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‘मियाँ’ का मतलब ‘अवैध बांग्लादेशी’… मुस्लिम विरोधी एजेंडा बताकर ‘द वायर’ का हिमंता के खिलाफ प्रोपेगेंडा, क्यों वामपंथियों की आँखों में खटकते हैं असम CM

असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा के हाल के बयानों को लेकर मुख्यधारा के वामपंथी मीडिया और ‘द वायर’ जैसे पोर्टल्स ने एक सुनियोजित अभियान छेड़ दिया है। मतदाता सूची के पुनरीक्षण और ‘मियाँ’ शब्द के इस्तेमाल को लेकर मुख्यमंत्री को ‘मुस्लिम विरोधी’ सिद्ध करने की कोशिश की जा रही है। लेकिन वास्तविकता इसके उलट है। हिमंता बिस्वा सरमा का संघर्ष किसी धर्म के खिलाफ नहीं, बल्कि उन ‘अवैध बांग्लादेशी’ के खिलाफ है जो असम की स्वदेशी संस्कृति, भूमि और लोकतांत्रिक अधिकारों को निगल रहे हैं।

द वायर का नैरेटिव: बयानों को तोड़-मरोड़कर पेश करने की साजिश

‘द वायर‘ ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि हिमंता बिस्वा सरमा जानबूझकर एक खास समुदाय (मियाँ) को डराने और उन्हें ‘परेशान’ करने की राजनीति कर रहे हैं। लेख में दावा किया गया है कि मुख्यमंत्री ने 4 से 5 लाख मियाँ मतदाताओं के नाम हटाने की बात कहकर लोकतंत्र का अपमान किया है। ‘द वायर’ ने मुख्यमंत्री के उस बयान को भी हाइलाइट किया जिसमें उन्होंने लोगों से मियाँ समुदाय के लिए ‘मुश्किलें’ पैदा करने को कहा, ताकि वे असम छोड़ दें।

वामपंथियों को हिमंता ने दिया जवाब

हिमंता बिस्वा सरमा ने वायर और उस जैसी वामपंथी खेमों के स्वघोषित मुस्लिम मसीहों को तीखा जवाब दिया है। उन्होंने X पर एक लंबे पोस्ट में लिखा, “जो लोग ‘मियाँ’ शब्द (यह असम में बांग्लादेशी मुस्लिमों की घुसपैठ के लिए इस्तेमाल होता है) पर मेरी टिप्पणी को लेकर मुझ पर हमला कर रहे हैं, उन्हें पहले यह पढ़ लेना चाहिए कि असम के बारे में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने खुद क्या कहा है। यह मेरी भाषा नहीं है, न मेरी कल्पना, और न ही कोई राजनीतिक बढ़ा-चढ़ाकर कही गई बात है।”

उन्होंने आगे लिखा, “ये शब्द खुद अदालत के हैं, ‘असम में चुपचाप और खतरनाक तरीके से जनसंख्या में बदलाव हो रहा है, जिससे लोअर असम के रणनीतिक रूप से बहुत महत्वपूर्ण जिलों के हाथ से निकल जाने का खतरा पैदा हो सकता है। अवैध प्रवासियों की वजह से ये इलाके धीरे-धीरे मुस्लिम बहुल क्षेत्र बनते जा रहे हैं। इसके बाद यह केवल समय की बात होगी कि इन इलाकों को बांग्लादेश में मिलाने की माँग उठाई जाए। अगर लोअर असम हाथ से निकल गया, तो पूरा पूर्वोत्तर भारत देश के बाकी हिस्सों से कट जाएगा और उस क्षेत्र के समृद्ध प्राकृतिक संसाधन भी देश के हाथ से निकल सकते हैं’।”

हिमंता ने आगे लिखा, “जब देश की सर्वोच्च संवैधानिक अदालत ‘जनसंख्या पर आक्रमण’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल करती है और देश की एकता और क्षेत्रीय सुरक्षा को लेकर चेतावनी देती है, तो उस सच्चाई को स्वीकार करना न तो नफरत है, न सांप्रदायिकता, और न ही किसी समुदाय पर हमला। यह एक गंभीर और पुरानी समस्या को समझना है, जिसे असम दशकों से झेल रहा है।

उन्होंने लिखा, “हमारा प्रयास किसी मजहब या किसी भारतीय नागरिक के खिलाफ नहीं है। हमारा प्रयास असम की पहचान, सुरक्षा और भविष्य की रक्षा करना है, ठीक वैसे ही जैसे सुप्रीम कोर्ट ने देश को चेतावनी दी थी। उस चेतावनी को नजरअंदाज करना ही असम और भारत के साथ सबसे बड़ा अन्याय होगा।”

वामपंथियों की आँखों में क्यो खटकते हैं हिमंता?

वामपंथी खेमे की राजनीति अक्सर इस सोच पर टिकी रही है कि धार्मिक पहचान को दबाकर रखा जाए और खास समुदायों को खुश करने की नीति अपनाई जाए। उन्हें ऐसे नेता पसंद आते हैं जो हर मुद्दे पर संतुलन के नाम पर चुप्पी साध लें या फिर वोट बैंक के दबाव में फैसले लें। जब कोई नेता खुलकर अपनी पहचान की बात करता है तुष्टीकरण की राजनीति को चुनौती देता है और स्पष्ट शब्दों में सच बोलता है, तो वही वामपंथियों के लिए सबसे बड़ी समस्या बन जाता है।

हिमंता बिस्वा सरमा इसी वजह से वामपंथियों की आँखों की किरकिरी बने हुए हैं। वह बार-बार यह सवाल उठाते हैं कि आखिर हिंदू अपनी पहचान पर गर्व क्यों न करे। वामपंथी विचारधारा को यह बात स्वीकार नहीं होती क्योंकि उनकी राजनीति में हिंदू पहचान को अक्सर संदेह की नजर से देखा जाता है। उन्हें लगता है कि अगर कोई नेता हिंदुत्व की बात करेगा, तो उनकी वैचारिक जमीन कमजोर पड़ जाएगी। इसलिए वामपंथी गुट ऐसे नेताओं को कट्टर, विभाजनकारी या असहिष्णु साबित करने की कोशिश करते हैं।

वामपंथियों को यह भी खलता है कि हिमंता सरमा मुस्लिम समाज को केवल वोट बैंक की तरह देखने के बजाय उन्हें शिक्षा और विकास की मुख्यधारा में लाने की बात करते हैं। जब वह घुसपैठ या अतिक्रमण जैसे मुद्दों पर सख्त रुख अपनाते हैं तो वामपंथी इसे मानवाधिकार या अल्पसंख्यक विरोध के रूप में पेश करने लगते हैं। असल में समस्या यह है कि वामपंथी हर मुद्दे को राजनीतिक चश्मे से देखते हैं और कानून, सुरक्षा या सामाजिक संतुलन जैसी बातों को स्वीकार करने को तैयार नहीं होते।

हिमंता सरमा का अपराध वामपंथियों की नजर में यही है कि वह डरकर नहीं बोलते। वह न तो किसी समुदाय के दबाव में आते हैं और न ही वैचारिक आलोचना से घबराते हैं। वह साफ कहते हैं कि देश और समाज का हित सबसे ऊपर है, चाहे इसके लिए कड़वी बात ही क्यों न कहनी पड़े। यही स्पष्टता वामपंथियों को असहज करती है।

कुल मिलाकर हिमंता बिस्वा सरमा की राजनीति उस सोच से अलग है जिसमें नेताओं को हर मुद्दे पर संतुलित या अस्पष्ट भाषा में बोलते देखा जाता है। वह अपनी बात सीधे और स्पष्ट शब्दों में रखते हैं, चाहे वह उनकी पहचान का सवाल हो, विकास का मुद्दा हो या घुसपैठ और कानून-व्यवस्था का मामला। यही वजह है कि एक वर्ग उन्हें मजबूती और स्पष्टता का प्रतीक मानता है, जबकि वामपंथी उन्हें अपने लिए चुनौती और असहजता का कारण समझता है।

जिन UGC नियमों को SC ने रोका उनमें शामिल ‘वामपंथी’ इंदिरा जयसिंह की सिफारिशें, जनरल कैटेगरी के छात्रों को निशाने बनाने की संभावनाओं को किया गया नजरअंदाज

सुप्रीम कोर्ट ने यूजीसी के नए नियम UGC इक्विटी नियम 2026 पर स्टे लगा दिया है। हाल ही में उच्च शिक्षण संस्थानों को लेकर किए गए नोटिफिकेशन को लेकर बवाल मचा हुआ है। प्रमोशन ऑफ इक्विटी 2026 के विरोध में लोग सड़कों पर उतर आए हैं। इस पर केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने 27 जनवरी 2026 को छात्रों को भरोसा दिलाया कि इस नियम का गलत इस्तेमाल नहीं होने दिया जाएगा। लेकिन छात्रों का डर खत्म नहीं हुआ और विरोध प्रदर्शन जारी रहा।

दरअसल ये तर्क दिया जा रहा है कि जनरल कटेगरी के लोग जाति के आधार पर भेदभाव का शिकार नहीं हो सकते इसलिए उनकी शिकायत को सिस्टम से बाहर रखा जा रहा है। UGC इक्विटी नियम 2026 को उच्च शिक्षण संस्थानों में इक्विटी को बढ़ावा देने के लिए एक ‘सुधार’ के तौर पर पेश किया जा रहा है।

स्वराज्य के अनुसार, 2026 के नियमों के बजाए 2025 का नियम एजुकेशनल इंस्टीट्यूशन्स में भेदभाव को दूर करने के लिए ज्यादा कारगर है। यह एक संतुलित नजरिया पेश करता है और ज्यादा व्यावहारिक है।

बराबरी पर UGC रेगुलेशन की शुरुआत

2019 में छात्र रोहित वेमुला और पायल तड़वी की माताओं ने दो पीआईएल दायर की थी, जिसके आधार पर 2025 के ड्राफ्ट तैयार किए गए थे। इन छात्रों में एक की मौत 2016 में और दूसरे की 2019 में हुई थी। उनके परिवारों ने आरोप लगाया था कि इनके साथ जाति के आधार पर भेदभाव किया गया, जिसकी वजह से इनदोनों ने आत्महत्या कर ली थी।

दोनों याचिकाकर्ताओं की वकील सीनियर एडवोकेट इंदिरा जयसिंह थी। उन्होंने एडवोकेट प्रसन्ना और दिशा वाडेकर के साथ मिलकर एजुकेशनल इंस्टीट्यूशन में भेदभाव को रोकने के लिए प्रभावी कदम उठाने की माँग की। सुप्रीम कोर्ट ने यूजीसी को निर्देश दिया था कि शैक्षणिक संस्थानों में भेदभाव रोकने के लिए गाइडलाइंस तैयार की जाए, उसी के आधार पर यूजीसी के नए नियम बनाए गए।

कहा जाता है कि PIL में पूरी तरह से नए नियम की माँग नहीं की गई थी, बल्कि मौजूदा यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (हायर एजुकेशनल इंस्टीट्यूशन में बराबरी को बढ़ावा देना) रेगुलेशन, 2012 को सख्ती से लागू करने की माँग की गई थी। 2012 के नियमों के तहत यूनिवर्सिटी को भेदभाव, खासकर अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के छात्रों को समानता दिलाने पर जोर दिया गया था।

PIL में याचिकाकर्ताओं ने एडमिशन, मूल्यांकन, हॉस्टल अलॉटमेंट और कैंपस लाइफ में जातिगत भेदभाव का आरोप लगाया था। उन्होंने संस्थानों पर 2012 के नियम को लागू करने में पूरी तरह विफल रहने का भी आरोप लगाया। याचिकाकर्ता ने दावा किया कि कोई मॉनिटरिंग नहीं की जाती थी। समान अवसर वाली जगह काफी कम थी। NAAC का कोई अता-पता नहीं था।
जनवरी 2025 में जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस उज्जल भुयान ने यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (UGC) को नियमों का पालन न करने के लिए फटकार लगाई। जजों ने UGC को सेल, शिकायतों और एक्शन पर डेटा पेश करने का निर्देश दिया। सुप्रीम कोर्ट UGC ने बताया कि वह रेगुलेशन के नियम का ड्राफ्ट बना रही है।

2025 के रेगुलेशन ने एजुकेशनल इंस्टीट्यूशन में जाति के आधार पर भेदभाव को दूर करने के लिए एक नियम बनाया।

UGC ने फरवरी 2025 में (हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशन में प्रमोशन ऑफ इक्विटी) रेगुलेशन जारी किए थे। 2025 के ड्राफ्ट रेगुलेशन का उद्देश्य सुरक्षा, निष्पक्षता और स्वायत्तता के बीच एक संतुलित ढाँचा तैयार करना था। PIL की माँग के मुताबिक, ‘इक्विटी कमेटी’ और 24/7 हेल्पलाइन जैसे उपाय सुझाए गए, ताकि सभी शामिल पार्टियों (विशेषकर SC/ST छात्रों) के लिए सुरक्षा बढ़ाई जा सके।

