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ललन सिंह के JDU अध्यक्ष पद छोड़ने के चर्चे, क्या बदलने वाली है बिहार की सियासी हवा: 29 दिसंबर को पर्दा उठा सकते हैं नीतीश कुमार

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की पार्टी जनता दल यूनाइटेड (JDU) से एक बड़ी खबर सामने आई है। पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष ललन सिंह ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। यह सब ऐसे समय में हुआ है, जब पार्टी की राष्ट्रीय बैठक 29 दिसंबर 2023 को दिल्ली में होनी थी। इसके पीछे क्या तर्क दिया गया है, इसका अभी खुलासा नहीं हुआ है।

सूत्रों के हवाले से मीडिया में कहा जा रहा है कि ललन सिंह ने अपना इस्तीफा नीतीश कुमार को सौंपते हुए पद से मुक्त करने का आग्रह किया है। हालाँकि, आधिकारिक तौर पर इसकी पुष्टि नहीं हुई है। माना जा रहा है कि नीतीश कुमार खुद राष्ट्रीय अध्यक्ष बनेंगे। यह भी कहा जा रहा है कि नीतीश कुमार किसी दूसरे नजदीकी को पार्टी अध्यक्ष बनाएँगे और ललन सिंह लोकसभा चुनावों की तैयारी करेंगे।

राजनीतिक गलियारे में यह भी चर्चा चल रही है कि ललन सिंह कुछ वजहों से मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से नाराज चल रहे हैं। इसलिए वो पद छोड़ने की लगातार पेशकश कर रहे थे। यह भी कहा जा रहा है कि नीतीश कुमार उन्हें मनाने में जुटे थे। रिपोर्ट्स में यह भी कहा जा रहा है कि नीतीश कुमार ने ललन सिंह को लोकसभा चुनावों तक कार्यवाहक अध्यक्ष बने रहने का आग्रह किया है।

बता दें कि नीतीश कुमार 23 दिसंबर की शाम की अचानक ललन सिंह के पटना स्थित आवास पर मिलने के लिए पहुँचे थे। इस दौरान ही अटकलें लगने लगी थीं कि जदयू में नेतृत्व परिवर्तन को लेकर चर्चा की गई है। इससे पहले सीएम आवास पर नीतीश कुमार, ललन सिंह और विजय चौधरी की मुलाकात हुई थी।

इस बैठक के बाद नीतीश कुमार ललन सिंह को उनके घर छोड़ने के लिए गए थे। हालाँकि, दोनों के बीच किसी तरह खटास नहीं बताई जा रही है। उधर भाजपा नेता सुशील मोदी ने दावा किया था कि ललन सिंह की लालू यादव के साथ नजदीकी बढ़ी। इससे नीतीश कुमार ललन सिंह से नाराज हैं और उन्हें पद से हटाने वाले हैं।

जानकारों का कहना है कि जब-जब JDU की राष्ट्रीय कार्यकारिणी और राष्ट्रीय परिषद की बैठक साथ हुई है, तब-तब उसके राष्ट्रीय अध्यक्ष बदले गए हैं। जब सुशील मोदी ने ललन सिंह को हटाने जाने की अटकलें लगाई थीं तो सीएम नीतीश कुमार ने इस बयान दिया था। उन्होंने कहा था कि जिसको जो मन में आता है, वही बोल देता है।

इसको लेकर 25 दिसंबर के दिए गए बयान में सीएम नीतीश ने कहा था, “कौन क्या बोलता है, इसको हम ध्यान नहीं दे रहे हैं। आजकल कुछ लोगों को जो मन में आता है, वो बोलते रहते हैं, ताकि उनको फायदा मिले। हालाँकि, इससे किसी को कोई लाभ नहीं मिलने वाला है। हमारी पार्टी में कोई इधर-उधर नहीं है, सब एकजुट हैं।”

‘मेरा रेसलिंग से कोई लेना-देना नहीं, मैंने संन्यास ले लिया है’: WFI विवाद पर बोले पूर्व अध्यक्ष बृजभूषण शरण सिंह – नई फेडरेशन के काम से मैं पूर्णतः अलग

बजरंग पूनिया, साक्षी मलिक और विनेश फोगाट जैसे खिलाड़ियों की आपत्ति और पहलवानों के विरोध प्रदर्शन के बाद बृजभूषण शरण सिंह को WFI (भारतीय कुश्ती संघ) के अध्यक्ष पद से इस्तीफा देना पड़ा था। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर फिर से चुनाव हुआ और बृजभूषण शरण सिंह के करीबी संजय सिंह अध्यक्ष चुने गए। इसके बाद फिर से विरोध चालू हो गया। अंततः केंद्रीय खेल मंत्रालय ने नवगठित पैनल के कामकाज पर रोक लगा दी और जूनियर चैंपियनशिप भी रद्द कर दी।

वहीं बृजभूषण शरण सिंह ने इस प्रकरण पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि उनका इन सबसे कोई वास्ता नहीं है। कैसरगंज से भाजपा सांसद ने कहा कि उन्होंने कुश्ती से संन्यास ले लिया है, और रेसलिंग अब उनका कोई लेना-देना नहीं है। उन्होंने ये भी कहा कि भविष्य में भी रेसलिंग से उनका कोई जुड़ाव नहीं रहेगा, अच्छा या बुरा लेकिन 12 वर्ष उन्होंने काम किया। भाजपा नेता ने कहा कि अब वो इस विवाद से हट गए हैं, नई फेडरेशन भी बन गई है।

बृजभूषण शरण सिंह ने कहा कि क्या करना है और क्या नहीं करना है, ये नई फेडरेशन का काम है, वो इन सबसे पूर्णतः अलग है। बता दें कि संजय सिंह की जीत के बाद फूल-माला के साथ स्वागत किए जाते हुए उनके साथ नए अध्यक्ष की तस्वीर आई थी। क्या WFI की गतिविधियों को रोके जाने का ये भी एक कारण है? इस पर पूछे जाने पर उन्होंने कहा कि फेसबुक पर उनके कितने फॉलोवर्स हैं और संजय सिंह कई वर्षों से रेसलिंग से जुड़े हुए हैं।

उन्होंने कहा कि कुश्ती से जुड़ा हर व्यक्ति उन्हें जानता ही है। वो पहले भी कह चुके हैं कि वो क्षत्रिय हैं और संजय सिंह भूमिहार, ऐसे में उन्हें उनका संबंधी बताया जा रहा है जो गलत है। बृजभूषण सिंह ने पूछा कि उन पर आरोप लगाने वाले यही पहलवान अपने घर के कार्यक्रमों में उन्हें नहीं बुलाते थे? भाजपा के आला नेताओं से मुलाकात के विषय में उन्होंने कहा कि रेसलिंग के मुद्दे पर चर्चा नहीं हुई है। भाजपा सांसद ने कहा कि उन्हें निशाना बनाया गया, टुकड़े-टुकड़े गैंग और प्रियंका गाँधी जैसे लोग प्रदर्शनकारियों के साथ आ गए।

