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पढ़ाया ‘कृषि विद्रोह’, था हिंदुओं का नरसंहार: 10000+ मौतें, मंदिरों में गोमांस, बापों के सामने धर्म बदल बेटियों का निकाह

भारत का इतिहास लिखने वालों ने जब भी हिन्दुओं के नरसंहार वाली किसी घटना के बारे में लिखा तो इसे एक ‘विद्रोह’ या ‘हिन्दू-मुस्लिम दंगे’ करार दिया। महाराष्ट्र में 19वीं शताब्दी के अंत में हिन्दुओं के लिए पूजा-पाठ तक अपराध हो गया था और मुस्लिम अक्सर हिन्दू जुलूसों पर हमले करते थे तो इसे भी ‘हिन्दू-मुस्लिम विवाद’ लिखा गया। उत्तर भारत में तो किसी को केरल के मालाबार में मोपला मुस्लिमों द्वारा हुए हिन्दुओं के नरसंहार के बारे में शायद ही पता हो।

न सिर्फ अंग्रेजों की नीति मुस्लिम तुष्टिकरण की रही थी, बल्कि महात्मा गाँधी जैसे नेता तक ने ‘खिलाफत आंदोलन’ का समर्थन कर के हिन्दुओं के कत्लेआम की तरफ से आँख मूँद लिया। मोपला हिन्दू नरसंहार को अक्सर ‘मालाबार विद्रोह’, या अंग्रेजी में ‘Rebellion‘ कह कर सम्बोधित किया गया। केरल भाजपा के अध्यक्ष रहे कुम्मनम राजशेखरन की मानें तो 1921 में हुई ये घटना राज्य में ‘जिहादी नरसंहार’ की पहली वारदात थी।

आज केरल में मुस्लिमों की जनसंख्या 27% के आसपास है। यहाँ की पार्टी ‘मुस्लिम लीग (IUML)’ के पास 15 विधानसभा सीटें हैं। राज्य से आतंकी संगठन ISIS में जाने वालों की अच्छी-खासी संख्या है। अब तो तालिबान में भी ‘मलयालियों’ के होने की बात खुद कॉन्ग्रेस सांसद शशि थरूर ने कही है। यहाँ के ईसाई भी ‘लव जिहाद’ से पीड़ित हैं। असल में केरल में इस्लामी कट्टरपंथ की जड़ें इतिहास में ही हैं।

मोपला हिन्दू नरसंहार के बारे में वामपंथी इतिहासकार कहते हैं कि ये अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह था। अगर ऐसा था, तो फिर मंदिर क्यों ध्वस्त किए गए थे? अगर ये ‘स्वतंत्रता संग्राम’ था, तो भारत के ही लोगों को अपनी ही धरती छोड़ कर क्यों भागना पड़ा था जिहादियों के डर से? वामपंथी इसे ‘मप्पिला मुस्लिमों का सशस्त्र विद्रोह’ कहते हैं। अगर ये विद्रोह था तो इसमें सिर्फ मुस्लिम ही क्यों थे? बाकी धर्मों के लोग क्यों नहीं?

लगभग 6 महीनों तक हिन्दुओं का नरसंहार चलता रहा था, जिसमें 10,000 से भी अधिक जानें गईं। भारत के कई अन्य क्षेत्रों की तरह ही केरल में भी इस्लाम अरब से ही आया था। अरब के व्यापारी वहाँ आया करते थे और इस तरह 9वीं शताब्दी में वहाँ इस्लाम का पनपना शुरू हुआ। कई गरीब हिन्दुओं का धर्मांतरण हुआ। अरब के जो व्यापारी यहाँ बसे, उनका वंश भी फला-फूला। इस तरह केरल में मुस्लिमों की जनसंख्या बढ़ती चली गई।

ये वही इलाका था, जहाँ हैदर अली और उनके बेटे टीपू सुल्तान ने हमले किए। पहले से ही पुर्तगाली यहाँ जमे हुए थे। ऊपर से मैसूर के आक्रमण ने यहाँ के हिन्दुओं को पलायन के लिए मजबूर किया। हिन्दुओं को जम कर लूटा गया था। लोगों को इससे भी हैरानी थी कि यहाँ ‘मप्पिला मुस्लिमों’ की जनसंख्या कैसे अचानक इतनी बढ़ गई कि वो हावी हो गए। दो ही कारण हैं – ज़्यादा से ज़्यादा बच्चे पैदा करना और गरीब हिन्दुओं का बड़ी संख्या में धर्मांतरण।

1921 में दक्षिण मालाबार में कई जिलों में मुस्लिमों की जनसंख्या सबसे ज्यादा थी। कुल जनसंख्या का वो 60% थे। अब वो समय आया जब महात्मा गाँधी ने मुस्लिमों का ‘विश्वास जीतने’ के लिए ‘खिलाफत आंदोलन’ को कॉन्ग्रेस का समर्थन दिला दिया। ‘खिलाफत’ मतलब क्या? ये आंदोलन ऑटोमन साम्राज्य को पुनः बहाल करने के लिए हो रहा था। तुर्की के खलीफा को पूरी दुनिया में इस्लाम का नेता नियुक्त करने के लिए हो रहा था।

न भारत को तब तुर्की से कोई लेनादेना था और न ही ऑटोमन साम्राज्य से। लेकिन, महात्मा गाँधी ने मुस्लिमों को कॉन्ग्रेस से जोड़ने के लिए उनके एक ऐसे अभियान का समर्थन कर दिया, जिसके दुष्परिणाम हिन्दुओं को भुगतने पड़े। वो 18 अगस्त, 1920 का समय था जब महात्मा गाँधी ‘खिलाफत’ के नेता शौकत अली के साथ मालाबार आए। वो ‘असहयोग आंदोलन और खिलाफत’ के लिए ‘ जागरूक’ करने आए थे।