इन नियमों में संस्थानों को अपनी स्थितियों के अनुसार, नियमों को लागू करने का अधिकार दिया गया। इक्विटी कमेटी का नेतृत्व संस्था के प्रमुख द्वारा किए जाने का प्रावधान है, ताकि संस्था की जवाबदेही को सुनिश्चित किया जा सके।

कमेटी में कम से कम एक सदस्य SC ​​या ST समुदाय से होना जरूरी था। ड्राफ्ट रेगुलेशन ने सामूहिक जिम्मेदारी को बढ़ावा देने के लिए फैकल्टी, छात्र-छात्राओं और संस्थान के प्रशासनिक स्टाफ की भागीदारी को प्रोत्साहित किया गया है।

2026 के रेगुलेशन में इंदिरा जयसिंह की सिफारिशों को शामिल किया गया

हालाँकि याचिकाकर्ता 2025 के ड्राफ्ट रेगुलेशन से खुश नहीं थे। सीनियर एडवोकेट इंदिरा जयसिंह ने ड्राफ्ट में दस मुख्य बदलावों का प्रस्ताव दिया। सुप्रीम कोर्ट ने रेगुलेशन को फाइनल करने के लिए 8 हफ्ते की डेडलाइन तय की। इसको देखते हुए नए रेगुलेशन 2026 को उच्च शिक्षण संस्थानों में इक्विटी को बढ़ावा देने के लिए 13 जनवरी 2026 को नोटिफाई किया गया।

इस रेगुलेशन में 2025 के रेगुलेशन में किए गए ‘संतुलन’ का अभाव था, और इसमें जयसिंह की कई सिफारिशें शामिल थीं।

2026 के रेगुलेशन ने पीड़ितों की कैटेगरी को SC, ST और OBC तक सीमित करके जनरल कटेगरी को जाति-आधारित हिंसा का शिकार मानने से मना कर दिया। जनरल कैटेगरी के छात्रों के लिए जाति-आधारित भेदभाव की शिकायत करने का कोई प्रावधान नहीं है। 2026 के रेगुलेशन न सिर्फ यह मानते हैं कि जाति के आधार पर भेदभाव सिर्फ SC, ST और OBC के लोगों के साथ होता है। इसमें जनरल कटेगरी के लोगों की सुरक्षा का कोई प्रावधान नहीं है, क्योंकि नया नियम मानता है कि इनके साथ कोई भेदभाव नहीं होता।

नया फ्रेमवर्क जनरल कटेगरी के स्टूडेंट्स के खिलाफ है, जिनके पास नियमों का गलत इस्तेमाल होने पर संस्थान का सहारा नहीं होगा। यही वजह है कि 2026 के रेगुलेशन का जनरल कटेगरी के छात्र विरोध कर रहे हैं, जिन पर इसका सीधा असर पड़ेगा।

(इस लेख को अंग्रेजी में लिखा गया है। मूल रूप को पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

आधुनिकता की चमक और संस्कृति की छाया: हम डिजिटल युग में भविष्य बना रहे हैं या खुद को खो रहे हैं?

भारत ने बीते वर्षों में डिजिटल इंडिया के माध्यम से अभूतपूर्व प्रगति की है। सरकारी सेवाओं का डिजिटलीकरण, डिजिटल भुगतान, ऑनलाइन शिक्षा, टेलीमेडिसिन और ई-गवर्नेस ने आम नागरिक के जीवन को आसान बनाया है। मोदी सरकार की मंशा रही है कि तकनीक के माध्यम से पारदर्शिता बढ़े, योजनाओं का लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुँचे और युवा शक्ति नवाचार व शोध की ओर प्रेरित हो। इसमें कोई संदेह नहीं कि डिजिटल क्रांति ने भारत को वैश्विक मंच पर नई पहचान दिलाई है। भारतीय वैज्ञानिकों, तकनीकी संस्थानों और स्टार्टअप्स ने विश्व स्तर पर अपनी क्षमता सिद्ध की है। आज भारत डिजिटल भुगतान, स्टार्टअप इकोसिस्टम आईटी सेवाओं में अग्रणी देशों में गिना जाता है।

इसी प्रगति के बीच एक मौन, गहरी और गंभीर चिंता भी जन्म ले रही है: क्या हम तकनीक का उपयोग कर रहे हैं, या धीरे-धीरे उसके मानसिक गुलाम बनते जा रहे हैं?

आज शायद ही कोई ऐसा घर होगा जहाँ मोबाइल फोन, इंटरनेट और सोशल मीडिया की पहुँच न हो। सुबह आँख खुलते ही मोबाइल हाथ में आ जाता है और रात को सोने से पहले भी वही अंतिम साथी होता है। हम बिना सोचे-समझे घंटों स्क्रीन पर समय बिताते हैं। विभिन्न सर्वेक्षण बताते हैं कि भारत में लोग औसतन प्रतिदिन 6 से 7 घंटे स्क्रीन पर बिताते हैं। यह समय केवल काम या अध्ययन में नहीं जाता बल्कि अधिकतर सोशल मीडिया, रील्स, वीडियो और मनोरंजन में व्यतीत होता है। यह आँकड़ा केवल समय का नहीं, हमारी सोच, हमारी प्राथमिकताओं और हमारे जीवन के संतुलन का भी संकेत देता है।

पहले परिवारों में शाम को बैठकर बातचीत होती थी। चौपालों पर चर्चा होती थी। ट्रेन में लोग एक-दूसरे से बात करते थे। पार्कों में बुजुर्ग अनुभव साझा करते थे। आज हर व्यक्ति अपने-अपने मोबाइल में खोया हुआ है। पास बैठा व्यक्ति भी दूर लगता है।

भारतीय समाज की सबसे बड़ी ताकत उसका संवाद थाः संवाद, सहकार और सौहार्द। आज वही संवाद धीरे-धीरे समाप्त हो रहा है। डिजिटल निर्भरता का सबसे बड़ा प्रभाव हमारे मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर दिखाई देता है। चिकित्सकों और शोधकर्ताओं के अनुसार, अत्यधिक स्क्रीन टाइम से अवसाद, चिंता, अनिद्रा और तनाव जैसी समस्याएँ बढ़ रही हैं। कोलंबिया यूनिवर्सिटी और विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) जैसे संस्थानों के अध्ययन बताते हैं कि सोशल मीडिया का अत्यधिक उपयोग किशोरों और युवाओं में मानसिक असंतुलन, आत्मविश्वास की कमी और सामाजिक अलगाव को जन्म देता है।

शारीरिक स्तर पर भी इसके दुष्परिणाम स्पष्ट हैं। कम चलना-फिरना, लंबे समय तक बैठना और देर रात तक स्क्रीन देखने से मोटापा, मधुमेह, हृदय रोग और रक्तचाप जैसी बीमारियाँ बढ़ रही हैं। जो रोग पहले वृद्धावस्था में होते थे, वे आज युवावस्था में ही दस्तक देने लगे हैं। यह केवल स्वास्थ्य का प्रश्न नहीं, भविष्य की पीढ़ी की क्षमता का प्रश्न है। इंटरनेट और ओटीटी प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध सामग्री भी एक गंभीर विषय है। हिंसा, अश्लीलता, अपसंस्कृति, गाली-गलौज और विकृत मानसिकता से भरी सामग्री आसानी से बच्चों और युवाओं तक पहुँच रही है।

इसका प्रभाव उनके मन, सोच और व्यवहार पर पड़ रहा है। रिश्तों के प्रति संवेदनशीलता कम हो रही है। धैर्य घट रहा है। सहनशीलता कमजोर हो रही है। कभी भारतीय परिवार को ‘प्रथम पाठशाला’ कहा जाता था। दादा-दादी बच्चों को कहानियाँ सुनाते थे, संस्कार देते थे, जीवन के मूल्य समझाते थे। माता-पिता बच्चों के साथ समय बिताते थे। आज वह भूमिका मोबाइल फोन निभा रहा है।

दो-तीन साल का बच्चा भी मोबाइल चलाना जानता है। माता-पिता व्यस्त हैं। बच्चे को मोबाइल पकड़ा दिया जाता है। यही उसकी दुनिया बन जाती है। संयुक्त परिवार की परंपरा, जो भारतीय समाज की रीढ़ थी, धीरे-धीरे कमजोर हो रही है। बुजुर्गों का अनुभव, मार्गदर्शन और संस्कार नई पीढ़ी तक नहीं पहुँच पा रहे हैं। हमारी संस्कृति संयम, संतुलन और त्याग पर आधारित रही है। सीमित आवश्यकताएँ, सरल जीवन और सामूहिकता हमारी पहचान थी।

आज हमारी आवश्यकताएँ असीमित हो गई हैं। उपभोग की संस्कृति बढ़ रही है। हम अधिक कमाने, अधिक खर्च करने और अधिक दिखाने की होड़ में फँसते जा रहे हैं। तकनीक ने इस प्रवृत्ति को और तेज कर दिया है। आज हर प्रश्न का उत्तर गूगल से लिया जाता है। हर निर्णय ऐप से होता है। हर दिशा GPS बताता है। हम धीरे-धीरे अपनी सोच, विवेक और निर्णय क्षमता तकनीक को सौंपते जा रहे हैं।

हमारे शास्त्रों में कहा गया है कि बु‌द्धि से ऊपर विवेक होता है। तकनीक बुद्धि का उत्पाद है लेकिन विवेक का विकल्प नहीं। जब विवेक कमजोर होता है, तब समाज दिशाहीन हो जाता है। इंटरनेट युग में अध्ययन, साहित्य, महापुरुषों के विचार और गहन चिंतन पीछे छूटते जा रहे हैं। कम लोग हैं जो तकनीक का उपयोग आत्मविकास के लिए करते हैं। अधिकतर लोग सतही मनोरंजन में उलझे रहते हैं।

शोध बताते हैं कि केवल एक सप्ताह का डिजिटल डिटॉक्स भी मानसिक संतुलन में सुधार ला सकता है। यह दर्शाता है कि हमारा मस्तिष्क लगातार डिजिटल उत्तेजना से थक चुका है। विश्व के कई देश इस खतरे को पहचान चुके हैं। फ्रांस, ब्रिटेन और अन्य देशों में बच्चों के लिए सोशल मीडिया नियंत्रण, स्क्रीन लिमिट और पैरेंटल कंट्रोल पर गंभीर विचार हो रहा है।

भारत में भी इस दिशा में संतुलित नीति की आवश्यकता है- ऐसी नीति जो स्वतंत्रता और जिम्मेदारी दोनों को संतुलित करे। नीति से अधिक जरूरी सामाजिक जागरूकता है। माता-पिता को बच्चों के साथ समय बिताना होगा। शिक्षकों को केवल पाठ्यक्रम नहीं, जीवन मूल्य भी सिखाने होंगे। समाज को संवाद की संस्कृति को पुनर्जीवित करना होगा। डिजिटल इंडिया हमारी ताकत है। यह हमारी प्रगति का आधार है। लेकिन यदि हमने संतुलन नहीं बनाया, तो यही ताकत हमारी कमजोरी बन सकती है।

तकनीक साधन है, साध्य नहीं। हमें यह तय करना होगा कि हम तकनीक के मालिक रहेंगे या उसके दास बनेंगे। आज आवश्यकता है आत्ममंथन की। अपने जीवन की गति को थोड़ा धीमा करने की। अपने रिश्तों को फिर से समय देने की। अपने बच्चों को स्क्रीन से बाहर की दुनिया दिखाने की। डिजिटल युग में भी भारतीय मूल्य, संस्कृति और विवेक ही हमारी सबसे बड़ी पूंजी हैं। यदि हम इन्हें बचा पाए, तो तकनीक हमारे लिए वरदान बनेगी। अन्यथा, हम सुविधाओं से भरे लेकिन संवेदनहीन समाज में बदलते चले जाएँगे। यह चुनाव आज हमारे हाथ में है।

क्या है आर्थिक सर्वेक्षण? जो आम जनता से लेकर उद्योगपतियों के खर्च का देता है पूरा ब्योरा: जानिए बजट से पहले क्यों इतना जरूरी?

