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दिल्ली HC के आदेश पर पुलिस ने UNI न्यूज एजेंसी का ऑफिस किया सील, वामपंथी-कॉन्ग्रेसी बता रहे प्रेस की आजादी पर हमला: जानें क्या है पूरा विवाद

राष्ट्रीय राजधानी में उस समय बड़ा विवाद खड़ा हो गया जब देश की सबसे पुरानी समाचार एजेंसियों में से एक यूनाइटेड न्यूज ऑफ इंडिया (UNI) के दफ्तर पर पुलिस कार्रवाई की गई। शुक्रवार (20 मार्च 2026) की शाम दिल्ली पुलिस के अधिकारी अर्धसैनिक बलों के साथ रफी मार्ग स्थित UNI के कार्यालय पहुँचे और अदालत के आदेश के बाद वहाँ खाली कराने की प्रक्रिया शुरू की।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, दफ्तर में मौजूद करीब 50 पत्रकारों और कर्मचारियों को तुरंत परिसर खाली करने के लिए कहा गया। यह भी सामने आया कि कार्रवाई के दौरान कुछ कर्मचारियों को जबरन बाहर निकाला गया।

इस मामले पर डिप्टी कमिश्नर ऑफ पुलिस सचिन शर्मा ने कहा कि पुलिस केवल सरकारी अधिकारियों की मदद के लिए वहाँ मौजूद थी। उन्होंने बताया, “हाईकोर्ट के आदेश के अनुसार हम L&DO अधिकारियों को सुरक्षा देने पहुँचे थे और UNI के स्टाफ से परिसर खाली करने को कहा गया।”

यह पूरी कार्रवाई दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा UNI की उस याचिका को खारिज किए जाने के कुछ घंटों बाद हुई, जिसमें जमीन आवंटन रद्द करने के फैसले को चुनौती दी गई थी। इसके तुरंत बाद अधिकारियों ने संपत्ति को सील कर दिया, जिसके बाद प्रेस की आजादी और सरकारी कार्रवाई को लेकर बहस तेज हो गई।

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UNI के खिलाफ कार्रवाई को ‘प्रेस की आजादी’ पर हमला बताकर जनता को किया जा रहा गुमराह

इस घटना के बाद कई वामपंथी विचारधारा से जुड़े लोग, एक्टिविस्ट और खुद को पत्रकार बताने वाले लोग सोशल मीडिया पर सरकार की आलोचना करने लगे। कई लोगों ने कहा कि यह कदम भारत में अभिव्यक्ति की आजादी के लिए कम होती जगह को दिखाता है।

कॉन्ग्रेस से जुड़े कार्यकर्ता श्रीनिवास ने इस स्थिति की तुलना एक तानाशाही व्यवस्था से की और कहा कि भारत में मीडिया की स्वतंत्रता पर गंभीर खतरा है। उन्होंने लिखा, “बधाई हो, भारत में उत्तर कोरिया पैदा हो गया…”

पत्रकार ममता त्रिपाठी ने भी इस मामले पर चिंता जताई और आरोप लगाया कि मीडिया इंडस्ट्री पर नियंत्रण किया जा रहा है। उन्होंने एक वीडियो शेयर करते हुए लिखा, “क्या लाला जी अब UNI पर भी कब्जा कर लेंगे? आज दिल्ली पुलिस ने UNI के दफ्तर पर छापा मारा!! पूरे न्यूज इंडस्ट्री को अपनी मुट्ठी में कर रखा है।”

इसी तरह पत्रकार हर्षवर्धन त्रिपाठी ने भी इस कार्रवाई की आलोचना की और सामने आए दृश्य को परेशान करने वाला बताया। उन्होंने लिखा, “दिल्ली पुलिस ने UNI पर छापा मारा है। ‘द स्टेट्समैन’ अखबार भी इसी समूह का हिस्सा है। यह शर्मनाक दृश्य है।”

वहीं एक अन्य पत्रकार नमिता शर्मा ने इस पूरे मामले पर कड़ी प्रतिक्रिया दी और कहा कि सिस्टम खुद मीडिया को निशाना बना रहा है। उन्होंने लिखा, “कोई गोली से मरता है, कोई भूख से… तो कोई सिस्टम से मरेगा, सब मरेंगे, दिल्ली पुलिस द्वारा UNI न्यूज पर रेड… मीडिया के लिए साफ संदेश है, जो चाटेगा, वो काटा जाएगा। आज UNI की बारी है, कल आपकी होगी, चापलूसी करने वाली पत्रकारिता ने भ्रष्ट सरकारों को महान बना दिया है…”

राजनीतिक नेताओं ने भी इस मामले में अपनी प्रतिक्रिया दी। पी संतोष कुमार ने इस कार्रवाई की निंदा करते हुए इसे प्रेस की आजादी पर हमला बताया।

इसी बीच गुजरात के एक अन्य कॉन्ग्रेस कार्यकर्ता सरल पटेल ने इस कार्रवाई को अघोषित आपातकाल जैसा बताया और अधिकारियों पर सख्ती से काम करने का आरोप लगाया। उन्होंने लिखा, “मोदी बीजेपी सरकार के पिछले 12 सालों के अघोषित आपातकाल की एक झलक है यह। भारत की सबसे पुरानी न्यूज एजेंसी UNI के दफ्तर पर दिल्ली पुलिस ने ऐसे छापा मारा और सील कर दिया, जैसे किसी आतंकी संगठन के खिलाफ कार्रवाई हो रही हो। कर्मचारियों को अपना सामान तक लेने का समय नहीं दिया गया। यह प्रेस की आजादी पर खुला हमला है!”

इन प्रतिक्रियाओं ने इस नैरेटिव को और हवा दी है कि प्रेस की आजादी खतरे में है। हालाँकि, कुछ अन्य लोगों का मानना है कि इस तरह के बयान बिना पूरे कानूनी और न्यायिक संदर्भ को समझे अनावश्यक घबराहट और डर का माहौल पैदा कर रहे हैं।

कार्रवाई की वजह क्या थी? कानूनी बैकग्राउंड

इस पूरे विवाद के केंद्र में UNI और सरकार के लैंड एंड डेवलपमेंट ऑफिस (L&DO) के बीच लंबे समय से चला आ रहा जमीन का विवाद है, जो आवास और शहरी मामलों के मंत्रालय के तहत आता है।

यह संपत्ति केंद्रीय दिल्ली के 9 रफी मार्ग पर स्थित है और इसे बेहद कीमती सार्वजनिक जमीन माना जाता है। UNI को यह जमीन कई दशक पहले इस साफ शर्त के साथ दी गई थी कि वह तय समय के भीतर यहाँ प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया (PCI) के साथ मिलकर एक संयुक्त कार्यालय भवन बनाएगा।

लेकिन सरकार और अदालत के रिकॉर्ड के अनुसार, यह शर्त कभी पूरी नहीं की गई। अपने हालिया आदेश में दिल्ली हाईकोर्ट ने UNI के खिलाफ कड़ी टिप्पणियाँ कीं। न्यायमूर्ति सचिन दत्त ने कहा कि संगठन ने वर्षों तक अपनी जिम्मेदारियाँ पूरी किए बिना ही कीमती सार्वजनिक जमीन पर कब्जा बनाए रखा।

अदालत ने कहा, “इस मामले के तथ्य दिखाते हैं कि एक ऐसी स्थिति बनी हुई थी, जहाँ एक लाइसेंसी ने दशकों तक अपनी जिम्मेदारियाँ पूरी नहीं कीं और कीमती सार्वजनिक जमीन को जैसे बंधक बनाकर रखा।”

अदालत ने आगे कहा कि इस तरह का व्यवहार “सार्वजनिक जमीन के आवंटन की व्यवस्था की बुनियाद पर चोट करता है” और यह निष्कर्ष निकाला कि “आवंटन रद्द किया जाना पूरी तरह सही और कानूनी रूप से अनिवार्य था।”

दशकों से नियमों का पालन न करना और डेडलाइन चूकना

यह मामला नया नहीं है, बल्कि 45 साल से भी ज्यादा पुराना है। UNI को रफी मार्ग स्थित जमीन पहली बार 1979 में इस योजना के साथ दी गई थी कि यहाँ कई मीडिया संस्थानों के लिए एक साझा ऑफिस कॉम्प्लेक्स बनाया जाएगा, लेकिन यह परियोजना कभी शुरू ही नहीं हो सकी।

इसके बाद 1986, 1999 और 2000 में कई बार संशोधित आवंटन पत्र जारी किए गए, जिनमें हर बार भवन निर्माण की शर्त दोहराई गई। इसके बावजूद कोई खास प्रगति नहीं हुई। यहाँ तक कि 2012 में निर्माण की मंजूरी मिलने के बाद भी परियोजना ठप ही रही।

साल 2023 में, कारण बताओ नोटिस जारी करने और संतोषजनक जवाब न मिलने के बाद, L&DO ने लीज की शर्तों के उल्लंघन का हवाला देते हुए आवंटन रद्द कर दिया। UNI ने इस फैसले को अदालत में चुनौती दी, लेकिन उसकी याचिका खारिज कर दी गई।

हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि “45 साल से अधिक समय तक लगातार काम न करने” को इस आधार पर माफ नहीं किया जा सकता कि अब संगठन कार्रवाई करने को तैयार है।

इस बीच UNI की आर्थिक समस्याओं ने स्थिति को और जटिल बना दिया। एजेंसी दिवालियापन प्रक्रिया से गुजरी और 2025 में द स्टेट्समैन लिमिटेड ने इसे अपने नियंत्रण में ले लिया। सरकार का तर्क था कि इस स्वामित्व परिवर्तन से आवंटी की प्रकृति बदल गई, क्योंकि यह जमीन मूल रूप से एक गैर-लाभकारी संस्था को दी गई थी, न कि किसी निजी व्यावसायिक संगठन को।

न्यायालय ने जनहित पर जोर दिया

अदालत ने एक और अहम बिंदु यह उठाया कि सार्वजनिक संपत्तियों की सुरक्षा बेहद जरूरी है। जिस जमीन की बात हो रही है, उसकी कीमत करीब 409 करोड़ रुपए आंकी गई है, जिससे यह एक बहुत ही कीमती सार्वजनिक संसाधन बन जाती है।

अदालत ने जोर देकर कहा कि सार्वजनिक जमीन को निजी संपत्ति की तरह नहीं माना जा सकता। उसने कहा, “सार्वजनिक जमीन को ऐसे किसी डिफॉल्टर लाइसेंसी के पास बंधक बनाकर नहीं रखा जा सकता, जिसने उस उद्देश्य को ही पूरा नहीं किया, जिसके लिए लाइसेंस दिया गया था।”

अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि भविष्य में ऐसे मामलों से बचने के लिए जमीन आवंटन की शर्तों को सख्ती से लागू किया जाए, ताकि इस तरह की लंबी देरी और दुरुपयोग न हो।

सरकार की भूमिका: हाई कोर्ट के आदेश को लागू करना

इस पूरे विवाद में एक बड़ा सवाल यह भी है कि सरकार ने यह कार्रवाई अपने स्तर पर की या फिर सिर्फ अदालत के निर्देशों का पालन किया। घटनाक्रम को ध्यान से देखने पर लगता है कि यह कार्रवाई दिल्ली हाईकोर्ट के आदेश के बाद की गई, जिसमें साफ तौर पर अधिकारियों को “तुरंत जमीन का कब्जा लेने” के लिए कहा गया था।

पुलिस अधिकारियों ने भी कहा है कि उनकी भूमिका केवल खाली कराने की प्रक्रिया के दौरान सुरक्षा देने तक सीमित थी। यह पूरी कार्रवाई L&DO के समर्थन में की गई, जो सरकारी जमीन के प्रबंधन के लिए जिम्मेदार है। इस लिहाज से देखा जाए तो सरकार की कार्रवाई मनमानी नहीं, बल्कि अदालत के निर्देशों के अनुरूप दिखाई देती है।

मामला कानूनी कार्रवाई का है, प्रेस की आजादी का नहीं

UNI विवाद ने एक बार फिर प्रेस की आजादी को लेकर बहस को सुर्खियों में ला दिया है। जहाँ कुछ एक्टिविस्ट और पत्रकार इस घटना को मीडिया की स्वतंत्रता पर हमला बता रहे हैं, वहीं कानूनी रिकॉर्ड एक ज्यादा जटिल तस्वीर पेश करता है।

यह कार्रवाई अचानक नहीं हुई, बल्कि जमीन के इस्तेमाल को लेकर दशकों पुराने विवाद का नतीजा है। दिल्ली हाईकोर्ट की विस्तृत टिप्पणियाँ बताती हैं कि UNI लगातार अपनी जिम्मेदारियों को पूरा करने में विफल रहा।

साथ ही, सरकार एक इम्प्लीमेंटेशन एजेंसी के रूप में अदालत के आदेशों का पालन करने के लिए बाध्य होती है। ऐसे निर्देशों को नजरअंदाज करना शासन और कानून के राज पर गंभीर सवाल खड़े कर सकता है।

जहाँ एक ओर प्रेस की आजादी को लेकर चिंताएँ किसी भी लोकतंत्र में अहम होती हैं, वहीं कानूनी कार्रवाई और राजनीतिक नैरेटिव के बीच फर्क करना भी उतना ही जरूरी है। इस मामले में उपलब्ध तथ्यों से यही संकेत मिलता है कि UNI के खिलाफ की गई कार्रवाई एक न्यायिक फैसले पर आधारित थी, न कि मीडिया पर किसी स्वतंत्र कार्रवाई का हिस्सा।

