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EVM की जगह जिस बैलेट पेपर की माँग कर रही थी कॉन्ग्रेस, झारखंड में उसी से मिली करारी हार: जानें- BJP से निपटने के लिए ठोस तरीका ढूँढने की राहुल को क्यों है जरूरत

झारखंड के नगर निकाय चुनावों 2026 के नतीजे सामने आने लगे हैं। इन नतीजों में साफ दिख रहा है कि झारखंड के सत्तारूढ़ INDI ब्लॉक से जनता का मोहभंग हो रहा है। राज्य की विपक्षी बीजेपी के उम्मीदवार झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM), कॉन्ग्रेस और सत्तारूढ़ गठबंधन समर्थित उम्मीदवारों पर भारी पड़ रहे हैं।

यूँ तो ये चुनाव बिना दलगत आधार पर लड़े गए थे लेकिन पार्टियों ने निर्दलीय उम्मीदवारों को ही अपना समर्थन दिया था। राज्य में 9 नगर निगम, 19 नगर परिषद और 20 नगर पंचायत के लिए चुनाव हुए थे जिनमें बीजेपी भारी पड़ी है। एक खास बात और है, वो ये कि ये चुनाव EVM से नहीं हुए थे बल्कि बैलेट पेपर से लड़े गए थे।

इन चुनाव नतीजों ने कॉन्ग्रेस समेत विपक्ष के उस नैरेटिव को भी बट्टा लिया दिया है जिसमें दावा किया जाता था कि बीजेपी EVM में गड़बड़ी कर चुनाव जीत लेती है। बीजेपी की इस जीत के बाद कर्नाटक में निकाय चुनाव EVM के बजाय बैलेट पेपर से कराने के कॉन्ग्रेस के फैसले पर भी सवाल उठने शुरू हो गए हैं।

कर्नाटक की सिद्धारमैया सरकार ने EVM के जरिए गड़बड़ी और वोट चारी का दावा करते हुए राज्य में निकाय चुनावों को बैलेट पेपर से कराने का ऐलान किया था। हालाँकि, पार्टी के भीतर ही इस फैसले पर दो फाड़ हो गई थी और कई नेताओं ने इसे पीछे ले जाने वाला फैसला बताते हुए विरोध किया था।

अब, झारखंड के चुनाव नतीजों के बाद कॉन्ग्रेस एक बार फिर अपने फैसले पर फिर से विचार करने पर मजबूर हो जाएगी। क्योंकि अगर झारखंड जैसा हाल कॉन्ग्रेस का कर्नाटक में भी हो गया, बीजेपी ने जीत हासिल कर ली तो पार्टी की तो फजीहत होगी ही साथ ही EVM के जरिए वोट चोरी के जिस मुद्दे को कॉन्ग्रेस को हवा दे रही है उस पर भी ब्रेक लग जाएगा।

ऐसे में पार्टी के भीतर इस फैसले पर जो असंतोष सामने आया है वो आगे और भी गहर सकता है। कॉन्ग्रेस के लिए कर्नाटक का मुद्दा इसलिए भी अहम है क्योंकि कर्नाटक में पहले ही मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और उप-मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार के बीच कुर्सी को लेकर खींचतान चल रही है। ऐसे में जरा सी चूक कॉन्ग्रेस के लिए भारी पड़ सकती है तो पार्टी को फूँक-फूँककर कदम रखना होगा।

मशीन नहीं, जनमत बोलता है

कॉन्ग्रेस चुनावों में हार को लेकर अक्सर यह तर्क देती आई है कि उसकी पराजय का एकमात्र कारण EVM है। EVM में गड़बड़ी से लेकर वोट चोरी जैसे मुद्दों को लेकर कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी अक्सर प्रेस कॉन्फ्रेंस करते दिखाई देते हैं।

ऐसे में बैलेट पेपर से आग झारखंड के नतीजों ने यह कम-से-कम इस बात पर तो मुहर लगाई ही है कि जनमत का फैसला किसी मशीन के हेर-फेर से नहीं बल्कि लोगों के वोट की सही ताकत के आधार पर ही हो रहा है।

चुनाव प्रक्रिया को तेज, पारदर्शी और कम विवादित बनाने के लिए देश में EVM को लागू किया गया था। खुद कॉन्ग्रेस ने इसके सहारे दर्जनों बार चुनाव जीते हैं। इसके बाद भी जब-जब कॉन्ग्रेस को हार मिली तो उसने आत्ममंथन के बजाय हार की ठीकरा EVM पर फोड़ना शुरू कर दिया। आत्ममंथन के नाम पर जो बैठकें हुई भीं, उनमें किसी की जवाबदेही नहीं तय की गई और EVM के नाम पर सब अपना-अपना पद बचाते रहे।

EVM पर ठीकरा फोड़ने के बजाय आत्ममंथन करे कॉन्ग्रेस

किसी भी राजनीतिक दल के लिए हार एक संकेत तो होती ही है। ये संकेत EVM पर उँगली उठकार बचने का नहीं बल्कि संगठन की कमजोरी, जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं की निष्क्रियता, स्थानीय मुद्दों से दूरी और नेतृत्व के प्रति लोगों की धारणा से जुड़े होते हैं।

पार्टी को दूसरे गैर जरूरी बातों के बजाय खुद से ये सवाल पूछने चाहिए कि क्या पार्टी का जमीनी ढाँचा मजबूत है? क्या स्थानीय नेतृत्व जनता से जुड़ा हुआ है? क्या चुनावी रणनीति समय के अनुरूप बदली गई है? इसके बजाय कॉन्ग्रेस बार-बार हार का कारण EVM को दिखाने की कोशिश करती हैं।

लोकतंत्र में विश्वास की नींव जनता के भरोसे पर टिकी होती है। यदि लगातार यह कहा जाए कि चुनाव प्रक्रिया ही संदिग्ध है, तो इससे लोकतांत्रिक संस्थाओं पर भी प्रश्नचिह्न लगता है। चुनाव आयोग की भूमिका लंबे समय से निष्पक्ष चुनाव कराने की रही है, कई बार कुछ लोगों पर सवाल उठे भी तो वो ऐसे नहीं रहे कि पूरी प्रक्रिया तो ही खराब मान लिया जाए।

संस्था की साख पर बट्टा लगाया जाए। अब कॉन्ग्रेस बार-बार चुनाव प्रक्रिया, EVM पर सवाल उठाकर संस्था की साख को बट्टा लगाने का ही काम कर रही है। झारखंड के निकाय चुनावों ने यह स्पष्ट संकेत दिया है कि हार-जीत का फैसला अंत में मतदाता को ही करना होता है। बैलेट हो या EVM, जनता का फैसला ही सबसे ऊपर है। यदि कॉन्ग्रेस को लगातार हार या चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है तो उसे अपनी रणनीति, संगठन और नेतृत्व पर पुनर्विचार करना ही होगा।

राहुल गाँधी और कॉन्ग्रेस के सामने तो BJP जैसा संगठित और कैडर आधारित दल है जो जमीनी काम पर भरोसा रखता है ऐसे में उसके लिए चुनौती और गंभीर है। हर चुनाव में हार के बाद EVM पर सवाल उठाने से थोड़े समय तक और कुछ लोगों तक एक राजनीतिक संदेश तो दिया जा सकता है लेकिन पार्टी के लिए समाधान आत्ममंथन और अपने भीतर सुधार से ही निकलेगा। लोकतंत्र में भरोसा बनाए रखने के लिए जरूरी है कि राजनीतिक दल जनता के फैसले को स्वीकार करें और अपनी कमियों को दूर करने के लिए काम करें।

चाचा शिवपाल और माता प्रसाद जैसे वरिष्ठों को किनारे कर अखिलेश ने PK को बना लिया ‘राजनीतिक गुरु’, बैकडोर से I-पैक का काम शुरू: 2017 से नहीं लिया सबक?

समाजवादी पार्टी (सपा) की 2027 उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की तैयारियों के बीच एक ऐसा रणनीतिक फेरबदल हो रहा है, जो न केवल पार्टी की आंतरिक संरचना बल्कि उसकी पूरी चुनावी संस्कृति को बदलने का संकेत दे रहा है। अखिलेश यादव ने चाचा शिवपाल सिंह यादव और वरिष्ठ नेता माता प्रसाद पांडेय जैसे अनुभवी, पारंपरिक और परिवार से जुड़े चेहरों को रणनीतिक रूप से दरकिनार करते हुए प्रशांत किशोर (पीके) और उनकी संस्था इंडियन पॉलिटिकल एक्शन कमिटी (आई-पैक) को अपना नया ‘राजनीतिक गुरु’ बना लिया है।

हालाँकि सूत्रों की मानें तो पीके खुलकर सामने नहीं आएँगे, बल्कि बैकडोर से अखिलेश को आधुनिक, डेटा-आधारित और माइक्रो-मैनेजमेंट वाली चुनावी राजनीति का नया ‘ककहरा’ सिखाएँगे। यह बदलाव सपा के पारंपरिक समाजवादी-परिवारवादी मॉडल से पेशेवर-कॉर्पोरेट मॉडल की ओर संक्रमण का प्रतीक है।

पारंपरिक नेतृत्व को अखिलेश यादव ने ‘लगाया’ किनारे

शिवपाल सिंह यादव सपा के संस्थापक मुलायम सिंह यादव के छोटे भाई हैं। 2016-17 में अखिलेश-शिवपाल कलह ने पार्टी को बुरी तरह विभाजित किया था। शिवपाल ने कैबिनेट से इस्तीफा दिया, नई पार्टी बनाई (प्रगतिशील समाजवादी पार्टी लोहिया), लेकिन 2022-23 में उनकी सपा में वापसी हुई। जनवरी 2023 में उन्हें राष्ट्रीय महासचिव बनाया गया। वे जसवंतनगर से छठी बार विधायक हैं। इसके बावजूद 2027 क चुनावी रणनीति में शिवपाल की कोई प्रमुख भूमिका दिखाई नहीं दे रही। अखिलेश ने 2017 की याद में शिवपाल की नाराजगी को पहले ही किनारे कर लिया है। तब शिवपाल की बगावत ने सपा को भारी नुकसान पहुँचाया था। अब पेशेवर टीम पर भरोसा बढ़ने से पुराने कार्यकर्ता और परिवारिक अनुभव दरकिनार हो रहे हैं।

माता प्रसाद पाण्डेय (81 वर्ष) सपा के वरिष्ठ ब्राह्मण चेहरा हैं। सात बार विधायक, पूर्व मंत्री और स्पीकर रहे हैं। जुलाई 2024 में अखिलेश ने उन्हें विधानसभा में विपक्ष का नेता बनाया था, जो भाजपा के ऊपरी जाति वोट को काटने की रणनीति की तरह रही।

हालाँकि इस बार इन वरिष्ठ नेताओं को दरकिनार करना केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि सिस्टेमैटिक है। अखिलेश का फोकस अब ‘पेड प्रोफेशनल टीम’ पर है, जिसमें उच्च पैकेज वाले सलाहकार, डेटा एनालिस्ट और डिजिटल एक्सपर्ट शामिल हैं। ऐसे में पारंपरिक कार्यकर्ता, जो दशकों से पार्टी का झंडा उठाते रहे वे खुद को निर्णयाक प्रक्रिया से बाहर महसूस कर रहे हैं। पार्टी अंदरूनी सूत्रों के अनुसार, असंतोष पनप रहा है, हालाँकि अभी ये खुलकर सामने नहीं आया है, लेकिन चुनाव नजदीक आते-आते सबकुछ साफ दिखने लगेगा।

सपा की चुनावी यात्रा: 2022 की हार से 2024 की उम्मीद तक

साल 2022 के विधानसभा चुनाव में सपा ने 111 सीटें जीतीं, लेकिन भाजपा के 255 के मुकाबले सत्ता से दूर रही। 2024 लोकसभा चुनाव में सपा ने इंडिया गठबंधन के सहारे 37 सीटें हासिल कीं, यह उसकी सबसे बड़ी वापसी थी। अखिलेश यादव ने बेरोजगारी, कानून-व्यवस्था और महँगाई जैसे मुद्दों पर हमला तेज किया। पार्टी के अंदर यह धारणा मजबूत हुई कि 2027 ‘डू ऑर डाई’ की लड़ाई है।

पार्टी सूत्रों के मुताबिक, अखिलेश ने दिसंबर 2025 में दिल्ली में आई-पैक टीम (प्रतिक जैन सहित) से मुलाकात की। पश्चिम बंगाल यात्रा के दौरान और बातचीत हुई। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने सलाह दी कि उच्च दाँव वाली लड़ाई के लिए आई-पैक को शामिल किया जाए। 28 मार्च 2026 को नोएडा से पीडीए (पिछड़े, दलित, अल्पसंख्यक) भागीदारी रैली के साथ अभियान शुरू होगा, वो भी चुनाव से लगभग एक साल पहले ही।

सपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष किरणमय नंदा ने मनीकंट्रोल को बताया, “आई-पैक की टीम यूपी में मैदान पर काम शुरू कर चुकी है। वे विभिन्न स्तरों पर स्टेकहोल्डर्स से मिल रही है, पार्टी कार्यकर्ताओं, सामाजिक समूहों और स्थानीय प्रभावशाली लोगों से बात कर रही है तथा जिला-वार राजनीतिक हकीकत का मानचित्रण कर रही है। वे जिला और बूथ स्तर पर अभियान को बेहतर बनाने, आउटरीच प्लान सुझाने, स्पष्ट मैसेजिंग और रोजमर्रा के मुद्दों से जुड़े आकर्षक नारे गढ़ने में मदद करेंगी। फोकस अंतिम मतदाता तक पार्टी का संदेश पहुंचाने और चुनाव से बहुत पहले मजबूत ग्राउंड कनेक्ट बनाने पर है।”

