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बांग्लादेश में हिंदुओं पर हो रहा अत्याचार, डेढ़ साल से मौन है यूनुस सरकार: समझिए ‘दीपू चंद्र दास’ को इंसाफ दिलाने का क्यों चल रहा दिखावा, भीतर बसा है ‘कट्टरपंथ’

बांग्लादेश में हिंदुओं के घरों पर हमला हुआ यूनुस सरकार कुछ नहीं कर सकी। बांग्लादेश में हिंदू महिलाओं का रेप हुआ यूनुस सरकार कुछ नहीं कर सकी। बांग्लादेश में हिंदुओं के देवी-देवताओं का अपमान हुआ, मंदिर टूटे युनूस सरकार कुछ नहीं कर सकी। बांग्लादेश में एक हिंदू युवक को सरेआम जलाकर फूँक दिया गया तब भी यूनुस सरकार कुछ नहीं कर सकी…।

यूनुस सरकार हर उस मुद्दे पर चुप रही जो हिंदुओं के उत्पीड़न से जुड़े हुए थे, मगर, अब दुनिया को दिखाने के लिए अचानक उन्हें दीपू चंद्र दास याद आ रहे हैं। कारण- जग में हो रही थू-थू है।

16-17 दिसंबर 2025 को बांग्लादेश में जब उस्मान हादी की हत्या की नाराजगी लेकर इस्लामी कट्टरपंथी सड़कों पर उतरे तो उनका ये गुस्सा 18 दिसंबर 2025 को एक दीपू चंद्र दास नाम के हिंदू युवक को मारकर, उसका शव पेड़ पर बाँधकर, शरीर जलाकर शांत हुआ।

घटना के बाद दीपू का जला हुआ धड़ और खोपड़ी देखकर उसका परिवार रोता रहा, इंसाफ माँगता रहा लेकिन यूनुस सरकार के कान पर जूँ तक नहीं रेंगी। बाद में मीडिया में खबर आई, भारत में विरोध हुआ, सोशल मीडिया पर आवाज उठी, विदेशों से मानवाधिकारों पर प्रश्न हुए तब जाकर अपनी इज्जत बचाने के लिए यूनुस सरकार ने इस पर प्रतिक्रिया देनी उचित समझी।

मीडिया में पहले दो दिन कहा गया कि आरोपितों की गिरफ्तारी हो गई है। करीबन दो दिन तक यही बताया जाता रहा कि कब 7 लोग गिरफ्तार हुए और कब 12। आज इसी दिखावे के क्रम में एक खबर ये भी आई है कि वहाँ यूनुस सरकार के मंत्री अबरार ने दीपू चंद्र दास के परिजनों से मुलाकात की है। कुल मिलाकर मीडिया में माहौल ऐसे बनाया जा रहा है जैसे यूनुस सरकार दीपू चंद्र दास की हत्या को लेकर बहुत चिंतित है और जितना हो सकेगा कार्रवाई करेगी।

हालाँकि इस सरकार की सच्चाई क्या है इसे इन खबरों से मत समझिए… समझना है तो याद करिए बांग्लादेश का बीता डेढ़ साल

शेख हसीना सरकार को हटाने के लिए कैसे इस्लामी कट्टरपंथियों ने बांग्लादेश की व्यवस्था को पैरों तले रौंद दिया था और खबरें आई थी कि बांग्लादेश में 2000+ से ज्यादा हिंदुओं का उत्पीड़न हुआ है। उस समय भी यही बात सामने आई थी कि एक्शन लिया जाएगा, कार्रवाई होगी, दोषियों को छोड़ा नहीं जाएगा।

कुछ दिन तक यही राग चला और बाद में एक खबर आई कि अगस्त 2024 में छात्र प्रदर्शन के दौरान जिन लोगों पर केस हुए उनपर से मामले को वापस लिया जा रहा है।

ये खबर उन हिंदुओं के लिए बड़ा आघात था जो इस्लामी भीड़ के बीच रहते हुए इस्लामी कट्टरपंथियो से इंसाफ की उम्मीद लगाए बैठे थे। यूनुस सरकार ने एक पल में उस हिंसा को छात्र प्रदर्शन का नाम देकर सब अपराध धो-पोंछकर साफ कर दिया। वहीं उस कथित छात्र प्रदर्शन में शामिल लोगों को कानूनी संरक्षण देने तक की बात कही।

दीपू चंद्र दास के पिता से मिले यूनुस सरकार के मंत्री

बकायदा बांग्लादेश के गृह मंत्रालय की ओर से आधिकारिक बयान जारी हुआ- “एक नए गैर-भेदभावपूर्ण बांग्लादेश की यात्रा शुरू हो गई है। जो छात्र और नागरिक इस उथल-पुथल में शामिल थे, उन्हें 15 जुलाई से 8 अगस्त के बीच उनके कार्यों के लिए दंड, गिरफ्तारी या परेशानियों का सामना नहीं करना पड़ेगा।”

अब बताइए क्या सच में बांग्लादेश की यूनुस सरकार जो दिखावा कर रही है कि उन्होंने दीपू चंद्र दास के हत्यारों को पकड़ लिया है, मंत्री उनके परिवार से मिल रहे हैं, उसके कोई भी मायने हैं…?

दीपू चंद्र दास पर सिर्फ इसलिए बोला जा रहा है क्योंकि उसे दिखाकर सवाल खड़े हो रहे हैं। वरना हमेशा याद रखिएगा कि यही सरकार डेढ़ साल से हिंदुओं के हर उत्पीड़न पर सिर्फ चुप है। ये सरकार तब भी मौन थी जब 5 अगस्त 2024 को हुए तख्तापलट के बाद से हिंदुओं पर 2000+ हमलों की खबर आई। ये सरकार तब भी चुप थी जब मोरक्को से इनके खुद के राजदूत हारून अल रशीद ने ये बात स्वीकार की थी कि शेख हसीना की सरकार में बोलने की आजादी का फायदा उठाकर बांग्लादेश में भारत के खिलाफ भड़काया गया। इस सरकार ने उस समय भी एक शब्द नहीं बोला था

  • जब इसी साल बांग्लादेश में 26 साल के अर्नब कुमार सरकार की चाय पीते समय सरेआम गोली मारकर हत्या कर दी गई थी…।
  • जब मोबाइल की दुकान चलाने वाले सुदेब हलदर को बेवजह गला रेतकर मार दिया गया।
  • जब कॉक्स बाजार के चकरिया में 8-10 लोगों ने 14 साल की लड़की से गैंगरेप कर दिय।
  • जब नरैल में हिंदू महिला बसना मलिक के साथ ऐसी दरिंदगी की गई थी क वह बाद में उल्टियाँ कर करके मर गई।
  • जब एक हिंदू पत्रकार सौगात बोस के घर पर हमला हुआ। उसके घरवालों की खोपड़ी फोड़ दी गई। हड्डियाँ तोड़ दी गई और सबको बुरी तरह घायल करके अपराधी फरार हो गए।

1 साल में सैंकड़ों नहीं हजारों घटनाएँ ऐसी हुई हैं जब बांग्लादेश की यूनुस सरकार चाहती तो हिंदुओं के लिए मुखर होकर कड़े एक्शन ले सकती थी, लेकिन ये कभी नहीं हुआ। लगातार हिंदू की हत्याओं की खबरों से मीडिया भरा रहा, मंदिर टूटने की घटनाएँ आती रहीं… मगर यूनुस सरकार शांत रही। इसलिए इस बार मीडिया में आ रहे बयानों से भ्रमित मत होइए।

आपको बरगलाने का, ध्यान भटकाने का ये सिर्फ एक तरीका है। इस्लामी कट्टरपंथियों के आगे झुक चुके बांग्लादेश और उसकी सरकार से हिंदुओं को उम्मीद नहीं लगाना चाहिए। उम्मीद होनी चाहिए तो सिर्फ इतनी कि बांग्लादेश में जो हिंदू शेष हैं वो इन कट्टरपंथियों की आतंक से हमेशा बचे रहें। इन परिवारों पर ऐसी मानसिकता की कभी नजर न पड़े।

बांग्लादेश में हिंदुओं की घटती संख्या

ये चिंता सिर्फ इसलिए है क्योंकि 1971 के बाद से बांग्लादेश में हिंदुओं की आबादी सिर्फ और सिर्फ घटी ही है। 1974 में हुई जनगणना के अनुसार बांग्लादेश में हिंदू कुल आबादी का 13.5% फीसद थे। 1981 2001 में 9.3% और 2011 की जनगणना में 8.5% हो गई।

सिर्फ मीडिया में आती खबरें ही नहीं, आँकड़े भी यही बताते हैं कि बांग्लादेश में इस्लामी कट्टरपंथ से अल्पसंख्यक हिंदू वैसे ही परेशान है जैसे पाकिस्तान में है। इस इस्लामी मुल्क में एक तरफ जहाँ लगातारा हिंदुओं की आबादी घटी है वहीं मुस्लिमों की आबादी में लगातार इजाफा हुआ है। 1974 में इनकी आबादी 85.4% थी और अब ये 91.5% हो गई

ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में चल रही थी ‘आतंकवाद’ पर बहस, पाकिस्तानी ‘मंत्री’ के बेटे को भारतीय छात्र ने हराया: जानिए कौन है ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के मायने समझाने वाला वीरांश भानुशाली

ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में भारत का डंका बज रहा है। यहाँ भारत के छात्र वीरांश भानुशाली ने एक डिबेट के दौरान पूरी दुनिया के सामने पाकिस्तानी प्रोपेगेंडा ध्वस्त कर दिया है। पाकिस्तान को करारा जवाब देते हुए भानुशाली ने आतंकवाद पर भारत की सख्त नीतियों को दोहराया। इस डिबेट का वीडियो सोशल मीडिया पर काफी वायरल हो रहा है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, यह डिबेट 26 नवंबर 2025 के अगले दिन ऑक्सपोर्ड यूनियन द्वारा आयोजित की गई थी, जिसका वीडियो अब सामने आया है। डिबेट का विषय था- ‘सदन मानता है कि पाकिस्तान के प्रति भारत की नीति एक लोकलुभावन रणनीति है, जिसे सुरक्षा नीति के नाम पर बेचा जा रहा है।’ डिबेट में वीरांश भानुशाली विषय के विपक्ष में बोलते हुए पाकिस्तानी टीम से मूसा हरराज को हराकर शानदार प्रदर्शन किया। मूसा पाकिस्तान के पूर्व संघीय मंत्री मुहम्मद रजा हयात हरराज के बेटे हैं।

26/11 हमले पर मुंबईकर की पीड़ा जाहिर कर पाकिस्तान को धोया

ऑक्सफॉर्ड यूनियन में यह डिबेट उस दिन हुई, जिस दिन को पूरा भारत कभी नहीं भूल सकता है। 26 नवंबर को, जब पाकिस्तान ने मुंबई में आतंकी हमला कराया था। इस हमले में 250 लोगों की मौत हुई थी। वहीं पूरा मुंबई उस समय डर के साए में था। उनमें से एक मुंबई के रहने वाले वीरांश भानुशाली भी थे। डिबेट में अपनी व्यक्तिगत पीड़ा को साझा करते हुए वीरांश ने पाकिस्तान पर जमकर प्रहार किया।

