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‘अपने बंगले से बाहर निकल कर, पोर्न से बाहर निकल कर कुछ कीजिए’ – शर्लिन चोपड़ा का शिल्पा शेट्टी पर तंज

पोर्नोग्राफी केस में राज कुंद्रा और शिल्पा शेट्टी का नाम आने के बाद से शर्लिन चोपड़ा उन पर हमलावर रही हैं। उन्होंने एक बार फिर अपने इंटरव्यू का एक वीडियो क्लिप ट्वीट करते हुए शिल्पा शेट्टी पर जमकर भड़ास निकाली है।

बॉलीवुड एक्ट्रेस शर्लिन चोपड़ा ने शिल्पा के टीवी पर साष्टांग दंडवत प्रणाम करने और रानी लक्ष्मीबाई के बारे में बात करने पर तंज कसते हुए ट्वीट किया, ”आप टीवी पर साष्टांग दंडवत प्रणाम करती हैं, उन कलाकारों को जिनकी कला से आप प्रभावित होती हैं। कृपया, रील लाइफ से बाहर निकलकर, रियल दुनिया में जाकर पीड़ित महिलाओं को थोड़ी बहुत सहानुभूति दिखाएँ। यकीन मानिए, सारी दुनिया आप को साष्टांग दंडवत प्रणाम करेगी!”

उन्होंने इंटरव्यू के दौरान कहा, ”मैं इस देश के लिए कुछ करना चाहती हूँ, खुद के लिए नहीं। मैं चाहती हूँ कि खुद के लिए ना जिऊँ, देश के लिए जिऊँ। खुद के लिए बंगला बनाना, खुद के लिए गाड़ी खरीदना अच्छा है एक हद तक, लेकिन गाड़ी बंगला खरीदने के बाद क्या? पोर्न बनाएँ… नहीं।”

एक्ट्रेस आगे कहती हैं, ”फिल्में कब तक करें। मैं चाहती हूँ कि पीड़ित महिलाओं और बच्चों के लिए कुछ करूँ। मंच पर बैठकर साष्टांग करना बहुत आसान होता है, मंच पर बैठकर रानी लक्ष्मीबाई के बारे में बातें करना आसान होता है, लेकिन आप फील्ड में जाकर पीड़ित महिलाओं के लिए कुछ कीजिए। अपने बंगले से बाहर निकलकर, पोर्न से बाहर निकलकर कुछ कीजिए। सारी दुनिया आपको साष्टांग दंडवत प्रणाम करेगी।”

गौरतलब है कि पोर्नोग्राफी केस में गिरफ्तार राज कुंद्रा दो महीने जेल में बिताने के बाद 21 सितंबर 2021 को घर लौटे थे। उन्हें सोमवार को बॉम्बे हाईकोर्ट ने जमानत दी थी। घर पहुँचने पर कुंद्रा काफी इमोशनल दिखाई दिए थे। उनकी आँखों में आँसू थे।

कुछ मीडिया रिपोर्टों में मुंबई पुलिस के हवाले से बताया गया है कि कुंद्रा के पास 119 पोर्न फिल्मों का कलेक्शन था। इसका सौदा वे 9 करोड़ रुपए में करना चाहते थे। उनकी योजना दो साल में अपने ऐप के यूजर्स 3 गुना और मुनाफा 8 गुना करने की थी। जाँच के दौरान पुलिस को ये वीडियो कुंद्रा के मोबाइल, लैपटॉप और हार्ड डिस्क से मिले थे। उनके खिलाफ मुंबई पुलिस 1500 पन्नों की चार्जशीट दायर कर चुकी है। इसमें शिल्पा सहित 43 गवाहों के बयान दर्ज हैं।

जिन BJP नेता मानस साहा की हुई मौत (TMC गुंडों के हमले के कारण)… ‘मरे हुए कुत्ते’ से ममता बनर्जी ने की उनकी तुलना

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी शुक्रवार (24 सितंबर, 2021) को भवानीपुर में चुनाव प्रचार के दौरान भाजपा नेता मानस साहा की तुलना ‘मरे हुए कुत्ते’ से करती दिखीं। मानस साहा की शव यात्रा को लेकर गुरुवार (23 सितंबर, 2021) को काफी बवाल होने के एक दिन बाद ममता ने यह विवादास्पद टिप्पणी की है।

भवानीपुर विधानसभा क्षेत्र के 71वें वार्ड में जनता को संबोधित करते हुए बनर्जी ने कहा, “कल जब मैं एक बैठक के लिए गई हुई थी, तब मैंने सुना कि वे (भाजपा कार्यकर्ता) एक शव के साथ मेरे आवास में प्रवेश करने की कोशिश कर रहे थे। उनकी इतनी हिम्मत कि यह सब मेरे घर के सामने करें।”

उन्होंने बीजेपी की राज्य इकाई को धमकी देते हुए कहा, ”अगर मैं आपके घर एक मरा हुआ कुत्ता भेज दूँ तो क्या होगा? क्या आपको नहीं लगता कि मेरे पास आवश्यक शक्तिबल (जनशक्ति) है? एक सड़े हुए कुत्ते को आपके घर के बाहर फेंकने में मुझे एक सेकंड का समय लगेगा और आप 10 दिनों तक (गंध के कारण) खा नहीं पाएँगे।”

भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष सुकांत मजूमदार ने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री की ‘असंवेदनशील’ टिप्पणी के लिए उनकी आलोचना की है। उन्होंने कहा, ”ये एक संवेदनशील मुख्यमंत्री के शब्द नहीं हो सकते। भाजपा के एक नेता की मौत हो गई है और वह भी तृणमूल कॉन्ग्रेस द्वारा किए गए हमले के कारण। लेकिन इस पर दुखी होने की बजाए उन्होंने उनकी तुलना एक मरे हुए कुत्ते से की। बेहद शर्मनाक।”

मानस साहा की हत्या

मृतक भाजपा नेता मानस साहा ने 2021 में पश्चिम बंगाल चुनावों के दौरान दक्षिण 24 परगना जिले के मगराहाट पश्चिम विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ा था। वह अपने प्रतिद्वंद्वी टीएमसी नेता जियास उद्दीन मोल्ला से 18,410 मतों से हार गए थे। कथित तौर पर, 2 मई (मतगणना के दिन) को टीएमसी के गुंडों ने साहा को बेरहमी से पीटा था। इस हमले में वह बुरी तरह जख्मी हो गए। लंबे इलाज के बाद उन्होंने 22 सितंबर 2021 को दम तोड़ दिया था।

बीजेपी नेता अर्जुन सिंह ने मामले की सीबीआई जाँच की माँग की थी। उन्होंने कहा, “साहा को स्थानीय टीएमसी विधायक के गुंडों ने पीटा था, क्योंकि मतगणना के रुझान से पता चला कि वह पीछे चल रहे थे।” वहीं, जियास उद्दीन मोल्ला ने इन आरोपों का खंडन किया था। कालीघाट में ममता बनर्जी के आवास के पास भाजपा कार्यकर्ता मानस साहा की शव यात्रा को लेकर गुरुवार (सितंबर 23, 2021) को बवाल मच गया। इस दौरान भाजपा नेताओं और कोलकाता पुलिस के बीच झड़प हो गई थी।