यह स्पष्ट है कि अखिलेश अब पारंपरिक ‘सड़क पर उतरकर’ अभियान के साथ-साथ डेटा एनालिटिक्स, डिजिटल नैरेटिव और पेशेवर माइक्रो-मैनेजमेंट पर भरोसा कर रहे हैं। पार्टी सूत्रों में हजार करोड़ रुपये तक के खर्च की चर्चा है, हालाँकि खर्चे की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई।

पीके और I-पैक, अब बैकडोर गुरु की रणनीति पर भरोसा

प्रशांत किशोर ने आई-पैक की स्थापना की थी। अब यह प्रतीक जैन के नेतृत्व में है। पीके खुद जन सुराज पार्टी के जरिए 2025 बिहार चुनाव में उतरे, लेकिन शून्य सीटें मिलीं, ये उनकी अब तक की सबसे बड़ी असफलता है। इसी चुनाव में उन्होंने जेडीयू को 25 से कम सीटें देने का दावा किया, लेकिन जेडीयू ने 85 सीटें जीत ली। ऐसे में उनका हालिया प्रदर्शन बेहद खराब ही कहा जाएगा और फिर बात करें यूपी में उनके अतीत के काम की, तो वो भी फेल ही रही है।

दरअसल, यूपी 2017 में कॉन्ग्रेस के लिए दिया उनका ’27 साल यूपी बेहाल’ नारा विफल रहा। तब आई-पैक और सपा की टीमें जगन्नाथ मिश्र ट्रस्ट बिल्डिंग में साथ बैठती थीं, लेकिन गठबंधन के बावजूद सपा 47 और कॉन्ग्रेस 7 सीटों पर सिमट गई थी।

लेकिन जानकारों का कहना है कि अब पीके सामने से काम करने की जगह बैकडोर से काम करेंगे। वे खुलकर नहीं आएँगे, लेकिन रणनीति, नैरेटिव, स्लोगन और बूथ-लेवल माइक्रो-मैनेजमेंट सिखाएँगे। जिसमें वो अखिलेश को सोशल मीडिया से परे, डेटा-ड्रिवन टारगेटिंग, स्विंग एरिया आइडेंटिफिकेशन और मुद्दों (बेरोजगारी, कानून-व्यवस्था) पर नैरेटिव सेट करने का ‘नया ककहरा’ सिखाएँगे। वैसे, खुद पीके बिहार चुनाव के समय कह चुके हैं कि वो ‘सलाह’ देने के बदले करोड़ों रुपए लेते हैं, वही पैसे वो बिहार में खर्च कर रहे हैं।

पार्टी के अंदर असमंजस और चुनौतियाँ

पीके और आईपैक के समाजवादी पार्टी से जुड़ने की खबरों से पुराने कार्यकर्ताओं में असंतोष स्पष्ट है। हजारों कार्यकर्ता जो रैलियाँ, बैठकें और बूथ संभालते आए हैं, अब वो ‘पेड टीम’ के सामने ‘सेकेंडरी’ महसूस कर रहे हैं। ऐसे में भारी बजट (अटकलें हजार करोड़ की) और आकर्षक पैकेज वाले एक्सपर्ट्स से ‘अंदरखाने’ बेचैनी बढ़ी है।

अखिलेश का यह कदम साहसी है, लेकिन जोखिम भरा भी है। पारंपरिक अनुभव और परिवारिक नेतृत्व को दरकिनार कर पीके को ‘गुरु’ बनाना सपा को नई ऊँचाई दे सकता है या गहरी दरार, ये एक बड़ा सवाल है। ऐसे में साल 2027 के विधानसभा चुनाव के नतीजे तय करेंगे कि बैकडोर गुरु का ‘ककहरा’ सपा को सत्ता दिला पाएगी या ये भी सिर्फ एक प्रयोग साबित होगा।

सेना को नहीं दी AI की खुली छूट, तो ट्रंप सरकार ने एंथ्रोपिक पर ऐसे की ‘सर्जिकल स्ट्राइक’: जानें- इसका क्या पड़ सकता है भविष्य पर असर

ट्रंप प्रशासन और क्लाउड एआई (Claude AI) बनाने वाली कंपनी एंथ्रोपिक के बीच का विवाद अब आर-पार की जंग में बदल गया है। सरकार ने कंपनी पर देशव्यापी फेडरल बैन लगाने के साथ ही उसे पेंटागन की ब्लैकलिस्ट में भी डाल दिया है। इसके अलावा, राज्य स्तर पर भी कंपनी पर दबाव बढ़ाया जा रहा है। माना जा रहा है कि इन सख्त कदमों का मकसद एंथ्रोपिक को उसके AI सुरक्षा नियमों (Safety Restrictions) को हटाने के लिए मजबूर करना है।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 27 फरवरी को ‘ट्रुथ सोशल’ पर एक लंबी पोस्ट के जरिए एंथ्रोपिक (Anthropic) पर प्रतिबंध लगाने की घोषणा की और इसे राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा बताया। उनके इस स्टैंड का युद्ध सचिव पीट हेगसेथ ने भी समर्थन किया। दोनों नेताओं का मानना है कि एंथ्रोपिक द्वारा अपने AI पर लगाई गई पाबंदियाँ एक निजी कंपनी द्वारा यह तय करने की अस्वीकार्य कोशिश है कि अमेरिका युद्ध कैसे लड़ेगा।

व्हाइट हाउस और एंथ्रोपिक के बीच विवाद इस बात पर नहीं है कि कंपनी अमेरिकी सेना के साथ काम करेगी या नहीं। कंपनी के मुताबिक, वह पहले से ही उनके साथ बड़े स्तर पर जुड़ी हुई है। असली लड़ाई उन ‘सुरक्षा नियमों’ (guardrails) को लेकर है, जिन्हें सेना पूरी तरह हटाना चाहती है। इसमें बड़े पैमाने पर घरेलू जासूसी और ऐसे पूरी तरह स्वायत्त हथियार (autonomous weapons) शामिल हैं, जिनमें इंसानी नियंत्रण की जरूरत नहीं होती।

एंथ्रोपिक का कहना है कि ये दोनों ही इस्तेमाल खतरनाक हैं, लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ हैं और आज की AI तकनीक के लिए सुरक्षित नहीं हैं। हालाँकि, अमेरिकी राष्ट्रपति कंपनी के इस तर्क से सहमत नहीं हैं।

गतिरोध किस वजह से शुरू हुआ?

एंथ्रोपिक के CEO डारियो अमोदेई ने एक बयान में कहा कि उनका AI मॉडल ‘क्लाउड’ पहले से ही अमेरिकी युद्ध विभाग और अन्य सुरक्षा एजेंसियों के साथ इंटेलिजेंस विश्लेषण, ऑपरेशनल प्लानिंग और साइबर ऑपरेशंस जैसे महत्वपूर्ण कार्यों में लगा हुआ है। उन्होंने यह भी दावा किया कि कंपनी ने राष्ट्रीय सुरक्षा के हित में अपने मुनाफे तक की परवाह नहीं की और चीनी कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़ी कंपनियों पर रोक लगाने के साथ-साथ चिप निर्यात के कड़े नियमों का समर्थन किया।

इसके बावजूद, युद्ध विभाग चाहता है कि एंथ्रोपिक अपने सुरक्षा नियमों (safeguards) को हटाए और ‘किसी भी कानूनी उपयोग’ की अनुमति दे। युद्ध सचिव हेगसेथ ने साफ कर दिया है कि सरकार किसी भी सप्लायर की शर्तें स्वीकार नहीं करेगी और राष्ट्रीय सुरक्षा की कानूनी जरूरतें ही एकमात्र पैमाना होनी चाहिए।

एंथ्रोपिक की रेड लाइन्स, मास सर्विलांस और सभी AI हथियार

एंथ्रोपिक के CEO डारियो अमोदेई ने अपने बयान में दो मुख्य श्रेणियों के बीच एक स्पष्ट रेखा खींची है, जिसमें पहली श्रेणी है- बड़े पैमाने पर घरेलू जासूसी (Mass Domestic Surveillance)। एंथ्रोपिक का तर्क है कि AI के जरिए बड़े स्तर पर की जाने वाली जासूसी बुनियादी स्वतंत्रता के लिए नए किस्म के खतरे पैदा करती है। कंपनी का कहना है कि कानून अभी AI की उस क्षमता के मुकाबले बहुत पीछे है, जिससे वह बिखरे हुए और सामान्य से लगने वाले डेटा को आपस में जोड़कर किसी भी व्यक्ति के जीवन की एक बेहद निजी और पूरी तस्वीर खुद-ब-खुद तैयार कर सकता है। संक्षेप में कहें तो, उन्हें डर है कि फ्रंटियर एआई मॉडल्स के कारण सरकार की आंतरिक जासूसी करने की शक्ति कई गुना बढ़ जाएगी, जो नागरिकों की गोपनीयता के लिए खतरनाक है।

‘इंटरनल ड्रैगनेट’ (Internal dragnet) का सीधा मतलब एक ऐसे व्यापक निगरानी तंत्र से है जिसका निशाना विदेशी दुश्मन नहीं, बल्कि देश के अपने ही नागरिक होते हैं। इसका अर्थ यह है कि सरकार AI जैसे शक्तिशाली हथियारों का इस्तेमाल करके बड़े पैमाने पर आम नागरिकों का डेटा इकट्ठा और विश्लेषण करती है, ताकि उनकी हर गतिविधि, संपर्क और व्यवहार पर नजर रखी जा सके। आसान भाषा में कहें तो यह किसी खास अपराधी की जाँच करने के बजाय पूरी जनता पर फेंके गए एक विशाल मछली पकड़ने वाले जाल जैसा है।

दूसरी श्रेणी पूरी तरह से स्वायत्त हथियार (Fully Autonomous Weapons) हैं- यानी ऐसे सिस्टम जो बिना किसी इंसानी दखल के खुद निशाना चुनते हैं और हमला करते हैं। एंथ्रोपिक का मानना है कि आज की AI तकनीक इतनी भरोसेमंद नहीं है कि उसे ऐसे हथियारों की कमान सौंपी जा सके। इसके अलावा, बिना मानवीय निगरानी के इन सिस्टमों पर वह सूझबूझ दिखाने का भरोसा नहीं किया जा सकता जो एक प्रशिक्षित सैनिक दिखाता है। खबरों के मुताबिक, एंथ्रोपिक ने इस तकनीक को सुरक्षित बनाने के लिए रिसर्च में मदद की पेशकश की थी, लेकिन सरकार ने उसे ठुकरा दिया।

कंपनी का स्टैंड यह नहीं है कि स्वायत्त हथियारों की कभी जरूरत ही नहीं पड़ेगी। उनका तर्क सिर्फ इतना है कि फिलहाल न तो तकनीक उतनी तैयार है और न ही इसकी निगरानी का कोई ठोस ढाँचा मौजूद है। ऐसे में एक छोटी सी गलती के परिणाम भी बेहद विनाशकारी हो सकते हैं।

ट्रंप का आदेश, तुरंत रोक और छह महीने का चरणबद्ध समापन

पेंटागन की समय सीमा समाप्त होने के बाद, राष्ट्रपति ट्रंप ने ‘ट्रुथ सोशल’ पर एक पोस्ट के जरिए सभी संघीय एजेंसियों को एंथ्रोपिक (Anthropic) की तकनीक का इस्तेमाल तुरंत बंद करने का आदेश दिया है। इस आदेश के तहत युद्ध विभाग और उन अन्य एजेंसियों के लिए छह महीने की समय सीमा (Phase out) तय की गई है जहाँ एंथ्रोपिक के टूल्स सिस्टम का हिस्सा बन चुके हैं। इस कदम का मकसद सरकारी कामकाज में बिना किसी बड़ी बाधा के, कंपनी को सिस्टम से तेजी से बाहर करना है।

ट्रंप ने जिस टकरावपूर्ण भाषा का इस्तेमाल किया, उसमें स्पष्ट रूप से एक राजनीतिक लहजा झलकता है। उन्होंने एंथ्रोपिक पर युद्ध विभाग को धमकाने (strong arm) का आरोप लगाया और उसे एक ‘कट्टरपंथी वामपंथी’ (radical left) कंपनी करार दिया। ट्रंप ने चेतावनी दी कि यदि कंपनी ने इस ‘फेज-आउट’ प्रक्रिया के दौरान सहयोग नहीं किया, तो वे राष्ट्रपति पद की ‘पूरी शक्ति’ का उपयोग करेंगे, जिसके ‘बड़े नागरिक और आपराधिक परिणाम’ हो सकते हैं।

राजनीतिक बयानबाजी अपनी जगह है, लेकिन इसका व्यावहारिक असर बिल्कुल साफ है। एक ऐसी कंपनी जो कभी संवेदनशील सरकारी प्रणालियों का हिस्सा थी, अब उसे पूरे संघीय इकोसिस्टम से बाहर करने के लिए सरकारी स्तर पर बड़े पैमाने पर अभियान शुरू कर दिया गया है।

सप्लाई चेन रिस्क लेबल, कॉन्ट्रैक्टर इकोसिस्टम के लिए मौत का गला घोंटने वाला है

ट्रंप द्वारा एंथ्रोपिक पर किए गए हमले यहीं नहीं रुके। युद्ध सचिव हेगसेथ ने घोषणा की है कि युद्ध विभाग अब एंथ्रोपिक को ‘राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए सप्लाई चेन का खतरा‘ (supply chain risk) घोषित करेगा। इसके साथ ही यह भी आदेश दिया गया है कि अमेरिकी सेना के साथ काम करने वाला कोई भी ठेकेदार (contractor), सप्लायर या पार्टनर अब एंथ्रोपिक के साथ किसी भी तरह का व्यावसायिक लेन-देन नहीं कर सकेगा।