यहाँ भी महात्मा गाँधी ने हिन्दुओं को ‘ज्ञान’ दिया। कालीकट में 20,000 की भीड़ के सामने बोलते हुए उन्होंने कहा कि अगर ‘खिलाफत’ के मामले में न्याय के लिए भारत के मुस्लिम ‘असहयोग आंदोलन’ का समर्थन करेंगे तो हिन्दुओं का भी दर्ज बनता है कि वो अपने ‘मुस्लिम भाइयों’ के साथ सहयोग करें। जून 1920 में महात्मा गाँधी के कहने पर ही मालाबार में ‘खिलाफत कमिटी’ बनी। इसके बाद वो काफी सक्रिय हो गई।

महात्मा गाँधी भी इस भुलावे में जीते रहे कि मुस्लिमों ने ‘असहयोग आंदोलन’ का समर्थन कर दिया है। लेकिन, इससे ये ज़रूर हुआ कि ‘खिलाफत’ की आग में मोपला मुस्लिमों ने हिन्दुओं का बहिष्कार शुरू कर दिया। हिन्दुओं को निशाना बनाया गया। उनकी घर-सम्पत्तियों व खेतों को तबाह कर दिया गया। कइयों का जबरन धर्मांतरण करा दिया गया। कॉन्ग्रेस पार्टी ने अंग्रेजों पर दोष मढ़ कर इतिश्री कर ली। हिन्दुओं को बचाने कोई नहीं आया।

हाँ, वामपंथी नेता खासे खुश थे। सौम्येन्द्रनाथ टैगोर जैसे कम्युनिस्ट नेताओं ने इसे ‘जमींदारों के खिलाफ विद्रोह’ बताया। इतिहासकार स्टेफेन फ्रेडरिक डेल ने स्पष्ट लिखा है कि ये ‘जिहाद’ था। उनका कहना है कि यूरोपियनों व हिन्दुओं से लड़ते हुए ‘जिहाद’ की प्रकृति तो मोपला मुस्लिमों में काफी पहले से थी। उनका कहना था कि आर्थिक स्थिति से इस नरसंहार का कोई लेनादेना नहीं था। देश में कई ‘किसान आंदोलन’ हुए, लेकिन ऐसे आंदोलन में धर्मांतरण का क्या काम?

इसमें सबसे विवादित नाम आता है वरियामकुननाथ कुंजाहमद हाजी का, जो इस पूरे नरसंहार का सबसे विवादित शख्सियत है। वो मालाबार में ‘मलयाला राज्यम’ नाम से एक इस्लामी सामानांतर सरकार चला रहा था। ‘इस्लामिक स्टेट’ की स्थापना करने वाला कोई व्यक्ति स्वतंत्रता सेनानी कैसे हो सकता है? ‘द हिन्दू’ अख़बार को पत्र लिख कर उसने हिन्दुओं को भला-बुरा कहा था। अंग्रेजों ने उसे मौत की सज़ा दी थी। अब उस पर फिल्म बना कर उसके महिमामंडन की तैयारी हो रही है।

RSS के विचारक जे नंदकुमार कहते हैं कि हाजी एक ऐसे परिवार से आता था, जो हिन्दू प्रतिमाएँ ध्वस्त करने के आदी थे। उसके अब्बा ने भी कई दंगे किए थे, जिसके बाद उसे मक्का में प्रत्यर्पित कर दिया गया था। मोपला दंगे के दौरान कई हिन्दू महिलाओं का रेप भी किया गया था मंदिरों को ध्वस्त किया गया था। बाबासाहब भीमराव आंबेडकर ने ‘Pakistan or The Partition of India’ में लिखा है कि मोपला दंगा दो मुस्लिम संगठनों ने किया था।

इनके नाम हैं – ‘खुद्दम-ए-काबा (मक्का के सेवक)’ और सेन्ट्रल खिलाफत कमिटी। उन्होंने लिखा है कि दंगाइयों ने मुस्लिमों को ये कह कर भड़काना शुरू किया कि अंग्रेजों का राज ‘दारुल हर्ब (ऐसी जमीन जहाँ, अल्लाह की इबादत की इजाजत न हो)’ है और अगर वो इसके खिलाफ लड़ने की ताकत नहीं रखते हैं तो उन्हें ‘हिजरत (पलायन)’ करनी चाहिए। आंबेडकर ने लिखा है कि इससे मोपला मुस्लिम भड़क गए और उन्होंने अंग्रेजों को भगा कर इस्लामी राज्य की स्थापना के लिए लड़ाई शुरू कर दी।

डॉक्टर आंबेडकर लिखते हैं, “अंग्रेजों के खिलाफ को तो जायज ठहराया जा सकता है, लेकिन मोपला मुस्लिमों ने मालाबार के हिन्दुओं के साथ जो किया वो विस्मित कर देने वाला है। मोपला के हाथों मालाबार के हिन्दुओं का भयानक अंजाम हुआ। नरसंहार, जबरन धर्मांतरण, मंदिरों को ध्वस्त करना, महिलाओं के साथ अपराध, गर्भवती महिलाओं के पेट फाड़े जाने की घटना, ये सब हुआ। हिन्दुओं के साथ सारी क्रूर और असंयमित बर्बरता हुई। मोपला ने हिन्दुओं के साथ ये सब खुलेआम किया, जब तक वहाँ सेना न पहुँच गई।”

दीवान बहादुर सी गोपालन नायर को मोपला नरसंहार के मामले में ‘प्राइमरी सोर्स’ माना जा सकता है, क्योंकि वो अंग्रेजी काल में वहाँ के डिप्टी कलक्टर थे। उन्होंने भी लिखा है कि गर्भवती महिलाओं के शरीर को टुकड़ों में काट कर सड़क पर फेंक दिया गया था। मंदिरों में गोमाँस फेंक दिए गए थे। कई अमीर हिन्दू भी भीख माँगने को मजबूर हो गए। जिन हिन्दू परिवारों ने अपनी बहन-बेटियों को पाल-पोष कर बड़ा किया था, उनके सामने ही उनका जबरन धर्मांतरण कर मुस्लिमों से निकाह करा दिया गया।