वीरांश भानुशाली ने डिबेट में अपनी बात ही मुंबई के उस 26/11 हमले के निजी अनुभव से शुरू की। भानुशाली ने कहा, “जिन लक्ष्यों को निशाना बनाया गया था, उनमें से एक छत्रपति शिवाजी महाराज टर्मिनल (CSMT) था, वही स्टेशन जिससे मेरी चाची लगभग हर शाम गुजरती थीं। संयोगवश या ईश्वर की कृपा से उस रात उन्होंने घर जाने के लिए दूसरे ट्रेन पकड़ी और उन 166 लोगों की जान बाल-बाल बचाई जो मारे गए।”

भानुशाली ने आगे कहा, “मैं तब स्कूली में पढ़ने वाला छात्र था और अपने शहर को जलते हुए देखने के लिए टेलीविजन से चिपका हुआ था। मुझे फोन पर अपनी माँ की आवाज में डर और अपने पिता के कसे हुए जबड़े में तनाव याद है। तीन रातों तक मुंबई सोया नहीं और मैं भी नहीं सोया।”

भानुशाली ने स्पष्ट किया कि वह इस घटना का जिक्र माहौल खराब करने के लिए नहीं, बल्कि डिबेट को वास्तविक्ता के दायरे में लाने के लिए साझा कर रहे हैं। वीरांश भानुशाली ने बताया कि उपनगरीव रेलवे स्टेशन उनके घर से महज 200 मीटर की दूरी पर था, जिसमें 1993 में बम धमाकों में 250 लोगों की जानें गईं। उन्होंने कहा, “मैं इन त्रासदियों की छाया में पला-बढ़ा हूँ।”

पाकिस्तान को जवाब देते हुए कहा, “इसीलिए जब कोई कहता है कि पाकिस्तान के प्रति भारत का कड़ा रुख सिर्फ लोकलुभावनवाद है, जिसे सुरक्षा नीति का नाम दिया जा रहा है, तो ऐसे में आप समझ सकते हैं कि मुझे इतना गुस्सा क्यों आता है।”

पाकिस्तान की करतूतें गिनाते हुए भानुशाली ने दिया करारा जवाब

पाकिस्तान की करतूतें गिनाते हुए भानुशाली ने डिबेट को अपने पक्ष में किया और कहा, “मुझे यह डिबेट जीतने के लिए बयानबाजी की जरूरत नहीं है। मुझे बस एक कैलेंडर का इस्तेमाल करना है।”

उन्होंने अपने पड़ोस में हुए 1993 के धमाकों का जिक्र करते हुए कहा, “मार्च 1993 में RDX विस्फोटकों ने प्लाजा सिनेमा को तहस-नहस कर दिया। 257 लोग मारे गए। क्या मार्च 1993 में चुनाव थे? नहीं। वह चुनाव तीन साल बाद होने थे। आतंकवाद इसलिए नहीं आया कि हमें वोट चाहिए थे। यह इसलिए आया क्योंकि दाऊद और ISI भारत की आर्थिक रीढ़ को तोड़ना चाहते थे। वह लोकलुभावनवाद नहीं था। वह युद्ध का एक कृत्य था।”

मुंबई 26/11 आतंकी हमले का जिक्र करते हुए कहा, “26/11 के बाद एक लोकलुभावन सरकार क्या करती? जनता का गुस्सा परमाणु बम जैसा था। एक लोकलुभावन नेता अगले चुनाव जीतने के लिए सीधे जेट विमानों को लॉन्च कर देता लेकिन तत्कालीन सरकार कॉन्ग्रेस पार्टी ने रणनीतिक संयम चुना।”

उन्होंने आगे कहा कि भारत ने कूटनीति का रास्ता चुना, दस्तावेज भेजे और अंतरराष्ट्रीय समुदाय से अपील की। भानुशाली ने कहा, “क्या गैर-लोकप्रिय दृष्टिकोण ने हमें शांति दिलाई? नहीं। इसने हमें पठानकोट दिलाया। इसने हमें उरी दिलाया। इसने हमें पुलवामा दिलाया।”

विश्व स्तर पर ऑपरेशन सिंदूर का अर्थ समझाया

वीरांश भानुशाली ने समझाया कि ऑपरेशन सिंदूर का नाम कैसे रखा गया। भानुशाली ने कहा, “उस नरसंहार में मारी गई विधवाओं के लिए हिंदू पत्नी के सिंदूर का चिन्ह चुना गया था। इस ऑपरेशन में 9 लॉन्चपैडों को सटीक रूप से नष्ट किया गया। हमने दोषियों को सजा दी। और फिर क्या हुआ? हम रुक गए। हमने आक्रमण नहीं किया। हमने कब्जा नहीं किया। यह लोकलुभावनवाद नहीं है। यह पेशेवर रवैया है।”

उन्होंने आगे कहा, “अपने नागरिकों को हत्या से बचाना लोकप्रिय है? इसका मतलब यह नहीं कि यह कोई चाल है।” उन्होंने कहा, “लेकिन अगर आप सुरक्षा के नाम पर असली लोकलुभावनवाद देखना चाहते हैं, तो रेडक्लिफ लाइन के उस पार देखिए। जब ​​भारत युद्ध लड़ता है, तो हम पायलटों से जानकारी लेते हैं। पाकिस्तान में वे कोरस को ऑटो-ट्यून करते हैं। आप अपने लोगों को रोटी नहीं दे सकते, इसलिए आप उन्हें तमाशा दिखाते हैं। यह युद्ध के डर से सार्वजनिक गरीबी को निजी शक्ति में बदलने की कला है।”

कौन हैं वीरांश भानुशाली?

वीरांश भानुशाली इंग्लैंड के ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में कानून के छात्र हैं। वे ऑक्सफोर्ड के सेंट पीटर कॉलेज से BA ज्यूरिस्प्रूडेंस (LLB), अंग्रेजी कानून और यूरोप में कानून अध्ययन की पढ़ाई कर रहे हैं। मुंबई में जन्मे भानुशाली ने कथित तौर पर मुंबई के NES इंटरनेशनल स्कूल में पढ़ाई की। बाद में वे उच्च शिक्षा के लिए ब्रिटेन चले गए।

वे वर्तमान में ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में छात्रों द्वारा संचालित वाद-विवाद समिति, ऑक्सफोर्ड यूनियन के चीफ ऑफ स्टाफ के रूप में कार्यरत हैं। इससे पहले कानून के छात्र ऑक्सफोर्ड यूनियन में अंतर्राष्ट्रीय अधिकारी और सचिव समिति के सदस्य के रूप में भी कार्य कर चुके हैं। उन्होंने अक्टूबर 2023 में द ऑक्सफोर्ड मजलिस की सह-स्थापना की, जो सांस्कृतिक और बौद्धिक चर्चाओं पर केंद्रित छात्रों की एक पहल है।

इनकम टैक्स रिफंड होल्ड पर मैसेज आया? फिर तो रिस्क मैनेजमेंट प्रक्रिया में फँस गई आपकी ITR: जानें- कैसे इस आफत से छुड़ाएँ जान, वर्ना लग सकती है पेनल्टी

इनकम टैक्स रिफंड का इंतजार कर रहे लाखों करदाताओं के लिए बुरी खबर है। आयकर विभाग ने रिस्क मैनेजमेंट प्रक्रिया के तहत बड़ी संख्या में ITR को होल्ड पर डाल दिया है। कई लोगों के फोन पर SMS और ईमेल आ रहे हैं कि उनका रिफंड रुका हुआ है और डिस्क्रेपेंसी के कारण जाँच चल रही है। विभाग ने स्पष्ट किया है कि यह एक तरह की चेतावनी है, ताकि करदाता अपनी गलतियाँ सुधार सकें।

आयकर विभाग के प्रवक्ता ने कहा, “विभाग ने AY 2025-26 के लिए एक डेटा-ड्रिवन कैम्पेन शुरू किया है, जिसमें करदाताओं को स्वेच्छा से अपनी अमान्य रिफंड क्लेम्स की समीक्षा करने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है।”

यह कैम्पेन उन करदाताओं को टारगेट कर रही है जिनके रिटर्न में डेटा मिसमैच पाया गया है। विभाग ने करदाताओं से अपील की है कि वे 31 दिसंबर 2025 तक रिवाइज्ड ITR फाइल करें, अन्यथा जनवरी 2026 से अपडेटेड रिटर्न पर अतिरिक्त टैक्स और पेनल्टी लग सकती है।

क्या कह रहे हैं एक्सपर्ट?

टैक्स एक्सपर्ट्स के मुताबिक, यह पहली बार है जब इतने बड़े पैमाने पर प्री-रिफंड वेरिफिकेशन हो रहा है। पहले ऐसे अलर्ट सिर्फ राजनीतिक दलों को दान देने वाले मामलों में आते थे, लेकिन अब हाई रिफंड क्लेम वाले हर रिटर्न की जाँच हो रही है।

एक एक्सपर्ट ने बताया, “एडवांस सिस्टम और डेटा एनालिटिक्स अब बारीकी से रिटर्न चेक कर रहे हैं।” अगर बैंक ब्याज, डिविडेंड या कैपिटल गेन्स की जानकारी AIS से मैच नहीं कर रही, तो रिफंड रुक सकता है।

रिफंड रुकने की मुख्य वजहें क्या हैं?

आयकर विभाग के अनुसार, TDS/TCS मिसमैच, AIS vs ITR आय मिसमैच, पिछले सालों से ज्यादा रिफंड क्लेम, 80C/80D/80G के बड़े दावे बिना बैकिंग डेटा के और गलत इनकम हेड क्लासिफिकेशन शामिल हैं। कई नौकरीपेशा लोग HRA का दावा बिना टीडीएस काटे कर देते हैं, जो अब आसानी से पकड़ा जा रहा है।

मैसेज को लेकर लोग हो रहे परेशान

सोशल मीडिया पर लोग पोस्ट कर रहे हैं कि मैसेज तो आया लेकिन डिटेल्स नहीं मिलीं। एक यूजर ने लिखा, “हजारों करदाताओं को अचानक यह मैसेज आ रहा है कि ITR रिफंड होल्ड पर है रिस्क मैनेजमेंट की वजह से। रिवाइज्ड रिटर्न एक हफ्ते में फाइल करें। विभाग को समस्या पता करने में 4 महीने लगे और करदाताओं को सुधारने के लिए कुछ दिन!”

कई लोगों ने यह भी बताया कि ईमेल स्पैम में जा रहा है या पुराने आईडी पर आ रहा है।

IT विभाग बोला- ये गलती सुधार का मौका

विभाग का कहना है कि यह अलर्ट नोटिस नहीं, बल्कि सुधार का मौका है। प्रेस रिलीज में लिखा है, “यह सलाह पहल उन करदाताओं से रिवाइज्ड आयकर रिटर्न फाइल करने को कहती है जिनकी पहचान की गई है, 31 दिसंबर 2025 तक। जो इस डेडलाइन को मिस करेंगे, वे 1 जनवरी 2026 से अपडेटेड रिटर्न फाइल कर सकते हैं, लेकिन लागू फीस और ब्याज के साथ।”

करदाताओं को क्या करना चाहिए?