हालाँकि, इस घटना ने साफ तौर पर एक बड़ी बहस को जन्म दिया है और मीडिया की आजादी, सरकारी कार्रवाई और जवाबदेही को लेकर चर्चा आने वाले दिनों में जारी रहने की संभावना है।


(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

Exclusive मुंबई के धारावी में अशिक खान ने चाकुओं से गोदकर हिंदू युवक को उतारा मौत के घाट, अपने बचाव में दर्ज कराई क्रॉस FIR: जानें- क्या लिखा है

मुंबई के धारावी इलाके में 16 मार्च 2026 को एक मामूली बहस ने हिंसक रूप ले लिया और एक मुस्लिम युवक ने एक हिंदू युवक की बेरहमी से हत्या कर दी। मृतक की पहचान अश्विन नादर के रूप में हुई है, जिसे अशिक असीम अख्तर खान ने शाम करीब 5:30 बजे गोपीनाथ कॉलोनी के एक सार्वजनिक शौचालय के पास चाकू मारकर मौत के घाट उतार दिया।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, मौके पर मौजूद लोगों ने बीच-बचाव की कोशिश की, लेकिन आरोपित लगातार अश्विन पर चाकू से वार करता रहा, जिससे उसके शरीर पर गहरे घाव हो गए। गंभीर रूप से घायल अश्विन को तुरंत नजदीकी अस्पताल ले जाया गया, जहाँ इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई।

घटना वाले दिन ही मृतक की माँ ने स्थानीय पुलिस स्टेशन में आरोपित अशिक असीम अख्तर खान के खिलाफ FIR दर्ज कराई। इस FIR में महाराष्ट्र पुलिस अधिनियम 1951 की धारा 135 और 37(1)(a) तथा BNS की धारा 109(1) और 351(3) के तहत मामला दर्ज किया गया।

(फोटो साभार: Mumbai police)

FIR के मुताबिक, 16 मार्च 2026 की शाम को अश्विन के चाचा मुथप्पा नाडर दौड़ते हुए उसकी माँ शेवंती शिवकुमार नाडर के पास पहुँचे और बताया कि उनके बेटे पर गोपीनाथ कॉलोनी के सार्वजनिक शौचालय के पास बेरहमी से हमला हुआ है। इसके बाद दोनों घटनास्थल पर पहुँचे, जहाँ उन्होंने अश्विन को खून से लथपथ जमीन पर बेहोश हालत में पड़ा पाया।

शेवंती ने FIR में बताया कि उन्होंने आरोपित को वहीं खड़े देखा, जिसके हाथ में खून से सना हुआ चाकू था। आरोपित वहाँ मौजूद लोगों को धमकी दे रहा था कि जो भी बीच में आएगा, उसे जान से मार देगा। उन्होंने यह भी बताया कि उनके बेटे का गला काटा गया था और उसके सीने, कमर, पेट और जांघों पर गहरे घाव थे।

(फोटो साभार: Mumbai Police)

पुलिस के मौके पर पहुँचने के बाद आरोपित को पकड़ लिया गया। मृतक की माँ ने बताया कि उन्हें वहाँ मौजूद लोगों से पता चला कि उनका बेटा और आरोपित एक-दूसरे को पहले से जानते थे और पहले भी उनके बीच झगड़ा हो चुका था। पुलिस अश्विन को अस्पताल लेकर गई, जहाँ डॉक्टरों ने उसकी हालत गंभीर बताई।

आरोपित अशिक खान द्वारा दर्ज की गई काउंटर FIR

घटना के अगले दिन 17 मार्च 2026 को आरोपित अशिक असीम अख्तर खान ने मृतक के खिलाफ BNS की धारा 118(1), 351(2) और 352 के तहत काउंटर FIR दर्ज कराई। अपनी शिकायत में खान ने दावा किया कि वह मूल रूप से बिहार के पूर्वी चंपारण जिले के ढाका का रहने वाला है।

(फोटो साभार: Mumbai police)

वह मुंबई अपने चाचा के पास रहने आया था, लेकिन फिलहाल अकेला रह रहा है। उसने खुद को दिहाड़ी मजदूर बताया और यह भी कहा कि वह नशे का आदी है। खान ने दावा किया कि उसकी मुलाकात करीब दो महीने पहले अश्विन नाडर से हुई थी, जो कथित तौर पर नशा करता था।

दोनों धारावी इलाके में साथ में गांजा पीते थे। खान के अनुसार, 15 मार्च 2026 को जूता गली में सिगरेट को लेकर उसका अश्विन और उसके दोस्तों के साथ झगड़ा हुआ था, जिसके बाद वह वहाँ से चला गया। खान ने आगे बताया कि 16 मार्च को वह गोपीनाथ कॉलोनी के सार्वजनिक शौचालय के पीछे बैठकर गांजा पी रहा था, तभी अश्विन वहाँ आया।

(फोटो साभार: Mumbai Police)

उसने आरोप लगाया कि पिछले दिन के झगड़े की वजह से अश्विन उसे गुस्से से देख रहा था और फिर दोनों के बीच बहस शुरू हो गई। खान के मुताबिक, अश्विन ने उसे गालियाँ दीं और जान से मारने की धमकी भी दी। खान ने यह भी कहा कि बहस के दौरान उसने चाकू निकाला और हमला किया, जिसके जवाब में अश्विन ने उस पर हाथ से हमला किया।

उसके अनुसार, जब अश्विन ने उससे चाकू छीन लिया, तो उसने अपनी जेब से ब्लेड निकालकर अश्विन पर वार किया। खान ने दावा किया कि इस झगड़े में उसका दाहिना हाथ घायल हुआ, जबकि अश्विन की गर्दन पर चोट आई। दोनों को इलाज के लिए अस्पताल ले जाया गया।

गौरतलब है कि जब यह FIR दर्ज की गई, तब अश्विन नाडर का इलाज चल रहा था। बाद में उसकी मौत हो गई। हालाँकि रिपोर्ट लिखे जाने तक उसकी मौत का सटीक समय और तारीख स्पष्ट नहीं हो पाई थी।

(मूल रुप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

हिमाचल प्रदेश के इतिहास में पहली बार सिकुड़ गया राज्य का बजट, CM से लेकर DM तक की सैलरी में कटौती: समझें- कैसे कॉन्ग्रेस की नीतियों से राज्य हुआ बर्बाद

मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने शनिवार (21 मार्च 2026) को वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए 54,928 करोड़ रुपए का बजट पेश किया, जो पिछले वर्ष के 58,514 करोड़ रुपए से 3,586 करोड़ रुपए कम है। इसके साथ ही हिमाचल प्रदेश के इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ है कि बजट का आकार घटा दिया गया। पिछले वर्ष जहाँ बजट 58,514 करोड़ रुपए था, वहीं इस बार इसे घटाकर 54,928 करोड़ रुपए कर दिया गया। यह लगभग 3,500–4,000 करोड़ रुपए की कटौती है।

यह कटौती महज संख्यात्मक नहीं, बल्कि राज्य की अर्थव्यवस्था की गंभीर बीमारी का प्रतीक है। बजट का कम होना केवल एक आँकड़ा नहीं है, बल्कि यह राज्य की आर्थिक स्थिति की गंभीरता का संकेत है। आमतौर पर राज्यों का बजट हर साल बढ़ता है, क्योंकि विकास कार्य, महंगाई और जनसंख्या की जरूरतें बढ़ती हैं। लेकिन यहाँ उल्टा हुआ यानी सरकार के पास खर्च करने के लिए संसाधन कम पड़ गए।

इसके साथ ही मुख्यमंत्री ने अपने वेतन में 50 प्रतिशत, उपमुख्यमंत्री और मंत्रियों के वेतन में 30 प्रतिशत, विधायकों के वेतन में 20 प्रतिशत की कटौती की घोषणा की है। ग्रुप-ए और ग्रुप-बी अधिकारियों के वेतन का 3 प्रतिशत, मुख्य सचिव, एसीएस, पीएस और डीजीपी स्तर के अधिकारियों का 30 प्रतिशत तथा अन्य उच्चाधिकारियों का 20 प्रतिशत वेतन अगले छह महीनों के लिए स्थगित किया गया है। बोर्ड-निगम के चेयरमैन, वाइस चेयरमैन और सलाहकारों के वेतन में भी 20 प्रतिशत कटौती होगी। ग्रुप-सी और डी कर्मचारी तथा पेंशनभोगी इससे अछूते रहेंगे, लेकिन न्यायपालिका से भी सहयोग की अपील की गई है।

यह फैसला ‘वित्तीय अनुशासन’ के नाम पर लिया गया है, लेकिन वास्तविकता यह है कि कॉन्ग्रेस सरकार की अकर्मण्यता, चुनावी फ्रीबीज के जाल और कुप्रबंधन ने राज्य के खजाने को खोखला कर दिया है। कमाई के स्रोत सूख गए हैं, जबकि खर्च दिन-प्रतिदिन बढ़ते जा रहे हैं। यह एक राज्य का हाल नहीं है, बल्कि कॉन्ग्रेस शासित कर्नाटक और डीएमके शासित तमिलनाडु (जो कॉन्ग्रेस की विचारधारा से प्रेरित है) भी इसी रास्ते पर चल रहे हैं।

इस रिपोर्ट में हम विस्तार से विश्लेषण करेंगे कि कैसे सुखविंदर सिंह सुक्खू की सरकार ने हिमाचल को फ्रीबीज का शिकार बनाया, कैसे वादे पूरे नहीं हुए, बजट कटौती से किन क्षेत्रों को नुकसान होगा, जनता पर क्या असर पड़ेगा और यह कॉन्ग्रेस की राष्ट्रीय नीति का हिस्सा कैसे है।

कॉन्ग्रेस की फ्रीबीज संस्कृति: हिमाचल की आर्थिक तबाही का मूल कारण

कॉन्ग्रेस ने 2022 के विधानसभा चुनाव में हिमाचल प्रदेश में सत्ता हासिल करने के लिए भारी-भरकम वादे किए थे, जिसमें पुरानी पेंशन योजना (ओपीएस) की बहाली, महिलाओं को 1,500 रुपए मासिक भत्ता, 300 यूनिट मुफ्त बिजली, युवाओं को रोजगार, किसानों को एमएसपी और बागवानी को बढ़ावा देना शामिल था।

सुखविंदर सिंह सुक्खू ने इन वादों को ‘जनहित’ का नाम देकर लागू किया, लेकिन इनकी लागत राज्य की क्षमता से कहीं ज्यादा थी। ओपीएस की बहाली अकेले 1,000 करोड़ रुपए सालाना अतिरिक्त बोझ डाल रही है, जो 1.36 लाख कर्मचारियों को लाभ देती है। महिलाओं के भत्ते, मुफ्त बिजली और अन्य सब्सिडी ने राजस्व व्यय को आसमान छू लिया।

पिछले तीन वर्षों में कॉन्ग्रेस सरकार ने लगभग 45,000 करोड़ रुपए का नया कर्ज लिया, कुल कर्ज 1 लाख करोड़ रुपए के पार पहुँच गया। ब्याज अदायगी अकेले 13 रुपए प्रति 100 रुपए व्यय में जा रही है। भाजपा प्रदेश प्रवक्ता संदीपनी भारद्वाज का कहना है यह कर्जा लेकर घी पीने वाली नीति है।

इस बजट में राज्य का राजस्व घाटा 6,577 करोड़ रुपए अनुमानित है, जबकि राजकोषीय घाटा 9,698 करोड़ रुपए (जीएसडीपी का 3.49 प्रतिशत) हो गया है। केंद्र द्वारा राजस्व घाटा अनुदान (आरडीजी) बंद होने को कॉन्ग्रेस बहाना बना रही है, जिसमें वार्षिक 8,105 करोड़ रुपए का नुकसान होना है, लेकिन सच्चाई यह है कि फ्रीबीज और कुप्रबंधन ने पहले ही खजाना खाली कर दिया था।

कॉन्ग्रेस सरकार ने दोगुना किया कर्ज

पिछली भाजपा सरकार के समय भी कर्ज बढ़ा था, लेकिन कॉन्ग्रेस ने उसे दोगुना कर दिया। कॉन्ग्रेस की ‘आइडियोलॉजी’ फ्रीबीज पर टिकी है, न कि विकास पर।

अब देखिए कि सुक्खू सरकार ने बोर्ड-निगमों में चेयरमैनों का मानदेय 30,000 से 80,000 रुपए बढ़ाया, फिर कटौती का दिखावा किया है। उन्होंने पंचायतों के 15वें वित्त आयोग के फंड वापस लेने की प्रक्रिया शुरू की, जो लोकतंत्र पर हमला है। यही नहीं, सुक्खू सरकार में दूध खरीद पर सीमा लगा दी गई, जबकि किसानों की 120 करोड़ रुपए की देनदारी लंबित है। इसके अलावा हिमाचल प्रदेश की रीढ़ यानी बागवानी की भी सुक्खू सरकार ने अनदेखी की, जिसकी वजह से केंद्र प्रायोजित 3,300 करोड़ रुपए के प्रोजेक्ट्स लागू नहीं हो सके और धन वापसी की नौबत तक आ गई।

यह अकर्मण्यता है। सुक्खू ने कहा कि बजट में ग्रामीण अर्थव्यवस्था, शिक्षा और स्वास्थ्य पर कोई कटौती नहीं है, लेकिन वास्तविकता एक दम उलट है। कुल व्यय में वेतन-पेंशन-ब्याज पर 61 रुपए प्रति 100 रुपए खर्च हो रहे हैं, जबकि पूंजीगत कार्यों पर सिर्फ 20 रुपए। ऐसे में विकास कार्य रुकेंगे, क्योंकि बजट घटने से लोक निर्माण, जल शक्ति जैसे विभाग प्रभावित होंगे, भले ही सीएम दावा करें कि इन पर कटौती नहीं की गई है।