गौरतलब है कि पश्चिम बंगाल में 2 मई 2021 को चुनावी नतीजों में तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) की जीत सुनिश्चित होने के बाद हिंसा भड़क उठी थी। विपक्ष खास कर बीजेपी समर्थक इस दौरान निशाने पर थे। बीजेपी से जुड़े जिन लोगों की हत्या की गई उनमें अभिजीत सरकार और हारन अधिकारी भी शामिल थे। हिंसा की सीबीआई जाँच या विशेष जाँच दल (SIT) के गठन को लेकर इनके परिजनों की ओर से दाखिल याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने बंगाल सरकार को नोटिस जारी किया था।

दूध की एक बूँद के लिए मर चुकी माँ के स्तन को चूस रही थी बच्ची: मोपला नरसंहार की एक कहानी, है अनगिनत

मेरा जीवन बहुत सीधा और सरल है, दिन में नौकरी, सामान्य शौक और एक खुशहाल परिवार। सामाजिक रूप से सक्रिय होने के कारण, मैं कई विचारधाराओं वाले लोगों से मिला हूँ और लोगों की खामियों को नजरअंदाज करना मेरा स्वभाव है। बाकी लड़कों की तरह मेरा बचपन भी पापा की सुनाई गई कहानियों से भरा हुआ है। काफी पुरानी कहानी, जो इतिहास बन चुका है। मैं इतिहास को लेकर बेहद जुनूनी हूँ।

अब, ठीक एक सदी के बाद भी, हम देखते हैं कि भयानक और विकराल अतीत का कंकाल हम पर हँस रहे हैं। जब भी वह युद्ध के पीछे की वजह का महिमामंडन करते हैं, तो हमारे घाव फिर से हरे हो जाते हैं। जी हाँ, मैं उसी मोपला नरसंहार की बात कर रहा हूँ, जिसे फर्जी तरीके से ‘किसानों के विद्रोह’ या ‘स्वतंत्रता संग्राम’ के रूप में पेश किया जाता है। हर बार सभी पार्टी ने अपने हित के लिए इसका इस्तेमाल किया।

21 अगस्त 1921 को सुबह 8 बजे नीलांबुर शहर में अज़ान की गूँज सुनाई दी। दक्षिणी मालाबार में अशांति की खबर सुनकर, नीलांबुर साम्राज्य ने अपने कोविलकम (महल) की सुरक्षा के लिए मुट्ठी भर संतरी (पहरेदार) नियुक्त किए। मोपला के समूह की पहचान उस समय नहीं हुई, क्योंकि विद्रोही काफिला एक धार्मिक जुलूस की तरह लग रहा था। महल के छोटे पहरेदारों ने भरसक इसका विरोध किया, लेकिन यह सब व्यर्थ रहा।

ये मजहबी खानाबदोश कोविलकम के हर जीवित हिंदू और हिंदू समर्थकों पर हमला करने के लिए आगे बढ़े; और अंत में, एक लंबी लड़ाई के बाद वेलुथेडन नारायणन और वेलीचप्पड़ (कोविलकम मंदिर के जानकार- वेट्टाकोरु माकन) ने महल की दीवारों की रक्षा करने की कोशिश में अपनी जान गँवा दी। दंगाइयों ने सामने के दरवाजे को क्षतिग्रस्त कर दिया लेकिन कोविलकम में प्रवेश नहीं कर सके। भीड़ का एक अन्य समूह पास की चलियार नदी की ओर भागा और नहा रही दो महिलाओं को मार डाला। महिला वहीं पास की चट्टान पर बैठी अपनी डेढ़ साल की बेटी की जान बचाने की गुहार लगाती रही। मगर दंगाइयों ने कोविलकम को लूटने के बाद दूसरी ओर कूच किया।

उस दोपहर में बेरहमी से मारे गए अनेक निर्दोषों के खून ने चलियार के तटों को धो डाला। वह छोटी बच्ची दूध की एक बूँद के लिए अपनी मृत माँ के स्तन को चूस रही थी, तभी नीलमपुर मानववेदन तिरुमुलपद के दूसरे राजा ने उसे देखा। उन्होंने उस अनाथ बच्ची को गोद लिया, उसका नाम कमला रखा और उसे अपनी बेटी के रूप में पाला। बाद में 1938 में कमला का विवाह इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड के जूनियर इंजीनियर पद्मनाभ मेनन से हुआ। दुख की बात यह है कि भारतीय इतिहार इसे मोपला विद्रोह के रूप में दर्शाता है, जबकि यह 1921 में हिंदू परिवारों द्वारा झेली गई भयावह हिंसा को उजागर करता है।

मोपला नरसंहार किसान विद्रोह नहीं था

उस समय सुहाद (शहादत) का सही अर्थ इस्लाम में फिर से लिखा गया था, जब उनके कत्लेआम का कारण सिर्फ और सिर्फ मजहब था और उस नाम पर लोगों को बेरहमी से मारा गया, बलात्कार किया गया और गैर-इस्लामी लोगों को लूटा गया। उनके अनुसार, इस्लामी शहीद (जो इस तथाकथित विद्रोह के दौरान मर जाते हैं) कीमती पत्थरों से सुसज्जित घोड़ों पर जन्नत की सैर करते हैं और उनका स्वागत हूरें करती हैं। एक अनपढ़ मोपला के लिए, यह वादे उसके द्वारा जीते गए सांसारिक जीवन की तुलना में अधिक स्वागत योग्य था।

भारत में स्वतंत्रता आंदोलनों ने प्रत्येक पुरुष और महिला को एक सामान्य उद्देश्य के लिए हाथ मिलाने की माँग की। खिलाफत आंदोलन को स्वराज आंदोलन के साथ जोड़ना महात्मा गाँधी का विचार था। उन्होंने सोचा कि इससे दूर रह रहे मुसलमानों को आजादी के हमारे संघर्ष में भाग लेने की पहल होगी। हालाँकि हिंदुओं के साथ हुए अन्याय के बारे में उन्हें काफी कम पता था, जब इस्लाम के नाम पर हजारों लोगों को मार दिया गया। भारतीय स्वतंत्रता सेनानियों ने एक स्वतंत्र देश का सपना देखा था, लेकिन खिलाफतियों ने एक स्वतंत्र इस्लामी देश का सपना देखा था।

वे 5000 किलोमीटर दूर तुर्की में हो रहे सत्ता संघर्ष को लेकर ज्यादा चिंतित थे। ब्रिटिश शासन के तहत भारत दार-उल-हरब था और, इसके खिलाफ लड़ने के लिए इसे किसी भी मुस्लिम का कर्तव्य माना जाता था। शुरुआत में, हजारों मोपला, रानी की सरकार के खिलाफ खिलाफत आंदोलन में शामिल हुए। एरानाड, वल्लुवनाद, पोन्नानी और कालीकट के हिंदुओं और मोपलाओं ने हाथ में हाथ डाल कर खिलाफत आंदोलन में हिस्सा लिया। मगर उन्हें कहाँ पता था कि मोपला लोग राष्ट्रवादी नेताओं के स्वराज का सपना नहीं देख रहे थे, बल्कि उनका उद्देश्य ब्रिटिश सरकार को उखाड़ फेंक कर इस्लाम के राज्य की स्थापना करना था।