सबसे पहले ITR पोर्टल पर लॉगिन करें, AIS और 26AS से डेटा मैच करें। अगर गलती मिले, तो रिवाइज्ड रिटर्न फाइल करें। अगर सही है, तो इंतजार करें, रिफंड रिलीज होगा। समय-समय पर e-Proceedings/Worklist चेक करें।

Revised Income Tax Return कैसे फाइल करें?

आयकर की ई-फाइलिंग वेबसाइट https://www.incometax.gov.in/iec/foportal/ पर जाएँ। इसके बाद PAN, पासवर्ड और कैप्चा डालकर लॉगिन करें। अगले चरण में e-File मेन्यू पर क्लिक करें और Income Tax Return चुनें। इसके बाद संबंधित असेसमेंट ईयर और ITR फॉर्म नंबर चुनें। फिर Filing Type में Original/Revised Return चुनें। आगे बढ़ते हुए Submission Mode में Prepare and Submit Online सेलेक्ट करें और फिर ऑनलाइन ITR फॉर्म के General Information टैब में Return Filing Section में Revised return under section 139(5) चुनें।

इस प्रोसेस में आगे बढ़ते हुए Return filing type में Revised चुनें और ओरिजिनल रिटर्न का Acknowledgement Number और Date of filing दर्ज करें।

Revised ITR फाइल करने पर कोई पेनल्टी नहीं लगती। हालाँकि अगर आपकी असली टैक्स देनदारी पहले दिखाई गई रकम से ज्यादा निकलती है, तो आपको ब्याज के तौर पर कुछ अतिरिक्त रकम चुकानी पड़ सकती है।

हालाँकि यह कदम लंबे समय में टैक्स सिस्टम को मजबूत बनाएगा, लेकिन फिलहाल भ्रम फैला रहा है। सरकार का कहना है कि यह स्वैच्छिक समीक्षा है, ताकि भविष्य में जाँच से बचा जा सके। कुल मिलाकर अगर आपको ऐसा मैसेज मिला है, तो घबराएँ नहीं, लेकिन एक्शन लें। ईमानदारी से टैक्स भरना ही सुरक्षित है।

अब स्किल-सैलरी के आधार पर मिलेगा US का H-1B वीजा, ट्रंप प्रशासन ने खत्म किया लॉटरी सिस्टम: जानिए- इससे कौन और कैसे होंगे प्रभावित

अमेरिका के ट्रंप प्रशासन ने H-1B वीजा प्रोग्राम में एक बड़ा बदलाव का ऐलान किया है। यह वीजा मुख्य रूप से विदेशी स्किल्ड वर्कर्स, खासकर टेक्नोलॉजी सेक्टर में काम करने वालों के लिए होता है। अब तक इस वीजा को लॉटरी सिस्टम से दिया जाता था, लेकिन अब इसे खत्म कर दिया गया है।

नई व्यवस्था में ज्यादा स्किल्ड और ज्यादा सैलरी वाले विदेशी वर्कर्स को प्राथमिकता मिलेगी। अमेरिकी गृह सुरक्षा विभाग (DHS) ने 23 दिसंबर 2025 को इसकी घोषणा की। यह बदलाव 27 फरवरी 2026 से लागू होगा और अगले H-1B कैप रजिस्ट्रेशन सीजन पर असर डालेगा।

डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन का कहना है कि इससे अमेरिकी वर्कर्स की नौकरियाँ और सैलरी सुरक्षित रहेंगी, क्योंकि पुराने सिस्टम में कंपनियाँ कम सैलरी पर विदेशी वर्कर्स हायर करके अमेरिकियों को नुकसान पहुँचा रही थीं।

यह बदलाव ऐसे समय में आया है जब अमेरिका में इमिग्रेशन पॉलिसी को लेकर बहस तेज है। H-1B वीजा मुख्य रूप से इंडियन प्रोफेशनल्स के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि 71 प्रतिशत H-1B होल्डर्स भारत से होते हैं। लेकिन नई पॉलिसी से इंडियंस पर भी असर पड़ेगा, खासकर उन पर जो एंट्री लेवल जॉब्स या कम अनुभव वाले हैं।

आइए- इस बदलाव को विस्तार से समझते हैं। पहले जानते हैं कि पुराना सिस्टम कैसा था, फिर नए बदलाव के फायदे-नुकसान और अमेरिका में लगने वाले आरोपों पर चर्चा करेंगे।

लॉटरी पर आधारित था पुराना H-1B वीजा सिस्टम

H-1B वीजा अमेरिका का एक नॉन-इमिग्रेंट वर्क वीजा है, जो स्पेशल ऑक्यूपेशन में काम करने वाले विदेशियों को दिया जाता है। यह मुख्य रूप से आईटी, इंजीनियरिंग, मेडिसिन और अन्य हाई-स्किल्ड फील्ड्स के लिए होता है। हर साल अमेरिका में 85,000 H-1B वीजा जारी किए जाते हैं। इनमें से 65,000 रेगुलर कैप के तहत और 20,000 अमेरिकी यूनिवर्सिटी से एडवांस्ड डिग्री (मास्टर्स या पीएचडी) वाले कैंडिडेट्स के लिए रिजर्व होते हैं।

पुराने सिस्टम में प्रोसेस कुछ इस तरह था: सबसे पहले अमेरिकी कंपनियाँ (जैसे अमेजन, माइक्रोसॉफ्ट, गूगल या टीसीएस) विदेशी वर्कर के लिए पेटिशन फाइल करती थीं। हर साल अप्रैल में रजिस्ट्रेशन ओपन होता था, और अगर अप्लिकेशंस कैप से ज्यादा आतीं (जो हमेशा आती थीं, क्योंकि डिमांड बहुत ज्यादा होती है), तो USCIS (यूएस सिटिजनशिप एंड इमिग्रेशन सर्विसेज) रैंडम लॉटरी चलाती थी। लॉटरी में सिलेक्ट होने पर ही आगे प्रोसेसिंग होती थी, जिसमें बैकग्राउंड चेक, इंटरव्यू और अप्रूवल शामिल था।

उदाहरण के लिए FY 2025 में लाखों अप्लिकेशंस आईं, लेकिन सिर्फ 85,000 को ही वीजा मिला। अमेजन को सबसे ज्यादा 10,000 से अधिक अप्रूवल मिले, उसके बाद टीसीएस, माइक्रोसॉफ्ट, ऐपल और गूगल। कैलिफोर्निया में सबसे ज्यादा H-1B वर्कर्स रहते हैं। इस लॉटरी सिस्टम की वजह से कई बार कम स्किल्ड या कम सैलरी वाले भी सिलेक्ट हो जाते थे, जबकि हाई स्किल्ड वाले बाहर रह जाते थे। यूजर के शब्दों में कहें तो “लॉटरी में गधे भी चले जाते थे”, मतलब किस्मत पर निर्भर था, स्किल पर नहीं।

अमेरिका में लगते थे H-1B वीजा के गलत इस्तेमाल के आरोप

ट्रंप प्रशासन ने पुराने सिस्टम पर कई आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि अमेरिकी कंपनियाँ H-1B का दुरुपयोग कर रही थीं। वे कम सैलरी पर विदेशी वर्कर्स हायर करके अमेरिकी लोगों को निकाल देती थीं। USCIS स्पोक्सपर्सन मैथ्यू ट्रैगेसर ने कहा, “मौजूदा रैंडम सिलेक्शन प्रक्रिया का दुरुपयोग हो रहा था। अमेरिकी नियोक्ता कम वेतन पर विदेशी कर्मचारियों को लाने के लिए इसका फायदा उठा रहे थे, जबकि अमेरिकी कर्मचारियों को ज्यादा वेतन देना पड़ता।”

उदाहरण के तौर पर सितंबर 2025 में ट्रंप ने एक प्रेसिडेंशियल प्रोक्लेमेशन साइन किया, जिसमें कहा गया कि आईटी फर्म्स अमेरिकी वर्कर्स को लेऑफ करके H-1B पर कम सैलरी वाले विदेशियों को हायर कर रही हैं। एक रिपोर्ट में बताया गया कि एक आईटी फर्म ने FY 2025 में 1,700 H-1B वर्कर्स अप्रूव कराए, लेकिन जुलाई में 2,400 अमेरिकी वर्कर्स को निकाल दिया। इससे अमेरिकी वर्कर्स की सैलरी दबती है और जॉब मार्केट में अनफेयर कॉम्पिटिशन होता है। ट्रंप ने इसे ‘अमेरिका फर्स्ट’ पॉलिसी के खिलाफ बताया।

इसके अलावा आउटसोर्सिंग कंपनियाँ (जैसे इंडियन आईटी फर्म्स) पर आरोप लगे कि वे एंट्री लेवल जॉब्स के लिए H-1B यूज करती हैं, जो अमेरिकी ग्रेजुएट्स के लिए होनी चाहिए। इससे यूएस वर्कफोर्स की क्वॉलिटी गिर रही थी।

स्किल और सैलरी पर आधारित वेटेड सिलेक्शन अब नया सिस्टम

अब नया नियम क्या है? DHS ने रैंडम लॉटरी को रिप्लेस करके ‘वेटेड सिलेक्शन प्रोसेस’ लागू किया है। इसमें ज्यादा स्किल्ड और हाई सैलरी वाले कैंडिडेट्स की सिलेक्शन की प्रॉबेबिलिटी बढ़ जाएगी। मतलब, जो पेटिशन हाई वेज लेवल पर फाइल की जाएँगी, उन्हें ज्यादा वेटेज मिलेगा।

ट्रैगेसर ने कहा, “नई वेटेड सिलेक्शन प्रक्रिया कॉन्ग्रेस के इरादे को बेहतर तरीके से पूरा करेगी और अमेरिका की प्रतिस्पर्धात्मकता को मजबूत बनाएगी। इससे अमेरिकी कंपनियों को ज्यादा वेतन और ज्यादा कुशल विदेशी कर्मचारियों के लिए आवेदन करने की प्रेरणा मिलेगी। इन नियामक बदलावों और भविष्य में आने वाले अन्य बदलावों से हम H-1B कार्यक्रम को अपडेट करते रहेंगे, ताकि अमेरिकी व्यवसायों की मदद हो सके, लेकिन अमेरिकी कर्मचारियों को नुकसान पहुंचाने वाले दुरुपयोग को रोका जा सके।”

वीजा की सालाना लिमिट वही रहेगी-65,000 + 20,000। लेकिन अब सिलेक्शन रैंडम नहीं, बल्कि मेरिट बेस्ड होगा। कंपनियों को हाई सैलरी ऑफर करनी पड़ेगी, ताकि सिलेक्शन चाँस बढ़े। यह बदलाव FY 2027 की रजिस्ट्रेशन से लागू होगा।

ट्रंप प्रशासन के फैसले से किन्हें होगा फायदा?

