31 मार्च 2026… यह सिर्फ एक तारीख नहीं, बल्कि भारत के आंतरिक सुरक्षा इतिहास में एक निर्णायक लक्ष्य है- ‘नक्सल मुक्त भारत’। केंद्र सरकार, सुरक्षा एजेंसियाँ और राज्य सरकारें पिछले एक दशक से इस दिशा में लगातार और सुनियोजित तरीके से आगे बढ़ रही हैं। अब जब नक्सलवाद अपने अंतिम गढ़ों तक सिमट चुका है, तो सरकार ने सिर्फ इसे हराने तक खुद को सीमित नहीं रखा, बल्कि यह भी सुनिश्चित करने की तैयारी कर ली है कि वामपंथी आतंकवाद दोबारा सिर न उठा सके।
सरकार ने इसके लिए विस्तृत एजेंडा बनाया है जिनमें अर्बन नक्सलियों पर लगाम लगाना भी शामिल है। सरकार के इस एजेंडा पर विस्तार से चर्चा करें उससे पहले बताते हैं कि किस तरह सरकार इस नक्सलियों के खात्मे के लिए पूरी तरह कमर कस चुकी है। 14 जनवरी 2026 को ही छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले में 29 नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया है। ये सरकार की नक्सलवाद के खिलाफ लड़ाई लड़ाई का एक मामूली हिस्सा है आँकड़े पर गौर करें तो दिखता है कि किस तरह बीते वर्ष में नक्सलवाद पर सबसे बड़ा प्रहार किया गया था।
नक्सली हिंसा में ऐतिहासिक गिरावट
पिछले एक दशक में सुरक्षा बलों और सरकार की साझा कोशिशों से नक्सली हिंसा में 53 प्रतिशत की बड़ी कमी दर्ज की गई है। अगर पिछले दो दशकों की तुलना करें तो साल 2004 से 2014 के बीच जहाँ हिंसा की 16,463 घटनाएँ हुई थीं, वहीं 2014 से 2024 के बीच यह घटकर 7,744 रह गईं। इस दौरान सुरक्षाकर्मियों की शहादत में 73 प्रतिशत (1,851 से घटकर 509) और आम नागरिकों की जान जाने की घटनाओं में 70 प्रतिशत (4,766 से घटकर 1,495) की भारी गिरावट आई है, जो प्रभावित इलाकों में लौटती शांति का स्पष्ट संकेत है।
साल 2025: ऑपरेशंस और सरेंडर के बड़े आँकड़े
अकेले साल 2025 की बात करें तो सुरक्षाबलों ने 270 नक्सली उग्रवादियों को मुठभेड़ में ढेर किया है। इसके साथ ही 680 नक्सलियों को गिरफ्तार किया गया और 1,225 नक्सलियों को आत्मसमर्पण करने के लिए मजबूर किया गया। ‘ऑपरेशन ब्लैक फॉरेस्ट’ जैसे अभियानों और बीजापुर, छत्तीसगढ़ व महाराष्ट्र में हुए बड़े एनकाउंटर्स ने नक्सलियों की कमर तोड़ दी है। अक्टूबर 2025 तक के आँकड़े बताते हैं कि मुख्यधारा में लौटने वाले नक्सलियों की संख्या में तेजी से इजाफा हुआ है।
मध्य प्रदेश: लाल आतंक से पूरी तरह मुक्त
दिसंबर 2025 में एक ऐतिहासिक घोषणा हुई जब मुख्यमंत्री मोहन यादव ने मध्य प्रदेश को ‘नक्सल मुक्त’ घोषित किया। बालाघाट में अंतिम दो बड़े नक्सलियों, दीपक (29 लाख इनामी) और रोहित (14 लाख इनामी) के आत्मसमर्पण ने इस राज्य से वामपंथी उग्रवाद का नामो-निशान मिटा दिया। यह इस बात का प्रमाण है कि यदि सरकार का संकल्प दृढ़ हो और एजेंसियाँ सतर्क हों, तो दशकों पुरानी समस्या का अंत संभव है।
मिशन 2026: गोलियों से नहीं, अब विकास और तकनीक से होगा ‘लाल आतंक’ का अंत
ET की रिपोर्ट के मुताबिक, केंद्र सरकार ने 31 मार्च 2026 तक भारत को नक्सल मुक्त बनाने के लिए एक दमदार ’10-सूत्रीय’ फॉर्मूला तैयार किया है। रोडमैप का पहला हिस्सा सुरक्षा के मोर्चे पर एक बड़े बदलाव का संकेत देता है। अब ध्यान ‘संघर्ष प्रतिक्रिया’ से हटकर ‘दीर्घकालिक शांति’ पर है। इसके तहत केंद्रीय अर्धसैनिक बलों (CAPF) की जगह धीरे-धीरे राज्य पुलिस को कमान सौंपी जा रही है।
डेटा के अनुसार, पिछले 10 वर्षों में 576 किलेनुमा पुलिस स्टेशन बनाए गए हैं और 336 नए सुरक्षा कैंप स्थापित किए गए हैं। साथ ही, नक्सलियों की फंडिंग रोकने के लिए NIA, ED और आयकर विभाग को समन्वित जाँच का जिम्मा दिया गया है। NIA ने अब तक नक्सलियों की ₹40 करोड़ और ED ने ₹12 करोड़ की संपत्ति जब्त की है, जिससे उनके वित्तीय नेटवर्क की कमर टूट गई है। शहरी क्षेत्रों में छिपे ‘अर्बन नक्सलियों’ और उनके फ्रंट संगठनों की पहचान कर उन्हें प्रतिबंधित करने की प्रक्रिया भी तेज कर दी गई है।
आँकड़े बताते हैं कि नक्सल प्रभावित 38 प्राथमिकता वाले जिलों में गरीबी दर 20% से अधिक है, जबकि राष्ट्रीय औसत 15% है। सुकमा, मलकानगिरी और पश्चिम सिंहभूम जैसे जिलों में तो यह 40% से भी ऊपर है। इसे देखते हुए सरकार ने 137 केंद्रीय योजनाओं को इन क्षेत्रों में शत-प्रतिशत लागू करने का लक्ष्य रखा है।
कनेक्टिविटी के मोर्चे पर 17,589 किमी सड़कों के लिए ₹20,815 करोड़ स्वीकृत किए गए हैं, जिसमें से 12,000 किमी का काम पूरा हो चुका है। संचार क्रांति के लिए 8,527 4G टावर मंजूर किए गए हैं। ड्रोन तकनीक के जरिए ‘स्वामित्व योजना’ को गति दी जा रही है ताकि हर ग्रामीण परिवार के पास अपनी जमीन का डिजिटल रिकॉर्ड हो, जिससे भूमि विवाद और नक्सलियों के बहकावे की गुंजाइश खत्म हो जाए।
बस्तर जैसे क्षेत्रों के आर्थिक विश्लेषण से पता चला है कि 70% घरों की आय ₹10,000 से कम है। रोडमैप का लक्ष्य इस मासिक आय को बढ़ाकर ₹25,000-30,000 तक ले जाना है। इसके लिए कौशल विकास और बाजार संपर्कों को मजबूत किया जा रहा है। अक्टूबर 2025 तक 1,225 नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया है, जिन्हें पुनर्वास नीति के तहत ₹5 लाख तक की आर्थिक मदद और ₹10,000 का मासिक वजीफा दिया जा रहा है। बस्तरिया बटालियन (1,143 जवान) जैसे प्रयोगों ने स्थानीय युवाओं को ‘बंदूक’ की जगह ‘वर्दी’ और ‘सम्मान’ की राह दिखाई है। सरकार का यह ‘ममता और कठोरता’ वाला मिश्रण नक्सलियों के भर्ती आधार को पूरी तरह खत्म कर रहा है।
हिंसा के विचार का अंत और भारत का नया सवेरा
इस रोडमैप की सबसे बड़ी ताकत इसका ‘पोस्ट-LWE’ विजन है। अतीत में हमने देखा है कि सुरक्षा बल जब किसी क्षेत्र को खाली कराते थे, तो शासन की अनुपस्थिति में नक्सली फिर लौट आते थे। लेकिन अब ‘सड़क, स्कूल और सुशासन’ की तिगड़ी ने उन दरारों को भर दिया है। NIA और ED के जरिए उनके ‘अर्बन इकोसिस्टम’ पर चोट करना एक मास्टरस्ट्रोक है, क्योंकि लाल आतंक को ऑक्सीजन शहरों के वातानुकूलित कमरों में बैठे बौद्धिक मददगारों से ही मिलती थी।
आज जब बस्तर के अबूझमाड़ में तिरंगा लहराता है और बालाघाट नक्सल मुक्त होता है, तो यह संदेश स्पष्ट है- ‘लोकतंत्र में हिंसा के लिए कोई स्थान नहीं है।’ 2026 तक भारत की धरती वामपंथी आतंकवाद से पूरी तरह मुक्त होगी और यह आने वाली पीढ़ियों के लिए एक ऐसा सुरक्षित भारत होगा जहाँ विकास की धारा हर उस अंतिम छोर तक पहुँचेगी जिसे नक्सलियों ने कभी ‘अंधेरा’ बनाए रखा था।
आज के डिजिटल दौर में, जहाँ हर पल मोबाइल की घंटी और स्क्रीन की रोशनी जिंदगी पर हावी है, वहाँ हिमाचल प्रदेश की ऊझी घाटी एक अलग ही तस्वीर पेश करती है। कुल्लू जिले में मनाली से सटी इस घाटी के नौ गाँव आज भी अपनी सदियों पुरानी देव परंपराओं को उसी अनुशासन के साथ निभाते हैं। यहाँ आस्था किसी प्रतीक तक सीमित नहीं है बल्कि जीवन की दिनचर्या का हिस्सा है, जो समय और तकनीक दोनों से परे जाकर अपनी जगह बनाए हुए है।
हर साल मकर संक्रांति से शुरू होकर पूरे 42 दिनों तक इन गाँवों में स्वेच्छा से सन्नाटा छा जाता है। इस दौरान न टीवी चलता है, न रेडियो, न डीजे और न ही किसी तरह का शोर-शराबा। मोबाइल फोन साइलेंट मोड में रखे जाते हैं, ऊँची आवाज में बात करना वर्जित होता है और खेतों में काम तक रोक दिया जाता है। मंदिरों के कपाट बंद रहते हैं और घंटियों को कपड़े से बांध दिया जाता है ताकि देवताओं की तपस्या में कोई विघ्न न पड़े।
यह सब किसी सरकारी आदेश या प्रशासनिक दबाव से नहीं होता। यह अनुशासन यहाँ के आराध्य देवी-देवताओं के आदेश से जुड़ा माना जाता है, जिसे गाँववाले पूरी श्रद्धा के साथ निभाते हैं। ऊझी घाटी की यह परंपरा इस बात का जीवंत प्रमाण है कि जब आस्था गहरी हो, तो आधुनिकता उसे कमजोर नहीं करती बल्कि उसके साथ सह-अस्तित्व में रहकर भी शांति और संतुलन बनाए रखती है।
क्या है यह देव परंपरा, जो 42 दिन तक गाँवों को कर देता है खामोश?
ऊझी घाटी के इन गाँवों में मान्यता है कि मकर संक्रांति के दिन से गाँवों के आराध्य देवता गौतम ऋषि, ब्यास ऋषि, कंचन नाग और नाग देवता तपस्या में लीन हो जाते हैं और स्वर्ग प्रवास पर चले जाते हैं।
देवताओं की तपस्या को भंग न किया जाए, इसके लिए गाँवों में पुरी तरह शांति बनाए रखना अनिवार्य हो जाता है। इसी कारण मनोरंजन, शोर-शराबा, खेती-बाड़ी और यहाँ तक कि मंदिरों में नियमित पूजा भी रोक दी जाती है।
(फोटो साभार – न्यूज 18)
गोशाल गाँव में मकर संक्रांति के दिन विधिवत पूजा-अर्चना के बाद देवालयों के कपाट बंद कर दिए जाते हैं। मंदिरों की घंटियों को कपड़े से बांध दिया जाता है ताकि गलती से भी कोई घंटी न बज जाए। यह रोक 42 दिनों तक यानी फागली उत्सव तक लागू रहता है।
स्थानीय मान्यता के अनुसार, यदि इस दौरान देव आदेश का उल्लंघन हुआ तो प्राकृतिक आपदाएँ, फसल खराब होना या गाँव में अशांति जैसी घटनाएँ हो सकती हैं। यही कारण है कि ग्रामीण इस परंपरा को पूरी गंभीरता से निभाते हैं।
किन गाँवों में लागू होता है देव प्रतिबंध?
