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कपड़े से लेकर खाने तक और रुई से लेकर प्लास्टिक तक… अब बांग्लादेश अपना माल रखे अपने पास: मोदी सरकार ने सबके आयात पर लगाया बैन, अधिसूचना जारी

भारत की मोदी सरकार ने बांग्लादेश को एक बड़ा झटका दिया है। 17 मई 2025 को एक अधिसूचना जारी कर मोदी सरकार ने बांग्लादेश से आने वाले रेडिमेड कपड़ों, प्रोसेस्ड फुड और फ्रूट ड्रिंक्स आदि पर पाबंदी लगा दी। अधिसूचना में कहा गया कि बांग्लादेश की ये सारी चीजें केवल मुंबई के न्हावा शेवा और कोलकाता के समुद्री बंदरगाहों के माध्यम से आएँगी और किसी बंदरगाह से नहीं।

वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के वाणिज्य विभाग के अंतर्गत विदेश व्यापार महानिदेशालय ने शनिवार (17 मई 2025) को एक अधिसूचना जारी कर इसकी जानकारी दी। यह फैसला बांग्लादेश सरकार के प्रमुख मोहम्मद युनुस के चीन में दिए गए विवादास्पद बयान के बाद लिया गया। जहाँ युनुस ने कहा था कि भारत के पूर्वोत्तर राज्य समुद्र से कटे हुए हैं और उन्हें समुद्र तक पहुँचने के लिए बांग्लादेश पर निर्भर रहना पड़ता है।

इसी बयान के बाद अधिसूचना जारी हुई। अब भारत के बंदरगाहों (न्हावा शेवा और कोलकाता बंदरगाहों को छोड़कर) पर बांग्लादेश से आने वाले सभी प्रकार के रेडिमेड कपड़ों, फल और फलों के स्वाद वाले और कार्बोनेटेड ड्रिंक्स, प्रोसेस्ड फुड, प्लास्टिक और पीवीसी तैयार सामान और लकड़ी के फर्नीचर के आयात पर प्रतिबंध लगा दिया गया है।

अधिसूचना के अनुसार, फल और फलों के स्वाद वाले कार्बोनेटेड ड्रिंक्स, बेक्ड सामान, स्नैक्स, चिप्स और कन्फेक्शनरी, कपास और कॉटन याम अपशिष्ट, प्लास्टिक और पीवीसी से तैयार सामान और लकड़ी के फर्नीचर के आयात को असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम में किसी भी भूमि सीमा शुल्क स्टेशनों (LCS) / एकीकृत चेक पोस्ट (ICP) और पश्चिम बंगाल में चंगराबांधा और फुलबारी के भूमि सीमा शुल्क स्टेशनों के माध्यम से अनुमति नहीं दी जाएगी।

इससे पहले 09 अप्रैल 2025 को भारत सरकार ने भारतीय बंदरगाहों और हवाई अड्डों पर भीड़भाड़ का हवाला देते हुए बांग्लादेश को पहले दी गई ट्रांसशिपमेंट सुविधा को वापस लेने की घोषणा की थी। इस सुविधा के तहत बांग्लादेश को भारत-बांग्लादेश सीमा पर स्थित पेट्रापोल लैंड पोर्ट से कंटेनर ट्रक भेजने की अनुमति दी गई थी, जो दक्षिण एशिया का सबसे बड़ा लैंड पोर्ट है। यह कोलकाता बंदरगाह, कोलकाता एयरपोर्ट के एयर कार्गो कॉम्प्लेक्स, महाराष्ट्र के न्हावाशेवा पोर्ट और दिल्ली एयरपोर्ट तक जाता है।

ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारत के हाथ लगा ‘खजाना’, दुनिया की बड़ी ताकतें हमारे सामने फैला रही हाथ: रिवर्स इंजीनियरिंग के कमाल से चीन-पाक को पीछे छोड़ देगा हिंदुस्तान

भारत के एयर डिफेंस सिस्टम ने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान की ओर से दागी गई चीनी पीएल-15ई मिसाइल को नष्ट कर एक बड़ा कारनामा किया। भारत ने न सिर्फ इन मिसाइलों को मार गिराया, बल्कि मलबा भी बरामद किया है। अब इस मिसाइल के मलबे ने वैश्विक ताकतों का ध्यान खींचा है।

फाइव आईज देश (ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, न्यूजीलैंड, यूनाइटेड किंगडम, अमेरिका), फ्रांस और जापान इस मलबे को हासिल करने में रुचि दिखा रहे हैं। चूँकि पंजाब के होशियारपुर में 9 मई 2025 को इस मिसाइल के न सिर्फ टुकड़े मिले, जिसमें मिसाइल लगभग पूरी तरह से सुरक्षित भी मिली है। अब इसके पीछे वैश्विक ताकतें भी आ चुकी हैं।

भारतीय वायु सेना के एयर मार्शल भारती ने 12 मई 2025 को प्रेस कॉन्फ्रेंस में बताया कि पाकिस्तान ने जे-10सी और जेएफ-17 लड़ाकू विमानों से ये मिसाइलें दागी थीं, लेकिन भारत की एस-400 और आकाश तीर एयर डिफेंस सिस्टम ने इन्हें नाकाम कर दिया।

पीएल-15ई एक अत्याधुनिक लंबी दूरी की हवा से हवा में मार करने वाली मिसाइल है, जिसे चीन ने बनाया है। यह 300 किलोमीटर तक की रेंज और मैक 5 की गति के साथ दुश्मन के विमानों को निशाना बना सकती है। हालाँकि, निर्यात संस्करण पीएल-15ई की रेंज थोड़ी कम है। इसमें एक्टिव रडार सीकर, जाम-प्रतिरोधी विशेषताएँ और ड्यूल-पल्स सॉलिड रॉकेट मोटर जैसे उन्नत फीचर्स हैं।

होशियारपुर में मिला मलबा इसमें मौजूद प्रणोदन प्रणाली, डेटा लिंक, रडार सीकर और इनर्शियल रेफरेंस यूनिट की जानकारी दे सकता है, जो चीन की सैन्य तकनीक को समझने के लिए अहम है।

वैश्विक ताकतों की भी इस मलबे में रुचि इसीलिए है, क्योंकि यह फाइव आईज, फ्रांस और जापान को चीन की मिसाइल तकनीक की गहराई से जाँच करने का मौका देगा। राफेल विमान को फ्रांस से बनाया है। चूँकि भारत राफेल का इस्तेमाल करता है और उसके आमने-सामने चीन और पाकिस्तान ही हैं, ऐसे में वो इस मिसाइल को समझना चाहता है। वहीं, जापान जो चीन के साथ क्षेत्रीय तनाव का सामना कर रहा है, वह भी इस मिसाइल की तकनीक को समझना चाहता है।

भारत इस मलबे को डीआरडीओ लैब में विश्लेषण के लिए भेज रहा है और माना जा रहा है कि अमेरिका जैसे मित्र देशों को भी इस डेटा तक पहुँच मिल सकती है।

रिवर्स इंजीनियरिंग का इतिहास पुराना

रिवर्स इंजीनियरिंग यानी किसी तकनीक को तोड़कर उसकी बनावट और कार्यप्रणाली समझना, सैन्य और तकनीकी क्षेत्र में क्रांति ला चुका है। दुनिया भर में देशों ने दुश्मन की तकनीक को रिवर्स इंजीनियरिंग के जरिए कॉपी किया और अपनी ताकत बढ़ाई। इसे इस बात से समझ सकते हैं कि जब ओसामा बिन लादेन को मारने के दौरान अमेरिकी हेलीकॉप्टर पाकिस्तान के एटबाबाद में खराब हो गया था, तब अमेरिकी सेना ने उसे वहीं पर पूरी तरह से नष्ट कर दिया, ताकि पाकिस्तान-चीन उसकी रिवर्स इंजीनियरिंग न कर सकें।

चीन की रिवर्स इंजीनियरिंग

चीन ने रिवर्स इंजीनियरिंग का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया। उदाहरण के लिए, उसने सोवियत संघ के मिग-21 जेट को कॉपी कर जे-7 फाइटर जेट बनाया। मिग-21 के डिज़ाइन को समझकर चीन ने इसे अपने हिसाब से बदला और बड़े पैमाने पर उत्पादन किया। इसी तरह रूस के सु-27 जेट की रिवर्स इंजीनियरिंग से चीन ने जे-11 और जे-16 जैसे फाइटर जेट विकसित किए। चीन का पहला विमानवाहक पोत लियाओनिंग भी सोवियत युग के वारयाग जहाज को खरीदकर रिवर्स इंजीनियरिंग से बनाया गया।

इसके अलावा चीन ने अमेरिकी स्टील्थ तकनीक को भी रिवर्स इंजीनियरिंग से समझने की कोशिश की, जब 1999 में सर्बिया में एक अमेरिकी एफ-117 स्टील्थ जेट नष्ट हुआ था।

अमेरिका और मिग-25

अमेरिका ने भी रिवर्स इंजीनियरिंग का सहारा लिया। 1976 में सोवियत पायलट विक्टर बेलेनको ने मिग-25 जेट को जापान में उतारकर शरण माँगी। अमेरिका और जापान ने मिलकर इस जेट के पुर्जे-पुर्जे को खोल लिया और इसकी तकनीक का गहरा अध्ययन किया।

इस घटना ने जापान को सोवियत तकनीक की गहरी समझ दी, जिससे उसने अपने रक्षा तंत्र को मजबूत किया। वहीं, मिग-25 की रडार, इंजन और स्टील्थ विशेषताओं को समझने के बाद अमेरिका ने अपने एफ-15 और एफ-16 जेट्स को बेहतर बनाया। हालाँकि, दबाव में जेट को सोवियत संघ को लौटाना पड़ा, लेकिन इस रिवर्स इंजीनियरिंग ने जापान और अमेरिका को तकनीकी बढ़त दी।

पीएल-15ई की रिवर्स इंजीनियरिंग से भारत को फायदा

पीएल-15ई मिसाइल की रिवर्स इंजीनियरिंग से भारत और फाइव आईज देशों को कई फायदे हो सकते हैं। सबसे पहले…