यह बदलाव मुख्य रूप से हाई स्किल्ड और अनुभवी वर्कर्स को फायदा देगा। जो लोग ज्यादा सैलरी वाली जॉब्स के लिए अप्लाई करेंगे, जैसे सीनियर सॉफ्टवेयर इंजीनियर्स, डेटा साइंटिस्ट्स या मैनेजमेंट रोल्स, उन्हें आसानी से वीजा मिल सकता है। अमेरिकी वर्कर्स को भी फायदा होगा, क्योंकि कंपनियाँ अब कम सैलरी पर विदेशियों को नहीं हायर कर पाएँगी, जिससे लोकल जॉब्स सुरक्षित रहेंगी।

ट्रंप प्रशासन का कहना है कि इससे अमेरिका की इकोनॉमी मजबूत होगी, क्योंकि सिर्फ ‘बेस्ट ऑफ द बेस्ट’ टैलेंट आएगा। यूजर के अनुसार, अब अमेरिका ‘घोड़े’ लेगा, मतलब सिर्फ स्किल्ड और अनुभवी लोगों को।

ट्रंप सरकार का फैसला अच्छा है या बुरा

यह बदलाव अच्छा भी है और बुरा भी, निर्भर करता है किस नजरिए से देखें। अच्छा इसलिए कि यह अनफेयर प्रैक्टिस को रोकेगा। अमेरिकी वर्कर्स की सैलरी बढ़ेगी और जॉब मार्केट फेयर बनेगा। हाई स्किल्ड प्रोफेशनल्स के लिए यह मेरिट बेस्ड सिस्टम है, जहाँ किस्मत नहीं, काबिलियत मायने रखेगी। इससे अमेरिका ग्लोबल कॉम्पिटिशन में आगे रहेगा।

लेकिन बुरा इसलिए कि न्यू ग्रेजुएट्स या कम अनुभव वाले विदेशियों के लिए मुश्किल हो जाएगी। इंडियन आईटी प्रोफेशनल्स, जो एंट्री लेवल पर आते हैं, उन्हें नुकसान होगा। कंपनियाँ अब ज्यादा सैलरी ऑफर करने से कतराएंगी, जिससे ओवरऑल H-1B अप्लिकेशंस कम हो सकती हैं। आउटसोर्सिंग फर्म्स पर असर पड़ेगा। इसके अलावा यह बदलाव कंट्रोवर्शियल है, क्योंकि कुछ लोग इसे प्रोटेक्शनिस्ट पॉलिसी कहते हैं, जो ग्लोबल टैलेंट को रोकती है।

ट्रंप प्रशासन के इस फैसले से अन्य क्या असर होंगे

ट्रंप प्रशासन ने H-1B पर और भी सख्ती की है। सितंबर 2025 में नई H-1B अप्लिकेशंस पर 100,000 डॉलर एक्स्ट्रा फीस लगाई गई। इसका मकसद कम सैलरी वाली हायरिंग रोकना था। कैलिफोर्निया समेत 20 स्टेट्स ने इसके खिलाफ मुकदमा दायर किया, लेकिन एक फेडरल जज ने इसे बरकरार रखा।

इसके अलावा दिसंबर 2025 से सोशल मीडिया वेटिंग को एक्सपैंड किया गया। अब सभी H-1B और H-4 अप्लिकेंट्स की ऑनलाइन प्रेजेंस चेक की जाएगी, ताकि सिक्योरिटी थ्रेट्स पता चलें। इससे वीजा इंटरव्यू में देरी हो रही है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, दिसंबर में इंडिया में H-1B रिन्यूअल के लिए गए कई लोग फँसे रह गए। उनके अपॉइंटमेंट्स कैंसल हो गए और नए डेट्स मार्च 2026 तक मिले। इमिग्रेशन लॉयर्स का कहना है कि इससे कंपनियाँ इंतजार नहीं कर पाएँगी और रिलेशनशिप्स खराब होंगे।

ट्रंप ने $1 मिलियन ‘गोल्ड कार्ड’ वीजा भी इंट्रोड्यूस किया, जो वेल्थी इंडिविजुअल्स को सिटिजनशिप का रास्ता देता है, लेकिन यह H-1B से अलग है।

ट्रंप प्रशासन के फैसले से भारतीयों पर पड़ेगा कितना असर?

भारत के लिए H-1B बहुत महत्वपूर्ण है। 71% H-1B होल्डर्स इंडियन हैं। नई पॉलिसी से एंट्री लेवल इंडियंस को मुश्किल होगी, लेकिन सीनियर प्रोफेशनल्स को फायदा हो। हालाँकि अब अमेरिका पर निर्भर इंडियन आईटी इंडस्ट्री को रिस्ट्रक्चरिंग करनी पड़ेगी। स्ट्रैंडेड वर्कर्स की समस्या से फैमिलीज प्रभावित हो रही हैं।

पॉइंट्स में समझें बदलाव…

पुराना vs नया प्रोसेस: पुराना – रैंडम लॉटरी; नया – वेटेड सिलेक्शन (हाई वेज को ज्यादा चांस)।
वीजा लिमिट: पहले की तरह 85,000 सालाना।
कम से लागू होगा सिस्टम: 27 फरवरी 2026 से।
फायदे: अमेरिकी जॉब्स सुरक्षित होंगी, हाई टैलेंट को आकर्षित करने पर फोकस।
नुकसान: न्यूकमर्स के लिए मुश्किल होगा वीजा पाना।
अन्य रोक: 100,000 डॉलर फीस, सोशल मीडिया चेक।
भविष्य: H-1B और L-1 वीजा रिफॉर्म एक्ट 2025 में और बदलाव, जैसे यूएस वर्कर्स को डिस्प्लेसमेंट से 180 दिन प्रोटेक्शन।

कुल मिलाकर यह बदलाव अमेरिका की इमिग्रेशन पॉलिसी को ‘अमेरिका फर्स्ट’ की दिशा में ले जा रहा है। जबकि कुछ इसे जरूरी सुधार मानते हैं, दूसरों को लगता है कि इससे इनोवेशन प्रभावित होगा। इंडिया जैसे देशों को अब ज्यादा स्किल डेवलपमेंट पर फोकस करना पड़ेगा। हालाँकि इसका अमेरिका पर भी बुरा असर पड़ सकता है, क्योंकि स्किल्ड लोगों की जरूरत पड़ने पर अब अमेरिकी कंपनियों को भी मोटी रकम चुकानी पड़ेगी।

वक्फ कानून का विरोध बहाना था, पूरी प्लानिंग के साथ की गई हिंदू पिता-पुत्र की हत्या: बंगाल की अदालत ने 13 मुस्लिमों को दी उम्रकैद, ममता का प्रोपेगेंडा भी किया ध्वस्त

पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले के जंगीपुर की एक ट्रायल कोर्ट ने सोमवार (22 दिसंबर 2025) को 72 साल के हरगोबिंदो दास और उनके 40 साल के बेटे चंदन दास की हत्या के मामले में 13 मुस्लिमों को उम्रकैद की सजा सुनाई है। यह घटना 12 अप्रैल 2025 को मुर्शिदाबाद के धुलिया जिले की है, जब भीड़ ने बाप और बेटे को घर से खींचकर बेरहमी से हत्या कर दी थी।

आरोपितों की पहचान दिलदार नदाब, अस्माउल नदाब उर्फ कालू नदाब, इंजामुल हक, जियाउल हक, फेकारुल शेख, अजफरुल शेख उर्फ बिलाई, मोनिरुल शेख, एकबाल शेख, नुरुल शेख, सबा करीम, हजरत शेख, हरजत अली, अकबर अली उर्फ एकबर शेख और यूसुफ शेख उर्फ शेख यूसुप के रूप में की गई।

इन सभी आरोपितों पर भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 103(2), 310(2), 331(5), 191(3), 115(2), 126(2), 332(a) और 3(5) के तहत मामला दर्ज कर दोषी ठहराया गया। जांगीपुर उपमंडल न्यायालय के न्यायाधीश अमिताभ मुखोपाध्याय ने 23 दिसंबर 2025 को इन सभी दोषियों को उम्रकैद की सजा सुनाई।

विशेष लोक अभियोजक बिवास चटर्जी ने बताया, “सभी 13 आरोपितों को हत्या, डकैती, जबरन प्रवेश, घातक हथियार से दंगा, चोट पहुँचाने और अवैध रूप से बँधक बनाने सहित अन्य BNS धाराओं के तहत दोषी ठहराया गया है। बंगाल में दोहरे हत्याकांड के मामले में यह सबसे तेज सजाओं में से एक है।”

आरोपितों को हत्या, लूट, घर में घुसपैठ, घातक हथियारों से दंगा और मारपीट सहित भारतीय न्याय संहिता (BNS) की कई धाराओं में दोषी पाया गया। मामले की जाँच 25 सदस्यीय SIT ने की थी, जिसने तीन राज्यों में छापेमारी कर 983 पन्नों की चार्जशीट दाखिल की।

परिवार ने कलकत्ता HC का दरवाजा खटखटाया, फैसले के बाद BJP नेता ने दी प्रतिक्रिया

कलकत्ता हाईकोर्ट में इस मामले की जाँच CBI से कराने की माँग को लेकर पीड़ित परिवार की याचिका पहले से दाखिल है, जिस पर सुनवाई अभी लंबित है। हरगोबिंदो दास की पत्नी ने कहा है कि आरोपितों को सजा सुनाए जाने के बाद ही आगे की कानूनी कार्रवाई पर फैसला लिया जाएगा।

वहीं, फैसले के बाद BJP नेता अमित मालवीय ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि ममता बनर्जी के शासन में पश्चिम बंगाल हिंदू बंगालियों के लिए लगातार असुरक्षित होता जा रहा है और उन्हें निशाना बनाकर हिंसा की जा रही है। उन्होंने पिता-पुत्र की भीड़ द्वारा की गई हत्या को इस गंभीर स्थिति का दुखद और चिंताजनक उदाहरण बताया।

यह दिल दहला देने वाली घटना इलाके में वक्फ संशोधन कानून के खिलाफ हुई हिंसक आंदोलन के बाद सामने आई थी। हालाँकि, BJP नेता अमित मालवीय ने कहा कि कोर्ट के जज ने अपने फैसले में साफ तौर पर कहा है कि इस हत्या का वक्फ से कोई लेना-देना नहीं था। उन्होंने आरोप लगाया कि इस मामले को लेकर लोगों को गुमराह करने और असली जिम्मेदारी से ध्यान हटाने की कोशिश की गई।

मालवीय ने आगे कहा कि सजा मिलने से पीड़ित परिवार का नुकसान पूरा नहीं हो सकता और इससे राज्य में रह रहे हिंदुओं के मन से डर खत्म नहीं होता। उन्होंने जोर देकर कहा कि कानून-व्यवस्था, सभी को समान सुरक्षा और सच्चाई से किसी भी राजनीतिक फायदे के लिए समझौता नहीं किया जाना चाहिए।

हरगोबिंदो दास की पत्नी पारुल दास ने याद किया वो भयावह मंजर

दिवंगत हरगोबिंदो दास की पत्नी पारुल दास ने मई महीने में घटना का आँखों देखा हाल बताया था। उन्होंने कहा, “सबसे पहले भीड़ ने हमारी दुकान तोड़ी, सारा सामान लूट लिया और चली गई। बाद में लौटकर उन्होंने हमारी रसोई को तोड़ दिया। फिर छत पर पत्थर, काँच और बोतलें फेंकी गईं। बाड़ के दूसरी तरफ से ईंट-पत्थर बरसाए गए। तीसरी बार जब वे आए, तो उनके हाथों में फावड़े, बेलचे और धारदार हथियार थे।”