CAG रिपोर्ट साफ कहती है कि हिमाचल प्रदेश ने भाजपा शासनकाल में 2018-19 से 2021-22 तक राजस्व अधिशेष दिखाया, लेकिन कॉन्ग्रेस के हाथ में कमान आने के बाद से लगातार घाटा हो रहा है। 15वें वित्त आयोग का अनुदान राजस्व घाटा खत्म करने के लिए था, लेकिन कॉन्ग्रेस ने फ्रीबीज पर उड़ा दिया। बकाया गारंटी 3,188 करोड़ रुपए, जो जीएसडीपी का 1.2 प्रतिशत है।

वेतन कटौती से क्या होंगे नुकसान

हिमाचल प्रदेश में वेतन कटौती वित्तीय आपातकाल का संकेत है। सरकार का दावा है कि इससे खजाने पर दबाव कम होगा, लेकिन हकीकत ये है कि इससे विकास कार्यों पर सीधा असर पड़ेगा। ग्रामीण क्षेत्रों में सड़कें, सिंचाई, बिजली परियोजनाएं अधर में लटकेंगी। शिक्षा और स्वास्थ्य में शिक्षक-डॉक्टर भर्ती रुकेंगी।

इस सरकार में आम आदमी को रोजगार नहीं मिल रहा है। युवा बेरोजगार, महिलाओं को 1,500 रुपए मिल भी रहे तो महंगाई में घुल गए। किसानों को दूध-फल बेचने में परेशानी हो रही है। पेंशनभोगी और ग्रुप-सी/डी कर्मचारी बच गए, लेकिन कुल मिलाकर माहौल निराशा का है। सुक्खू सरकार के इस कदम से प्रति व्यक्ति व्यय घटेगा, जिससे विकास दर धीमी पड़ेगी।

कॉन्ग्रेस शासित राज्यों का बुरा हाल

कॉन्ग्रेस ने जो चुनावी वादे किए थे, उन्हें भी पूरे नहीं कर पाई। ये एक राज्य का हाल नहीं है, बल्कि कॉन्ग्रेस शासित कर्नाटक भी इसी रास्ते की तरफ बढ़ रहा है। तमिलनाडु का भी यही हाल है। राज्य लगातार कर्ज ले रहे हैं, जबकि कर्नाटक और तमिलनाडु जैसे राज्य परपंरागत तरीके से समृद्ध माने जाते हैं और इनकी कमाई भी बहुत अधिक है। लेकिन कॉन्ग्रेस इन राज्यों में फ्रीबीज का वादा करके सत्ता में आई और पूरे राज्य को बर्बाद कर गई।

हिमाचल की अर्थव्यवस्था पर संकट

हिमाचल प्रदेश की राजनीति और अर्थव्यवस्था इस समय एक ऐसे मोड़ पर खड़ी दिखाई देती है, जहाँ से आगे का रास्ता बेहद चुनौतीपूर्ण है। हालिया बजट में जो तस्वीर सामने आई है, उसने न सिर्फ वित्तीय संकट को उजागर किया है, बल्कि यह भी दिखाया है कि राज्य की आर्थिक संरचना कितनी कमजोर हो चुकी है।

हिमाचल प्रदेश की मौजूदा स्थिति एक चेतावनी है केवल एक राज्य के लिए नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए। सुखविंदर सिंह सुक्खू सरकार का यह फैसला कि वह अपने और अधिकारियों के वेतन में कटौती करेगी, एक साहसिक कदम जरूर है, लेकिन यह उस गहरे संकट का लक्षण भी है, जिसमें राज्य फंस चुका है। हिमाचल की यह कहानी केवल एक राज्य की आर्थिक रिपोर्ट नहीं, बल्कि उस राजनीति का आईना है, जहाँ अल्पकालिक लाभ के लिए दीर्घकालिक स्थिरता को नजरअंदाज किया गया।

सुखविंदर सिंह सुक्खू की अगुवाई वाली कॉन्ग्रेस सरकार ने अपने चौथे बजट में कई ऐसे फैसले लिए हैं, जिन्हें ‘सख्त लेकिन जरूरी’ बताया जा रहा है। लेकिन सवाल यह है कि आखिर राज्य को इस स्थिति तक पहुँचाया किसने? अब देखना यह है कि क्या यह संकट सुधार का अवसर बनता है या फिर यह आर्थिक गिरावट की लंबी कहानी की शुरुआत है।

AI से क्या चाहते हैं लोग और किस बात को लेकर हैं चिंतित: एनथ्रोपिक के ‘सबसे बड़े सर्वे’ में हुआ बड़ा खुलासा, पढ़ें- कैसे बदल जाएगी दुनिया

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI आज सिर्फ एक तकनीकी शब्द नहीं रह गया है, बल्कि यह हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन चुका है। चाहे दफ्तर का काम हो, पढ़ाई हो, बिजनेस हो या व्यक्तिगत जीवन, AI हर जगह अपनी जगह बना रहा है।

इसी बदलती दुनिया को समझने के लिए AI कंपनी एनथ्रोपिक (Anthropic) ने एक स्टडी की है। इस अध्ययन में 159 देशों के 80 हजार से अधिक लोगों से बातचीत की गई और खास बात यह रही कि यह इंटरव्यू खुद AI मॉडल क्लाउड ने लिया।

यह स्टडी इसलिए खास है, क्योंकि इसमें सिर्फ आँकड़े नहीं हैं, बल्कि लोगों की सोच, उनके अनुभव, उनकी उम्मीदें और उनके डर सब कुछ बहुत गहराई से सामने आया है। इससे ये समझने में मदद मिलती है कि लोग AI को कैसे देख रहे हैं और भविष्य में उससे क्या चाहते हैं।

AI का बढ़ता प्रभाव

आज AI को लेकर दुनिया भर में चर्चा हो रही हैं, कहीं इसे भविष्य का सबसे बड़ा अवसर बताया जा रहा है, तो कहीं इसे खतरे के रूप में देखा जा रहा है। लेकिन इन चर्चाओं में अक्सर एक चीज की कमी रहती है, आम लोगों की आवाज।

Anthropic की इस स्टडी ने उसी कमी को पूरा करने की कोशिश की है। इसमें लोगों से सवाल पूछे गए, उनकी बातों को ध्यान से सुना गया और फिर AI की मदद से उन जवाबों का विश्लेषण किया गया। इस तरह यह स्टडी सिर्फ डेटा नहीं, बल्कि लोगों के अनुभव के रूप में सामने आई है।

AI सबसे बड़ा सहयोगी

स्टडी के अनुसार, लगभग 18.8 प्रतिशत लोगों ने AI से अपनी सबसे बड़ी उम्मीद प्रोफेशनल एक्सीलेंस यानी काम में उत्कृष्टता हासिल करने की जताई। इसका सीधा मतलब है कि लोग चाहते हैं कि AI उनके छोटे-छोटे, दोहराए जाने वाले काम संभाल ले, ताकि वे बड़े और महत्वपूर्ण फैसलों पर ध्यान दे सकें।

कई प्रोफेशनल्स ने बताया कि AI की मदद से वे अपने काम को तेजी से और बेहतर तरीके से पूरा कर पा रहे हैं। इससे उनकी प्रोडक्टिविटी बढ़ी है और वे ज्यादा प्रभावी ढंग से काम कर पा रहे हैं। लेकिन यह सिर्फ काम तक सीमित नहीं है, इसके पीछे एक गहरी सोच भी छिपी है।

समय की आजादी: असली लक्ष्य बेहतर जीवन

जब लोगों से यह पूछा गया कि वे AI के जरिए काम में सुधार क्यों चाहते हैं, तो जवाब सिर्फ अधिक पैसा या बेहतर करियर तक सीमित नहीं था। बहुत से लोगों ने कहा कि वे AI की मदद से अपने लिए समय निकालना चाहते हैं।

किसी ने कहा कि अब वह परिवार के साथ ज्यादा समय बिता पा रहा है, तो किसी ने बताया कि उसे अपने शौक पूरे करने का मौका मिल रहा है। यानी AI लोगों को सिर्फ काम में मदद नहीं कर रहा, बल्कि उन्हें जीवन जीने का समय भी दे रहा है।

व्यक्तिगत विकास और मानसिक सशक्तिकरण

करीब 13.7 प्रतिशत लोगों ने AI को अपने पर्सनल ट्रांसफॉर्मेशन का जरिया बताया। इसका मतलब है कि वे AI की मदद से खुद को बेहतर बनाना चाहते हैं, नई चीजें सीखना, अपनी सोच को विकसित करना और मानसिक रूप से मजबूत बनना।

कई लोगों ने AI को एक ऐसे साथी के रूप में देखा जो उन्हें बिना किसी जजमेंट के समझता है। वे उससे अपने सवाल पूछ सकते हैं, अपनी समस्याएँ बता सकते हैं और सीख सकते हैं। खासकर छात्रों के लिए AI एक ऐसा शिक्षक बन गया है जो हमेशा उपलब्ध रहता है और धैर्य के साथ हर सवाल का जवाब देता है।

जीवन प्रबंधन में AI की भूमिका

AI का इस्तेमाल लाइफ मैनेजमेंट में भी देखने को मिला। लगभग 14 प्रतिशत लोगों ने कहा कि वे AI का इस्तेमाल अपने रोजमर्रा के कामों को व्यवस्थित करने के लिए करते हैं।

आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में समय और ध्यान दोनों की कमी होती है। ऐसे में AI एक पर्सनल असिस्टेंट की तरह काम करता है, जो शेड्यूल बनाता है, रिमाइंडर देता है और कामों को प्राथमिकता के अनुसार व्यवस्थित करता है। खासकर उन लोगों के लिए, जिन्हें फोकस करने या प्लानिंग में दिक्कत होती है, AI एक बड़ी मदद बनकर उभरा है।

आर्थिक अवसर और विकास की नई दिशा

AI ने लोगों के लिए कमाई के नए रास्ते भी खोले हैं। स्टडी में कई लोगों ने बताया कि वे AI की मदद से अपना बिजनेस शुरू कर रहे हैं या अपनी आय बढ़ा रहे हैं।

खासकर विकासशील देशों में AI को एक गेम चेंजर के रूप में देखा जा रहा है। यहाँ लोग इसे एक ऐसे टूल के रूप में देख रहे हैं जो उन्हें बिना ज्यादा संसाधनों के भी आगे बढ़ने का मौका देता है। AI की मदद से लोग नए आइडिया विकसित कर रहे हैं, मार्केट तक पहुँच बना रहे हैं और अपनी पहचान बना रहे हैं।

स्टडी में एक दिलचस्प बात यह सामने आई कि केवल 5.6 प्रतिशत लोगों ने AI का उपयोग क्रिएटिव एक्सप्रेशन के लिए करते हैं। कला, लेखन या संगीत जैसे क्षेत्रों में AI का उपयोग काफी काम रहा। इससे यह संकेत मिलता है कि फिलहाल लोग AI को एक प्रोडक्टिविटी टूल के रूप में ज्यादा देखते हैं, न कि रचनात्मकता को बढ़ाने वाला माध्यम।

सबसे बड़ी चिंता: AI पर भरोसे की कमी

जहाँ उम्मीदें हैं, वहीं चिंताएँ भी हैं। स्टडी में सबसे बड़ी चिंता AI की विश्वसनीयता को लेकर सामने आई। लगभग 26.7 प्रतिशत लोगों को डर है कि AI हमेशा सही जानकारी नहीं देता।

फोटो साभार – एनथ्रोपिक

यह चिंता खासकर उन लोगों में ज्यादा देखी गई जो AI का इस्तेमाल जरूरी निर्णय लेने में करते हैं, जैसे वकील, डॉक्टर या वित्तीय सलाहकार। उनके लिए AI की एक छोटी सी गलती भी बड़े नुकसान का कारण बन सकती है।

नौकरी और आर्थिक असुरक्षा का डर

करीब 22.3 प्रतिशत लोगों ने नौकरी और अर्थव्यवस्था को लेकर चिंता जताई। उन्हें डर है कि AI के बढ़ते इस्तेमाल से नौकरियाँ खत्म हो सकती हैं या काम करने का तरीका पूरी तरह बदल सकता है। हालाँकि कुछ लोग इसे अवसर के रूप में भी देख रहे हैं, लेकिन यह डर अभी भी काफी मजबूत है। खासकर उन लोगों में जिनकी स्थाई नौकरी है और वह पूरी तरह उस पर निर्भर हैं।

लगभग 21.9 प्रतिशत लोगों को यह चिंता है कि AI के बढ़ने से इंसानों का नियंत्रण कम हो सकता है। उन्हें डर है कि कहीं ऐसा न हो कि AI खुद फैसले लेने लगे और इंसानों की भूमिका कम हो जाए। यह चिंता सिर्फ तकनीकी नहीं, बल्कि नैतिक और सामाजिक भी है। लोग यह जानना चाहते हैं कि AI का इस्तेमाल कैसे और किसके नियंत्रण में होगा।

मानसिक प्रभाव और रिश्तों पर असर

AI के इस्तेमाल का एक और पहलू है, उसका मानसिक और सामाजिक प्रभाव। कुछ लोगों को डर है कि AI पर ज्यादा निर्भरता से उनकी सोचने की क्षमता कम हो सकती है।

वहीं दूसरी तरफ कई लोग AI को भावनात्मक सहारा भी मानते हैं। खासकर ऐसे लोग जो अकेले हैं या मुश्किल परिस्थितियों में हैं, वे AI से बातचीत करके राहत महसूस करते हैं। लेकिन इससे यह खतरा भी है कि कहीं लोग असली रिश्तों से दूर न हो जाएँ।

