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IIT दिल्ली में जाति सम्मेलन : दलितों को फिलिस्तीनियों से जोड़ने और जाति प्रथा को ग्लोबल उत्पीड़न बताने की कोशिश, दिव्या द्विवेदी और इक्वालिटी लैब्स का प्रोपेगेंडा

इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी दिल्ली ने 16 से 18 जनवरी के बीच कैंपस में हुई ‘क्रिटिकल फिलॉसफी ऑफ कास्ट एंड रेस’ विषय पर कॉन्फ्रेंस को विवादास्पद मानते हुए इसकी जाँच शुरू की है। आधिकारिक बयान में IIT दिल्ली ने कहा कि उसने संबंधित फैकल्टी मेंबर्स, वक्ताओं के कंटेंट और उसपर जताई गई आपत्तियों की जाँच के लिए एक कमेटी बनाई है।

इंस्टीट्यूट ने आगे कहा कि कमेटी की जाँच रिपोर्ट आने के बाद प्रोटोकॉल के मुताबिक एक्शन लिया जाएगा। इंस्टीट्यूट ने देश के प्रति अपनी जवाबदेही, एकेडमिक और इंस्टीट्यूशनल गाइडलाइंस को पालने करने की बात कही है।

कॉन्फ्रेंस में क्या हुआ

तीन दिनों तक यह कार्यक्रम IIT दिल्ली की मेन बिल्डिंग के सीनेट हॉल में चला। इसे 2001 में साउथ अफ्रीका के डरबन में हुए नस्लवाद पर विश्व कॉन्फ्रेंस के 25 साल पूरे होने पर रखा गया था।

आयोजकों के मुताबिक, कॉन्फ्रेंस का मकसद जाति और वंश पर आधारित भेदभाव को नस्लीय भेदभाव के साथ वैश्विक मंच पर रखना था। यह कार्यक्रम जाति, नस्ल, जेंडर, धर्म आदि मुद्दों पर वैश्विक नजरिया तैयार करने की कोशिश की गई। दरअसल यह एक ऐसे नेटर्वक का निर्माण करने की कोशिश थी, जो मानवाधिकारों को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर उठा सके। इसलिए कार्यक्रम के दौरान विचार विमर्श, लेक्चर, पैनल डिस्कशन, राउंड टेबल, बुक लॉन्च और फिल्म स्क्रीनिंग की गई।

बाहर से देखने पर यह सब अच्छा लग सकता है, लेकिन इस कॉन्फ्रेंस ने जाति व्यवस्था पर एकतरफ़ा राय दी। कार्यक्रम को इस तरह से पेश किया गया जैसे भारत में अल्पसंख्यकों और दलितों के साथ बहुत ज्यादा भेदभाव किया जाता है।

कॉन्फ्रेंस का आयोजन IIT दिल्ली की दिव्या द्विवेदी और सौजन्या तमालपकुला ने ह्यूमैनिटीज़ और सोशल साइंसेज़ डिपार्टमेंट की मदद से किया था। दिव्या द्विवेदी वही प्रोफ़ेसर हैं जिन्होंने एक बार एक न्यूज़ चैनल पर डिबेट के दौरान दावा किया था कि हिंदू धर्म 20वीं सदी में बना था। उन्होंने द कारवां के लिए लिखे एक आर्टिकल में हिंदू धर्म को ‘धोखा’ भी कहा था।

वक्ताओं में इंटरनेशनल ‘एक्टिविस्ट’ और ‘स्कॉलर’ शामिल थे, जिनमें इक्वालिटी लैब्स की फाउंडर थेनमोझी सुंदरराजन भी शामिल थीं, जो जाति को नस्ल-आधारित बताने और वैश्विक मंच पर विवादित टिप्पणियों के लिए कुख्यात रही हैं। ‘इक्वालिटी लैब्स’ अमेरिका में जाति की बात को आगे बढ़ा रही है, उसका दावा है कि अमेरिका में आकर बसे ऊँची जाति के भारतीय अक्सर भारतीय मूल के साथियों और SC/ST समुदाय के कर्मचारियों के साथ जाति के आधार पर भेदभाव करते हैं।

कई बार व्याख्यान के दौरान जाति भेद को नस्ल भेद से जोड़ा गया। ग्लोबल गवर्नेंस, धर्म और आज के राजनीतिक आंदोलनों पर चर्चा की गई। दलित मुद्दों की तुलना दूसरे अंतरराष्ट्रीय झगड़ों से की गई। इन सेशन में ‘जाति के आधार पर भेदभाव’ को दूर करने के लिए इंटरनेशनल गठबंधन बनाने की बात कही गई।

दिव्या द्विवेदी कौन हैं और क्या करती हैं

दिव्या द्विवेदी IIT दिल्ली में ह्यूमैनिटीज और सोशल साइंसेज डिपार्टमेंट में प्रोफेसर हैं, जो इस कॉन्फ्रेंस की मुख्य आयोजक थी। वह फिलॉसफी और लिटरेचर पढ़ाती हैं। पिछले दस सालों में वह एक ऐसी सिद्धांतवादी के तौर पर उभरी हैं, जो कहता है कि भारत में न केवल अल्पसंख्यकों के साथ भेदभाव किया जा रहा है, बल्कि दलित, आदिवासी और निचली जातियों के साथ भेदभाव किया जा रहा है।

उनके एकेडमिक करियर में इंटरनेशनल पब्लिशर्स के साथ पब्लिकेशन, यूरोपियन इंस्टीट्यूशन्स में फेलोशिप और UNESCO से जुड़े प्लेटफॉर्म्स से जुड़ी एडवाइजरी की भूमिका शामिल हैं। यानी उनके पास ग्लोबल मंच मौजूद है, जहाँ वह भारत के खिलाफ जहर उगलती हैं और लोगों का नजरिया बदलने के लिए प्रोत्साहित करती हैं।

हिंदू धर्म और हिंदू पहचान पर विवादित बयान देती रही हैं

द्विवेदी का दृष्टिकोण हमेशा हिन्दू विरोधी रहा है। 2019 में एक टेलीविज़न डिबेट के दौरान, उन्होंने कहा, “हिंदू धर्म बीसवीं सदी की शुरुआत में इस बात को छिपाने के लिए बनाया गया था कि निचली जाति के लोग ही भारत में असली बहुसंख्यक हैं।” उन्होंने आगे दावा किया कि महात्मा गाँधी ने ‘एक झूठी हिंदू बहुसंख्यक और एक नई हिंदू पहचान बनाने में मदद की’। उन्होंने आगे कहा कि इस राजनीतिक सोच को ‘खत्म’ कर दिया जाना चाहिए।

इन विचारों को उन्होंने विवादित मैगज़ीन, द कारवां में बताया। ‘द हिंदू होक्स’ शीर्षक वाले लेख में हिंदू पहचान को ऊँची जाति के एलीट वर्ग द्वारा जानबूझकर बनाई गई पॉलिटिकल फिक्शन के तौर पर पेश किया गया। लेख में उन्होंने तर्क दिया कि ‘हिंदू’ शब्द ज़ुल्म से जुड़ा हुआ है और इसमें ऊँची जातियों का दबदबा है।

ऐसे दावों को नतीजों की तरह पेश किया जाता है, जिससे परंपराओं और अलग-अलग जातियों के लाखों हिंदुओं के धार्मिक अनुभव के लिए बहुत कम जगह बचती है। हिंदू धर्म को एक ‘छल’ के तौर पर पेश करके, वह असल में सनातन धर्म को माननेवालों की अवहेलना करती है। इस बात को भी नजरअंदाज करती हैं कि लाखों लोग अपने धर्म को कैसे समझते और मानते हैं।

G20 में हिन्दू धर्म को खत्म करने की कही बात

द्विवेदी का सोच वाला रवैया 2023 में भारत में G20 मीटिंग के दौरान और भी साफ़ हो गया। उस दौरान, उन्होंने फ्रेंच ब्रॉडकास्टर फ्रांस 24 के साथ एक इंटरव्यू में कहा कि वह हिंदू धर्म के बिना भारत के भविष्य को देखती हैं। दिव्या द्विवेदी ने विदेशी मीडिया के सामने आर्यन थ्योरी की बात करते हुए भारत से हिन्दू धर्म को मिटाने की वकालत की।

दिव्या ने कहा, “दो भारत हैं। बहुसंख्यक आबादी पर अत्याचार करने वाले नस्लीय जाति व्यवस्था का अतीत का भारत और फिर भविष्य का भारत है, जो जाति उत्पीड़न और हिंदू धर्म के बिना एक समतावादी भारत है। यह वह भारत है जिसका अभी तक प्रतिनिधित्व नहीं आया है, लेकिन वह इंतजार कर रहा है, दुनिया को अपना चेहरा दिखाने के लिए तरस रहा है।”

फ्रांस 24 के पत्रकार ने उनसे सवाल करते हुए भारतीय रिक्शा चालक की कहानी बताते हुए उनसे उनकी राय पूछी कि भारत द्वारा किए गए डिजिटलीकरण और वैश्वीकरण जैसे उपायों से देश के नागरिकों को कैसे लाभ हो रहा है। उन्होंने दिव्या द्विवेदी को बताया कि कैसे रिक्शा चालक ने उन्हें समझाया कि पीएम मोदी की डिजिटल इंडिया पहल ने उन्हें न केवल अपने ग्राहकों, बल्कि पूरी दुनिया से जुड़ने और अपना व्यवसाय बढ़ाने में मदद की। इस पर दिव्या ने कहा कि ये मीडिया की गढ़ी हुई कहानियाँ हैं।

IIT दिल्ली कॉन्फ्रेंस में फिर जाति-नस्ल को जोड़ा

द्विवेदी ने CPCR3 में कहा, ‘डरबन के बचे हुए हिस्से: जाति और नस्ल की एक क्रिटिकल फिलॉसफी की ओर’ नाम से एक पेपर पेश किया। हालाँकि पेपर का पूरा टेक्स्ट या उनके प्रेजेंटेशन का वीडियो अभी पब्लिक में उपलब्ध नहीं है, लेकिन पेपर का एब्स्ट्रैक्ट खुद ही बहुत कुछ बताता है। वैश्विक सैद्धांतिक और राजनीतिक प्रतिमानों के भीतर जाति और नस्ल को परिभाषित करते हुए उन्होंने व्याख्यान दिया।

स्रोत-IIT दिल्ली

मार्च 2025 में ऑक्सफ़ोर्ड प्रेस से छपे इस पेपर में, द्विवेदी ने यह दावा दोहराया कि ‘कास्ट इज रेस प्लस’, यह नारा 2001 के डरबन कॉन्फ्रेंस से आया था। उन्होंने तर्क दिया कि जाति और नस्ल में काफी समानता है, जिसकी जड़ें उन्होंने पूर्व औपनिवेशिक और औपनिवेशिक ‘आर्यन डॉक्ट्रिन’ के तौर पर पेश की। उनके अनुसार, यह सिर्फ भेदभाव ही नहीं बल्कि नस्लवाद का सबसे मुखर रूप ‘पैलियो रेसिज़्म’ है।

स्रोत-ऑक्सफोर्ड प्रेस

उन्होंने आगे कहा कि जाति को नस्ल के बराबर मानने का विरोध मुख्य रूप से इस तथाकथित एकरूपता के साथ टकराव को रोकने के लिए है। यह तर्क सिर्फ इसलिए दिए जा रहे थे कि ये साबित किया जा सके कि हिंदू समाज सुधार योग्य या अंदरूनी रूप से बहुलवादी नहीं है। यह समाज को एक स्वाभाविक रूप से नस्लीय व्यवस्था के रूप में दिखाता है, जिसे ग्लोबल विचारधारा के जरिए चुनौती दी जानी चाहिए।

हिन्दू धर्म को बदनाम करने की साजिश

द्विवेदी का नजरिया धर्म, इतिहास, सामाजिक व्यवहार और राजनीतिक शक्ति को एक ही फ्रेमवर्क में समेट देता है। हिंदू धर्म को दबदबे का एक ज़रिया बना दिया गया है, जाति को पूरी तरह से नस्लीय बना दिया गया है, और अलग राय को विद्वानों की असहमति के बजाय नैतिक टालमटोल माना गया।

यह लेफ्ट-लिबरल बुद्धिजीवियों के साथ ये बहुत बड़ी समस्या है। उनके हिसाब से, यह ‘मेरा रास्ता या हाईवे’ है। कोई भी जो उनके तर्क को काउंटर करने के लिए कोई दूसरा नैरेटिव या नजरिया पेश करता है, वह राइट-विंगर बन जाता है, चाहे वह तर्क कितना भी सही क्यों न हो।

उनका काम जाति को नस्ल और हिंदू पहचान को धोखा बताकर भारत के अंदरूनी सामाजिक प्रक्रिया में बाहरी दखल को न्योता देना है। यह उन देसी सुधार आंदोलनों, फिलॉसॉफिकल परंपराओं और सोशल मोबिलिटी को गलत साबित करता है जो उनकी थीसिस से मेल नहीं खाते।

सबसे ज़रूरी बात यह है कि G20 के दौरान एकेडमिक कॉन्फ्रेंस या इंटरनेशनल मीडिया जैसे ग्लोबल प्लेटफॉर्म का उनका बार-बार इस्तेमाल यह दिखाता है कि यह कहानी सिर्फ़ एकेडमिक जाँच नहीं है, बल्कि स्कॉलरशिप के तौर पर पेश की गई पॉलिटिकल वकालत है।

IIT दिल्ली में उनकी भूमिका क्यों मायने रखती है

जब IIT दिल्ली जैसे पब्लिक फंडेड प्रीमियर इंस्टिट्यूशन में इस तरह का सिद्धांत घर कर जाता है, तो यह ज्यादा चिंताजनक है। जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी (JNU) को लंबे समय से लेफ्ट-लिबरल, एंटी-हिंदू और एंटी-इंडिया कहानियों का हब माना जाता रहा है, ज़्यादातर इसलिए क्योंकि ऐसी आइडियोलॉजी को बिना किसी मतलब के प्रशासनिक दखल से फलने-फूलने दिया गया है।

एकेडमिक आजादी का मतलब आइडियोलॉजिकल मोनोपॉली नहीं है। द्विवेदी के इस कॉन्फ्रेंस में दुनिया को देखने का उनका नजरिया दिखा, जहाँ बैलेंस या काउंटर करने वाला कोई नहीं था। चिंता यह नहीं है कि उनके विचार विवादित हैं। चिंता यह है कि इन विचारों को एकेडमिक आम सहमति के तौर पर आगे बढ़ाया जाता है, एलीट इंस्टिट्यूशन के ज़रिए बढ़ाया जाता है, और इंटरनेशनल लेवल पर भारतीय सच्चाई के तौर पर पेश किया जाता है। यही वजह है कि उनके रोल, उनकी कॉन्फ्रेंस और उनके इंटेलेक्चुअल नेटवर्क की जांच जरूरी है।

इक्वालिटी लैब्स की फाउंडर थेनमोझी सुंदरराजन कौन हैं?

थेनमोझी सुंदरराजन इक्वालिटी लैब्स की फाउंडर और एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर हैं। वह खुद को एक ट्रांसमीडिया आर्टिस्ट, थ्योरिस्ट और फ्यूचरिस्ट बताती हैं। वह धर्म, नस्ल, जाति, जेंडर, टेक्नोलॉजी और न्याय पर एक दलित अमेरिकन कमेंटेटर हैं। उन्होंने पहले भी हिंदू धर्म, हिंदू समाज और संस्कृति पर आपत्तिजनक बयान दिए हैं। कॉन्फ्रेंस के लिए उनका टॉपिक था ‘दलित अमेरिकियों पर नस्लीय और जातिगत विषमताओं का असर’।

स्रोत- आईआईटी दिल्ली

उनका संगठन, इक्वालिटी लैब्स, अमेरिका में सबसे असरदार एंटी-ब्राह्मण ग्रुप में से एक बनकर उभरा है। वह ‘द ट्रॉमा ऑफ कास्ट’ की लेखिका भी हैं और उन्होंने जातिवाद को नस्ल, ज़ुल्म वाली व्यवस्था और नरसंहार बता कर इसे इंटरनेशनल बनाने की कोशिश की और एक अहम आवाज के तौर पर खुद को स्थापित किया।

थेनमोझी सुंदरराजन की लीडरशिप में, इक्वालिटी लैब्स ने हिंदू समाज, खासकर ब्राह्मण समुदायों को दूसरी जातियों को दबाने वाला दिखाने वाली कहानियों को आगे बढ़ाया है।

इक्वालिटी लैब्स और इसका विवादास्पद रिकॉर्ड

इक्वालिटी लैब्स ने दुनिया भर का तब ध्यान खींचा जब ट्विटर के पूर्व CEO जैक डोर्सी ने ‘स्मैश ब्राह्मणिकल पैट्रियार्की’ यानी जातिवाद को बताने वाली बाह्मणवादी पितृसत्ता लिखे एक प्लेकार्ड के साथ पोज़ दिया। यह पोस्टर खुद सुंदरराजन ने डिज़ाइन किया था। यह तस्वीर संगठन की पहचान बन गई, जो सुधार के बजाय सामाजिक दुश्मनी को बढ़ावा देता है।

स्रोत- फाइल फोटो

इस संगठन ने साउथ एशियन अमेरिकन्स के बीच बड़े पैमाने पर जातिगत भेदभाव का दावा करने वाली रिपोर्ट्स पर ऑर्गनाइज़ेशन फॉर माइनॉरिटीज़ इन इंडिया (OFMI) के साथ मिलकर काम किया है। OFMI की स्थापना भजन सिंह भिंडर ने की थी, जो ISI से जुड़े थे। इसमें पीटर फ्रेडरिक भी शामिल थे, जिन्होंने बार-बार हिंदू राजनीतिक हस्तियों और संगठनों को टारगेट किया। इन संबंधों के बावजूद, इक्वालिटी लैब्स को एक्टिविस्ट लॉमेकर्स और मीडिया आउटलेट्स द्वारा जाति वाद के खिलाफ एक आवाज के तौर पर बताया गया।
पॉलिटिकल लॉबिंग और आइडियोलॉजिकल कैंपेनिंग

इक्वालिटी लैब्स का US डेमोक्रेटिक पार्टी के जस्टिस डेमोक्रेट्स विंग में काफी असर है। इस संगठन ने यूनाइटेड स्टेट्स में इंडिया के सिटिज़नशिप अमेंडमेंट एक्ट के खिलाफ आक्रामक कैंपेन चलाया, जिसमें जेनोसाइड के आरोपों को बढ़ावा दिया गया और ‘स्टॉप हिंदू फासिज़्म’ जैसे नारे पॉपुलर किए गए।

विवादित दावा और गुगल का इंटरव्यू रोका गया

सौंदरराजन ने बार-बार विवादित दावे किए हैं। उन्होंने कहा कि वैदिक काल में संस्कृत सिर्फ ब्राह्मणों के लिए थी और मनुस्मृति में दलितों के कानों में पिघला हुआ शीशा डालने का आदेश दिया गया था। इन दावों पर कई स्कॉलरों ने विरोध जताया। उन्होंने योग की परंपरा का भी विरोध किया।