बजट सत्र की शुरुआत के साथ ही संसद में गुरुवार (29 जनवरी 2026) को केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण सबसे पहले आर्थिक सर्वेक्षण (Economic Survey) 2025-26 पेश करेंगी। यह दस्तावेज देश की अर्थव्यवस्था की पूरी तस्वीर सामने रखता है। वित्त मंत्री द्वारा यह रिपोर्ट बजट से ठीक एक दिन पहले संसद में रखी जाती है, ताकि बजट से पहले देश की आर्थिक स्थिति साफतौर पर समझी जा सके।

आर्थिक सर्वेक्षण की इस रिपोर्ट में आम लोगों की आमदनी, महँगाई का असर, रोजागर के हालात, खेती और उद्योग की स्थिति, सरकार के खर्च और नीतियों के नतीजे का आकलन होता है। सर्वेक्षण का मकसद सिर्फ आँकड़ें पेश करना नहीं होता, बल्कि यह समझना भी होता है कि देश की अर्थव्यवस्था किन चुनौतियों से जूझ रही है और आगे किन क्षेत्रों में सुधार की जरूरत है।

इसी सर्वेक्षण के आधार पर यह तय होता है कि आने वाले बजट में किन सेक्टरों को प्राथमिकता दी जाएगी और किन नीतियों में बदलाव किया जा सकता है। अगर यह देश के लिए इतना जरूरी दस्तावेज है, तो इसके बारे में जानना भी उतना ही जरूरी है। आइए इसके बारे में हर डिटेल के साथ आगे बढ़ते हैं।

आर्थिक सर्वेक्षण क्या होता है और इसे कौन तैयार करता है?

आर्थिक सर्वेक्षण सरकार की वह आधिकारिक रिपोर्ट होती है, जिसमें पूरे साल के दौरान देश की अर्थव्यवस्था की स्थिति का विस्तार से विश्लेषण किया जाता है। इसमें यह बताया जाता है कि देश की आर्थिक रफ्तार कैसी रही, आमदनी और खर्च का संतुलन क्या रहा, महँगाई कितनी बढ़ी या घटी, रोजगार के अवसर कैसे रहे और खेती, उद्योग व सेवा क्षेत्र ने कैसा प्रदर्शन किया। आसान शब्दों में कहा जाए तो आर्थिक सर्वेक्षण यह समझाने की कोशिश करता है कि देश की अर्थव्यवस्था जमीन पर किस हालत में है, न सिर्फ कागजों में।

यह रिपोर्ट वित्त मंत्रालय के अंतर्गत आने वाले आर्थिक कार्य विभाग द्वारा तैयार की जाती है। आर्थिक सर्वेक्षण को तैयार करने की जिम्मेदारी देश के मुख्य आर्थिक सलाहकार (CEA) और उनकी टीम की होती है। यह टीम पूरे साल जमा हुए सरकारी आँकड़ों, अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की रिपोर्ट्स और अलग-अलग क्षेत्रों से जुड़े डेटा का अध्ययन करती है। इसके बाद इन सभी जानकारियों को जोड़कर एक ऐसी रिपोर्ट बनाई जाती है, जो सरकार के आर्थिक फैसललों की दिशा और सोच को सामने रखती है।

आर्थिक सर्वेक्षण कोई राजनीतिक दस्तावेज नहीं होता, बल्कि इसे एक ‘विश्लेषणात्मक रिपोर्ट’ माना जाता है। इसमें सिर्फ उपलब्धियाँ ही नहीं गिनाई जातीं, बल्कि कमजोरियों, जोखिमों और आगे की चुनौतियों पर भी खुलकर बात की जाती है। यही वजह है कि इसे बजट से पहले पेश किया जाता है, ताकि नीति निर्धारण से पहले देश की आर्थिक सच्चाई को समझा जा सके। इसी सर्वे के आधार पर यह संकेत मिलता है कि सरकार आने वाले समय में अर्थव्यवस्था को किस दिशा में आगे बढ़ाना चाहती है।

आर्थिक सर्वेक्षण में किन-किन क्षेत्रों की समीक्षा होती है?

आर्थिक सर्वक्षण में देश की अर्थव्यवस्था से जुड़े लगभग हर बड़े क्षेत्र की गहराई से समीक्षा की जाती है। सबसे पहले बात होती है आर्थिक विकास यानी GDP ग्रोथ की। इसमें यह बताया जाता है कि देश की अर्थव्यवस्था कितनी तेजी से बढ़ी, अलग-अलग सेक्टरों ने इसमें कितना योगदान दिया और यह विकास पिछले वर्षों के मुकाबले कैसा रहा। साथ ही आने वाले साल के लिए ग्रोथ का अनुमान भी पेश किया जाता है।

इसके बाद महँगाई की स्थिति का विश्लेषण किया जाता है। सर्वे यह बताता है कि रोजमर्रा की चीजों के दाम कैसे बदले, खाने-पीने की वस्तुओं, ईंधन और सेवाओं की कीमतों का आम लोगों पर क्या असर पड़ा। खुदरा महँगाई और थोक महँगाई दोनों पर अलग-अलग चर्चा होती है, ताकि साफ समझा जा सके कि दबाव कहाँ से आ रहा है।

रोजगार और श्रम बाजार भी आर्थिक सर्वे का अहम हिस्सा होता है। इसमें बताया जाता है कि नौकरियों की स्थिति कैसी रही, संगठित और अंसगठित क्षेत्र में रोजगार के अवसर बढ़े या घटे, महिला और युवाओं की भागीदारी कितनी रही। इसके जरिए यह समझने की कोशिश होती है कि आर्थिक विकास का फायदा लोगों तक पहुँच रहा है या नहीं।

सर्वे में कृषि क्षेत्र की अलग से समीक्षा की जाती है। इसमें फसलों का उत्पादन, मॉनसून का असर, किसानों की आय, न्यूनतम समर्थन मूल्य और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की स्थिति पर चर्चा होती है। खेती से जुड़े जोखिम और सुधार की जरूरत वाले पहलुओं को भी इसमें सामने रखा जाता है।

इसके अलावा उद्योग और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की स्थिति बताई जाती है। इसमें फैक्ट्रियों का उत्पादन, निवेश का रुझान, MSME सेक्टर की हालत और बड़े उद्योगों के प्रदर्शन पर ध्यान दिया जाता है। साथ ही यह भी देखा जाता है कि उद्योगों को किन चुनौतियों का सामना करना पड़ा।

सेवा क्षेत्र, जो भारतीय अर्थव्यवस्था की बड़ी ताकत है। उस पर भी विस्तार से बात होती है। बैंकिंग, IT, पर्यटन, ट्रांसपोर्ट और अन्य सेवाओं की ग्रोथ, इनसे जुड़े रोजगार और निर्यात पर सर्वे में फोकस किया जाता है।

आर्थिक सर्वे में सरकारी वित्त की स्थिति भी शामिल होती है। इसमें सरकार की कमाई, खर्च, राजकोषीय घाटा, कर्ज की स्थिति और टैक्स संग्रह का पूरा हिसाब दिया जाता है। इससे यह साफ होता है कि सरकार की आर्थिक सेहत कैसी है।

अंत में सर्वे में वैश्विक आर्थिक हालत का असर भी समझाया जाता है। अंतरराष्ट्रीय बाजार, युद्ध, तेल की कीमतें, ब्याज दरें और वैश्विक मंदी जैसे कारक भारतीय अर्थव्यवस्था को कैसे प्रभावित कर रहे हैं, इस पर भी विस्तार से चर्चा होती है।

इस तरह आर्थिक सर्वेक्षण एक ही दस्तावेज में देश की पूरी आर्थिक तस्वीर पेश करता है, ताकि नीति निर्धारण के लिए ठोस आधार मिल सके।

बजट से पहले आर्थिक सर्वेक्षण क्यों जरूरी?

बजट देश के आने वाले साल की आर्थिक योजना होता है। ऐसे में बजट बनाने से पहले यह जानना बहुत जरूरी है कि जमीन पर हालात क्या हैं। आर्थिक सर्वे इसी काम के लिए होता है। यह सरकार के यह समझने में मदद करता है कि किन जगहों पर हालात सुधरे हैं और किन क्षेत्रों में अब भी परेशानी बनी हुई है। बिना इस समझ के बजट सिर्फ अंदाजे पर आधारित रह जाएगा।

आर्थिक सर्वे यह साफ करता है कि सरकार के पिछले फैसलों का असर कैसा रहा। जिन योजनाओं से फायदा मिला, उन्हें आगे बढ़ाने का संकेत मिलता है। जिन नीतियों से उम्मीद के मुताबिक नतीजे नहीं आए, उन पर दोबारा सोचने की जरूरत सामने आती है। इसी वजह से बजट से पहले सर्वे को एक तरह का मार्गदर्शन माना जाता है।

बजट में पैसा कहाँ खर्च किया जाए और किस क्षेत्र को ज्यादा सहारे की जरूरत है, इसका जवाब भी आर्थिक सर्वे से मिलता है। अगर किसी हिस्से में दबाव दिखता है, तो बजट में वहाँ राहत देने की कोशिश होती है। जहाँ संभावनाएँ दिखती हैं, वहाँ निवेश बढ़ाने की दिशा तय की जाती है। इससे बजट ज्यादा व्यावहारिक बनता है।

आर्थिक सर्वे आम लोगों और विशेषज्ञों दोनों के लिए भी अहम होता है। इससे यह संकेत मिलता है कि सरकार की सोच किस दिशा में जा रही है। बाजार, उद्योगों और आम नागरिक बजट से पहले ही समझने लगते हैं कि आगे किस तरह के फैसले हो सकते हैं। इसी वजह से आर्थिक सर्वे को बजट की नींव माना जाता है, जिस पर पूरे साल की आर्थिक योजना खड़ी होती है।

विश्वविद्यालयों में 118% बढ़ा जातिगत भेदभाव: जानें- UGC के आँकड़ों से कैसे खेल कर रहे वामपंथी

पिछले कुछ दिनों से ‘द वायर’ और उसके जैसे झुकाव वाले वामपंथी सोशल मीडिया अकाउंट्स यह दावा कर रहे हैं कि उच्च शिक्षा संस्थानों में जातिगत भेदभाव की शिकायतों में 118.4% की बढ़ोतरी हुई है। पहली नजर में यह आँकड़ा डराने वाला लगता है और यही इसका मकसद भी है। इतना बढ़ा हुआ प्रतिशत हमेशा चौंकाता है, खासकर तब जब असली संख्या और उसका संदर्भ छुपा दिया जाए।

असल डेटा क्या कहता है?

UGC के आँकड़ों के अनुसार, 2019-20 में 173 शिकायतें थीं, जो 2023-24 में बढ़कर 378 हो गईं। इसी को 118.4% की बढ़ोतरी बताया जा रहा है। हालाँकि, यह कभी नहीं बताया जाता कि ये शिकायतें 704 विश्वविद्यालयों और 1,553 कॉलेजों यानी 2,200 से ज्यादा उच्च शिक्षा संस्थानों से आई हैं। इस पैमाने पर देखें तो सबसे ज्यादा शिकायतों वाले साल में भी औसतन एक संस्थान में साल भर में एक से भी कम शिकायत आती है। महत्वपूर्ण बात यह भी है कि 90% से अधिक शिकायतें ‘निपटाई गई’ हैं। यानी व्यवस्था पूरी तरह ठप नहीं है जैसा कि एक संकट जैसी तस्वीर पेश की जा रही है।

साल-दर-साल आँकड़े भी किसी ‘अचानक विस्फोट’ की कहानी नहीं बताते। शिकायतें धीरे-धीरे बढ़ीं है 173 (2019–20), 182 (2020–21), 186 (2021–22), 241 (2022–23) और फिर 2023-24 में तेज उछाल आया। यह ज्यादा संभावना दिखाता है कि रिपोर्टिंग बढ़ी, न कि कैंपस नैतिकता अचानक गिर गई।

UGC अधिकारियों ने खुद माना है कि इसका बड़ा कारण छात्रों में SC/ST सेल्स की जानकारी बढ़ना है। यानी पहले जो मामले दबे रह जाते थे, अब वे सामने आ रहे हैं। यह सच है कि लंबित मामलों की संख्या18 से बढ़कर 108 हो गई है, जो सिस्टम पर दबाव की ओर इशारा करती है। लेकिन इसे पूरे उच्च शिक्षा तंत्र में ‘व्यापक भेदभाव का संकट’ बताना तथ्यात्मक रूप से भ्रामक है।

भारत का उच्च शिक्षा तंत्र (Higher Education System) करोड़ों छात्रों और लाखों शिक्षकों से जुड़ा है। ऐसे विशाल सिस्टम में केवल प्रतिशत उछाल दिखाकर तस्वीर पेश करना न तो संतुलित है, न ईमानदार। भेदभाव की शिकायतें गंभीर हैं और उनका समाधान जरूरी है। लेकिन संस्थाओं के आकार, प्रति-कैंपस औसत और नतीजों को छुपाकर आँकड़ों को केवल डर पैदा करने के लिए इस्तेमाल करना नीति-निर्माण नहीं बल्कि ‘नैरेटिव गढ़ना’ है।

आँकड़ों को कैसे हथियार बनाया जाता है?

