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डेढ़ करोड़ घरों को मुफ्त बिजली कनेक्शन, किसानों का बिल आधा: सपा-बसपा के अंधकार में डूबा था UP, उजाला लेकर आए CM योगी

समाजवादी पार्टी अभी भले ही सब कुछ मुफ्त देने के अपने वादे में बिजली को भी जोड़ कर चल रही है। इसके लिए लोगों को आकर्षित करने का एक नया तरीका खोजा गया है। अभी से ही ‘रजिस्ट्रेशन’ चालू कर दिया गया है। फॉर्म भरवाए जा रहे हैं। हालाँकि, इसे चुनाव आयोग के दिशानिर्देशों के खिलाफ भी बताया जा रहा है। लेकिन, जब इस पार्टी की सरकार थी तब बिजली महँगी भी थी और आती भी नहीं थी। जबकि भाजपा की राज्य सरकार ने किसानों और गरीबों को बिजली के क्षेत्र में कई राहत दिए।

किसानों के लिए बिजली बिल में 50% कटौती की गई

जनवरी 2022 में ही योगी सरकार ने ट्यूबवेल चलाने वाले किसानों के लिए बिजली बिल को आधा करने का ऐलान किया। इससे 13 लाख लोगों को फायदा मिला।इसके साथ ही शहरी क्षेत्र के किसानों के लिए भी बिजली बिल में 50% की कटौती की गई। इसके साथ ही राज्य में मीटर वाले बिजली कनेक्शन का भाव 2 रुपए प्रति यूनिट की जगह 1 रुपए प्रति यूनिट हो गया। वहीं हॉर्सपॉवर मीटरों पर 70 की जगह 35 रुपए प्रति मीटर हो गया। इसी तरह बिना मीटर वालों के लिए ये 170 की जगह 85 रुपए प्रति मीटर हो गया।

इससे शहरी क्षेत्र के लोगों को भी लाभ मिला और उन्हें 6 रुपए प्रति यूनिट की जगह 3 रुपए प्रति यूनिट ही अब देने होते हैं। सात ही फिक्स्ड मीटर रेंटल चार्ज भी 130 रुपए की जगह 65 रुपए प्रति महीने हो गया। ऐसे में जब सपा और AAP ने 300 यूनिट बिजली मुफ्त देने का वादा किया है, लोगों को आशंका ये है कि क्या उनके राज में बिजली समय पर आएगी भी? फ़िलहाल यूपी के अधिकतर इलाकों में बिजली 24 घंटे आती है और कुछ देर के लिए ही कटती है।

उत्तर प्रदेश में अब नए बिजली कनेक्शन के लिए न तो दफ्तरों की दौड़ लगानी पड़ती है और न ही इसमें लंबा समय लगता है। लघु उद्योग वालों को बिजली कनेक्शन के लिए मात्र 3 दिन में NOC (अनापत्ति प्रमाण पात्र) के लिए सिंगल विंडो की व्यवस्था की गई है। सितंबर 2020 में योगी सरकार के ‘MSME (Establishment and Operations) अधिनियम, 2020’ के तहत इसे सुनिश्चित किया गया। उस समय तक MSME को 29 तरह से विभागों से 80 NOC जुटाने होते थे।

अक्टूबर 2021 में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अधिकारियों को सख्त हिदायत दी थी कि ग्रामीण इलाके हों या शहरी क्षेत्र, शाम के 6 बजे से लेकर सुबह 7 बजे तक बिजली कटनी नहीं चाहिए। उस समय देश में कोयले की उपलब्धता को लेकर तरह-तरह की बातें की गई थीं, लेकिन इसका कोई असर नहीं पड़ा। सीएम योगी का कहना था कि खासकर त्योहारों के समय लोगों को बिजली मिलने में दिक्कतें नहीं आनी चाहिए। साथ ही बिजली बिल में किसी आम आदमी को कोई गड़बड़ी न हो, इसका निर्देश भी उन्होंने दिया था

1.38 करोड़ घरों में मुफ्त बिजली कनेक्शन, 1.4 लाख गाँवों तक विद्युत् सप्लाई

अब थोड़ा आँकड़ों की भी बात कर लेते हैं। उत्तर प्रदेश सरकार के अनुसार, साढ़े 4 वर्षों में 1.38 करोड़ घरों को मुफ्त में बिजली के कनेक्शन दिए गए। साथ ही रोस्टर बना कर ग्रामीण इलाकों में बिजली की सप्लाई सुनिश्चित की गई। गाँवों में 18-22 घंटे और शहरों में 24 घंटे बिजली देने का प्रावधान बनाया गया। इसके लिए ‘सौभाग्य योजना’ के तहत 1.4 लाख से अधिक राजस्व गाँवों और 2.84 लाख अन्य गाँवों तक बिजली पहुँची। नियम बनाया गया कि गाँवों में 48 और शहरों में 24 घंटे के भीतर ट्रांसफर्मर मरम्मत का कार्य पूरा किया जाए।

1.38 करोड़ घरों के भीतर से अंधेरा दूर करना बहुत बड़ी बात है। ये वो घर हैं, जहाँ सपा-बसपा की सरकारें बिजली नहीं पहुँचा पाई। सर्वाधिक बिजली कनेक्शन देने के मामले में उत्तर प्रदेश ने पूरे देश में शीर्ष स्थान प्राप्त किया। बिजली की सप्लाई और वितरण में कोई अड़चन न आए और ये बेहतर हो, इसके लिए 7786.52 किलोमीटर 33 केवी लाइनों का निर्माण किया गया। अधिकारी अब नाईट पेट्रोलिंग करते हैं, ताकि 24 घंटे बिजली की सप्लाई की पुष्टि हो सके।

इससे फायदा ये होता है कि किसी भी प्रकार की गड़बड़ी को तुरंत दुरुस्त करने का कार्य किया जाता है और लोगों को दिक्कतों का सामना नहीं करना पड़ता। ‘उत्तर प्रदेश पॉवर कॉर्पोरेशन लिमिटेड (UPPCL)’ ने तो 7 जुलाई, 2021 को सर्वाधिक 51.2285 करोड़ यूनिट बिजली की सप्लाई कर के एक नया रिकॉर्ड बनाया। बिजली से जुड़ी अधिकतर सेवाओं के ऑनलाइन होने से लोगों को भागदौड़ नहीं करनी पड़ती। गरीब घरों को बिजली की पहली 100 यूनिट पर तब 3 रुपए प्रति यूनिट ही शुक्ल लेने की व्यवस्था की गई।

वहीं सरकार अब अक्षय ऊर्जा की तरफ भी बढ़ रही है, जिसके तहत 1535 मेगावाट के 7500 करोड़ रुपए के सौर ऊर्जा प्रस्ताव स्वीकृत किए गए। भारत ‘अंतरराष्ट्रीय सोलर अलायन्स’ का संस्थापक है, ऐसे में उत्तर प्रदेश इस दिशा में काम कर रहा है। साथ ही उत्तर प्रदेश में बिजली की उत्पादन क्षमता में भी 3978 मेगावाट की वृद्धि हुई। अब तो गन्ना मिल भी 1500 करोड़ रुपए की बिजली का उत्पादन कर रहे हैं। सिंचाई के लिए किसानों को विशेष छूट दी जा रही है।