विद्रोह से कुछ दिन पहले, अंग्रेजों को हिंसा की हवा मिली और उन्होंने कालीकट में अपनी दूसरी लेइनस्टर रेजिमेंट को मजबूत किया, उसी रेजिमेंट के तीन और प्लाटून को मद्रास से बुलाया। उन्होंने थिरुरंगदी में मुस्लिम कट्टरपंथियों के बीच छिपे हुए हथियारों की खोज करने की योजना बनाई। इन फोर्स के साथ मजिस्ट्रेट 20 अगस्त 1921 की सुबह तिरुरंगडी पहुँचे। तलाशी के बाद सुबह 10 बजे तक तीन लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया। उसी समय, पुलिस पार्टी को सूचना मिली कि 2000 मोपला थानूर से परप्पनगडी रेलवे स्टेशन पहुँचे हैं और वे थिरुरंगडी की ओर बढ़ रहे थे। मीन वेरिंग, जिला पुलिस अधीक्षक आर एच हिचकॉक और डिप्टी एसपी अमू साहेब के नेतृत्व में सर्च टीम ने मोपला भीड़ का सामना किया।

यह 1921 मोपला जिहाद की शुरुआत थी। ‘नारा-ए-तकबीर, अल्लाहु अकबर’, ये नारे राष्ट्रवादी शक्ति या किसान शक्ति को प्रतिध्वनित नहीं करते थे। न तो उन्होंने स्वराज ध्वज (पिंगली वेंकैया द्वारा डिजाइन किया गया) और न ही खिलाफत ध्वज (दो चौराहे वाले घेरे) लिए थे। इसके बजाय दंगाइयों ने काले ‘बैनर ऑफ ईगल’ के साथ मार्च किया, जिसे रयात अल-उकाब के रूप में भी जाना जाता है। यह इस्लामी परंपरा में मुहम्मद द्वारा फहराया गया ऐतिहासिक ध्वज था। इस प्रतीक का इस्तेमाल इस्लामवाद और जिहादवाद में किया जाता है।

उन्होंने लोहे की रॉड से हमला किया। पुलिस की बेनट उनकी बढ़ती संख्या का सामना नहीं कर पा रही थी। पुलिस फायरिंग में नौ मारे गए। जब भीड़ वापस चली गई, तो अंग्रेजों ने थानूर खिलाफत समिति के सचिव कुंजिखदर और 40 अन्य मोपालियों को पकड़ लिया।

ब्रिटिश प्रशासन कुछ समय के लिए स्थूल पड़ गया था और इस दौरान कट्टरपंथियों ने हथियार उठा लिए थे। उन्होंने पुलिस थानों, कोषागारों, अदालतों और अन्य सरकारी कार्यालयों में छापेमारी की और लूटपाट की। ये धार्मिक गड़बड़ी जल्द ही जंगल की आग की तरह मलप्पुरम के आस-पास के इलाकों में फैल गई।

क्यों एमबी राजेश गलत थे

हाल ही में जब केरल विधानसभा के अध्यक्ष एमबी राजेश ने न्यूज चैनल में एक बयान दिया, तो इसने मुझे एक बार फिर सुनाई गई कहानियों से बहुत दर्दनाक क्षणों और नुकसानों को याद दिला दिया। मुझे एमबी राजेश के खिलाफ कोई व्यक्तिगत शिकायत नहीं है, लेकिन उन्होंने राजनीतिक लाभ और इस्लामी तुष्टीकरण के लिए तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर पेश किया। ऐसे लोग महान भारतीय लोकतंत्र के चेहरे पर धब्बा हैं, चलियार पर तैरने वाले हजारों हिंदुओं की सड़ी-गली लाशों पर दावत देने की कोशिश करने वाले जानवर हैं और संक्षेप में कहें तो यह एक कम्युनिस्ट हैं!

इस तरह के बयानबाजी करने वाली कैंसर टाइप विचारधारा कुछ वोटों के लिए सरासर गलत है। अगर वे मजदूर वर्ग के कुछ हज़ार नामों को मिटा देते हैं, तो मोपला दंगा एक आदर्श कहानी है जो उनके फर्स्ट क्लास के युद्ध सिद्धांत और बाइनरी संस्थाओं- जमींदारों और किसानों के साथ फिट बैठती है।

अबनी मुखर्जी ने 1922 में लेनिन को अपनी रिपोर्ट में कम्युनिस्ट संस्करण गढ़ा। एम स्वराज और राजेश सहित कम्युनिस्टों की नई पीढ़ियाँ कॉमरेड मुखर्जी की वही पुरानी कहावत का जाप करती हैं और उस संघर्ष में, वे अपने स्वयं के श्रद्धेय नेता ईएमएस नंबूदीरपद के बयान का खंडन भी करते हैं, जो खुद मोपला विद्रोह का शिकार थे, जिसे अपना घर छोड़ने के लिए मजबूर किया गया था।

पूरे सम्मान के साथ, कुछ प्रश्न हैं मेरे

दक्षिण मालाबार के अलावा दुनिया में कहाँ धार्मिक नारों से किसान क्रांति का नेतृत्व किया जाता है? यदि दंगे अंग्रेजों के खिलाफ थे, तो कितने ब्रिटिश अधिकारी मारे गए? यदि क्रांति भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का हिस्सा थी, तो किस राष्ट्रीय नेता ने बड़े पैमाने पर धर्मांतरण और हिंदुओं के सामूहिक बलात्कार का आह्वान किया? आज की पीढ़ी सोचने, विश्लेषण करने और इन पर खुलकर चर्चा करने के लिए अच्छी तरह से शिक्षित है। निष्कर्ष बहुत सरल, रूपांतरित या मार डालने वाले होंगे। स्वतंत्रता सेनानियों के रूप में कट्टरपंथियों के एक समूह को चित्रित करने के किसी भी प्रयास की निंदा की जाएगी, क्योंकि यह एकमात्र श्रद्धांजलि है, जो हम अपने अज्ञात पूर्वजों को दे सकते हैं जो इस कट्टरपंथ के शिकार हो गए।

नोट: लेखक ऊपर जिक्र किए गए कमला और पद्मनाभ मेनन के पोते हैं। इसका मूल वर्जन आप यहाँ पढ़ सकते हैं

हिंदू नौकर का जबरन खतना कराया, मंदिर जाने पर पीटा… नमाज भी पढ़वाया: डॉ नासिर और बेटे जुबेर खान पर केस

मध्य प्रदेश के आगर मालवा जिले से जबरन धर्म परिवर्तन का मामला सामने आया है। बताया जा रहा है कि नासिर और उसके बेटे जुबेर खान ने अपने नौकर दशरथ का जबरन खतना कर उसे धर्मांतरण के लिए मजबूर किया। पुलिस ने नासिर और जुबेर खान के खिलाफ मध्य प्रदेश धार्मिक स्वतंत्रता अध्यादेश 2020 के तहत मामला दर्ज किया है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, 31 वर्षीय दशरथ ने पुलिस को बताया कि मालीखेड़ा के रहने वाले डॉक्टर नासिर खान ने अपने बेटे के साथ मिलकर जबरन उसका खतना करवा दिया। उन्होंने उसे मंदिर जाने पर पीटा और इस्लाम कबूल करने के लिए धमकाया। पीड़ित का आरोप है कि बाप-बेटे ने उससे जबरन नमाज पढ़वाई थी।

