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तालिबानी आतंकियों के कब्जे में कुंदुज एयरपोर्ट: भारत द्वारा अफगान सेना को दिए MI-35 अटैक हेलीकॉप्टर किया सीज, इंजन गायब

अफगानिस्तान में तालिबानी आतंकी एक के बाद एक शहर पर कब्जा करते जा रहे हैं। बुधवार (11 अगस्त) को तालिबानी आतंकियों ने अफगान के कुंदुज प्रांत के भी अधिकतर हिस्से पर कब्जा जमा लिया है। यानी अब कुंदुज एयरपोर्ट भी अफगानिस्तान के हाथ से निकल गया है। यही नहीं भारतीय वायु सेना द्वारा अफगान सेना को गिफ्ट किया गया Mi-35 हिंद अटैक हेलिकॉप्टर को भी तालिबानी आतंकियों ने अपने कब्जे में ले लिया है। एमआई-35 को रूस द्वारा डिजाइन किया गया था।

कब्जे वाले एयरपोर्ट से इसकी वीडियो और तस्वीरें सामने आई हैं, जिसमें तालिबानी आतंकी गनशिप की रखवाली कर रहे हैं। हालाँकि, हेलीकॉप्टर के इंजन के रोटर ब्लेड और महत्वपूर्ण पार्ट्स गायब दिख रहे हैं। वीडियो और फोटो को बारीकी से देखने पर पता चलता है कि रोटर ब्लेड जमीन पर, हेलीकॉप्टर के नीचे रखे गए थे।

रक्षा विश्लेषक जोसेफ डेम्पसी (Joseph Dempsey) के अनुसार, 14 जुलाई को सेटेलाइट फोटो में कुंदुज के हैंगर में अपने रोटर ब्लेड के साथ एक एमआई-35 अटैक हेलीकाप्टर खड़ा दिखाई दिया था, लेकिन कल यानी 10 अगस्त को क्लिक की गई फोटो में बिना रोटर ब्लेड के हेलीकॉप्टर दिखाई दिया। इसलिए, यह अनुमान लगाया जा रहा है कि अफगान सेना ने तालिबान आतंकियों से हारने का अनुमान लगा लिया था, जिसके चलते उन्होंने हेलीकॉप्टर के पुर्जे हटा दिए।

साथ ही यह भी अनुमान लगाया जा रहा है कि इसके रोटर ब्लेड को हटाने के अलावा ये भी हो सकता है कि अफगान वायु सेना ने ही हेलीकॉप्टर से उसके इंजन को अलग कर दिया होगा। ताकि उसका प्रयोग ना किया जा सके। हालाँकि, इसकी पुष्टि नहीं की जा सकती है। हेलीकॉप्टर के पास खड़े तालिबानी आतंकवादियों की तस्वीर में इसके आसपास रखे रोटर ब्लेड्स भी दिख रहे हैं। भारतीय रक्षा विशेषज्ञ मनु पब्बी के अनुसार, यह संभव है कि अफगान वायु सेना अन्य हेलीकॉप्टरों की मरम्मत के लिए इनके पार्ट्स का इस्तेमाल कर रही हो।

तालिबान ने कथित तौर पर इस हफ्ते कुंदुज एयरपोर्ट, अफगान सेना के ठिकानों के साथ-साथ उत्तरपूर्वी शहर कुंदुज पर भी पूरी तरह से कब्जा कर लिया। कुंदुज राजनीतिक दृष्टिकोण से काफी महत्वपूर्ण प्रांत माना जाता है। यह शहर उत्तरी प्रांतों और मध्य एशिया के प्रवेश द्वार पर स्थित है। तालिबान के प्रवक्ता जबीहुल्ला मुजाहिद ने कहा कि उसके लोग एयरपोर्ट के करीब हैं। आज, तालिबानी आतंकवादियों ने एयरपोर्ट पर कब्जा कर लिया और कुंदुज एयरपोर्ट पर अफगान सेना के मुख्यालय सहित अफगानिस्तानी सेना से उसका नियंत्रण भी छीन लिया है।

सोशल मीडिया यूजर्स के मुताबिक एयरपोर्ट पर एक सिविलियन प्लेन भी मौजूद था। अफगान नेशनल आर्मी की 217वीं कोर का मुख्यालय हवाई अड्डे पर स्थित है, जो अब तालिबान के नियंत्रण में है। रिपोर्ट्स के अनुसार, सैकड़ों अफगान सैनिकों और पुलिस अधिकारियों ने तालिबान के सामने आत्मसमर्पण कर दिया है।

असम में अवैध बांग्लादेशी बदल रहे डेमोग्राफी: जनसंख्या नियंत्रण, गौमांस की बिक्री सहित कई समस्याओं से जूझते हिमंत बिस्वा सरमा

ऐसा लगता है जैसे असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा चुनाव के पूर्व की भाँति उसके उपरांत भी अपने प्रदेश की राजनीतिक बहसें और संवाद नियंत्रित कर रहे हैं। विषय कोई भी हो, अक्सर ऐसा देखा जा रहा है कि उस पर बहस का आरंभ उन्हीं से हो रहा है या फिर किसी सरकारी घोषणा के जरिए उन्हीं के कार्यालय से हो रहा है। जनसंख्या नियंत्रण हो या गौमांस की बिक्री, प्रदेश में रहने वाले अवैध विदेशियों का मुद्दा हो या कानून-व्यवस्था की, बात उन्हीं से शुरू होती दिखाई दे रही है। उनके द्वारा वर्षों से विवादित माने जाने वाले विषयों को लगातार उठाए जाने के बावजूद ऐसा लगता है जैसे प्रदेश में विपक्षी दल अभी भी यह सोचते हुए सकते में हैं कि वे अपनी बात कहाँ से आरंभ करें और कहाँ तक ले जाएँ?

