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मंदिर तोड़ा, खजाना लूटा पर हिला नहीं सके शिवलिंग: औरंगजेब के दरबारी लेखक ने भी कबूला था, शिव महापुराण में छिपा है इसका राज़

प्राचीन काशी विश्वनाथ मंदिर के सम्बन्ध में कई किताबें प्रमाण के तौर पर उपलब्ध हैं जो ज्ञानवापी विवादित ढाँचे में जहाँ अब शिवलिंग प्राप्त हुआ है वहीं पर बाबा विश्वनाथ के अविमुक्त रूप में स्थापित होने को प्रमाणित करती हैं। वहीं मंदिर के तोड़े जाने का एक महत्वपूर्ण प्रमाण ‘मा-असीर-ए-आलमगीरी’ नाम की पुस्तक भी है। यह पुस्तक औरंगज़ेब के दरबारी लेखक सकी मुस्तईद ख़ान ने 1710 में लिखी थी। इसी किताब में उस शाही फरमान का उल्लेख है, जिसमें औरंगज़ेब ने विश्वनाथ मंदिर को तोड़ने के लिए जारी किया था।

फारसी में जारी शाही फरमान-1 (‘मा-असीर-ए-आलमगीरी’ से) बाकी के दो पन्ने नीचे दिए गए हैं।

ज्ञानवापी वह जगह है जहाँ काशी में शिव का आदिस्थान माना गया है। जहाँ शिव स्वयं अविमुक्तेश्वर लिंग रूप में इस तरह से विराजमान हैं कि आक्रांताओं द्वारा कई बार की कोशिशों के बावजूद भी उसे हिलाया तक नहीं जा सका जबकि कोशिशें मुहम्मद गोरी, सुल्तान महमूद शाह, शाहजहाँ सहित कई मुग़ल आक्रांताओं ने की। बाद में 1669 में औरंगजेब के समय जब मूल मंदिर को तोड़कर मंडपम के ऊपर गुम्बद-मेहराब बनाकर उसे मस्जिद के रूप में तामीर करा दिया गया तो भी शिवलिंग को अपनी जगह से हिला पाने की कोशिशें नाकाम ही रहीं। यहीं पर वजूखाना बनवा दिया गया था जहाँ नमाजी हाथ-पैर धोते हैं जो उसी तरफ सिर किए बैठे नंदी से करीब 40 फिट की दूरी पर है। इसलिए भी इसके मुख्य मंदिर होने के प्रमाण सामने आए हैं।

ग्राफिक्स से समझें वर्तमान स्थिति (साभार-अवधेश कुमार)

शिवलिंग को क्षति न पहुँचाए जाने का जिक्र प्रायः मुगलकालीन सभी इतिहासकारों ने करते हुए लिखा है कि काशी के प्रधान शिवालय का ध्वंस करने के बाद जब शिवलिंग को अपने साथ ले जाने की कोशिश हुई तो तमाम कोशिशों के बाद भी शिवलिंग अपने मूल स्थान से हिला भी नहीं। अंतत: शिवलिंग छोड़ दिया गया और अंत में सारा खजाना लूटकर चले गए।

बार-बार लूटा और नष्ट किया गया मुख्य मंदिर परिसर

बता दें कि पुराणों में शिव और पार्वती के आदि स्थान काशी विश्वनाथ को प्रथम लिंग माना गया है। इसका उल्लेख महाभारत में भी किया गया है। वहीं औरंगजेब से पहले जाएँ तो 11वीं सदी तक यह मंदिर अपने मूल रूप में बना रहा, सबसे पहले इस मंदिर के टूटने का उल्लेख 1034 में मिलता है। इसके बाद 1194 में मोहम्मद गोरी ने इसे लूटने के बाद तोड़ा। काशी वासियों ने इसे उस समय अपने हिसाब से बनाया लेकिन वर्ष 1447 में एक बार फिर इसे जौनपुर के सुल्तान महमूद शाह ने तुड़वा दिया। फिर वर्ष 1585 में राजा टोडरमल की सहायता से पंडित नारायण भट्ट ने इसे बनवाया था लेकिन वर्ष 1632 में शाहजहाँ ने एक बार फिर काशी विश्वनाथ मंदिर को तुड़वाने के लिए मुग़ल सेना की एक टुकड़ी भेज दी। लेकिन हिन्दुओं के प्रतिरोध के कारण मुग़लों की सेना अपने मकसद में कामयाब न हो पाई। हालाँकि, इस संघर्ष में काशी के 63 जीवंत मंदिर नष्ट हो गए।

इसके बाद सबसे बड़ा विध्वंश औरंगजेब ने करवाया जो काशी के माथे पर सबसे बड़े कलंक के रूप में आज भी विद्यमान है। साक़ी मुस्तइद खाँ की किताब ‘मासिर -ए-आलमगीरी’ के मुताबिक़ 16 जिलकदा हिजरी- 1079 यानी 18 अप्रैल 1669 को एक फ़रमान जारी कर औरंगजेब ने मंदिर तोड़ने का आदेश दिया था। साथ ही यहाँ के ब्राह्मणों-पुरोहितों, विद्वानों को मुसलमान बनाने का आदेश भी पारित किया गया था।

मंदिर से औरंगजेब के ग़ुस्से की एक वजह यह थी यह परिसर संस्कृत शिक्षा बड़ा केन्द्र था और दाराशिकोह यहाँ संस्कृत पढ़ता था। और इस बार विश्वनाथ मंदिर की महज एक दीवार को छोड़कर जो आज भी मौजूद है और बिना किसी सर्वे के भी साफ दिखाई देती है, समूचा मंदिर संकुल ध्वस्त कर दिया गया। मुग़ल इतिहासकारों के अनुसार ही 15 रब- उल-आख़िर यानी 2 सितम्बर 1669 को बादशाह औरंगजेब को खबर दी गई कि मंदिर न सिर्फ़ गिरा दिया है, बल्कि उसकी जगह मस्जिद की तामीर भी करा दी गई है।