कोतवाली थाना प्रभारी रणजीत सिंगार ने मीडिया रिपोर्ट में बताया कि दशरथ मैहर (31 वर्ष) निवासी गणेशपुरा गंगधार जिला झालावाड़ ने नासिर खान व उसके बेटे जुबेर खान के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी। उसने अपनी शिकायत में बताया कि वह साल 2007 से आरोपित नासिर के यहाँ नौकर की हैसियत से काम कर रहा था।

इस दौरान बाप-बेटे ने दशरथ को जबरन धर्म परिवर्तन करने के लिए डराया-धमकाया। दशरथ ने शिकायत में कहा कि करीब 7 महीने पहले आरोपितों ने जबरन उसका खतना करवा दिया था। वे उसे जबरन टोपी पहना कर नमाज भी पढ़वाते थे। इसके अलावा वो उसे मंदिर नहीं जाने देते और ना ही कोई त्योहार मनाने देते थे। अगर दशरथ उनका कहना नहीं मानता था तो वे उसे पीटते थे। आरोपित उसे बार-बार कहते थे कि हमने तुझे इतने सालों से पाला है इसलिए तुझे धर्म परिवर्तन करना ही पड़ेगा।

मध्य प्रदेश धार्मिक स्वतंत्रता अध्यादेश 2020 के तहत शादी तथा किसी अन्य कपटपूर्ण तरीके से किए गए धर्मांतरण के मामले में अधिकतम 10 साल की कैद एवं एक लाख रुपए तक के जुर्माने का प्रावधान किया गया है।

‘कहीं स्तनपान करते शिशु को छीन कर 2 टुकड़े किए, कहीं बार-बार रेप के बाद मरी माँ की लाश पर खेल रहा था बच्चा’: मोपला नरसंहार

केरल में मोपला मुस्लिमों द्वारा किए गए नरसंहार पर RSS विचारक जे नंदकुमार ने लोगों को इतिहास से अवगत कराया है। उन्होंने बताया कि किस तरह कॉन्ग्रेस की संस्थापक एनी बेसेंट ने भी मालाबार का दौरा किया था वहाँ के पीड़ित हिन्दुओं से बात की। उन्होंने लिखा है कि किस तरह एक गर्भवती हिन्दू महिला का पेट फाड़ कर भ्रूण को निकाल कर उसे क्षत-विक्षत कर दिया गया। ऐसी कई डरावनी घटनाएँ हुईं।

जे नंदकुमार ने एक और घटना का जिक्र किया। एक शिशु अपनी माता का स्तनपान कर रहा था। मोपला मुस्लिमों ने उस बच्चे को उसकी माता की छाती से छीन कर उसके दो टुकड़े कर दिए। इस घटना का जिक्र एनी बेसेंट ने भी किया है। एक जगह एक महिला का बार-बार इस तरह क्रूरता से रेप किया गया कि उसकी मृत्यु हो गई। उसका छोटा सा बच्चा काफी देर तक अपनी मरी हुई माँ के शरीर पर खेलता रहा और स्तनपान करने की कोशिश करता रहा – कितना हृदय विदारक दृश्य रहा होगा ये।

कई विद्वानों ने इसे पूरी दुनिया की सबसे क्रूरतम घटना बताई। खुद शंकरन नायर ने ऐसा बताया है, जो कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष रहे थे। बाबासाहब आंबेडकर का कहना था कि ये दंगा नहीं था, हिन्दुओं पर मुस्लिमों का आक्रमण था। एनी बेसेंट ने तो पूछा है कि क्या ये लोग शैतान थे? मलयालम महाकवि कुमार असन ने ‘दुरावस्था’ नाम के खंडकाव्य लिखा है कि ये मुस्लिम शैतान हैं क्या, क्या इनकी माताएँ-बहनें नहीं हैं?

एक वर्ष के भीतर पुस्तक प्रकाशित हुआ और उन्हें इस्लामी कट्टरपंथियों की धमकी मिलने लगी कि वो इसे वापस लें, लेकिन उन्होंने कहा कि ये पीड़ितों से बात कर के लिखी गई है और वो इसे वापस नहीं लेंगे। 1924 में उनकी हत्या हो गई और इसका कारण आज तक पता नहीं चला। 2 दिन बाद नाव से उनकी लाश मिली। नाव का वो कमरा बाहर से बंद था। वो तैराकी में दक्ष थे। लेकिन, छोटे नदी में डूब कर उनके मरने की कहानी पर कैसे कोई विश्वास करे? क्या ये साजिश नहीं थी?

इसके बाद जे नंदकुमार ने कुछ आँकड़े सामने रखे, जिसमें सबसे प्रमुख था कि मोपला मुस्लिमों द्वारा 10,000 हिन्दुओं का नरसंहार किया गया। उनकी जमीनें, मंदिर और खेत – सब छीन कर नष्ट कर दी गई। उन्होंने बताया कि जहाँ एक वीभत्स हत्याकांड हुआ, वहाँ हमारे मारे गए भाई-बहनों की याद में एक स्मारक तक नहीं बनवाने दिया गया। लेकिन, मोपला मुस्लिमों और उनके वंशजों को सरकारी रुपयों से, हमारे टैक्स के पैसों से पेंशन दी जा रही है।

उन्होंने कहा कि 100 वर्षों से हिन्दू पीड़ितों को न्याय नहीं मिला है। उन्होंने लोगों से इसके लिए आगे आने की अपील करते हुए कहा कि अच्छे लोग खामोश रहते हैं, इसीलिए अन्याय होता है। उन्होंने लोगों से तटस्थ न रहने की अपील करते हुए केरल में मालाबार के हिन्दुओं, वहाँ के पीड़ितों के वंशजों से बात कर के उनकी वेदना को समझने की अपील की। उन्होंने वीर सावरकर की पुस्तक ‘मोपला, अर्थात इससे मुझे क्या?’ नामक पुस्तक को पढ़ने की भी अपील की।

उन्होंने इस ‘खिलाफत आंदोलन’ और मोपला द्वारा हिन्दू नरसंहार की निंदा करते हुए अंत में कहा कि इसका योगदान भारत के विभाजन में भी था। उन्होंने सच्चाई के साथ खड़े होने की अपील करते हुए कहा कि इन चीजों पर फिर से अध्ययन किया जाना चाहिए। बता दें कि मोपला मुस्लिमों द्वारा हिन्दुओं के नरसंहार के 100 वर्ष पूरे होने पर आयोजित कार्यक्रम में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी शिरकत की।

‘इंशाअल्लाह इंसाफ होगा… अपने धर्म का प्रचार अपराध नहीं’ – ओवैसी ने किया अवैध धर्मांतरण वाले मौलाना कलीम का समर्थन

