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बंगाल हिंसा: ममता सरकार को NHRC रिपोर्ट पर हलफनामा दाखिल करने के लिए कलकत्ता हाईकोर्ट ने दिया 31 जुलाई तक का समय

कलकत्ता हाईकोर्ट ने बुधवार (28 जुलाई) को पश्चिम बंगाल सरकार को राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) की रिपोर्ट के जवाब में अपना पूरा हलफनामा दाखिल करने के लिए 31 जुलाई तक का समय दिया। अदालत ने आज सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया कि अब और समय नहीं दिया जाएगा। मामले की अगली सुनवाई 2 अगस्त को होनी है।

एक याचिकाकर्ता की ओर से पेश हुई वकील प्रियंका टिबरेवाल ने पश्चिम बंगाल में चुनाव के बाद हुई हिंसा के मामले में अदालत के सुस्त रवैये पर कड़ी आपत्ति जताई। उन्होंने अदालत में कहा कि मामले की सुनवाई में देरी से पीड़ितों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा।

टिबरेवाल ने तर्क दिया कि कानूनी कार्रवाई में देरी के कारण पीड़ितों को उनकी शिकायतें वापस लेने के लिए धमकाया जा रहा है। उन्होंने कहा कि राज्य पीड़ितों पर ध्यान दिए बिना कार्रवाई में देरी करने के लिए कई हथकंडे अपना रहा है।

टिबरेवाल ने आगे कहा, “अगर मामले में और देरी हुई तो पीड़ित अपनी शिकायतें वापस ले लेंगे। पश्चिम बंगाल में अभी भी हिंसा जारी है।

वकील ने कहा कि इस संबंध में अभी तक कोई एफआईआर दर्ज नहीं की गई है। उन्होंने आरोपों की जाँच के लिए एक स्वतंत्र एसआईटी (विशेष जाँच दल) गठित करने की तत्काल आवश्यकता को भी दोहराया।

टिबरेवाल ने कहा, “यदि आपके लॉर्डशिप को लगता है कि लोगों को मार कर पेड़ पर लटकाने से मामले रुक सकते हैं, तो मुझे कुछ नहीं कहना है।”

टेबरीवाल द्वारा पश्चिम बंगाल हिंसा पर आपत्ति जताने के बाद एक अन्य याचिकाकर्ता की ओर से पेश हुए वरिष्ठ वकील महेश जेठमलानी ने तर्क दिया, ”लॉर्डशिप जानते हैं कि ज्यादा समय देने से सबूत गायब हो जाते हैं। इस मामले में पुलिस की मिलीभगत है।”

उन्होंने कहा कि राज्य को एनएचआरसी रिपोर्ट पर व्यापक प्रतिक्रिया दर्ज करने के लिए पर्याप्त समय दिया गया था। यदि अब राज्य को और समय चाहिए, तो उसे एक उचित कारण दिखाना होगा। NHRC समिति बाद के घटनाक्रम और नए मामलों से बेंच को अवगत कराना चाहती थी। हालाँकि, इसे यह कहते हुए खारिज कर दिया गया था कि यह आज की दलीलों पर नहीं था।

इसके बाद बेंच ने आदेश दिया, “एनएचआरसी की रिपोर्ट पर और जवाब दाखिल करने के लिए हमसे और समय माँगा गया है। इसलिए हमने राज्य को अंतिम अवसर के रूप में 31 जुलाई तक का समय दिया है।

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के बाद सियासी हिंसा के मामले में मृत बीजेपी कार्यकर्ता अभिजीत सरकार की डीएनए रिपोर्ट कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश राजेश बिंदल, जस्टिस आई.पी मुखर्जी, जस्टिस हरीश टंडन, सौमेन सेन और सुब्रत तालुकदार की 5 सदस्यीय पीठ में पेश की गई। उन्होंने राज्य द्वारा एनएचआरसी की रिपोर्ट के जवाब में दायर किए गए हलफनामे और सार्वजनिक रूप से एनएचआरसी समिति के कुछ सदस्यों के बयानों वाली एक पेन-ड्राइव को भी अपने रिकॉर्ड में लिया।

पाकिस्तान में फिर हुआ चीनी नागरिकों पर हमला: कार पर चलाई गई अंधाधुंध गोलियाँ, 1 घायल

पाकिस्तान में एक बार फिर चीनी नागरिकों पर हमला हुआ है। खबर है कि कुछ अज्ञात लोगों ने कराची में बुधवार (जुलाई 28, 2021) को मोटरसाइकल पर आकर चीन के दो नागरिकों पर गोली चलाईं, जिसके कारण एक चीनी घायल हो गया। उसे फौरन पास के अस्पताल में भर्ती करवाया गया। वहीं आरोपित मौके से फरार हो गए।

समाचार एजेंसी रॉयटर्स के मुताबिक, घटना को चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता झाओ लिजियान ने एक अलग मामला बताया है। उनका कहना है कि उन्हें पाकिस्तान में चीनी नागरिकों की सुरक्षा और संपत्ति की रक्षा को लेकर पूरा भरोसा है।

इधर, पुलिस ने बताया कि एक मोटरसाइकिल पर सवार बंदूकधारियों ने चीनी नागरिकों पर अंधाधुंध गोलियाँ चलाईं। बचाव अधिकारी और पुलिस ने बताया कि इस घटना में एक चीनी नागरिक घायल हो गया, जबकि आरोपित घटना को अंजाम देकर फरार हो गए।