इसे औरंगजेब के समय अंजुमन इंतजामिया जामा मस्जिद नाम दिया गया था लेकिन बाद में ज्ञानवापी कूप के कारण इसका नाम भी ज्ञानवापी मस्जिद ही रहा। वहीं मंदिर के खंडहरों पर ही बना वह मस्जिद बाहर से ही स्पष्ट दीखता है जिसके लिए न किसी पुरातात्विक सर्वे की जरुरत है न किसी खुदाई की। लेकिन अभी सर्वे के बाद मिले शिवलिंग और दूसरे प्रमाणों की वजह से हिन्दुओं की स्थिति और भी मजबूत हुई है।

शिवलिंग को तहस-नहस करने की कोशिश

मुगलों द्वारा कई बार के हमलों में मूल शिवलिंग को नष्ट करने और अपने साथ ले जाने की कई कोशिशें हुईं लेकिन हर बार आक्रांताओं की तमाम कोशिशें क्यों नाकाम हुईं। इसका एक उत्तर शिवमहापुराण के 22वें अध्याय के 21वें श्लोक में मिलता है। यह इन दिनों चर्चा का विषय है। काशी विद्वत परिषद ने भी इस बात का जिक्र करते हुए बताया कि मुग़ल आक्रांताओं की नजर हमेशा से काशी के देवालयों पर रही और कई बार के हमलों में उन्होंने कई सदियों तक समय-समय पर नुकसान भी पहुँचाया। सभी ने अपने-अपने काल में काशी विश्वनाथ मंदिर पर भी आक्रमण किए। मंदिर का खजाना लूटा लेकिन लाख कोशिश के बाद भी विश्वेश्वर शिवलिंग को अपने साथ नहीं ले जा सके।

यहाँ तक कि शिवलिंग अपने स्थान से टस से मस भी नहीं हुआ। लेकिन, इसके प्रमाण के तौर पर जो एक बात कही जा रही है वो पौराणिक भले हो लेकिन उसका प्रमाण जमीन पर आज भी दिखता है। शिवमहापुराण में एक श्लोक की चर्चा हो रही है-

‘अविमुक्तं स्वयं लिंग स्थापितं परमात्मना। न कदाचित्वया त्याज्यामिंद क्षेत्रं ममांशकम्।’

जिसकी व्याख्या कई विद्वानों ने करते हुए बताया है कि मूल शिवलिंग को काशी से बाहर अन्यत्र नहीं ले जा सकते क्योंकि स्वयं महादेव शिव यहाँ अविमुक्त रूप में स्थापित हैं। श्लोक के आधार पर ही कहा जा रहा है कि शिव ने स्वयं आदेश दिया कि मेरे अंश वाले ज्योतिर्लिंग तुम इस क्षेत्र को कभी मत छोड़ना। ऐसा कहते हुए देवाधिदेव महादेव ने इस ज्योतिर्लिंग को अपने त्रिशूल के माध्यम से काशी में स्थापित कर दिया।

अंग्रेजों के समय भी हो चुकी है समझौते की कोशिश

बाद के दूसरे प्रमाणों की बात करें तो काशी विश्वनाथ का इतिहास मुगलों के आक्रमण के बाद से कई बार बनने-बिगड़ने का रहा। वहीं आज की कानूनी प्रक्रिया भी नई नहीं है। जहाँ 18वीं सदी में मराठा सरदार ने मंदिर मुक्ति के प्रयास किए और 1770 ई में बादशाह शाह से मंदिर के क्षतिपूर्ति की वसूल करने का आदेश भी पारित करा लिया। लेकिन उस वक्त तक देश में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी का शासन हो गया था। वहीं सन् 1809 में काशी के हिंदुओं ने मंदिर के स्थान पर बनाए गए मस्जिद पर कब्जा कर लिया जिसे आज के समय में ज्ञानवापी मस्जिद कहा जाता है। तब 1810 में काशी के तत्कालीन डीएम मि. वाटसन ने एक पत्र लिखकर ज्ञानवापी परिसर को हिंदुओं को सौंपने के लिए कहा।

अंग्रेज दंडाधिकारी वॉटसन ने 30 दिसम्बर 1810 को ‘वाईस प्रेसिडेंट ऑफ कॉउन्सिल’ में कहा था, “ज्ञानवापी परिसर हमेशा के लिए हिन्दुओं को सौप दिया जाए। उस परिसर में हर तरफ हिंदुओं के देवी-देवताओं के मंदिर हैं। मंदिरों के बीच में मस्जिद का होना इस बात का प्रमाण है कि वह स्थान भी हिंदुओं का ही है।” तब अंग्रेजी शासन ने अपने अधिकारी की बात नहीं मानी थी। परिणाम स्वरुप यह कभी वास्तविक रूप से लागू नहीं हो पाया।

1936 का ज्ञानवापी मुकदमा

अभी प्रमाणों पर बात चल ही रही है तो थोड़ा सा जिक्र 1936 में चले मुकदमें की भी कर लेते हैं। जिसमें मंदिर के पक्ष में जो अकाट्य प्रमाण दिए गए थे यदि उन्हीं के आलोक में अभी भी सुनवाई हो तो नए सर्वेक्षण और पुराने ऐतिहासिक और पुरातात्विक प्रमाणों के आगे मुस्लिमों के दावे कहीं नहीं ठहरेंगे।

इन्हीं मामलों पर प्रमाण के साथ अपना पक्ष रखते हुए काशी विद्वत परिषद के संगठन मन्त्री पंडित गोविन्द शर्मा बताते हैं कि विश्वनाथ मंदिर के सम्बन्ध में कई पुस्तकें प्रमाण के तौर पर उपलब्ध हैं लेकिन सबसे महत्वपूर्ण प्रमाण ‘मा-असीर-ए-आलमगीरी’ नाम की पुस्तक है। यह पुस्तक औरंगज़ेब के दरबारी लेखक सकी मुस्तईद ख़ान ने 1710 में लिखी थी। इसी पुस्तक में उस फरमान का उल्लेख है, जिसमें औरंगज़ेब ने विश्वनाथ मंदिर को तोड़ने का आदेश दिया था।