अवैध धर्मांतरण मामले में गिरफ्तार मौलाना कलीम सिद्दीकी का समर्थन करने पर एआईएमआईएम (AIMIM) के अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी सोशल मीडिया यूजर्स के निशाने पर आ गए हैं। मौलाना कलीम का समर्थन करते हुए असदुद्दीन ओवैसी ने कहा, ”अपने धर्म का प्रचार अपराध नहीं है।”

औवेसी ने इस मामले पर शुक्रवार (24 सितंबर 2021) को ट्वीट किया। उन्होंने लिखा, ”मौलाना कलीम साहब के वकील अबुबकर सब्बाक से बात की। अनुच्छेद-25 में अपने धर्म का प्रचार करने का अधिकार है। अपने धर्म की जानकारी देना किसी भी तरह से अपराध नहीं है। यूपी सरकार मीडिया ट्रायल कर रही है। उनके खिलाफ लगाई गई धाराएँ आरोपों से मेल नहीं खाती। इंशाअल्लाह इंसाफ होगा।”

दरअसल, अपने धर्म के बारे में जानकारी देना, या उसका प्रचार-प्रसार करना अपराध नहीं है, लेकिन अवैध धर्म परिवर्तन एक अपराध है। मौलाना कलीम सिद्दीकी पर अवैध धर्मांतरण का आरोप है, जिसके चलते उन्हें 10 दिन की रिमांड पर एटीएस को सौंप दिया गया है। ऐसे में एआईएमआईएम के अध्यक्ष को सोशल मीडिया यूजर्स आड़े हाथों लिया है।

हाबुल दत्ता नाम के एक यूजर ने लिखा, ”बेफिजूल की बातें करना और मुस्लिम को भड़काना ही आता तुम्हें। तुम बैरिस्टर के नाम पर धब्बा हो। तुम्हें सिर्फ बक-बक करना और ​बिना सोचे-समझे बोलना आता है। सबको पता है धर्म का प्रचार करना गुनाह नहीं है पर बहला-फुसलाकर के जोर जबरदस्ती करना गुनाह है। अब मुगल का जमाना नहीं ये, हिंदुस्तान है।”

एक अन्य यूजर ने लिखा, ”जैसा काम वैसा अंजाम, तुम्हारा भी वक्त आएगा, इंशाअल्लाह।”

एक और ट्विटर यूजर ने लिखा, “बड़ी-बड़ी फेंकने से कुछ नहीं होता। हैदराबाद की इस खातून की कोई मदद नहीं कर रहा। आप सब सिर्फ समाज को बेवकूफ बनाते हो। इंसानियत हैं तो पहले हैदराबाद के खातून का भला करो फिर समाज के ठेकेदार बनना।”

ध्यान दें कि अनुच्छेद-25 से लेकर 28 तक धार्मिक स्वतंत्रता की बात की गई है। संविधान के अनुच्छेद-25 में हर किसी को किसी भी धर्म का पालन करने और मानने का अधिकार है। उसका प्रचार प्रसार और प्रवचन करने का भी अधिकार है। लेकिन इसमें कहीं भी जबरन धर्मपरिवर्तन का उल्लेख नहीं किया गया है।

गौरतलब है कि उत्तर भारत में कई इस्लामिक ट्रस्ट चलाने वाले और 30 साल से देश के सबसे बड़े अवैध धर्मांतरण गिरोह को संचालित करने वाले मौलाना करीम सिद्दीकी को यूपी एटीएस की टीम ने बुधवार (22 सितंबर 2021) को मेरठ से गिरफ्तार किया था। मौलाना जामिया इमाम वलीउल्लाह ट्रस्ट चलाता है, जो कई मदरसों को फंड देता है। इसके लिए उसे विदेशों से भारी फंडिंग मिलती है।

इससे पहले उत्तर प्रदेश एटीएस ने धर्मांतरण कराने के मामले में मोहम्मद उमर गौतम और मुफ्ती काजी जहाँगीर आलम कासमी को जून में दिल्ली के जामिया नगर इलाके से गिरफ्तार किया गया था। उन पर पाकिस्तान की इंटर-सर्विसेज इंटेलिजेंस (आईएसआई) से कथित फंडिंग के साथ बधिर छात्रों और गरीब लोगों को इस्लाम में कन्वर्ट करने की कोशिश करने का आरोप लगा था।

‘तुम चोटी-तिलक-जनेऊ रखते हो, मंदिर जाते हो, शरीयत में ये नहीं चलेगा’: कुएँ में उतर मोपला ने किया अधमरे हिन्दुओं का नरसंहार

मोपला नरसंहार की 100वीं बरसी पर बोलते हुए RSS विचारक जे नंदकुमार ने बताया कि मालाबार छोड़ कर गए हुए कई हिन्दू वापस आ गए, जब टीपू सुल्तान की हार हुई। इसके बाद वो वापस आए और उन्होंने अपनी जमीनें वापस ली। उन्होंने बताया कि इसके बाद मालाबार में एक परिवर्तन हुआ और सांप्रदायिक दंगों का एक सिलसिला शुरू हो गया, जो 1792 से लेकर 2021 तक चला। कार्यक्रम में उत्त्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी शिरकत की।

उन्होंने जानकारी दी कि इस दौरान 82 बड़े दंगे हुए, जो मुस्लिमों द्वारा हिन्दुओं पर एकपक्षीय था। इसके बाद खिलाफत आंदोलन शुरू हो गया। उन्होंने कहा कि एक छोटी चिंगारी से भी बहुत बड़ा विस्फोट हो सकता है, इसके बाडजुए कॉन्ग्रेस नेतृत्व ने हरी झंडी दिखा कर आंदोलन शुरू किया। मोपला मुस्लिम बिना किसी कारण हिन्दुओं पर हमले करते थे। ‘खिलाफत कमिटी’ बनने के बाद ही केरल में दंगे शुरू हो गए।

उन्होंने अली मुसरयार का नाम लिया, जिसका जिक्र बाबासाहब भीमराव आंबेडकर ने भी किया है। उसने अपनी एक इस्लामी सत्ता की स्थापना कर के हिन्दुओं का जबरन मतांतरण शुरू किया। जबकि, सेक्युलर लोग इसे ब्रिटेन के खिलाफ बताते हुए स्वाधीनता संग्राम बताते हैं और कहते हैं कि बाद में गलती से दंगे शुरू हो गए। उन्होंने कहा कि सितंबर 1914 में ही वहाँ मुस्लिमों की एक सभा हुई थी, जिसमें उन्होंने अंग्रेजों का समर्थन किया था।

पहले विश्व युद्ध के बाद इंग्लैंड ने ऐलान किया था कि अगर मुस्लिम उसका समर्थन करते हैं तो वो खिलाफत आंदोलन का साथ देगा, जिसके बाद केरल में अंग्रेजों के समर्थन में सभाएँ हुईं, नमाज हुई। लेकिन, अंग्रेजों ने युद्ध में जीत के बाद तुर्की सल्तनत को हटा कर कई मुल्कों को आज़ाद कराया। इसके बाद ‘खिलाफत आंदोलन’ शुरू हुआ, जिसका मुख्य उद्देश्य था तुर्की के खलीफा को पुनः स्थापित करना।