  1. इस मिसाइल के एक्टिव रडार सीकर और ड्यूल-पल्स मोटर की तकनीक को समझकर भारत अपनी मिसाइल रक्षा प्रणालियों को और मजबूत कर सकता है। डीआरडीओ इस डेटा का इस्तेमाल आकाश, बराक-8 और नई मिसाइलों को बेहतर बनाने में कर सकता है।
  2. यह मिसाइल की जाम-प्रतिरोधी विशेषताओं को समझने से भारत को इलेक्ट्रॉनिक युद्ध में बढ़त मिलेगी। पाकिस्तान के पास जे-10सी और जेएफ-17 जैसे विमान हैं, जो पीएल-15ई ले जा सकते हैं। इस तकनीक को समझकर भारत अपनी वायु सेना को इन खतरों से निपटने के लिए तैयार कर सकता है।
  3. चीन के खिलाफ भारत को रणनीतिक लाभ मिलेगा। चीन की जे-20 और जे-16 जैसी स्टील्थ विमान इस मिसाइल का इस्तेमाल करते हैं। पीएल-15ई की कमजोरियों को जानकर भारत अपनी राफेल, सुखोई-30 और तेजस विमानों की रक्षा रणनीति को मजबूत कर सकता है।

फाइव आईज देशों के लिए यह मलबा चीन की सैन्य ताकत को समझने का सुनहरा मौका है। अमेरिका, जो पहले ही मिग-25 जैसी रिवर्स इंजीनियरिंग कर चुका है, इस डेटा से अपनी मिसाइल रक्षा प्रणालियों को अपग्रेड कर सकता है। फ्रांस अपने राफेल जेट्स को पीएल-15ई के खिलाफ बेहतर बना सकता है, जबकि जापान को दक्षिण चीन सागर में चीन के खतरे से निपटने में मदद मिलेगी।

पीएल-15ई मिसाइल का मलबा भारत के लिए एक तकनीकी खजाना है। रिवर्स इंजीनियरिंग से भारत न केवल पाकिस्तान, बल्कि चीन के खिलाफ भी अपनी रक्षा तैयारियों को मजबूत कर सकता है। साथ ही फाइव आईज, फ्रांस और जापान जैसे देशों के साथ सहयोग से भारत वैश्विक मंच पर अपनी स्थिति को और सशक्त करेगा। रिवर्स इंजीनियरिंग का इतिहास बताता है कि ऐसी तकनीकों ने देशों को सैन्य और तकनीकी रूप से सशक्त बनाया है, और भारत के पास अब ऐसा ही मौका है।

कैराना का नोमान इलाही निकला ISI का जासूस, 4 बार जा चुका पाकिस्तान: ऑपरेशन सिंदूर के दौरान दुश्मन मुल्क को दे रहा था अहम सूचनाएँ

उत्तर प्रदेश के शामली जिले के कैराना से एक सनसनीखेज मामला सामने आया है, जहाँ बेगमपुरा मोहल्ले का नोमान इलाही पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ISI के लिए जासूसी करते पकड़ा गया। नोमान पहले बेरोजगार था और अपने अब्बू के साथ पासपोर्ट और दस्तावेज बनवाने का काम करता था। अब्बू की मौत के बाद उसने यह धंधा संभाला, लेकिन लालच में आकर ISI के जासूसी नेटवर्क से जुड़ गया।

जाँच एजेंसियों के अनुसार, नोमान पासपोर्ट सेवा केंद्र की आड़ में उन लोगों के दस्तावेज तैयार करता था, जो सऊदी अरब, पाकिस्तान या अन्य देशों में जाने की योजना बनाते थे। नोमान के घर से आठ संदिग्ध पासपोर्ट बरामद हुए हैं।

पासपोर्ट सेवा केंद्र से जुड़कर दस्तावेजों को बनवाने के दौरान ही नोमान ISI एजेंट इकबाल काना के संपर्क में आया और देश की गोपनीय जानकारी पाकिस्तान भेजने लगा। नोमान चार बार पाकिस्तान जा चुका है, जहाँ उसने ISI हैंडलरों से मुलाकात की। उसकी बुआ और मौसी पाकिस्तान में रहती हैं, जिसका बहाना बनाकर वह वहाँ जाता रहा। हाल ही में हरियाणा पुलिस ने उसे पानीपत से गिरफ्तार किया, जहाँ वह चार महीने से अपनी बहन के घर रहकर फैक्ट्री में सिक्योरिटी गार्ड की नौकरी कर रहा था।

पूछताछ में नोमान ने खुलासा किया कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान ISI सक्रिय थी और वह भारतीय सेना की गतिविधियों की जानकारी मोबाइल और सोशल मीडिया के जरिए भेजता था। उसके घर से आठ संदिग्ध पासपोर्ट बरामद हुए हैं। जाँच में पता चला कि वह जन सुविधा केंद्र के जरिए फर्जी दस्तावेज भी बनवाता था। उसकी गिरफ्तारी के बाद जाँच यूपी, हरियाणा, दिल्ली, देहरादून और पानीपत तक फैल गई है।

जाँच एजेंसियों का मानना है कि यह अकेले नोमान का मामला नहीं, बल्कि एक बड़ा जासूसी नेटवर्क है, जिसमें कैराना, शामली और अन्य क्षेत्रों के युवक शामिल हो सकते हैं। यह नेटवर्क फेरीवालों, प्राइवेट नौकरी करने वालों और दस्तावेज सेवाओं से जुड़े लोगों के जरिए चल रहा है। नोमान को यूपी पुलिस को सौंप दिया गया है और उसके सभी संपर्कों की जाँच जारी है।

ऑपरेशन सिंदूर में ISRO की भूमिका रही निर्णायक, लक्ष्यों की पहचान से लेकर दुश्मन मिसाइलों की ट्रैकिंग तक: जानें – कैसे आसमानी कमाल से भारत ने पाकिस्तान को दी शिकस्त

भारत अपनी अंतरिक्ष और रक्षा क्षमताओं को नई ऊँचाइयों पर ले जा रहा है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) रविवार (18 मई 2025) सुबह 5:59 बजे अपनी 101वीं मिशन के तहत ईओएस-09 उपग्रह लॉन्च करने जा रहा है। यह उपग्रह पोलर सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल (पीएसएलवी-सी61) के जरिए श्रीहरिकोटा के सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से प्रक्षेपित होगा। जो भारत की निगरानी क्षमता को और भी मजबूत करेगा।

इसरो ने ऑपरेशन सिंदूर में निभाया अहम रोल

ऑपरेशन सिंदूर के दौरान देश की सुरक्षा में इसरो की भूमिका अभूतपूर्व रही। इसरो के सैटेलाइट खासतौर पर RISAT और कार्टोसेट का बड़ा रोल रहा। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान इन सैटेलाइट ने भारतीय सेना को दुश्मन की लोकेशन, मूवमेंट और ठिकानों की सटीक जानकारी दी। इसी वजह से भारतीय वायुसेना ने 23 मिनट में टारगेट को सफलतापूर्वक तबाह कर दिया, वो भी बिना लाइन ऑफ कंट्रोल पार किए।

इसरो की तकनीक की वजह से भारत को आतंकियों और दुश्मन की तकनीकी चाल, डिफेंस एस्टेब्लिशमेंट, रडार, एयर डिफेंस सिस्टम और हथियारों की लोकेशन और स्ट्रैटेजिक तैयारी की पहले से जानकारी मिल गई। इन सेटेलाइट्स की हाई रेजोल्यूशन इमेजिंग और अंधेरे में भी काम करने की क्षमता ने पूरे ऑपरेशन सिंदूर को सफल बनाया।

इसरो के चेयरमैन वी. नारायणन ने बताया कि ऑपरेशन सिंदूर में 10 उपग्रहों ने भारतीय सेना की मदद की, जिससे पाकिस्तान के ड्रोन और मिसाइल हमलों को नाकाम किया गया।

इसरो प्रमुख ने इम्फाल में सेंट्रल एग्रीकल्चरल यूनिवर्सिटी के दीक्षांत समारोह में कहा, “हमारे कम से कम 10 उपग्रह लगातार देश की सुरक्षा के लिए काम कर रहे थे। हमारे 7,000 किलोमीटर के समुद्री तट और उत्तरी सीमाओं की निगरानी के लिए उपग्रह और ड्रोन तकनीक जरूरी है।” उन्होंने बताया कि इसरो के बनाए भारतीय उपग्रहों ने पाकिस्तानी ड्रोन और मिसाइलों की सटीक जानकारी दी, जिससे अकाशतीर और अन्य स्वदेशी वायु रक्षा प्रणालियों ने इन्हें नष्ट कर दिया।

इसरो के उपग्रहों की कैमरा रिजॉल्यूशन 26 सेंटीमीटर तक है, जो दुनिया में सबसे बेहतरीन है। नारायणन ने कहा, “हमारे सभी उपग्रह सटीकता के साथ काम करते हैं और देश की सुरक्षा व विकास के लिए हैं।”

नारायणन ने गुरुवार (15 मई 2025) को चेन्नई में पत्रकारों से कहा, “हमने जनवरी में श्रीहरिकोटा से 100वाँ रॉकेट लॉन्च किया था। अब 101वां उपग्रह ईओएस-09 लॉन्च होने जा रहा है।” उन्होंने बताया कि इसरो के सभी मिशन देश की जरूरतों के हिसाब से बनाए जाते हैं। “हम किसी देश से प्रतिस्पर्धा नहीं करते। हमारे मिशन देश की सुरक्षा और विकास के लिए हैं।”

बता दें कि इसरो अब अपने 101वें मिशन में जुटा है। इस मिशन में इसरो ईओएस-09 उपग्रह, जिसे रिसैट-1बी को लॉन्च करेगा। जो भारत की पृथ्वी अवलोकन क्षमता को और मजबूत करेगा। इसका वजन 1,696.24 किलोग्राम है और यह सी-बैंड सिंथेटिक एपर्चर रडार (एसएआर) से लैस है। यह रडार दिन-रात और हर मौसम में उच्च-रिजॉल्यूशन तस्वीरें ले सकता है। यह उपग्रह कृषि, वन, आपदा प्रबंधन, शहरी नियोजन और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में मदद करेगा। इसकी मिशन अवधि 5 साल है और इसमें मिशन खत्म होने के बाद सुरक्षित डी-ऑर्बिटिंग के लिए ईंधन भी है। यह उपग्रह सन-सिंक्रोनस पोलर ऑर्बिट में स्थापित होगा।

गौरतलब है कि इसरो ने 1979 में अपनी अंतरिक्ष यात्रा शुरू की थी। 1980 में पहला सफल लॉन्च हुआ था। आज इसरो के 50 से ज्यादा उपग्रह टीवी प्रसारण, दूरसंचार और सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में काम कर रहे हैं। ऑपरेशन सिंदूर में इसरो की तकनीक ने भारत को पाकिस्तान पर निर्णायक बढ़त दिलाई। ईओएस-09 की लॉन्चिंग के साथ भारत और इसरो अब अपनी अंतरिक्ष तकनीक को और मजबूत करने की दिशा में बढ़ रहे हैं।