इस स्टडी में यह भी सामने आया कि अलग-अलग देशों में AI को लेकर सोच अलग-अलग है। भारत जैसे देशों में लोग AI को लेकर ज्यादा सकारात्मक हैं, क्योंकि वे इसे अवसर के रूप में देखते हैं।

वहीं यूरोप और अमेरिका में लोग ज्यादा सतर्क हैं और इसके संभावित नुकसान को लेकर चिंतित हैं। यह अंतर आर्थिक स्थिति, तकनीकी पहुँच और सामाजिक ढाँचे के कारण भी हो सकता है।

इस स्टडी का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष लाइट और शेड की अवधारणा है। इसका मतलब है कि AI के फायदे और नुकसान एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। AI आपको तेजी से काम करने में मदद करता है, लेकिन इससे काम का दबाव भी बढ़ सकता है।

यह आपको सीखने में मदद करता है, लेकिन इससे आपकी खुद की सोचने की क्षमता कम हो सकती है। यह आपको भावनात्मक सहारा देता है, लेकिन इससे आप उस पर निर्भर भी हो सकते हैं। यानी AI एक ऐसा टूल है जो जितना फायदेमंद है, उतना ही जटिल भी है।

धुरंधर-2 में ‘अतीक अहमद’ का पाकिस्तानी कनेक्शन दिखाए जाने पर छाती पीट रहे प्रोपेगेंडाबाज, माफिया के लिए उमड़ा प्रेम: जानें- क्या है पूरा सच

फिल्म ‘धुरंधर: द रिवेंज’ में करीब 7-9 मिनट का यूपी के माफिया डॉन का किरदार है। उसका नाम है अतीफ अहमद। फिल्म में उसके आईएसआई कनेक्शन, हथियारों की तस्करी और जाली नोट का धंधा करने वाला दिखाया गया है। इसको लेकर एसपी- कॉन्ग्रेस और तमाम वामपंथियों की भौहें चढ़ गई हैं।

इनका कहना है कि ये पूर्व एसपी सांसद और माफिया अतीक अहमद को दिखाया गया है। लेकिन उसकी हत्या के बाद उसे इस तरह से पाकिस्तान से कनेक्शन दिखाना गलत है। जबकि सच यह है कि अतीक अहमद का पाकिस्तान से न सिर्फ संबंध था बल्कि उसके सारे काले कारनामे पाकिस्तान की मदद से चलते थे। अपना खौफ पैदा करने के लिए वह जिन हथियारों का इस्तेमाल करता था, वह पाकिस्तान से आते थे।

ISI और आतंकियों से कनेक्शन

फिल्म में इलाहाबाद और यूपी का जिक्र करते हुए अतीफ का आईएसआई से कनेक्शन दिखाया गया है। आईएसआई से हथियारों की तस्करी, नकली नोट नेपाल के रास्ते भारत में लाकर खपाना और यूपी में किसकी सरकार बनेगी, इसमें हस्तक्षेप करना। फिल्म में उसका मर्डर भी लगभग उसी तरह दिखाया गया है, जैसा रियल में हुआ था।

हालाँकि, फिल्म में ये दिखाया गया है कि उसकी हत्या की योजना भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजय सान्याल ने की थी। जबकि असल मे अतीक और उसके भाई अशरफ की हत्या 15 अप्रैल 2023 को प्रयागराज में पुलिस कस्टडी में गोली मारने से हुई थी। सीएम योगी के कानून व्यवस्था सख्त किए जाने के बाद यूपी में माफिया राज का खात्मा हुआ।

इसको लेकर फिल्म में दिखाया गया है कि जेल में अतीफ की आईएसआई के हेड से बात होती है, वह 60000 करोड़ जाली नोट लाने के लिए तैयार हो जाता है। यूपी चुनाव को प्रभावित करने के लिए इन जाली नोटों का इस्तेमाल करने का प्लान था। इस बीच उसकी हत्या हो जाती है। इस वजह से कॉन्ग्रेस और समाजवादी पार्टी फिल्म को प्रोपेगेंडा बता रही है।

समाजवादी पार्टी के नेता पूर्व सांसद एसटी हसन का कहना है कि अतीक के मामले में किसी भारतीय जाँच एजेंसी ने आईएसआई कनेक्शन का खुलासा नहीं किया था। लेकिन फिल्म में अतीफ अहमद के नाम के किरदार का कनेक्शन दिखाया गया है। जबकि हकीकत ये है कि अतीक अहमद का कनेक्शन आईएसआई के साथ साथ जम्मू कश्मीर के आतंकी संगठन लश्कर ए तैयबा से था। अतीक अहमद के ISI से सीधे जुड़ाव को दिखाए जाने पर अगर समाजवादी पार्टी के नेता अतीक अहमद की पैरवी कर रहे हैं, तो ये काफी शर्म की बात है।

उसकी हत्या से कुछ दिनों पहले प्रयागराज पुलिस ने अप्रैल 2023 में उमेश पाल हत्याकांड का चार्जशीट दाखिल किया था। इसमें अतीक अहमद और उसके भाई अशरफ अहमद को हथियार तस्करी का भी आरोपी बनाया गया था। चार्जशीट के मुताबिक, उसके आईएसआई और लश्कर ए तैयबा से सीधे संबंध थे। आईएसआई के एजेंट से फोन पर बात होती थी। पंजाब में पाकिस्तान से हथियार ड्रोन के माध्यम से गिराए जाते थे। कोई लोकल एजेंट इसे उठाता था और अतीक अहमद गैंग तक पहुँचाता था। लश्कर ए तैयबा और दूसरे आतंकियों को भी ये हथियार सप्लाई किए जाते थे।

चार्जशीट में कहा गया है कि अगर पुलिस अतीक को उन जगहों पर ले जाए, तो वह हथियार और गोला बारूद तक बरामद करवा सकता है। पुलिस ने इसी बयान पर एफआईआर दर्ज की थी। पुलिस ने जब उसके घर की तलाशी ली थी तो पाकिस्तानी कारतूस और हथियार भी बरामद हुई थी।

पूर्व DGP विक्रम सिंह के मुताबिक, “इस बारे में कोई शक नहीं होना चाहिए। जब ​​अतीक अहमद जिंदा था, तो उसके गैंग को IS-277 (इंटरस्टेट-277) के तौर पर लिस्ट किया गया था। अपने कबूलनामे में उसने माना था कि 0.45 कैलिबर की पिस्तौल, AK-47 और RDX आदि पाकिस्तान से ड्रोन के जरिए पंजाब पहुँचते थे और वहाँ से उस तक पहुँचते थे। उसके संबंध लश्कर-ए-तैयबा और ISI से भी थे। जब अतीक के घर की तलाशी ली गई थी तो पाकिस्तानी कारतूस और हथियार बरामद हुए थे। “

जेल से चलाता था अपना साम्राज्य

फिल्म में दिखाया गया है कि जेल में बंद अतीफ अहमद अपना काम जेल से आराम से चलाता था। उसे फोन मिल जाते थे और वह आईएसआई से बात करता था। सारी प्लानिंग हो जाती थी। हकीकत में भी अतीक अहमद जेल में रहे या बाहर। उसके काले कारनामें चलते रहते थे।

इसमें तो किसी को शक नहीं होना चाहिए कि जब समाजवादी पार्टी की सरकार यूपी में थी, तो अतीक अहमद की तूती बोलती थी। इलाहाबाद और आसपास के इलाकों में वह खौफ का पर्याय हुआ करता था। यहाँ तक कि जब सरकार ने अवैध कब्जा की गई जमीन की नीलामी करने की कोशिश की, तो उसे लेने कोई सामने नहीं आया।

लोगों की जमीनों पर कब्जा करना, गुंडागर्दी, किसी को भी उठवा कर मार देना जैसी हरकतें आज भी लोगों की जुबान पर हैं। फिल्म में जिस तरह से अतीफ अहमद का आईएसआई कनेक्शन दिखाया गया है।

असल में वह भी उसकी मौत से पहले बाहर आ चुका था। खुद उसने इसे स्वीकार किया था। अब फिल्म में अतीफ के किरदार पर सवाल उठाने वालों का कहना है कि अगर उसका पाकिस्तान से कनेक्शन था तो फिर उसकी हत्या पर संसद में क्यों दुख जताया गया। अतीक अहमद पूर्व सांसद था और उसकी मौत पर संसद में श्रद्धांजलि एक सांसद को दिया गया था, न की पाकिस्तानी कनेक्शन वाले माफिया को।

यूपी सरकार में दखल रखता था अतीक अहमद

फिल्म में दिखाया गया है कि यूपी सरकार में अतीफ का अच्छा खासा दखलंदाजी है। नोटबंदी के बाद आईएसआई के चीफ और आतिफ के बीच बातचीत होती है। अतीफ कहता है कि यूपी गया अपने हाथ से…हार जाएँगे चुनाव, आगे अल्लाह की मर्जी..। इसको देखकर बताया जा सकता है कि ये किस वक्त की बात है।

दरअसल माफिया अतीक अहमद ने 1989 में पहली बार इलाहाबाद पश्चिम सीट से विधानसभा चुनाव जीतकर राजनीतिक में सक्रिय हुआ था। उसके बाद वह लगातार चुनाव जीतता रहा। 2004 में वह एसपी की टिकट पर फूलपुर से लोकसभा चुनाव जीता। उसकी समाजवादी पार्टी के सत्ता पर काबिज रहने के दौरान तूती बोलती थी।

1971 में पाकिस्तानी फौज ने चुन-चुनकर मारे हिंदू, अमेरिकी संसद में ‘बांग्लादेश’ के नरसंहार पर आया प्रस्ताव: जानें- क्या हैं माँग

अमेरिकी संसद ‘सीनेट’ में 1971 में बांग्लादेश मुक्ति संग्राम में पाकिस्तानी फौज द्वारा की गई हत्याओं को नरसंहार के रूप में मान्यता देने को लेकर प्रस्ताव पेश किया गया है। शुक्रवार (20 मार्च 2026) को अमेरिकी कॉन्ग्रेस के सांसद ग्रेग लैंड्समैन ने निचले सदन में यह प्रस्ताव पेश किया, जिसमें कहा गया कि पाकिस्तान का यह ऑपरेशन संयुक्त राष्ट्र (UN) की नरसंहार की परिभाषा को पूरा करता है।

लैंड्समैन ने पाकिस्तान का साथ देने के लिए इस्लामी कट्टरपंथी राजनीतिक संगठन ‘जमात-ए-इस्लामी’ को कठघरे में लाने की बात कही। सांसद ने यह भी कहा कि अमेरिका को बहुत पहले ही इसे नरसंहार घोषित कर देना चाहिए था।

उन्होंने बांग्लादेश में अल्पसंख्यक हिंदुओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने की भी माँग की। प्रस्ताव में कहा गया है कि 25 मार्च 1971 को घोषित ऑपरेशन सर्चलाइट के दौरान पागकिस्तानी फौज और उनके इस्लामी सहयोगियों ने अत्याचार किए। उस समय सभी धर्मों के बंगाली मूल के लोगों को हमलों में निशाना बनाया गया था। हिंदुओं का सफाया किया गया और उनका नरसंहार किया गया।

प्रस्ताव में क्या कहा गया?

अमेरिकी संसद में पेश किए गए प्रस्ताव में 1971 में बांग्लादेश मुक्ति संग्राम को इतिहास की दर्दनाक घटनाओं में से एक बताया है, जिसे न्याय और वैश्विक मान्यता नहीं मिल सकी है। इस प्रस्ताव में उस दौर की घटनाओं को याद करते हुए न सिर्फ नरसंहार के रूप में पहचान देने की बात कही गई है, बल्कि बांग्लादेश के अल्पसंख्यक हिंदुओं की सुरक्षा पर भी जोर दिया गया है।

प्रस्ताव में कहा गया कि इस दौरान पश्चिम पाकिस्तान की सरकार में पंजाबी नेताओं की संख्या अधिक थी, जिन्होंने पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) को नजरअंदाज किया। पूर्वी पाकिस्तान के बंगालियों को कमतर समझा गया।

ऑपरेशन सर्चलाइट और नरसंहार की शुरुआत

1970 के चुनाव में शेख मुजिबुर रहमान के नेतृत्व वाली अवामी लीग को बहुमत हासिल होने के बाद भी हालात नहीं सुधरे। रहमान ने पूर्वी पाकिस्तान को अधिक स्वायत्तता देने का वादा किया था, लेकिन पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति आगा मोहम्मद याह्या खान, जुलफिकर अली भुट्टो के साथ उनकी बातचीत विफल हो गई और 25 मार्च 1971 की रात पाकिस्तानी सरकार ने उन्हें गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया।

इसके बाद ही जमात-ए-इस्लामी की विचारधारा से प्रेरित इस्लामी समूहों के साथ मिलकर पाकिस्तानी फौज ने ‘ऑपरेशन सर्चलाइट’ नाम से पूर्वी पाकिस्तान में बड़े पैमाने पर सैन्य कार्रवाई शुरू की। इस दौरान आम नागरिकों का नरसंहार किया गया।

प्रस्ताव में माना गया कि इस नरसंहार का एक बेहद दर्दनाक पहलू महिलाओं के साथ हुई हिंसा है। अनुमान है कि 2 लाख से अधिक महिलाओं के साथ बलात्कार हुआ। सामाजिक कलंक के कारण असली संख्या शायद कभी सामने नहीं आ पाएगी और कई पीड़ितों की पहचान इतिहास में दर्ज नहीं हो सकी।