उन्होंने बताया कि 1920 में खिलाफत का घोषणापत्र आया था, जिसमें ‘भारत’ शब्द तक नहीं था, इसमें स्वतंत्रता व संस्कृति की बात तो छोड़ दीजिए। साथ ही उन्होंने एक इस्लामी राज्य की कल्पना की थी। उन्होंने कॉन्ग्रेस से पूछा कि ‘खिलाफत आंदोलन’ में स्वतंत्रतता कहाँ थी? इतिहासकार आरसी मजूमदार ने लिखा है कि कॉन्ग्रेस नेता खिलाफत के पैन-इस्लामी प्रकृति को समझने में नाकाम रहे। इसने भारत की राष्ट्रीयता की जड़ को काटा।

उन्होंने वामपंथियों पर भी निशाना साधा। इन्होंने इसे ‘कृषि क्रांति’ और ‘क्लास वॉर’ तक करार दिया। इसे जमींदारों के खिलाफ भूमिहीनों का संघर्ष बताया गया। कुछ कथित बुद्धिजीवियों ने इसे किसानों का आंदोलन बताया, जो सरासर झूठ है। जे नंदकुमार ने बताया कि वहाँ हिन्दुओं में भी गरीब लोग थे और मुस्लिमों में भी अमीर लोग थे। उन्होंने पूछा कि अगर ये जमींदारों के खिलाफ था, तो कितने मुस्लिम जमींदारों की हत्या हुई?

जिन हिन्दुओं का नरसंहार हुआ, उनमें अधिकतर पिछड़े वर्ग के लोग थे। उन्होंने बताया कि दूसरा आक्रमण कपड़ा बनाने वाले हिन्दुओं पर हुआ, जो पिछड़ी श्रेणी में आते हैं। उन्होंने पूछा कि अगर ऐसा है तो ईसाईयों पर हमले क्यों हुए? उन्होंने 25 सितंबर की एक क्रूरत हत्याकांड को याद किया, जहाँ मल्ल्पुरम और कालीकट के बीच एक स्थान पर एक कुएँ के सामने 50 से ज्यादा हिन्दुओं को मुस्लिम आतंकियों ने बाँध कर रख दिया।

एक चट्टान के ऊपर बैठ कर उनके ‘गुनाहों’ की बात की गई और तिलक-चोटी-जनेऊ पर आपत्ति जताते हुए मंदिर में जाने को भी ‘गुनाह’ बताया गया और कहा गया कि शरीयत के शासन में ये ठीक नहीं है। हिन्दुओं के गले काट-काट कर कुएँ में धकेल दिया गया, जिसमें कई हिन्दू दम घुटने से भी मरे। इसके कई घंटों बाद कुएँ में आवाज़ सुन कर कुछ मुस्लिम कुएँ में उतरे और अधमरे लोगों के भी गले काट-काट कर हत्याएँ की गईं।

‘हिन्दुओं का नरसंहार करने वाले मोपला को अब भी मिल रही पेंशन, हैदर के आक्रमण से 50% हिन्दुओं का पलायन’: CM योगी ने किया याद

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने केरल में हुए मोपला नरसंहार की 100वीं बरसी पर आयोजित एक कार्यक्रम को सम्बोधित करते हुए याद किया कि कैसे जिहादी तत्वों ने हिन्दुओं का नरसंहार किया था। उन्होंने कहा कि ये नरसंहार योजनाबद्ध तरीके से कई महीनों तक चला, जिसमें 10,000 हिन्दुओं की हत्या हुई, माताओं-बहनों का शीलभंग हुआ और मंदिरों को तोड़ा गया। सीएम योगी ने इसे जमींदारों के विरुद्ध आक्रोश बताए जाने पर भी आपत्ति जताई।

उन्होंने कहा कि तुष्टिकरण के कारण इतिहास को बदल दिया गया, जिसे तत्कालीन सत्ताधीशों का संरक्षण दिया। उन्होंने बाबसाहब भीमराव आंबेडकर और वीर विनायक दामोदर सावरकर को भी याद किया, जिन्होंने अपने पुस्तकों में इस नरसंहार की वीभत्सता का जिक्र किया था। उन्होंने कहा कि आदि शंकराचार्य की धरती पर हिन्दुओं की रक्षा के लिए गुरु गोरखनाथ के अनुयायी भी आए थे। उन्होंने कहा कि गोरखनाथ के अनुयायियों के मालाबार के हिन्दुओं पर बड़े उपकार हैं।

इस अवसर पर RSS विचारक जे नंदकुमार ने ‘आज़ादी के अमृत महोत्सव’ का जिक्र करते हुए कहा कि हम कैसे स्वाधीन हुए, जिसके पीछे जितने वीर नायक-नायिका थे उन सबकी गाथा हम फिर से सुनेंगे। उन्होंने कहा कि कुछ इतिहासकारों ने सही इतिहास लिखने का प्रयास किया ज़रूर, लेकिन सही इतिहास आज भी पढ़ने को नहीं मिलता। उन्होंने इतिहास को ठीक परिप्रेक्ष्य में समाज के सामने रखने पर जोर दिया।

इस दौरान उन्होंने बड़ा खुलासा किया कि हिन्दुओं का नरसंहार करने वाले मोपला मुस्लिमों व उनके वंशजों को अब भी ‘स्वतंत्रता सेनानी’ बताते हुए उन्हें कॉन्ग्रेस व वामपंथी सरकारों द्वारा पेंशन भी दिया जा रहा है, जो हमारे टैक्स के पैसों से जाता है। उन्होंने कहा कि 100 वर्ष बाद इसे याद करने की वजह ये है कि हम इससे सीखेंगे नहीं तो इतिहास खुद को दोहराता है। उन्होंने जिक्र किया कि कैसे इस्लामी ताकतों ने अलग-अलग देशों में दंगे किए, जिसकी पुनरावृत्ति अब देखने को मिल रही है।

उन्होंने इसका भी जिक्र किया कि कैसे उच्च शिक्षण संस्थानों में ‘खिलाफत 2.0’ जैसे कार्यक्रम हो रहे हैं और तुर्की के राष्ट्रपति तैय्यब एर्डोगन को ‘एकमात्र आशा’ बताई जा रही है। उन्होंने CAA विरोध के दौरान इस्लामी कट्टरता और केरल में मोपला मुस्लिम नरसंहारकों की वर्दी में निकली यात्रा का भी जिक्र किया। इसमें नारा लगाया गया था कि हमने 1921 में जो तलवार उठाया था, वो अब भी हमारे हाथ में है और हमने उसे समुद्र में फेंका नहीं है।

उन्होंने ‘लव जिहाद’ और ‘नारकोटिक्स जिहाद’ का जिक्र करते हुए कहा कि कुछ भी अचानक नहीं हुआ था, बल्कि 1921 में जो हुआ उसका एक लंबा इतिहास है। उन्होंने केरल के बारे में ज्यादा विचार करने का जिक्र करते हुए कहा कि वहाँ मालाबार में 1766 में जब हैदर के नेतृत्व में मैसूर का आक्रमण हुआ था, तब से लेकर मुस्लिमों और नॉन-मुस्लिमों के बीच संघर्ष शुरू हो गया। हैदर का बेटा टीपू सुल्तान और क्रूर था, जिसके मालाबार से हिन्दुओं को भगाया।