इसके अलावा जुलाई 2018 में ही उत्तर प्रदेश के 5 लाख फ़्लैट मालिकों को योगी सरकार ने बड़ा तोहफा दिया था। अपार्टमेंट्स और बहुमंजिला इमारतों में रहने वालों को हर फ्लैट के लिए अलग-अलग बिजली मीटर और कनेक्शन की व्यवस्था की गई। पहले अपार्टमेंट मैनेजमेंट किराएदारों और फ्लैट मालिकों से मनमानी करता था। योगी राज में ये ख़त्म हुआ। अब पॉवर कंपनियों से सीधे फ्लैट को बिजली कनेक्शन और बिल मिलता है। अपार्टमेंट्स में सिंगल की जगह मल्टी पॉइंट कनेक्शन की व्यवस्था की गई। गाजियाबाद और नोएडा के लोगों को इससे खास फायदा हुआ।

ख़त्म किया सपा-बसपा काल का अंधेरा, अपराध में आई कमी

सपा-बसपा के दौर में ये होता था कि सिर्फ 10 जिलों में ही बिजली की सप्लाई पर ध्यान दिया जाता था। योगी सरकार ने ये भेदभाव ख़त्म किया और गाँवों पर विशेष ध्यान दिया। सभी जिलों को बराबर बिजली की बात की गई। अखिलेश यादव की सरकार ने कई ऐसे करार किए थे, जिससे जनता पर 5000 करोड़ रुपए का बोझ पड़ता। योगी सरकार ने सत्ता संभालने के 100 दिनों के भीतर इन सभी डील्स को रद्द किया। 60 लाख ऐसे परिवार थे, जिन्हें बिजली कनेक्शन दिया ही नहीं जा रहा था। उन्हें योगी सरकार ने कनेक्शंस दिए।

सत्ता संभालने के बाद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने जो कहा था, उससे समझ जाइए सपा-बसपा कार्यकाल में उत्तर प्रदेश की स्थिति क्या थी, “मैं पहले हैलीकॉप्टर से चलता था तो अंधेरा दिखाई देते ही समझ जाता था कि उत्तर प्रदेश की शुरुआत हो गई। पहले रात में बिजली नहीं रहती थी, घरों में डकैती पड़ जाती थी। डकैती की FIR तक नहीं लिखी जाती थी। लखनऊ में तब 100 परिवारों को बिजली देकर जो शुरुआत हुई, वो 1.38 करोड़ तक पहुँची। SMS के जरिए विद्युत् सम्बंधित शिकायतों के दर्ज किए जाने की व्यवस्था की गई।

पहले बिजली बिल न चुकाने वाले किसानों और गरीबों को प्रताड़ित किया जाता था, जबकि अब योगी सरकार ने इसकी व्यवस्था की है कि उनका कनेक्शन न काटा जाए। गन्ने का भाव बढ़ाने के बाद किसानों को बिजली के मामले में भी रियायत दी गई। जिन किसानों ने बिजली बिल नहीं चुकाया था, उनका कनेक्शन न काटने के आदेश जारी किए गए। जबकि मायावती के घर का 1.67 करोड़ रुपए का बिजली बिल बकाया था, जिसे कनेक्शन काट कर चुकाने को कहा गया और उन्हें ऐसा करना पड़ा।

‘ईसाई मिशनरी सेवा के बदले करती है सौदा, हिंदू बेटी के साथ जो हुआ उसे भूलाया नहीं जा सकता’: लावण्या आत्महत्या पर प्रबल प्रताप ने जताया आक्रोश

तमिलनाडु के तंजावुर में 17 साल की छात्रा लावण्या की आत्महत्या का मामला तूल पकड़ता जा रहा है। छत्तीसगढ़ में भी इस घटना को लेकर लोगों में व्यापक आक्रोश है। अखिल भारतीय घर वापसी अभियान के प्रमुख प्रबल प्रताप सिंह जूदेव ने पूरे मामले को लेकर ईसाई मिशनरियों पर हमला बोला है। उन्होंने कहा कि हमारी हिंदू बेटी के साथ तमिलनाडु में जो हुआ उसे भूलाया नहीं जा सकता है, ना किसी को क्षमा किया जा सकता है। ईसाई मिशनरी सेवा के बदले सौदा करती हैं।

छत्तीसगढ़ BJP के सचिव प्रबल प्रताप ने कहा, “तमिलनाडु में बेटी लावण्या की आत्महत्या ने उन्हें झकझोर कर रख दिया है। ईसाई मिशनरियों के प्रताड़ित करने के कारण लावण्या ने आत्महत्या जैसा कदम उठाया है। मुझे यह बात कहने में बिल्कुल भी संकोच नहीं हो रहा है कि ईसाई मिशनरी सेवा के बदले सौदा करती हैं और धर्मांतरण के लिए हर तरह का हथकंडा अपनाती हैं। इसका विरोध ही एक मात्र उपचार है।”

वहीं, दूसरी ओर अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के कार्यकर्ताओं ने भी तहसील प्रशासन के माध्यम से तमिलनाडु के राज्यपाल से लावण्या आत्महत्या मामले में न्याय की गुहार लगाई है। राज्यपाल को भेजे ज्ञापन में उन्होंने कहा है कि इस घटना से पूरे देश का युवा बेहद सदमे और पीड़ा में है। ज्ञापन में एबीवीपी कार्यकर्ताओं ने पुलिस पर दोषियों को सजा दिलाने के लिए सक्रिय रूप से काम नहीं करने का आरोप लगाया है। उन्होंने कहा कि बड़े पैमाने पर धर्मांतरण का संज्ञान लिया जाए। लावण्या का मामला भी धर्मांतरण से जुड़ा हुआ है, जिसकी वजह से उसे आत्महत्या करने के लिए मजबूर होना पड़ा।

गौरतलब कि लावण्या ने जहर खाकर आत्महत्या कर ली थी। लड़की के परिजनों ने आरोप लगाया था कि हॉस्टल वॉर्डन द्वारा उसे प्रताड़ित किया गया था और मारा-पीटा गया था, क्योंकि उसने ईसाई धर्म में कन्वर्ट होने से इनकार कर दिया था। लड़की ने 9 जनवरी, 2022 को ही जहर खा लिया था। 10 दिन तक चले इलाज के बाद उसकी 19 जनवरी 2022 को मौत हो गई। सोशल मीडिया पर लड़की का एक वीडियो भी वायरल हुआ था, जिसमें उसने बताया था कि धर्मांतरण न करने के कारण उसे प्रताड़ित किया गया था।

5 भाषाओं में गाने वाले धृतिश्मन से लेकर PM Cares के लिए म्यूजिकल चैरिटी करने वाली साक्षी तक: PM मोदी ने बच्चों को किया सम्मानित

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (PM Modi) ने सोमवार (24 जनवरी, 2022) को ‘राष्‍ट्रीय बालिका दिवस’ (National Girl Child Day) के मौके पर वीडियो कान्फ्रेंसिंग के माध्यम से प्रधानमंत्री राष्ट्रीय बाल पुरस्कार (PMRBP) विजेताओं से बातचीत की। इस दौरान पीएम मोदी ने ब्लॉकचेन टेक्नोलॉजी का उपयोग करके वर्ष 2022 और 2021 के लिए पीएमआरबीपी पुरस्कार विजेताओं को डिजिटल प्रमाणपत्र प्रदान किए। यह पुरस्कार भारत में रहने वाले 5 वर्ष से अधिक और 18 वर्ष तक के बच्चों को नवाचार, शैक्षिक उपलब्धि, खेल, कला एवं संस्कृति, समाज सेवा और बहादुरी जैसे क्षेत्रों में असाधारण क्षमता और उत्कृष्ट उपलब्धि प्राप्त करने पर दिया जाता है।