हिंदुओं को बनाया गया निशाना

प्रस्ताव में कहा गया कि नरसंहार में विशेष तौर पर हिंदुओं को निशाना बनाया गया। 28 मार्च 1971 को ढाका में अमेरिकी कौंसुल जनरल आर्चर ब्लड ने वॉशिंगटन को भेजे संदेश में इसे ‘चयनात्मक नरसंहार’ बताया और कहा कि पाकिस्तानी फौज के समर्थन से गैर-बंगाली मुस्लिम समूह गरीब इलाकों में बंगालियों और हिंदुओं पर हमले कर रहे हैं। 6 अप्रैल 1971 को भेजे गए ‘ब्लड टेलीग्राम’ में अमेरिकी अधिकारियों ने अपनी सरकार की चुप्पी पर आपत्ति जताई और इस स्थिति को नरसंहार बताया। 8 अप्रैल के एक अन्य संदेश में ब्लड ने साफ कहा कि हिंदुओं को विशेष रूप से निशाना बनाया जा रहा है।

अमेरिकी सीनेटर एडवर्ड एम. केनेडी की अध्यक्षता वाली समिति ने 1 नवंबर 1971 को अपनी रिपोर्ट में कहा कि 25 मार्च 1971 से पाकिस्तानी फौज ने सुनियोजित आतंकी अभियान चलाया, जिसमें सबसे ज्यादा नुकसान हिंदू समुदाय को हुआ। उनकी जमीनें छीनी गईं, उन्हें चिन्हित कर मार डाला गया और यह सब इस्लामाबाद से लागू मार्शल लॉ के तहत किया गया। 1972 में इंटरनेशनल कमीशन ऑफ जूरिस्ट्स की एक रिपोर्ट में भी कहा गया कि हिंदुओं को सिर्फ उनके धर्म के कारण मारा गया और उनके गाँव तबाह कर दिए गए।

प्रस्ताव में संयुक्त राष्ट्र (UN) का रुख भी साफ किया कि UN ने नरसंहार रोकथाम और सजा संबंधी कन्वेंशन के अनुसार, किसी राष्ट्रीय, जातीय, नस्लीय या धार्मिक समूह को पूरी तरह या आंशिक रूप से खत्म करने की मंशा से किए गए कृत्य नरसंहार माने जाते हैं।

प्रस्ताव में क्या है माँगें?

प्रस्ताव में कहा गया है कि संसद का निचला सदन 25 मार्च 1971 को पाकिस्तानी सुरक्षाबलों द्वारा बांग्लादेश के लोगों पर किए गए अत्याचारों की कड़ी निंदा करता है। इसमें माना गया है कि पाकिस्तानी फौज और उसके इस्लामी सहयोगियों ने बिना भेदभाव के बंगाली लोगों की बड़े पैमाने पर हत्या की, चाहे उनका धर्म या लिंग कुछ भी हो।

उन्होंने राजनीतिक नेताओं, बुद्धिजीवियों, पेशेवरों और छात्रों को मार डाला और हजारों महिलाओं को जबरन यौन दासी बनाया। खासतौर पर हिंदू अल्पसंख्यकों को निशाना बनाते हुए उनके खिलाफ नरसंहार, सामूहिक बलात्कार, जबरन धर्म परिवर्तन और उन्हें उनके घरों से निकालने जैसे अत्याचार किए गए।

प्रस्ताव में यह भी स्वीकार किया गया कि किसी भी पूरे समुदाय या धार्मिक समूह को कुछ लोगों के अपराधों के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। प्रस्ताव में अपील की गई कि वे 1971 में पाकिस्तानी फौज और उसके सहयोगी जमात-ए-इस्लामी द्वारा बंगाली हिंदुओं के खिलाफ किए गए इन अत्याचारों को मानवता के खिलाफ अपराध, युद्ध अपराध और नरसंहार के रूप में मान्यता दें।

प्रस्ताव पास होने का माफी माँगेगा पाकिस्तान?

अगर यह प्रस्ताव पास हो जाता है तो सबसे पहले पाकिस्तान पर कूटनीतिक दबाव बढ़ेगा। अमेरिकी संसद का यह कदम भले की प्रतीकात्मक हो, लेकिन इससे दुनिया भर में 1971 की घटनाओं को नरसंहार के रूप में देखने की सोच मजबूत होगी। इसके बाद पाकिस्तान को अमेरिकी अधिकारियों से मानवाधिकार से जुड़े सवालों का सामना करना पड़ेगा।

इससे दोनों देशों के बीच बातचीत में यह मुद्दा बार-बार उठेगा और रिश्तों में तनाव आएगा। साथ ही बांग्लादेश और हिंदू समुदाय की आवाज भी मजबूत होगी, जिससे वैश्विक मीडिया में पाकिस्तान की छवि खराब हो सकती है।

इसके अलावा अमेरिका की विदेश नीति में पाकिस्तान को लेकर ज्यादा सावधानी बरती जाएगी। इससे आर्थिक मदद और सैन्य सहयोग जैसे मुद्दों पर बहस तेज हो सकती है। आगे चलकर यह प्रस्ताव दूसरे देशों को भी प्रेरित कर सकता है, जैसे यूरोपीय संघ और कनाडा, जहाँ ऐसे ही प्रस्ताव लाए जा सकते हैं। इससे पाकिस्तान पर माफी माँगने या जवाब देने का दबाव बढ़ेगा। कुल मिलाकर पाकिस्तान की अंतरराष्ट्रीय छवि को नुकसान होगा और भविष्य में होने वाले समझौतों में यह पुराना मुद्दा परेशानी खड़ी कर सकता है।

NIA ने म्यांमार में आतंकियों को ड्रोन ट्रेनिंग देने आए विदेशियों को पकड़ा, पढ़ें- जब कुकी आतंकियों ने मणिपुर के गाँवों पर ड्रोन से गिराए थे बम

NIA ने आतंकवाद के खिलाफ बड़ी कार्रवाई करते हुए इस महीने की शुरुआत में 7 विदेशी नागरिकों को गिरफ्तार किया। इनमें छह यूक्रेन के नागरिक और एक अमेरिकी भाड़े का लड़ाका मैथ्यू एरन वैनडाइक शामिल है। यूक्रेनी नागरिकों को दिल्ली और लखनऊ से पकड़ा गया जबकि अमेरिकी नागरिक वैनडाइक को कोलकाता से गिरफ्तार किया गया।

पटियाला हाउस कोर्ट की विशेष NIA अदालत ने सभी आरोपितों को पूछताछ के लिए NIA की हिरासत में भेज दिया है। यह मामला इसलिए भी खास माना जा रहा है क्योंकि पहली बार किसी आतंकी साजिश की जाँच में यूरोप और अमेरिका के नागरिकों को इस तरह गिरफ्तार किया गया है।

NIA के मुताबिक, ये सभी विदेशी नागरिक टूरिस्ट वीजा पर भारत आए थे। इसके बाद ये लोग बिना जरूरी अनुमति (Restricted Area Permit) के अवैध तरीके से मिजोरम पहुँच गए। वहाँ से ये म्यांमार गए और वहाँ के जातीय सशस्त्र समूहों से संपर्क किया। जाँच एजेंसी ने यह भी बताया कि ये विदेशी नागरिक अपने साथ बड़ी मात्रा में ड्रोन लेकर आए थे और यूरोप से हथियार और हार्डवेयर भारत के रास्ते सप्लाई कर रहे थे।

खास बात यह है कि अमेरिकी नागरिक मैथ्यू एरन वैनडाइक ने साल 2014 में ‘Sons of Liberty International’ (SOLI) नाम की एक नॉन-प्रॉफिट सिक्योरिटी कंपनी शुरू की थी। वैनडाइक खुद 2011 में लीबिया में मुअम्मर गद्दाफी की सरकार के खिलाफ लड़ रहे विद्रोहियों के साथ भी लड़ चुका है। उसकी कंपनी अलग-अलग सशस्त्र समूहों को सैन्य ट्रेनिंग देने का काम करती है।

केंद्रीय एजेंसी ने अदालत को बताया कि ये विदेशी नागरिक म्यांमार के जातीय सशस्त्र समूहों को ड्रोन वॉरफेयर की ट्रेनिंग देने की साजिश रच रहे थे। इसमें ड्रोन ऑपरेशन, असेंबली, जैमिंग तकनीक और इससे जुड़ी अन्य चीजें सिखाने की योजना शामिल थी।

2024 में कुकी आतंकियों द्वारा ड्रोन से हमले

पहली नजर में इन घटनाओं को देखकर ऐसा लग सकता है कि ये विदेशी नागरिक सिर्फ पड़ोसी देश म्यांमार में चल रही उग्रवादी गतिविधियों की मदद कर रहे थे और उनका भारत से कोई लेना-देना नहीं है। लेकिन इस फैसले पर पहुँचने से पहले सितंबर 2024 में कुकी-मैतेई संघर्ष के बीच मणिपुर में हुए ड्रोन हमलों को याद करना भी जरूरी है।

1 सितंबर 2024 को कुकी आतंकी समूहों ने ड्रोन का इस्तेमाल करके मैतेई गांवों पर हमला किया। ये हमले बेहद खतरनाक थे क्योंकि पहली बार देश के अंदर किसी आतंकी या उग्रवादी समूह ने ड्रोन के जरिए हमले किए थे।

इस घटना से सुरक्षा एजेंसियाँ सतर्क हो गई थीं। कुकी आतंकियों ने ड्रोन के जरिए 40 से ज्यादा बम गिराए थे। इम्फाल वेस्ट के काउट्रुक और कदंगबंद जैसे मैतेई गाँवों को निशाना बनाया गया। इन ड्रोन हमलों में कई आम नागरिकों की मौत हो गई और कई लोग गंभीर रूप से घायल हो गए।

ड्रोन के जरिए बम गिराने की इस घटना ने इलाके में चल रहे जातीय संघर्ष को और ज्यादा खतरनाक बना दिया। यह संघर्ष मई 2023 में शुरू हुआ था और करीब एक साल बाद इस तरह का बड़ा घटनाक्रम देखने को मिला। मणिपुर पुलिस ने इन ड्रोन हमलों को ‘अभूतपूर्व’ बताया यानी ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था। पुलिस के मुताबिक, कुकी आतंकियों ने हाई-टेक ड्रोन का इस्तेमाल करके रॉकेट-प्रोपेल्ड ग्रेनेड (RPG) भी दागे और मैतेई गाँवों को निशाना बनाया।

खुफिया एजेंसियों ने यह भी पुष्टि की कि काउट्रुक गाँव पर हमले में कुकी आतंकियों ने लंबी दूरी की स्नाइपर राइफल्स का भी इस्तेमाल किया। खासतौर पर RPG जैसे एडवांस हथियारों का इस्तेमाल सुरक्षा एजेंसियों के लिए चिंता की बात बन गया। ड्रोन से बम गिराने के लिए थोड़े बहुत बदलाव करके काम चल सकता है लेकिन RPG दागने के लिए पूरी तरह मिलिट्री-ग्रेड ड्रोन और खास तकनीकी जानकारी की जरूरत होती है जो स्थानीय स्तर पर आसानी से संभव नहीं है।

मणिपुर 2024 ड्रोन हमलों में विदेशी साजिश के संकेत

सुरक्षा एजेंसियों को 2024 में मणिपुर में हुए ड्रोन हमलों में विदेशी हाथ होने के संकेत मिले। एजेंसियों के मुताबिक, इन हमलों को अंजाम देने में ऐसे लोगों की भूमिका दिखी जो ड्रोन के जरिए विस्फोट करने में ट्रेनड और एक्सपर्ट थे। साथ ही, किसी विदेशी एजेंसी की मदद या समर्थन की संभावना से भी इनकार नहीं किया गया। हमलों के बाद जारी बयान में मणिपुर पुलिस ने कहा कि इस तरह से ड्रोन के जरिए बम गिराने की घटना पहले कभी इस क्षेत्र के लंबे समय से चल रहे जातीय संघर्ष में नहीं देखी गई थी।

पुलिस ने अपने बयान में कहा, “इम्फाल वेस्ट के काउट्रुक में हुए हमले में कुकी आतंकियों ने हाई-टेक ड्रोन के जरिए कई RPG दागे। आम युद्ध में ड्रोन से बम गिराने की घटनाएँ देखी जाती रही हैं लेकिन सुरक्षा बलों और आम नागरिकों पर इस तरह ड्रोन का इस्तेमाल इस संघर्ष को एक नए और खतरनाक स्तर पर ले जाता है।

हमले के बाद भविष्य में ऐसे खतरों से निपटने के लिए असम राइफल्स ने मणिपुर में एंटी-ड्रोन सिस्टम तैनात किए। जाँच के दौरान NIA ने उस सप्लाई चेन का भी पता लगा लिया जिसके जरिए ये ड्रोन मणिपुर तक पहुँचे थे। एजेंसी ने मोटबुंग के गामंगाई गाँव के रहने वाले खैगौलेन किपजेन उर्फ डेविड को इस मामले में अहम कड़ी के तौर पर पहचाना जिसने ड्रोन और उससे जुड़े सामान को इकट्ठा करके मणिपुर तक पहुँचाया था।

जाँच में यह भी सामने आया कि उसे ये ड्रोन और उपकरण नई दिल्ली के रमेश नगर के रहने वाले मयंक शर्मा और हरियाणा के रोहतक के विक्रम चौधरी ने सप्लाई किए थे। किपजेन ने इन दोनों को ड्रोन देने के बदले बड़ी रकम भी चुकाई थी। इसके अलावा लाइकांगबाम अल्बर्ट सिंह का नाम भी सामने आया जिसने इनसे ड्रोन और बैटरियाँ खरीदी थीं।