दिमाग में भर रहे कट्टरपंथ, तालीम दे रहे आतंकवाद की: समझें कैसे पंजाब-हरियाणा के युवाओं को निशाना बना रहा पाकिस्तान, ISI कर रहा ‘खालिस्तान प्लान’ एक्टिव

पंजाब और हरियाणा में बीते कुछ समय से खालिस्तानी और पाकिस्तान की ISI की गतिविधियाँ बढ़ गई हैं। खुफिया एजेंसियों का कहना है कि ISI की मदद से खालिस्तानी आतंकी भारत में घुसपैठ कर रहे हैं। वे ड्रोन और दूसरे तरीकों से पंजाब-हरियाणा में हथियार और गोला-बारूद भेज रहे हैं।

खालिस्तानी आतंकियों की गिरफ्तारियाँ और बरामदगी

हरियाणा के कैथल में 17 मई 2025 को देवेंद्र नाम के एक जासूस को पकड़ा गया। वह भारत-पाक संघर्ष और ऑपरेशन सिंदूर की गोपनीय जानकारी पाकिस्तानी सेना और ISI को देता था। उसके पास से कई उपकरण मिले, जिनकी पुलिस जाँच कर रही है।

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, NIA ने शुक्रवार (16 मई 2025) को पंजाब में बब्बर खालसा इंटरनेशनल (BKI) से जुड़े 15 ठिकानों पर छापा मारा। ये ठिकाने गैंगस्टर हैप्पी पासियाँ से जुड़े थे, जो पाकिस्तान में बैठे आतंकी रिंदा का करीबी है। गुरदासपुर में 2023 में पुलिस स्टेशन पर ग्रेनेड हमले की साजिश रचने वाले हैप्पी से मोबाइल फोन, डिजिटल डिवाइस और कुछ आपत्तिजनक दस्तावेज मिले। जाँच में पता चला कि हैप्पी ने रिंदा के कहने पर पंजाब और हरियाणा में ग्रेनेड हमलों की योजना बनाई थी। उसके साथी विदेशों से हथियार और पैसे भेज रहे थे। NIA इसकी और जाँच कर रही है।

मई 2022 में हरियाणा पुलिस ने करनाल से चार खालिस्तानी आतंकियों को पकड़ा था। ये लोग ड्रोन से पाकिस्तान से हथियार लाकर तेलंगाना जा रहे थे। इनसे हथियार और विस्फोटक बरामद हुए। कई अभियानों में पंजाब और हरियाणा पुलिस के साथ NIA ने कई खालिस्तानी समर्थकों को गिरफ्तार किया। इनमें नाभा जेल ब्रेक का मुख्य साजिशकर्ता और खालिस्तानी आतंकी कश्मीर सिंह उर्फ बलबीर सिंह भी शामिल है। वह 2016 के जेल ब्रेक मामले में फरार था और उस पर 10 लाख का इनाम था।

खालिस्तानियों से AK-47, पिस्तौल, विस्फोटक उपकरण, ड्रोन, मोबाइल फोन, डिजिटल उपकरण, आपत्तिजनक दस्तावेज और नकदी जैसी चीजें बरामद हुईं।

स्थानीय युवाओं की आतंकी गतिविधियों के लिए भर्ती

सोशल मीडिया और दूसरे तरीकों से स्थानीय युवाओं को कट्टरपंथी विचारधारा में फँसाकर आतंकी गतिविधियों में शामिल किया जा रहा है। पाकिस्तान वैध दस्तावेजों से युवाओं को ट्रेनिंग के लिए भेज रहा है। ये युवा लौटकर हमले करते हैं। खासकर मजहबी सोच वाले युवाओं को निशाना बनाया जा रहा है।

भारत-पाक तनाव कम होने के बावजूद ISI भारत में अशांति फैलाने की कोशिश कर रही है। युद्धविराम के बाद ISI खालिस्तानी समर्थकों को भड़का रही है। सिख फॉर जस्टिस (SFJ) का चीफ गुरपतवंत सिंह पन्नू पंजाब और हरियाणा में आतंकी नेटवर्क को फिर से सक्रिय कर रहा है। वह पुलिस और सरकारी इमारतों पर हमले की साजिश रच रहा है। खुफिया एजेंसियों ने अलर्ट जारी किया है। NIA और राज्य पुलिस इस पर कार्रवाई कर रही हैं। पाकिस्तान से चलने वाले खालिस्तानी सोशल मीडिया अकाउंट पकड़े गए, जिनमें बॉट अकाउंट भी शामिल हैं। केंद्र ने 100 भड़काऊ वीडियो और पन्नू के 50 से ज्यादा फर्जी अकाउंट ब्लॉक कर दिए।

इसके अलावा पन्नू ने वीडियो जारी कर दावा किया था कि पटियाला आर्मी स्कूल की दीवारों पर खालिस्तान और पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे उसने ही लिखवाए थे। वीडियो में पन्नू ने कथित तौर पर दीवार पर ये नारे दिखाते हुए स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों को भी भड़काया था। पन्नू ने बच्चों को कहा था कि अपने परिवारों को बचाने की जिम्मेदारी आर्मी स्कूल के बच्चों की है।

एक रिपोर्ट की मानें तो मुख्य संदिग्ध आदिल अहमद थोकर, जिसने आतंकियों की मदद की, 2024 में पाकिस्तान से आतंकी ट्रेनिंग लेकर लौटा था। सुरक्षा बलों के अनुसार, 2014 के बाद से, पाकिस्तान वैध दस्तावेजों का उपयोग कर कश्मीरी युवाओं को भर्ती कर रहा है। लगभग 40 स्थानीय युवा वैध यात्रा दस्तावेजों पर पाकिस्तान जाकर आतंकी प्रशिक्षण ले चुके हैं। आदिल भी इसी बदली रणनीति का हिस्सा है, जो धार्मिक कट्टरता के कारण 2018 में पाकिस्तान जाकर लश्कर-ए-तैयबा में शामिल हो गया था।

पाकिस्तान में में बैठे आतंकी संगठन युवाओं को आतंकवाद की ओर धकेल रहे हैं। जो युवा अकेलापन महसूस करते हैं, भेदभाव का शिकार हैं या भावनात्मक रूप से कमजोर हैं, उन्हें झूठा अपनापन और पहचान का एहसास दिलाया जाता है। उन्हें ऐसे समुदाय का हिस्सा बनाया जाता है, जहाँ उन्हें स्वीकार किया जाता है।

कट्टरपंथी संगठन और मदरसे युवाओं को ‘शहीद’ होने के फायदे बताते हैं, जैसे जन्नत में जगह, परिवार के लिए सम्मान और पैसे। कुछ मामलों में युवाओं को धमकाया जाता है या उनके परिवारों को नुकसान की धमकी दी जाती है, ताकि वे आतंकी समूहों में शामिल हों। कुछ मदरसा या स्कूलों में कट्टरपंथी विचारधारा पढ़ाई जाती है, जिससे युवाओं का ब्रेनवॉश करके उन्हें हिंसा के लिए तैयार किया जाता है।

बता दें कि ऑपरेशन सिंदूर के बाद पाकिस्तानी फौज ने दावा किया था कि भारत ने पाकिस्तान पर हमले के बहाने पंजाब, सिखों और गुरुद्वारों को निशाना बनाया। ऑपइंडिया ने अपनी रिपोर्ट में बताया था कि कैसे खालिस्तानी आतंकवाद का पूरा नेटवर्क ही पाकिस्तान ने खड़ा किया था। ऐसे में ISI का एक बार फिर से युवाओं को आतंकवाद की तरफ ढकेलने की कोशिश उसी नाकाप एजेंडे का हिस्सा है, जो वो पहले से अंजाम देता आया है।

चूँकि भारत जानता है कि खालिस्तानी समर्थकों और ISI की पंजाब-हरियाणा में आतंकी गतिविधियाँ उसकी सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा हैं। ऐसे में सुरक्षा एजेंसियाँ इसे रोकने के लिए लगातार काम कर रही हैं। जिसका नतीजा आतंकवादियों के स्लीपर सेल के जाल को तोड़ने और आतंकियों की धर-पकड़ के रूप में सामने आ रहा है।

240 पुस्तकें, 50 रिसर्च पेपर… स्वामी रामभद्राचार्य को ‘ज्ञानपीठ पुरस्कार’ क्यों? जो 500 सालों में नहीं हुआ वो भी कर दिखाया: संत नहीं, पुरस्कृत हुआ है पुरस्कार

क्या विद्वान केवल एक ही समूह में होते हैं? क्या सिर्फ़ वही व्यक्ति विद्वान कहा जाएगा जो अमेरिका और यूरोप के लेखकों को उद्धृत करता हो, भारतीय तत्व-मीमांसा में रत व्यक्ति को विद्वता का प्रमाण-पत्र पाने का कोई अधिकार नहीं है? प्रमाण-पत्र इसीलिए, क्योंकि भारत में एक विशेष गिरोह है जो इसे बाँटता फिरता है। वो गिरोह ये तय करता है कि कौन लेखक है और कौन नहीं, कौन बुद्धिजीवी है और कौन नहीं, कौन विद्वान है और कौन नहीं। स्वामी रामभद्राचार्य को ‘ज्ञानपीठ पुरस्कार’ मिलने के बाद ये साफ़ हो गया है कि वो इस गिरोह द्वारा कल्पित विद्वानों की सूची में नहीं आते हैं।

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने शुक्रवार (16 मई, 2025) को रामानंदी संप्रदाय के जगद्गुरु स्वामी रामभद्राचार्य को 58वें ‘ज्ञानपीठ पुरस्कार‘ से सम्मानित किया। उद्योगपति साहू शांति प्रसाद द्वारा 1944 में स्थापित ‘भारतीय ज्ञानपीठ’ द्वारा प्रतिवर्ष साहित्य के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान देने वाले लेखकों को इस पुरस्कार से सम्मानित किया जाता रहा है। 1965 से इस अवॉर्ड की शुरुआत हुई थी। सुमित्रानंदन पंत, रामधारी सिंह दिनकर, अमृता प्रीतम, महाश्वेता देवी, निर्मल वर्मा, केदारनाथ सिंह और कृष्णा सोबती जैसे बड़े नामों को इस पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है। अब इस सूची में चित्रकूट स्थित ‘तुलसी पीठ’ के संस्थापक स्वामी रामभद्राचार्य का नाम भी जुड़ गया है।

स्वामी रामभद्राचार्य को क्यों मिला ‘ज्ञानपीठ पुरस्कार’?