कुछ लोगों के लिए आज यह आश्चर्य और उत्सुकता का विषय है कि एक मुख्यमंत्री जो राजनीति के अपने आरंभिक दिनों से संघ परिवार का सदस्य नहीं रहा, ऐसे में महत्वपूर्ण और पूर्व में विवादित माने गए विषयों पर इतनी बेबाकी से बहस को नेतृत्व कैसे दे रहा है? वैसे पुरानी परंपरा निभाते हुए हमारे राजनीतिक विश्लेषक किसी नेता को राजनीतिक दल या वैचारिक संगठनों से अलग करके नहीं देख पाते पर फिर भी कुछ विश्लेषकों के अनुसार सरमा वर्तमान भारतीय जनता पार्टी में हिंदुत्व की सबसे प्रखर और ऊँची आवाजों में एक हैं।

विश्लेषकों के इन मंतव्यों के पीछे उनके अपने कारण होंगे पर प्रश्न यह उठता है कि मुख्यमंत्री पद ग्रहण करने के उपरांत वे जिन प्रमुख विषयों पर लगातार बड़ी बेबाकी के साथ बोल रहे हैं, उन पर क्या बहस बहुत पहले नहीं होनी चाहिए थी? प्रश्न यह भी उठता है कि इन विषयों पर उत्तर-पूर्वी राज्यों में सबसे बड़े और प्रमुख राज्य की नीति क्या पहले से तय नहीं हो जानी चाहिए थी?

हाल ही में एक टीवी चैनल को दिए साक्षात्कार में सरमा ने साफ़ तौर पर कहा कि वे प्रदेश में अवैध रूप से रहने वाले बांग्लादेशी मुस्लिमों की शिनाख्त करके उन्हें निकालने के लिए वचनबद्ध हैं। उनकी इस बात ने देश में अवैध रूप से घुसे बांग्लादेशी मुस्लिमों के कारण लगातार बदलती डेमोग्राफी के मुद्दे को एक बार फिर से केंद्र में ला खड़ा किया है। यह बहस और नीति का विषय है कि ऐसे लोगों की पहचान करके उन्हें निकलने का तरीका क्या होगा?

पर यह बहस छेड़ना अपने आप में महत्वपूर्ण है, खासकर तब जब प्रदेश में चुनाव नहीं हैं। यह इस बात को दर्शाता है कि मुख्यमंत्री सरमा न केवल बदलती डेमोग्राफी से पैदा होने वाले खतरे को पहचानते हैं बल्कि उसपर खुलकर बहस करने के लिए तैयार भी हैं। ऐसा करते हुए वे जल्दी में भले लग रहे पर यही समय की माँग है। दशकों तक सरकारें और राजनीतिक दल जिस एक मुद्दे से अलग रहने की कोशिश करते रहे हैं, वह मुद्दा और टाला नहीं जा सकता।

इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता कि पिछले पाँच दशकों में लगातार बदल रही डेमोग्राफी असम की सबसे बड़ी समस्या रही है। इसकी वजह से प्रदेश में सामाजिक समरसता के साथ-साथ कानून और प्रशासनिक व्यवस्था को न केवल क्षति हुई है बल्कि आर्थिक, धार्मिक और सुरक्षा सम्बंधित समस्याएँ भी सिर उठा चुकी हैं। इस बात से भी कोई इनकार नहीं कर सकता कि अब तक इस ज्वलंत समस्या पर राजनीतिक दलों और प्रदेश की सरकारों ने चुप्पी साध रखी थी।

ऐसे में यदि वर्तमान मुख्यमंत्री समस्या पर बहस और हल चाहते हैं तो उनकी नीयत पर शक करना तथाकथित सेक्युलर राजनीति को कुछ दिनों के लिए ऑक्सीजन तो दे सकता है पर देश और प्रदेश के वासियों का भला नहीं कर सकता। बदलती डेमोग्राफी के भयंकर परिणाम भले ही कई वर्षों से सामने आते रहे हैं पर सच यही है कि सेक्युलर दलों और उनके नेताओं ने जिस तरह शुतुरमुर्ग की तरह अपने सिर रेत में धँसा रखे हैं, वह न तो भारतीय लोकतंत्र के लिए अच्छा है और न ही सरकारों की संवैधानिक जिम्मेदारियों के लिए।

असम के साथ यह समस्या त्रिपुरा और पश्चिम बंगाल तक पहुँच ही चुकी है। समस्या के सामाजिक और राजनीतिक परिणाम भी दिखाई देने आरंभ हो चुके हैं। हमारे वर्तमान लोकतंत्र का ऐसा कोई स्तंभ नहीं है जो समस्या पर अपनी राय प्रकट न कर चुका हो। राजनीति से शुरू हुई समस्या सर्वोच्च न्यायालय तक पहले ही पहुँच चुकी है। न्यायालय भी इसपर अपने विचार प्रकट कर चुका है।

यह अलग बात है कि पश्चिम बंगाल का वर्तमान सत्ताधारी दल पिछले दो दशकों में समस्या को लेकर अपनी नीति में बदलाव ला चुका है पर ऐसा कितने दिन और संभव हो सकेगा उसपर प्रश्न खड़े होते रहेंगे। अच्छी बात यह है कि असम के मुख्यमंत्री इसपर न केवल बहस के लिए तैयार दिख रहे हैं बल्कि हल की खोजने की दिशा में कदम बढ़ाने के लिए भी तैयार दिखते हैं। यह दीर्घकालीन लोकतंत्र के हित में है कि अवैध रूप से देश में घुसने और रहने वाले विदेशी नागरिकों की वजह से लगातार बदल रही डेमोग्राफी के संभावित परिणामों पर न केवल बहस हो बल्कि इसे रोकने की दिशा में ठोस कदम उठाए जाएँ।

‘केजरीवाल सरकार ने ओलंपिक में करोड़ों के होर्डिंग-बैनर लगाए, खिलाड़ियों को मदद देना जरूरी नहीं समझा’: एथलीट ने लगाए गंभीर आरोप