लेकिन, जहाँ तक 1936 के मुक़दमे की बात है। तब अदालत में दोनों पक्षों के द्वारा सबूत पेश किए जा रहे थे। ‘मा-असीर-ए-आलमगीरी’ और औरंगज़ेब के फ़रमान की भी चर्चा हुई। तब मुस्लिमों ने उर्दू में लिखी ‘मा-असीर-ए-आलमगीरी’ पेश की जिसमें विश्वनाथ मंदिर को तोड़े जाने और औरंगज़ेब के ऐसे किसी फ़रमान का ज़िक्र नहीं था। कहते हैं कि जब इस छल से हिन्दू पक्ष निराश होने लगा और हिन्दू पक्षकारों के चेहरे पर हवाइयाँ उड़ने लगी तब कुछ ही दिनों के अन्दर काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के इतिहासकार डॉ. परमात्मा शरण ने फ़ारसी में लिखी और 1871 में बंगाल एशियाटिक सोसाइटी के द्वारा प्रकाशित असली ‘मा-असीर-ए-आलमगीरी’ अदालत के समक्ष प्रस्तुत कर दी।

फारसी में जारी शाही फरमान-2 (‘मा-असीर-ए-आलमगीरी’ से)

जिसकी पृष्ठ संख्या-88 पर औरंगज़ेब के आदेश पर काशी विश्वनाथ मन्दिर को तोड़े जाने का ज़िक्र है। कहते हैं तब जाकर उस साज़िश का पर्दाफ़ाश हुआ जो उस्मानिया यूनिवर्सिटी, हैदराबाद में रची गई थी। इसी यूनिवर्सिटी ने ‘मा-असीर-ए-आलमगीरी’ का 1932 में उर्दू अनुवाद प्रकाशित किया था। जिसमें से षडयंत्रपूर्वक श्री काशी विश्वनाथ के इतिहास वाले पन्नों को निकाल दिया गया था।

फारसी में जारी शाही फरमान-3 (‘मा-असीर-ए-आलमगीरी’ से)

खैर, ये सब इसलिए कि वामपंथी इतिहासकारों और इस्लामिक विद्वानों ने कई बार ऐसे छलपूर्वक अधूरे साक्ष्य के आधार पर प्रपंच रचाने की कोशिश की। वही काम वो इस बार भी ज्ञानवापी विवादित ढाँचे में मिले शिवलिंग को ख़ारिज करने के लिए कई उल-जलूल बातें प्रमाण के नाम पर पेश करते नजर आ रहे हैं। ऐसे में बस इतना जान लीजिए कि सबूतों को गायब कर देना, सबूतों के साथ छेड़-छाड़ करना, फ़र्ज़ी सबूत बनाने का प्रयास करना, फ़र्ज़ी कहानियाँ गढ़ना ये सब इनकी पुरानी चालें हैं। बाद में जब सच उजागर हो जाता है तो ये बकवास और बेसिर-पैर की बातें करने लगते हैं।

बिशप कॉटन स्कूल की लड़कियों ने सड़क पर की झोंटा-झोंटी, लात-घूँसे के साथ बेसबॉल का डंडा भी चला: Video वायरल, दावा- बॉयफ्रेंड पर हुई लड़ाई

सोशल मीडिया पर एक वीडियो तेजी से वायरल हो रहा है। यह वीडियो बेंगलुरु के प्रतिष्ठित बिशप कॉटन गर्ल्स स्कूल के सामने का बताया जा रहा है। इस वीडियो में स्कूल के सामने छात्राओं को एक-दूसरे के साथ मारपीट करते हुए देखा जा सकता है। 

वायरल वीडियो में लड़कियाँ स्कूल यूनिफॉर्म में दिखाई दे रही हैं। छात्राओं को मंगलवार (17 मई 2022) को विट्ठल माल्या रोड के पास अपने सहपाठियों के साथ लड़ाई करते हुए देखा गया। इस विवाद का कारण फिलहाल पता नहीं चल पाया है। हालाँकि, सोशल मीडिया पर वायरल स्क्रीनशॉट में इसका कारण बॉयफ्रेंड और फेक डेट बताया जा रहा।

वीडियो में लड़कियों को एक-दूसरे को थप्पड़ मारते और एक-दूसरे के बाल खींचते हुए देखा जा सकता है। एक लड़की को बेसबॉल स्टिक से भी दूसरी छात्राओं को मारते देखा जा सकता है। जहाँ कई लड़के और कुछ महिलाएँ उन्हें अलग करने की कोशिश करते हैं, वहीं दो लड़कियाँ एक-दूसरे को सीढ़ियों से नीचे खींचती है। कुछ लोग असहाय होकर लात, घूँसे और झोंटा झोटी देखते रहे। स्कूली छात्राओं की यह लड़ाई किसी गैंगवार की तरह लग रही थी।

कुछ समय तक लड़ाई जारी रही। बिशप कॉटन गर्ल्स स्कूल की लड़कियों को चीखते और चिल्लाते हुए सुना जा सकता था। कुछ स्कूली बच्चों सहित आसपास मौजूद लोगों ने लड़कियों को लड़ने से रोकने की कोशिश की। हालाँकि, लड़कियाँ एक-दूसरे को पीटती रहीं। एक अन्य वीडियो में एक लड़की को बैरिकेड्स की ओर धकेले जाने के बाद उसकी नाक से खून बहता हुआ दिखाई दे रहा है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, सड़क पर होने वाली लड़ाई को रोकने के लिए स्कूल के अधिकारियों ने कोई दखल नहीं दिया। बिशप कॉटन गर्ल्स स्कूल ने भी अभी तक कोई बयान जारी नहीं किया है। वीडियो सोशल मीडिया पर खूब वायरल हो रहा है और इस पर खूब मीम्स भी बन रहे हैं।

हनुमान चालीसा के टुकड़े-टुकड़े किए, फिर जला कर फेंक दिया: पंजाब में बेअदबी की घटना, AAP सरकार निशाने पर