पुलिस का कहना है अभी तक इस हमले के पीछे के इरादे स्पष्ट नहीं हो पाए हैं। पुलिस मामले की जाँच कर रही है। मालूम हो कि कराची पाकिस्तान के दक्षिणी सिंध प्रांत की राजधानी है, जहाँ कई चीनी-वित्त पोषित निर्माण परियोजनाओं पर काम चल रहा है।

पिछले दिनों अभी 14 जुलाई को पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा (Khyber Pakhtunkwha) के ऊपरी कोहिस्तान में दसू हाइड्रपॉवर प्लांट (Dasu hydropower plant) के पास कथिततौर पर एक आंतकी हमला हुआ था। इसमें एक बस को बम ब्लास्ट में उड़ा दिया गया था। घटना में कई चीनी नागरिक भी मरे थे। इसके अलावा इस साल अप्रैल में, दक्षिण-पश्चिमी पाकिस्तान के क्वेटा में एक ऐसे होटल में बम ब्लास्ट हुआ था जो चीनी राजदूत की मेजबानी कर रहा था। हमले में 4 लोग घायल हुए थे, मगर चीनी राजदूत सुरक्षित बच गए थे।

9 सदस्यीय तालिबानी प्रतिनिधिमंडल चीन के दौरे पर: अमेरिकी सैनिकों के हटने के बाद सामने आया चीन-तालिबान का ‘घातक’ गठजोड़

अफगानिस्तान में अमेरिकी सैनिकों की वापसी के बाद चीन युद्धग्रस्त देश के साथ अपनी निकटता बढ़ाने का अवसर तलाश रहा है। बताया जा रहा है कि अफगानिस्तान की शांति प्रक्रिया को लेकर चीन ने बड़ी ही चालाकी से तालिबान को समर्थन करने का ऐलान कर दिया है। दरअसल, मुल्ला अब्दुल गनी बरादर के नेतृत्व में बुधवार (28 जुलाई) को एक तालिबान प्रतिनिधिमंडल ने चीन में विदेश मंत्री वांग यी से मुलाकात की है। ऐसे में खबरें हैं कि चीन ने तालिबान को अपना समर्थन दे दिया है। कतर में मुल्ला अब्दुल गनी बरादर तालिबान के राजनीतिक कार्यालय के प्रमुख है और अमेरिका के साथ तालिबान की वार्ता में प्रमुख भूमिका निभा रहे हैं।

हांगकांग स्थित समाचार साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट की रिपोर्ट के अुनसार, यह बैठक चीन के उत्तरी शहर तियानजिन में हुई थी। सोशल मीडिया पर इस मुलाकात की कई तस्वीरें सामने आई हैं।

तालिबान के प्रवक्ता डॉ. मोहम्मद नईम ने ट्वीट किया कि शांति प्रक्रिया और सुरक्षा मुद्दों पर चीनी सरकार के साथ बातचीत के लिए तालिबान का 9 सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल चीन की दो दिवसीय यात्रा पर है। चीन के आधिकारिक निमंत्रण पर मुल्ला अब्दुल गनी बरादर के नेतृत्व में यह प्रतिनिधिमंडल चीन गया है। उन्होंने बताया कि चीनी विदेश मंत्री वांग यी, उप विदेश मंत्री और अफगानिस्तान के लिए चीन के विशेष प्रतिनिधि के साथ अलग-अलग बैठकें हुईं।

नईम ने कहा, “राजनीति, अर्थव्यवस्था, दोनों देशों की सुरक्षा से जुड़े मुद्दों और अफगानिस्तान की मौजूदा स्थिति लेकर शांति प्रक्रिया पर चर्चा हुई।” प्रवक्ता ने दोहराया कि तालिबान ने चीन को आश्वासन दिया है कि वह किसी भी देश की सुरक्षा के खिलाफ अफगानिस्तान की जमीन का इस्तेमाल नहीं होने देगा। जिसका अर्थ है कि वे उइगर अलगाववादियों को शरण नहीं देंगे। उन्होंने कहा, “चीन ने अफगान लोगों के साथ अपने सहयोग को जारी रखने और विस्तार करने का आश्वासन दिया है, यह कहते हुए कि वे अफगानिस्तान के मामलों में हस्तक्षेप नहीं करेंगे, लेकिन समस्याओं को हल करने और शांति बनाने में मदद करेंगे।”

अफगानिस्तान की मौजूदा स्थिति को लेकर तालिबानी नेताओं का चीन दौरा काफी अहम माना जा रहा है। यह पहली बार है जब तालिबान के किसी वरिष्ठ नेता ने चीन का दौरा किया है, क्योंकि इस्लामिक आतंकवादी समूह ने पूरे अफगानिस्तान पर कब्जा करने के लिए बड़े पैमाने पर हमला किया है। अमेरिकी रिपोर्ट में कहा गया है कि तालिबान ने अफगानिस्तान में करीब 200 जिलों पर कब्जा कर लिया है।

वहीं, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) की एक रिपोर्ट के अनुसार प्रतिबंधित आतंकवादी गुट तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) के पास अब भी अफगान सीमा पर लगभग 6,000 प्रशिक्षित लड़ाके हैं। बताया जा रहा है कि यूएन एनालिटिकल सपोर्ट एंड सैंक्शन मॉनिटरिंग टीम की 28वीं रिपोर्ट में इस बात की भी पुष्टि की गई है कि अफगानिस्तान-चीन सीमा पर करीब सैकड़ों बीजिंग विरोधी चरमपंथियों की मौजूदगी बनी हुई है। पाकिस्तान का आरोप है कि अफगानिस्तान टीटीपी का इस्तेमाल उसके खिलाफ हमले में करता है। टीटीपी, अफगान और तालिबान में गठजोड़ को लेकर इमरान सरकार की मुश्किलें बढ़ गई हैं।