अप्रैल 2022 में, गूगल ने सुंदरराजन की एक तय इंटरव्यू स्थगित कर दी थी, क्योंकि इससे वर्कप्लेस पर विवाद होने और आपसी दुश्मनी पैदा होने का खतरा था। टेक की बड़ी कंपनी ने साफ किया कि गूगल में जाति के आधार पर भेदभाव की कोई जगह नहीं है, लेकिन वह ऐसे सेशन होस्ट नहीं करेगी जिनसे कर्मचारियों के बीच फूट पड़ने का खतरा हो।

खालिस्तानियों और SB403 विवाद से लिंक

सौंदरराजन ने सिख्स फॉर जस्टिस के खालिस्तानी आतंकवादी गुरपतवंत सिंह पन्नून के साथ स्टेज शेयर किया। इस पर भी दुनिया का ध्यान गया। इस बात को US कॉन्ग्रेस के उम्मीदवार रितेश टंडन ने भी हाईलाइट किया था। यह इवेंट वाशिंगटन DC में हुआ था, और बाद में हिंदू एडवोकेसी ग्रुप्स ने इस इवेंट की तस्वीरें शेयर की थीं।

इक्वालिटी लैब्स ने प्रस्तावित एंटी-कास्ट डिस्क्रिमिनेशन बिल का कैलिफोर्निया में समर्थन किया था, जो अब खत्म हो चुके सिस्को कास्ट केस पर काफी हद तक निर्भर था। गवर्नर गेविन न्यूसम द्वारा बिल वापस किए जाने को सुंदरराजन ने बड़ा झटका कहा और इसे ‘दिल तोड़ने वाला’ बताया। यह एक तरह से अमेरिकन लॉ में कास्ट नैरेटिव्स को कानूनी जामा पहनाने की कोशिश माना जा सकता है।

आरुषि पुनिया द्वारा दलित- फ़िलिस्तीनियों की तुलना

कॉन्फ्रेंस के दौरान एक वक्ता आरुषि पुनिया ने ‘दलितों और फ़िलिस्तीनियों में क्या समानता है?’ विषय पर अपनी बात रखी। आरुषि IIT दिल्ली से ट्रेनिंग लेने वाली स्कॉलर हैं, जहाँ उन्होंने दलित और फ़िलिस्तीनी लिटरेचर और दुख की कहानियों की तुलना करते हुए अपनी PhD पूरी की।

वह कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी में विज़िटिंग फ़ेलो भी रही हैं और इंडियन एक्सप्रेस, मिडिल ईस्ट आई और दूसरे लेफ़्ट झुकाव वाले पब्लिकेशन जैसे प्लेटफ़ॉर्म के लिए लिख चुकी हैं।

मई 2024 में इंडियन एक्सप्रेस में छपे एक लेख में, उन्होंने तर्क दिया कि दलितों और फ़िलिस्तीनियों को ‘एथनो-नेशनल स्टेट्स’ के हाथों ज़ुल्म, बेइज़्ज़ती, खत्म करने की कोशिश के एक जैसे अनुभव हैं। उन्होंने भारतीय सोशल ऑर्डर की तुलना इज़राइल फ़िलिस्तीन संघर्ष से की, जिसमें कथित तौर पर हावी ग्रुप दबे हुए लोगों पर नस्लीय कंट्रोल करते हैं।

उनके आर्टिकल ने बार-बार हिंदू समाज और भारतीय राज्य व्यवस्था को ‘जायोनिज़्म’ यानी यहूदी व्यवस्था जैसा बताया और कहा कि जाति, गाजा और वेस्ट बैंक में इजराइल के कामों की तरह ही नस्लीय दबदबे के एक रूप के तौर पर काम करती है।

यह तुलना बहुत गलत है। दलित भारत के नागरिक हैं जिनके पास संवैधानिक अधिकार, राजनीतिक प्रतिनिधित्व से लेकर वो सारे अधिकार हैं जो देश के किसी भी नागरिक को मिले हुए हैं। इसके उलट, फ़िलिस्तीनी एक जियोपॉलिटिकल लड़ाई में हैं जिसमें बॉर्डर, जंग, हमास जैसे टेररिस्ट ग्रुप और दूसरे देशों के दावे शामिल हैं। एक सभ्यता के अंदर सामाजिक भेदभाव को दो देशों की लड़ाई से तुलना करना कोई स्कॉलरशिप नहीं है, बल्कि सोच को सवाल है।

उन्होंने जाति के ज़ुल्म और जंग में शामिल इलाके के लोगों की तुलना की। इस दौरान इस बात पर भी ध्यान नहीं दिया कि ऐसे तर्क ऐतिहासिक सच्चाई को मिटा देते हैं, और जातीय भेदभाव के शिकार लोगों को हथियारों वाली लड़ाइयों की ओर बढ़ने की प्रेरणा देते हैं।

यह सोच सुधार या न्याय को आगे नहीं बढ़ाती। इसके बजाय, यह भारतीय समाज को स्वाभाविक रूप से ज़ुल्मी और ग्लोबल झगड़े वाले इलाकों के बराबर दिखाने की एक बड़ी एकेडमिक सोच को बढ़ावा देती है।

यह कोई अकेली घटना नहीं, बल्कि एक पैटर्न है

IIT दिल्ली में CPCR3 कॉन्फ्रेंस को लेकर हुआ विवाद भारत के एकेडमिक स्थानों में एक बड़े मुद्दे की ओर इशारा करता है। जिसे जाति और भेदभाव पर एक एकेडमिक चर्चा के तौर पर पेश किया गया, वह एक छोटी और एकतरफ़ा कहानी को बढ़ावा देने लगा, जिसने हिंदू समाज को स्वाभाविक रूप से ज़ुल्मी और सुधार से परे दिखाया।

दिव्या द्विवेदी ने कॉन्फ्रेंस आयोजित की और इक्वालिटी लैब्स की फाउंडर थेनमोझी सुंदरराजन की मौजूदगी से कॉन्फ्रेंस का नेचर और साफ़ हो गया। हिन्दुओं की जातिगत भेदभाव को ग्लोबल झगड़े के पैटर्न के तौर पर दिखाना और नस्लवाद से जोड़ने की कोशिश की यह पहली घटना नहीं है। यह तरीका सुधार के बारे में कम और टकराव के बारे में ज्यादा है, जो अक्सर विश्वसमुदाय का ध्यान खींचने के लिए किया जाता है।

ऐसी कॉन्फ्रेंस अकेले नहीं होतीं। इसी तरह के इवेंट तेज़ी से कैंपस में ऑर्गनाइज़ किए जा रहे हैं, जहाँ एक्टिविस्ट की बातों को एकेडमिक आम सहमति के तौर पर पेश किया जाता है, जबकि दूसरे नज़रिए को नज़रअंदाज़ किया जाता है। जब जाति को बार-बार नस्ल के बराबर माना जाता है और भारत की सामाजिक सच्चाइयों की तुलना युद्ध के मैदानों से की जाती है, तो इससे बातचीत के बजाय बँटवारा होता है।

एकेडमिक आजादी का मतलब सोच पर मोनोपॉली नहीं है। IIT दिल्ली जैसे इंस्टीट्यूशन की जिम्मेदारी है कि वे बैलेंस, इंटेलेक्चुअल सख्ती और सच्ची बहस को बढ़ावा दें। कॉन्फ्रेंस को लेकर जाँच कमेटी बनाने का फैसला एक जरूरी कदम है, लेकिन बड़ा मुद्दा अभी भी बना हुआ है।

यह एपिसोड तो बस शुरुआत है। जब तक ऐसी बातों और कॉन्फ्रेंस की और करीब से जाँच नहीं की जाती, तब तक एकेडमिक जगहें सीखने वाली जगह के बजाय तय सोच से चलने वाली पॉलिटिकल नेरेटिव गढ़ने वाली जगह बनने लगेगी।

(यह लेख अंग्रेजी में लिखा गया है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

पढ़ाई छूटी, स्टेशन पर कटी रातें और अब मिला पद्मश्री: पढ़ें- सत्यनारायण नुवाल की कहानी जिनकी सोलर इंडस्ट्रीज के हथियारों ने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ में दिखाया जलवा

गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर सोलर इंडस्ट्रीज इंडिया लिमिटेड के संस्थापक और चेयरमैन सत्यनारायण नुवाल को ट्रेड और इंडस्ट्री के क्षेत्र में पद्मश्री से सम्मानित किया गया। ‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ की रिपोर्ट के अनुसार, उनकी कंपनी द्वारा बनाए गए ‘नागास्त्र’ हथियार सिस्टम का पिछले साल मई में हुए ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान सफलतापूर्वक इस्तेमाल किया गया था।

नुवाल, सोलर डिफेंस एंड एयरोस्पेस लिमिटेड (SDAL) के भी चेयरमैन हैं, जो देश की पहली और सबसे बड़ी निजी सैन्य-स्तरीय विस्फोटक निर्माण इकाइयों में से एक मानी जाती है। खास बात यह है कि SDAL ने ब्रह्मोस मिसाइल के लिए बूस्टर भी उपलब्ध कराए हैं।

उद्योग और समाज में असाधारण योगदान के लिए चुने गए सत्यनारायण नुवाल हाल के वर्षों में महाराष्ट्र के विदर्भ क्षेत्र से पद्मश्री पाने वाले इकलौते कारोबारी हैं। उन्होंने TOI से बातचीत में कहा, “मुझे उम्मीद नहीं थी कि मुझे इतना बड़ा सम्मान मिलेगा। यह पुरस्कार देश के लिए मेरी जिम्मेदारी को और बढ़ाता है। रक्षा क्षेत्र में कारोबार करने का मकसद मुनाफा नहीं बल्कि राष्ट्रसेवा है।”

नुवाल पहली पीढ़ी के उद्यमी हैं। उन्होंने 1990 के दशक के मध्य में बेहद साधारण शुरुआत की थी, जब वह कोल इंडिया लिमिटेड को व्यावसायिक विस्फोटक सप्लाई करते थे। उस दौर में वह अकेले यात्रा करते थे और कई बार रेलवे प्लेटफॉर्म पर घंटों इंतजार करना पड़ता था। बाद में 2010 में उनकी कंपनी ने सैन्य-स्तरीय विस्फोटक बनाना शुरू किया और रक्षा क्षेत्र में प्रवेश किया।

74 वर्षीय नुवाल बताते हैं, “निजी क्षेत्र की किसी कंपनी के लिए यह बिल्कुल नया क्षेत्र था। मैं अक्सर सशस्त्र बलों को सप्लाई से जुड़ी दिक्कतों के बारे में सुनता था और समझ गया था कि देश को इस क्षेत्र में और उद्यमियों की जरूरत है। इसी सोच के साथ हमने रक्षा क्षेत्र में छोटा-सा योगदान देने का फैसला किया।”

इस महीने SDAL के दौरे के दौरान रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने पुष्टि की कि कंपनी का नागास्त्र ड्रोन-आधारित लॉइटरिंग म्यूनिशन भारत की इस अहम सैन्य कार्रवाई में दुश्मन के ठिकानों पर सटीक निशाना साधने में सफल रहा।

नुवाल ने उस दौरान बताया था, “अमेरिका या अन्य देशों में एक साथ चार मिसाइलें दागी जा सकती हैं लेकिन हमारा ‘भार्गवास्त्र’ एक साथ 60 माइक्रो-मिसाइलें फायर करता है। दुनिया में ऐसा सिस्टम अभी कहीं और मौजूद नहीं है।” भार्गवास्त्र एक मल्टी-लेयर माइक्रो-मिसाइल एंटी-ड्रोन या काउंटर अनमैन्ड एरियल सिस्टम (C-UAS) है।

रक्षा मंत्री को ‘प्रलय’ शॉर्ट-रेंज बैलिस्टिक मिसाइल के बारे में भी जानकारी दी गई थी। कंपनी के एक अधिकारी ने बताया, “हम प्रलय के लिए कई मोटर बनाते हैं लेकिन हमारी क्षमता पूरी मिसाइल बनाने की भी है। अगर मौका मिले तो हम दो महीने में पूरी मिसाइल विकसित कर सकते हैं।”

इसके अलावा SDAL ने SE-BEX-2 नाम का हाई-एनर्जी मटीरियल भी विकसित किया है, जिसे परमाणु बम के बाद सबसे शक्तिशाली विस्फोटक माना जाता है और जो पारंपरिक TNT से लगभग दोगुना ताकतवर है। SDAL पहली निजी कंपनी बनी जिसने सेना को पूरा म्यूनिशन सिस्टम उपलब्ध कराया, जिसमें पुराने मॉडल की जगह मल्टीमोडल हैंड ग्रेनेड भी शामिल हैं।

कंपनी ने शुरुआत में पिनाका रॉकेट के ऑर्डर पूरे किए। इसके बाद इसने मल्टीमोडल ग्रेनेड बनाए, जो किसी निजी कंपनी द्वारा तैयार किया गया पहला पूरा सिस्टम था। समय के साथ कंपनी ने एंटी-ड्रोन सिस्टम और ड्रोन निर्माण में भी कदम बढ़ाया। हाल ही में SDAL ने नागपुर के मिहान-SEZ में रोबोटिक्स और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित तकनीकों के लिए जमीन खरीदी है।

आर्थिक तंगी के कारण छोड़नी पड़ी पढ़ाई

फोर्ब्स की सूची के अनुसार, सत्यनारायण नुवाल भारत के सबसे अमीर लोगों में शामिल हैं। उनकी कुल संपत्ति लगभग 5.2 अरब डॉलर (46,500 करोड़ से अधिक) आंकी गई है। रक्षा क्षेत्र में उनकी कंपनी को व्यापक पहचान मिली है और यह सशस्त्र बलों के लिए विस्फोटक बनाने का सरकारी लाइसेंस पाने वाली भारत की पहली निजी कंपनी थी।

हालाँकि, इस विशाल कारोबारी साम्राज्य की नींव राजस्थान के भीलवाड़ा के एक साधारण परिवार में पड़ी थी। उनके पिता एक सरकारी अकाउंटेंट थे, जो बचपन से ही व्यावसायिक समझ विकसित करने पर जोर देते थे। आर्थिक तंगी के कारण नुवाल 10वीं कक्षा के बाद पढ़ाई जारी नहीं रख सके।

इसके बाद वह अपने गुरु के साथ मथुरा में एक साल रहे और छोटे-मोटे व्यवसायों में हाथ आजमाया। उन्होंने फोर्ब्स को दिए इंटरव्यू में कहा था, “पढ़ाई से ज्यादा मेरी रुचि कारोबार करने में थी।” घर लौटने के बाद उन्होंने फाउंटेन पेन की स्याही बनाने, लीजिंग बिजनेस और ट्रांसपोर्ट कंपनी जैसे कई प्रयोग किए।

इसी दौरान 19 साल की उम्र में उनकी शादी हो गई और जिम्मेदारियाँ बढ़ती चली गईं। परिवार का खर्च चलाने के लिए वह 1977 में महाराष्ट्र के चंद्रपुर चले गए, जहाँ एक रिश्तेदार के साथ काम किया। कई बार हालात ऐसे थे कि उन्हें रेलवे स्टेशन पर ही रात गुजारनी पड़ती थी।

इसी दौरान उनकी मुलाकात अब्दुल सत्तार अल्लाह भाई से हुई, जिनके पास गनपाउडर डिपो था और विस्फोटक इस्तेमाल का लाइसेंस था। नुवाल ने वह जगह 1,000 महीने के किराए पर लेने की कोशिश की लेकिन यह रकम भी उनके लिए बड़ी थी। धीरे-धीरे उनका कारोबार बढ़ा और उन्हें कोयला खदानों से बड़े ऑर्डर मिलने लगे।

1984 तक उनकी कंपनी कंसाइनमेंट एजेंसी बन गई और 1990 तक वह एक बड़े डीलर बन चुके थे।

एक नई सुबह की शुरुआत

1990 का दशक नुवाल के लिए निर्णायक साबित हुआ। अपने लंबे अनुभव के आधार पर उन्होंने 1995 में नागपुर में सोलर इंडस्ट्रीज की स्थापना की। उन्होंने बैंक से 60 लाख रुपए की व्यवस्था की और अपनी अन्य बचत भी इसमें लगाई। इसके बाद उन्होंने स्लरी विस्फोटकों का उत्पादन शुरू किया और आगे चलकर डेटोनेटर के साथ बड़े पैमाने पर विस्फोटक निर्माण के क्षेत्र में कदम रखा। कोल इंडिया लिमिटेड भी उनकी कंपनी के प्रमुख ग्राहकों में शामिल था।

2006 में कंपनी ने शेयर बाजार में कदम रखा। उस समय कंपनी का शुद्ध मुनाफा लगभग 11 करोड़ रुपए और टर्नओवर 78 करोड़ रुपए था। जुटाई गई पूंजी से उत्पादन बढ़ाया गया और 13 नई इकाइयाँ स्थापित की गईं। सोलर इंडस्ट्रीज ने जाम्बिया, घाना, नाइजीरिया, तुर्की, तंजानिया और दक्षिण अफ्रीका में प्लांट लगाए।

इसके अलावा थाईलैंड, इंडोनेशिया और ऑस्ट्रेलिया में भी उत्पादन इकाइयाँ शुरू कीं। भारत में कंपनी की मौजूदगी नौ राज्यों के 29 शहरों तक फैल गई। यह देश की पहली निजी कंपनी बनी जिसे सशस्त्र बलों के लिए हथियार और विस्फोटक बनाने का सरकारी लाइसेंस मिला। नुवाल समझ चुके थे कि भविष्य में गोला-बारूद का स्वदेशी निर्माण जरूरी होगा।

इसलिए उन्होंने ग्रेनेड, मध्यम और बड़े कैलिबर का गोला-बारूद, हाई एनर्जी एक्सप्लोसिव (HMX), प्रोपेलेंट और वॉरहेड बनाने की क्षमता विकसित की। सोलर इंडस्ट्रीज को करीब 450 करोड़ रुपए का मल्टीमोड हैंड ग्रेनेड सप्लाई का ऑर्डर मिला, जो दो साल में पूरा किया जाना था। यह भारत के रक्षा इतिहास में पहली बार था जब किसी निजी कंपनी को ऐसा गोला-बारूद ऑर्डर मिला।

संदीप मेटैलिक्स के चेयरमैन संदीप अग्रवाल ने नुवाल के संघर्षों को याद करते हुए कहा, “उन्होंने खनन उद्योग को विस्फोटक सप्लाई करने से शुरुआत की। समय के साथ उन्होंने ऐसे सिस्टम विकसित किए, जो पहले निजी क्षेत्र में नहीं थे। 2010 से उन्होंने रक्षा क्षेत्र में निवेश शुरू किया और अब जाकर कंपनी को उसका फल मिलना शुरू हुआ है।”

आज सोलर इंडस्ट्रीज DRDO द्वारा विकसित कई रणनीतिक मिसाइल प्रणालियों जैसे प्रलय, पिनाका, आकाश और अन्य गाइडेड वेपन सिस्टम के निर्माण में भारत की प्रमुख निजी साझेदार है। कंपनी सॉलिड रॉकेट मोटर और प्रोपल्शन सिस्टम की भी बड़ी सप्लायर है।