मोदी सरकार में रुपया भी हुआ ग्लोबल, UAE को पहली बार कच्चे तेल के बदले भारतीय मुद्रा में किया भुगतान

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (PM Narendra Modi) के नेतृत्व में भारत अपनी मुद्रा रुपए की वैश्विक स्वीकार्यता बढ़ाने पर लगातार काम कर रहा है। इसके तहत भारत ने संयुक्त अरब अमीरात (UAE) से खरीदे गए कच्चे तेल (Crude Oil) का भुगतान वैश्विक मुद्रा के रूप में स्वीकृत अमेरिकी डॉलर के बजाय रुपए में किया है। कच्चे तेल के लिए UAE को भारत द्वारा रुपए में किया गया यह पहला भुगतान है।

भारत दुनिया तीसरा का सबसे बड़ा ऊर्जा उपभोक्ता देश है। इस तरह वैश्विक स्तर पर स्थानीय मुद्रा को बढ़ावा देकर भारत ने एक रणनीतिक कदम उठाया है। भारत का यह कदम तेल आपूर्तिकर्ताओं में विविधता लाने, लेनदेन की लागत में कटौती करने और रुपए को व्यापार निपटान मुद्रा के रूप में स्थापित करने के भारत द्वारा किए जा रहे व्यापक प्रयासों का यह हिस्सा है।

बताते दें कि 11 जुलाई 2022 को भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने आयातकों को रुपए में भुगतान करने और निर्यातकों को स्थानीय मुद्रा में भुगतान करने की अनुमति दी थी। हालाँकि, अधिकारियों का कहना है कि अंतरराष्ट्रीयकरण एक सतत प्रक्रिया है और वर्तमान में इसका कोई विशेष लक्ष्य नहीं है।

भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) ने पिछले तीन वर्षों में सीमा पार भुगतान में रुपए के उपयोग को बढ़ावा देने के अपने प्रयास में एक दर्जन से अधिक अंतरराष्ट्रीय बैंकों को रुपए में व्यापार करने की अनुमति दी है। RBI ने अब तक 22 देशों के साथ रुपए में व्यापार की सहमति बना चुका है।

दरअसल, जुलाई में भारत ने रुपए में निपटान के लिए संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के साथ एक समझौता किया था। इसके तहत इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन (IOC) को अबू धाबी नेशनल ऑयल कंपनी (ADNOC) से दस लाख बैरल कच्चे तेल की खरीद के लिए भारतीय रुपए में भुगतान करना पड़ा। इसके अतिरिक्त, कुछ रूसी तेल आयात का निपटान भी रुपए में किया गया है।

अपनी तेल की जरूरतों को पूरा करने के लिए भारत उसका 85 प्रतिशत से अधिक तेल आयात करता है। इसको देखते हुए भारत ने एक रणनीति अपनाई है, जिसमें सबसे अधिक लागत प्रभावी आपूर्तिकर्ताओं से सोर्सिंग, आपूर्ति स्रोतों में विविधता लाने और अंतरराष्ट्रीय दायित्वों का पालन करने पर जोर दिया गया है। रूसी तेल आयात में वृद्धि के दौरान देश को इस रणनीति से अरबों डॉलर की बचत हुई।

हालाँकि, कुछ देशों के साथ ही गैर-तेल व्यापार समझौतों में व्यापार का निपटान रुपए में करने में सफलता मिली है, लेकिन तेल निर्यातक देश रुपए में लेनदेन से संकोच करते रहे हैं। अब रूस के बाद संयुक्त अरब अमीरात द्वारा इस दिशा में आगे बढ़ने के बाद स्थानीय मुद्रा को वैश्विक स्तर पर स्वीकार करने में सफलता मिलेगी।

उधर, संसद की स्थायी समिति को संबोधित करते हुए तेल मंत्रालय ने इस बात पर जोर दिया कि नियामक दिशानिर्देशों का पालन करने वाले आपूर्तिकर्ताओं को कच्चे तेल का भुगतान भारतीय रुपए में किया जा सकता है। मंत्रालय ने कहा कि भारतीय रुपए का उपयोग करके भुगतान करने में बहुत अधिक अंतरराष्ट्रीय रुचि नहीं है, क्योंकि आपूर्तिकर्ता धन के प्रत्यावर्तन और उच्च लेनदेन लागत से सावधान हैं।

वित्तीय वर्ष 2022-23 (अप्रैल 2022 से मार्च 2023) में भारत ने 232.7 मिलियन (2.32 करोड़) टन कच्चे तेल के आयात पर 157.5 बिलियन डॉलर (लगभग 13 लाख करोड़ रुपए) खर्च किए। भारत को कच्चा तेल निर्यात करने वाले प्रमुख देशों में इराक, सऊदी अरब, रूस और संयुक्त अरब अमीरात हैं। इनका पश्चिम एशिया की कुल आपूर्ति में 58 प्रतिशत का योगदान है। ।

‘आज मैं मुसलमान बन गया’: हिंदू युवक का वीडियो, पत्नी ने कहा- शबाना खान ने मेरे पति से जबरन कबूल करवाया इस्लाम

सोशल मीडिया में एक वीडियो वायरल है। इसमें दिख रहा युवक मुस्लिम बनने की बात कह रहा है। इस युवक की पहचान बरेली के 24 साल के आकाश मौर्य के तौर पर हुई है। आकाश की पत्नी लक्ष्मी का कहना है कि उसके पति से जबरन इस्लाम कबूल करवाया गया है।

15 सेकंड के इसे वीडियो में आकाश मौर्य इस्लामी टोपी पहने नजर आ रहा है। वीडियो के बैकग्राउंड गाना बज रहा है- ‘मेरा दिल तो मोहम्मद’ और साथ ही एक कैप्शन लिखा था – आज, मैं मुस्लिम बन गया हूँ।

वीडियो के सामने आने के तुरंत बाद, आकाश मौर्य की पत्नी ने परिवार के अन्य सदस्यों के साथ सुभाष नगर पुलिस में शिकायत दर्ज कराई है। इसमें शबाना खान नाम की एक मुस्लिम महिला पर आकाश मौर्य को प्रेम जाल में फँसाने का आरोप लगाया है।

लक्ष्मी ने पुलिस को बताया कि आकाश मौर्य 21 दिसंबर 2023 से घर नहीं लौटा है। उसने कहा कि घर छोड़ते वक्त वह सोने और चाँदी के सिक्के और 23,000 रुपए नकद लेकर गया था। आकाश मौर्य एक कूरियर कंपनी में डिलीवरी बॉय का काम करता था।