दिल्ली की केजरीवाल सरकार ने टोक्यो ओलंपिक में भाग लेने वाले दिल्ली के 5 एथलीट्स के केवल बैनर लगाकर इतिश्री कर ली। उन्होंने एथलीट्स को ओलंपिक की तैयारी के लिए कभी कोई आर्थिक सहायता मुहैया नहीं कराई। ऐसा दिल्ली के एक एथलीट सार्थक भांबरी ने कहा है। एथलीट ने दिल्ली सरकार को लेकर अपना रोष व्यक्त किया है। उनका कहना है कि अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व वाली दिल्ली सरकार ने हमें ओलंपिक की तैयारी के लिए कभी कोई आर्थिक मदद नहीं दी।

दरअसल, इस बार देश की राजधानी दिल्ली के 5 एथलीट्स टेबल टेनिस स्टार मनिका बत्रा, शूटर दीपक कुमार और दो 400 मीटर धावक, अमोज जैकब और सार्थक भांबरी ने टोक्यो ओलंपिक में भाग लिया था। इन सभी के बड़े-बड़े बैनर पूरी दिल्ली में लगाए गए।

दिल्ली के रहने वाले सार्थक भांबरी का कहना है कि केजरीवाल सरकार ने ओलंपिक मिशन में वाहवाही लूटने के लिए शहर भर के चौक-चौराहों को बैनरों से पेंट कर दिया, लेकिन उन्होंने खिलाड़ियों की सुध लेना जरूरी नहीं समझा। उन्होंने बताया कि दिल्ली सरकार ने केवल बैनर लगाने पर ही फोकस ​किया और खिलाड़ियों की अनदेखी की।

राजौरी गार्डन में रहने वाले 22 वर्षीय भांबरी ने कहा, ”मैं आपको बता सकता हूँ कि दिल्ली सरकार ने मुझे कभी कोई आर्थिक मदद नहीं दी।” उन्होंने कहा कि हाँ मेरे पोस्टर जरूर लगाए गए हैं, ‘दिल्ली बोले जीत के आना’, कैसे जीत के आना? सार्थक ने आगे कहा, ”मैंने कहीं देखा है कि ओलंपिक के लिए होर्डिंग और पोस्टर पर करोड़ों रुपए खर्च किए गए हैं। यहाँ तक कि अगर उन्होंने ओलंपिक में जाने से महीनों पहले हमारी तैयारियों के लिए इसका 10 से 15 प्रतिशत भी खर्च किया होता हम अपने प्रदर्शन को और भी बेहतर कर सकते थे।”

हालाँकि, भांबरी सार्थक ने बुधवार (11 अगस्त) को ट्वीट कर दिल्ली सरकार का समर्थन किया है। उन्होंने कहा, ”मीडिया के साथ मेरी हालिया बातचीत को गलत तरीके से पेश किया गया है। मैं दिल्ली सरकार का पूरा समर्थन करता हूँ। मैं पहले उनकी योजनाओं से अवगत नहीं था और इसलिए मिशन उत्कृष्टता योजना के लिए आवेदन नहीं कर सका।”

बता दें कि कई राष्ट्रीय स्पधार्ओं में पदक जीतने वाले और भारत की 400 मीटर रिले टीम में जगह बनाने वाले भांबरी ने दिल्ली सरकार पर आरोप लगाया था कि उन्हें मिशन उत्कृष्टता योजना के तहत अभी तक इसका लाभ नहीं मिला है।

अश्विनी उपाध्याय को जंतर-मंतर पर मुस्लिम विरोधी नारों के मामले में जमानत, कोर्ट ने कहा- ‘उनकी संलिप्तता का कोई प्रमाण नहीं’

दिल्ली के जंतर-मंतर में पूर्व भाजपा प्रवक्ता और सुप्रीम कोर्ट के वकील अश्विनी उपाध्याय के द्वारा आयोजित रैली में मुस्लिम विरोधी नारे लगाए जाने के मामले में मेट्रोपॉलिटन कोर्ट ने यह कहते हुए उपाध्याय को जमानत दी है कि ऐसा कोई प्रमाण नहीं है जिससे यह पता चले कि भड़काऊ नारे उपाध्याय के कहने पर या उनकी उपस्थिति में लगे हों। उपाध्याय को मंगलवार (10 अगस्त 2021) को गिरफ्तार किया गया था।

मेट्रोपॉलिटन कोर्ट के न्यायाधीश उद्भव कुमार जैन ने आदेश पारित करते हुए कहा कि यहाँ प्रस्तुत किए गए रिकॉर्ड्स में ऐसा कुछ भी नहीं है जो यह बताता हो कि भड़काऊ नारे उपाध्याय के कहने पर लगाए गए हों या फिर उनकी उपस्थिति उस दौरान रही हो। कोर्ट ने कहा कि जिस वीडियो के आधार पर यह कार्रवाई की गई है उसमें उपाध्याय के विरोध में कुछ भी नहीं है। कोर्ट ने जमानत का आदेश पारित करते हुए कहा कि यह ऐसा मामला नहीं है जहाँ आवेदक (उपाध्याय) के फरार हो जाने की गुंजाइश हो। कोर्ट ने यह भी माना कि निश्चित तौर पर बंद दरवाजों के पीछे साजिश हुई है और कहा कि चूँकि जाँच अभी अपनी प्रारंभिक अवस्था में है ऐसे में केवल संभावनाओं के आधार पर किसी की स्वतंत्रता को प्रभावित नहीं किया जा सकता है।

ज्ञात हो कि अंग्रेजों के जमाने के कानूनों को ख़त्म करने की माँग करते हुए उपाध्याय ने जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शन का आयोजन किया था। विरोध प्रदर्शन अंग्रेजों के जमाने के उन कानूनों को लेकर था, जिनका इस्तेमाल कर के ब्रिटिश भारतीयों पर अत्याचार करते थे। चूँकि ये कानून अभी भी मौजूद हैं, इसीलिए इस विरोध प्रदर्शन में ‘यूनिफॉर्म सिविल कोड’ की माँग की गई, ताकि देश में सभी नागरिकों के लिए समान कानून हो। उपाध्याय द्वारा आयोजित इसी विरोध प्रदर्शन के दौरान कुछ अज्ञात लोगों द्वारा मुस्लिम विरोधी नारेबाजी भी हो गई। इस नारेबाजी का वीडियो तेजी से सोशल मीडिया पर वायरल हो गया।