इस कार्यक्रम में केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री स्मृति ईरानी (Smriti Irani) भी मौजूद थीं। केंद्रीय मंत्री ने अपने ट्विटर अकाउंट पर जिन बच्चों को सम्मानित किया गया है, उनका जिक्र किया है। उन्होंने उत्तर प्रदेश के चंद्राय सिंह चौधरी के बारे में शेयर करते हुए लिखा, “सिर्फ 13 वर्ष की आयु में चंद्राय सिंह ने अपना नाम एशिया बुक और गिनीज़ बुक में दर्ज करवाया है। रोलर स्केटिंग खेल में 48 घंटे चलने वाला प्रशिक्षण प्राप्त करने वाले चंद्राय को खेल के क्षेत्र में प्रधानमंत्री राष्ट्रीय बाल पुरस्कार 2022 से सम्मानित किया गया है।”

हरियाणा के आकर्ष कौशल के बारे में स्मृति ईरानी कहती हैं कि वह एक प्रतिभावान नवाचारी हैं। कोरोना से निपटने में सहायतार्थ उन्होंने MIS RTPCR पोर्टल और बेड की उपलब्धता के लिए एक डैशबोर्ड का विकास किया, जो काफी उपयोगी सिद्ध हुआ। उन्हें प्रोत्साहन देने के लिए प्रधानमंत्री राष्ट्रीय बाल पुरस्कार 2022 से सम्मानित किया गया है।

केंद्रीय मंत्री बिहार के पाल साक्षी के बारे में लिखती हैं कि उन्होंने समाज सेवा के क्षेत्र में मिसाल कायम की है। कोरोना के खिलाफ लड़ाई में ‘PM CARES Fund’ में अपने योगदान के लिए पाल ने ऑनलाइन म्यूजिकल चैरिटी शो का आयोजन किया। उन्हें प्रधानमंत्री राष्ट्रीय बाल पुरस्कार 2022 से सम्मानित किया गया है।

उन्होंने आगे लिखा, “5 वर्षीय धृतिश्मन चक्रवर्ती ने इंडिया बुक ऑफ रिकॉर्ड्स 2021 हासिल कर सबसे कम उम्र के बहुभाषी गायक के रूप में मिसाल कायम की है। वह संस्कृत सहित 5 भाषाओं में गा सकते हैं। धृतिश्मन को कला एवं संस्कृति के क्षेत्र में प्रधानमंत्री राष्ट्रीय बाल पुरस्कार 2022 से सम्मानित किया गया है।”

मीधानश गुप्ता के बारे में स्मृति ईरानी लिखती हैं। पंजाब के 11 वर्षीय मीधानश गुप्ता को समाज सेवा के क्षेत्र में प्रधानमंत्री राष्ट्रीय बाल पुरस्कार से नवाजा गया है। उन्होंने एक वेब पोर्टल बनाया है, जो एक ही मंच पर सभी कोविड-19 संबंधित जानकारी प्रदान करता है। उनके वेब-प्लेटफॉर्म देश भर में लोगों को जागरूक कर रहे हैं।

बता दें कि इस वर्ष विभिन्न श्रेणियों के तहत देश भर से 29 बच्चों को PMRBP-2022 के लिए चुना गया है। पुरस्कार विजेता हर साल गणतंत्र दिवस परेड में भी भाग लेते हैं। पुरस्कार विजेता को एक पदक, एक लाख रुपए का नकद पुरस्कार और एक प्रमाण पत्र दिया जाता है।

‘आतंकियों से भी ज्यादा खतरनाक है ये, चंदा खा जाती है’: राना अयूब को सऊदी वाले लगातार दे रहे डोज पर डोज, कहा – ‘काबा हमारा है’

तथाकथित पत्रकार राना अयूब यमन और सऊदी अरब को लेकर किए गए ट्वीट के बाद बुरी फँसी हैं। आतंकवादियों के समर्थन का आरोप लगा कर सऊदी अरब वाले निशाना साध रहे हैं, लेकिन इसके लिए भी वो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ही दोषी ठहरा रही हैं। राना अयूब ने लिखा था कि यमन को सऊदी अरब तबाह कर रहा है, जबकि सच्चाई ये है कि यमन सरकार के निवेदन पर सऊदी अरब वहाँ कार्रवाई कर रहा है। राना अयूब ने इस बात पर शर्म जताया था कि मक्का-मदीना का नियंत्रण सऊदी अरब के पास है।

अब सऊदी अरब और भारत के लोग मिल कर उन पर निशाना साध रहे हैं। मेजर (रिटायर्ड) माणिक एम जॉली ने लिखा, “राणा अयूब ने एक कूटनीतिक मुद्दे में टाँग अड़ाया, जिस समस्या की उन्हें समझ नहीं थी। ISI ने उनका इस्तेमाल ईरान-पाकिस्तान-तुर्की के एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए किया, ताकि वो सऊदी अरब-अमेरिका और आंशिक रूप से इजरायल पर भी निशाना साध सकें। ये रोजमर्रा के घृणा फैलाने से कहीं अधिक बढ़ कर है। ये एक बड़ा लीग हैं।”

सऊदी अरब के दिखने वाले एक ट्विटर हैंडल ने लिखा, “गैर-अरबी मुस्लिम ये समझते हैं कि केवल मुस्लिम होने के कारण उन्हें काबा के नियंत्रण का अधिकार है। लेकिन, इसे हमारे महान पूर्वज इस्माइल ने बनवाया था। जबकि मदीना हमारे कबीलों की भूमि रही है। एक सऊदी के मुस्लिम होने के नाते मैं कह सकता हूँ कि आपके विचार की कोई अहमियत नहीं है।” एक अन्य हैंडल ने लिखा, “राना अयूब अब खुलेआम आतंकियों का समर्थन कर रही हैं। हूती विद्रोहियों ने दो भारतीय नागरिकों को मार दिया, लेकिन इस पर वो चुप हैं। हूती, अलकायदा या ISIS में कोई अंतर नहीं है।”

एक अन्य सऊदी अरब के व्यक्ति ने लिखा कि मुस्लिम होने के नाते वो ये देख कर परेशान है कि राना अयूब ईरान समर्थित उस गुट का समर्थन कर रही हैं, जिन्होंने इराक, सीरिया, लेबनान और यमन से लाखों मुस्लिमों को पलायन के लिए मजबूर किया। ‘TFI’ के संपादक त्रिभुवन ने लिखा कि राना अयूब ये भूल गई थीं कि सऊदी अरब में भारत की तरह सहिष्णुता नहीं है। उन्होंने कहा कि अब उन्हें समझ में आ गया होगा कि ‘असहिष्णुता’ का मतलब क्या होता है।

कूटनीतिक मामलों के विशेषज्ञ हसन सजवानी ने कहा कि राना अयूब जैसे लोग सबसे बड़े दोषी हैं। उन्होंने लिखा कि खुद को ‘मानवतावादी आवाज़’ बता कर ऐसे लोग हमेशा हूती, हमास, और ISIS से जुड़े समूहों का समर्थन करते हैं। उन्होंने भी याद दिलाया कि कैसे हूती आतंकियों ने अबूधाबी एयरपोर्ट पर दो निर्दोष सिखों की हत्या कर दी। सऊदी अरब के एक अन्य सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर ने राना अयूब पर सामाजिक कार्यों के नाम पर चंदा जुटा कर पचा जाने का आरोप लगाया।

