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कानपुर हिंसा में कुछ पुलिसकर्मियों से हयात जफर हाशमी की थी मिलीभगत, एसीपी और एसएचओ रैंक के अधिकारी शामिल: SIT करेगी पूछताछ

उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) के कानपुर में 3 जून को हुई हिंसा (Kanpur Violence) के मामले में चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। टाइम्स नाऊ नवभारत की रिपोर्ट के मुताबिक, कानपुर में हुई हिंसा के मास्टरमाइंड हयात जफर हाशमी की कुछ पुलिसकर्मियों के साथ मिलीभगत थी। इन पुलिस अधिकारियों में एसीपी अकमल खान, बेकनगंज थाने के थाना प्रभारी नवाब अहमद और चौकी इंचार्ज शामिल हैं।

रिपोर्ट के मुताबिक, कानपुर हिंसा की जाँच के लिए गठित एसआईटी इन पुलिसकर्मियों से भी पूछताछ कर सकती है। दावा किया गया है कि हिंसा से ठीक पहले तक हयात जफर हाशमी इन पुलिस अधिकारियों के संपर्क में था। कुछ पुलिस अधिकारियों की मिलीभगत से ही इतनी बड़ी हिंसा को अंजाम दिया जा सका। इसमें ये बताया गया है कि जौहर फैंस एसोसिएशन के अध्यक्ष हयात जफर हाशमी ने पुलिसकर्मियों से बातचीत के दौरान कहा था कि वो इस हिंसा को तीन की बजाय 5 जून को करेगा। हालाँकि, आश्वासन देने के बाद भी तीन जून को ही इस हिंसा को अंजाम दिया गया।

क्या है पूरा मामला

गौरतलब है कि शुक्रवार तीन जून को जुमे की नमाज के बाद कानपुर में सड़कों पर उतरी इस्लामिक दंगाइयों की भीड़ ने जमकर पत्थरबाजी की। इसमें कई लोग जख्मी भी हुए। खास बात ये कि उस दिन देश के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी कानपुर में थे। इस घटना के बाद एक्शन में आई पुलिस ने हयात जफर हाशमी को गिरफ्तार कर लिया। फिलहाल उसे 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में भेजा गया है। इतना ही नहीं कानपुर हिंसा में इस्लामिक कट्टरपंथी संगठन पापुलर फ्रंट ऑफ इंडिया का भी नाम सामने आया था।

पुलिस ने इसकी पुष्टि की थी कि हिंसा वाले दिन जफर हाशमी ने पीएफआई को फोन किया था। इस मामले सपा के नेता निजाम कुरैशी का भी नाम सामने आया है। कानपुर पुलिस ने जिन 36 दंगाइयों की 5 जून को लिस्ट जारी की थी उसमें टॉप-5 में निजाम कुरैशी का नाम था। बहरहाल इस मामले में अब तक पुलिस ने 50 आरोपितों को गिरफ्तार किया है और पत्थरबाजी और हिंसा में शामिल रहे दंगाइयों की 147 अवैध संपत्तियों को चिह्नित किया गया है।

मुस्लिम महिला को चेहरे से बुर्का हटाने के लिए कहना पड़ा भारी, 55 वर्षीय डॉक्टर दुर्व्यवहार का दोषी, साल के अंत में मिल सकती है ये सजा

इंग्लैंड के स्टोक-ऑन-ट्रेंट में एक डॉक्टर को मुस्लिम महिला को चेहरे से बुर्का हटाने के लिए कहने और उसके साथ दुर्व्यवहार का दोषी पाया गया है। एक पैनल ने डॉक्टर को दुर्व्यवहार करने का दोषी पाया है, जिसके चलते कीथ वॉल्वर्सन को अपनी नौकरी से हाथ धोना पड़ सकता है। यह घटना 2018 में रॉयल स्टोक यूनिवर्सिटी अस्पताल में एक नियुक्ति के दौरान हुई थी।

इस मामले में डॉक्टर कहना है, “मैंने ऐसा इसलिए कहा था, क्योंकि वह अंग्रेजी समझ नहीं पा रही थीं। मैंने उन्हें अपनी बात ठीक ढंग से समझाने और उनकी बात समझने के लिए बुर्का उतारने को कहा था। ताकि मैं फेस एक्सप्रेशन उनकी बात समझ सकूँ।”

55 वर्षीय डॉक्टर ने दावा किया कि उन्होंने श्रीमती क्यू के रूप में जानी जाने वाली महिला से अपना बुर्का उठाने के लिए इसलिए कहा था, ताकि वह उसके होंठों को पढ़कर यह समझ सकें कि वह क्या कहना चाह रही थी, लेकिन उनके कहने के बावजूद कि वह बुर्का नहीं हटाना चाहती थी।

डेली मेल के मुताबिक, डॉ वॉल्वर्सन ने 25 साल से अधिक समय तक जीपी के रूप में काम किया है। इससे पहले उनका रिकॉर्ड बिल्कुल बेदाग था, लेकिन उसके बाद उन्हें कदाचार के 28 आरोपों का सामना करना पड़ा, जिनमें श्रीमती क्यू के साथ नियुक्ति से संबंधित 16 आरोप भी शामिल थे।

कीथ वॉल्वर्सन को उनके इस व्यवहार के लिए एक मेडिकल ट्रिब्यूनल ने तीखी फटकार लगाई है। ट्रिब्यूनल ने कहा कि उन्हें ऐसा करने की कोई जरूरत नहीं थी, जब वह महिला अपना बुर्का नहीं हटाना चाहती थी।

एक मेडिकल प्रैक्टिशनर्स ट्रिब्यूनल सर्विस (एमटीपीएस) पैनल ने कहा कि ऐसी कौन सी गंभीर ​परिस्थितियाँ थीं, जिसके चलते मुस्लिम महिला को बुर्का हटाने के लिए कहना पड़ा। पैनल ने यह भी कहा कि डॉ वॉल्वर्सन को मरीजों के साथ गलत तरीके से पेश आने का भी दोषी पाया गया है। उन्होंने कहा कि वे अंग्रेजी नहीं आने पर उन्हें हतोत्साहित करते हैं।

पैनल ने फैसला सुनाया है कि डॉक्टर ने मुस्लिम महिला के साथ अनुचित व्यवहार किया। वह दुराचार का दोषी है। इस साल के अंत में तय हो जाएगा कि उसे निलंबित किया जाएगा या फिर मौजूदा मेडिकल रजिस्टार (medical register) से हटाने की सजा दी जाएगी।

सरकारी गाड़ी, VIP आरोपित: हैदराबाद गैंगरेप पर क्यों ‘कठमुल्लों की जुबान’ बोल रहे गृहमंत्री महमूद अली, हाथरस-कठुआ वाला गैंग भी मौन

हैदराबाद में नाबालिग गैंगरेप मामले में लंबी पड़ताल के बाद सारी जानकारी मीडिया में अब साफ है। सबको पता चल चुका है कि कैसे AIMIM विधायक के बेटे और भतीजे के तार इस गैंगरेप से जुड़े हैं और किस तरह पूरी वारदात को एक सरकारी गाड़ी में अंजाम दिया गया। मीडिया चैनलों पर तो इस केस की रोज चर्चा हो ही रही है लेकिन इसी बीच गैंगरेप केस को ‘एडवांस जमाने की गलती’ बताने वाले तेलंगाना के गृहमंत्री महमूद अली भी आखिरकार अपने संवेदनहीन ‘बयान’ की लीपापोती में जुट गए हैं। 