जगद्गुरु स्वामी रामभद्राचार्य को ‘ज्ञानपीठ पुरस्कार’ मिलने के बाद एक प्रश्न जो बार-बार पूछा जा रहा है वो ये है कि उन्हें ये सम्मान क्यों? ये सवाल पूछने वालों में अधिकतर वो हैं जिन्हें पता तक नहीं है कि भारतीय साहित्य के बड़े नाम कौन से हैं, महत्वपूर्ण पुस्तकें कौन सी हैं अथवा भारतीय साहित्य के क्षेत्र में विभिन्न कालों में किन-किन प्रकार की रचनाओं का प्रभुत्व रहा है। अब जो जागरूक ही नहीं है, वो सोशल मीडिया के आधार पर अपनी राय बनाएगा। उसने सोशल मीडिया पर स्वामी रामभद्राचार्य के साहित्यिक कार्यों को देखा ही नहीं, तो वो सवाल पूछेगा ही।

ऐसा नहीं है कि ये सवाल पूछने वाले लोग धन अथवा मुख्यधारा तक अपनी पहुँच न होने के कारण अनभिज्ञ हैं, उन्होंने अनभिज्ञता के कुएँ में रहना स्वयं ही चुना है। कारण – भारतीय संस्कृति, परंपराओं एवं इतिहास से उन्हें घृणा है। ये घृणा उन्हें अविद्या की तरफ ले जाती है और ये अविद्या उन्हें हर गंभीर कार्य करने वाले का विरोध करने के लिए उकसाती है। मैं इस लेख में उन्हें जवाब नहीं देने जा रहा, बल्कि उन आम लोगों को समझाने जा रहा हूँ, जिन्हें अपने भ्रमजाल में फँसाने के लिए वो अनभिज्ञ गिरोह सारा कुचक्र रचता है।

फिर वही सवाल – एक भगवा वस्त्र धारण करने वाले एक नेत्रहीन साधु को ‘ज्ञानपीठ पुरस्कार’ क्यों? क्या भारत में अब सेक्युलरिज्म नाम की कोई चीज नहीं बची, आखिर राष्ट्रपति के हाथ से हिन्दू धर्म का साधु कैसे सम्मानित हो सकता है? ऐसे ही सभी सवालों के जवाब मैं इस लेख के जरिए देने जा रहा हूँ। पहले सवाल का सीधा जवाब है – 22 भाषाओं के विद्वान स्वामी रामभद्राचार्य 240 से अधिक पुस्तकें और 50 से अधिक शोधपत्र लिख चुके हैं। दूसरे सवाल का सीधा जवाब – भारत-भूमि पर इस भूमि के धर्म एवं संस्कृति को आगे बढ़ाने वाले व्यक्ति का सम्मान किए जाने को किसी भी शब्द की दुहाई देकर रोकी नहीं जा सकती है।

साहित्य के क्षेत्र में जगद्गुरु स्वामी रामभद्राचार्य का योगदान

स्वामी रामभद्राचार्य अधिकतर संस्कृत में लिखते हैं, एक ऐसी भाषा जिसमें हमारे वेद, उपनिषद, पुराण, रामायण और महाभारत लिखे गए। वो भाषा जिसे संरक्षण की आवश्यकता है। वो भाषा जिसमें रचित साहित्य कई पीढ़ियों की परवरिश के तौर-तरीकों को प्रभावित करते आए हैं। माता-पिता-गुरु के सम्मान से लेकर धर्म की रक्षा के लिए युद्ध तक की प्रेरणा हमें इन्हीं साहित्यों से मिली है। स्वामी रामभद्राचार्य इसी संस्कृति भाषा के मौजूदा युग के विरले विद्वानों में से एक हैं।

वो हिंदी में भी लिखते हैं, जो भारत की राजभाषा है और देश के अधिकतर लोगों द्वारा बोली और समझी जाती है। वो देश में सबसे अधिक जनसंख्या वाले राज्यों उत्तर प्रदेश-बिहार की स्थानीय भाषाओं अवधी और भोजपुरी में भी साहित्य रचते आए हैं। यानी, स्वामी रामभद्राचार्य के कार्य शोधार्थियों के भी काम आते हैं, आम लोगों को भी प्रभावित करते हैं। गोस्वामी तुलसीदास पर उनका अध्ययन इतना व्यापक है कि उन्हें रामचरितमानस पर अघोषित अंतिम प्राधिकरण माना जाता है। जिज्ञासा, समीक्षण, श्रद्धा एवं विश्वास की सनातन नीति पर चलते हुए उन्होंने रामचरितमानस का प्रामाणिक संस्कार प्रस्तुत किया। रामचरितमानस ही वो काव्य है जिसने उत्तर भारत में रामकथा को पुनः हमारे जीवन में स्थापित किया।

बचपन से लेकर अबतक लगभग 5000 बार जगद्गुरु स्वामी रामभद्राचार्य रामचरितमानस कथा का प्रवचन देश-विदेश में कर चुके हैं। 8 वर्षों के गहन शोध एवं इस अमर साहित्य के 27 संस्करणों के अध्ययन के बाद उन्होंने ‘तुलसी पीठ’ के माध्यम से अपना संस्करण पेश किया। हालाँकि, पुस्तक से छेड़छाड़ के कारण 2008-09 में उनके विरुद्ध विरोध प्रदर्शन भी हुए, लेकिन भारतीय इतिहास में शास्त्रार्थ की परंपरा रही है और शंकराचार्य भी जगद्गुरु तभी हुए जब उन्होंने वाद-विवाद के माध्यम से देश भर के विद्वानों का हृदय जीता। अतः, महत्वपूर्ण ये है कि हमारे प्राचीन साहित्य विलुप्त न हों और उनपर श्रद्धाभाव से शोधकार्य होता रहे।

9000 पृष्ठ, 50000 श्लोक और 9 खंड… पाणिनि द्वारा रचित संस्कृत व्याकरण ‘अष्टाध्यायी’ पर उन्होंने जो महाभाष्य लिखा है वैसा आजतक नहीं लिखा गया। स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसका अनावरण किया। ‘अष्टाध्यायी’ साधारण पुस्तक नहीं है, पतंजलि ने इसे ‘सर्ववेद-परिषद्-शास्त्र’ कहकर संबोधित किया है। फरवरी 2025 में चित्रकूट पहुँचे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वामी रामभद्राचार्य की 3 पुस्तकों का अनावरण किया – पाणिनि का ‘अष्टाध्यायी’ महाभाष्य, रामानंदाचार्य चरितम और राष्ट्रलीला ऑफ लॉर्ड श्री कृष्णा। पीएम मोदी ‘विकास भी, विरासत भी’ की नीति लेकर चलते हैं, ऐसे में उस ‘विरासत’ के मुख्य स्तंभ बनकर स्वामी रामभद्राचार्य के कार्य स्वतः ही स्थापित हो जाते हैं।

‘अष्टाध्यायी’ ईसा के जन्म से भी सैकड़ों वर्ष पूर्व लिखी गई संस्कृत व्याकरण की पुस्तक है, जिसके आधार पर वैदिक काल के बाद के साहित्य रचे गए। यहाँ तक कि ग्रीक और लैटिन जैसी प्राचीन विदेशी भाषाओं में भी इस तरह के किसी पुस्तक का कोई उदाहरण नहीं मिलता। स्वामी रामभद्राचार्य को तो केवल एक इस कार्य के लिए ज्ञानपीठ जैसे कई पुरस्कार मिल जाने चाहिए थे। उन्होंने इसका कई गुना कार्य कर दिया।

रामचरितमानस के क्रिटिकल एडिशन और ‘अष्टाध्यायी’ महाभाष्य के अलावा उनका एक और महत्वपूर्ण कार्य है – ब्रह्मसूत्र, भगवद्गीता और 11 उपनिषदों पर आधारित ‘श्रीराघवकृपाभाष्यम्’। जो लोग आज स्वामी रामभद्राचार्यजी पर निशाना साध रहे हैं उनमें से अधिकतर आज से 27 वर्ष पूर्व या तो पैदा भी नहीं हुए होंगे या डायपर में खेल रहे होंगे, तब अप्रैल 1998 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी इस पुस्तक को लॉन्च कर रहे थे। ब्रह्मसूत्र, उपनिषद और गीता को मिलाकर ‘प्रस्थानत्रयी’ कहते हैं, 500 वर्षों से इनपर कोई संस्कृत भाष्य नहीं लिखा गया था, ये कार्य स्वामी रामभद्राचार्य ने किया।

धर्म एवं संस्कृति के साथ-साथ दिव्यांगों के लिए भी चलाते हैं यूनिवर्सिटी

रामकथा के माध्यम से कई दशकों से वो समाज को ऐतिहासिक व आध्यात्मिक ज्ञान से लाभान्वित कर रहे हैं, ये योगदान भी कम है क्या? और हाँ, ये सब उन्होंने प्रज्ञाचक्षु होने के बावजूद किया है। नेत्र चले गए, लेकिन दृष्टि उन्होंने श्रम व साधना से अर्जित की। 1991 में उन्होंने PhD की और 1998 में DLitt – उनको गाली देने वाले अधिकतर अबतक टैक्स के पैसों से ही पल रहे हैं। और हाँ, पोस्ट डॉक्टरेट की डिग्री उन्हें भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति KR नारायणन के हाथों मिली थी, जो दलित समाज से थे। हिन्दू एकता को खंडित करने के लिए द्रविड़ बनाम आर्य का कुचक्र रचने वालों को ये पसंद नहीं आएगा।

इलाहाबाद हाईकोर्ट में श्रीराम जन्मभूमि मामले के अंतिम जजमेंट में उनकी गवाही और उनके द्वारा दिए गए साक्ष्यों का जिक्र हुआ। राम मंदिर को लेकर उन्होंने शास्त्रों से ऐसे-ऐसे साक्ष्य दिए कि जज भी दंग रह गए। दिव्यांग छात्र-छात्राओं के लिए उन्होंने एक पूरी की पूरी यूनिवर्सिटी खोल की। अध्यात्म व समाज की सेवा के लिए ‘तुलसी पीठ’ की स्थापना की। भारत क्या, पूरी दुनिया में दिव्यांगों के लिए कोई विश्वविद्यालय नहीं था। ‘विकलांग सेवा संघ’ के जरिए उन्होंने दिव्यांग पुरुषों-महिलाओं के कल्याण के लिए कई कार्यक्रम शुरू करवाए।