बाबासाहब आंबेडकर ने इसे हिन्दू-मुस्लिम दंगा मानने से इनकार करते हुए कहा था कि हिन्दुओं की मौत का कोई आँकड़ा नहीं है, लेकिन ये संख्या बहुत बड़ी है। आप इतिहास में जहाँ भी मोपला के बारे में पढ़ेंगे, आपको बताया जाएगा कि ये एक ‘कृषक विद्रोह था’, अंग्रेजों के खिलाफ था। लेकिन, इसकी आड़ में ये छिपाया जाता है कि किस तरह हजारों हिन्दुओं को मौत के घाट उतार दिया गया था।

इस्लामी आतंकी हमले में 59 नागरिकों सहित 80 की मौत: बुर्किना फासो के राष्ट्रपति ने घोषित किया 3 दिन का शोक

अफ्रीकी देश बुर्किना फासो में हुए आतंकी हमले में अब तक 59 नागरिकों के साथ 80 लोग अपनी जान गँवा चुके हैं। देश के राष्ट्रपति रोच मार्क काबोर ने तीन दिनों के राष्ट्रीय शोक की घोषणा की है।

The guardian की रिपोर्ट्स के मुताबिक, सरकार ने गुरुवार (19 अगस्त) जानकारी दी कि उत्तरी शहर गोरगडजी (Gorgadji) के पास बुधवार को इस्लामी आतंकियों ने एक काफिले पर घात लगाकर हमला कर दिया। इस हमले में 6 स्वयंसेवी रक्षा लड़ाकों, 15 सैनिकों के साथ 59 नागरिक मारे गए थे। वहीं, बुधवार को शुरुआती मौत का आँकड़ा 47 बताया गया था।

बुर्किना फासो में हुए इस हमले की अभी तक किसी भी आतंकी समूह ने जिम्मेदारी नहीं ली है, लेकिन अल-कायदा और आईएसआईएस जुड़े आतंकवादी पश्चिम अफ्रीकी देश में सुरक्षाबलों पर अक्सर हमले करते रहे हैं।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, सैनिक और स्वयंसेवी रक्षा लड़ाके उत्तरी बुर्किना के एक अन्य शहर अरबिंदा के लिए रवाना होने वाले नागरिकों की रखवाली कर रहे थे। तभी जिहादियों ने घात लगाकर उन पर हमला कर दिया। सरकार के मुताबिक, सुरक्षा बलों ने मुठभेड़ में 58 आतंकवादियों को मार गिराया और बाकी को विमान में डाल अपने साथ ले गए। उन्होंने बताया कि इस मुठभेड़ में 19 लोग घायल भी हुए हैं। बचाव और राहत कार्य जारी है।

गौरतलब है कि आतंकी हमलों की वजह से पूरे देश में अशांति का माहौल है। बिना आधुनिक हथियारों के यहाँ की सेना आतंकियों से लोहा ले रही है। जुलाई 2021 में यहाँ व्यापक विरोध प्रदर्शन हुए, जिसके बाद सरकार पर दबाव बढ़ा। इसके चलते राष्ट्रपति रोच मार्क ने अपने रक्षा और सुरक्षा मंत्रियों को बर्खास्त कर दिया। इसके बाद उन्होंने खुद को रक्षा मंत्री नियुक्त किया।

बता दें कि बुर्किना फासो एक ऐसा देश है, जहाँ कई आतंकी संगठन सक्रिय हैं। बुर्किना फासो के पड़ोसी देश माली और नाइजर हैं, जहाँ अक्सर आतंकी हमले होते रहते हैं। पश्चिम अफ्रीका के साहेल क्षेत्र में सबसे अधिक आतंकी हमले होते हैं। यह पिछले दो हफ्तों में बुर्किना के सैनिकों पर तीसरा बड़ा हमला था, जिसमें नाइजर सीमा के पास 4 अगस्त को एक हमला भी शामिल था। इस हमले में 11 नागरिकों सहित 30 लोग मारे गए थे।

‘दो पैसे की प्याली गई, पर कुत्ते की जात पहचानी गई’: कुमार विश्वास का ट्वीट, मुनव्वर राना को क्यों पड़ रही गाली?

देश में ऐसे लोगों की संख्या बढ़ती जा रही है जो तालिबान का महिमामंडन कर रहे हैं। कई मुस्लिम धर्मगुरु और नेता तालिबान की प्रशंसा करते फूले नहीं समा रहे हैं, ऐसे में लोकप्रिय कवि कुमार विश्वास ने ट्वीट करके ऐसे लोगों को लताड़ लगाई है।

विश्वास ने ट्वीट करके कहा, “ज्यादा दिमाग न लगाइए। अगर पड़ोस के घर में मची अफरा-तफरी के कारण, जिंदगी भर आपसे इज्जत पाने वाले और आपके घर में रह रहे, बदबूदार सोच से भरे किसी जाहिल शख्स का पर्दाफाश हो रहा है तो शोक नहीं, शुक्र मनाइए कि दो पैसे की प्याली गई (वो भी पड़ोसियों की), पर कुत्ते की जात पहचानी गई।”

हालाँकि विश्वास ने अपने ट्वीट में किसी का नाम नहीं लिया लेकिन सोशल मीडिया यूजर इसी बहाने शायर मुनव्वर राना को निशाने पर ले रहे हैं। कई यूजर्स का मानना है कि कुमार विश्वास ने बिना नाम लिए मुनव्वर राना के लिए ही यह बात कही है।

मुनव्वर राना ने कहा था कि तालिबानी आतंकी नहीं हैं बल्कि उन्होंने अपने मुल्क को आजाद कराया था। इस पर गीतकार मनोज मुंतशिर ने भी अपनी आपत्ति जताई थी और कहा था, “फिर तो आज़ाद कश्मीर की माँग करने और वादी में बेगुनाहों का खून बहाने वाले भी आतंकवादी नहीं हैं। राना साहब, मजबूर कर रहे हैं आप कि मैं अपनी लाइब्रेरी से आपकी किताबें हटा दूँ। बाज़ आ जाइए!”