वीडियो वायरल होने के बाद दिल्ली पुलिस ने बड़ी कार्रवाई करते हुए मंगलवार (10 अगस्त, 2021) को अश्विनी उपाध्याय एवं उनके अन्य सहयोगियों विनोद शर्मा, दीपक सिंह, दीपक, विनीत क्रांति और प्रीत सिंह को गिरफ्तार कर लिया। हालाँकि उपाध्याय द्वारा इस नारेबाजी के संबंध में दिल्ली पुलिस को भेजे गए पत्र में उन्होंने लिखा कि सोशल मीडिया पर उन्हें बदनाम करने के लिए उनके नाम से वीडियो वायरल किया जा रहा है जबकि नारेबाजी करने वालों को वह जानते भी नहीं हैं।

उन्होंने दिल्ली पुलिस कमिश्नर को लिखित शिकायत देकर मजहबी उन्माद फ़ैलाने वालों के खिलाफ कार्रवाई का निवेदन किया। AAP विधायक अमानतुल्लाह खान ने इस मामले में पुलिस में शिकायत दर्ज कराई थी जिसके खिलाफ खुद भड़काऊ बातें कहने के लिए एफआईआर दर्ज की गई थी।

उपाध्याय ने दिल्ली पुलिस को जानकारी दी है कि इस रैली में कुछ असामाजिक तत्व घुस गए थे, जिन्होंने इस कार्यक्रम को बदनाम करने की कोशिश की है। उन्होंने बताया कि वो दोपहर 12:15 बजे ही कार्यक्रम स्थल से निकल गए थे। उपाध्याय ने ये भी कहा कि जो लोग इस वीडियो को उनके नाम पर शेयर कर के फैला रहे हैं, उनके खिलाफ भी मानहानि का मुकदमा दर्ज किया जाना चाहिए। उनका कहना था कि कि जब तक 1860 की IPC, 1861 का पुलिस एक्ट और 1872 का एविडेंस एक्ट लागू रहेगा, मजहबी उन्माद काबू में नहीं आएगा। फिलहाल इस मामले की जाँच की जा रही है।

370 हटाने के बाद कश्मीरी पंडितों को घाटी में बसाने के प्रयास तेज, अब तक इतने हिन्दुओं को मिली उनकी प्रॉपर्टी वापस

नरेंद्र मोदी सरकार जम्मू-कश्मीर से आतंकवाद का सफाया करने और विस्थापित कश्मीरी पंडितों को उनका हक दिलाने के​ लिए हर संभव प्रयास कर रही है। इसी कड़ी में केंद्र सरकार कश्मीर में आतंकवादी हिंसा के चलते अपने घरों से पलायन कर गए कश्मीरी पंडितों की पैतृक संपत्ति को बहाल करने की कोशिश कर रही है। केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने एक प्रश्न के लिखित उत्तर में राज्यसभा में बुधवार (11 अगस्त) को कहा, ”अब तक कुल 9 कश्मीरी पंडितों को कश्मीर में उनकी प्रॉप्रटी वापस दिलाई गई है। यह कश्मीरी पंडित उस प्रॉपर्टी के असली मालिक हैं।”

उन्होंने कहा कि सरकार उन सभी कश्मीरी हिंदू को वापस कश्मीर में बसाने और उनकी प्रॉपर्टी वापस कराने के प्रयास कर रही है, जो वहाँ कट्टरपंथी इस्लामिक आतंकियों की हिंसा का शिकार हुए थे। आतंकियों के कारण उन्हें कश्मीर छोड़ कर पलायन करने पर मजबूर होना पड़ा था। केंद्रीय गृह राज्य मंत्री ने बताया कि जम्मू-कश्मीर विस्थापित अचल संपत्ति (संरक्षण, सुरक्षा एवं मजबूरी में बिक्री का निषेध) कानून 1997 के तहत राज्य के संबंधित जिलों के जिलाधीश विस्थापितों की अचल संपत्ति के कानूनी संरक्षक होते हैं।

उन्होंने कहा कि अगर इस प्रॉपर्टी पर कोई गैर कानूनी तरीके से अतिक्रमण करता है तो डीएम इस पर कानूनी कार्रवाई करते हैं। अब अपनी जमीन वापस पाने के लिए कश्मीरी पंडित जिला मजिस्ट्रेट से भी संपर्क कर सकते हैं।

अनुच्छेद-370 को निरस्त करने के बाद पुनर्वास डेटा का विवरण देते हुए, राय ने कहा, “सरकार द्वारा प्रदान की गई जानकारी के अनुसार जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद-370 के निरस्त होने के बाद कुल 520 प्रवासी प्रधानमंत्री विकास पैकेज-2015 के तहत नौकरी हासिल करने के लिए कश्मीर लौट आए हैं।”

गौरतलब है कि जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद-370 हटने के बाद 2 सालों में यहाँ कितने लोगों ने जमीन खरीदी। इस सवाल के जवाब में केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने मंगलवार (10 अगस्त) को कहा, ”अगस्त 2019 के बाद से अब तक सिर्फ दो बाहरी लोगों ने जम्मू-कश्मीर में जमीन खरीदी है।”

बता दें कि 1990 में इस्लामी ​कट्टरपंथियों के कारण हजारों कश्मीरी पंड़ितों को घाटी से पलायन करने पर मजबूर होना पड़ा था। लेकिन साल 2019 में अनुच्छेद-370 और 35ए के हटने के बाद कश्मीरी पंडितों की घर वापसी की उम्मीद बंधी थी।

‘कोई तो है जो पाकिस्तान के साथ खेलने नहीं दे रहा’: न्यूजीलैंड के खिलाड़ियों के IPL खेलने से तिलमिलाए इंजमाम उल हक