राना अयूब ने इंस्टाग्राम पर लिखा था कि वो 2022 में हज करने जाना चाहती हैं। अब जब एक सोशल मीडिया यूजर ने तंज कसा कि राना अयूब का हज कोटा रद्द कर दिया गया है, तो उन्होंने उन्हें ‘संघी’ बता दिया। वहीं हसन सजवानी ने ये भी लिखा कि राना अयूब सऊदी को ‘खून का प्यासा’ बता रही हैं, जबकि हूती आतंकियों के कुकृत्यों पर चुप रहती हैं। उन्होंने राना अयूब को आतंकियों से भी ज्यादा खतरनाक करार दिया। कइयों ने उन्हें ‘झूठी’ बताया। सऊदी वालों ने कहा कि हमारे पवित्र स्थलों को लेकर उन्हें ज्ञान नहीं चाहिए।

बता दें कि यमन के हूती विद्रोहियों और सऊदी अरब के बीच युद्ध चल रहा है। यूनाइटेड अरब अमीरात की राजधानी अबूधाबी पर भी हूतियों ने कई बैलिस्टिक मिसाइल छोड़े हैं। सऊदी अरब के दक्षिणी इलाकों की सीमा यमन से मिलती है, जहाँ खासी अशांति है। UAE के एक F16 मिसाइल को भी तबाह कर दिया गया। इससे ‘रेड सी शिपिंग रूट’ को भी खतरा पैदा हो गया है। यमन में 2014 से ही गृह युद्ध चल रहा है, जब हुतियों ने सना नाम के इलाके पर कब्ज़ा कर के सऊदी अरब को इसमें हस्तक्षेप के लिए मजबूर किया।

‘वो भारतीय सभ्यता से जुड़े हैं, उन पर पश्चिमी सभ्यता हावी नहीं’: कंगना रनौत ने बताया क्यों खास हैं साउथ के सुपरस्टार्स

बॉलीवुड अभिनेत्री कंगना रनौत (Kangana Ranaut) ने अल्लू अर्जुन (Allu Arjun) की फिल्म ‘पुष्पा: द राइजिंग’ की बंपर सफलता के बाद सोशल मीडिया पर दक्षिण के कंटेंट और सुपरस्टार्स की तारीफ करते हुए बॉलीवुड को सलाह दी है। मणिकर्णिका फेम एक्ट्रेस कंगना रनौत (Kangana Ranaut Instargram) ने अपनी इंस्टाग्राम स्टोरी पर अल्लू अर्जुन की ‘पुष्पा’ और कन्नड़ एक्टर यश की फिल्म ‘केजीएफ चैप्टर 2’ (KGF 2) के लुक का कोलाज शेयर किया है। इसके बैकगाउंड में उन्होंने समांथा रुथ प्रभु के आइटम सॉन्ग का तेलुगु वर्जन ‘ऊ अंतवा’ (Oo Antava) को भी जोड़ा है।

कंगना ने इस पोस्ट में अल्लू अर्जुन और यश की तारीफ करते हुए बताया कि आखिर क्यों साउथ का कंटेंट और वहाँ के एक्टर्स को इतना पसंद किया जाता है। ‘क्वीन’ फिल्म की अभिनेत्री ने पहली वजह बताई सभ्यता। उन्होंने लिखा, “नंबर 1 साउथ के मेकर्स अपनी भारतीय सभ्यता से पूरी तरह जुड़े हुए हैं। नंबर 2 वे अपने परिवार से प्यार करते हैं और बहुत पारंपरिक हैं, उन पर पश्चिमी सभ्यता हावी नहीं हुई है। नंबर 3 उनका प्रोफेशनलिज्म और जुनून यूनीक है।”

फोटो साभार: इंस्टाग्राम

दक्षिण भारतीय फिल्मों की बढ़ती लोकप्रियता के कारण बताने के बाद कंगना ने आगे बॉलीवुड फिल्म इंडस्ट्री को सलाह दी। बॉलीवुड में फैले नेपोटिज्म और यहाँ के कई दिग्गज प्रोड्यूसर, डायरेक्टर और एक्टर्स से खफा रहने वाली अभिनेत्री ने लिखा, “साउथ के लोगों को चाहिए कि वे बॉलीवुड वालों को उन्हें अपनी तरह भ्रष्ट बनाने की अनुमति न दें।”

बता दें कि पिछले साल 17 दिसंबर को रिलीज हुई ‘पुष्पा’ को दर्शकों का बहुत प्यार मिल रहा है। फिल्म ओटीटी पर भी छाई हुई है और यूट्यूब पर Oo Antava के साथ इसके सभी गानों काफी पसंद किया जा रहा है। ‘पुष्पा’ के बाद अब अल्लू के फैंस उनकी अगली फिल्म ‘अला वैकुंठपुरमुलु’ के हिंदी में रिलीज होने का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं। यह फिल्म पहले सिनेमाघरों में 26 जनवरी 2022 को रिलीज होने वाली थी, लेकिन इसकी रिलीज डेट आगे बढ़ाकर 6 फरवरी कर दी गई है।

लावण्या, हीरालाल और दिनेश यादव: ये सिर्फ 3 नाम और 3 खबर नहीं… हिंदुओं के लिए 3 चैलेंज हैं

17 जनवरी 2022 – दिल्ली के सुल्तानपुरी में हीरालाल गुजराती की हत्या कर दी जाती है। हत्या का आरोप इरफान नाम के शख्स पर। ये वही इरफान है, जिसने हीरालाल की बहन से रेप किया था, जेल भी गया।

19 जनवरी 2022 को 12वीं में पढ़ने वाली लावण्या इस संसार को छोड़ कर चली गईं – मजबूरी में, प्रताड़ना से हार मान कर। प्रताड़ना इस बात को लेकर कि पढ़ाई करनी है तो ईसाई बनो। इनकार करोगी तो टॉयलेट साफ करो।

20 जनवरी 2022: दिल्ली हिन्दू विरोधी दंगों में पहली सजा सुनाई गई – दिनेश यादव को। दिनेश पर 73 साल की एक मुस्लिम वृद्धा के घर में आग लगाने और उनकी भैंस खोल कर ले जाने का आरोप था।

4 दिन में हुई यह 3 खबरें। अखबार पलट लीजिए, प्राइम टाइम को याद कर लीजिए। इन 4 दिनों में नेताओं के दिए भाषण पर भी दिमाग दौड़ाइए या उनके सोशल मीडिया अकाउंट को खंगाल जाइए। निराशा हाथ लगेगी। फिर याद कीजिए तबरेज या अखलाक वाली खबरों के कवरेज को। साथ ही यति नरसिंहानंद वाले मंदिर में आसिफ की पिटाई पर 24*7 मीडिया रिपोर्टिंग को भी याद कीजिए।

याद कर ही रहे हैं तो खुद के भीतर भी झाँक लीजिए। जिस समाज में हम रहते हैं, जिस सोशल मीडिया पर दिन भर कुछ न कुछ चलता रहता है – वहाँ की चर्चाओं पर भी ध्यान दीजिए। सन्नाटा पसरा मिलेगा हर जगह। चर्चा गायब, खबर खत्म। यह सन्नाटा हम हिंदुओं के लिए बड़ा खतरा है। इसलिए क्योंकि ये 3 खबर हमारे लिए सिर्फ खबर नहीं बल्कि 3 चैलेंज है।

हीरालाल की हत्या और ‘डरा हुआ मुसलमान’ का खौफ

देश की राजधानी में यह पहली हत्या नहीं है, आखिरी भी नहीं होगी। लेकिन अपराध सिर्फ हत्या तक सीमित नहीं है। जिन हीरालाल की हत्या हुई, उनकी बहन का रेप भी इरफान ने ही किया था। इसी वजह से वो जेल में भी था। परोल पर बाहर आया तो हीरालाल को मार ही डाला। दिल्ली में जिस पार्टी की सत्ता है, अपराधी का उससे कनेक्शन भी रहा है। जिस इलाके में सिर्फ इरफान का ही घर मुस्लिम का है, वहाँ उसके खौफ से – “यह मकान बिकाऊ है, मुसलमानों के आतंक से, हीरा की हत्या के डर के कारण” – वाला पोस्टर चिपका दिया जाता है। हत्या के अलावे इतने सारे सनसनी वाले एंगल के बावजूद मीडिया चुपचाप रहती है तो इसके मायने समझिए।