पंजाब से हनुमान चालीसा की बेअदबी का मामला सामने आया है। बठिंडा जिले में हनुमान चालीसा (Hanuman Chalisa) के जले हुए पन्ने मिलने के बाद से हिन्दू संगठनों में काफी आक्रोश है। सूचना मिलने पर पुलिस और फिंगर एक्सपर्ट की टीम मौके पर पहुँची। फिंगर एक्सपर्ट की टीम ने हनुमान चालीसा के जले हुए पन्नों को अपने कब्जे में लेकर जाँच शुरू कर दी है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, सोमवार (16 मई, 2022) देर रात कुछ शरारती तत्वों ने हनुमान चालीसा में आग लगाकर उसकी प्रतियाँ किला साहिब के पास फेंक दी थी। इसकी जानकारी मिलते ही हिन्दू संगठनों में विरोध की लहर दौड़ गई।

बताया जा रहा है कि शहर का माहौल खराब करने के लिए शरारती तत्वों ने यह हरकत की है। हिंदू संगठनों के नेता सुखपाल सरन और संदीप अग्रवाल ने कहा कि उन्हें देर शाम सूचना मिली थी कि किले के पास किसी ने हनुमान चालीसा में आग लगा दी है। वहीं एसएसपी बठिंडा जे एलेनचेजियन ने हिंदू संगठनों को भरोसा दिलाते हुए कहा है कि पुलिस इस मामले की तह त​क जाने के लिए जाँच में जुट गई है। सीसीटीवी कैमरों की फुटेज भी खंगाली जा रही है। जल्द ही हनुमान चालीसा का अपमान करने वालों को गिरफ्तार कर लिया जाएगा।

वहीं, सोशल मीडिया पर हनुमान चालीसा का अपमान करने की खबर वायरल होने के बाद से यूजर्स में व्याप्त रोष है। पंजाब प्रधान अंतरराष्ट्रीय हिंदू महासभा के ट्विटर हैंडल से मोदी सरकार से इस मामले में शरारती तत्वों के खिलाफ सख्त कदम उठाने की माँग की गई है। ट्वीट में लिखा गया है, “मोदी सरकार को सख्त कदम उठाने चाहिए। पंजाब में ना तो हिंदू सुरक्षित हैं और ना हिंदू धर्म सुरक्षित है। आज बठिंडा में हनुमान चालीसा का अपमान किया गया। हम कब तक हिंदू देवी-देवताओं का अपमान सहन करते रहेंगे। शरारती खालिस्तानी की गतिविधियाँ तेज होती जा रही हैं मोदी सरकार पंजाब की तरफ ध्यान दें।”

एक अन्य यूजर ने लिखा, “हिन्दू विरोधी ताकतों को एकजुटता से कुचलना चाहिए। सरकार तमाशा देखती है। जात-पात से ऊपर उठकर सबसे पहले हमें हिन्दू बनना चाहिए।”

सूख गई यमुना, दिल्ली पानी को तरसी: जल संकट के लिए हरियाणा को दोषी बता रहे केजरीवाल, CM खट्टर ने बताया- कितना दे रहे पानी

दिल्ली में मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल (Delhi CM Arvind Kejriwal) के नेतृत्व वाली आम आदमी पार्टी की सरकार (Aam Aadami Party Government) जब भी संकट की स्थिति आती है, वह अपनी जिम्मेदारियों से भागने लगती है। प्राय: वह इसका दोष दूसरों पर मढ़ने की कोशिश की करती रहती है। दिल्ली में गहराए जल संकट को लेकर अरविंज केजरीवाल की सरकार ने इसके लिए हरियाणा (Haryana) को दोषी ठहराया है।

दिल्ली में सूख रही यमुना नदी को लेकर अरविंद केजरीवाल सरकार ने भाजपा शासित राज्य हरियाणा को आपात संदेश भेजते हुए दिल्ली के लिए अतिरिक्त पानी की माँग की थी। हालाँकि, हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहरलाल खट्टर (Manohar Lal Khattar) ने कहा कि अरविंद केजरीवाल झूठ बोल रहे हैं और आंकड़े भी झूठे पेश कर रहे हैं।

सीएम खट्टर ने कहा कि दिल्ली को उसके हिस्से का पानी 1,050 क्यूसेक पानी दिया जा रहा है। वहीं, सीएम खट्टर ने आरोप लगाया कि मुख्यमंत्री भगवंत मान (CM Bhagwant Mann) की नेतृत्व वाली पंजाब की आम आदमी पार्टी की सरकार हरियाणा का पानी रोक रही है।

अरविंद केजरीवाल की सरकार का कहना है कि हरियाणा द्वारा दिल्ली को कम पानी देने के कारण यमुना का जलस्तर नीचे आ गया है। वहीं, वजीराबाद जलाशय का जलस्तर 674.5 फुट से घटकर 671.8 फुट आ गया है। इसके कारण दिल्ली के कई इलाकों में पानी की संकट का सामना करना पड़ रहा है।

इस जल संकट के कारण दिल्ली के कम से कम 25 इलाकों पर इसका सीधा प्रभाव पड़ेगा। इन इलाकों में लोगों को पानी की किल्लत झेलनी पड़ेगी। नदी के सूखने के कारण चंद्रावल, वज़ीराबाद और ओखला में पानी का उत्पादन लगभग 25-30 प्रतिशत तक तक गिर गया है। यमुना के सूखने से दिल्ली के दिल्ली कैंट, पटेल नगर, करोलबाग, सिविल लाइंस, पहाड़गंज, तुगलकाबाद, मॉडल टाउन, पंजाबी बाग, बुराड़ी, कमला नगर, शक्ति नगर, प्रह्लादपुर, जहाँगीरपुर, मूलचंद, ग्रेटर कैलाश आदि इलाकों में इसका सीधा प्रभाव पड़ेगा।

