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बच्चे अपना जेंडर चुनने पर कर पाएँ विचार इसलिए लड़के-लड़कियों का यौवन रोकने के प्रयास: जानिए क्या है ‘प्यूबर्टी ब्लॉकर्स’, UK में जिसके ट्रायल के खिलाफ उतरीं हस्तियाँ

यूनाइटेड किंगडम में इस समय बच्चों और युवाओं के जेंडर डिस्फोरिया के इलाज को लेकर बहस चल रही है। जेंडर डिस्फोरिया का मतलब होता है कि कोई बच्चा या युवा अपने जन्म के समय दिए गए जेंडर से खुद को असहज महसूस करता है। ऐसे मामलों में कुछ समय से ‘प्यूबर्टी ब्लॉकर्स’ नाम की दवाओं का इस्तेमाल किया जाता रहा है जो शरीर में यौवन (प्यूबर्टी) की प्रक्रिया को कुछ समय के लिए रोक देती हैं। 2024 में आई ‘कैस रिव्यू’ नाम की एक सरकारी रिपोर्ट में कहा गया कि इन दवाओं के फायदे और नुकसान को लेकर पुख्ता वैज्ञानिक सबूत नहीं हैं। इसके बाद ब्रिटेन की सरकारी स्वास्थ्य सेवा NHS ने बच्चों पर इन दवाओं के सामान्य इस्तेमाल पर रोक लगा दी।

अब विवाद इसलिए फिर बढ़ गया है क्योंकि जनवरी 2026 से ‘पाथवे’ नाम का एक नया क्लिनिकल ट्रायल शुरू किया जा रहा है, जिसमें इन प्यूबर्टी ब्लॉकर्स को दोबारा बच्चों पर आजमाया जाएगा। Christian Today की रिपोर्ट के मुताबिक, इसमें 10 से 16 साल की उम्र के लगभग 220 बच्चों को प्यूबर्टी ब्लॉकर्स दिए जाएँगे। इसी के विरोध में एक ऑनलाइन पिटीशन शुरू की गई है, जिस पर अब तक 1 लाख से ज्यादा लोग साइन कर चुके हैं और सरकार से इस ट्रायल को रोकने की माँग कर रहे हैं।

याचिका में की गई है क्या माँग?

8 जनवरी 2025 को संसद की आधिकारिक वेबसाइट पर यह याचिका डाली गई थी। हैरी पॉटर की लेखिका जे.के. रोलिंग जैसी हस्तियों द्वारा समर्थन के बाद इसे भारी समर्थन मिला। जे.के. रोलिंग ने कहा कि उन्होंने इस याचिका पर हस्ताक्षर किए हैं और यह बच्चों पर किया जा रहा एक अनैतिक प्रयोग है।

इस याचिका को डालने वाले थेरेपिस्ट जेम्स ऐस्स ने बताया कि इस याचिका पर एक लाख लोगों का समर्थन जुटाने के लिए 6 महीनों का समय था लेकिन ऐसे 4 दिन में ही हो गया।

इस याचिका में माँग की गई है, “सरकार जानती है कि ‘प्यूबर्टी ब्लॉकर्स’ से बच्चों के शरीर और मन पर ऐसे असर पड़ सकते हैं जो बाद में पूरी तरह ठीक न हों। ‘कैस रिव्यू’ के बाद खुद सरकार ने माना है कि इनमें जोखिम हैं। इसके बावजूद सरकार की अनुमति से होने वाले एक ट्रायल के तहत सैकड़ों बच्चों को ‘प्यूबर्टी ब्लॉकर्स’ दिए जाने की तैयारी की जा रही है।”

याचिका में कहा गया है, “इस ट्रायल को रद्द किया जाए। जो बच्चे अपने शरीर को लेकर असहज महसूस करते हैं, जिनमें से कई ऑटिज़्म से भी प्रभावित होते है उनके लिए सही रास्ता समय देना, प्यूबर्टी को स्वाभाविक रूप से आगे बढ़ने देना और उन्हें समझने-सहजने वाली थैरेपी देना है। समाधान यह नहीं हो सकता कि बच्चों को ऐसी मेडिकल प्रक्रिया में डाल दिया जाए जो दिमाग के विकास, हड्डियों की बढ़त, यौन क्षमता को नुकसान पहुँचा सकती है और भविष्य में बाँझपन तक का खतरा पैदा कर सकती है।”

‘प्यूबर्टी ब्लॉकर्स’ क्या हैं?

प्यूबर्टी ब्लॉकर्स जिन्हें वैज्ञानिक भाषा में गोनाडोट्रोपिन-रिलीजिंग हार्मोन (GnRH) एनालॉग्स कहा जाता है, ऐसी दवाएँ हैं जो शरीर में सेक्स हार्मोन्स (एस्ट्रोजन और टेस्टोस्टेरॉन) के उत्पादन को दबाती हैं। ये प्यूबर्टी से जुड़े शारीरिक बदलावों को रोकती हैं जिनमें लड़कियों में स्तनों का विकास, मासिक धर्म, कूल्हों का चौड़ा होना और लड़कों में वृषण का बड़ा होना, आवाज का गहरा होना, चेहरे पर बाल आना जैसे बदलाव शामिल हैं। ये दवाएँ इंजेक्शन, इम्प्लांट या नेजल स्प्रे के रूप में दी जाती हैं, और आमतौर पर हर 1-3 महीने में दोहराई जाती हैं।

अमेरिकी सरकार के स्वास्थ्य विभाग से जुड़े नेशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन में प्रकाशित एक रिपोर्ट के मुताबिक, आमतौर पर प्यूबर्टी लड़कियों में 8 से 13 साल की उम्र के बीच और लड़कों में 9 से 14 साल की उम्र के बीच शुरू होती है और यह 5 चरणों में आगे बढ़ती है। इन दवाओं को शुरुआत में उन बच्चों के इलाज के लिए बनाया गया था जिनमें प्यूबर्टी सामान्य उम्र से बहुत पहले शुरू हो जाती थी। बाद के वर्षों में इनका इस्तेमाल जेंडर डिस्फोरिया से जूझ रहे बच्चों और युवाओं में भी किया जाने लगा। यह माना गया कि प्यूबर्टी को रोककर उन्हें समय मिलेगा ताकि वे बिना शरीर में होने वाले अनचाहे बदलावों के तनाव के अपनी जेंडर पहचान को समझ सकें और बाद में यह फैसला कर सकें कि आगे जेंडर-अफर्मिंग हार्मोन थेरेपी लेनी है या नहीं।

‘जेंडर आइडेंटिटी’ को लेकर बढ़ रहा है भ्रम!

UK में NHS की एक विशेष सेवा है जिसे ‘जेंडर आइडेंटिटी डेवलपमेंट सर्विस’ (GIDS) कहा जाता है। यह उन बच्चों और युवाओं की मदद करती है जिन्हें अपनी जेंडर पहचान को लेकर भ्रम, असहजता या मानसिक परेशानी महसूस होती है। नवंबर 2023 में यूके की संसद में एक रिपोर्ट पेश की गई जिसमें बताया गया कि साल 2011–12 में इस सेवा के पास केवल 210 बच्चों और युवाओं को भेजा गया था लेकिन 2021–22 तक यह संख्या बढ़कर 5,000 से भी ज्यादा हो गई।

यानी लगभग दस सालों में जेंडर पहचान से जुड़ी समस्याओं के लिए मदद लेने वाले बच्चों और युवाओं की संख्या में तेज बढ़ोतरी हुई है। GIDS पूरे UK के बच्चों और युवाओं की देखभाल करता है। इनमें से कुछ बच्चे और युवा ट्रांसजेंडर होते हैं जबकि कई ऐसे भी होते हैं जो केवल अपनी पहचान को लेकर उलझन या तनाव से गुजर रहे होते हैं।

जेंडर डिस्फोरिया और युवाओं में इसका इलाज

जेंडर डिस्फोरिया एक मानसिक स्थिति है जिसमें व्यक्ति अपने जन्म के समय मिले जेंडर को लेकर असहज महसूस करता है। इससे तनाव, चिंता और अवसाद जैसी समस्याएँ हो सकती हैं। ब्रिटेन में ऐसे मामलों की संख्या तेजी से बढ़ी है और विशेषज्ञ बताते हैं कि इन बच्चों में से कई ऑटिज्म या अन्य मानसिक समस्याओं से भी जूझ रहे होते हैं।

जेंडर डिस्फोरिया के इलाज के दो मुख्य तरीके हैं। इसमें पहला है- ‘एफर्मेटिव केयर’ जिसमें बच्चे की बताई गई जेंडर पहचान को स्वीकार कर हार्मोन या सर्जरी जैसे मेडिकल इलाज दिए जाते हैं। दूसरा है- ‘एक्सप्लोरेटिव थेरेपी’ जिसमें बच्चे की मानसिक स्थिति, परिवार, समाज और भावनात्मक कारणों को समझने की कोशिश की जाती है।

ब्रिटेन में पहले NHS की टैविस्टॉक क्लिनिक, जिसे GIDS भी कहते हैं, में प्यूबर्टी ब्लॉकर्स का खूब इस्तेमाल होता था लेकिन 2020 में कीरा बेल नामक मरीज का केस के बाद यह सवाल उठा कि क्या बच्चे इसके जोखिम समझ सकते हैं। इसके बाद ऐसे इलाजों पर रोक लगी। दूसरे देशों में भी रुख बदल रहा है। फिनलैंड और स्वीडन ने इन दवाओं पर पाबंदी लगाई है।

‘कैस’ रिव्यू में क्या सामने आया?

2020 में NHS ने एक रिव्यू शुरू करवाया जिसकी अुगआई डॉ. हिलेरी कैस ने की थी। इसका उद्देश्य युवाओं के लिए दी जा रही जेंडर आइडेंटिटी सेवाओं की गहराई से जाँच करना था, क्योंकि ऐसे मामलों में तेजी से बढ़ोतरी हो रही थी और इलाज से जुड़े ठोस सबूत कमजोर माने जा रहे थे। अप्रैल 2024 में इसकी फाइनल रिपोर्ट पब्लिश की गई।

इसमें पाया गया कि प्यूबर्टी ब्लॉकर्स के पीछे का वैज्ञानिक आधार अभी स्पष्ट नहीं है। जेंडर डिस्फोरिया, मानसिक स्वास्थ्य या सामाजिक-मनोवैज्ञानिक स्थिति पर इसके प्रभावों को लेकर ठोस सबूत बहुत कम हैं। दिमागी विकास और यौन-मनोवैज्ञानिक विकास पर इसके क्या असर पड़ते हैं, यह भी अभी ठीक से पता नहीं है। रिपोर्ट में कहा गया कि इन दवाओं से हड्डियों की मजबूती, दिमाग के विकास और प्रजनन क्षमता पर संभावित प्रभाव हो सकता है

रिपोर्ट में कहा गया, “18 साल से कम उम्र के बच्चों और युवाओं में मर्दाना या औरतों वाले हार्मोन देने को लेकर भी कई सवाल बने हुए हैं। कम उम्र में इलाज शुरू करने वालों पर लंबे समय तक किए गए अध्ययन उपलब्ध नहीं हैं, इसलिए इसके भविष्य के नतीजों को पूरी तरह समझना संभव नहीं है। डॉक्टर भी यह भरोसे से नहीं बता सकते कि कौन-से बच्चे आगे चलकर स्थाई रूप से ट्रांसजेंडर पहचान अपनाएँगे।”

ट्रायल के समर्थन और विरोध में तर्क

इस ‘प्यूबर्टी ब्लॉकर’ ट्रायल को लेकर कई तरह की चिंताएँ सामने आई हैं। आलोचकों का कहना है कि यह ट्रायल नैतिक रूप से सही नहीं है और बच्चों की सुरक्षा से जुड़े सवाल खड़े करता है। जेनस्पेक्ट जैसे समूहों के अनुसार, ट्रायल की योजना में उन बच्चों का जिक्र नहीं है जो बाद में अपना फैसला बदल सकते हैं। उनका कहना है कि लगभग 98 प्रतिशत बच्चे आगे चलकर हार्मोन इलाज पर चले जाते हैं, जिससे भविष्य में संतान पैदा करने की क्षमता प्रभावित हो सकती है। ट्रायल केवल दो साल का है, जबकि पछतावे के मामले कई बार 7-11 साल बाद सामने आते हैं। इन समूहों ने दिसंबर 2025 में विरोध प्रदर्शन किए और सांसदों से इस ट्रायल को रोकने की माँग की।

वहीं, ट्रायल के समर्थकों का कहना है कि इससे ठोस जानकारी मिलेगी और परिवार बेहतर फैसले ले पाएँगे। सरकार ने इसे मंजूरी दी है लेकिन कई दलों के नेता इसके खिलाफ हैं। दूसरे देशों में भी ऐसे इलाजों को रोका जा रहा है। कुल मिलाकर यह बहस बच्चों की सुरक्षा और सही इलाज को लेकर है और फैसला इसी आधार पर होना चाहिए।

सोमनाथ, नेहरू और 17 चिट्ठियाँ: मंदिर पुनर्निर्माण के समय ‘सेक्युलर’ जवाहरलाल को एक नहींं कई दिक्कतें थी, पचा नहीं पा रहे थे सनातन धाम की भव्य दिव्य वापसी

सोमनाथ मंदिर के रेनोवेशन के बाद मई 1951 में उद्घाटन कार्यक्रम के लिए तत्कालीन राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद को बुलाया गया था। हमने पिछले हिस्से में देखा कि कैसे प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने इतना हंगामा किया कि राष्ट्रपति खुद कार्यक्रम में जाएँ, फिर भी राजेंद्र प्रसाद कार्यक्रम में शरीक हुए। सोमनाथ मामले को लेकर नेहरू के कुछ और लेटर देखते हैं।

सोमनाथ मंदिर का प्रोग्राम पास आ रहा था। इसी बीच, अप्रैल 1951 में, ट्रस्ट के अध्यक्ष जामसाहेब दिग्विजय सिंह जडेजा ने कुछ पड़ोसी देशों में इंडियन एम्बेसी को लेटर लिखकर वहाँ की नदियों का पानी भेजने का आग्रह किया। इनका इस्तेमाल उद्घाटन के मौके पर किया जाना था। ‘सेक्युलर’ जवाहरलाल ने इस पर एतराज जताया। दर्द इतना ज़्यादा था कि नेहरू ने एक साथ कई लेटर फाड़ दिए।

नेहरू आगे कहते हैं, ‘मुझे समझ नहीं आता कि हम इस बात की चिंता क्यों नहीं करते कि दूसरे हमारे कामों, हमारी एक्टिविटीज के बारे में क्या सोचते हैं।’ वे आगे कहते हैं, ‘मुझे यह भी समझ नहीं आता कि चीन से नदी का पानी भारत कैसे लाया जाएगा? मैं इन सब से बहुत परेशान हूँ।’ चिट्ठी में आगे नेहरू मुंशी से पूछते हैं कि अगर ऐसी चिट्ठियाँ दूसरे उच्चायोग को भेजी गई हैं तो उन्हें बताया जाए, ताकि वे उन्हें भी चिट्ठी लिख सकें।

अगर आप इस चिट्ठी को देखें, तो यह साफ है कि पहले प्रधानमंत्री को एक हिंदू मंदिर के जीर्णोद्धार से ज्यादा इस बात की चिंता थी कि कोई दूसरा देश क्या सोचेगा। वे कहते रहते थे कि तुम ऐसा मत करो, नहीं तो दूसरे देश हमारे बारे में क्या सोचेंगे। मोदी जैसे युगपुरुष की तुलना नेहरू जैसे व्यक्ति से नहीं हो सकती। ऐसा इरादा भी नहीं है, क्योंकि अब तो विदेशी राष्ट्राध्यक्ष भी मंदिरों में जाने लगे हैं। मोदी के आने के बाद यह बदलाव आया है।

सौराष्ट्र सरकार के पाँच लाख के फंड खर्च करने पर दिक्कत

अब बात करते हैं पाँच लाख के फंड की। नेहरू इस बात से परेशान थे कि सौराष्ट्र सरकार (उस समय गुजरात नहीं था) इस प्रोग्राम पर खर्च क्यों कर रही थी। जवाहरलाल ने इस गुस्से में कई चिट्ठियाँ लिखी थीं।

21 अप्रैल को सौराष्ट्र के उस समय के मुख्यमंत्री यू. एन. ढेबर को लिखे एक लेटर में नेहरू कहते हैं कि उन्हें खबरों से पता चला कि सौराष्ट्र सरकार ने सोमनाथ मंदिर में उद्घाटन कार्यक्रम के लिए 5 लाख की रकम मंजूर की है।

नेहरू कहते हैं, ‘मैं यह पढ़कर हैरान रह गया और मैं जानना चाहता हूँ कि क्या यह सच है। सोमनाथ मंदिर की जो भी अहमियत हो, यह सरकार का काम नहीं है और मंदिर के लिए पैसे इकट्ठा करना गैर-सरकारी लोगों का काम है। मुझे नहीं लगता कि आम लोगों के पैसे का सही इस्तेमाल हो रहा है।’

22 अप्रैल को नेहरू ने उस समय के जामसाहेब दिग्विजय सिंह जडेजा को एक चिट्ठी लिखी। पत्र में नेहरू बिना किसी औपचारिकता के सीधे अपनी बात शुरू की।

नेहरू कहते हैं, ‘मैं सोमनाथ मंदिर में होने वाले इस प्रोग्राम को लेकर बहुत परेशान हूँ। अगर यह कोई पर्सनल/प्राइवेट मामला होता तो ठीक था, लेकिन ऐसी बातें फैल रही हैं कि सरकार भी इसमें शामिल है। कुछ लोगों को लगता है कि भारत सरकार भी इसमें शामिल है और सौराष्ट्र सरकार को 100 परसेंट ऐसा लगता है। खबरों में कहा गया है कि सौराष्ट्र सरकार इस प्रोग्राम के लिए पाँच लाख रुपए खर्च करेगी।’