पारुल दास ने आगे बताया, “पिता और बेटा वहीं खड़े थे। भीड़ ने दोनों को घसीटकर बाहर निकाला। मेरे पति को नाले के पास मार डाला गया और मेरे बेटे को उस पेड़ के नीचे।” जब उनसे पूछा गया कि क्या पुलिस मदद के लिए आई थी, तो उन्होंने कहा, “नहीं, कुछ भी नहीं। अगर तीसरी बार पुलिस आ जाती, तो यह हत्या नहीं होती। पुलिस चार घंटे बाद आई।” उन्होंने बताया कि टीवी पर दिखाई गई तस्वीरों से ही वह हमलावरों को पहचान सकीं।

पारुल दास ने कहा, “हम डर के साए में जी रहे हैं। हमें यहाँ BSF कैंप चाहिए।” उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें आज तक समझ नहीं आया कि उनके परिवार के साथ इतनी क्रूरता क्यों की गई, क्योंकि “हमारी किसी से कोई दुश्मनी नहीं थी।” इसके साथ ही पारुल दास और उनकी बहू पिंकी दास ने पश्चिम बंगाल पुलिस और तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) के कुछ लोगों पर उन्हें परेशान करने का आरोप भी लगाया।

घटना के समय पश्चिम बंगाल में वक्फ संशोधन कानून को लेकर भारी हिंसा फैल रही थी और मुर्शिदाबाद जिला भी इससे बचा हुआ नहीं था। 11 और 12 अप्रैल को समसेरगंज के धुलियान नगरपालिका और तीनपाकुड़िया ग्राम पंचायत इलाके में हालात इतने बिगड़ गए कि कई लोगों को अपने घर छोड़कर भागना पड़ा। इस दौरान घरों और गाड़ियों में आग लगा दी गई और जमकर तोड़फोड़ हुई।

इसी माहौल का फायदा उठाकर उसी इलाके के रहने वाले 13 आरोपितों ने इस वारदात को अंजाम दिया, जबकि यह हत्या सीधे तौर पर आंदोलन से जुड़ी नहीं थी। एक पुलिस अधिकारी के अनुसार, हमलावर तलवारों और लाठियों से लैस थे।

बाद में जो हथियार बरामद हुआ, वह तलवार जैसा एक धारदार औजार था, जिसके ऊपरी हिस्से में 90 डिग्री का मोड़ था। वहीं, SIT की चार्जशीट में बताया गया है कि पास की एक मस्जिद पर सुरक्षाबलों द्वारा फायरिंग की अफवाह फैल गई थी। इसी अफवाह के बाद नाराज भीड़ बेकाबू हो गई, घरों में आगजनी की गई और इसी हिंसा के दौरान पिता-पुत्र की बेरहमी से हत्या कर दी गई।

ममता बनर्जी की राजनीतिक साजिशें खोजने की कोशिश

यह साफ है कि यह हत्या एक नाराज और हिंसक भीड़ की दरिंदगी का नतीजा थी और इसका केंद्र सरकार के किसी कानून से सीधा कोई संबंध नहीं था। इसके बावजूद मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने निर्दोष हिंदुओं की सुरक्षा में राज्य सरकार की नाकामी स्वीकार करने के बजाए इस संवेदनशील मुद्दे पर राजनीतिक बयानबाजी करना चुना।

इस्लामी इमामों के एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए ममता बनर्जी ने मुर्शिदाबाद की हिंसा को पूर्व-नियोजित बताया और इसके लिए BJP को जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने कहा, “कल मैंने ANI पर एक ट्वीट देखा, जिसमें गृह मंत्रालय के हवाले से कहा गया था कि इसमें बांग्लादेश की भूमिका है। अगर यह सच है, तो इसकी जिम्मेदारी केंद्र सरकार की बनती है। सीमा की सुरक्षा BSF करती है, राज्य सरकार नहीं। फिर आपने BJP के लोगों को बाहर से आकर यहाँ अशांति फैलाने और भाग जाने की इजाजत क्यों दी?”

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने केंद्र सरकार पर जिम्मेदारी से बचने का आरोप लगाते हुए कहा कि हिंसा के लिए केंद्र दोषी है। उन्होंने दावा किया कि वह यह पता लगाएँगी कि सीमा क्षेत्रों में BSF ने किन स्थानीय युवकों को पैसे देकर पत्थरबाजी करवाई।

ममता बनर्जी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चेतावनी देते हुए कहा कि वक्फ संशोधन कानून खतरनाक है और देश को बांट देगा। उन्होंने प्रधानमंत्री से इस कानून को लागू न करने की अपील की। साथ ही, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह पर आरोप लगाया कि वह अपने राजनीतिक एजेंडे के लिए देश को नुकसान पहुँचा रहे हैं और प्रधानमंत्री से उन्हें रोकने की माँग भी की। ममता ने यह भी दोहराया कि उनकी पार्टी तृणमूल कॉन्ग्रेस वक्फ कानून के खिलाफ लड़ाई में सबसे आगे है।

आलोचकों का कहना है कि बंगाल में फैली हिंसा को ममता बनर्जी और TMC नेताओं के भड़काऊ और विभाजनकारी बयानों ने और हवा दी। इसके बावजूद, ममता ने अशांति के लिए सभी को जिम्मेदार ठहराया, लेकिन न तो कानून-व्यवस्था संभालने वाली पुलिस की जवाबदेही तय की और न ही अपनी सरकार की विफलता स्वीकार की।

राज्य सरकार की नाकामी SIT की चार्जशीट में भी साफ नजर आती है। प्रशासन न तो अफवाहों को रोक सका और न ही हिंसक तत्वों पर काबू पा सका, जो पूरे इलाके में उत्पात मचाते रहे। पीड़िता पारुल दास ने भी पुलिस की गंभीर लापरवाही की ओर इशारा करते हुए कहा था कि अगर पुलिस चार घंटे देर से नहीं आती, तो उनके पति और बेटे की जान बच सकती थी।

इसके बावजूद, वक्फ संशोधन कानून के नाम पर जब बंगाल में कट्टरपंथी हिंसा फैला रहे थे, तब भी TMC प्रमुख ममता बनर्जी लगातार ऐसे बयान देती रहीं जो इन तत्वों की भाषा से मेल खाते थे और साथ ही BJP पर हमले करती रहीं।

ममता बनर्जी ने RSS पर जमकर निशाना साधा

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगाल में हुई हिंसा को लेकर BJP के साथ-साथ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) पर भी निशाना साधा। उन्होंने आरोप लगाया कि BJP, उसके सहयोगी दल और RSS राज्य में हिंसा को लेकर झूठ और भ्रम फैलाने का काम कर रहे हैं।

ममता बनर्जी ने कहा, “BJP और उसके सहयोगी जो फैला रहे हैं, वह पूरी तरह गलत और संकीर्ण सोच पर आधारित है। उनकी बातें झूठ और गलत व्याख्याओं से भरी हैं। लोगों को उन पर भरोसा नहीं करना चाहिए। वे दंगे भड़काना चाहते हैं।” उन्होंने आगे कहा कि BJP पश्चिम बंगाल में अचानक बहुत आक्रामक हो गई है और RSS भी उनके साथ शामिल है। “पहले मैंने RSS का नाम नहीं लिया था, लेकिन अब कहना पड़ रहा है कि राज्य में फैलाए जा रहे इन बदसूरत झूठों की जड़ में RSS भी है,” उन्होंने कहा।

मुख्यमंत्री ने आरोप लगाया कि BJP और RSS एक दुर्भाग्यपूर्ण घटना का राजनीतिक फायदा उठाकर समाज को बाँटने की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने कहा, “वे विभाजन की राजनीति करना चाहते हैं और ‘फूट डालो, राज करो’ का खेल खेल रहे हैं, जो बेहद खतरनाक है।”

ममता बनर्जी ने यह भी दावा किया कि BJP और RSS उस सार्वभौमिक हिंदू धर्म को बदनाम करने की कोशिश कर रहे हैं, जिसमें उनके अनुसार सभी धर्म शामिल हैं, हिंदू, इस्लाम, ईसाई, बौद्ध, जैन और यहूदी धर्म।

ममता की यह प्रतिक्रिया उस समय आई, जब पश्चिम बंगाल के राज्यपाल सी वी आनंद बोस ने राज्य में फैली अराजकता को लेकर सरकार की कार्यप्रणाली की आलोचना करते हुए हालात को अजीब और बर्बर बताया था। वहीं, पश्चिम बंगाल विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष सुवेंदु अधिकारी ने भी कहा कि राज्य सरकार हिंसा को रोकने में पूरी तरह नाकाम रही।

निष्कर्ष

वक्फ संशोधन कानून के विरोध में हुई हिंसक प्रदर्शन को बहाना बनाकर दास परिवार के दो लोगों की हत्या की गई, जबकि उनका इस आंदोलन से कोई लेना-देना नहीं था। इस दौरान नाराज भीड़ ने पिता और बेटे की जान ले ली।

लेकिन इस घटना के बाद पुलिस की भूमिका पर सवाल उठाने या कानून-व्यवस्था पर सख्ती करने के बजाय मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने BJP और RSS पर निशाना साधा। आलोचकों का कहना है कि वह अपने वोट बैंक को नाराज नहीं करना चाहती थीं, जबकि उसी दौरान राज्य में हिंसा और अराजकता फैली हुई थी।

राज्य में दंगे हो रहे थे, हिंदुओं की जान जा रही थी, लेकिन ममता बनर्जी और तृणमूल कॉन्ग्रेस के नेता व्यवस्था बहाल करने के बजाय वक्फ संशोधन कानून के खिलाफ राजनीतिक बयानबाजी में लगे रहे।

बाद में जब हालात की गंभीरता सामने आई, तो मुख्यमंत्री ने अपनी सरकार और प्रशासन की कमियों पर ध्यान देने के बजाय BJP और RSS पर आरोप लगाना शुरू कर दिया, मानो जमीनी हालात उनकी सरकार की नाकामी का नतीजा न हों।

गूगल ने UP में शुरू की इमरजेंसी सर्विस, पुलिस-एम्बुलेंस तक पहुँचेगी आपकी लोकेशन: समझें- कैसे लोगों की जान बचाने में मिलेगी मदद

गूगल ने भारत में अपनी इमरजेंसी लोकेशन सर्विस (Google ELS) को चुपचाप लॉन्च कर दिया है। यह सर्विस आपातकालीन स्थितियों में लोगों की जान बचाने में बड़ा रोल निभाएगी। सबसे खास बात यह है कि इसे सबसे पहले उत्तर प्रदेश में शुरू किया गया है, जहाँ राज्य की 112 इमरजेंसी हेल्पलाइन से जोड़ा गया है। अब कोई भी एंड्रॉयड फोन यूजर यूपी में 112 डायल करेगा तो उसकी सटीक लोकेशन खुद-ब-खुद इमरजेंसी सेंटर तक पहुँच जाएगी।