ये पहली बार नहीं है जब केजरीवाल सरकार ने कुप्रबंधन के कारण दिल्ली की बिगड़ी हालत के लिए दूसरे पर आरोप लगाया हो। पंजाब में जब कॉन्ग्रेस और हरियाणा में भाजपा की सरकार रही तब दिल्ली में प्रदूषण के लिए इन दोनों राज्यों में पराली जलाना दिल्ली के लिए प्रदूषण का कारण बता चुके हैं। कोरोना काल में मजदूरों के पलायन के लिए वह केंद्र को दोषी ठहरा चुकी है। वहीं, दिल्ली में निगमकर्मियों की हड़ताल पर राजधानी की सड़कों पर फैले कचड़े के लिए भाजपा शासित MCD को दोषी ठहराया था। वहीं, भाजपा का कहना है कि निगमकर्मियों का वेतन देने के लिए दिल्ली सरकार फंड जारी नहीं कर रही है।

काशी विश्वनाथ पर की थी विवादित टिप्पणी, अब वायरल हुआ LU प्रोफेसर का वीडियो: खेला जाति वाला कार्ड, कहा – मेरी पिटाई हुई, गाली दी

काशी विश्वनाथ मंदिर और हिन्दू धर्म को लेकर विवादित बयान देने के मामले में चर्चा में चल रहे लखनऊ विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर रविकांत चंदन के साथ मारपीट किए जाने के आरोप लगे हैं। प्रोफेसर का आरोप है कि वो बुधवार (18 मई, 2022) को सिक्योरिटी गार्ड के साथ क्लास लेने जा रहे थे, तो उसी दौरान उन्हें किसी ने थप्पड़ जड़ दिया।

रिपोर्ट के मुताबिक, शिक्षक का आरोप है कि प्रॉक्टर ऑफिस के सामने ‘समाजवादी छात्र सभा’ के इकाई अध्यक्ष कार्तिक पांडेय ने उनके साथ मारपीट की और उन्हें जातिगत गालियाँ दी। इसका वीडियो वायरल हो रहा है, जिसके कुछ लोग आपस में धक्का-मुक्की करते हुए देखे जा सकते हैं। हालाँकि, इस बीच वहाँ पर तैनात सिक्योरिटी गार्ड ने कार्तिक को पकड़ लिया। बाद में यूनिवर्सिटी चौकी के पुलिस कर्मी कार्तिक को अपने साथ ले गए।

‘समाजवादी’ छात्र कार्तिक पर मारपीट का आरोप लगाने वाली प्रोफेसर रविकांत चंदन के मुताबिक, उनके साथ यह वारदात दोपहर के करीब 1 बजे के आसपास हुई। उस दौरान वो चीफ प्रॉक्टर के कार्यालय के सामने थे और घटना के बाद से वो वहीं पर मौजूद हैं।

इस बीच विवादित प्रोफेसर के समर्थन में शिक्षक संघ समेत कई छात्र संगठन उतर आए हैं। मंगलवार को ऑल स्टूडेंट एसोसिएशन (AISA) और कॉन्ग्रेस की स्टूडेंट विंग एनएसयूआई ने रविकांत चंदन का बचाव किया है। इसके साथ ही उनके खिलाफ दर्ज एफआईआर को खारिज करने की माँग की गई है।

क्या है पूरा मामला

गौरतलब है कि हाल ही में रविकांत चंदन ने एक टीवी डिबेट के दौरान काशी विश्वनाथ और हिन्दू संतों के खिलाफ बयान दिया था। इसके खिलाफ हसनगंज थाने में धार्मिक भावनाओं को आहत करने का केस दर्ज किया था। लखनऊ विश्वविद्यालय के छात्र अमन दुबे ने इस मामले में केस दर्ज कराया था। विश्वविद्यालय ने भी प्रोफेसर रविकांत से स्पष्टीकरण माँगा था।

ज्ञानवापी शिवलिंग ‘काशी विश्वनाथ मंदिर न्यास परिषद’ को सौंपने की माँग, बोले परिषद के अध्यक्ष – अब ये वजूखाना कैसे हो सकता है?

ज्ञानवापी विवाद के बीच ‘काशी विश्वनाथ मंदिर न्यास परिषद’ के अध्यक्ष नागेंद्र पांडे ने अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। उन्होंने बुधवार (18 मई, 2022) को कहा, “बाबा विश्वेश्वर की मूर्ति मिल गई है तो ये वजूखाना कैसे हो सकता है, अब ऐसा नहीं हो सकता। हमारी माँग है कि जब तक फैसला नहीं आ जाता, तब तक शिवलिंग काशी विश्वनाथ न्यास को सौंप दिया जाए।”

ज्ञानवापी विवादित ढाँचे के अंदर वजूखाना (नमाज से पहले पैर हाथ धोने की जगह) को प्रशासन ने सील कर दिया है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, प्रशासन ने यहाँ लोहे की चादरें और जाली लगाकर वजू खाने को बंद कर दिया है। अब किसी को भी इस जगह पर जाने की इजाजत नहीं है। रिपोर्ट्स में दावा किया जा रहा है वजूखाने की सुरक्षा की जिम्मेदारी सीआरपीएफ को सौंपी गई है। सीआरपीएफ के दो जवान सील की गई इस जगह पर दिन-रात तैनात रहेंगे।

बीते दिनों वाराणसी में विवादित ज्ञानवापी ढाँचे का सर्वे पूरा होने के बाद हिन्दू पक्ष ने यहाँ शिवलिंग मिलने का दावा किया था। यह शिवलिंग कुएँ में मिला था। इस दौरान 16 मई 2022 (सोमवार) दीवारों पर हिन्दू मंदिर के अवशेष दिखाई देने का भी दावा किया गया था। इसके बाद से इस जगह को सील कर दिया गया है। अगले दिन यानी मंगलवार (17 मई, 2022) को सिविल जज सीनियर डिवीजन की अदालत में सुनवाई के दौरान दोनों पक्षों (हिंदू और मुस्लिम) के बीच जोरदार बहस ​हुई।