ज्ञात हो कि ‘न्यूज नेशन’ चैनल पर दीपक चौरसिया से बात करते हुए राना ने तालिबान का महिमामंडन किया था और कहा था कि तालिबान ने भारतीयों के खिलाफ कोई खराब कदम नहीं उठाया और उन्हें जाने के लिए नहीं कहा, लेकिन हालात बिगड़ने पर लोग आ रहे हैं। मुनव्वर राना ने कहा कि तालिबान के जुल्म को लेकर हमें परेशान होने की ज़रूरत नहीं है, लेकिन अफगानिस्तान के हजार वर्ष का इतिहास कहता है कि हिंदुस्तान ने उनसे हमेशा मोहब्बत की है। यहाँ तक कि उन्होंने भगवान वाल्मीकि की तुलना तालिबान से कर डाली और कहा कि वाल्मीकि रामायण लिख देता है तो वो देवता हो जाता है, उससे पहले वो डाकू होता है। इंसान का कैरेक्टर बदलता रहता है।

कालीघाट मंदिर: जहाँ से दूर हुई थी भागीरथी नदी, माना जाता है सबसे सिद्ध काली मंदिर… 51 शक्तिपीठों में से एक

ऑपइंडिया की मंदिर श्रृंखला में हाल ही में दक्षिणेश्वर काली मंदिर के बारे में जानकारी दी गई थी, जिसका निर्माण एक विधवा महिला रानी रासमणि द्वारा कराया गया था। कोलकाता में ही एक और प्रसिद्ध काली मंदिर है, जो कालीघाट के नाम से जाना जाता है। यह भारत का सबसे प्रसिद्ध और सिद्ध काली मंदिर है, जो 51 शक्तिपीठों में से एक है।

मंदिर का इतिहास

भारत में शक्तिपीठों का सर्वाधिक महत्व है। ये शक्तिपीठ ऐसे स्थान हैं, जहाँ माता सती की मृत देह के अंग गिरे थे। ये स्थान पूरे भारत समेत पड़ोसी देशों जैसे बांग्लादेश और नेपाल में भी स्थित हैं। कोलकाता के कालीघाट मंदिर में माता सती के दाहिने पैर का अँगूठा गिरा था। तब से ही यह स्थान शक्तिपीठ माना जाता है।

वर्तमान दृश्य मंदिर की स्थापना सन् 1809 में हुई थी। यह मंदिर कोलकाता के सबर्ण रॉय चौधरी नामक धनी व्यापारी के सहयोग से पूरा हुआ। इसके अलावा 15वीं और 17वीं शताब्दी की कुछ रचनाओं में भी इस मंदिर का जिक्र मिलता है। कालीघाट मंदिर में गुप्त वंश के कुछ सिक्के मिलने के बाद यह पता चलता है कि गुप्त काल के दौरान भी इस मंदिर में श्रद्धालुओं का आना-जाना बना हुआ था।

कोलकाता के कालीघाट मंदिर के बारे में सबसे खास बात यह है कि पहले यह मंदिर हुगली (जिसे भागीरथी भी कहा जाता था) के किनारे स्थित था। लेकिन समय के साथ भागीरथी, मंदिर से दूर होती चली गई। अब यह मंदिर आदिगंगा नाम की नहर के किनारे पर स्थित है, जो अंततः हुगली नदी से जाकर मिलती है।

मंदिर के विषय में अन्य जानकारियाँ

मोनोशा ताल, जोर बांग्ला, नट मंदिर, हरकथ ताल और राधा कृष्ण मंदिर भी कालीघाट मंदिर का ही हिस्सा हैं। मंदिर परिसर में ही कुंडुपुकुर स्थित है, जो एक जलकुंड है। माता सती का दाहिना अँगूठा इसी कुंड में से मिला था। मंदिर के गर्भगृह में स्थापित माँ काली की प्रतिमा अद्भुत और अद्वितीय है। इस प्रतिमा का निर्माण दो संतों आत्माराम ब्रह्मचारी और ब्रह्मानंद गिरी ने किया था। पत्थर को तराश कर बनाई गई इस माँ काली की इस प्रतिमा की तीन बड़ी आँखें हैं, साथ ही चार स्वर्ण भुजाएँ भी हैं। इसके अलावा माँ काली के हमेशा से पूज्य स्वरूप के अनुसार प्रतिमा की जीभ भी बाहर निकली हुई है, जो सोने की है।

पश्चिम बंगाल, प्रसिद्ध दुर्गा पूजा उत्सव के लिए जाना जाता है। कालीघाट मंदिर में भी यह उत्सव बड़े ही धूमधाम से मनाया जाता है। नवरात्रि में इस मंदिर का महत्व बढ़ जाता है। देश के कोने-कोने से आने वाले श्रद्धालु नवरात्रि के दौरान घंटों लाइनों में व्यतीत करते हैं ताकि माँ काली का दर्शन कर सकें। मंगलवार और शानिवार के साथ अष्टमी को कालीघाट मंदिर में विशेष पूजा की जाती है।

कैसे पहुँचें?