इसे विवाद के सबसे बड़े मोड़ के रूप में देखा जा सकता है। यह केवल सरकार द्वारा अपना खुद का उपयोग बंद करने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह रक्षा ठेकेदारों और सैन्य विक्रेताओं के विशाल नेटवर्क को स्पष्ट संदेश है कि वे एंथ्रोपिक (Anthropic) के साथ किसी भी व्यावसायिक स्तर पर संपर्क नहीं रख सकते। एंथ्रोपिक के अनुसार, इस तरह का कड़ा रुख ऐतिहासिक रूप से केवल अमेरिकी दुश्मनों के खिलाफ अपनाया जाता रहा है, और किसी अमेरिकी कंपनी के खिलाफ इसका इस्तेमाल अभूतपूर्व है।

व्यावहारिक रूप से, यह लेबल एक ‘चोक पॉइंट’ (दम घोंटने वाले कदम) की तरह काम करता है। अमेरिका की अधिकांश बड़ी कंपनियाँ प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से पेंटागन को अपनी सेवाएँ बेचती हैं। यदि इन कंपनियों को एंथ्रोपिक के साथ व्यापार करने से रोक दिया जाता है, तो एंथ्रोपिक की साझेदारियाँ, वितरण चैनल, क्लाउड व्यवस्थाएँ और तकनीक को जोड़ने वाली सभी कड़ियाँ पूरी तरह ठप हो सकती हैं।

पार्टनर्स पर दबाव, डाइवेस्टमेंट की अफवाहें और इंडस्ट्री के लिए डरावना मैसेज

केवल एंथ्रोपिक ही अकेली ऐसी कंपनी नहीं है जो व्हाइट हाउस के भारी दबाव और गुस्से का सामना कर रही है। कुछ रिपोर्टों के अनुसार, युद्ध सचिव हेगसेथ अब एनवीडिया, अमेजन और गूगल जैसी दिग्गज टेक कंपनियों पर भी दबाव बना रहे हैं कि वे एंथ्रोपिक से अपने शेयर वापस लें और अपनी साझेदारियाँ खत्म करें। इसके पीछे का तर्क सीधा है- अगर एंथ्रोपिक को ‘सप्लाई चेन के लिए खतरा’ माना जाता है, तो रक्षा क्षेत्र से जुड़ी कोई भी बड़ी कंपनी जोखिम उठाने के बजाय एंथ्रोपिक से नाता तोड़ना ही सुरक्षित समझेगी।

यह कदम केवल खरीदारी से जुड़ा फैसला नहीं है, बल्कि एक दबावकारी अभियान है। इसे अमेरिकी सरकार, खासकर सैन्य अनुबंधों (military contracts) के साथ काम करने वाले पूरे एआई उद्योग के लिए एक चेतावनी के रूप में देखा जाना चाहिए। संदेश साफ है: या तो सरकार की शर्तों पर कॉन्ट्रैक्ट साइन करें, या फिर ऐसी ब्लैकलिस्ट का सामना करें जो दूसरी कंपनियों को भी आपसे दूर रहने पर मजबूर कर देगी।

एंथ्रोपिक का जवाब, कोर्ट में चुनौती और हार मानने से इनकार

एंथ्रोपिक ने स्पष्ट कर दिया है कि वह ‘सप्लाई चेन रिस्क’ के इस टैग को अदालत में चुनौती देगा। कंपनी ने इस कदम को कानूनी रूप से गलत बताया है और चेतावनी दी है कि यह सरकार के साथ काम करने वाली किसी भी अमेरिकी कंपनी के लिए एक खतरनाक मिसाल पेश करता है। कंपनी ने यह भी कहा है कि वह अन्य प्रदाताओं के साथ तालमेल बिठाने में मदद करेगी ताकि सैन्य योजनाएँ और ऑपरेशन प्रभावित न हों, लेकिन उसने साफ कर दिया है कि वह अपनी नैतिकता और सिद्धांतों के खिलाफ जाकर उन दो सुरक्षा नियमों (safeguards) को नहीं हटा सकती।

दूसरे शब्दों में, एंथ्रोपिक अलग होने की प्रक्रिया (offboarding) में सहयोग की पेशकश तो कर रहा है, लेकिन अपने सिद्धांतों से समझौता करने को तैयार नहीं है।

एंथ्रोपिक से परे यह क्यों मायने रखता है

यह पूरा घटनाक्रम केवल एंथ्रोपिक और अमेरिकी सरकार के बीच के टकराव तक सीमित नहीं है। ट्रंप प्रशासन का तर्क है कि सेना के पास अपने द्वारा खरीदे गए उपकरणों पर पूरा नियंत्रण होना चाहिए और कोई भी निजी कंपनी उनके उपयोग पर अपनी शर्तें नहीं थोप सकती। दूसरी ओर, एंथ्रोपिक का मानना है कि कुछ क्षमताएँ इतनी खतरनाक हैं कि उन्हें फिलहाल अनुमति नहीं दी जा सकती, खासकर तब जब एआई अभी भी गलतियाँ करने और ‘भ्रम’ (hallucinations) पैदा करने के लिए कुख्यात है। जब मामला देश के नागरिकों की जासूसी करने या मशीनों को जानलेवा फैसले लेने की छूट देने का हो, तो मानवीय निगरानी की कमी विनाशकारी साबित हो सकती है।

राष्ट्रीय सुरक्षा के समर्थकों को भी इस उदाहरण (precedent) पर विचार करने की जरूरत है। यदि कोई सरकार किसी घरेलू कंपनी को सिर्फ इसलिए ‘सप्लाई चेन का खतरा’ बताकर ब्लैकलिस्ट कर देती है क्योंकि उसने जासूसी या स्वायत्त हथियारों का हिस्सा बनने से मना कर दिया, तो यह एक साफ संकेत है कि नैतिकता पर निजी क्षेत्र की असहमति को सरकारी खरीद की शक्ति के जरिए कुचला जाएगा।

सबसे चिंताजनक बात तीखी बयानबाजी नहीं, बल्कि इसके पीछे का तरीका (mechanism) है। ‘सप्लाई चेन रिस्क’ का लेबल अब केवल कॉन्ट्रैक्ट विवाद सुलझाने का जरिया नहीं रह गया है। इसे किसी भी संस्था को रक्षा क्षेत्र के पूरे इकोसिस्टम से अलग-थलग करने के लिए डिजाइन किया गया है। इस तरह का इस्तेमाल राष्ट्रीय सुरक्षा खरीद को एक ऐसे हथियार में बदल देता है, जो ताकत के दम पर पूरे एआई उद्योग की दिशा बदल सकता है।

सिद्धांतों की जंग: एंथ्रोपिक बनाम अमेरिकी सरकार

एंथ्रोपिक का दावा है कि उसने अपनी पूरी पहचान ‘एआई सुरक्षा’ (AI Safety) के दम पर बनाई है, और उसने घरेलू स्तर पर बड़े पैमाने पर जासूसी और बिना मानवीय निगरानी वाले पूर्ण स्वायत्त हथियारों के इस्तेमाल को लेकर अपनी ‘लक्ष्मण रेखा’ खींच दी है। इसके जवाब में ट्रंप प्रशासन ने कंपनी पर दोतरफा कड़ा प्रहार किया है- पहला, पूरी संघीय सरकार में इसके उपयोग पर तत्काल रोक का आदेश, और दूसरा, पेंटागन द्वारा इसे ‘सप्लाई चेन के लिए खतरा’ घोषित करना। यह कदम एंथ्रोपिक को रक्षा अर्थव्यवस्था से जुड़े तमाम पार्टनर्स और ठेकेदारों से पूरी तरह काटने की क्षमता रखता है।

फिलहाल, वाशिंगटन का संदेश बिल्कुल स्पष्ट और कड़ा है। या तो कोई एआई कंपनी सरकार की शर्तों पर सेना को असीमित पहुँच दे, या फिर एक ‘दुश्मन’ की तरह बर्ताव झेलने के लिए तैयार रहे, जिसके परिणाम उसके व्यापार का दम घोंट सकते हैं।

(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी भाषा में अनुराग द्वारा लिखी गई है। अंग्रेजी की रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

WhatsApp समेत सभी मैसेजिंग ऐप्स पर 1 मार्च 2026 से सिम-बाइंडिंग अनिवार्य, रजिस्टर्ड सिम हटाते ही सेवा बंद: जानें- आम यूजर्स पर क्या होगा इसका असर

दूरसंचार विभाग (DoT) ने 28 नवंबर 2025 को व्हाट्सएप, टेलीग्राम, सिग्नल, स्नैपचैट, शेयरचैट, जियोचैट, अराटई और जोश जैसे लोकप्रिय मैसेजिंग और कम्युनिकेशन ऐप्स को औपचारिक निर्देश जारी किए थे कि उनकी सेवाएँ तभी चलें, जब संबंधित मोबाइल फोन में वही सही और रजिस्टर्ड सिम कार्ड लगा हो।

इन कंपनियों को इस नियम को लागू करने के लिए 90 दिनों का समय दिया गया था, जिसकी अवधि शनिवार (28 फरवरी 2026) को पूरी हो रही है। साथ ही 120 दिनों के भीतर नियमों को ममाने का रिपोर्ट भी जमा करने को कहा गया था। ऐसे में यह नई व्यवस्था रविवार (1 मार्च 2026) से प्रभावी होने जा रही है।

ये दिशानिर्देश DoT की AI और डिजिटल इंटेलिजेंस यूनिट की ओर से जारी किए गए हैं, जिसे टेलीकम्युनिकेशन आइडेंटिटी यूजर एंटिटीज (TIUEs) यानी ऐसे ऑनलाइन प्लेटफॉर्म जो मोबाइल नंबर को पहचान के तौर पर इस्तेमाल करते हैं, उनको नियंत्रित करने के लिए अधिक अधिकार दिए गए हैं।

सरकार ने साफ चेतावनी दी है कि नियमों का पालन न करने पर टेलीकॉम साइबर सिक्योरिटी नियम, टेलीकम्युनिकेशंस एक्ट 2023 और अन्य संबंधित कानूनों के तहत कानूनी कार्रवाई की जा सकती है।

संचार मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने ‘राइजिंग भारत समिट 2026’ में बातचीत के दौरान कहा कि “सिम-बाइंडिंग नियम लागू रहेगा और हमें उम्मीद है कि सभी सेवा प्रदाता इसमें शामिल होंगे।” उन्होंने इसे समय की जरूरत बताया।

नए टेलीकॉम सुरक्षा मानकों के मुताबिक, मैसेजिंग ऐप्स को यह सुनिश्चित करना होगा कि अगर कोई अकाउंट अलग-अलग डिवाइस पर इस्तेमाल हो रहा है, तो व्हाट्सएप वेब जैसी वेब सेवाओं से हर छह घंटे में अपने आप लॉगआउट हो जाए।

हालाँकि जिस डिवाइस में रजिस्टर्ड सिम कार्ड लगा होगा, वहाँ यह लॉगआउट लागू नहीं होगा। ऐप्स को यह भी जाँचना होगा कि जिस मोबाइल नंबर से अकाउंट बना है, वही सिम मुख्य मोबाइल डिवाइस में मौजूद है।

अगर रजिस्टर्ड सिम फोन में नहीं मिला, तो सेवा तुरंत बंद करनी होगी। केंद्र सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि रोमिंग के दौरान यदि सिम कार्ड फोन में सक्रिय है, तो यूजर्स पर इसका कोई असर नहीं पड़ेगा।

SIM-बाइंडिंग क्या है?