इसमें सबसे पहले वादी (हिंदू) पक्ष के अधिवक्ताओं ने अपनी बात रखते हुए कहा था, “जहाँ शिवलिंग मिला है, वहाँ भीषण बदबू है और वजू किया गंदा जल बह रहा है। उसके नीचे का हिस्सा दीवारों में चुना गया है। इस स्थल पर बांस-बल्ली व मलबा-पत्थर है।” उन्होंने उसे हटाकर तहखाने की दीवार तोड़कर उस स्थान की भी कमीशन कार्यवाही कराने पर बल दिया। वादी पक्ष का तर्क था कि इससे हकीकत का पता चल जाएगा कि शिवलिंग की गहराई कितनी है। यह स्थान नंदी जी के मुख के ठीक सामने है और वही गर्भगृह बताया गया।

दूसरी ओर प्रतिवादी अंजुमन इंतजामिया मस्जिद कमेटी की ओर से सर्वे रिपोर्ट आने से पहले ही शिवलिंग पाए जाने की बात पर बिना आपत्ति जताए उसे सील किए जाने पर हैरानी जताई है। प्रतिवादी पक्ष ने कहा कि पहले रिपोर्ट कोर्ट में प्रस्तुत हो और उससे सभी अवगत हों। इसके बाद हम अपना पक्ष मजबूती से रखेंगे। साथ ही प्रतिवादी पक्ष ने मीडिया में बयानबाजी पर सवाल उठाते हुए कहा कि जो न पक्षकारों का वकील है, न सर्वे टीम का सदस्य है। वह भी इस मामले में अनापशनाप बयान दे रहा है।

गौरतलब है कि जी न्यूज़ के एक शो में बोलते हुए एडवोकेट विष्णु जैन ने कहा था, “मैंने कोई गोपनीयता भंग नहीं की है। मैं वही सब बता रहा हूँ जो प्रकाशित हो चुका है। तथाकथित ज्ञानवापी मस्जिद की जो भी पश्चिमी दीवार को देख लेगा वो इसे हिन्दू मंदिर ही कहेगा। उसमें देवी-देवताओं की मूर्तियाँ रखने के लिए स्थान बना हुआ है। इसी के साथ घंटियाँ बनी हुई हैं। इस मामले में कुल 7 केस दाखिल हुए हैं। उन केसों में भक्त, भगवान, स्थान और मालिकाना हक सब शामिल है। आने वाले समय में सभी दावे एक साथ जोड़ दिए जाएँगे।”

एडवोकेट विष्णु जैन ने आगे कहा था, “1996 में भी सर्वे हुआ था ज्ञानवापी का। अब दोबारा हुआ है। अगर दोनों स्थितियों में कोई फर्क मिला तो प्लेसेस ऑफ़ वर्शिप एक्ट विपक्षी पर लागू होगा। प्लेसेस ऑफ़ वर्शिप एक्ट हमारे अदालत जाने का अधिकार छीन लेता है। यह एक्ट सुप्रीम कोर्ट द्वारा वर्णित हर किसी के अदालत जाने के अधिकारों का उललंघन है।”

शिवलिंग पर अश्लील टिप्पणी करने वाले AIMIM नेता दानिश कुरैशी को गुजरात पुलिस पुलिस ने किया गिरफ्तार, लिखा था…

गुजरात AIMIM के नेता दानिश कुरैशी को बुधवार (18 मई, 2022) को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। दानिश पर आरोप है कि उन्होंने ज्ञानवापी विवादित ढाँचे में शिवलिंग पाए जाने और स्थानीय अदालत द्वारा इसकी सुरक्षा का आदेश दिए जाने के बाद अभद्र टिप्पणी की थी। हिंदू संगठनों ने इस पर आक्रोश जताया था और उनकी गिरफ्तारी की माँग की। मंगलवार (17 मई, 2022) को अहमदाबाद के वासणा में उसके खिलाफ याचिका दायर की गई थी।

AIMIM नेता दानिश कुरैशी ने ज्ञानवापी में मिले शिवलिंग को लेकर सोशल मीडिया पर अश्लील और अभद्र टिप्पणी की। इसके बाद अहमदाबाद के वासणा इलाके के रहने वाले जयदीप सिंह वाघेला ने दानिश के खिलाफ वासणा थाने में शिकायत दर्ज कराई। जयदीप सिंह वाघेला ने मामला दर्ज कर कार्रवाई की माँग की थी। पुलिस ने आज दानिश को गिरफ्तार कर लिया है।

ऑपइंडिया के साथ एक बात करते हुुए याचिकाकर्ता जयदीप सिंह वाघेला ने बताया कि जब कुरैशी की टिप्पणी उनके संज्ञान में आई, तो किसी भी हिंदू की तरह उनकी भी धार्मिक भावनाएँ आहत हुईं। इसलिए सभी हिंदुओं की तरफ से उन्होंने कुरैशी के खिलाफ वासणा थाने में अर्जी दी। वाघेला ने आगे कहा कि दानिश की गिरफ्तारी भर से बात खत्म नहीं हो जाती है, बल्कि कड़ी से कड़ी सजा भी मिलनी चाहिए।

उल्लेखनीय है कि ज्ञानवापी विवादित ढाँचे में शिवलिंग पाए जाने, उसकी सुरक्षा को बरकरार रखने और सर्वेक्षण को अवैध नहीं मानने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले से अधिकतर इस्लामवादियों की तरह गुजरात एआईएमआईएम के नेता भी निराश थे। उन्होंने अपने हर सोशल मीडिया अकाउंट पर हिंदू आस्था के प्रतीक शिवलिंग पर अपमानजनक और अश्लील टिप्पणी की।

दानिश की टिप्पणी के बाद, हिंदू संगठनों ने उग्र विरोध प्रदर्शन किया और अधिकारियों से कुरैशी को हिरासत में लेने का आह्वान किया। हिंदू युवा वाहिनी के प्रभारी योगी देवनाथ ने भी गुजरात के मुख्यमंत्री से दानिश कुरैशी की गिरफ्तारी की माँग की।

दानिश ही नहीं, बल्कि कई सोशल मीडिया यूजर्स ने शिवलिंग और भगवान शंकर का मजाक उड़ाते हुए पोस्ट किया। खुद को कॉन्ग्रेस का प्रदेश समन्वयक बताने वाले अफजल लखानी ने भी शिवलिंग की तुलना थाली और प्याले की तस्वीर से तुलना करते हुए फेसबुक पर पोस्ट कर हिंदुओं की भावनाओं को आहत किया है।