कुल्लू जिले की ऊझी घाटी के नौ गाँव गोशाल, कोठी, सोलंग, पलचान, रुआड़, कुलंग, शनाग, बुरुआ और मझाच में देव परंपरा के तहत विशेष प्रतिबंध लागू रहते हैं। इन गाँवों के लोग अपने आराध्य देवताओं के आदेश को सामूहिक रूप से और पूरी आस्था के साथ निभाते हैं।
इन नियमों के तहत कहीं मनोरंजन के सभी साधन बंद रहते हैं, तो कहीं कृषि कार्य पूरी तरह निषिद्ध होता है। कुछ गाँवों में दोनों तरह की पाबंदियाँ एक साथ लागू होती हैं। गोशाल में टीवी, रेडियो और अन्य मनोरंजन साधनों पर पूर्ण रोक रहती है जबकि अन्य गाँवों में खेतों में काम करने या गोशालाओं से गोबर निकालने तक की अनुमति नहीं होती।
आधुनिक समय में भी इन गाँवों में 42 दिनों तक मोबाइल फोन का उपयोग बेहद सीमित रहता है। फोन केवल जरूरी कामों के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं और सभी लोग उन्हें साइलेंट मोड पर रखते हैं।
घंटी बजना, रील्स या वीडियो चलाना, तेज आवाज में गाने सुनना, लाउडस्पीकर, डीजे या रेडियो का उपयोग पूरी तरह से रोक लग जाता है। यहाँ तक कि सीटी बजाना या ऊँची आवाज में बात करना भी देव आदेश का उल्लंघन माना जाता है। इस समय खेती-बाड़ी से जुड़े सभी कार्य रोक दिए जाते हैं। किसान न तो खुदाई करते हैं, न जुताई और न ही किसी अन्य कृषि गतिविधि में शामिल होते हैं। इन सभी नियमों का पालन ग्रामीण बिना किसी सवाल के श्रद्धा और अनुशासन के साथ करते हैं।
मंदिरों में नहीं होती पूजा
इस देव परंपरा की सबसे अनोखी बात यह है कि 42 दिनों तक मंदिरों में नियमित पूजा भी नहीं होती। गोशाल गाँव में कंचन नाग, गौतम ऋषि और ब्यास ऋषि के मंदिरों के कपाट विधिवत पूजा के बाद बंद कर दिए जाते हैं। इसी तरह सिमसा गाँव में देवता कार्तिक स्वामी के मंदिर के कपाट भी मकर संक्रांति से 12 फरवरी तक बंद रहते हैं।
फोटो साभार – न्यूज 18
मंदिरों में लगी घंटियों को कपड़े से बांध दिया जाता है ताकि कोई श्रद्धालु गलती से भी घंटी न बजा दे। यह सब देवताओं को पूर्ण शांति देने के उद्देश्य से किया जाता है।
42 दिन बाद फागली उत्सव और देवताओं की भविष्यवाणी
42 दिनों का यह देव प्रतिबंध फागली उत्सव के साथ समाप्त होता है। इसी दिन देवताओं के स्वर्ग प्रवास से लौटने की मान्यता है। इस मौके पर गाँवों में भव्य उत्सव आयोजित किया जाता है। देवताओं का जोरदार स्वागत होता है और देव वाद्य यंत्रों की गूंज से घाटी फिर से जीवंत हो उठती है।
मान्यता है कि देवता लौटकर आने वाले साल में होने वाली घटनाओं के बारे में भविष्यवाणी भी करते हैं। मंदिर के अंदर मूर्ति पर लगाए गए मिट्टी के लेप को हटाया जाता है, जिसमें से कुमकुम, अनाज के दाने, सेब के पत्ते जैसी चीजें निकलती हैं। इन्हीं संकेतों के आधार पर सालभर की भविष्यवाणी की जाती है।
गुजरात की धरती हमेशा से उद्यमिता और व्यापारिक समझ के लिए जानी जाती रही है। जब वर्ष 2003 में तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘वाइब्रेंट गुजरात’ की नींव रखी थी, तब शायद ही किसी ने कल्पना की होगी कि यह पहल एक दिन क्षेत्रीय स्तर तक पहुँचेगी और अरबों रुपये के निवेश को आकर्षित करेगी। जनवरी 2026 में राजकोट स्थित मारवाड़ी विश्वविद्यालय में आयोजित ‘वाइब्रेंट गुजरात रीजनल कॉन्फ्रेंस’ (VGRC) ने यह साबित कर दिया कि गुजरात का विकास इंजन अब केवल महानगरों तक सीमित नहीं रहा बल्कि सौराष्ट्र और कच्छ के दूरदराज इलाकों तक फैल चुका है।
गौरतलब है कि वाइब्रेंट गुजरात समिट का 10वां संस्करण वर्ष 2024 में आयोजित हुआ था, जिसमें 41,299 परियोजनाओं के लिए कुल 26.33 लाख करोड़ रुपए के MoU (समझौता ज्ञापन) पर हस्ताक्षर किए गए थे। प्री-समिट और समिट को मिलाकर कुल 98,540 परियोजनाओं के लिए 45.2 लाख करोड़ रुपए से अधिक के निवेश प्रस्ताव आए थे, जिससे करीब 81 लाख रोजगार सृजित होने की संभावना बनी थी।
इसके बाद वाइब्रेंट गुजरात समिट का 11वाँ संस्करण वर्ष 2026 में प्रस्तावित था लेकिन राज्य सरकार ने क्षेत्रीय क्षेत्रों पर विशेष फोकस के लिए इस समिट को क्षेत्रीय स्तर तक विस्तार देने का फैसला किया। इसी कड़ी में सौराष्ट्र-कच्छ के लिए VGRC का आयोजन पहले अक्टूबर 2025 में उत्तर गुजरात के मेहसाणा में और फिर 11-12 जनवरी 2026 को राजकोट में किया गया। अब राज्य स्तरीय वाइब्रेंट गुजरात समिट वर्ष 2027 में आयोजित किया जाएगा।
अक्टूबर 2025 में आयोजित पहले VGRC में 1,212 MoU पर हस्ताक्षर हुए थे और इसमें 3.24 लाख करोड़ रुपए के निवेश प्रस्ताव प्राप्त हुए थे। वहीं हाल ही में सौराष्ट्र-कच्छ में आयोजित VGRC में ब्लू इकॉनमी, ग्रीन स्टार्टअप्स, शिपबिल्डिंग, सिरेमिक उद्योग और पर्यटन जैसे क्षेत्रों पर विशेष ध्यान दिया गया। इंजीनियरिंग और ऑटो पार्ट्स के प्रमुख केंद्र के रूप में पहचान रखने वाले राजकोट को इस सम्मेलन के जरिए अंतरराष्ट्रीय बाजार से जोड़ने का प्रयास किया गया। यह सम्मेलन राजकोट-मोरबी हाईवे पर स्थित मारवाड़ी विश्वविद्यालय परिसर में आयोजित किया गया, जहाँ 55 एकड़ क्षेत्र में 6 प्रदर्शनी डोम और एक मुख्य इनोवेशन हॉल तैयार किया गया था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 11 जनवरी को इस वाइब्रेंट गुजरात रीजनल कॉन्फ्रेंस का उद्घाटन किया।
VGRC के खत्म होने के बाद सामने आए आँकड़े
यह कच्छ-सौराष्ट्र के 12 जिलों को कवर करने वाला पहला कॉन्फ्रेंस था, जिसमें 24 देशों के रिप्रेजेंटेटिव, 4,000 से ज्यादा एंटरप्रेन्योर, 450 से ज्यादा एग्जिबिटर और 29,000 रजिस्ट्रेशन आए। इसके अलावा 2,200 से ज्यादा B2B/B2G मीटिंग हुईं। इसके बाद ₹5.78 लाख करोड़ के 5,492 MoU साइन हुए हैं। राज्य के डिप्टी चीफ मिनिस्टर हर्ष सांघवी ने इस बारे में जानकारी देते हुए एक पोस्ट शेयर किया है।
ऑटो, इंजीनियरिंग और उससे जुड़े सेक्टर में 381 करोड़ रुपए के 5 MoU
सिरेमिक मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में 1,460 करोड़ रुपए के 5 MoU
एयरोस्पेस और डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में 1,650 करोड़ रुपए के 3 MoU
स्किल डेवलपमेंट और MSME कैपेसिटी बिल्डिंग में 0.22 करोड़ रुपए के 4 MoU
ब्लू बायोइकोनॉमी (बायोफ्यूल, फंक्शनल फूड और न्यूट्रास्यूटिकल्स) सेक्टर में 261 करोड़ रुपए के 13 MoU
ग्रीन AI डेटा सेंटर और डीप टेक सेक्टर में 9 करोड़ रुपए के 2 MoU साइन किए गए हैं।
समापन समारोह में कैबिनेट मंत्री जीतू वाघाणी द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार, वर्ष 2003 में आयोजित पहले वाइब्रेंट गुजरात के दौरान केवल 80 एमओयू पर हस्ताक्षर हुए थे, जिनकी कुल निवेश राशि 66,000 करोड़ रुपए थी। इसके मुकाबले राजकोट में आयोजित इस क्षेत्रीय वाइब्रेंट गुजरात सम्मेलन में 5,492 एमओयू पर हस्ताक्षर किए गए हैं, जिनकी कुल निवेश राशि 5.78 लाख करोड़ रुपए है।
उन्होंने कहा कि ये आँकड़े और कई देशों की भागीदारी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर देश-विदेश के निवेशकों के अटूट विश्वास को दर्शाती है। जीतू वाघाणी ने आगे कहा कि प्रधानमंत्री के नेतृत्व में आत्मनिर्भर भारत, स्टार्टअप इंडिया और मेक इन इंडिया जैसी पहलें जमीनी स्तर पर साकार हो रही हैं, जिसका सीधा लाभ गुजरात के उद्योगपतियों और औद्योगिक इकाइयों को मिलेगा।
सौराष्ट्र-कच्छ पर सरकार के फोकस के पीछे स्ट्रेटेजिक कारण
गुजरात सरकार जानबूझकर सौराष्ट्र और कच्छ क्षेत्र को आगे बढ़ा रही है, क्योंकि इन इलाकों में अपार संभावनाएं मौजूद हैं। गुजरात की कुल समुद्री तटरेखा लगभग 1,600 किलोमीटर लंबी है जिसमें से 70% से अधिक हिस्सा सौराष्ट्र और कच्छ में आता है। यह तटरेखा दुबई, यूरोप और अफ्रीका जैसे वैश्विक बाजारों तक पहुँच का भारत का प्रमुख प्रवेश द्वार मानी जाती है। अहमदाबाद या सूरत की तुलना में सौराष्ट्र और विशेष रूप से कच्छ में बड़े पैमाने पर जमीन उपलब्ध है, जो सोलर पार्क या स्टील प्लांट जैसे मेगा प्रोजेक्ट्स के लिए बेहद जरूरी है।
सम्मेलन को संबोधित करते हुए मंत्री अर्जुन मोढवाडिया ने कहा कि कच्छ-सौराष्ट्र के लोगों में उद्यमिता की मजबूत भावना है। सरकार अब इस उद्यमिता को ‘इन्फ्रास्ट्रक्चर’ और ‘नीतिगत प्रोत्साहन’ के जरिए वैश्विक स्तर तक ले जा रही है। उन्होंने बताया कि मोरबी भारत के कुल सिरेमिक उत्पादन का 90% हिस्सा देता है और वैश्विक स्तर पर दूसरे स्थान पर है। इसी कारण इस क्षेत्र को VGRC में एक विशेष जोन के रूप में प्रदर्शित किया गया, जहाँ आयोजित सेमिनार में 1,460 करोड़ रुपए के एमओयू पर हस्ताक्षर किए गए।
ये MoU एडवांस्ड टेक्नोलॉजी, ऑटोमेशन, एनर्जी एफिशिएंसी और वेस्ट रीसाइक्लिंग के जरिए प्रोडक्शन कॉस्ट कम करेंगे, ग्लोबल कॉम्पिटिटिवनेस बढ़ाएँगे और एक्सपोर्ट बढ़ाएँगे। इस सेक्टर में वर्तमान में 10,000 से 12,000 लोगों को रोजगार मिलता है, जिनमें करीब 60% महिलाएँ हैं, और इन नए निवेशों से इस रोजगार आधार को और मजबूती मिलेगी। इसके अलावा, प्रस्तावित नया सिरेमिक पार्क वैल्यू-एडेड उत्पादों और आधुनिक विनिर्माण को बढ़ावा देगा।
इंजीनियरिंग उद्योग से लेकर ग्रीन एनर्जी तक
राजकोट का इंजीनियरिंग उद्योग अब ‘न्यू एज टेक्नोलॉजी’ से जुड़ रहा है। अब तक राजकोट पंप और ऑटो पार्ट्स के लिए जाना जाता था लेकिन सेमीकंडक्टर हब बनने के साथ यहाँ की छोटी इकाइयाँ हाई-टेक चिप मैन्युफैक्चरिंग की सप्लाई चेन का हिस्सा बनेंगी। इससे इंजीनियरिंग के छात्रों को विदेश जाने के बजाय राजकोट में ही लाखों रुपए के पैकेज मिलने का रास्ता खुलेगा।
इसके अलावा गुजरात का लक्ष्य वर्ष 2030 तक 100 GW रिन्यूएबल एनर्जी क्षमता विकसित करने का है तो ऐसे में इस सेक्टर में हुए MoUs से बड़ा लाभ होगा। ग्रीन हाइड्रोजन, सोलर, विंड और ओशन एनर्जी से ऊर्जा सुरक्षा मजबूत होगी, कार्बन उत्सर्जन घटेगा और खासकर ग्रामीण इलाकों में हजारों कुशल रोजगार पैदा होंगे। गाँवों में बिजली की स्थिरता बढ़ेगी और आय के नए स्रोत बनेंगे। ग्रीन हाइड्रोजन सेक्टर में निवेश से भविष्य में कच्छ ‘एनर्जी कैपिटल’ के रूप में उभरेगा।
द्वारका, सोमनाथ और पोरबंदर के समुद्र तटों को ‘क्रूज टूरिज्म’ के लिए विकसित किया जा रहा है। इससे पर्यटन बढ़ेगा और स्थानीय हस्तशिल्प, परिवहन और हॉस्पिटैलिटी सेक्टर में उल्लेखनीय वृद्धि होगी। इसके अलावा, कच्छ-सौराष्ट्र के बंदरगाह भारत के प्रमुख गेटवे हैं। निर्यात बढ़ने से परिवहन लागत घटेगी और वैश्विक व्यापार में भागीदारी बढ़ेगी। इससे ब्लू इकॉनमी और ग्रीन शिपिंग को बढ़ावा मिलेगा। मछली उद्योग में भी आधुनिक कोल्ड स्टोरेज और प्रोसेसिंग यूनिट स्थापित होने से मछुआरों की आय बढ़ेगी।