गौरतलब है कि तालिबान ने पहले ही चीन को आश्वासन दे दिया था कि वो शिनजियांग के मुस्लिमों में बढ़ते कट्टरपंथ को लेकर चुप रहेगा। साथ ही चीन जो उइगर मुस्लिमों के खिलाफ कार्रवाई कर रहा है, उस पर भी वो कुछ नहीं बोलेगा। इसके बाद माना जा रहा है कि तालिबान और चीन के बीच में अफगानिस्तान को लेकर समझौता हो गया है।

उत्तर-पूर्वी राज्यों में संघर्ष पुराना, आंतरिक सीमा विवाद सुलझाने में यहाँ अड़ी हैं पेंच: हिंसा रोकने के हों ठोस उपाय  

असम और मिजोरम के पुलिस बलों के बीच सोमवार 26 जुलाई के दिन हुई झड़प गंभीर हो गई। परिणामस्वरूप गोलीबारी में असम पुलिस के पाँच जवान और साथ ही एक नागरिक भी मारा गया। घटना असम के कछार और मिजोरम के कोलासिब जिलों की सीमा पर हुई। उत्तर-पूर्व में हाल के वर्षों में हुई यह सबसे गंभीर घटना है जो आतंरिक सीमा विवाद से आगे हिंसा तक जा पहुँची। जो बात चिंताजनक है वो यह है कि दो राज्यों के पुलिस बलों से ऐसी घटना की अपेक्षा नहीं की जाती। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि ये झड़प हाल ही में शिलांग में उत्तर-पूर्वी राज्यों और केंद्र के बीच हुई एक ऐसी बैठक के बाद हुई जिसमें राज्यों की आतंरिक सीमाओं से सम्बंधित विवाद के संभावित हल तलाशने की दिशा में चर्चा हुई थी।

उत्तर-पूर्व के राज्यों की आतंरिक सीमाओं पर नागरिकों के बीच झड़प या संघर्ष होता रहा है पर हाल के वर्षों में पुलिस बलों के बीच ऐसी गंभीर झड़प नहीं हुई थी। घटना ने दोनों राज्यों के साथ-साथ देश को भी आश्चर्यचकित कर दिया।

इस घटना के बाद असम और मिजोरम के मुख्यमंत्रियों का सार्वजनिक आचरण भी लोगों को हतप्रभ कर गया। दोनों मुख्यमंत्रियों ने केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह से अपने ट्विटर अकाउंट के माध्यम से शिकायत की। राज्यों के मुख्यमंत्रियों से सार्वजनिक तौर पर ऐसे आचरण की अपेक्षा नहीं रहती पर दोनों मुख्यमंत्रियों ने जो किया उसके पीछे शायद यह कारण रहा कि दोनों अपने राज्य के नागरिकों के साथ खड़े दिखना चाहते थे। वैसे भी उत्तर-पूर्वी राज्यों के लोग ऐसे मौकों पर भावावेश में रहते हैं। यह बात राज्य के नेताओं को विवश करती है कि वे अपने नागरिकों के साथ खड़े दिखें। एक और कारण शायद यह था कि झड़प में पाँच पुलिसवालों की आकस्मिक मृत्यु असम के लोगों के लिए असाधारण बात थी।

उत्तर-पूर्वी राज्यों में आंतरिक सीमा विवादों का इतिहास पुराना है। असम और उसके पड़ोसी राज्यों के बीच ऐसे विवाद होते रहे हैं। इसके पीछे मुख्य कारण यह है कि मेघालय, नागालैंड और मिजोरम पहले असम का ही हिस्सा थे जो अलग-अलग समय में असम से राज्यों के रूप में अलग किए गए। इन तीन राज्यों के अलावा असम और अरुणाचल प्रदेश के बीच भी आंतरिक सीमा का विवाद रहा है जो अक्सर सीमा पर बसे नागरिकों के बीच होता रहता है। जनजातियों के बीच ऐसे विवाद अधिकतर खेती की जमीन जंगल या समय-समय पर अवैध निर्माण के कारण होते हैं। इन राज्यों में स्थानीय लोगों के बीच आंतरिक सीमाओं को लेकर विवाद इसलिए भी आम है क्योंकि कोई ऐसी सीमा होती नहीं जो दोनों राज्यों को अलग करे।

इन प्रदेशों में जनजातियों की भारी मात्रा में उपस्थिति के कारण उत्तर-पूर्वी राज्यों में प्रशासनिक व्यवस्था अधिकतर स्वायत्त स्थानीय काउंसिल के अधीन रहती है। ऐसे में राज्यों के प्रशासन के हर पहलू को दुरुस्त रखने की अपेक्षा करना हमेशा तार्किक नहीं लगता। वैसे भी जनजातियों के बीच संबंधों और संघर्षों का एक लम्बा इतिहास रहा है। पिछले चार-पाँच दशकों में इस स्थानीय व्यवस्था में जनसंख्या में हो रहे बदलाव के कारण ऐसे गुट भी बने हैं जो जनजातियों का हिस्सा नहीं रहे और हाल के वर्षों में इन जगहों पर पहुँचे हैं। यह एक ऐसी समस्या है जो पिछले लगभग सत्तर वर्षों से केवल असम ही नहीं बल्कि मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम में भी देखी गई है। इन बातों का प्रभाव स्थानीय प्रशासन और कानून व्यवस्था पर पड़ता ही है। असम में तेज़ी से हुए जनसंख्या में बदलाव का राजनीतिक और सामाजिक प्रभाव दिखाई देने लगा है।