दरअसल कुछ दिन पहले से ही तेलंगाना के गृह मंत्री इस मामले में उन ‘कठमुल्लों’ की तरह ही बात करते दिख रहे हैं जिनको लगता है कि महिलाओं के साथ अपराध उनके छोटे कपड़ों की वजह से होता है। जो लड़कियों के मोबाइल इस्तेमाल नहीं करने को लेकर फतवा जारी करते हैं। महमूद अली ने टीवी 9 मीडिया से बात करते हुए रेप केस को गलती की श्रेणी में रखा था जिसके बाद उनकी गिनती उन लोगों में शुरू हो गई थी जो रेप मामले में लड़कों को बचाने के लिए घृणित अपराध को ‘भूल’ बता कर जस्टिफाई करते हैं। हमने भी उन्हें इस संबंध में खुला पत्र लिखा था… अब एक बार फिर उनका इस मामले में नया बयान आया है। महमूद अली ने अब गैंगरेप का सारा ठीकरा मोबाइल फोन और व्हॉट्सएएप आदि को दिया है और इनके ही सहारे पहले वाले बयान को दबाने की कोशिश की है।

उन्होंने इस बार कहा कि नए जमाने में बच्चे मोबाइल और व्हॉट्सएप के कारण बिगड़ रहे हैं। ये माँ-बाप की जिम्मेदारी है कि वो उनपर नजर बनाए रखें। अपने बयान में महमूद अली ने हर माता-पिता से कहा कि अगर वो लोग अपने बच्चों को इस तरह खुले में घूमने के लिए छोड़ देंगे तो फिर उन्हें संभालना मुश्किल हो जाएगा। इसलिए जरूररी है कि उनके ऊपर ध्यान दिया जाए।

महमूद अली का गैंगरेप मामलों पर ऐसा बचकाना बयान कोई चौंकाने वाला नहीं है। उन्होंने साल 2019 में भी यही किया था और अब 2022 में भी उनकी यही संवेदनहीनता देखने को मिली है। लेकिन, एक गैंगरेप मामले में तथाकथित नारीवादियों की चुप्पी इस बार फिर हैरान करने वाली है। क्या आपने नोटिस किया कि हैदराबाद का पूरा केस इतना हाईप्रोफाइल है। आरोपितों में AIMIM नेता के बेटे का नाम है। बच्चों के साथ माता-पिता पर केस दर्ज करने की बात पुलिस कर रही है। लेकिन बावजूद इतना सब होने केे अब तक उस गैंग की आँख नहीं खुली है…।

कठुआ गैंगरेप मामले में हिंदुस्तान पर शर्मिंदा होने वाली लॉबी और हाथरस रेप केस में सरकार को कोसने वाली नारीवादी…चंद दिनों से शांत हैं। न सरकार से सवाल हुआ। न आरोपित के पिता से इस्तीफे की माँगे गए और न ही इंसानियत के नाते उस लड़की को इंसाफ दिलाने के पोस्ट शेयर हुआ। यदि इस पूरे मामले में कोई काम तेजी से हुआ तो वो उस भाजपा नेता पर कार्रवाई का था जिसने पूरे केस में AIMIM नेता की संलिप्ता को दुनिया के सामने पेश किया। जिसके बाद कुछ दिनों में उन्हें पकड़ लिया गया क्योंकि ये सबूत दिखाते समय पीड़िता की पहचान भी उजागर हो गई थी।

ध्यान दीजिए कि इस केस में भाजपा नेता द्वारा किए गए खुलासे से पहले मीडिया में आई खबरों ने इस बात को बताया था कि पुलिस भी AIMIM विधायक के बेटे की संलिप्ता मना कर रही है लेकिन जब सबूत सबके सामने आया तो उन्हें इस केस में विधायक के बेटे को भी गिरफ्तार करना पड़ा। छानबीन के बाद बताया गया कि रेप केस में विधायक के बेटे का हाथ नहीं है मगर उसने लड़की से दुर्व्यवहार किया है इस बात को नहीं नकारा जा सकता। पुलिस भी बाहरी माहौल देख ये मान गई कि केस AIMIM नेता के बेटे से जुड़ा है। मगर गृहमंत्री महमूद अली एक ओर से इसे एडवांस जमाने में हुई गलती की तरह दिखा रहे है और दूसरी ओर उस महिला गैंग की आँख का पानी मर गया है जिन्हें ये होश नहीं है कि कम से कम खुद को निष्पक्ष दिखाने के लिए वो दो लाइन में इस केस की निंदा कर दें। या शायद ये कह सकते हैं कि हैदराबाद में नाबालिग से हुई ज्यादती पर आँसू बहाना उनके एजेंडे पर फिट नहीं बैठता।

नूपुर शर्मा के बाद अब महाराष्ट्र पुलिस ने नवीन जिंदल को भेजा समन, पैगंबर मुहम्मद के कथित अपमान पर 15 जून को पूछताछ के लिए बुलाया

मुहम्मद पैगंबर पर कथित टिप्पणी के मामले में दिल्ली बीजेपी के पूर्व नेता नवीन जिंदल की भी मुश्किलें बढ़ सकती हैं। महाराष्ट्र पुलिस ने भारतीय जनता पार्टी के पूर्व नेता नवीन जिंदल को पैगंबर मुहम्मद पर उनकी टिप्पणी से संबंधित एक मामले में पूछताछ के लिए तलब किया है। उन्हें यह समन ठाणे जिले के भिवंडी पुलिस स्टेशन की ओर से जारी किया गया है।

समन की कॉपी सामने आ गई है। इसके मुताबिक, जिंदल को पुलिस ने 15 जून को सुबह 11:30 बजे महाराष्ट्र के भिवंडी पुलिस स्टेशन में पेश होने को कहा है। इसके साथ ही उन्हें पुलिस की ओर से कहा गया है कि इस अवधि में वो ऐसा कोई भी काम नहीं करें, जिससे जाँच में बाधा पैदा हो। साथ ही सबूतों को नष्ट नहीं करने और उससे छेड़छाड़ नहीं करने को भी कहा गया है। उनके खिलाफ आईपीसी 295 (ए) के तहत मामला दर्ज किया गया है। गौरतलब है कि जिंदल से पहले ठाणे जिले के मुंब्रा पुलिस थाने ने बीजेपी से निलंबित प्रवक्ता नूपुर शर्मा को 22 जून को व्यक्तिगत रूप से गवाही देने के लिए बुलाया है।

ठाणे पुलिस के द्वारा नवीन जिंदल को भेजा गया समन

उल्लेखनीय है कि पूर्व बीजेपी प्रवक्ता नूपुर शर्मा और नवीन जिंदल द्वारा कथित तौर पर पैगंबर मुहम्मद को लेकर टिप्पणी करने के मामले में कई इस्लामिक देशों ने भारत सरकार के समक्ष इस मामले को प्रमुखता से उठाया था। इसके बाद भारतीय जनता पार्टी ने पैगंबर मुहम्मद पर उनके बयानों और कथित तौर पर इस्लामी भावनाओं को आहत करने के जवाब में राष्ट्रीय प्रवक्ता नुपुर शर्मा और नवीन कुमार जिंदल को 5 जून को पार्टी से 6 सालों के लिए निलंबित कर दिया। दोनों नेताओं ने माफी माँगते हुए कहा था कि उनका इरादा किसी भी धार्मिक समुदाय की भावनाओं को ठेस पहुँचाने का नहीं था।

बता दें कि पैगंबर मुहम्मद पर अपनी टिप्पणी को लेकर नवीन कुमार जिंदल और नूपुर शर्मा के खिलाफ पूरे देश में कई मामले दर्ज किए गए हैं। आतंकवादी संगठन अल कायदा सहित कई इस्लामी संगठनों ने नेताओं और उनके परिवारों को जान से मारने की धमकी दी है।