नेहरू के मुताबिक, ‘जहाँ तक भारत सरकार की बात है, मैं पार्लियामेंट में साफ-साफ कह दूँगा कि सरकार का इस मामले से कोई लेना-देना नहीं है। लेकिन मुझे सौराष्ट्र सरकार पर शक है और मुझे लगता है कि सरकार होने के नाते उन्हें इसमें शामिल नहीं होना चाहिए और पैसे का खर्च भी गलत है। मैंने चीफ़ मिनिस्टर (ढेबर) को भी बता दिया है।’

यहाँ नेहरू फिर से राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद का मुद्दा उठाते हैं। वे लिखते हैं, ‘मेरी दिक्कत यह है कि राष्ट्रपति प्रोग्राम में जा रहे हैं। मैंने उनसे कहा कि इससे गलत मैसेज जाएगा, लेकिन अब यह उनका पर्सनल मामला है, इसलिए मैं इसमें दखल नहीं देना चाहता।’

इसके बाद, नदियों के पानी के बारे में नेहरू जाम साहेब से कहते हैं, ‘मुझे यह जानकर हैरानी हुई कि आपने अलग-अलग उच्चायोग से अपनी नदियों का पानी भेजने के लिए कहा था। कुछ उच्चायोग ने इस पर एतराज जताया है और इससे हम मुश्किल में पड़ गए हैं। याद रखें कि आप सिर्फ सोमनाथ मंदिर के ट्रस्टी ही नहीं हैं, बल्कि सौराष्ट्र के राजप्रमुख भी हैं।’

एक बार फिर नेहरू कहते हैं, ‘मुझे समझ नहीं आ रहा कि मैं इसमें क्या कर सकता हूँ। लेकिन प्रोग्राम जो भी हो, मुझे यह साफ करना है कि भारत सरकार का इस कार्यक्रम से कोई लेना-देना नहीं है। पाकिस्तान इस मामले का फायदा उठा रहा है और यह साबित करने की कोशिश कर रहा है कि हम ‘सेक्युलर देश’ नहीं हैं। ‘गरीब’ (जवाहरलाल ने यहाँ इंग्लिश में ‘गरीब’ शब्द का इस्तेमाल किया है) अफगानिस्तान को भी इसमें घसीटा जा रहा है।’

खुद नेहरू का लिखा यह लेटर दिखाता है कि नेहरू पाकिस्तान से धर्मनिरपेक्षता का सर्टिफिकेट लेने के लिए कितने बेचैन थे। पहले PM को इस बात की चिंता थी कि अफगानिस्तान से लेकर बर्मा और चीन तक सभी देश क्या कहेंगे, उनकी चिंता सिर्फ सोमनाथ मंदिर के प्रोग्राम की नहीं थी। उनके साथ जो होगा, सो होगा!

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री को चिट्ठी

अब बात करते हैं एक जरूरी चिट्ठी की, जो 21 अप्रैल, 1951 को लिखी गई थी। किसे? पाकिस्तान के उस समय के प्रधानमंत्री लियाकत अली खान को।

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री को ‘मेरे प्यारे नवाबजादा’ कहकर बुलाते हुए, नेहरू लिखते हैं, ‘मैं आम तौर पर रेडियो पाकिस्तान के ब्रॉडकास्ट की तरफ़ आपका ध्यान नहीं खींचता। लेकिन मैंने यह भी कहा है कि कुछ ब्रॉडकास्ट, खासकर पश्तो भाषा में, अक्सर पूरी तरह से झूठे आरोप लगाते हैं। 17 अप्रैल को पेशावर से पश्तो में किया गया ब्रॉडकास्ट इसका एक उदाहरण है और अगर आप इस मामले पर ध्यान देंगे तो मैं आभारी रहूँगा।’

आगे, ‘यह कहानी कि सोमनाथ मंदिर के दरवाजे अफगानिस्तान से भारत लाए जाएँगे, पूरी तरह झूठी है। इसमें ज़रा भी सच्चाई नहीं है। इसे सार्वजनिक तौर पर मना किया जा चुका है। असलियत यह है कि किसी को नहीं पता कि ऐसे कोई दरवाज़े हैं भी या नहीं और अफ़गानिस्तान से ऐसा कुछ भी भारत नहीं भेजा जा रहा है। फिर भी यह सब पाकिस्तानी प्रेस में चल रहा है। ब्रॉडकास्ट या रिपोर्ट्स कितना सच कह रहे हैं, यह तय करना मैं आप पर छोड़ता हूँ।’

नेहरू इस बात को लेकर कितने परेशान थे कि ‘प्यारे नवाबज़ादा’ का देश क्या सोचेगा, वहाँ का प्रेस क्या कह रहा है। यह लेटर इसका सबूत है।

22 अप्रैल को एक तरफ नेहरू ने जाम साहेब को लेटर भेजा और दूसरी तरफ जाम साहेब का लेटर नेहरू के पास पहुँचा। जाम साहेब ने प्रोग्राम के लिए प्राइम मिनिस्टर को एक औपचारिक आमंत्रण पत्र भेजा था। लेटर के जवाब में, नेहरू ने जाम साहेब को एक और लेटर लिखा। तारीख 24 अप्रैल, 1951।

इसमें नेहरू आमंत्रण के लिए शुक्रिया अदा करते हुए कहते हैं कि वह अभी दिल्ली नहीं छोड़ सकते। फिर प्रोग्राम को लेकर अपना गुस्सा निकालने लगते हैं।

सेक्युलर नेहरू ‘पुनरुत्थान’ से परेशान थे

17 अप्रैल, 1951 को विदेश मंत्रालय के सेक्रेटरी जनरल और विदेश सचिव को भेजे एक नोट में नेहरू लिखते हैं, “मैंने प्रेसिडेंट और मुंशी दोनों से कहा है कि मुझे ये सब एक्टिविटीज़ बिल्कुल पसंद नहीं हैं। क्या विदेश मंत्रालय को पता है कि ऐसे लेटर (नदी के पानी के बारे में) विदेश में हमारी एम्बेसी को भेजे जा रहे हैं? मैं चाहता हूँ कि आप (विदेश मंत्रालय) एम्बेसी को लिखकर बता दें कि वे इन आग्रह पर कोई ध्यान न दें।”

नेहरू ने उसी दिन चीन में भारतीय राजदूत के. एम. पनीकर को एक चिट्ठी लिखी। इस चिट्ठी में PM नेहरू लिखते हैं, ‘मैंने प्रेसिडेंट से कहा था कि इस प्रोग्राम में शामिल न हों, लेकिन उन्होंने पहले ही न्योता स्वीकार कर लिया था और तब से मैं ज़्यादा दखल नहीं दे सकता था। इसलिए अब मैं उनके दौरे और वहाँ जो कुछ भी हो रहा है, उसे जितना हो सके कम करने की कोशिश कर रहा हूँ।’

17 तारीख को, उस समय के होम मिनिस्टर सी. राजगोपालाचारी को एक और चिट्ठी लिखी गई। इस चिट्ठी में, नेहरू चीन में भारत के राजदूत पनीकर की एक चिट्ठी को कोट करते हैं और कहते हैं, ‘मैं आपका ध्यान उस ओर दिला रहा हूँ, जो उन्होंने (पनीकर) सोमनाथ मंदिर के बारे में लिखा है। मैं यह सब देखकर परेशान हो रहा हूँ और समझ नहीं पा रहा हूँ कि क्या करूँ। अपनी एम्बेसी को चिट्ठी लिखना और किसी प्रोग्राम के लिए उनकी नदी से पानी माँगना कितना अजीब है!’ इस चिट्ठी में नेहरू इस बात को लेकर भी परेशान दिखते हैं कि बर्मा की कम्युनिस्ट पार्टी क्या कहेगी। नेहरू इस बात को लेकर भी परेशान थे कि पाकिस्तान क्या सोचेगा। इस पर आगे बात होगी।

17 तारीख को केएम मुंशी को एक और लेटर लिखा जाता है। लेटर में नेहरू कहते हैं कि उन्हें चीन में भारतीय एम्बेसडर (पानीकर) का एक लेटर मिला है, जिसमें सोमनाथ मंदिर के ट्रस्टियों ने उन्हें लिखा है और नदी का पानी भेजने के लिए कहा है। इसका इस्तेमाल मंदिर में धार्मिक समारोहों के लिए किया जाएगा। नेहरू लिखते हैं, ‘इस लेटर ने हमारी एम्बेसी को मुश्किल में डाल दिया है और मैं भी उतना ही परेशान हूँ। अगर किसी और ने यह आग्रह की होती, तो बात अलग होती। अगर सरकार से जुड़े लोग ऐसा लेटर भेजते हैं और उसमें प्रेसिडेंट का नाम भी है, तो इससे विदेश में हमारे लिए शर्मिंदगी वाली स्थिति पैदा होगी।’

नेहरू लिखते हैं, ‘मैंने इस बारे में आपको पहले भी लिखा है। मैं इस ‘पुनरुत्थान’ से बहुत परेशान हूँ और इस बात से भी कि राष्ट्रपति, कुछ मंत्री और आप राजप्रमुख के तौर पर इस प्रोग्राम में शामिल हो रहे हैं। मुझे लगता है कि यह हमारी सरकार के उसूलों के खिलाफ है। इसके नेशनल और इंटरनेशनल लेवल पर बुरे नतीजे हो सकते हैं। निजी तौर पर, हर कोई जो चाहे कर सकता है, लेकिन हम सार्वजनिक तौर पर ऐसा नहीं कर सकते।’

केएम मुंशी को एक और लेटर लिखा गया।

लेटर में नेहरू लिखते हैं, ‘मैं इस बात से बहुत परेशान हूँ कि सरकार विदेश में सोमनाथ प्रोग्राम से जुड़ी हुई है। इस मामले पर पार्लियामेंट में सवाल उठाए जाएँगे और मैं यह साफ कर दूँगा कि सरकार का इससे कोई लेना-देना नहीं है। लेकिन मैं सौराष्ट्र सरकार के बारे में ऐसा नहीं कह सकता, जो इस प्रोग्राम पर पाँच लाख खर्च कर रही है। मुझे लगता है कि इस हालत में सरकार का यह खर्च उठाना पूरी तरह से गलत है।’

जामसाहेब पर अप्रत्यक्ष आरोप

जामसाहेब का जिक्र करते हुए नेहरू लिखते हैं, ‘मैंने इस मामले पर प्रेसिडेंट और जामसाहेब को लेटर लिखे हैं। जामसाहेब न सिर्फ सोमनाथ मंदिर के ट्रस्टियों के चेयरमैन हैं, बल्कि सौराष्ट्र के राजप्रमुख भी हैं।’ यहाँ नेहरू जामसाहेब पर आरोप लगाते हुए कहते हैं कि उन्होंने एम्बेसी को जो लेटर लिखे, उन्होंने हमें मुश्किल में डाल दिया है! यह उन लेटर के बारे में है, जिनमें नदियों के पानी के बारे में रिक्वेस्ट की गई थी।

24 अप्रैल को मृदुला साराभाई को लिखे अपने लेटर में भी नेहरू इन सभी बातों का जिक्र करते हैं और अपने दिल की बात कहते हैं। वह प्रेसिडेंट के प्रोग्राम में शामिल होने, उन्हें सौराष्ट्र सरकार द्वारा फंड के इस्तेमाल से कैसे नहीं रोक पाए, और भी बहुत कुछ बताते हैं। वह आगे कहते हैं कि मृदुला को प्रेसिडेंट से मिलकर उन्हें समझाना चाहिए और गुजराती प्रेस में हो रही बुराई के बारे में बताना चाहिए।

प्रोग्राम का कवरेज कम करने की कोशिशें

सारी कोशिशें नाकाम होने के बाद, 28 अप्रैल को नेहरू ने उस समय के सूचना और प्रसारण मंत्री आर. आर. दिवाकर को एक चिट्ठी लिखी। वजह? यह निर्देश देने के लिए कि प्रोग्राम का कवरेज कम किया जाए और ऐसा न लगे कि सरकार किसी भी तरह से इसमें शामिल है।

नेहरू दिवाकर को लिखते हैं, ‘इस सोमनाथ प्रोग्राम में सरकार को शामिल करने से देश और विदेश में हमें नुकसान होगा। मुझे कई शिकायतें भी मिल रही हैं। लोग पूछ रहे हैं कि क्या एक ‘सेक्युलर’ सरकार इस तरह से बर्ताव कर सकती है? मैं बस इतना कह सकता हूँ कि यह कोई ‘सरकारी प्रोग्राम’ नहीं है।’

इसके बाद नेहरू कहते हैं, ‘मुझे लगता है कि अगर हालात ऐसे बने, तो हमारे रेडियो ब्रॉडकास्ट को सोमनाथ प्रोग्राम का कवरेज पूरी तरह से कम कर देना चाहिए, ताकि किसी भी तरह से ऐसा न लगे कि यह कोई सरकारी प्रोग्राम है।’

सोमनाथ प्रोग्राम की तारीख पास आ रही थी। इसी बीच 2 मई, 1951 को नेहरू ने सभी मुख्यमंत्रियों को एक लेटर लिखा। लेटर में 19 अलग-अलग बिन्दू थे। इनमें 17वां पॉइंट सोमनाथ मंदिर से जुड़ा था।

नेहरू एक बार फिर मुख्यमंत्रियों के सामने साफ करते हैं कि सरकार इसमें किसी भी तरह से शामिल नहीं है। वह यह भी चेतावनी देते हैं कि भले ही इसके लिए पब्लिक सपोर्ट हो, हमें याद रखना होगा कि ऐसा कुछ भी नहीं किया जा सकता, जिससे सेक्युलरिज्म को नुकसान हो। उन्होंने आगे यह डर भी जताया कि देश में कई कम्युनल ताकतें एक्टिव हैं और हमें उनसे लड़ना होगा। एक समझदारी भरी सलाह देते हुए नेहरू ने लिखा, ‘सरकारों के लिए हमेशा सेक्युलर और नॉन-कम्युनल रुख अपनाना जरूरी है।’

कार्यक्रम से दो दिन पहले, 9 मई को नेहरू ने विदेश मंत्रालय को एक नोट भेजा, जिसमें यह सारी भावनाएँ हैं, इसलिए अलग से चर्चा की कोई ज़रूरत नहीं है।

13 जून, 1951 को नेहरू ने सर्वपल्ली राधाकृष्णन को एक चिट्ठी लिखी। तब तक सोमनाथ का कार्यक्रम पूरा हो चुका था।

इस चिट्ठी में नेहरू लिखते हैं, ‘आपने सोमनाथ कार्यक्रम में कुछ मंत्रियों के होने का ज़िक्र किया। मैं सहमत हूँ। सच तो यह है कि मैंने उन्हें रोकने की कई कोशिशें कीं, लेकिन वे जाने के लिए तैयार थे। सोमनाथ में जो हुआ, उससे मैं बहुत दुखी था। मैंने यह कहने की बहुत कोशिश की कि सरकार का इससे कोई लेना-देना नहीं है। लेकिन सरदार पटेल के कुछ फैसलों की वजह से सरकार पहले ही कुछ हद तक इसमें शामिल हो चुकी थी।

आखिरी चिट्ठी 1 अगस्त, 1951 को लिखी गई थी, जो मुख्यमंत्रियों को भेजी गई चिट्ठी थी। यहाँ भी नेहरू ने एक बार फिर सोमनाथ प्रोग्राम का जिक्र किया और कहा कि इससे भारत की इमेज खराब हुई और पाकिस्तान ने इसका पूरा फ़ायदा उठाकर प्रोपेगैंडा फैलाया।

कुल मिलाकर, नेहरू ने सोमनाथ मुद्दे पर सत्रह चिट्ठियाँ लिखीं। उनको एतराज था कि सरकार भी किसी न किसी तरह से इसमें शामिल थी, जबकि सच तो यह था कि पैसा लोगों ने इकट्ठा किया था। नेहरू की धर्मनिरपेक्षता आड़े आ रही थी। नेहरू को इस बात की ज्यादा चिंता थी, कि दूसरे देश क्या कहेंगे, पड़ोसी आतंकवादी देश पाकिस्तान क्या कहेगा।

इन देशों से मान्यता पाने की इतनी ज्यादा इच्छा थी कि उन्होंने हजारों साल बाद फिर से बनाए जा रहे हिंदू मंदिर के गर्व को एक तरफ रख दिया, लेकिन इस बात पर जोर देते रहे कि सरकार का इससे कोई लेना-देना नहीं है। मानो सरकार को इस प्रोग्राम पर शर्म आ रही हो! नेहरू की बातें कम से कम इसी ओर इशारा करती हैं।

अगर एक हिंदू देश में हिंदू मंदिर बन रहा है, तो हिंदुओं द्वारा चुनी गई सरकार इसमें क्यों शामिल नहीं होनी चाहिए? नेहरू ने सेक्युलरिज़्म की इम्पोर्टेड परिभाषाओं के असर में आकर बहुसंख्यक के साथ खराब बर्ताव करने में कोई हिचकिचाहट नहीं दिखाई। एक तरह से इन चिट्ठियों के जरिए कहा जा सकता है कि उन्होंने बार-बार बहुसंख्यक का अपमान किया।

आज समय बदल गया है। आज सरकार ‘सोमनाथ स्वाभिमान पर्व’ मना रही है। चलिए उसी मुद्दे पर बात खत्म करते हैं जिससे हमने पहला हिस्सा शुरू किया था। यह सब करने में मौजूदा सरकार को सेक्युलरिज़्म परेशान नहीं करता। यह 2014 में बदली सोच की हवा का सुखद नतीजा है। राम मंदिर भी इसी का नतीजा था। दो आर्टिकल की यह सीरीज़ इस शुभकामना के साथ खत्म करते हैं कि कुछ सालों बाद इसमें काशी-मथुरा भी जुड़ जाएगा।

(ये लेख मूल रूप से गुजराती में लिखी गई है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें। )

गोधरा में भीतर से नहीं फूँकी गई थी साबरमती एक्सप्रेस… शर्म तो आप घोंटकर पी चुके हैं शंकर सिंह वाघेला, पर क्या जमीर भी आपका मर चुका है?