इसके अलावा इन राज्यों में विकास और मूलभूत सुविधाओं को लेकर पहले की केंद्र और राज्य सरकारों के प्रदर्शन पर हमेशा प्रश्नचिन्ह लगता रहा। इन कारणों से ये राज्य न केवल बाकी के भारत से कटे रहे बल्कि इनमें नीति निर्धारण, विकास की रूपरेखा और उनका क्रियान्वयन न हो सका। ये ऐसी समस्याएं हैं जिनका हल निकालने में समय लगेगा। वर्तमान केंद्र सरकार के प्रयास पिछले कुछ वर्षों से दिख रहे हैं पर दशकों की समस्याओं का हल वर्षों में संभव नहीं हो सकता। जनजातियों का आर्थिक विकास जब तक कृषि पर निर्भर रहेगा तब तक ऐसी समस्याएं दिखाई देती रहेगी।

वर्तमान परिस्थितियों में केंद्र और राज्य सरकारों के लिए एक चुनौती यह तय करने की भी है कि जनजातियों में संवैधानिक या कानूनी दृष्टिकोण स्थापित करना कितना कठिन या सरल है? यह प्रश्न इसलिए और महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि असम और उसके पड़ोसी राज्य अपनी सीमाएं चार अलग-अलग देशों से साझा करते हैं। चुनौती यह तय करने की भी है कि जनजातियों के प्रति सरकारों का जो रवैया आज से पचास वर्ष पूर्व था, क्या आज भी प्रासंगिक है? क्या पिछले पांच दशकों में नई परिस्थितियाँ पैदा नहीं हुई जो स्थानीय प्रशासन के लिए ही नहीं बल्कि केंद्र और राज्य सरकारों के लिए नई चुनौती लेकर आई हैं। समय के अनुसार क्या समस्याएं, चुनौतियाँ और अवसर बदले नहीं हैं?

उत्तर-पूर्व में केंद्र और राज्य सरकारों के लिए उनकी लगातार बदलती भूमिका चुनौती भी लाती हैं और अवसर भी। यह तब और महत्वपूर्ण हो जाता है जब केंद्र में सत्ताधारी दल भाजपा किसी न किसी रूप में सभी राज्य सरकारों का हिस्सा है। असम के मुख्यमंत्री नॉर्थ ईस्ट डेमोक्रेटिक अलायंस के सबसे महत्वपूर्ण नेता हैं। उनकी भूमिका इसलिए और महत्वपूर्ण हो जाती है। उनके और साथ ही अन्य राज्यों के मुख्यमंत्रियों के लिए यह अवसर है कि दशकों से चल रहे आंतरिक सीमा विवाद का हल निकालने की दिशा में तेज़ी से कदम उठाएं। केंद्रीय गृह मंत्रालय को भी जल्दी दिखाते हुए इन सीमा विवादों का हल निकालने के प्रयासों में अपना योगदान देना चाहिए। हाल की बैठकों से स्पष्ट है कि एक प्रयास जारी है पर इसमें तेज़ी लाई जानी चाहिए ताकि ऐसी किसी घटना को दोबारा होने से रोका जा सके।

‘क्वीन का रोल ऑफर कर शूटिंग पर किया रेप’: पीड़िताओं को टॉर्चर कर बनाई गई अश्लील फिल्में, राज कुंद्रा को बेल से कोर्ट का इनकार

पोर्न केस में चारों ओर से फँसे कारोबारी राज कुंद्रा की मुश्किलें और बढ़ गई हैं। एक ओर मुंबई अदालत ने उनको जमानत देने से मना कर दिया है और दूसरी ओर कुछ अन्य पीड़िताएँ भी सामने आई हैं जिन्होंने इस केस में गंभीर आरोप लगाए हैं। पीड़िताओं का कहना है कि उनसे उन लोगों ने जबरन अश्लील सीन शूट करवाए जो कुंद्रा को कंटेंट भेजते थे और यही कंटेंट ऐप के मालिक को भी बेचा जाता था।

एक पीड़िता ने तो इस बाबत कई सबूत भी पेश किए। उसके पास ऑडिशन के लिए जो इंस्टाग्राम पर संदेश आए थे। उसने बताया कि पहले उसे शुरू शुरू में पोज देने के लिए कहा गया लेकिन हर ऑडिशन के हर चरण के बाद अश्लीलता बढ़ती गई। जब पीड़िता ने इन सबके लिए मना किया जो उसे मुकदमे की धमकी दी गई। साथ में पूरे शूट का खर्चा देने को भी कहा गया।

इसी तरह एक अन्य पीड़िता ने कहा कि घर की आर्थिक स्थिति के कारण उसे काम की बहुत ज्यादा जरूरत थी। वह ऑडिशन देने गई तो उसे रानी का रोल प्ले करने को कहा गया। वह तैयार हो गई। बाद में पता चला कि वह सामान्य ऑडिशन सेट अप नहीं था। पीड़िता बताती है कि जब उसने वहाँ से निकलने की कोशिश की तो आरोपितों ने डराने धमकाने वाले हथकंडों से उसे ब्लैकमेल किया, लेकिन वहाँ से उसे जाने नहीं दिया। जब उसने रोना शुरू किया तो चेहरे पर एक्स्ट्रा मेक अप लगाकर उसके आँसू छिपाए गए और पूरी फिल्म शूट की गई।