5.78 लाख करोड़ रुपS के निवेश से लगभग 12 से 15 लाख प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार के अवसर पैदा होंगे। इससे रोजगार के लिए होने वाला पलायन रुकेगा। उद्योगों के आने से नए हाईवे, रेलवे कनेक्टिविटी और स्मार्ट शहर विकसित होंगे। राजकोट का नया अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा इस विकास को और गति देगा। यह भी उल्लेखनीय है कि जब कोई बड़ा प्लांट स्थापित होता है, तो उसके आसपास एमएसएमई इकाइयाँ भी विकसित होती हैं। इससे राजकोट और जामनगर के छोटे उद्योगपतियों को बड़ा बाजार मिलेगा।
सरकार उद्योगों की जरूरतों के अनुसार नए स्किल विश्वविद्यालय और ‘सेंटर ऑफ एक्सीलेंस’ स्थापित कर रही है, जिससे युवा उद्योगों के लिए तैयार हो सकें। इस तरह गुजरात अब सिर्फ वाइब्रेंट ही नहीं बल्कि ‘रीजनली वाइब्रेंट’ भी बन रहा है।
(यह खबर गुजराती में प्रार्थना अमीन ने लिखी है जिसे इस लिंक पर क्लिक कर पढ़ा जा सकता है)
नई दिल्ली में आयोजित विश्व पुस्तक मेला 2026 की थीम ‘भारतीय सैन्य इतिहास: शौर्य एवं प्रज्ञा’ महज एक विषय नहीं बल्कि भारत की सभ्यतागत स्मृतियों और राष्ट्रीय चेतना का सशक्त उद्घोष है। यह थीम भारतीय सैन्य इतिहास के उन स्वर्णिम अध्यायों को उजागर करती है, जहाँ रणभूमि में अदम्य साहस और निर्णयन में गहन बौद्धिक प्रज्ञा का अनुपम समन्वय दिखाई देता है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने संदेश में इस विषय को अत्यंत सराहनीय बताते हुए कहा कि यह भारत की गौरवशाली परंपराओं, अपराजेय साहस और समृद्ध बौद्धिक विरासत को रेखांकित करता है। वास्तव में, भारतीय सैन्य इतिहास केवल युद्धों, विजय या पराजय का वृत्तांत नहीं है बल्कि यह रणनीति, नैतिक मूल्यों, नेतृत्व क्षमता और कर्तव्यबोध की एक जीवंत पाठशाला रहा है, जिससे पीढ़ियों ने आत्मबोध और राष्ट्रबोध की प्रेरणा प्राप्त की है।
पुस्तक मेले की थीम ‘भारतीय सैन्य इतिहास: शौर्य और ज्ञान के 75 वर्ष’ आज के भारत के आत्मविश्वास और स्मृतिबोध को प्रतिबिंबित करती है। यह थीम स्पष्ट करती है कि भारत का सैन्य इतिहास केवल रणक्षेत्र की वीरता तक सीमित नहीं बल्कि रणनीतिक प्रज्ञा, नैतिक नेतृत्व और राष्ट्रनिर्माण में सेनाओं की निर्णायक भूमिका का समग्र आख्यान है। 75 वर्षों की इस यात्रा को पुस्तक, विमर्श और प्रदर्शनी के माध्यम से प्रस्तुत करना आने वाली पीढ़ियों के लिए इतिहास को जीवंत अनुभव में बदल देता है।
प्राचीन काल से लेकर आधुनिक युग तक भारत की सैन्य परंपरा ने यह सिद्ध किया है कि शक्ति का वास्तविक स्वरूप विवेक से संचालित होता है। चाणक्य की अर्थनीति से लेकर शिवाजी महाराज की गुरिल्ला रणनीति, और स्वतंत्र भारत की सेनाओं की आधुनिक युद्ध-कुशलता—हर चरण में ‘शौर्य’ के साथ ‘प्रज्ञा’ की स्पष्ट छाप दिखाई देती है। पुस्तक मेला 2026 की यह थीम विशेष रूप से युवाओं के लिए प्रेरणास्रोत है। यह उन्हें इतिहास से सीख लेने, राष्ट्रभक्ति को भावनात्मक नारे से आगे बढ़ाकर कर्तव्य और अनुशासन के रूप में समझने की दिशा देती है। साथ ही, यह संदेश भी देती है कि सशक्त राष्ट्र वही होता है, जो अपने अतीत को जानता, समझता और उससे भविष्य की दिशा तय करता है।
केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान द्वारा 12 जनवरी, 2026 को नई दिल्ली स्थित प्रधानमंत्री संग्रहालय में चयनित 43 युवा लेखकों से संवाद किया गया। उन्हें सार्थक पुस्तकें लिखने के लिए मेंटरशिप अवधि का भरपूर लाभ उठाने के लिए प्रोत्साहित किया जो देश के युवाओं को पढ़ने, लिखने और ज्ञान के साथ गहराई से जुड़ने के लिए प्रेरित करें। उन्होंने शोध सामग्री तक पहुँच के महत्व पर जोर दिया और निर्देश दिया कि राष्ट्रीय पुस्तक ट्रस्ट (NBT) के माध्यम से भौतिक और डिजिटल दोनों संसाधनों की उपलब्धता सुनिश्चित की जानी चाहिए।
उन्होंने यह भी कहा कि लेखकों को ‘एक राष्ट्र, एक सदस्यता’ (ONOS) पहल के तहत संसाधनों तक पहुँच प्रदान की जानी चाहिए। उनके अकादमिक और शोध संबंधी सहयोग को पुख्ता करने के लिए सुझाव दिया कि चयनित लेखकों को अपने-अपने क्षेत्रों के केंद्रीय विश्वविद्यालयों से संबद्ध किया जाए ताकि वे अपनी किताबों को तैयार कर सकें।
धर्मेंद्र प्रधान का यह जोर कि युवा लेखक मेंटरशिप अवधि का अधिकतम लाभ उठाकर सार्थक और प्रेरक पुस्तकें लिखें, अत्यंत प्रासंगिक है। आज के डिजिटल और त्वरित सूचना के युग में गहन शोध, तथ्यात्मक प्रामाणिकता और विचारों की स्पष्टता पहले से कहीं अधिक आवश्यक हो गई है। इसी संदर्भ में NBT के माध्यम से भौतिक और डिजिटल संसाधनों की उपलब्धता तथा ONOS पहल के तहत शोध सामग्री तक पहुँच सुनिश्चित करने का निर्देश एक दूरदर्शी कदम है।
केंद्रीय विश्वविद्यालयों से चयनित लेखकों को जोड़ने का सुझाव इस योजना को अकादमिक मजबूती प्रदान करता है। इससे लेखन केवल व्यक्तिगत अनुभव पर आधारित न रहकर शोध, विमर्श और बौद्धिक परंपरा से जुड़ सकेगा। यह प्रयास युवा लेखकों को वैश्विक मानकों के अनुरूप तैयार करने में सहायक होगा। सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि पीएम-युवा 3.0 देश की विविधता को उसकी वास्तविक शक्ति के रूप में स्वीकार करता है। विभिन्न पृष्ठभूमियों से आए युवा लेखकों की ऊर्जा, आत्मविश्वास और आकांक्षाएँ ‘विकसित भारत’ के सपने को शब्दों का आधार देती हैं। यह योजना यह भी सिद्ध करती है कि सरकार केवल पाठ्यक्रम और परीक्षा तक सीमित नहीं बल्कि विचार, संवाद और सृजनशीलता को राष्ट्र की प्रगति का मूल मानती है।
10 जनवरी,2026 को नई दिल्ली विश्व पुस्तक मेला (NDWBF) 2026 का उद्घाटन केवल एक सांस्कृतिक आयोजन नहीं बल्कि भारत की बौद्धिक चेतना, बहुभाषी परंपरा और राष्ट्रबोध का सशक्त उत्सव है। धर्मेंद्र प्रधान द्वारा इस विश्वविख्यात मेले का उद्घाटन और वीर सुरेंद्र साई तथा संबलपुर के शहीदों को समर्पित पुस्तक ‘कुडोपाली की गाथा: 1857 की अनकही कहानी’ का बहुभाषी विमोचन, इस आयोजन को ऐतिहासिक और भावनात्मक दोनों स्तरों पर विशिष्ट बनाता है। कुडोपाली की गाथा पर एक वीडियो भी प्रदर्शित किया गया।
आज जब भारत आत्मनिर्भरता और वैश्विक नेतृत्व की ओर अग्रसर है, ऐसे समय में ‘भारतीय सैन्य इतिहास: शौर्य एवं प्रज्ञा’ जैसी थीम न केवल प्रासंगिक है बल्कि अत्यंत आवश्यक भी। यह पुस्तक मेले को केवल साहित्यिक आयोजन नहीं बल्कि राष्ट्रीय आत्मचिंतन का मंच बना देती है जहाँ कलम, विचार और इतिहास मिलकर राष्ट्रनिर्माण की चेतना को मजबूत करते हैं।
इस्लाम में इंसान की मर्जी की महत्वता है, जबरदस्ती की कोई जगह नहीं- मजहब की ये परिभाषा हाल में आरजे सायमा ने दी है। उन्होंने बड़ी चालाकी से हिजाब-बुर्का मुद्दे पर इस्लाम को डिफेंड किया है कि दुनियाभर में घटना कोई भी हो जाए, लेकिन बात मजहब की आलोचना पर न आए।
Islam is based on consent, not coercion. No one can forcibly make someone do anything! It’s, totally, the person’s choice. The choice to wear a hijab or not to wear one. And not just a hijab. Anything. No one is authorised to force them into wearing or removing. Period.
ये तरीका ऑस्ट्रेलिया आतंकी हमले के समय अरफा खानम शेरवानी ने भी अपनाया था। हालाँकि, उनकी स्ट्रैटेजी चली नहीं और उनके अपने ही समुदाय के लोग उनपर सवाल खड़ा करने लगे। सायमा के साथ भी यही हुआ है लेकिन वो आँख मूंदकर रखेंगी क्योंकि उन्हें नैरेटिव ये बनाना है कि जो लोग हिजाब पहनने को मजबूर कर रहे हैं वो अच्छे से इस्लाम को नहीं जानते।
दिलचस्प बात है कि सायमा जैसे बुद्धिजीवियों की हिजाब पर राय मौका, घटना और स्थान देखकर बदलती रहती है। जैसे भारत की बात आती है तो ये हिजाब पहनने को सीधा मजहबी अधिकार से जोड़ती हैं, शैक्षणिक संस्थानों में उसे पहने जाने की पैरवी करती हैं और किसी बाहर मुल्क में ये मुद्दा बनता है तो नारीवादी पक्ष निकल आता है, तब ये क्रांतिकारी भी बनती हैं, हिजाब को च्वाइस भी बताती हैं और इस्लाम को डिफेंड करने का लिबरल वर्जन भी खोजती हैं।
मगर, अफसोस उनका ये वर्जन जमीनी हकीकत और मीडिया में मौजूद तमाम उदाहरणों से बिलकुल निकलता है। बहुत पीछे जाने की जरूरत नहीं है। 2025 के दिसंबर माह में ही यूपी के शामली में एक मुस्लिम व्यक्ति ने अपनी बीवी और दो नाबालिग बेटियों की हत्या कर दी। कारण? तीनों बिना बुर्का पहने घर से बाहर निकल गई थीं। 2021 में असम से खबर आई थी एक महिला को दुकान से सिर्फ इसलिए बाहर निकाल दिया गया क्योंकि उसने जींस पहनी थी, बुर्का नहीं। 2022 में कर्नाटक से रिपोर्ट आई थी कि एक संगठित समूह मुस्लिम महिलाओं पर नजर रखने के लिए बनाया गया था, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि कोई भी महिला सार्वजनिक स्थानों पर बिना हिजाब या बुर्का के न दिखें।
यह सब भारत की घटनाएँ हैं, किसी दूर-दराज के कट्टर इस्लामिक देश की नहीं। क्या इन पर कभी सायमा कि कोई प्रतिक्रिया या विरोध देखने को मिला? क्या ऐसी खबरों को सुनने के बाद कभी आरजे सायमा ये कहने गईं कि इस्लाम में तो मर्जी चलती है, जबरदस्ती नहीं।
इसी तरह विदेशों में महिलाओं के साथ हिजाब न पहनने पर क्या हुआ, इसके भी तमाम उदाहरण हैं। ईरान की महसा अमीनी याद है आपको? 22 साल की वह लड़की जिसे ‘ठीक से हिजाब न पहनने’ के आरोप में हिरासत में लिया गया और इतनी बेरहमी से पीटा गया कि उसकी मौत हो गई।
2014 में ईरान के इस्फाहान में महिलाओं पर तेजाब हमलों की घटनाएँ सामने आईं। जाँच में पता चला कि निशाना वे महिलाएँ थीं जो ‘ढंग से’ हिजाब या बुर्का नहीं पहन रही थीं। इसी तरह कनाडा की अक्सा परवेज, महज 16 साल की लड़की, जिसकी हत्या उसके अपने परिवार ने इसलिए कर दी क्योंकि वह खुद को ढककर बाहर नहीं जाती थी।
ये तो सिर्फ वे मामले हैं जो मीडिया में आ सके। कितनी घटनाएँ चार-दीवारी के भीतर दबा दी जाती होंगी, इसका अंदाजा लगाना मुश्किल है। आरजे सायमा क्या इन सभी मामलों में पीड़ित महिलाओं और बच्चियों को यह समझाने जाएँगी कि इस्लाम मर्जी का मजहब है, जबरदस्ती का नहीं? या फिर हमेशा की तरह यह कहकर पल्ला झाड़ लेंगी कि यह ‘असल इस्लाम’ नहीं है?
विडंबना यह है कि जिस इस्लाम की परिभाषा सायमा गढ़ती हैं, उसे बार-बार गलत उन्हीं लोगों ने साबित किया है जो इस मजहब को सबसे ज्यादा कट्टरता से मानते हैं। अगर आम लोगों को ‘नासमझ’ मान भी लिया जाए, तो उन मुल्ला-मौलानाओं की तकरीरों का क्या जवाब है, जिनकी बातें सुनकर समाज दिशा तय करता है?
खुले मंचों से बार-बार कहा जाता है कि कुरान में हिजाब का जिक्र है और लड़कियों को इसे पहनना ही चाहिए। कई बार तो ये भी बताया जाता है कि महिलाओं को आजादी देना ही गलत बात है। उनके स्कूल जाने से लेकर उनके खुले सर घूमने की चाह तक को इस्लाम के खिलाफ बता दिया जाता है। तब सवाल उठता है- क्या समस्या कुछ ‘भटके हुए लोगों’ की है, या फिर उस विचारधारा की, जिसे हर बार बचाने के लिए कभी आरफा को और कभी आरजे सायमा को नया नैरेटिव गढ़ना पड़ता है?