मुस्लिम नाम बदल कर हिंदू नाम के सहारे लड़की से प्रेम का नाटक कर उसकी हत्या या धर्म-परिवर्तन जैसे अपराधों की रिपोर्टिंग मुख्य धारा की मीडिया कैसे करती है? या तो नहीं या बहुत छोटे में। और ऐसा क्यों करती है? ताकि इन अपराधों पर पर्दा डाला जा सके और उससे भी बढ़ कर ‘लव जिहाद’ जैसे टर्म को ‘षड्यंत्र’ कह कर खारिज किया जा सके।

मीडिया के ऐसे सेलेक्टिव अप्रोच के कारण समय के साथ चाहते या न चाहते हुए भी समाज इस ‘षड्यंत्र’ में विश्वास करने लगता है। लव जिहाद के कारण भले किसी बच्ची का करियर बर्बाद हो जाए, उसे मार डाला जाए या कोई पिता अपनी बेटी के अपराधी और सिस्टम से तंग आकर उसे गोलियों से भून दे – मीडिया और समाज लव जिहाद को ‘षड्यंत्र’ बता कर सो जाता है।

हीरालाल की हत्या पर मीडिया की चुप्पी यही है। अपराधी मुस्लिम है तो चुप रहो। हीरालाल आर्थिक और सामाजिक रूप से पिछड़ा था, इसलिए ‘भीम-मीम’ की एकता के लिए चुप रहो। ‘भीम-मीम’ पर अगर कुछ दिखाना है तो तब दिखाओ जब नैरेटिव ‘ब्राह्मणवादी उत्पीड़न’ पर हो। ट्विटर वाला जैक हो, बरखा हो, दुनिया का टॉप यूनिवर्सिटी हो – ‘ब्राह्मणवादी उत्पीड़न’ का प्लाकार्ड झट से चला दो।

बात यहीं पर खत्म नहीं होती है। ‘भीम-मीम’ का नैरेटिव मीडिया द्वारा इतना गहरा धँसा दिया जाता है कि जो पीड़ित वर्ग है, वो खुद ही इस पर विश्वास भी करने लगता है। जब ऐसा होता है, तो उसी पीड़ित वर्ग के लिए हालात बदतर हो चुका होता है। क्योंकि वास्तविकता के विपरीत यही इस सिद्धांत को आगे बढ़ाते दिखने लगते हैं। वास्तविक उत्पीड़न (लव जिहाद) को ‘षड्यंत्र’ की चादर से ढक दिया जाता है, मीडिया फैक्टरी में गढ़ी गई ‘ब्राह्मणवादी उत्पीड़न’ को मुख्यधारा में लाकर पटक दिया जाता है – बार-बार रटा-रटाया जाता है।

हीरालाल की हत्या से मुस्लिम अपराधी, बहन के साथ रेप, सत्ता-नेता सब गायब। मीडिया के लिए यह खबर नहीं। हिंदू समाज भी हर आतंकी हमले के बाद Mumbai Spirit जैसे अपने-अपने काम में लग जाएगा। रह जाएगी बस हीरालाल की वो माँ, जिसने कभी इरफान को बेटे जैसा माना था। पीछे छूट जाएँगे हीरालाल के 3 अनाथ बच्चे अपनी विधवा माँ के साथ।

लावण्या की मौत, मुस्लिम को थप्पड़ और हिजाब

‘लड़की हूँ, लड़ सकती हूँ’ गीत गाने वाली प्रियंका गाँधी ने रोहित वेमुला पर ट्वीट किया। उसी दिन 17 फरवरी को इनके भाई राहुल गाँधी ने भी ट्वीट किया। लेकिन 2 दिन बाद लावण्या की मौत पर इन लोगों ने चुप्पी साधे रखी। क्यों? रोहित वेमुला में दलित एंगल था, उत्तर प्रदेश में चुनाव है। लावण्या मामला ईसाई धर्मांतरण का है। दोनों की माँ सोनिया गाँधी खुद जन्म के समय ईसाई थीं। कई कारण हो सकते हैं। अब इनसे कौन पूछे, पूछने पर बता दें, ऐसा रिकॉर्ड भी नहीं।

राजनीति की बात ऊपर हो गई। पुलिस क्या कर रही है, उस पर हाई कोर्ट तक को आदेश देना पड़ गया। अब मीडिया और समाज की बात। एक लड़की मरने के लिए मजबूर कर दी जाती है, मर भी जाती है, मरने से पहले वीडियो में सब कुछ बोल जाती है… लेकिन असल मायने में मृत है वो मीडिया, जो सहानुभूति भी नहीं दिखा पा रहा। प्राइम टाइम पर 12वीं क्लास की बच्ची के सपनों को जगह नहीं मिल पाती।

और मीडिया को दोष क्यों भला? मृत तो है हमारा तथाकथित सेकुलर कहलाने का कीड़ा कटवाया हिंदू समाज। वो हिंदू समाज जो शिवलिंग पर पेशाब करते धराने पर आसिफ को लगे थप्पड़ों की चर्चा चाय पर करता है। मंदिर में पानी पीने गए बच्चे को थप्पड़ क्यों मारा को लेकर सहानुभूति दिखाता है। लेकिन लावण्या से क्या मतलब? हिंदी-भाषी हिंदुओं के लिए वो तमिल थी। तमिल हिंदुओं के लिए शायद वो DMK-AIDMK जैसे खेमे में बाँट कर भुला दी गई होगी।

हिजाब से जुड़ी खबर भी मेनस्ट्रीम मीडिया में प्राइम टाइम का स्लॉट ले जाती है। अखबारों में फ्रंट पेज का हिस्सा होती है। कर्नाटक के कॉलेज वाली खबर को ही याद कर लीजिए। नेता-मंत्री-मौलवी सब पीछे पड़ गए थे। कपड़ों की बात भी जिनके लिए सनसनी है, उन सभी का मौत पर चुप रह जाना आखिर ऐसे ही नहीं हो सकता है। इसके पीछे के एजेंडा को समझना होगा। हिंदू से जुड़ा हर हित, हर घटना हाशिए पर – यही इनका षड्यंत्र है, अफसोस यह सफल होते दिख रहे हैं।

लावण्या के लिए न नेता, न समाज, न मीडिया। जिस सोच के साथ राजनीति और मीडिया के कॉकटेल ने हिंदू आतंक का बीज बोया था, वो अब पाँव पसार चुका है। हिंदू पीड़ित हो ही नहीं सकते, यह अब मुख्यधारा की बात हो गई है। एक हिंदू बच्ची की मौत, मौत से पहले का वीडियो… सब कुछ होते हुए भी तथाकथित ‘धर्मनिरपेक्ष समाज’ को दुखी नहीं हो रहा। आवाजें नहीं उठ रहीं। मोमबत्तियों की फैक्टरी बंद हो गई है, जलेंगी कहाँ से! पहले जो संघियों की मौत पर दुखी नहीं होते थे, अब उसके नेक्स्ट स्टेप में हर हिंदू बच्चे-बच्चियों की मौत पर ये चुपचाप चादर तान सो जाते हैं।