पीड़िता ने पुलिस को यह भी बताया कि उसकी वीडियो में नजर आने वाले एक्टर ने उसके साथ रेप किया और ये सब फिल्म में रिकॉर्ड हुआ। उसके रोने के कारण कई बार उसका मेकअप करना पड़ा और जब पूरी शूटिंग हो गई तो उसे 10 हजार रुपए थमा दिए गए और वहाँ से जाने को कहा गया।

बता दें कि राज कुंद्रा की बेल याचिका मामले में अभियोजन पक्ष की ओर से विरोध करते हुए अन्य पीड़िताओं के बयान का उल्लेख किया गया है। उन्होंने बताया कि कैसे आरोपित ने जरूरतमंद औरतों का फायदा उठा कर उन्हें इस अपराध की ओर ढकेला जबकि वह खुद अमीर और रसूखदार व्यक्ति थे।

कोर्ट में दावा किया गया कि बहुत सी अन्य पीड़िताओं ने भी सामने आकर शिकायत लिखवाई है। इसके अलावा ये भी संभव है कि राज कुंद्रा विदेश भाग जाएँ या जरूरी सबूतों को नष्ट कर दें। पूरे मामले को जानने समझने के बाद चीफ मेट्रोपोलिटियन मजिस्ट्रेट एसबी भाजीपाले ने उनकी बेल याचिका को रद्द कर दिया।

मालूम हो कि जिन धाराओं में राज कुंद्रा के विरोध केस चल रहे हैं उनमें अधिकतम सजा 7 साल की है। उनके विरुद्ध आईपीसी की धारा 292, 293 और आईटी एक्ट 67 और 67ए के तहत केस दर्ज है। कुंद्रा की ओर से माँग की गई है कि उन्हें हिरासत से राहत दी जाए। हालाँकि, कोर्ट इस केस में मुंबई पुलिस के जवाब का इंतजार कर रही है। इसके बाद यह मामला 29 जुलाई को सुना जाएगा।

जम्मू-कश्मीर के 5 जिले-7 जगह, कश्मीरी पंडितों के लिए बनेंगे फ्लैट: 3841 युवक घाटी लौटे

इस्लामिक आतंकवाद और कट्टरपंथ के कारण अपने घर छोड़ भागने को मजबूर हुए कश्मीरी पंडितों की केंद्र शासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर में वापसी की राह खुलने लगी है। उप राज्यपाल मनोज सिन्हा के नेतृत्व वाली प्रशासनिक परिषद ने 2015 के प्रधानमंत्री विकास पैकेज के तहत घाटी में विस्थापित कश्मीरी पंडितों के लिए 2744 फ्लैटों के निर्माण के लिए पाँच जिलों में भूमि हस्तांतरण को मँजूरी दे दी है। इसके तहत 278 कनाल जमीन आपदा प्रबंधन, राहत, पुनर्वास एवं पुननिर्माण विभाग को स्थानांतरित की जाएगी।

दूसरी तरफ बुधवार (28 जुलाई 2021) को केंद्र सरकार ने संसद में बताया कि सुरक्षा का अहसास होने के बाद से कश्मीर में प्रधानमंत्री पुर्नवास पैकेज के तहत रोजगार पाने के लिए हाल में 3841 युवा कश्मीरी पंडित वापस लौटे हैं। केंद्रीय गृ​ह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने राज्यसभा में एक सवाल के लिखित जवाब में यह बात कही। उन्होंने बताया कि इसी पैकेज के तहत 1997 लोगों का चयन अप्रैल में जॉब के लिए हुआ है और वे जल्द ही कश्मीर जाने वाले हैं।

18 महीने में तैयार हो जाएँगे फ्लैट

एक बयान में केंद्र शासित प्रदेश प्रशासन ने कहा है कि फ्लैट पाँच जिलों के सात स्थानों पर 356 करोड़ की अनुमानित लागत से बनाए जाएँगे। निर्माण कार्य 18 महीने में पूरा होने की उम्मीद है। इससे करीब 413 कुशल और अकुशल श्रमिकों को रोजगार मिलेगा। इसके पूरा होने के बाद ये आवासीय भवन प्रधानमंत्री राहत पैकेज के तहत कश्मीर में नौकरी पाने पाने वाले विस्थापित कश्मीरियों को दिया जाएगा।

इससे पहले केंद्र सरकार ने वर्ष 2015 में विस्थापित कश्मीरी पंडित कर्मचारियों के लिए 920 करोड़ रुपए की लागत से 6,000 ट्रांजिट आवास इकाइयों के निर्माण को मँजूरी दी थी। रिपोर्ट के मुताबिक साल 2015 में पीएम नरेंद्र मोदी ने कश्मीर में विकास योजनाओं के लिए 80,000 करोड़ रुपए के भारी-भरकम पैकेज की घोषणा की थी।

इससे पहले जम्मू-कश्मीर के उप राज्यपाल ने कश्मीरी पंडितों की वापसी को लेकर इसी महीने की 18 जुलाई को एक हाई लेवल मीटिंग की थी। इस दौरान उप राज्यपाल ने घाटी में कश्मीरी पंडितों को फिर से बसाने के लिए प्रशासन से सक्रिय तौर पर कदम उठाने के लिए कहा था। इसके साथ ही दूसरे राज्यों से घाटी में आने वाले प्रवासियों के रजिस्ट्रेशन में भी तेजी लाने का निर्देश प्रशासन को दिया गया था। उपराज्यपाल ने कहा था, “सबसे पहले हमें यह सुनिश्चित करना चाहिए कि कश्मीरी प्रवासियों की पूरी आबादी जम्मू-कश्मीर सरकार के साथ पंजीकृत हो।”