राजनीति सर्कस है या नहीं, यह अलग बहस का विषय हो सकता है। लेकिन इसमें जोकरों की संख्या अच्छी-खासी है। ऐसा कहना बिल्कुल भी बढ़ा-चढ़ाकर नहीं होगा। जब किसी नेता का राजनीतिक करियर खत्म हो जाता है और वह पूरी तरह अप्रासंगिक हो जाता है, तब भी मीडिया और सोशल मीडिया में चर्चा बने रहने के लिए उसे उलटे-सीधे और अजीबो-गरीब बयान देने पड़ते हैं।

गुजरात में ऐसे लोगों की संख्या कितनी है, इसके लिए कोई जनगणना हुई हो ऐसा तो ध्यान में नहीं आता, लेकिन शंकरसिंह वाघेला इस सूची में अपना नाम काफी समय से शामिल करवाने में लगे हुए हैं।

पूर्व मुख्यमंत्री रह चुके शंकरसिंह ने कुछ साल पहले कॉन्ग्रेस से नाता तोड़ने के बाद मुख्यधारा की राजनीति से लगभग दूरी बना ली है। अब तो वे चुनाव भी नहीं लड़ते। यह अलग बात है कि हर चुनाव से पहले ‘बापू’ एक नई पार्टी लेकर आते हैं, उनकी पार्टी थोड़ी-बहुत हलचल मचाती है और नतीजों के बाद फिर शांत हो जाती है।

काफी समय से ‘बापू’ चर्चा में नहीं थे। हाल ही में वे अचानक सक्रिय हो गए हैं। उनसे ज्यादा सक्रिय उनका सोशल मीडिया हो गया है। आजकल अगर आप शंकरसिंह की फेसबुक वॉल देखें, तो रोज दो-पाँच रील पोस्ट की हुई मिलेंगी। यह सब बिल्कुल हाल ही में शुरू हुआ है। इनमें से ज्यादातर क्लिप अलग-अलग चैनलों को दिए गए इंटरव्यू से ली गई हैं।

इन इंटरव्यू में शंकरसिंह हमेशा अलग-अलग मुद्दों पर बीजेपी, मोदी-शाह और गुजरात सरकार पर हमला करते रहते हैं। और इसमें कोई आपत्ति भी नहीं है। विपक्ष के नेता के तौर पर यह उनका काम ही माना जाता है। लेकिन अब उन्होंने दिशा बदल ली है और एक खतरनाक रास्ता अपना लिया है। बीजेपी और मोदी पर हिंदू-मुस्लिम ध्रुवीकरण करने का आरोप लगाने के लिए वे गोधरा हिंदू हत्याकांड को बीच में ले आए हैं।

गोधरा हिंदू हत्याकांड पर शंकरसिंह के एक इंटरव्यू की क्लिप चार दिन पहले यानी 8 जनवरी 2026 को पोस्ट की गई थी। उस क्लिप में बेहद घिनौनी, अपमानजनक और बेबुनियाद बातें कही गई हैं।

शंकरसिंह का कहना है कि गोधरा में साबरमती एक्सप्रेस का डिब्बा बाहर से नहीं, बल्कि अंदर से जलाया गया था। उनका यह भी कहना है कि स्थानीय मुस्लिमों को तो यह तक पता नहीं था कि ट्रेन किस समय आएगी और किस डिब्बे में कौन लोग सवार हैं।

इतना ही नहीं, शंकरसिंह आगे दलील देते हैं कि डिब्बे को अंदर मौजूद किसी व्यक्ति ने ही आग लगा दी थी। वे यह भी कहते हैं कि ऐसा इसलिए किया गया ताकि बीजेपी हिंदुओं और मुस्लिमों के बीच दुश्मनी पैदा कर सके और चुनाव में इसका फायदा उठा सके।

शंकरसिंह कहते हैं, “हिंदुओं को बाँटो, मुस्लिमों को बाँटो, लोगों को धर्म के आधार पर बाँटो। अगर आप लोगों को धर्म के आधार पर बाँटना चाहते हैं तो क्या होगा? ऐसा करने का एक प्लान था, मैं कहूँगा कि एक साजिश थी, इस साजिश में गोधरा में कारसेवकों की गाड़ी जला दी गई… यह इन कारसेवकों के लौटने का समय नहीं था, बल्कि अयोध्या जाकर कारसेवा करने का समय था।”

वे आगे कहते हैं, “उन्हें वापस आना था, यह किसे पता था? यह तो अंदर का आदमी ही जान सकता था। गोधरा के मुस्लिमों को कहाँ पता था कि कौन कहाँ है? किस डिब्बे पर लिखा था कि इसमें कारसेवक हैं? उस डिब्बे को साजिश के तहत अंदर से जलाया गया। उसमें सभी हिंदू थे। इतना ही नहीं, उन शवों को सफेद कपड़ों में लपेटकर अहमदाबाद में शोक यात्रा निकालने की भी योजना बनाई गई। यह कितना राक्षसी दिमाग वाला प्लान होगा। गुजरात में बीजेपी को सत्ता में लाने के लिए गोधरा में डिब्बा जलाया गया। इतना ही नहीं, रक्षक ही भक्षक बन गए।”

गोधरा में क्या हुआ था, इसकी स्वतंत्र जाँच हो चुकी है। देश की सर्वोच्च अदालत फैसला सुना चुकी है। कई मुस्लिम दोषियों को सजा भी दी जा चुकी है। इसके बावजूद दो दशक बाद भी ऐसी बेबुनियाद बातें सामने आती रहती हैं। लेकिन यहाँ गंभीरता इसलिए ज्यादा है, क्योंकि ये बातें किसी आम व्यक्ति ने नहीं, बल्कि उसी राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री ने कहीं हैं, जहाँ यह घटना घटी थी

क्या शंकरसिंह इतने मूर्ख हैं कि उन्हें 27 फरवरी को वास्तव में क्या हुआ था, इसकी जानकारी ही नहीं है? क्या उन्हें नहीं पता कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले में इस घटना के बारे में क्या लिखा गया है? क्या उन्हें यह भी नहीं मालूम कि स्थानीय मुस्लिमों ने एक दिन पहले बकायदा योजना बनाकर, साजिश रचकर, पत्थर और पेट्रोल इकट्ठा किया था और अगले दिन जब साबरमती एक्सप्रेस स्टेशन पर आई तो उसके दो डिब्बों को बाहर से बंद करके आग लगा दी गई थी? इन सभी सवालों का जवाब स्वाभाविक रूप से ‘नहीं’ ही है।

क्या एक राजनेता, वह भी पूर्व मुख्यमंत्री स्तर का व्यक्ति, इतनी नीचे की सोच तक गिर सकता है कि हत्याकांड में मारे गए 59 कारसेवकों का अपमान करे? यह कहना कि डिब्बा अंदर से जलाया गया था, क्या उन कारसेवकों के बलिदान, उनकी शहादत और उनके परिवारजनों का अपमान नहीं है?

ट्रेन किस समय आएगी, यह किसे पता था- ऐसी बचकानी दलीलें शंकरसिंह ने दी हैं। लेकिन क्या उन्हें नहीं पता कि साजिश पहले से रची जा चुकी थी और एक दिन पहले एक गेस्ट हाउस में बैठक भी हुई थी? “मुस्लिमों को कैसे पता होता कि ट्रेन कब आएगी और किस डिब्बे में कौन बैठे हैं।” ऐसा सवाल उठाने वाले शंकरसिंह को क्या यह पता नहीं है कि इन्हीं मुस्लिम अपराधियों ने पहले से पेट्रोल इकट्ठा कर रखा था और यह सब अदालत में साबित हो चुका है। अदालत दोषियों को सजा सुना चुकी है और उनकी जमानत भी खारिज कर चुकी है।

27 फरवरी को साबरमती एक्सप्रेस के डिब्बे जलाए जाने की घटना में जिन 59 हिंदुओं की मौत हुई थी, वे सभी कारसेवक थे। इनमें 27 महिलाएँ और 10 बच्चे शामिल थे। उनका इतना ही ‘अपराध’ था कि वे अपने आराध्य के जन्मस्थान से कारसेवा करके लौट रहे थे। अपनी आस्था को प्रकट करने की कीमत उन्हें अपनी जान देकर चुकानी पड़ी। और इतना ही नहीं, इसके बाद भी सालों तक उन पर यह आरोप लगाए जाते रहे कि डिब्बा अंदर से जलाया गया था या फिर कोई नेता अपनी राजनीतिक चमकाने और किसी खास समुदाय को खुश करने के लिए उन्हीं कारसेवकों पर आरोप थोप देता है।

शंकरसिंह की यह रील, यह लिखे जाने तक, 10 लाख से ज्यादा बार देखी जा चुकी है। कमेंट बॉक्स में लोग उनकी बातों को सच मानकर आगे बढ़ा रहे हैं- यही हमारा सामूहिक दुर्भाग्य है। हम यही प्रार्थना कर सकते हैं कि शंकरसिंह को सदबुद्धि मिले। और एक और प्रार्थना करें कि जीवन में कभी शंकरसिंह की मुलाकात उन 59 कारसेवकों के परिवारजनों से न हो। क्योंकि उस समय उन परिवारों का सामना करना उन्हें जिस कठिनाई में डालेगा, वैसी कठिनाई एक 80 वर्ष से ऊपर के वरिष्ठ राजनेता को झेलनी पड़े, यह हम नहीं चाहते।

(मूलरूप से यह रिपोर्ट गुजराती भाषा में लिखी गई है, जिसे पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें।)

यूक्रेन-वेनेजुएला जैसा खेल ईरान में नहीं कर पाएँगे मस्क-अमेरिका, चीन-रूस की मदद से निकाली स्टारलिंक को ब्लॉक करने की तरकीब: इंटरनेट को विरोधियों का हथियार नहीं बनने देगा तेहरान

ईरान में इस वक्त इस्लामी शासन के खिलाफ बड़े पैमाने पर सड़क पर प्रदर्शन हो रहे हैं। लोग खामेनेई की सरकार के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं। उधर, खामेनेई सरकार इन प्रदर्शनकारियों पर हिंसक कार्रवाई कर रही है। खामेनेई सरकार ने पूरे देश में इंटरनेट तक बंद कर दिया है।

इस बीच प्रदर्शनकारियों की मदद के लिए स्पेसएक्स(SpaceX) ने ईरान में अपनी सैटेलाइट इंटरनेट सेवा ‘स्टारलिंक’ को चालू किया था। लेकिन अब स्टारलिंक को भी बंद किया जा रहा है। इसके लिए रूस की तकनीक और चीन के शोध का इस्तेमाल किया जा रहा है।

खामेनेई सरकार के इंटरनेट बंद करने के बाद स्टारलिंक ने चौंकाया

ईरान में सरकार विरोधी प्रदर्शनकारियों के बीच आपस में बात करने और प्रदर्शन को संगठित करने में इंटरनेट और सोशल मीडिया की बहुत बड़ी भूमिका रही है। इसका असर देखकर इस्लामी शासन ने 08 जनवरी 2026 को पूरे देश में इंटरनेट बंद कर दिया। यह इंटरनेट बंदी गुरुवार शाम 6.45 बजे से लागू हुई। क्लाउडफेयर रडार की रिपोर्ट के अनुसार, इसके बाद ईरान में इंटरनेट ट्रैफिक लगभग ‘पूरी तरह शून्य’ हो गया।

पूरी तरह इंटरनेट बंद करने से पहले IPv6 ट्रैफिक में तेज गिरावट दर्ज की गई थी। इससे संकेत मिलता है कि जैसे-जैसे प्रदर्शन तेज हो रहे थे, ईरान की इस्लामी सरकार धीरे-धीरे और चुनकर इंटरनेट बंद कर रही थी।

ईरान का यह पूरी तरह इंटरनेट बंद बहुत उन्नत और योजनाबद्ध तरीके से हुआ है। सरकार अपने खास सरकारी संचार को चालू रख रही है, लेकिन आम लोगों के लिए बाहरी दुनिया से जुड़ने वाला इंटरनेट पूरी तरह काट दिया गया है। रिपोर्ट्स के अनुसार, VPN और प्रॉक्सी सेवाएँ भी इस बार ज्यादातर काम नहीं कर रही हैं, जबकि पहले ईरान के लोग इन्हीं तरीकों से इंटरनेट बंदी को पार करते रहे हैं।

सरकार की निगरानी वाले लोकप्रीय ऐप रूबिका(Rubika) और ईता(Eita) को भी बंद कर दिया गया है। इसके अलावा ईरान में बैंकिंग सेवाएँ, कैब बुकिंग ऐप्स जैसे स्नैप(Snapp) और टैप्सी(Tapsi), ऑनलाइन शॉपिंग प्लेटफॉर्म और अंतरराष्ट्रीय फभोन कॉल पर भी रोक लगा दी गई है।

सरकार का मानना है कि इन कदमों से प्रदर्शन शांत हो जाएँगे, लेकिन स्थानीय लोगों का कहना है कि इससे गुस्सा और बढ़ गया है। इसी वजह से पहले से ज्यादा लोग खामेनेई सरकार के खिलाफ सड़कों पर उतर रहे हैं।

इस बीच 09 जनवरी 2026 को एलन मस्क की कंपनी स्पेसएक्स ने ईरान में स्टारलिंग इंटरनेट सेवा मुफ्त में चालू कर दी। जिन प्रदर्शनकारियों के पास तस्करी से लाए गए स्टारलिंग टर्मिनल थे, उन्होंने सरकार की पाबंदियों को पार कर बिना सेंसर वाला इंटरनेट इस्तेमाल करना शुरू कर दिया।

यह याद दिलाना जरूरी है कि साल 2022 के महसा अमीनी आंदोलन और 2019 के सरकार विरोधी प्रदर्शनों के दौरान भी स्टारलिंक एक बड़ा सहारा बना था। ईरान में स्टारलिंग डिवाइस रखने और इसके सैटेलाइट इंटरनेट का इस्तेमाल करने पर प्रतिबंध है, फिर भी हजारों की संख्या में स्टारलिंग टर्मिनल चोरी-छिपे देश में लाए गए।

अनुमान लगाया गया कि ईरान में इस समय लगभग 40 से 50 हजार स्टारलिंग सब्सक्राइबर्स मौजूद हैं।

ईरानी सरकार ने स्टारलिंक सिग्नल को किया जाम

ईरान में सरकार विरोधी प्रदर्शनकारियों पर हो रही हिंसक कार्रवाई के बीच खबर है कि ईरानी अधिकारियों ने कई इलाकों में स्टारलिंक के सिग्नल जाम करने में सफलता पा ली है, जिससे बड़े स्तर पर इंटरनेट में दिक्कतें पैदा हुई हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार, ईरानी सरकार सेना में इस्तेमाल होने वाले शक्तिशाली जैमर का उपयोग कर रही है। इससे स्टारलिंक के अपलिंक और डाउनलिंक डेटा में भारी नुकसान हो रहा है। यह नुकसान 30 प्रतिशत से बढ़कर 09 जनवरी 2026 तक 80 प्रतिशत तक पहुँच गया।

ईरानी अधिकारियों की इस कार्रवाई में GPS सिग्नल में भी दखल शामिल है, जबकि स्टारलिंग को टर्मिनल और सैटेलाइट को जोड़ने के लिए GPS पर निर्भर रहना पड़ता है। इसके कारण ईरान के कई प्रदर्शन वाले इलाकों में इंटरनेट या तो बहुत कमजोर हो गया या लगभग पूरी तरह बंद हो गया।

इंटरनेट शोधकर्ता और मियान ग्रुप में इंटरने सुरक्षा और डिजिटल अधिकारों के निदेशक आमिर रशिदी ने कहा कि अपने 20 साल के शोध अनुभव में उन्होंने कबी ऐसे सेना-स्तर के जैमर नहीं देखे, जिनका इस्तेमाल ईरानी सरकार स्टारलिंक को रोकने के लिए कर रही है। रशिदी ने कहा कि इतनी उन्नत तकनीक या तो ईरान ने खुद विकसित की है, या फिर यह रूस या चीन ने ईरान को दी है।

यह बात समझना जरूरी है कि स्टारलिंक को ब्लॉक करना नामुमकिन नहीं है। पहले भी रूस यूक्रेन में स्टारलिंक इंटरनेट को जाम कर चुका है। लेकिन ईरान का इतनी बड़े स्तर पर ऐसा कर पाना हैरान करने वाला है। इससे यह टूटती है कि LEO(Low Earth Orbit) सैटेलाइट सिस्टम को जाम करना लगभग असंभव है।

हालाँकि, रूस, ईरान या चीन की तरफ से कोई अधिकारिक पुष्टि सामने नहीं आई है, लेकिन रिपोर्ट्स के मुताबिक ईरान का यह ‘किल स्विच’ तरीका रूस के हार्डवेयर, चीन की तकनीकी जानकारी और ईरान में किए गए परीक्षणों का नतीजा है।

विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान सरकार द्वारा अपनाया गया यह ‘किल स्विच’ तरीका देश की पहले से कमजोर अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुँचा रहा है। अनुमान है कि हर एक घंटे के इंटरनेट बंद रहने से ईरान को करीब 15.6 लाख डॉलर का नुकसान हो रहा है।

