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रोहित को बनाना चाहते थे मुस्लिम, जहर खाकर दे दी जान: हथियारों के साथ घर में घुसे थे सलमान-सत्तार, मोबाइल में मिले Video से खुला राज

उत्तर प्रदेश के औरैया जिले में धर्मान्तरण के दबाव के चलते एक हिन्दू युवक ने आत्महत्या कर ली। मृतक का नाम रोहित है। रोहित के परिजनों का आरोप है कि इस्लाम न कबूलने की वजह से उस पर सत्तार, सलमान आदि ने पॉक्सो के तहत केस दर्ज करवा दिया था। आरोपितों ने रोहित पर एक मुस्लिम लड़की से निकाह करने का दबाव भी बनाया था।

दरअसल, शनिवार (18 नवंबर, 2023) को जहर खा कर की गई आत्महत्या से पहले रोहित ने वीडियो बना कर अपनी पीड़ा जाहिर करने का प्रयास किया था। फ़िलहाल, पुलिस ने एक आरोपित को गिरफ्तार कर लिया है और बाकियों की तलाश की जा रही है।

यह मामला औरैया जिले के विधूना थानाक्षेत्र का है। यहाँ के गाँव बरके पुरवा की रहने वाली सरोजनी देवी ने पुलिस में शिकायत दर्ज करवाई है। शिकायत में पीड़िता ने बताया कि उनके बेटे रोहित की औरैया के ही सत्तार से अच्छी दोस्ती थी। इसी दोस्ती के चलते रोहित का सत्तार के घर आना जाना था। घर आने-जाने के दौरान रोहित की जान-पहचान सत्तार की बेटी से हो गई।

आरोप है कि सत्तार अपनी बेटी का निकाह रोहित से करवाना चाहता था। इसलिए उसने सलमान और बंटी खान आदि के साथ मिल कर रोहित पर इस्लाम कबूल करने का दबाव बनाया। पीड़ितों का आरोप है कि जब रोहित ने हिन्दू धर्म छोड़ने से मना कर दिया तब आरोपितों ने उस पर औरैया के ही सहार थाने में 6 सितंबर, 2023 को FIR दर्ज करवा दी।

इस FIR में सलमान ने अपनी बहन को नाबालिग बताते हुए रोहित पर उसके अपहरण का आरोप लगाया था। इसी केस में रोहित के साथ अनुज और आर्यन खान को भी नामजद किया गया था जिन पर अपहरण में रोहित के सहयोग का आरोप था।

तब इस मामले में पुलिस ने रोहित को गिरफ्तार कर के लड़की को बरामद करने का दावा किया था। हालाँकि, ऑपइंडिया से बात करते हुए मृतक की बहन ने दावा किया है कि उनके भाई पर आरोप लगाने वाली लड़की बालिग़ थी जिसकी उम्र सत्तार और सलमान ने कम कर के लिखवाई थी।

बाद में रोहित पर नाबालिग से रेप की धारा और पॉक्सो एक्ट की बढ़ोत्तरी की गई थी। इस मामले में लगभग डेढ़ माह जेल में रह कर रोहित बाहर निकला। वह ई रिक्शा चला कर अपना गुजरा करने लगा। 15 नवंबर, 2023 को सुबह लगभग 7 बजे सत्तार, सलमान, बंटी खां, दुल्ली खां, टुन्नन खां और वकील खां रोहित के घर पहुँचे। आरोपितों के हाथों में चाकू और गँड़ासे थे जिसे दिखा कर उन्होंने रोहित को इस्लाम कबूल करने का दबाव बनाया। इस दौरान रोहित को जान से मारने और उसके माता-पिता को जेल भिजवाने की धमकी दी गई।

इस केस में सरोजनी देवी का आरोप है कि गाँव वालों के बीच-बचाव के चलते उनके परिवार की जान बच पाई थी। वहीं गाँव से चले जाने के बाद भी सत्तार अपने साथियों सहित रोहित पर इस्लाम कबूलने का दबाव बनाता रहा। रोहित की बहन ने ऑपइंडिया से बात करते हुए बताया कि रोहित ने किसी भी हाल में हिन्दू धर्म न छोड़ने का ऐलान कर दिया था।

आखिरकार रोहित ने पता नहीं किस मजबूरी या दबाव में 18 नवंबर को पहले अपनी पूरी आपबीती एक वीडियो में बताई और फिर जहर खा लिया। वीडियो में उसने सत्तार के परिवार वालों पर खुद को प्रताड़ित करने का आरोप लगाया है।

पुलिस ने इस मामले में सत्तार, सलमान, बंटी, वकील, दुल्ली और टुन्नन खां को नामजद करते हुए केस दर्ज कर लिया है। इन सभी पर IPC की धारा 147, 506, 306 के साथ उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध अधिनियम की धारा 3/5(1) के तहत कार्रवाई की गई है।

बता दें कि ऑपइंडिया के पास FIR कॉपी मौजूद है। औरैया की पुलिस अधीक्षक चारू निगम के मुताबिक एक आरोपित को गिरफ्तार कर के बाकियों की तलाश और मामले में जाँच करवाई जा रही है।

भारत से सटे सीमा पर होने वाले ‘इज्तिमा’ पर नेपाल सरकार ने लगाई रोक, दुनियाभर से 50000+ मुस्लिमों का होना था जमावड़ा, अब 24 घंटे में लाव लश्कर हटाने का आदेश

धार्मिक संवेदनशीलता का हवाला देते हुए नेपाल सरकार ने भारत-नेपाल सीमा पर होने वाली मुस्लिमों की सालाना इस्लामी जलसा इज्तिमा पर रोक लगा दी है। यहाँ इस्लाम पर तकरीरें होनी थीं। कहा जा रहा है इसमें कई प्रतिबंधित मुस्लिम मजहबी नेताओं को भी बुलाया गया था। जिस पर अब नेपाल के गृह मंत्रालय ने रोक लगते हुए इस आयोजन के लिए लगाए गए टेंट और इसके लिए आए लोगों से अपना इलाका 24 घंटे के अंदर खाली करने को कहा है।

दरअसल, जोगबनी सीमा से सटे नेपाल के कोशी के सुनसरी जिले में इज्तिमा की तैयारी जोर-शोर से चल रही थी। नेपाल का ये इलाका भारत के बिहार राज्य के अररिया जिले के शहर जोगबनी से लगा हुआ है।

इस जिले के दुहबी और इटहरी में 21 से 23 नवंबर तक इज्तिमा के लिए 80 एकड़ में टेंट लगाए गए। इसमें आने वाले करीब 50 हजार लोगों के रहने के पूरे इंतजामात भी किए गए थे।

इसके लिए दुनिया भर के कई देशों के मुस्लिमों को बुलावा भेजा गया था। बता दें कि सुनसरी जिला मजहबी तौर से काफी संवेदनशील इलाका है। यहाँ मुस्लिमों के इस बड़े आयोजन से हिंदू बाहुल्य देश नेपाल में धार्मिक भावनाओं के भड़कने की आशंका थी।