न्यजीलैंड ने आगामी टेस्ट क्रिकेट वर्ल्ड कप से पहले बांग्लादेश औऱ पाकिस्तान के खिलाफ होने वाले मैच के लिए अपनी टीम का ऐलान कर दिया है। हालाँकि, उसने अपने 7 मेन स्ट्रीम खिलाड़ियों को इससे बाहर रखा है और उनकी जगह दूसरे खिलाड़ियों के नामों का ऐलान किया है। इससे पाकिस्तान के पूर्व कप्तान इंजमाम-उल-हक ने अपनी नाराजगी जाहिर करते हुए आईसीसी को खरी-खोटी सुनाई है। उन्होंने आईसीसी की चुप्पी पर सवाल उठाया है।

इंजमाम-उल-हक ने अपना दर्द जाहिर करते हुए अपने यूट्यूब चैनल पर कहा, “पाकिस्तान टीम जहाँ क्रिकेट खेलने के लिए जाती है। वहाँ उसे विपक्षी टीम के मेनस्ट्रीम के खिलाड़ियों के साथ खेलने का मौका ही नहीं दिया जा रहा है। इस साल अप्रैल में हमने दक्षिण अफ्रीका का दौरा किया था, तो वहाँ भी उन्होंने अपने मेन खिलाड़ियों को आईपीएल खेलने के लिए भेज दिया था। इसके बाद इंग्लैड दौरे के दौरान ईसीबी ने कोरोना का हवाला देकर रातों-रात पूरी टीम ही बदल डाली। हमें बी टीम के साथ मैच खेलना पड़ा। हैरानी की बात यह है कि एक ही दिन में उनके सभी खिलाड़ी कोरोना से सही भी हो गए।”

दरअसल, आईपीएल के पहले हाफ का आयोजन भारत में हुआ था और इसके दूसरे हाफ का आयोजन दुबई में होना है। इसमें शामिल होने के लिए न्यूजीलैंड क्रिकेट ने टीम के कैप्टन केन विलियम्सन, तेज गेंदबाज ट्रेंट बोल्ट, काइल जेमीशन, लोकी फर्ग्यूशन समेत सात खिलाड़ियों को अनुमति दे दी है। इसी से इंजमाम तिलमिलाए हुए हैं।

उन्होंने कहा, “पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड को आईसीसी से ये सवाल पूछना चाहिए कि आखिर वो क्या कर रहा है। वो अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट को छोड़कर प्राइवेट लीग को प्रमोट क्यों कर रहा है? मुझे लगता है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सही तरीके से पाकिस्तान को प्रैक्टिस नहीं करने दिया जा रहा है। अगर आप इन सारी चीजों के सीक्वेंस को देंखे तो ये सारा कुछ पाकिस्तान के ही साथ किया जा रहा है और ऐसा कहीं नहीं हो रहा है।”

पूर्व पाकिस्तानी खिलाड़ी ने अपना दर्द बयाँ करते हुए कहा, “ऐसा लगता है कि या तो कोई पाकिस्तान के साथ खेलने नहीं दे रहा है या कोई हमारे साथ मैच खेलना ही नहीं चाहता है। पाकिस्तान को आईसीसी से कहने की जरूरत है कि वो सोया क्यों है? कोई भी टीम बीच में हट कैसे सकती है? उसके खिलाफ कार्रवाई हो सकती है क्या?”

इसी प्रकार बीते दिनों इंग्लिश क्रिकेटर मोंटी पनेसर ने पाकिस्तान द्वारा आयोजित किए जा रहे ‘कश्मीर प्रीमियर लीग’ में हिस्सा नहीं लेने का फैसला लिया था। उन्होंनें कहा था, “मैं इन सब में नहीं पड़ना चाहता।” दरअसल, बीसीसीआई ने केपीएल में खेलने पर हुक्का-पानी बंद करने की चेतावनी दी थी।  

पंजाब के स्‍वास्‍थ्‍य मंत्री का ‘खुफिया प्लान’ गौशाला की जमीन पर ‘बैंक्वेट हॉल’, दस्तावेजों ने खोली पोल: CBI जाँच की माँग

पंजाब के स्वास्थ्य मंत्री बलबीर सिद्धू इन दिनों खासा विवादों में हैं। द ट्रिब्यून की रिपोर्ट के मुताबिक, स्वास्थ्य मंत्री बलबीर सिद्धू के एनजीओ ने मोहाली के बलोंगी गाँव में गौशाला की जमीन पर ‘बैंक्वेट हॉल’ बनाने का प्लान बनाया था। हालाँकि, स्वास्थ्य मंत्री बलबीर सिद्धू ने इन आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है। उन्होंने दावा किया था कि उनके एनजीओ को गौशाला के लिए आवंटित 10 एकड़ की पंचायत भूमि पर केवल आवारा मवेशियों को ही रखने की इजाजत दी जाएगी। मंत्री ने कहा था कि इस जमीन का इस्तेमाल केवल आवारा पशुओं की देखभाल के लिए किया जाएगा और परिसर में कोई अन्य व्यावसायिक गतिविधि नहीं होगी।

बलबीर सिद्धू के इस दावे को द ट्रिब्यून के पास मौजूद दस्तावेजों ने झूठा साबित कर दिया है। दस्तावेजों के मुताबिक जमीन पर बैंक्वेट हॉल बनाने की योजना थी। पिछले साल अक्टूबर में तैयार एनजीओ के एक प्रस्ताव के अनुसार और इसके महासचिव नरेश कंसल द्वारा हस्ताक्षरित गौशाला, मंदिर और डायग्नोस्टिक सेंटर के अलावा एक बैंक्वेट हॉल का निर्माण भी इस योजना का अहम हिस्सा था। दस्तावेजों में यह भी उल्लेख किया गया है कि ट्रस्टी बैंक्वेट हॉल के निर्माण का पूरा खर्चा उठाएगा। कंसल ने दावा किया है कि बैंक्वेट हॉल व्यावसायिक गतिविधियों के लिए नहीं है, बल्कि गरीब लोगों के लिए बनाया जाना था, ताकि वे उसमें अपने काम कर सकें।