दिल्ली पुलिस ने बुधवार को पूर्व भाजपा प्रवक्ता नूपुर शर्मा, भाजपा के पूर्व नेता नवीन कुमार जिंदल, ‘पत्रकार’ सबा नकवी और कई अन्य के खिलाफ साइबर स्पेस में अशांति पैदा करने के इरादे से झूठी जानकारी को बढ़ावा देने के आरोप में प्राथमिकी दर्ज की थी।

जिस पाकिस्तानी सांसद को तीसरी बीवी ने ‘शैतान से भी बुरा’ बताया था, उनकी संदिग्ध मौत: ड्रग्स के साथ न्यूड Video भी हुआ था वायरल

इमरान खान की पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (PTI) पार्टी के सांसद और जाने-माने टीवी होस्ट आमिर लियाकत हुसैन (Aamir Liaquat Hussain) की गुरुवार (9 जून 2022) को मौत हो गई। अपनी तीसरी निकाह और तलाक को लेकर वे पिछले काफी समय से विवादों में थे। पाकिस्‍तानी मीडिया के मुताबिक 49 साल के आमिर लियाकत हुसैन कराची के अपने घर में बेहोश मिले थे। बेहोशी की हालत में ही उन्हें अस्पताल ले जाया गया, लेकिन उन्हें बचाया नहीं जा सका।

जिओ न्‍यूज के मुताबिक, आमिर को बीती रात से ही बेचैनी हो रही थी, लेकिन उन्‍होंने अस्‍पताल जाने से इनकार कर दिया था। उनके कर्मचारी जावेद ने बताया कि सुबह आमिर के कमरे से चिल्‍लाने की आवाजें आ रही थीं। जब उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया तो कर्मचारी दरवाजा तोड़कर कमरे में घुसे।

कराची के डीआईजी मुकद्दस हैदर ने बताया कि शुरुआती जाँच में आमिर लियाकत की मौत में कोई साजिश नहीं नजर आ रही है। पुलिस ने इस मामले की जाँच शुरू कर दी है। पिछले महीने आमिर लियाकत का न्‍यूड वीडियो लीक हो गया था। यह वीडियो आमिर के बेडरूम का था। आमिर ने न्‍यूड वीडियो के लीक होने पर अपनी तीसरी बीवी दानिया मलिक पर जमकर भड़ास निकाली थी। कुरान की एक आयत का जिक्र करते हुए कहा था, “बीवी और शौहर एक-दूसरे के कपड़े की तरह होते हैं, लेकिन तुमने (दानिया) इसे तोड़ दिया है।” उस वक्त ऐसा आरोप लगाया जा रहा था कि इस न्यूड वीडियो को दानिया ने ही लीक किया है। सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे इस वीडियो में आमिर न्यूड थे और उनके बेड पर ड्रग्स भी रखी हुई थी।

आमिर ने 19 साल की दानिया से निकाह 9 फरवरी 2022 को किया था। कुछ ही महीने में मामला तलाक तक पहुँच गया। इसके बाद दानिया ने आमिर लियाकत को ‘शैतान से भी बुरा’ बताया था। उन्होंने कहा था, “उसका बर्ताव शैतान से भी बुरा है। आमिर आए दिन शराब के नशे में मुझे पीटता था। साथ ही वो मुझे और मेरे परिवार को लगातार धमकियाँ भी देता था। मैंने अदालत से माँग की है कि वो आमिर को हमें घर, 15 करोड़ रुपए और ज्वैलरी देने का आदेश दें।”

दनिया ने आरोप लगाया था, “वो (आमिर) कहता है कि मैं दुनिया छोड़ सकता हूँ पर नशा नहीं। न जाने कौन सा नशा है वो और कहाँ से उसे लाता है। वो सफेद रंग का होता है और काले रंग की प्लेट में बनाता है उसको। बाद में उसे वो नाक से लेता था। इसके अलावा वो वोडका भी पीता था।”

आज नूपुर शर्मा को गला काटने की धमकी, कल कमलेश तिवारी को गोदा: दुनिया की 10 वीभत्स हत्याएँ, जो पैगंबर-इस्लाम की ‘ईशनिंदा’ के नाम पर हुईं

हजारों सालों से मानव अपने अपनी सामाजिक संरचनाओं और सभ्यतागत विकास को लेकर सतत गतिशील है। कभी ईसाइयों में भी धर्मगुरुओं और चर्च की आलोचना करने पर मृत्युदंड का प्रावधान था, लेकिन समय के साथ बदलाव हुआ और समालोचना को समाज में विस्तृत स्थान दिया गया। सनातन धर्म का आधार ही शास्रार्थ रहा है। अर्थात किसी भी विषय को लेकर तर्क और वितर्क भारतीय परंपरा का सार रहा है। इसलिए भारत का संविधान भी उन तत्वों से उत्प्रेरित है।

हालाँकि, मानव सभ्यता के विकास और उसकी गतिशीलता से अलग इस्लाम आज भी आलोचना को जगह नहीं देता। इस्लाम दूसरे की आलोचना करने के अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बात तो करता है, लेकिन इस्लाम, कुरान और उसके पैगंबर पर किसी पर प्रतिक्रिया को बर्दाश्त नहीं करता है। यह मानव के विकासशील प्रवृत्ति के ठीक विपरीत है।

कुरान, इस्लाम या उसके पैगंबर मुहम्मद पर किसी तरह की टिप्पणी को वह ईशनिंदा मानता है, लेकिन दूसरे समुदाय के खिलाफ आपत्तिजनक भाषा बोलना अपना मजहब सम्मत व्यवहार मानता है। इसके पीछे भी इस्लाम की कुछ मजहबी पुस्तकें हैं।

विद्वानों का मानना है कि नसाई और सुनन अबू दाउद के हदीसों में ईशनिंदा के लिए सजा का प्रावधान किया गया है। उसमें कहा गया है कि पैगंबर के खिलाफ बार-बार ईशनिंदा करने वाले व्यवहार के लिए एक यहूदी महिला गुलाम को उसके मालिक ने मार डाला था। कहानी के अनुसार, जब इस बात को पैगंबर के सामने लाया गया तो उन्होंने मालिक के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की।

इस्लामी मजहबी किताबों में ईशनिंदा के लिए मौत की सजा का प्रावधान है। मुस्लिम देशों में ईशनिंदा करने वाले लोगों को पत्थर से मार-मार कर हत्या, गर्दन को धड़ से अलग करके या फिर जिंदा जलाकर मारने सहित कई तरह से वीभत्स मौत की सजा दी जाती है। वहीं, भारतीय इस्लामी कट्टरपंथी भी इसका समर्थन करते हैं।

भारत में भी इस्लामी कट्टरपंथ अक्सर ‘गुस्ताख-ए-रसूल की एक ही साजा, सर तन से जुदा… सर तन से जुदा’ के नारे लगाते हैं। ये कट्टरपंथी सिर्फ नारे ही नहीं लगाते, बल्कि हत्याओं को अंजाम भी देते हैं। आज हम ऐसी दस हत्याओं की चर्चा इस लेख में करेंगे, जिसने भारत और दुनिया को हिलाकर रख दिया।

कमलेश तिवारी की हत्या

हिंदू महासभा के नेता कमलेश तिवारी को ईशनिंदा के कथित आरोप में इस्लामी कट्टरपंथियों ने 18 अक्टूबर 2019 को चाकू मारकर बेरहमी से हत्या कर दी थी। हत्यारों ने चाकू मारने के बाद उन्हें गोली भी मारी थी। दरअसल, तिवारी ने साल 2015 में इस्लाम के पैगंबर मुहम्मद को लेकर एक बयान दिया था, जिसको लेकर कट्टरपंथियों ने इसे ईशनिंदा बताते हुए बवाल मचाया था।