गौरतलब है कि बीते महीने अक्टूबर की शुरुआत में ही भारत के इस पड़ोसी देश के बाँके जिला के नेपालगंज में भारी सांप्रदायिक हिंसा भड़की थी। तब यहाँ मुस्लिम भीड़ ने एक फेसबुक पोस्ट को लेकर न सिर्फ ‘सर तन से जुदा’ और ‘लब्बैक-लब्बैक’ के नारे लगाए, जुलुस निकाले बल्कि हिन्दुओं की रैली पर पथराव कर हिंसा की थी।

इसी से बचने के लिए नेपाल ने दुर्घटना से सुरक्षा भली का रवैया अपनाया है। इस वजह से भारत की सीमा के पास होने वाले इस आयोजन को सुरक्षा की दृष्टि से रोक लगा दी गई है। इस मामले में सुनसरी जिला प्रशासन को खबर लगी थी कि इज्तिमा में भारत सहित कई देशों के प्रतिबंधित कट्टर मुस्लिम समर्थक मौलाना, उलेमा और मौलवी शिरकत करने वाले हैं।

इसके आयोजन से नेपाल को पड़ोसी मुल्क भारत से रिश्ते खराब होने का अंदेशा भी था। मुस्लिमों के इस सालाना मजहबी आयोजन को लेकर सुनसरी जिला प्रशासन ने नेपाल सरकार से सलाह माँगी थी। सुनसरी की चीफ जिलाधिकारी हुमकला पाण्डे ने ‘इज्तिमा’ को लेकर गृह मंत्रालय को पत्र लिखा था।

वहीं मामले की गंभीरता को देखते हुए गृह मंत्रालय ने किसी भी कीमत पर इस कार्यक्रम को रोकने का निर्देश जारी कर दिया। जिलाधिकारी पाण्डे ने बताया कि गृह मंत्रालय के निर्देश के बाद आयोजकों को कार्यक्रम रोकने के लिए लिखित निर्देश जारी कर दिया गया है।

नेपाल ने ये फैसला यहाँ के खुफिया विभाग और कई राजनीतिक दलों के साथ सुनसरी जिले के अधिकारियों के साथ बैठक करने के बाद लिया। इसके मद्देनजर सुनसरी के चीफ जिलाधिकारी जिले के सुरक्षा अधिकारियों के संग आयोजन स्थल का मौका मुआयना करने गए थे।

इस दौरान उन्होंने इज्तिमा के लिए लगाए गए टेंटों को तुंरत हटाने के साथ ही बाहर से वहाँ आए लोगों को 24 घंटे के अंदर जिला छोड़ने का निर्देश भी दिया।

यदि PM मोदी ‘पनौती’ हैं तो भारत को ‘पनौती’ प्रधानमंत्री ही चाहिए

  1. क्या आपको पता है आज भारत का खेल बजट कितना है?
  2. क्या आप ‘TOPS’ यानी टारगेट ओलंपिक पोडियम स्कीम के बारे में जानते हैं?
  3. क्या आप ‘खेलो इंडिया’ के तहत देशभर में तैयार हो रहे टैलेंट पूल के बारे में जानते हैं?

इन सवालों का जवाब तीन कारणों से जानना जरूरी है। पहला, इससे आपको पता चलता है कि कैसे मोदी सरकार ने उस देश में स्पोर्टस का एक ‘इको सिस्टम’ तैयार कर दिया है, जो देश मानता था कि पढ़ोगे-लिखोगे तो बनोगे नवाब, खेलोगे-कूदोगे तो होगे खराब। जिस देश की सरकारें मानती थीं कि खेल ही है, उसके लिए कैसा सिस्टम

दूसरा, जिस देश में गली-गली में टैलेंट दम तोड़ देते थे, उस देश के गली-गली से निकले टैलेंट अब विश्व स्तरीय प्रशिक्षण पाकर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर देश को गौरवान्वित होने का क्षण दे रहे हैं। इसी साल भारत ने एशियाई खेलों का अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया है। ‘खेलो इंडिया’ अभियान से निकले करीब सवा सौ खिलाड़ी एशियाई खेलों का हिस्सा बने थे। इनमें से 36 ने मेडल भी जीत लिए।

इन सवालों के जवाब जानने का तीसरा कारण तात्कालिक है। क्योंकि 2014 और 2019 के जनादेश से घृणा करने वाला वर्ग क्रिकेट विश्व कप के फाइनल की हार के बाद आपके प्रधानमंत्री को ‘पनौती’ बता आपके वोट को अपमानित करने का काम कर रहा है।

किसी देश में खेल का ‘इको सिस्टम’ कितना बेहतर है, इसका पता ओलंपिक में उस देश की तरफ से क्वालिफाई करने वाली खिलाड़ियों की संख्या से पता चलता है। 2012 में लंदन में हुए ओलंपिक के लिए भारत के 83 एथलीट ने क्वालिफाई किया था। लेकिन, मोदी सरकार के रहते हुए दो ओलंपिक रियो डी जेनेरियो 2016 और टोक्यो 2020 ओलंपिक के लिए क्रमश: 117 और 126 खिलाड़ियों ने क्वालिफाई किया है।

अब मोदी सरकार में खेल का ढाँचा बनाने के लिए उठाए गए कदमों पर गौर करिए। 9 साल पहले के मुकाबले खेल बजट आज तीन गुणा हो चुका है। इस साल के लिए केंद्र सरकार ने युवा और खेल मंत्रालय को 3389.32 करोड़ रुपए का बजट दिया है। लक्ष्य है खिलाड़ियों को बेहतर सुविधाएँ और प्रशिक्षण उपलब्ध कराकर 2024 के पेरिस ओलंपिक और पैरालंपिक में प्रदर्शन और बेहतर करना।

उल्लेखनीय है कि 2007-08 में भारत का खेल बजट महज 708 करोड़ रुपए का था। हालाँकि 2009-10 में यह बजट 3670 करोड़ रुपए हो गया था। पर इसका कारण खेल का इको सिस्टम विकसित करना न होकर, 2010 के दिल्ली राष्ट्रमंडल खेलों की तैयारी था। इसके बाद से खेल बजट में फिर से कमी आने लगी। लेकिन मोदी सरकार इस क्षेत्र के बजट में लगातार उल्लेखनीय वृद्धि कर रही है।

इस पैसे को खर्च करने के लिए बकायदा एक रोडमैप तैयार किया गया है। खेलो इंडिया, TOPS जैसी योजना तैयार की गई है। इसके तहत स्कूल, कॉलेज, विश्वविद्यालय के स्तर पर प्रतिभाशाली खिलाड़ियों की पहचान की जा रही है। फिर उनके प्रशिक्षण, डाइट और अन्य चीजों पर सरकार खर्च कर रही है।

खेलो इंडिया के तहत टैलेंट पूल तैयार करने का काम किया जा रहा है। इस समय देशभर के करीब तीन हजार खिलाड़ियों को इस योजना के तहत प्रशिक्षण दिया जा रहा है। इन खिलाड़ियों को 8 साल के लिए सालाना 5 लाख रुपए भी दिए जा रहे हैं। इसी तरह TOPS के तहत यह सुनिश्चित किया जा रहा है कि देश के शीर्ष खिलाड़ियों को दुनिया का श्रेष्ठ प्रशिक्षण मिले।