इसी बीच, पंजाब विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष बीर देविंदर सिंह और पूर्व मंत्री बिक्रम सिंह मजीठिया ने सिद्धू द्वारा किए गए कथित भूमि घोटाले की सीबीआई जाँच की माँग की है। उन्होंने कहा कि यह जमीन बलोंगी पंचायत की है, जो एक गौशाला बनाने के लिए दी गई है।

मजीठिया ने कहा, “बलबीर सिद्धू ने बलोंगी में करोड़ों की पंचायत की जमीन हड़प ली है और अब मोहाली के मेयर के रूप में अपने भाई की मिलीभगत से बलोंगी को नगर निगम की सीमा में शामिल कर अपनी जमीन को वैध करने जा रहे हैं। हम इस मामले की सीबीआई जाँच चाहते हैं।”

वहीं, द ट्रिब्यून की रिपोर्ट की तर्ज पर बीर देविंदर ने भी बलबीर सिंह सिद्धू पर भूमि घोटाले का आरोप लगाया है। उन्होंने टाइम्स ऑफ इंडिया से कहा, ”पंजाब के स्वास्थ्य मंत्री से जुड़ा एक बड़ा भूमि घोटाला सामने आया है, जिसमें बलबीर सिंह सिद्धू के नेतृत्व में एक संदिग्ध ट्रस्ट ने मोहाली जिले के बलोंगी गाँव की जमीन को हड़प लिया है।” उन्होंने कहा कि ग्रामीण विकास एवं पंचायत मंत्री तृप्त राजिंदर सिंह बाजवा की मिलीभगत से पंचायत की 100 करोड़ रुपए की जमीन हड़प ली गई है। इसके साथ ही जमीन को वैध बनाने के लिए वह बलोंगी को भी नगर निगम की सीमा में शामिल कर रहा है, जिसकी सीबीआई जाँच होनी चाहिए।

उन्होंने कहा कि पंचायत विभाग ने बाल गोपाल गौ बसेरा सोसायटी ट्रस्ट को दी गई भूमि पर एक बैंक्वेट हॉल और एक डायग्नोस्टिक सेंटर के निर्माण की भी अनुमति दी थी, जिसकी अध्यक्षता स्वास्थ्य मंत्री ने की थी।

टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट का स्क्रीनशॉट

इसके बारे में ग्रामीणों को भी जानकारी नहीं थी। वे केवल गौशाला के बारे में जानते थे। बलोंगी के सरपंच बहादुर सिंह ने कहा कि उनसे जमीन लेने का एकमात्र प्रस्ताव गौशाला था। उन्होंने कहा, “इसमें बैंक्वेट हॉल या मंदिर बनाया जाएगा इसका कोई जिक्र नहीं था।”

पंजाब विलेज कॉमन लैंड्स (रेगुलेशन) एक्ट 1961 के तहत पंचायत की जमीन पर कोई भी बैंक्वेट हॉल या धार्मिक स्थल बनाने का प्रावधान नहीं है। बताया जा रहा है कि स्वास्थ्य मंत्री से संपर्क करने के सभी प्रयास व्यर्थ रहे, क्योंकि उनके कर्मचारियों ने उनसे मिलने से इनकार कर दिया। बलोंगी में सोसायटी को सालाना 25,000 रुपए प्रति एकड़ की दर से 33 साल के पट्टे पर जमीन आवंटित की गई थी, जो मौजूदा बाजार दर से काफी कम है।

‘हनुमान चालीसा’ पढ़ने वाले केजरीवाल क्यों डरते हैं हिंदू शरणार्थियों की मदद से? किसका वोट बैंक खिसकने का है खौफ?

पाकिस्तान में धार्मिक और सामाजिक प्रताड़ना झेलने के कारण भारत आए हिंदू शरणार्थियों और अवैध रूप से देश में घुसे रोहिंग्या मुस्लिमों में अंतर है। अंतर यह है कि बिना नागरिकता मिले देश में रहने वाले रोहिंग्या मुस्लिमों को दिल्ली सरकार वो सुविधाएँ देती हैं, जो नागरिकता पाए हिन्दू शरणार्थियों को नहीं मिलतीं। अब तक यह सर्वविदित है कि आम आदमी पार्टी की दिल्ली सरकार कैसे रोहिंग्या मुस्लिमों को सुविधाएँ देती है या उनका प्रबंध करती है और कैसे हिन्दू शरणार्थियों को न्यूनतम सुविधाएँ भी देने की बात पर मुँह फेर लेती है। इसका परिणाम यह हुआ है कि दिल्ली में कुछ स्थानों पर बसे ये हिन्दू शरणार्थी अमानवीय परिस्थितियों में रहने के लिए बाध्य हैं।

इस विषय पर हाल ही में दिल्ली उच्च न्यायालय में दाखिल एक जनहित याचिका पर आए फैसले में न्यायालय की दो न्यायाधीशों वाली पीठ ने कहा कि नागरिकता मिलने के बाद भारत आए हिंदू शरणार्थी हर उस सुविधा के हकदार हैं, जो भारत के किसी और नागरिक को मिलती है। ऐसे में नैतिकता और नियमों के तहत दिल्ली सरकार पर यह जिम्मेदारी आती है कि वह इन नागरिकों को न्यूनतम सुविधाएँ उपलब्ध कराए।

देखने वाली बात यह होगी कि दिल्ली सरकार न्यायालय के आदेश का पालन करने की दिशा में क्या कदम उठाती है पर महत्वपूर्ण यह है कि दिल्ली सरकार अवैध रूप से भारत में घुसे विदेशियों और वैध रूप से नागरिकता प्राप्त शरणार्थियों में भेदभाव करती है। ज्ञात हो कि हाल ही में न्यायालय में दाखिल सूचना के अनुसार दिल्ली सरकार कोरोना महामारी के दौरान रोहिंग्या मुस्लिमों को मुफ्त में राशन मुहैया कराती रही है।

प्रश्न यह उठता है कि भारत सरकार की ओर से नागरिकता प्राप्त हिन्दुओं को सुविधाएँ मुहैया कराने के लिए किसी भारतीय या एनजीओ को न्यायालय जाने की आवश्यकता क्यों पड़ती है और यही न्यूनतम सुविधाएँ अवैध रूप से रहने वाले रोहिंग्या मुस्लिमों को कैसे मिल जाती हैं? प्रश्न यह भी उठता है कि राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के आदेश के बावजूद हिंदू शरणार्थियों से इन सरकारी सुविधाओं को दूर क्यों रखा जाता है? आखिर दिल्ली सरकार के लिए इन नागरिकों को न्यूनतम सुविधाएँ देना क्या असंभव है? और यदि ऐसा है तो फिर रोहिंग्या मुस्लिमों को ये सुविधाएँ कैसे दी जा रही हैं?