अभी तक ज्यादातर मैसेजिंग ऐप्स इंस्टॉल करते समय यूजर के मोबाइल नंबर पर भेजे गए OTP (वन टाइम पासवर्ड) से उसकी पहचान की पुष्टि करते हैं। एक बार वेरिफिकेशन हो जाने के बाद ऐप चलता रहता है, भले ही सिम कार्ड फोन से निकाल दिया जाए, बदल दिया जाए या बंद ही क्यों न कर दिया जाए। इसी तरह ऐप के वेब वर्जन भी OTP या QR कोड से लॉगिन होकर काम करते हैं, जहाँ कंप्यूटर जैसे दूसरे डिवाइस पर भी अकाउंट चलाया जा सकता है, चाहे रजिस्ट्रेशन वाला सिम उस डिवाइस में मौजूद न हो।

सरकार का मानना है कि इसी व्यवस्था का फायदा उठाकर बड़े पैमाने पर धोखाधड़ी और दुरुपयोग हो रहा है। इसलिए अब इस पूरी प्रणाली को बदलने का फैसला किया गया है।

इसी के तहत सिम-बाइंडिंग नाम का नया सुरक्षा उपाय लागू किया गया है, जिसमें मैसेजिंग ऐप को सीधे उस सिम कार्ड से जोड़ा जाएगा, जिससे अकाउंट रजिस्टर हुआ है। अब ऐप तभी काम करेगा, जब रजिस्टर्ड सिम उसी स्मार्टफोन में लगा रहेगा। यानी जैसे ही सिम निकाला जाएगा, ऐप की सेवाएँ बंद हो जाएँगी।

यह निर्देश नवंबर 2024 में केंद्र सरकार द्वारा जारी किए गए टेलीकम्युनिकेशंस (टेलीकॉम साइबर सिक्योरिटी) नियमों के बाद आया है। इन नियमों के तहत टेलीकॉम सेवा प्रदाताओं को किसी भी सुरक्षा घटना की जानकारी 24 घंटे के भीतर देनी अनिवार्य किया गया था। साथ ही उन्हें मजबूत साइबर सुरक्षा व्यवस्था लागू करने, एक मुख्य टेलीकम्युनिकेशन सुरक्षा अधिकारी (Chief Telecommunication Security Officer) नियुक्त करने और नए नियमों के पालन की निगरानी करने के निर्देश दिए गए थे। सरकार को यह अधिकार भी दिया गया कि वह साइबर सुरक्षा मजबूत करने के लिए टेलीकॉम कंपनियों से  नॉन कंटेन्ट  और ट्रैफिक डेटा ले सके।

आधिकारिक बयान में कहा गया है कि दूरसंचार विभाग (DoT) के जाँच में यह पाया गया कि कुछ ऐप आधारित कम्युनिकेशन सेवाएँ, जो भारतीय मोबाइल नंबर को पहचान के रूप में इस्तेमाल करती हैं, यूजर्स को बिना उस मूल सिम कार्ड के भी सेवा इस्तेमाल करने की अनुमति देती हैं। खासकर विदेश में बैठे साइबर अपराधी इसी खामी का फायदा उठाकर ठगी और अन्य आपराधिक गतिविधियाँ चला रहे हैं।

मैसेजिंग ऐप्स में सिम-बाइंडिंग और उसके दुरुपयोग का मुद्दा एक इंटर मिनिस्ट्रियल पैनल और अन्य सरकारी एजेंसियों ने उठाया था। इसके बाद दूरसंचार विभाग (DoT) ने ऐप-आधारित कम्युनिकेशन सेवाएँ देने वाली बड़ी कंपनियों के साथ कई दौर की बैठकों में इस विषय की व्यवहारिकता और जरूरत पर चर्चा की।

लंबी चर्चा के बाद अंततः टेलीकम्युनिकेशन पहचान (Telecommunication Identifiers) के दुरुपयोग को रोकने और पूरे टेलीकॉम सिस्टम की सुरक्षा व विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए औपचारिक आदेश जारी किया गया।

निर्देशों के अनुसार, अब इन ऐप-आधारित कम्युनिकेशन सेवाओं को निम्नलिखित शर्तों का पालन करना होगा:

यह सुनिश्चित करें कि ऐप-आधारित कम्युनिकेशन सेवाएँ हमेशा उसी सिम कार्ड से जुड़ी रहें, जो ग्राहक या उपयोगकर्ता की पहचान, सेवा उपलब्ध कराने या डिलीवरी के लिए इस्तेमाल किए गए मोबाइल नंबर से लिंक है और जो डिवाइस में इंस्टॉल है। इससे बिना उस विशेष सक्रिय सिम के ऐप खुल नहीं सकेगा।

यह सुनिश्चित करें कि यदि मोबाइल ऐप की वेब सेवा उपलब्ध कराई जाती है, तो उसे समय-समय पर लॉगआउट किया जाए (अधिकतम छह घंटे के भीतर) और डिवाइस को दोबारा QR कोड के माध्यम से कनेक्ट करने का विकल्प दिया जाए।

नोटिफिकेशन में कहा गया है, “DoT के सिम-बाइंडिंग निर्देश एक ठोस सुरक्षा खामी को दूर करने के लिए बेहद जरूरी हैं, जिसका फायदा साइबर अपराधी बड़े पैमाने पर, कई बार सीमा पार से, डिजिटल ठगी चलाने में कर रहे हैं। इंस्टेंट मैसेजिंग और कॉलिंग ऐप्स पर बने अकाउंट उस सिम के हटाने, बंद करने या विदेश ले जाने के बाद भी चलते रहते हैं। इसी वजह से भारतीय नंबरों का इस्तेमाल कर गुमनाम ठगी, रिमोट ‘डिजिटल अरेस्ट’ फ्रॉड और सरकारी अधिकारी बनकर किए जाने वाले कॉल जैसे अपराध किए जा रहे हैं।”

ऑनलाइन चोरी को रोकने में SIM-बाइंडिंग की अहम भूमिका

लंबे समय तक सक्रिय रहने वाले वेब या डेस्कटॉप सेशन की वजह से पीड़ितों के अकाउंट को ट्रेस करना और बंद कराना मुश्किल हो जाता है। ऐसा इसलिए क्योंकि ठग बिना असली डिवाइस या सिम अपने पास रखे, दूर बैठकर अकाउंट को कंट्रोल करते रहते हैं।

फिलहाल एक बार भारत में किसी डिवाइस पर सेशन को वैध ठहरा दिया जाए तो वह विदेश से भी चलता रहता है। इससे अपराधी भारतीय नंबरों का इस्तेमाल कर बिना दोबारा किसी अतिरिक्त पहचान सत्यापन के ठगी कर पाते हैं।

नई व्यवस्था में ऑटो-लॉगआउट फीचर केवल वेब वर्जन पर लागू होगा, ऐप वर्जन पर नहीं। यह फीचर लंबे समय से चल रहे वेब सेशन को समाप्त करेगा और तय समय के बाद डिवाइस या सिम के जरिए दोबारा सत्यापन (री-ऑथेंटिकेशन) जरूरी होगा।

इससे अकाउंट टेकओवर, रिमोट एक्सेस के दुरुपयोग और म्यूल अकाउंट (फर्जी/किराए के अकाउंट) गतिविधियों की संभावना काफी कम हो जाएगी। बार-बार सत्यापन की शर्त से अपराधियों के लिए काम करना मुश्किल होगा, क्योंकि उन्हें हर बार डिवाइस या सिम पर अपना नियंत्रण साबित करना पड़ेगा।

सिम-डिवाइस बाइंडिंग और समय-समय पर लॉगआउट की व्यवस्था से हर सक्रिय अकाउंट और वेब सेशन एक ऐसे सिम से जुड़ा रहेगा, जो KYC के जरिए सत्यापित है। इससे लोन ऐप ठगी, फिशिंग, फर्जी निवेश योजनाओं और ‘डिजिटल अरेस्ट’ जैसे मामलों में इस्तेमाल हो रहे नंबरों की ट्रेसबिलिटी फिर से सुनिश्चित होगी।

नोटिस में आगे कहा गया है कि “साल 2024 में ही साइबर ठगी से 22800 करोड़ रुपए से ज्यादा का नुकसान हुआ है। ऐसे में टेलीकॉम साइबर सिक्योरिटी नियमों के तहत जारी ये समान और लागू करने योग्य निर्देश टेलीकॉम पहचान के दुरुपयोग को रोकने, नंबरों की ट्रेसबिलिटी सुनिश्चित करने और भारत के डिजिटल इकोसिस्टम में नागरिकों का भरोसा बनाए रखने के लिए संतुलित और जरूरी कदम हैं।”

डिवाइस बाइंडिंग और ऑटोमैटिक सेशन लॉगआउट जैसी व्यवस्था पहले से ही बैंकिंग और पेमेंट ऐप्स में अपनाई जाती है, ताकि अकाउंट टेकओवर, सेशन हाईजैकिंग और अविश्वसनीय डिवाइस से गलत इस्तेमाल को रोका जा सके। अब साइबर अपराधों के केंद्र बन चुके ऐप-आधारित कम्युनिकेशन प्लेटफॉर्म पर भी इन सुरक्षा उपायों को लागू किया जा रहा है।

सरकार के निर्देश पर प्रतिक्रिया

रिपोर्ट्स के मुताबिक,मेटा, जो व्हाट्सएप की पेरेंट कंपनी है, ऐप के ऐसे बीटा वर्जन की टेस्टिंग कर रही है जिसमें यूजर्स को यह जांचने के लिए अलर्ट दिया जा रहा है कि उनका रजिस्टर्ड सिम कार्ड फोन में मौजूद है या नहीं। इन बीटा वर्जन में सिम-बाइंडिंग कमांड से जुड़े कोड रेफरेंस भी पाए गए हैं।

स्वतंत्र ब्लॉग WABetaInfo, जो सार्वजनिक होने से पहले अक्सर व्हाट्सएप के कोड में होने वाले बदलावों पर नजर रखता है, उन्होंने खुलासा किया कि साइन-इन स्क्रीन पर एक नया प्रॉम्प्ट जोड़ा गया है। इसमें लिखा है, “भारत में नियामकीय आवश्यकताओं के कारण व्हाट्सएप को यह जाँचना होगा कि आपका सिम कार्ड आपके डिवाइस में है।”

दूसरी ओर, बिजनस टुडे की रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय सरकार को एक ऐसे समूह की कानूनी चुनौती का सामना करना पड़ रहा है, जो दुनिया की बड़ी मैसेजिंग सेवाओं जैसे गूगल और मेटा का प्रतिनिधित्व करता है। इस समूह ने नए सिम-बाइंडिंग नियमों को असंवैधानिक बताते हुए इसे राज्य की शक्तियों का अवैध विस्तार करार दिया है।

कंपनियों ने DoT को पत्र लिखकर आरोप लगाया है कि यह कदम गैरकानूनी है और मंत्रालय को संसद द्वारा दिए गए अधिकारों से आगे जाता है। पत्र में दावा किया गया कि सरकार ने टेलीकम्युनिकेशंस (टेलीकॉम साइबर सिक्योरिटी) संशोधन नियम 2025 के मामले में अपने विधायी अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर कार्रवाई की है।

वहीं CNBC TV18 ने एक सूत्र के हवाले से बताया कि सिम-बाइंडिंग की समय-सीमा बढ़ाने का कोई कारण नहीं है। सूत्र के अनुसार, “धोखाधड़ी रोकने और सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए सिम-बाइंडिंग जरूरी है। राष्ट्रीय सुरक्षा से कोई समझौता नहीं हो सकता।” यह भी कहा गया कि ये कदम राष्ट्रीय सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए और सार्वजनिक परामर्श के बाद तैयार किए गए हैं।

(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

Movie Review: द केरल स्टोरी-2 में 3 राज्यों की लव जिहाद की कहानियाँ, जानें- क्यों ये फिल्म हर हिंदू माता-पिता को देखनी चाहिए

‘द केरल स्टोरी-2: गोस बियॉन्ड’ अब कोई साधारण फिल्म नहीं रह गई है। इस पर उठे सवालों ने ही इसे और अधिक देखने योग्य बना दिया है। फिल्म के निर्देशक कामाख्या नारायण सिंह हैं और निर्माता विपुल अमृतलाल शाह ने देश में फैल रही लव जिहाद की समस्या को सामाजिक और वैचारिक रूप से जिस तरह पर्दे पर उतारने का प्रयास किया है, वह वास्तव में उल्लेखनीय है।

3 राज्य-3 कहानियाँ

फिल्म में देश के अलग-अलग कोनों से तीन लड़कियों की कहानियाँ दिखाई गई हैं। ये कहानियाँ बताती हैं कि किस प्रकार हिंदू पहचान के कारण उनके साथ भावनात्मक और सामाजिक स्तर पर छल किया जाता है, उन्हें उनकी पहचान के आधार पर चिह्नित कर अंधेरे गर्त में धकेल दिया जाता है।

फिल्म के रिलीज से पहले सामने आए प्रोमो वीडियोज में राजस्थान की दिव्या पालीवाल, केरल की सुरेखा नायर और मध्य प्रदेश की नेहा संत को पीड़िताओं के रूप में दिखाया गया था। इन तीनों किरदारों को उल्का गुप्ता, ऐश्वर्या ओझा और अदिति भाटिया ने निभाया है। इनमें से अदिति भाटिया का यह बड़े पर्दे पर पहला डेब्यू है।

किरदार और अभिनय

सुरेखा की कहानी यह दर्शाती है कि ऐसे विधर्मियों से बचने के लिए केवल शिक्षा पर्याप्त नहीं होती। वहीं नेहा संत की कहानी बताती है कि यदि आपको अपने धर्म से प्रेम है, तब भी आपको झूठ बोलकर फँसाया जा सकता है। इसी प्रकार दिव्या पालीवाल की कहानी यह सिखाती है कि कम उम्र की बच्चियों का किस तरह ब्रेनवॉश कर उन्हें अपने जाल में फँसाया जाता है।

तीनों अभिनेत्रियों ने दिव्या, सुरेखा और नेहा के किरदार को प्रभावशाली ढंग से निभाया है। एक दर्शक के रूप में आप देख पाते हैं कि किस तरह एक लव जिहाद पीड़िता को जाल में फँसाया जाता है और किन-किन चरणों में उसका ब्रेनवॉश किया जाता है।

फिल्म की खासियत और समाचार में आती खबरें

‘द केरल स्टोरी’ के बाद पर्दे पर आ रही ‘द केरल स्टोरी-2: गोस बियॉन्ड’ की खास बात ये है कि इसकी कहानी किसी एक राज्य तक सीमित नहीं है, बल्कि देश के अलग-अलग हिस्सों से आती लव जिहाद की खबरों से जुड़ती है। उन पीड़िताओं की व्यथा भी इसमें दिखाई देती है, जो अब सामने आकर बताने लगी हैं कि कैसे उनकी जिंदगी बर्बाद की गई, उन्हें धर्म परिवर्तन के लिए प्रताड़ित किया गया या जबरन बीफ खिलाया गया।

बतौर अभिभावक कुछ दृश्य आपको विचलित कर सकते हैं, लेकिन यह बेचैनी उस पीड़ा से कम ही होगी, जो अपनी बेटियों को खो देने या उनके साथ हुई अमानवीय घटनाओं को देखकर किसी माता-पिता को होती है।