इसका फायदा ओलंपिक से लेकर एशियाई खेलों तक भारत के प्रदर्शन में आए सुधार तक में देखने को मिला है। यह सब उस देश में हो रहा है, जहाँ खेल का क्षेत्र हमेशा से सरकारी उपेक्षा और लालफीताशाही का शिकार रहा है। जिसके कारण कभी-कभार किसी अभिनव बिंद्रा ने स्वर्णिम प्रदर्शन किया भी तो वह देश के खेल ढाँचे की सफलता से अधिक उनकी व्यक्तिगत अर्जित सफलता थी।

आज ग्रामीण स्तर तक खेल के ढाँचे को लेकर केंद्र सरकार पैसा दे रही है। राष्ट्रीय खेल महासंघों को सहायता मिल रही है। अंतराष्ट्रीय स्पर्धाओं के विजेता हो या उनके कोच, उन्हें पुरस्कृत किया जा रहा है। राष्ट्रीय खेल पुरस्कार, उत्कृष्ट खिलाड़ियों को पेंशन, पंडित दीनदयाल उपाध्याय राष्ट्रीय खेल कल्याण कोष, राष्ट्रीय खेल विकास कोष, भारतीय खेल प्राधिकरण (SAI) के जरिए प्रशिक्षण केंद्रों का संचालन हो रहा है। पैसे का आवंटन योजनाओं के क्रियान्वयन के आधार पर हो रहा न कि राज्यों के राजनीतिक रसूख को नाप-तौल कर।

ऐसा भी नहीं है कि यह सब मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल में शुरू हुआ है। खेल को लेकर 2014 में आते ही इस सरकार का विजन स्पष्ट था। इस सरकार का मानना रहा है कि देश की प्रगति इस बात से भी जुड़ी हुई है कि देश में खेल का ढाँचा कितना व्यापक और कितना मजबूत है। यही कारण है कि मोदी सरकार ने अपने पहले कार्यकाल में भी खेल विकास योजनाओं के तहत 6801 करोड़ 30 लाख रुपए जारी किए थे।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसी साल गोवा में 37वें राष्ट्रीय खेलों को संबोधित करते हुए कहा भी था, “किसी भी देश के खेल क्षेत्र की प्रगति का सीधा नाता उस देश की अर्थव्यवस्था की प्रगति से भी जुड़ा होता है। नकारात्मकता और निराशा भले मैदान में ही क्यों न हो, उसका असर जीवन के हर क्षेत्र पर दिखता है। खेल क्षेत्र की सफलता को भारत की सफलता से अलग कर नहीं देखा जा सकता है।”

खेल और अर्थव्यवस्था के बीच जो लिंक प्रधानमंत्री बता रहे हैं, उसे बाजार भी मानता है। क्रिकेट विश्व कप के आयोजन से भारतीय अर्थव्यवस्था में करीब 22 हजार करोड़ रुपए आने का अनुमान है। सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि 2036 के जिस ओलंपिक की मेजबानी हासिल करने को मोदी सरकार प्रयास कर रही है, वह मिलने पर अर्थव्यवस्था को कितना बड़ा बूस्ट मिलेगा।

अब लौटते हैं 19 नवंबर 2023 को अहमदाबाद के नरेंद्र मोदी स्टेडियम में। 50 ओवर के विश्व कप क्रिकेट के फाइनल में भारत और ऑस्ट्रेलिया की टीम मुकाबिल थी। भारतीय टीम पूरे टूर्नामेंट में अपराजेय रही। फाइनल में खिलाड़ियों का उत्साहवर्धन करने प्रधानमंत्री मोदी भी स्टेडियम पहुँचे। इसमें कुछ भी नया नहीं था। पूर्व में भी हम प्रधानमंत्री मोदी को विभिन्न क्षेत्रों के खिलाड़ियों का इस तरह से उत्साहवर्धन करते देख चुके हैं। लेकिन भारतीय टीम की हार के बाद जिस तरह की टिप्पणियाँ की गई, उससे प्रतीत होता है कि मोदी से घृणा करने वाला वर्ग अपने ही देश की हार की प्रतीक्षा में बैठा था।

क्रिकेट वह खेल है, जिसके प्रशासन और ढाँचे में सरकार का कोई दखल नहीं होता है। देश के गली-गली में क्रिकेट को पहुँचाने का श्रेय भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (BCCI) को जाता है। समय-समय पर बीसीसीआई के प्रशासनिक रवैए को लेकर विवाद होते रहे हैं, बावजूद इसके यह खेल देश में समय के साथ अपना असर बढ़ाते गया। 1983 में पहली बार क्रिकेट वर्ल्ड कप जीतना हो या फिर 2011 में दोबारा से 50 ओवर के क्रिकेट का विश्व विजेता बनना, यह बीसीसीआई के ही प्रशासनिक नेतृत्व में हुआ है। यह महज संयोग था कि उस समय प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी और मनमोहन सिंह थे। यदि खेलों को लेकर ये सरकारें गंभीर होती तो 2008 तक मिले 17 ओलंपिक मेडल में से 11 देने वाली हॉकी ही बेसहारा नहीं होती।

खेल के क्षेत्र में किसी सरकार के काम का मूल्यांकन इस बात पर होता है कि उसने कैसा देशव्यापी ढाँचा खड़ा किया। जमीन पर जाकर प्रतिभा की पहचान करने की व्यवस्था किस तरह तैयार की। प्रतिभाओं को कैसे तराशा। उन्हें विश्वस्तरीय मुकाबलों के लिए कैसे तैयार किया। इन्हीं क्षेत्रों में कार्य से कोई देश खेल की महाशक्ति बनता है। लेकिन पूर्व की सरकारों ने इस दिशा में गंभीर कार्यों को लेकर कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई। इस दिशा में काम 2014 के बाद शुरू हुए हैं।

खेल की दुनिया में महाशक्ति बनने के लिए भारत को अभी लंबी यात्रा करनी होगी। मोदी सरकार इस यात्रा के लिए वह जमीन तैयार कर रही है, जिस पर चलकर अमेरिका, रूस, चीन जैसे देश खेल की महाशक्ति बने। यदि इस जमीन को तैयार करने वाला प्रधानमंत्री ‘पनौती’ है तो वह हमें स्वीकार है। अहमदाबाद की एक खराब शाम या एक कप के हाथ से फिसल जाने से हम किसी ऐसे नेतृत्व को स्वीकार नहीं कर सकते, जिनका किसी कप के हाथ में आने के समय सत्ता में होना महज संयोग था। हम जानते हैं कि संयोग की यात्रा पर एक दिन पूर्णविराम लगता है। पर मजबूत जमीन कई पीढ़ियों का भविष्य बदल देती है। वह तब भी स्वर्णिम मार्ग पर ले जाती है, जब जमीन तैयार करने वाला सूरज अपनी यात्रा पूर्ण कर चुका होता है। वह देश को गौरवान्वित होने के असंख्य क्षण बार-बार प्रदान करता रहता है।