Twitter ने किया क़ानून का खुला उल्लंघन, दिल्ली HC ने दिया एक सप्ताह का अंतिम मौका: नए अधिकारियों को बताया था ‘अंतरिम’

दिल्ली हाईकोर्ट ने नए आईटी नियमों का पालन न करने को लेकर एक बार फिर से माइक्रो ब्लॉगिंग प्लेटफॉर्म Twitter को फटकार लगाई है। ट्विटर द्वारा पेश किए गए एक एफिडेविट को लेकर उसे फटकारा गया। इसमें उसने नए चीफ कंप्लायंस ऑफिसर और ग्रीवांस ऑफिसर की नियुक्ति ‘अस्थायी कर्मचारी’ के रूप में करने की बात बताई थी। दिल्ली हाईकोर्ट ने बुधवार (28 जुलाई, 2021) को Twitter को ‘अंतिम मौका’ दिया।

दिल्ली हाईकोर्ट ने आदेश दिया कि वो एक सप्ताह के भीतर एक बेहतर एफिडेविट लेकर अदालत के समक्ष पेश हो, जिसमें नए आईटी नियमों के मुताबिक अधिकारियों की नियुक्ति के पूरे विवरण हों। इसके लिए उसे एक सप्ताह का समय दिया गया है। साथ ही दिल्ली उच्च-न्यायालय ने ये प्रश्न भी पूछा कि Twitter ने अब तक नोडल कॉन्टेक्ट पर्सन के रूप में किसी अधिकारी की नियुक्ति क्यों नहीं की है?

जस्टिस रेखा पल्ली की एकल पीठ ने ट्विटर के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें कंपनी पर नए आईटी नियमों का पालन न करने का आरोप लगाया गया था। हाईकोर्ट ने इस पर टिप्पणी करते हुए कहा कि ट्विटर की एफिडेविट से पता चलता है कि उसने पूरी तरह से नए आईटी नियमों की धज्जियाँ उड़ाई हैं। कोर्ट ने कहा, “हमें समझ नहीं आ रहा कि आपकी कंपनी क्या करना चाह रही है? जो भी करना है, जी जान से करिए।”

ट्विटर के खिलाफ दलील पेश की गई थी कि उसने नए आईटी नियमों के मुताबिक अधिकारियों की सिर्फ ‘अंतरिम नियुक्ति’ की है। नोडल ऑफिसर की नियुक्ति भी ज़रूरी है, क्योंकि वही जाँच एजेंसियों और कंपनी के बीच एक पुल का काम करेगा। ट्विटर ने इसे लेकर अब तक सिर्फ मौखिक आश्वासन ही दिया है, जिसे अब उससे लिखित में लिया जाएगा। कोर्ट ने कर्मचारियों की ‘अस्थायी’ नियुक्ति पर आपत्ति जताई।

दिल्ली हाईकोर्ट ने पूछा, ” ये ‘Contingent Worker‘ क्या होता है? इसके क्या अर्थ हुआ? इससे ऐसा प्रतीत होता है जैसे उन अधिकारियों की ड्यूटी किसी आकस्मिक खर्च पर आधारित हो। हमें पता ही नहीं कि इसमें थर्ड पार्टी कांट्रेक्टर कौन है। हम नहीं समझे, आप इन शब्दों का मतलब समझाइए। ये कानून का पूर्णरूपेण उल्लंघन है। ऐसा नहीं चलेगा।” ट्विटर ने अब पारदर्शी और स्पष्ट एफिडेविट पेश करने की बात कही है।

कोर्ट ने कहा कि एक 31 वर्ष के व्यक्ति को ये पद दिया गया है और वो अधिकारी ही कह रहा है कि वो ट्विटर का कर्मचारी नहीं है। कोर्ट ने नियमों का हवाला देते हुए कहा कि इस पद को लेकर कंपनी गंभीरता दिखाए। अगले एफिडेविट में इसकी डिटेल्स माँगी गई है। ट्विटर ने कहा कि वो नए नियमों का पालन करने के लिए पूरा जोर लगा रहा है। अमित आचार्य नाम के अधिवक्ता ने ट्विटर के खिलाफ याचिका दायर की थी।

बकरीद की ढील का दिखने लगा असर? केरल में 1 दिन में कोरोना संक्रमण के 22129 केस, 156 मौतें भी

देश भर में जहाँ कोरोना की दूसरी लहर के बाद बढ़ाई गई सख्तियों ने स्थिति को नियंत्रित किया, वहीं केरल में बकरीद पर दी गई रियायतों ने हालात को बेकाबू कर दिया है। वहाँ केवल एक दिन में 22 हजार से ज्यादा केस आए हैं और एक ही दिन में 156 मौतें भी दर्ज हुई हैं। इन आँकड़ों के साथ ही केरल वह पहला राज्य बन गया है जहाँ पिछले 50 दिन में 20 हजार के ऊपर मामले आए हों।

साभार: Covid19india.org

रिपोर्ट्स के मुताबिक राज्य में पॉजिटिविटी रेट 12.35% है। मई के बाद यह पहली दफा है कि राज्य में कोविड केसों का आँकड़ा 22 हजार पार किया हो। पूरे देश भर में रिपोर्ट हुए कोविड केसों में 53 % मामले अकेले केरल से आए हैं। पिछले 24 घंटों में जहाँ भारत में 42, 917 नए केस रिपोर्ट हुए, रिकवरी 41, 653 लोगों की हुई। ऐसे में अकेले केरल से आए एक दिन के आँकड़े (22129) चौंकाने वाले हैं।