रामभद्राचार्य जी की इतनी रचनाएँ कि उनपर बात करते-करते ही सुबह से शाम हो जाए। उन्हें पढ़ने, समझने और उनकी मीमांसा या उनपर टीका करने में कितने साल लग जाएँगे ये स्वयं ही सोच लीजिए। सोचिए, जिन्होंने स्वामी रामभद्राचार्य के साहित्य का क-ख-ग भी नहीं पढ़ा है, वो उनके योगदान को लेकर सवाल उठा रहे हैं। साहित्य, समाज और संस्कृति – तीनों क्षेत्र में उनका योगदान अभूतपूर्व है। जिस ‘तुलसी पीठ सेवा न्यास’ की उन्होंने स्थापना की है वो आगे भी कई वर्षों तक उनके द्वारा शुरू किए गए अभियान जो जारी रखेगा। स्वामी रामभद्राचार्य के कार्य सनातन पर हैं, सनातन हैं।

स्वामी रामभद्राचार्य के रचनाओं की तालिका

यहाँ मैं स्वामी रामभद्राचार्य की रचनाओं को विवरण के साथ पेश कर रहे हैं:

वर्षशीर्षकभाषाप्रकाशकसारांश
1994अरुन्धतीहिन्दीश्री राघव साहित्य प्रकाशन निधि, हरिद्वारवसिष्ठ और अरुंधति के जीवन पर आधारित 15 सर्गों में विभाजित 1,279 श्लोकों की महाकाव्यात्मक कविता।
2002श्रीभार्गवराघवीयम्संस्कृतजगद्गुरु रामभद्राचार्य विकलांग विश्वविद्यालय21 सर्गों, 2,121 श्लोकों का महाकाव्य। हिंदी व्याख्या सहित। कई पुरस्कार प्राप्त।
2010अष्टावक्रहिन्दीजगद्गुरु रामभद्राचार्य विकलांग विश्वविद्यालय8 सर्गों में 864 श्लोकों में रचित, अष्टावक्र ऋषि पर आधारित।
2011गीतरामायणम्संस्कृतजगद्गुरु रामभद्राचार्य विकलांग विश्वविद्यालय28 सर्गों में 1,008 गीतों द्वारा रामायण की संगीतमय प्रस्तुति।
1980काका विदुरहिन्दीश्री गीता ज्ञान मंदिर, राजकोटमहाभारत के विदुर पर लघुकाव्य।
1980मुकुन्दस्मरणम्संस्कृतश्री गीता ज्ञान मंदिर, राजकोटकृष्ण की स्तुति में दो भागों में लघुकाव्य।
1982मा̐ शबरीहिन्दीगिरिधर कोशलेंद्र चिन्तन समिति, दरभंगारामायण की पात्रा शबरी पर आधारित लघुकाव्य।
1996आजादचन्द्रशेखरचरितम्संस्कृतश्री तुलसी पीठ सेवा न्यासक्रांतिकारी चन्द्रशेखर आजाद पर लघुकाव्य। हिंदी टीका सहित।
2000सरयूलहरीसंस्कृतश्री तुलसी पीठ सेवा न्याससरयू नदी पर आधारित लघुकाव्य।
2001लघुरघुवरम्संस्कृतश्री तुलसी पीठ सेवा न्यासबाल राम पर लघुकाव्य, केवल लघु वर्णों में।
2004भृङ्गदूतम्संस्कृतजगद्गुरु रामभद्राचार्य विकलांग विश्वविद्यालयमंदाक्रान्ता छंद में, राम द्वारा सीता को भेजे संदेश का चित्रण।
1991राघवगीतगुञ्जनहिन्दीश्री राघव साहित्य प्रकाशन निधि, हरिद्वारगीतात्मक कविता।
1993भक्तिगीतसुधाहिन्दीश्री राघव साहित्य प्रकाशन निधि, हरिद्वारराम और कृष्ण पर आधारित 438 गीतों की कविता।
1997श्रीरामभक्तिसर्वस्वम्संस्कृतश्री तुलसी पीठ सेवा न्यास100 श्लोकों की कविता।
—आर्याशतकम्संस्कृत—आर्या छंद में 100 श्लोकों की कविता।
—चण्डीशतकम्संस्कृत—देवी चंडी की स्तुति में 100 श्लोकों की कविता।
—राघवेन्द्रशतकम्संस्कृत—राम की स्तुति में 100 श्लोकों की कविता।
—गणपतिशतकम्संस्कृत—गणेश की स्तुति में 100 श्लोकों की कविता।
—श्रीराघवचरणचिह्नशतकम्संस्कृत—राम के चरणचिह्नों की स्तुति में 100 श्लोक।
1987श्रीजानकीकृपाकटाक्षस्तोत्रम्संस्कृतश्री तुलसी पीठ सेवा न्याससीता की कृपा दृष्टि की स्तुति।
1992श्रीरामवल्लभास्तोत्रम्संस्कृतश्री राघव साहित्य प्रकाशन निधि, हरिद्वारसीता की स्तुति।
1994श्रीगङ्गामहिम्नस्तोत्रम्संस्कृतश्री राघव साहित्य प्रकाशन निधि, हरिद्वारगंगा नदी की महिमा पर स्तुति।
1995श्रीचित्रकूटविहार्यष्टकम्संस्कृतश्री राघव साहित्य प्रकाशन निधि, हरिद्वारराम के चित्रकूट विहार की 8 श्लोकों में स्तुति।
2002श्रीराघवभावदर्शनम्संस्कृतश्री तुलसी पीठ सेवा न्यासराम के जन्म की उपमाओं द्वारा स्तुति; हिंदी टीका सहित।
2003कुब्जापत्रम्संस्कृतजगद्गुरु रामभद्राचार्य विकलांग विश्वविद्यालयकुब्जा द्वारा कृष्ण को लिखा गया पत्र।
2008श्रीसीतारामकेलिकौमुदीहिन्दीजगद्गुरु रामभद्राचार्य विकलांग विश्वविद्यालय327 पदों में बाल लीलाओं पर आधारित रीति काव्य।
2009श्रीसीतारामसुप्रभातम्संस्कृतजगद्गुरु रामभद्राचार्य विकलांग विश्वविद्यालयसीता-राम को समर्पित सुप्रभातम्। हिंदी अनुवाद सहित।
1996श्रीराघवाभ्युदयम्संस्कृतश्री तुलसी पीठ सेवा न्यासराम के उदय पर आधारित एकांकी नाटककाव्य।
—उत्साहहिन्दीश्री तुलसी पीठ सेवा न्यास—

स्वामी रामभद्राचार्य की कुछ अन्य रचनाएँ यहाँ देखिए:

वर्षशीर्षकविषयप्रकाशकटिप्पणी
1998श्रीब्रह्मसूत्रेषु श्रीराघवकृपाभाष्यम्ब्रह्मसूत्रश्री तुलसी पीठ सेवा न्यासप्रस्थानत्रयी पर संस्कृत में भाष्य
1998श्रीमद्भगवद्गीतासु श्रीराघवकृपाभाष्यम्भगवद्गीताश्री तुलसी पीठ सेवा न्यास–
1998कठोपनिषदि श्रीराघवकृपाभाष्यम्कठोपनिषद्श्री तुलसी पीठ सेवा न्यास–
1998केनोपनिषदि श्रीराघवकृपाभाष्यम्केनोपनिषद्श्री तुलसी पीठ सेवा न्यास–
1998माण्डूक्योपनिषदि श्रीराघवकृपाभाष्यम्माण्डूक्य उपनिषद्श्री तुलसी पीठ सेवा न्यास–
1998ईशावास्योपनिषदि श्रीराघवकृपाभाष्यम्ईशावास्य उपनिषद्श्री तुलसी पीठ सेवा न्यास–
1998प्रश्नोपनिषदि श्रीराघवकृपाभाष्यम्प्रश्न उपनिषद्श्री तुलसी पीठ सेवा न्यास–
1998तैत्तिरीयोपनिषदि श्रीराघवकृपाभाष्यम्तैत्तिरीय उपनिषद्श्री तुलसी पीठ सेवा न्यास–
1998ऐतरेयोपनिषदि श्रीराघवकृपाभाष्यम्ऐतरेय उपनिषद्श्री तुलसी पीठ सेवा न्यास–
1998श्वेताश्वतरोपनिषदि श्रीराघवकृपाभाष्यम्श्वेताश्वतर उपनिषद्श्री तुलसी पीठ सेवा न्यास–
1998छान्दोग्योपनिषदि श्रीराघवकृपाभाष्यम्छांदोग्य उपनिषद्श्री तुलसी पीठ सेवा न्यास–
1998बृहदारण्यकोपनिषदि श्रीराघवकृपाभाष्यम्बृहदारण्यक उपनिषद्श्री तुलसी पीठ सेवा न्यास–
1998मुण्डकोपनिषदि श्रीराघवकृपाभाष्यम्मुण्डक उपनिषद्श्री तुलसी पीठ सेवा न्यास–
1991श्रीनारदभक्तिसूत्रेषु श्रीराघवकृपाभाष्यम्नारद भक्ति सूत्रश्री तुलसी पीठ सेवा न्यास–
1997अष्टाध्याय्याः प्रतिसूत्रं शाब्दबोधसमीक्षणम्अष्टाध्यायी सूत्रों पर शोधराष्ट्रीय संस्कृत संस्थान (प्रकाशनाधीन)डी.लिट् शोधप्रबंध
2001श्रीरामस्तवराजस्तोत्रे श्रीराघवकृपाभाष्यम्श्रीराम स्तवराज स्तोत्रश्री तुलसी पीठ सेवा न्यास–
1983महावीरीहनुमान चालीसा पर टीकाश्री कृष्ण जन्म सेवा संस्थान, मथुरा–
1985श्रीगीतातात्पर्यभगवद्गीताश्री राघव साहित्य प्रकाशन निधि, हरिद्वार–
2005भावार्थबोधिनीरामचरितमानसजगद्गुरु रामभद्राचार्य विकलांग विश्वविद्यालय–
–श्रीराघवकृपभाष्य (९ खण्डों में)रामचरितमानस––
1981अध्यात्मरामायणे अपाणिनीयप्रयोगानां विमर्शःअध्यात्मरामायण की पाणिनि–विरुद्ध प्रवृत्तियों की समीक्षा–पीएचडी शोधप्रबंध
1982मानस में तापस प्रसंगरामचरितमानस के अयोध्या काण्ड में एक तपस्वी के प्रसंग की विवेचनाश्री गीता ज्ञान मंदिर, राजकोट–
1988सनातनधर्म की विग्रहस्वरूप गोमातागोमाता की सनातन धर्म में स्थिति पर विवेचनश्री राघव साहित्य प्रकाशन निधि, हरिद्वार–
1988श्रीतुलसीसाहित्य में कृष्णकथातुलसीदास कृत साहित्य में कृष्ण चरित्र की समीक्षाश्री राघव साहित्य प्रकाशन निधि, हरिद्वार–
1990सीता निर्वासन नहींवाल्मीकि रामायण में सीता निर्वासन को उत्तरकाण्ड की कलपना सिद्ध करने वाला आलोचनात्मक ग्रंथश्री राघव साहित्य प्रकाशन निधि, हरिद्वार–
2007श्रीरासपञ्चाध्यायीविमर्शःभागवत के रासपंचाध्यायी पर विवेचनजगद्गुरु रामभद्राचार्य विकलांग विश्वविद्यालय–
1980भरत महिमारामायण में भरत जी की महिमा पर नवाह्निक प्रवचनश्री गीता ज्ञान मंदिर, राजकोट–
1985सुग्रीव का अघ और विभीषण की करतूतिरामायण के दो पात्रों पर नवाह्निक प्रवचनश्री कृष्ण जन्म सेवा संस्थान, मथुरा–
1989मानस में सुमित्रारामचरितमानस में सुमित्रा की भूमिका पर नवाह्निक प्रवचनश्री राघव साहित्य प्रकाशन निधि, हरिद्वार–
1992प्रभु करि कृपा पाँवरी दी…––अपूर्ण प्रवचन ग्रंथ