राँची के 4 मंदिरों में तोड़फोड़, कटर से काट दी देवी-देवताओं की प्रतिमाएँ: 3 दिन बाद भी पुलिस के हाथ खाली

झारखंड की राजधानी राँची में एक साथ कई हिन्दू मंदिरों में तोड़फोड़ की खबर है। तोड़फोड़ के दौरान देवी-देवताओं की मूर्तियों को कटर से काटा गया है। इस घटना के बाद हिन्दू संगठनों ने नाराजगी जताते हुए प्रदर्शन किया है। शुक्रवार (17 नवंबर, 2023) को सामने आई इस घटना में फ़िलहाल पुलिस अभी तक किसी भी आरोपित को गिरफ्तार नहीं कर पाई है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक घटना राँची के मांडर इलाके की है। यहाँ शुक्रवार को जब लोग सुबह उठे तो उनको 4 मंदिरों में देवी-देवताओं की प्रतिमाओं के खंडित होने की जानकारी मिली। लोगों को पता चला कि मुड़मा स्थित महावीर मंदिर, छोटा बजरंग बली मंदिर, बूढ़ा महादेव और मड़ई देवी मंडप में किसी असामाजिक तत्व ने न सिर्फ तोड़फोड़ की थी बल्कि मूर्तियों को कटर चला कर काट दिया था। थोड़ी ही देर में क्षतिग्रस्त प्रतिमाओं के फोटो और वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गए।

वहीं इस घटना से नाराज लोगों ने सड़क पर उतर कर प्रदर्शन किया। इस दौरान जाम लगाया गया और आरोपितों को जल्द से जल्द गिरफ्तार करने की माँग की गई। हालात को सँभालने पहुँचीं पुलिस ने नाराज लोगों को समझाया और शांत करवाया। छठ पर्व होने की वजह से लोगों ने प्रशासन का सहयोग किया। हालाँकि, इस दौरान जल्द कार्रवाई करने का अल्टीमेटम भी दिया गया। पुलिस ने अज्ञात आरोपितों के खिलाफ केस दर्ज कर जाँच शुरू कर दी। हालाँकि अभी तक किसी की गिरफ्तारी नहीं हो पाई है।

झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री और भाजपा नेता बाबूलाल मरांडी ने राज्य में मंदिरों को क्षतिग्रस्त होने जैसी घटनाओं के आम बात हो जाने का आरोप लगाया है। उन्होंने राँची पुलिस द्वारा आरोपितों की जल्द गिरफ्तारी की उम्मीद जताई है। इस मामले में ऑपइंडिया से बात करते हुए स्थानीय भाजपा नेता आनंद सिंह ने इस घटना के पीछे ईसाई मिशनरियों की साजिश की आशंका जताई है। आनंद सिंह ने इस मामले में अब तक कोई गिरफ्तारी न होने की वजह प्रशासनिक अधिकारीयों द्वारा की जा रही ढिलाई को जिम्मेदार बताया।

जिस ऑस्ट्रेलिया ने जीता वर्ल्ड कप उसके कप्तान ICC की टीम में नहीं, रोहित शर्मा के नेतृत्व को किया सलाम: भारत के 6 खिलाड़ी

वर्ल्डकप के फाइनल मुकाबले में भले ही भारत को ऑस्ट्रेलिया के हाथों शिकस्त झेलनी पड़ी है लेकिन उसके दबदबे की कहानी अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट काउंसिल (ICC) की टीम बयाँ कर रही है। ICC की 12 सदस्यीय टीम में 6 खिलाड़ी भारतीय हैं।

ICC वर्ल्डकप टूर्नामेंट में खेलने वाली सभी टीमों के खिलाड़ियों में से चुन कर एक टीम तैयार करती है। इस टीम में टूर्नामेंट के दौरान सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने वाले खिलाड़ियों को जगह दी जाती है। भारत के 6 खिलाड़ियों का इसमें होना दिखाता है कि भारत ने टूर्नामेंट में कितना मजबूत प्रदर्शन किया है।

इस टीम का कप्तान भारतीय टीम के कप्तान रोहित शर्मा को बनाया गया है। रोहित की कप्तानी और उनकी बल्लेबाजी को देखते हुए उन्हें इस टीम का कप्तान बनाया गया है। उनके शुरूआती ओवर में तेजी से रन बनाने और बड़े स्कोर खड़े करने में उनकी भूमिका देखते हुए उन्हें कप्तान की भूमिका सौंपी गई है।

टीम में रोहित के बाद भारतीय बल्लेबाज विराट कोहली को जगह दी गई है। विराट कोहली इस टूर्नामेंट में सबसे अधिक रन बनाने वाले बल्लेबाज रहे हैं। उन्होंने पूरे टूर्नामेंट के दौरान 765 रन बनाए हैं। वर्ल्डकप के दौरान खेली गई 11 पारियों में से केवल 2 बार ऐसा हुआ है जब वह 50 से कम रन पर आउट हुए हों।

विराट कोहली ने इसी वर्ल्डकप के दौरान एकदिवसीय मैच में सबसे अधिक अर्ध शतक बनाने का रिकॉर्ड भी अपने नाम किया है। विराट कोहली को इसी लिए इस टीम में जगह मिली है। विराट के साथ ही भारतीय विकेटकीपर केएल राहुल को भी इस टीम में शामिल किया गया है।

राहुल की ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ 97 रनों की पारी और उनके कुल 452 रनों को भारतीय टीम के प्रदर्शन के लिए महत्वपूर्ण बताते हुए ICC ने उन्हें अपनी टीम में जगह दी है। 4.25 रन/ओवर की दर से गेंदबाजी करने वाले रविन्द्र जडेजा भी इसका हिस्सा हैं।

भारतीय गेंदबाज जसप्रीत बुमराह की 4.06 रन प्रति ओवर देने के करिश्माई प्रदर्शन के चलते उन्हें भी इस टीम में जगह मिली है। उन्होंने यह कारनामा मैच के शुरूआती ओवर में गेंद डालते हुए किया है जहाँ फील्डिंग से भी उतनी सहायता नहीं मिलती।

टीम में भारतीय गेंदबाज मोहम्मद शमी को भी जगह दी गई है। वह इस वर्ल्डकप टूर्नामेंट के सर्वाधिक विकेट लेने वाले गेंदबाज भी हैं। उन्होंने पूरे वर्ल्डकप में 24 विकेट लिए हैं। उनके इस जबरदस्त प्रदर्शन को देखते हुए ICC ने उन्हें अपनी टीम में शामिल किया है। शमी वर्ल्ड कप में तीसरे सर्वाधिक विकेट लेने वाले गेंदबाज भी बन गए हैं।

ICC की टीम में कुल 12 खिलाड़ी रखे गए हैं। इनमें से 6 भारतीय, 2 दक्षिण अफ्रीकी, 2 ऑस्ट्रेलिया, 1 श्रीलंका और 1 न्यूजीलैंड से हैं। ऑस्ट्रेलिया की तरफ से एडम जम्पा और ग्लेन मैक्सवेल जबकि दक्षिण अफ्रीका से जेराल्ड कोट्जी और क्विंटन डी कॉक को शामिल किया गया है। श्रीलंका से दिलशान मधुशंका और न्यूजीलैंड से डैरिल मिचेल को शामिल किया गया है।