शिकायत प्रति का स्क्रीनग्रैब

लक्ष्मी के मुताबिक, इज्जतनगर पुलिस स्टेशन के तहत आने वाले मठ लक्ष्मीपुर में डिलीवरी करते वक्त उसके पति की मुलाकात 21 साल की शबाना खान से हुई थी। कथित तौर पर आकाश बीते 4 महीने से शबाना से फोन पर बात करता रहा था। लक्ष्मी का आरोप है कि उसके पति आकाश को शबाना ने ही फँसाया है।

आकाश मौर्य का वीडियो सोशल मीडिया पर आने के बाद उनका परिवार स्तब्ध है। जानकारी के मुताबिक, शबाना खान कथित तौर पर वीडियो कॉल कर लक्ष्मी को बताया कि आकाश मौर्य ने इस्लाम अपना लिया है। बकौल लक्ष्मी उसने धमकी दी कि अगर उसने आकाश से संपर्क करने की कोशिश की तो वह उसे चोट पहुँचाएगी।

वहीं आकाश मौर्य की मां सपना ने बताया कि शबाना खान के संपर्क में आने के बाद से उनके बेटा कभी-कभार ही घर आता था। उन्होंने कहा कि आकाश को इस्लाम कबूल करने के लिए मजबूर किया गया है। उनका ये भी कहना था कि जब शबाना ने उनकी बहु लक्ष्मी को फोन किया तो उसने पीछे से आकाश को रोते हुए सुना था। हालात से मजबूर होकर परिवार ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई है।

वहीं इस मसले को लेकर पुलिस अधीक्षक राहुल भाटी का कहना है कि आकाश मौर्य सुभाष नगर पुलिस स्टेशन पहुँचा था। उसने अपना बयान दर्ज कराते हुए धर्मांतरण के आरोपों को खारिज किया है। मंगलवार (26 दिसंबर 2023) को इस मामले पर ऑपइंडिया से बात करते हुए आकाश मौर्य के पिता ने बताया कि उनका बीटा घर लौट आया है। धर्म परिवर्तन से जुड़े दावों के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने आरोपों को सत्य बताया।

धर्म के लिए हुए बलिदान, मुगलों के सामने नहीं झुकने दी खालसा की शान: कहानी गुरु के उन साहिबजादों की जिनको समर्पित है ‘वीर बाल दिवस’

आज 26 दिसंबर है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पहल के बाद से यह दिन वीर बाल दिवस के तौर पर मनाया जाता है। य​ह दिन समर्पित है गुरु गोविंद सिंह के साहिबजादों को। इन्होंने धर्म के लिए खुद को बलिदान कर दिया, लेकिन बर्बर मुगलों के सामने घुटने नहीं टेके।

गुरु गोविंद सिंह के बेटों फतेह सिंह और जोरावर सिंह को मुगलिया फौज के सेनापति वजीर खान ने दीवार में जिंदा चुनवा दिया था, लेकिन उनके मुँह से उफ तक नहीं निकली। माता गुजरी देवी और चार साहिबजादों के बारे में जानने से पहले, उन गुरु गोविंद सिंह को जानिए जिन्होंने ‘खालसा पंथ’ की स्थापना की। सिखों के 10वें गुरु गोविंद सिंह न सिर्फ एक संत एवं दार्शनिक, बल्कि एक कुशल योद्धा भी थे। उन्होंने बर्बर मुगल बादशाह औरंगजेब के विरुद्ध कई युद्ध लड़े। उनके पिता गुरु तेग बहादुर की औरंगजेब ने ही हत्या करवाई थी। इस कारण मात्र 9 वर्ष की उम्र में गोविंद सिंह को गुरु की पदवी सँभालनी पड़ी थी।

गुरु के पीछे औरंगजेब ने वजीर खान को लगाया

औरंगजेब ने गुरु गोविंद सिंह मुकाबला करने के लिए उनके पीछे वजीर खान को लगाया था। उसे सरहिंद का सूबेदार बना कर भेजा गया और सिखों का दमन की खुली छूट दी गई। गुरु गोविंद सिंह को उसके साथ कई युद्ध लड़ने पड़े। सतलुज से लेकर यमुना नदी के बीच के पूरे क्षेत्र पर वजीर खान का ही शासन चलता था। उसने गुरु गोविंद सिंह के 5 और 8 वर्षीय बेटों साहिबजादा फ़तेह सिंह और साहिबजादा जोरावर सिंह को ज़िंदा पकड़ लिया था। इस्लाम न अपनाने पर उसने दोनों को ही दीवार में ज़िंदा चुनवा दिया।

ये भी एक संयोग ही है कि वजीर खान का संहार करने वाले सिख योद्धा का नाम भी फ़तेह सिंह ही था, जो बन्दा सिंह बहादुर की सेना में थे। उन्होंने वजीर खान का सिर धड़ से अलग कर दिया था। इसे ‘चप्पर-चिड़ी’ के युद्ध के रूप में जाना जाता है। मई 1710 में सिखों ने वजीर खान को उसके किए की सज़ा दी थी। गुरु गोविंद सिंह ने सन् 1688 में भंगानी के युद्ध से लेकर 1705 ईस्वी में मुक्तसर के युद्ध तक दर्जनों युद्ध लड़े। उन्होंने अपने परिवार का बलिदान दे दिया, लेकिन मुगलों के सामने नहीं झुके।

गुरु गोविंद सिंह की सिख सेना की लड़ाई मुगलों के साथ-साथ पहाड़ी राजाओं के साथ भी थी। चमकौर के युद्ध में सिख सेना का काफी नुक़सान हुआ था, लेकिन मुगलों पर वो भारी पड़े थे। बौखलाए औरंगजेब ने वजीर खान और जबरदस्त खान के नेतृत्व में एक विशाल फ़ौज को सिखों को कुचलने के लिए भेज दी। इसके लिए औरंगजेब ने सरहिंद, लाहौर और जम्मू के सूबेदारों के अलावा लगभग दो दर्जन पहाड़ी राजाओं के साथ गठबंधन से एक बड़ी फ़ौज तैयार की और उसे गुरु गोविंद सिंह को पकड़ने के लिए आनंदपुर साहिब भेजा।

कुरान की कसम से पलटे मुगल किया गुरु पर हमला

गुरु गोविंद सिंह भी इस युद्ध के लिए तैयार थे और संख्या में कम होने के बावजूद खालसा सेना ने मुगलों के दाँत खट्टे कर दिए। शुरुआती झड़पों में मुगलों को अपनी पराजय स्पष्ट दिख रही थी। इसके बाद मुग़ल फ़ौज ने आनंदपुर साहिब को चारों ओर से घेर कर रसद-पानी की किल्लत पैदा कर दी। बाहर से क्षेत्र का सम्बन्ध टूटने के कारण भोजन-पानी का अभाव हो गया। मुगलों ने इस दौरान संधि का प्रस्ताव दिया और कहा कि अगर गुरु गोविंद सिंह दुर्ग छोड़ देते हैं तो उन्हें और उनके परिवार को सुरक्षित निकलने के लिए रास्ता दिया जाएगा।