कोलकाता देश के चार प्रमुख महानगरों में से एक है, ऐसे में यहाँ पहुँचने के लिए परिवहन के साधनों की अनुपलब्धता का कोई प्रश्न ही नहीं उठता। कालीघाट मंदिर से कोलकाता के नेताजी सुभाष चंद्र बोस अंतरराष्ट्रीय हवाईअड्डे की दूरी लगभग 25 किलोमीटर (किमी) है।

प्रसिद्ध हावड़ा जंक्शन, कालीघाट मंदिर से मात्र 10 किमी दूर है। कोलकाता पहुँचने के बाद मंदिर पहुँचना काफी आसान है और माना जाता है कि कोलकाता जाकर भी अगर दक्षिणेश्वर काली माता मंदिर और कालीघाट की यात्रा न की तो यात्रा अधूरी ही मानी जाएगी।

फुटबॉलर मेसी ने जिस टिश्यू से पोछे आँसू, उसकी ऑनलाइन नीलामी में ₹74363300 की बोली

अर्जेंटीना के महान फुटबालर लियोनेल मेसी ने फुटबॉल जगत से संन्यास ले लिया है। उनके जाने से बार्सिलोना से पेरिस सेंट जर्मेन (PSG) तक फुटबॉल जगत को तगड़ा झटका लगा है। उनके फैंस भावुक हो उठे हैं। इस बीच अपने विदाई समारोह के दौरान भावुक हुए मेस्सी ने जिन टिश्यू पेपर से अपने आँसुओं को पोंछा था, उन्हें अब बेचा जा रहा है। इसकी कीमत 1 मिलियन डॉलर ( 7,43,63,300 रुपए) रखी गई है।

रिपोर्ट के अनुसार, मेसी की यादगार वस्तुओं की माँग आसमान छू रही है। उनके द्वारा इस्तेमाल किए गए टिश्यू एक लोकप्रिय वेबसाइट Mercado Libre तक पहुँच गए हैं, जहाँ प्रशंसकों के लिए यह अत्यधिक कीमत पर उपलब्ध है। कम्प्लीट स्पोर्ट्स के अनुसार, उनकी भावनात्मक प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद एक अनाम व्यक्ति ने आँसू से भीगे हुए टिश्यू को इकट्ठा किया और यह कहते हुए ऑनलाइन विज्ञापन पोस्ट किया कि अगर सही कीमत आएगी तो इसे बेचा जाएगा।

लैडबिल स्पोर्ट्स ने कहा है कि ऑनलाइन विक्रेता ने कैप्शन में भारी भरकम कीमत को सही ठहराते कहा है कि छोड़े गए टिश्यू में ‘मेस्सी का आनुवंशिक मेटेरियल है’, जिसका उपयोग मेसी जैसे अन्य फुटबॉलर को ‘क्लोन’ करने के लिए किया जा सकता है। हालाँकि, जिस मर्काडो लिब्रे वेबसाइट पर सेलिंग के लिए इसे लिस्टेड किया गया था, वर्तमान में वहाँ उपलब्ध नहीं है। अब केवल उस विज्ञापन के स्क्रीनशॉट सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे हैं।

Minutouno.com के मुताबिक, न केवल ‘मूल’ टिश्यू पेपर बेचा जा रहा है, बल्कि अब इसकी कॉपी भी वर्तमान में ऑनलाइन बेची जा रही हैं। एक ऑनलाइन वेबसाइट मिलोंगा कस्टम्स ने लियोनेल मेसी के टिश्यूज की एक प्रतिकृति को एक संग्रहणीय वस्तु के रूप में लॉन्च किया, जिसे बड़े करीने से प्लास्टिक की चादर में बॉक्स किया गया था, इसके साथ स्टार फुटबॉलर की भावुक होने की एक तस्वीर भी थी।

मिलोंगा कस्टम के अनुसार, “लोगों ने में रोते हुए मेसी का रुमाल दिलवाया !! हम इसे फ्लोरेंसियो वेरेला में बेच रहे हैं।”

इतना ही नहीं मेसी की बार्सिलोना की पुरानी जर्सी और कोपा अमेरिका की प्रतिकृतियों ने लोगों के घ्यान को अपनी ओर खींचा है। उनकी पीएसजी जर्सी की भी भारी मांग है। पीएसजी के आधिकारिक परिसर के बाहर प्रशंसकों की लंबी लाइनें लगी हुई है। फैंस मेस्सी की 30 नंबर और पीछे लिखे हुए टी पहनने के लिए कई घंटों तक इंतजार कर रहे हैं।

सपा नेता चौधरी बशीर को तीसरी बीवी ने पहुँचाया जेल, छठे निकाह से पहले तलाक दे भगाया था

उत्तर प्रदेश के आगरा के थाना मंटोला में कुछ दिन पहले समाजवादी पार्टी नेता व पूर्व मंत्री चौधरी बशीर के ख़िलाफ़ तीन तालक के तहत केस दर्ज हुआ था। अब इसी मामले में ताजा जानकारी है कि पूर्व मंत्री को गुरुवार (अगस्त 19, 2021) को गिरफ्तार करके जेल भेज दिया गया है। इससे पहले कोर्ट ने पूर्व मंत्री की अग्रिम जमानत याचिका को खारिज किया था। इसके बाद कथिततौर पर उन्होंने खुद थाने आकर आत्मसमर्पण किया।

एसएसपी मुनिराज ने बताया कि तीन तलाक के केस में आरोपित पूर्व मंत्री चौधरी बशीर को थाना मंटोला पुलिस ने गिरफ्तार करने के बाद कोर्ट में पेश किया, जहाँ से उन्हें जेल भेजा गया है। विवेचना के बाद चार्जशीट लगाई जाएगी। अमर उजाला की रिपोर्ट के अनुसार, जिला जेल में चौधरी बशीर को बैरक नंबर 14 में रखा गया है। इसमें 50 से अधिक बंदी हैं। इस बैरक में आरोपित पूर्व मंत्री चौधरी बशीर को बंदियों के साथ फर्श पर सोना होगा। उनके खिलाफ दिल्ली में पूर्व विधायक के परिवार की महिला ने धोखाधड़ी का मुकदमा दर्ज कराया था। मंटोला पुलिस अब इस मुकदमे की भी जानकारी ले रही है। इसमें भी उनका वारंट बनवाया जा सकता है।