सोचिए, मात्र 2 महीने की उम्र में जिस शिशु को अपनी आँखें खोनी पड़ी थीं, उसने विद्वता के शिखर को छूकर ये सन्देश दिया कि कोई भी सफल न होने के पीछे कोई भी बहाना नहीं होता। श्रम एवं साधना से सबकुछ संभव है। जिस बच्चे को अपशकुन मानकर परिवार-समाज के शादी-विवाह व अन्य शुभ कार्यक्रमों में हिस्सा तक नहीं लेने दिया जाता था, वो शुभ-लाभ का चलता-फिरता प्रतीक बन गया। तभी अपनी शुरुआती रचनाओं के दौरान वो स्वयं को ईश्वर के समक्ष ‘अनाथं जडं मोहपाशेन बद्धं’ कहकर संबोधित करते हैं, अर्थात – “जो अनाथ है, जड़ है, और मोह के बंधन में जकड़ा हुआ है।”

अब इकोनमी ही नहीं, डिफेंस सेक्टर में भी ग्लोबल पॉवर बनकर उभरा है भारत: ऑपरेशन सिंदूर में दुनिया ने देखा दम, नई डिफेंस पॉलिसी के बाद इजरायल-अमेरिका-रूस की लाइन में एंट्री

पाकिस्तान समर्थित आतंकवादियों ने 22 अप्रैल 2025 को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम की बैसरन घाटी में 26 हिंदू पर्यटकों की बेरहमी से हत्या कर दी और कई लोगों को घायल कर दिया। इस खौफनाक हमले ने भारत की पाकिस्तान के प्रति नीति को पूरी तरह बदल दिया।

इसके बाद भारत ने सख्त रवैया अपनाया। सिंधु जल संधि को रोक दिया, पाकिस्तानी नागरिकों के वीजा रद्द कर दिए, दोनों देशों के बीच व्यापार बंद कर दिया और पाकिस्तानी मीडिया- सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर पाबंदी लगा दी। ये कदम पाकिस्तान के लिए मुश्किल वक्त की शुरुआत माने जा रहे हैं।

7 मई की सुबह भारत ने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ शुरू किया। भारतीय सेना ने पाकिस्तान में घुसकर नौ आतंकी ठिकानों पर सटीक हमले किए। लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद जैसे आतंकी संगठनों के ठिकाने पूरी तरह तबाह कर दिए गए। इस कार्रवाई से आतंकवाद को बहुत बड़ा झटका लगा।

पाकिस्तान ने इसका जवाब देने के लिए जम्मू-कश्मीर के सीमावर्ती इलाकों में आम लोगों, मंदिरों और गुरुद्वारों पर हमले किए। लेकिन भारत के आधुनिक हथियारों और स्मार्ट रणनीति ने पाकिस्तान की हर नापाक साजिश को नाकाम कर दिया। इसके बाद भारत ने और सख्त कदम उठाया और पाकिस्तान के बड़े सैन्य ठिकानों पर निर्णायक और सटीक हमले किए, जिससे उन्हें भारी नुकसान हुआ।

इस नुकसान से परेशान होकर 10 मई को पाकिस्तान के सैन्य संचालन महानिदेशक (DGMO) ने भारत के DGMO से संपर्क किया और युद्धविराम की बात की। लेकिन जैसा पहले से अनुमान था, पाकिस्तान ने इस समझौते को तोड़ा। उसने सीमा पर गोलीबारी शुरू कर दी और रात में ड्रोन हमले किए। हालाँकि, भारतीय सुरक्षा बलों ने इन हमलों को भी पूरी तरह नाकाम कर दिया।

आतंकवाद को अब युद्ध माना जाएगा

10 मई को भारत ने साफ-साफ ऐलान किया कि अब किसी भी आतंकवादी हमले को युद्ध की तरह लिया जाएगा और उसका जवाब भी उसी स्तर पर दिया जाएगा। यह भारत की सुरक्षा नीति में बहुत बड़ा बदलाव है। सूत्रों के मुताबिक, इस फैसले से सीमा पार आतंकी साजिशों के खिलाफ पूरी सैन्य ताकत से जवाब देना आसान हो गया है।

भारत ने पहले भी 2016 में उरी, 2019 में पुलवामा और अब पहलगाम हमले के जवाब में सैन्य कार्रवाई की थी। लेकिन 10 मई का यह फैसला अब इस नीति को एक स्पष्ट और आधिकारिक रणनीति बनाता है।

जिनेवा में संयुक्त राष्ट्र में भारत के पूर्व राजदूत दिलीप सिन्हा ने ‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ से कहा, “बालाकोट में भारत ने पहली बार पाकिस्तान के अंदर आतंकी ठिकानों पर हमला करने का हक लिया था। पहलगाम के बाद इसे और आगे बढ़ाया गया। 9/11 के बाद से दुनिया मानती है कि आतंकवाद को समर्थन देने वाला देश अपनी संप्रभुता के पीछे नहीं छिप सकता। भारत अब चाहे बड़ा संघर्ष हो, इस हक का इस्तेमाल करेगा।”

यह कदम पाकिस्तान के लिए सख्त चेतावनी है, जो कई आतंकी संगठनों से जुड़ा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार आतंकवाद के खिलाफ साफ नीति बनाना चाहती है ताकि ऐसे हमलों के जिम्मेदार लोगों को कड़ी सजा दी जाए। पुलवामा और पहलगाम हमलों के जवाब में भारत की सैन्य कार्रवाई को न तो पाकिस्तान की जाँच की माँग और न ही अंतरराष्ट्रीय दबाव रोक पाया।

सिन्हा ने आगे कहा, “अब इसे राष्ट्रीय नीति का दर्जा दे दिया गया है। भारत यह तय करेगा कि कौन सा आतंकी हमला युद्ध माना जाए। यह हमें अमेरिका और इजरायल की तरह बनाता है, जिन्होंने आतंकवाद के खिलाफ एकतरफा सैन्य कार्रवाई का हक रखा है।”

भारत की नई सुरक्षा नीति में साफ कहा गया है कि अगर पाकिस्तान आतंकवादियों के जरिए भारत पर हमला करता है, तो उसे युद्ध माना जाएगा। भारत ऐसे हमलों का जवाब देने का पूरा हक रखता है और जरूरत पड़ने पर हर कदम उठाएगा।

नया भारत

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान चुप्पी रखी और 12 मई की रात देश को संबोधित किया। उन्होंने कहा कि आतंकवाद के खिलाफ भारत की सख्त और तेज कार्रवाई अब देश की सुरक्षा नीति का हिस्सा है। “ऑपरेशन सिंदूर ने आतंकवाद के खिलाफ हमारी लड़ाई में नया मानक बनाया है। यह हमारी न्यू नॉर्मल पॉलिसी है।”

मोदी ने साफ किया कि ऑपरेशन सिंदूर को खत्म नहीं माना जाए। भारत पाकिस्तान की हर हरकत पर नजर रखेगा। अपने 22 मिनट के राष्ट्र संबोधन में उन्होंने जोर देकर कहा, “हमने पाकिस्तान के आतंकी और सैन्य ठिकानों पर कार्रवाई को सिर्फ रोका है। हम उसका रवैया देखेंगे कि वह क्या करता है।”

प्रधानमंत्री मोदी ने आगे कहा, “भारत की वायुसेना, थलसेना, नौसेना, बीएसएफ और अर्धसैनिक बल हर वक्त तैयार हैं। सर्जिकल स्ट्राइक, एयर स्ट्राइक और अब ऑपरेशन सिंदूर हमारी नीति का हिस्सा बन गए हैं।” हालाँकि, उनके भाषण का सबसे महत्वपूर्ण पहलू वह क्षण था जब उन्होंने उन तीन नई सामान्य बातों की ओर ध्यान दिलाया, जो अब पाकिस्तान की किसी भी शत्रुतापूर्ण कार्रवाई के प्रति भारत की प्रतिक्रिया का स्थायी हिस्सा बन गई हैं। ये तीनों सिद्धांत भारत की नई सुरक्षा नीति में निर्णायक बदलाव को दर्शाते हैं।

भारत की शर्तों पर निर्णायक जवाबी कार्रवाई :  पीएम मोदी ने कहा, “पहला, अगर भारत पर कोई आतंकी हमला होता है तो उसका मुँहतोड़ जवाब दिया जाएगा। हम अपनी शर्तों पर ही मुँहतोड़ जवाब देंगे। हम हर उस जगह पर सख्त कार्रवाई करेंगे जहाँ से आतंकवाद की जड़ें निकलती हैं।”

प्रधानमंत्री मोदी ने जोर देकर कहा कि भारत अब पाकिस्तान की किसी भी आक्रामक कार्रवाई का जवाब उसी अनुपात में, अपनी शर्तों पर, और आतंकवाद की जड़ पर प्रहार करते हुए देगा। पाकिस्तान की ओर स्पष्ट संकेत करते हुए उन्होंने इन तीन नए सिद्धांतों को भारत की प्रतिक्रिया नीति का हिस्सा बताया। इस घोषणा के साथ ही भारत ने दोनों देशों के बीच दशकों से चल रहे तथाकथित ‘सीमित युद्ध’ के विकल्प को प्रभावी रूप से अस्वीकार कर दिया है।