दरअसल दिल्ली सरकार के कर्ता-धर्ता आजकल हिंदुओं में तो एक वोट बैंक देखने लगे हैं पर उन्हें हिंदू शरणार्थियों में कोई वोट बैंक दिखाई नहीं देता। या कहीं कारण यह तो नहीं कि पाकिस्तान या अन्य पड़ोसी देशों में धार्मिक प्रताड़ना झेलकर भारत आए इन हिंदुओं को न्यूनतम सुविधाएँ देने के कारण केजरीवाल के अल्पसंख्यक वोटर के नाराज होने का खतरा है? आखिर ऐसे क्या कारण हैं कि दिल्ली सरकार राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग या न्यायालय के आदेशों का भी पालन नहीं कर सकती? ऐसा करना क्या केजरीवाल सरकार की संवैधानिक जिम्मेदारी नहीं है?

पिछले चुनाव के समय केजरीवाल जगह-जगह हनुमान चालीसा पढ़ते हुए यह दावा कर रहे थे कि वे ही असल हिंदू हितैषी हैं पर सरकार बनाने के बाद हिंदू हितों की बात पता नहीं कहाँ चली गई। अच्छा, ऐसा नहीं कि केवल राजनीति या सरकार ने ही इन हिंदुओं से मुँह मोड़ लिया है। रोहिंग्या मुस्लिमों के तथाकथित मानवाधिकार की रक्षा पर रात-दिन बिलखने वाले स्वघोषित बुद्धिजीवी और सेक्युलर मीडिया को भी इन हिंदू शरणार्थियों के अधिकारों पर बात करते नहीं देखा जाता। यहाँ तक कि यदि कोई बोलता है तो उसके विरोध में भी आवाज़ें उठने लगती हैं। आखिर हिन्दू शरणार्थियों की बात करना इनके किस हित को नुकसान पहुँचा सकता है?

सीएए और एनआरसी के विरुद्ध शाहीन बाग़ में महीनों तक जो कुछ भी हुआ, उसकी परिणति दिल्ली के हिंदू विरोधी दंगों में हुई। इस तथाकथित आंदोलन और इसके बाद हिंदू विरोधी दंगों में आम आदमी पार्टी और उसके नेताओं की भूमिका किसी से छिपी नहीं है। ऐसे में यह स्पष्ट हो जाता है कि केजरीवाल द्वारा हिंदू हितों की बात क्यों खोखली है।

प्रश्न उठता है कि जो केजरीवाल सरकारी पैसे पर श्रवण कुमार बनकर दिल्ली के हर बुजुर्ग को अयोध्या की तीर्थयात्रा करवाने का वादा करते हैं, वे पाकिस्तान से आए नागरिकता प्राप्त हिंदू शरणार्थियों के लिए न्यूनतम सरकारी सुविधाएँ मुहैया कराने की बात पर क्यों बगलें झाँकने लगते हैं? दरअसल श्रवण कुमार बनकर दिल्ली के बुजुर्गों की अयोध्या की तीर्थ यात्रा का केजरीवाली वादा अयोध्या के राम मंदिर निर्माण में अपने लिए किसी तरह क्रेडिट का एक टुकड़ा खोज लेने से अधिक कुछ नहीं है। अयोध्या में राम मंदिर का विरोध करने वाली आम आदमी पार्टी और उसके नेता वहाँ अपने लिए कुछ खोजने के फिराक में हैं।

दिल्ली उच्च न्यायालय के आदेश का पालन दिल्ली सरकार किस तरह और कब करती है, यह महत्वपूर्ण प्रश्न है। रोहिंग्या मुस्लिमों को भोजन और रहने की व्यवस्था करने वाली दिल्ली सरकार की परीक्षा इस बात में है कि वह हिंदू शरणार्थियों को नियमों और नैतिकता के तहत सरकारी सुविधाएँ मुहैया कराती है या नहीं? यदि दिल्ली सरकार न्यायालय के आदेश का पालन नहीं करती है तो यह साफ़ हो जाता है कि इतने वर्षों के मुख्यमंत्रित्व के बाद भी केजरीवाल अभी तक सरकार और दलीय राजनीति को अलग नहीं कर पाए हैं और यह स्थिति केवल लोकतंत्र के लिए ही नहीं, सरकार की संवैधानिक जिम्मेदारियों के लिए भी दुर्भाग्यपूर्ण है।

TMC नेताओं ने अपनी ही पार्टी की 2 महिला नेता से की मारपीट और बदसलूकी: देखें वीडियो

पश्चिम बंगाल में तृणमूल कॉन्ग्रेस के अंदर पड़ी फूट उभर कर सामने आ गई है। यहाँ हुगली जिले के गोघाट में पंचायत समिति के अध्यक्ष मनोरंजन पॉल और महिला तृणमूल नेत्री श्यामली घोष व मैना बाग के साथ उनकी ही पार्टी के नेताओं ने मारपीट व बदसलूकी की। इस मामले में पुलिस ने तीन आरोपितों को गिरफ्तार भी किया है।