फिल्म के कई हृदयविदारक दृश्यों के बाद अंतिम दृश्य दर्शकों को संतोष का अनुभव करा सकते हैं। बैकग्राउंड में ‘हर-हर शंभू’ गीत सुनाई देता है, मनोज मुंतशिर की आवाज में चेतावनी के बोल गूँजते हैं, बुलडोजर का दृश्य दिखता है और पुलिस की कार्रवाई नजर आती है।

फिल्म में क्या खास

फिल्म का संगीत और बैकग्राउंड म्यूजिक पीड़िताओं के दर्द और फिल्म के हर सीन के प्रभाव और इमोशन को सशक्त बनाता हैं। संपादन की बात करें तो कुछ स्थानों पर एक दृश्य से दूसरे दृश्य में अचानक परिवर्तन दिखाई देता है, लेकिन यही बदलाव दर्शकों को फिल्म से जोड़े रखते हैं।

तीन अलग-अलग कहानियों को जोड़ने के लिए क्रॉस-कटिंग तकनीक का उपयोग किया गया है, जिससे पूरी फिल्म एक सहज प्रवाह में आगे बढ़ती है।

इसी प्रकार फिल्म में डॉयलॉग भी विशेष हैं, जो कई मुद्दों पर गहराई से सोचने पर मजबूर करते हैं। उन डॉयलॉग्स को आप अतिनाटकीय नहीं कह सकते, क्योंकि यही संवाद आजकल हो रही घटनाओं को परिभाषित करते हैं। जैसे-

‘ये काफिर हिंदू सेकुलर कहलाने को मरे जात हैं’
‘देश में हमारे लोग हर जगह मोहब्बत फैला रहे हैं’
हमारे में नास्तिक नहीं होते, तुम काफिर नास्तिक होते हो’
’16 साल के लाड-प्यार पे 6 महीने का प्यार’
‘कयामत के दिन शुक्रिया कहोगी’
‘भरोसा नहीं है के म्हारे पे बेबी।’

क्यों देखें इस फिल्म को

इस फिल्म का विरोध वह लोग कर रहे हैं जिन्हें लगता है कि समाज में लव जिहाद जैसा कुछ नहीं है। लेकिन, अगर आप उन खबरों में पीड़िताओं के दर्द को पढ़-सुनकर कभी कोई विचार मन में लाते हैं तो फिल्म जरूर देखी जानी चाहिए।

इसे देखिए ताकि आपकी वो समझ विकसित हो कि आप सोच सके कि आपको अपनी बच्चियों की परवरिश किस दिशा में करनी है। आप जान सकें कि विधर्मी तत्वों से लड़कियों को कैसे बचाना है। आप फैसला कर पाएँ कि आपको सेकुलर होने के भ्रम में जीना है या ये स्वीकारना कि आप हिंदू हैं।

गौरतलब है कि इस फिल्म के विरोध में केरल हाई कोर्ट में याचिका दायर की गई थी, जिसके बाद फिल्म की रिलीजिंग पर रोक लग गई थी। हालाँकि शुक्रवार (27 फरवरी 2026) को केरल हाई कोर्ट ने ये रोक हटा ली और अब ये फिल्म अपने तय समय पर पूरे देश में रिलीज हो रही है।

गुजरात के सूरत में गौहत्या की सूचना पर पहुँचे गौरक्षकों और पुलिस पर इस्लामी गैंग का हमला, 22 गिरफ्तार: हमले में कई लोग-पुलिसकर्मी घायल, जानें पूरा मामला

गुजरात के सूरत जिले के मंगरोल तालुका के हथोड़ा गाँव में गौहत्या की सूचना पर पहुँची पुलिस टीम और गौ रक्षकों पर हिंसक हमला कर दिया गया। इस हमले में एक पुलिसकर्मी और एक गौ रक्षक गंभीर रूप से घायल हो गए।

घटना बुधवार (25 फरवरी 2026) की बताई जा रही है, जिसके बाद गुरुवार (26 फरवरी 2026) को सूरत जिला पुलिस ने गाँव में बड़ा अभियान चलाकर 22 मुस्लिम पुरुषों को उनके घरों से हिरासत में लिया। पुलिस ने इस मामले में खुद शिकायतकर्ता बनकर FIR दर्ज की है और जाँच जारी है।

कोसांबा पुलिस स्टेशन में कांस्टेबल गोविंदसिंह शिवभाई जलिया की शिकायत के आधार पर मामला दर्ज किया गया। शिकायत के मुताबिक, गौ रक्षक सत्यप्रकाश यादव ने गौहत्या की सूचना दी थी, जिसके बाद पुलिस टीम गाँव पहुँची। तलाशी के दौरान दो बाइकों पर सवार कुछ लोग वहाँ पहुँचे और पुलिस से बहस करने लगे। देखते ही देखते विवाद बढ़ गया और पुलिस व गौ रक्षकों पर हमला कर दिया गया।

FIR के अनुसार, बाद में करीब 50 लोगों की भीड़ जमा हो गई, जो तलवार और पाइप जैसे हथियारों से लैस थी। आरोप है कि भीड़ ने जान से मारने की नीयत से हमला किया, जिसमें सत्यप्रकाश यादव और एक पुलिसकर्मी गंभीर रूप से घायल हो गए। दोनों को किसी तरह मौके से निकालकर अस्पताल में भर्ती कराया गया है। फिलहाल पुलिस पूरे मामले की जाँच में जुटी है और आगे की कार्रवाई जारी है।

SP के आदेश पर चला तलाशी अभियान, इस्लामी कट्टरपंथियों को किया गया गिरफ्तार

इस मामले में सूरत जिला बजरंग दल के समन्वयक और गौ रक्षक जय पटेल ने ऑपइंडिया से बातचीत में दावा किया कि रमजान शुरू होते ही कुछ कट्टरपंथी तत्व सक्रिय हो जाते हैं और गौहत्या जैसी घटनाएँ बढ़ जाती हैं।

उन्होंने कहा कि हथोड़ा गाँव की घटना में पुलिस और गौ रक्षकों, दोनों को निशाना बनाया गया। जय पटेल के मुताबिक, हमले के अगले ही दिन यानी गुरुवार (26 फरवरी 2026) को सूरत SP राजेश गड़िया के निर्देश पर सख्त कार्रवाई की गई।

सूरत ग्रामीण DSP बीके वनारा के नेतृत्व में पुलिस टीम ने गाँव में सर्च ऑपरेशन चलाया। टीम में कई जाँच अधिकारी और पुलिसकर्मी शामिल थे। तलाशी के दौरान संदिग्ध लोगों को पकड़कर कोसंबा पुलिस स्टेशन ले जाया गया। पुलिस ने आधिकारिक तौर पर 22 लोगों की गिरफ्तारी की पुष्टि की है।

जय पटेल ने यह भी आरोप लगाया कि हमलावर पुलिस की मौजूदगी और हथियारों से भी नहीं डरे। उनका कहना है कि रमजान के दौरान पहले भी कोसंबा और सूरत के अन्य इलाकों में इस तरह की घटनाएँ सामने आ चुकी हैं। उन्होंने आरोपितों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की माँग की है।

वहीं, कोसांबा पुलिस स्टेशन के PI ने बताया कि घटना की गंभीरता को देखते हुए तुरंत कार्रवाई की गई। अब तक 22 लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है और मामले की जाँच जारी है। FIR में कुल 40 लोगों को नामजद आरोपित बनाया गया है, जबकि कुछ अन्य अज्ञात भी शामिल हैं।

पुलिस ने आरोपितों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (IPC) की कई धाराओं- 109(1), 121(1), 126(2), 132, 189(4), 190, 191(2), 191(3), 195(1), 221, 296(बी) और 351(3)- के तहत मामला दर्ज किया है। मामले में आगे की कानूनी कार्रवाई जारी है।

कड़ी कार्रवाई की जाएगी – SP गधिया

इस मामले में सूरत जिला पुलिस प्रमुख राजेश गधिया ने ऑपइंडिया से बातचीत में पुष्टि की है कि 22 आरोपितों को गिरफ्तार कर लिया गया है और बाकी बचे आरोपितों की तलाश जारी है।

उन्होंने यह भी बताया कि FIR में ‘अज्ञात व्यक्ति’ के रूप में लिखे गए सभी लोगों के नाम अब सामने आ गए हैं और पुलिस ने इस दिशा में कार्रवाई की है। घटना के बारे में बताते हुए उन्होंने कहा कि हथोड़ा गाँव में रात 1:30 से 2 बजे के बीच गौहत्या की सूचना मिलने पर मुखबिर के साथ 6 पुलिसकर्मी गाँव गए।

रात में पुलिसकर्मी बैटरी लाइट की मदद से तलाशी कर रहे थे, तभी अचानक दो बाइकों पर सवार 6 लोग आए और पुलिसकर्मियों से भिड़ गए। इसके बाद उन्होंने करीब 50 और लोगों को बुला लिया। झगड़े के बाद इस भीड़ ने पुलिसकर्मियों और मुखबिर पर जानलेवा हमला कर दिया।

उन्होंने यह भी बताया कि पुलिसकर्मी की शिकायत के आधार पर हत्या के प्रयास, दंगा और कर्तव्य में बाधा डालने का मामला दर्ज किया गया है। फिलहाल, DCP की टीम मामले की जाँच कर रही है। उन्होंने आश्वासन दिया कि कानून को अपने हाथ में लेने वाले किसी भी व्यक्ति को बख्शा नहीं जाएगा, FSL की मदद से वैज्ञानिक साक्ष्य जुटाए जाएँगे और सख्त कार्रवाई की जाएगी।

(मूल रूप से ये रिपोर्ट गुजराती में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

Ex Muslim सलीम पर जानलेवा हमले के बाद सोशल मीडिया पर कौन लोग हँस रहे हैं? पढ़ लीजिए नाम, कमेंट भी जो खोल देंगे आँख

गाजियाबाद के लोनी में एक्स मुस्लिम सलीम वास्तिक पर जानलेवा हमला हुआ है। वो दिल्ली के जीटीबी अस्पताल में मौत से जिंदगी के लिए जंग लड़ रहे हैं। सलीम पर हमले की खबर को ऑपइंडिया ने प्रकाशित किया। इसके बाद वो खबर सोशल मीडिया पर भी शेयर की गई। सोशल मीडिया पर खबरों को साझा करना एक स्टैंडर्ड प्रैक्टिस है। हालाँकि ये खबर प्रकाशित होते ही तेजी से पढ़ी जाने लगी, लेकिन जो चौंकाने वाली बात रही, वो ये कि सोशल मीडिया पर जहाँ अधिकतर गैर-मुस्लिमों ने पीड़ित के साथ संवेदना जताई, तो इस्लामी कट्टरपंथियों के लिए ये खुशी की खबर बन गई।

ऑपइंडिया की खबर जब सोशल मीडिया पर शेयर की गई, तो रिएक्शन में चौंकाने वाला पैटर्न सामने आया। फेसबुक पर 3000+ लोगों ने रिएक्शन दिया, जिसमें किसी ने केयर की इमोजी दी, तो किसी ने दुआ माँगी, लेकिन 46 लोग ऐसे रहे, जिनका रिएक्शन बताता है कि वो सलीम पर हमले से बेहद खुश हैं। देखिए-

फेसबुक पर सलीम के हमले के बाद हाहा रिएक्शन का स्क्रीनशॉट

आगे और भी नाम हैं।

फेसबुक पर सलीम के हमले के बाद हाहा रिएक्शन का स्क्रीनशॉट 2
फेसबुक पर सलीम के हमले के बाद हाहा रिएक्शन का स्क्रीनशॉट 3

इन 46 में से अधिकतर आईडी मुस्लिमों के नाम से ही बनी हैं। कुछेक हिंदू नाम से लॉक आईडी भी दिख रही हैं। ये हाहा रिएक्शन बढ़ता जा रहा है। समाचार लिखे जाने तक ऐसे रिएक्शनों की बाढ़ आ चुकी है।

इस दौरान कमेंट बॉक्स में बहुत सारे लोगों ने चिंता जताई। महज 2 घंटों में 1200+ रिएक्शन आए, लेकिन इस्लामी पहचान वाली आईडी से दुख की जगह खुशियाँ जताई गई। कुछ रिएक्शन आप भी पढ़ सकते हैं।

सलीम पर हमले के बाद सोशल मीडिया पोस्ट पर आए कमेंट्स

सलीम पर हमले की खबर तेजी से वायरल हो रही है। इसी के साथ खुद रही है उस हमलावर प्रवृत्ति की पोल भी, जो खुद हमले में भले ही शामिल नहीं हुए हों, लेकिन उन पर हमले को खुला समर्थन दे रहे हैं।

ये स्क्रीनशॉट और ये रिएक्शन अपने आप में सबकुछ बयाँ कर दे रहे हैं।

न्यायपालिका में भ्रष्टाचार जैसी कोई चीज नहीं: जज के घर में नकदी मिलने की घटना धरती नहीं मंगल ग्रह पर घटी?

राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (NCERT) की पाठ्यपुस्तक में ‘न्यायपालिका में भ्रष्टाचार’ पर एक अध्याय शामिल किए जाने पर सुप्रीम कोर्ट, मुख्य न्यायाधीश सहित उसके जजों और कुछ वकीलों की प्रतिक्रिया से कई सवाल उठते हैं।

पहला- जजों और वकीलों को आठवीं कक्षा के बच्चे के ‘न्यायपालिका में भ्रष्टाचार’ के बारे में जानने, पढ़ने और चर्चा करने पर इतनी आपत्ति क्यों है? दूसरा- क्या न्यायपालिका में भ्रष्टाचार जैसी कोई चीज है ही नहीं? तीसरा- वह संस्था जो हमेशा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को प्राथमिकता देती है, हमेशा स्वतंत्रता और स्वतंत्र बहस को बढ़ावा देती है, एक अध्याय प्रकाशित होते ही इस पर प्रतिबंध क्यों लगा रही है? कई सवाल हैं, लेकिन पहले हम पूरे के बारे में बता देते हैं।

मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद से पाठ्यक्रम में बड़े बदलाव हुए हैं। पहले बच्चों को जो इतिहास पढ़ाया जाता था, वह अधिकतर वामपंथी इतिहासकारों की देन होता था। अन्य विषयों में भी यही स्थिति देखने को मिलती थी। सरकार के आने के बाद से सभी क्षेत्रों में एक समान बदलाव शुरू हुए हैं।

साल 2020 में शिक्षा नीति लागू की गई, जिसके तहत कई बदलाव किए जा रहे हैं। ये बदलाव धीरे-धीरे और चरणबद्ध तरीके से होने चाहिए, किताबें रातोंरात नहीं बदली जा सकतीं। एक बदलाव यह आया कि पहले पाठ्यक्रम में सीधी-सादी बातें लिखी जाती थीं। गाँधी जी को महान क्यों न माना जाए या उन्हें अधिक महत्व क्यों न दिया जाए?

अगर इतिहास में ऐसा कुछ हुआ, तो हुआ, लेकिन हम इसके कारणों पर विस्तार से चर्चा नहीं करते थे। अब बच्चों को इन घटनाओं पर चर्चा करने और एक अलग दृष्टिकोण अपनाने के लिए प्रोत्साहित करने के प्रयास किए जा रहे हैं। NCERT ने हाल ही में कक्षा आठवीं की पाठ्यपुस्तक में ‘न्यायपालिका में भ्रष्टाचार’ शीर्षक से एक अध्याय जोड़ा है।

इसमें देश की किन-किन कोर्ट में कितने मामले लंबित हैं और आम जनता को इससे किन समस्याओं का सामना करना पड़ता है, इसकी विस्तृत जानकारी दी गई है। साथ ही इसमें यह भी बताया गया है कि कोर्ट में जजों का व्यवहार कैसा होना चाहिए, ‘आचार संहिता’ क्या है और यदि जज इसका पालन करने में विफल रहते हैं तो क्या व्यवस्था है।

इसमें यह भी जानकारी दी गई है कि यदि आरोप गंभीर हैं तो संसद जजों को बर्खास्त कर सकती है। दरअसल, इंडियन एक्सप्रेस ने इस मुद्दे पर एक लेख प्रकाशित किया, जिसके चलते कपिल सिबल और अभिषेक मनु सिंहवी जैसे वकीलों ने कोर्ट का रुख किया और इसे ‘गंभीर चिंता का विषय’ बताया।

अंततः यह मामला मुख्य जज सूर्यकांत की कोर्ट तक पहुँचा और उन्होंने NCERT की कड़ी आलोचना की। उन्होंने यह भी कहा कि उनकी कोर्ट इस मामले में स्वतः संज्ञान लेते हुए सुनवाई शुरू करेगी और NCERT और केंद्र सरकार से जवाब माँगेगी।

दूसरी ओर, एनसीईआरटी ने पीछे हटते हुए पुस्तक वापस ले ली। जिन लोगों को प्रतियाँ बेची गई थीं, उनसे भी प्रतियाँ वापस मंगाई गईं। अगले दिन अदालत में स्वतः संज्ञान लेते हुए सुनवाई शुरू हुई और सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने केंद्र की ओर से माफी भी माँगी। बाद में अदालत ने आदेश पारित कर पुस्तक पर प्रतिबंध लगा दिया और कहा कि इसकी सभी भौतिक और डिजिटल प्रतियाँ प्रतिबंधित की जानी चाहिए।

यह कार्रवाई 24 से 48 घंटों के भीतर की गई। यदि माननीय न्यायाधीशों ने अन्य मामलों में भी इतनी ही तेजी दिखाई होती, तो एनसीईआरटी की पुस्तक में उल्लिखित लंबित मामलों की संख्या में काफी कमी आ जाती!

कोर्ट ने अपने आदेश में क्या कहा?

सुप्रीम कोर्ट के जजों ने ने इस पूरी घटना को न्यायपालिका पर ‘सोची-समझी साजिश’ करार दिया है। उन्होंने यह भी कहा कि यदि कोर्ट इस मामले में हस्तक्षेप नहीं करता है, तो इससे जनता, विशेषकर युवाओं के मन में न्यायपालिका की गरिमा को ठेस पहुँचेगी।

कोर्ट ने अपने आदेश में कहा, “इस मामले में न्यायपालिका की महत्वपूर्ण भूमिका को नजरअंदाज किया गया है, जिसके तहत उसने संविधान की मूलभूत संरचना के सिद्धांतों की रक्षा की है। यह एक गंभीर मामला है क्योंकि इसी कोर्ट ने भ्रष्टाचार, पद के दुरुपयोग और सार्वजनिक धन के दुरुपयोग के लिए कई उच्च पदस्थ अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की है।”

हालाँकि कोर्ट ने कहा कि यह आत्म-विश्लेषण अभ्यास किसी वास्तविक आलोचना या न्यायिक समीक्षा के अधिकार को दबाने के लिए शुरू नहीं किया गया था और उसका मानना ​​है कि स्वतंत्र और गंभीर बहस से संस्थाएँ मजबूत होती हैं। कोर्ट ने तर्क दिया कि यह हस्तक्षेप शिक्षा की गरिमा बनाए रखने के लिए किया गया था।

छात्रों को इतनी कम उम्र में, जब वे सार्वजनिक जीवन और संस्थाओं की समझ विकसित कर रहे होते हैं, एकतरफा दृष्टिकोण देना उचित नहीं है। कोर्ट ने यह भी कहा कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर गंभीर परिणामों और नकारात्मक प्रभाव को देखते हुए, ऐसा आचरण आपराधिक अवमानना ​​की श्रेणी में आ सकता है और यदि जानबूझकर किया गया हो, तो यह न्याय प्रशासन में हस्तक्षेप के बराबर होगा और संस्था की गरिमा का अपमान करने के समान होगा।

क्या न्यायपालिका में भ्रष्टाचार नहीं है?

पाठ में इस्तेमाल किए गए बोल्ड शब्दों और गंभीरता को देखते हुए ऐसा लग सकता है कि NCERT और शिक्षा मंत्रालय ने कोई बड़ा अपराध किया है, लेकिन उनका एकमात्र ‘अपराध’ यह था कि उन्होंने न्यायपालिका में भ्रष्टाचार के बारे में बात करना शुरू कर दिया, जो अब तक नहीं हो रहा था और वह भी पाठ्यपुस्तक में।

अगर न्यायपालिका में भ्रष्टाचार जैसी कोई चीज न होती, जजों के आचरण की कभी जाँच न हुई होती, जजों के खिलाफ भ्रष्टाचार की कोई शिकायत न होती और NCERT ने मनगढ़ंत बातों से पाठ्यपुस्तक में एक अध्याय जोड़ दिया होता, तो सुप्रीम कोर्ट के इन शब्दों का महत्व होता।

अगर न्यायपालिका में भ्रष्टाचार जैसी कोई चीज न होती, तो कुछ महीने पहले दिल्ली हाई कोर्ट के एक पूर्व जज के घर से नकदी मिलने का क्या मामला था? आज तक यह पता क्यों नहीं चल पाया है कि यह पैसा किसका था और वहाँ कैसे पहुँचा? अगर समस्या मौजूद है, तो इस पर चर्चा क्यों नहीं होती?

हम वर्षों से राजनीति और व्यापार में भ्रष्टाचार का अध्ययन कर रहे हैं, इस समस्या पर लगातार चर्चा हो रही है और राजनेताओं से सवाल पूछे जा रहे हैं। समस्या का सही निदान तभी होता है जब उस पर पहली बार चर्चा की जाती है। चर्चा शुरू करने के लिए पाठ्यपुस्तकों से बेहतर कोई माध्यम या साधन नहीं है।

ऐसा नहीं है कि न्यायपालिका में भ्रष्टाचार के मामले नहीं हुए हैं और इसकी कोई गारंटी नहीं है कि भविष्य में ऐसा नहीं होगा। ऐसा भी नहीं है कि यह पूरी तरह से स्वच्छ संस्था है, इसलिए इस पर चर्चा होनी चाहिए। मूल मुद्दा यह है कि वर्षों से भ्रष्टाचार की परिभाषा राजनीति, नौकरशाही और पुलिस विभागों आदि के इर्द-गिर्द घूमती रही है और जज हमेशा इससे बचते रहे हैं।

यदि कोई सवाल उठाता है, चर्चा करता है या आलोचना करता है, तो ‘न्यायालय की अवमानना’ का हथियार हमेशा तैयार रहता है। लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि न्यायपालिका भ्रष्टाचार से अछूती रही है। पहली बार NCERT ने संविधान के संरक्षक माने जाने वाले सर्वोच्च निकाय को इस दायरे में लाया है और संपूर्ण न्यायिक व्यवस्था ने इसका विरोध किया है।

भारतीय न्यायपालिका में सिर्फ एक नहीं, कई समस्याएँ

आपत्ति उठाना, किताबों पर प्रतिबंध लगाना समस्या का समाधान नहीं है। भारतीय न्यायपालिका में यही एकमात्र समस्या नहीं है। अतीत में कॉलेजियम प्रणाली को समाप्त करने के लिए, जहाँ जज बंद दरवाजों के पीछे बैठकर जजों की नियुक्ति करते थे, सरकार ने राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NGAC) के लिए एक अधिनियम बनाया था, लेकिन इसी सुप्रीम कोर्ट ने इसे ‘असंवैधानिक’ करार देते हुए रद्द कर दिया।

आज जज ही जजों की नियुक्ति करते हैं और केवल सूचना देने के लिए सामने आते हैं। किसे नियुक्त किया गया और किस कारण से, यह जानकारी न तो आम जनता को दी जाती है और न ही सरकार को। कोर्ट की अवमानना ​​का प्रावधान आवश्यक है क्योंकि कोर्ट के आदेशों का उल्लंघन करने पर कार्रवाई का विकल्प खुला होना चाहिए।

लेकिन यदि जजों की आलोचना करने, उनके आदेशों की आलोचना करने या कोर्ट की आलोचना करने पर अवमानना ​​के मामले दर्ज होते रहते हैं, तो इससे किसी भी संस्था की गरिमा कम हो जाती है। विशेष रूप से ऐसी संस्था के लिए जो अन्य मामलों में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और मौलिक अधिकारों की बात करती है।

देश भर में राजनेताओं के लिए अपनी आय और संपत्ति घोषित करने की व्यवस्था है , जजों के लिए नियम यह है कि वे चाहें तो ऐसा कर सकते हैं और यदि वे ऐसा नहीं करते हैं, तो कोई समस्या नहीं है, कोई दबाव नहीं है। अगर इस पर चर्चा शुरू भी होती है, तो लंबी छुट्टियों का मुद्दा भी सामने आ जाता है।

कौन सा अस्पताल या पुलिस स्टेशन दो या तीन महीने तक पूरी तरह से कम कर्मचारियों के साथ काम करेगा, सिर्फ इसलिए कि उसके डॉक्टरों या पुलिस अधिकारियों को छुट्टी पर जाना है? देश की कई कोर्टों में अनगिनत मामले लंबित हैं, कई मामले आते रहते हैं, जिनमें निपटारे में दशकों लग जाते हैं।

प्रक्रिया में देरी के कारण लोगों को वर्षों तक न्याय नहीं मिल पाता। सुप्रीम कोर्ट में मामलों की सुनवाई होना एक चुनौतीपूर्ण कार्य है, लेकिन कुछ वकील हर तीसरे दिन मामले लेकर वहाँ पहुँचते हैं और मामले सूचीबद्ध भी हो जाते हैं। अगर हम बैठकर चर्चा करें तो कई ऐसी समस्याएँ हमारे सामने आएँगी।

एक तरफ तो सुप्रीम कोर्ट कहता है कि उसे जायज आलोचना से कोई आपत्ति नहीं है, वहीं दूसरी तरफ वह ऐसे अध्यायों पर प्रतिबंध लगा रहा है।

इसका कारण शिक्षा की गरिमा को बनाए रखना बताया जाता है। कोर्ट की अवमानना ​​का जोखिम उठाते हुए भी, हम कहना चाहेंगे कि ये तर्क बचकाने, नासमझ और हास्यास्पद हैं और अब हम यह भी मान लें कि कोर्ट में भ्रष्टाचार जैसी कोई चीज नहीं है। अगर कोई पूछे कि जज के घर में नकदी मिलने की घटना क्या थी? तो हम कहेंगे कि यह तो मंगल ग्रह पर हुई थी!