खास बात यह है कि जैमिंग की तकनीक बहुत उन्नत और नई है, और रिपोट्स के अनुसार इसमें रूस के इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर (EW) सिस्टम इस्तेमाल होते हैं। खासकर Murmansk-BN और Krasukha-4 सिस्टम। रूस दशकों से EW सिस्टम विकसित कर रहा है और उसने तीन बड़े EW सिस्टम बनाए हैं: रडार जाम करने के लिए Krasukha-4, मोबाइल नेटवर्क को बाधित करने के लिए Leer-3 और रणनीतिक इलेक्ट्रॉनिक रुकावट के लिए Murmansk-BN शामिल हैं।

रूस ने इस सिस्टम का इस्तेमाल यूक्रेन के साथ जारी युद्ध में किया, जिससे यूक्रेन में स्टारलिंक इंटरनेट को प्रभावित किया। हालाँकि, यह हमेशा के लिए बंद नहीं हुआ। रूस की इस सफलता के बाद स्पेसएक्स ने स्टारलिंक में सॉफ्टवेयर अपडेट किए ताकि इसे रोक सकें।

रूस के अलावा, कभी भी ताइवान पर हमला करने वाले चीन ने भी स्टारलिंग को बाधित करने की तकनीक पर रिसर्च की है। उन्होंने कई ग्राउंड स्टेशन से एक साथ जैमिंग करने का तरीका खोजा है। नवंबर 2025 में चीन के शोधकर्ताओं ने ताइवान में संभावित संघर्ष की स्थिति में स्टारलिंक इंटरनेट को जाम करने का सिमुलेशन किया था।

चीन ने अपने Simulation research of distributed jammers against mega-constellation downlink communication transmissions नाम के रिसर्च में पाया कि स्टारलिंक इंटरनेट सिस्टम को प्रभावी रूप से जाम करने के लिए लगभग 1000 से 2000 एयरबोर्न डिवाइस की जरूरत होगी।

रिसर्च में लिखा है,”स्टारलिंक के ऑर्बिटल प्लेन स्थिर नहीं हैं और इस कंस्ट्रलेशन की मूवमेंट ट्रैजेक्ट्री बहुत जटिल है। दृश्य क्षेत्र में आने वाले सैटेलाइट्स की संख्या लगातार बदलती रहती है। यह समय और जगह दोनों में अनिश्चितता किसी भी तीसरे पक्ष के लिए स्टारलिंक कंस्ट्रलेशन को मॉनिटर या कंट्रोल करने में बड़ी चुनौती पैदा करती है।”

यह भी लिखा, “जैमर्स को ग्रिड-आधारित तरीके से तैनात किया जाता है ताकि विरोधी पक्ष के पास जगह के हिसाब से लचीलापन बढ़े। इसके साथ ही जैमिंग की संभावना और प्रभावशीलता मापने का तरीका भी अपनाया गया है। असली सैटेलाइट ऑपरेशन डेटा के आधार पर स्टारलिंक सिस्टम को उदाहरण मानकर, रेडियो फ्रीक्वेंसी पावर, ग्रिड की दूरी और एंटेना की रेडिएशन पैटर्न के अलग-अलग हालात में जैमिंग कवरेज रेंज निकाली गई।”

आगे कहा गया, “सिमुलेशन के नतीजे दिखाते हैं कि जब नोड ट्रांसमिशन पावर 26 dBW है, तो हर नोड का औसत जैमिंग कवरेज 38.5 km² तक पहुँच सकता है। यह मेगा-कंस्ट्रलेशन्स के नियमन और प्रबंधन में मदद करता है।” यह अध्ययन Zheijang University और Beijing Institute of Technology के शोधकर्ताओं Gu Hanqing, Yang Zhuo, Zhang Peng और Wen Xiaowen ने किया है।

भारी प्रतिबंध और लगातार अमेरिका और इजरायल के साथ टकराव में रहने के अलावा बढ़ती घरेलू नाराजगी के चलते ईरान में इस्लामी शासन कई सालों से अपनी इंटरनेट नियंत्रण क्षमताओं को बढ़ा रहा है। ईरानी सरकार एक राष्ट्रीय इंटरनेट विकसित करने की योजना बना रही है, जो चीन के ग्रेट फायरवॉल जैसी होगी।

पिछले साल इजरायल और ईरान संघर्ष के दौरान इंटरनेट बंद होने के बावजूद ईरानी लोगों ने स्टारलिंक का इस्तेमाल किया, लेकिन इस बार पहली बार ईरानी अधिकारी इस सैटेलाइट इंटरनेट सेवा को देश में बड़े स्तर पर प्रभावी रूप से निशाना बना रहे हैं।

बोलने की जरूरत नहीं कि स्पेसएक्स भी इसका जवाब देने के लिए उपाय करेगी। जैसे कि फ्रीक्वेंसी होपिंग या बीम एडजस्टमेंट आदि। ताकि ईरानी अधिकारियों द्वारा पैदा की गई रुकावट को रोका जा सके।

आर्थिक संकट, भारी महँगाई और दबावपूर्ण इस्लामी शासन के खिलाफ ईरान में विरोध प्रदर्शन तेज

28 दिसंबर 2025 को तेहरान में दुकानदारों और बाजार व्यापारियों की एक स्थानीय हड़ताल से शुरू हुए विरोध देखते ही देखते पूरी ईरान के लगभग सभी 31 प्रांतों में फैल गए। ईरान की सड़कों पर सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह खामेनेई के खिलाफ ‘तानाशाह मौत के काबिल हैं’ जैसे नारे लगाए जा रहे हैं, जबकि इस्लामिक रिवॉल्यूशनरी गार्ड्स अभी भी प्रदर्शनकारियों को पकड़ने में लगे हैं।

लोग निर्वासित शाह रजा पहलवी की वापसी की भी माँग कर रहे हैं। अब तक 500 से ज्यादा लोग मार जा चुके हैं, इनमें बच्चे भी शामिल हैं। इसके अलावा लगभग 48 सुरक्षाकर्मियों की भी जान गई हैं। अमेरिका के ह्यूमन राइट्स एक्टिविस्ट न्यूज (HRANA) के अनुसार, इस्लामी शासन ने अब तक 10,600 से ज्यादा लोगों को गिरफ्तार किया है।

बता दें कि ईरान में चल रहे विरोध प्रदर्शन मुख्य रूप से गंभीर आर्थिक संकट के कारण हैं। हालाँकि सत्ता परिवर्तन की आवाजे भी काफी तेज हैं। कारण ईरानी रियाल का अचानक ढहना है, जो अमेरिकी डॉलर के मुकाबले ऐतिहासिक रूप से लगभग 1.42 से 1.45 मिलियन तक गिर गया है। केवल 2025 में ही रियाल अपनी आधी कीमत खो चुका है।

यह भी उल्लेखनीय है कि रियाल कभी भी अमेरिकी डॉलर के मुकाबले बहुत मजबूत मुद्रा नहीं रही। जब मोहम्मद रजा फर्जिन ने सेंट्रल बैंक का नेतृत्व संभाला, उस समय रियाल का एक्सचेंज रेट 4,30,000 प्रति डॉलर था। हालाँकि, अचानक गिरकर 1.42 मिलियन हो जाने से यह साफ दिखा कि ईरानी मुद्रा कितनी गहरी मुश्किल में पहुँच गई है।

ईरानी मुद्रा की इस रिकॉर्ड गिरावट के पीछे लंबे समय से चल रहे अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध, जून 2025 में इजरायल के साथ संघर्ष के बाद तेल आय में कटौती और घरेलू आर्थिक खराब प्रबंधन मुख्य कारण हैं। इसके अलावा सरकार की उदारीकरण नीतियों ने भी इस गिरावट को काफी बढ़ावा दिया है।

इसका नतीजा यह हुआ कि ईरान उच्च स्तर की महँगाई से जूझ रहा है। दिसंबर 2025 में आधिकारिक महँगाई दर 42.2 प्रतिशत तक पहुँच गई। खाद्य वस्तुओं की कीमतें सालाना आधार पर 72 प्रतिशत तक बढ़ गईं, जबकि मेडिकल सामान की कीमते 50 प्रतिशत तक बढ़ीं।

आयात पर बढ़ती निर्भरता, विदेशों में फँसे हुए फंड और विदेशी मुद्रा तक पहुँच में असफलता के कारण ईरान की अर्थव्यवस्था गहरी मुसीबत में है। IMF के अनुसार, देश की GDP ग्रोथ 2023 में 5.7 प्रतिशत से गिरकर 2024 में 3.7 प्रतिशत हो गई और 2026 में अनुमानित रूप से केवल 0.6 प्रतिशत रह जाएगी।

खरीदने की शक्ति कम होने के कारण लाखों लोग बुनियादी जरूरत की चीजें, खाना और स्वास्थ्य सेवाएँ भी मुश्किल से खरीद पा रहे हैं। असहनीय जीवन यापन की लागत के अलावा नई ईरानी साल में होने वाले संभावित टैक्स बढ़ोतरी ने स्थिति को और बिगाड़ दिया है। ईरानी करदाता डर रहे हैं कि टैक्स बढ़ाए जाने के बाद उनकी हालत और भी खराब हो जाएगी।

(मूलरूप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में लिखी गई है, जिसे पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें।)

Opindia Exclusive: सपा ने बनाया KGMU को लव जिहाद-इस्लामी धर्मांतरण का ‘मरकज’, लाल किला ब्लास्ट में गिरफ्तार डॉक्टर परवेज से लेकर जाकिर नाइक तक से कनेक्शन

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ की किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (KGMU) में यूँ तो शोध और बीमारियों का इलाज होता है लेकिन पिछले कुछ समय में इसमें फैल रहा इस्लामी कट्टरपंथ का कैंसर अब सामने आने लगा है। हिंदू महिला डॉक्टर को लव जिहाद में फँसाकर उसका डॉ. रमीजुद्दीन द्वारा उत्पीड़न किए जाने का मामले सामने आने के बाद परत-दर-परत कट्टरपंथियों की साजिश सामने आती गई। इस कहानी में महिलाओं के उत्पीड़न का दर्द है, रमीज जैसे कट्टरपंथियों की साजिश है और सपा-बसपा जैसे राजनीतिक दलों का संरक्षण भी है।

इस कहानी की जड़ें पीलीभीत से शुरू होती हैं। रमीजुद्दीन और उसके अब्बा सलीमुद्दीन मूल रूप से पीलीभीत के रहने वाले थे। बाद में सलीमुद्दीन, खटीमा जाकर बस गया और उसने अपना सरनेम ‘मलिक’ रख लिया। वहाँ जाकर उसने एक होम्योपैथिक मेडिकल स्टोर खोला और इसके जरिए ही महिलाओं से नजदीकियाँ बढ़ानी शुरू कीं। सलीमुद्दीन ने 4 हिंदू महिलाओं से निकाह किया और उन्हें मुस्लिम बनने पर मजबूर किया।

सूत्रों के मुताबिक, सलीमुद्दीन असल में पीलीभीत के एक काजी के संपर्क में था और देवबंद में आता-जाता रहा था। परिवार के भीतर मजबही कट्टरता बढ़ती चली गई और वही हिंदू घृणा उनके बेटे रमीजुद्दीन तक पहुँची। रमीजुद्दीन पढ़ाई में तेज था। उसका चयन 2012 में आगरा मेडिकल कॉलेज में हो गया। यहीं से कहानी एक नया मोड़ लेती है।

आगरा मेडिकल कॉलेज में ‘इस्लामिक मेडिकोज मीट’: धर्मांतरण का अड्डा

KGMU में डॉक्टर रहे भूपेंद्र सिंह बताते हैं कि यह बात 2012 की है जब रमीज ने आगरा के एसएन मेडिकल कॉलेज में MBBS में दाखिला लिया। तब तक प्रदेश में सपा की सरकार आ चुकी थी और कट्टरपंथी सोच रखने वाले लोगों का हौसला बढ़ गया था। आगरा मेडिकल कॉलेज में ‘इस्लामिक मेडिकोज मीट’ नाम से बैठके होने लगीं और इन बैठकों में मौलाना और सीनियर छात्र जूनियर्स को यह सिखाने लगे कि हिंदू लड़कियों से कैसे नजदीकी बढ़ाई जाए। इस्लामिक मेडिकोज नाम का एक वॉट्सऐप ग्रुप भी था जिसमें ये कट्टरपंथी जुड़े हुए थे।

डॉक्टर भूपेंद्र ने कहा, “उस कॉलेज में कई मुस्लिम डॉक्टरों ने हिंदू लड़कियों को प्रेम-जाल में फँसाया और बाद में उनका धर्म परिवर्तन कराया। रमीज के भी चार–पाँच करीबी मुस्लिम दोस्त थे, जो इसी सोच के साथ काम कर रहे थे। KGMU में उसका एक दोस्त पिछले एक साल से इसी तरह की गतिविधियों में लगा हुआ है।”

परिवार से भी उसे समर्थन मिलता था, अब्बा सलीमुद्दीन उसे धर्मांतरण के लिए लगातार प्रेरित करते थे। इतना ही नहीं रमीजुद्दीन लड़कियों को सेक्स पॉवर दिखाने के लिए सलीमुद्दीन के अनुमति से अमेरिकन गाँजा मँगवाता था। इसके बाद लड़कियों को अपनी सेक्स पॉवर को अल्लाह की नेमत बताता था।

KGMU का जाकिर नाइक कनेक्शन

अब आगरा से वापस लौटते हैं KGMU पर। डॉक्टर भूपेंद्र बताते हैं कि 2004 के आसपास KGMU में कुछ मेडिकल छात्र भगौड़े इस्लामी कट्टरपंथी डॉ. जाकिर नाइक के संपर्क में आ गए। धीरे-धीरे कैंपस के कुछ हिस्सों में बकरदाढ़ी रखना और हिजाब पहनना आम होने लगा। इसी दौर में जाकिर नाइक की विचारधारा से जुड़े कट्टरपंथी हिंदू लड़कियों को फँसाने लगे थे। बताया जाता है कि इसमें BDS के छात्र ज्यादा सक्रिय थे।

डॉक्टर भूपेंद्र ने कहा, “सपा-बसपा के समय इन लोगों का हौसला बढ़ा। तीन-चार साल में यही छात्र सीनियर बने और खुद तकरीर करने लगे। यह गैंग 2011-12 तक सक्रिय रहा।” उसी समय आगरा में भी ‘इस्लामिक मेडिकोज मीट’ के नाम पर मुस्लिम मेडिकल छात्रों को इकट्ठा कर उनका ब्रेनवॉश किया जाने लगा। आगरा मेडिकल कॉलेज में मुस्लिम डॉक्टरों और हिंदू लड़कियों के निकाह का पैटर्न काफी ज्यादा दिखने लगा।

यह साफ नहीं है कि KGMU और आगरा के ये समूह आपस में जुड़े थे या अलग-अलग काम कर रहे थे। इतना जरूर है कि मेडिकल कॉलेजों में मौलानाओं का आना-जाना धीरे-धीरे सामान्य होता गया। बस्ती मेडिकल कॉलेज में पिछले एक साल से मौलाना आने लगे। बुलंदशहर मेडिकल कॉलेज में तो एक फर्स्ट-ईयर के HOD पर मेडिकल साइंस पढ़ाते समय हदीस के उदाहरण देने का आरोप लगा, जिसे बाद में साथी फैकल्टी ने समझाकर रोका।

बुलंदशहर में मुस्लिम छात्रों की संख्या अधिक होने के कारण नमाज की व्यवस्था के लिए प्रिंसिपल पर दबाव भी बनाया गया। हालाँकि, विरोध के बाद यह संभव नहीं हो पाया। कुल मिलाकर, मौलानाओं की मौजूदगी अब कई मेडिकल कॉलेजों में आम हो गई है।

सूत्र बताते हैं कि एक पूर्व मेडिकल कॉलेज की प्रिंसिपल जो अब पूर्वांचल के एक कॉलेज की प्राचार्य हैं अपने एक मुस्लिम छात्र के साथ लिव-इन में रह रही हैं। उन्होंने अपने पति से तलाक लेने का फैसला किया है और मामला कोर्ट में है।

वर्षों से KGMU में चल रहा धर्मांतरण और लव जिहाद का खेल

डॉ भूपेंद्र बताते हैं कि आज से करीब 10-15 साल पहले भी KGMU धर्मांतरण का बड़ा अड्डा बना हुआ था। उस समय सपा-बसपा की सरकारें थीं और आसपास की मस्जिदों से मौलाना अक्सर कैंपस में आते-जाते थे। बाद में योगी सरकार आने के बाद काफी समय तक हालात शांत रहे। पिछले कुछ सालों से यह गतिविधियाँ फिर से शुरू हो गई हैं।

वे बताते हैं कि कुछ मुस्लिम नर्सें योजनाबद्ध तरीके से हिंदू नर्सों और मुस्लिम स्टाफ के बीच दोस्ती करवाती हैं। धीरे-धीरे बात शारीरिक संबंधों तक पहुँचाई जाती है और फिर धर्म परिवर्तन की दिशा में दबाव बनाया जाता है। KGMU के गाँधी वार्ड में नर्सिंग स्टाफ की एक महिला का धर्मांतरण कराकर निकाह कराया गया। एक अन्य मामले में धर्मांतरण हो चुका है और निकाह की तैयारी बताई जा रही है।

इसी तरह माइक्रोबायोलॉजी विभाग में भी एक संविदाकर्मी महिला को एक अधेड़ मुस्लिम कर्मचारी द्वारा अपने प्रभाव में लेने की कोशिश का आरोप सामने आया है। बताया जाता है कि रमीज के गैंग से जुड़े लोग भी ऐसी ही गतिविधियों में शामिल हैं।