यह फीचर एंड्रॉयड स्मार्टफोन में पहले से मौजूद है और अलग से कुछ करने की जरूरत नहीं पड़ती। जब यूजर 112 नंबर डायल करता है या इमरजेंसी मैसेज भेजता है, तो ELS अपने आप एक्टिव हो जाता है। यह GPS, वाई-फाई और मोबाइल नेटवर्क की मदद से लोकेशन का पता लगाता है और 50 मीटर के दायरे में सटीक जगह इमरजेंसी सर्विस को भेज देता है। भले ही कॉल कुछ सेकंड में कट जाए, लोकेशन फिर भी पहुँच जाती है।

फोन कटने के बाद भी पहुँच जाएगी सर्विस

उत्तर प्रदेश को पहले राज्य के तौर पर चुना गया क्योंकि यहाँ हर दिन लाखों इमरजेंसी कॉल और मैसेज आते हैं। पायलट टेस्टिंग के दौरान इस सर्विस ने 2 करोड़ से ज्यादा कॉल और मैसेज की लोकेशन सफलतापूर्वक पहचानने में मदद की। कई मामलों में कॉल कटने के बावजूद कंट्रोल रूम तक लोकेशन पहुँच गई। यह सर्विस उत्तर प्रदेश पुलिस और Pert Telecom Solutions के साथ मिलकर शुरू की गई है।

इमरजेंसी में परेशान लोग नहीं बता पाते सही जानकारी

अक्सर इमरजेंसी में लोग घबराहट या अनजान जगह होने की वजह से सही लोकेशन नहीं बता पाते। ऐसे में पुलिस या एम्बुलेंस को पहुँचने में देरी हो जाती है। Google ELS इसी समस्या का समाधान है। अब मदद माँगने वाले को लोकेशन बताने की टेंशन नहीं रहेगी। चाहे हादसा हो, मेडिकल इमरजेंसी हो या कोई खतरा, तुरंत सही जगह पर मदद पहुँच सकेगी।

नहीं होगा प्राइवेसी का हनन

प्राइवेसी को लेकर गूगल ने साफ किया है कि यह सर्विस पूरी तरह सुरक्षित है। ELS सिर्फ इमरजेंसी कॉल या मैसेज के समय ही एक्टिव होती है। लोकेशन फोन से सीधे इमरजेंसी सेंटर तक जाती है और गूगल खुद इसे नहीं देखता या स्टोर नहीं करता। यूजर्स की निजता का पूरा ख्याल रखा गया है। यह सर्विस मुफ्त है और कोई डेटा शेयर नहीं होता।

फिलहाल यह फीचर उत्तर प्रदेश में एंड्रॉयड 6.0 या उससे ऊपर वाले फोन पर उपलब्ध है। iOS यूजर्स के लिए अभी यह सर्विस नहीं आई है। गूगल ने कहा है कि जल्द ही इसे देश के बाकी राज्यों में भी लॉन्च किया जाएगा। राज्य सरकारों और लोकल अथॉरिटी के साथ मिलकर इसे धीरे-धीरे पूरे भारत में फैलाया जाएगा।

जान बचाने के मामले में गेम चेंजर साबित हो सकता है ये फीचर

ELS को ऑन करने के लिए यूजर्स को कुछ अलग नहीं करना पड़ता। जैसे ही 112 डायल करेंगे, फीचर खुद काम शुरू कर देगा। कोई ऐप डाउनलोड करने या सेटिंग बदलने की जरूरत नहीं। यह इनबिल्ट फीचर है जो बैकग्राउंड में रहता है और सिर्फ जरूरत पड़ने पर काम करता है।

सोशल मीडिया कंपनियाँ पहले से सुसाइड प्रिवेंशन जैसे मामलों में मदद करती रही हैं, लेकिन Google ELS फिजिकल इमरजेंसी के लिए सीधा और तेज समाधान है। खासकर ग्रामीण इलाकों या हाईवे पर जहाँ लोकेशन बताना मुश्किल होता है, यह जान बचाने वाली साबित होगी।

उत्तर प्रदेश पुलिस ने भी इस सर्विस का स्वागत किया है। इससे रिस्पॉन्स टाइम कम होगा और ज्यादा लोगों तक समय पर मदद पहुँच सकेगी। गूगल की यह पहल डिजिटल इंडिया के तहत सुरक्षा को मजबूत करने की दिशा में बड़ा कदम है।

इसरो ने सफलतापूर्वक लॉन्च किया दुनिया का सबसे बड़ा कमर्शियल कम्युनिकेशन सैटेलाइट ब्लूबर्ड ब्लॉक-2: जानें- कैसे मोबाइल टॉवर-ऑप्टिकल फाइबर के दिन होंगे पूरे

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने बुधवार (24 दिसंबर 2025) की सुबह सफलतापूर्वक अमेरिकी कंपनी एएसटी स्पेसमोबाइल के ब्लूबर्ड ब्लॉक-2 सैटेलाइट को अंतरिक्ष में स्थापित कर दिया।

यह लॉन्च इसरो के सबसे शक्तिशाली रॉकेट एलवीएम3-एम6 से सतीश धवन स्पेस सेंटर, श्रीहरिकोटा से हुआ। यह मिशन इसरो की कमर्शियल क्षमताओं का एक बड़ा प्रमाण है और भविष्य में इंटरनेट कनेक्टिविटी को पूरी तरह बदलने वाला साबित होगा।

लॉन्च की सफलता और तकनीकी विवरण

बुधवार की सुबह निर्धारित समय पर एलवीएम3 रॉकेट ने उड़ान भरी और लगभग 15 मिनट बाद ब्लूबर्ड ब्लॉक-2 सैटेलाइट को पृथ्वी की निम्न कक्षा (लो अर्थ ऑर्बिट-एलईओ) में सफलतापूर्वक पहुँचा दिया। यह कक्षा पृथ्वी से करीब 520-600 किलोमीटर की ऊँचाई पर है। सैटेलाइट का वजन लगभग 6100 किलोग्राम है, जो इसरो के इतिहास में एलईओ में भेजा गया अब तक का सबसे भारी कमर्शियल पेलोड है। इससे पहले का रिकॉर्ड नवंबर 2025 में लॉन्च किए गए सीएमएस-03 सैटेलाइट का था, जो करीब 4400 किलोग्राम का था।

यह मिशन न्यूस्पेस इंडिया लिमिटेड (एनएसआईएल) और एएसटी स्पेसमोबाइल के बीच हुए कमर्शियल समझौते का हिस्सा है। एलवीएम3 रॉकेट की यह छठी ऑपरेशनल फ्लाइट है और यह पूरी तरह सफल रही। रॉकेट की तीन स्टेज दो सॉलिड बूस्टर, लिक्विड कोर स्टेज और क्रायोजेनिक अपर स्टेज ने बखूबी काम किया। इसरो की वेबसाइट और यूट्यूब चैनल पर लाइव स्ट्रीमिंग के जरिए लाखों लोग इस ऐतिहासिक पल के गवाह बने।

ब्लूबर्ड ब्लॉक-2 सैटेलाइट की खासियतें

ब्लूबर्ड ब्लॉक-2 दुनिया का सबसे बड़ा कमर्शियल कम्युनिकेशन सैटेलाइट है। इसमें 223 वर्ग मीटर का फेज्ड ऐरे एंटीना लगा है, जो लो अर्थ ऑर्बिट में तैनात होने वाला सबसे बड़ा कमर्शियल ऐरे है। यह सैटेलाइट सामान्य स्मार्टफोन को सीधे स्पेस से हाई-स्पीड 4जी/5जी इंटरनेट प्रदान करेगा। यूजर्स को कोई अतिरिक्त एंटीना या स्पेशल डिवाइस की जरूरत नहीं पड़ेगी।

यह तकनीक सेलुलर ब्रॉडबैंड को पूरी दुनिया में पहुँचाएगी। चाहे जंगल हो, समुद्र हो, रेगिस्तान हो या बिजली गुल होने की स्थिति में कहीं भी मोबाइल फोन से हाई-स्पीड इंटरनेट, वॉयस कॉल, वीडियो कॉल और डेटा उपलब्ध होगा। एएसटी स्पेसमोबाइल पहले ही सितंबर 2024 में पांच ब्लूबर्ड सैटेलाइट लॉन्च कर चुकी है, जो अमेरिका और कुछ अन्य देशों में कवरेज दे रहे हैं। ब्लॉक-2 इनसे कई गुना बड़ा और शक्तिशाली है, जो 10 गुना ज्यादा डेटा कैपेसिटी प्रदान करेगा।

टावर और ऑप्टिकल फाइबर के दिन लदने वाले हैं

यह सैटेलाइट भविष्य में मोबाइल टावर और ऑप्टिकल फाइबर केबल को पुराना बना देगा। दुनिया भर में समुद्र तल पर बिछी लाखों किलोमीटर लंबी केबल नेटवर्क की जरूरत कम हो जाएगी, क्योंकि डेटा का फ्लो जमीन से हटकर स्पेस की ओर शिफ्ट हो जाएगा। एएसटी स्पेसमोबाइल का लक्ष्य स्पेस-बेस्ड सेलुलर ब्रॉडबैंड नेटवर्क बनाना है, जो दुनिया के 50 से ज्यादा मोबाइल ऑपरेटर्स के साथ पार्टनरशिप में काम करेगा। इससे अरबों लोग जो अभी इंटरनेट से वंचित हैं, जुड़ सकेंगे।

इसरो के लिए कमर्शियल महत्व

पूर्व इसरो चेयरमैन एस सोमनाथ ने कहा था कि यह वजन के लिहाज से सबसे बड़ा सैटेलाइट है और भारत के लिए कमर्शियल दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण मिशन है। इसरो ने अब तक 33 देशों के 430 से ज्यादा सैटेलाइट लॉन्च किए हैं, लेकिन ब्लूबर्ड ब्लॉक-2 सबसे भारी है। भारत का एलवीएम3 रॉकेट भारी पेलोड लॉन्च करने में सक्षम है, जो हमें ग्लोबल मार्केट में मजबूत बनाता है।

लॉन्चिंग का आखिरी चरण भी सफलतापूर्वक हुआ पूरा (फोटो साभार: YT/ISRO)

यह मिशन चंद्रयान-3 और वनवेब सैटेलाइट लॉन्च जैसी सफलताओं के बाद इसरो की विश्वसनीयता को और बढ़ाता है। भारत अब कमर्शियल लॉन्च में बड़ा खिलाड़ी बन रहा है।

ब्लूबर्ड ब्लॉक-2 का सफल लॉन्च इंटरनेट की दुनिया में क्रांति लाने वाला कदम है। अब हर जगह, हर समय हाई-स्पीड कनेक्टिविटी संभव हो जाएगी। इसरो की इस उपलब्धि पर पूरे देश को गर्व है। आने वाले समय में ऐसे और सैटेलाइट लॉन्च होकर ग्लोबल डिजिटल डिवाइड को खत्म करेंगे।

गुजरात के जिस सेवेन्थ डे स्कूल में मुस्लिम ने हिंदू छात्र की हत्या की, उसे सरकार ने नियंत्रण में लिया: अभिभावकों ने ऑपइंडिया का जताया आभार

गुजरात में मुस्लिम नाबालिग द्वारा हिंदू छात्र की हत्या के बाद चर्चा में आए सेवेन्थ डे स्कूल का नियंत्रण सरकार ने आधिकारिक तौर पर अपने हाथ में ले लिया है। अहमदाबाद नगर जिला शिक्षा अधिकारी (DEO) रोहित चौधरी को स्कूल का प्रशासक नियक्त किया गया है।

22 दिसंबर 2025 को जिला शिक्षा अधिकारी ने प्रशासक के रूप में कार्यभार संभाला। इस दौरान स्कूल के बाहर अभिभावक संघ और जनक संघर्ष समिति ने ढोल बजाकर और मिठाई बाँटकर जश्न मनाया। अभिभावकों ने नए प्रशासक का स्वागत किया और ऑपइंडिया को भी आभार व्यक्त किया।

DEO ने अभिभावकों को बताया कि अब से सरकार इस विद्यालय का प्रबंधन करेगी और छात्रों की शिक्षा और सुरक्षा संबंधी हितों को ध्यान में रखते हुए कार्य करेगी। उन्होंने यह भी कहा कि फिलहाल इस विद्यालय में कोई नया प्रवेश नहीं दिया जाएगा।

अभिभावकों ने क्या कहा?