(यह रिपोर्ट मूल रुप से गुजराती में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

मंदिर निर्माण पर हो रही थी बात, आरफा खानम ने रखी ‘मस्जिद’ की डिमांड: हिंदू महिलाओं ने लताड़ा तो RSS को देने लगीं गाली, The Wire ने जबरन ‘धक्का-मुक्की’ वाला एंगल घुसाया

प्रोपेगेंडा पत्रकार आरफा खानम शेरवानी एक बार फिर अपने ही बुने हुए जाल में बुरी तरह फँस गई हैं। नोएडा की एक पॉश सोसाइटी में मंदिर निर्माण के सीधे-साधे मुद्दे को ‘सांप्रदायिक’ रंग देने और अपना पुराना ‘मुस्लिम विक्टिम कार्ड’ चमकाने पहुँची आरफा को वहाँ की जागरूक हिंदू महिलाओं ने ऐसा करारा जवाब दिया कि उन्हें वहाँ से उल्टे पाँव भागना पड़ा।

आरफा, जो हिंदू महिलाओं को ‘गैसलाइट’ करने और उन्हें अपराधी जैसा महसूस कराने गई थीं, खुद ट्रोल होकर लौटी हैं। इस पूरी घटना ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि आरफा खानम की पत्रकारिता का मकसद जमीन की हकीकत दिखाना नहीं, बल्कि हर मुद्दे में बीजेपी, RSS और मुस्लिम एंगल घुसाकर समाज में दरार पैदा करना है।

वीडियो की हकीकत: आरफा के ‘मस्जिद कार्ड’ पर महिलाओं का जवाब

सोशल मीडिया पर आरफा खानम का एक वीडियो तेजी से वायरल हो रहा है, जिसमें वे नोएडा के सेक्टर 15ए की महिलाओं से बातचीत कर रही हैं। इस वीडियो में महिलाओं अपनी माँग को बताती है कि उन्हें मंदिर सोसाइटी में चाहिए, जिससे काफी दूर आना-जाना, ट्रैफिक में फँसना बंद हो जाएगा और बुजुर्गों के लिए सुविधा हो जाएगी। इस वीडियो में आप देख सकते हैं कि कोई भी महिला आरफा से ना तो बदतमीजी से बातचीत कर रही है, ना ही तेज आवाज में चिल्ला रही है और ना ही धक्का-मुक्की कर रही हैं।

आरफा ने जितने भी सवाल वहाँ खड़ी हिंदू महिलाओं से पूछे है उनके जवाब उन्हें बेहद शांतिपूर्ण तरीके से मिला है। अपना मुस्लिम और मस्जिद विक्टिम कार्ड घुसाने पर भी महिलाओं ने उन्हें ये ही कहाँ है कि आप अपना एजेंडा यहाँ मत लाओ। मंदिर की बात है, मंदिर तक रहने दो। वीडियो में आप सुन सकते हैं कि जब मंदिर की माँग ज्यादा कर रही लोगों की तादाद ज्यादा थी, तो प्रोपेगेंडाई पत्रकार आरफा ने मस्जिद बनवाने पर भी सवाल कर डाला। आरफा महिलाओं से कहने लगी कि फिर तो मस्जिद भी बनना चाहिए।

इस सवाल का जवाब महिलाओं ने बेहत लहजे से दिया कि जब सोसाइटी में 99.99 प्रतिशत हिंदू लोग है तो मस्जिद बनवाना या ना बनवाना कहाँ से आ जाता है। फिर आरफा ने महिलाओं की तादात को ‘मेजोरिटिज्म’ शब्द से नवाजा, जिसका जवाब भी हिंदू महिलाओं ने बेहद तरीके और करारा दिया। वहाँ खड़ी एक हिंदू महिला ने आरफा को कहा- “हमें ऐसा लग रहा है कि अपने ईश्वर का नाम लेने में क्रिमिनल करार दिया जा रहा है।”

महिला ने आरफा को सीधा मुँह यह भी जवाब दिया कि यह महीने आज से 40 साल पहले नोएडा के मास्टर प्लान में मंदिर के लिए डेजिग्नेटिड यानि नामित थी। 40 साल पहले इतना ट्रैफिक नहीं हुआ करता था और लोग आसानी से दूर मंदिर जा सकते हैं। लेकिन आज ट्रैफिक बढ़ रहा है, समय नहीं है, लोग बुजुर्ग है, कुछ दिव्याँग है, तो कुछ लोगों के पास गाड़ी चलाने के लिए ड्राइवर नहीं है कि वह उन्हें मंदिर तक ले जाए।

वहाँ खड़ी एक महिला ने तो साफ कहा कि इसमें सरकार का कोई रोल नहीं है, ये हम लोगों की माँग है। इसके अलावा भी आरफा को हिंदू महिलाओं ने उनके कट्टरपंथी एजेंडे पर काफी बढ़िया जवाब दिया है, जिसे आप वीडियो में सुन सकते हैं। महिलाओं ने आरफा को ये ही कहा कि आप अपने एजेंडा यहाँ मत थोपिए… महिलाओं ने साफ कहा कि हमें पता है आपका एजेंडा क्या होता है, आप एक Biased साइड के लिए रिपोर्टिंग करती है। सोशल मीडिया पर भी नेटिजन्स ने आरफा के इस वीडियो पर काफी हँसी उड़ाई। कुछ लोगों ने लिखा कि जनता अब नफरत भरे एजेंडे पर यकीन नहीं कर रही है। अब जनता झगड़े के बजाय फैक्ट्स पर यकीन कर रही है।

The Wire का खेल: एडिटिंग का मायाजाल और फर्जी हेडलाइन

जब ग्राउंड पर आरफा का एजेंडा बुरी तरह फेल हो गया, तो उनके संस्थान ‘The Wire’ ने डैमेज कंट्रोल के लिए अपने यूट्यूब चैनल पर एक वीडियो डाला। इस वीडियो का टाइटल दिया गया- ‘मंदिर का समर्थन पर ‘लोकतंत्र’ से समस्या, उग्र महिलाओं ने आरफ़ा के साथ की धक्का-मुक्की’।

इस टाइटल और वीडियो की एडिटिंग को गौर से देखें तो ‘The Wire’ का प्रोपेगेंडा बेनकाब हो जाता है। वीडियो की शुरुआत में ही आरफा इसे ‘अमीर लोगों की सोसाइटी’ और ‘BJP वोटर्स’ का गढ़ बताकर नफरत फैलाना शुरू कर देती हैं। वे कहती हैं कि उत्तर प्रदेश के चुनाव पास हैं और RSS पूरी हरकत में आ गई है, हमारे समाज का हिंदूकरण कम पड़ गया था जो अब घर तक मंदिर की बात आ गई है।”

आरफा ने जानबूझकर इसे ‘RSS का प्रोजेक्ट’ करार दिया और अपने दर्शकों से कहा कि ‘आप 100 साल के RSS को देख रहे हैं कि वे कैसे घुसपैठ कर रहे हैं।’ ‘The Wire’ ने वीडियो को इस तरह से काट-छाँट कर पेश किया है ताकि हिंदू महिलाएँ ‘उग्र’ दिखें, जबकि असल में आरफा खुद महिलाओं को उकसा रही थीं और उन्हें अपराधी साबित करने पर तुली हुई थीं। वीडियो में कहीं भी वह धक्का-मुक्की नहीं है जिसका दावा हेडलाइन में किया गया है। लेकिन आरफा अपनी आदत के मुताबिक ‘डोंट टच मी’ कहकर खुद को पीड़ित दिखाने का नाटक करती रहीं।

क्या है पूरा मामला? क्यों हो रही है मंदिर की माँग?

नोएडा के सेक्टर 15A का यह पूरा मामला कोई सांप्रदायिक विवाद नहीं, बल्कि वहाँ रहने वाले लोगों की बुनियादी सुविधा और उनके अधिकारों का मामला है। इस सोसाइटी में रहने वाले लगभग 99 प्रतिशत से ज्यादा हिंदू लोग चाहते हैं कि उनकी सोसाइटी के भीतर एक मंदिर बन जाए। इसके पीछे बहुत ही साधारण वजहें हैं।

पहली वजह यह है कि सोसाइटी के पास कोई मंदिर नहीं है, जिसके कारण बुजुर्गों को पूजा-पाठ के लिए काफी लंबी दूरी तय करनी पड़ती है। दूसरी समस्या ट्रैफिक और जाम की है, मुख्य मंदिर दूर होने की वजह से लोगों को घंटों जाम में फँसना पड़ता है, जिससे समय और ऊर्जा दोनों की बर्बादी होती है। साथ ही, वहाँ की महिलाओं का कहना है कि 40 साल पहले जब इस इलाके का नक्शा बना था, तभी यह जमीन मंदिर के लिए ही तय की गई थी।

लेकिन इस सीधी-सादी माँग को पत्रकार आरफा खानम ने एक अलग ही रंग दे दिया। उन्हें इसमें ‘हिंदू राष्ट्र’ बनाने की साजिश और जमीन हड़पने जैसा गंभीर मामला नजर आने लगा। उन्होंने सोशल मीडिया पर इसे एक खतरे की घंटी (वेक-अप कॉल) बताया। जबकि हकीकत यह है कि वहां के निवासी सिर्फ अपनी ही जमीन पर अपनी आस्था और सुविधा के लिए मंदिर बनवाना चाहते हैं, जो उनका अधिकार है।

एजेंडा पत्रकारिता की हार

आरफा खानम की पूरी रिपोर्टिंग का मकसद यह था कि सेक्टर 15A को ‘RSS की प्रयोगशाला’ साबित किया जाए। उन्होंने जानबूझकर बातचीत में नरेंद्र मोदी और BJP को घुसाया ताकि वे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ‘मैजोरिटी टेररिज्म’ का नैरेटिव सेट कर सकें। वे वहाँ रिपोर्टिंग करने नहीं, बल्कि महिलाओं को डराने और उन्हें ‘अलोकतांत्रिक’ साबित करने गई थीं।

आरफा खानम वही चेहरा हैं जिन्होंने शाहीन बाग के समय मुस्लिमों को सलाह दी थी कि ‘विचारधारा न बदलें, बस रणनीति बदलें।’ नोएडा में भी वे इसी ‘रणनीति’ के साथ आई थीं, पहले निष्पक्ष पत्रकार होने का ढोंग करना और फिर धीरे से ‘मस्जिद’ और ‘मुस्लिम अधिकार’ का रोना रोकर हिंदुओं को दबाना।

लेकिन नोएडा की इन महिलाओं ने उनकी इस चाल को भांप लिया और उन्हें साफ कह दिया ‘अपना एजेंडा यहाँ मत चलाइए।’ जब आरफा का ‘मुस्लिम विक्टिम कार्ड’ नहीं चला, तो वे आक्रामक हो गईं और बाद में सोशल मीडिया पर झूठ फैलाने लगीं।

PM मोदी की केनेसेट स्पीच को जो वामपंथन बता रही ‘एंटी नेशनल’, प्रोग्रेसिव इंटरनेशनल नाम के प्रोपेगेंडा गिरोह से जुड़े हैं उसके तार: जानिए इसके बारे में सबकुछ

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ऐतिहासिक इजरायल यात्रा ने पूरी दुनिया का ध्यान खींचा है। जहाँ भारत और इजरायल व्यापार से लेकर रक्षा तक कई क्षेत्रों में अपनी साझेदारी मजबूत कर रहे हैं, वहीं ‘फ्री फिलिस्तीन’ इस्लामी-वामपंथी गिरोह इससे बुरी तरह तिलमिला गया है।

इस्लामवादियों, दिखावटी ‘सेक्युलर’ नेताओं, वामपंथी प्रचार मंचों और तथाकथित बुद्धिजीवियों सभी ने बिना सोचे-समझे पीएम मोदी के इजरायल दौरे और कनेसेट में संबोधन की निंदा शुरू कर दी है। इसी क्रम में प्रोग्रेसिव इंटरनेशनल की सह-जनरल कोऑर्डिनेटर वर्षा गंडिकोटा-नेल्लुतला ने पीएम मोदी को ‘राष्ट्र-विरोधी’’ तक कह दिया।

उन्होंने 25 फरवरी 2026 को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर लिखा, “हमारे खूबसूरत देश का नाम खून से सने कनेसेट में लिखना सबसे बड़ा राष्ट्र-विरोधी काम है।”

गौरतलब है कि 25 फरवरी 2026 को पीएम मोदी ने इजरायल की संसद कनेसेट को संबोधित किया। पीएम मोदी ने हमास द्वारा 7 अक्टूबर 2023 को किए गए आतंकी हमले की कड़ी निंदा करते हुए कहा, “हम आपके दर्द को महसूस करते हैं। भारत पूरी मजबूती से इजरायल के साथ खड़ा है। निर्दोष नागरिकों की हत्या को जायज नहीं ठहराया जा सकता।”

अंत में पीएम मोदी को ‘स्पीकर ऑफ द कनेसेट मेडल’ से सम्मानित किया गया, जो कनेसेट द्वारा दिया जाने वाला सर्वोच्च सम्मान है।

वर्षा गंडिकोटा-नेल्लुतला, प्रोग्रेसिव इंटरनेशनल और न्यूजक्लिक कनेक्शन

वर्षा गंडिकोटा प्रोग्रेसिव इंटरनेशनल (PI) की सह-जनरल कोऑर्डिनेटर हैं। यह एक अंतरराष्ट्रीय संगठन है जो दुनियाभर में वामपंथी कार्यकर्ताओं और समूहों को एकजुट करता है। इसके वेबसाइट के अनुसार, “प्रोग्रेसिव इंटरनेशनल मई 2020 में दुनिया की प्रगतिशील ताकतों को संगठित करने के उद्देश्य से शुरू हुआ।”

वर्षा इस संगठन में ‘ब्लू प्रिंट’ पॉलिसी वर्क और द हेग ग्रुप का नेतृत्व करती हैं। यह संगठन खुले तौर पर इजरायल विरोधी और फिलिस्तीन समर्थक एजेंडा चलाता है, यहाँ तक कि हमास जैसे आतंकी संगठन की हिंसा को भी कमतर दिखाता है। इसकी वेबसाइट पर मोदी सरकार और हिंदुओं के खिलाफ कई आपत्तिजनक प्रचार लेख मौजूद हैं।