हाल ही में, KGMU का एक इंटर्न डॉक्टर मोहम्मद आदिल पर नर्सिंग छात्रा से के बलात्कार का आरोप लगा। इससे पहले उसके कई संबंध हिंदू लड़कियों के साथ थे। बाद में उसने उन्हें छोड़ दिया और एक बेहद कम उम्र की मुस्लिम नर्सिंग छात्रा के करीब चला गया। उसने अपनी एक मुस्लिम महिला मित्र से कहा कि हिंदू लड़कियों के साथ उसके पुराने रिश्तों को गलत नहीं समझना चाहिए क्योंकि उसके मुताबिक यह ‘अच्छा काम’ था।

सिर्फ छात्र नहीं, VC से प्रोफेसर तक: KGMU में कट्टरपंथ के कई चेहरे

यह मामला सिर्फ छात्रों या जूनियर डॉक्टरों तक सीमित नहीं है। आरोप है कि KGMU में नीचे से ऊपर तक यानी VC से लेकर प्रोफेसर स्तर तक इस कट्टर सोच का असर दिखता रहा है। किस तरह पीड़ितों पर भी ये कट्टरपंथी दबाव बनाते हैं, डॉ. रमीज का मामला उसका एक उदाहरण है।

जब डॉ. रमीज का मामला तब सामने आया तब पीड़िता के पिता उसी दिन विभागाध्यक्ष सुरेश बाबू के पास पहुँचे जिस दिन उनकी बेटी ने आत्महत्या की कोशिश की थी। लेकिन आरोप है कि विभाग की दो कट्टर फैकल्टी डॉ. सुमायरा कयूम और डॉ. वाहिद अली ने फैकल्टी मीटिंग में विभागाध्यक्ष सुरेश बाबू पर दबाव बना दिया। इसके बाद सुरेश बाबू ने फैकल्टी और रेजिडेंट डॉक्टरों से कह दिया कि लड़की मानसिक रूप से अस्थिर है और लड़का अच्छा है।

इतना ही नहीं रेजिडेंट डॉक्टरों पर यह लिखने का दबाव डाला गया कि लड़की ठीक नहीं है। हालाँकि, रेजिडेंट डॉक्टरों ने ऐसा लिखने से इनकार कर दिया। पीड़िता के पिता ने बेहद दयनीय हालत में बस इतना कहा कि वह नहीं चाहते कि वह लड़का उनकी बेटी के सामने आए। उन्होंने चीफ प्रॉक्टर से भी मुलाकात की लेकिन कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।

आरोप है कि सुमायरा कयूम और वाहिद अली सीधे तौर पर छात्र को बचाने की कोशिश कर रहे थे जबकि पूरा विश्वविद्यालय प्रशासन मामले को टालता रहा। बाद में जब हिंदू संगठनों का दबाव बढ़ा तब जाकर कुलपति ने अपने भरोसेमंद लोगों की एक समिति बना दी।

इसी तरह प्रशासन पर भी गंभीर सवाल हैं। आरोप है कि KGMU के वीसी सोनिया नित्यानंद ने नियमों को दरकिनार कर एक मुस्लिम संविदाकर्मी को अपना सलाहकार बना लिया और उसे गलत तरीके से स्थायी पद व पेंशन तक दिलवा दी। कहा जाता है कि यही सलाहकार वीसी कार्यालय में बैठकर मुस्लिम कर्मचारियों को संरक्षण देता है।

बताते हैं कि क्रिटिकल केयर विभाग में भी सपा सरकार के समय बड़ी संख्या में मुस्लिम फैकल्टी की नियुक्ति कर ली गई। कहा जाता है कि विभाग में रोज कोई न कोई नियम तोड़ा जाता है। जब हिंदू विभागाध्यक्ष (HOD) शिकायत के पत्र कुलपति कार्यालय भेजते हैं, तो आरोप है कि वही सलाहकार उन पत्रों को कूड़े में फेंक देता है।

बीजेपी के प्रवक्ता और वकील प्रशांत उमराव ने भी KGMU के VC ऑफिस के मुस्लिम समर्थक होने का दावा किया है। प्रशांत ने लिखा, “KGMU का वाइस चांसलर ऑफिस मुस्लिमों के समर्थन में लगा हुआ है। जिहाद के मामले हो या कट्टरपंथ के सबमें वाइस चांसलर ने ढीला ढाला रवैया अपनाया हुआ है।”

उन्होंने लिखा, “इसी तरह से यह भी सूचना आ रही है कि विश्वविद्यालय के क्रिटिकल केयर विभाग में कुछ कट्टरपंथी डॉक्टर बिना विश्वविद्यालय को सूचना दिए विदेश यात्रा कर आए तो कुछ मध्य एशिया के देशों में इंटरव्यू भी दे आए लेकिन जब हिंदू विभागाध्यक्ष ने कार्रवाई के लिए चिट्ठी लिखी तो उसे कूड़े के ढेर में डाल दिया गया और वाइस चांसलर ऑफिस ने इन लोगों पर विशेष दयादृष्टि बनाई।”

दिल्ली ब्लास्ट के आरोपित से लव जिहादी रमीज का कनेक्शन

डॉ रमीज के दिल्ली में लाल किले के बाहर हुए बम धमाके के सिलसिले में गिरफ्तार किए गए डॉ. परवेज अंसारी से भी कनेक्शन सामने आया है। दोनों ने एसएन मेडिकल कॉलेज में मेडिकल कॉलेज में छात्राओं को फँसाकर धर्मांतरण का नेटवर्क बनाया था। ये दोनों जिहादी हॉस्टल में साथ रहते थे और दोनों ने साथ मिलकर हिंदू लड़कियों फँसाने का प्लान बनाया था। इन्होंने मिलकर ग्रुप बनाया था जिसमें कई मौलानाओं को भी जोड़ा गया था। जो भी नया मुस्लिम छात्र आता उसे ये लोग अपने ग्रुप में जोड़ लेते थे।

मीडिया रिपोर्ट्स में सूत्रों के हवाले के बताया गया है कि धर्मांतरण के मकसद से मेडिकल छात्र और जूनियर डॉक्टर पहले अपनी साथी छात्राओं से दोस्ती करते थे। वे उनकी हर गतिविधि पर नजर रखते हुए लेक्चर थिएटर से लेकर लाइब्रेरी तक लगातार साथ रहते। धीरे-धीरे नजदीकियाँ बढ़ाने के बाद उनके आपत्तिजनक वीडियो बना लिए जाते और फिर इन्हीं के जरिए धर्म परिवर्तन का दबाव डाला जाता। बताया जाता है कि इस तरीके से कई छात्राएँ उनके जाल में फँस गईं।

जब KGMU में बनी थी मजार

KGMU में सामने आया लव जिहाद का मामला कोई अपवाद नहीं है। यह संस्थान पहले भी कट्टरपंथ से जुड़े विवादों का केंद्र रहा है। बीते वर्ष अप्रैल में भी ऐसा ही एक गंभीर मामला सामने आया था, जब परिसर में बनी एक अवैध मजार को हटाने की कार्रवाई हिंसा में बदल गई थी।

दरअसल, किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी के नेत्र विभाग के पीछे एक मजार बना दी गई थी, जिसके आसपास धीरे-धीरे अवैध बस्ती और पान-बीड़ी समेत कई अनधिकृत दुकानें खड़ी हो गईं। प्रशासन की ओर से इस अतिक्रमण को हटाने के लिए कई बार नोटिस जारी किए गए लेकिन अतिक्रमणकारियों ने परिसर खाली करने से इनकार कर दिया।

स्थिति तब और बिगड़ गई जब 26 अप्रैल 2025 को KGMU प्रशासन ने पुलिस बल के साथ मिलकर अवैध कब्जा हटाने की कार्रवाई शुरू की। जैसे ही मजार को तोड़ने की प्रक्रिया आगे बढ़ी, वहां मौजूद भीड़ ने अचानक पथराव शुरू कर दिया। हालात इतने बेकाबू हो गए कि हमलावरों ने एक डॉक्टर को भी पकड़ लिया, जिससे पूरे परिसर में अफरा-तफरी मच गई।

KGMU में इस तरह की घटनाएँ यह बताती हैं कि परिसर के भीतर अवैध अतिक्रमण और कट्टरपंथ से जुड़ी गतिविधियाँ समय-समय पर कानून-व्यवस्था के लिए चुनौती बनती रही हैं, जिन्हें लेकर प्रशासन और सुरक्षा एजेंसियाँ लगातार दबाव में रही हैं।

साफ शब्दों में कहें तो KGMU की यह कहानी किसी एक आरोपित या एक घटना की नहीं है। यह सालों से चल रहे उस गंदे और संगठित खेल की परतें खोलती है, जिसमें लव जिहाद, धर्मांतरण, संस्थागत संरक्षण, राजनीतिक चुप्पी और राजनीतिक शह तक भी एक साथ दिखाई देती है। जिस मेडिकल यूनिवर्सिटी का काम लोगों की जान बचाना है अगर वही कट्टरपंथियों का अड्डा बनती जाए तो यह बल्कि समाज और देश के लिए गंभीर खतरा है। बार-बार सामने आए मामलों ने साफ कर दिया है कि यह समस्या ऊपरी नहीं बल्कि जड़ों तक फैली हुई है।

योगी प्रशासन इस पूरे मसले को लेकर गंभीर है और पुलिस जाँच में जुटी हुई है। आगे और भी नाम, चेहरे और कड़ियाँ सामने आएँगी। कट्टरपंथ के इस कैंसर की अगर समय रहते सर्जरी नहीं की गई तो यह पूरे सिस्टम को खोखला कर देगा। इसकी सर्जरी जितनी जल्दी और जितनी सख्त होगी, उतना ही उत्तर प्रदेश और देश की सेहत के लिए बेहतर होगा।

महबूबा मुफ्ती से आरफा तक चाहती हैं कि हम न जानें इस्लामी लुटेरों-आक्रांताओं का सच, क्योंकि नफरत फैलेगी: अजीत डोभाल से यूँ ही नहीं चिढ़ा लेफ्ट-लिबरल गैंग

राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) अजीत डोभाल ने 10 जनवरी 2026 को ‘विकसित भारत यंग लीडर्स डायलॉग’ के उद्घाटन समारोह में युवाओं से प्रेरित करने के लिए शब्द कहे, उससे इस्लामी कट्टरपंथियों और वामपंथियों का धड़ा आहत होकर बैठा है।

नतीजतन NSA को सोशल मीडिया पर सांप्रदायिक, नफरत फैलाने वाला, देश को बाँटने वाला व इनसिक्योर बताकर सेकुलर भारत के लिए खतरा बताया जा रहा है। उन्हें घेरने वालों में इस्लामी पत्रकारिता के लिए कुख्यात आरफा खानम, अलगाववादियों का समर्थन करने वाली जम्मू-कश्मीर की पूर्व सीएम महबूबा मुफ्ती जैसों के नाम हैं।

नीचे देख सकते हैं महबूबा मुफ़्ती ने ट्वीट किया, “यह बहुत दुखद है कि डोभाल जैसे उच्च पद के अधिकारी, जिनका काम देश को अंदरूनी और बाहरी खतरों से बचाना है, उन्होंने नफरत फैलाने वाली सांप्रदायिक विचारधारा को अपनाया और मुसलमानों के खिलाफ हिंसा को सामान्य बनाने की कोशिश की। 21वीं सदी में सदियों पुराने घटनाओं के लिए Revenge लेने की बात करना केवल एक इशारा है, जो गरीब और अशिक्षित युवाओं को एक पहले से ही परेशान और लक्ष्य बन रही अल्पसंख्यक समुदाय पर हमला करने के लिए उकसाता है।”

इसी तरह, आरफा खानम शेरवानी ने डोभाल को ऐसा इनसिक्योर अधिकारी बताया, जो राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के पद के लिए उपयुक्त नहीं हैं।

इनके अलावा कंचना यादव जैसे लोग भी अजीत डोभाल के बयान को तोड़-मरोड़कर अपना एंगल देने में लगे हैं। वो अपने फॉलोवर्स को ये बता रहे हैं कि डोभाल अपने बच्चों को तो विदेशों में पढ़ा रहे हैं और आपके बच्चों को भड़का रहे हैं। कंचना का ट्वीट देखिए-

ऐसे ही लिबरल धड़े का जाना-माना नाम स्वाति चतुर्वेदी- लिखती हैं- आपके बच्चे मंदिर तोड़ने वालों से बदला लेंगे और डोभाल के बच्चे बाहर विदेश में बिजनेस करके लक्जरी जीवन जीएँगे।

ऊपर दिए सारे ट्वीट को देख ऐसा लग रहा है मानो डोभाल ने देश के युवाओं से बदला लेने की बात कही है, उन्होंने मुस्लिमों के खिलाफ युवाओं को भड़काया है। जबकि हकीकत इससे पूरी अलग है। अजीत डोभाल ने कार्यक्रम में युवाओं से जो कहा, उसका कहीं से कहीं तक अर्थ हिंसा से जुड़ा नहीं था।

क्या कहा था अजीत डोभाल ने?

कार्यक्रम में अजीत डोभाल ने देश के युवाओं को देश के इतिहास के प्रति जागरूक किया था। उन्होंने युवाओं से ये कहा था स्वतंत्रता हमें आसानी से नहीं मिली, बल्कि इसके लिए पीढ़ियों ने अपार बलिदान दिए। इतिहास की सच्चाइयों को समझ कर युवाओं को देश के पुनर्निर्माण में जुटना चाहिए।

उनके जिस शब्द पर वामपंथी और कट्टरपंथी ने बवाल मचाया हुआ है उसे भी उन्होंने किस संदर्भ में कहा था इसे उनके पूरे बयान से समझिए। डोभाल ने कहा था-

भारत के अतीत को सिर्फ दुख के साथ याद नहीं किया जाना चाहिए बल्कि उससे प्रेरणा लेकर आगे बढ़ना चाहिए। उन्होंने कहा कि इतिहास में कई लोगों को फाँसी दी गई, गाँव जला दिए गए, हमारी सभ्यता को नुकसान पहुँचाया गया। मंदिर लूटे गए और लोग बेबस होकर यह सब होते देखते रहे। यह इतिहास हमें चुनौती देता है कि हर युवा के भीतर आग होनी चाहिए। ‘बदला’ शब्द आदर्श नहीं है, लेकिन बदला एक शक्तिशाली ताकत है। हमें अपने इतिहास का बदला लेना होगा और भारत को उसके अधिकारों, विचारों और विश्वासों के आधार पर फिर महान बनाना होगा।

डोभाल के बयान से साफ है कि वो कहीं भी ‘बदले’ शब्द को हिंसा से जोड़कर नहीं बोल रहे थे बल्कि एक मजबूत और आत्मनिर्भर भारत का निर्माण की बात कर रहे हैं। उन्होंने इतिहास से सीख लेकर राष्ट्र को पुनर्निर्मित करने की बात कही, न कि किसी समुदाय के खिलाफ हिंसा भड़काने की। उनका मकसद अपने श्रोता युवाओं में देशभक्ति जगाने का था, द्वेष फैलाने का नहीं।

हालाँकि, उनके बयान को वामपंथी और कट्टरपंथी अपने एजेंडे के अनुसार तोड़-मरोड़कर पेश कर रहे हैं। उन्हें शायद डर है कि कहीं सच में लोग उस इतिहास को लेकर सजग न हो जाएँ जहाँ देश को तोड़ने वालों और संपत्तियों को लूटने वालों का जिक्र है। इनकी दिक्कतें इसलिए हैं क्योंकि जिन्होंने भारत को समय-समय पर नष्ट करने का प्रयास किया वो ही इनके पसंदीदा ‘नायक’ हैं।

इस्लामी आक्रांताओं को क्यों कर रहे हो बदनाम- लिबरल और कट्टरपंथियों का तर्क

दिलचस्प बात ये है कि डोभाल के बयान को विकृत ढंग से पेश करने के चक्कर में ये लोग खुद ही इसको स्वीकार कर बैठे कि देश के मंदिर को लूटने वाली घटनाएँ बिलकुल सच हैं। महबूबा मुफ्ती के ट्वीट से स्पष्ट है कि वह मान रही हैं कि 21वीं सदी से पहले ये घटनाएँ हुईं थीं। लेकिन फिर भी वो इससे मुँह इसलिए मोड़ रही हैं क्योंकि वो नहीं चाहती इतिहास को बार-बार उकेरा जाए जिससे पता चले सच क्या था।

वहीं आरफा खानम हैं, जिनकी पत्रकारिता का केंद्र हमेशा ये बताने-समझाने पर रहता है कि मुगलों ने देश के लिए क्या किया… उनके लिए अगर कोई ये बता दे कि उन्होंने देश में और देश के लोगों के साथ क्या किया तो उन्हें इससे आपत्ति होने लगती है।

कंचना यादव और स्वाति चतुर्वेदी का भी यही पैटर्न है। वह अच्छे से जान-समझ रही हैं कि डोभाल ने क्या बोला है, लेकिन उनकी बात चूँकि वामपंथी एजेंडे पर सही नहीं बैठ रही इसलिए उन्होंने उस बयान के खुद ही मायने गढ़ लिए।

असली गलती किसकी?