इसके बाद तिवारी को गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया था। वह 9 महीने जेल में रहे। जब वह बाहर आए तो हिंदू कार्यकर्ता के वेश में कट्टरपंथियों ने उनसे मुलाकात के बहाने हत्या को अंजाम दिया। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में खुलासा हुआ था कि उन पर चाकू के 15 वार किए गए थे। उसके बाद उनके चेहरे पर गोली मार दी गई थी।

इस मामले में पुलिस ने SIT की चार्जशीट में 13 आरोपियों को हत्या, आपराधिक साजिश रचने और आर्म्स एक्ट के तहत नामजद किया गया है। इस मामले में बरेली के मौलवी सैय्यद कैफी अली को SIT ने हत्यारों की मदद करने के आरोप में गिरफ्तार किया था। मोहम्मद नावेद सिद्दीकी नाम के दिल्ली के एक वकील ने अन्य सहायता उपलब्ध कराई थी।

गवर्नर सलमान तासीर

पाकिस्तान के नेता और पंजाब के पूर्व राज्यपाल सलमान तासीर को साल 2011 में इसलिए हत्या कर दी गई, क्योंकि उन्होंने ईशनिंदा की एक आरोपित ईसाई महिला आसिया बीबी का समर्थन किया था। आसिया बीबी को कथित ईशनिंदा के लिए फाँसी की सजा सुनाई गई थी।

सलमान तासीर ने तत्कालीन पाकिस्तानी राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी से महिला की सजा को माफ करने की अपील करने की अपील की थी। उन्होंने कहा था कि आधुनिक दुनिया में इस तरह के कानूनों के लिए कोई स्थान नहीं होना चाहिए। यह मानवता के खिलाफ है।

तासीर के इस बयान के बाद उनके ही अंगरक्षक मुमताज कादरी ने जनवरी 2011 में गोली मारकर हत्या कर दी। इसके बाद कादरी को पाकिस्तान में एक नायक के रूप में प्रदर्शित किया गया है और हर तरफ उसकी तारीफ की गई। आज कादरी के नाम पर एक मस्जिद भी है।

दरअसल, आसिया के मुस्लिम पड़ोसी ने किसी बात को लेकर उन से झगड़ा किया और फिर उन पर ईशनिंदा का आरोप लगा दिया। इसके बाद आसिया के खिलाफ पूरे पाकिस्तान में मौत की सजा माँग की जाने लगी। हालाँकि, अंतरराष्ट्रीय दबाव में पाकिस्तान आसिया बीबी को फाँसी नहीं दे सका और आज वह परिवार सहित कनाडा में हैं।

सैमुएल पैटी

फ्रांस में एक स्कूल टीचर सैमुएल पैटी ने नवंबर 2020 में पढ़ाने के दौरान आतंकी गतिविधियों को लेकर छात्रों को पैगंबर मुहम्मद का एक कार्टून दिखाया था। इसके बाद उसी कक्षा का एक मुस्लिम छात्र इसे ईशनिंदा मानकर अल्लाह-हू-अकबर चिल्लाते हुए चाकू से पैटी का गला रेत दिया था।

47 वर्षीय पैटी इतिहास-भूगोल के शिक्षक थे और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता विषय पर एक कक्षा में छात्रों को शार्ली एब्दो द्वारा पैगंबर पर बनाए कार्टून को दिखाया था। इस पर कई अभिभावकों ने शिकायत की थी और उनमें से एक ने शिक्षक के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी।

तब फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने इस घटना को ‘इस्लामी आतंकी हमला’ करार दिया था और देश से एकजुट होने का आग्रह किया था। उन्होंने कहा कि पीड़िता की हत्या इसलिए की गई क्योंकि वह एक शिक्षक था और उसने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की शिक्षा दी थी। इसके बाद फ्रांस ने इस्लामी संगठनों के खिलाफ कठोर कार्रवाई की थी।

महाशय राजपाल

अविभाजित भारत में साल 1920 में मुस्लिमों ने दो आपत्तिजनक किताबें- ‘कृष्ण तेरी गीता जलानी पड़ेगी’ और ‘उन्नीसवीं सदी का महर्षि’। पहली पुस्तक में भगवान कृष्ण के लिए अपमानजनक और अश्लील शब्दों का प्रयोग किया था। वहीं दूसरी पुस्तक में इस्लाम की तर्कपूर्ण व्याख्या करने वाले महर्षि दयानंद सरस्वती को लेकर आपत्तिजनक बात कही गई थीं। ये दोनों किताबें एक अहमदी मुस्लिम ने लिखी थीं।

इसके विरोध में पंडित चामुपति लाल ने मुस्लिमों के पैगंबर मोहम्मद की जीवनी पर एक छोटी सी पुस्तक ‘रंगीला रसूल’ लिखा। पंजाब के महाशय राजपाल ने अपने प्रकाशन गृह ‘राजपाल एंड संस’ से इसे प्रकाशित किया था।

इस किताब को लेकर खतरे को देखते हुए लेखक पंडित चामुपति ने महाशय राजपाल से वादा ले लिया कि वे कभी भी लेखक का नाम प्रकट नहीं करेंगे। इसके बाद इस किताब को गुमनाम रूप से ‘दूध का दूध और पानी का पानी’ नाम से प्रकाशित किया गया था।

हालाँकि, यह किताब हदीसों के उचित शोध के बाद लिखा गया था, फिर भी इसको लेकर मुस्लिमों ने बवाल मचा दिया। यह विरोध खिलाफतवादियों और अहमदियों द्वारा संचालित था। अहमदियों ने अपने पैगंबर के कथित अपमान के लिए हिंदुओं का आर्थिक बहिष्कार करने का आग्रह करते हुए कई शहरों में पोस्टर छपवाए।

जबकि पहला संस्करण जल्दी से बिक गया था, ब्रिटिश सरकार ने दूसरे संस्करण के छपने से पहले जून 1924 में इसे प्रतिबंधित कर दिया था। इसके बाद मुसलमानों ने महाशय राजपाल के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज कराया था।

मुकदमे के दौरान उन्हें रंगीला रसूल के असली लेखक का नाम बताने पर छोड़ने की पेशकश की गई, लेकिन उन्होंने इसे अस्वीकार कर दिया। करीब तीन साल तक चली कानूनी कार्यवाही के बाद मई 1927 में महाशय राजपाल को आरोपों से बरी कर दिया गया।

इस फैसले के खिलाफ मुस्लिमों ने बड़े पैमाने पर दंगे किए। मुस्लिम समूहों ने महाशय राजपाल की हत्या का ऐलान किया और कहा कि शरीयत के हिसाब से यह जायज है। इसके बाद महाशय राजपाल की हत्या के कई प्रयास किए गए और अंत में 6 अप्रैल 1929 को इल्म उद दीन नाम के एक 19 वर्षीय बढ़ई ने उनकी छाती में आठ बार चाकू घोंपकर हत्या कर दी।

डेबोरा सैमुअल

हाल ही में नाइजीरिया के उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र सोकोटो में डेबोरा सैमुअल नाम के एक ईसाई छात्र को को ईशनिंदा के आरोप में इस्लामिक भीड़ ने उसके कॉलेज में ही उसे पीट-पीट कर मार डाला। इस हिंसक भीड़ में उसके साथी भी शामिल थे।

सोकोतो राज्य के शेहू शगरी कॉलेज ऑफ एजुकेशन में पढ़ने वाली पीड़िता ने कॉलेज के व्हाट्सएप ग्रुप में किसी व्यक्ति द्वारा इस्लामिक पोस्ट साझा करने पर आपत्ति जताई थी। उन्होंने कहा था कि कॉलेज के ग्रुप में धार्मिक सामग्री साझा नहीं की जानी चाहिए। इसके बाद उन पर ईशनिंदा का आरोप लगाकर उनकी हत्या कर दी गई।