यतीमखाना में जानवरों की तरह ठूँसे हुए थे अनाथ, मौलवी को देख बंद कर लेते थे ऑंखें: दीनी तालीम के नाम पर तालिबानी जीवन जीते बच्चे NCPCR को मिले

कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरु में अवैध तरीके से एक यतीमखाना चल रहा था। इस दारूल उलूम सैय्यादिया नाम के यतीमखाने में खुलेआम बाल अधिकारों का उल्लघंन कर बच्चों को मानसिक यातना दी जा रही थी।

आलम ये है कि यहाँ रहने वाले बच्चे मौलवी से इतना खौफ खाए हुए थे कि उसके आते ही हिलना-डुलना बंद कर आँखें बंद कर लेते है। यहाँ बच्चों को पूरे दिन बगैर किसी खेलकूद के मस्जिद में रखा जाता है।

ये खुलासा राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) की औचक निरीक्षण में सामने आई हैं। एनसीपीसीआर ने इस मामले में संज्ञान लेकर कर्नाटक सरकार के चीफ़ सेक्रेटरी को नोटिस जारी किया है।

गौरतलब है कि NCPCR के अध्यक्ष प्रियांक कानूनगो ने बेंगलुरू में अवैध तरीके से चलाए जा रहे दारूल उलूम सैय्यादिया यतीम खाना का औचक निरीक्षण किया था। इस ग़ैरपंजीकृत निरीक्षण के दौरान यहाँ कई अनियमितताएँ पाई गई। इसका सारा ब्यौरा NCPCR के अध्यक्ष ने अपने एक्स हैंडल पर शेयर किया है।

100 वर्ग फ़िट के कमरे में 8 बच्चे

यहाँ क़रीब 200 यतीम यानी अनाथ बच्चों को रखा गया है। जानवरों की तरह 100 वर्ग फ़िट के कमरे में 8 बच्चों को रखा गया है। इस तरह के 5 कमरों में 40 बच्चे रहते हैं तो कॉरिडोर में 16 बच्चे रहते हैं।

बाक़ी बचे 150 बच्चों को मस्जिद के नमाज़ पढ़ने वाले 2 अलग-अलग हाल में रात को सुलाया जाता हैं। ये सभी बच्चे दिन भर इन्हीं नमाज़ वाले हाल में रहकर मदरसे की इस्लामिक दीनी तालीम लेते हैं।

न स्कूल न खेल का सामान

इस यतीमखाने में रहने वाले बच्चे बेहद छोटे हैं। इन मासूमों के लिए यहाँ न कोई खेल का सामान है और न ही ये बच्चे टेलीविजन देख सकते हैं। ये बच्चे इतने डरे हुए हैं कि मौलवी को आता देख सारे के सारे वहीं खड़े होकर आँख बंद कर लेते हैं।

तड़के सुबह 3:30 पर जगा कर उन्हें मदरसे की दीनी तालीम में लगा दिया जाता है। इनको दोपहर में सोने को कहा जाता है। इसके बाद फिर शाम से रात तक इनकी तालीम शुरू हो जाती है।

पूरे दिन में नमाज़ के लिए बस छोटे ब्रेक दिए जाते हैं। न इन बच्चों के खाने का ठिकाना है, न आराम का और न मनोरंजन के लिए कोई इंतजाम है। बस इन्हें सारे वक्त मस्जिद के अंदर रखा जाता है। एक तरह से ये बच्चे मध्ययुगीन तालिबानी जीवन जी रहे हैं। इनके हिस्से में जैसे संविधान में लिखा जीवन है ही नहीं।

यतीमखाने की इमारत में चल रहा स्कूल

जानकारी के मुताबिक, करोड़ों की वफ़्फ़ की सम्पत्ति वाले इस यतीमखाने की बिल्डिंग अलग है, लेकिन यहाँ इन बच्चों को न रखकर इसमें स्कूल चलाया जा रहा है। लेकिन इस स्कूल में भी इन यतीम बच्चों को जाने और तालीम लेने की इजाज़त नहीं है।

NCPCR ने इस मामले में कर्नाटक सरकार की क्लास लगाई है। उनका कहना है कि ये राज्य सरकार की लापरवाही का सुबूत और देश के संविधान का उल्लंघन है। आयोग ने इस पर संज्ञान लेते हुए राज्य के चीफ़ सेक्रेटरी को नोटिस जारी कर दिया है।

डॉन बॉस्को मिशनरी स्कूल में भी मिली थी अनियमितताएँ

इस मामले से पहले भी NCPCR ने बेंगलुरु के डॉन बॉस्को मिशनरी के एक चिल्ड्रेन होम के निरीक्षण में अनियमितताएँ पाई गई थी। NCPCR अध्यक्ष कानूनगो ने यहाँ राजस्थान के जोधपुर का एक बच्चा मिला था। ये बच्चा घर से भटक कर यहाँ आ गया था। इसे यहाँ अवैध तरीके से कई महीनों से रखा गया है।

NCPCR अध्यक्ष ने मामला प्रकाश में आने के तुरंत बाद इस बच्चे को वापस जोधपुर भेजने का निर्देश दिया। NCPCR अध्यक्ष ने बताया कि नियमों के मुताबिक बच्चे को घर भेजा जाना चाहिए था, लेकिन बाल गृह ने इसका पालन नहीं किया।

‘फ्री फिलिस्तीन’ वाले युवक को ₹8.33 लाख का इनाम देगा पन्नू, वर्ल्ड कप के फाइनल में मैदान में घुस गया था: खालिस्तानी आतंकी ने ईसाइयों-मुस्लिमों को भड़काया

कनाडा में बैठे खालिस्तानी आतंकी और सिख फॉर जस्टिस (SFJ) प्रमुख गुरपतवंत सिंह पन्नू ने विश्वकप के दौरान ‘फ्री फिलिस्तीन’ वाली टीशर्ट पहन कर मैदान में घुसने वाले ऑस्ट्रेलियाई युवक जॉनसन को इनाम देने का एलान किया है। इनाम की राशि 10 हजार डॉलर यानी लगभग 8 लाख 33 हजार रुपए बताई गई है। रविवार (19 नवम्बर, 2023) को अहमदाबाद में सुरक्षाकर्मियों ने जॉनसन को तब हिरासत में ले लिया था जब उसने भारत ऑस्ट्रेलिया मैच के दौरान मैदान में विराट कोहली को पकड़ लिया था।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, गुरपतवंत सिंह ने यह घोषणा एक वीडियो जारी कर के की है। इस वीडियो में उसने जहाँ ऑस्ट्रेलियाई नागरिक वेन जॉनसन को 10 हजार डॉलर देने का एलान किया तो वहीं भारत के खिलाफ जहर उगला। इस दौरान पन्नू ने 2002 के गुजरात दंगों और 1984 के दिल्ली दंगों का जिक्र किया। अपने वीडियो के माध्यम से खालिस्तानी पन्नू ने ईसाइयों और मुस्लिमों को भड़काने का प्रयास किया। वीडियो में पतवंत ने अवैध कब्ज़े के तौर पर फिलिस्तीन के साथ पंजाब नाम लिया।