ईरान के लोग एक बार फिर सड़कों पर हैं। इस बार विरोध इस्लामी हुकूमत के खिलाफ है। अयातुल्ला अली खामेनेई को सत्ता से हटाने की माँग को जारी इन प्रदर्शन में 2500 से ज्यादा लोग मारे जा चुके हैं। मुस्लिम महिलाएँ हिजाब उतारकर इस्लामी सत्ता का विरोध कर रही हैं। उधर, खामेनेई सरकार दमन, गिरफ्तारियों और फाँसी का रास्ता चुन रही है।
इन प्रदर्शनों की अगुवाई मुस्लिम महिलाएँ कर रही हैं, जो कभी हिजाब उतारकर, कभी खामेनेई की फोटो से सिगरेट सुलगाकर, तो कभी पुलिस के सामने डटकर खड़ी हो रही हैं। सड़कों पर ‘तानाशाह मुर्दाबाद’, ‘मुल्लाओं को ईरान छोड़ना होगा’ जैसे नारे सुनाई दे रहे हैं। यह नारे पूरी व्यवस्था के खिलाफ हैं, जो इस्लाम के नाम पर जीवन, कपड़े, सोच और बोलने की आजादी तय करती है।
ईरान के लोग सवाल पूछ रहे हैं कि क्या ‘इस्लामी क्रांति‘ ने वाकई आजादी दी थी या सिर्फ सत्ता का चेहरा बदला था। यही सवाल 1979 में भी उठा था, जब ईरान की जनता राजा मोहम्मद रजा शाह पहलवी के खिलाफ सड़कों पर उतरी थी। तब भी तानाशाही, दमन और सत्ता के केंद्रीकरण के खिलाफ नारे लगे थे। फर्क बस इतना है कि तब जनता ने राजशाही से छुटकारा पाने के लिए मजहबी नेतृत्व पर भरोसा किया था। आज चार दशक बाद वही जनता उसी इस्लामी सत्ता को हटाने के लिए संघर्ष कर रही है, मानो किरदार बदलकर इतिहास ईरान में खुद को दोहरा रहा हो।
1979 से पहले ईरान में राजशाही
जिस ईरान ने 1979 में राजा के खिलाफ बगावत की, वह अचानक गुस्से में नहीं फूटा था। यह गुस्सा सालों से भीतर जमा हो रहा था। उस वक्त देश पर मोहम्मद रजा शाह पहलवी का शासन था। राजा पहलवी खुद को ईरान को पिछड़ेपन से निकालकर आधुनिक दुनिया में ले जाने वाला नेता मानता था। उस वक्त तेहरान जैसे शहरों में ऊँची इमारतें, वेस्टर्न लाइफस्टाइल, फैशन और विश्वविद्यालय दिखते थे। बाहर से ईरान एक प्रगतिशील देश लगता था, खासकर पश्चिमी दुनिया की नजरों में।
राजा मोहम्मद रजा शाह पहलवी (फोटो साभार: AajTak)
लेकिन यह तस्वीर अधूरी थी। सत्ता पूरी तरह राजा के हाथ में थी और जनता की भागीदारी लगभग शून्य थी। चुनाव औपचारिक थे, विपक्ष का नाम नहीं था। जो भी सरकार से सवाल करता, उसे SAVAK (साजमान-ए-इत्तिलाआत वा अम्नियत-ए-किश्वर) नाम की खुफिया एजेंसी का सामना करना पड़ता था। बोलने की आजादी, लिखने की आजादी और राजनीतिक असहमति तीनों पर कड़ा नियंत्रण था।
शाह के दौर में मुस्लिम महिलाओं की पहचान
1960 और 1970 के दशक में शाह के शासन में ईरान की मुस्लिम महिलाओं को आजादी थी। शहरों में महिलाएँ बिना हिजाब पढ़ाई करती थीं, नौकरी करती थीं और सार्वजनिक जीवन का हिस्सा बनती थीं। शाह के शासन में महिलाओं को वोट का अधिकार मिला, पारिवारिक कानूनों में कुछ सुधार हुए और शिक्षा के दरवाजे भी खोले गए।
लेकिन ग्रामीण इलाकों और मजहबी क्षेत्रों में महिलाओं की भूमिका अभी भी काफी सीमित थी। कई जगह अब भी महिलाओं को पढ़ाई और नौकरी करने की अनुमति नहीं थी। जहाँ एक तरफ शाह ने पश्चिमी संस्कृति और आधुनिकता को आगे बढ़ाया, यही मजहबी और सामाजिक मूल्यों के टकराव का कारण बना।
शाह की सत्ता में महिलाओं की आजादी को समाज और मजहबी समूहों के मानदंडों के खिलाफ मानी जाती थी। यही वजह थी कि मजहबी उलेमा और शिया मौलवी शाह की सत्ता के विरोध में थे। यही विरोधाभास अंत में 1979 की क्रांति में महिलाओं की भूमिका और उनके अधिकारों के सवाल का आधार बना।
शाह के खिलाफ विरोध को मौलवियों और उलेमाओं ने दी मजहबी पहचान
शाह की सत्ता में प्रगति को देख सबसे ज्यादा असंतुष्ट शिया मुस्लिम और उलेमा थे। ईरान में सदियों से शिया उलेमा केवल मजहबी नेता नहीं थे, बल्कि वे सामाजिक और कानूनी जीवन में भी दखल करते थे। मोहम्मद रजा शाह पहलवी की आधुनिकता की परियोजना में इन मजहबी नेताओं के लिए जगह नहीं बची थी।
शाह की नीतियों से शिया उलेमा खफा थे। मजहबी अदालतों को कमजोर होते, शरिया कानूनों की जगह देश के अपने कानून लागू होते और वक्फ संपत्तियों पर सरकारी नियंत्रण होते देख मौलवी और उलेमा नाखुश थे। उस दौर में मस्जिदों और मदरसों का इस्तेमाल सरकार के खिलाफ बयानबाजी में होने लगा। कई मौलवियों को गिरफ्तार कर जेल भेजा गया और कुछ को देश से बाहर निकाल दिया गया।
इस बीच सबसे प्रमुख चेहरा सामने आया अयातुल्ला रुहोल्लाह खुमैनी। 1963 में जब शाह ने ‘व्हाइट रेवोल्यूशन’ के नाम से भूमि सुधार, महिला अधिकार और पश्चिमीकरण से जुड़ी नीतियाँ लागू कीं, तो खुमैनी ने इन्हें इस्लाम विरोधी बताया। खुमैनी ने मस्जिदों से लोगों को शाह के खिलाफ भड़काना शुरू कर दिया। नतीजा यह हुआ कि 1964 में खुमैनी को पहले तुर्की और फिर इराक के नजफ शहर में डिपोर्ट कर दिया गया।
डिपोर्ट होने के बावजूद खुमैनी की आवाज ईरान के लोगों तक पहुँच रही थी। तब खुमैनी के भाषण को कैसेट टेप्स के जरिए ईरान में फैलने लगीं। शिया तौर-तरीकों में शहादत और अत्याचार के नाम पर खुमैनी ने ईरानी जनता का समर्थन हासिल किया। मस्जिदें, मदरसे और मजहबी जुलूसों से शाह सरकार के विरोध का केंद्र बनाया गया।
धीरे-धीरे शाह के खिलाफ गुस्सा सिर्फ राजनीतिक नहीं रहा, बल्कि मजहबी संघर्ष के रूप में देखा जाने लगा। शिया उलेमाओं ने ईरान में मजहबी पहचान को बचाने की लड़ाई शुरू की। यही भावना आगे चलकर 1979 की इस्लामी क्रांति की रीढ़ बनी।
1978-79 के आंदोलन से शाह के ईरान छोड़ने तक
मोहम्मद रजा शाह पहलवी के विरोध 1978 तक तेजी से फैलने लगा। महँगाई से शुरू हुए इस विरोध ने सरकार की आर्थिक नीतियों से लेकर शहरों में पश्चिमीकरण पर आवाज ऊँची की। अब सिर्फ तेहरान नहीं, बल्कि छोटे-छोटे शहरों और कस्बों में हजारों लोग सड़कों पर उतर आए। जिस तेहरान विश्वविद्यालय ने विरोध को दिशा दी थी, ये अब सभाओं और नारेबाजियों का अड्डा बन गया। इसी दौरान अजरबादेगान यूनिवर्सिटी में भी बड़े स्तर पर प्रदर्शन हुए।
1979 में विरोध प्रदर्शन (फोटो साभार: AFP)
अब शाह सरकार ने भी प्रदर्शनकारियों को हटाने का मन बना लिया था। 08 सितंबर 1978 को तेहरान के जालेह चौक पर चल रहे विरोध प्रदर्शन में सरकार मार्शल लॉ (सेना का नियंत्रण) लगा दिया था। सेना ने बिना चेतावनी के प्रदर्शनकारियों पर गोलियाँ चलाईं। इस गोलीबारी में 64 लोग मारे गए और 200 से अधिक घायल हुए थे। इस घटना ने विरोध प्रदर्शन को क्रांति का रूप दिया।
इसके बाद से विरोध प्रदर्शनों में सुरक्षाबलों और लोगों की झड़पें आम हो गईं। कभी गोलीबारी, तो कभी लाठीचार्ज का इस्तेमाल किया गया। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, इस 1978-79 इस्लामी क्रांति में लगभग 2 से 3 हजार लोगों की मौत हुई थी। इन प्रदर्शनों के चलते शाह पर अंतरराष्ट्रीय दबाव तेज होने लगा।
अब मोहम्मद शाह रजा को समझ आ गया कि ईरान में सत्ता बनाए रखना मुश्किल हो गया है। 16 जनवरी 1979 को शाह ने ईरान छोड़ने का फैसला किया। शाह पहले मिस्र गए, फिर अमेरिका और बाद में बहरीन में कुछ समय बिताया। शाह के देश छोड़ने के बाद सरकार पूरी तरह खाली हो गई और देश में अस्थिरता चरम पर थी।
खुमैनी और इस्लामी क्रांति का उदय
शाह के देश छोड़ने के बाद ईरान सड़कों पर शक्ति प्रदर्शन कर रहा था। शाह के विरोध में इस आंदोलन में शामिल छात्र, मजदूर, महिलाओं, वामपंथी और मजहबी नेताओं ने इसे इस्लामी क्रांति का नाम दिया। अब अयातुल्ला रुहोल्लाह खुमैनी को वापस बुलाने की माँग हर तरफ गूँज रही थी।
तभी 01 फरवरी 1979 को खुमैनी फ्रांस से ईरान वापस लौटे। खुमैनी की वतन वापसी में करोड़ो लोग सड़कों पर स्वागत करने उतरे। ईरान को खुमैनी से काफी उम्मीदें थीं। खुमैनी ने ईरान में सत्ता को मजहबी तौर-तरीकों से चलाने का संदेश दिया। इसके बाद खुमैनी और उनके शिया मुस्लिम उलेमा और मौलवियों ने सत्ता संभाली। संसद और अदालतें बनाई गईं, लेकिन उनका काम केवल प्रशासनिक फैसले लेना था, असली शक्ति अब ‘सुप्रीम लीडर’ और मजहबी नेतृत्व के हाथ में थी।
खुमैनी की ईरान में वापसी (फोटो साभार: BBC)
महिलाओं के लिए स्थिति तेजी से बदल गई। जो महिलाएँ शाह के दौर में शिक्षा और नौकरी करने को स्वतंत्र थीं, अब उन पर कड़ी पाबंदी लागू कर दी गई। सार्वजनिक जीवन में हिजाब को अनिवार्य कर दिया गया। पारिवारिक कानूनों में बदलाव कर महिलाओं के तलाक, गवाही औऱ अभिभावक अधिकार सीमित कर दिए गए। सरकार इसे ‘इस्लामी व्यवस्था’ के लिए जरूरी बताने लगी।
बदलाव सिर्फ महिलाओं तक सीमित नहीं रहा। 1979 के बाद मजहबी संगठन जैसे मस्जिदें, मदरसे और इस्लामी संस्थान अब प्रशासन और कानून के प्रमुख केंद्र बन गए। हर नीति, हर कानून और हर सामाजिक गतिविधि मौलवियों और खुमैनी के निर्णयों के अनुसार नियंत्रित होने लगे।
1979 से 2026 तक, क्या ईरान में कुछ बदला?