सत्यनारायण नुवाल को सोलर इंडस्ट्रीज को वैश्विक पहचान दिलाने के साथ-साथ सामाजिक जिम्मेदारियों के प्रति उनकी प्रतिबद्धता के लिए भी जाना जाता है। शिक्षा, समाज कल्याण और सामुदायिक विकास के क्षेत्र में उनके योगदान की देशभर में सराहना हुई है। उन्हें मिला पद्मश्री सम्मान न केवल उनके कारोबारी सफर की उपलब्धि है, बल्कि राष्ट्र निर्माण में उनकी अहम भूमिका को भी रेखांकित करता है।

(यह रिपोर्ट मूल रुप से अंग्रेजी में रुक्मा राठौर ने लिखी है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

लातूर भूकंप से पैदा ‘सेवा’ का संकल्प, 33 साल में हुआ ‘इंटरनेशनल’: 20+ देशों में पहुँचाया सनातक का ‘सेवा परमो धर्म’ भाव, जानिए- RSS से प्रेरित संगठन की वैश्विक गाथा

जब भी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) से जुड़े सेवा कार्यों की बात होती है तो सबसे पहले सेवा भारती का नाम जहन में आता है। एक ऐसा संगठन जो दशकों से भारत के कोने-कोने में निस्वार्थ सामाजिक सेवा करता आ रहा है। परंतु सेवा की यह यात्रा यहीं तक सीमित नहीं है। आज हम आपको RSS के विचार परिवार के उस संगठन की कहानी बताने जा रहे हैं, जिसने भारतीय सेवा-भावना को देश की सीमाओं से बाहर निकालकर वैश्विक मंच तक पहुँचा दिया है। एक ऐसा संगठन, जो भारत में ही नहीं बल्कि दुनिया के दर्जनों देशों में पीड़ित मानवता के लिए आशा और सहारा बना है- सेवा इंटरनेशनल।

आपदा के दर्द से जन्मी सेवा इंटरनेशनल

1993 का साल। महाराष्ट्र के लातूर में भूकंप ने हर ओर तबाही मचा दी थी। मकान ढह चुके थे, परिवार उजड़ गए थे और चारों तरफ दर्द, डर और बैचनी का माहौल था। इसी अफरा-तफरी और संकट के बीच कुछ ऐसे लोग एक साथ आए, जिनका एक ही संकल्प था कि पीड़ितों के दुःख को कम करना है और मानवता के नाते मदद के लिए आगे आकर हाथ बढ़ाने हैं । यही वह क्षण था, जब सेवा इंटरनेशनल की यात्रा शुरू हुई। यानी किसी बड़े संगठित मिशन की तरह नहीं बल्कि सेवा-भाव और संवेदनशीलता के साथ।

लातूर भूकंप के दौरान शुरू हुई यह छोटी-सी पहल जल्द ही एक बड़े विचार में बदलने लगी। भारत से दूर रह रहे भारतीयों यानी भारतीय प्रवासी समुदाय ने महसूस किया कि वे अपनी जड़ों से जुड़कर अपने देश और समाज के लिए कुछ कर सकते हैं। इसी सोच ने सेवा इंटरनेशनल को दिशा दी। भारतीय दर्शन की भावना ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ यानी पूरी दुनिया एक परिवार है, इस संगठन की आत्मा बनी। धीरे-धीरे यह छोटा सा दीपक एक तेज लौ में बदल गया जिसने दुनिया भर में बसे भारतीयों को सेवा के लिए एक मंच दिया।

समय के साथ सेवा इंटरनेशनल का विस्तार भारत से बाहर भी होने लगा। आज यह संगठन दुनिया के 20 से अधिक देशों में सक्रिय है और आपदा, संकट या जरूरत के समय मानवता के साथ खड़ा दिखाई देता है। 16 मई 1997 को सेवा इंटरनेशनल को औपचारिक रूप से भारतीय ट्रस्ट अधिनियम, 1882 के तहत पंजीकृत किया गया। यह कदम संगठन के लिए एक मजबूत आधार बना, जिससे उसकी सेवा गतिविधियों को दीर्घकालिक दिशा मिली।

शुरुआती दौर में सेवा इंटरनेशनल का मुख्य फोकस प्राकृतिक आपदाओं के समय त्वरित राहत और सहायता पर था। लेकिन जैसे-जैसे अनुभव बढ़ा, संगठन की सोच भी व्यापक होती चली गई। अब सेवा इंटरनेशनल केवल राहत तक सीमित नहीं है बल्कि शिक्षा, रोजगार व कौशल विकास, स्वास्थ्य और स्वच्छता, पर्यावरण संरक्षण और नेतृत्व विकास जैसे क्षेत्रों में भी सक्रिय भूमिका निभा रहा है।

सेवा इंटरनेशनल ने अपने कार्यों को संयुक्त राष्ट्र के सस्टेनेबल डेवलपमेंट गोल्स (SDGs) से जोड़ा है ताकि मदद सिर्फ तात्कालिक न होकर टिकाऊ और दूरगामी हो। उद्देश्य यही है कि समुदायों को केवल सहायता न दी जाए बल्कि उन्हें इतना सक्षम बनाया जाए कि वे भविष्य की चुनौतियों का सामना खुद कर सकें।

UN के सस्टेनेबल डेवलपमेंट गोल्स

लातूर की त्रासदी से जन्मा यह सेवा आंदोलन आज एक वैश्विक पहचान बन चुका है जो संकट में फंसी मानवता के लिए सहारा और सेवा को जीवन-मूल्य मानने वालों के लिए प्रेरणा है।

भारत और भारतीय उपमहाद्वीप में सेवा इंटरनेशनल की सेवा कहानी

सेवा इंटरनेशनल ने बीते बीते वर्षों में आपदाओं के समय जमीन पर उतरकर लगातार काम किया है। उपलब्ध आँकड़े बताते हैं कि सेवा इंटरनेशनल ने अब तक भारतीय उपमहाद्वीप में 45 से अधिक बड़ी आपदाओं में सक्रिय भूमिका निभाई है जिनमें 2013 में पाकिस्तान में की गई मदद भी शामिल है। इन आपदाओं में भूकंप, बाढ़, चक्रवात, क्लाउडबर्स्ट, सूखा, सुनामी, औद्योगिक दुर्घटनाएँ और हाल के वर्षों में COVID-19 जैसी महामारी भी शामिल हैं। यह काम भारत के लगभग सभी राज्यों के साथ-साथ नेपाल और श्रीलंका जैसे पड़ोसी देशों में भी किया गया।

सेवा इंटरनेशनल की ताकत उसका व्यापक स्वयंसेवी नेटवर्क है। संगठन के साथ 1 लाख 52 हजार से अधिक स्वयंसेवक जुड़े हैं जो संकट के समय बिना किसी स्वार्थ के सेवा में जुट जाते हैं। इसके अलावा 1200 से अधिक साझेदार संगठन भी इसके साथ मिलकर काम करते हैं जिससे राहत कार्य तेजी से और बड़े स्तर पर संभव हो पाता है। इसी संगठित प्रयास का परिणाम है कि सेवा इंटरनेशनल आपदा के शुरुआती दिनों में ही प्रभावित इलाकों तक पहुँचने में सफल रहती है।

आँकड़ों के अनुसार, सेवा इंटरनेशनल ने अब तक यहाँ 25 लाख से अधिक लोगों को सीधे और अप्रत्यक्ष रूप से सहायता पहुँचाई है। इनमें वे परिवार शामिल हैं जिन्होंने आपदा में अपना घर, रोजगार या आजीविका खो दी थी। संगठन का प्रयास केवल भोजन या दवाइयों तक सीमित नहीं रहता बल्कि पीड़ितों को दोबारा सामान्य जीवन में लौटाने पर भी जोर दिया जाता है।

यही वजह है कि सेवा इंटरनेशनल राहत के बाद पुनर्निर्माण के काम को प्राथमिकता देती है। अब तक संगठन ने 35,000 से अधिक गाँवों, घरों और सामुदायिक भवनों के निर्माण में योगदान दिया है। ये निर्माण कार्य उन क्षेत्रों में किए गए हैं जहाँ लोग पूरी तरह से बेघर हो चुके थे और उनके पास दोबारा जीवन शुरू करने के साधन नहीं बचे थे।

शिक्षा को भी सेवा इंटरनेशनल ने अपने सेवा कार्यों का अहम हिस्सा बनाया है। संगठन ने अब तक 275 से अधिक स्कूल और छात्रावास बनाए हैं ताकि आपदा या गरीबी के कारण बच्चों की पढ़ाई न रुके। ये शैक्षणिक संस्थान मुख्य रूप से ग्रामीण, आदिवासी और आपदा-प्रभावित इलाकों में स्थापित किए गए हैं।

इसके साथ-साथ सेवा इंटरनेशनल रोजगार और आत्मनिर्भरता पर भी काम कर रही है। देश के अलग-अलग हिस्सों में 55 से अधिक प्रशिक्षण केंद्र संचालित किए जा रहे हैं, जहाँ युवाओं और महिलाओं को कौशल विकास और रोजगार से जुड़ा प्रशिक्षण दिया जाता है। महिलाओं को सशक्त बनाने के उद्देश्य से संगठन ने 492 स्वयं सहायता समूह भी बनाए हैं जिससे वे आर्थिक रूप से मजबूत बन सकें और अपने परिवार की जिम्मेदारी सँभाल सकें।

सेवा इंटरनेशनल का प्रयास केवल किसी एक आपदा या समय तक सीमित नहीं है। आज संगठन के साथ 18,000 से अधिक सामुदायिक सदस्य जुड़े हुए हैं जो सेवा को एक अभियान नहीं बल्कि समाज के प्रति कर्तव्य मानते हैं। आँकड़े साफ दिखाते हैं कि सेवा इंटरनेशनल भारत और भारतीय उपमहाद्वीप में केवल राहत देने वाला संगठन नहीं है बल्कि यह संकट के बाद जीवन को दोबारा खड़ा करने की एक सतत और भरोसेमंद कोशिश का नाम बन चुका है।

कोविड-19 के काल में सेवा इंटरनेशनल का कार्य

कोविड-19 जैसी कठिन और भयावह महामारी के समय, जब हर तरफ अनिश्चितता और डर का माहौल था तब सेवा इंटरनेशनल ने मानवता के साथ खड़े रहकर समाज को संबल देने का कार्य किया। संगठन ने कोविड-19 के कठिन दौर में 30 लाख से अधिक लोगों तक अपनी सेवाएँ पहुँचाई। संगठन ने जरूरतमंद परिवारों तक 22,500 से अधिक दूध के पैकेट पहुँचाए। कोरोना योद्धाओं और आम लोगों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए 1100 से ज्यादा PPE किट और N95 मास्क वितरित किए गए।

इस सेवा अभियान की सबसे बड़ी ताकत 1260 से अधिक वे स्वयंसेवक रहे, जिन्होंने अपने परिवार और निजी सुरक्षा की परवाह किए बिना दिन-रात लोगों की मदद की। भूख से जूझ रहे लोगों के लिए 2,08,800 से अधिक ताजा पका हुआ भोजन तैयार कर सम्मान के साथ परोसा गया और 18,800 से ज्यादा स्टे-एट-होम राशन किट उन परिवारों तक पहुँचाई गईं, जिनके चूल्हे बुझने की कगार पर थे। महामारी के दौरान सुरक्षा को लेकर जागरूकता बढ़ाने के लिए 77,454 से अधिक कपड़े के मास्क बनाए और बाँटे गए।

इस संकट में महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में भी एक मानवीय पहल की गई जिसमें 1625 से अधिक महिला स्वयं सहायता समूहों ने घर पर मास्क बनाकर न केवल सेवा की बल्कि अपने परिवार की आजीविका को भी सहारा दिया। सेवा का दायरा केवल इंसानों तक सीमित नहीं रहा बल्कि 4,000 से अधिक गायों और कुत्तों जैसे बेसहारा जानवरों को भी भोजन उपलब्ध कराया गया। स्वच्छता और स्वास्थ्य की जरूरतों को समझते हुए 3,100 से अधिक हाइजीन किट वितरित की गईं और 3,113 से ज्यादा मरीजों को उपचार की सुविधा दिलाई गई। यह पूरा प्रयास केवल आँकड़ों की कहानी नहीं है बल्कि करुणा, संवेदना और निस्वार्थ सेवा की वह मिसाल है, जिसने संकट के समय हजारों लोगों को उम्मीद और भरोसा दिया।

दुनियाभर में सेवा इंटरनेशनल के कार्य

सेवा इंटरनेशनल न केवल भारत में बल्कि अमेरिका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया सहित दर्जनों देशों में भी सक्रिय रूप से काम कर रहा है। यह संगठन दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में रहने वाले लोगों को सेवा, सहयोग और इंसानियत की भावना से जोड़ने का काम करता है।

सेवा इंटरनेशनल की उपस्थिति
सेवा इंटरनेशनल की वैश्विक उपस्थिति

सेवा इंटरनेशनल की वार्षिक रिपोर्ट 2024–25 के अनुसार, संगठन ने वर्ष भर में वैश्विक स्तर पर मानवीय सेवा का व्यापक प्रभाव दर्ज किया है। दुनिया में सेवा इंटरनेशनल के अलग-अलग कार्यों से 8,73,656 से अधिक लोगों के जीवन सीधे प्रभावित हुए हैं। शिक्षा, स्वास्थ्य, आपदा राहत, महिला सशक्तिकरण और सामुदायिक विकास जैसे क्षेत्रों में किए गए कार्यों का उद्देश्य केवल तात्कालिक सहायता नहीं बल्कि लंबे वक्त तक लोगों का सशक्तिकरण रहा है। इन प्रयासों के माध्यम से वंचित और संकटग्रस्त समुदायों तक आवश्यक संसाधन और सहयोग पहुँचाने का कार्य किया गया है।

इस वैश्विक सेवा अभियान की रीढ़ रहे 11,180 से अधिक समर्पित स्वयंसेवक, जिन्होंने मिलकर 91,795 घंटे से अधिक समय सेवा कार्यों को दिया। साथ ही, 138 से अधिक सहयोगी संस्थाओं और संगठनों के साथ साझेदारी ने सेवा इंटरनेशनल की पहुँच और प्रभाव को और मजबूत किया है। ये आँकड़े दर्शाते हैं कि संगठित प्रयास, स्वयंसेवकों की प्रतिबद्धता और सहयोग की शक्ति के माध्यम से सेवा इंटरनेशनल दुनियाभर में मानवता की सेवा को प्रभावशाली रूप से आगे बढ़ा रहा है।

आगे की राह

सेवा इंटरनेशनल के महासचिव और अंतर्राष्ट्रीय संयोजक केजी श्याम परांडे ने ऑपइंडिया से बातचीत में कहा, “सेवा इंटरनेशनल का उद्देश्य स्थानीय स्तर पर विद्यमान समस्याओं को समझते हुए उनके स्थायी और व्यावहारिक समाधान विकसित करना है। संस्था प्रत्येक देश में वहाँ के कानूनों, सामाजिक-सांस्कृतिक परिस्थितियों और प्रशासनिक व्यवस्थाओं का पूर्ण सम्मान करते हुए अपने सेवा कार्यों का संचालन करती है।”

उन्होंने कहा, “सेवा इंटरनेशनल का मानना है कि सम्पूर्ण विश्व एक परिवार है और जिस समाज व देश में हम रहते हैं, उसकी सेवा करना तथा वहाँ के लोगों के कल्याण के प्रति संवेदनशील रहना हमारा नैतिक दायित्व है। इसी भाव के साथ सेवा इंटरनेशनल के कार्यकर्ता आज विश्व के विभिन्न देशों में सक्रिय रूप से कार्य कर रहे हैं।”

आगे के उद्देश्यों को स्पष्ट करते हुए केजी श्याम परांडे ने कहा कि सेवा इंटरनेशनल का लक्ष्य केवल तात्कालिक राहत तक सीमित नहीं है बल्कि स्थानीय समुदायों को दीर्घकालिक रूप से आत्मनिर्भर बनाना संस्था की प्राथमिकता है। उनके अनुसार, संस्था का प्रयास है कि जहाँ भी सेवा इंटरनेशनल कार्य करे वहाँ शांति, सामाजिक सौहार्द और आपसी विश्वास का वातावरण बने। सेवा इंटरनेशनल की दीर्घकालिक सोच आपदा के समय राहत पहुँचाने के साथ-साथ शिक्षा, स्वास्थ्य और कौशल विकास के माध्यम से लोगों को सशक्त करना है ताकि वे भविष्य में किसी भी संकट का सामना स्वयं कर सकें।

परांडे ने कहा, “हमारा उद्देश्य यही है कि जिस समाज में हम काम करें, वहाँ लोगों के जीवन में वास्तविक और सकारात्मक बदलाव आए और शांति व मानवीय मूल्यों को मजबूती मिले।”

रायपुर साहित्य उत्सव: छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक आत्मा और राष्ट्रीय संवाद का अनुपम संगम

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के नवा रायपुर स्थित पुरखौती मुक्तांगन परिसर में 23 से 25 जनवरी तक आयोजित तीन दिवसीय रायपुर साहित्य उत्सव 2026 एक ऐतिहासिक और अत्यंत सफल आयोजन साबित हुआ। ‘आदि से अनादि तक’ थीम पर आधारित यह उत्सव छत्तीसगढ़ राज्य के रजत जयंती वर्ष और गणतंत्र के अमृतकाल के अवसर पर आयोजित किया गया, जिसमें साहित्य, संस्कृति, विचार-विमर्श और लोक परंपराओं का अनूठा मेल देखने को मिला।

मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के नेतृत्व वाली राज्य सरकार की इस पहल ने छत्तीसगढ़ की साहित्यिक विरासत को राष्ट्रीय स्तर पर मजबूत पहचान दिलाई।

उत्सव का शुभारंभ 23 जनवरी को विनोद कुमार शुक्ल मंडप में हुआ, जहाँ मुख्य अतिथि राज्यसभा के उप सभापति हरिवंश और अध्यक्ष मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने दीप प्रज्ज्वलित कर कार्यक्रम की शुरुआत की। इस अवसर पर उपमुख्यमंत्री अरुण साव, महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा की कुलपति डॉ. कुमुद शर्मा और अभिनेता मनोज जोशी सहित कई गणमान्य अतिथि उपस्थित रहे।

उद्घाटन समारोह: साहित्य की शक्ति और छत्तीसगढ़ की गौरवगाथा

उप सभापति हरिवंश ने छत्तीसगढ़ के महान साहित्यकार स्वर्गीय विनोद कुमार शुक्ल को नमन करते हुए कहा कि छत्तीसगढ़ी साहित्य की प्राचीन और समृद्ध परंपरा रही है। उन्होंने कबीर के काशी और कवर्धा से जुड़ाव का उल्लेख किया तथा मैथिलीशरण गुप्त की पंक्तियों के माध्यम से साहित्य की समाज-दिशा देने वाली भूमिका पर प्रकाश डाला। हरिवंश ने कहा, “एक पुस्तक और एक लेखक दुनिया बदलने की शक्ति रखते हैं।” उन्होंने भारत की आर्थिक प्रगति, आत्मनिर्भरता और 2047 के विकसित भारत संकल्प में साहित्य की भूमिका को रेखांकित किया।

मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने छत्तीसगढ़ को प्रभु श्रीराम का ननिहाल बताते हुए कहा कि यह पावन भूमि साहित्य का महाकुंभ बनकर उभरी है। उन्होंने बताया कि 120 से अधिक ख्यातिप्राप्त साहित्यकारों की भागीदारी के साथ 42 सत्रों में समकालीन सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक विषयों पर गहन विमर्श हुआ। साय ने स्वतंत्रता संग्राम को समुद्र मंथन से तुलना करते हुए माखनलाल चतुर्वेदी, माधवराव सप्रे, पंडित लोचन प्रसाद पांडेय, पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी और गजानन माधव मुक्तिबोध जैसे साहित्यकारों की स्मृतियों को सहेजने की जिम्मेदारी पर जोर दिया।

उन्होंने अटल बिहारी वाजपेयी की कविताओं का जिक्र करते हुए कहा कि कविता अन्याय के विरुद्ध प्रतिरोध सिखाती है। उपमुख्यमंत्री अरुण साव ने आयोजन को छत्तीसगढ़ की साहित्यिक पहचान मजबूत करने वाला बताया।

रायपुर साहित्य उत्सव की झलकियाँ

पुस्तक विमोचन और साहित्यिक गतिविधियाँ

उद्घाटन के दौरान छत्तीसगढ़ राज्य के 25 वर्ष पूर्ण होने पर आधारित जे. नंदकुमार की कॉफी टेबल बुक, प्रो. अंशु जोशी की ‘लाल दीवारें, सफेद झूठ’ और राजीव रंजन प्रसाद की ‘तेरा राज नहीं आएगा रे’ का विमोचन किया गया।

उत्सव में कुल 42 सत्र आयोजित हुए, जिनमें 5 समानांतर, 4 सामूहिक और 3 संवाद सत्र शामिल थे। अंतिम दिन पत्रकारिता और साहित्य, ट्रैवल ब्लॉगिंग, नाट्यशास्त्र, समाज-सिनेमा, संविधान-भारतीय मूल्य तथा शासन-साहित्य के अंतर्संबंधों पर चर्चा हुई। चाणक्य नाटक का मंचन, लोकनृत्य, लोकगीत, छत्तीसगढ़ी सांस्कृतिक प्रस्तुतियां और कवि सम्मेलन ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध किया।

चित्रकला प्रदर्शनी और कार्यशालाएँ: रंगों में छत्तीसगढ़ की आत्मा

सुरेंद्र दुबे मंडप में छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक विरासत को दर्शाती भव्य चित्रकला प्रदर्शनी लगी। छत्तीसगढ़ महतारी की तस्वीर (कलाकार सोनल शर्मा), बस्तर बाजार (अवध कंवर), राजिम कुंभ (दिव्या चंद्रा) और रामगढ़ पहाड़ियों के चित्रों ने दर्शकों को आकर्षित किया। पेंटिंग और कार्टून कार्यशालाओं में युवा कलाकारों को मार्गदर्शन मिला।

लोकाचार और जन भागीदारी: उत्सव की असली ताकत

उत्सव में चाउमीन के ठेले नहीं, बल्कि कोदो का भात, चापड़ा चटनी, फर्रा, जिमिकंद का आचार और खट्टी कढ़ी जैसे पारंपरिक पकवान परोसे गए। पारंपरिक साड़ियां, आदिवासी आभूषण जैसे हसुली और बाजूबंद ने छत्तीसगढ़ी लोकाचार को जीवंत किया। चार पीढ़ियों का संगम, उत्तर-दक्षिण-पूर्वोत्तर-पश्चिम के साहित्यकारों की उपस्थिति और स्थानीय कलाकारों की प्रस्तुतियां इसे लोक उत्सव बनाती रहीं।

व्यवस्था अद्भुत थी-समयबद्ध कार्यक्रम, आकस्मिक चुनौतियों के लिए वैकल्पिक योजना और कोई अफरातफरी नहीं। आयोजक टीम ने संभ्रांतवादी होने से बचाकर इसे जनभागीदारी वाला बनाया।

रायपुर साहित्य उत्सव की झलकियाँ

राज्यपाल की सराहना और भविष्य की उम्मीद

समापन समारोह में राज्यपाल रमेन डेका ने कहा कि डिजिटल दौर में भी साहित्य का महत्व अक्षुण्ण रहेगा। उन्होंने ‘वंदे मातरम’ का उदाहरण देते हुए शब्दों की ताकत पर जोर दिया और ऐसे उत्सवों को गांव-छोटे शहरों तक पहुँचाने की अपील की। वित्त मंत्री ओ.पी. चौधरी और रंगकर्मी सच्चिदानंद जोशी ने भी आयोजन की सराहना की। निर्देशक चन्द्रप्रकाश द्विवेदी ने आयोजकों द्वारा  समय का अनुशासन और छोटी-छोटी बातों का ध्यान रखने की  प्रशंसा की तथा बस्तर जैसे स्थानों में इसे दोहराने की बात कही। 

सफलता की कुंजी: मुख्यमंत्री साय सरकार की प्रतिबद्धता

बीते दो वर्षों में साय सरकार ने साहित्य और संस्कृति को सामाजिक उत्तरदायित्व मानकर कई पहलें कीं। यह उत्सव जनभागीदारी, स्थानीय भाषाओं और युवा रचनाकारों को मंच देकर सफल रहा।

रायपुर साहित्य उत्सव 2026 न केवल एक आयोजन था बल्कि छत्तीसगढ़ की आत्मा का उत्सव था। यह छत्तीसगढ़ को साहित्यिक मानचित्र पर मजबूत स्थान देगा और आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बनेगा। आयोजक टीम-मुख्य रूप से मुख्यमंत्री के मीडिया सलाहकार पंकज झा, आर. कृष्णा दास और छत्तीसगढ़ संस्कृति परिषद के पूर्व/वर्तमान साहित्य अकादमी अध्यक्ष शशांक शर्मा-ने यादगार बनाया। यह अन्य साहित्यिक उत्सवों के लिए मानक स्थापित कर गया है।

रायपुर साहित्य उत्सव के एक सत्र के दौरान राम माधव

रायपुर साहित्य उत्सव की धुरी: पंकज झा- चुपचाप सफलता का सूत्रधार

रायपुर साहित्य उत्सव 2026 की चमक के पीछे एक ऐसा व्यक्तित्व है जो कभी मंच पर नहीं आया, लेकिन पूरे आयोजन की धुरी बना रहा-पंकज झा। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के मीडिया सलाहकार के रूप में उन्होंने इस तीन दिवसीय साहित्य महाकुंभ को बिना किसी दिखावे के संभाला और इसे यादगार बनाया। उनकी मेहनत, दूरदर्शिता और संगठन क्षमता ने उत्सव को राष्ट्रीय स्तर पर सफलता दिलाई।

पंकज झा का काम करने का अंदाज बिल्कुल अलग है। वे अपने किए काम का श्रेय कभी नहीं लेते। यदि कोई बधाई दे, तो वे तुरंत टीम, सहयोगियों और कार्यकर्ताओं की चर्चा शुरू कर देते हैं-कैसे उन्होंने दिन-रात एक कर इस सपने को साकार किया। सारा क्रेडिट वे मुख्यमंत्री के ‘नया रायपुर’ विजन और साहित्य प्रेम को देते हैं। यह विनम्रता उन्हें अन्य आयोजकों से विशिष्ट बनाती है।

एक जिम्मेदार आयोजक के रूप में वे आलोचना का सामना भी खुले मन से करते हैं। यदि शिकायत सही हो, तो वे इसे किसी पर टालने की बजाय पूरी जिम्मेदारी खुद ले लेते हैं। यही गुण उन्हें विश्वसनीय और सम्मानित बनाता है।

उत्सव की सबसे बड़ी खासियत थी अतिथियों की उपस्थिति। आधे से अधिक वक्ता और लेखक सिर्फ पंकज झा के व्यक्तिगत स्नेह और प्रेम के कारण आए। कुछ वरिष्ठ साहित्यकार, जो स्वास्थ्य कारणों से अब कम बाहर निकलते थे, आयोजन में मुख्य द्वार से मंच तक पैदल चलकर पहुंचे। जिसके बीच ठीक ठाक दूरी थी। यह उनके प्रेम का जादू था। उनकी दोस्ती की दुनिया इतनी विस्तृत है कि कई लोग न बुलाए जाने पर नाराज भी हुए और अब उन्हें मनाने का काम भी पंकज जी को ही करना पड़ेगा।

यदि इस उत्सव में ‘मैन ऑफ द मैच’ चुनना हो, तो नाम पंकज झा का ही होगा। उन्होंने छत्तीसगढ़िया प्रेम को न सिर्फ जिया, बल्कि पूरे आयोजन में रचा-बसा दिया। छत्तीसगढ़ की मिठास, आतिथ्य और सांस्कृतिक गर्मजोशी हर अतिथि को छू गई। बाहर से आए लोग जाते-जाते अभिभूत होकर कहते रहे- ‘सबले बढ़िया छत्तीसगढ़िया’।

पंकज झा ने साबित किया कि सच्चा नेतृत्व चुपचाप मेहनत, प्रेम और टीमवर्क से आता है। रायपुर साहित्य उत्सव उनकी दूरदर्शिता और मानवीय संवेदना का जीवंत प्रमाण है।

दर्जनों हिंदू लड़कियों पर नजर, छाँगुर से लेकर जाकिर नाइक तक जुड़े तार और दिल्ली ब्लास्ट से भी कनेक्शन: जानें- KGMU के लव जिहादी रमीज के बारे में अब तक क्या-क्या पता चला?

लखनऊ की किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी इन दिनों सुर्खियों में है। यहाँ ऐसे डॉक्टरों की गैंग का खुलासा हुआ, जो हिन्दू लड़कियों को प्रेम जाल में फँसा कर उन्हें निकाह करने और इस्लाम कबूल करने का दबाव बनाते थे। लड़कियों के अश्लील फोटो और वीडियो के सहारे ब्लैकमेल करना, फर्जी निकाहनामा बनाकर निकाह करना जिहादी गैंग का मकसद था। KGMU में जिहादी डॉक्टरों को मौलाना 2 हिन्दू महिला डॉक्टर को टारगेट करने के लिए कहता था। हर हिन्दू महिला के धर्मांतरण का ‘रेट’ अलग-अलग था। ऐसे कई खुलासे अब तक जाँच में सामने आए हैं।

17 दिसंबर 2025 को इस मामले का पता तब चला जब एक हिन्दू महिला डॉक्टर ने जहर खाकर खुदकुशी करने की कोशिश की। महिला डॉक्टर ने पैथोलॉजी विभाग के अपने सीनियर डॉ. रमीज मलिक पर उससे निकाह करने और धर्म परिवर्तन करने के लिए दबाव डालने का आरोप लगाया। उसे शारीरिक और मानसिक रूप से प्रताड़ित भी किया गया।

पीड़िता ने परेशान होकर जहर खाकर खुदकुशी करने का प्रयास किया। पीड़िता के पिता ने मुख्यमंत्री और राज्य महिला आयोग से शिकायत की। राज्य महिला आयोग की अध्यक्ष बबिता चौहान और उपाध्यक्ष अपर्णा यादव एक्टिव हुईँ। इनलोगों ने कुलपति से मुलाकात कर जानकारी ली और कहा कि धर्मांतरण को लेकर एक व्यक्ति नहीं बल्कि गैंग काम कर रहा है, जिसे बेनकाब किया जाएगा।

अश्लील वीडियो बना कर किया ब्लैकमेल और रेप

पीड़िता डॉक्टर ने अपनी आपबीती बताई। उसने कहा कि डॉ. रमीजुद्दीन मलिक उर्फ रमीज मलिक ने गर्भपात भी कराया। आरोपित ने पीड़िता डॉक्टर के अश्लील वीडियो भी बनाए और फिर ब्लैकमेल किया। पीड़िता ने फिर दोहराया कि डॉ. रमीजुद्दीन उर्फ रमीज मलिक ने उस पर निकाह के लिए धर्म परिवर्तन का दबाव बनाया था।

पीड़िता ने कहा कि शादी का झाँसा देकर पहले डॉ. रमीजुद्दीन ने उसके साथ बार-बार शीरारिक संबंध बनाए। पीड़िता प्रेग्नेंट हो गई, तो दवा खिलाकर बच्चा भी गिरवा दिया। इसके बाद अक्टूबर 2025 में पीड़िता ने शादी का दबाव बनाया, तो धर्मांतरण करने के लिए कहने लगा।

पीड़िता ने आरोपित से दूरी बनानी शुरू कर दी। इसके बावजूद आरोपित डॉक्टर उसकी पीछे पड़ा रहा। पीड़िता की अश्लील वीडियो दिखाकर ब्लैकमेल करता रहा और कहता था- “इसे वायरल कर दूँगा, कहीं शादी करने लायक नहीं रहोगी। मान जाओ और धर्म परिवर्तन कर लो।” इसके बाद पीड़िता ने आरोपित डॉक्टर की पहली बीवी मानसी सक्सेना के बारे में भी बताया। पीड़िता ने कहा कि वह सितंबर 2026 में ही मानसी सक्सेना से मिली थी। उसे भी इस्लाम कबूल करवाया गया और फिर निकाह किया।

सीएम योगी से पीड़िता को दिया सख्त कार्रवाई का भरोसा

पीड़िता डॉक्टर ने सीएम योगी आदित्यनाथ से मुलाकात की और उन्हें घटना की पूरी जानकारी दी। सीएम ने उन्हें दोषियों पर कड़ी कार्रवाई का भरोसा दिलाया। सीएम ने कहा कि जाँच में जो भी व्यक्ति संलिप्त पाया जाएगा, उस पर समान रूप से कार्रवाई होगी। महिला आयोग ने भी इस मुद्दे पर सीएम से मुलाकात कर घटना के बारे में बताया।

मामले की जाँच के बाद डॉक्टर रमीज मलिक को केजीएमयू से सस्पेंड कर दिया गया। कॉलेज प्रशासन की जाँच में वह शामिल होकर खुद को निर्दोष बताता रहा। लेकिन जब पुलिस का शिकंजा कसा तो वह फरार हो गया। पुलिस ने उस पर पहले ₹25 हजार और बाद में ₹50 हजार का इनाम घोषित कर दिया।

रमीजुद्दीन ने खिलाफ गैर जमानती वारंट जारी किया गया। जगह-जगह छापेमारी की गई। 7 जनवरी 2026 को उसके पीलीभींत स्थित पैतृक घर पर कुर्की का नोटिस चस्पाया गया। 9 जनवरी को पुलिस ने आरोपित डॉक्टर रमीज मलिक को दबोच लिया। वह कोर्ट में सरेंडर करने की फिराक में था।

डॉ. रमीज का अब्बा सलीमुद्दीन भी जिहादी निकला

पीड़िता की शिकायत पर डॉक्टर रमीजुद्दीन मलिक के अब्बा सलीमुद्दीन और अम्मी खतीजा को 5 जनवरी 2026 को लखनऊ पुलिस ने ठाकुरगंज क्षेत्र से गिरफ्तार किया। इस बीच सलीमुद्दीन को लेकर भी चौकाने वाले खुलासे हुए। उसने खुद भी अलग-अलग राज्यों की 4 हिंदू महिलाओं से निकाह किया था और उनका धर्म परिवर्तन करवाया था। उसकी बीवियाँ जम्मू-कश्मीर, पंजाब, उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश की हैं।

सलीमुद्दीन के साथ उसकी जिस बीवी खतीजा को गिरफ्तार किया गया, वह भी पहले हिन्दू थी। आरोपित डॉक्टर रमीज मलिक सलीमुद्दीन की पहली बीवी का बेटा था, जो पंजाबी थी। सलीमुद्दीन उत्तराखंड के खटीमा में होम्योपैथिक क्लिनिक चलाता था। वह इलाज के बहाने महिलाओं से नजदीकियाँ बढ़ाने की कोशिश करता था।

सलीमुद्दीन असल में पीलीभीत के एक काजी के संपर्क में था और देवबंद में आता-जाता रहा था। परिवार के भीतर मजहबी कट्टरता बढ़ती चली गई और वही हिंदू घृणा उनके बेटे रमीजुद्दीन तक पहुँची। रमीजुद्दीन पढ़ाई में तेज था। उसका चयन 2012 में आगरा मेडिकल कॉलेज में हो गया। वह अपने अब्बू और काजी के जबरदस्त प्रभाव में था।

आगरा मेडिकल कॉलेज में ‘इस्लामिक मेडिकोज मीट’

2012 में रमीज मलिक का आगरा के एसएन मेडिकल कॉलेज में MBBS में दाखिला हुआ। तब तक प्रदेश में सपा की सरकार आ चुकी थी और कट्टरपंथी सोच रखने वाले लोगों का हौसला बढ़ गया था। आगरा मेडिकल कॉलेज में ‘इस्लामिक मेडिकोज मीट’ नाम से बैठके होने लगीं और इन बैठकों में मौलाना और सीनियर छात्र जूनियर्स को यह सिखाने लगे कि हिंदू लड़कियों से कैसे नजदीकी बढ़ाई जाए। इस्लामिक मेडिकोज नाम का एक वॉट्सऐप ग्रुप भी था जिसमें ये कट्टरपंथी जुड़े हुए थे।

उस कॉलेज में कई मुस्लिम डॉक्टरों ने हिंदू लड़कियों को प्रेम-जाल में फँसाया और बाद में उनका धर्म परिवर्तन कराया। रमीज के भी चार–पाँच करीबी मुस्लिम दोस्त थे, जो इसी सोच के साथ काम कर रहे थे। KGMU में उसका एक दोस्त पिछले एक साल से इसी तरह की गतिविधियों में लगा हुआ है।

KGMU और आगरा के ये समूह आपस में जुड़े थे या अलग-अलग काम कर रहे थे। इतना जरूर है कि मेडिकल कॉलेजों में मौलानाओं का आना-जाना धीरे-धीरे सामान्य होता गया। बस्ती मेडिकल कॉलेज में पिछले एक साल से मौलाना आने लगे। बुलंदशहर मेडिकल कॉलेज में तो एक फर्स्ट-ईयर के HOD पर मेडिकल साइंस पढ़ाते समय हदीस के उदाहरण देने का आरोप लगा, जिसे बाद में साथी फैकल्टी ने समझाकर रोका।

डॉक्टर भूपेंद्र ने कहा, “सपा-बसपा के समय इन लोगों का हौसला बढ़ा। तीन-चार साल में यही छात्र सीनियर बने और खुद तकरीर करने लगे। यह गैंग 2011-12 तक सक्रिय रहा।” उसी समय आगरा में भी ‘इस्लामिक मेडिकोज मीट’ के नाम पर मुस्लिम मेडिकल छात्रों को इकट्ठा कर उनका ब्रेनवॉश किया जाने लगा। आगरा मेडिकल कॉलेज में मुस्लिम डॉक्टरों और हिंदू लड़कियों के निकाह का पैटर्न काफी ज्यादा दिखने लगा।