इसके लिए मुग़ल सूबेदारों ने कुरान तक की कसम खाई। हालाँकि, उनमें कुछ सिख सैनिक ऐसे भी थे जो दुर्ग छोड़ कर चले गए लेकिन गुरु गोविंद सिंह ने पहले ही शर्त रख दी थी अगर वो ऐसा करते हैं तो गुरु-शिष्य का रिश्ता नहीं रहेगा। लगभग आठ महीने के समय तक आनंदपुर साहिब को मुगलों ने घेरे रखा। अंत में सिख सेना ने गुरु गोविंद सिंह, उनकी माँ गुजरी देवी और चारों साहिबजादों (अजीत सिंह, जुझार सिंह, जोरावर सिंह और फ़तेह सिंह) के साथ दुर्ग छोड़ने की योजना बनाई।

यही वो दिन था जब मुगलों ने कुरान की कसम को धत्ता बताते हुए खालसा सेना पर सरसा नदी के तट पर आक्रमण कर दिया। मौसम ठंड और बारिश का था। ऐसे मुश्किल वक्त में भी अजीत सिंह (19) और जुझार सिंह (14) को लेकर गुरु गोविंद सिंह किसी तरह चमकौर की गढ़ी तक पहुँचने में कामयाब रहे थे।

हालाँकि इस दौरान उनके परिवार के बाकी लोग उनसे बिछुड़ गए। जोरावर सिंह और फ़तेह सिंह के साथ उनकी दादी और गुरु गोविंद सिंह की माँ गुजरी देवी थीं। गुरु के एक पुराने रसोईए के गाँव में जाकर इन तीनों ने शरण ली। उसने गुरु से विश्वासघात करते हुए दोनों बच्चों को वजीर खान को सौंप दिया।

क्रूर वजीर खान ने इन दोनों साहिबजादों गिरफ्तार कर लिया। उसने इन दोनों साहिबजादों के सामने शर्त रखी कि वो इस्लाम अपना लें। लेकिन उन्होंने ऐसा करने से इनकार कर दिया। दोनों छोटे बच्चों ने कहा कि वो अपना धर्म कभी नहीं छोड़ सकते। इस दौरान उन्होंने अपने दादा गुरु तेग बहादुर के बलिदान को याद करते हुए वजीर खान से दो टूक कह दिया कि हम गुरु गोविंद सिंह के पुत्र हैं। हम अपना धर्म कभी नहीं छोड़ सकते। फिर क्या था गुस्से से भरे वजीर खान ने उन दोनों को ज़िंदा दीवार में चुनवाने का आदेश दिया।

वजीर खान ने इन दोनों साहिबजादों को दीवार में चुनवाने के लिए मलेरकोटला के नवाब को सौंपना चाहा था। दरअसल नवाब का भाई सिखों के साथ युद्ध में मारा गया था। वजीर खान को लगा कि वो पहले कि आग में जल रहा होगा, लेकिन उसने ऐसा करने से इनकार करते हुए कहा कि उस युद्ध में इन दोनों बालकों का क्या दोष?

दोनों साहिबजादों में जोरावर सिंह बड़े थे। जब उनको चिनवाने के लिए बनाई जा रही दीवार ऊपर उठने लगी तो उनकी आँखों में आँसू आ गए। इस पर छोटे भाई फतेह सिंह ने उनसे पूछा कि क्या वो बलिदान देने से डरकर रो रहे हैं? तब जोरावर सिंह ने छोटे भाई को जवाब दिया कि ऐसी बात नहीं हैं। वो तो ये सोच कर दुःखी हैं कि छोटा होने की वजह से फ़तेह सिंह की दीवार पहले बन जाएगी और वो पहले उसमे समा जाएँगे और उनकी मौत पहले होगी। उन्होंने कहा कि दुःख यही है कि मेरे से पहले बलिदान होने का अवसर तुम्हें मिल रहा है। उन्होंने कहा कि मैं मौत से नहीं डरता, वो मुझसे डरती है।

आनंदपुर साहिब का युद्ध और साहिबजादों का बलिदान

किसी युद्ध में बच्चों के साथ इस तरह की अमानवीयता का उदाहरण पहले शायद ही कहीं मिलता है। फिर चमकौर की गढ़ी में भी युद्ध हुआ, जिसमें वीरता का प्रदर्शन करते हुए गुरु गोविंद सिंह के बाकी दोनों बेटों अजीत सिंह और जुझार सिंह भी बलिदान हो गए।

एक और बात जानने लायक है कि जिन 40 सिखों ने मुगलों के घेरने पर आनंदपुर साहिब छोड़ा था। बाद में उन सिखों ने ही गुरु के पीछे सेना संगठित करने में बड़ी भूमिका निभाई और अपने प्राण देकर प्रायश्चित किया।

यही युद्ध वो वक्त था, जब औरंगजेब ने गुरु गोविंद सिंह में दिलचस्पी लेनी शुरू की। जब उसे युद्ध के मैदान में सिखों के फायदे में रहने की जानकारी हुई तो उसने गुरु गोविंद सिंह के व्यक्तित्व से लेकर उनके युद्ध कौशल के बारे में भी जानकारियाँ जुटाई।

मुग़ल सैनिकों ने जब गुरु की प्रशंसा की तो औरंगजेब ने उन्हें अपने सामने लाने का आदेश दे डाला। युद्ध में जब दूर-दूर से सिख पहुँचे तो वो खुश थे और एक-दूसरे को बधाई दे रहे थे कि उन्हें गुरु और धर्म के लिए मृत्यु के वरण का मौका मिल रहा है।

ये सही बात थी कि आनंदपुर साहिब ऊँची जगह पर था और सिख सेना को मुगलों की गतिविधियों का पता चल रहा था, लेकिन वो खुले में भी थे और युद्ध के दौरान गड्ढे में भी गिर रहे थे। इस दौरान गुरु गोविंद सिंह ने मुगलों की तरफ तोप से वार का आदेश दिया। इस दौरान मुग़ल फ़ौज उन हथियारों को जब्त करने के लिए आगे बढ़ीं। लेकिन, सिखों की गरजती बंदूकों ने उन्हें रोक दिया। फिर तीरों की बौछार हुई और मुगलों के घोड़े और फौजी एक-दूसरे के ऊपर ही गिरने लगे।