ऐसे ‘बुद्धिजीवी’ वर्ग लोगों को समझने की जरूरत है कि इतिहास को इनके हिसाब से पेश करने का एक दौर बीत चुका है। अब वो समय नहीं है कि इस्लामी आक्रांताओं के कुकृत्यों को महिमामंडन करने का काम हो। इतिहास का अर्थ वही होता है जो बीता समय का सच हो। अगर उसे बताने से एक समुदाय पर सवाल उठ रहे हैं, तो समस्या उस रिलिजन या मजहब में है न कि इतिास में।

आज अगर देश को लूटे जाने के इतिहास को गहराई से पढ़ने पर ‘लुटेरे’ इस्लामी आक्रांता ही निकलकर आ रहे हैं तो इसमें इतिहास बताने वाले की क्या गलती है? गलती उसकी है जिसने ये किया, गलती उसकी है जिसने हमेशा ये समझा कि दुनिया वही इतिहास पढ़ेगा जो वो वर्ग पढ़ाना चाहेगा। गलती उस वर्ग की है जिसे लगा कि उन्होंने कह दिया तो अकबर हमेशा ‘महान’ बना रहेगा और औरंगजेब को लोग हमेशा ‘मंदिर का निर्माण’ कराने वाले के तौर पर जानेंगे।

स्वामी विवेकानंद जयंती पर विशेष: शिकागो से सनातन की पताका लहराने वाले महान संत, पश्चिम को भारतीय संस्कृति से जोड़ा; युवाओं को दिखाई राष्ट्रप्रेम की नई दिशा

स्वामी विवेकानंद की जयंती पूरी दुनिया में 12 जनवरी को मनाई जाती है। भारत में इस दिन को राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाया जाता है। साल 1984 में भारत सरकार ने यह निर्णय लिया ताकि युवाओं को स्वामी जी की शिक्षाओं से प्रेरणा मिले।

स्वामी विवेकानंद ने न केवल भारत को नई दिशा दिखाई, बल्कि पूरी दुनिया में सनातन धर्म की महिमा फैलाई। उन्होंने पश्चिमी देशों को भारतीय संस्कृति, वेदांत दर्शन और योग से परिचित कराया। उनके ओजस्वी भाषणों और कार्यों से हजारों लोग उनके शिष्य बने। आज भी उनकी शिक्षाएँ युवाओं को मजबूत बनाती हैं।

स्वामी विवेकानंद का प्रारंभिक जीवन और आध्यात्मिक जागरण

स्वामी विवेकानंद का जन्म 12 जनवरी 1863 को कलकत्ता (अब कोलकाता) में हुआ था। उनका बचपन का नाम नरेंद्रनाथ दत्ता था। वे एक संपन्न बंगाली परिवार से थे। पिता विश्वनाथ दत्ता वकील थे और माँ भुवनेश्वरी देवी धार्मिक प्रवृत्ति की महिला। नरेंद्र बचपन से ही बुद्धिमान, निडर और जिज्ञासु थे। वे पढ़ाई में तेज थे और खेलकूद में भी आगे। लेकिन उनका मन हमेशा बड़े सवालों में उलझा रहता- ईश्वर कहाँ है? जीवन का उद्देश्य क्या है?

युवावस्था में नरेंद्र ब्रह्म समाज से जुड़े, जहाँ एकेश्वरवाद की बात होती थी। लेकिन उन्हें संतुष्टि नहीं मिली। 1881-82 में उनकी मुलाकात श्री रामकृष्ण परमहंस से हुई। रामकृष्ण एक सरल संत थे, जो दक्षिणेश्वर काली मंदिर में रहते थे। नरेंद्र पहले तो उनके विचारों से असहमत थे, लेकिन रामकृष्ण की दिव्य अनुभूति ने उन्हें प्रभावित किया।

रामकृष्ण ने कहा, “ईश्वर को देखा जा सकता है, जैसे मैं तुम्हें देख रहा हूँ।” धीरे-धीरे नरेंद्र उनके शिष्य बन गए। रामकृष्ण ने उन्हें वेदांत का गहरा ज्ञान दिया और कहा कि सभी धर्म सत्य की ओर ले जाते हैं।

1886 में रामकृष्ण का महासमाधि हो गया। नरेंद्र और उनके गुरुभाइयों ने बारानगर में मठ स्थापित किया। नरेंद्र ने संन्यास लिया और नाम हुआ स्वामी विवेकानंद। इसके बाद वे पूरे भारत भ्रमण पर निकल पड़े। कन्याकुमारी में उन्होंने समुद्र तट पर ध्यान किया और भारत की दशा पर विचार किया। उन्हें लगा कि भारत को आध्यात्मिक ज्ञान तो है, लेकिन गरीबी और अज्ञानता से मुक्ति चाहिए। यहीं से उन्हें विचार आया कि विश्व मंच पर भारत की आवाज उठानी चाहिए।

शिकागो विश्व धर्म संसद के मंच से विश्व में फहराई सनातन की पताका

साल 1893 में अमेरिका के शिकागो में विश्व धर्म संसद का आयोजन हुआ। यह पहला मौका था जब दुनिया के सभी प्रमुख धर्मों के प्रतिनिधि एक मंच पर आए। स्वामी विवेकानंद भारत का प्रतिनिधित्व करने गए। यात्रा कठिन थी- पैसे नहीं थे, लेकिन कुछ शुभचिंतकों की मदद से वे पहुंचे।

11 सितंबर 1893 को उनका पहला भाषण हुआ। मंच पर खड़े होकर उन्होंने कहा, “मेरे अमेरिकी भाइयों और बहनों!” पूरा हॉल तालियों से गूँज उठा। उन्होंने हिंदू धर्म की उदारता बताई- सभी धर्मों का सम्मान, संप्रदायवाद का विरोध और कहा कि जैसे नदियाँ अलग-अलग रास्तों से समुद्र में मिलती हैं, वैसे ही सभी धर्म ईश्वर तक पहुँचाते हैं। उन्होंने सहिष्णुता की बात की और कहा कि हिंदू धर्म कभी दूसरे धर्मों को नष्ट करने की बात नहीं करता।

यह भाषण इतना प्रभावशाली था कि अखबारों ने उन्हें ‘साइक्लोन मॉन्क’ कहा। स्वामी जी ने कई भाषण दिए और वेदांत दर्शन समझाया। पश्चिमी लोग पहली बार भारतीय आध्यात्म को वैज्ञानिक और तार्किक रूप में सुन रहे थे। इससे सनातन धर्म की पताका पूरी दुनिया में लहरा गई।

पश्चिम में भारतीय संस्कृति की स्थापना

शिकागो के बाद स्वामी विवेकानंद अमेरिका और यूरोप में कई वर्ष रहे। उन्होंने हजारों व्याख्यान दिए। न्यूयॉर्क में वेदांत सोसाइटी स्थापित की। योग और ध्यान की क्लासें शुरू की। पश्चिमी लोग योग को केवल शारीरिक व्यायाम समझते थे, लेकिन स्वामी जी ने बताया कि यह मन की शुद्धि और ईश्वर प्राप्ति का मार्ग है।

स्वामी विवेकानंद ने राजयोग, कर्मयोग, भक्तियोग और ज्ञानयोग की किताबें लिखीं। इनसे वेदांत दर्शन पश्चिम में घर-घर पहुंचा। अमेरिका में कई वेदांत केंद्र खुले। इंग्लैंड में भी उन्होंने व्याख्यान दिए। पश्चिमी बुद्धिजीवी हैरान थे कि एक युवा भारतीय संन्यासी इतना गहरा ज्ञान कैसे रखता है। स्वामी जी ने भारतीय संस्कृति की महानता बताई- त्याग, सेवा, एकता। उन्होंने गीता और उपनिषदों को सरल भाषा में समझाया। इससे पश्चिम में भारतीयता का सम्मान बढ़ा।

स्वामी विवेकानंद को चाहने लगे पश्चिमी दुनिया के विद्वान

स्वामी विवेकानंद की वाणी और व्यक्तित्व इतना आकर्षक था कि हजारों लोग उनके मुरीद हो गए। भारत में उनके गुरुभाई जैसे स्वामी ब्रह्मानंद, स्वामी तुरीयानंद उनके साथी बने। लेकिन पश्चिम में भी कई शिष्य बने। सबसे प्रसिद्ध हैं मार्गरेट नोबल, जो सिस्टर निवेदिता बनीं। मार्गरेट आयरिश मूल की थीं, लंदन में स्वामी जी से मिलीं। उनके विचारों से इतनी प्रभावित हुईं कि भारत आ गईं और शिक्षा और सेवा कार्य में लग गईं। उन्होंने कलकत्ता में लड़कियों का स्कूल खोला।

अमेरिका में कई महिलाएँ और पुरुष उनके शिष्य बने। जैसे मैरी हेल, सराह बुल आदि। स्वामी जी महिलाओं की शिक्षा और सम्मान पर बहुत जोर देते थे। उन्होंने कहा कि जब तक महिलाएँ मजबूत नहीं होंगी, राष्ट्र मजबूत नहीं होगा। उनके चाहने वाले प्रोफेसर, वैज्ञानिक और आम लोग थे। निकोला टेस्ला जैसे वैज्ञानिक भी उनके विचारों से प्रभावित हुए। स्वामी जी की सादगी, ओज और प्रेम ने लोगों को बांध लिया।

रामकृष्ण मिशन की स्थापना और सेवा कार्य

साल 1897 में स्वामी विवेकानंद जी भारत लौटे। लाखों लोगों ने उनका स्वागत किया। उन्होंने रामकृष्ण मिशन की स्थापना की। इसका उद्देश्य था- आत्मा की खोज और दूसरों की सेवा। उनका सूत्र था- “शिव ज्ञान में जीव सेवा”। मिशन ने शिक्षा, स्वास्थ्य और आपदा राहत में काम शुरू किया। आज दुनिया भर में इसके केंद्र हैं।

भारत के राष्ट्रवाद को दिखाई राह

स्वामी विवेकानंद ने भारत को गुलामी की नींद से जगाया। उन्होंने कहा, “उठो, जागो और तब तक न रुको जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाए।” स्वामी विवेकानंद ने भारत के युवाओं से कहा कि तुममें असीम शक्ति है। भारत को आध्यात्मिक गुरु बनना है। उन्होंने हिंदू धर्म के पुनरुत्थान की बात की, लेकिन संकीर्णता का विरोध किया।

स्वामी विवेकानंद ने कहा कि भारत की संस्कृति सभी को जोड़ने वाली है। उनके विचारों से बाल गंगाधर तिलक, महात्मा गाँधी, सुभाष चंद्र बोस जैसे नेता प्रभावित हुए। स्वामी जी ने राष्ट्रवाद को आध्यात्मिक आधार दिया – सेवा ही राष्ट्रभक्ति है।

उन्होंने युवाओं से कहा, “मुझे सौ युवा दो, मैं भारत बदल दूँगा।” उनकी शिक्षाएँ आज भी प्रासंगिक हैं-मजबूत बनो, निडर बनो, दूसरों की मदद करो।

स्वामी विवेकानंद ने छोड़ी अमर विरासत

स्वामी विवेकानंद केवल 39 वर्ष जिए, लेकिन उनका योगदान अमर है। केवल 39 साल की उम्र में 4 जुलाई 1902 को उन्होंने महासमाधि ली। स्वामी विवेकानंद ने सनातन धर्म को विश्व मंच पर स्थापित किया, पश्चिम को भारतीयता से जोड़ा और भारत को आत्मविश्वास दिया। राष्ट्रीय युवा दिवस हमें याद दिलाता है कि युवा ही राष्ट्र की शक्ति हैं। स्वामी जी के शब्दों में “सबसे बड़ा धर्म है अपने देश से प्रेम करना।” उनकी जयंती पर संकल्प लें कि हम उनकी शिक्षाओं पर चलेंगे और भारत को विश्व गुरु बनाएँगे।

ताशकंद में आधी रात में मौत, नहीं हुआ पोस्टमॉर्टम फिर भी शरीर पर ‘कट’ के निशान: जानें- शास्त्री के साथ उस रात क्या हुआ था

भारत के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की पुण्यतिथि पर रविवार (11 जनवरी 2026) को केंद्रीय मंत्रियों और मुख्यमंत्रियों ने उन्हें श्रद्धांजलि दी है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने उन्हें याद करते हुए कहा, “शास्त्री जी को कोटि-कोटि नमन। एक साधारण पृष्ठभूमि से आने वाले गुदड़ी के लाल शास्त्री जी ने अपने दृढ़ संकल्प और मजबूत नेतृत्व से 1965 के युद्ध में भारत को विजय दिलाई। उनका सादगीपूर्ण जीवन हर एक समाजसेवी के लिए प्रेरणा है।”

शास्त्री जी का जीवन जहाँ लोगों को हमेशा प्रेरणा बना रहा तो उनकी दुखद मृत्यु से जुड़े सवाल आज भी रहस्य की तरह मौजूद हैं। लाल बहादुर शास्त्री का निधन 11 जनवरी 1966 को ताशकंद शहर में हुआ था। ताशकंद अब उज्बेकिस्तान की राजधानी है लेकिन तब यह सोवियत संघ का हिस्सा हुआ करता था। शास्त्री वहाँ 1965 के भारत–पाक युद्ध के बाद हुए ‘ताशकंद समझौते’ के सिलसिले में मौजूद थे। सरकार की ओर से बताया गया कि उनकी मृत्यु ‘दिल का दौरा पड़ने’ से हुई लेकिन इसके बाद कई ऐसी बातें सामने आईं, जिनकी वजह से लोगों के मन में सवाल पैदा हुए।

रहस्यमयी मौत की पूरी कहानी

रिपोर्ट्स के मुताबिक, 10 जनवरी की रात लाल बहादुर शास्त्री ने हल्का भोजन किया और एक गिलास दूध पीने के बाद आराम करने चले गए। रात करीब 1:25 बजे उन्हें अचानक बेचैनी और खाँसी की शिकायत हुई। तुरंत डॉक्टर को बुलाया गया लेकिन कुछ ही मिनटों बाद यानी करीब 1:32 बजे डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। मेडिकल रिपोर्ट और तत्कालीन आधिकारिक बयान में उनकी मौत का कारण हार्ट अटैक बताया गया।

हालाँकि, शास्त्री की मृत्यु को लेकर शुरू से ही कई सवाल उठते रहे हैं। समय-समय पर इसे साजिश करार दिया जाता रहा है। सबसे पहले उनकी पत्नी ललिता देवी ने आशंका जताई थी कि शास्त्री को जहर दिया गया था। जब उनका पार्थिव शरीर भारत लाया गया, तो कई लोगों ने शरीर पर नीले निशान देखे, जिससे संदेह और गहरा गया।

इस मामले को और रहस्यमय बनाने वाली बात यह रही कि कहा जाता है कि शास्त्री का पोस्टमार्टम नहीं कराया गया। ताशकंद में जिस कमरे में वे ठहरे थे, वहाँ न तो टेलीफोन था और न ही कोई इमरजेंसी बेल। आरोप यह भी लगे कि उन्हें समय पर ठीक से इलाज नहीं मिल पाया। शास्त्री की मौत की जाँच को लेकर कई दावे किए गए लेकिन किसी भी जाँच से कोई ठोस निष्कर्ष सामने नहीं आया। वर्ष 2009 में सरकार ने संसद में बताया कि सोवियत और भारतीय डॉक्टरों ने इस मामले की जाँच की थी लेकिन उससे जुड़े कोई रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं हैं।

यह भी कहा जाता है कि प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) में इस मामले से जुड़ी एक फाइल मौजूद है लेकिन उसे आज तक सार्वजनिक नहीं किया गया। संदेह को और बढ़ाने वाली एक और घटना यह रही कि शास्त्री के निजी डॉक्टर डॉ. आर.एन. चुग की बाद में एक रहस्यमयी सड़क दुर्घटना में मौत हो गई। इन तमाम तथ्यों और सवालों के बावजूद, लाल बहादुर शास्त्री की मौत आज भी भारतीय इतिहास के सबसे रहस्यमय अध्यायों में से एक बनी हुई है।

उस रात क्या हुआ था?