परमाणु ब्लैकमेल बर्दाश्त नहीं :  उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा, “दूसरी बात, भारत किसी भी परमाणु ब्लैकमेल को बर्दाश्त नहीं करेगा। भारत परमाणु ब्लैकमेल की आड़ में विकसित हो रहे आतंकवादी ठिकानों पर सटीक और निर्णायक हमला करेगा।”

पाकिस्तान की आदत रही है कि वह हर आतंकी हमले के बाद भारत और अंतरराष्ट्रीय समुदाय को डराने के लिए परमाणु हमले की धमकी देता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने संबोधन में न केवल इस रणनीति को बेनकाब किया, बल्कि स्पष्ट रूप से कहा कि ऐसी खोखली और डराने वाली धमकियाँ भारत को किसी भी उल्लंघन की स्थिति में सख्त और निर्णायक जवाब देने से नहीं रोक सकतीं।

आतंकवादियों और उनके प्रायोजकों के बीच कोई भेद नहीं : उन्होंने कहा, “तीसरी बात, हम सरकार द्वारा प्रायोजित आतंकवाद और आतंकवाद के मास्टरमाइंड के बीच कोई अंतर नहीं करेंगे। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान दुनिया ने एक बार फिर पाकिस्तान का घिनौना चेहरा देखा, जब पाकिस्तानी सेना के शीर्ष अधिकारी मारे गए आतंकवादियों को अंतिम विदाई देने आए थे। यह राज्य प्रायोजित आतंकवाद का पुख्ता सबूत है, और हम अपने नागरिकों को किसी भी खतरे से बचाने के लिए निर्णायक कदम उठाते रहेंगे”।

पाकिस्तान का आतंकवादियों से गहरा संबंध व्यापक रूप से प्रलेखित है। इस देश ने न केवल आतंकवादी हमलों का जश्न मनाया है, बल्कि अपनी संसद में ओसामा बिन लादेन जैसे आतंकियों का महिमामंडन भी किया है, जिससे वह वर्षों से आतंकवादियों के लिए एक सुरक्षित ठिकाना बन गया है। पाकिस्तानी राजनेता और सेना के अधिकारी भी समय-समय पर इस सच्चाई को स्वीकार कर चुके हैं।

भारत के हालिया अभियान के दौरान यह और स्पष्ट हो गया जब 100 से अधिक आतंकवादियों को मार गिराया गया और उनके अंतिम संस्कार में वरिष्ठ पाकिस्तानी सैन्य अधिकारियों की उपस्थिति दर्ज की गई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसी संदर्भ में यह दोटूक संदेश दिया कि भारत अब आतंकवादी संगठनों और उन्हें समर्थन देने वालों के बीच कोई फर्क नहीं करेगा, दोनों को एक ही दृष्टिकोण से देखा जाएगा और समान रूप से जवाब दिया जाएगा।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्पष्ट शब्दों में कहा, “भारत का रुख बिल्कुल साफ है। आतंक और बातचीत एक साथ नहीं चल सकते, आतंक और व्यापार एक साथ नहीं चल सकते, और पानी और खून एक साथ नहीं बह सकते।” उन्होंने यह संकेत भी दिया कि पाकिस्तान जैसे शत्रुतापूर्ण पड़ोसी के साथ किसी भी संभावित बातचीत का दायरा केवल आतंकवाद और पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (पीओके) तक सीमित रहेगा। प्रधानमंत्री ने यह सख्त संदेश मंगलवार (13 मई 2025) को आदमपुर एयरफोर्स स्टेशन पर वायु योद्धाओं और सैनिकों से बातचीत के दौरान दोहराया, जिससे भारत की बदली हुई सुरक्षा नीति और कूटनीतिक स्थिति और भी स्पष्ट हो गई।

भारत की तकनीकी ताकत, पाकिस्तान की नाकामी

‘ऑपरेशन सिंदूर’ में भारत ने अपनी सैन्य ताकत, रणनीति और तकनीक का शानदार प्रदर्शन किया। पाकिस्तान ने भारतीय नागरिक इलाकों और सैन्य ठिकानों पर ड्रोन, मिसाइल और रॉकेट से हमले किए। लेकिन भारत ने सिर्फ आतंकी ठिकानों को निशाना बनाया। भारतीय सेना ने अपनी एकीकृत वायु रक्षा प्रणाली (Integrated Air and Missile Defense System) से सैन्य ठिकानों और संपत्तियों की पूरी रक्षा की।

भारत की मिसाइलों ने बहावलपुर, मुरीदके, मुजफ्फराबाद और कोटली जैसे आतंकी ठिकानों को सटीक निशाना बनाकर तबाह कर दिया। पाकिस्तान की महँगी मिसाइल रक्षा प्रणाली पूरी तरह बेकार साबित हुई। भारत के स्वदेशी हथियार, इजरायली तकनीक और रूस का S-400 सिस्टम पाकिस्तान के ड्रोन और मिसाइलों को रोकने में कामयाब रहा। इसके उलट, पाकिस्तान की चीनी रक्षा प्रणालियाँ पूरी तरह नाकाम रहीं। भारतीय ड्रोन और मिसाइलें बिना रुकावट पाकिस्तान में घुसीं और अपने निशाने पूरे किए।

भारत ने अपनी ‘आयरन डोम’ जैसे आकाशतीर और S-400 सुदर्शन चक्र वायु रक्षा सिस्टम को रणनीतिक रूप से तैनात किया। इनसे तुर्की के ड्रोन, चीनी मिसाइलें और कुछ पाकिस्तानी विमान नाकाम हो गए। पाकिस्तान ने लंबी दूरी के रॉकेट, कामिकेज ड्रोन और चीनी पीएल-15 मिसाइलों का इस्तेमाल किया। लेकिन भारत की वायु रक्षा ने ज्यादातर हमलों को नाकाम कर दिया। कुछ हमले ही रक्षा प्रणाली को भेद पाए, लेकिन उन्होंने भी मामूली नुकसान किया।

भारतीय सशस्त्र बलों ने पाकिस्तानी हमले का मुंहतोड़ जवाब देते हुए नागरिक क्षेत्रों को निशाना बनाने की उसकी कोशिशों को नाकाम किया। इसके लिए भारत ने अपने स्वदेशी ‘आयरन डोम’ आकाशतीर एयर डिफेंस सिस्टम (ADS) को रूस से प्राप्त S-400 सुदर्शन चक्र ADS के साथ रणनीतिक रूप से तैनात किया। भारत की एकीकृत, बहुस्तरीय वायु रक्षा प्रणाली ने तीव्र संघर्ष के दौरान तुर्की के ड्रोन, चीनी मिसाइलों और संभावित रूप से कुछ पाकिस्तानी विमानों का भी प्रभावशाली रूप से सामना कर उन्हें निष्क्रिय कर दिया।

अधिकारियों के अनुसार, पाकिस्तान ने संघर्ष के दौरान लंबी दूरी के रॉकेट, लोटरिंग म्यूनिशन और क्वाडकॉप्टर के साथ-साथ तुर्की निर्मित बाइकर यिहा कामिकेज़ ड्रोन और अस्सिसगार्ड सोंगार ड्रोन का इस्तेमाल किया। इसके अलावा, पाकिस्तान ने चीन निर्मित पीएल-15 लंबी दूरी की हवा से हवा में मार करने वाली मिसाइलों का भी उपयोग किया, जो विशेष रूप से दृश्य सीमा से परे की मुठभेड़ों के लिए डिजाइन की गई हैं।

भारत ने इस संघर्ष में पहली बार ब्रह्मोस मिसाइल का युद्ध में इस्तेमाल किया। यह दुनिया की सबसे तेज सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल है और भारत की सटीक जवाबी क्षमता का प्रतीक है।

पाकिस्तान की फतह-II बैलिस्टिक मिसाइल और चीनी पीएल-15 मिसाइलें भारतीय रक्षा प्रणालियों के सामने बेकार रहीं। चीनी HQ-9 और HQ-16 रक्षा प्रणालियाँ भी भारतीय हमलों को रोकने में नाकाम रहीं, जिससे पाकिस्तान की रक्षा क्षमताओं की बड़ी खामियाँ उजागर हो गईं।

भारतीय वायुसेना के संचालन महानिदेशक ए.के. भारती ने बताया कि कई पाकिस्तानी लड़ाकू विमान मार गिराए गए, हालाँकि यह साफ नहीं कि वे F-16 थे या JF-17। पाकिस्तान ने चीनी ड्रोन विंग लूंग और CH-II का भी इस्तेमाल किया, लेकिन भारत ने उन्हें सीमा पर ही मार गिराया।

इस संघर्ष ने पाकिस्तान की चीनी वायु रक्षा प्रणालियों की कमजोरियों को उजागर कर दिया। HQ-9 और HQ-16 जैसी प्रणालियाँ भारतीय स्कैल्प स्टील्थ क्रूज मिसाइलों और हैमर ग्लाइड बमों को रोकने में पूरी तरह विफल रहीं। इन प्रणालियों की सीमित पहचान क्षमता और इलेक्ट्रॉनिक जैमिंग के प्रति संवेदनशीलता के कारण वे कम ऊँचाई पर, ज़मीन के करीब उड़ने वाले खतरों की प्रभावी पहचान नहीं कर पाईं, जिससे भारत के सटीक और गुप्त हमले सफल रहे।

पाकिस्तान की वायु रक्षा प्रणाली में पर्याप्त आक्रामकता की कमी और ताल-मेल का अभाव स्पष्ट रूप से दिखाई दिया, जिसका भारत ने अपनी SEAD (शत्रु वायु रक्षा का दमन) रणनीति के तहत भरपूर फायदा उठाया। भारतीय बलों ने रडार नोड्स को सटीकता से निशाना बनाकर पाकिस्तान की वायु रक्षा प्रणाली को प्रभावी ढंग से निष्क्रिय कर दिया।

रफीकी, मुरीद, नूर खान, रहीम यार खान, सुक्कुर और चुनियन जैसे प्रमुख सैन्य हवाई अड्डों पर हमले किए गए, जबकि स्कार्दू, भोलारी, जैकोबाबाद और सरगोधा के हवाई अड्डों को भारी नुकसान पहुँचा। इसके अलावा, सियालकोट और पसरूर स्थित रडार साइटों को भी निशाना बनाया गया।

भारत ने डिकॉय विमान, सिग्नल दमन और रडार जैमिंग जैसी उन्नत रणनीतियों का इस्तेमाल किया, जिसने पाकिस्तान की वायु रक्षा को पूरी तरह कमजोर कर दिया।