पन्नू ने अपने वीडियो में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इजरायल-फिलिस्तीन युद्ध से सबक लेने की सलाह भी दी। इस से पहले पन्नू ने सितंबर 2023 में एक वीडियो जारी कर के अहमदाबाद में होने वाले विश्व कप फाइनल मैच को बंद करवाने की भी गीदड़ भभकी दी थी। इस धमकी के चलते गुजरात पुलिस ने पन्नू पर FIR दर्ज की थी। FIR में पन्नू में शत्रुता को बढ़ावा देने की धाराएँ लगाई गईं हैं। अहमदाबाद पुलिस ने मैदान में फिलिस्तीन के समर्थन में घुसने वाले युवक वेन जॉनसन पर भी FIR दर्ज की है।

बताते चलें कि रविवार को अहमदाबाद में भारत-ऑस्ट्रेलिया के बीच विश्वकप का फाइनल मैच चल रहा था। इस दौरान वेन जॉनसन मैदान में घुस गया और बल्लेबाजी कर रहे विराट कोहली को जा कर पकड़ लिया। वेन जॉनसन ने एक टी शर्ट पहन रखी थी। इस टीशर्ट में आगे और पीछे ‘फिलिस्तीन पर हमले बंद करो’ और ‘फ्री फिलिस्तीन’ लिखा हुआ था। आरोपित के लिए एक मुस्लिम वकील अनस तनवीर ने कानूनी सहायता उपलब्ध कराने का भी एलान किया है। वहीं कॉन्ग्रेस समर्थक अशोक पांडेय ने इस घटना पर खुद भी फ्री फिलिस्तीन लिख कर ट्वीट किया है।

UP में बैन के खिलाफ कोर्ट जाएगा हलाल ट्रस्ट: जानिए कौन है इस सर्टिफिकेट का ठेकेदार, क्यों योगी सरकार ने लगाया है प्रतिबंध

उत्तर प्रदेश में हलाल सर्टिफाइड प्रोडक्ट बैन होने के बाद योगी आदित्यनाथ सरकार से हलाल ट्रस्ट नाराज है। ट्रस्ट के सीईओ नियाज अहमद ने योगी सरकार के फैसले के खिलाफ कोर्ट जाने का निर्णय लिया है। कहा गया है कि हलाल सर्टिफाइड प्रोडक्ट्स पर बैन लगाना गलत है। ये व्यक्तिगत व उत्पाद बनाने वालों की मर्जी है। ये उन्हें देखना है कि जो चीज वो बना रहे हैं वो ग्राहकों के हिसाब से कैसे सही है।

जमीयत उलमा-ए-हिंद हलाल ट्रस्ट के सीईओ नियाज अहमद फारुकी ने कहा कि हलाल ट्रस्ट में प्रमाणन प्रक्रिया भारत में निर्यात के उद्देश्यों और घरेलू वितरण दोनों के लिए निर्माताओं की आवश्यकताओं के अनुरूप है। हलाल प्रमाणित उत्पादों की वैश्विक माँग मजबूत है और भारतीय कंपनियों के लिए ऐसा प्रमाणन प्राप्त करना अनिवार्य है, यह तथ्य हमारे वाणिज्य मंत्रालय द्वारा भी निर्दिष्ट है। नियाज कहते हैं कि हलाल सर्टिफिकेशन से उपभोगता वो प्रोडक्ट यूज कर पाते हैं जो उन्हें करना है। वह तर्क देते हैं कि इससे देश को आर्थिक रूप से लाभ होता है।

योगी सरकार का ‘हलाल सर्टिफाइड’ उत्पादों पर बैन का फैसला

बता दें कि उत्तर प्रदेश में पिछले दिनों हलाल सर्टिफाइड उत्पादों पर बैन लगा दिया गया था। यूपी सरकार ने तय किया था कि राज्य की सीमा के भीतर हलाल उत्पादों के उत्पादन, वितरण, भण्डारण पर संपूर्ण बैन लागू हो। इसके लिए आधिकारिक तौर पर आदेश भी जारी किया गया था।

उत्तर प्रदेश सरकार ने कहा था हलाल सर्टिफिकेट किसी उत्पाद की गुणवत्ता से संबंधित नहीं है। ऐसे निशान गुणवत्ता को लेकर भ्रम की स्थिति ही पैदा करते हैं। जिन उत्पादों पर इस तरह के प्रतिबंध लगाए गए हैं, उनका उल्लेख राज्य सरकार द्वारा जारी पत्र में साफ तौर पर किया गया है।

इस पत्र में बताया गया है कि डेरी उत्पाद, चीनी, बेकरी उत्पाद, पिपरमिंट ऑयल, रेडी टू ईट सेवरीज व खाद्य तेल आदि के लेबल पर हलाल प्रमाणन का उल्लेख किया जा रहा है, जो कि गलत है। उत्तर प्रदेश सरकार का कहना है कि इन उत्पादों के लिए FSSAI प्रमाण पत्र ही काफी है।

हलाल क्या होता है?

हलाल या झटका मीट किसी जानवर के माँस को नहीं बल्कि काटने के तरीके को कहा जाता है। हलाल सिर्फ एक अरबी शब्द है जिसका मतलब मुस्लिमों के लिए जायज होता है। यानी जायज ढंग से काटा गया जानवर ही वो लोग खा सकते हैं।

कैसे होता है जानवर हलाल

जानवर को हलाल करने का एक खास तरीका होता है। इस प्रक्रिया में छुरी से जानवर की गर्दन की नस और सांस लेने वाली नली को काटा जाता है। इस वक्त एक दुआ भी पढ़ी जाती है। गर्दन पर छुरी चलाने के बाद जानवर का पूरा खून निकलने का इंतजार किया जाता है। हलाल करने के दौरान जानवर की गर्दन को फौरन अलग नहीं किया जाता बल्कि जब जानवर मर जाता है तो उसके हिस्से किए जाते हैं। इस्लाम में इसे ‘ज़िबाह’ करना भी कहते हैं।

हलाल कानून के नियम

हलाल मीट का अर्थ केवल जानवर को उस ढंग से काटना नहीं होता बल्कि उस माँस की पैकेजिंग के भी नियम होते हैं। जैसे एक नियम होता है कि केवल एक मुस्लिम व्यक्ति ही जानवर को मार सकता है। जानवर हलाल करते हुए तेज चाकू की मदद से गर्दन की नस इस तरह काटी जाती है कि जानवर का सिर धड़ से अलग न हो। जानवर मारने के बाद उसकी नसों से अधिक से अधिक खून निकलने दिया जाता है।

इसके अलावा इस्लाम में मीट खाने का यह भी नियम है कि मुस्लिम ऐसा जानवर नहीं खा सकते हैं जो कि हलाल प्रक्रिया के अनुसार न मारा गया हो।

कैसे मिलता है हलाल सर्टिफिकेशन?