2023 में हरियाणा के नूंह में दंगाइयों के घरों पर बुलडोजर कार्रवाई को इस संगठन ने ‘भारत के लोकतंत्र का ध्वंस’ बताया था, जिस बयान पर जेरेमी कॉर्बिन और जारा सुल्ताना जैसे इस्लामवादी नेताओं के हस्ताक्षर थे। ‘नेकेड हिंदू सुप्रीमिज्म’ हेडलाइन वाली ऐसी ही एक रिपोर्ट में प्रोग्रेसिव इंटरनेशनल ने मुस्लिमों को पीड़ित दिखाने के लिए हिंदुओं को बदनाम किया।

प्रोग्रेसिव इंटरनेशनल लगातार हिंदुओं, हिंदुत्व, भाजपा-RSS और मोदी सरकार को बदनाम करता रहा है। मणिपुर संकट पर लिखे एक लेख में, प्रोग्रेसिव इंटरनेशनल ने ‘हिंदू राष्ट्रवादियों’ को दोषी ठहराते हुए उन पर ‘सर्वोच्चता’ का युद्ध छेड़ने का आरोप लगाया।

प्रोग्रेसिव इंटरनेशनल में हर्ष मंदर जैसे लोग परिषद सदस्य हैं। मंदर ने हिंदुत्व और उससे जुड़े हिंदुओं को बदनाम करने वाले कई लेख लिखे हैं। ऐसे ही एक लेख में, जिसका शीर्षक था, क्या भारत नरसंहार की ओर बढ़ रहा है?, मंदर ने ग्रेगरी स्टैंटन का हवाला देते हुए झूठा दावा किया कि भारत में मुस्लिमों का नरसंहार हो सकता है।

गौरतलब है कि हर्ष मंदर ने बतौर IAS लगभग दो दशकों तक काम किया था और 2002 में गुजरात में हुए ‘राज्य प्रायोजित दंगों’ के विरोध में उन्होंने सेवा से इस्तीफा दे दिया था। पद से इस्तीफा देने के बाद, मंदर ने सोनिया गाँधी की राष्ट्रीय सलाहकार परिषद में काम किया, जिसने हिंदू विरोधी सांप्रदायिक हिंसा विधेयक का मसौदा तैयार किया था।

मैंडर ने सेंटर फॉर इक्विटी स्टडीज के निदेशक के रूप में भी कार्य किया है, जिसे ईसाई इंजीलवादी संगठनों से फंड प्राप्त हुआ था और उन्होंने अतीत में खुले तौर पर धार्मिक धर्मांतरण का समर्थन किया है। हर्ष मंदर का लेख, जो मुस्लिमों में पीड़ित होने की भावना को भड़काने के उद्देश्य से लिखा गया था, पाकिस्तान के पूर्व पीएम इमरान खान द्वारा साझा किया गया था।

उन्होंने 2018 में प्रकाशित अपने लेख में लिखा था, “आज मुस्लिम लगभग हर राजनीतिक दल के लिए बेघर और बेसहारा हैं। यह स्थिति तब है जब भारत दुनिया के दसवें हिस्से के मुस्लिमों का घर है, लगभग 18 करोड़ लोग, जो इसे इंडोनेशिया और पाकिस्तान के बाद सबसे बड़ा मुस्लिम देश बनाता है। भारत में मुस्लिम होना कभी इतना कठिन नहीं रहा, भारत के विभाजन के बाद के तूफानी महीनों के बाद से तो बिल्कुल भी नहीं।”

हर्ष मंदर, इशरत का भी एक जाना-माना समर्थक है, जो आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा की महिला काडर थी। इशरत को 3 साथियों के साथ गुजरात क्राइम ब्रांच ने मुठभेड़ में ढेर कर दिया। हर्ष मंदर उन 40 ‘कार्यकर्ताओं’ में से एक था जिन्होंने अयोध्या फैसले के खिलाफ कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दायर की थी।

हर्ष मंदर उस ग्रुप का भी हिस्सा है, जिसने नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) के खिलाफ भी याचिका दायर की है। मंदर ने CAA विरोधी प्रदर्शनों के दौरान मुस्लिमों को दंगा भड़काने के लिए भी उकसाया था। उसका नाम दिल्ली पुलिस की चार्जशीट में भी बार-बार आया है।

खैर, हर्ष मंदर की तरह ही प्रोग्रेसिव इंटरनेशनल की परिषद में पूर्व JNU प्रोफेसर और इस्लामी आतंकवादी अफजल गुरु की प्रशंसक जयति घोष भी शामिल हैं।

2016 में घोष ने आतंकवादी अफजल गुरु की मौत की सजा के विरोध में आयोजित प्रदर्शनों को दबाने के लिए मोदी सरकार की आलोचना की थी। इसके अलावा घोष का नाम सीताराम येचुरी और योगेंद्र यादव के साथ 2020 के दिल्ली हिंदू विरोधी दंगों के पूरक आरोप पत्र में भी शामिल है।

प्रोग्रेसिव इंटरनेशनल की कार्यकारी संस्था ‘कैबिनेट’ में ब्रिटेन की लेबर पार्टी के पूर्व नेता जेरेमी कॉर्बिन शामिल हैं। कॉर्बिन विवादों में घिरे रहते हैं। 2023 में पियर्स मॉर्गन के साथ एक साक्षात्कार के दौरान उन्होंने हमास को आतंकवादी संगठन मानने से इनकार कर दिया था।

2009 में जेरेमी कॉर्बिन ने कट्टरपंथी इस्लामी संगठनों हिजबुल्लाह और हमास से जुड़े आतंकवादियों को ब्रिटेन की संसद में आमंत्रित किया था। इससे पहले, कॉर्बिन ने ‘फ्री रियाज एंड कय्यूम कैंपेन’ का समर्थन किया था, जिसका उद्देश्य भारतीय राजनयिक रविंद्र म्हात्रे के अपहरण और हत्या के दोषी मोहम्मद रियाज और अब्दुल कय्यूम राजा को जेल से रिहा कराना था।

2022 में कॉ़न्ग्रेस नेता राहुल गाँधी की विवादास्पद ब्रिटेन यात्रा के दौरान कॉर्बिन की उनके साथ तस्वीर खींची गई थी। कॉर्बिन से मुलाकात को लेकर भारी विवाद खड़ा हुआ था, क्योंकि पूर्व लेबर नेता का कश्मीरी अलगाववादी विचारों का समर्थन करने, जम्मू कश्मीर पर पाकिस्तान के रुख से सहमत होने और भारत के आंतरिक मामलों में अंतरराष्ट्रीय हस्तक्षेप की माँग का समर्थन करने का इतिहास रहा है।

गौरतलब है कि PI के ‘मानद’ सलाहकार सदस्यों में नोआम चोम्स्की और न्यूजक्लिक से जुड़े मार्क्सवादी पत्रकार विजय प्रसाद जैसे लोग शामिल हैं। प्रोग्रेसिव इंटरनेशनल में पहले विजय प्रसाद परिषद के सदस्य थे। वे प्रोग्रेसिव इंटरनेशनल की संस्थापक अंतरिम परिषद का हिस्सा थे।

विजय प्रसाद नेविल रॉय सिंघम द्वारा वित्तपोषित वामपंथी नेटवर्क में प्रमुख भूमिका निभाते हैं। सिंघम ने पीपुल्स डिस्पैच सहित विभिन्न चीन समर्थक और भारत विरोधी प्रचार माध्यमों में लाखों डॉलर का निवेश किया है। यहाँ विजय प्रसाद ने प्रचार संबंधी लेख लिखे हैं।

पीपुल्स डिस्पैच एक मीडिया पोर्टल है जो खुद को एक ‘अंतरराष्ट्रीय मीडिया परियोजना’ बताता है जिसका मिशन दुनिया भर के जन आंदोलनों और संगठनों की आवाजों को दुनिया के सामने लाना है। जनवरी 2020 के एक लेख में, प्रसाद ने JNU प्रदर्शनकारियों के प्रति सहानुभूति व्यक्त की और मोदी सरकार की कड़ी आलोचना की।

न्यूजक्लिक का हिंदू-विरोधी पूर्वाग्रह किसी से छिपा नहीं है। इसके अलावा न्यूजक्लिक पर चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (CCP) से कथित संबंधों को लेकर भी जाँच चल रही है। 2023 में न्यूयॉर्क टाइम्स की एक जाँच में कार्यकर्ता संगठनों, गैर-लाभकारी संस्थाओं, फर्जी कंपनियों और चीनी प्रचार से उनके घनिष्ठ संबंधों का खुलासा हुआ, जिसका नेतृत्व नेविल रॉय सिंघम कर रहे थे।

2024 में दिल्ली पुलिस द्वारा दायर आरोपपत्र में चीनी सरकार को ‘अंतिम धनदाता’ बताया गया, जिसके माध्यम से भारत-विरोधी विचारों, विशेष रूप से कश्मीर और किसानों के विरोध प्रदर्शनों को भड़काने के लिए धन भेजा गया था। यह मामला अभी अदालत में चल रहा है।

साल 2021 में ही OpIndia ने NewsClick के संबंधों की विस्तृत जाँच की और खुलासा किया कि यह कई ऐसे व्यक्तियों से जुड़ा हुआ था जो नियमित रूप से भारत के खिलाफ जहर उगलते हैं, जिनमें शहरी नक्सली, तीस्ता सेतलवाद, अभिसार शर्मा और कई अन्य शामिल हैं। OpIndia की वह रिपोर्ट यहाँ पढ़ी जा सकती है।

प्रोग्रेसिव इंटरनेशनल के टाइड्स फाउंडेशन से संबंध

प्रोग्रेसिव इंटरनेशनल की वेबसाइट के अनुसार, इसके 70 से अधिक संगठन सदस्य हैं। इनमें हमास समर्थक समूह अरब रिसोर्स एंड ऑर्गेनाइजिंग सेंटर भी शामिल है, जिसे टाइड्स फाउंडेशन फंडिंग करती है।

दिलचस्प बात यह है कि OpIndia ने पहले ही टाइड्स फाउंडेशन और न्यूजक्लिक के बीच संबंधों का पता लगाया था। टाइड्स फाउंडेशन कई हिंदू-विरोधी और भारत-विरोधी संगठनों और तत्वों को वित्तपोषण देने के लिए कुख्यात है। इस फाउंडेशन ने हिंदू फॉर ह्यूमन राइट्स (HfHR) को अनुदान दिया था, जिसके इस्लामवादियों और खालिस्तानियों से संबंध हैं।

इस फाउंडेशन का गठन 2019 में दो इस्लामवादी समर्थक समूहों, इंडियन अमेरिकन मुस्लिम काउंसिल (IAMC) और ऑर्गेनाइजेशन फॉर माइनॉरिटीज ऑफ इंडिया (OFMI) द्वारा किया गया था। टाइड्स ने अमन पब्लिक चैरिटेबल ट्रस्ट को भी वित्त पोषित किया था। यह ट्रस्ट न्यूजक्लिक-चीन फंडिंग घोटाले से जुड़ा है।

वर्षा गंडाकोटी का हिंदुत्व विरोधी और हमास समर्थक दृष्टिकोण

हमास को नॉन-स्टेट एक्टर बताकर वर्षा लगातार इस फिलिस्तीनी इस्लामी आतंकी गुट का बचाव करती रही हैं। जबकि हमास की विचारधारा साफ है कि इजरायल वक्फ की संपत्ति है, यानी मुसलमानों की और वो आखिरी यहूदी को धरती से खत्म करने तक संघर्ष करता रहेगा। हमास यही कर भी रहा है।

इस्लामी-वामपंथी लंबे समय से हिंदुत्व को बदनाम करते आ रहे हैं। वर्षा ने भी पहले हिंदुत्व की तुलना जायोनिज्म से की थी। हालाँकि वर्षा के समर्थकों के अनुसार जायोनिज्म एक नरसंहारवादी विचारधारा है, लेकिन उन्होंने कभी यह स्पष्ट नहीं किया कि यदि हिंदुत्व जायोनिज्म की तरह ही है, तो ‘हिंदू राष्ट्रवादियों’ ने वास्तव में कौन सा नरसंहार किया है।

इसमें कोई हैरानी की बात नहीं है कि फिलिस्तीन और इस्लामी आतंकवादी समूह हमास का समर्थन करने वाली वर्षा पहलगाम हमले के बाद मई 2025 में भारत द्वारा पाकिस्तान में इस्लामी आतंकवादी ठिकानों पर किए गए हमले से नाराज थीं। उसने लिखा, “आज भारत में एक भी युद्ध-विरोधी राजनीतिक नेता का न दिखना चिंताजनक है।”

वर्षा का सोशल मीडिया और प्रोग्रेसिव इंटरनेशनल में उनका काम मुख्य रूप से इजरायल-फिलिस्तीन संघर्ष और गाजा में कथित ‘नरसंहार’ के इर्द-गिर्द घूमता है। वर्षा प्रोग्रेसिव इंटरनेशल द्वारा बनाए गए ‘द हेग’ ग्रुप की एक्टिंग चेयर (अंतरिम मुखिया) भी है, जिसका काम ही है इजरायल की कार्रवाई को नरसंहार घोषित करना। ऐसे में वो इजरायल की आत्मरक्षा हर की कार्रवाई को गाजा के मुस्लिमों नरसंहार तो घोषित करती ही है, लेकिन पाकिस्तान और बांग्लादेश में इस्लामी कट्टरपंथियों द्वारा हिंदुओं पर किए जा रहे अत्याचारों के खिलाफ कभी मुँह नहीं खोलती।

वर्षा वामपंथी प्रचार प्रोपेगेंडा पोर्टल ‘द वायर’ पर भी लगातार आर्टिकल लिखती रही है, जिसमें अधिकतर कंटेंट हिंदुओं, राष्ट्रवादियों और इजरायल के खिलाफ है।

(यह रिपोर्ट मूल रुप से अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)