1979 में ईरान की जनता ने राजा के खिलाफ बगावत की थी। लोगों को लगा था कि राजा के जाने के बाद उन्हें आजादी मिलेगी, अपनी बात कहने का हक मिलेगा और देश जनता की मर्जी से चलेगा। शाह चला गया, लेकिन उसी जगह एक ऐसी व्यवस्था आ गई, जिमें सत्ता फिर कुछ गिने-चुने लोगों के हाथ में चली गई। फर्क बस इतना था कि पहले ताज पहनने वाला राजा था, अब सत्ता पर मजहबी नेता बैठ गए।
1979 की इस्लामी क्रांति के बाद महिलाएँ (फोटो साभार: BBC)
खुमैनी के बाद ईरान में मजहब के नाम पर कानून बनने लगे। महिलाओं की आजादी सीमित हो गई, पहनावे से लेकर जिंदगी के फैसलों तक पर नियम लगाए गए। बोलने, लिखने और विरोध करने पर रोक लगती गई। जिन लोगों ने 1979 में बदलाव के सपने देखे थे, उन्होंने कुछ ही सालों में महसूस किया कि डर और दबाव खत्म नहीं हुआ, बस उसका चेहरा बदल गया।
आज 2026 में जब लोग फिर सड़कों पर हैं, तो उनके वही ‘तानाशाह मुर्दाबाद’ वाले पुराने नारे हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि अब ये नारे राजा के खिलाफ नहीं, बल्कि खामेनेई और इस्लामी सत्ता के खिलाफ हैं। यह दिखाता है कि ईरान में 47 साल में सरकार बदली, चेहरे बदले, लेकिन आम लोगों की परेशानी वही रही। आज का विरोध सवाल खड़े करता है कि क्या 1979 की ‘इस्लामी क्रांति’ ने सच में लोगों को आजादी दी या बस एक तानाशाही से दूसरी तानाशाही तक का सफर तय हुआ।
यही वजह है कि ईरान का आज और उसका इतिहास एक-दूसरे से अगल नहीं हैं। 1979 में जो सवाल उठे थे, वही सवाल आज भी जिंदा हैं और शायद यही इस कहानी का सबसे कड़वा सच है।
हिमाचल प्रदेश की सरकार जठिया देवी सैटेलाइट टाउनशिप को विकसित करने के लिए 8 गाँवों की 249 हेक्टेयर जमीन का अधिग्रहण कार्य शुरू करने जा रही है।
दरअसल शिमला शहर से करीब 14 km दूर चंडीगढ़ के नाम से जुड़ा ‘हिम चंडीगढ’ शहर बसाने की तैयारी है। कॉन्ग्रेस सरकार ने इसे मंजूरी दे दी है, लेकिन ग्रामीण पूरे प्रोजेक्ट का विरोध कर रहे हैं। इनका कहना है कि कृषि और फ्लोरीकल्चर के लिए ये इलाका काफी मशहूर है। ग्रामीणों की आजीविका इससे जुड़ी है। पहले बंजर जमीनों को लिया गया था लेकिन अब गाँवों को हटाने की तैयारी है। इसको लेकर ग्रामीणों ने जिला प्रशासन के सामने अपनी शिकायत दर्ज करा चुके हैं।
प्रस्तावित सैटेलाइट टाउनशिप के लिए केन्द्र को औपचारिक मंजूरी के लिए भेजा गया है लेकिन अभी इसकी मंजूरी नहीं मिली है। इसके बावजूद राज्य सरकार लैंड पूलिंग मॉडल के तहत काम कर रही है।
2014 में प्रोजेक्ट की प्लानिंग हुई
हिमाचल प्रदेश हाउसिंग एंड अर्बन डेवलपमेंट अथॉरिटी (HIMUDA) ने जाठिया देवी क्षेत्र में एक रिहायशी प्रोजेक्ट शुरू करने जा रही है। शिमला पर पड़ रहे जनसंख्या के भारी दबाव को देखते हुए इस प्रोजेक्ट को 2014 में राज्य सरकार ने शुरू करने की योजना बनाई थी। अब इसे लेकर काम तेजी से आगे बढ़ रहा है। जाठिया देवी पंचायत समेत पूरे इलाके में नोटिस चिपकाए गए हैं। इसमें लोगों से उनकी आपत्तियाँ और सुझाव माँगे गए हैं।
जाठिया देवी टाउनशिप प्रोजेक्ट क्या है
जाठिया देवी शिमला से 14 किलोमीटर दूर ग्राम पंचायत बागी में आने वाली जगह है। इसका नाम इलाके में एक पुराने जाठिया देवी मंदिर के नाम पर पड़ा है। प्रस्तावित टाउनशिप को शिमला पर दबाव कम करने, नए इकोनॉमिक हब बनाने और टिकाऊ, आपदा-रोधी शहरी विकास को बढ़ावा देने के लिए एक योजनाबद्ध सैटेलाइट माउंटेन टाउनशिप के तौर पर विकसित किए जाने का प्लान है।
स्टेट हाईवे 16 और नेशनल हाईवे 5 के पास मौजूद जाठिया देवी टाउनशिप बनेगा। यह जुब्बरहट्टी में शिमला एयरपोर्ट से 3–4 km और ISBT शिमला से करीब 22 km दूर है। यह इलाका समुद्र तल से 1,300 से 1,500 मीटर ऊपर है। यहाँ पहाड़ियाँ, घाटियाँ और छोटी-छोटी नदियाँ मौजूद हैं।
नवंबर 2025 में टाउनशिप से जुड़ी SIA रिपोर्ट सामने आई। इसके मुताबिक, टाउनशिप करीब 249 हेक्टेयर में फैला होगा, जिसमें से 35 हेक्टेयर सरकारी ज़मीन होगी। प्रस्तावित ज़मीन के इस्तेमाल में रेजिडेंशियल ज़ोन (55.16 हेक्टेयर) शामिल हैं। हाई इनकम ग्रुप (HIG), मीडियम इनकम ग्रुप (MIG), लो इनकम ग्रुप (LIG), और आर्थिक रूप से कमज़ोर तबके (EWS) के लिए अलग अलग घर होगा।
कमर्शियल एरिया 13.36 हेक्टेयर क्षेत्र में फैला होगा, जबकि नॉन-पॉल्यूशनिंग इंडस्ट्रियल ज़ोन 15.7 हेक्टेयर क्षेत्र में होगा। 16.42 हेक्टेयर भूमि पर ग्रीन जोन होगा। रिवर डेवलपमेंट एरिया 16.56 हेक्टेयर क्षेत्र में होगा। चौड़ी सड़कें 13.78 हेक्टेयर में होगी। यूटिलिटी सर्विस, स्मार्ट ट्रांसपोर्ट सिस्टम, हेलीपैड कनेक्टिविटी, और इको-सेंसिटिव प्लानिंग एरिया टाउनशिप की खासियत होगी। इस पूरे प्रोजेक्ट पर 50 हजार करोड़ रुपए खर्च आएँगे।
टाउनशिप के फेज 1 में HIG, MIG, LIG, और EWS कैटेगरी में 895 रेजिडेंशियल यूनिट्स का प्रस्ताव है। 84.22 हेक्टेयर में कमर्शियल और इंडस्ट्रियल हिस्से भी होंगे, जबकि ग्रीन और रिवर डेवलपमेंट जोन में और 33 हेक्टेयर जमीन होगी।
ग्रामीण कर रहे हैं विरोध
इस प्रोजेक्ट का कई गाँवों ने विरोध करना शुरू कर दिया है। 10 जनवरी 2026 को बागी ग्राम पंचायत ने अपने यहाँ के गाँवों के विस्थापन का विरोध करते हुए कहा है कि टाउनशिप बनाने के लिए वह अपना गाँव नहीं उजाड़ने देंगे। इस पंचायत में 11 में से 8 गाँव आते हैं, जिसका अधिग्रहण किया जाना है। ग्रामीणों ने एकमत होकर प्रस्ताव पास किया कि वे अपनी जमीन का अधिग्रहण नहीं होने देंगे।
SIA रिपोर्ट में कहा गया है कि ग्राम पंचायत बागी के अंदर आने वाले 8 गाँवों के लगभग 249 हेक्टेयर (लगभग 2,959 बीघा) जमीन है, जिसे अधिग्रहण के लिए चुना गया है। ये गाँव हैं- चानन (568 बीघा), पन्टी (109 बीघा), आंजी (396 बीघा), शिल्ली बागी (699 बीघा), मझोला (78 बीघा), शिलरू (214 बीघा), धनोकरी (270 बीघा), और क्यारागी (303 बीघा)।
ये सभी गाँव ग्रामीण शिमला में आते हैं। इसके अलावा पड़ोसी सोलन जिले की ममलिग तहसील में मंजियारी गाँव (लगभग 441 बीघा) की भी पहचान की गई है। SIA रिपोर्ट के मुताबिक, 386 परिवार सीधे तौर पर इससे प्रभावित होंगे। साथ ही 158 परिवारों की सीधे रोजी-रोटी पर असर पड़ सकता है।
ग्रामीणों को विस्थापन का डर
स्थानीय लोगों का कहना है कि इस अधिग्रहण से उपजाऊ खेती की जमीन, पुश्तैनी घरों और कुलदेवी-देवताओं के स्थान समेत सदियों पुरानी सामाजिक और धार्मिक इमारतों को हटाया जा सकता है।
ये केवल जमीन का मामला नहीं है, बल्कि पुर्वजों की इस निशानी से भावनाएँ जुड़ी हुई हैं। पुश्तैनी जमीन और अपने कुल देवताओं के मंदिर को छोड़ना इतना आसान नहीं है। आखिर बाहरी लोगों को बसाने के लिए उन्हें क्यों उजाड़ा जा रहा है?
29 दिसंबर 2025 की सुनवाई में प्रोजेक्ट का विरोध करने वाले नीरज ठाकुर ने कहा, “हमें बताया गया है कि खेती की जमीन और घरों समेत पूरे गाँव के लिए जाएँगे। सरकार पीढ़ियों से यहाँ रह रहे लोगों को हटाकर नए लोगों के लिए घर बनाना चाहती है।”
खेती ही आजीविका का एकमात्र साधन है- ग्रामीणों का कहना है कि वे बड़े किसान नहीं है। लेकिन खेती ही उनका जीवन जीने का साधन है। जब बंजर पहाड़ियाँ ली थी तो किसी ने विरोध नहीं किया, लेकिन अब गाँव माँग रहे हैं। आखिर गाँव से बेदखल करने के बाद ग्रामीण कैसे अपना पेट पालेंगे।
ग्रामीणों ने एक मत होकर प्रोजेक्ट का विरोध किया है। ग्राम पंचायत बागी के प्रधान नरेश कुमार ठाकुर ने कहा, “हालाँकि प्रस्ताव पास करने के लिए 418 घरों में से 120 घरों के समर्थन की जरूरत थी, लेकिन प्रस्ताव पर हर परिवार के 280 लोगों ने साइन किए।”
ग्रामीणों का कहना है कि बहुत पहले हिमुडा ने पहाड़ी टाउनशिप के लिए 250 बीघा से ज्यादा जमीन का अधिग्रहण किया था। अब तक अधिग्रहित जमीन पर एक भी ईंट नहीं रखी गई है। वह जमीन बंजर थी। लेकिन इस बार लोगों के घरों के साथ-साथ खेती-बाड़ी की जमीन भी लेने की बात है।
कम मुआवजे और पुनर्वास पर सवाल
ग्रामीणों का कहना है कि बिना सहमति और समाधान के उन्हें भूमि का अधिग्रहण स्वीकार नहीं होगा। ग्रामीण सोशल इंपेक्ट सर्वे टीम गो बैक के नारे लगाए थे।
लोगों से जमीन अधिग्रहण, पुनर्वास और फिर से बसाने के अधिकार एक्ट, 2013 के सेक्शन 5 और नियम 8 के तहत जारी किए गए नोटिस में अधिग्रहण पर राय माँगी गई है। HIMUDA और रेवेन्यू अधिकारियों के मुताबिक, मुआवजा इलाके में जमीन की मौजूदा कीमतों और कलेक्टर रेट के आधार पर दिया जाना है।
हालाँकि गाँववालों ने मुआवजे के तौर पर क्या दिया जाएगा, इस पर विचार किए बिना अधिग्रहण का बॉयकॉट करने का फैसला किया है। इनका कहना है कि गाँवों की जमीनें जॉइंट प्रॉपर्टी हैं। इसलिए प्रॉपर्टी के मालिकों को मुआवजे के तौर पर ज्यादा पैसे नहीं मिलेंगे।
गाँववालों में से एक, 84 साल के हीरा सिंह ठाकुर ने कहा, “मेरे और मेरे भाइयों के पास कुल मिलाकर 12 बीघा जमीन है। बेटों और पोतों में बंटवारे के बाद, हर एक को कितना मिलेगा? खेती हमारी रोजी-रोटी है। आगे बढ़ने से पहले सरकार को मुआवजे के बारे में SIA रिपोर्ट में साफ करना चाहिए।”
दरअसल SIA के चैप्टर 3 में माना गया है कि जमीन अधिग्रहण से लोगों को हटाया जा सकता है। हटाए जाने वाली इमारतों में, सात मंदिर, पाँच स्कूल, करीब दो दर्जन दुकानें, नहरें, दूसरे एक्टिविटी से जुड़े संस्थान और घर शामिल हैं।
हालाँकि हिमुडा के CEO और सेक्रेटरी सुरेंद्र कुमार वशिष्ठ ने ग्रामीणों के डर को दूर करने की कोशिश करते हुए कहा है कि कोई भी जमीन जबरदस्ती नहीं ली जाएगी। उन्होंने कहा, “हम लोकल लोगों की मर्जी के खिलाफ कोई जमीन नहीं लेंगे। 29 दिसंबर की सुनवाई एक लंबे प्रोसेस का सिर्फ पहला कदम था। हमारे पास पहले से ही करीब 262 बीघा जमीन है, और हम इसे बढ़ाना चाहते हैं, लेकिन लोगों को हटाकर नहीं।”
उन्होंने आगे कहा कि रिहायशी घरों को अधिग्रहण से बाहर रखा जाएगा और किचन गार्डनिंग और रोजी-रोटी की सुरक्षा के लिए प्रोविजन मौजूद हैं। सुरेन्द्र कुमार वशिष्ठ ने कहा, “एक बीच का रास्ता निकाला जा रहा है ताकि उपजाऊ जमीन और घरों को बाहर रखा जा सके।” उन्होंने यह भी दावा किया कि 8 गाँवों की जमीन बहुत उपजाऊ नहीं है।
प्रोजेक्ट की जरूरत क्यों पड़ी
शिमला में जबरदस्त भीड़भाड़ है। राजधानी होने की वजह से सरकारी ऑफिस और व्यावसायिक गतिविधियाँ भी काफी हैं। यातायात और जनसंख्या का भारी दबाव के चलते शहर से कुछ दूर रिहायशी इलाके बसाने की प्लानिंग हुई। इसे पिछली बीजेपी सरकार ने भी आगे बढ़ाया।
SIA रिपोर्ट में प्रोजेक्ट के फायदे गिनाए जा रहे हैं। इसमें दावा किया गया है कि टाउनशिप से रोजगार के मौके और इकोनॉमिक मोबिलिटी पैदा होगी, शिक्षा, हेल्थकेयर और मार्केट तक पहुँच बेहतर होगी, ग्रामीण इलाकों को बड़े इकोनॉमिक कॉरिडोर से जोड़ा जाएगा, सामाजिक सुधार, स्किल डेवलपमेंट और लोकल एंटरप्रेन्योरशिप को बढ़ावा मिलेगा और पर्यावरण के अनुकूल, कम इंधन खर्च वाहनों को प्रोत्साहन के साथ सबको साथ लेकर चलने वाली मनोरंजन की जगहों का विकास किया जाएगा।
बाजार को बूस्ट किया जाएगा। होटल और मॉल बनेंगे। इससे नौकरियाँ सृजित होगी। काम और लिविंग का हब होगा।
पिछले एक दशक से जाठिया देवी टाउनशिप का काम ठप पड़ा है। अब फेज़ I का काम शुरू किया जा रहा है। लेकिन जब तक ग्रामीणों की समस्याओं का समाधान नहीं होगा। इस प्रोजेक्ट पर सवाल उठते रहेंगे। यह इस बात पर निर्भर करेगा कि अधिकारी स्थानीय विरोध, मुआवजे की चिंताओं और पर्यावरण सुरक्षा उपायों को कैसे सुलझाते हैं।
पहले से विवादों में रहे भोपाल लिटरेचर फेस्टिवल ने इस बार खुद को बचाने के लिए एक लेखक और उनकी किताब को ढाल बनाने की कोशिश की। मगर इस बार भी भारत भवन को बेवजह विवादों में घसीट ही दिया। क्या आठ साल बाद अब BLF का भारत भवन पर एकाधिकार खत्म होगा?