DC ऑफिस के सामने महिला ने की आत्मदाह की कोशिश, ईसाई में धर्मांतरण के लिए प्रताड़ना का आरोप: कहा- तमिलनाडु पुलिस नहीं कर रही कार्रवाई

तमिलनाडु (Tamil Nadu) में कलेक्टर ऑफिस के बाहर एक महिला ने धर्मांतरण के लिए परेशान किए जाने का आरोप लगाते हुए आत्मदाह करने की कोशिश की। हालाँकि, घटनास्थल पर मौजूद लोगों ने उसे बचा लिया। महिला का आरोप है कि ईसाई धर्म अपनाने के लिए उस पर लगातार दबाव डाला जा रहा है।

राज्य के रामनाथपुरम (Ramanathapuram) जिले की पचेरी गाँव की रहने वाली वलारमती ने आरोप लगाया कि उसके गाँव का ही रहने वाला देवदास उसको उसके परिवार को ईसाई धर्म अपनाने के लिए मजबूर कर रहा है। महिला ने आरोप लगाया कि धर्मांतरण से इनकार करने पर देवदास उसके परिवार को प्रताड़ित कर रहा है।

अपनी व्यथा के लेकर कलेक्टर के ऑफिस में पहुँची वलारमती का कहना है कि इसकी शिकायत उसने पुलिस से की थी, लेकिन पुलिस मामले में कोई कार्रवाई नहीं रही है। इसलिए उसने आत्मदाह करने करने का प्रयास किया। महिला ने आरोप लगाया कि उसके गाँव में धर्म परिवर्तन का काम किया जा रहा है और जब उसके परिवार ने इनकार कर दिया तो उसे 2019 से ही परेशान किया जा रहा है।

दरअसल, वलारमती पुलिस की बेरुखी से परेशान होकर कलेक्टर ऑफिस पहुँची थी, जहाँ अधिकारी आम लोगों की शिकायतें सुन रहे थे। इसी दौरान उसने यह कदम उठाया। हालाँकि, वहाँ मौजूद पत्रकारों एवं पुलिसकर्मियों ने उसकी कोशिश की विफल करते हुए उसे बचा लिया।

वालारमती का कहना है कि देवदास ने 8 लोगों के साथ मिलकर ईस्ट कोस्ट रोड पर उसके बेटे घेर लिया, लेकिन वहाँ मौजूद लोगों ने उसे बचा लिया। महिला का आरोप है कि देवदास और उसके परिवार ने घर का रास्ता भी रोक दिया है और झूठे मामले में फँसा दिया है। वलारमती ने कहा, “इसके बाद हम कोर्ट गए और हमारे पक्ष में फैसला आया। इसके बाद उन लोगों ने मुझे जान से मारने की कोशिश की।”

इंडिया टुडे के अनुसार, महिला का कहना है कि जब उन लोगों ने उस पर हमला किया तो वह पुलिस के पास गई, लेकिन पुलिस ने कार्रवाई करने का वादा करने के बाद भी कुछ नहीं किया। महिला का आरोप है कि देवदास और उसका परिवार उसे और उसके परिवार को नुकसान पहुँचाने की कोशिश कर रहा है।

वहीं, पुलिस कहना है कि राजस्व प्रभाग अधिकारी और पुलिस उपाधीक्षक द्वारा एक जाँच में पता चला है कि मुद्दा भूमि विवाद का है। गाँव में अभी भी कई हिंदू परिवार हैं। पुलिस सूत्रों कहना है कि वलारमती और देवदास के परिवार के बीच जमीन के एक हिस्से को लेकर 10 साल से भी अधिक समय से विवाद चल रहा है।

वहीं, एक अन्य मामले में ईसाइयों ने हिंदुओं पर हमला किया है, जिसमें एक महिला की सिर में चोट आई है। ऑर्गेनाइजर के अनुसार, घटना तिरुनेलवेली जिले के अदैमथिप्पनकुलम की है। यहाँ ईसाइयों और हिंदुओं के बीच गाँव के एक सार्वजनिक स्थान के उपयोग को लेकर लंबे समय से विवाद चल रहा है। यह मामला कोर्ट में विचाराधीन है। कोर्ट ने आदेश अंतरिम आदेश में विवादित जगह पर दोनों पक्षों को जाने से बचने के लिए कहा है।

कोट पर 6 भाषा में ‘भारत’ लिख कान्स फेस्टिवल पहुँचे अनुराग ठाकुर: इंडिया को ‘कंट्री ऑफ ऑनर’ का सम्मान, 6 फिल्में चलेंगी पर्दे पर

फ्रांस में मंगलवार (17 मई 2022) से शुरू हुए 75वें कान्स फिल्म फेस्टिवल में भारत का प्रतिनिधित्व इस बार सूचना एवं प्रसारण मंत्री अनुराग ठाकुर ने अपनी टीम के साथ किया। कार्यक्रम में अनुराग ठाकुर एक खास कोट पहने दिखे जिसकी बटन पर 6 भाषाओं में भारत लिखा था। इस बार ‘मार्चे डू सिनेमा’ में भारत को पहले ‘कंट्री ऑफ ऑनर’ के रूप में चुना गया है। ये भारत के लिए बड़े सम्मान की बात है।

बता दें कि 17 मई को केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर के साथ-साथ कान्स फेस्टिवल में रेड कॉर्पेट पर संगीतकार ए आर रहमान, संगीतकार रिकी केज, गीतकार एवं कवि प्रसून जोशी, अभिनेता नवाजुद्दीन सिद्दीकी, आर माधवन, अनुभवी निर्देशक शेखर कपूर, वाणी टी टीकू, रिकी केज, कमल हसन और लोक गायक मामे खान शामिल थे। इसके अलावा कान्स कार्यक्रम में तेलुगु अभिनेत्रिया तमन्ना भाटिया और पूजा हेगड़े भी नजर आईं। सूचना एवं प्रसारण मंत्री ने अपने प्रतिनिधिमंडल को लेकर कहा कि कान्स रेड कार्पेट पर चलने वाला यह अब तक का सबसे बड़ा भारतीय दल है।