इस्लामी मुल्कों में तो हलाल सर्टिफिकेशन सरकार द्वारा दिया जाता है। लेकिन भारत में खाद्य पदार्थों को सर्टिफिकेट FSSAI द्वारा दिया जाता है। ये संस्था हलाल सर्टिफिकेशन नहीं देती। भारत में हलाल सर्टिफिकेशन देने वाली अन्य कंपनियाँ हैं। इनमें से प्रमुख कंपनियाँ- हलाल इंडिया प्राइवेट लिमिटेड, हलाल सर्टिफिकेशन सर्विसेज इंडिया प्राइवेट लिमिटेड, जमीयत उलमा-ए-हिंद हलाल ट्रस्ट हैं जिनके पास इसका ठेका है।

हलाल सर्टिफिकेशन के विरोध का कारण

हलाल सर्टिफिकेशन के बाद उत्पादों की कीमत बढ़ जाती है क्योंकि पूरी प्रक्रिया में पैसे लगते हैं जो कंपनी बाद में ग्राहकों से वसूलती है। इतना ही नहीं, ये प्रक्रिया ऐसी है जहाँ गैर मुस्लिमों के लिए रोजगार के अवसर उपलब्ध नहीं रह पाते। इसके अलावा सबसे बड़ा कारण इस हलाल प्रक्रिया को विरोध करने का है कि दूसरे देश में हलाल सर्टिफाइड उत्पादों को मान्यता नहीं दी जा सकती।

उत्तरकाशी में विदेश से आई टीम, मंदिर में पूजा के बाद शुरू किया मजदूरों को बचाने का अभियान: कहा- सबको निकालेंगे, किसी को नहीं होगा नुकसान

उत्तराखंड के उत्तरकाशी की सिल्कयारा सुरंग में मलबा आने की वजह से एक सप्ताह से ज्यादा समय से फँसे 41 मजदूरों के रेस्क्यू ऑपरेशन की देखरेख के लिए अब अंतरराष्ट्रीय एक्सपर्ट पहुँच गए हैं। इस मामले में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी से बात की है।

सुरंगों के मामले में अंतरराष्ट्रीय एक्सपर्ट अरनॉल्ड डिक्स सिल्क्यारा पहुँच चुके हैं। उनके साथ विशेषज्ञों की पूरी टीम है। उन्होंने घटना के रेस्क्यू ऑपरेशन की जानकारी ली और सुरंग का दौरा किया है। उन्होंने उन जगहों का दौरा भी किया है जहाँ से सुरंग में छेद किया जाना है।

डिक्स ने उस मंदिर में पूजा-अर्चना भी की जिसे सुरंग के बाहर स्थापित किया गया है। डिक्स ने कहा, “हम इन सभी लोगों को निकाल लेंगे। हमारी पूरी टीम यहाँ है और हम जल्द ही मजदूरों को निकालने के लिए कुछ रास्ता निकालेंगे। जरूरी यह है कि जिन्हें निकालना है वह सुरक्षित रहें बल्कि जो रेस्क्यू में लगे हैं वह भी सुरक्षित रहें। पूरा विश्व हमारी सहायता कर रहा है। यहाँ काम कर रही टीम काफी मेहनती है, उनकी योजनाएँ सही लग रही हैं। हम इन लोगों को जल्द ही निकाल लेंगे।”

12 नवम्बर को सुबह 5:30 बजे इस सिल्क्यारा सुरंग में अचानक से मलबा आने की वजह से 41 मजदूर फँस गए थे। इन्हें निकालने के लिए कई प्रयास किए जा चुके हैं लेकिन अभी सफलता नहीं मिली है। लगातार अलग-अलग तरीके से मजदूरों तक पहुँचने की कोशिश की जा रही है। हाल ही में मलबे के भीतर से पाइप डालने के अलावा पहाड़ी के ऊपर से सुंरग में पहुँचने का प्लान भी बनाया गया है। इसके लिए जल्द ही ड्रिलिंग शुरू होने वाली है। अरनॉल्ड डिक्स ने इस जगह का भी दौरा किया है।

अरनॉल्ड ने कहा, “मैंने इस जगह का दौरा किया है। अभी तो यह ठीक दिख रहा है लेकिन हमें बाद में पता चलेगा कि यह नुकसानदायक तो नहीं। हमारे पास हिमालय को जानने वाले विशेषज्ञ मौजूद है। अन्दर मौजूद लोगों को कोई नुकसान पहुँचना चाहिए। हमें यहाँ सभी चीजों पर ध्यान देना है।”

एक्सपर्ट के अलावा सुरंग में रक्षा मंत्रालय से DRDO की रोबोटिक्स टीम भी पहुँची है। यह टीम यहाँ आधुनिक मशीने लेकर पहुँची है। इसके पास छोटे रोबोट से लेकर ड्रोन आदि हैं। बाकी टीमें अब भी सुरंग के भीतर रास्ता बनाने में जुटी हैं । मजदूरों को खाना-पानी भी पहुँचाया जा रहा है। उनसे बात भी की जा रही है।

घटनास्थल पर कल प्रधानमंत्री के पूर्व सलाहकार भाष्कर खुलबे और पीएमओ में अधिकारी मंगेश घिल्डियाल भी पहुँचे थे। उनसे रिपोर्ट माँगी गई है। प्रधानमंत्री मोदी ने उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के साथ फ़ोन पर बात भी की है। उन्होंने कहा है कि इस ऑपरेशन में जो भी मशीनें चाहिए, केंद्र सरकार उपलब्ध करवा रही है। केंद्र और राज्य के सहयोग से यह मजदूर जल्द ही बाहर निकाले जाएँगे।

गौरतलब है कि मजदूरों के फँसने के बाद सबसे पहले मलबा हटाने की कोशिश की गई जो फेल हो गई। इसके बाद मलबे के किनारे से 900 मिलीमीटर व्यास वाले पाइप डालने का प्रयास किया गया जो कि अभी जारी है। इसके लिए ऑगर मशीनें लाई गई हैं। इसके अतिरिक्त, सुरंग में पहुँचने के लिए अब ऊपर पहाड़ी से भी खुदाई की जा रही है। सुरंग के दूसरे मुहाने से भी खुदाई करके मजदूरों को निकालने का प्रयास किया जा रहा है।

बिहार में ईसाई मिशनरी भी चला रहे लव जिहाद, टारगेट पर हिंदू लड़कियाँ: रिपोर्ट में दावा- कई जगहों पर 60% आबादी कन्वर्ट

बिहार में हिंदू परिवार की बहन, बेटियों को प्यार के जाल में फँसाकर उनसे शादी कर ईसाई मजहब अपनाने के लिए मजबूर किया जा रहा है। वहाँ इस ईसाई लव जिहाद एक-दो नहीं बल्कि कई मामले सामने आए हैं।