भारत-म्यांमार बॉर्डर: हथियार और ड्रग्स तस्करी का आसान रूट

सितंबर 2024 में कुकी आतंकियों ने जिन ड्रोन का इस्तेमाल किया उन्हें ग्रेनेड ले जाने और दागने के लिए मॉडिफाई किया गया था। रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह तरीका 2021 में म्यांमार में हुए तख्तापलट के दौरान वहाँ के उग्रवादी समूहों जैसा ही था। भारत-म्यांमार की असुरक्षित सीमा लंबे समय से हथियार, ड्रग्स की तस्करी का रास्ता है। NIA के अनुसार, म्यांमार के जातीय उग्रवादी समूह पूर्वोत्तर भारत के स्थानीय संगठनों को समर्थन देते रहे हैं।

यह बॉर्डर ड्रग्स तस्करी का भी बड़ा रास्ता है। अफीम, हेरोइन और बड़े पैमाने पर बनने वाली मेथ जैसी ड्रग्स इसी रास्ते से भारत पहुँचती हैं। UNODC के मुताबिक, म्यांमार के शान और चिन राज्य दुनिया में अवैध ड्रग्स के सबसे बड़े केंद्र बन चुके हैं। 2023 में म्यांमार ने अफगानिस्तान को पीछे छोड़ते हुए सबसे बड़ा अवैध अफीम उत्पादक देश बन गया। 2025 तक अफीम की खेती में 17% की बढ़ोतरी हुई, खासकर भारत से सटे इलाकों में।

भारत में इसका असर साफ दिखा और एम्फेटामिन ड्रग्स की बरामदगी 2023 के 34 क्विंटल से बढ़कर 2024 में 80 क्विंटल हो गई। नवंबर 2024 में कोस्ट गार्ड ने 5,500 किलो मेथ के साथ म्यांमार की नाव पकड़ी जो अब तक की सबसे बड़ी जब्ती थी। NCB के मुताबिक, ड्रग्स का पैसा अब आतंकवाद और उग्रवाद को फंड कर रहा है। गृह मंत्री अमित शाह ने भी इस खतरे को लेकर चेताया है।

NIA ने कोर्ट को बताया कि इसी बॉर्डर के जरिए भारतीय उग्रवादी समूह यूरोप से ड्रोन तकनीक हासिल कर रहे हैं। एजेंसी इन विदेशियों की फंडिंग का सोर्स पता करने के लिए उनकी हिरासत चाहती है।

कड़ियाँ जोड़ने पर क्या सामने आता है?

इन सभी तथ्यों को जोड़कर देखें तो मामला काफी गंभीर नजर आता है। लड़ाई का अनुभव रखने वाले विदेशी नागरिक अगर म्यांमार के उग्रवादी समूहों को ट्रेनिंग दे रहे हैं और भारत की जमीन का इस्तेमाल कर रहे हैं तो यह क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा है। भारत के पूर्वोत्तर में सक्रिय कई उग्रवादी समूह पहले से ही म्यांमार की तरफ से हथियार और फंडिंग ले रहे हैं जिसमें ड्रग्स का पैसा और संदिग्ध विदेशी संगठनों की भूमिका बताई जाती है।

ऐसे में भारत में इन विदेशी नागरिकों की मौजूदगी को सिर्फ एक साधारण घटना नहीं माना जा सकता कि वे यहाँ से होकर म्यांमार जा रहे थे। यह मामला कहीं ज्यादा बड़ा और गंभीर दिखता है। यह पूरी घटना इस ओर इशारा करती है कि भारत के अंदरूनी हालात और कमजोरियों का फायदा उठाकर कुछ विदेशी ताकतें देश को अस्थिर करने की कोशिश कर रही हैं जिसमें एक बड़ी साजिश की आशंका नजर आती है।

(यह खबर मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी गई है जिसे इस लिंक पर क्लिक कर पढ़ा जा सकता है)

साधना से मर्यादा तक: चैत्र नवरात्र और रामनवमी की शक्ति संस्कृति

जिस सभ्यता की कालगणना का प्रथम उच्चार ही शक्ति साधना से होता है, वह सभ्यता स्वभाव से कभी भीरु नहीं हो सकती। किंतु इतिहास की विडंबना देखिए कि निरंतर आक्रमणों और वैचारिक उपनिवेशवाद ने उसी समाज के मन में ऐसी मानसिक जड़ता भर दी कि शक्ति उपासना का जीवंत दर्शन कर्मकांड में सिमटता चला गया। शस्त्र पूजन प्रतीक बनकर रह गया। शौर्य के संस्कार क्षीण पड़ते गए।

शक्ति केवल देवी का स्वरूप नहीं है। वह जीवन के प्रत्येक आयाम में सक्रिय चेतना है। इसी दृष्टि से भारत में स्त्री को ‘शक्ति’, मातृभूमि को ‘भारत माता’ और प्रकृति को पूज्य माना गया। यह वह सांस्कृतिक दृष्टि है, जिसमें आध्यात्म, समाज और प्रकृति परस्पर एक सूत्र में बँधे हैं।

नवरात्र का अर्थ है- अंधकार पर चेतना का विजय अभियान। इन नौ दिनों में जिस आदिशक्ति की आराधना होती है, वह ऐसी ऊर्जा है जो सृजन भी हैं और संहार भी। करुणा भी हैं और पराक्रम भी। भारतीय परंपरा ने इसी शक्ति को ‘देवी’ रूप में प्रतिष्ठित किया है।

देवी दुर्गा मातृत्व का ही नहीं, अन्याय के विनाश का भी प्रतीक हैं। उनके हाथों में शस्त्र इसलिए हैं, क्योंकि भारतीय दर्शन अन्याय के समक्ष निष्क्रिय सहिष्णुता को धर्म नहीं मानता। शक्ति उपासना का संदेश स्पष्ट है- धर्मरक्षा के लिए सामर्थ्य अनिवार्य है।

भीरुता वाली इसी मानसिक जड़ता को तोड़ने का पर्व है- नवरात्र। यह आत्मरक्षा, आत्मसम्मान और धर्मनिष्ठ साहस का जागरण है। यह स्मरण कराता है कि सज्जनता का अर्थ समर्पण नहीं होता। सहिष्णुता का अर्थ आत्मविस्मृति नहीं है।

नवरात्र की पूर्णता रामनवमी पर होती है। भगवान श्रीराम भारतीय मानस के केवल धार्मिक प्रतीक नहीं, बल्कि आचरण की मर्यादा, शासन की नैतिकता और सामाजिक संतुलन के आदर्श हैं। यदि नवरात्र शक्ति का प्रतीक है तो रामनवमी मर्यादा का संदेश।

शक्ति बिना मर्यादा, विनाशकारी होती है और मर्यादा बिना शक्ति दुर्बलता का प्रतीक। भारतीय दर्शन इन दोनों के संतुलन की शिक्षा देता है।

यही संतुलन भारत की सांस्कृतिक आत्मा का मूल है। इसमें साहस भी है और संवेदनशीलता भी। पराक्रम भी है और करुणा भी।

चैत्र नवरात्र और रामनवमी भारतीय आत्मा के दो आयाम हैं- शक्ति और मर्यादा। एक साहस देती है, दूसरी दिशा। एक अन्याय के विरुद्ध खड़ा करती है, दूसरी संयम सिखाती है। बताती हैं कि हिंदुत्व किसी संकीर्ण धार्मिक पहचान का नाम नहीं, बल्कि भारत की जीवन पद्धति का वह सांस्कृतिक स्वरूप है, जिसमें अनेक देवपरंपराएँ, भाषाएँ और लोकाचार समाहित हैं। यही सांस्कृतिक चेतना भारत को केवल भौगोलिक इकाई नहीं, बल्कि जीवंत सभ्यता बनाती है।

यह संतोष की बात है कि आधुनिक भारत में अपनी जड़ों की ओर लौटने की प्रवृत्ति तेज हुई है। मंदिरों में बढ़ती श्रद्धा, तीर्थयात्राओं का विस्तार और पारिवारिक परंपराओं का पुनर्जीवन संकेत देते हैं कि भारत अपनी सांस्कृतिक अस्मिता के प्रति पुनः सजग हो रहा है। अब परंपरा पिछड़ेपन का प्रतीक नहीं, बल्कि आत्मविश्वास का आधार मानी जा रही है।

स्मरण रहे कि शक्ति साधना से विमुख समाज अपनी पहचान खो देता है। मर्यादा त्यागने वाला समाज अराजकता में डूब जाता है। भारत का मार्ग इन दोनों के संतुलन में है।

सनातन की एकजुटता पर उठाओ सवाल ताकि ‘उम्माह’ का रहे बोलबाला: जानें- क्यों तरुण हत्याकांड में वामपंथी हिंदुओं में ही भर रहे ‘ग्लानि’, क्या है स्ट्रैटेजी

दिल्ली के उत्तम नगर में होली के दौरान एक हिंदू दलित परिवार की खुशियाँ मातम में बदल गईं। एक बच्ची के पानी के गुब्बारे की छींटें मुस्लिम महिला पर पड़ने के बाद शुरू हुआ विवाद इतना बढ़ा कि तरुण को भीड़ ने पीट-पीटकर मार डाला। परिवार माफी माँगता रहा लेकिन इसकी कीमत उसकी जान देकर चुकानी पड़ी। घटना के दौरान भीड़ में शामिल लोग ‘खूनी होली’ की बात करते दिखे।

घटना के बाद वामपंथियों का प्रोपेगेंडा पैटर्न देखने को मिला। इसमें पहले इसे सामान्य झगड़ा बताने की कोशिश हुई। कहा गया कि दोनों पक्षों में मारपीट हुई और एक व्यक्ति की गलती से मौत हो गई। जब यह नैरेटिव नहीं चला तो सोशल मीडिया पर तरुण पर ही आरोप लगाए जाने लगे कि वही उकसा रहा था और वही मारने गया था। लेकिन स्थानीय लोगों और तथ्यों ने इन दावों को खारिज कर दिया।

इसके बाद फोकस पूरी तरह बदल दिया गया। तरुण के लिए न्याय की माँग कर रहे हिंदुओं के गुस्से को ही सवालों के घेरे में लाया गया। हिंदू संगठनों के प्रदर्शन को साजिश और हिंसा से जोड़ने की कोशिश की गई जबकि हत्या के मुद्दे को पीछे धकेला गया। यह पूरा मामला अब केवल एक हत्या तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह उस नैरेटिव की लड़ाई का उदाहरण बन गया है जिसमें घटना से ज्यादा उसकी कहानी को प्रभावित करने की कोशिश होती है।

हिंदुओं को ‘अपराधी बनाने’ की सिस्टेमेटिक कोशिश

इस हिंसा में लेफ्ट-लिबरल गिरोह ने तरुण के लिए न्याय की माँग करना तो छोड़िए, हिंदुओं को ही अपराधी बताने की सिस्टेमेटिक कोशिशें शुरू कर दी। सबसे पहले ‘अस्वीकार’- इस गिरोह और इससे जुड़े पत्रकारों ने सबसे पहले इस घटना को सही रूप में दिखाने के बजाय इसे मामूली झगड़े को तौर पर पेश करनी कोशिश की। ऐसा दिखाया गया है कि दोनों पक्षों ने एक-दूसरे को मारा और उनमें एक आदमी ‘गलती’ से मर गया। यह दिखानी कोशिश की गई कि स्थानीय झगड़े को सांप्रदायिक रंग दिया जा रहा है।

सोशल मीडिया पर भी आपको कई ऐसे वीडियो दिखेंगे, जिसमें यह बताने की कोशिश की गई कि यह स्थानीय लोगों का झगड़ा था। हालाँकि, तथ्य सामने थे तो यहाँ इस गिरोह की दाल नहीं गली।

इसके बाद यह कोशिश शुरू की गई कि तरुण पर ही इल्जाम लगा दिया जाए। सोशल मीडिया पर दावे वायरल होने लगे कि तरुण ही छेड़छाड़ कर रहा था और वही इन कट्टरपंथियों को मारने गया था लेकिन ये दावे भी नहीं टिके और पड़ोसियों और अन्य लोगों ने इस गिरोह का यह प्रोपेगेंडा भी फेल कर दिया।

इसके बाद एक और कोशिश शुरू की गई, इस बार निशाने पर तरुण की जगह पूरा हिंदू समाज था। इस हत्या के बाद हिंदू समुदाय ने तरुण कुमार की हत्या के लिए न्याय की माँग की। विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल जैसे हिंदूवादी संगठनों ने खुलेआम प्रदर्शन का ऐलान किया जिसके बाद भारी संख्या में न्याय की माँग के लिए लोग सड़कों पर उतर गए। लोग सड़कों पर उतरे तो उनमें से कई आक्रोशित भी थे और इसी आक्रोश की आड़ में हत्या को ढकने की साजिश शुरू कर दी गई। बताया जाना लगा कि तरुण की हत्या तो मामूली बात है असल दिक्कत हिंदुओं से ही है।

कॉन्ग्रेस के नेता भी इसी प्रोपेगेंडा को हवा देने लगे, पवन खेड़ा जैसे वरिष्ठ नेता तक यह दावा करने लगे कि तरुण की हत्या तो महज दो लोगों का झगड़ा थी, लेकिन RSS-BJP ने इस मामले को उग्र कर दिया। यानी हिंदू अगर न्याय माँगते हुए आक्रोशित भी हो जाएँ तो यह हिंदुओं के लिए गुनाह है। हत्या भी उन्हीं की होगी, आरोप भी उनपर लगेगा और अंत में अगर संभलकर नहीं बोले तो अपराधी भी वही ठहरा दिए जाएँगे।

यह पैटर्न कोई अभी का नहीं है। इसी दिल्ली में 2020 के दंगों को देखिए, शरजील इमाम जैसे लोगों के भड़काऊ भाषण दिए पैटर्न के तहत रोड ब्लॉक की गईं, जिसे जाँच में साजिश करार दिया गया। लेकिन यह गिरोह अंकित शर्मा की हत्या को छिपाकर इस मामले में सिर्फ इस पीड़ित को दिखाता है और वो है शरजील इमाम। उदयपुर में कन्हैयालाल की निर्मम हत्या को आइसोलेटेड घटना बताकर हिंदू एकजुटता पर ही सवाल उठा दिए गए। केरल, उत्तर प्रदेश और राजस्थान में लव जिहाद के सैकड़ों मामले सामने आने के बावजूद इन्हें मिथ करार दिया जाता रहा है।

विरोध प्रदर्शनों का पैटर्न: हिंदुओं की उदारता ही उनका अपराध है?