उल्लेखनीय है कि कुछ दिन पहले समाजवादी पार्टी नेता की तीसरी पत्नी नगमा ने उनके विरुद्ध उत्पीड़न का मुकदमा दर्ज करवाया था। पीड़िता का कहना था कि 23 जुलाई को बशीर शाइस्ता नाम की महिला से छठा निकाह कर रहा था, जब उन्होंने ऐसा करने से उसे रोका तो बशीर ने सबके सामने उन्हें तीन तलाक बोलकर भगा दिया। दोनों के दो बेटे हैं।

नगमा ने शिकायत दर्ज करवाते हुए अपनी सेफ्टी के लिए पुलिस सुरक्षा की माँग की थी। उनका कहना था कि निकाह के बाद से ही शौहर और ननदों ने उनका शारीरिक व मानसिक शोषण शुरू कर दिया था। इसीलिए अब तंग आकर वह कार्रवाई चाहती हैं। पुलिस ने नगमा की शिकायत पर मुकदमा दर्ज कर लिया था। मामले में जाँच की जा रही थी।

नगमा ने शिकायत में कहा था कि उनका शौहर बीवियाँ बदलने के लिए कोई भी रूप धारण कर लेता है। एक बार तो उन्होंने हिंदू लड़की से शादी के लिए हिंदू का चोला पहना था। नगमा ने अपने इस दावे के प्रमाण भी दिए। उन्होंने हिंदू महिला के साथ उनकी (बशीर) शादी की तस्वीरें दिखाईं, जिसमें नजर आ रहा था कि बशीर ने माथे पर टीका लगाया हुआ है। इसके अलावा एक तस्वीर ऐसी भी थी जिसमें उन्होंने ‘जय माता दी’ की पट्टी माथे पर बाँधी है।

नगमा ने अपने शौहर के लिए कहा था, “वह आदमी नहीं हैवान है, उसने मुझसे पहले भी कई औरतों की जिंदगी बर्बाद की है।” उनके मुताबिक, बशीर की मुस्लिम समाज में अच्छी पैठ है। इसी का फायदा उठा कर वह हर बार चुनाव लड़ता है। पूर्व में उसके ख़िलाफ़ लोगों को भड़काने का मुकदमा भी दर्ज हुआ था। पिछले साल उसने बकरीद पर दंगा करवाने की कोशिश की थी, मगर वीडियो वायरल होने पर दो केस दर्ज हुए थे।

‘4 लोगों की निजी कंपनी बन गई संयुक्त किसान मोर्चा, राजनीतिक दल कर रहे फंडिंग’: अपनों ने किसान आंदोलन की खोली पोल

केंद्र सरकार के तीन कृषि कानूनों के खिलाफ दिल्ली की सीमाओं पर लगातार प्रदर्शन कर रहे कथित किसानों की पोल खुलने लगी है। तीन कृषि कानूनों के खिलाफ विरोध प्रदर्शन के पीछे हो रही साजिश का पर्दाफाश करने के लिए दो किसान नेता आगे आए हैं। अखिल भारतीय स्वामीनाथन संघर्ष समिति के प्रदेश अध्यक्ष विकाल पचर ने 40 किसान संघों की अंब्रेला संस्था संयुक्त किसान मोर्चा (एसकेएम) को 4 लोगों की निजी कंपनी बताया है और आरोप लगाया है कि इसे राजनीतिक दलों द्वारा फंडिंग की जा रही है।

पचर ने टाइम्स नाउ को बताया, “एसकेएम आज राकेश टिकैत, योगेंद्र यादव, दर्शन पाल, बलबीर राजेवाल की प्राइवेट लिमिटेड कंपनी है।” उन्होंने आगे कहा कि उनका विरोध तीन कृषि कानूनों के खिलाफ था, लेकिन इन लोगों का ध्यान उत्तर प्रदेश और पंजाब में होने वाले चुनावों पर है।

‘योगेंद्र यादव किसान नहीं हैं’

राष्ट्रीय किसान मोर्चा के वीएम सिंह ने दावा किया कि कुछ लोग मामले को सुलझाने के लिए केंद्र सरकार से बातचीत करने के बजाय विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। उन्होंने खुलासा किया कि योगेंद्र यादव किसानों के विरोध प्रदर्शनों का इस्तेमाल अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए कर रहे हैं।

वीएम सिंह ने राकेश टिकैत की पोल खोलते हुए कहा, “राकेश टिकैत वही आदमी हैं, जो कानून आने से पहले ही कृषि कानूनों को लेकर खुश थे।”

पचर ने कहा कि संयुक्त किसान मोर्चा राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं के कारण 2024 तक विरोध करना चाहता है। सिंह ने आरोप लगाया कि संयुक्त किसान मोर्चा केंद्र सरकार से तब तक बात नहीं करेगा, जब तक कि वे इन पार्टियों को चुनाव में जीत नहीं दिला देते हैं।

चर्चा के लिए हमारे दरवाजे हमेशा खुले: कृषि राज्यमंत्री

विरोध प्रदर्शनों पर प्रतिक्रिया देते हुए केंद्रीय कृषि राज्यमंत्री कैलाश चौधरी ने कहा, “किसानों के लिए हमारे दरवाजे हमेशा चर्चा खुले हैं, ताकि कृषि कानूनों के इस मुद्दे को हल किया जा सके।” मंत्री ने याद दिलाया कि राकेश टिकैत ने खुद ही कृषि कानूनों को पास करने पर पीएम मोदी को बधाई देते हुए कहा था कि 27 साल बाद महेंद्र टिकैत की आत्मा को शांति मिलेगी।

इस साल जनवरी में राकेश टिकैत ने किसानों के आंदोलन को वैचारिक आंदोलन करार देते हुए कहा था कि किसान मई 2024 तक केंद्र के नए कृषि कानूनों का विरोध करने के लिए तैयार हैं। बता दें कि केंद्र सरकार द्वारा लाए गए तीन कृषि सुधार कानूनों के खिलाफ किसान संगठन 26 नवंबर 2020 से दिल्ली की सीमाओं पर विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं।