मैं पिछले दिनों कोलकाता-दिल्ली में था। भारत भवन का न्यासी होने के नाते अनेक मित्रों ने दिल्ली में रूबरू और फोन पर एक ही तरह के सवाल किए- “आपके भारत भवन में यह क्या चलता रहता है?” लौटकर मीडिया और सोशल मीडिया पर वही दुखी करने वाले एक जैसे विवाद बिखरे हुए देखे, जो बीते वर्षों में होते रहे।
दो कारणों से मेरा सरोकार केवल भारत भवन से है। पहला, मैं यहाँ का न्यासी हूँ और दूसरा, पिछले तीस सालों में अपने पत्रकारीय जीवन के आरंभ से देश के इस प्रतिष्ठित बहुकला केंद्र से एक श्रोता-दर्शक के रूप में जुड़ा ही रहा हूँ।
भारत भवन में होने वाले BLF का विवादों और सवालों से चोली-दामन का साथ उसी दिन से है, जब से भारत भवन के दरवाजे इनके लिए खोले गए। दो साल पहले भी ऐसे ही किसी विषय पर बवाल हो चुका है। तब तत्कालीन संस्कृति मंत्री ने काफी सख्त रुख दिखाया था। मध्य प्रदेश की साहित्यिक और सांस्कृतिक क्षेत्र में सक्रिय संस्थाओं के यह सवाल ध्यान देने योग्य हैं कि जब किसी और निजी संस्था को भारत भवन उपलब्ध नहीं है तो BLF को क्यों वंदनवार सजते हैं और वह भी ‘अज्ञात कारणों’ से हर साल मोटी सरकारी आर्थिक मदद सहित।
2021 में शासन की ओर से मुझे न्यास मंडल में सम्मिलित किया गया। साल-डेढ़ साल में होने वाली दो-तीन औपचारिक बैठकों में मैं उपस्थित भी रहा। आखिरी बार 2024 में कभी बैठक हुई थी। मुझे नहीं पता था कि न्यास अभी कार्यशील है या उसका कार्यकाल पूरा हो गया है। ताजा विवाद पर जब मीडिया के मित्रों ने प्रश्न किए तो मैंने सबसे पहले भारत भवन के प्रशासनिक अधिकारी प्रेमशंकर शुक्ला से इसकी जानकारी ली। मुझे बताया गया कि न्यास का अस्तित्व अभी है। कहा गया, “जब तक आपको सूचना न मिले कि आप नहीं हैं, तब तक मानकर चलें कि आप हैं।’
जब न्यास का पुनर्गठन हुआ तो ऐसी अनेक संस्थाओं ने हमसे संपर्क किया और चाहा कि या तो सभी संस्थाओं को यह महत्वपूर्ण कला केंद्र उपलब्ध होना चाहिए या एक ही नीति पर सबके साथ अमल होना चाहिए। यह पक्षपात क्यों? BLF के आयोजन में भारत भवन के कौन से या किसके हित जुड़े हैं जबकि इतने वर्षों में भी भोपाल के लेखक, दर्शक और श्रोताओं से उसका कोई तारतम्य तक नहीं बन पाया है और लिटरेचर फेस्टिवलों में उमड़ने वाली भीड़ आश्चर्यजनक रूप से यहाँ गायब रही है।
मुझे याद है कि न्यास मंडल की आरंभिक बैठकों में प्रसिद्ध रंगकर्मी राजीव वर्मा ने यह विषय बहुत प्रमुखता से उठाया था कि भारत भवन में बाहरी आयोजनों को लेकर हमारी नीति ‘एक और स्पष्ट’ होनी चाहिए। भारत भवन या तो सभी को उपलब्ध कराएँ या किसी को भी नहीं। बाकी न्यासियों को भी पहली ही बार पता चला था कि भोपाल की किसी एक संस्था के लिए भारत भवन में स्वागत द्वार सजते हैं और बाकियों के लिए ‘नो एंट्री’ का साइनबोर्ड है। स्वाभाविक रूप से सभी सहमत थे कि यह अनुचित है।
संभव है कि जनता से जुड़ाव न होने के कारण ही जानबूझकर ऐसे विषय और सत्र रखे जाते हों, जिनसे अनावश्यक भ्रम पैदा हो और विवाद खड़े हों। भीड़ जुटाने के लिए आयोजकों की ओर से प्रचार की यह एक सुनियोजित नीति के तहत किया जाता हो। मैं प्रसंगवश इंदौर लिटरेचर फेस्टिवल (ILF) को याद करना चाहूँगा। 11 साल से इंदौर में वह लोकप्रिय आयोजन के रूप में प्रतिष्ठित हुआ है, जहाँ इंदौर से बाहर के अनेक साहित्य और संस्कृतिप्रेमी केवल श्रोता के रूप में तीन दिन आकर शामिल होते हैं। हर सत्र में विषय से जुड़े श्रोताओं का एक समर्पित वर्ग इस आयोजन ने बना लिया है। बीते वर्षों में तारेक फतह और तसलीमा नसरीन जैसे चर्चित लेखक भी अनेक बार शामिल हुए हैं और कभी किसी विषय या पुस्तक को लेकर विवाद की एक लकीर नहीं देखी गई। तब लगता है कि BLF भारत भवन के लिए एक अपशगुन क्यों बना?
जो भी हो, यह स्पष्ट है कि भारत भवन को साधन संपन्न सरकारी प्रायोजक संस्थाओं से लैस शक्तिशाली BLF के आयोजकों ने विवादों का एक मैदान बना दिया गया है। इससे प्रचार या दुष्प्रचार BLF को जो भी मिला हो मगर भारत भवन की साख अनावश्यक ही चौपट हुई। एक न्यासी के रूप में मेरी चिंता केवल भारत भवन को लेकर है, जो हमारी पीढ़ी को विरासत में मिला है। वह हमने बनाया नहीं है। अगर हम उसको बहुकलाओं का एक निरंतर सक्रिय और जनता से जुड़ा हुआ केंद्र नहीं बना सकते तो कम से कम उसकी छवि को धूमिल करने वाले ऐसे विवादों के अवसर तो पैदा न करें। समय रहते संभलें। नीतियों और निर्णयों पर पुनर्विचार करें। यह जाँच का भी विषय है कि लगातार इतनी बदनामियों के बावजूद BLF को ढोने में दिलचस्पी किसकी है?
मेरा विनम्र सुझाव है कि हर साल पैदा होने वाले ऐसे कटुतापूर्ण प्रसंग का अब पटाक्षेप हो जाना चाहिए। शासन को निर्णय करना चाहिए कि अगले वर्ष से BLF के लिए भारत भवन उपलब्ध नहीं है। लाखों की मदद उन्हें शासन देता ही है। वे चाहें किसी भी बड़े होटल या रिसॉर्ट या धर्मशाला में यह आयोजन कर सकते हैं। भोपाल में जम्बूरी मैदान से लेकर लाल परेड ग्राउंड तक असीमित स्थान हैं। समाज में नेरेटिव बनाने के लिए जैसे भी विषय उन्हें चुनने हों, वे स्वतंत्र हैं, अभिव्यक्ति की अपार स्वतंत्रता अबाधित है और वे धन-साधन संपन्न तो हैं ही। किंतु भारत भवन को बचाना जरूरी है। यह भारत भवन के सभी पाँच प्रभागों को रिस्ट्रक्चर करने का बिल्कुल सही समय है।
मध्य प्रदेश भारत का ह्दय प्रदेश है। यहाँ भारत केंद्रित और स्थानीय प्रासंगिक विषयों की क्या कमी है? मध्य प्रदेश की सामाजिक, सांस्कृतिक विरासत, राजा भोज, विक्रमादित्य, रानी कमलापति, भीम बैठका और हाल ही में देश भर की चर्चा में आए विदिशा के ऐतिहासिक उदयपुर जैसे विषय अनेक हैं, जिन पर विमर्श किया जा सकता था। इनकी जगह पर बाबर जैसे आक्रांता की चर्चा भोपाल में समझ के परे है जबकि अयोध्या आस्था और विकास के मार्ग पर उजाले से भर रही है। नई शिक्षा नीति में इतिहास के पाठ्यक्रमों से भी बाबर-औरंगजेब समेटे जा रहे हैं। तब हम क्यों इतिहास के इन प्रेतों को अपने विमर्श में जिंदा रखना चाहते हैं? यह समय रामायण से राष्ट्रीय पुनर्जागरण तक भारत की अपनी महान गाथाएँ कहने का है। स्वयं प्रधानमंत्री बार-बार यही दोहरा रहे हैं।
मुझे लगता है, ऐसे संवेदनशील और ऊर्जा से भरे अनुकूल समय में बाबर जैसे आक्रमणकारी को विमर्श–केंद्र में लाना न केवल मूर्खतापूर्ण है, बल्कि भारत की आत्मा के वर्तमान प्रवाह के बिल्कुल विपरीत भी। कम से कम शासन के प्रांगण में शासन की सहायता से होने वाले वैचारिक अनुष्ठान को इनसे बचा जाना ही उचित था मगर अत्यंत दुख की बात है कि एक कर्कश विवाद एक बार फिर भारत भवन से जुड़ गया। BLF ने एक लेखक और उसकी किताब को अपनी ढाल बनाकर यह खेल भारत भवन के पवित्र परिसर से किया। यह असहनीय है।
मैं स्वयं लेखक हूँ और भारत में इस्लाम के फैलाव पर दो किताबें मेरी हैं। मैं स्पष्ट करना चाहूँगा कि किसी किताब या किसी लेखक से न्यास का कोई विरोध नहीं है। किंतु मध्य प्रदेश की साहित्यिक और सांस्कृतिक क्षेत्र में सक्रिय संस्थाओं को यह संदेश बिल्कुल नहीं जाना चाहिए कि भारत भवन में किसी भी संस्था विशेष या आयोजन विशेष के पक्ष में निर्णय लेने की अलग और मनमानी नीति है। आठ साल से यह एक परंपरा ही बन गई है। BLF की ओर से प्रस्तुत ताजा कटु प्रसंग यह बता रहा है कि घड़ा भर चुका है।
चीन ने एक बार फिर भारत को उकसाने की कोशिश की है। उसने भारतीय इलाके शक्सगाम घाटी पर अपना दावा किया है। 5180 वर्ग किमी का ये क्षेत्र पीओके में पड़ता है, जो भारत का अभिन्न अंग है। इस पर पाकिस्तान ने 1948 में कब्जा किया था और 1963 में चीन को सौंप दिया।
चीन की प्रवक्ता ने बताया ‘अपना क्षेत्र’
चीन के विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता माओ निंग ने जम्मू-कश्मीर में शक्सगाम घाटी पर भारत के दावे को खारिज करते हुए कहा है कि ये चीन का इलाका है इसलिए ‘अपने’ इलाके में इंफ्रास्ट्रक्चर बनाना पूरी तरह से सही है।
#BREAKING: China provoked India yet again, claiming Indian territory as their own. Chinese Foreign Minister Spokesperson has rejected India's claim to the Shaksgam Valley in Jammu & Kashmir.
"The territory you mentioned belongs to China. It’s fully justified for China to conduct… pic.twitter.com/HY2yBekBZ7
चीनी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता माओ निंग ने कहा कि जिस इलाके को लेकर सवाल उठ रहे हैं, वह चीन का ही हिस्सा है। अपने इलाके में इन्फ्रास्ट्रक्चर बनाना चीन का अधिकार है और इस पर कोई सवाल नहीं उठाया जा सकता।
माओ निंग ने आगे कहा कि चीन और पाकिस्तान ने 1963 में भारत के विरोध के बावजूद पीओके के क्षेत्र को लेकर समझौता किया था। इस दौरान दोनों देशों ने सीमा तय की थी। चीन इस क्षेत्र से सीपीईसी के तहत आर्थिक गलियारा बनाना चाहता है। हालाँकि चीन ने साफ कहा है कि चीन पाक सीमा समझौते और सीपीईसी का कश्मीर मुद्दे से कोई लेना देना नहीं है। इस पर चीन का रुख पहले जैसा ही है।
कश्मीर को चीन इतिहास से जुड़ा जटिल मुद्दा मानता है और भारत-पाकिस्तान के आपसी बातचीत से सुलझाने का हिमायती है। हालाँकि चीन यह भी कहता है कि वह संयुक्त राष्ट्र के प्रस्तावों और अंतरराष्ट्रीय समझौतों का सम्मान करता है।
चीन- पाकिस्तान सीमा समझौते का भारत ने किया विरोध
शक्सगाम घाटी भारतीय इलाका है। भारत ने 1963 में साइन किए गए तथाकथित चीन-पाकिस्तान सीमा समझौते को कभी मान्यता नहीं दी। भारत ने लगातार इस समझौते को गैर-कानूनी और अमान्य करार दिया है। भारत चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर को भी मान्यता नहीं देता है, क्योंकि ये आर्थिक गलियारा उस भारतीय इलाके से होकर गुजरता है, जिस पर पाकिस्तान ने जबरदस्ती और गैर-कानूनी तरीके से कब्जा किया हुआ है। इसमें कश्मीर के गिलगित-बाल्टिस्तान जैसे इलाके भी शामिल हैं।
भारत के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने 9 जनवरी 2026 को कहा है कि CPEC के तहत चीन PoK की शक्सगाम घाटी में इन्फ्रास्ट्रक्चर तैयार कर रहा है जो पूरी तरह गलत है। उन्होंने कहा, ” हम चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) को मान्यता नहीं देते, क्योंकि यह भारत के उस इलाके से होकर गुजरता है, जो पाकिस्तान के जबरन और अवैध कब्जे में है। जम्मू-कश्मीर और लद्दाख भारत का अभिन्न हिस्सा हैं। यह बात पाकिस्तान और चीन दोनों को कई बार साफ-साफ बताई जा चुकी है।”
रणधीर जायसवाल ने कहा कि शक्सगाम घाटी भारत का हिस्सा है और भारत 1963 में हुए तथाकथित चीन-पाकिस्तान सीमा समझौते को कभी मान्यता नहीं दी है और समझौते को हमेशा अवैध माना है।
1962 में चीन से भारत की जंग के बाद पाकिस्तान और चीन में ‘दोस्ती’ हो गई। चीन और पाकिस्तान में सीमा का निर्धारण किया। इसमें भारतीय क्षेत्र, जो पाकिस्तान के कब्जे में था, उसे भी बाँटा गया। पाकिस्तान ने 1948 में कब्जाए शक्सगाम घाटी के 5180 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को चीन को दे दिया।
समझौते के तहत घाटियों, नदियों आदि को सीमा के निर्धारण का आधार बनाया गया। हालाँकि भारत ने इसका पुरजोर विरोध किया। इस तरह से शक्सगाम घाटी जैसे भारतीय क्षेत्र चीन के कब्जे में आ गए।
CPEC का भारत करता रहा है विरोध
चीन पाकिस्तान आर्थिक गलियारा चीन के शिंजियांग प्रांत से पाकिस्तान के बलूचिस्तान स्थित ग्वादर बंदरगाह तक बनाया जा रहा आर्थिक गलियारा है। इस पर करीब 5 लाख करोड़ रुपए चीन खर्च कर रहा है। इसका मकसद चीन की पहुँच को अरब सागर तक पहुँचाना है।