इतने सारे तथ्यों के बावजूद सार्वजनिक बहस को सिर्फ एक आंकड़े तक सीमित कर दिया गया है- 118.4%। वामपंथी इकोसिस्टम इसी प्रतिशत को बार-बार उछालता है, लेकिन जानबूझकर यह नहीं बताता कि शिकायतें कितने संस्थानों, कितने छात्रों और प्रति कैंपस औसतन कितनी हैं। जब आधार संख्या छोटी होती है, तो थोड़ी-सी बढ़ोतरी भी प्रतिशत में बहुत बड़ी दिखती है। संदर्भ और पैमाना हटते ही आँकड़े डर पैदा करने का औजार बन जाते हैं।

हमारा पक्ष: UGC 2026 का विरोध, न्याय का नहीं

UGC 2026 का विरोध करना भेदभाव से इनकार करना नहीं है। भेदभाव मौजूद है और उस पर सख़्त कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन नया ढाँचा जातिगत भेदभाव की परिभाषा को इस तरह बदलता है कि जनरल कैटेगरी को जानबूझकर बाहर कर देता है और साथ ही दुरुपयोग से बचाने वाली प्रक्रियात्मक सुरक्षा भी कमजोर करता है। इससे न्याय नहीं बल्कि संस्थानों में डर आधारित प्रशासन पैदा होने का खतरा है।

भारत को ऐसे भेदभाव-रोधी नियम चाहिए जो सख्त हों लेकिन संतुलित, सुरक्षात्मक हों लेकिन निष्पक्ष और तथ्यों पर आधारित हों, विचारधारा पर नहीं। बढ़ा-चढ़ाकर गढ़े गए नैरेटिव पर बनी नीतियाँ ऊपर से निर्णायक लग सकती हैं लेकिन अनुपात और प्रक्रिया के बिना वे उसी न्याय को कमजोर कर देती हैं, जिसे बचाने का दावा करती हैं।

(यह खबर मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी गई है जिसे इस लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं)

छँटनी के डर से जेफ बेजोस से नौकरी की भीख माँगता इंडिया ब्यूरो चीफ, जानें- कैसे वॉशिंगटन पोस्ट में नौकरी बचाने की शर्त बना ‘भारत विरोध’

वरिष्ठ पत्रकारों का अपने ही संस्थान के मालिक से सार्वजनिक मंच पर नौकरी बचाने की अपील करना मीडिया जगत में एक असामान्य और चौंकाने वाली स्थिति है। यह घटना न सिर्फ संपादकीय स्वतंत्रता पर सवाल खड़े करती है बल्कि मीडिया संस्थानों पर मालिकाना प्रभाव की वास्तविकता को भी सामने लाती है। साथ ही, यह उस धारणा को भी चुनौती देती है कि मीडिया पूरी तरह स्वतंत्र रूप से काम करता है।

‘द वॉशिंगटन पोस्ट’ के नई दिल्ली ब्यूरो चीफ प्रांशु वर्मा का ऐसा ही एक मामला सामने आया है। अखबार में बड़े पैमाने पर छँटनी की खबरें सामने आने के बाद उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर पोस्ट करते हुए सीधे अमेजन के संस्थापक और द वॉशिंगटन पोस्ट के मालिक जेफ बेजोस से हस्तक्षेप करने की अपील की है।

प्रांशु वर्मा का ट्वीट सिर्फ यह कहने तक सीमित नहीं था कि उन्हें नौकरी पर बने रहने दिया जाए। वह ट्वीट ऐसा लग रहा था जैसे उन्होंने सबके सामने अपना परिचय, अपने काम का ब्योरा और अखबार के प्रति अपनी निष्ठा एक साथ रख दी हो। जेफ बेजोस को टैग करते हुए वर्मा ने कहा कि ‘द वॉशिंगटन पोस्ट’ भारत के गिने-चुने मीडिया संस्थानों में से है, जो सरकार के दबाव या सेंसरशिप के डर के बिना रिपोर्टिंग करता है।

एक ही झटके में, उन्होंने खुद को कथित तौर पर तानाशाही मीडिया इकोसिस्टम में एक बहादुर विरोधी के तौर पर पेश कर दिया। साथ ही, अखबार को कथित तौर पर दबाने वाले भारतीय शासन व्यवस्था के खिलाफ खड़े होने वाले एकमात्र ‘योद्धा’ के तौर पर पेश किया। दरअसल, लंबे वक्त से इस तरह की दुश्मनी विदेशी मीडिया निकालता रहा है। पश्चिमी संरक्षकों का समर्थन पाने के लिए इस तरह की मनगढ़ंत बातें कुछ मीडियाकर्मी लंबे वक्त से करते रहे हैं।

इसके बाद जो सामने आया, उसने लोगों को और हैरान कर दिया। प्रांशु वर्मा ने अपने ट्वीट में अपने ब्यूरो की उन खबरों की गिनती भी कर दी जिन्हें वह चर्चित मानते हैं। उन्होंने उदाहरण के तौर पर भारतीय अरबपतियों पर की गई वे रिपोर्टें गिनाईं, जिनमें दावा किया गया था कि उनके साथ दूसरों की तुलना में बेहतर व्यवहार किया जाता है। इसके अलावा मोदी सरकार के दौर में कथित भाई-भतीजावाद से जुड़ी खबरें, भारतीय कंपनियों पर रूस-यूक्रेन युद्ध को परोक्ष रूप से बढ़ावा देने के आरोपों वाले लेख और भारत की घुसपैठ रोकने की कोशिशों को ‘मुसलमानों को बांग्लादेश भेजने का अभियान’ बताने वाली रिपोर्टें भी शामिल थीं।

ब्यूरो चीफ द्वारा भेजे गए हर लेख का एक मकसद साफ था। ना केवल बेजोस के सामने अपनी काबिलियत साबित करना नहीं बल्कि उस ‘ग्लोबल नजरिए’ के साथ वैचारिक जुड़ाव का संकेत देना जिसने वाशिंगटन पोस्ट की विदेशी रिपोर्टिंग को परिभाषित किया है।

वर्मा ने यह साफ कर दिया कि ‘द वॉशिंगटन पोस्ट’ में काम करने और वहाँ टिके रहने का एक तय तरीका है। वहाँ भारत पर रिपोर्टिंग का मतलब सिर्फ घटनाएँ बताना नहीं है बल्कि भारत को कटघरे में खड़ा करना भी है। भारत को एक ऐसे संप्रभु लोकतांत्रिक देश के रूप में नहीं देखा जाता जो जटिल समस्याओं से जूझ रहा हो बल्कि उसे शक की नजर से देखा जाता है। उसकी नीतियों और फैसलों को अक्सर दमन, बहुसंख्यकवाद और नैतिक चूक के फ्रेम में रखकर पेश किया जाता है।

जाली दस्तावेजों, सीमा घुसपैठ और कई मामलों में आपराधिक आरोपों से जुड़े अवैध रोहिंग्याओं के जबरन देश में आने को राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा नहीं माना जाता बल्कि इसे सांप्रदायिक उत्पीड़न अभियान का नाम दिया जाता है। अरबपति उदारीकरण की ओर बढ़ रही अर्थव्यवस्था में कारोबारी नहीं हैं, बल्कि सत्ताधारी भ्रष्टाचार का पर्याय बन गए हैं। कूटनीतिक तनाव भू-राजनीति नहीं बल्कि भारत की कथित नैतिक विफलताओं के कारण उत्पन्न ‘विघटन’ है।

इसीलिए वर्मा की दलील पत्रकारिता के बचाव के लिए नहीं है बल्कि खुद को बनाए रखने की कोशिश है। इसमें साफ पता चलता है कि देखो हम कितना नुकसान करते हैं। देखो हम किस तरह की बातें फैलाते हैं। यकीनन इसे बचाना जरूरी है।

ताजा मामला ‘द वॉशिंगटन पोस्ट’ पर छाए संकट के बारे में बहुत कुछ बताता है। पोस्ट के पुराने मीडिया रिपोर्टर पॉल फारही की रिपोर्ट के मुताबिक, अखबार स्टाफ में भारी कटौती की तैयारी कर रहा है, जिससे 300 लोगों की नौकरियाँ खत्म हो सकती हैं। इसका सबसे ज्यादा असर विदेशी डेस्क और स्पोर्ट्स डेस्क पर पड़ेगा। एडिटर्स ने कथित तौर पर चेतावनी दी है कि न्यूजरूम के आधे से ज्यादा लोगों को छँटनी का सामना करना पड़ सकता है। इससे पहले 2023 में करीब 240 लोगों को नौकरी से हटाया गया था।

ये छँटनी की वजह साफ है। एडवरटाइजिंग रेवेन्यू गिर गया है, सब्सक्रिप्शन रुक गए हैं और ग्लोबल जर्नलिज्म के लिए जो नैतिक दिखावा कभी होता था, वह अब बिलों का भुगतान नहीं कर रहा है। पढ़ने वाले ध्यान नहीं दे रहे हैं, इसलिए नहीं कि जवाबदेह रिपोर्टिंग का स्वागत नहीं किया जा रहा है, बल्कि इसलिए कि रिपोर्टिंग के रूप में लगातार ‘नैरेटिव एक्टिविज्म’ ने भरोसा खत्म कर दिया है।

वर्मा की बेजोस से सार्वजनिक अपील एक व्यापक और कुछ हद तक ‘बेशर्मी’ है। ब्यूरो चीफ और सीनियर एडिटर एक अरबपति मालिक से मेहरबानी की अपील करते हैं, साथ ही सत्ता से अपनी स्वतंत्रता का दावा करते हैं। यह एक ऐसी उलझन है जिसे #SaveThePost जैसे हैशटैग से दूर नहीं किया जा सकता।

अजीब बात है कि एक पत्रकार जो भारत सरकार पर प्रेस की आजादी को दबाने का आरोप लगाता है। उसका अपना पेशेवर भविष्य पूरी तरह से एक अमेरिकी उद्योगपति के विवेक पर निर्भर करता है। यह विडंबना ही है कि वर्मा अपने ब्यूरो की भारत के व्यापारिक समूहों पर पक्षपातपूर्ण रिपोर्टिंग का बखान करते हुए एक अमेरिकी व्यवसायी से अपनी नौकरी बचाने की गुहार लगा रहे थे।

हालाँकि, प्रॉब्लम यह नहीं है कि बेजोस घाटे में चल रहे डेस्क को फंडिंग देने में हिचकिचा रहे हैं। प्रॉब्लम यह है कि द वॉशिंगटन पोस्ट जैसे आउटलेट्स इस बात को समझ नहीं पा रहे हैं कि नफ़रत से भरी, सोच पर अड़ी रिपोर्टिंग अब एक टिकाऊ बिजनेस मॉडल नहीं है। इसी सोच की वजह से द वॉशिंगटन पोस्ट के लिए दुनिया भर में मुश्किलें बढ़ रही हैं। ये संस्थान ऐसी हालत में आ गया है कि अब उसे बने रहने के लिए बड़े पैमाने पर लोगों को निकालने के बारे में सोचना पड़ रहा है।

वर्मा का ट्वीट उनकी नौकरी बचाने के लिए था। अनजाने में ही इसने उस मानसिकता को उजागर कर दिया जिसने अमेरिका के सबसे प्रतिष्ठित समाचार पत्रों में से एक को पतन के कगार पर पहुँचा दिया है। यही कारण है कि न्यूजलॉन्ड्री, द वायर आदि जैसे अधिकांश भारतीय मीडिया संस्थान जो द पोस्ट की विचारधारा का अनुकरण करने की कोशिश कर रहे हैं, उन्हें भी इसी कारण से चंदा और सदस्यता के लिए लगातार अनुरोध करना पड़ता है।

चाहे वह कोई अमेरिकी प्रतिष्ठित समाचार पत्र हो या उसके भारतीय वैचारिक अनुकरणकर्ता, पाठकों ने उन मीडिया संगठनों से अपना समर्थन वापस लेना शुरू कर दिया है जो छद्म पत्रकारिता को ‘स्वतंत्र’ और ‘निष्पक्ष’ पत्रकारिता करते हैं।

(यह लेख अंग्रेजी में लिखा गया है। इसे मूल रूप में पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

व्यापार पर बात, ममता बनर्जी करने लगी ‘मुस्लिम वोट बैंक’ का बचाव: क्या हैं बंगाल CM के बयान के मायने, क्यों BJP नेता ने इसे बेलडांगा हिंसा से जोड़ा?