इस्लामिक भीड़ ने न सिर्फ डेबोरा को बुरी तरह मारा, बल्कि डेबोरा के शरीर को पत्थर से बुरी तरह कुचल डाला। उसके बाद उन्हें आग लगा दी। इस हिंसक कांड में शामिल अधिकांश मुस्लिम लड़के उनके सहपाठी थे। मुस्लिमों ने इसे ईशनिंदा का बदला बताया।

सफूरा बीबी

पाकिस्तान के डेरा इस्माइल खान में जामिया इस्लामिया फलाहुल बिनात मदरसा के तीन शिक्षकों ने अपने एक सहयोगी सफूरा बीबी पर ईशनिंदा करने का आरोप लगा दिया। विवाद बढ़ने के बाद एक महिला ने सफूरा बीबी पर चाकू से वार किया और फिर उसका गला काट दिया।

तीन आरोपित महिलाओं ने पुलिस को बयान दिया कि 13 वर्षीय उनकी एक रिश्तेदार लड़की ने सपने में देखा था कि पैगंबर मुहम्मद ने कहा कि सफूरा बीबी ने उनके खिलाफ ईशनिंदा की है। पुलिस रिपोर्ट्स के मुताबिक, मदरसा में पढ़ाने वाली तीन आरोपित महिलाओं ने सपने को साकार किया।

किशन भारवाड़

गुजरात के धंधुका में किशन भारवाड़ नाम के एक हिंदू युवक की 25 जनवरी 2022 को दो मुस्लिम बाइक सवारों ने गोली मारकर हत्या कर दी थी। भारवाड़ ने सोशल मीडिया पर एक वीडियो शेयर किया था, जिसमें पैगंबर मुहम्मद की तस्वीर दिख रही थी। इसके बाद से कट्टरपंथी मुस्लिमों द्वारा उन्हें लगातार हत्या की धमकी दी जा रही थी।

27 वर्षीय किशन की हत्या के लिए मौलाना (इस्लामी धार्मिक नेताओं) ने मुस्लिम लड़कों को भड़काया था। मौलाना ने इसे ‘ईशनिंदा’ बताते हुए इन हमलावरों को किशन की हत्या कर जिहाद के लिए उकसाया था। इस हत्याकांड में कम से कम 6 मौलवियों को गिरफ्तार किया गया है।

हर्षा हत्याकांड

कर्नाटक के शिवमोगा में 20 फरवरी 2022 की रात को एक पेट्रोल पंप के पास बजरंग दल के कार्यकर्ता हर्षा की चाकू मारकर हत्या कर दी गई थी। पेशे से दर्जी हर्षा ने कर्नाटक बुर्का विवाद के दौरान स्कूलों और कॉलेजों के ड्रेस कोड में एकरूपता की माँग करने के लिए भगवा शॉल पहना था।

प्राथमिक जाँच में पाया गया है कि हर्षा की हत्या कॉलेज परिसरों में बुर्का पहनने के खिलाफ उनके रुख के कारण हुई थी। साल 2015 में फेसबुक पर एक इस्लामवादी पेज ‘मैंगलोर मुस्लिम’ ने भी हर्षा को पैगंबर मुहम्मद पर उनकी टिप्पणी के लिए धमकी दी थी।

पोस्ट में लिखा था, “हिंदुत्व आतंकवादी समूह के सदस्य हर्षा ने पैगंबर मोहम्मद और अल्लाह को निशाना बनाते हुए आपत्तिजनक पोस्ट डाले हैं और पवित्र काबा की मॉर्फ्ड तस्वीरें सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर साझा की हैं। हम शिवमोगा के लोगों से अनुरोध करते हैं कि उनके खिलाफ नजदीकी पुलिस स्टेशन में मामला दर्ज करें और उन्हें ‘उचित उपचार’ भी दें।

इसे ईशनिंदा बताते हुए मुस्लिम कट्टरपंथियों ने हर्षा के खिलाफ कई सोशल मीडिया फतवे घोषित किए गए थे। परिणाम ये हुआ कि इन फतवों के कारण हर्षा की अंतत: हत्या कर दी गई।

प्रियंता कुमारा दियावदान

पाकिस्तान के सियालकोट में एक श्रीलंकाई व्यक्ति प्रियंता कुमारा को ईशनिंदा की अफवाहों को लेकर एक उग्र इस्लामी भीड़ ने प्रताड़ित किया और जिंदा जलाकर मार डाला। पीड़ित पाकिस्तानी क्रिकेट टीम की टी20 गियर बनाने वाली कंपनी सियालकोट में राजको इंडस्ट्रीज में महाप्रबंधक थे।

अफवाह फैलाई गई क प्रियंता कुमार ने पैगंबर मुहम्मद का कार्टून फाड़कर कूड़ेदान में डाल दिया। इसके बाद संस्थान के कर्मचारियों ने अल्लाह-हू-अकबर के नारे लगाते हुए उनकी हत्या कर दी।

शार्ली हेब्दो

कथित ईशनिंदा को लेकर दुनिया को हिला देने वाला सबसे बड़ा हत्याकांड फ्रांस के शार्ली हेब्दो का था। शार्ली हेब्दो पत्रिका ने पैगंबर मुहम्मद का कार्टून बनाया था। इसके बाद दुनिया भर के इस्लामी कट्टरपंथी इसके खिलाफ फतवा जारी करते हुए हत्या की धमकी दी थी।

इसके बाद साल 2015 में इस्लामिक कट्टरपंथियों ने शार्ली हेब्दो के कार्यालय में घुसकर उसके कर्मचारियों पर गोलियों की बौछार कर दी थी। इस हमले में कार्यालय और उसके आसपास के 12 लोगों की मौत हो गई थी, जबकि 11 लोग घायल हो गए थे। इसके बाद चार यहूदियों और एक पुलिसकर्मी की हत्या कर दी गई थी।

इन हत्याओं के बाद शार्ली हेब्दो ने उस कार्टून का प्रकाशन जारी रखा। साल 2020 में उसे प्रकाशित करने के बाद इस्लामिक कट्टरपंथियों ने फिर कई हत्याएँ की। पैगंबर के कार्टून प्रकाशन को इस्लामियों ने ईशनिंदा बताया था।

‘बीजेपी-RSS का नाम लो…’: स्वप्ना सुरेश पर समझौते का दबाव, कहा था- सोना तस्करी में शामिल हैं केरल CM विजयन और उनका परिवार

गोल्ड स्मलिंग केस (Kerala Gold Smuggling) में केरल के मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन की संलिप्तता के दावे करने के बाद स्वप्ना सुरेश (Swapna Suresh) ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। केरल हाई कोर्ट में याचिका दायर कर उन्होंने कहा कि विजयन (Pinarayi Vijayan) के सहयोगी ने उनसे मुलाकात कर समझौते का दबाव डाला। ऐसा नहीं करने पर गंभीर परिणाम भुगतने की चेतावनी दी।

रिपब्लिक टीवी का कहना है कि इस याचिका की कॉपी उसके पास मौजूद है। इसके अनुसार शाजी किरण नाम का एक व्यक्ति बुधवार (8 जून 2022) को पलक्कड़ स्थित स्वप्ना के ऑफिस में आया था। मुख्यमंत्री विजयन का करीबी बताते हुए उसकी स्वप्ना से मुलाकात करवाई गई। रिपोर्ट के अनुसार इस व्यक्ति ने समझौते करने अथवा गिरफ्तारी के लिए तैयार रहने की चेतावनी दी।