उन्होंने जानकारी दी कि मालाबार से लगभग आधे हिन्दुओं को अपनी सारी संपत्ति छोड़ कर भागना पड़ा, ताकि वो अपनी जान और मान बचा सकें। टीपू सुल्तान की फ़ौज ने सांप्रदायिक हिंसा का नंगा नाच किया और विश्व की सबसे ज्यादा गुणवत्ता वाले चाय के उत्पादन को छोड़ कर हिन्दू भागे, जिसके बाद टीपू सुल्तान ने उन्हें मुस्लिमों में बाँट दिया। वहाँ के मुस्लिम जमींदार बन बैठे और उन्होंने अपना वर्चस्व स्थापित किया।

Apps-आतंक-Pak-अफगानिस्तान… QUAD में ऐसे घिर रहा चीन, बौखलाहट में उठा रहा गलवान का मुद्दा

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शुक्रवार (सितंबर 24, 2021) को क्वाड (QUAD) देशों की बैठक में शामिल हुए। प्रधानमंत्री मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति बाइडेन की मुलाकात चीन और पाकिस्तान दोनों के लिए स्पष्ट संदेश है। साथ ही आने वाले दिनों में भारत की हिंद प्रशांत क्षेत्र में बड़ी भूमिका का संकेत भी। बाइडेन से मुलाकात के पहले उपराष्ट्रपति कमला हैरिस से मुलाकात में पीएम मोदी की यात्रा की दिशा और परिणाम की पटकथा लिख दी गई। विदेश सचिव ने बताया कि आतंकवाद पर उपराष्ट्रपति हैरिस ने स्वतः स्फूर्त कड़ा संदेश पाकिस्तान को दिया। यह दर्शाता है कि अफगानिस्तान के ताजा हालात और तालिबानी शासन के बाद पैदा हुए खतरों के प्रति भारत और अमेरिका की चिंता समान है।

क्वाड (QUAD) बैठक में पाकिस्तान को आतंकवाद और कट्टरपंथ पर कठोर संदेश तो मिला ही है, साथ ही अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और जापान के नेतृत्व के साथ पीएम मोदी की चीन से उपजे खतरों पर विस्तृत चर्चा हुई है। खासतौर पर हिन्द प्रशांत क्षेत्र और दक्षिण चीन सागर में चीन के मनमाने रवैये पर इन देशो की चिंता समान है। ऑकस (AUKUS: Security pact between Australia, United Kingdom and United States) संबंधित आशंकाओं को भी द्विपक्षीय बैठकों में दूर किया गया। बैठक में भारत ने चीनी ऐप्स का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने क्लीन ऐप मूवमेंट (CLEAN APP MOVEMENT) पर जोर दिया। गौरतलब है कि भारत में कई चीनी एप्स बैन हैं।

बैठक में अमेरिकी नेतृत्व ने भी चीन के खतरों की ओर इशारा किया है और भरोसा दिया कि वो इससे निपटने के लिए भूमिका निभाने के लिए तैयार हैं। आने वाले दिनों में क्वाड और ऑकस की भूमिका भी इस संदर्भ में बढ़ेगी। द्विपक्षीय बातचीत में इंडो पैसिफि‍क का जिक्र कर बाइडेन ने चीन को साफ संदेश देने की कोशिश की है कि वो समंदर में दादागीरी करना बंद करे। वहीं अफगानिस्‍तान के पूरे प्रकरण में अमेरिका की छवि को जिस तरह धक्‍का लगा, अब वो उसके लिए पाकिस्‍तान को जिम्‍मेदार मान रहा है। भारत के लिए भी पाकिस्‍तान प्रायोजित आतंकवाद चुनौती बना हुआ है। 

भारत ने ये भी बताया है कि कैसे तालिबान को चीन और पाकिस्तान का साथ मिल रहा है, उससे भारत के लिए ही नहीं दुनिया की मुश्किलें बढ़ सकती हैं। अमेरिका ने भी भारत के इस रुख को स्वीकार किया है। दोनों पक्षों ने अफगानिस्‍तान में आतंकवाद से लड़ने पर जोर दिया। दोनों ने कहा कि तालिबान अपने उस वादे पर कायम रहे जिसमें कहा गया है कि अफगानिस्‍तान की जमीन का इस्‍तेमाल आतंकवाद के लिए नहीं होगा। ये भी कहा गया कि तालिबान अफगानिस्‍तान में महिलाओं, बच्‍चों और अल्‍पसंख्‍यकों के मानवाधिकारों का सम्‍मान करेगा, मानवीय मदद पहुँचने देगा। दोनों पक्ष इसके लिए सियासी बातचीत करेंगे। 

भारत ने आतंकी संगठनों को मिल रहे पाकिस्तान के सहयोगी और अफगानिस्तान में पाकिस्तान की भूमिका का भी मुद्दा उठाया और दोनों देश इस बात पर सहमत हुए हैं कि अफगानिस्तान की धरती से आतंकवाद का इस्तेमाल किसी दूसरे देश के लिए न किया जाए। इसके अलावा दोनों देश इस बात पर भी सहमत हुए हैं अफगानिस्तान के आतंकी संगठनों को पड़ोसी देशों से मिल रही आर्थिक मदद को भी रोका जाए।

चीन को लेकर अमेरिकी प्रशासन और भारत की सोच एक जैसी दिख रही है। एक तरफ वो आगे बढ़कर किसी लड़ाई में उलझना नहीं चाहता लेकिन उसकी तरफ आँख उठाने पर वो जवाबी कार्रवाई के लिए तैयार है। बाइडेन ने भी माना कि महात्‍मा गाँधी के दर्शन की इस समय दुनिया को सबसे ज्यादा जरूरत है। पिछले दो वर्षों में दुनिया बहुत बदल गई है, कोरोना से जंग हो या आतंकवाद से, अमेरिका और भारत दोनों को एक-दूसरे की पहले से ज्यादा जरूरत है, यही वजह है कि ये रिश्‍ता और मजबूत होने वाला है। 

इधर चीन एक बार फिर भारतीय सीमा पर अपनी बौखलाहट दिखा रहा है। चीन की तरफ से ताजा बयान में कहा गया है कि गलवान घाटी में संघर्ष इसलिए हुआ क्योंकि भारत ने चीन के क्षेत्र का अतिक्रमण किया और सभी समझौतों का उल्लंघन किया। चीन के इस बयान को खारिज करते हुए भारत के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अरिंदम बागची ने कहा कि चीनी कार्रवाई से द्विपक्षीय संबंधों पर असर पड़ा है।

उन्होंने कहा कि हमारे सभी द्विपक्षीय समझौतों के उलट यथास्थिति को बदलने के चीनी पक्ष के एकतरफा प्रयासों एवं भड़काऊ व्यवहार के कारण शांति एवं स्थिरता में बाधा आई। इससे द्विपक्षीय संबंधों पर भी असर पड़ा है।