मुगलों को लगता था कि किले में होने की वजह से सिखों को फायदा है। सिखों की दो बड़ी तोपें गरजी और मुग़ल फ़ौज सहित पहाड़ी राजा भी भाग खड़े हुए। उस दिन सिखों की जीत हुई। यही वो दिन था, जब बौखलाए मुगलों ने आनंदपुर साहिब आने-जाने के रास्तों को बंद करने का फैसला लिया।

गुरु गोविंद सिंह की माँ गुजरी भी सैनिकों की हालत देखते हुए किले को छोड़ने के पक्ष में थीं। कहते हैं अपने दोनों पोतों की मौत की खबर सुनते ही उन्हें ऐसा सदमा लगा था कि उनका भी निधन हो गया था।

यही वजह है कि दिसंबर महीने का सिख पंथ में एक अलग स्थान है। ये चार साहिबजादों का बलिदान ही था कि आगे के सिखों में वीरता और बहादुरी कई गुनी हो गई और उनका साहस आसमान छूने लगा। बाबा बंदा सिंह बहादुर महाराष्ट्र के नांदेड़ से से पंजाब आए, ताकि वो इस क्रूर नरसंहार का बदला ले सकें। इसी बलिदान का परिणाम था कि आगे चल कर महाराजा रणजीत सिंह के नेतृत्व में एक बड़े सिख साम्राज्य का उदय हुआ था।

‘जिन्होंने बदला धर्म उनको ST से बाहर करो’: अब दिल्ली आने को तैयार हैं जनजातीय समाज के लोग, क्रिसमस से पहले राँची में हुआ था जुटान

डी लिस्टिंग यानी धर्मांतरण कर ईसाई अथवा मुस्लिम बनने वाले जनजातीय समाज के लोगों को अनुसूचित जनजाति (ST) के दायरे से बाहर करने को लेकर देशव्यापी आंदोलन चल रहा है। फरवरी 2024 में जनजातीय समाज के लोग अपनी माँगों के समर्थन में दिल्ली में जुट सकते हैं। क्रिसमस से ठीक पहले 24 दिसंबर 2023 को झारखंड की राजधानी राँची में जुटान कर वह अपना इरादा जता चुके हैं।

अनुसूचित जनजाति के लोगों का यह अभियान जनजाति सुरक्षा मंच (JSM) के बैनर तले चल रहा है। टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार इस अभियान को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) और अन्य हिंदुवादी संगठनों का भी समर्थन हासिल है। इसी रिपोर्ट में देशभर के जनजातीय समाज के लोगों का दिल्ली में फरवरी में जुटान होने की बात कही गई है। हालाँकि इसकी तारीख अभी तय नहीं हुई है।

जनजातीय समाज के लोगों का कहना है कि धर्मांतरण करने वाले लोग ST का लाभ उठाकर उनके अधिकार को छीन रहे हैं। उनके अनुसार ईसाई बनने वाले ST बीते 75 साल से अनुसूचित जनजाति को मिलने वाले आरक्षण लाभ का 80 फीसदी फायदा उठा रहे हैं। जेएसएम का कहना है कि ईसाइयों अथवा मुस्लिमों का एसटी आरक्षण पर अधिकार नहीं हैं। लेकिन वे जनजातीय समाज के लोगों को मिले संवैधानिक अधिकारों का अतिक्रमण कर रहे हैं।

इन्हीं माँगों के समर्थन में जनजातीय समाज के करीब 5000 लोगों का जुटान क्रिसमस से ठीक पहले 24 दिसंबर 2023 को राँची के मोरहाबादी मैदान में हुआ। उलगुलान आदिवासी डीलिस्टिंग नमक इस महारैली का आयोजन JSM की ओर से किया गया था। झारखंड के अलग-अलग हिस्सों से आए अनुसूचित जनजाति समाज के लोगों ने पारंपरिक पोशाकों और तीर-धनुष जैसे पारंपरिक हथियारों के साथ इस रैली में शिरकत की थी।

रैली की अध्यक्षता पूर्व केंद्रीय मंत्री और लोकसभा के पूर्व उपाध्यक्ष करिया मुंडा ने की। उनके अलावा बीजेपी के लोकसभा सांसद सुदर्शन भगत, राज्यसभा सदस्य समीर ओरांव, जेएसएम के राष्ट्रीय संयोजक गणेश राम भगत भी मौजूद थे। करिया मुंडा ने कहा, “झारखंड में ईसाई धर्म अपनाने वाले आदिवासियों का प्रतिशत लगभग 15-20% होगा, लेकिन अगर हम सरकारी नौकरियों और आईएएस सहित प्रथम श्रेणी के अधिकारियों को देखें, तो 80-90% वे हैं जो धर्मांतरित हैं।”

जनजातीय समाज के लोगों की डी-लिस्टिंग की डिमांड नई नहीं है। मुंडा ने बताया कि राँची की तरह ही नागपुर, नासिक, मुंबई जैसे कई जगहों पर इन्हीं माँगों को लेकर जनजातीय समाज के लोगों का जुटान हो चुका है। वहीं जेएसएम के राष्ट्रीय सह संयोजक राजकिशोर हांसदा ने कहा कि भारतीय संविधान के निर्माताओं ने देश के 700 से अधिक जनजातीय समूहों के अधिकारों की रक्षा के लिए बेहतरीन कोशिशें की थीं, लेकिन ये फायदा मुट्ठी भर उनलोगों को मिल रहा है जो धर्म बदल चुके हैं। जिन्हें चर्च का समर्थन हासिल है।

‘यदि मैं मर जाऊँ तो समझना यह मर्डर है’: मुंबई एयरपोर्ट से गिरफ्तारी का दावा कर KRK ने लिया सलमान खान का नाम, फिर डिलीट किया ट्वीट

विवादित बयानों से अक्सर चर्चा में रहने वाले कमाल राशिद खान उर्फ KRK ने एक पोस्ट में खुद की गिरफ्तारी का दावा किया। इसके लिए सलमान खान को जिम्मेदार बताया। कहा कि यदि पुलिस स्टेशन या जेल में उनकी मौत हो जाए तो इसे हत्या माना जाए। बाद में उन्होंने यह पोस्ट डिलीट कर लिया।

मीडिया रिपोर्टों के अनुसार केआरके ने 25 दिसंबर 2023 को एक्स/ट्विटर पर एक पोस्ट करते हुए दावा किया कि वे दुबई जा रहे थे, लेकिन मुंबई पुलिस ने उन्हें एयरपोर्ट से गिरफ्तार कर लिया। बताया कि कोर्ट में हर तारीख पर मौजूद रहने के बावजूद 2016 के एक मामले में उनकी गिरफ्तारी की गई है।