साभार: Covid19india.org

पिछले दो हफ्तों से केरल में औसतन हर दिन 15 हजार केस दर्ज हो रहे थे। लेकिन मंगलवार को इसमें अचानक बढ़त देखने को मिली। अब तक राज्य में कुल केसों की संख्या 33, 87, 716 है। महाराष्ट्र के बाद केसों की गिनती के मामले में केरल दूसरे नंबर पर है। यहाँ अब भी 1.45 केस एक्टिव हैं जबकि महाराष्ट्र में 82000 केस एक्टिव हैं। वहीं मंगलवार को हुई 156 मौतों को मिलाकर वहाँ मरने वालों की कुल संख्या 16, 326 पहुँच गई है।

साभार: Covid19india.org

उत्तरी केरल के मुस्लिम बहुल इलाकों में सबसे ज्यादा केस रिकॉर्ड किए गए हैं। मलप्पुरम जिले ने एक ही दिन में 4,037 मामलों के साथ सबसे अधिक पॉजिटिव मामले दर्ज किए। इसके बाद त्रिशूर में 2,623; कोझीकोड में 2,397; एर्नाकुलम में 2,352; पलक्कड़ में 2,115; कोल्लम में 1,914; कोट्टायम में 1,136; तिरुवनंतपुरम में 1,100; कन्नूर में 1,072; अलाप्पुझा में 1,064; कासरगोड में 813; वायनाड में 583; पठानमथिट्टा में 523 और इडुक्की में 400 केस दर्ज हुए हैं।

साभार: Covid19india.org

माना जा रहा है कि केरल में जिस तरह से आँकड़ों में उछाल देखने को मिला है इसके पीछे का कारण पिनराई विजयन सरकार द्वारा बकरीद में दी गई राहत है। कई लोग इस पर ट्वीट कर रहे हैं। भाजपा नेता संबित पात्रा ने भी सवाल खड़े किए हैं। उनका कहना है, “बकरीद के समय 3 दिन की जो छूट केरल सरकार ने दी, उस पर सुप्रीम कोर्ट ने भी चिंता जताई और कहा कि ‘कावड़ यात्रा के मामले में हमने जो फैसला दिया है, उन हिदायतों का पालन बकरीद के समय केरल सरकार को भी करना चाहिए।’ मगर तुष्टिकरण की राजनीति जीती और सुप्रीम कोर्ट की इन हिदायतों का पालन केरल की सरकार ने किया। जिसका नतीजा है आज 22,000 केस आना।”

बता दें कि केरल सरकार ने बकरीद की वजह से 18, 19 और 20 जुलाई को लॉकडाउन में छूट दी थी। 21 जुलाई को बकरीद थी। ऐसे में त्योहार से जुड़ी खरीदारी के मद्देनजर प्रतिबंधों में ढील दी गई थी। साथ ही मुख्यमंत्री कार्यालय (सीएमओ) की ओर से दी गई जानकारी में कहा गया था कि ए, बी और सी कैटेगरी की जरूरी सामान वाली दुकानों के साथ ही कपड़ा, इलेक्ट्रॉनिक्स और फैंसी ज्वैलरी की भी दुकानों को रात 8 बजे तक खोले जाने की अनुमति है।

इस मामले पर शीर्ष अदालत ने भी केरल सरकार को फटकार लगाई थी। कोर्ट ने बकरीद में दी गई राहत मामले पर सुनवाई करते हुए कहा था कि यह चौंकाने वाली स्थिति है कि केरल सरकार ने लॉकडाउन मानदंडों में ढील देने में व्यापारियों की माँग को मान लिया। इसी के साथ सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर सरकार की ओर से दी गई ढील के चलते राज्य में कोरोना का संक्रमण फैलता है तो कोर्ट उचित कार्रवाई करेगी। बेंच ने सुनवाई में साफ कहा था कि किसी भी तरह का दबाव भारत के नागरिकों के जीवन के सबसे कीमती अधिकार से ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं हो सकता है। अगर कोई अप्रिय घटना होती है तो कोई भी जनता इसे संज्ञान में ला सकती है और उसके अनुसार कार्रवाई की जाएगी।

राजस्थान में उत्तराखंड के नितिन पंत का बंदूक के दम पर धर्मांतरण, बना दिया अली हसन: विरोध करने पर देते थे करंट, मदरसे में पिटाई

उत्तराखंड में इस्लामी धर्मांतरण का नया मामला सामने आया है। उत्तराखंड के रहने वाले नितिन पंत का राजस्थान में धर्मांतरण करा कर उसे ‘अली हसन’ बना दिया गया था। इसके लिए उसे रुपए, नौकरी और घर देने का लालच देकर उसके साथ ऐसा किया गया है। वो किसी तरह आरोपितों के चंगुल से निकल कर उत्तर प्रदेश के सहारनपुर पहुँचा और वहाँ के हिन्दू पदाधिकारियों को अपनी आपबीती सुनाई।