घर-घर 12 साल की लड़कियों की तलाश, जबरन निकाह कर रहे तालिबानी, औरतों की तस्वीरों पर पोत रहे कालिख: रिपोर्ट्स

भारत का लिबरल जमात इस बात पर खुश है कि तालिबान ने प्रेस कॉन्फ्रेंस की। औरतों को अधिकार देने की बात कही है। यशवंत सिन्हा जैसे नेता हों या देवबंद का मुफ्ती, यह साबित करने पर अमादा हैं कि इस बार तालिबान पहले जैसा नहीं है। कुछ यही राग पाकिस्तान और चीन भी अलाप रहा है। दूसरी तरह अफगानिस्तान से जो रिपोर्ट आ रही हैं, वह बताती हैं कि शरिया की आड़ में इस्लामी कट्टरपंथी औरतों को उसी जलालत भरी जिंदगी में फिर से धकेल रहे हैं, जिनसे उन्हें करीब दो दशक पहले आजादी मिली थी।

अफगानिस्तान में तालिबान के घुसने के बाद अब बच्चों से लेकर औरतों तक पर अत्याचार जारी है।  रिपोर्ट्स सामने आ रही हैं कि नए तालिबान में भी सबसे ज्यादा खतरा औरतों को ही है। 90 के दशक में तालिबान की ऐसी ही नीतियों ने औरतों का दमन किया था और अब दोबारा वही काल लौट आया है। लड़कियों को चिह्नित कर घर से उठाया जा रहा। न 12 साल की लड़की छोड़ी जा रही है न 45 साल की औरत। उन्हें ढूँढ-ढूँढ कर निकाह के लिए उठाया जा रहा है और फिर उन्हें सेक्स स्लेव बनाया जा रहा है।

नए तालिबान में महिलाओं को चुस्त कपड़े पहनने की आजादी तो छोड़ दीजिए, बुर्का न पहनने पर मौत की सजा है। इसी तरह लड़कियों का पढ़ना, लिखना, नौकरी करना सब तालिबान के लिए हराम है। घर की अलमारियों से लेकर दराजों और सूटकेस तक में तालिबानी चेक कर रहे हैं कि कोई लड़की उनसे बच न जाए।

औरतों को समान अधिकारों की जो बातें कैमरे के सामने हो रही हैं, वो भी फर्जी मालूम पड़ती हैं। टीवी एंकर शबनम दावरन कहती हैं कि महिलाओं को नौकरी से निकाला जा रहा है। इंडिया टुडे को दिए इंटरव्यू में शबनम ने बताया कि वह सरकार द्वारा संचालित RTA पश्तू में काम करती थीं। लेकिन काबुल में तालिबान के घुसने के अगले दिन जब वो दफ्तर गई तो उन्हें काम पर दोबारा न आने को कहा गया। उन्होंने पूछा कि ऐसा क्यों तो उन्होंने कहा कि तालिबान राज आ गया है अब RTA में महिलाएँ काम नहीं करेंगी। उनके पुरुष साथियों ने उन्हें कहा, “तुम लड़की हो, जाओ अपने घर जाओ।”

इतना ही नहीं अफगानिस्तान में अब कई जगहों पर ब्यूटी पार्लर और शोरूम्स में लगे महिलाओं के पोस्टर पर सफेद रंग चढ़ाया जा रहा है या फिर उन पर कालिख पोती जा रही है। अफगानिस्तान की पहली महिला मेयर जरीफा गफारी कहती हैं कि उनकी और उनके परिवार की सहायता करने के लिए कोई नहीं है, वो अपने परिवार के साथ हैं और उन्हें पता है कि तालिबानी आएँगे और उन्हें मार देंगे।

अफगानिस्तान की राष्ट्रीय महिला फुटबॉल टीम की पूर्व कप्तान खालिदा पोपल भी तालिबान के डर से सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स से अपनी फोटो हटा रही हैं। उन्होंने टीम की सदस्यों से कहा है कि वे अपने घर छोड़कर भाग जाएँ और अपने इतिहास को मिटाने की कोशिश करें।

इसके अलावा हजारा समुदाय, जो कि शिया मुसलमानों का एक समूह है, उसके लोग तालिबान की किसी प्रेस कॉन्फ्रेंस आदि पर भरोसा नहीं कर पा रहे। तालिबानी उनकी बेटियों से जबरन निकाह कर रहे हैं। दुखद बात ये है कि जिस समय तालिबान टीवी पर शांति संदेश भेज रहा था उसी समय हजारा नेता अब्दुल अली मजारी की मूर्ति तोड़े जाने की खबर आई। ऐसे ही आज सुबह से सोशल मीडिया पर एक वीडियो घूम रही है। वीडियो में महिलाएँ अपने बच्चों को कंटीली तारों के ऊपर फेंक रही हैं और अमेरिकी सैनिकों से मदद की गुहार लगा रही हैं। वो बार बार कह रही हैं। उन्हें बचाया जाए तालिबान आ रहा है।

ट्विटर ने अफगानिस्तान के कार्यवाहक राष्ट्रपति अमरुल्लाह सालेह से जुड़े अकाउंट्स को किया बंद, तालिबान धड़ल्ले से कर रहा है प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल

अफगानिस्तान में तालिबान के कब्जे के बाद अब माइक्रो ब्लॉगिंग प्लेटफॉर्म ट्विटर ने भी 19 अगस्त 2021 को अफगानिस्तान के कार्यवाहक राष्ट्रपति अमरुल्लाह सालेह के खिलाफ कार्रवाई करते हुए उनसे जुड़े सभी अकाउंट्स को बंद कर दिया है। @Afghanpresident और उनकी पार्टी अफगानिस्तान ग्रीन ट्रेंड (AGT) के हैंडल @AfgGreenTrend को माइक्रो-ब्लॉगिंग साइट द्वारा निलंबित कर दिया गया है। कथित तौर पर सालेह अभी भी अफगानिस्तान के कब्जे के खिलाफ मुकाबला करने के लिए सेना को एकत्रित कर रहे हैं। वह वर्तमान में पंजशीर प्रांत में हैं, जहाँ अभी तक तालिबान का कब्जा नहीं हो पाया है।