उन्होंने लिखा, “मैं पिछले एक साल से मुंबई में ही हूँ। मैं हर बार कोर्ट द्वारा दी गई तारीख पर मौजूद हो रहा हूँ। आज मैं नए साल के सेलिब्रेशन के लिए दुबई जा रहा था। लेकिन, मुंबई पुलिस ने मुझे एयरपोर्ट से ही गिरफ्तार कर लिया।”

केआरके ने पोस्ट में बताया, “पुलिस के मुताबिक मैं साल 2016 में दर्ज हुए केस में वांटेड हूँ। सलमान खान का कहना है कि उनकी फिल्म टाइगर-3 मेरी वजह से फ्लॉप हुई है। अगर मैं किसी भी वजह से पुलिस स्टेशन या फिर जेल के अंदर मर जाता हूँ तो आप सबको पता होना चाहिए कि मेरा कत्ल हुआ है। इतना ही नहीं, आप सबको ये भी पता है कि इसका जिम्मेदार कौन होगा।”

केआरके का वह ट्वीट जो उन्होंने बाद में डिलीट कर लिया (साभार: लाइव हिंदुस्तान)

इस पोस्ट में उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को टैग भी किया था। हालाँकि बाद में केआरके ने यह पोस्ट डिलीट कर दिया। इसका कारण उन्होंने नहीं बताया है। न ही उनकी गिरफ्तारी की मुंबई पुलिस ने पुष्टि की है।

बता दें कि अलग तरीके से फिल्मों की समीक्षा करने के लिए पहचान बनाने वाले केआरके को साल 2022 में भी अरेस्ट किया गया था। उस समय दुबई से मुंबई आने पर गिरफ्तारी हुई थी। यह गिरफ्तारी 2020 के एक विवादास्पद सोशल मीडिया पोस्ट को लेकर हुई थी। केआरके के खिलाफ कई केस दर्ज हैं।

मुंबई की एक अदालत ने 23 जून 2021 को सलमान खान द्वारा दायर मानहानि के मामले में केआरके को फिल्म अभिनेता पर कोई भी पोस्ट या वीडियो शेयर करने से अस्थायी तौर पर रोक दिया था। इसके बाद जब जनवरी 2023 में सलमान खान की फिल्म ‘किसी का भाई किसी की जान’ का टीजर आया तो इसका रिव्यू करने के लिए केआरके ने उनसे इजाजत भी माँगी थी।

अभी हुए लोकसभा चुनाव तो BJP को कितनी सीटें? – देखें ताज़ा ओपिनियन पोल के आँकड़े, अभिनेता नाना पाटेकर बोले – शानदार काम हुआ है, पौने 400 सीटें आएँगी

मल्लिकार्जुन खड़गे के नेतृत्व में भी I.N.D.I. गठबंधन नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली बीजेपी और NDA के आगे फेल होती नजर आ रही है। लोकसभा चुनाव 2024 को लेकर एबीपी न्यूज-सी वोटर की ओर से किए गए पहले ओपिनियन पोल में एनडीए को तीसरी बार प्रचंड बहुमत मिलता दिख रहा है। इस ओपिनियन पोल की मानें तो एनडीए 335 सीटों तक पर जीत हासिल करती दिख रही है। हालाँकि, लोकसभा चुनाव में हर बार एनडीए ओपिनियन पोल्स से कहीं बेहतरीन जीत दर्ज करती रही है।

एबीपी-सी वोटर ओपिनियन पोल के मुताबिक, अगर आज चुनाव होते हैं, तब भी लोकसभा की कुल 543 सीटों में से एनडीए 295 से लेकर 335 सीटों पर जीत दर्ज करने की हालत में है। वहीं, I.N.D.I. एलायंस आधे से भी कम सीटों पर सिमटती दिख रही है। इंडी एलायंस को अधिकतम 165 से लेकर 205 सीटों पर ही जीत पाने का अनुमान है। वहीं, अन्य की बात करें तो 30-35 सीटों पर अन्य दल भी जा सकते हैं, जिसमें बीजू जनता दल जैसी पार्टियाँ हैं।

बीजू जनता दल केंद्र में न तो एनडीए के साथ है और न ही इंडी गठबंधन के, लेकिन किसी भी महत्वपूर्ण मौके पर वोटिंग के समय वो एनडीए की तरफ खड़ी दिखती है।

देश में वोटिंग के पैटर्न को समझने के लिए अगर उसे चार हिस्सों में बाँट दिया जाए, तो भी उत्तर, पूर्व और पश्चिम जोन में बीजेपी और एनडीए को बंपर जीत मिलती दिख रही है। सिर्फ दक्षिण जोन में बीजेपी थोड़ी कमजोर दिखती है, लेकिन राज्यों का आँकड़ा जोड़ा जाए तो कर्नाटक में 52 प्रतिशत वोटों के साथ बीजेपी यहाँ भी शीर्ष पर दिखती है। उत्तर जोर में तो बीजेपी 180 सीटों में से 160 तक सीटों पर जीत दर्ज करती दिख रही है। दक्षिण जोन में ये आँकड़ा 132 सीटों में से 20-30 का ही है, लेकिन पूर्वी जोन में 153 सीटों में से 80-90 सीटों पर बीजेपी और एनडीए आगे दिखती हैं, तो पश्चिम जोन में 89 में से 45-55 सीटों पर जीत दर्ज कर एनडीए बहुमत से बहुत आगे निकलती दिख रही है।

इस बीच, बॉलीवुड एक्टर नाना पाटेकर ने केंद्र सरकार के काम को बेहद शानदार बताया। उन्होंने उम्मीद जताई कि बहुत शानदार तरीके से बीजेपी जीतेगी। नाना पाटेकर ने विकल्प न होने की भी बात कही।

एक पत्रकार ने उनसे जब पूछा गया कि अब 2024 लोकसभा चुनाव है और चुनाव को लेकर क्या देखते हैं? इस सवाल पर नाना पाटेकर ने भी अपनी राय रखी है। उन्हें बिना लाग लपेट के साफ बात कहने के लिए जाना जाता रहा है।

नाना पाटेकर ने सीधे सपाट शब्दों में कहा, “देख लेना, इतने बड़े तरीके से बीजेपी आ जाएगी। अब कौन सी (सीटें) आती है, क्या आते हैं, वो नहीं। लेकिन तुम्हारे पास कोई विकल्प है नहीं है, और इतना बेहतरीन काम हुआ है। साढ़े तीन सौ, पौने चार सौ तक जाएगा। मुझे कोई ताज्जुब नहीं होगा।”