‘अमर उजाला’ की खबर के अनुसार, बजरंग दल (हिंदुस्तान) के पदाधिकारी निपुण भारद्वाज ने जानकारी दी कि नितिन पंत फिलहाल बहुत डरा हुआ है और उसने सहारनपुर के ही बालाजी घाट पर शरण ले रखी है। 2010 में वो नौकरी की तलाश में राजस्थान का भिवाड़ी गया था। वहाँ मुस्लिम समाज के कुछ लोग मिले, जो उसे जबरन पकड़ कर मेवात में ले गए। वहाँ उसका धर्म-परिवर्तन करा दिया गया।

जब उसने इन सबका विरोध किया तो उसके साथ मारपीट भी की गई। साथ ही उसे व उसके परिवार को जान से मार डालने की धमकी दी गई। उसे लालच दिया गया था कि अगर वो इस्लाम अपना लेता है तो उसकी शादी भी करा दी जाएगी। उस पर दबाव बनाया गया था कि अब वो हिन्दू समाज की लड़कियों को फँसाए और उनसे इस्लाम कबूल करवाए। इसके बाद उसे मुजफ्फरनगर के फुलत ले जाया गया।

फिर मेरठ के एक अधिवक्ता के पास ले जाकर ‘शपथ-पत्र’ बनवाया गया। उसे सहारनपुर में उमाही गाँव में स्थित एक मदरसे रखा गया था, लेकिन वो किसी तरह वहाँ से भागने में कामयाब रहा। निपुण भारद्वाज और बालाजी घाट के संचालक अतुल तुली ने जानकारी दी कि आरोपितों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई के लिए पुलिस से माँग की गई है। नितिन पंत का शुद्धिकरण करा कर घर-वापसी कराई गई है।

उसने बताया कि मुस्लिम समाज के जिन लोगों ने उसे निशाना बनाया था, वो दबंग थे। धर्मांतरण के लिए पिस्तौल का भय भी दिखाया गया था। विरोध करने पर करंट देते थे। मुजफ्फरनगर के मदरसे में भी उसकी पिटाई हुई थी। ये गिरोह हिन्दू लड़कियों को भी अपने जाल में फँसा कर मुस्लिम बनाता था। हिन्दू कार्यकर्ताओं ने एसपी सिटी को मामले की जानकारी दी है, जिसके बाद जाँच चल रही है। पुलिस जल्द ही इस मामले में मुकदमा दर्ज करेगी।

हाल ही में उत्तर प्रदेश के बिजनौर जिले का रहने वाले अनुसूचित जाति के एक शख्स का पुणे में धर्मांतरण करने का मामला सामने आया था। हालाँकि, हंगामा होने के बाद इसने अपने मूल हिंदू धर्म में वापसी कर ली थी। दरअसल, डेविड कुमार नाम का यह शख्स पुणे के एक बेकरी में काम करता था। इसी दौरान बेकरी संचालकों ने उसकी गरीबी दूर करने के नाम पर उसका धर्म परिवर्तन करवा दिया। धर्मांतरण के बाद युवक ने अपना नाम डेविड कुमार से बदलकर मोहम्मद बिलाल रख लिया था।

श्री नयना देवी में मील के पत्थरों पर लिखे गए खालिस्तान समर्थक नारे, श्रद्धालुओं में दहशत फैलाने की कोशिश

हिमाचल प्रदेश में श्री नयना देवी-कोलां वाला टोबा सड़क पर खालिस्तानी आतंकवादी संगठन और जरनैल सिंह भिंडरावाले के समर्थन में नारे लिखे गए हैं। असामाजिक तत्वों ने इन पत्थरों पर खालिस्तान की हद शुरू, खालिस्तान बिच तुहाड्डा स्वागत है, खालिस्तान जिंदाबाद लिखा है। वहीं पुलिस और आम लोग इसे शरारती तत्वों का काम बताते हुए इलाके में माहौल खराब करने की साजिश बता रहे हैं।

रिपोर्ट्स के मुताबिक स्थानीय पुलिस ने बताया कि सड़क के मील के पत्थर पर खालिस्तानी नारे लिखना शरारती तत्वों की करतूत है, जो माहौल खराब करने और लोगों में दहशत पैदा करने पर आमादा हैं। पुलिस ने कहा कि खालिस्तानी नारों के साथ मील के पत्थर को खराब करने के लिए जिम्मेदार लोगों का पता लगाने के लिए जाँच के आदेश दिए गए हैं। डीएसपी श्री नयना देवी जी पूर्ण चंद ने कहा कि पुलिस जल्द ही तोड़फोड़ के लिए दोषी लोगों का पता लगाकर उन्हें गिरफ्तार करेगी।

बताया जा रहा है कि यह मामला तब प्रकाश में आया जब स्थानीय लोगों ने प्रशासन को इसके बारे में अवगत करवाया। लोगों ने देखा कि जगह-जगह पर पेंट से और मार्कर पेन से खालिस्तान जिंदाबाद, खालिस्तान में शामिल हो और पंजाबी भाषा में जनमत संग्रह 2021 व एसएसजे में शामिल हो लिखा है। कोलां वाला टोबा से गाड़ियों में आने वाले हजारों की संख्या में श्रद्धालुओं की नजर इन पत्थरों पर पड़ रही है। 

गौरतलब है कि इस साल श्री नयना देवी में श्रावण अष्टमी के मेले आरंभ होने जा रहे हैं। हजारों श्रद्धालु श्री नयना देवी में श्रावण अष्टमी मनाने के लिए कोलां वाला टोबा से यात्रा कर रहे हैं। ऐसे में असामाजिक तत्वों की करतूतों से हड़कंप मच गया है, जिससे लोगों में यह संदेह बढ़ रहा है कि ये लोग उत्सव को बाधित करना चाहते हैं।