15 लड़कियों पर धर्मांतरण का दबाव, 50 से अधिक लड़कियों के फोटो

पुलिस ने रमीजुद्दीन के मोबाइल की जाँच की। इसमें सामने आया कि वह 15 हिंदू लड़कियों के संपर्क में था, जिन्हें फँसाकर धर्मांतरण का दबाव बना रहा था। उसके निशाने पर केवल छात्राएँ ही नहीं बल्कि प्रोफेसर भी थीं। इनमें आगरा, नोएडा और अन्य कई जिलों की महिलाएँ शामिल थीं। उसका नेटवर्क लखनऊ के अलावा अन्य शहरों में भी था।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, रमीज मलिक ने KGMU की एक महिला प्रोफेसर को भी जाल में फँसा रखा था। नोएडा में काम करने वाली लड़की ने पुलिस को बताया कि साल 2012 में रमीजुद्दीन ने उसे नशीली दवा पिलाकर दुष्कर्म किया और वीडियो भी बनाया। इसके बाद से वह लड़की को ब्लैकमेल कर शोषण कर रहा था।

पुलिस जाँच के मुताबिक, रमीज मलिक पर आगरा की एक हिंदू महिला डॉक्टर का जबरन धर्मांतरण कराने और धोखे से निकाह करने का आरोप लगाया। पीड़ित महिला का आरोप है कि डॉक्टर रमीज ने फर्जी निकाहनामा तैयार करवाकर लंबे समय तक उसका यौन शोषण किया।

पीलीभीत के काजी जाहिद हसन राना ने यह निकाह पढ़ाया था और शारिक नाम का युवक इसमें गवाह बना था। फर्जी निकाहनामा ये इसलिए है, क्योंकि निकाह के वक्त न तो रमीज और न ही हिंदू महिला डॉक्टर पीलीभीत आए थे। घर बैठे ही केवल कागजों पर निकाहनामा तैयार कर लिया गया था।

रमीज मलिक के मोबाइल ने खोले कई राज

जाँच के दौरान आरोपित डॉक्टर रमीज का मोबाइल फोन और लैपटॉप जब्त किया गया। उसने अपने मोबाइल से कई चैट और संपर्क नंबर डिलीट कर दिए थे, जिन्हें फोरेंसिक टीम की मदद से रिकवर करने की कोशिश चल रही है।

रमीज मलिक को रिमांड पर लेकर पुलिस ने कड़ी पूछताछ की। जानकारी के मुताबिक, उसने कई सवाल पर चुप्पी साध ली। आगरा में डॉक्टर परवेज से संबंधों पर भी उसने साफ कुछ नहीं कहा।

उसके फोन और लैपटॉप से पुलिस को अहम सुराग मिले हैं। जाँच एजेंसियों के अनुसार, रमीज ने अपने डिजिटल डिवाइस में ‘जन्नत’ नाम से एक फोल्डर बनाकर हिंदू लड़कियों का डेटा, आपत्तिजनक वीडियो और नंबर सहेज कर रखे थे। शुरुआती जाँच में सामने आया कि उसने पिछले 13 वर्षों से अपनी गतिविधियों का डिजिटल रिकॉर्ड सँभालकर रख रहा था।

जैसे ही हिंदू लड़की से होता था संपर्क, रख लेता था सारी जानकारी

पूछताछ में सामने आया कि रमीज मलिक का प्रभाव KGMU के मेडिकोज ग्रुप और मेडिकल छात्रों तक था, जिसका इस्तेमाल नेटवर्क फैलाने में किया जाता था। लैपटॉप से 50 से अधिक युवतियों के वीडियो, अश्लील सामग्री और संदिग्ध संपर्कों की जानकारी मिली है। आरोपित ने कुछ मददगारों के नाम बताए हैं, जिनकी भूमिका की जाँच की जा रही है।

लैपटाप के एक अलग फोल्डर में रमीज ने कथित तौर पर कॉल गर्ल्स का भी डेटा जमा कर रखा था। इसमें नाम, नंबर और अन्य जानकारियाँ शामिल हैं। पुलिस का कहना है कि इन कॉल गर्ल्स का इस्तेमाल वो अपने धर्मांतरण रैकेट में मुस्लिम युवाओं को फँसाने के लिए करता था। जाँच में सामने आया कि जिस भी हिंदू लड़की से उसका संपर्क होता था, वह उसकी फोटो और डिटेल तैयार कर अपने पास सेव कर लेता था।

15 लाख का ‘लालच’ और धर्मांतरण नेटवर्क

धर्मांतरण की जाँच के दौरान कई चौकाने वाले खुलासे हुए। इस दौरान पता चला कि रमीज एक बड़े धर्मांतरण नेटवर्क का हिस्सा था, जहाँ मेडिकोज (डॉक्टरों) के धर्मांतरण पर 15 लाख और अन्य लोगों के लिए 5 लाख रुपए का ‘रेट’ तय था।

जाँच में सामने आया है कि आरोपित डॉ रमीज ने फरवरी में एक हिंदू डॉक्टर से शादी की थी, जिसके बदले उसे 15 लाख रुपए मिले थे। कॉल डिटेल्स से पता चला है कि वह 15 अन्य महिला रेजिडेंट डॉक्टरों के भी संपर्क में था और उन्हें मानसिक रूप से प्रभावित कर धर्मांतरण का दबाव बना रहा था। KGMU में चर्चा है कि यह पूरा खेल एक संगठित नेटवर्क के जरिए चल रहा था, जो धर्मांतरण कराने पर मोटी रकम मुहैया कराता था।

जाँच में पता चला है कि डॉक्टर रमीज और धर्मांतरण गिरोह से जुड़े कुछ मेडिकल स्टाफ की क्लास अलग-अलग मौलाना लेते थे और डॉक्टरों को खास संदेश देते थे।

रिपोर्ट के मुताबिक, मौलाना डॉक्टरों को दो हिंदू महिलाओं से निकाह करने का संदेश देते थे और इसे शवाब का काम बताकर प्रेरित करते थे। ग्रुप से जुड़े हर डॉक्टर इसी तरह टारगेट दिए जाते थे।

KGMU प्रशासन की मिलीभगत उजागर

धर्मांतरण की इस साजिश में रमीज मलिक की मदद करने के आरोप में दो प्रोफेसरों के नाम भी सामने आए। कॉल रिकॉर्ड्स के अनुसार, रमीज की इन प्रोफेसरों से घंटों बातचीत होती थी। आरोप है कि इन्होंने न सिर्फ रमीज को छिपने में मदद की, बल्कि पीड़िता पर मामला दबाने का दबाव भी बनाया। KGMU की जाँच समितियाँ अब इन प्रोफेसरों से पूछताछ कर रही हैं कि छात्रा के आत्महत्या की कोशिश के बावजूद उन्होंने प्रशासन को सूचना क्यों नहीं दी।

धर्मांतरण का दबाव बनाने के मामले में गिरफ्तार डॉक्टर रमीज और KGMU प्रशासन की मिलीभगत का पता चला। 17 दिसंबर 2025 को KGMU के पैथोलॉजी विभाग के HoD वाहिद अली को घटना की जानकारी दे दी गई थी, लेकिन कई दिनों तक यह बात दबाकर रखी गई।

बताते हैं कि कई बार पहले भी रमीज के खिलाफ शिकायतें मिली थीं, लेकिन KGMU प्रशासन के जिन अफसरों को इस विषय पर कार्रवाई करनी थी उनका आरोपित रमीज को संरक्षण मिला हुआ था। जब तक इस मामले में पुलिस ने FIR दर्ज नहीं कर ली, तब तक KGMU प्रशासन इस मामले में चुप्पी साधे बैठा रहा।

कई दिनों बाद जब पुलिस ने कार्रवाई शुरू की, तब जाकर KGMU प्रशासन की नींद टूटी और उसे सस्पेंड किया गया। घटना के सामने आने पर पैथोलॉजी विभाग के हेड (HoD) वाहिद अली को पद से हटा दिया गया है। उनकी जगह डॉ रश्मि कुशवाहा को इंचार्ज बनाया गया।

KGMU का एक और डॉक्टर गिरफ्तार

लखनऊ पुलिस ने KGMU के इंटर्न डॉक्टर मोहम्मद आदिल को गिरफ्तार किया। आरोपित ने छात्रा को निकाह का झाँसा देकर लंबे वक्त तक उसका शारीरिक शोषण किया और उसकी अश्लील फोटो व वीडियो वायरल करने की धमकी दी। आदिल ने पहले छात्रा से दोस्ती की थी और निकाह का भरोसा देकर छात्रा को अपने फ्लैट पर बुलाने लगा।

वहीं, उसने कई बार छात्रा के साथ शारीरिक संबंध बनाए। इसके बाद जब छात्रा ने निकाह की बात कही तो हर बार टालमटोल करता और धमकी देता। कहता कि अगर दोबारा इस बारे में बात की तो अश्लील फोटो-वीडियो वायरल कर देगा।

पीड़िता ने आदिल से तंग आकर 29 दिसंबर 2025 को कैसरबाग थाने में यौन शोषण और धमकाने की शिकायत दर्ज कराई थी। इसके बाद वह फरार हो गया और कई दिनों तक लोकेशन बदल-बदलकर छिपा रहा। 14 जनवरी 2026 को लखनऊ पुलिस ने आदिल को गिरफ्तार कर लिया।

दिल्ली ब्लास्ट मामला और जाकिर नाइक से रमीज मलिक का कनेक्शन

जाँच में रमीज का दिल्ली ब्लास्ट केस में गिरफ्तार की गई शाहीन से भी कनेक्शन सामने आया है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, छानबीन में यह खुलासा हुआ है कि दिल्ली ब्लास्ट की आरोपी डॉ. शाहीन से रमीज की मुलाकात एक मेडिकल कॉन्फ्रेंस के दौरान हुई थी। उसी मुलाकात के बाद से रमीज पर शाहीन की विचारधारा का गहरा प्रभाव पड़ गया था। पूछताछ में उसने खुद भी शाहीन से कनेक्शन की बात स्वीकार की है।

आरोपित डॉक्टर रमीज के मोबाइल से धर्मांतरण से जुड़ी संदिग्ध चैट्स और विवादित इस्लामिक प्रचारक जाकिर नाईक के कई वीडियो मिले हैं। पुलिस को शक है कि रमीज इन वीडियो के जरिए धर्मांतरण का जाल बुन रहा था। डॉक्टर भूपेंद्र बताते हैं कि 2004 के आसपास KGMU में कुछ मेडिकल छात्र भगौड़े इस्लामी कट्टरपंथी डॉ. जाकिर नाइक के संपर्क में आ गए।

धीरे-धीरे कैंपस के कुछ हिस्सों में बकरदाढ़ी रखना और हिजाब पहनना आम होने लगा। इसी दौर में जाकिर नाइक की विचारधारा से जुड़े कट्टरपंथी हिंदू लड़कियों को फँसाने लगे थे। बताया जाता है कि इसमें BDS के छात्र ज्यादा सक्रिय थे। धीरे-धीरे ये धँधा एक पैटर्न बन गया।

पुलिस की मानें तो रमीज के फोन में सिर्फ पीड़िता ही नहीं, बल्कि कई अन्य हिंदू लड़कियों और महिला डॉक्टरों के साथ की गई बातचीत भी मिली। डेटा रिकवरी के दौरान मोबाइल से कुछ न्यूड तस्वीरें भी बरामद हुई। इन चैट्स से साफ संकेत मिल रहे हैं कि आरोपित एक साथ कई महिलाओं के संपर्क में था और उन्हें अपने जाल में फँसा रहा था।

इस मामले की जाँच पुलिस के साथ अब एसटीएफ कर रही है। जाँच का बढ़ता दायरा देख कर उसके करीबियों ने मोबाइल डेटा वॉट्सएप चैट डिलीट कर दिए। कई लोग अंडरग्राउंड हो गए।

परिसर में अवैध मजारें काफी खतरनाक

केजीएमयू परिसर में आधा दर्जन से अधिक अवैध मजारें बनी हुई हैं, जो सुरक्षा के लिहाज से गंभीर खतरा हैं। VHP के अनुसार, अप्रैल 2025 में नेत्र रोग विभाग के पीछे बनी मजार के पास अतिक्रमण हटाने गई टीम पर हमला हुआ था, जिसमें कई चिकित्सक घायल हुए थे।

बाद में पुलिस प्रशासन की मदद से वहाँ बनी दुकानों को हटाया गया लेकिन मजार अब भी मौजूद है। संगठन ने ट्रॉमा सेंटर, क्वीनमेरी परिसर, नई OPD और डेंटल बिल्डिंग, डालीगंज स्थित RLC बिल्डिंग और पल्मोनरी विभाग के पास भी मजारें स्थित हैं।

समाजवादी पार्टी और बीएसपी के दौर में करीब 10-15 साल पहले भी KGMU धर्मांतरण का बड़ा अड्डा बना हुआ था। उस समय आसपास की मस्जिदों से मौलाना अक्सर कैंपस में आते-जाते थे। बाद में योगी सरकार आने के बाद काफी समय तक हालात शांत रहे। पिछले कुछ सालों से यह गतिविधियाँ फिर से शुरू हो गई हैं।

गणतंत्र दिवस को बनाया शोक दिवस, हिंदी पर की घटिया राजनीति और 70+ छात्रों की मौत: जानें कैसे 61 साल पहले भाषाई घृणा फैलाकर DMK आई सत्ता में, अब फिर से है क्या वही प्रयास?

26 जनवरी 1965 का दिन। पूरे देश में गणतंत्र दिवस की धूम थी। दिल्ली में परेड चल रही थी, तिरंगा लहरा रहा था, लोग उत्साह से भरे थे। लेकिन मद्रास (आज का तमिलनाडु) में माहौल बिल्कुल अलग था। सुबह का आकाश उदास था, काले झंडे लहरा रहे थे, और सड़कों पर युवा छात्रों की भीड़ थी। यह दिन उत्सव का नहीं, शोक का बन गया। हिंदी को आधिकारिक भाषा बनाने के विरोध में शुरू हुआ आंदोलन इतना उग्र हो गया कि कई नवयुवकों ने अपनी जान गँवा दी। कई पुलिस गोलीबारी में मारे गए, कई ने आत्मदाह किया।

आधिकारिक आँकड़ों में करीब 70 मौतें दर्ज हैं, लेकिन गवाहों और कार्यकर्ताओं का कहना है कि संख्या इससे कहीं ज्यादा थी। यह एक अनर्थ था, जो गणतंत्र दिवस के दिन हुआ। यहाँ दशकों पहले छात्रों का जो बलिदान हुआ, वो भाषा के नाम पर राजनीति की भेंट चढ़ गया। आज दशकों बाद हमें उस समय को याद करना चाहिए, ताकि समझ सकें कि कैसे एक भाषाई मुद्दे को राजनीतिक हथियार बनाकर युवाओं की जिंदगियाँ दाँव पर लगा दी गईं।

ये मामला सिर्फ हिंदी समर्थन या विरोध का नहीं है। यह मामला उस राजनीति से जुड़ा है, जिसमें डीएमके ने हिंदी विरोधी आंदोलन की आड़ में युवाओं को आगे कर दिया और कॉन्ग्रेस सरकार ने इसे सही से संभाला नहीं। डीएमके ने इसे उत्तर भारत बनाम दक्षिण भारत का रंग दे दिया, जबकि कॉन्ग्रेस ने अपने विरोध को हिंदी विरोध से जोड़कर सत्ता बचाने या हासिल करने की कोशिश की। नतीजा? निर्दोष छात्रों की मौतें, राज्य में अराजकता और लंबे समय तक राजनीतिक बदलाव।

तमिलनाडु में एंटी हिंदी जड़ें आजादी से पहले की

आंदोलन की जड़ें पुरानी थीं। स्वतंत्रता से पहले ही, 1937 में मद्रास प्रेसिडेंसी में कॉन्ग्रेस सरकार ने सी. राजगोपालाचारी के नेतृत्व में स्कूलों में हिंदी अनिवार्य की थी। तब भी विरोध हुआ था और सरकार को पीछे हटना पड़ा। संविधान सभा में भी टीटी कृष्णमाचारी जैसे नेताओं ने चेतावनी दी थी कि भाषाई साम्राज्यवाद देश की एकता को खतरे में डाल सकता है। ऐसे में साल 1950 में लागू हुए संविधान में मुंशी-अयंगार फॉर्मूला अपनाया गया, हिंदी को आधिकारिक भाषा बनाया गया, लेकिन अंग्रेजी को 15 साल तक सहायक भाषा के रूप में रखा गया।

यह अवधि 26 जनवरी 1965 को खत्म हो रही थी। हिंदी बेल्ट के नेता इसे हिंदी की जीत मानते थे। लेकिन दक्षिण और खासकर तमिलनाडु में इसे भाषाई दबदबा और सांस्कृतिक हमला समझा गया। छात्रों को डर था कि सिविल सेवा परीक्षाएँ हिंदी में हो जाएँगी और गैर-हिंदी भाषी नौकरियों से बाहर हो जाएँगे।

डीएमके ने छात्रों की बलि चढ़ाकर की राजनीति

साल 1964 से ही तनाव बढ़ रहा था। डीएमके के नेता सीएन अन्नादुराई ने बड़े प्रदर्शन शुरू किए। छात्र संगठन भी सक्रिय हो गए। डीएमके ने इसे ‘शोक दिवस’ घोषित किया। मद्रास के कॉन्ग्रेसी मुख्यमंत्री भक्तवत्सलम ने चेतावनी दी कि गणतंत्र दिवस को शोक दिवस मानने वाला देशद्रोही है। अन्नादुराई और कई डीएमके कार्यकर्ताओं को नजरबंद कर लिया गया। सरकार को लगा कि आंदोलन सिर्फ एक पार्टी का है और दब जाएगा। लेकिन यह गलतफहमी थी। असली ताकत छात्रों में थी। डीएमके ने छात्रों को आगे कर दिया और आंदोलन की आड़ में राजनीतिक फायदा उठाने की कोशिश की।

मदुरै जुलूस रोकने के लिए कॉन्ग्रेसियों ने की थी हिंसा

25 जनवरी को मदुरै में छात्रों ने जुलूस निकाला। उनके हाथों प्लेकार्ड थे- ‘हिंदी कभी नहीं, अंग्रेजी हमेशा!’ वे संविधान की उन प्रतियों को जलाने वाले थे, जिनमें हिंदी को आधिकारिक भाषा बनाने का प्रावधान था। कॉन्ग्रेस कार्यकर्ताओं से झड़प हुई। छोटी सी झड़प जल्दी ही दंगे में बदल गई। पत्थर चले, बसें जलाई गईं, रबर जलने की तेज गंध फैल गई। खबर पूरे राज्य में फैली और हिंसा भड़क उठी। कई प्रदर्शनकारी पुलिस से भिड़ंत में मारे गए, कई ने आत्महत्या कर ली।