ऐसी ही एक शिकार सुनीता रहीं। दो भाईयों और एक बहन के परिवार में वो सबसे छोटी हैं, लेकिन 17 साल के होते-होते पड़ोसी जॉन ने उसे अपने प्रेमजाल में ऐसा फाँसा कि वो उससे कभी उबर नहीं पाई। उनका इस तरह से ब्रेनवाश किया गया कि अपना घर छोड़ दिया और जॉन के परिवारवालों ने 30 दिन बाद ही उन्हें ईसाई बना दिया। ये ही नहीं माया नाम की एक हिंदू लड़की की भी यही कहानी है ईसाई लड़के ने प्यार के जाल में फँसा शादी की, धर्म बदलवाया और फिर दो बच्चों के होने के बाद उसे छोड़कर चला गया।

कम साक्षरता दर वाले इलाके हैं निशाने पर

ये दो ही नहीं बल्कि के बिहार के सीमांचल में सैकेड़ों लड़कियाँ ईसाईयों के इस नए लव जिहाद का शिकार हुई हैं। ये खुलासा दैनिक भास्कर के एक स्टिंग में हुआ है। यहाँ ये बात भी गौर करने लायक है कि बिहार के सीमांचल में 1999 से लेकर 2005 के बीच गाँवों में चर्च बढ़ते चले गए हैं। इसमें भी शहरों को छोड़कर चर्च बनाने के लिए गाँवों को चुना गया है।

इसके पीछे भी तगड़ी साजिश हैं क्योंकि अररिया, कटिहार, किशनगंज, पूर्णिया, भागलपुर मधेपुरा और बेगूसराय जैसे जिले साक्षरता दर में पीछे है। साफ है कि वहाँ के लोगों का ब्रेनवॉश करना आसान है। इस काम को चेन्नई से हैंडल किया जाता है।

बिहार के अलग-अलग जोन में स्कूल और हेल्थ सेंटर में लगे लोग धीरे-धीरे वहाँ के निवासियों को ईसाई बनाने की घुट्टी पिलाते हैं। इसके बाद वहाँ ईसाईयों की तादात बढ़ते ही आनन-फानन में चर्च भी बना दिया जाता है।

मधेपुरा में 60 फीसदी बने ईसाई

मधेपुरा एक ऐसा जिला है जिसके कई गाँवों में ईसाई आबादी 40 से 60 फीसदी तक जा पहुँची है। यहाँ के मुरलीगंज ब्लॉक का तिनकोनवा गाँव इसका उदाहरण हैं। पटना से 260 किलोमीटर दूर 1400 घरों वाला ये गाँव शिक्षा के मामले में बेहद पिछड़ा है।

इसकी आबादी 60 हजार है, लेकिन यहाँ गिरजाघरों यानी चर्च की तादाद हैरानी में डालने वाली है। कक्षा 8वीं तक का एक स्कूल मिशनिरियों का है। हॉस्पिटल भी उनका ही है। यहाँ आर हैम्ब्रम और उनकी वाइफ ललिता ईसाई मजहब का प्रचार करते हैं।

ललिता के मुताबिक, यहाँ कई लड़कों ने हिंदू लड़कियों से प्यार किया और शादी के लिए ये लड़कियाँ ईसाई बन गई। उन्होंने ये भी बताया कि वो भी हिंदू थीं और ईसाई आर हैम्ब्रम से प्यार किया और उनका धर्म अपनाकर उनसे शादी कर ली।

ललिता ने भी खुलासा किया कि प्रार्थना सभा और संगीत के जरिए वो लोगों को ईसाई धर्म अपनाने का प्रचार करते हैं। ऐसी ही एक महिला झारखंड की सरिता भी है। वो भी अपने पति के साथ मिलकर सहरसा में लोगों को ईसाई मजहब अपनाने के लिए प्रेरित करती थीं। अब वो यही काम मधेपुरा में कर रही है। सरिता ने माना कि प्यार के बाद धर्म बदलने के मामलों में इजाफा हो रहा है।

चर्च में शादी के बाद 32वें दिन हिंदू लड़की को ईसाई बनाया जाता है। इससे पहले 6 से लेकर एक साल तक लड़की को ईसाईत के तौर-तरीके बताए जाते हैं। जाँच में सामने आया है कि यहाँ महज दो साल में ही 30 से लेकर 50 घरों ने ईसाई धर्म अपना लिया है।

दबदबे वाले परिवार भी बने ईसाई

गाँव में मनोज का परिवार ईसाई बन गया है। मनोज अब मनोज हैम्ब्रम हो गए हैं। मनोज के दो बेटे हैं। दोनों ने हिंदू लड़कियों को प्यार का झाँसा दिया और फिर उन्हें शादी करने से पहले ईसाई बनाया।

वहीं अब इन लड़कियों के परिवारों ने भी ईसाई धर्म अपना लिया है। गाँव के चर्च के रोशन हैम्ब्रम का भी कुछ ऐसा ही किस्सा है। उनके मुताबिक हिंदू लड़की किसी ईसाई लड़के से प्यार करती है तो शादी से पहले उसे ईसाई धर्म अपनाना होता है। वरना उनकी शादी नहीं हो सकती।

वह मानते हैं कि ईसाई धर्म अपनाने वाली अधिकांश लड़कियाँ हिंदू हैं। हालाँकि, उनका यह भी कहना है कि हिंदू लड़कियाँ ईसाई धर्म के विचारों से प्रभावित होती हैं। इसके पीछे ये वजह है कि बचपन से ही उन्हें ईसाई मजहब का पाठ पढ़ाया जाता है।

पूर्णिया से तिकोनवा गाँव में ठाकुर सोरेन को जमीन का लालच देकर बुलाया गया और फिर उन्हें ईसाई बना दिया। उनकी बेटी भी इस लव जिहाद का शिकार बनी। इस मामले में भी बाद में शादी के बाद ईसाई लड़का उसे छोड़कर चला गया।

तिकोनवा गाँव के चर्च में हर रविवार को 150 ईसाई आते हैं और ये सब हिंदू धर्म छोड़कर इस धर्म में आए हैं। ऐसा ही एक परिवार चिंटू का है जो 2015 में हिंदू धर्म छोड़कर ईसाई बन गए। चिंटू के बाद 32वें के बाद वो न तो हिंदू देवी-देवता का नाम लेते हैं और न ही मंदिर जाते हैं और प्रसाद खाते हैं।

उनका कहना है कि हिंदू को ईसाई बनाने पर यीशु खुश होते हैं। इस धर्मांतरण पर विश्व हिंदू परिषद के विवेक कुमार कहते है कि हिंदू लड़कियों के ईसाई बनने के केस इधर बढ़ गए हैं। हालाँकि उनका कहना है कि 3 साल के अंदर 2500 लोगों की घर वापसी हुई है।

वहीं इस पर अंतरराष्ट्रीय हिंदू परिषद बिहार के वरिष्ठ उपाध्यक्ष जवाहर झा कहते हैं कि हिंदूओं को ईसाई बनाने देश के लिए साइलेंट किलर जैसा है क्योंकि ये सुर्खियों में नहीं आते। ये आर्थिक तौर पर पिछड़े हिंदू परिवारों को निशाना बनाते हैं।