हिंदू समाज को हमेशा से सहिष्णु और उदार माना जाता है। यह समाज अलग-अलग मतों को स्वीकार करता है और इसी से जुड़कर भी रहता है। लेकिन कई बार ऐसा लगता है कि ज्यादा सहन करना कमजोरी समझ लिया जाता है। हिंदुओं की ‘उदारता’ ही उनका ‘अपराध’ बन जाती है। इसे प्रदर्शनों के पैटर्न के जरिए भी समझा जा सकता है। हिंदू संगठनों के प्रदर्शन का पैटर्न भी आम तौर पर यही रहता है कि लोग प्रदर्शन के लिए लोगों को बुलाने का आह्वान करते हैं, अपनी माँगों के लिए सड़कों पर उतरते हैं, पुलिस-प्रशासन तक अपनी बात पहुँचाते हैं और फिर न्याय का इंतजार करते हैं। यही दिल्ली में भी हुआ। इसे के लिए हिंदुओं को अपराधी बनाया जा रहा है।

अब दूसरी तरफ कट्टरपंथियों के इस प्रदर्शन के पैटर्न को देखिए। कई बार तो किसी को भनक तक नहीं लगती कि यहाँ कोई प्रदर्शन होने वाला है। ना कोई सार्वजनिक पोस्टर, ना सोशल मीडिया पर चर्चा। बस गुप्त बैठकें होती हैं, बंद कमरों में प्लानिंग होती है, वॉट्सऐपर पर कोडेड मेसेज चलते हैं और अचानक दंगा भड़क जाता है, हिंसा शुरू हो जाती है और सड़कों पर पत्थरबाजी देखने को मिलती है।

2020 दिल्ली दंगे इसका सबसे खतरनाक उदाहरण हैं। दिखावे के लिए महीनों तक ‘शांतिपूर्ण’ प्रदर्शन चल रहे थे लेकिन असली खेल पर्दे के पीछे खेला जा रहा था। दिल्ली में देखते ही देखते प्रदर्शन हिंसक हो गया और दर्जनों हिंदू मारे गए। इसके अलावा आगजनी और मंदिरों पर हमले की घटनाएँ भी हुई। मुस्लिमों की घरों से पत्थरबाजी की गई तो जाहिर है कि ये पत्थर एक दिन में नहीं इकट्ठा हुए होंगे। यह साजिश लंबे समय से रची जा रही थी। ताहिर हुसैन की छत पर बाहुबली गुलेल और पेट्रोल बम जैसी चीजें मिलीं जो हिंसक प्रदर्शनों के सुनियोजित होने पर सवाल उठा रही थीं।

उत्तर प्रदेश के बरेली में सितंबर 2025 को जुमे की नमाज के बाद ‘आई लव मोहम्मद‘ को लेकर हुई हिंसा भी इसी तरह का उदाहरण है। लोगों को जो आम विरोध प्रदर्शन लग रहा था, वो अचानक हिंसक हो गया और पुलिस पर पत्थरबाजी की गई। जाँच में पता चला कि यह आम या विरोध भी पूरी प्लानिंग के तहत अंजाम दिया जा रहा था।

बरेली में कुछ लोग इस्लामिया मैदान में जाने की जिद कर रहे थे और पुलिस ने उन्हें रोकने की कोशिश की थी तो कट्टरपंथियों ने पुलिस पर पथराव कर दिया। इस दंगे के लिए करीब 5000 उपद्रवियों की फौज तैयार की गई थी। ये उपद्रवी शहर की 390 मस्जिदों में ठहराए गए थे और उनके पास पहले से ईंट, पत्थर और पेट्रोल बम जैसे हथियार मौजूद थे। अगर ये कट्टरपंथी अपनी इस साजिश में सफल हो जाते तो शायद सैकड़ों लोगों की जान जाती लेकिन पुलिस ने इन्हें काबू कर लिया।

राम नवमी, हनुमान जयंती और अन्य धार्मिक जुलूसों के कार्यक्रमों पर हमलों की खबरें हम सब सुनते हैं। अचानक मस्जिदों और घरों की छतों से पत्थरबाजी होने लगती है, ऐसी दर्जनों घटनाएँ हैं। बीते दिनों शिवाजी महाराज की जयंती के मौके जुलूस पर हमला हुआ और मस्जिद से पत्थरबाजी की गई।

अब पत्थरबाजी के लिए ये पत्थर कैसे और क्यों इकट्ठा होते होंगे ये सवाल ही इन प्रदर्शनों की आड़ में होने वाली साजिश का सबसे बड़ा जवाब है। इन पैटर्न से आपको अंदाजा होगा कि दिल्ली के जिन हिंदुओं को अपराधी बताया जा रहा है वो असल में सिर्फ अपने बेटे-भाई को होने से ही पीड़ित नहीं है बल्कि वो उस प्रोपेगेंडाबाज गिरोह से भी पीड़िता है जो उनकी आवाज तक उठाने पर उन्हें अपराधी घोषित कर देता है।

तरुण पर चुप्पी, रिजवान के लिए दर्द?

इस घटना में वामपंथी प्रोपेगेंडाबाजों ने तरुण की हत्या से ध्यान हटाने के लिए ‘रिजवान कहाँ है‘ का नैरेटिव भी चलाया था। इस घिनौने नैरेटिव को हवा देने में तथाकथित सेकुलर और पत्रकारिता का चोला पहनने वाले लोग खुलकर सामने आ गए। आरजे सायमा से लेकर जहीर इकबाल की पत्नी सोनाक्षी सिन्हा और वारिस पठान समेत कई इस्लामी कट्टरपंथी इन्फ्लुएंसर्स ने यह प्रोपेगेंडा फैलाया था। लेकिन दिल्ली पुलिस ने उनके इस प्रोपेगेंडा की हवा निकाल दी।

इसका मकसद बिल्कुल साफ था कि तरुण की हत्या वाले मुद्दे से लोगों का ध्यान भटका दिया जाए। यह धारणा बना दी जाए कि इस घटना में सिर्फ हिंदू परिवार ही नहीं बल्कि मुस्लिम परिवार ने भी अपना बच्चा खो दिया है। पुलिस को बार-बार टैग करके इसे गंभीरता का रंग देने की रणनीति अपनाई गई ताकि आम आदमी सोचे कि शायद पुलिस कुछ छुपा रही है। लेकिन सच सामने आया तो इन सब प्रोपेगेंडाबाजों की पोल खुल गई।

हिंदुओं के लिए सच को पहचानने का समय

तरुण की हत्या के अपराध को छिपाने के लिए उस अपराध पर खड़ा किया गया दोहरा नैरेटिव भी कम अपराध नहीं है। न्याय माँगने वालों को ही साजिशकर्ता या हिंसक बता देना असल में पूरे देश में एक डर का माहौल खड़ा करने की साजिश है। यह केवल शब्दों का खेल नहीं है बल्कि यह इस गिरोह द्वारा हिंदू विरोध की धारणा बनाने की प्रक्रिया है।

यह गिरोह बस यही तय करता है कि कैसे अपने पर हुए अपराध के बाद भी हिंदुओं को आक्रामक और अपराधी की तरह दिखाया जाए जबकि दूसरे पक्ष को बेबस और पीड़ित की तरह पेश किया जाए। यह वक्त इस पूरे नैरेटिव को चुनौती देने का है। क्योंकि अगर आज भी हम यह नहीं समझ पाए कि हमारे सामने जो परोसा जा रहा है वो पूरी सच्चाई नहीं है तो आने वाले समय में हर घटना इसी तरह किसी एजेंडे की भेंट चढ़ाया जाता रहेगा। तब न कोई तरुण याद रहेगा, न उसकी हत्या केवल इस गिरोह के द्वारा बनाई एक कहानी बची रहेगी जिसे बार-बार दोहराकर सच साबित किया जाएगा।

नजरिया: ‘विक्टिम’ को ‘विलेन’ बनाने का खतरनाक इकोसिस्टम

उत्तम नगर के तरुण हत्याकांड ने एक बार फिर उस ‘नैरेटिव वॉर’ को सतह पर ला दिया है, जहाँ अपराधी के मजहब को ढाल बनाने के लिए पीड़ित के अस्तित्व को ही मिटाने की कोशिश की जाती है। यह महज एक स्थानीय झगड़ा या गुब्बारे से शुरू हुई हिंसा नहीं है, बल्कि एक सोची-समझी ‘मनोवैज्ञानिक युद्धनीति’ का हिस्सा है।

दिल्ली से लेकर बरेली तक, पैटर्न एक ही है। जहाँ एक पक्ष की ‘सुनियोजित हिंसा’ को ‘हताशा’ बताकर डिफेंड किया जाता है, वहीं दूसरे पक्ष की ‘प्रतिक्रिया’ को ‘आतंक’ करार दिया जाता है। सनातन समाज को यह समझना होगा कि यह लड़ाई केवल सड़कों पर नहीं, बल्कि मोबाइल की स्क्रीन और अखबारों की सुर्खियों में लड़ी जा रही है।

अगर आज तरुण के लिए न्याय की माँग को ‘गुंडागर्दी’ मानकर हिंदू पीछे हटा, तो कल हर घर का दरवाजा इसी कट्टरता की दस्तक सुनेगा। यह ‘ग्लानि’ से बाहर निकलकर ‘सत्य’ को पहचानने और संगठित होने का समय है, क्योंकि नैरेटिव की इस जंग में चुप रहना ही पराजय स्वीकार करना है।

X पर सक्रिय ट्रोल पर हुई कार्रवाई तो भड़क गई कॉन्ग्रेस, मोदी सरकार को बनाने लगे निशाना: पढ़ें कैसे इन हैंडल्स से फैलाया जा रहा था एंटी इंडिया प्रोपगेंडा

केंद्र सरकार ने IT एक्ट की धारा 69ए का इस्तेमाल करते हुए बुधवार (18 मार्च 2026) को कई ऐसे एक्स हैंडल्स पर कार्रवाई की है, जिनके माध्यम से सोशल मीडिया पर एंटी-इंडिया प्रोपगेंडा फैलाया जा रहा था। ये एक्स हैंडल अधिकतर विपक्षी पार्टियों और उसके इकोसिस्टम से जुड़े थे, जिन्हें भारत में अब ‘Withheld’ कर दिया गया है। इस कार्रवाई का मकसद ऐसे कटेंट का प्रसार रोकना है, जो समाज में अव्यवस्था और देश की सुरक्षा को खतरे में डाल सकते हैं।

इस घटना के तुरंत बाद भारतीय राष्ट्रीय कॉन्ग्रेस ने सरकार पर अभिव्यक्ति की आजादी छीनने का आरोप लगाते हुए अभियान शुरू कर दिया। दिल्ली में पार्टी की सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म विभाग की प्रमुख सुप्रिया श्रीनेत ने इस मुद्दे पर प्रेस कॉन्फ्रेंस की।

श्रीनेत ने इस कदम को बढ़ती सेंसरशिप की संस्कृति बताया और केंद्र पर आरोप लगाया कि वो असहमति को दबा रही है डिजिटल चर्चा पर अपना कब्जा मजबूत कर रही है और अपनी नीतियों की आलोचना करने वालों पर हमला कर रही है। उन्होंने कहा कि मोदी सरकार ने सभी ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स पर स्वतंत्र असहमति वाली आवाजों को चुप कराने का पैटर्न अपनाया है।

श्रीनेत ने कहा कि ऐसे कदम दरअसल नौकरशाहों को खुली जानकारी तक पहुँचने के फैसले पर पावर दे देते हैं। सुप्रिया ने कहा, “यह सिर्फ कहानी गढ़ने की बात नहीं है बल्कि अभिव्यक्ति की आजादी की आत्मा पर हमला है।” उन्होंने यह भी दावा किया कि सरकार मुख्यधारा के मीडिया में दखल के बाद अब सोशल मीडिया की दुनिया में भी अपना दखल बढ़ा रही है।

श्रीनेत ने आगे लिखा, “जिन लोगों पर असर पड़ा है उनमें से कई कॉन्ग्रेस के साथ नहीं हैं। कुछ तो हमारी फैसलों की आलोचना भी करते हैं लेकिन हम उनके समर्थन में आवाज उठाते हैं। हमने राहुल गाँधी से सीखा है कि किसी भी अन्याय का सामना करने वाले का साथ दें चाहे वो हमारे खिलाफ रहे हों और वो हमारे आधिकारिक सिस्टम का हिस्सा न हों बावजूद इसके कि भाजपा और उसके ट्रोल्स क्या कहते हैं।”