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने हाल ही में नबन्ना में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान उद्योगपतियों और बिजनेस लीडर्स को संबोधित किया। यह मंच बंगाल में निवेश, व्यापार और औद्योगिक विकास के माहौल पर बातचीत के लिए था। लेकिन इसी मंच से ममता बनर्जी ने अपनी मुस्लिम तुष्टीकरण की राजनीति के सबूत दिए।

कार्यक्रम को संबोधित कर अपने भाषण में ममता बनर्जी कहती हैं, “अगर हम 30 प्रतिशत समुदाय के आदमी से झगड़ा करें, तो वो रोज रोड अवरोध करेगा। आपकी कंपनी बंद कर देगा। हमारा जीना हराम कर देगा। हम चाहते हैं सब बराबर रहें। कोई किसी के मसलों में हस्तक्षेप न करे।”

ममता बनर्जी के बयान का यह वीडियो सोशल मीडिया पर खूब वायरल है। यह बयान ऐसे समय में आया है, जब कुछ ही दिन पहले बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले के बेलडांगा इलाके में मुस्लिम भीड़ ने बवाल मचाया था। भीड़ ने सड़क और रेलवे जाम किया, वाहनों में तोड़फोड़ और पत्थरबाजी की।

बीजेपी ने ममता बनर्जी के इस बयान को आड़े हाथों लेते हुए इसे बेलडांगा में हुई हिंसा से जोड़ा है। बीजेपी नेता अमित मालवीय ने कहा, “इस तरह मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने बेलडांगा में हुई हिंसा को उचित ठहराया और मूलरूप से यह कहा कि उनके वोट बैंक को पूरे प्रदेश में उत्पात मचाने का अधिकार है और वह कोई कार्रवाई नहीं करेंगी।”

मुस्लिमों को खुश करने के लिए ममता बनर्जी ने व्यापारिक मंच का किया उपयोग

बीजेपी ने इसे बेलडांगा से सिर्फ इसीलिए जोड़ा क्योंकि ममता बनर्जी का बयान और मकसद उसी कम्युनिटी के लोगों का बचाव करता हुआ दिखाई देता है, जिसने बेलडांगा की सड़कों पर उपद्रव मचाया था। मुख्यमंत्री ने अपने भाषण में भले ही किसी जगह या घटना का नाम न लिया हो, लेकिन शब्दों का चुनाव और समय अपने आप में बहुत कुछ कहता है।

यहाँ सवाल यह है ही नहीं कि ममता बनर्जी ने किसी घटना का नाम लिया या नहीं। सवाल यह है कि उन्होंने क्या कहा, किस मंच से कहा और किस संदर्भ में कहा? नबन्ना का मंच व्यापारियों के लिए था। वहाँ से संदेश यह जाना चाहिए था कि राज्य में विकास और व्यापार को कैसे आगे बढ़ाया जाए। लेकिन इसके बजाए बयान का फोकस इस बात पर रहा कि एक खास कम्युनिटी (मुस्लिमों) को नाराज करने का नतीजा क्या हो सकता है।

ममता बनर्जी ने यह नहीं कहा कि सड़क जाम करने गलत है। उन्होंने यह भी नहीं कहा कि जो कोई भी ऐसा करेगा, उसके खिलाफ कार्रवाई होगी। इसटे उलट वह ऐसा करने वाली मुस्लिम भीड़ का बचाव करते हुए इतने बड़े मंच से लोगों को उन उपद्रवियों से डरने का संदेश दे रही हैं।

ममता बनर्जी मुस्लिम वोटबैंक पर मंडराए खतरे को निपटाने की रणनीति

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी आगे कहती हैं कि सरकार चाहती है कि सब लोग अपनी-अपनी जिंदगी जिएँ, कोई किसी के मामलों में दखल न दे। यह वचन सुनने में काफी उदार लगते हैं। लेकिन जब इसे जमीनी हकीकत के साथ जोड़ा जाता है, तो कई असहज सवाल खड़े होते हैं। अगर सच में सबको बराबरी का अधिकार है तो बार-बार सड़क जाम और विरोध के जरिए हिंदुओं को दबाने की राजनीति बंगाल की पहचान क्यों बन गई है?

मुस्लिमों के क्राइम पर बराबरी की बात करने से ममता बनर्जी ने केवल उनके अपराधों को ढकने का काम किया है। मुस्लिम तुष्टीकरण में ममता बनर्जी इतना डूब चुकी हैं कि उन्हें मतलब ही नहीं है कि वो कौन-से मंच पर हैं? वो सिर्फ इस कोशिश में लगी हैं कि कहीं उनका मुस्लिम वोटबैंक हाथ से न निकल जाए। वैसे भी आगामी विधानसभा चुनावों में TMC पर मुस्लिम वोटबैंक खोने का खतरा मंडरा रहा है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, विधानसबा चुनाव 2026 में मुर्शिदाबाद में बाबरी मस्जिद की नींव रखवाने वाले TMC के बागी नेता हुमायूं कबीर TMC के खिलाफ मुस्लिम गठबंधन खड़ा करने जा रहे हैं। इस गठबंधन में प्रतिबंधित संगठन PFI का राजनीतिक दल SDPI से लेकर फुरफुरा शरीफ मस्जिद के राजनीतिक दल ISF शामिल होने जा रहा है। खबरें यह भी हैं कि कॉन्ग्रेस को भी गठबंधन में शामिल होने का न्योता मिला है।

तो अगर यह मुस्लिम गठबंधन बन भी जाता है, तो सबसे ज्यादा खतरा ममता बनर्जी की TMC को ही है, क्योंकि उनकी आधी राजनीति मुस्लिम तुष्टीकरण के ही भरोसे है। क्योंकि पिछले कई सालों में ममता बनर्जी की सरकार में हिंदुओं पर लगातार अत्याचार और हमले पर चुप्पी दर्ज कर उन्होंने अपना मुस्लिम वोटबैंक मजबूत किया है। पिछले साल 2025 में फुरफुरा शरीफ में इफ्तार पार्टी अटेंड करना भी इसी मुस्लिम वोटबैंक को खुश करना था। और आने वाले चुनावों में भी उनकी यही रणनीति है।

ममता बनर्जी की ‘बराबरी’ की बात और जमीनी हकीकत

अब बिजनेस लीडर्स के मंच से सामने आया ममता बनर्जी का यह बयान, भले ही मुख्यमंत्री इसे अलग संदर्भ में पेश कर रही हों, लेकिन यह सवाल छोड़ जाता है कि बंगाल में बार-बार सड़क जाम, दंगे और उपद्रव आखिर किसका काम है? बेलडांगा हो या इससे पहले सामने आई बाकी हिंसाओं की घटना हो, अक्सर दिखता रहा है कि विरोध के नाम पर कानून हाथ में लेने वाली भीड़ एक ही पहचान से जुड़ी होती है।

मुख्यमंत्री यह भी कहती हैं कि सबको अपनी इच्छा से जीने का अधिकार है और कोई किसी के मसलों में दखल न दे। लेकिन यह बात तब खोखली लगने लगती है, जब जमीनी हकीकत कुछ और कहती है। अगर सबको अपनी इच्छा से जीने का अधिकार है, तो फिर हिंदुओं को यह सलाह क्यों दी जाती है कि वे मुस्लिम बहुल इलाको में न जाएँ? क्यों हिंदू पलायन कर रहा है? क्यों ममता सरकार की पुलिस हिंदुओं को प्रदर्शन करने पर लाठियों से कूटती है? क्यों हिंदुओं के धार्मिक जुलूस पर पत्थरबाजी होती है?

संदेशखाली की घटनाओं के दौरान भी यही पैटर्न देखने को मिला। हिंदू पीड़ितों की शिकायतों पर गंभीरता से बात करने की बजाए ममता सरकार ने आरोपों का रुख RSS और BJP की ओर मोड़ दिया। इससे पता चलता है कि मुस्लिमों के क्राइम पर ममता बनर्जी की सरकार बराबरी की बात करती है, लेकिन हिंदुओं पर हुए अत्याचार को लेकर आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति करती है।

निष्कर्ष: ममता बनर्जी का दोहरा रवैया

देखा जाए तो ममता बनर्जी की राजनीति मुस्लिम तुष्टीकरण पर केंद्रित होकर रह गई है। जो वो बिजनेस लीडर्स के मंच से भी मुस्लिमों को खुश करने वाले बयान देने से खुद को नहीं रोक पा रही हैं। जब बेलडांगा में मुस्लिमों द्वारा सड़कों पर अवरोध और उपद्रव करने वाली मुस्लिम भीड़ को लेकर ‘बराबरी’ और ‘अधिकार’ की याद आ जाती है, वहीं हिंदुओं पर सालों से हो रहे अत्याचारों के मामलों में या तो आरोप दूसरों के सिर मढ़ दिए जाते हैं या फिर चुप्पी साध ली जाती है।

अंबेडकर, माधवी जाधव और नासिक की 26 जनवरी… वर्दी वाली का ये रोना-धोना लोकतंत्र के लिए शुभ नहीं

नासिक में महाराष्ट्र के मंत्री गिरीश महाजन के गणतंत्र दिवस भाषण में वन विभाग के एक अधिकारी द्वारा बाधा डालना, कोई भावनात्मक मामला नहीं है और न ही यह केवल डॉ. बी.आर. अंबेडकर के प्रति श्रद्धा का मुद्दा है। यह संस्थागत पतन का एक गंभीर मामला है। राज्य के पदाधिकारी संविधान के प्रति जवाबदेह होते हैं और उन्हें संवैधानिक पद पर बैठे नेताओं का सम्मान करने का आदेश होता है।

क्या थी घटना

गणतंत्र दिवस के अवसर पर राष्ट्रीय ध्वज फहराने के बाद गिरीश महाजन ने अपने आधिकारिक भाषण में डॉ. अंबेडकर का नाम नहीं लिया। यह चूक, चाहे जानबूझकर की गई हो या नहीं, वन विभाग की कर्मचारी माधवी जाधव ने पकड़ ली और भाषण के बीच में ही स्पष्टीकरण माँगा। पुलिस ने इस दौरान हस्तक्षेप किया, उन्हें कुछ समय के लिए हिरासत में लिया गया और मामला देखते ही देखते एक बड़े राजनीतिक विवाद में बदल गया।

महाजन ने बाद में स्पष्ट किया कि यह चूक अनजाने में हुई थी और उन्होंने माफी माँगी। उन्होंने कहा कि वे अपने भाषणों में नियमित रूप से अंबेडकर का जिक्र करते हैं और उनका मकसद अंबेडकर का अपमान करना नहीं था। सामान्य लोकतांत्रिक और नागरिक मानकों के अनुसार, यह मामला यहीं समाप्त हो जाना चाहिए था।

इसके बजाय यह एक साजिश के तहत गुस्से में बदल गया, जिसमें ‘अंबेडकर की पहचान मिटाने’ के आरोप लगे, एफआईआर दर्ज करने की माँग और राजनीतिक नेताओं द्वारा मंत्री को हटाने की माँग शामिल थी।

माधवी ने एक कदम आगे बढ़ते हुए घोषणा की कि गिरीश महाजन द्वारा किया गया तथाकथित ‘पाप’ इतना गंभीर था कि उन्हें माफ नहीं किया जा सकता। उन्होंने दावा किया कि आगामी महाकुंभ में पवित्र स्नान भी इसे धो नहीं पाएगा।

यह तनाव बहुत कुछ कहता है। यह न केवल महाकुंभ में स्नान करने की हिंदू संस्कारों के प्रति घोर अवमानना ​​को उजागर करता है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि किस प्रकार उपेक्षा को अब अपमान के हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है, और किस प्रकार राजनीतिक व्यवस्था के कुछ वर्गों ने अंबेडकर को एक ऐसे व्यक्ति में बदल दिया है जिनका आह्वान अब प्रतीकात्मक या श्रद्धापूर्ण नहीं, बल्कि अनिवार्य हो गया है।

भारत के इतिहास में शायद यह पहली बार है कि किसी नेता पर ‘अपमान’ का आरोप उसके कहे गए शब्दों के लिए नहीं, बल्कि उसके अनकहे शब्दों के लिए लगाया गया है।

खतरनाक है यह बदलाव

संविधान में ऐसा कोई प्रावधान, कानूनी आदेश या परंपरा नहीं है, जो गणतंत्र दिवस के प्रत्येक भाषण में डॉ. अंबेडकर के नाम को अनिवार्य कर दे। भाषण शपथ पत्र नहीं होते। वे जोर, संदर्भ और विषयवस्तु को दर्शाते हैं। कोई मंत्री राष्ट्रवाद, संघवाद, शिवाजी महाराज या समकालीन शासन के बारे में बात कर सकता है, वह किसी अहम व्यक्ति का नाम नहीं भी ले सकता है।

यदि ‘अपमान’ का मापदंड केवल उल्लेख न करने तक सीमित कर दिया जाए, तो कोई भी भाषण सुरक्षित नहीं रहेगा। हर भाषण को बाधित किया जा सकता है। हर मंत्री पर आरोप लगाया जा सकता है। हर चूक को दुर्भावना के रूप में पेश किया जा सकता है।

व्यक्तिगत शिकायत की आड़ में राजनीतिक सक्रियता

माधवी जाधव कोई आम नागरिक नहीं थीं जो असहमति व्यक्त कर रही हों। वह एक संवैधानिक समारोह में ड्यूटी पर तैनात सरकारी कर्मचारी थीं। सेवा नियम, प्रशासनिक अनुशासन और भारतीय राज्य की मूलभूत संरचना के अनुसार, नौकरशाहों और वर्दीधारी कर्मियों को आधिकारिक जिम्मेदारियों का निर्वहन करते समय राजनीतिक रूप से तटस्थ रहना आवश्यक है।