रिपोर्ट के मुताबिक स्वप्ना ने याचिका में कहा है, “08.06.2022 को शाजी किरण नाम का एक व्यक्ति दोपहर करीब 1.30 बजे पलक्कड़ के मेरे ऑफिस में आया। उसे शिवशंकर ने यह कहकर मिलवाया कि वह पिनाराई विजयन और कोडियेरी बालाकृष्णन का बहुत करीब है। इस व्यक्ति ने मुझे कहा कि वह विजयन के निर्देश पर आया है ताकि इस मुद्दे को सुलझाया जा सके।” याचिका में कहा गया है कि शाजी किरण ने स्वप्ना से सीएम के सामने सरेंडर करने और आरएसएस तथा भाजपा के उकसाने पर उनका नाम लेने की बात कहने को कहा।

गौरतलब है कि सोना तस्करी मामले की मुख्य आरोपित स्वप्ना सुरेश ने 7 जून 2022 को मुख्यमंत्री विजयन पर कई गंभीर आरोप लगाए था। कोच्चि की अदालत में पेशी के बाद उसने मीडिया से बात करते हुए कहा था कि विजयन डिप्लोमेटिक बैगेज की आड़ में सोने की तस्करी में शामिल थे। उसने कहा, “इस मामले में मैंने अदालत से केरल के मुख्यमंत्री, उनके पूर्व प्रमुख सचिव एम. शिवशंकर, विजयन की पत्नी कमला, बेटी वीणा, उनके अतिरिक्त निजी सचिव सी.एम. रवींद्रन, पूर्व नौकरशाह नलिनी नेट्टो और पूर्व मंत्री के.टी. जलील की संलिप्तता के बारे में भी बताया है। साथ ही मैंने कोर्ट में अपनी सुरक्षा की माँग करते हुए याचिका भी दायर की है।”

इसके बाद सत्ताधारी एलडीएफ के विधायक और पूर्व मंत्री केटी जलील ने सीएम विजयन और उनके परिवार के खिलाफ साजिश का आरोप लगाते हुए स्वप्ना सुरेश के खिलाफ केस दर्ज कराया था। इस मामले में दूसरे आरोपित के तौर पर पूर्व विधायक पीसी जॉर्ज का भी नाम है।

क्या है गोल्ड स्मगलिंग केस

केरल में सोना तस्करी का मामला जुलाई 2020 में सामने आया था। डिप्लोमेटिक बैगेज की आड़ में सोने की तस्करी का मामला स्वप्ना सुरेश से शुरू हुआ और फिर इसके तार मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन के दफ्तर तक पहुँच गए। स्वप्ना सुरेश पर आरोप था कि उन्होंने फर्जी डाक्यूमेंट्स पेश कर 2 जुलाई 2020 को ‘डिप्लोमेटिक इम्युनिटी’ का प्रयोग कर खाड़ी देशों से 30 किलो सोने की तस्करी की। इसका खुलासा 6 जुलाई को तब हुआ, जब कस्टम के अधिकारियों ने यूएई कॉन्सुलेट के एक अधिकारी से पूछताछ की, जो PRO के पद पर तैनात था।

इस्लामिक ‘टेरर’ की दहशत, घुटनों पर रेंगने लगे बड़े मीडिया घराने: मुस्लिमों को ठेस पहुँचाने वाली कंटेंट पर खुद ही चला रहे कैंची, ‘एक्स मुस्लिम’ पर पूरा शो गायब

नूपुर शर्मा की टिप्पणी पर मुस्लिम समुदाय द्वारा व्यक्त आक्रोश, जिसकी अगली कड़ी के रूप में सर काटने और सामूहिक बलात्कार की धमकी ने अब पूरा भानुमती का पिटारा ही खोल दिया है। दरअसल, जब से पीएम मोदी सत्ता में आए, हिंदुओं ने ओवरटन विंडो (नैरेटिव) को अपने हिसाब से काफी हद तक सेट करने में कामयाबी हासिल की है, जिसमें कई वर्जित विषयों के बारे में खुलकर बात की गई – चाहे वह हिंदू नरसंहार हो, इस्लामी आक्रमण, इतिहास की विकृति या सांस्कृतिक विरासतों का सुधार। दूसरे तरीके से देखा जाए तो नसीम तालेब का सिद्धांत एकदम जीवंत हो चुका है कि कैसे “सबसे असहिष्णु जीतता है”, इसी का परिणाम है कि आज इस्लाम की आलोचना मुख्यधारा से पहले ही पब्लिक डिस्कोर्स का हिस्सा बन चुकी है।

तालिबान और अल कायदा सहित इस्लामी समुदाय के एक स्वर में “गुस्ताख-ए-रसूल की एक साजा, सर तन से जुदा” के नारे लगाने के बाद, मीडिया घराने भी डरे हुए हैं। उनको ऐसा लगता है कि उन साक्षात्कारों को न दिखाएँ जो मुस्लिमों और इस्लामवादियों को नाराज कर सकते हैं।

यहाँ तक कि इंडिया टीवी, जो कि खुद को जनता की आवाज़ के रूप में प्रदर्शित करते आए हैं, ने एक वीडियो को डिलीट कर दिया है जिसमें उसने पूर्व-मुस्लिमों का साक्षात्कार लिया था और यह जानना चाहा था कि उन्होंने इस्लाम को क्यों छोड़ा?

बता दें कि Youtube पर जहाँ वीडियो को डिलीट कर दिया गया है, वहीं उनकी वेबसाइट पर, यह लिखा हुआ आ रहा है कि पूर्व मुस्लिमों के वीडियो साक्षात्कार को प्राइवेट कर दिया गया है।

स्क्रीनशॉट ऑफ़ एक्स मुस्लिम शो- इंडिया टीवी की वेबसाइट से

फ़िलहाल, उनके वेबसाइट पेज की एक आर्काइव कॉपी, जहाँ यह वीडियो होना चाहिए था, यहाँ देखी जा सकती है।

इंडिया टीवी के साक्षात्कार की बात करें तो उनकी वेबसाइट पर दिए गए शीर्षक के अनुसार, पूर्व मुस्लिमों और मौलानाओं के बीच एक बहस थी। यहाँ यह उल्लेखनीय है कि नूपुर शर्मा प्रकरण के बाद, जहाँ इस्लामी राष्ट्र इस्लाम पर की गई टिप्पणियों की निंदा करने के लिए सामने आए, वहीं अल कायदा और तालिबान ने धमकी दी और कई इस्लामी संगठनों ने नुपुर शर्मा के सिर पर एक करोड़ का इनाम भी रखा। संभवतः इसी का परिणाम है कि इस्लामी दहशत में फ़िलहाल इंडिया TV ने अपने इंटरव्यू शो को हटा लिया है।

वहीं कई समाचार चैनलों के सूत्रों ने कहा है कि नुपुर शर्मा प्रकरण के बाद, शीर्ष मालिकों द्वारा एंकरों और संपादकों पर भारी दबाव डाला जा रहा है कि वे ऐसी सामग्री को हटा दें जिसे इस्लामी समुदाय के लिए आक्रामक के रूप में देखा जा सकता है।

ऐसे ही एक टीवी पत्रकार ने कहा कि ये विचारक (फिलर्स) ज्यादातर चैनलों के मालिकों की ओर से आए होते हैं। “हमें थोड़े में सूचनाएँ दे दी जाती हैं, फिलर्स (जो वक्ता होते हैं।) उनसे यह सुनिश्चित करने के लिए कहा जाता है कि मुस्लिमों को नाराज करने वाले शो नहीं करने हैं, क्योंकि नूपुर शर्मा की घटना के बाद अब माहौल सही नहीं है। वहीं कुछ ऐसे शो को हटाने का अप्रत्यक्ष दबाव भी था जिन्हें आपत्तिजनक माना जा सकता है।