26 जनवरी को मद्रास में काले झंडे लहराए गए। छात्र सड़कों पर थे। रेल की पटरियाँ ब्लॉक की गईं, रेलवे संपत्ति जलाई गई। परिवहन ठप हो गया। आंदोलन फरवरी तक चला। छात्रों ने ‘एंटी-हिंदी एजिटेशन काउंसिल’ बनाया, जो कॉलेजों के छात्रों को एकजुट करता था। हिंसा चरम पर पहुँच गई। पुलिस फायरिंग में कई मौतें हुईं। दो केंद्रीय मंत्रियों सी. सुब्रमण्यम और ओवी अलागेसन ने इस्तीफा दे दिया। उन्होंने प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री से कहा कि वे ऐसी सरकार में नहीं रह सकते जो अपने लोगों से लड़ रही हो।

1967 में अंग्रेजी को मिल गई स्थाई जगह

दिल्ली में शास्त्री और गृह मंत्री गुलजारीलाल नंदा कानूनी दाँव-पेंच में उलझे थे। तभी राजनीतिक साहस की कमी थी। तब सूचना एवँ प्रसारण मंत्री रहते हुए इंदिरा गाँधी ने तमाम प्रोटोकॉल तोड़ डाले और सीधे मद्रास पहुँच गई। उन्होंने प्रदर्शनकारियों से बात करके बिना सरकार से सलाह लिए ही प्रदर्शनकारियों की बातें मानते हुए अंग्रेजी को बनाए रखने का आश्वासन दे दिया। हालाँकि फरवरी में प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने खुद संसद में आश्वासन दिया कि अंग्रेजी अनिश्चित काल तक सहायक भाषा रहेगी। यह 1967 के आधिकारिक भाषा अधिनियम संशोधन में औपचारिक हो गया। अंग्रेजी तब तक रहेगी, जब तक सभी गैर-हिंदी राज्य सहमत न हों – यानी लगभग हमेशा के लिए।

कॉन्ग्रेस हमेशा के लिए हो गई सत्ता से बाहर

यह समझौता किसी की पूरी जीत नहीं था, लेकिन भारत की बहुलता को मान्यता दी। हिंदी को बढ़ावा मिलेगा, लेकिन थोपा नहीं जाएगा। लेकिन इसकी कीमत क्या थी? दर्जनों युवा मारे गए। डीएमके ने इस आंदोलन को राजनीतिक हथियार बनाया। हिंदी विरोध को उत्तर-दक्षिण विभाजन का रूप दिया। छात्रों को आगे कर, खुद पीछे रहकर फायदा उठाया। कॉन्ग्रेस सरकार ने भी गलतियाँ कीं- पहले प्रदर्शनों को दबाने की कोशिश, फिर देर से समझौता।

नतीजा? 1967 में डीएमके सत्ता में आई। कॉन्ग्रेस तमिलनाडु में हमेशा के लिए कमजोर हो गई। आज तक वहाँ कॉन्ग्रेस अकेले चुनाव नहीं जीत पाई। डीएमके और एआईएडीएमके के बीच सत्ता घूमती है और कॉन्ग्रेस किसी न किसी की गठबंधन की पिछलग्गू साथी बनकर रह जाती है।

तब के दुश्मन अब बने स्थाई साथी

आज डीएमके और कॉन्ग्रेस तमिलनाडु में साथ हैं। दोनों एक-दूसरे के बिना नहीं चल सकते। लेकिन उस समय की राजनीति ने क्या किया? नवयुवकों को बलिदान का मोहरा बना दिया। हिंदी विरोध की आड़ में क्षेत्रीय भावनाएँ भड़काईं और सत्ता हासिल की। हम एंटी-हिंदी आंदोलन के उस उग्र रूप का विरोध करते हैं, जिसमें निर्दोष जिंदगियाँ गईं। हिंदी थोपना गलत होता (हालाँकि ऐसा था नहीं), लेकिन आंदोलन को इतना हिंसक बनाना, छात्रों को आगे करना और मौतों को राजनीतिक सीढ़ी बनाना भी गलत था। कॉन्ग्रेस ने इसे सही से नहीं संभाला, डीएमके ने फायदा उठाया।

अब भी हिंदी विरोध को राजनीतिक हथियार बनाए हुए है DMK

हालाँकि डीएमके इस मुद्दे को अब भी हथियार की तरह ही इस्तेमाल कर रही है। बीते रविवार यानी 25 जनवरी 2026 को ‘तमिल भाषा शहीद दिवस’ पर मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने फिर वही पुराना राग अलापा।

स्टालिन ने सोशल मीडिया पर लिखा– “भाषा युद्ध बलिदान दिवस: तब और अब, हिंदी के लिए यहाँ कोई जगह नहीं है! एक ऐसा राज्य जो अपनी भाषा से जान से ज्यादा प्यार करता था, उसने हिंदी थोपे जाने के खिलाफ लड़ाई लड़ी। हर बार जब इसे थोपा गया, तो उसी जोश से लड़ा। इसने उपमहाद्वीप में अलग-अलग भाषाई राष्ट्रीयताओं के अधिकार और पहचान की रक्षा की। मैं उन बलिदानियों को श्रद्धांजलि देता हूँ जिन्होंने तमिल के लिए जान कुर्बान की। भाषा युद्ध में अब और जान नहीं जाएगी, हमारी तमिल पहचान नहीं मरेगी! हम हमेशा हिंदी थोपे जाने का विरोध करेंगे।”

स्टालिन ने 1964-65 के आंदोलन का पुराना वीडियो भी शेयर किया, जिसमें प्रदर्शन, आत्मदाह और हिंसा की तस्वीरें हैं। उन्होंने अन्नादुराई और करुणानिधि को श्रद्धांजलि दी। केंद्र पर NEP 2020 और तीन-भाषा नीति के जरिए हिंदी थोपने का आरोप लगाया। स्टालिन का दावा है कि तमिलनाडु की दो-भाषा नीति (तमिल-अंग्रेजी) से ही तरक्की हुई है।

लेकिन सवाल यह है क्या आज हिंदी थोपी जा रही है? केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान बार-बार कह चुके हैं कि NEP में हिंदी अनिवार्य नहीं, सभी भारतीय भाषाओं को बढ़ावा है। फिर भी स्टालिन इसे ‘थोपना’ बताते हैं। क्यों? क्योंकि 2026 में विधानसभा चुनाव नजदीक हैं। पुराने आंदोलन को उछालकर भावनाएँ भड़काना, क्षेत्रीय अस्मिता जगाना… यही डीएमके की पुरानी रणनीति है। 1965 में छात्रों की मौतों से सत्ता मिली, आज उन मौतों को याद कर वोट माँगना।

गणतंत्र दिवस का दिन उत्सव का होता है। लेकिन 1965 में तमिलनाडु में यह शोक का दिन बन गया। उन छात्रों को याद करें, जिन्होंने सोचा कि वे भाषा और संस्कृति बचा रहे हैं, लेकिन राजनीति की चाल में बलिदान हो गए। हमें याद रखना चाहिए कि भाषाई मुद्दों को राजनीतिक विभाजन का हथियार नहीं बनाना चाहिए।

लाखों मृत मतदाता, फर्जी नाम और अवैध घुसपैठिए: पश्चिम बंगाल में क्यों जरूरी है SIR, पढ़ें ऑपइंडिया का रिसर्च पेपर

ऑपइंडिया ने एक शोध पत्र (रिसर्च पेपर) तैयार किया है जो पश्चिम बंगाल में सामने आ रहे वोटर लिस्ट की दिक्कतों की पड़ताल करता है। वोटर लिस्ट से जुड़ा यह संकट उस समय सामने आया है, जब चुनाव आयोग (ECI) देशभर में स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) यानी विशेष गहन पुनरीक्षण अभियान चला रहा है। यह एक बड़ी और कानूनी रूप से अनिवार्य प्रक्रिया है, जिसके तहत 12 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में मतदाता सूचियों की गहन समीक्षा शुरू की गई है।

राष्ट्रीय स्तर पर SIR लागू करने का फैसला बिहार में हुए SIR के बाद लिया गया। बिहार में इस अभ्यास के दौरान वोटर लिस्ट में गंभीर संरचनात्मक गड़बड़ियाँ सामने आई थीं जैसे बिना मिलान वाली प्रविष्टियाँ, डुप्लीकेट वोटर और संदिग्ध विदेशी नागरिकों के नाम। हालाँकि, पश्चिम बंगाल में सामने आई तस्वीर इससे कहीं ज्यादा गंभीर और चौंकाने वाली साबित हो रही है।

चुनाव आयोग की मैपिंग प्रक्रिया में पश्चिम बंगाल में भारी विसंगतियाँ पहले ही सामने आ चुकी हैं। SIR के दौरान लगभग 24.16 लाख वोटरों को मृत पाया गया है। वहीं, UIDAI (आधार प्राधिकरण) ने चुनाव आयोग को जानकारी दी है कि राज्य में करीब 34 लाख आधार कार्ड धारकों को मृत घोषित किया जा चुका है। इसके अलावा 13 लाख ऐसे मृत व्यक्ति भी सामने आए हैं जिनके पास आधार कार्ड नहीं था, यह जानकारी प्रक्रिया के दौरान साझा की गई है।

SIR कुछ मामलों में स्वतः सुधार करने वाला भी साबित हुआ है। जैसे ही वोटर लिस्ट की गहन जाँच शुरू हुई, कई अवैध घुसपैठिए डर के कारण खुद ही देश छोड़कर अपने मूल देश लौटने लगे। खास तौर पर बांग्लादेश जाने वालों की संख्या बढ़ी है। सीमा सुरक्षा बलों ने पुष्टि की है कि कुछ ही हफ्तों में करीब 1,600 अवैध प्रवासी बांग्लादेश भाग गए।

पश्चिम बंगाल में प्रशासनिक कामकाज हमेशा से मुश्किल रहा है, क्योंकि यहाँ राजनीतिक दबाव, धमकी और हिंसा की घटनाएँ सामने आती रही हैं। उदाहरण के तौर पर, 28 नवंबर 2025 को कलकत्ता हाईकोर्ट ने पश्चिम बंगाल-बांग्लादेश सीमा पर बाड़ लगाने के मामले में स्थिति रिपोर्ट न देने पर ममता बनर्जी सरकार को कड़ी फटकार लगाई थी।

केंद्र सरकार ने कोर्ट को बताया कि राज्य सरकार के सहयोग न करने और जमीन उपलब्ध न कराने की वजह से सीमा पर बाड़ लगाने का काम रुका हुआ है। ममता बनर्जी पर अवैध बांग्लादेशियों को संरक्षण देने के आरोप भी लगे हैं। उन्होंने एक बार कहा था कि NRC जैसे कदम से राज्य में खून-खराबा और गृहयुद्ध जैसी स्थिति पैदा हो सकती है।

SIR के दौरान भी कई जगहों पर गंभीर रुकावटें आईं। राजनीतिक समर्थन प्राप्त समूहों के विरोध, धमकी और सत्ताधारी पार्टी के कार्यकर्ताओं द्वारा बाधा डालने की खबरें सामने आईं, जिससे यह साफ होता है कि मतदाता सूची को साफ करने का काम कितने तनावपूर्ण माहौल में हो रहा है।

सुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवाई के दौरान भी SIR की वैधता को मजबूती मिली है। मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि बिहार में SIR के दौरान बड़े पैमाने पर नाम काटे जाने की आशंका सही साबित नहीं हुई और किसी भी नागरिक ने गलत तरीके से मताधिकार छीने जाने की शिकायत नहीं की।

पश्चिम बंगाल में SIR को चुनावी गड़बड़ियों के लंबे इतिहास के संदर्भ में देखना जरूरी है। अवैध बांग्लादेशियों के वोटर आईडी बनवाने से लेकर उत्तर 24 परगना, नदिया और पश्चिम मेदिनीपुर जैसे जिलों में फर्जी वोटर नेटवर्क के मामलों तक, यह साफ है कि ये समस्याएँ नई नहीं हैं। ये सालों की लापरवाही, राजनीतिक दखल और सीमावर्ती इलाकों की कमजोर व्यवस्थाओं का नतीजा हैं।

फिलहाल चल रहा SIR अभियान राज्य में चुनावी व्यवस्था को सुधारने की अब तक की सबसे बड़ी कोशिश है। साथ ही, यह उन गहरी गड़बड़ियों को भी उजागर कर रहा है, जो अब तक सतह के नीचे छिपी हुई थीं। यह अध्ययन सार्वजनिक रूप से उपलब्ध आँकड़ों और मामलों के आधार पर बताता है कि पश्चिम बंगाल में SIR क्यों जरूरी है।

(पूरा रिसर्च पेपर डाउनलोड करने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

किसी ने धर्मांतरण से बचाए जनजातीय, किसी ने नक्सली इलाके में भी की समाज सेवा… मोदी सरकार अब असली हकदारों को दे रही ‘पद्म पुरस्कार’, पढ़ें 10 गुमनाम नायकों की कहानी

गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर साल 2026 के पद्म पुरस्कारों के नामों की घोषणा हो चुकी है और राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने इन नामों पर अपनी औपचारिक मुहर भी लगा दी है। यह वही पल होता है, जब देश उन लोगों को याद करता है, जिन्होंने बिना शोर मचाए अपने काम से भारत को बेहतर बनाया।

इस बार पद्म पुरस्कारों के लिए देश-विदेश से 39 हजार से ज्यादा नामांकन आए। इन हजारों नामों में से असली नायकों को चुना गया। इनमें 5 लोगों को पद्म विभूषण, 13 लोगों को पद्म भूषण और 113 लोगों को पद्म श्री दिया जा रहा है। हर साल ये सम्मान खेल, अभिनय, संगीत, साहित्य, विज्ञान, चिकित्सा और अन्य क्षेत्रों में असाधारण योगदान के लिए दिए जा रहे हैं।

इन 131 नामों के पीछे सिर्फ उपलब्धियाँ नहीं, बल्कि संघर्ष, मेहनत और लगातार समाज के लिए कुछ करने की भावना छिपी है। इस बार की सूची में बड़ी संख्या में जमीनी स्तर पर काम करने वाले गुमनाम लोगों के नाम भी शामिल हैं। इनके योगदान के बारे में जानना जरूरी है, इसीलिए हम आपसे उनकी कहानी साझा करेंगे।

कर्नाटक में मुफ्त लाइब्रेरी चला रहे अंके गौड़ा

कर्नाटक के मंड्या जिले के हरलाहल्ली गाँव के रहने वाले अंके गौड़ा ने अपनी पूरी जिंदगी किताबों को लोगों तक पहुँचाने में लगा दी। अंके गौड़ा पेशे से बस कंडक्टर रहे और बाद में करीब 30 साल तक शुगर फैक्ट्री में काम किया। उनकी आमदनी बहुत सीमित थी, लेकिन उन्होंने अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा किताबें खरीदने में लगा दिया।

आज उनकी बनाई हुई मुफ्त लाइब्रेरी में 2 लाख से ज्यादा किताबें हैं, जो 20 से अधिक भारतीय और विदेशी भाषाओं में हैं। खास बात यह है कि यह लाइब्रेरी पूरी तरह मुफ्त है- न कोई फीस, न सदस्यता, न कोई रोक-टोक। वे सिर्फ किताबें जमा नहीं करते, बल्कि उन्हें सहेजते, वर्गीकृत करते और खुद संभालते हैं। रोजाना उनकी लाइब्रेरी में सैंकड़ों पाठक आते हैं, जिनमें गाँव के बच्चे, कॉलेज छात्र, रिसर्ज स्कॉलर और शिक्षक शामिल हैं।

जनजातीय समाज का धर्मांतरण रोक रहे अरुणाचल के तेची गुबिन

अरुणाचल प्रदेश के शियोमी जिले के केबी गाँव में जन्मे तेची गुबिन की जिंदगी हमेशा अपने समाज और अपनी जड़ों से जुड़ी रही है। पहाड़ी इलाकों में पले-बढ़े गुबिन ने बहुत करीब से देखा कि कैसे बाहरी प्रभाव और लालच की वजह से कई जनजातीय परिवार अपनी पारंपरिक पहचान, रीति-रिवाज और विश्वासों से दूर होकर धर्म परिवर्तन के प्रलोभन में आ रहे हैं।

यही चिंता धीरे-धीरे उनके जीवन का उद्देश्य बन गई। पढ़ाई पूरी करने के बाद वे सरकारी सेवा में गए। उन्होंने अरुणाचल प्रदेश सरकार में मुख्य वास्तुकार और बाद में हाउसिंग डायरेक्टर जैसे अहम पदों पर सेवाएँ दीं। सरकारी सेवा के दौरान और उसके बाद भी तेची गुबिन ने जनजातीय समाज को धर्मांतरण से होने वाले सामाजिक और सांस्कृतिक नुकसान के बारे में जागरूक करने का काम किया।

वे लगातार गाँव-गाँव जाकर लोगों से बात करते रहे और समझाते रहे कि धर्म बदलने से सिर्फ आस्था ही नहीं बदलती, बल्कि पूरी पद्धति, संस्कृति और सामाजिक ढाँचा प्रभावित होता है। उन्होंने जनजातीय समुदायों को उनकी मूल परंपराओं, लोक आस्थाओं और सामाजिक एकता से जोड़े रखने के लिए कई सामाजिक मंचों और संगठनों के साथ मिलकर काम किया।

इसी क्रम में ने अरुणाचल विकास परिषद और अखिल भारतीय वनवासी कल्याण आश्रम से भी सक्रिय रूप से जुड़े, जहाँ उनका फोकस लोगों को आत्मसम्मान और अपनी पहचान पर गर्व का भाव देना रहा। साल 2024 में सेवानिवृत्ति के बाद भी वे पूरी तरह समाजसेवा में लगे रहे। उनके काम की पहचा पहले भी राष्ट्रीय स्तर पर बनी, जब उन्हें ‘माय होम इंडिया’ और ‘वन इंडिया अवार्ड’ जैसे सम्मान से नवाजा गया।

‘वन की माँ’ बन चुकी केरल की कोल्लक्कयिल देवकी अम्मा

केरल के छोटे से इलाके अलप्पुझछा में 92 साल की कोल्लक्कयिल देवकी अम्मा की जिंदगी एक साधारण महिला से बदलकर ‘वन की माँ’ की पहचान बन चुकी है। उन्होंने अपने पुस्तैविला (Puthiyaviala) मकान के चारों ओर की 4.5 एकड़ बंजर जमीन को एक घने, हरित जंगल में बदल दिया है, जिसे आच लोग ‘तपोवनम्’ (Tapovanam) के नाम से जानते हैं।

इस जंगल में अब 3000 से अधिक पेड़ और पौधे बढ़ चुके हैं, जिनमें कई आयुर्वेदिक, दुर्लभ और क्षेत्रीय प्रजातियाँ शामिल हैं और यह सब उन्होंने लगभग 44 सालों में खुद के हाथों से लगाए, सींचे और बचाए हैं। आज यह जंगल पक्षियों, कीड़ों, छोटे जीवों और स्थानीय लोगों के लिए एक इको-सिस्टम के रूप में काम कर रहा है।