लोकतंत्र विरोधी नहीं, घोर अनुशासनहीनता

मंत्री के माफी माँग लेने के बावजूद उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की माँग की गई। इससे पता चलता है कि यह टकराव संवैधानिक मूल्यों को लेकर नहीं, भावनात्मक आवेश में उठाया गया।

इससे भी अधिक चिंताजनक बात उसकी प्रतिक्रिया थी। सियासत करने वालों ने माधवी के काम की तारीफ की अनुशासनहीनता को नजरअंदाज किया और कर्तव्य की अवहेलना करने के बावजूद उसे सराहा।

प्रोटोकॉल का पालन नहीं करने पर भी अधिकारी का विपक्षी नेताओं और कार्यकर्ताओं ने तारीफ की। मुंबई की कॉन्ग्रेस सांसद वर्षा गायकवाड़ ने कहा कि यह ‘हर स्वाभिमानी मराठी मानुष की आवाज’ है।

कॉन्ग्रेस नेता शमा मोहम्मद ने वन अधिकारी को ‘बहादुर’ बताया और संविधान के निर्माता का कथित तौर पर अपमान करने के आरोप में महाजन को तुरंत बर्खास्त करने की माँग की।

कॉन्ग्रेस का समर्थन करनेवाले सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर वन अधिकारी की तारीफ की और उन्हें सलाम किया।

जब राजनीतिज्ञ ड्यूटी पर तैनात अधिकारियों की अनुशासनहीनता का सार्वजनिक रूप से समर्थन करते हैं, तो वे वैचारिक टकराव को पुरस्कृत कर रहे होते हैं, दंडित नहीं। सरकारी कर्मचारियों से उम्मीद की जाती है कि वे निष्पक्ष रहें, लेकिन यहाँ मामला उल्टा हो गया।

संस्थाएँ होती हैं कमजोर

अंबेडकर की आलोचना, अनदेखी और पूजनीय बनाना एक और चिंताजनक पहलू है। ऐसा तब है जब डॉ. अंबेडकर स्वयं नायक पूजा के प्रबल आलोचक थे। संविधान सभा में अपने अंतिम भाषण में उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा, “धर्म में भक्ति, आत्मा की मुक्ति का मार्ग हो सकती है। लेकिन राजनीति में भक्ति या नायक पूजा तानाशाही की ओर ले जाने वाला निश्चित मार्ग है।”

लेकिन आज, उनके नाम पर काम करने का दावा करने वाले कई लोगों ने उन्हें नायक बना दिया है, जिसके खिलाफ वे खुद थे। एक ऐसा प्रतीक जिसका नाम लेना अनिवार्य किया जाना चाहिए। इसके बिना ये ईशनिंदा माना जाएगा।

यह श्रद्धांजलि नहीं, साधन के रूप में उपयोग है

सबसे अहम बात यह है कि ऐसे काम स्वतंत्र राजनीतिक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को सीमित कर देता है। हमारा संविधान प्रत्येक नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की गारंटी देता है। अंबेडकर का उल्लेख न करना कोई अपराध नहीं है। यह कदाचार भी नहीं है। गणतंत्र दिवस के भाषण में किसी भी विषय पर बात की जा सकती है और इसके लिए किसी निर्धारित वैचारिक ढाँचे का पालन करना अनिवार्य नहीं है।

यदि कल कोई मंत्री जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल, सावरकर, नेताजी सुभाष चंद्र बोस या किसी अन्य ऐतिहासिक व्यक्ति का नाम छोड़ दे, तो क्या इससे भी व्यवधान उत्पन्न करना उचित होगा? भारत के स्वतंत्रता संग्राम और संवैधानिक यात्रा में सदियों से अनगिनत योगदानकर्ताओं का हाथ रहा है। कोई भी भाषण उन सभी का नाम नहीं ले सकता, और न ही इसकी अपेक्षा की जानी चाहिए।

भाषण को लेकर गुस्से की निरर्थकता को इस बात से भी समझी जा सकती है कि स्वतंत्रता के बाद से, प्रधानमंत्रियों, मुख्यमंत्रियों या यहाँ तक कि कुछ प्रमुख हस्तियों ने गणतंत्र दिवस और स्वतंत्रता दिवस पर सैकड़ों भाषण दिए हैं। किसी को भी कभी भी सभी स्वतंत्रता सेनानियों या संविधान निर्माताओं के नाम गिनाने के लिए बाध्य नहीं किया गया है। किसी पर भी भगत सिंह, विवेकानंद या अंबेडकर का ‘अपमान’ करने का आरोप नहीं लगाया गया है, सिर्फ इसलिए कि उनके नाम किसी विशेष भाषण में नहीं लिए गए।

तो फिर यह अपवाद क्यों?

इसका उत्तर सिद्धांतों में नहीं, राजनीति में निहित है।

सीआईएसएफ अधिकारी ने कंगना रनौत पर हमला किया

नासिक की घटना कोई छोटी बात नहीं है। यह दिखाता है कि नौकरशाही और वर्दीधारी सेवाओं का राजनीतिकरण कितना हुआ और लगातार होता ही जा रहा है। हाल में सबसे चर्चित उदाहरण 2024 की वह घटना है, जब सीआईएसएफ अधिकारी कुलविंदर कौर ने कथित तौर पर हवाई अड्डे पर सांसद कंगना रनौत को थप्पड़ मारा था। कौर ने बाद में रनौत की किसान विरोध प्रदर्शनों पर की गई टिप्पणियों का हवाला देकर अपने कृत्य को सही ठहराया था।

कुलविदर का थप्पड़ मारना सुरक्षा और प्रोटोकॉल दोनों का ही उल्लंघन था। लेकिन इसके बाद जो हुआ वह और भी चिंताजनक था। कौर को निलंबित और स्थानांतरित कर दिया गया, लेकिन संस्थागत स्तर पर इसकी कोई कड़ी निंदा नहीं हुई। इसके बजाय, सार्वजनिक हस्तियों ने खुलेआम हमले को ‘सामान्य’ बताया। संगीतकार विशाल ददलानी ने तो कार्रवाई होने पर उन्हें नौकरी दिलाने का भी प्रस्ताव रखा। राजनीतिक समर्थकों ने उनके आचरण को विरोध का साहसी आवाज कहा।

इससे जो संदेश गया वह यह था कि यदि राजनीतिक विचार से सहमत न हो तो राजनीतिज्ञों का विरोध करने का अधिकार ड्यूटी पर तैनात अधिकारियों को भी है, लेकिन ये कैसे हो सकता है?

नासिक की घटना इसी तर्क को पुष्ट करती है। अधिकारी को साहसी के रूप में चित्रित किया गया है। मंत्री, माफी माँगने के बावजूद दोषी के रूप में पेश किए जाते हैं, क्योंकि वे भाजपा से हैं। यह प्रधानमंत्री मोदी की पार्टी है। इसलिए कॉन्ग्रेस समर्थकों का वह निशाना बनते हैं। अनुशासन को दमन के रूप में देखा जाता है। तटस्थता को नैतिक कायरता बताकर खारिज कर दिया जाता है।

बरेली के मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री ने यूजीसी के नए नियमों के विरोध में इस्तीफा दे दिया। गणतंत्र दिवस पर बरेली नगर मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री के इस्तीफे ने इस प्रवृत्ति को और भी स्पष्ट कर दिया है। हालाँकि इस्तीफा देना एक व्यक्तिगत अधिकार है, लेकिन अग्निहोत्री द्वारा अपने इस्तीफे को सरकारी नीतियों के खिलाफ राजनीतिक विरोध के रूप में पेश करना एक बार फिर प्रशासन और राजनीति के बीच की रेखा को धुँधला करता है।

संवैधानिक लोकतंत्र के लिए निष्पक्ष प्रशासन जरूरी

सरकारी और प्रशासनिक सेवा में शामिल व्यक्ति पर निष्पक्ष होने की जिम्मेदारी है। वो किसी संगठन का हिस्सा नहीं बन सकते। उनकी तटस्थता ही देश और समाज के लिए जरूरी है। एक बार जब अधिकारी स्वयं को निर्णायक समझने लगते हैं और व्यक्तिगत या वैचारिक विश्वास के आधार पर निर्वाचित प्रतिनिधियों का विरोध करने के लिए सशक्त हो जाते हैं, तो सत्ता की श्रृंखला टूटती है।

आज अंबेडकर का नाम नहीं लेने पर सरकारी अधिकारी को शिकायत है। कल जाति, धर्म, भाषा, आरक्षण नीति या आस्था भी इसका कारण हो सकती है। यदि हर अधिकारी को लगता है कि उसे ड्यूटी के दौरान व्यवधान डालने, नाटकीय ढंग से इस्तीफा देने या राजनेताओं के साथ दुर्व्यवहार करने का अधिकार है, तो शासन व्यवस्था ठप्प हो जाएगी।

गणतंत्र दिवस केवल संविधान को अपनाने और मानने का ही दिन नहीं है, बल्कि संवैधानिक व्यवस्था, संयम, प्रक्रिया, संस्थागत सीमाओं और भूमिकाओं के प्रति सम्मान का भी दिन है। नासिक की घटना में इन सभी सिद्धांतों का उल्लंघन किया।

कर्तव्य के दौरान राजनीतिक सक्रियता साहस नहीं है। यह कर्तव्य का उल्लंघन है। और जब ऐसे उल्लंघन को सराहा जाता है, प्रोत्साहित किया जाता है और उसका राजनीतिकरण किया जाता है, तो यह अपवाद नहीं रह जाता, बल्कि एक संक्रामक रोग बन जाता है।

(यह लेख अंग्रेजी में लिखा गया है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ लिंक करें)

होमी भाभा-संजय गाँधी से जनरल रावत और अजित पवार तक: 1965 से 2026 तक का वो खौफनाक इतिहास, जब हवाई दुर्घटनाओं में दिग्गजों ने गँवाई जान

महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री अजित पवार का बुधवार (28 जनवरी 2026) सुबह बारामती में एक विमान हादसे में दुखद निधन हो गया। मुंबई से उड़ान भरने के बाद लैंडिंग के दौरान उनका चार्टर्ड प्लेन अनियंत्रित होकर खेतों में जा गिरा और धू-धू कर जल उठा। इस हादसे ने न केवल महाराष्ट्र बल्कि पूरे देश को हिला कर रख दिया है। अजित पवार अकेले ऐसे नेता नहीं हैं, भारतीय राजनीति का इतिहास ऐसे कई काले पन्नों से भरा है जब ‘आसमानी सफर’ ने देश के कई राजनेताओं को हमेशा के लिए खामोश कर दिया।

जब सरहद पर पाकिस्तानी हमले का शिकार हुआ गुजरात के मुख्यमंत्री का विमान

19 सितंबर 1965 की वह शाम भारतीय इतिहास के सबसे दर्दनाक पन्नों में से एक है, जब गुजरात के दूसरे मुख्यमंत्री बलवंतराय मेहता का विमान पाकिस्तानी वायु फौज ने बीच हवा में मार गिराया था। भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान मेहता अपनी पत्नी सरोजबेन, तीन स्टाफ सदस्यों और एक पत्रकार के साथ कच्छ सीमा के दौरे पर थे। जैसे ही उनका विमान मीठापुर से उड़ा, पाकिस्तानी फाइटर जेट के पायलट कैश हुसैन ने उसे घेर लिया।

विमान उड़ा रहे रिटायर्ड पायलट जहाँगीर इंजीनियर ने विंग्स हिलाकर दया का संकेत भी दिया, लेकिन पाकिस्तानी फौज के आदेश पर महज 100 मीटर की ऊँचाई पर विमान को मिसाइल से नेस्तनाबूद कर दिया गया। इस कायराना हमले में मुख्यमंत्री और उनकी पत्नी समेत विमान में सवार सभी 8 लोगों की मौके पर ही मौत हो गई। यह देश के लोकतांत्रिक इतिहास की पहली और इकलौती घटना थी, जब युद्ध के दौरान किसी मुख्यमंत्री के नागरिक विमान को निशाना बनाया गया।

आल्प्स की पहाड़ियों में दफन हुआ भारत का ‘परमाणु सपना’