“बढ़ते खतरों के बीच, ऐसे संवेदनशील मुद्दों ने चैनल्स के मालिकों को हिला कर रख दिया है। उन्हें लगता है कि जरा सा भी उकसाने से उन्हें धमकियाँ मिल सकती हैं।”

फिर भी, पिछले 10 वर्षों में और विशेष रूप से पिछले 8 सालों में, हिंदुओं ने ओवरटन विंडो (नैरेटिव) को काफी हद तक स्थानांतरित करने में कामयाबी हासिल की है।

ओवरटन विंडो की बात करें, तो दरअसल विचारों और नीतियों का एक समूह है जो एक निश्चित समय में मुख्यधारा की आबादी के लिए स्वीकार्य है। स्वीकार्यता का दायरा समाज को ‘अस्वीकार्य’ मानने से लेकर विचारों का कौन सा समूह अंततः मुख्यधारा की आबादी के लिए स्वीकार्य सरकारी नीति बन जाता है। यह इसी परिप्रेक्ष्य में आता है।

वहीं जोशुआ ट्रेविनो ने माना है कि सार्वजनिक विचारों की स्वीकृति को मोठे तौर पर इन 6 भागों में बाँटा जा सकता है:

  • असंभव
  • रेडिकल
  • स्वीकार्य
  • सेंसिबल
  • लोकप्रिय
  • पॉलिसी आधारित

ओवरटन विंडो, सीधे शब्दों में कहें, तब शिफ्ट हो जाती है जब एक स्वीकार्य विचार लोकप्रिय हो जाता है और फिर नीति में बदल जाता है। दूसरे शब्दों में कहें तो जब एक कट्टरपंथी विचार ‘समझदारी से भरे’ विचारों से ‘लोकप्रिय’ माना जाता है और फिर आगे चलकर नीति में तब्दील हो जाता है।

जबकि हिंदुओं ने सत्ता में सरकार की मदद से, पिछले कुछ वर्षों में ओवरटन विंडो को स्थानांतरित करने में बड़े पैमाने पर कामयाबी हासिल की है, वहीं मीडिया घरानों ने इस्लामी दबाव के साथ, हिंदुओं को ओवरटन विंडो के फिर से सिकुड़ने का जोखिम बढ़ गया है।

नुपुर शर्मा के साथ जो कुछ भी हुआ, उसे देखकर यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि इंडिया टीवी की तरह, कई दूसरे लोग भी होंगे जो यह सोचते हों कि अगर दुनिया के सबसे बड़े राजनीतिक दल के राष्ट्रीय प्रवक्ता को इस तरह से धमकाया और खतरे में डाला जा सकता है, तो उनके चुप रहने में ही भलाई है। हालाँकि, एक मीडिया हाउस के दबाव में आने, वीडियो डिलीट करने और औसत नागरिकों के बीच एक बड़ा अंतर है, जो मुसीबत में पड़ने पर सबसे पहले उनका समर्थन नहीं कर सकते हैं और साथ ही, दूसरे जो सच बोलने के लिए दबाव में खड़े होने के पेशे में नहीं हैं। हालाँकि, ओवरटन विंडो के सिकुड़ने से उनकी भी राय प्रभावित होती है।

अभी हाल ही में हिंदुओं ने एक ऐसे मजहब के बारे में खुलकर बात करना शुरू किया है, जिसने ऐतिहासिक रूप से हिंदू समुदाय को अपने अधीन रखा, प्रताड़ित, हत्या और बलात्कार किया है। अभी हाल ही में हम खुले तौर पर यह माँग करने लगे थे कि हमारी आस्था और विश्वास को उसी स्तर का सम्मान मिले जो अन्य धर्मों की माँग है और सिर्फ इसलिए कि हम सड़क पर उतरकर अपनी शक्ति का प्रदर्शन नहीं करते हैं, हमारे देवी-देवता का अपमान करने की छूट नहीं हैं। अभी हाल ही में हिंदुओं ने यह महसूस करना शुरू किया कि “सभी धर्म समान हैं” बस कहने की बात है। जबकि हिंदू बहुलता में विश्वास करते हैं, वहीं इस्लामवादियों का सपना दारुल-हर्ब का है, जिसके लिए दार-उल-इस्लाम में परिवर्तित करने की आवश्यकता है और उनके लिए हिंदू काफिर बने रहेंगे, चाहे समुदाय उनके लिए कितनी भी रियायतें क्यों न दे।

देखा जाए तो सदियों से हिंदुओं के साथ दुर्व्यवहार किया गया है, हालाँकि, इंटरनेट युग में, यह तथ्य है कि सोशल मीडिया का इस्तेमाल एक महिला के सिर की माँग के लिए एक अंतरराष्ट्रीय अभियान आयोजित करने के लिए किया जा सकता है, यह एक वास्तविकता है जिसे हिंदू स्वीकार करने की कोशिश कर रहे हैं। इस प्रक्रिया में, जनता के लिए फ्री स्पीच के कार्यों को गंभीर आघात लगा है।

जैसा कि एक ओर इंडिया टीवी इस्लामी दबाव के आगे झुक जाता है, वहीं दूसरी ओर, इंडिया न्यूज पर उनके एंकर प्रदीप भंडारी ने एक कार्यक्रम आयोजित किया था जिसमें पूर्व मुसलमानों ने टेलीविजन पर कट्टरपंथी मुस्लिमों का पर्दाफाश किया था, उसे अभी भी लाइव देखा जा सकता है।

ऐसे में जहाँ आम नागरिकों से अपेक्षा की जाती है कि वे पहले अपनी सुरक्षा के बारे में सोचें, मीडिया घरानों को भी ऐसे बाद के दबावों से निपटने के लिए तैयार होना चाहिए। वहीं इंडिया टीवी जैसे शक्तिशाली मीडिया हाउस से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वह उन पर दबाव डालने से पहले ही झुक जाएँगे। वे निश्चित रूप से नूपुर शर्मा को दी जा रही धमकियों से भयभीत हो गए और धमकी देने वाले इस्लामवादियों के सामने खड़े होने और स्टैंड लेने के बजाय, वे रेंगने लगे जबकि इस्लामवादियों ने अभी तक उन्हें झुकने के लिए भी नहीं कहा था।

21 जुलाई को देश को मिलेगा नया राष्ट्रपति, कुल 4809 वोटर: व्हिप जारी नहीं कर सकेंगे राजनीतिक दल, जानिए पूरी प्रक्रिया

चुनाव आयोग ने गुरुवार (9 जून 2022) को राष्ट्रपति चुनाव की तारीख का ऐलान कर दिया। देश के सर्वोच्च पद के लिए 18 जुलाई को वोटिंग होगी। नतीजे 21 जुलाई को घोषित किए जाएँगे। राष्ट्रपति चुनाव के लिए अधिसूचना 15 जून को जारी की जाएगी। नामांकन की अंतिम तिथि 29 जून और नामांकन पत्रों की जाँच 30 जून को निर्धारित की गई है। उम्मीदवार अपना नामांकन दो जुलाई तक वापस ले सकते हैं।

चुनाव आयोग ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि पैसा या किसी भी प्रकार का लालच देने वालों पर कड़ी कार्रवाई की जाएगी। कोई भी राजनीतिक दल व्हिप जारी नहीं कर सकता है। वोटरों को एक, दो, तीन लिखकर अपनी पसंद बतानी होगी। वोट देने के लिए सभी को विशेष इंक वाला पेन दिया जाएगा। आयोग ने कहा कि राष्ट्रपति चुनाव के कुल वोटरों की संख्या 4809 है। इसमें लोकसभा के सांसद और सभी राज्यों के विधानसभा के विधायक शामिल हैं।