CPEC के तहत चीन सड़क, बंदरगाह, रेलवे और ऊर्जा प्रोजेक्ट्स पर काम कर रहा है। ये आर्थिक गलियारा पीओके के गिलगिट-बाल्टिस्तान से होकर गुजरता है। ये क्षेत्र भारत का है, जिस पर पाकिस्तान ने कब्जा कर रखा है।
ये प्रोजेक्ट भारत को घेरने की कोशिश भी है। चीन की विस्तारवादी नीति जगजाहिर है। भारत के अक्साई चिन पर चीन ने कब्जा कर रखा है। पीओके के कुछ क्षेत्रों को पाकिस्तान ने अवैध तरीके से चीन को दे दिया है। अरुणाचल के कुछ हिस्सों पर चीन ने कब्जा कर रखा है। ऐसे में अरब सागर तक चीन की जबरदस्ती पहुँच से भारत के गुजरात जैसे राज्यों के लिए नई मुसीबत पैदा होगी।
वहीं चीन को नए कॉरिडोर से क्रूड ऑयल ले जाना आसान होगा क्योंकि अभी चीन की 80 फीसदी क्रूड ऑयल मलक्का की खाड़ी से होते हुए चीन तक पहुँचता है, जिससे उस पर खर्च काफी आता है। ये रास्ता 16 हजार किलोमीटर का है।
अगर कॉरिडोर से चीन का व्यापार हुआ तो दूरी 5 हजार किलोमीटर कम हो जाएगी। चीन मालदीप, श्रीलंका, बांग्लादेश समेत तमाम हिंद महासागर के देशों से अपनी दोस्ती बढ़ा रहा है। इस रास्ते से इन तक पहुँचने की दूरी भी कम हो जाएगी। दूसरी ओर चीनी नौसेना अरब सागर से लेकर हिंद महासागर पर नजर रखेगी। उत्तर में तिब्बत पर कब्जा कर चीन वैसे ही भारतीय सीमा पर खड़ा है।
कई सालों से शक्सगाम घाटी में इंफ्रास्ट्रक्चर बना रहा चीन
अलग-अलग मीडिया रिपोर्ट में दावा किया गया है कि चीन ने शक्सगाम घाटी में 10 मीटर चौड़ी सड़क का लगभग 75 किलोमीटर हिस्सा पहले ही बना लिया है, जबकि आगे भी कंस्ट्रक्शन जारी है। इससे पहले, चीनी पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) ने सड़क का 36 किलोमीटर हिस्सा बनाया था। इस सड़क के लगातार कंस्ट्रक्शन से चीन भारत के सियाचिन के करीब पहुँच रहा है।
सैटेलाइट इमेज से पता चलता है कि यह सड़क शक्सगाम घाटी के बाहर दो चीनी मिलिट्री पोस्ट से जुड़ी है। इनमें से एक इस इलाके में काम कर रही PLA यूनिट का हेडक्वार्टर हो सकता है। यह सड़क इसलिए अहम है क्योंकि यह ट्रांस-काराकोरम इलाके में है, जो ऐतिहासिक रूप से कश्मीर का हिस्सा है। PoK और शक्सगाम घाटी समेत पूरा जम्मू-कश्मीर भारत का हिस्सा है, जिसे पाकिस्तान ने गैर-कानूनी तरीके से चीन को दे दिया था।
POK के गिलगित-बाल्टिस्तान में अवैध तरीके से 2021 में एक सड़क बनाने का प्लान किया गया था जो मुज़फ़्फ़राबाद को मुस्तग दर्रे से जोड़ती। मुस्तग दर्रा पाकिस्तान बॉर्डर पर शक्सगाम घाटी से लगता है। बताया गया था कि यह सड़क शिनजियांग में यारकंद से जुड़ेगी, जिसका मतलब है कि यह सड़क शक्सगाम घाटी से होकर चीन के नेशनल हाईवे G219 से जुड़ेगी।
In a significant development, 🇨🇳 road has breached the border at Aghil Pass (4805 m) and entered the lower Shaksgam valley of Kashmir, 🇮🇳 with the road-head now less than 30 miles from 🇮🇳 Siachen
This permanently answers the question of Shaksgam for 🇮🇳
हालाँकि यह सड़क पाकिस्तान के कब्जे वाले गिलगित-बाल्टिस्तान में यूरेनियम जैसे मिनरल्स के परिवहन के लिए बनाई गई है, लेकिन भारत के खिलाफ जंग में चीन और पाकिस्तान इस सड़क का इस्तेमाल मिलिट्री ऑपरेशन के लिए कर सकते हैं।
खास बात यह है कि जिस सड़क की बात हो रही है, वह अघिल दर्रे में है। यह दर्रा पहले से तिब्बत के साथ कश्मीर का बॉर्डर रहा है। 1960 में भारत-चीन बॉर्डर पर बातचीत के दौरान चीनी पक्ष से कहा कि भारत सरकार के आधिकारिक मैप में ये इलाका भारत में दिखाते हैं। इंपीरियल गजेटियर ऑफ इंडिया के 1907 एडिशन मैप और सर्वे ऑफ इंडिया के पब्लिश किए गए पॉलिटिकल मैप मे भी ये भारत का हिस्सा है।”
पाकिस्तान ने चीन को वह इलाका दिया, जो कभी उसका था ही नहीं
शक्सगाम घाटी काराकोरम पहाड़ों की रेंज में एक ऊँचाई वाला इलाका है, जो करीब 5,180 किलोमीटर तक फैला है। यह घाटी सियाचिन ग्लेशियर के उत्तर में है। खास दर्रों के पास होने और PoK में चीन के शिनजियांग के साथ इसके कनेक्शन को देखते हुए इसका सामरिक महत्व बहुत है। हालाँकि 1963 के चीन-पाकिस्तान का अवैध समझौता इसके जड़ में है, हालाँकि ये विवाद 1947 से ही चला आ रहा है।
1947 में इस्लामिक तरीके से भारत के बंटवारे से पहले, शक्सगाम घाटी जम्मू और कश्मीर रियासत का हिस्सा थी। इस सियासत के राजा हरि सिंह थे। यह इलाका हुंजा के लोकल सरदार मीर के राज में आता था। हुंजा ने हिंदू महाराजा के अधिकार को माना। इतिहास गवाह है कि शक्सगाम घाटी और रस्कम घाटी जम्मू और कश्मीर की सीमाओं में शामिल थी। 19वीं सदी के आखिर और 20वीं सदी की शुरुआत में ब्रिटिश सर्वे ने भी इसे माना था। हालाँकि चीन ने किंग राजवंश के नाम पर ऐतिहासिक संबंधों के आधार पर इस पर दावे किए, लेकिन उन्हें औपचारिक रूप नहीं दिया गया।
भारत के बंटवारे और 1947 में पाकिस्तान के बनने के बाद, पाकिस्तान के सपोर्ट वाले कबायली हमलावरों ने जम्मू और कश्मीर पर हमला किया, जिससे पहला भारत-पाकिस्तान युद्ध शुरू हो गया। युद्ध के बीच, महाराजा हरि सिंह ने 26 अक्टूबर 1947 को इंस्ट्रूमेंट ऑफ़ एक्सेशन यानी विलय पत्र पर साइन किए, जिससे शक्सगाम घाटी सहित पूरा जम्मू और कश्मीर औपचारिक रूप से भारत का हिस्सा बन गया।
लेकिन, लड़ाई के दौरान पाकिस्तान ने उत्तरी कश्मीर के एक बड़े हिस्से पर कब्जा कर लिया, जिसमें शक्सगाम घाटी तक जाने वाले इलाके भी शामिल थे, क्योंकि यह कब्जा गैर-कानूनी था, इसलिए शक्सगाम घाटी समेत पूरा इलाका इंटरनेशनल कानून के मुताबिक आज भी भारतीय इलाका है।
यह माना जाता है कि चीन-पाकिस्तान के रिश्ते तभी मजबूत हुए, जब पाकिस्तान और चीन ने गैर-कानूनी CPEC के लिए हाथ मिलाया। लेकिन, पाकिस्तान लंबे समय से चीन को मना रहा है। चीन-पाकिस्तान के रिश्तों में छह दशकों का मिलिट्री सहयोग, आर्थिक और डिप्लोमैटिक तालमेल, 1963 में शक्सगाम घाटी पर समझौता, 1970 के दशक में न्यूक्लियर सहयोग की शुरुआत, 2013 में ग्वादर का ट्रांसफर और CPEC का ऑफिशियल लॉन्च शामिल है।
1962 में चीन-भारत युद्ध के बाद, पाकिस्तान ने चीन के साथ रिश्ते मज़बूत करने का मौका हाथ से जाने नहीं दिया। 2 मार्च 1963 को, चीन और पाकिस्तान ने चीन-पाकिस्तान फ्रंटियर एग्रीमेंट पर साइन किए। इस एग्रीमेंट के तहत पाकिस्तान ने दूसरे इलाकों में ‘सीमा एडजस्ट’ करने के बदले शक्सगाम वैली का कंट्रोल चीन को दे दिया। हालाँकि, यह एग्रीमेंट कंडीशनल था, जिसमें कहा गया था कि दिया गया इलाका कश्मीर मुद्दे पर भविष्य में भारत-पाकिस्तान के बीच होने वाले किसी भी सेटलमेंट में फाइनल रेजोल्यूशन के अधीन होगा।
गैर-कानूनी होने के अलावा यह समझौता बहुत गलत था। चीन शक्सगाम वैली पर कंट्रोल कैसे कर सकता है, इसे अपने शिनजियांग प्रांत में कैसे मिला सकता है, जबकि यह भी दावा कर सकता है कि यह इलाका कश्मीर पर फाइनल रेजोल्यूशन के अधीन होगा? मान लीजिए, अगर भारत और पाकिस्तान कश्मीर पर सहमत हो जाते हैं, और शक्सगाम वैली को भारत को वापस करने का फैसला किया जाता है, तो क्या चीन, वहां इंफ्रास्ट्रक्चर में भारी इन्वेस्टमेंट करने के बाद, स्ट्रेटेजिक रूप से महत्वपूर्ण वैली को भारत को सौंप देगा?
भारत ने 1963 के चीन-पाकिस्तान एग्रीमेंट को लगातार इस आधार पर खारिज किया है कि पाकिस्तान ने जम्मू और कश्मीर के उन हिस्सों पर गैर-कानूनी कब्जा कर लिया है जिन्हें अब PoK कहा जाता है, और इस तरह उसके पास भारत के इलाके पर बातचीत करने या उसे सौंपने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है। क्योंकि विलय के समय शक्सगाम घाटी जम्मू और कश्मीर का हिस्सा थी, इसलिए PoK पर पाकिस्तान का कंट्रोल एक गैर-कानूनी कब्जा है।
पाकिस्तान को चीन के साथ भारतीय इलाके के बारे में द्विपक्षीय समझौता करने का कोई हक नहीं था। यह नहीं भूलना चाहिए कि हुंजा के मीर ने महाराजा हरि सिंह के अधिकार को मान्यता दी थी, और महाराजा ने कानूनी तौर पर और अपनी मर्जी से पूरा जम्मू और कश्मीर भारत को दे दिया था।
PoK सरकार ने 1949 में पाकिस्तान सरकार के साथ कराची एग्रीमेंट किए, जिसमें गिलगित-बाल्टिस्तान के सभी ज़मीनी अधिकार पाकिस्तान को दे दिए गए थे। खबर है कि इस एग्रीमेंट पर मुश्ताक अहमद गुरमानी (कश्मीर मामलों के मंत्री), सरदार मोहम्मद इब्राहिम खान (तथाकथित ‘आजाद कश्मीर’ के प्रेसिडेंट) और चौधरी गुलाम अब्बास ने साइन किए थे।
समझौते में तथाकथित ‘आजाद कश्मीर’ ने गिलगित-बाल्टिस्तान का पूरा एडमिनिस्ट्रेशन पाकिस्तान को सौंप दिया (जिसने इस इलाके का कुछ हिस्सा चीन को दे दिया)। इसी इलाके से पाकिस्तान ने 5000 स्क्वायर किलोमीटर (शक्सगाम घाटी) चीन को सौंप दिया था।
असल में सरदार इब्राहिम ने बाद में बताया कि उनके साइन नकली किए गए थे। दरअसल उनका साइन मुहम्मद दीन तासीर ने किए थे। कराची एग्रीमेंट पर साइन करने के तुरंत बाद इब्राहिम को पद से हटा दिया गया।
चाहे PoK पर कब्जा हो या शक्सगाम घाटी को सौंपना, पाकिस्तान पहले से ही एक गैर-कानूनी कब्जा करने वाला रहा है, जिसके पास पूरे जम्मू-कश्मीर इलाके के बारे में किसी भी देश के साथ कोई भी एग्रीमेंट करने का कोई कानूनी हक नहीं है।
भारत ने शक्सगाम घाटी में जमीनी हकीकत को बदलने की कोशिशों के खिलाफ चीन के सामने लगातार विरोध जताया है। अभी भी चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे का पुरजोर विरोध कर रहा है और 1963 में शक्सघाटी को चीनी कब्जे में दिए जाने का विरोध किया था। भारत अपने हितों की रक्षा के लिए जरूरी कदम उठाने का अधिकार भी रखता है। पड़ोसियों के रवैये पर भारत का स्टैंड हमेशा साफ रहा है।
भारत में त्यौहार केवल छुट्टियाँ नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का एक जीवंत माध्यम हैं। मकर संक्रांति से ठीक एक दिन पहले मनाया जाने वाला लोहड़ी का पर्व उत्तर भारत, विशेषकर पंजाब और हरियाणा की आत्मा है। कड़कड़ाती ठंड, ढोल की थाप और अग्नि के चारों ओर नाचते-गाते लोग… यह दृश्य भाईचारे और नई फसल के स्वागत का प्रतीक है।
लेकिन पिछले कुछ वर्षों से एक अजीब विरोधाभास देखने को मिल रहा है। जिस तरह दिवाली और होली को ‘प्रदूषण’ और ‘पानी की बर्बादी’ के नाम पर निशाना बनाया गया, अब वही नैरेटिव लोहड़ी के साथ भी जोड़ा जा रहा है। मीडिया और सोशल मीडिया के एक वर्ग के जरिए लोहड़ी की पवित्र अग्नि को ‘वायु प्रदूषण’ का कारण बताकर बदनाम किया, जबकि उसी समय पश्चिमी देशों से आए ‘बॉनफायर’ (Bonfire) को एक आधुनिक और कूल ‘कल्चर’ के रूप में पेश किया। इस दोहरी मानसिकता के पीछे का सच और लोहड़ी के वास्तविक महत्व को समझने का प्रयास करते हैं।
लोहड़ी और बॉनफायर: केवल नाम का अंतर नहीं, बल्कि नीयत और इतिहास का फर्क है
आजकल के दौर में किसी भी त्यौहार पर अपनी राय बनाने या उसे सही-गलत ठहराने से पहले हमें यह समझना चाहिए कि वह त्यौहार शुरू क्यों हुआ था। आज हम ‘लोहड़ी’ और ‘बॉनफायर’ दोनों को एक ही तराजू में तौल देते हैं, लेकिन हकीकत यह है कि इन दोनों के बीच का अंतर सिर्फ भाषा का नहीं है।
इनके पीछे की भावना, इनका इतिहास और इनका मकसद एक-दूसरे से पूरी तरह अलग है। जहाँ एक तरफ लोहड़ी हमारी मिट्टी और किसान की मेहनत से जुड़ी है, वहीं बॉनफायर का इतिहास कुछ ऐसा है जिसके बारे में जानकर आप हैरान रह जाएँगे।
लोहड़ी: क्यों यह किसान की मुस्कान और प्रकृति का धन्यवाद है?