24 जनवरी 1966 की वह सर्द सुबह भारत के लिए एक ऐसी त्रासदी लेकर आई, जिसने देश के वैज्ञानिक भविष्य की नींव हिला दी। भारतीय परमाणु कार्यक्रम के जनक और महान वैज्ञानिक होमी जहाँगीर भाभा एयर इंडिया के विमान ‘कंचनजंघा’ से जिनेवा जा रहे थे, तभी फ्रेंच आल्प्स की माउंट ब्लांक चोटियों से टकराकर उनका विमान दुर्घटनाग्रस्त हो गया। इस खौफनाक हादसे में भाभा समेत सभी 117 लोगों की मौत हो गई। हालाँकि, आधिकारिक रिपोर्ट ने इसे नेविगेशनल गलती बताया, लेकिन महज 18 महीने में परमाणु बम बनाने का दावा करने वाले भाभा की मौत पर आज भी साजिश के बादल मंडराते हैं। कई थ्योरीज दावा करती हैं कि भारत की परमाणु शक्ति को रोकने के लिए सीआईए (CIA) ने विमान में बम लगाया था। ताशकंद में लाल बहादुर शास्त्री के निधन के महज दो हफ्ते बाद हुई इस घटना ने पूरे राष्ट्र को एक गहरे शून्य में धकेल दिया था।

संजय गाँधी की वो आखिरी उड़ान: रोमांच जब बन गया काल

अजित पवार के प्लेन क्रैश ने आज पूरे देश को 46 साल पुराने उस मंजर की याद दिला दी, जिसने इंदिरा गाँधी के लाडले संजय गाँधी को हमेशा के लिए खामोश कर दिया था। 23 जून 1980 की वो सुबह दिल्ली के सफदरजंग एयरपोर्ट पर आम दिनों जैसी ही थी, जब 33 साल के तेजतर्रार नेता संजय गाँधी अपने नए ‘पिट्स एस-2ए’ विमान में सवार हुए। इंदिरा गाँधी के उत्तराधिकारी माने जाने वाले संजय गाँधी अपनी बेबाक शैली और युवाओं में जबरदस्त पैठ के लिए जाने जाते थे। उस दिन वे काफी उत्साहित थे और सुबह करीब 8 बजे अपने प्रशिक्षक सुभाष सक्सेना के साथ हवा में कलाबाजियाँ दिखाने के लिए उड़ान भरी।

अगले 11 मिनट तक आसमान में रोमांच का खेल चलता रहा। विमान कभी गोते लगाता तो कभी अचानक ऊँचाई छूता। लेकिन 12वें मिनट में जैसे ही संजय गाँधी ने खतरनाक करतब दिखाने के लिए विमान को नीचे झुकाया, अचानक इंजन बंद हो गया। देखते ही देखते विमान जमीन पर आ गिरा और सब कुछ खत्म हो गया। जब प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी अस्पताल पहुँचीं और बेटे का बेजान शरीर देखा तो वे फफक कर रो पड़ीं। उस एक हादसे ने न केवल एक माँ की गोद सूनी की, बल्कि देश की राजनीति का रुख भी हमेशा के लिए बदल दिया।

माधवराव सिंधिया: नियति का वो क्रूर फैसला और ग्वालियर का ‘काला रविवार’

30 सितंबर 2001 की वह सुबह ग्वालियर के लिए किसी आम दिन जैसी ही शुरू हुई थी, लेकिन दोपहर होते-होते आसमान से आई एक खबर ने पूरे देश को सन्न कर दिया। कॉन्ग्रेस के दिग्गज नेता और ग्वालियर के ‘महाराज’ माधवराव सिंधिया को उस दिन वास्तव में कानपुर की एक रैली में नहीं जाना था, लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। दिल्ली की तत्कालीन मुख्यमंत्री शीला दीक्षित की तबीयत खराब होने के कारण सिंधिया जी ने उनके स्थान पर रैली में जाने का फैसला किया। उन्होंने सुबह फोन पर अपने करीबियों से कहा था कि शाम को लौटकर मीटिंग करेंगे, पर वह शाम कभी नहीं आई। उत्तर प्रदेश के मैनपुरी जिले के करहल में भारी बारिश के बीच उनका निजी ‘सेसना’ विमान आग का गोला बनकर खेतों में जा गिरा।

जैसे ही यह खबर फैली कि विमान में माधवराव सिंधिया सवार थे, ग्वालियर से लेकर दिल्ली तक हड़कंप मच गया। ग्वालियर की सड़कों पर सन्नाटा पसर गया और हजारों लोग बदहवास होकर ‘जयविलास पैलेस’ की ओर दौड़ पड़े। शहर के 90 फीसदी घरों में उस शाम चूल्हा नहीं जला था। हर आँख नम थी और हर दिल अपने लाडले नेता के लिए दुआ कर रहा था। उनकी अंतिम यात्रा में जनसैलाब का वो मंजर ऐतिहासिक था। प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने पूरी संसद को एक विमान से ग्वालियर लाने का फैसला किया था। महात्मा गाँधी के बाद यह देश का पहला ऐसा शोक जलसा था, जहाँ किसी गैर-पदेन नेता के लिए लाखों लोग बिलख-बिलख कर सड़कों पर उतर आए थे।

जीएमसी बालयोगी: लोकसभा के वो ‘सबसे युवा’ अध्यक्ष जिनका सफर तालाब में थम गया

गंती मोहन चंद्र बालयोगी भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में एक ऐसा नाम हैं, जिन्होंने महज 51 साल की उम्र में अपनी एक अमिट छाप छोड़ी। वे लोकसभा के सबसे युवा और पहले दलित अध्यक्ष थे, जिन्हें उनकी शालीनता और कठिन परिस्थितियों में भी शांत रहने के लिए जाना जाता था। एक वकील और मजिस्ट्रेट से अपना करियर शुरू करने वाले बालयोगी ने संसद की गरिमा बनाए रखने के लिए कई कड़े सुधार किए। उन्होंने ही सबसे पहले सदन के ‘वेल’ में हंगामा करने वाले सांसदों के स्वतः निलंबन का नियम बनाया और सांसदों के लिए आचार संहिता लागू की। साल 2001 के संसद हमले के बाद सुरक्षा पुख्ता करने में भी उनकी भूमिका अहम रही थी।

3 मार्च 2002 की वह सुबह उनके जीवन की आखिरी सुबह साबित हुई। आंध्र प्रदेश के कृष्णा जिले में सफर के दौरान उनका ‘बेल 206’ हेलीकॉप्टर तकनीकी खराबी और घने कोहरे का शिकार हो गया। पायलट को धुँध के कारण रास्ता नहीं दिखा और उसने जमीन समझकर हेलीकॉप्टर को एक तालाब में उतारने की कोशिश की, जिससे यह भयानक हादसा हो गया। इस क्रैश में बालयोगी समेत उनके सुरक्षा अधिकारी और पायलट की मौके पर ही मौत हो गई। उनकी लोकप्रियता इतनी थी कि उनके अंतिम दर्शन के लिए पार्थिव शरीर को विजयवाड़ा, हैदराबाद और दिल्ली ले जाया गया, जहाँ हजारों लोगों ने नम आँखों से अपने प्रिय ‘शांतिदूत’ को विदाई दी।

सहारनपुर के आसमान में थमी ओपी जिंदल और सुरेंद्र सिंह की धड़कनें

31 मार्च 2005 की वह दोपहर हरियाणा की राजनीति के लिए एक काला साया लेकर आई, जब सहारनपुर के पास हुए एक हेलिकॉप्टर क्रैश में दिग्गज बिजनेसमैन और तत्कालीन ऊर्जा मंत्री ओम प्रकाश जिंदल का निधन हो गया। वे चंडीगढ़ से दिल्ली जा रहे थे, तभी अचानक हेलिकॉप्टर के इंजन में खराबी आ गई। इस भयानक हादसे में जिंदल के साथ हरियाणा के कृषि मंत्री चौधरी सुरेंद्र सिंह और पायलट कर्नल टीएस चौहान की भी मौके पर ही मौत हो गई।

प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक, हेलिकॉप्टर के गिरते समय सुरेंद्र सिंह को दिल का दौरा पड़ा था, जबकि ओपी जिंदल का सिर खिड़की से टकराने की वजह से उन्हें जानलेवा चोट आई। इस दुर्घटना ने पूरे देश को स्तब्ध कर दिया था क्योंकि जिस हेलिकॉप्टर ने यह गोता खाया था, वह बिल्कुल नया था।

वाई एस राजशेखर रेड्डी: पहाड़ियों में खो गया आंध्र का नायक

2 सितंबर 2009 की वह सुबह आंध्र प्रदेश के लिए किसी काल से कम नहीं थी। मुख्यमंत्री वाईएस राजशेखर रेड्डी (YSR) अपने ड्रीम प्रोजेक्ट ‘प्रजापथम’ के लिए चित्तूर जिले की ओर निकले थे। सुबह 8:38 बजे जब उनके बेल-430 हेलीकॉप्टर ने हैदराबाद के बेगमपेट एयरपोर्ट से उड़ान भरी तो किसी ने नहीं सोचा था कि यह उनकी आखिरी यात्रा होगी। करीब एक घंटे बाद, जब हेलीकॉप्टर नल्लामाला के घने और खतरनाक जंगलों के ऊपर से गुजर रहा था, अचानक ATS से उसका संपर्क टूट गया। पूरा सरकारी अमला और सुरक्षा एजेंसियाँ सन्न रह गईं। बारिश इतनी तेज थी कि घंटों तक कुछ पता नहीं चला और अफवाहें उड़ने लगीं कि कहीं नक्सलियों ने मुख्यमंत्री का अपहरण तो नहीं कर लिया?

अगले 24 घंटे तक पूरा देश साँसें थामकर टीवी स्क्रीन पर नजरें गड़ाए रहा। तलाशी अभियान में सेना के सुखोई विमान, इसरो के सैटेलाइट और थर्मल इमेजिंग की मदद ली गई। अगले दिन सुबह करीब 9:20 बजे वायुसेना को ‘पसुरुतला’ पहाड़ियों (पिजन हिल के सामने) पर हेलीकॉप्टर का मलबा दिखा। जब राहतकर्मी और मीडिया की टीमें वहाँ पहुँचीं, तो मंजर खौफनाक था। हेलीकॉप्टर के टुकड़े पाँच एकड़ में बिखरे थे और इंजन जलकर खाक हो चुका था।

डीजीसीए (DGCA) की जाँच में खुलासा हुआ कि यह कोई साजिश नहीं, बल्कि एक तकनीकी चूक और पायलट की गलती थी। रिपोर्ट के मुताबिक, हेलीकॉप्टर के गियरबॉक्स में खराबी आ गई थी और उसे ठीक करने के चक्कर में पायलटों ने नियंत्रण खो दिया। साथ ही, उड़ान से पहले जरूरी सुरक्षा जाँच भी पूरी नहीं की गई थी।

तवांग की पहाड़ियों में खो गए दोरजी खांडू, पाँच दिन बाद मिला मलबा

30 अप्रैल 2011 की सुबह अरुणाचल प्रदेश के लिए एक काले साये की तरह आई, जब मुख्यमंत्री दोरजी खांडू का पवन हंस हेलीकॉप्टर तवांग से ईटानगर जाते समय रहस्यमयी तरीके से लापता हो गया। उड़ान भरने के महज 20 मिनट बाद, 13,000 फीट ऊँचे सेला दर्रे के पास पहुँचते ही एटीसी से उनका संपर्क टूट गया। अगले पाँच दिनों तक पूरा देश और राज्य सरकार गहरी चिंता में रही, क्योंकि खराब मौसम और भारी बर्फबारी के बीच भारतीय वायु सेना के सुखोई विमान और इसरो के सैटेलाइट भी मलबे का सटीक पता नहीं लगा पा रहे थे।

आखिरकार, बुधवार सुबह चीन सीमा के पास लुगुथांग गाँव के लोगों ने मलबे की सूचना दी, जहाँ मुख्यमंत्री का निर्जीव शरीर और दुर्घटनाग्रस्त हेलीकॉप्टर के अवशेष मिले थे। इस दिल दहला देने वाले हादसे में मुख्यमंत्री के साथ सवार चार अन्य लोगों की भी दुखद मौत हो गई थी।

जनरल बिपिन रावत: कुन्नूर की पहाड़ियों में थम गई देश के पहले ‘चीफ’ की सांसें

8 दिसंबर 2021 का वो काला दिन भारत कभी नहीं भूल सकता, जब तमिलनाडु के कुन्नूर की पहाड़ियों में हुए एक दर्दनाक हेलीकॉप्टर हादसे ने देश के पहले चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (CDS) जनरल बिपिन रावत को छीन लिया। जनरल रावत अपनी पत्नी मधुलिका रावत और 11 अन्य सैन्य कर्मियों के साथ Mi-17 V5 चॉपर में सवार होकर वेलिंगटन जा रहे थे। रक्षा मंत्रालय की हालिया रिपोर्ट और जाँच से साफ हुआ है कि यह हादसा किसी तकनीकी खराबी या साजिश का नतीजा नहीं था, बल्कि अचानक बदले मौसम और घने बादलों की वजह से हुई ‘पायलट की चूक’ (ह्यूमन एरर) थी। चश्मदीदों ने बताया कि विमान तेजी से पेड़ों से टकराया और पल भर में आग के गोले में तब्दील हो गया।