दें कि नरेंद्र मोदी की अगुवाई में साल 2014 और साल 2019 के आम चुनाव यानी लोकसभा चुनाव में बीजेपी और एनडीए का प्रदर्शन बेहद शानदार रहा है। बीजेपी ने अकेले दम पर दोनों ही बार बहुमत के आँकड़े को पार किया और साथी पार्टियों के साथ प्रचंड बहुमत की सरकार बनाई। साल 2019 में तो बीजेपी ने अब तक का सबसे बेहतरीन प्रदर्शन करते हुए अकेले ही तीन सौ का आँकड़ा पार करते हुए 303 सीटों पर जीत हासिल की थी। इस बार के ओपिनियन पोल भी साफ साफ बता रहे हैं कि नरेंद्र मोदी की अगुवाई में बीजेपी और एनडीए स्पष्ट तरीके से प्रचंड बहुमत के साथ जीत की हैट्रिक लगाने जा रहे हैं।

सलाखों के पीछे भी चाहिए बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएँ! जेल में मेडिकल केयर को लेकर HC के आदेश पर समिति गठित, कैदियों के चिकित्सा अधिकार और चुनौतियाँ

जेल प्रणाली के भीतर स्वास्थ्य देखभाल के गंभीर मुद्दे को संबोधित करने के लिए एक अभूतपूर्व कदम में, दिल्ली उच्च न्यायालय ने एक विशेष समिति का गठन करके सक्रिय रुख अपनाया है। इस समिति को जेल में बंद व्यक्तियों के लिए चिकित्सा सुविधाओं में सुधार के उपायों का मूल्यांकन और सिफारिश करने की कठिन जिम्मेदारी सौंपी गई है।

जेल स्वास्थ्य सेवा की स्थिति पर हाल ही में हुई सुनवाई से निकला यह निर्णय, कैदियों के कल्याण और अधिकारों को सुनिश्चित करने के लिए न्यायपालिका की प्रतिबद्धता को दर्शाता है। समिति, जिसमें कानूनी विशेषज्ञ, चिकित्सा पेशेवर और मानवाधिकार संगठनों के प्रतिनिधि शामिल हैं, का उद्देश्य दिल्ली की सुधार सुविधाओं के भीतर मौजूदा स्वास्थ्य देखभाल प्रावधानों की व्यापक समीक्षा करना है।

दिल्ली की जेलों में स्वास्थ्य सुविधाओं में सुधार के तरीके सुझाने के लिए दिल्ली स्वास्थ्य सचिव के अधीन यह विशेष समिति गठित की है। अमनदीप सिंह ढल बनाम प्रवर्तन निदेशालय वाले मामले में ये फैसला सुनाया गया हाउ। अदालत ने दिल्ली सरकार के गृह सचिव और स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण सचिव को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया कि जेल के कैदियों की स्वास्थ्य संबंधी आवश्यकताएँ पूरी की जाएँ और जेलों में बुनियादी ढाँचा बनाए रखा जाए।

महानिदेशक (जेल), दिल्ली जेल के मुख्य चिकित्सा अधिकारी, जिला अदालतों के दो वरिष्ठ जेल विजिटिंग न्यायाधीश, दिल्ली राज्य कानूनी सेवा प्राधिकरण के सचिव के साथ-साथ वकील संजय दीवान और गायत्री पुरी भी समिति के सदस्य होंगे।

उपरोक्त प्रतिबद्ध इस अदालत को एक महीने की अवधि के भीतर जेलों में स्वास्थ्य देखभाल सुविधाओं में सुधार और सभी कैदियों को समान स्वास्थ्य देखभाल को बढ़ावा देने के तरीकों के संबंध में सुझाव देंगे। समिति अदालत को यह भी विशेष रूप से सूचित करेगी कि क्या जेल अस्पताल में आपातकालीन स्थितियों जैसे कार्डियक अरेस्ट, रक्तस्राव आदि से निपटने के लिए सुविधाएँ उपलब्ध हैं, क्योंकि ऐसी स्थिति में पहले कुछ मिनट किसी व्यक्ति की जान बचाने के लिए महत्वपूर्ण होते हैं।

समिति का एक प्राथमिक उद्देश्य कैदियों के लिए उपलब्ध चिकित्सा बुनियादी ढाँचे, स्टाफिंग स्तर और स्वास्थ्य सेवाओं की समग्र गुणवत्ता की पर्याप्तता का आकलन करना भी है। इस पहल से जेल प्रणाली के भीतर चिकित्सा देखभाल की पहुँच और मानकों के बारे में लंबे समय से चली आ रही चिंताओं का समाधान होने की उम्मीद है।

समिति को स्वास्थ्य सेवा वितरण को बढ़ाने के लिए चिकित्सा प्रौद्योगिकी में प्रगति का लाभ उठाते हुए नवीन समाधान तलाशने का भी काम सौंपा गया है। इसमें दूरस्थ परामर्श की सुविधा के लिए टेलीमेडिसिन कार्यक्रमों की व्यवहार्यता की जाँच करना शामिल है, जिससे कैदियों को बाहरी चिकित्सा सुविधाओं तक पहुँचाने से जुड़ी तार्किक चुनौतियों को कम किया जा सके। कानूनी विशेषज्ञों का सुझाव है कि ऐसी समिति का गठन स्वास्थ्य देखभाल के संवैधानिक अधिकार की मान्यता का प्रतीक है, यहाँ तक ​​कि हिरासत में मौजूद लोगों के लिए भी।

यह कदम अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार मानकों के अनुरूप है जो सभी व्यक्तियों को उनकी कानूनी स्थिति की परवाह किए बिना पर्याप्त चिकित्सा देखभाल प्रदान करने के महत्व पर जोर देता है। जैसे ही समिति ने अपना काम शुरू किया है, परिवर्तनकारी सिफारिशों के लिए प्रत्याशा अधिक है जो संभावित रूप से दिल्ली में जेल स्वास्थ्य सेवा के परिदृश्य को नया आकार दे सकती है।

यह बदलाव न केवल नैतिक विचारों से प्रेरित है बल्कि कानूनी आदेशों से भी प्रेरित है जो कैदियों के स्वास्थ्य और सुरक्षा को सुनिश्चित करने के दायित्व को रेखांकित करता है। प्रमुख पहलों में जेलों के भीतर व्यापक चिकित्सा सुविधाओं की स्थापना शामिल है, जो विभिन्न स्वास्थ्य मुद्दों से निपटने के लिए सुसज्जित हैं। ऑन-साइट स्वास्थ्य देखभाल की दिशा में इस कदम का उद्देश्य उपचार में देरी को कम करना और समग्र पहुँच में वृद्धि करना है। इसके अतिरिक्त, यह जेल में बंद व्यक्तियों के सामने आने वाली अनूठी स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों, जैसे संचारी रोगों और मानसिक स्वास्थ्य स्थितियों, का समाधान करना चाहता है। नवोन्मेषी टेलीमेडिसिन कार्यक्रम भी शुरू किए गए हैं, जो कैदियों को दूर से ही स्वास्थ्य पेशेवरों से परामर्श करने में सक्षम बनाते हैं।