मौके पर पहुँचे ऑपइंडिया से बातचीत करते हुए एक स्थानीय अभिभावक ने बताया कि सरकार ने शुरू से ही इस परियोजना का समर्थन किया है। शिक्षा अधिकारी समेत अन्य अधिकारी भी सहयोग कर रहे हैं। शिक्षा अधिकारी से हुई अपनी मुलाकात का जिक्र करते हुए उन्होंने बताया कि शिक्षा अधिकारी ने आश्वासन दिया है कि किसी भी बच्चे का भविष्य बर्बाद नहीं होगा और किसी को भी चिंता करने की जरूरत नहीं है।

एक अन्य स्थानीय व्यक्ति ने भी प्रदेश की बीजेपी सरकार और स्थानीय नेताओं के प्रति आभार व्यक्त किया। जनक संघर्ष समिति के अभिभावकों ने भी सरकार के इस फैसले का स्वागत किया और सरकार के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त की है।

एक अन्य अभिभावक ने कहा कि सेवन्थ डे स्कूल में जो घटना घटी, वह बेहद गंभीर थी और सरकार ने कठोर कार्रवाई करते हुए स्कूलों को चेतावनी दी है कि अगर अन्य स्कूल भी ऐसी गंभीर घटनाओं में शामिल पाए गए तो सरकार उनके खिलाफ भी इसी तरह की कार्रवाई करेगी। सिंधी समुदाय के एक नेता ने भी इस फैसले को हिंदू समुदाय की जीत बताया है।

वहीं दूसरे स्थानीय व्यक्ति ने बताया कि एक हिंदू छात्र की निर्मम हत्या का असर पूरे देश में फैल गया है, जिसके बाद पूरे हिंदू समुदाय ने आंदोलन किया। इन सभी मामलों पर विवाद बढ़ने पर सरकार ने भी कड़ी कार्रवाई शुरू की और स्कूल की जाँच के लिए एक समिति का गठन किया है।

इसके बाद जब अनियमितताएँ और कुप्रबंधन सामने आए, तो सरकार ने पूरे स्कूल का प्रशासन अपने हाथ में ले लिया और मिसाल कायम करने वाली कार्रवाई की। उन्होंने यह भी कहा कि इस स्कूल में न केवल सिंधी समुदाय का बल्कि हिंदू समुदाय के एक बेटे की भी हत्या हुई है, इसीलिए पूरा हिंदू समुदाय एकजुट होकर लड़ा।

इसके अलावा, अभिभावक परिषद के सदस्यों ने ऑपइंडिया के प्रति विशेष आभार व्यक्त किया है। उन्होंने कहा कि हत्या की घटना से लेकर स्कूल के सरकार द्वारा अधिग्रहण किए जाने तक, ऑपइंडिया ने बहुत सराहनीय कार्य किया है और विशेष कवरेज प्रदान की है। एक अन्य अभिभावक ने कहा कि ऑपइंडिया समाज और लोगों तक सही जानकारी पहुँचाने में सफल रहा है और इसके लिए वे भी आभारी हैं।

(यह रिपोर्ट मूलरूप से गुजराती भाषा में लिखी गई है, जिसे पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें।)

हिंदू डॉक्टर पर निकाह और धर्मांतरण का दबाव बनाने वाले रमीज को KGMU ने किया सस्पेंड, CM योगी ने दी पीड़िता को सुरक्षा: FIR के बाद हुआ फरार, पहली बीवी को भी कबूल करवाया था इस्लाम

लखनऊ के केजीएमयू में ‘मुस्लिम बनो और निकाह करो’ कहने वाले डॉक्टर रमीजुद्दीन नायक उर्फ रमीज मलिक पर योगी सरकार का एक्शन शुरू हो गया है। रेजिंडेंट डॉक्टर रमीजुद्दीन को सस्पेंड कर दिया गया है। उसके केजीएमयू में एंट्री पर बैन लगा दिया गया है। इससे पहले पीड़िता की तहरीर पर KGMU के रेजिडेंट डॉक्टर रमीजुद्दीन के खिलाफ चौक कोतवाली में मुकदमा दर्ज किया गया। आरोपित केजीएमयू की जाँच कमेटी के सामने पेश होने के बाद फिलहाल फरार बताया जा रहा है।

सीएम योगी से पीड़िता ने माँगी सुरक्षा

सोमवार (22 दिसंबर 2025) को पीड़िता से सीएम योगी ने फोन पर बात की थी। सीएम योगी ने बातचीत में निष्पक्ष जाँच का आश्वासन दिया था। उन्होंने पूरे मामले पर केजीएमयू प्रशासन से रिपोर्ट भी माँगी है। घटना के बाद पीड़िता को सुरक्षा दी जा रही है। 24 घंटे उसके साथ सिपाही रहता है। वर्कप्लेस पर सेक्सुअल हैरेसमेंट के लिए बनी विशाखा कमेटी ने कॉलेज प्रशासन को अपनी रिपोर्ट सौंप दी है। इसके आधार पर ही डॉक्टर रमीजुद्दीन को सस्पेंड किया गया है।

पश्चिम बंगाल की रहने वाली है पीड़िता डॉक्टर

पीड़िता डॉक्टर पश्चिम बंगाल की रहने वाली है। वह एमडी पैथोलॉजी कर रही हैं। उसका सीनियर डॉक्टर रमीजुद्दीन है। वह केजीएमयू में एमडी पैथोलॉजी थर्ड ईयर का स्टुडेंट है। रमीजुद्दीन उत्तराखंड का रहनेवाला है। उसके खिलाफ शुरुआती रिपोर्ट में सबूत मिले हैं।

दरअसल 17 दिसंबर को पीड़िता डॉक्टर ने कमरे में दवा की ओवरडोज लेकर आत्महत्या की कोशिश की थी। उन्हें केजीएमयू में ही भर्ती किया गया। परिवार को खबर दी गई। इसके बाद परिवार के लोग 19 दिसंबर को लखनऊ पहुँचे। उसके पिता भी डॉक्टर हैं।

प्रेम जाल में फँसा कर इस्लाम कबूलने का दबाव

डॉक्टर रमीजुद्दीन से पीड़िता की मुलाकात 2023 में हुई थी। दोनों के बीच दोस्ती हुई और फिर डॉक्टर रमीजुद्दीन ने उसे प्रेम जाल में फँसाया, फिर धर्मांतरण का दबाव बनाया। उसने कहा कि मुस्लिम बनो और निकाह करो। लड़की के मना करने पर वह उसे टॉर्चर करने लगा। दरअसल लड़की को डॉक्टर रमीजुद्दीन के शादीशुदा होने का पता उसकी पहली बीवी से ही मिली थी।

डॉक्टर रमीजुद्दीन ने इतना प्रताड़ित किया कि पीड़िता दवा का ओवरडोज लेकर आत्महत्या करने कोशिश की। पीड़िता कहती है कि फरवरी 2025 में डॉक्टर रमीजुद्दीन ने दूसरी हिन्दू लड़की को फँसाकर धर्मांतरण करवाया और फिर निकाह कर लिया।

सोमवार (22 दिसंबर 2025) को डॉक्टर रमीजुद्दीन जाँच कमेटी के सामने पेश हुआ। दरअसल वह जाँच से बचने के लिए बीमारी का बहाना बना रहा था। जाँच कमेटी ने कई बार डॉक्टर रमीजुद्दीन को फोन किया, लेकिन उसने फोन नहीं उठाया। अंत में व्हाट्सएप के जरिेए उसे मैसेज किया गया। तब उसने बीमारी का बहाना बना कर जाँच कमेटी के सामने उपस्थित होने में असमर्थता जाहिर की, लेकिन कमेटी नही मानी और उसे आना पड़ा।

डॉक्टर रमीजुद्दीन अपने पिता के साथ वहाँ पहुँचा। उसने खुद को बेगुनाह बताया। उसने ये भी दावा किया कि वह शादीशुदा नहीं है। इस पर उसे एफिडेविट देने के लिए कहा गया यानी उसे साबित करना है कि वह शादीशुदा नहीं है।

जाँच कमेटी में शामिल डॉक्टर केके सिंह के मुताबिक, आरोपित डॉक्टर रजीमुद्दीन का निकाह हुआ है या नहीं इसकी जाँच की जा रही है। हालाँकि उसने एडमिशन के वक्त खुद को अविवाहित करार दिया था। डॉक्टर के के सिंह के मुताबिक, जाँच रिपोर्ट के आधार पर ही उसे 24 घंटे के भीतर सस्पेंड किया गया है। यहाँ तक कि विश्वविद्यालय आने पर भी प्रतिबंध लगा दिया गया है। दरअसल डीन एकेडमिक्स प्रोफेसर डॉक्टर वीरेन्द्र आतम ने सस्पेंड करने का आदेश जारी किया।

आदेश में कहा गया है कि जाँच पूरी होने तक डॉक्टर रमीजुद्दीन कैंपस में एंट्री नहीं कर पाएगा। लेकिन उसके लखनऊ छोड़ने पर रोक लगी हुई है। क्योंकि जब जब जाँच कमेटी उसे बुलाएगी, उसे हाजिर होना पड़ेगा। इस दौरान केजीएमयू मुख्यालय में वह रहेगा। लेकिन पुलिस कह रही है कि वह फरार हो गया है।

घटना के बाद केजीएमयू के पैथोलॉजी विभाग के पीजी स्टूडेंट्स विभाग के अंदर हलचल कम दिख रही है। विभाग का काम सामान्य रूप से चल रहा है। लेकिन लोग आपस में इस मामले को लेकर धीरे धीरे बातें कर रहे हैं।

वीएचपी के समरेन्द्रजी के मुताबिक, केजीएमयू के पैथोलॉजी विभाग में ये पहला मामला नहीं है। पैथॉलोजी के नर्सिंग विभाग में एक मुस्लिम महिला ने अपने हिन्दू रूम पार्टनर पर दबाव डालकर निकाह पैथोलॉजी विभाग के ही मोहम्मद नफीस अहमद से करा दिया। यहाँ तक कि पैथोलॉजी विभाग ने डॉक्टर बिटिया पर इतना दबाव बनाया कि वह अपनी जान देने की कोशिश की।