अमरुल्लाह सालेह का अकाउंट्स ट्विटर ने बंद किया

खास बात यह है कि जहाँ ट्विटर ने सालेह से जुड़े अकाउंट्स को निलंबित कर दिया है, वहीं तालिबान के प्रवक्ता का अकाउंट्स अभी भी प्लेटफॉर्म पर एक्टिव है। उल्लेखनीय है कि ट्विटर पर कई तालिबानी नेताओं के अकाउंट उपलब्ध हैं। तालिबान का प्रवक्ता जबीहुल्लाह मुजाहिद अपने ट्विटर अकाउंट को नवीनतम सूचनाओं के साथ सक्रिय रूप से अपडेट कर रहा है। माइक्रो ब्लॉगिंग साइट पर उसके 3,00,000 से अधिक फॉलोवर्स हैं। एक अन्य प्रवक्ता सुहैल शाहीन के भी 3,00,000 से अधिक फॉलोवर्स हैं, जबकि कारी यूसुफ अहमदी के ट्विटर पर लगभग 60,000 फॉलोवर्स हैं।

तालिबानी नेताओं के ट्विटर अकाउंट

फेसबुक और यूट्यूब ने तालिबान और उसके फॉलोवर्स से जुड़े अकाउंट्स पर तेजी से प्रतिबंध लगाना शुरू कर दिया है, वहीं ट्विटर ने कट्टरपंथी इस्लामिक संगठन पर ऐसी कार्रवाई करने से इनकार कर दिया है। कंपनी ने कहा है कि वो तालिबान के खातों की लगातार निगरानी कर रही है और अगर वे ‘सीमा पार करते हैं’ तो जिहादी समूह के खिलाफ कार्रवाई होगी।

गौरतलब है कि फेसबुक ने तालिबान पर प्रतिबंध की घोषणा करते हुए कहा था कि तालिबान को अमेरिकी कानूनों के अनुसार एक आतंकवादी संगठन घोषित किया गया है। इसलिए वह फेसबुक, व्हाट्सएप और इंस्टाग्राम सहित अपने सभी प्लेटफॉर्मों से तालिबान से जुड़े सभी खातों और सामग्री को हटा देगा।

‘धर्म के खिलाफ नफरत नहीं करेंगे बर्दाश्त’: स्वरा भास्कर पर असम में FIR, तालिबानी ‘प्रेम’ में ‘हिंदुत्व’ के लिए उगला था जहर

तालिबानियों के आतंक की तुलना ‘हिंदुत्व’ से किए जाने पर बॉलीवुड अभिनेत्री स्वरा भास्कर के ख़िलाफ़ अब हिंदू आईटी सेल ने एफआईआर दर्ज करवाई है। ये एफआईआर असम के हाथीगाँव (Hatigaon) थाने में हुई है। इस मामले पर समूह के रिक्रूटमेंट हेड सांतनु साकिया (Santanu Sakia) द्वारा तहरीर दी गई थी।

असम में हुई एफआईआर की कॉपी

इस मामले में शिकायत मिलने के कुछ घंटे के बाद पुलिस ने एफआईआर कर ली। जानकारी के मुताबिक, स्वरा भास्कर के ख़िलाफ़ धारा 67 ए और 295 ए के तहत केस दर्ज हुआ है। असम के अलावा हिंदू आईटी सेल की ओर से इस मामले पर एक एफआईआर गुजरात में भी दर्ज हुई है।

गुजरात से हुई शिकायत

हिंदू आईटी सेल के सोशल मीडिया कॉर्डिनेटर अक्षित सिंह बताते हैं कि समूह कानूनी तरीके से धर्म के लिए काम करता है। अभी तक इस समूह ने तकरीबन 500 शिकायतें करवाई हैं और इनमें 24 में एफआईआर भी हुई है। इस प्लेटफॉर्म के फाउंडर विकास पांडे और रमेश सोलंकी हैं। स्वरा भास्कर मामले में हिंदू आईटी सेल का पक्ष साफ है कि वो अपने धर्म के विरुद्ध किसी भी प्रकार की नफरत को बर्दाश्त नहीं करेंगे।

बता दें कि अफगानिस्तान में तालिबानियों के कब्जे के बाद स्वरा भास्कर ने अपने ट्वीट में लिखा था, “हम तालिबान के आतंक पर हैरानी और दुःख जताते हुए ‘हिंदुत्व आतंकवाद’ की तारीफ नहीं कर सकते। ऐसा भी नहीं हो सकता कि हम तालिबान के आतंक पर चुप बैठें और ‘हिंदुत्व आतंकवाद’ पर आक्रोश जताएँ। हमारे मानवीय व नैतिक मूल्य इस पर आधारित नहीं होने चाहिए कि अत्याचारी कौन है और पीड़ित कौन है।”

उल्लेखनीय है कि इससे पहले बॉम्बे हाईकोर्ट में प्रैक्टिस करने वाले वकील आशुतोष दुबे ने भी स्वरा भास्कर के खिलाफ मुंबई पुलिस और पालघर पुलिस में शिकायत दर्ज कराई थी। उन्होंने कहा था कि वह जल्द ही स्थानीय पुलिस स्टेशन में भी अभिनेत्री के खिलाफ शिकायत दर्ज कराएँगे। उनके ट्वीट पर पालघर पुलिस ने जवाब देते हुए मामले की जाँच करने और उचित कार्रवाई करने की बात कही थी।