भारत के वर्तमान राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद का कार्यकाल 24 जुलाई 2022 को समाप्त हो जाएगा। इससे पहले देश के अगले और 15वें राष्ट्रपति को चुन लिया जाएगा। आइए जानते हैं भारत में कैसे होता है राष्ट्रपति का चुनाव, कौन इसके लिए वोट करते हैं और कैसे इन वोट की वैल्यू निर्धारित होती है।

कैसे होता है राष्ट्रपति चुनाव

भारत में राष्ट्रपति का चुनाव आम चुनाव से बेहद अलग होता है। इस चुनाव में भारत के नागरिक अप्रत्यक्ष रूप से हिस्सा लेते हैं। अर्थात, इस चुनाव में जनता द्वारा चुने गए विधायक और सांसद हिस्सा लेते हैं। वोट में हिस्सा लेने वाले विधायक और सांसद के वोट का वेटेज अलग-अलग होता है। संविधान के अनुच्छेद-54 के अनुसार, राष्ट्रपति का चुनाव एक इलेक्टोरल कॉलेज करता है। इसके सदस्यों का प्रतिनिधित्व आनुपातिक होता है। यानी, उनका सिंगल वोट ट्रांसफर होता है, पर उनकी दूसरी पसंद की भी गिनती होती है।

इनको है वोट देने का अधिकार

इस चुनाव में सभी प्रदेशों की विधानसभाओं के चुने हुए सदस्य, लोकसभा और राज्यसभा में चुनकर आए सांसद वोट डालते हैं। राष्ट्रपति की ओर से राज्य सभा में मनोनीत 12 सदस्य वोट नहीं डाल सकते ​हैं। इसके अलावा राज्यों की विधान परिषदों के सदस्यों को भी वोटिंग का अधिकार नहीं है, क्योंकि उन्हें जनता ने नहीं चुना होता है।

सिंगल ट्रांसफरेबल वोट सिस्टम क्या है

राष्ट्रपति चुनाव में एक खास तरीके से वोटिंग होती है। इस प्रक्रिया में हिस्सा लेने वाले सदस्य तमाम उम्मीदवारों में से पहले अपने पसंदीदा उम्मीदवार को वोट डालते है। अर्थात बैलट पेपर में सदस्य बता देते हैं कि राष्ट्रपति पद के लिए उनकी पहली, दूसरी और तीसरी पसंद क्या है। यदि पहली पसंद वाले वोटों से विजेता का फैसला नहीं हो सका, तो उम्मीदवार के खाते में वोटर की दूसरी पसंद को नए सिंगल वोट की तरह ट्रांसफर किया जाता है। इसलिए इसे सिंगल ट्रांसफरेबल वोट कहा जाता है।

राष्ट्रपति चुनाव में वोट की वैल्यू का निर्धारण

जैसा पहले ही बता चुके है कि चुनाव प्रक्रिया में विधायक और सांसद वोट की वैल्यू अलग-अलग होती है। यह हर एक विधायक के लिए अलग हो सकता है और इसका निर्धारण उसके राज्य की जनसंख्या और विधानसभा क्षेत्र की संख्या पर निर्भर करता है। वोट का वेटेज निकलने के लिए उस प्रदेश की जनसंख्या को चुने गए विधायकों की संख्या से भाग दिया जाता है, इसके बाद जो नंबर आता है, उसे 1000 से भाग दिया जाता है। इस तरह यह उस राज्य के विधायक के एक वोट का वेटेज होता है। यदि भाग देने के बाद प्राप्त संख्या 500 से ज्यादा है तो इसमें 1 जोड़ दिया जाता है।

सांसद के वोट की वैल्यू

सांसदों के वोटों का वेटेज अलग है। इसमें सबसे पहले सभी राज्यों की विधानसभाओं के चुने सदस्यों के वोटों का वेटेज जोड़ा जाता है। अब इस सामूहिक वेटेज को राज्यसभा और लोकसभा के चुने सदस्यों की कुल संख्या से भाग किया जाता है। इस तरह जो नंबर मिलता है, वह एक सांसद के वोट का वेटेज होता है। अगर इस तरह भाग देने पर शेष 0.5 से ज्यादा बचता हो तो वेटेज में एक का इजाफा हो जाता है।

आपको बता दें कि राष्ट्रपति चुनाव की एक और सबसे खास बात यह है कि इस चुनाव में सबसे ज्यादा वोट हासिल करने से ही जीत तय नहीं होती है। राष्ट्रपति वही बनता है, जो सांसदों और विधायकों के वोटों के कुल वेटेज का आधा से ज्यादा हिस्सा हासिल करे। मान लीजिए राष्ट्रपति चुनाव के लिए जो इलेक्टोरल कॉलेज है, उसके सदस्यों के वोटों का कुल वेटेज 10,98,882 है। ऐसे में जीत के लिए राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार को 5,49,442 वोट हासिल करने होंगे। जो प्रत्याशी सबसे पहले यह कोटा हासिल करता है, उसे राष्ट्रपति चुन लिया जाता है।

अफगान फैशन मॉडल अजमल हकीकी और उनके 3 साथियों को तालिबान ने भेजा जेल, इस्लाम और कुरान के ‘अपमान’ का आरोप

तालिबान (Taliban) ने इस्लाम और कुरान के अपमान के आरोप में अफगानिस्तान (Afghanistan) के मशहूर फैशन मॉडल अजमल हकीकी (Ajmal Haqiqi) और उनके तीन साथियों को गिरफ्तार किया है। इसके बाद ट्विटर पर एक तस्वीर वायरल हुई है, जिसमें हकीकी के हाथों में हथकड़ी लगी दिखाई देती है। 

अफगान में एक वीडियो वायरल है। इसमें कॉमेडियन गुलाम साखी (Ghulam Sakhi) अरबी में कुरान की आयतें पढ़ रहे हैं। गुलाम साखी ठीक से बोल नहीं पाते हैं। अपनी इस खामी को वह लोगों को हँसाने के लिए भी इस्तेमाल करते रहे हैं। लेकिन जब वह कुरान की आयतें पढ़ रहे थे तो अजमल हकीकी हँस रहे थे। यही वीडियो वायरल हो गया। जिसके बाद अजमल हकीकी समेत 4 लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया।

गिरफ्तारी के बाद तालिबान सरकार ने अजमल हकीकी और उनके साथियों का वीडियो जारी किया है, इसमें वे लोग तालिबान सरकार से माफी माँग रहे हैं। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक वीडियो के साथ लिखा गया है, “किसी को भी कुरान या फिर पैगंबर द्वारा कही गई बातों का अपमान करने का हक नहीं है।” अजमल हकीकी अपने फैशन शो, यूट्यूब क्लिप्स और मॉडलिंग इवेंट्स की वजह से चर्चा में रहते हैं।

गौरतलब है कि हाल ही में तालिबान ने अफगानिस्तान में मानवाधिकार संस्थानों समेत 4 विभागों को खत्म कर दिया था। तालिबान सरकार का कहना था कि उसके पास फंड की कमी है, ऐसे में इन विभागों का संचालन कर पाना आसान नहीं होगा। तालिबान ने मानवाधिकार आयोग जैसे विभाग को गैर-जरूरी करार दिया था। तालिबान सरकार के उप-प्रवक्ता इनामुल्लाह समांगनी ने कहा था, “ये विभाग बहुत जरूरी नहीं थे और इन्हें बजट में शामिल नहीं किया गया था। इसलिए इन्हें भंग कर दिया गया है।” इसमें मानवाधिकार आयोग के अलावा संविधान को लागू करने के लिए बना आयोग भी शामिल था।