देवकी अम्मा की कहानी 1980 में हुए एक गंभीर कार हादसे से शुरू होती है, जब वे खेतों में काम नहीं कर पाई और खेती से दूर हो गई। उस कठिन समय में उन्होंने अपने घर के आसपास जो एक छोटी-सी जमीन थी, वहाँ पहला पौधा लगाया। उस एक पौधे ने उनके मन में प्रकृति के लिए गहरा लगाव पैदा किया और उन्होंने हर रोज कम से कम एक पौधा लगाने का संकल्प लिया।

धीरे-धीरे यह काम बढ़ता गया और 4 दशकों में ‘तपोवनम्’ नाम का जंगल तैयार हो गया, जिसमें आम, जामुन, नारियल, औषधीय जड़ी बूटियाँ और दुर्लभ पेड़ भी मौजूद हैं। इस जंगल में तालाब, मछलियाँ और कई पक्षी प्रजातियाँ भी पनपी हैं, जिससे यह एक जीवित पारिस्थितिकी स्थल बन चुका है। देवकी अम्मा का यह काम सिर्फ पेड़ लगाने तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने एक जीवित पर्यावरणीय शिक्षा स्थल भी तैयार किया है, जहाँ स्थानीय बच्चे, छात्रों और पर्यावरण प्रेमी आते हैं और बायोडायवर्सिटी, पौधों की प्रजातियाँ और पारिस्थितिक संतुलन के बारे में सीखते हैं।

कश्मीरी पंडितों के लिए संगीत की पाठशाला लगाने वाले बृज लाल भट्ट

कश्मीर की घाटी में जन्मे बृज लाल भट्ट ने बहुत कम उम्र में यह समझ लिया था कि संगीत सिर्फ सुर-ताल नहीं होता, बल्कि एक पूरी संस्कृति की आत्मा होता है। कश्मीरी पंडितों के विस्थापन से जब सूफियाना कलाम, वाख, भजन और पारंपरिक लोक धुने जैसे कश्मीरी लोक संगीत नई पीढ़ी से दूर होती जा रही थीं, तब भट्ट ने तय किया कि वे इस विरासत को अगली पीढ़ी तक जिंदा रखेंगे।

उन्होंने अपने जीवन का बड़ा हिस्सा कश्मीरी पंडित बच्चों और युवाओं को संगीत सिखाने में लगा दिया। चाहे मंदिर परिसर हो, सामुदायिक सभाएँ हो या छोटे-छोटे घरों के कमरे। उन्होंने हर जगह को ‘संगीत की पाठशाला’ बना दिया। वे सिर्फ गाना नहीं सिखाते थे, बल्कि हर रचना के पीछे की कहानी, उसका धार्मिक और सांस्कृतिक अर्थ भी समझाते थे।

बृज लाल भट्ट के लिए संगीत प्रतिरोध नहीं, बल्कि पुनर्निमाण का रास्ता था। उन्होंने बिना शोर किए, बिना मंच की तलाश किए, चुपचाप एक पूरी परंपरा को संभाले रखा। जब हालात ने कश्मीरी पंडित समाज को बिखेर दिया, तब संगीत ही वह डोर बना, जिसने पहचान को टूटने नहीं दिया। आज उन्हें कश्मीरी लोक संगीत का संरक्षक इसीलिए कहा जाता है क्योंकि उन्होंने सुरों के जरिए एक समुदाय को उसकी यादों, आस्था और संस्कृति से जोड़े रखा।

नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में अलख जगा रहीं बुधरी ताती

छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले के हिरानार गाँव की रहने वाली बुधरी ताती पिछले 36 सालों से देश के सबसे कठिन इलाकों में समाज सेवा कर रही हैं। उन्हें लोग प्यार से ‘बड़ी दीदी’ कहते हैं क्योंकि उन्होंने न सिर्फ समाज की जरूरतों को पहचाना, बल्कि खुद आगे आकर उन्हें पूरा भी किया।

बुधरी ताती की सेवा की शुरुआत 1984 में हुई, जब उन्होंने बस्तर के नक्सल प्रभावित वनांचल इलाकों में कदम रखा और महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों के जीवन को बदलने का काम शुरू किया। उन्होंने 500 से अधिक महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने में मदद की, जिनमें से कई आज अपनी आजीविका स्वयं चला रही हैं।

ताती ने साक्षरता अभियान, सामाजिक जागरूकता कार्यक्रम, स्वास्थ्य और साफ-सफाई की पहल चलाई और पहाड़ों व जंगलों के गाँवों में शिक्षा की पहुँच को मजबूत किया। उनके प्रयासों की वजह से कई महिलाएँ नर्सिंग और स्थानीय सेवाओं में काम कर रही हैं, जिससे समुदाय में सकारात्मक बदलाव आया है।

बता दें कि इन 5 नामों के अलावा पद्म पुरस्कार से सम्मानित किए जाने वाले बाकी लोग हैं:

आर्मिडा फर्नांडीज: मुंबई की पीडियाट्रिशियन अरमिडा फर्नांडीस ने एशिया का पहला ह्यूमन मिल्क बैंक बनाया।

पुन्नियमूर्ति नटेसन: तमिलनाडु के पशु चिकित्सक पुन्नियमूर्ति नटेसन ने जानवरों के इलाज के लिए पारंपरिक दवा का इस्तेमाल आधुनिक विज्ञान के साथ किया।

धर्मिकलाल चुनीलाल पंड्या: गुजरात की पारंपरिक लोककला ‘मानभट्ट’ को बचाने और आगे बढ़ाने में योगदान।

के पाजनिवेल: पारंपरिक तमिल मार्शल आर्ट ‘सिलम्बम’ के प्रशिक्षक रहकर इस कला को लोकप्रिय बनाया।

कैलाश चंद्र पंत: पत्रकार और समाजसेवी, जिन्होंने हिंदी भाषा और साहित्य के प्रति लोगों को जागरूक किया।

मोदी सरकार में असली हकदार को मिला पुरस्कार, कॉन्ग्रेस ने ‘खास’ को दिया

इन नामों को सुन लोग कह रहे हैं कि पुरस्कार के असली हकदारों को अब जाकर सम्मान मिलना शुरू हुआ है वरना पहले किसी ने सोचा भी नहीं था कि इस तरह दूर दराज शहरों में कलाओं को संजोने वाली हस्तियों को इतने बड़े पुरस्कार से सम्मान मिलेगा। कॉन्ग्रेस के शासन काल में तो उन्हें ही सम्मान मिलता था जो उनके खास होते थे। खुद कॉन्ग्रेस समर्थकों ने भी इस बात को माना है।

साल 2023 मोदी सरकार ने शाह रशीद अहमद कादरी ने पद्म पुरस्कार पाने के बाद कहा था, “मैं शुरू से कॉन्ग्रेसी था… पाँच साल यूपीए शासन में उम्मीद की कि मुझे ये सम्मान मिलेगा लेकिन ऐसा नहीं हुआ। बीजेपी सरकार आई। हमें लगा ये हमें क्यों देंगे लेकिन ख्याल गलत था। उन्होंने मुझे चुना। बहुत-बहुत धन्यवाद।”

पद्मश्री पाने वाले सुपर 30 के आनंद कुमार, जो आर्थिक रूप से कमजोर परिवार के बच्चों को मुफ्त में आईआईटी प्रवेश परीक्षा की ट्रेनिंग देते हैं, उन्होंने तो यहाँ तक कहा था कि जब सरकार ने उन्हें सम्मानित करने की सूचना दी तो उन्हें यकीन ही नहीं हुआ। उन्होंने

ऐसे ही कर्नाटक के वरिष्ठ नेता प्रमोध माधवराज ने भी 2021 में पद्म पुरस्कारों को लेकर जो मोदी सरकार ने ट्रेंड बदला उसकी तारीफ की थी। उन्होंने कहा था- नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार बनने के बाद, पद्म भूषण और पद्म श्री जैसे पुरस्कार उन लोगों को मिल रहे हैं जो इसके हकदार हैं। उन्होंने कहा था कि अनुकरणीय कारनामों के साथ जमीनी स्तर पर उपलब्धि हासिल करने वालों की पहचान करना और उन्हें पुरस्कार देना एक अच्छी शुरुआत है। उन्होंने ये भी कहा था- “मैं दूसरी पार्टी से हूँ लेकिन फिर भी नरेंद्र मोदी की इस ट्रेंड को बदलने के लिए तारीफ करूँगा।”

मोदी सरकार में अनसुनी कहानियों को मिली पहचान, बदली प्रक्रिया

गौरतलब है मोदी सरकार ने सत्ता में आने के बाद पद्म पुरस्कार पाने की प्रक्रिया में बदलाव किया था। पहले जहाँ ये अवार्ड केवल उन लोगों को मिलते थे जो इसके लिए अप्लाई करते थे। उस प्रक्रिया में केवल उन लोगों का नाम आ पाता था जिन्हें अवार्ड के बारे में पता होता था और जानकारी होती थी कि इसका कब नामांकन करना है, कहाँ उसे जमा कराना है, क्या सोर्स लगानी है आदि-आदि… ये सब बिंदु मिलकर निर्धारित करते थे कि किसका नाम UPA शासन में पद्म पुरस्कार के लिए घोषित होगा। इस प्रक्रिया में उन लोगों को अवार्ड ज्यादा मिलता था जो सरकार के करीबी होते थे, वहीं असली संघर्ष करने वाले गुमनाम ही रह जाते थे।

मोदी सरकार जब आई तो उन्होंने इन पुरस्कारों की महत्ता को समझते हुए इन्हें उन हस्तियों तक पहुँचाना शुरू किया जो वाकई जमीनी स्तर पर समाज में उत्कृष्ट कार्य कर रहे हैं मगर उनकी सिफारिश करने वाला कोई नहीं है, उन्हें ये भी नहीं पता है कि पद्म अवार्ड लेने के लिए क्या प्रक्रिया है।

मोदी सरकार ने इस सिस्टम को सुधारने के लिए सबसे पहले नामांकन की प्रक्रिया को पारदर्शी किया। उन्होंने ऑनलाइन नॉमिनेशन शुरू किया जिसमें कोई भी व्यक्ति किसी भी शख्स को उसके कार्यों के लिए नामित कर सकता था। इस प्रक्रिया से फायदा ये हुआ कि वो नाम भी सामने आए जिनके संघर्ष की कहानी लोगों तक नहीं थी। इससे सामान्य जन की इसमें भागीदारी बढ़ी और पद्म पुरस्कार पाकर हस्तियों ने पीएम मोदी का धन्यवाद किया।

लिस्ट उठाकर यदि देखें तो पता चलेगा कि 2016 के बाद से अब तक मोदी सरकार में कई ऐसे लोग सम्मानित हुए हैं जिन्हें उम्मीद ही नहीं थी कि उनके कार्यों के लिए उन्हें कोई पूछेगा। विलुप्त होती कलाओं को संरक्षित करने वालों को इस सम्मान से उत्साह भी बढ़ता है और उन्हें उनके मूल्य का एहसास भी हो पाता है।

कहीं किया पथराव तो कहीं तोड़ीं मूर्तियाँ, सरस्वती पूजा पर भी इस्लामी कट्टरपंथियों ने मचाया बवाल: पढ़ें- हमले और तोड़फोड़ की 9 घटनाएँ

ज्ञान और बुद्धि की देवी माँ सरस्वती को समर्पित बसंत पंचमी का पर्व पूरे देश में हिंदुओं द्वारा श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जाता है। देश में हिंदू त्योहारों के जश्न को बिगाड़ना अब एक घृणित और नियोजित ट्रेंड बन चुका है। राम नवमी, हनुमान जयंती और अन्य त्योहारों के दौरान विघ्न डालने की प्रवृत्ति इस साल बसंत पंचमी पर भी दिखी। देश के कई हिस्सों में हिंदू विरोधी तत्वों ने सरस्वती पूजा में व्यवधान डालने की कोशिश की। पूजा के दौरान और विसर्जन के समय उत्सव को निशाना बनाकर हमला और तोड़फोड़ की कई घटनाएँ दर्ज की गईं।

झारखंड: हजारीबाग में माँ सरस्वती की शोभायात्रा पर कट्टरपंथियों ने किया पथराव

झारखंड के हजारीबाग में शनिवार (24 जनवरी 2026) को एक मुस्लिम भीड़ ने सरस्वती पूजा विसर्जन के लिए निकाली जा रही शोभायात्रा पर पथराव किया। केरेदरी प्रखंड के बेल्टू गाँव में मूर्ति विसर्जन के लिए जुलूस निकाला जा रहा था। अचानक, मुस्लिम भीड़ ने हिंदू जुलूस पर पथराव शुरू कर दिया। इसके जवाब में जुलूस में शामिल कुछ लोगों ने भी पलटवार किया।

विवाद जुलूस में बज रहे संगीत के कारण शुरू हुआ। मुस्लिम पक्ष को अचानक गीत आपत्तिजनक लगने लगे और थोड़ी ही देर में मामला हिंसा में बदल गया। मुस्लिम कट्टरपंथियों ने हिंदुओं पर पथराव किया, जिससे कई लोग घायल हो गए।

हजारीबाग वर्षों से हिंदुओं के खिलाफ इस्लामी हिंसा का केंद्र रहा है। राम नवमी, हनुमान जयंती, होली जैसी अवसरों पर मुसलमान अक्सर मामूली बहानों जैसे संगीत बजना या भगवा झंडा के हवाले से हिंदुओं पर हमले करते रहे हैं। 2020 में भी हजारीबाग के लखे सुंडी बस्ती में मुस्लिम भीड़ ने सरस्वती पूजा विसर्जन जुलूस पर पथराव किया, कई वाहन तोड़े और 4-5 लोग घायल हुए थे। आज भी हिंदुओं के त्योहारों पर इसी तरह का तरीका अपनाया जा रहा है।

असम: डिब्रूगढ़ में सरस्वती की मूर्ति तोड़ी गई

शनिवार (24 जनवरी 2026) को पूजा के दिन माँ सरस्वती की मूर्ति को अज्ञात व्यक्तियों ने तोड़ दिया। अब तक इस घटना के पीछे कौन लोग हैं, इसकी कोई जानकारी नहीं मिली है। स्थानीय हिंदुओं ने दोषियों की पहचान कर उन्हें सजा देने की माँग की है।

त्रिपुरा: कैलाशहर में सरस्वती पूजा के दौरान मुसलमानों ने अशांति फैलाई

त्रिपुरा के कैलाशहार में सरस्वती पूजा के दौरान तनाव की स्थिति उत्पन्न हो गई, जब कथित तौर पर लगभग 16 मुस्लिम युवाओं ने दरांती और डंडों से हिंदू जुलूस में तोड़ने का प्रयास किया। यह झड़पें कतल डिघीरपुर क्षेत्र में हुईं।

भाजपा मंडल अध्यक्ष प्रीतम घोष ने कहा कि लगभग 16 मुस्लिम युवाओं ने दरांती और डंडों से हिंदुओं पर हमला कर सरस्वती पूजा में विघटन करने का प्रयास किया। घोष ने कहा, “सूचना मिलते ही जब हम मौके पर पहुँचे, उन्होंने हमारे ऊपर बेतहाशा हमला कर दिया। स्थिति और हिंसक हो गई। ये शरारती तत्व बांग्लादेश जैसी खतरनाक स्थिति दोहराने की कोशिश कर रहे हैं। हमें ऐसे ताकतों के खिलाफ एकजुट होकर लड़ना होगा।”

हमले में प्रीतम घोष घायल हुए, वहीं भाजपा युवा मोर्चा जिला अध्यक्ष अरूप धर का घर भी तोड़ा गया। रिपोर्ट्स के अनुसार, कतल डिघीरपुर में भाजपा का दफ्तर भी आग के हवाले कर दिया गया। पुलिस बलों को स्थिति पर काबू पाने के लिए तैनात किया गया।

पश्चिम बंगाल: TMC की अंदरूनी लड़ाई ने उत्तर 24 परगना जिले में सरस्वती पूजा में खलल डाला

शुक्रवार (23 जनवरी) को पश्चिम बंगाल के उत्तर 24 परगना जिले के कामरहाटी शहर में तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) के आंतरिक संघर्ष के कारण सरस्वती पूजा में बाधा उत्पन्न हो गई। सूत्रों के अनुसार, बेलघाड़िया सर्वजनिन श्री श्री दुर्गा चौक सोसाइटी मंदिर को TMC के एक गुट ने बंद कर दिया है।

इसके कारण स्थानीय हिंदू महिलाएँ माँ सरस्वती की पूजा नहीं कर पा रही हैं। स्थानीय पुलिस ने तब तक हस्तक्षेप करने या ताला हटाने से इनकार कर दिया है, जब तक TMC के विवादित गुटों के बीच किसी प्रकार का समझौता नहीं हो जाता।

TMC नेता ने ममता बनर्जी के स्कूल में सरस्वती पूजा न करने के लिए स्टूडेंट्स को धमकाया

साउथ कोलकाता के सरकारी समर्थित जोगेश चंद्र चौधरी कॉलेज में पढ़ाई कर रही एक महिला छात्रा ने बताया कि उन्हें तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) के एक नेता ने सरस्वती पूजा आयोजित करने के खिलाफ धमकी दी।

पीड़िता के अनुसार, TMC नेता का नाम दाऊद आलम मोल्ला बताया गया। छात्रा ने एक वायरल वीडियो में कहा,”दाऊद आलम मोल्ला बाहर खड़ा है। उसने मुझे धमकी दी कि वह मेरी LLM को बर्बाद कर देगा।” संयोगवश, जोगेश चंद्र चौधरी लॉ कॉलेज से ही पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और TMC सुप्रीमो ममता बनर्जी ने पढ़ाई की है।

TMC गुटों के बीच अंदरूनी लड़ाई के कारण कूचबिहार में सरस्वती पूजा समारोह रोका गया

पश्चिम बंगाल के कूचबिहार जिले के दिनहाटा कॉलेज में शुक्रवार (23 जनवरी) को सत्तारूढ़ तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) के दो गुटों के बीच आपसी झड़प के बाद सरस्वती पूजा मंडप को छोड़ना पड़ा।

स्थिति बिगड़ने पर कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए पुलिस को बुलाया गया। मामले की जानकारी मिलते ही दिनहाटा थाने के प्रभारी और SDPO कॉलेज परिसर पहुँचे। सरस्वती पूजा में शामिल होने आए हिंदू श्रद्धालुओं को अपनी सुरक्षा के लिए वहाँ से भागने पर मजबूर होना पड़ा। मौके से सामने आई तस्वीरों में दिखा कि सत्तारूढ़ TMC के गुंडों ने कॉलेज परिसर को युद्ध के मैदान में बदल दिया।

हिंदू स्टूडेंट्स को स्कूल कैंपस में सरस्वती पूजा करने की इजाज़त नहीं है क्योंकि 50% से ज्यादा स्टूडेंट्स मुस्लिम हैं

पश्चिम बंगाल के उत्तर 24 परगना जिले के बारासात शहर से एक अन्य घटना सामने आई, जहाँ हिंदू छात्रों को स्कूल परिसर के भीतर सरस्वती पूजा आयोजित करने की अनुमति नहीं दी गई।