श्रीनेत यहीं नहीं रुकी, बल्कि कहा कि अकाउंट्स ब्लॉक करने से सवाल नहीं रुकेंगे। उन्होंने यह भी शिकायत की कि यह मुद्दा एक बड़ी समस्या का हिस्सा है और सरकार को बढ़ते संसदीय आर्थिक चुनौतियों और विदेश नीति की कमियों से ध्यान हटाने का आरोप लगाया।

श्रीनाते ने इसी तरह के तर्कों वाला एक वीडियो भी अपलोड किया और बैन किए गए अकाउंट्स के समर्थन में ट्वीट किया जिसमें उन्होंने फैसले को ‘अस्वीकार्य’ बताया और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ‘कायर’ कहा।

दिलचस्प बात यह है कि यह पुरानी बड़ी पार्टी असहमति कुचलने का लंबा इतिहास रखती है और अक्सर अभिव्यक्ति की आजादी का उल्लंघन करती रही है। फिर भी वह इन लोगों के पीछे खड़ी हो गई है न कि ऊँचे आदर्शों की सच्ची चिंता से बल्कि इसलिए कि वे विपक्ष की कहानी फैलाते हैं। बेशक यह उनके खिलाफ कार्रवाई का एकमात्र कारण नहीं हो सकता क्योंकि उनकी ऑनलाइन गतिविधियों में काफी कुछ शामिल है।

फेक न्यूज फैलाने में माहिर हैं ये अकाउंट

नेहर_हू 2 लाख 42 हजार 300 फॉलोअर्स वाला एक पॉपुलर अकाउंट है जो इस्लामो-लिबरल गुट का है जिसपर रोक लगी है। इसने बार-बार न सिर्फ झूठी खबरें फैलाईं बल्कि नस्लवाद दिखाया और भारतीय सेना पर आरोप लगाए। उसने न्यायपालिका की भी निंदा की क्योंकि उसने मशहूर जिम मालिक ‘मोहम्मद’ दीपक कुमार को सुरक्षा नहीं दी जो पहलगाम आतंकी हमले के शिकारों का मजाक उड़ा रहा था और कह रहा था ‘केवल भारत में हीरो को विलेन बना दिया जाता है।’

उसने ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर का भाषण शेयर किया जिसमें ब्रिटेन की विविधता का जश्न था और कहा कि ‘भारत में ठीक उलटा है’ देश की निंदा करने का कोई मौका नहीं छोड़ा भले ही झूठ बोलकर। यह अकाउंट ‘अल्पसंख्यक खतरे में’ वाली बनाई गई कहानियाँ फैलाने में सबसे आगे रहा जबकि हिंदुओं पर हमलों को साफ कर दिया या उनके नरसंहार का मजाक उड़ाया।

साल 2024 में उसने ओपइंडिया के हिंदूफोबिया ट्रैकर का हवाला देकर कहा कि कश्मीर में हिंदू उत्तर प्रदेश से ज्यादा सुरक्षित हैं ताकि अपनी आश्चर्यजनक अपमानजनक और असंवेदनशील सोच दिखा सके। वह कश्मीरी पंडितों के जिहादियों के कारण पलायन को जानता है लेकिन फिर भी उनके दर्द का मजाक उड़ाता है।

इसी महीने अमेरिका के भारत राजदूत सर्जियो गोर और इंडो-पैसिफिक कमांड के कमांडर सैमुअल जे पापारो भारत की वेस्टर्न आर्मी कमांड के चंडीगढ़ मुख्यालय गए। बातचीत पश्चिमी थिएटर की गंभीर सुरक्षा मुद्दों पर केंद्रित थी जो पाकिस्तान से सैन्य गतिरोध और दुश्मनी के कारण महत्वपूर्ण है।

लेकिन इस मीटिंग का इस्तेमाल प्रधानमंत्री मोदी को समझौता करने का आरोप लगाने के लिए किया गया जो कॉन्ग्रेस पार्टी अक्सर लगाती है और इससे रक्षा बलों की ईमानदारी पर सवाल उठाए गए।

नेहर_हू ने बिहार के लोगों पर उनके वोटिंग चॉइस के लिए नस्लवादी हमला किया और कहा ‘टॉयलेट में माइग्रेशन का मजा लो अगले 5 साल’ मेहनतकश मजदूर वर्ग का अपमान करने के लिए सिर्फ इसलिए क्योंकि उन्होंने उसकी पसंदीदा पार्टियों को वोट नहीं दिया।

“उत्तर प्रदेश और बिहार से लाखों प्रवासी त्योहार पर घर जाने के लिए भयानक तकलीफ झेलते हैं। कुछ तो मर भी जाते हैं” उसने 2024 में इसी तरह कहा और उन्हें केसरिया पार्टी को सपोर्ट करने के लिए कोसा और आरोप लगाया कि उसकी सरकार ने वंदे भारत अमीरों के लिए शुरू किया। उसने इसमें ‘जैसा बोया वैसा काटा’ जैसे तंज भी खुशी खुशी जोड़े। इस आदमी ने लगातार राज्य और उसके रहने वालों को स्वच्छता और दूसरी चीजों पर नीचा दिखाया है।

एक महिला ने बताया कि उसने उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी में समाजवादी पार्टी को वोट दिया था लेकिन उसे भाजपा का स्लिप मिल गया। हालाँकि उसने ये भी कहा कि मेरे साथ छोटा बच्चा था वोटिंग के समय जिस वजह से गलत बटन दब गया और मुझे ईवीएम से कोई समस्या नहीं है।” लेकिन उसकी झूठी बात का इस्तेमाल करके उसने भारत के चुनाव आयोग की निंदा की।

उसने और अल्ट न्यूज के मोहम्मद जुबैर ने पत्रकार निशा पाल को निशाना बनाने की कोशिश की क्योंकि उन्होंने पहलगाम आतंकी घटना ऑपरेशन सिंदूर और इजराइल-हमास युद्ध के बारे में कुछ मुस्लिम बच्चों से सवाल पूछे थे।

उसने एक वीडियो भी अपलोड किया जिसमें कथित पाकिस्तानी आदमी भारतीय क्रिकेट टीम की जीत का जश्न मना रहा था और कह रहा था कि इस्लामिक रिपब्लिक भारत से बेहतर देश है जबकि अपने देश के खिलाफ आतंकवाद समेत सभी बड़े अपराधों को नजरअंदाज कर रहा था।

मोदी सरकार के खिलाफ नाराजगी के रूप में छिपा एंटी इंडिया प्रोपगेंडा

डॉ निमो यादव 2.0 एक और प्रमुख अकाउंट जो भारत में बैन हो गया है उसने दो केंद्रीय मंत्रियों को राष्ट्र विरोधी गतिविधियों से जोड़ने तक की हद पार कर दी। उसने कहा, “क्या यह सच है कि एन सीतारमण का ऑफिस और राजीव चंद्रशेखर ट्विटर पर उस व्यक्ति को फॉलो कर रहे थे जो भारत में आतंकियों को ट्रेनिंग दे रहा था।” इसने इन नेताओं की जाँच NIA से कराने की डिमांड तक रख डाली।

इस बीच जिन पार्टियों को ये लोग सपोर्ट करते हैं वे वोट बैंक के लिए माफिया और गैंगस्टरों को बढ़ावा दे रही हैं और अपनी एजेंडा थोपने के लिए मानवीय सीमाओं को पार कर रही हैं। उसने भारतीय सेना के अधिकारियों के दिखने पर मजाक भी किया और कहा, “यह तब होता है जब मिड-डे मील में अंडे बैन कर दो।” इस तरह से वो वर्दीधारी सैनिकों का सम्मान करता है, जिन्होंने युद्धक्षेत्र में पाकिस्तान और चीन जैसे दुश्मनों से लड़ते हुए अद्भुत शौर्य का प्रदर्शन किया।

इन हैंडल्स पर निखिल गुप्ता की गिरफ्तारी पर मजा लिया जो खालिस्तानी आतंकी गुरपतवंत सिंह पन्नू के असफल हत्या षड्यंत्र में शामिल था और चाहा कि उसकी कहानी धुरंधर 2 में दिखाई जाए, जिसमें आर माधवन भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार का रोल करते हैं। यह भारतीय खुफिया एजेंसियों का मजाक उड़ाने का उसका दयनीय प्रयास था।

डॉ निमो यादव 2.0 ने एक और पोस्ट में दावा किया कि ‘भारत के लिए चीजें अच्छी नहीं लग रही’ क्योंकि ‘रूस ने पाकिस्तान को सस्ते दाम पर कच्चा तेल ऑफर किया’ जिसे उसने सरकार की बड़ी असफलता बताया। दूसरी तरफ भारत रूस से बहुत सस्ते दाम पर तेल खरीद रहा है खासकर 2022 में अमेरिका की धमकियों और टैरिफ के बावजूद।

वह जानता है कि रूस का पाकिस्तान को ऑफर भारत की इजराइल से निकटता की तरह दोनों देशों के रिश्तों में बाधा नहीं डालता फिर भी उसने अपनी प्रचार से मुँह नहीं मोड़ा।

अलग-अलग अकाउंट्स लेकिन काम एक जैसा

इसी तरह की पाबंदी मनीष आरजे के अकाउंट पर भी लगी है। उसने दावा किया था कि बिहारी वोटरों ने अपनी आत्मा 10 हजार में बेच दी क्योंकि उन्होंने भाजपा को सपोर्ट किया। यह लोकतांत्रिक प्रक्रिया इस गुट को तभी स्वीकार्य लगती है जब उनकी पसंदीदा पार्टियाँ जीतती हैं।

उसने भी बाकियों की तरह झूठी जानकारी फैलाने से खुद को नहीं रोका और इजराइल को ‘फादरलैंड’ कहा गलत तरीके से प्रधानमंत्री मोदी को इसका श्रेय देते हुए जबकि मोदी ने भारतीय यहूदियों के बारे में कहा था कि वे पश्चिम एशिया के उस देश को अपना पिता मानते हैं जबकि भारत को मातृभूमि।

आरजे ने कोलकाता मेडिकल कॉलेज और अस्पताल में हुई भयानक बलात्कार और हत्या की घटना में पीड़िता की माँ को भी अपनी छोटी राजनीति में घसीट लिया और आरोप लगाया कि न्याय की उनकी गुहार दरअसल भाजपा टिकट पर चुनाव लड़ने की इच्छा से थी। उसने शोक संतप्त महिला की बेइज्जती की, जबकि उसे सत्तारूढ़ तृणमूल कॉन्ग्रेस सरकार से जवाब माँगना चाहिए था।

उसने लगातार उन पोस्ट्स को रीट्वीट किया जो भू-राजनीतिक संकट से भारतीयों पर पड़ने वाले नुकसान का मजाक उड़ाती हैं।

‘एक्टिविस्ट और सोशल वर्कर’ संदीप सिंह लिस्ट में एक और नाम है जो कॉन्ग्रेस का खासकर हरियाणा यूनिट का खुलकर समर्थन कर रहा है कई पोस्ट्स के जरिए जो श्रीनेत के दावे का खंडन करता है कि ये अकाउंट उनकी पार्टी को सपोर्ट नहीं करते।

इसके अलावा वह भारत में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर प्रतिबंध चाहता है जैसा कि हालिया विवादित रिपोर्ट में अमेरिका के अंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता आयोग ने कहा है धार्मिक स्वतंत्रता के नाम पर और भेदभाव रोकने के लिए। रिपोर्ट ने रिसर्च एंड एनालिसिस विंग पर टारगेटेड सैंक्शंस की भी सिफारिश की।

डॉ रंजन जिनके अकाउंट का भी यही हाल हुआ। उसने एक कार्यक्रम का वीडियो पोस्ट किया और गलत दावा किया कि मोदी सरकार के प्रभाव में भारतीय मीडिया नागरिकों से संकट और आपदाएँ छिपा रही है। उसका साफ मकसद है लोगों में डर पैदा करना और सरकार के खिलाफ नफरत भड़काना, बिना देश पर पड़ने वाले असर को सोचे।

उसने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के बयान को भी तोड़ मरोड़ कर पोस्ट किया और जातीय विभाजन पैदा करने की कोशिश की।

कुछ लोगों ने घटना के बाद अपने ट्वीट्स लॉक कर लिए जिससे कई सवाल उठे।

ये वही लोग हैं, जो हिंदू एक्टिविस्ट विजय पटेल के अकाउंट सस्पेंड होने पर खुश थे और मालाबार गोल्ड चाहता था कि उन्हें जेल भेजा जाए क्योंकि उन्होंने उनके पाकिस्तानी इन्फ्लुएंसर्स को हायर करने की आलोचना की थी जो ऑपरेशन सिंदूर की निंदा कर रहे थे। वे ‘सेंसरशिप’ का मजा लेते हैं जब तक वो उनके विरोधियों पर अन्यायपूर्ण तरीके से लगे। पाखंड और दोहरे मापदंड वाकई हैरान करने वाले हैं।

गौरतलब है कि अप्रैल 2024 में लोकसभा चुनाव से ठीक पहले अमित शाह ने कॉन्ग्रेस को उसके एडिटेड वीडियो का इस्तेमाल करने के लिए फटकार लगाई जिसमें आरोप था कि भाजपा की सत्ता आने पर आरक्षण खत्म हो जाएगा। यह वीडियो कॉन्ग्रेस के नेतृत्व वाले इंडिया गठबंधन और उनके पूरे नेटवर्क द्वारा असली बताकर फैलाया गया था। इस तरह नुकसान पहुँचाने के इरादे से गलत सूचना फैलाने को हल्के में नहीं लिया जा सकता। ठीक वैसे ही देश की सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी जो ऐसी तकनीकें इस्तेमाल करती रही है उसके इन अकाउंट्स के खिलाफ कार्रवाई के बाद नाराज होना आश्चर्य की बात नहीं है।

मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।