लावण्या की मौत पर सत्ता-नेता-मीडिया-समाज सब गायब। आश्चर्च यह कि हिंदू समाज भी गायब। वो भी तब जब मसला ईसाई धर्मांतरण का है। लावण्या अपना धर्म बचा कर यह दुनिया छोड़ गईं। उनके माता-पिता को 3 और बच्चों को पालना है, पढ़ाई-लिखाई करवानी है। दबाव और अभाव में पहले भी हिंदू भाई-बहन ईसाई बने हैं। भगवान न करे, लेकिन लावण्या के माता-पिता ने अगर कभी ऐसा कदम उठाया तो उस दिन सच में वो बच्ची हार जाएगी – धर्म से भी, मन से भी।

हिन्दू विरोधी दिल्ली दंगा, पहली सजा हिंदू को ही

हीरालाल और लावण्या के मामले से ज्यादा गंभीर मसला दिनेश यादव का है। यह मसला न्याय से जुड़ा है, न्यायपालिका से जुड़ा है। मीडिया और राजनीति के जाल में फँसा आम आदमी आखिर किससे उम्मीद लगाए? मीडिया और राजनीति के घालमेल ने जिस हिंदू विरोधी दिल्ली दंगों को जन्म दिया, उसमें फँसा आम आदमी आखिर कहाँ जाए? अदालत के पास न्याय के लिए जाए और न्याय जमीनी हकीकत से दूर हो तो आखिर क्या किया जाए?

दिनेश यादव को दोषी पाकर माननीय अदालत ने क्या किया, यह खबर है। खबर यह भी है कि हिंदू विरोधी दिल्ली दंगों में जिस दिलबर नेगी की हाथ-पैर कटी अधजली लाश मिली थी, उस केस में माननीय जज सुब्रमण्यम प्रसाद ने मो. ताहिर, शाहरुख, मो. फैजल, मो. शोएब, राशिद और परवेज को जमानत दी। जरा दोनों मामलों को भी देखा जाए।

दिनेश पर आरोप – मुस्लिम महिला के घर में आग लगाना, उनकी भैंस खोल कर ले जाना।
दिलबर नेगी मामले में 6 मुस्लिमों (जिन्हें बेल मिली) पर आरोप – जिस दुकान में इनकी (नेगी की) अधजली लाश मिली, उसमें तोड़फोड़ और आग लगाना।

एक मामले में घर में आग लगाने का आरोप है, भैंस खोल कर ले जाने का आरोप है। पीड़ित मुस्लिम महिला है, जो जीवित है। दूसरे मामले में भी आग लगाने और तोड़फोड़ का आरोप है। पीड़ित हिंदू युवक था, कटी-अधजली लाश ही अब उसकी याद है। जमानत तो रिफाकत अली को भी दे दी अदालत ने। जबकि अदालत ने ही वीडियो देख कहा था कि रिफाकत अली को हिंसक भीड़ के बीच लोहे की छड़ थामे देखा जा सकता है।

ऊपर दिनेश यादव और दिलबर नेगी मामले को एक-एक वाक्य में संक्षेप में समझा गया। अब देखते हैं दिनेश यादव और रिफाकत अली मामले को। मुझे अमानवीय कह सकते हैं लेकिन दोनों मामलों को आमने-सामने रख कर पढ़ते समय मुझे हँसी आई। दोषी पाकर सजा दे दिए गए दिनेश यादव के लिए माननीय जज साहब ने अपने आदेश में लिखा है कि वो अपराध करने में शामिल रहा है, इसका कोई साक्ष्य नहीं है। वो जज हैं, जजमेंट सुना दी। लेकिन जिस न्यायिक आधार/तर्क पर दिनेश को सजा मिली, एकदम उस जैसे ही साक्ष्य पर रिफाकत को जमानत कैसे मिल जाती है – यही मेरे हँसने का कारण बना।

माननीय अदालत ने दिनेश यादव के लिए जो अपने आदेश में लिखा, उसका मुख्य हिस्सा

माननीय अदालत, न्यायिक प्रक्रिया, जमानत, दोषी और इंसाफ… ये लंबे-चौड़े शब्द हैं। माननीय जज साहब शायद बेहतर समझते होंगे। इन सबके बीच मुझे सांप्रदायिक हिंसा बिल याद आ रहा है।

2005 में कॉन्ग्रेसी सरकार के समय इस बिल को ड्राफ्ट किया गया था। हंगामा हुआ। 2011 में फिर से कॉन्ग्रेसी सरकार ने इसे वापस लाया। सांप्रदायिक हिंसा रोकथाम बिल (Prevention of Communal Violence Bill 2011) – यह है पूरा नाम। इसे सोनिया गाँधी की अध्यक्षता वाली राष्ट्रीय सलाहकार परिषद ने तैयार किया था। इस बिल को समझना है तो इसके कुछ हिस्से को पढ़ लीजिए।

  1. अगर कहीं भी दंगा होता है तो इसके लिए वहाँ की बहुसंख्यक आबादी को जिम्मेदार ठहराया जाएगा।
  2. दंगों में अगर बहुसंख्यक आबादी की महिला के साथ रेप हो तो इस बिल के अनुसार वो अपराध नहीं। इंडियन पीनल कोड (आईपीसी) के तहत यह रेप होगा, लेकिन इस कानून के अनुसार नहीं।
  3. अनुसूचित जाति और जनजातियों के साथ अगर मुस्लिम संप्रदाय का दंगा हो जाए तो एससी एसटी एक्ट इस बिल के कारण निष्प्रभावी (अगर अनुसूचित जाति और जनजातियाँ उस इलाके में बहुसंख्यक हों) हो जाएगा।

खैर, यह बिल कानून नहीं बन पाया। कॉन्ग्रेसी सरकार 2011 के बाद भ्रष्टाचार मामले में फँस कर चित्त थी और 2014 के बाद लगभग सो चुकी है। लेकिन कॉन्ग्रेसी इको-सिस्टम अभी भी जिंदा है। अफसोस यह कि न्यायपालिका भी इससे वंचित नहीं। दंगा हो, जिस भी परिस्थिति में हो – बहुसंख्यकों पर कानून की लाठी चलेगी – सांप्रदायिक हिंसा बिल यही था। दिनेश यादव मामले में दोषी करार और दिलबर नेगी मामले में जमानत – बिना कानून बने सांप्रदायिक हिंसा बिल अदालतों से तारीख दर तारीख किसी न किसी स्वरूप में निकल रहे हैं। यह स्थिति डरावनी है। इस कॉन्ग्रेसी इको-सिस्टम को रोकना होगा, यह फैसला मिसाल नहीं बनने दिया जा सकता। इसकी लड़ाई ऊपरी अदालत में हिंदुओं को लड़नी भी होगी, जीतनी भी होगी।

विष्णु गोस्वामी, वी.रामलिंगम, ध्रुव त्यागी, चन्दन गुप्ता, हीना तलरेजा, अंकित सक्सेना, प्रशांत पुजारी, विधु जैन, ट्विंकल शर्मा, सुबोध सिंह, डॉक्टर पंकज नारंग, रिया गौतम, बन्धु प्रकाश, प्रीति माथुर, कमलेश तिवारी, प्रीति रेड्डी, रतन लाल, विनोद कुमार, अंकित शर्मा, महाराज कल्पवृक्ष गिरी, सुशील गिरी, निलेश तेलगड़े, नीरज प्रजापति – ये कुछ नाम हैं। मीडिया ने तो भूला दिया है, हिंदू समाज भूलने की गलती न करे। वरना कल किसी आर्टिकल में इन नामों में लावण्या, हीरालाल और दिनेश यादव के नाम भी जुड़ जाएँगे।