रिपोर्ट्स के अनुसार, यह अनुमति इसलिए रोकी गई क्योंकि संबंधित स्कूल में 50% से अधिक छात्र मुस्लिम समुदाय से हैं। सोशल मीडिया पर सामने आए एक वीडियो में पुलिसकर्मियों को छात्रों को देवी सरस्वती की पूजा करने से रोकते हुए देखा गया। बाद में हिंदू छात्रों को स्कूल परिसर के बाहर फुटपाथ पर सरस्वती पूजा आयोजित करने के लिए मजबूर होना पड़ा।

इस दौरान प्रदीप चटर्जी नामक एक व्यक्ति को यह कहते हुए सुना गया, “हमें बताया गया कि इस स्कूल में हिंदू अल्पसंख्यक हैं, इसलिए यहाँ पूजा नहीं हो सकती… पश्चिम बंगाल में रहने वाले हिंदुओं की स्थिति और बांग्लादेश में हिंदुओं की स्थिति में कोई फर्क नहीं रह गया है।”

उन्होंने आगे कहा कि यदि 50 प्रतिशत मुस्लिम छात्रों वाला तर्क पूरे देश में लागू किया जाए, तो कल हिंदू यह दावा कर सकते हैं कि देश में उनकी आबादी 50 प्रतिशत से अधिक है और ऐसे में नमाज की अनुमति भी नहीं दी जानी चाहिए।

झारखंड: लोहरदगा में सरस्वती पूजा जुलूस को लेकर मुसलमानों ने हिंदुओं पर हमला किया

झारखंड के लोहरदगा जिले में रविवार (25 जनवरी 2026) को सरस्वती पूजा जुलूस के दौरान हिंदुओं पर मुस्लिम भीड़ ने हमला किया। यह घटना लोहरदगा के कूडू थाना क्षेत्र अंतर्गत बारिडीह गाँव में सरस्वती पूजा विसर्जन के समय हुई। हिंदू श्रद्धालु गाँव से होकर माँ सरस्वती की झाँकी निकाल रहे थे, तभी मूर्ति ले जा रही गाड़ी एक मुस्लिम के घर की छत से हल्की सी टकरा गई।

इसके बाद मुस्लिम परिवार और उनके साथियों ने इकट्ठा होकर गाड़ी के ड्राइवर के साथ मारपीट की। सुबह तक मामला पूरी तरह हिंसक हो गया और मुस्लिम भीड़ ने हिंदुओं तथा उनके घरों पर हमला कर दिया। घटना की सूचना मिलते ही कूडू थाना की पुलिस और सीमा सुरक्षा बल (BSF) की बाइक दस्ता मौके पर पहुँचा और स्थिति को नियंत्रित करने का प्रयास किया।

फोटो – आज तक

हमले में तीन लोग घायल हुए हैं, जिनका स्थानीय अस्पताल में इलाज चल रहा है। पुलिस ने स्थिति पर काबू कर लिया है।

बांग्लादेश: गोपालगंज में सरस्वती की मूर्ति तोड़ी गई

अगस्त 2024 में प्रधानमंत्री शेख हसीना को जबरन सत्ता से हटाए जाने के बाद से बांग्लादेश में हिंदुओं पर लगातार अत्याचार देखने को मिल रहे हैं। स्थानीय हिंदुओं पर हमले, बलात्कार, लूटपाट और हत्याओं की घटनाएँ सामने आई हैं। इस्लामी युनुस शासन के संरक्षण में मुस्लिम भीड़ द्वारा कई बार हिंदू मंदिरों में तोड़फोड़ की जा चुकी है। ताजा मामले में, शुक्रवार (23 जनवरी 2026) को गोपालगंज जिले के मुकसुदपुर उपजिला स्थित एक सार्वजनिक पूजा मंडप में मुस्लिमों ने माँ सरस्वती की मूर्ति को क्षतिग्रस्त कर दिया।

बांग्लादेश के गोपालगंज में सरस्वती की मूर्ति तोड़ी गई। (इमेज: डेली रिपब्लिक बांग्लादेश)

मुकसुदपुर थाने के प्रभारी अब्दुल्ला अल मामून ने बताया कि यह हिंदू-विरोधी अपराध सरस्वती पूजा समाप्त होने के बाद किया गया। यह घटना उजानी यूनियन के पश्चिम उजानी कंदनीपारा गाँव स्थित सामुदायिक पूजा स्थल की है। पूजा संपन्न होने के बाद श्रद्धालु मंडप से लौट गए थे।

इसके बाद मुस्लिम हमलावरों ने जानबूझकर माँ सरस्वती की मूर्ति की गर्दन मरोड़ दी, जिससे मूर्ति का सिर लटक गया,यह एक सोची-समझी अपवित्रता की कार्रवाई थी। हिंदू-बहुल गोपालगंज जिला बीते दो वर्षों में मुस्लिमों द्वारा किए गए कई हिंदू-विरोधी अपराधों का गवाह रहा है।

(मूल रूप से ये खबर अंग्रेजी में श्रद्धा पांडे ने लिखी है, जिसको विस्तार से पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें)

एक ही जुर्म के लिए उलेमा को डाँट तो ‘निचले तबके’ को मौत, बच्चों-महिलाओं का यौन उत्पीड़न ‘माफ’: जानें- तालिबानी राज में लागू होने जा रहे ‘क्रिमिनल प्रोसीजर कोड’ के बारे में सबकुछ

अफगानिस्तान में तालिबानी फरमान नए ‘क्रिमिनल प्रोसीजर कोड’ के तौर पर एक बार फिर सामने आया है। इसमें विरोध करने वालों के लिए मौत, ईशनिंदा के नाम पर कोड़े बरसाना, बच्चों और महिलाओं के यौन उत्पीड़न के बावजूद कोई कड़ी सजा का प्रावधान नहीं होना जैसी व्यवस्था है। धार्मिक अल्पसंख्यकों के साथ जबरदस्त भेदभाव किया गया है। जनता के बीच भी ‘न्याय’ एक समान नहीं है।

एक ही जुर्म के लिए अलग-अलग सजा

अफगानिस्तान की अदालतें नए कानून को मानने के लिए बाध्य होंगी। नए ‘क्रिमिनल प्रोसीजर कोड‘ (दे महाकुमु जज़ाई ओसुलनामा) को सर्वोच्च नेता हिबतुल्ला अखुंदजादा ने मंजूरी दी है। 4 जनवरी 2026 को जारी क्रिमिनल प्रोसीजर कोड को तीन सेक्शन, 10 चैप्टर और 119 आर्टिकल हैं। कानून के तहत समाज को चार हिस्सों में बांटा गया है। एक ही जुर्म के लिए सोशल स्टेटस के हिसाब से अलग-अलग सजा का प्रावधान है।

यह कोड अफगानिस्तान की जनता को 4 भागों में बाँटता है। धार्मिक उलेमा या विद्वान, अशरफ यानी संपन्न वर्ग, मध्यम वर्ग और निचला तबका। धार्मिक जानकारों को सबसे ऊँची कैटेगरी में रखा गया है और उन्हें कड़ी सजा से छूट दी गई है। गलत काम करने पर सिर्फ डांटने का प्रावधान है।

दूसरी कैटेगरी में कबायली बुज़ुर्ग, मिलिट्री कमांडर और असरदार अमीर लोग शामिल हैं। इस ग्रुप के लोगों को बुलाया जा सकता है और चेतावनी दी जा सकती है, लेकिन उन्हें जेल या शारीरिक सजा नहीं दी जाएगी।

तीसरी कैटेगरी में मिडिल क्लास के लोग शामिल हैं, जिन्हें जेल हो सकती है। जबकि चौथी और सबसे निचली कैटेगरी में आम लोग शामिल हैं, जिन्हें उन्हीं जुर्मों के लिए जेल, कोड़े मारने और दूसरी कड़ी सजा मिलेगी। यानी सजा अपराधी के अपराध से तय नहीं होगा, बल्कि उसके स्टेटस से तय होगा।

यह कानून मानवाधिकार उल्लंघन और निष्पक्ष सुनवाई के बुनियादी सिद्धांतों के विपरीत है। इस कोड में धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ भेदभाव किया गया है और लोगों की बोलने की आजादी को रोकने से लेकर बेवजह गिरफ्तारी और सजा देने की व्यवस्था है।

सजा भी हर तबके के लिए अलग- अलग तय किया गया है। एक तरह से यह सरकारी दमन को कानूनी मान्यता देता है। इस क्रिमिनल प्रोसीजर कोड में कहीं भी बचाव पक्ष के वकील तक पहुँच की जरूरत ही महसूस नहीं की गई है। टॉर्चर करने, मनमानी तरीके से हिरासत में लेने का अधिकार है। किसी भी मामले में मुआवजा पाने का अधिकार नहीं है।

इसके अलावा, कोड में कम से कम और ज़्यादा से ज़्यादा सजा तय नहीं की गई है, और आपराधिक कामों को साबित करने के लिए स्वतंत्र जाँच की प्रक्रिया को खत्म करके, इसके बजाय ‘स्वीकारोक्ति’ और ‘गवाही’ को अपराध साबित करने के मुख्य तरीके के तौर पर लागू किया गया है।

धार्मिक भेदभाव वाला कानून

नया कानून ‘हनफी इस्लाम’ को मानता है। क्रिमिनल प्रोसीजर कोड के आर्टिकल 2 का क्लॉज़ 8, हनफी विचारधारा को मानने वालों को मुसलमान बताता है। हनफी इस्लाम के अंतर्गत शिया, इस्लाइली, अहल ए हदीस को रखा गया है। जो लोग इसका पालन नहीं करते, उन्हें काफिर कहा गया है।

हनफी मानने वालों को अपना धर्म बदलने का अधिकार नहीं है। ऐसा करने पर दो साल जेल की सजा का प्रावधान है।

एक ऐसे देश में जहाँ जाफ़री शिया, इस्माइली, और अहल-ए-हदीस जैसे दूसरे इस्लामी नजरिए के मानने वाले, साथ ही सिख और हिंदू जैसे गैर-मुस्लिम समेत कई धार्मिक अल्पसंख्यक रहते हैं, यह भेदभाव वाला वर्गीकरण सीधे तौर पर धर्म और विश्वास के आधार पर भेदभाव न करने के सिद्धांत का उल्लंघन करता है।

‘बदात या बिदअत’ का लेबल लगाना और तालिबान के न्यायिक संस्थानों को असीमित अधिकार देना, धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ बड़े पैमाने पर दमन, कानूनी सुरक्षा से वंचित करने और मनमानी सजा देने के हालात बनाता है।

इसके अलावा, क्रिमिनल प्रोसीजर कोड के आर्टिकल 14 में यह तय किया गया है कि ‘पब्लिक इंटरेस्ट’ के लिए, अपराधियों को मारना सही है। इसमें ईशनिंदा जैसे आरोप भी शामिल हैं। इसी तरह, आर्टिकल 17 के क्लॉज 2 में, इस्लामी फैसलों का ‘मजाक उड़ाना’ सजा के लायक माना गया है और अपराधियों के लिए दो साल की जेल की सजा तय की है। इसमें ये नहीं बताया गया है कि ‘मजाक उड़ाने’ को कैसे पहचाना जाएगा। एक तरह से जजों को अपने नजरिए से मनमाने तरीके से सजा देने का अधिकार होगा।

डांस-गानों पर पूरी तरह पाबंदी

नए कानून के आर्टिकल 59 के मुताबिक, डांस करने और उसे देखने वालों को अपराध घोषित किया गया है और उनके लिए सजा का प्रावधान है। यानी परंपरागत सांस्कृतिक कार्यक्रम भी इस कानून के लागू होने के बाद बंद रहेंगे और लोकल संस्कृति नष्ट हो जाएगी।

कोड का आर्टिकल 13 के तहत नैतिक भ्रष्टाचार की जगहों को खत्म करने की बात कही गई है। ये तय करने का अधिकार भी सरकार को होगा कि कौन सी जगह इस श्रेणी में आएगा। इसके बहाने ब्यूटी पार्लरों और ऐसे सार्वजनिक जगहों पर रोक लगाई जा सकती है, जहाँ महिलाएँ जाती हैं या लोग जमा होते हैं और बातचीत करते हैं। आर्टिकल 40 के अनुसार, कोई भी व्यक्ति जो ‘भ्रष्टाचारी’ हो, तो भी उसे अपराधी माना जाएगा और उसे सजा दी जा सकती है। इसमें ‘भ्रष्टाचार’ का मतलब भी साफ न हो,

‘गुलामी’ को मान्यता देता है कानून

रावदारी का कहना है कि तालिबान का क्रिमिनल कोड ‘गुलाम’ शब्द का बार-बार इस्तेमाल करके गुलामी को मान्यता देता है। कोड के आर्टिकल 15 और 4 गुलामी और उससे जुड़े अधिकारों के बारे में बताया गया है। इंटरनेशनल लॉ के तहत गुलामी अपने सभी रूपों को सिरे से खारिज किया गया है।

एक प्रोविज़न में कहा गया है: “किसी भी ऐसे जुर्म के लिए जिसके लिए कोई तय ‘हुदूद’ सज़ा तय नहीं है, अपनी मर्ज़ी से सज़ा दी जाएगी, चाहे अपराधी आजाद हो या गुलाम।”

कानून की नजर में बराबरी और गुलामी पर पूरी तरह रोक अंतर्राष्ट्रीय कानून और मानवाधिकार की बुनियादी नियमों में एक है। लेकिन तालिबानी शासन इसे नहीं मानता। ह्यूमन राइट्स के बुनियादी उसूलों और इंटरनेशनल लॉ के ज़रूरी नियमों में से है- बराबरी का अधिकार, लेकिन क्रिमिनल प्रोसीजर कोड ऑफ़ कोर्ट्स का आर्टिकल 9 समाज को असरदार तरीके से चार कैटेगरी में बाँटता है।

‘स्कॉलर’ (उलेमा), ‘एलीट’ (अशरफ), ‘मिडिल क्लास’ और ‘लोअर क्लास’। इस आर्टिकल के मुताबिक, एक ही जुर्म करने पर, सज़ा का टाइप और गंभीरता जुर्म के नेचर के आधार पर नहीं, बल्कि जुर्म करने वाले की सोशल हैसियत के आधार पर तय होती है। उदाहरण के लिए, अगर कोई जुर्म किसी धार्मिक जानकार ने किया है, तो उसके लिए सिर्फ सलाह दी जाती है।

अगर यह जुर्म किसी एलीट क्लास के किसी व्यक्ति ने किया है, तो इसके लिए कोर्ट में समन और सलाह दी जाती है। लेकिन, अगर वही जुर्म ‘मिडिल क्लास’ के लोगों ने किया है, तो उन्हें जेल होती है, और अगर समाज के ‘लोअर क्लास’ के लोगों ने किया है, तो जेल के अलावा, उन्हें शारीरिक सजा भी दी जाती है। यह फैसला न सिर्फ सामाजिक भेदभाव को मान्यता देता है, बल्कि कानून के सामने बराबरी के सिद्धांत, भेदभाव पर रोक के सिद्धांत, जुर्म और सज़ा के बीच बराबरी के सिद्धांत, और कोड़े मारने जैसे अमानवीय सजा को मान्यता देता है।

इसके अलावा, कोड ने कई सेक्शन में ‘गुलाम’ शब्द का जिक्र करके गुलामी को भी सही ठहराया गया है। जैसा कि आर्टिकल 15 में कहा गया है, “किसी भी ऐसे जुर्म के मामले में जिसके लिए ‘सजा तय’ नहीं की गई है, ताज़ीर (अपनी मर्ज़ी की सज़ा) तय की जाती है, चाहे अपराधी आजाद हो या गुलाम।” इसी तरह, आर्टिकल 4 के पैराग्राफ 5 में कहा गया है कि ‘हद’ की सजा ‘इमाम’ दे सकता है और ‘ताजीर की सजा’ ‘पति’ और “मालिक” दे सकते हैं।

इस क्रिमिनल प्रोसीजर कोड में लोगों को आजाद और गुलाम बताना, और ‘गुलाम’ शब्द का जिक्र करना अंतर्राष्ट्रीय कानून का खुल्मखुल्ला उल्लंघन है।

कोड शारीरिक सजा, जैसे सार्वजनिक कोड़े मारने को कानूनी मान्यता देता है और बढ़ाता है। इसे मानवाधिकारों के खिलाफ और अपमानजनक व्यवहार माना गया है, जो सिस्टम में हिंसा को स्थान देता है।

महिलाओं और बच्चों पर दमन की छूट

यह कोड महिलाओं को सार्वजनिक जीवन से पूरी तरह मिटाने के तालिबान के प्रयासों को और तेज करता है। इसमें महिलाओं के लिए कड़े ड्रेस कोड, पुरुष अभिभावक (महरम) की अनिवार्य उपस्थिति, और सार्वजनिक स्थानों पर महिलाओं की आवाज सुनने पर भी सजा के प्रावधान शामिल हैं। ब्यूटी पार्लरों को बंद करने की कोशिश की जा रही है।

ह्यूमन राइट्स ऑर्गनाइज़ेशन रावदारी का कहना है कि तालिबान अपने क्रिमिनल कोर्ट के कोड ऑफ प्रोसीजर के तहत बच्चों की पिटाई को अपराध की श्रेणी में नहीं रखा है। कोड के आर्टिकल 30 में सिर्फ शारीरिक हिंसा जैसे हड्डियों में फ्रैक्चर, स्किन का फटना शामिल किया गया है।

बच्चों के यौन उत्पीड़न, मानसिक शोषण वगैरह को इसमें कोई जगह नहीं दी गई है। आर्टिकल 48 में कहा गया है कि एक पिता अपने 10 साल के बेटे को नमाज़ न पढ़ने जैसे कामों के लिए सजा दे सकता है।

विरोध करने पर मिलेगी मौत की सजा

तालिबान कोर्ट के कोड के अनुसार, जिसकी एक कॉपी अफ़गानिस्तान इंटरनेशनल को मिली है, तालिबान ने ‘बागी’ बताए गए लोगों को मौत की सजा दी है। कोड में कहा गया है कि ‘बागी’ से जनता को नुकसान होता है और उसे मारे बिना ठीक नहीं किया जा सकता।

यह नियम कानूनी संस्थाओं को विरोधियों और आलोचकों को मौत की सजा देने का अधिकार देता है। आर्टिकल 4, क्लॉज 6, नागरिकों को किसी व्यक्ति को खुद सजा देने की इजाजत देता है अगर वे कोई ‘पाप’ करते हुए देखते हैं।

कोड में कहा गया है कि कोई भी मुसलमान जो किसी व्यक्ति को पाप करते हुए देखता है, उसे सजा देने का अधिकार है।

एक और नियम कहता है कि कोई भी व्यक्ति जो सिस्टम के विरोधियों को बैठक करते हुए देखता है या उसके बारे में जानता है, लेकिन संबंधित अधिकारियों को सूचित नहीं करता है, उसे अपराधी माना जाएगा और उसे दो साल जेल की सज़ा दी जाएगी।

इस आर्टिकल के तहत, सभी नागरिकों को तालिबान विरोधियों की गतिविधियों की सूचना अधिकारियों को देनी होगी या खुद सजा भुगतना पड़ेगा। यानी हर तरह के जुल्म के बावजूद विरोध करने का अधिकार कानून में नहीं दिया गया है।