लव जिहादियों सुधर जाओ, वरना राख कर दिया जाएगा-अपर्णा यादव

22 दिसंबर 2025 को पीड़िता अपने परिवार के साथ महिला आयोग के दफ्तर में उपाध्यक्ष अपर्णा यादव से मुलाकात की।

पीड़िता ने आपबीती बताते हुए कहा कि उसे बहुत प्रताड़ित किया गया। वह काफी डर गई थी। वह जुलाई से आरोपित के साथ रिलेशनशिप में थी। इस दौरान पता चला कि वह शादीशुदा है। उसने कहा कि उसने जब डॉक्टर रमीजुद्दीन से दूरी बनाने की कोशिश की, तो उसका शोषण किया गया। अब वह काफी दहशत में हैं। खुद की और परिवार की सुरक्षा को लेकर भी डर गई हैं।

उसकी बातें सुनकर अपर्णा यादव को गुस्सा आ गया। उन्होंने कहा कि लव जिहादियों सुधर जाओ, वरना एक-एक को राख कर दिया जाएगा। अपर्णा यादव ने आगे कहा कि लड़की को इतना प्रताड़ित किया गया कि वह अपनी जान लेने की कोशिश की।

अपर्णा यादव ने कहा, “जब माता सीता का अपहरण हुआ तो पूरे रावण कुल का नाश हो गया। जब द्रौपदी का चीरहरण हुआ तो कुरु वंश का नाश हुआ। हमारा दुर्भाग्य है कि भारत में लव जिहाद कर हिंदू बेटियों का जीवन बर्बाद किया जा रहा है। उन्होंने पीड़िता को न्याय दिलाने की बात कही और कहा कि कोर्ट में कड़ी सजा दिलवाने की कोशिश करेंगे।”

केजीएमयू के बाहर प्रदर्शन

एबीवीपी ने इस मुद्दे पर केजीएमयू के सामने धरना प्रदर्शन किया और कुलपति सोनिया नित्यानंद को ज्ञापन सौंपा। उसमें 15 दिनों के भीतर जाँच पूरी करने समेत कई माँगे हैं। इनके पूरी नहीं होने पर आंदोलन करने की धमकी दी गई है। मंगलवार (23 दिसंबर 2025) की शाम केजीएमयू कैंपस के गेट नंबर 1 पर नेशनल मेडिकोज संगठन यानी एनएमओ ने कैंडल मार्च निकाला है।

एबीवीपी की लखनऊ महानगर मंत्री सरिता पांडे ने कहा कि केजीएमयू जैसी संस्था में अगर धर्मांतरण के लिए दबाव डालकर लड़की को प्रताड़ित किया जा सकता है, तो दूसरे विश्वविद्यालय और शिक्षण संस्थान में क्या होता होगा।

SIR पर योगेंद्र यादव ने फिर फैलाया झूठ: जिनका हुआ निधन या जो चले गए उनके वोट कटने को बताया ‘अधिकार छीनना’, तमिलनाडु से 97 लाख नाम कटने पर रोना रोया

फेज-2 के बाद स्पेशल इंटेंसिव रिविजन (SIR) के तहत जैसे ही ड्राफ्ट मतदाता सूची जारी हुई तो कुछ लोगों ने उस पर नाराजगी जतानी शुरू कर दी। इस कथित नाराजगी का पहले से ही अनुमान लगाया गया था। विरोध करने वालों ने इसे ऐसे दिखाने की कोशिश की मानो चुनाव आयोग ने बीजेपी के साथ मिलकर लोगों से उनका वोट देने का हक छीन लिया हो।

21 दिसंबर को, खुद को न्यूज पोर्टल बताने वाले यूट्यूब चैनल ‘द रेड माइक’ से बातचीत करते हुए कॉन्ग्रेस से जुड़े वकील योगेंद्र यादव ने दावा किया कि SIR की वजह से तमिलनाडु में 97 लाख मतदाताओं के वोटिंग अधिकार खत्म हो गए हैं।

यह बात भारत निर्वाचन आयोग (ECI) द्वारा तमिलनाडु और गुजरात की ड्राफ्ट मतदाता सूची जारी करने के बाद कही गई। ECI के आँकड़ों के अनुसार, तमिलनाडु में 97.3 लाख नाम मतदाता सूची से हटाए गए हैं जबकि गुजरात में 73.7 लाख नाम हटाए गए।

आँकड़े सामने आते ही योगेंद्र यादव जैसे लोग यह कहने लगे कि बड़ी संख्या में लोगों से मतदान का अधिकार छीन लिया गया है। हकीकत यह है कि ये दावे आँकड़ों को सही तरह से समझने पर नहीं बल्कि सिर्फ बड़ी संख्या दिखाकर लोगों को डराने और गुमराह करने पर आधारित हैं। तथ्यों को ईमानदारी से देखने के बजाय ऐसे बयान सिर्फ भ्रम फैलाते हैं।

ड्राफ्ट रोल असल में क्या दिखाते हैं

तमिलनाडु में मतदाताओं की संख्या पहले 6.4 करोड़ थी, जो मौजूदा ड्राफ्ट सूची में घटकर 5.4 करोड़ रह गई है। यानी कुल 97.3 लाख नाम हटाए गए हैं। इनमें से 26.9 लाख मतदाताओं को मृत पाया गया।

लगभग 66.4 लाख ऐसे लोग थे जो या तो दूसरी जगह शिफ्ट हो चुके थे, लंबे समय से वहाँ नहीं रह रहे थे, या फील्ड जाँच के दौरान अपने पते पर नहीं मिले। वहीं, करीब 4 लाख नाम इसलिए हटाए गए क्योंकि वे एक से ज्यादा जगहों पर दर्ज पाए गए।

इसी तरह की स्थिति गुजरात में भी सामने आई। यहाँ मतदाताओं की संख्या 5.1 करोड़ से घटकर 4.3 करोड़ रह गई। कुल 73.7 लाख नाम सूची से हटाए गए। इनमें 18.1 लाख मतदाता मृत पाए गए जबकि करीब 51.8 लाख लोग अपने दर्ज पते पर नहीं मिले या दूसरी जगह जा चुके थे। इसके अलावा, लगभग 3.8 लाख नाम एक से अधिक स्थानों पर दर्ज होने के कारण हटाए गए।

वहीं, तमिलनाडु में 1.2 करोड़ मतदाताओं के नाम नोटिस के लिए चिह्नित किए गए हैं। ये नाम मतदाता सूची से हटाए नहीं गए हैं। दरअसल, इनमें रिकॉर्ड से जुड़ी कुछ गड़बड़ियाँ पाई गई हैं, जैसे माता-पिता और बच्चों की उम्र में असामान्य अंतर या एक ही माता-पिता से बहुत अधिक बच्चों का दर्ज होना। ये केवल जाँच के संकेत हैं, न कि नाम हटाने की कोई कार्रवाई।

लोकतांत्रिक प्रक्रिया को कमजोर करने की साजिश

चुनाव आयोग (ECI) ने जो डेटा स्पष्ट रूप से दिया है, उसके बावजूद योगेंद्र यादव जैसे कुछ एक्टिविस्ट जो अक्सर ऐसे मामलों पर डर फैलाते हैं, यह दावा कर रहे हैं कि मतदाता हटाने का काम जानबूझकर और बिना वजह किया गया। ऐसे दावे भ्रामक हैं और गंभीर खतरा पैदा करते हैं क्योंकि इससे आम लोगों के मन में यह गलत संदेश जाता है कि चुनाव आयोग लोकतांत्रिक प्रक्रिया को कमजोर करने के इरादे से काम कर रहा है।

यादव का निष्कर्ष डेटा की सही व्याख्या से नहीं निकला है। नाम हटाने का मुख्य कारण यह रहा कि संबंधित मतदाता या तो अब मौजूद नहीं थे, अपने दर्ज पते पर नहीं रहते थे, या फिर एक से अधिक जगह पंजीकृत पाए गए। एक ही व्यक्ति के कई पंजीकरण होने की स्थिति में केवल एक वोटर ID ही मान्य होती है, बाकी को रद्द किया जाता है। यह प्रक्रिया ECI द्वारा मतदाता धोखाधड़ी रोकने के लिए जरूरी और तय नियमों के तहत की जाती है।

स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन एक संवैधानिक प्रक्रिया है

SIR यानी मतदाता सूची का संशोधन कोई नई या असामान्य प्रक्रिया नहीं है। यह संविधान के तहत नियमित रूप से किया जाने वाला काम है, जिसका मकसद मतदाता सूची को सही और अपडेट रखना होता है। अगर ऐसी समीक्षा न हो, तो सूची में मृत मतदाताओं के नाम, दूसरी जगह जा चुके लोगों की एंट्री और डुप्लीकेट नाम लगातार बने रहते हैं। समय के साथ जब ऐसी गलतियाँ बढ़ती जाती हैं, तो चुनाव प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े होने लगते हैं।

SIR को लोकतंत्र पर हमला कहना खतरनाक है। इससे लोगों का भरोसा उसी प्रक्रिया से उठ सकता है, जिसे चुनावों को निष्पक्ष, पारदर्शी और सुरक्षित बनाए रखने के लिए बनाया गया है।

समाधान पर ध्यान नहीं, समस्या पर गढ़ी जा रही कहानी

चुनाव आयोग ने साफ तौर पर बताया है कि 18 जनवरी 2026 तक मतदाता या राजनीतिक दलों के बूथ स्तर के एजेंट शिकायत और आपत्ति दर्ज करा सकते हैं। अगर कोई योग्य मतदाता मानता है कि उसका नाम गलत तरीके से चिह्नित किया गया है, तो उसे तय समय सीमा के भीतर शिकायत करने का पूरा अधिकार है। इसके बावजूद सार्वजनिक बहस में प्रक्रिया और तथ्यों पर बात करने के बजाय डर फैलाने और मनगढ़ंत कहानी गढ़ने को ज्यादा तरजीह दी जा रही है।

लोकतंत्र में सटीकता की जरूरत होती है, बढ़ा-चढ़ाकर बताने की नहीं

चुनावी सुधार कभी भी दिखावटी या आकर्षक नहीं होते और मतदाता सूची की जाँच को अक्सर गलत तरीके से पेश किया जाता है। कभी-कभी इसे जानबूझकर योगेंद्र यादव जैसे एक्टिविस्ट और राहुल गाँधी जैसे नेता गलत रंग से पेश करते हैं।

जब सामान्य प्रक्रिया के तहत होने वाले मतदाता सूची सुधार को जानबूझकर वोटरों को हटाने की साजिश बताया जाता है, तो सच और अफवाह के बीच फर्क मिटने लगता है। ऐसे बयान असली प्रक्रिया पर बेवजह शक पैदा करते हैं और लोगों को भ्रमित करते हैं और यही इनका मकसद होता है।

(मूल रूप से ये खबर अंग्रेजी टीम के अनुराग ने लिखी है, जिस इस लिंक पर क्लिक करे पढ़ सकते हैं)