‘बीजेपी नेताओं का आना मना है’: घरों पर लगे पोस्टरों को शामली पुलिस ने बताया शरारती तत्वों की शरारत, अब होगी कार्रवाई

उत्तर प्रदेश के शामली जिले में एक मकान के आगे लगा एक पोस्टर सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। इस पोस्टर में लिखा है, “इस मकान के अंदर बीजेपी वालों का आना मना है। केवल RLD वालों का ही प्रवेश है। आज्ञा से अंकुर कुमार, RLD”। कुछ ही देर में इस पोस्टर पर कई मीडिया संस्थानों ने खबर भी बना डाली।

मीडिया रिपोर्ट्स में कहा गया कि शामली विधानसभा क्षेत्र के गाँव लिलौन में कई लोगों ने अपने घरों और गेट पर लिखा है कि भाजपा वालों का आना मना है। इस खबर को अंकुर कुमार, पिटू सिंह, साहब सिंह, ओमपाल सिंह, वीर सिंह, गुड्डू, रामवीर, नीटू कुमार, रविद्र कुमार आदि के बयानों के आधार पर बनाया गया। खबर में गाँव वालों के गुस्से के पीछे गन्ने का भुगतान, बेरोजगारी और गौवंश द्वारा फसलों के नुकसान को बताया गया है। इसी के साथ किसी हरेंद्र ताऊ का भी जिक्र किया गया है।

वहीं, शामली पुलिस की जाँच में यह मामला किसी की सोची समझी शरारत पाया गया है। शामली पुलिस ने इस पूरे मामले में जवाब दिया है। पुलिस के मुतबिक, “जाँच करने पर मकान मालिक ने बताया कि कुछ शरारती तत्वों द्वारा मकान मालिक की मर्जी के बिना ऐसा कार्य किया गया था। लिखा हुआ पोस्टर मिटा दिया गया है। और आवश्यक वैधानिक कार्यवाही की जा रही है।”

पहले 2 चरणों में ही सपा-बसपा ने उतारे 63 मुस्लिम उम्मीदवार: मुस्लिमों के सहारे चुनावी वैतरणी पार करेंगे अखिलेश यादव और मायावती?

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव और मायावती मुस्लिमों के सहारे अपने-अपने दलों की वैतरणी पार लगाने का ख्वाब देख रहे हैं। तभी तो अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी और मायावती की बसपा खुल कर मुस्लिमों को टिकट बाँट रही है, वो भी चुपचाप। वो नहीं चाहते हैं कि जनता में उनकी ‘मुस्लिम तुष्टिकरण’ वाली छवि बने, इसीलिए बातें राम और कृष्ण की कर रहे है और टिकट मुस्लिमों को बाँटे जा रहे हैं। आइए, हम आपको आँकड़े बताते हैं।

पहले चरण के चुनाव के लिए सपा-रालोद गठबंधन ने 13 मुस्लिमों को उम्मीदवार बनाया था, जबकि दूसरे चरण के लिए 10 और मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट दिया गया है। लेकिन, इसकी आधिकारिक घोषणा करने से बचा जा रहा है। बताया जा रहा है कि दूसरे चरण के लिए अभी और भी मुस्लिमों को टिकट दिए जा सकते हैं। इससे पहले बसपा सुप्रीमो मायावती ने पहले चरण के लिए 17 मुस्लिमों को टिकट दिया था। दूसरे चरण में भी बहुजन समाज पार्टी ने 23 उम्मीदवारों को टिकट दिया है।

कुल मिला कर बसपा अब तक दोनों चरणों में 40 मुस्लिम नेताओं को उम्मीदवार बना चुकी है। इन दो चरणों में 113 विधानसभा सीटों के लिए मतदान होने हैं। प्रतिशत की बात करें तो जहाँ अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी ने अब तक अपने कुल 20% टिकट मुस्लिमों को दिए हैं, वहीं मायावती की बसपा इस मामले में 35% के आँकड़े के साथ उससे आगे है। भाजपा ने अब तक एक भी मुस्लिम उम्मीदवार नहीं उतारा है। सपा ने आधिकारिक ऐलान नहीं किया है, लेकिन उम्मीदवारों की संपत्ति सम्बन्धी ब्योरे के अपलोड किए जाने के बाद ये आँकड़े सामने आए हैं।

चुनाव आयोग के दिशानिर्देशों के हिसाब से ऐसा करना अनिवार्य है। अमरोहा, मीरगंज, बेहट, सीशमाऊ, भोजीपुरा, बहेरी, चमरुहा, धामपुर, शाहजहाँपुर, चाँदपुर और चाँदपुर और ठकुरवाड़ा से सपा ने मुस्लिम उम्मीदवार उतारे हैं। एक वरिष्ठ नेता के हवाले से ‘News 18’ ने बताया कि मायावती को काउंटर करने के लिए सपा अभी दूसरे चरण के लिए और मुस्लिम उम्मीदवार घोषित करेगी। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने जनता को आगाह किया है कि गंभीर आपराधिक रिकॉर्ड वाले उम्मीदवारों को वो वोट न करें।

उदाहरण के लिए कैराना से सपा ने नाहिद हसन को टिकट दिया है, जिन्हें दंगा कराने के आरोप में गिरफ्तार किया गया है। उन पर कैराना से हिन्दू परिवारों को पलायन के लिए मजबूर करने का भी आरोप है। बुलंदशहर से मोहम्मद यूनुस सपा के उम्मीदवार हैं, जिन पर कई FIR दर्ज हैं। अमरोहा से महबूब अली पर अखिलेश यादव ने भरोसा जताया है, जिनका पुराना आपराधिक रिकॉर्ड है। मीरगंज से सुल्तान बेग को उतारा गया है, जिन पर गैंगस्टर एक्ट लगा हुआ है। चमरुहा सीट के नसीर अहमद खान पर धोखाधड़ी और साजिश सहित 29 मामले दर्ज हैं।

अंतरराष्ट्रीय तस्कर मोहम्मद इनामुल हक को सुप्रीम कोर्ट ने दी जमानत: करोड़ों के अवैध पशु तस्करी मामले में है मुख्य आरोपित

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (24 जनवरी 2022) को करोड़ों के पशु तस्करी मामले के मास्टरमाइंड मोहम्मद इनामुल हक (Mohammed Enamul Haque) को जमानत दे दी है। पश्चिम बंगाल में पशुओं की अंतरराष्ट्रीय तस्करी करने वाले इनामुल पर भ्रष्टाचार रोकथाम अधिनियम (एमडी इनामुल हक बनाम सीबीआई) से संबंधित कई धाराओं के तहत आरोप लगाए गए थे।

जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और दिनेश माहेश्वरी की बेंच ने कलकत्ता हाई कोर्ट के नवंबर 2021 के आदेश के खिलाफ फैसला सुनाया है, जिसमें हक की जमानत याचिका खारिज कर दी गई थी। कोर्ट ने कहा कि अब इस मामले में आरोपित को जेल में बंद रखना जरूरी नहीं है। कोच्चि में दर्ज मामले में उसे कानूनन जमानत मिल ही गई थी। वह नवंबर 2020 से जेल में ही था, जबकि चार्जशीट 2021 में दाखिल हुई थी। इस तरह अब चार्जशीट दाखिल होने के बाद उसे जमानत पर जेल से बाहर निकाला जा सकता है। इसमें कोई दिक्कत नहीं है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस मामले की जाँच में पाया गया है कि पश्चिम बंगाल के रोशनबाग में सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) की एक बटालियन के पूर्व कमांडेंट ने भारत-बांग्लादेश बॉर्डर के पास पशु तस्करों से रिश्वत ली थी। जब बाद में उन्हें केरल के एलेप्पी रेलवे स्टेशन पर अधिकारियों ने पकड़ा, तो उनके पास से 43 लाख रुपए बरामद हुए थे। वो भी जमानत पर रिहा हो चुके हैं। हक पर कमांडेंट को रिश्वत देने का आरोप लगाया गया था।