बता दें कि गलवान घाटी में पिछले वर्ष जून में चीनी सैनिकों के साथ भीषण झड़प में भारतीय सेना के 20 जवान वीरगति को प्राप्त हो गए थे, जो दशकों बाद दोनों पक्षों के बीच गंभीर सैन्य झड़प थी। चीन ने फरवरी में आधिकारिक रूप से स्वीकार किया था कि भारतीय सेना के साथ संघर्ष में उसके पाँच अधिकारी मारे गए, जबकि माना जाता है कि मरने वाले चीनी सैनिकों की संख्या काफी अधिक थी।

बेगानी कामयाबी में बिहारी दीवाना, UPSC टॉपर शुभम कुमार के बहाने कुछ कड़वी बातें

एक व्हाट्सएप ग्रुप से जुड़ा हुआ हूँ। इसके ज्यादातर सदस्य दिल्ली के विभिन्न मीडिया संस्थानों से जुड़े हैं। मीडिया के पेशे के अलावा इस ग्रुप के सदस्यों के बीच एक और जो बात साझा है, वह यह है कि इन सबकी जड़ें बिहार और झारखंड के उन इलाकों से है जो कागजी मिथिला राज्य का हिस्सा हैं। इसी कागजी मिथिला राज्य का हिस्सा बिहार का कटिहार जिला भी है। संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) 2020 की परीक्षा में शीर्ष स्थान हासिल करने वाले शुभम कुमार भी मूल रूप से इसी जिले के कदवा प्रखंड के कुम्हरी गाँव के रहने वाले हैं। पिता देवानंद सिंह उत्तर बिहार ग्रामीण बैंक में शाखा प्रबंधक हैं तो जड़ें अब भी बिहार में बची हुई हैं।

शुभम की सफलता और उनकी जड़ों को लेकर पहला विवरण मैथिल पत्रकारों के इसी व्हाट्सएप ग्रुप में प्राप्त हुआ। थोड़ी देर बाद सोशल मीडिया में भी उनकी धूम दिखी। ‘एक बिहारी, सौ पर भारी’ जैसे जुमले पूरी रफ्तार से चल रहे थे। ऐसा लग रहा था कि बेबस हो पलायन करने को, महानगरों में दोयम दर्जे की जिंदगी जीने को विवश बिहारियों को शुभम कुमार की सफलता के पीछे अपने राज्य के बीमारू होने का सच, सुशासन के रोम-रोम में विद्यमान नग्न छिद्रों को ढक खुद की श्रेष्ठता साबित करने का जो मौका मिला है, उसे वे किसी भी परिस्थिति में हाथ से निकलने नहीं देना चाहते।

आखिर हर साल यूपीएससी का टॉपर बिहारी होता भी तो नहीं है। देश की सर्वश्रेष्ठ मानी जाने वाली इस परीक्षा को शुभम से पहले आखिरी टॉपर बिहार ने 21 साल पहले दिया था। शुभम सहित अब तक केवल 4 बिहारी ही इस पायदान तक पहुँचने में कामयाब रहे हैं। लेकिन, सवाल शुभम की सफलता को लेकर जश्न मनाने की इस प्रवृत्ति पर नहीं है। सवाल इन जश्नों के पीछे असली सवालों से मुँह मोड़ने की मानसिकता को लेकर है।

10वीं बिहार के पूर्णिया से करने वाले शुभम आगे की पढ़ाई के लिए बोकारो चले गए थे। 2014 में देश की एक और कठिन परीक्षा पास की और आईआईटी बॉम्बे चले गए। फिर शोध करने अमेरिका गए, जहाँ उन्होंने तय किया कि उन्हें यूपीएससी परीक्षा की तैयारी करनी है।

शुभम के इस सफर में य​दि उनकी जड़ों (पैदा कहाँ होना है यह तय करना उनके अधिकार क्षेत्र से बाहर था) को छोड़ दें तो बिहार का ​क्या योगदान है? आखिर बिहार में ऐसा कोई शैक्षणिक संस्थान क्यों नहीं है जहाँ शुभम अपनी पढ़ाई कर यूपीएससी टॉपर बनने के सपने बुन पाते? क्या शुभम की सफलता बिहार के बीमार स्कूलों का स्वास्थ्य दुरुस्त कर देगी? क्या इस सफलता से बिहार के उन सभी विश्वविद्यालयों के सत्र नियमित हो जाएँगे जो तीन साल की डिग्री देने में 5, यहाँ तक कि 6 साल भी लगा देते हैं? शायद नहीं और इस नग्न सच्चाई से हम भलीभाँति अवगत भी हैं। इसलिए शुभम के बिहारी होने का जोर-जोर से ढोल पीट हम ऐसे हर नग्न सवाल को दफन कर देना चाहते हैं जिनसे हजारों-लाखों शुभम का भविष्य जुड़ा है।

ऐसा नहीं है कि मेरा इरादा शुभम वाले बिहारी रंग में भंग डालने का है या फिर मैं ईर्ष्या से पीड़ित मैथिल हूँ। यूपीएससी की 2019 की परीक्षा में 290वाँ रैंक हासिल करने के बाद इसी शुभम ने एक साक्षात्कार में कहा था, “बिहार की हवा में ही ऐसा होता है कि सब लोग कहते हैं कि आईएस करना है, तो यह बचपन से ही ड्रीम होता है।” जाहिर है सपने आज भी बिहार की मिट्टी-पानी में जिंदा हैं और यही सपने हमारी ताकत हैं। पर यह ताकत केवल ‘एक बिहारी, सौ पर भारी’ जैसे जुमलों तक ही सिमट कर नहीं रह जाना चाहिए।

चर्चों के शोर का क्या? 2019 में इसी परीक्षा में सफल होने के बावजूद शुभम का नगाड़ा इतना नहीं बजा था। 2019 की रैकिंग से IDAS (इंडियन डिफेंस अकाउंट सर्विसेस) के लिए चयनित शुभम ताजा रैकिंग के बाद अपनी पसंद की सेवा का विकल्प चुनेंगे और कुछ दिन बाद चर्चों से गायब हो जाएँगे। अगले बरस मौसम बदलेगा और नए टॉपर का शोर मचेगा। लिहाजा फिजूल के शोर में दबते मूल सवालों पर गौर करना जरूरी है। इन सवालों से ही हर बिहारी का अस्तित्व जुड़ा है।

माटी कहे कुम्हार से

जड़ों का क्या? जड़ तो उस मजदूर शंकर चौधरी की भी कटिहार जिले में ही थी जिनकी हत्या जम्मू-कश्मीर के कुलगाम में आतंकी हमले के दौरान कर दी गई। यह भी अजीब संयोग है कि चौधरी की हत्या भी शुक्रवार को हुई थी और शुभम की सफलता की खबर भी कटिहार के हिस्से शुक्रवार को ही आई। फर्क तारीखों का था। सफलता 24 सितंबर को आई, मातम 17 सितंबर के नाम रहा। तारीखों का यही फर्क बिहार का भविष्य तय करेगा। तय करेगा कि उसकी जड़ों से कितने टॉपर निकलेंगे, क्योंकि जश्न तो हम उन झा लोगों की सफलता का भी मना लेते हैं जिनके पुरखों ने कई पीढ़ी पहले पलायन कर लिया और फिर उनके बच्चों ने न मिथिला देखी और न मैथिली सीखी।