यह प्रौद्योगिकी-संचालित दृष्टिकोण न केवल स्वास्थ्य देखभाल वितरण की दक्षता में सुधार करता है बल्कि कैदियों को बाहरी चिकित्सा सुविधाओं तक ले जाने से जुड़े जोखिमों को भी कम करता है। महत्वपूर्ण रूप से, ये प्रयास चिकित्सा गोपनीयता और गोपनीयता बनाए रखने की प्रतिबद्धता के साथ हैं, यह सुनिश्चित करते हुए कि कैदियों को सामान्य आबादी के व्यक्तियों के समान गोपनीयता प्राप्त हो।

जेल की सेटिंग के भीतर डॉक्टर-रोगी की गोपनीयता की पवित्रता को बनाए रखने के उपायों के साथ, सुरक्षा चिंताओं और चिकित्सा अधिकारों के बीच संतुलन बनाना एक प्राथमिकता बनी हुई है। हालाँकि, प्रगति हो रही है, चुनौतियाँ बनी हुई हैं। अत्यधिक भीड़-भाड़ वाली सुविधाएँ और सीमित संसाधन स्वास्थ्य सेवाओं पर दबाव डाल सकते हैं, जिससे संभावित रूप से देखभाल की गुणवत्ता से समझौता हो सकता है।

वकालत समूह इन मुद्दों के समाधान के लिए चल रहे सुधारों के महत्व पर जोर देना जारी रखते हैं और यह सुनिश्चित करते हैं कि कैदियों के चिकित्सा अधिकारों को न केवल मान्यता दी जाए बल्कि सक्रिय रूप से संरक्षित किया जाए। अधिक न्यायसंगत और मानवीय सुधारात्मक प्रणाली की खोज में, चिकित्सा अधिकारों पर ध्यान एक महत्वपूर्ण स्तंभ के रूप में खड़ा है। जैसे-जैसे जेल स्वास्थ्य देखभाल के बारे में बातचीत विकसित होती है, व्यापक लक्ष्य स्पष्ट रहता है: प्रत्येक व्यक्ति की गरिमा और भलाई को बनाए रखना, चाहे उनकी कैद की स्थिति कुछ भी हो।

मानवाधिकार अधिवक्ताओं और जेल सुधार संगठनों सहित हितधारक, घटनाक्रम की बारीकी से निगरानी कर रहे हैं और आशावाद व्यक्त कर रहे हैं कि यह पहल व्यापक प्रणालीगत सुधारों के लिए उत्प्रेरक के रूप में काम करेगी। दिल्ली उच्च न्यायालय की निर्णायक कार्रवाई न केवल कानून की व्याख्या करने और उसे बनाए रखने में न्यायपालिका की भूमिका को रेखांकित करती है, बल्कि न्याय प्रणाली के भीतर व्यक्तियों के जीवन और कल्याण को प्रभावित करने वाले मुद्दों से सक्रिय रूप से जुड़ने में भी है। समिति के निष्कर्षों और उसके बाद की सिफारिशों का बेसब्री से इंतजार किया जा रहा है, इस उम्मीद के साथ कि वे दिल्ली में कैद आबादी के लिए बेहतर स्वास्थ्य देखभाल के एक नए युग की शुरुआत करेंगे।

‘मैं गलत समय में खेलती थी’: पूर्व एथलीट अंजू बॉबी जॉर्ज ने सुनाया कॉन्ग्रेस काल का कड़वा अनुभव, बोलीं – PM मोदी की अगुवाई में भारत बना खेल महाशक्ति

भारत की स्टार एथलीट रही अंजू बॉबी जॉर्ज ने पीएम मोदी की जमकर तारीफ की है। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई में भारत खेलों की महत्वपूर्ण शक्ति बन गया है। जॉर्ज ने कहा कि हमारे समय में खिलाड़ी ही कम होते थे, अब के जैसा माहौल भी नहीं था। उन्होंने कहा कि पहले का माहौल खेलों के लिए बेहतर नहीं था। इतना प्रोत्साहन नहीं मिलता था। इसे कॉन्ग्रेस पर हमले की तरह देखा जा रहा है।

बता दें कि पीएम मोदी ने क्रिसमस के मौके पर ईसाई समुदाय द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में हिस्सा लिया था। इसी कार्यक्रम में स्टार एथलीट रही अजूं बॉबी जॉर्ज भी मौजूद थीं। उन्होंने कहा, “एक खिलाड़ी के तौर पर 25 सालों से सबकुछ देख रही हूँ। पहले की तुलना अब काफी बदलाव देख रही हूँ। जब 20 साल पहले मैंने भारत के लिए विश्व स्तर पर पहला पदक जीता था तब मेरा विभाग मुझे पदोन्नति नहीं दे रहा था। वहाँ सब कह रहे थे कि हमारे यहाँ ऐसा नहीं होता है। उसके बाद जब नीरज चोपड़ा ने पदक जीता तो मैंने काफी बदलाव देखें। हमने, आपने और पूरे भारत ने जिस तरह जश्न मनाया, उससे मुझे काफी जलन हुई। मुझे लगता है कि मैं खेलों में गलत समय पर थी।”

पीएम मोदी की जमकर तारीफ

अंजू बॉबी जॉर्ज ने कहा, “खेलों इंडिया, फिट इंडिया के जरिए खेलों की बात अब सब जगह हो रही है। भारत अब फिटनेस को अपना रहा है और खेलों में आगे बढ़ रहा है। हमारे खिलाड़ी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अच्छा प्रदर्शन कर रहे हैं। हमारे समय एक या दो एथलीट होते थे। अब काफी खिलाड़ी हैं। यह आपके नेतृत्व के कारण हुआ है। महिला सशक्तिकरण अब सिर्फ शब्द नहीं है। भारत की लड़कियाँ सपना देख रही हैं। उन्हें पता है कि उनका सपना पूरा होगा। इस बात से काफी खुशी है कि हम 2036 ओलंपिक की मेजबानी के लिए तैयार हैं। ओलंपिक के लिए हमने तैयारियाँ शुरू कर दी हैं और उसके लिए बैठके हो रही हैं।”

बता दें कि अंजू बॉबी जॉर्ज ने साल 2003 में विश्व एथलेटिक्स चैंपियनशिप में कांस्य पदक जीता था। ऐसा करने वाली वो पहली एथलीट बनीं थी। उस समय खिलाड़ी जो कुछ भी बन रहे थे, अपने दम पर। उनका इशारा इसी तरफ था। अंजू को कर्णम मल्लेश्वरी की श्रेणी में रखा जाता है, जिन्होंने अपने दम पर इतिहास रचा था।