तस्करी के आरोपित हक की पैरवी करते हुए सीनियर एडवोकेट मुकुल रोहतगी ने अदालत में कहा कि उनका मुवक्किल 6 नवंबर, 2021 से जेल में है, जबकि बीएसएफ कमांडेंट सहित अन्य सभी आरोपितों को जमानत पर छोड़ दिया गया है। रोहतगी ने बताया कि जिन अपराधों के लिए हक पर आरोप लगाया गया है, उनमें अधिकतम सात साल कैद की सजा हो सकती है। उन्होंने कहा कि आरोपों की जाँच सीबीआई की सौंपी गई है, जबकि राज्य ने सीबीआई को जाँच के लिए मना कर रखा है।

बता दें कि सीबीआई जाँच में सामने आया था कि अवैध मवेशी व्यापार का मास्टरमाइंड मोहम्मद इनामुल हक 1000 करोड़ रुपए के अधिक का हवाला नेटवर्क चलाता था। वह पशु तस्करों के लिए अवैध रूप से धन का लेन-देन करता था। हक अवैध पशु तस्करी वह अपने साथी गुलाम मुस्तफा और अनारूल शेख के साथ मिलकर चलाता था। इस मामले में सीबीआई ने 36वें बटालिएन के बीएसएफ कमांडेंट सतीश कुमार को भी सितंबर 2021 में गिरफ्तार किया था।

बिशप फ्रैंको मुलक्कल को बरी कर हुआ ‘न्याय’ का अपमान: वरिष्ठ वकील रेबेका जॉन ने उठाए ट्रायल कोर्ट के फैसले पर सवाल

केरल की एक अदालत द्वारा नन रेप केस में बिशप फ्रैंको मुलक्कल को बरी किए जाने के मामले में वरिष्ठ वकील रेबेका जॉन (Rebecca) ने अपनी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने अदालत के फैसले पर सवाल उठाते हुए कहा कि ये निर्णय एक उपहास है जिसने आरोपित की जगह पीड़िता को ट्रायल पर रख दिया। उन्होंने फैसले को लेकर कहा कि इस निर्णय ने न्यायशास्त्र को उलट दिया है और ये पूरी तरह से देश के कानून की अवहेलना है।

अपनी बात रखते हुए वरिष्ठ वकील रेबेका जॉन ने समझाया कि एक रेप पीड़िता की गवाही हमेशा अन्य अपराधों की गवाही से अलग रखकर देखी जानी चाहिए। उन्होंने ये जानकारी भी दी कि कई बार इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट पहले भी बोल चुका है।

आरुषि तलवार, हर्षद मेहता स्कैम, हाशमीपुरा नरसंहार, 1984 सिख नरसंहार, 2 जी स्पेक्ट्रम जैसे मामलों को संभालने वाली रेबेका जॉन ने कहा, “कोटाय्यम के ट्रायल कोर्ट के फैसले से जो मुझे समझ आया वो ये है कि आरोपित की जगह रेप पीड़िता ट्रायल पर चली गई है। इस फैसले ने उसे (पीड़िता) नकारा है और उस पर अविश्वास जताया है, जो कि कानून में अस्वीकार्य है।”

उन्होंने कहा कि कोर्ट ने रेप पीड़िता के सबूतों को नकारने और उनपर अविश्वास जताने में बहुत समय खर्च किया और ये सब सिर्फ इसलिए हुआ क्योंकि उसने अपनी पहली एफआईआर में और अन्य सिस्टर्स को खुलासा करते हुए अपने  साथ हुए यौन अपराध की सीमा को नहीं बताया था। उन्होंने अदालत के फैसले पर सवाल उठाते हुए कहा कि अदालत रेप पीड़िता की स्थिति समझने में बिलकुल विफल हुआ है।

वरिष्ठ वकील कहती हैं कि FIR तथ्यों का विश्वकोश नहीं है। इसमें केवल व्यापक मापदंडों का उल्लेख किया जा सकता है। भले ही नन ने पहली प्राथमिकी में यौन अपराध के विवरण का उल्लेख नहीं किया, लेकिन जब वह सहज हो गई तो उसने मजिस्ट्रेट के सामने पूरा विवरण दिया। उन्होंने कहा कि इस तरह प्राथमिकी के आधार पर बलात्कार पीड़िता की गवाही को खारिज करना और बदनाम करना बिलकुल अनावश्यक था। इस निर्णय में उच्च न्यायालय और केरल न्यायालय के निर्णयों के लिए भी कोई सम्मान नहीं है।

वरिष्ठ वकील ने कहा कि अदालत आईपीसी की धारा 376 के तहत बढ़े बलात्कार के मामले में जाँच करने में विफल हुई है। उन्होंने कोर्ट के निर्णय को देख यह भी कहा कि इस फैसले के पीछे पूर्वनिर्धारित मानसिकता थी कि अभियुक्त को बरी किया जाना चाहिए और इसके लिए पीड़िता, जो कि बेहद साहसिक है और उसकी तीन साथियों को बदनाम करने का हर प्रयास किया है। कोर्ट ने शपथ लेने के बाद दिए गए बयान को नहीं माना और पुराने बयानों पर विश्वास किया जबकि वो बोलती रह गई कि वो झूठ है।

बिशप मुलक्कल को किया बरी

उल्लेखनीय है कि केरल की एक अदालत ने बहुचर्चित नन रेप केस (Nun Rape Case) में बिशप फ्रैंको मुलक्कल (Bishop Franco Mulakkal) को 14 जनवरी 2022 को बरी कर दिया था। मुलक्कल भारत के पहले कैथोलिक बिशप थे, जिन्हें नन का यौन शोषण करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया। केरल की कोट्टायम पुलिस ने नन के दुष्कर्म मामले में आरोपित बिशप के खिलाफ 2018 में मुकदमा दर्ज किया था।

आरोप था कि बिशप ने कथित तौर पर 2014 और 2016 के बीच अपने कॉन्वेंट में एक नन के साथ 13 बार बलात्कार किया। उन पर नन को गलत तरीके से कैद करने, बलात्कार, अप्राकृतिक यौन संबंध बनाने और आपराधिक धमकी देने का आरोप लगाया गया था। नन द्वारा इसकी शिकायत किए जाने के बाद कॉन्वेंट की कई नन ने बिशप के खिलाफ विरोध-प्रदर्शन किया। पीड़िता ने 29 जून 2018 को शिकायत दर्ज कराई। उन्हें पुलिस ने 19 सितंबर 2018 को गिरफ्तार किया था। मुलक्कल को गिरफ्तार करने में तीन महीने लग गए।

26 महीने के ट्रायल के बाद बिशप को बरी किया गया है। इस मामले में जो चार्जशीट दाखिल की गई थी जिसमें 83 गवाहों के बयान दर्ज थे। फैसला आने के बाद फ्रैंको मुअक्कल के वकील ने रिपब्लिक टीवी से कहा कि पीड़िता झूठ बोल रही थी। उसके आरोपों में कोई सच्चाई नहीं थी। वकील ने कहा कि यह मामला फ्रैंको मुअक्कल के खिलाफ नहीं, बल्कि ईसाइयत के खिलाफ था।