बता दें कि आज अनुराग ठाकुर कान्स फिल्म फेस्टिवल के अलावा एक बिजनेस इवेंट में भारतीय पवेलियन का उद्घाटन किया। इसके बाद वह मैजेस्टिक बीच पर मार्चे डू फिल्म के उद्घाटन समारोह का हिस्सा बनेंगे। मंगलवार को वह रेड कार्पेट पर सफेद कोट में नजर आए जिसमें हिंदी, अंग्रेजी, गुजराती, असम, मलयाली और पंजाबी में भारत लिखा हुआ है।

कंटेंट हब बन सकता है भारत: PM मोदी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इस फेस्टिवल के शुरू होने से पहले टीम इंडिया को पत्र लिखा। अपने पत्र में उन्होंने कहा, ये संयोग ही है कि भारत-फ्रांस संबंधों के 75 साल, आजादी के 75 साल और कान्स फिल्म फेस्टिवल साथ-साथ मनाया जा रहा है। पीएम मोदी ने बताया कि भारत की काफी कुछ कहानियाँ बताई जानी शेष हैं और भारत में वो क्षमता है कि वो दुनिया का कंटेट हब बनेगी। फिल्मी दुनिया में अपनी ताकत दिखाने गए टीम इंडिया के नेतृत्व की बागडोर केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर ने संभाली तो उन्होंने तय कर लिया था कि कुछ अलग कर के दिखाना है ताकि दुनिया के सामने देश की फिल्मों का ही नहीं बल्कि बाकी दमखम भी दिखे।

कौन-कौन सी फिल्में कान्स फेस्टिवल में दिखाई

उल्लेखनीय है कि भारतीय सिनेमा के महान फिल्ममेकर सत्यजीत रे की दुर्लभ फिल्म प्रतिद्वंदी को इस बार कान्स फिल्म फेस्टिवल में प्रदर्शित करने का निर्णय लिया गया है। इसके अलावा 75वें कान्स फेस्टिवल में भारत की 6 और फिल्में दिखाई जानी हैं। इनमें जुलाई में रिलीज होने वाली आर माधवन की रॉकेट्री: द नाम्बी इफेक्ट है। वहीं अन्य पाँच फिल्में निखिल महाजन की मराठी फिल्म गोदावरी है, शंकर श्रीकुमार की ‘अल्फा बीटा गामा’, बिस्वजीत बोरा की ‘बूम्बा राइड’, अचल मिश्रा की ‘धुइन’ और जयराज की ‘ट्री फुल ऑफ पैरट्स’ शामिल है। ये फेस्टिवल  17 मई से 28 मई कर चलने वाला है। अनुराग ठाकुर के साथ भारतीय प्रतिनिधिमंडल में अक्षय कुमार को भी शामिल होना था लेकिन कोरोना पॉजिटिव होने के कारण वह इसका हिस्सा नहीं बन पाए

सपा नेता मोहसिन अंसारी ने लीची के बीज को बताया शिवलिंग, यूपी पुलिस ने दबोचा: फेसबुक के जरिए माहौल बिगाड़ने की कोशिश

ज्ञानवापी विवादित ढाँचे पर कोर्ट की सुनवाई और वहाँ पर शिवलिंग होने की खबरों के बीच कट्टरपंथी इस्लामवादी लगातार हिन्दू धर्म को ठेस पहुँचाने वाले पोस्ट कर रहे हैं। ऐसा ही एक पोस्ट उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर से समाजवादी पार्टी के नेता मोहसिन अंसारी ने किया है। सपा नेता ने लीची के कटे हुए फल की तस्वीर शेयर करते हुए उसके बीज की तुलना शिवलिंग से की। इसके बाद उसे गिरफ्तार कर लिया गया है।

रिपोर्ट के मुताबिक, समाजवादी पार्टी के नेता मोहसीन अंसारी के खिलाफ कोतवाली पुलिस ने एफआईआर दर्ज की है। इस मामले में सीओ सिटी कुलदीप कुमार के मुताबिक, मोहसिन नाम के व्यक्ति ने विवादित पोस्ट की थी, जिसके जरिए धार्मिक कमेंट किए गए थे। इससे सामाजिक सौहार्द बिगड़ने का खतरा बढ़ गया था। पुलिस अधिकारी के मुताबिक, आरोपित सपा नेता के खिलाफ इंडियन पीनल कोड की धारा धारा 153A और आईटी एक्ट-2000 की धारा 67 के तहत केस दर्ज किया गया है।

उल्लेखनीय है कि धारा धारा 153A के तहत दोषी पाए जाने वाले व्यक्ति को 3 साल की कैद या जुर्माना अथवा दोनों ही हो सकते हैं।

क्या है पूरा मामला

गौरतलब है कि समाजवादी पार्टी के नेता मोहसिन अंसारी पर ये आरोप है उन्होंने फेसबुक पर लीची को बीच से कटी हुई इमेज को शेयर किया था। इसे उसने शिवलिंग करार देते हुए कहा कि इस लीची की जाँच होनी चाहिए। इसके साथ बाद कई सारी विवादित टिप्पणियाँ की गईं। इसके जरिए हिन्दुओं की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाने की कोशिश की गई।

फोटो साभार: फेसबुक

इससे पहले इसी तरह के पोस्ट हिमाचल प्रदेश के सिरमौर स्थित पावंटा में अरमान मलिक नाम के मुस्लिम व्यक्ति ने किया था। उसने अपनी टॉयलेट सीट की तुलना शिवलिंग से की थी। उसके साथ नसीम राज ने इसे शेयर किया था। जब पुलिस ने दोनों को गिरफ्तार कर लिया तो सैकड़ों की संख्या में कट्टरपंथी इस्लामियों ने थाने पर हमला कर दिया। पुलिस का गाड़ियों पर पथराव किया गया।