हैरानी की बात यह है कि जनरल रावत के हेलीकॉप्टर को ‘मास्टर ग्रीन’ कैटेगरी का क्रू उड़ा रहा था, जो सबसे कम विजिबिलिटी में भी विमान संभालने में माहिर माने जाते हैं। 16 मार्च 1958 को जन्मे जनरल रावत का सैन्य सफर 1978 में गोरखा राइफल्स से शुरू हुआ था और अपनी काबिलियत के दम पर वे भारतीय सेना के प्रमुख और फिर देश के पहले सीडीएस बने। 18वीं लोकसभा की स्थायी समिति की रिपोर्ट के अनुसार, 2017 से 2022 के बीच वायुसेना के जो 34 हादसे हुए, उनमें कुन्नूर का यह क्रैश सबसे ज्यादा झकझोर देने वाला था। इस एक दुर्घटना ने न केवल एक जांबाज योद्धा को खो दिया, बल्कि भारतीय सैन्य नेतृत्व में एक ऐसा शून्य पैदा कर दिया जिसे भरना नामुमकिन है।

लंदन की उड़ान बनी आखिरी सफर, विमान हादसे में विजय रूपाणी का निधन

12 जून 2025 की वो तारीख गुजरात के इतिहास में एक काले अध्याय के रूप में दर्ज हो गई, जब सूबे के पूर्व मुख्यमंत्री विजय रूपाणी एक भीषण विमान हादसे का शिकार हो गए। वे अहमदाबाद एयरपोर्ट से एयर इंडिया की फ्लाइट के जरिए अपनी बेटी से मिलने लंदन जा रहे थे। चश्मदीदों के मुताबिक, टेक-ऑफ के कुछ ही देर बाद विमान अपना संतुलन खो बैठा और एक भयावह दुर्घटना का शिकार हो गया। इस रूह कँपा देने वाले हादसे में विजय रूपाणी समेत विमान में सवार सभी 241 यात्रियों की मौत हो गई। उनकी पहचान करना इतना मुश्किल था कि हादसे के कई दिनों बाद DNA मिलान के जरिए उनके निधन की आधिकारिक पुष्टि हो सकी।

राजकोट में हुए उनके अंतिम संस्कार में जनसैलाब उमड़ पड़ा, जहाँ हजारों लोगों ने अपने प्रिय नेता को नम आँखों से अंतिम विदाई दी। 21 तोपों की सलामी के बीच जब विजय रूपाणी का पार्थिव शरीर पंचतत्व में विलीन हुआ, तो पूरा शहर शोक की लहर में डूबा था। गुजरात ने अपना एक सादगी पसंद और मिलनसार नेता एक ऐसी आसमानी आफत में खो दिया, जिसकी भरपाई कभी नहीं हो सकेगी।

भीषण धमाके, आग की लपटें और सब खाक: अजित पवार के विमान हादसे की आँखों देखी, शोक और शंकाओं के बीच जाँच शुरू

महाराष्ट्र के लिए बुधवार (28 जनवरी 2026) का दिन एक दर्दनाक और स्तब्ध कर देने वाली घटना लेकर आया। महाराष्ट्र के उप-मुख्यमंत्री अजित पवार की विमान हादसे में मौत की खबर ने देशभर में लोगों को स्तब्ध कर दिया। मुंबई से बारामती जाते समय जिस विमान में वह सवार थे, वह लैंडिंग के दौरान दुर्घटनाग्रस्त हो गया। खेतों में गिरे इस विमान में गिरते ही आग लग गई और कुछ ही पलों में वह पूरी तरह जलकर खाक हो गया। इस हादसे में विमान में सवार सभी 5 लोगों की मौत हो गई।

मुंबई से बारामती जा रहे थे अजित पवार

बुधवार को महाराष्ट्र के अजित पवार मुंबई से बारामती के लिए रवाना हुए थे। बारामती पहुँचकर उन्हें चुनाव प्रचार से जुड़े 4-5 कार्यक्रमों में शामिल होना था और जनसभाओं को संबोधित करना था। इसी सिलसिले में उन्होंने चार्टर विमान से यात्रा की थी। यह विमान बारामती एयरपोर्ट पर लैंडिंग की तैयारी में था लेकिन हवाई पट्टी तक पहुँचने से पहले ही हादसे का शिकार हो गया। बताया जा रहा है कि दुर्घटना स्थल रनवे से करीब तीन किलोमीटर पहले का इलाका था, जो खेतों और ग्रामीण क्षेत्र से घिरा हुआ है।

लैंडिंग के दौरान बिगड़ा संतुलन

प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, विमान जैसे ही नीचे उतरना शुरू हुआ, उसी दौरान उसका संतुलन बिगड़ता नजर आया। स्थानीय लोगों ने बताया कि विमान लैंडिंग की कोशिश में लड़खड़ा रहा था और कुछ सेकंड तक ऐसा लग रहा था कि वह सुरक्षित उतर जाएगा लेकिन पल भर में स्थिति बदल गई। देखते ही देखते विमान हवाई पट्टी से भटक गया और पास के खेतों की ओर जा गिरा। गिरते ही तेज आवाज हुई और आग की लपटें उठने लगीं।

लैंडिंग की दूसरी कोशिश में हादसा

लाइव फ्लाइट ट्रैकिंग प्लेटफॉर्म Flightradar24 से मिले डेटा के मुताबिक, दुर्घटनाग्रस्त लियरजेट 45 (VT-SSK) विमान बारामती एयरपोर्ट पर उतरने की दूसरी कोशिश कर रहा था। जानकारी के अनुसार, पायलट ने पहली बार लैंडिंग का प्रयास किया लेकिन किसी कारणवश वह सफल नहीं हो सका। इसके बाद विमान को दोबारा ऊंचाई पर ले जाकर रनवे पर उतारने की कोशिश की गई। एविएशन की भाषा में इस प्रक्रिया को गो-अराउंड कहा जाता है। दुर्भाग्यवश, दूसरी कोशिश के दौरान विमान नियंत्रण खो बैठा और जमीन पर गिर गया, जिससे यह हादसा हो गया।

Flightradar24 का डेटा

विमान क्रैश के बाद हुए 4-5 धमाके

हादसे के चश्मदीदों का कहना है कि विमान जमीन से टकराते ही उसमें आग लग गई। खेतों में गिरते ही विमान पूरी तरह आग की चपेट में आ गया। चारों ओर धुआँ फैल गया और कुछ ही क्षणों में आग ने विकराल रूप ले लिया। मलबे से उठती लपटें और तेज धमाकों की आवाज सुनकर आसपास के गाँवों से लोग मौके की ओर दौड़ पड़े।

प्रत्यक्षदर्शियों ने बताया कि विमान के क्रैश होने के तुरंत बाद 4-5 जोरदार धमाके हुए। हादसे के बाद विमान आग का गोला बन गया और लगातार विस्फोटों की आवाज आती रही। लोगों का कहना है कि धमाकों के कारण कोई भी व्यक्ति विमान के नजदीक जाने की हिम्मत नहीं जुटा पाया। आग की लपटें इतनी ऊँची थीं कि दूर से ही यह साफ नजर आ रहा था कि विमान पूरी तरह नष्ट हो चुका है।

प्रत्यक्षदर्शियों ने क्या बताया?

मौके पर मौजूद एक प्रत्यक्षदर्शी ने बताया कि उसने अपनी आँखों से विमान को नीचे आते देखा। उसके अनुसार, विमान जब उतर रहा था तो ऐसा लग रहा था कि वह किसी भी क्षण गिर सकता है। कुछ ही सेकंड में वही हुआ और विमान खेतों की ओर जा गिरा। पहले किसी को अंदाजा नहीं था कि यह किसका विमान है। लोगों को लगा कि पास मौजूद पायलट ट्रेनिंग सेंटर का कोई विमान होगा। बाद में जानकारी मिली कि यह विमान महाराष्ट्र के वरिष्ठ नेता को लेकर आ रहा था। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, विमान गिरने से पहले काफी अस्थिर दिखाई दे रहा था और फिर करीब 200 फीट गहरी खाई की ओर जा गिरा। इसके बाद विस्फोट हुए और आग तेजी से फैल गई।

आग के कारण नहीं हो सकी मदद

हादसे के तुरंत बाद स्थानीय लोग मदद के लिए मौके पर पहुँचे। लोगों ने विमान से यात्रियों को बाहर निकालने की कोशिश भी की लेकिन आग इतनी तेज थी कि कोई भी पास नहीं जा सका। प्रत्यक्षदर्शियों ने बताया कि आग और धमाकों के कारण हालात बेहद भयावह थे। कई लोगों की आँखों के सामने यह हादसा हुआ और वे चाहकर भी कुछ नहीं कर सके। घटनास्थल पर अफरा-तफरी मच गई और कुछ ही देर में वहाँ भीड़ जमा हो गई।

उस विमान की कहानी जिसमें सवार थे अजित पवार

जिस विमान में अजित पवार सवार थे, वह VSR वेंचर्स प्राइवेट लिमिटेड द्वारा संचालित और VT-SSK के रूप में पंजीकृत Learjet 45XR था। यह कंपनी भारत की प्रमुख नॉन-शेड्यूल्ड यानी चार्टर विमान ऑपरेटिंग कंपनियों में से एक है। Learjet 45XR एक हाई-परफॉर्मेंस सुपर-लाइट बिजनेस जेट है, जिसे तेज रफ्तार, बेहतर फ्यूल एफिशिएंसी और ऊंचाई पर उड़ान भरने की क्षमता के लिए जाना जाता है। यह विमान आमतौर पर शॉर्ट और मीडियम रूट्स की उड़ानों के लिए इस्तेमाल किया जाता है।

Learjet 45XR का विंगस्पैन करीब 47 फीट बताया जाता है और इसका वजन लगभग 9,752 किलोग्राम है। यह विमान 1990 के दशक में डिजाइन किया गया था और इसे सुपर-लाइट बिजनेस जेट कैटेगरी में Cessna Citation Excel के विकल्प के तौर पर पेश किया गया था। इस विमान के केबिन में खड़े होने की जगह नहीं होती लेकिन Learjet सीरीज की पहचान हमेशा हाई-स्पीड परफॉर्मेंस रही है। इसी वजह से इसे बिजनेस और चार्टर फ्लाइट्स के लिए पसंद किया जाता रहा है।

VSR वेंचर्स प्राइवेट लिमिटेड की स्थापना वीके सिंह द्वारा की गई थी और कंपनी का मालिकाना हक भी उनके पास है। यह कंपनी प्राइवेट जेट चार्टर, हेलिकॉप्टर रेंटल, मेडिकल इवैकुएशन यानी एयर एम्बुलेंस और एयरक्राफ्ट लीजिंग जैसी सेवाएँ देती है। कंपनी की फ्लीट में Learjet 45XR के अलावा Beechcraft Super King Air B200 और Agusta 109 हेलिकॉप्टर जैसे विमान भी शामिल हैं। इसका हेड ऑफिस नई दिल्ली के महिपालपुर में स्थित है और कंपनी एंड-टू-एंड एविएशन कंसल्टेंसी और एयरक्राफ्ट मैनेजमेंट सेवाएँ भी देती है।

शोक और शंकाएँ

अजित पवार के निधन पर देश भर में शोक की लहर दौड़ गई है। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से लेकर प्रधानमंत्री मोदी और तमाम राज्यों के मुख्यमंत्रियों, नेताओं और अन्य हस्तियों ने उनके निधन पर शोक व्यक्त किया है। हालाँकि, शोक के बीच इस हादसे को लेकर संदेह भी जताया जा रहा है। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी समेत कई नेताओं ने इस हादसे की जाँच की माँग की है। हादसे की जाँच करने की माँग करने वाले लोगों में अजित पवार के साथी और महाराष्ट्र के उप-मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे, जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला और सपा के नेता एसटी हसन भी शामिल हैं।

ममता बनर्जी ने कहा, “यहाँ नेता भी सुरक्षित नहीं हैं। मुझे नहीं पता क्या दिक्कत है। मुझे पता चला था कि वो बीजेपी की सरकार का नेतृत्व करने वाले हैं और आज अचानक उनका निधन हो गया। सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में सही जाँच होनी चाहिए। क्या यह बेवजह डर फैलाना है या कोई साजिश।”

हादसे के कारणों की होगी जाँच

फिलहाल इस भीषण विमान हादसे के कारणों को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं है। शुरुआती तौर पर यह कहा जा रहा है कि लैंडिंग के दौरान विमान का कंट्रोल बिगड़ गया था। वहीं, नागरिक उड्डयन मंत्रालय ने बताया है कि दुर्घटना स्थल का निरीक्षण करने और जाँच शुरू करने के लिए विमान दुर्घटना जांच ब्यूरो की टीम बारामती के लिए रवाना हो गई है और इस हादसे की जाँच करेगी।