घटना का वीडियो भी जारी हो गया है, जिसमें स्पष्ट देखा जा सकता है कि श्यामली घोष के साथ टीएमसी के कुछ नेता धक्का-मुक्की कर रहे हैं और उनका हाथ पकड़कर उन्हें धक्का दे रहे हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, घटना सोमवार (9 अगस्त 2021) की है, जब गोघाट ब्लॉक एडमिनिस्ट्रेटिव ऑफिस में गोघाट एक नंबर पंचायत समिति के अध्यक्ष मनोरंजन पॉल अपने चेंबर में बैठे हुए थे। उसी दौरान पूर्व विधायक और हुगली जिला तृणमूल के उपाध्यक्ष मानस मजूमदार के समर्थक वहाँ पहुँचे और मनोरंजन पॉल के साथ हाथापाई की।

इस बीच मामले में बीच-बचाव करने पहुँची श्यामली घोष और मैना बाग के साथ भी टीएमसी नेता के समर्थकों ने बदसलूकी और मारपीट की। उनकी यह करतूत वहाँ लगे सीसीटीवी कैमरे में भी कैद हो गई। इसमें आरोपित श्यामली घोष को धक्का मारते हुए दिखाई दे रहे हैं। घटना के बाद श्यामली घोष समेत तीनों पीड़ित नेताओं ने पुलिस में इसकी शिकायत की, जिसके आधार पर मंगलवार (10 अगस्त 2021) को पुलिस ने तीन टीएमसी नेताओं को गिरफ्तार कर लिया।

इस मामले में हुगली टीएमसी के जिलाध्यक्ष दिलीप यादव ने कहा है कि उन्होंने मामले से पार्टी के आला नेताओं को अवगत करा दिया है। वहाँ से जैसा भी निर्देश मिलेगा उसके आधार पर कार्रवाई की जाएगी। वहीं श्यामली घोष का कहना है कि हम लोग 1998 से टीएमसी के साथ हैं और आज तक ममता बनर्जी के सभी आदेशों का पालन किया है। लेकिन, आज पार्टी में हमारे साथ ही इस तरह का दुर्व्यवहार किया जा रहा है।

‘ऑक्सीजन की कमी से मौत के आँकड़े केंद्र ने नहीं माँगे’: कैबिनेट मंत्री ने 2 ईमेल से सिसोदिया के दावे को किया फुस्स

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री मनसुख मांडविया ने दिल्ली के उप-मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया को जवाब दिया है। मनीष सिसोदिया ने दावा किया था कि कोरोना की दूसरी लहर के दौरान ऑक्सीजन से हुई मौतों को लेकर केंद्र सरकार ने कोई आँकड़ा नहीं माँगा है। अरविंद केजरीवाल की सरकार में नंबर-2 मनीष सिसोदिया ने दावा किया था कि केंद्र सरकार कह रही है कि उन्होंने ऑक्सीजन की कमी से हुई मौतों को लेकर राज्यों से रिपोर्ट माँगी।

मनीष सिसोदिया ने कहा “ऑक्सीजन से हुई मौतों का आँकड़ा माँगने के मामले में केंद्र से दिल्ली सरकार को कोई चिट्ठी नहीं आई! आप राज्यों से पूछोगे नहीं, राज्यों को जाँच नहीं करने दोगे और आप कह दोगे कि राज्य बता नहीं रहे?” मैंने अख़बारों में पढ़ा कि केंद्र ने कहा है कि राज्यों से उसने पूछा है, लेकिन सिर्फ एक राज्य ने जवाब दिया। आज तक केंद्र से दिल्ली सरकार को ऐसी कोई चिट्ठी आई ही नहीं है।”

हालाँकि, केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री मनसुख मांडविया ने इस दावे को नकारते हुए एक ईमेल शेयर किया। इस ईमेल में 26 जुलाई, 2021 (सोमवार) को दोपहर 3 बजे भेजा गया था। इस ईमेल में कई राज्यों के रेसिपिएंट हैं और कई अधिकारियों को इसे एक साथ भेजा गया है। इसमें दिल्ली सरकार से जुड़े दो ईमेल एड्रेस भी हैं, जिस पर मांडविया ने लाल घेरा लगा कर दिखाया। इस ईमेल को भारत सरकार के ‘कोरोना कंट्रोल रूम’ ने भेजा था।

इसमें सवाल पूछा गया है कि क्या सरकार दवाओं, मेडिकल उपकरणों और ऑक्सीजन की कमी से हुई मौतों का आँकड़ा अपडेट करती है? इसमें लिखा है कि क्या ऑक्सीजन या ऑक्सीजन सिलिंडरों की कमी से मौतों का कोई आँकड़ा है? साथ ही कहा गया है कि अगर हाँ, तो मार्च 1, 2021 से लेकर अब तक के आँकड़े भेजिए। साथ ही पूछा गया है कि क्या सरकार इस तरह का कोई डेटाबेस मेंटेन करना चाहती है?

मनसुख मांडविया ने दिल्ली के उप-मुख्यमंत्री को जवाब देते हुए लिखा, “माननीय मनीष सिसोदिया जी, 26 जुलाई को मेरे मंत्रालय (स्वास्थ्य) ने दिल्ली सरकार को जो मेल भेजा है, ये रही उसकी कॉपी। अभी भी देरी नहीं हुई है! 13 अगस्त तक आप डेटा भेज सकते हैं, ताकि हम प्रश्न का उत्तर संसद को भेज सकें। अपने अधिकारियों से समीक्षा करके जरूरी डाटा जल्द से जल्द भिजवाने की कृपा करें।”

जुलाई 2021 में दिल्ली के स्वास्थ्य मंत्री सत्येंद्र जैन ने कहा था कि दिल्ली और देश के अन्य जगहों पर ऑक्सीजन की कमी से मौतें हुई हैं। दिलचस्प यह है कि आप सरकार ने हाईकोर्ट को बताया था कि ऑक्सीजन से कोई मौत नहीं हुई है। उन्होंने कहा था, “दिल्ली और देश के अन्य जगहों पर ऑक्सीजन की कमी के कारण कई मौतें हुई हैं। यह कहना पूरी तरह से गलत है कि ऑक्सीजन की कमी से किसी की मौत नहीं हुई।