पत्रकार रशीद किदवई ने अपनी किताब ‘भारत के प्रधानमंत्री’ में शास्त्री के निधन से जुड़ी जानकारी दी है। किदवई ने लिखा, “कुलदीप नैयर उस दौरे में शास्त्री के साथ थे। अपनी किताब में उन्होंने उस रात ताशकन्द में घटी घटनाओं का जीवन्त चित्रण किया है: ‘दरवाजा सतत खटखटाए जाने से मेरी आँख खुली। कॉरिडोर में खड़ी महिला ने मुझसे कहा, ‘तुम्हारे प्रधानमंत्री मौत का सामना कर रहे हैं।’ मैंने जल्दी से कपड़े बदले और एक भारतीय अधिकारी के साथ थोड़ी ही दूर स्थित रूस की देहाती शैली में बने उस आरामगाह की ओर चल पड़े, जिसमें शास्त्री आराम कर रहे थे। मैंने देखा कि (सोवियत संघ प्रमुख अलेक्सेई) कोसीगिन बरामदे में ही खड़े हैं।”

किदवई, नैयर के हवाले से आगे लिखते हैं, “उन्होंने हमें देख दूर से ही हाथ हिलाकर जता दिया कि शास्त्री की मृत्यु हो चुकी है। बरामदे के पीछे डाइ‌निंग रूम था, जहाँ एक लम्बी-चौड़ी अंडाकार टेबल के चारों ओर बैठी डॉक्टरों की टीम शास्त्री के चिकित्सक आर.एन. चुघ से घटना की जानकारी ले रही थी।कमरे के एक कोने में स्थित ड्रेसिंग टेबल पर एक थर्मस उलटा पड़ा था। ऐसा लग रहा था कि शास्त्री ने उसे खोलने की कोशिश की थी। कमरे में कोई घंटी नहीं थी। शास्त्री को बचाने में नाकाम रहने को लेकर संसद में किए जा रहे हमलों का सामना करते समय, यह वह बिन्दु था, जिस पर सरकार ने झूठ का सहारा लिया था’।”

उन्होंने आगे लिखा, “इधर-उधर से जुटाई गई जानकारी से सामने आया कि स्वागत समारोह से शास्त्री लगभग रात 10 बजे अपनी विश्राम-स्थली पहुँचे। उन्होंने अपने निजी सहायक रामनाथ से खाना माँगा जो भारतीय राजदूत टी.एन. कौल के घर से तैयार होकर आया था। कौल के बावर्ची जान मुहम्मद द्वारा तैयार किए गए इस भोजन में सब्जी की एक डिश, आलू और एक करी वाली डिश थी। शास्त्री ने बहुत थोड़ा खाना खाया। सोते समय शास्त्री को दूध पीने की आदत थी सो रामनाथ ने उन्हें दूध दिया। दूध पीने के बाद भारतीय प्रधानमंत्री एक बार फिर बेचैनी से चहलकदमी करने लगे, फिर उन्होंने पानी माँगा। रामनाथ ने ड्रेसिंग टेबल पर रखे थर्मस फ्लास्क में से उन्हें पानी दिया।”

किदवई आगे लिखते हैं, “शास्त्री के निजी सचिव अपने कमरे में सामान पैक कर रहे थे कि रात के 1 बजकर 20 मिनट पर शास्त्री उनके दरवाजे पर आए। जगन्नाथ ने बताया कि वे बहुत तकलीफ में दिख रहे थे। मुश्किल से उन्होंने पूछा, ‘डॉक्टर साहब किधर हैं?’ इस बीच शास्त्री को भयंकर खाँसी आने लगी, जिससे उनका पूरा शरीर कँपकँपा रहा था। निजी सहायकों ने उन्हें थामा और जल्दी से ले जाकर बिस्तर पर लिटाया। जगन्नाथ ने उन्हें पानी दिया और दिलासा भी, ‘बाबूजी, आप ठीक हो जाओगे।’ इस पर शास्त्री ने अपने सीने की ओर इशारा किया और बेहोश हो गए। जगन्नाथ ने दिल्ली में ललिता शास्त्री को जब यह बात बताई तो वे बोलीं कि ‘तुम बहुत भाग्यशाली हो जो अन्तिम समय में तुमने उन्हें पानी पिलाया’।”

नहीं हुआ पोस्टमॉर्टम फिर पर शरीर पर कट के निशान

रिपोर्ट्स में बताया गया है कि हार्ट अटैक को उस समय प्राकृतिक मृत्यु माना जाता था और इसलिए पोस्टमार्टम को अनिवार्य नहीं समझा गया। शास्त्री जी की शुरुआती मेडिकल जाँच सोवियत संघ में ही हुई और निधन के बाद ताशकंद में डॉक्टरों ने उनके शव की जाँच की। भारत सरकार ने सोवियत मेडिकल रिपोर्ट को स्वीकार कर लिया क्योंकि उस दौर में सोवियत संघ भारत का करीबी रणनीतिक सहयोगी था। इसी वजह से भारत में दोबारा पोस्टमार्टम कराने की जरूरत महसूस नहीं की गई।

बाद में उनकी पत्नी ललिता शास्त्री ने कहा कि उनसे पोस्टमार्टम के लिए औपचारिक सहमति नहीं ली गई थी लेकिन गहरे शोक और अफरा-तफरी के बीच उन्होंने भी इस पर जोर नहीं दिया। सरकारी दस्तावेजों में भी दर्ज है कि परिवार की ओर से कोई विशेष मांग नहीं आई थी। यह भी माना जाता है कि अगर भारत में पोस्टमार्टम होता या जहर देने की आशंका सामने आती, तो इससे भारत-सोवियत संबंधों पर असर पड़ सकता था और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर राजनीतिक संकट खड़ा हो जाता।

जब नैयर ताशकंद से भारत लौटे, तो ललिता शास्त्री ने उनसे सवाल किया कि शास्त्री जी के शरीर का रंग नीला क्यों हो गया था। इस पर नैयर ने जवाब दिया कि उन्हें बताया गया था कि शव को सुरक्षित रखने के लिए लगाए गए रासायनिक पदार्थों की वजह से शरीर का रंग नीला पड़ जाता है।

किदवई ने नैयर के हवाले से लिखा, “तब उन्होंने शास्त्री के शरीर पर लगे ‘कट के निशानों’ की बाबत पूछा। मुझे उनके बारे में कुछ पता नहीं था, क्योंकि मैंने शास्त्री का शरीर नहीं देखा था। इसके अलावा उनकी इस बात ने मुझे आश्चर्यचकित कर दिया कि न तो ताशकन्द में, न ही दिल्ली में शास्त्री के शव का पोस्टमार्टम किया गया। यह था तो असामान्य ही। इसीलिए उन्हें व शास्त्री के दीगर परिजनों को उनकी मृत्यु के मामले में विभिन्न तरह की शंकाएँ थीं। कुछ दिनों बाद मैंने सुना कि लालबहादुर शास्त्री के दो निजी सहायकों पर ललिता शास्त्री गुस्सा हो गई। कारण यह था कि इन सहायकों ने उस कागज पर हस्ताक्षर करने से इनकार कर दिया, जिसमें आरोप लगाया गया था कि शास्त्री की मौत प्राकृतिक नहीं थी।”

नैयर ने अक्टूबर 1970 के आखिर में इस मुद्दे पर मोरारजी देसाई से बातचीत की थी। उन्होंने देसाई से पूछा कि क्या उन्हें सच में लगता है कि शास्त्री की मौत प्राकृतिक नहीं थी। इस पर मोरारजी देसाई ने कहा, “यह सब राजनीति है। मुझे पूरा विश्वास है कि इसमें कोई गड़बड़ी नहीं थी। उनकी मृत्यु दिल का दौरा पड़ने से ही हुई थी। इस बारे में मैंने उनके डॉक्टर और उनके सचिव सी.पी. श्रीवास्तव से भी बात की थी, जो ताशकंद में उस समय उनके साथ मौजूद थे।” लाल बहादुर शास्त्री की मौत के कई पक्ष हैं, दावे हैं लेकिन इनके बीच कई सवाल भी हैं जो आज भी अपने जवाबों की प्रतीक्षा में हैं।

बार-बार इस्लामी आक्रमण, बार-बार प्रतिरोध और पुनर्निर्माण की गाथा: सनातन सभ्यता की पहचान सोमनाथ मंदिर को जीवित रखने के लिए हर युग में खड़े हुए हिंदू शासक

सोमनाथ केवल एक मंदिर नहीं है, बल्कि यह भारत की उस ऐतिहासिक स्मृति का प्रतीक है जहाँ मजहबी कट्टरता के हमलों के सामने भी आस्था, शौर्य और सांस्कृतिक स्वाभिमान बार-बार उठ खड़ा हुआ है। सदियों के अंतराल में जब-जब सोमनाथ पर प्रहार हुआ, तब-तब हिंदू शासकों और योद्धाओं ने कभी तलवार उठाकर रास्ता रोका, तो कभी ईंट-पत्थर जोड़कर मंदिर को फिर से भव्य रूप दिया।

अरब से लेकर तुर्क आक्रमणों तक, मजहबी उन्माद ने बार-बार सोमनाथ को निशाना बनाया। कभी समुद्री रास्ते से तो कभी उत्तर-पश्चिमी जमीनी रास्तों से। लेकिन हर विनाश के बाद इतिहास ने यह भी देखा है कि हिंदू शासक न केवल अडिग रहे, बल्कि उन्होंने मंदिर और संस्कृति दोनों को पूरी गरिमा के साथ फिर से स्थापित किया। यह लेख उसी अटूट प्रतिरोध और संघर्ष की परंपरा को रेखांकित करता है।

यह लेख सोमनाथ की रक्षा करने वाले, संघर्ष और युद्ध लड़ने वाले और इस मंदिर को जीवंत रखने वाले महान शासकों और योद्धाओं की स्मृति को समर्पित है। इसके अलावा, यह लेख आधुनिक भारत तक की उस यात्रा को भी रेखांकित करता है, जहाँ मंदिर का पुनर्निर्माण केवल एक ढाँचा खड़ा करना नहीं, बल्कि हमारे राष्ट्रीय स्वाभिमान की बुलंद पुकार बन गया है।

इस्लामी हमलों की पृष्ठभूमि और प्रतिरोध

11वीं से 14वीं शताब्दी के बीच पश्चिमी भारत में सोमनाथ पर कई बार हमले हुए। इन हमलों का एकमात्र उद्देश्य केवल मंदिर को तोड़ना या धन लूटना नहीं था, बल्कि एक पूरी संस्कृति के केंद्र को अपमानित करना था। इसके बावजूद, सोमनाथ की परंपरा कभी टूटी नहीं। समय के साथ राजसत्ताएँ बदलीं, लेकिन प्रतिरोध की चेतना हमेशा कायम रही। कभी युद्ध के मैदान में संघर्ष के रूप में, तो कभी मंदिर की पुनर्स्थापना के संकल्प के रूप में।

मूलराज सोलंकी: सौराष्ट्र की रक्षा की राजनीतिक नींव

10वीं शताब्दी में मूलराज सोलंकी (प्रथम) ने सोलंकी (चालुक्य) वंश की स्थापना की और अणहिलवाड़ पाटन को अपनी राजधानी बनाया। यह वह दौर था जब पश्चिमी तटों पर अरबों के समुद्री हमले जारी थे और उत्तर-पश्चिम से इस्लामी शक्तियाँ धीरे-धीरे आगे बढ़ रही थीं। हालाँकि, मूलराज ने सोमनाथ को लेकर कोई सीधी लड़ाई लड़ी हो, इसका कोई स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलता है, लेकिन ऐतिहासिक तथ्य यह है कि उन्होंने गुजरात-सौराष्ट्र में एक संगठित हिंदू सत्ता की स्थापना की। यही सत्ता आगे चलकर सोमनाथ की रक्षा के लिए एक ढाल बनी। मूलराज का योगदान केवल तलवार चलाने तक सीमित नहीं था, बल्कि उन्होंने वह राजनीतिक स्थिरता प्रदान की, जिसके बिना किसी भी मंदिर की रक्षा कर पाना संभव नहीं था।

भीमदेव प्रथम: गजनी के हमले के बाद का संघर्ष

सन 1026 में महमूद गजनी ने सोमनाथ पर आक्रमण किया था। यह हमला न केवल लूटपाट के उद्देश्य से किया गया था, बल्कि इसका मुख्य लक्ष्य एक महान धार्मिक प्रतीक को नष्ट करना था। इस आक्रमण के बाद पूरे गुजरात में भय और अस्थिरता का माहौल बन गया था। ऐसे कठिन समय में भीमदेव प्रथम ने सत्ता संभाली। उन्होंने सौराष्ट्र में प्रशासनिक नियंत्रण को फिर से मजबूत किया और हिंदू अधिकारों की पुनर्स्थापना की। भीमदेव का ऐतिहासिक महत्व इसलिए है क्योंकि उन्होंने दुनिया को यह संदेश दिया कि केवल एक आक्रमण से राज्य समाप्त नहीं होता। उनके शासनकाल में सोमनाथ का पूरा क्षेत्र फिर से हिंदू नियंत्रण में आ गया और मंदिर का भव्य पुनर्निर्माण भी हुआ।

1026 ईस्वी के विनाश के बाद भीमदेव प्रथम द्वारा करवाया गया यह पुनर्निर्माण सोमनाथ के इतिहास में पहला बड़ा राजनैतिक पुनरुद्धार माना जाता है। उनका यह कार्य इस बात का जीवंत प्रमाण है कि कैसे एक बड़े राजनैतिक आघात के बावजूद सांस्कृतिक संकल्प को फिर से जीवित किया जा सकता है।

सिद्धराज जयसिंह: सैन्य शक्ति से सांस्कृतिक सुरक्षा

सोलंकी वंश के सबसे शक्तिशाली शासकों में जयसिंह सिद्धराज का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। उनका शासनकाल वह समय था जब उत्तर भारत में तुर्की शक्तियों का प्रभाव बढ़ रहा था। जयसिंह सिद्धराज ने न केवल सीमाओं की रक्षा की, बल्कि सौराष्ट्र और सोमनाथ क्षेत्र में राजनैतिक संरक्षण की एक मजबूत व्यवस्था खड़ी की। उनके दौर में मंदिर केवल पूजा स्थल नहीं थे, बल्कि राज्य की प्रतिष्ठा का केंद्र थे। सोमनाथ जैसे तीर्थ पर हमला पूरे राज्य पर हमला माना जाता था और इसी विचारधारा ने आगे चलकर गुजरात को लंबे समय तक सुरक्षित रखा।

सोलंकी वंश के महान शासक जयसिंह सिद्धराज ने गुजरात और सौराष्ट्र को सैन्य दृष्टि से बेहद सशक्त बनाया था। उनके शासनकाल में मंदिरों और तीर्थस्थानों को राज्य का पूर्ण संरक्षण प्राप्त हुआ। सोमनाथ जैसे पवित्र स्थान उनके समय में राजनैतिक सुरक्षा और सांस्कृतिक सम्मान के प्रतीक बने रहे। उन्होंने सोमनाथ में समय-समय पर निर्माण और जीर्णोद्धार के कार्य भी करवाए थे।

रानी नायकी देवी: कयादरा के मैदान में थाम ली आक्रांता की सेना

12वीं सदी में गुजरात की धरती पर एक निर्णायक मोड़ तब आया, जब रानी नायकी देवी ने 1178 ईस्वी में ‘कयादरा के युद्ध’ में मोहम्मद गोरी को करारी शिकस्त दी। यह केवल एक सैन्य जीत नहीं थी, बल्कि इस विजय ने पश्चिमी भारत और प्रभास-सोमनाथ क्षेत्र को एक बहुत बड़े विनाश से बचा लिया था। उस समय के और बाद के इतिहासकार इस जीत को सोमनाथ की रक्षा के लिए एक निर्णायक मोड़ मानते हैं।

यह महज एक युद्ध नहीं था, बल्कि सोमनाथ और गुजरात की अस्मिता की रक्षा थी। एक महिला शासक का इस तरह कट्टर आक्रमण के सामने डटकर खड़े होना भारतीय इतिहास का एक गौरवशाली अध्याय है। रानी नायकी देवी की यह वीरता इस बात का प्रमाण है कि आस्था और स्वाभिमान की लड़ाई में लिंग या पद की कोई सीमा नहीं होती। जब धर्म और संस्कृति पर संकट आता है, तो हर व्यक्ति योद्धा बन सकता है। यह घटना आज भी गुजरात और भारत की ऐतिहासिक गौरवगाथा के एक अटूट हिस्से के रूप में जीवित है।

राजा कान्हड़ देव: स्थानीय वीरता की ढाल

बड़े साम्राज्यों के बीच सोमनाथ की रक्षा में स्थानीय शासकों की भूमिका भी बेहद निर्णायक रही है। जन-इतिहास और लोक कथाओं के अनुसार, राजा कान्हड़ देव ने सौराष्ट्र में स्थानीय सैन्य शक्ति को संगठित करने का महत्वपूर्ण कार्य किया था। समुद्री तटों और जमीनी रास्तों से होने वाले अचानक हमलों के खिलाफ ये स्थानीय सेनाएँ ही पहली ढाल बनकर खड़ी होती थीं। हालांकि इतिहास की किताबों में उनका वर्णन कम मिलता है, लेकिन सोमनाथ जैसे पवित्र स्थान इन स्थानीय योद्धाओं के बिना कभी सुरक्षित नहीं रह पाते।

इसी कालखंड के दौरान राजस्थान और गुजरात के सीमावर्ती इलाकों में उनका संघर्ष विशेष रूप से उल्लेखनीय है। तुर्की आक्रमणों और गोरी समर्थक इस्लामी हमलावरों के विरुद्ध उनके सैन्य अभियानों ने सोमनाथ की ओर जाने वाले रास्तों और मंदिर परिसर की सुरक्षा में बहुत बड़ा योगदान दिया था।

राजा कान्हड़ देव की स्थानीय शौर्य और संगठित प्रतिरोध की यह भूमिका दर्शाती है कि बड़े साम्राज्यों के बीच भी स्थानीय शासकों की तलवार और उनकी अटूट आस्था ही मंदिर और संस्कृति को जीवित रख सकती है। उनके प्रयासों ने सोमनाथ की निरंतर चली आ रही परंपरा को मजबूती प्रदान की और भविष्य के पुनर्निर्माण के लिए एक ठोस आधार तैयार किया।

राजा भोज परमार: सांस्कृतिक पुनरुत्थान के महानायक

मालवा के परमार शासक राजा भोज का योगदान केवल युद्ध के मैदान तक सीमित नहीं था, बल्कि उन्होंने सभ्यता को फिर से जीवित करने में बड़ी भूमिका निभाई। गजनी के आक्रमणों के बाद जब हिंदू समाज गहरे मानसिक आघात में था, तब राजा भोज ने शैव-परंपरा, मंदिर संस्कृति और शास्त्रीय ज्ञान को राजनैतिक संरक्षण दिया। उनका यह कदम केवल धार्मिक नहीं, बल्कि एक कड़ा राजनैतिक संदेश था कि सनातन सभ्यता को कभी मिटाया नहीं जा सकता। सोमनाथ जैसे पवित्र स्थलों का पुनरुद्धार इसी वैचारिक और मानसिक शक्ति के कारण संभव हो पाया।

इतिहास और साहित्य के विभिन्न स्रोतों में राजा भोज परमार और महाराजा विक्रमादित्य का नाम सोमनाथ के जीर्णोद्धार के साथ सम्मान से जोड़ा जाता है। शैव परंपरा और लोक-स्मृति में उनका स्थान बेहद ऊँचा है। सोमनाथ मंदिर की रक्षा और पुनर्स्थापना केवल सेना के बल पर नहीं हुई, बल्कि इसके पीछे राजनैतिक दूरदर्शिता, सांस्कृतिक सुरक्षा और ज्ञान का प्रसार भी शामिल था। इस महान शासक का योगदान आज भी लोककथाओं में जीवित है, जो सोमनाथ की अटूट परंपरा को और भी सशक्त बनाता है।