लोहड़ी का नाम सुनते ही हमारे मन में आग की लपटें और उसके चारों ओर नाचते-गाते लोगों की तस्वीर आती है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि यह शब्द कहाँ से आया? जानकारों का मानना है कि लोहड़ी शब्द ‘लोह’ और ‘ड़ी’ के मेल से बना है। यहाँ ‘लोह’ का अर्थ उस लोहे के तवे से है जिस पर रोटियाँ सिंकती हैं और ‘ड़ी’ का संबंध ‘रेवड़ी’ से है। यह त्यौहार उस समय आता है जब उत्तर भारत में कड़ाके की ठंड अपने चरम पर होती है और किसान की रबी की फसल (जैसे गेहूँ और सरसों) खेतों में लहलहाने लगती है।
किसानों के लिए लोहड़ी का मतलब है ‘आर्थिक आजादी’ और ‘समृद्धि’। महीनों की हाड़-तोड़ मेहनत के बाद जब फसल कटने को तैयार होती है, तो किसान सबसे पहले अग्नि देवता का आभार व्यक्त करता है। वह अग्नि में तिल, गुड़, गजक और मक्का अर्पित करता है। यह केवल एक रस्म नहीं है, बल्कि यह कहना है कि ‘हे ईश्वर, आपकी कृपा से हमारे घर में अन्न आया है, इसे स्वीकार करें और आगे भी हमें खुशहाल रखें।’ यह त्यौहार इंसान और प्रकृति के गहरे रिश्ते को दर्शाता है।
लोहड़ी का वैज्ञानिक और सामाजिक आधार
अगर हम वैज्ञानिक नजरिए से देखें, तो लोहड़ी के समय उत्तर भारत (खासकर पंजाब, हरियाणा, चंडीगढ़ और दिल्ली) में तापमान गिरकर 3 डिग्री सेल्सियस तक पहुँच जाता है। इतनी भयानक ठंड में शरीर को ऊष्मा (Heat) की जरूरत होती है। प्राचीन समय से ही, जब बिजली या हीटर नहीं होते थे, तब ‘सामूहिक अग्नि’ ही वह जरिया थी जो लोगों को ठंड से बचाती थी।
सामाजिक रूप से भी इसका बड़ा महत्व है। लोहड़ी के बहाने पूरा मोहल्ला या गाँव एक ही आग के पास बैठता है। इसमें कोई अमीर या गरीब नहीं होता। ऊँच-नीच का भेद मिटाकर लोग साथ बैठते हैं, मूँगफली खाते हैं और दुख-सुख बाँटते हैं। यानी यह आग केवल लकड़ी नहीं जलाती, बल्कि समाज के बीच की कड़वाहट को जलाकर भाईचारे की मिठास पैदा करती है।
बॉनफायर का ‘स्याह’ इतिहास: जिसे हम मजा समझते हैं, उसका सच क्या है?
अब बात करते हैं उस ‘बॉनफायर’ की, जिसे आज की पीढ़ी और मीडिया बहुत ‘कूल’ और ‘मॉडर्न’ मानता है। अक्सर हम देखते हैं कि बड़े होटलों या फार्म हाउसों में ‘बॉनफायर पार्टी’ होती है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि यह शब्द कहाँ से आया? बॉनफायर असल में अंग्रेजी के शब्द ‘Bone-fire’ से बना है, जिसका सीधा मतलब है ‘हड्डियों की आग‘।
प्राचीन और मध्यकालीन यूरोप में इस आग का इतिहास बड़ा डरावना था। उस समय जब बड़े पैमाने पर युद्ध होते थे या ऐसी बीमारियाँ (महामारी) फैलती थीं जिनसे हजारों लोग मर जाते थे, तो लाशों के ढेर लग जाते थे। उन लाशों और उनकी हड्डियों को ठिकाने लगाने के लिए जो विशाल आग जलाई जाती थी, उसे ‘बोन-फायर’ कहा जाता था। इतना ही नहीं, जो लोग धर्म या समाज के खिलाफ कुछ बोलते थे (जिन्हें हैरिटिक्स कहा जाता था) या जिन महिलाओं को ‘चुड़ैल’ करार दिया जाता था, उन्हें भी सजा के तौर पर इन्हीं विशाल आग के ढेरों में जिंदा जला दिया जाता था।
आधुनिक दौर की विडंबना: सजा वाली आग ‘मजा’ बन गई
समय बदला और धीरे-धीरे इस ‘बोन-फायर’ को ‘बॉनफायर’ कहा जाने लगा। फ्रेंच भाषा में ‘Bon’ का मतलब ‘अच्छा’ होता है, तो लोगों ने मान लिया कि यह एक ‘अच्छी आग’ है। आज इसे मनोरंजन, शराब और संगीत के साथ जोड़ दिया गया है। इसमें न तो कोई धार्मिक भावना है, न ही प्रकृति के प्रति कोई सम्मान।
सबसे बड़ी विडंबना देखिए- मीडिया और सोशल मीडिया के ‘ज्ञानियों’ का दोहरा मापदंड यहाँ साफ दिखता है। जिस बॉनफायर का इतिहास ‘मौत, सजा और लाशों की हड्डियों’ से जुड़ा है, उसे आज का मीडिया ‘एंजॉयमेंट’ और ‘हाई-फाई कल्चर’ का हिस्सा बताता है। उसके खिलाफ कभी कोई खबर नहीं छपती कि यह पर्यावरण को नुकसान पहुँचा रहा है।
देसी मीडिया में ‘बॉनफायर’ को ‘कल्चर’ बताने का चलन
लेकिन जिस लोहड़ी का आधार ‘जीवन, नई फसल, किसान की खुशी और प्रकृति का पूजन’ है, उसे तुरंत ‘प्रदूषण’ से जोड़ दिया जाता है। उसे बंद करने या रोकने के लिए हर साल अखबारों में लंबी-चौड़ी रिपोर्ट्स छापी जाती हैं। यह सोचना बेहद जरूरी है कि हमारी अपनी पावन परंपरा को ‘विलेन’ और विदेशी ‘सजा वाली आग’ को ‘हीरो’ बनाकर पेश करने के पीछे आखिर मानसिकता क्या है?
बॉनफायर जैसी चीजों को हाइप देने का कार्य मीडिया में इस तरह किया गया कि आजकल ट्रैवल एजेंसियाँ कहीं अगर छुट्टियों का पैकेज बनाती हैं तो उसमें बॉनफायर नाइट का एक अलग इवेंट की तरह बताया जाता है।
परंपरा के विरुद्ध नैरेटिव: लोहड़ी को बदनाम करने की कोई साजिश
पिछले कुछ सालों में एक अजीब सा चलन देखने को मिला है। जैसे ही कोई हिंदू त्यौहार करीब आता है, अचानक से ‘पर्यावरण प्रेमियों’ की बाढ़ आ जाती है। दिवाली पर पटाखों और होली पर पानी की बर्बादी का नैरेटिव सेट करने के बाद, अब लोहड़ी को निशाना बनाया जा रहा है।
इसे ‘इको-फ्रेंडली’ बनाने के नाम पर असल में त्यौहार की रस्मों को ही खत्म करने का एक सुनियोजित प्रयास किया। मीडिया और सोशल मीडिया के जरिए लोगों के मन में यह बात बिठाने की कोशिश की जाती है कि आपकी आस्था पर्यावरण की दुश्मन है।
निशाने पर त्यौहार: एक रात की अग्नि बनाम साल भर का प्रदूषण
अखबारों और बड़े न्यूज पोर्टल्स में ऐसी खबरें बड़ी चालाकी से पेश की जाती हैं, जिनसे लगे कि लोहड़ी जलते ही शहर की हवा जहरीली हो गई। वे AQI (हवा की गुणवत्ता मापने वाला पैमाना) के आँकड़े दिखाते हैं। जबकि सच यह है कि दिल्ली और चंडीगढ़ जैसे शहरों में प्रदूषण का स्तर (PM 2.5 और PM 10) पहले से ही सुरक्षित सीमा से कई गुना ज्यादा होता है।
पूरे साल चलने वाले कारखानों, सड़कों पर दौड़ती करोड़ों गाड़ियों और बड़े-बड़े निर्माण कार्यों से जो धुआँ निकलता है, उस पर चुप्पी साध ली जाती है। लेकिन जैसे ही लोहड़ी की एक रात सांकेतिक अग्नि जलती है, उसे पूरे साल के प्रदूषण का विलेन बनाकर पेश कर दिया जाता है।
मीडिया का दोहरा चरित्र: लोहड़ी ‘धुआँ’ है और बॉनफायर ‘स्टाइल’
मीडिया की दोहरी मानसिकता यहाँ एकदम साफ हो जाती है। जब बात लोहड़ी की आती है, तो हेडलाइंस होती हैं- ‘धुएँ से घुट रहा दम’, ‘पेड़ काटने से पर्यावरण का नुकसान’, या ‘इस बार धुएँ वाली नहीं, स्मॉक-फ्री लोहड़ी मनाएँ’।
लेकिन जैसे ही कोई हाई-प्रोफाइल ‘बॉनफायर नाइट’ होती है, तो वही मीडिया लिखता है- ‘कड़कड़ाती ठंड में बॉनफायर पार्टी का मजा लें’, ‘शहर के वो खास ठिकाने जहाँ आप बॉनफायर का आनंद ले सकते हैं’।
यही काम सोशल मीडिया के ‘इनफ्लुएंसर्स’ भी करते हैं। वे लोहड़ी पर तो ज्ञान देंगे कि लकड़ियाँ नहीं जलानी चाहिए, लेकिन अपनी न्यू ईयर पार्टी या हिल स्टेशन की वेकेशन में बॉनफायर के सामने बैठकर शराब के गिलास के साथ फोटो डालेंगे। वहाँ वह आग ‘लक्जरी’ और ‘स्टेटस सिंबल’ बन जाती है, लेकिन वही आग लोहड़ी के आँगन में जलती है तो ‘पिछड़ापन’ और ‘प्रदूषण’ कहलाने लगती है।
इतिहास के साथ छेड़छाड़: राजाओं की चाटुकारिता या जनता का विद्रोह?
कुछ ‘बुद्धिजीवी’ तो एक कदम और आगे निकल जाते हैं। वे यह भ्रामक बात फैलाते हैं कि लोहड़ी का त्यौहार पुराने समय में राजाओं को खुश करने के लिए शुरू हुआ था। यह सरासर गलत और इतिहास को दबाने की कोशिश है। लोहड़ी का सीधा संबंध दुल्ला भट्टी की बहादुरी से है। मुगल शासन के दौरान दुल्ला भट्टी ने उन गरीब हिंदू लड़कियों को बचाया था जिन्हें गुलामी के बाजार में बेचा जा रहा था।
दुल्ला भट्टी ने उन लड़कियों का पिता बनकर उनका कन्यादान किया और आग जलाकर उनके फेरे करवाए। इसलिए लोहड़ी ‘चाटुकारिता’ का नहीं, बल्कि अन्याय के खिलाफ ‘विद्रोह’, ‘न्याय’ और ‘भाईचारे’ का त्यौहार है। इसे केवल एक ‘फैशनेबल कल्चर’ कहना इसकी महानता को कम करना है।
एजेंडे से बड़ी है आस्था
राहत की बात यह है कि अब देश की जनता इन प्रोपेगेंडा फैलाने वालों से ज्यादा समझदार हो गई है। लोग त्यौहार छोड़ नहीं रहे, बल्कि उसे अधिक जिम्मेदारी के साथ मना रहे हैं। चंडीगढ़ और दिल्ली-NCR में बहुत से लोग पेड़ की लकड़ियों की जगह ‘गौकाष्ठ’ (गाय के गोबर से बनी लकड़ी) का इस्तेमाल कर रहे हैं। इससे प्रदूषण भी नहीं होता और हमारी धार्मिक मान्यता के अनुसार अग्नि पूजन और शुद्ध हो जाता है।
इसके अलावा, लोग अब घर-घर छोटी आग जलाने के बजाय पूरे मोहल्ले में एक सामूहिक लोहड़ी जला रहे हैं। इससे लकड़ी भी कम लगती है और आपसी भाईचारा भी बढ़ता है। जनता की यह सजगता उन लोगों के मुंह पर तमाचा है जो पर्यावरण के बहाने हमारी संस्कृति को खत्म करना चाहते थे।
पर्यावरण के नाम पर त्यौहारों को नीचा दिखाना एक ‘फैशन’ बन गया है। आज लोग ओपिनियन के नाम पर यह ज्ञान तो आसानी से दे देते हैं कि दीवाली-होली या लोहड़ी कैसे मनाई जाए, लेकिन वे अपनी जीवनशैली में कोई बदलाव नहीं करते। लोहड़ी के जश्न को रोकने की कोशिश सिर्फ इसलिए की गई ताकि हमारे मन में अपनी ही जड़ों के प्रति अपराध बोध पैदा हो सके।
लेकिन लोहड़ी की आँच को बुझाने वाले यह भूल गए कि इसे मनाने वाले वर्ग (विशेषकर पंजाब और हरियाणा) ने इन्हें कभी मौका ही नहीं दिया। आज जनता तथाकथित ‘एक्टिविस्ट’ से कहीं ज्यादा जागरूक है। लोहड़ी की यह पावन अग्नि हमें याद दिलाती है कि हमारी परंपराएँ प्रकृति का सम्मान करना सिखाती हैं, नुकसान पहुँचाना नहीं। हमें अपनी जड़ों पर गर्व करना चाहिए और ऐसे हर एजेंडे को लोहड़ी की इसी अग्नि में भस्म कर देना चाहिए जो हमें अपनी पहचान से दूर ले जाना चाहता है।