राजा महिपाल देव: सोमनाथ के रक्षक और कुशल प्रशासक

परमार वंश के राजा महिपाल देव उन शासकों की श्रेणी में आते हैं, जिनका कार्य केवल युद्ध लड़ने तक सीमित नहीं था, बल्कि उन्होंने सुरक्षा और प्रशासन को भी नई मजबूती दी। पश्चिमी भारत के धार्मिक केंद्रों की सुरक्षा करना, तीर्थस्थानों के लिए संसाधन जुटाना और अस्थिरता के दौर में शांति बनाए रखना। ये वो कार्य थे जिन्होंने लगातार होने वाले आक्रमणों के बीच भी भारतीय सभ्यता को जीवित रखा। राजा महिपाल देव इसी अटूट निरंतरता के प्रतीक हैं।

14वीं-15वीं शताब्दी के दौरान राजा महिपाल प्रभास क्षेत्र (सोमनाथ) की रक्षा के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध रहे। कहा जाता है कि उन्होंने गुजरात के इस्लामी सूबेदार जफर खान की सेना को कई बार धूल चटाई और सोमनाथ की सुरक्षा सुनिश्चित की। उन्होंने सोमनाथ क्षेत्र में बड़े सैन्य अभियान चलाए। लोक परंपराओं के अनुसार, राजा महिपाल ने सोमनाथ और उसके आसपास के स्थानीय लोगों को युद्धकला में प्रशिक्षित किया था, ताकि मंदिर की रक्षा हर हाल में की जा सके।

कुमारपाल: सभ्यता की रक्षा का साझा संकल्प

राजा कुमारपाल हालाँकि जैन परंपरा के अनुयायी थे, फिर भी उन्होंने सोमनाथ सहित तमाम हिंदू तीर्थों की रक्षा के लिए भरपूर प्रशासनिक सहयोग दिया। यह इस बात का जीता-जागता सबूत है कि सोमनाथ की रक्षा करना केवल किसी एक संप्रदाय का विषय नहीं, बल्कि पूरी भारतीय सभ्यता का प्रश्न था। आक्रमणकारी भले ही किसी खास मजहब के जुनून से भरे थे, लेकिन उनका प्रतिरोध करने वाला स्वर संपूर्ण भारतीय सभ्यता का था। 12वीं सदी में कुमारपाल ने मंदिर के संरक्षण और धार्मिक व्यवस्थाओं की जिम्मेदारी स्वीकार की थी। उनके शासनकाल में सोमनाथ की तीर्थ-परंपरा को एक बार फिर स्थिरता मिली। कुमारपाल ने न केवल सोमनाथ को सुरक्षा प्रदान की, बल्कि इसके निर्माण कार्य में भी महत्वपूर्ण मदद दी थी।

मराठा साम्राज्य: स्वतंत्रता की नई लहर

18वीं शताब्दी में मराठा साम्राज्य ने सौराष्ट्र से विदेशी इस्लामी सत्ता को उखाड़ फेंका। हालाँकि यह सीधे तौर पर केवल मंदिर के लिए युद्ध नहीं था, बल्कि यह एक राजनैतिक मुक्ति का संघर्ष था, जिसके बिना मंदिर का पुनरुद्धार संभव ही नहीं था। मराठों ने गुजरात में ऐसा सुरक्षित वातावरण तैयार किया जिससे सोमनाथ फिर से अपनी पहचान पा सके। सौराष्ट्र-गुजरात को अराजकता के दौर से बाहर निकालने और धार्मिक स्थलों की सुरक्षा सुनिश्चित करने में मराठा सैन्य अभियानों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही।

रानी अहिल्याबाई होलकर: आस्था का पुनरुद्धार

सन 1783 में रानी अहिल्याबाई होलकर ने सोमनाथ का पुनर्निर्माण करवाया। उनका यह कार्य केवल एक भवन का निर्माण नहीं था, बल्कि सदियों से हुए अपमान का एक गौरवशाली जवाब था। उन्होंने दुनिया को दिखाया कि मंदिर के ढाँचे को तोड़ा जा सकता है, लेकिन लोगों की आस्था को नहीं। तत्कालीन राजनैतिक परिस्थितियों को देखते हुए, रानी अहिल्याबाई ने मूल स्थान से थोड़ी दूर पर एक नया मंदिर बनवाया, वहाँ शिवलिंग की प्राण-प्रतिष्ठा की और पूजा की परंपरा को फिर से जीवित किया। आधुनिक सोमनाथ मंदिर के निर्माण से पहले, आस्था की ज्योति को जलाए रखने में यह सबसे महत्वपूर्ण अध्याय था। माना जाता है कि भगवान सोमनाथ ने स्वयं रानी अहिल्याबाई को स्वप्न में दर्शन दिए थे और उन्हें प्रभास क्षेत्र में मंदिर के पुनर्निर्माण की प्रेरणा दी थी।

आधुनिक भारत में राष्ट्रीय पुनर्जागरण: सरदार पटेल से पीएम मोदी तक

आजादी के बाद सोमनाथ का पुनर्निर्माण केवल एक धार्मिक विषय नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्वाभिमान का प्रश्न बन गया था। तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू की आपत्तियों के बावजूद, सरदार वल्लभभाई पटेल के दृढ़ संकल्प और उनकी पहल से भव्य सोमनाथ मंदिर का निर्माण हुआ। स्वतंत्र भारत के किसी नेता का यह पहला ऐसा बड़ा निर्णय था, जिसने यह दिखाया कि आजाद भारत अपनी सांस्कृतिक स्मृतियों को संकोच के साथ नहीं, बल्कि संकल्प के साथ देखता है।

इस प्रयास को वैचारिक और प्रशासनिक नेतृत्व कन्हैयालाल माणिकलाल (केएम) मुंशी ने दिया और साल 1951 में तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद ने मंदिर का उद्घाटन किया। आज के भारत में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सोमनाथ केवल अतीत की एक याद नहीं है, बल्कि एक जीवंत सांस्कृतिक विरासत के रूप में चमक रहा है। मंदिर के इतिहास, संरक्षण और गौरव पर यह गर्व संकेत देता है कि सोमनाथ की गाथा आज भी राष्ट्र की चेतना में धड़क रही है।

सोमनाथ का यह इतिहास गवाह है कि मजहबी कट्टरता ने बार-बार हमला किया, लेकिन हिंदू शासक और योद्धा हर बार डटकर खड़े रहे, कभी युद्ध के मैदान में तो कभी मंदिर के पुनर्निर्माण में। यही कारण है कि सोमनाथ आज भी अडिग खड़ा है, केवल एक मंदिर के रूप में नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता की कभी न हार मानने वाली जिजीविषा (जीने की इच्छा) के प्रतीक के रूप में। यह लेख उन सभी वीरों के स्मरण का एक प्रयास है, जिन्होंने अपनी तलवार, संकल्प और परिश्रम से इस महान परंपरा को जीवित रखा है।

(यह रिपोर्ट मूल रूप से गुजराती के लेखक भार्गव राज्यगुरु ने लिखी है। गुजराती का लेख पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

बांग्लादेश-चीन पर एकसाथ नजर, FIC-NWJFAC की तैनाती और समुद्री घुसपैठ पर रोक: क्यों भारत के लिए अहम है हल्दिया में बनने वाला नौसेना का नया ‘बेस’

भारतीय नौसेना पूर्वी समुद्री मोर्चे पर अपनी मौजूदगी को और मजबूत करने की दिशा में एक अहम कदम उठाने जा रही है। पश्चिम बंगाल के हल्दिया में एक नया नौसैनिक अड्डा बनाया जाएगा। इसका मकदस उत्तरी बंगाल की खाड़ी क्षेत्र में भारत की समुद्री निगरानी और सुरक्षा क्षमता को बढ़ाना है। यह फैसला ऐसे समय में लिया गया है जब इस इलाके में चीन की नौसैनिक गतिविधियाँ लगातार बढ़ रही हैं और बांग्लादेश व पाकिस्तान से जुड़े समीकरण भी तेजी से बदल रहे हैं।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, हल्दिया में बनने वाला यह ठिकाना पूर्ण विकसित नौसैनिक बेस नहीं होगा बल्कि इसे नौसेना की एक ‘डिटैचमेंट’ के रूप में विकसित किया जाएगा। यहाँ मुख्य रूप से छोटे युद्धपोतों की तैनाती की जाएगी। ये युद्धपोत तटीय निगरानी, गश्ती और तुरंत प्रतिक्रिया जैसे अभियानों में अहम भूमिका निभाएँगे। ऐसे जहाज उथले पानी में भी प्रभावी ढंग से काम कर सकते हैं और इससे बंगाल की खाड़ी के उत्तरी हिस्से में भारत की ऑपरेशनल पकड़ मजबूत होगी।

क्यों अहम है हल्दिया में नौसेना का अड्डा?

हल्दिया में प्रस्तावित नौसैनिक बेस को अगर रणनीतिक नजरिए से देखा जाए, तो यह सिर्फ एक नया सैन्य ठिकाना नहीं बल्कि भारत की पूर्वी समुद्री सुरक्षा को तेज, चुस्त और ज्यादा प्रभावी बनाने की योजना का अहम हिस्सा है।

सबसे पहले स्थान को समझना जरूरी है। हल्दिया, कोलकाता से लगभग 100 किलोमीटर दूर हुगली नदी के किनारे स्थित है और यहाँ से बंगाल की खाड़ी तक सीधी पहुँच मिलती है। अभी तक भारतीय नौसेना के जहाजों को कोलकाता से निकलकर हुगली नदी के लंबे और समय लेने वाले रास्ते से गुजरना पड़ता है। नया बेस बनने के बाद यह लंबा सफर काफी हद तक बच जाएगा और जहाज बहुत तेजी से खुले समुद्र यानी बंगाल की खाड़ी तक पहुँच सकेंगे। यह समय की बचत युद्ध या किसी आपात स्थिति में बेहद अहम होती है।

रणनीतिक दृष्टि से भी हल्दिया का स्थान बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। यह क्षेत्र न केवल भारत के लिए व्यापारिक और औद्योगिक रूप से अहम है बल्कि समुद्री मार्गों की सुरक्षा के लिहाज से भी इसकी भूमिका बढ़ जाती है। बंगाल की खाड़ी में चीन की बढ़ती मौजूदगी और उसकी तथाकथित ‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स’ रणनीति के बीच भारत अपनी समुद्री सीमाओं और हितों की रक्षा के लिए सक्रिय कदम उठा रहा है। हल्दिया में नौसेना की मौजूदगी से इस पूरे क्षेत्र पर निगरानी और नियंत्रण करना भारत के लिए आसान हो जाएगा।

चीन और बांग्लादेश के रिश्ते पहले से ही काफी मजबूत रहे हैं और यह सिलसिला पिछले दस साल से ज्यादा समय से चल रहा है। चीन ने बांग्लादेश नौसेना को दो पनडुब्बियाँ सौंपी हैं और चटगाँव के पास पनडुब्बियों के लिए एक नौसैनिक अड्डा भी बना रहा है। पहले इस अड्डे का नाम बीएनएस शेख हसीना रखा गया था लेकिन अब उसका नाम बदल दिया गया है।

बांग्लादेश में शेख हसीना के सत्ता से जाने के बाद हालात लगातार बिगड़ते चले गए हैं। मोहम्मद युनूस के नेतृत्व में सत्ता चल तो रही है लेकिन उसकी असल लगाम कट्टरपंथियों के हाथ में आ गई है। भारत के साथ संबंध लगातार खराब होते जा रहे हैं और पाकिस्तान के सैन्य से लेकर राजनीतिक नेतृत्व तक की नजदीकियाँ बांग्लादेश से बढ़ रही हैं। ऐसे में बांग्लादेश पर नजर रखना भारत के लिहाज के लिए अहम होता जा रहा है।

रक्षा सूत्रों के मुताबिक, इस नौसैनिक अड्डे के बनने के बाद इलाके में जो भी समुद्री हलचल होगी उस पर भारतीय नौसेना की सीधी निगाह रहेगी। पिछले साल नवंबर में पाकिस्तान की नौसेना ने अपना युद्धपोत पीएनएस सैफ बांग्लादेश भेजा था। यह चीन में बना गाइडेड मिसाइल फ्रिगेट है। इस दौरे को काफी अहम माना गया। नवंबर में दोनों देशों की नौसेनाओं के बीच दो-स्टार स्तर की स्टाफ बातचीत भी हुई जो अपने आप में पहली बार था। भारत को आशंका है कि आने वाले समय में पाकिस्तान और बांग्लादेश के बीच रक्षा सहयोग और बढ़ सकता है।

क्या होगी इस नेवल बेस की क्षमता?

इस बेस के लिए हल्दिया डॉक कॉम्प्लेक्स का इस्तेमाल किया जाएगा, जो साल 1970 से काम कर रहा है। इसका मतलब यह है कि नौसेना को बिल्कुल नए सिरे से पूरा इंफ्रास्ट्रक्चर खड़ा करने की जरूरत नहीं पड़ेगी। शुरुआत में एक विशेष जेट्टी बनाई जाएगी, जहाँ नौसैनिक जहाजों को बाँधा जा सकेगा और साथ में शोर सपोर्ट सुविधाएँ विकसित की जाएँगी यानी जहाजों के रखरखाव, ईंधन, स्टाफ और ऑपरेशंस से जुड़ी जरूरी व्यवस्थाएँ। मौजूदा बंदरगाह ढाँचे का फायदा उठाने से बेस जल्दी तैयार हो सकेगा और लागत भी कम रहेगी।

यह भी साफ किया गया है कि हल्दिया कोई बड़ा नेवल कमांड नहीं होगा। इसे एक छोटे लेकिन बेहद अहम नौसैनिक डिटैचमेंट यानी चौकी के रूप में विकसित किया जा रहा है। यहाँ करीब 100 अधिकारी और नाविक तैनात रहेंगे। संख्या भले ही कम लगे लेकिन इस तरह के बेस का मकसद भारी-भरकम तैनाती नहीं बल्कि तेजी से प्रतिक्रिया देने की क्षमता होता है।

अब बात करते हैं उन जहाजों की, जिनके लिए यह बेस खास तौर पर तैयार किया जा रहा है। हल्दिया बेस मुख्य रूप से छोटे, तेज और अत्यधिक फुर्तीले युद्धपोतों का अड्डा होगा।

पहली श्रेणी है फास्ट इंटरसेप्टर क्राफ्ट्स यानी FICs। ये छोटे आकार के लेकिन बहुत तेज जहाज होते हैं, जिनकी रफ्तार 45 नॉट्स तक हो सकती है। वजन करीब 100 टन के आसपास होता है और इन्हें चलाने के लिए 10 से 12 लोगों का क्रू काफी होता है। ये जहाज मशीन गन से लैस रहते हैं और इनका मुख्य काम तटीय इलाकों में गश्त, संदिग्ध गतिविधियों पर तुरंत कार्रवाई, घुसपैठ रोकना और बंदरगाहों की सुरक्षा करना होता है। समुद्र में किसी छोटे खतरे या तेज मूवमेंट के खिलाफ ये सबसे पहले प्रतिक्रिया देने वाले प्लेटफॉर्म होते हैं।

दूसरी और ज्यादा उन्नत श्रेणी है न्यू वॉटर जेट फास्ट अटैक क्राफ्ट्स यानी NWJFACs। ये जहाज आकार में FICs से बड़े होते हैं, लगभग 300 टन के और इनकी स्पीड भी 40 से 45 नॉट्स के बीच होती है। इनकी सबसे बड़ी खासियत इनका हथियार सिस्टम है। इन्हें CRN-91 गन से लैस किया जाएगा और भविष्य में इनमें नागास्त्र जैसे लूटरिंग मुनिशन भी तैनात किए जा सकते हैं। लूटरिंग मुनिशन को आम भाषा में ड्रोन जैसी स्मार्ट मिसाइलें कहा जा सकता है, जो लक्ष्य की पहचान करती हैं और फिर सटीक हमला करती हैं। इस वजह से NWJFACs सिर्फ निगरानी के लिए नहीं बल्कि सटीक स्ट्राइक और विशेष सैन्य अभियानों के लिए भी बेहद उपयोगी होंगे।

इन जहाजों की अहमियत इस बात से भी समझी जा सकती है कि 2024 में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता में डिफेंस एक्विजिशन काउंसिल ने 120 फास्ट इंटरसेप्टर क्राफ्ट्स और 31 न्यू वॉटर जेट फास्ट अटैक क्राफ्ट्स की खरीद को मंजूरी दी थी। यह फैसला साफ संकेत देता है कि भारत अपनी तटीय सुरक्षा और शॉर्ट-रेंज मैरीटाइम ऑपरेशंस को प्राथमिकता दे रहा है।

इन सभी जहाजों का इस्तेमाल तटीय सुरक्षा, समुद्री घुसपैठ रोकने, बंदरगाहों की रक्षा और विशेष सैन्य अभियानों में किया जाएगा। हल्दिया जैसे बेस से इनकी तैनाती का मतलब यह है कि बंगाल की खाड़ी में किसी भी संदिग्ध गतिविधि, चाहे वह तस्करी हो, आतंकवादी घुसपैठ हो या किसी विदेशी नौसैनिक मूवमेंट की निगरानी, उस पर भारतीय नौसेना बेहद कम समय में प्रतिक्रिया दे सकेगी।

कुल मिलाकर हल्दिया का यह प्रस्तावित नौसैनिक बेस आकार में छोटा जरूर होगा लेकिन इसकी रणनीतिक भूमिका बड़ी है। यह भारत की पूर्वी समुद्री सीमा पर निगरानी को मजबूत करेगा, प्रतिक्रिया समय घटाएगा और बंगाल की खाड़ी में बदलते सुरक्षा समीकरणों के बीच भारत की पकड़ को और मजबूत बनाएगा।