सूत्रों के अनुसार, “9 और 10 मई को भारत ने एक ही ऑपरेशन में परमाणु-सशस्त्र राष्ट्र के 11 एयरबेस पर हमला करने वाला पहला देश बन गया, जिसमें पाकिस्तान की वायु सेना की 20 प्रतिशत संपत्ति नष्ट हो गई। भोलारी एयरबेस पर भारी नुकसान हुआ, जिसमें स्क्वाड्रन लीडर उस्मान यूसुफ (और चार एयरमैन) की मौत और प्रमुख लड़ाकू विमानों का नष्ट होना शामिल है।” हमले के दौरान कई पाकिस्तानी वायुसेना के लड़ाकू विमान नष्ट हो गए।

भारत ने पाकिस्तान के एयरबोर्न वार्निंग एंड कंट्रोल सिस्टम (AWACS) विमान को मार गिराकर उसे और अधिक अपमानित किया। इस कार्रवाई से पाकिस्तान की हवाई निगरानी क्षमता और युद्धक्षेत्र समन्वय को गंभीर झटका लगा, जिससे उसकी समग्र वायु रक्षा और संचालन क्षमता पर बड़ा असर पड़ा।

झूठ और आपत्तिजनक टिप्पणियों की आड़ में भारत ने पाकिस्तान में महत्वपूर्ण संपत्तियों को नष्ट कर दिया

भारत ने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान पाकिस्तान के भीतरी इलाकों में सटीक हमलों की अभूतपूर्व क्षमता का प्रदर्शन किया, जो यूक्रेन में रूसी कार्रवाई की तरह दिखाई दी, जबकि पाकिस्तान खुद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हास्य का पात्र बना रहा।

पाकिस्तानी रक्षा मंत्री ख्वाजा मुहम्मद आसिफ ने सीएनएन को दिए एक साक्षात्कार में अपने ही देश के दावे कि पाकिस्तान ने राफेल सहित पाँच भारतीय लड़ाकू विमानों को मार गिराया और इसे ‘सोशल मीडिया पोस्ट’ करार देकर खारिज कर दिया।

सरकार द्वारा यह दावा भी किया गया कि लाहौर, कराची और रावलपिंडी सहित विभिन्न स्थानों पर भारत द्वारा भेजे गए 25 ड्रोन को रोका और नष्ट किया गया, लेकिन बाद में रक्षा मंत्री ने संसद में यह कहकर पलटी मार दी कि सैन्य प्रतिष्ठानों का स्थान उजागर न हो, इसलिए ड्रोन को जानबूझकर नहीं रोका गया।

पाकिस्तान की सेना ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में भारत के खिलाफ गलत सूचना फैलाने की कोशिश की, जिसमें भारतीय प्रेस ब्रीफिंग के एक एडिट किए गए वीडियो और बिना ठोस सबूतों वाले पावरपॉइंट प्रेजेंटेशन का उपयोग किया गया।

उन्होंने यह दावा भी किया कि भारत का एस-400 सिस्टम नष्ट हो गया और आदमपुर एयरबेस को भारी नुकसान पहुँचा, जिसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वयं एयरबेस पर जाकर खारिज कर दिया। वहाँ की तस्वीरों में एस-400 प्रणाली सही-सलामत देखी गई।

पाकिस्तान के लोकप्रिय कॉमेडियन और पॉडकास्ट होस्ट शहजाद घियास शेख ने पियर्स मॉर्गन के ‘सेंसर’ शो में एक विवादास्पद बयान दिया, जिसमें उन्होंने दावा किया कि ओसामा बिन लादेन पाकिस्तानी खुफिया एजेंसियों से छिपने की कोशिश कर रहा था। इस पर मॉर्गन ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा, “अगर आपकी खुफिया एजेंसियों को नहीं पता था कि वह वहाँ है, तो यह सैन्य खुफिया इतिहास की सबसे खराब विफलता होगी।”

इस बीच, जब पाकिस्तान प्रचार, विजय जुलूस और भ्रामक दावों में व्यस्त था, उसकी रक्षा और रडार प्रणाली पूरी तरह रक्षाहीन नजर आई। भारतीय हमलों के सामने पाकिस्तान की यह स्थिति ऐसी लग रही थी जैसे वह खुले मैदान में बैठी हुई निशाना बनने को तैयार बत्तख हो।

यह स्थिति 2019 के बालाकोट हवाई हमले की याद दिलाती है, जब पाकिस्तान की वायुसेना के एक फैन पेज पर नींद से सो जाओ क्योंकि PAF जाग रहा है पोस्ट होने के तुरंत बाद ही उसे भारतीय हमलों का सामना करना पड़ा था। इस बार भी इतिहास ने खुद को दोहराया, और पाकिस्तान फिर से असहाय दिखा।

मनमोहन से मोदी तक: भारत की नीति में बड़ा बदलाव

कॉन्ग्रेस के नेतृत्व वाली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) सरकार ने पाकिस्तान द्वारा प्रायोजित आतंकवादी हमलों, विशेष रूप से 2008 के मुंबई हमलों (26/11), के बावजूद कभी भी निर्णायक सैन्य कार्रवाई नहीं की। 26 नवंबर 2008 को पाकिस्तान के दस आतंकवादियों ने मुंबई पर हमला कर 166 निर्दोष लोगों की जान ले ली और 300 से अधिक को घायल कर दिया।

इसके बावजूद, तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की सरकार ने पाकिस्तान के खिलाफ कोई ठोस सैन्य प्रतिक्रिया नहीं दी। बलपूर्वक जवाब देने की बजाय केवल ‘कड़ी निंदा’ की गई, कैंडल मार्च निकाले गए और इस्लामाबाद को दस्तावेज़ी डोज़ियर भेजे गए। आतंकवाद के इतने गंभीर कृत्य के बाद भी पाकिस्तान को दंडित करने की कोई पहल नहीं की गई, जिससे सरकार की कमजोर प्रतिक्रिया की व्यापक आलोचना हुई।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत ने हर बड़े आतंकी हमले के बाद निर्णायक सैन्य कार्रवाई कर पाकिस्तान को स्पष्ट संदेश दिया है। 2016 की सर्जिकल स्ट्राइक, 2019 का बालाकोट एयरस्ट्राइक और अब ऑपरेशन सिंदूर इसका सबूत हैं। पहलगाम हमले के बाद की कार्रवाई ने इस सख्त नीति को और साफ कर दिया।

भारत ने अब वैश्विक मंच पर यह स्थापित कर दिया है कि वह एक निष्क्रिय ताकत नहीं, बल्कि सैन्य, कूटनीतिक और औद्योगिक रूप से उभरती हुई वैश्विक शक्ति है, जो अपनी संप्रभुता पर किसी भी उल्लंघन को बर्दाश्त नहीं करेगी।

इसके विपरीत, कॉन्ग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार के कार्यकाल में आतंकवादी घटनाओं के बावजूद सैन्य कार्रवाई से बचा गया। विशेष रूप से 26/11 मुंबई हमलों के बाद, तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की सरकार ने केवल ‘कड़ी निंदा’, कैंडल मार्च और पाकिस्तान को डोज़ियर भेजने तक ही प्रतिक्रिया सीमित रखी।

पूर्व वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल फली एच. मेजर (सेवानिवृत्त) ने पुष्टि की कि 26/11 के बाद वायुसेना ने जवाबी हमले के कई विकल्प तैयार किए थे और सरकार को इसकी जानकारी दी गई थी। उन्होंने कहा, “हम अगले 18-24 घंटों में हमले के लिए तैयार थे, लेकिन सरकार की ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई।”

उन्होंने हाल ही में 26/11 साजिशकर्ता तहव्वुर हुसैन राणा के प्रत्यर्पण का स्वागत करते हुए यह भी कहा कि यदि तत्काल कार्रवाई की जाती, तो संभवतः वह अब तक इतिहास बन चुका होता। कॉन्ग्रेस की निष्क्रियता और पाकिस्तान के खिलाफ निर्णायक कदम उठाने में विफलता उसकी आतंकवाद के प्रति कमजोर नीति को उजागर करती है।

नये भारत ने अपनी क्षमता और दृढ़ विश्वास का परिचय दिया

भारत ने स्पष्ट रूप से घोषित कर दिया है कि वह अब एक शांत और दबा हुआ राष्ट्र नहीं, बल्कि एक सशक्त वैश्विक शक्ति है जो बहुध्रुवीय विश्व की जटिलताओं को पार करने की क्षमता रखता है। पाकिस्तान के खिलाफ हालिया जीत ने न केवल भारत की सैन्य श्रेष्ठता को प्रदर्शित किया, बल्कि स्वदेशी हथियारों के निर्माण में इसकी उपलब्धियों को भी उजागर किया है।

भारत और पाकिस्तान की तुलना अब अप्रासंगिक हो गई है। भारत आज दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है, जबकि पाकिस्तान आर्थिक रूप से संकटग्रस्त है और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) और अन्य देशों की सहायता पर निर्भर है।

जहाँ पाकिस्तान अपने हथियारों के लिए मुख्य रूप से चीन, तुर्की और अमेरिका पर निर्भर है, वहीं भारत का ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा क्षेत्र में एक उल्लेखनीय सफलता बन चुका है। इसके अलावा, भारतीय नौसेना ने समुद्री क्षेत्र में अपनी निर्णायक और प्रभावशाली उपस्थिति स्थापित कर ली है, जो भारत की समग्र सैन्य क्षमता का एक और सशक्त प्रमाण है।

हालिया संघर्ष के दौरान भारतीय नौसेना के स्वदेशी विमानवाहक पोत INS विक्रांत ने पाकिस्तान की हवाई रणनीति को हतोत्साहित करने में अहम भूमिका निभाई। इसकी कमान में कार्यरत वाहक युद्ध समूह ने उत्तरी अरब सागर में तेजी से और बिना किसी विरोध के प्रवेश किया, जो भारत के समुद्री प्रभुत्व का स्पष्ट संकेत था।

INS विक्रांत की प्रभावशाली उपस्थिति ने पाकिस्तान की किसी भी बड़ी हवाई कार्रवाई को रोक दिया। इस स्वदेशी विमानवाहक पोत से मिले रणनीतिक लाभ ने भारत की निवारक शक्ति को और मज़बूत किया तथा महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित किया।

वाइस एडमिरल ए. एन.प्रमोद ने पुष्टि की कि नौसेना, भूमि और समुद्र दोनों मोर्चों पर कराची जैसे प्रमुख पाकिस्तानीठिकानों पर हमले के लिए पूरी तरह तैयार थी, जिससे भारत की समग्र सैन्य तैयारियों का संकेत मिलता है।

वाइस एडमिरल ए. एन. प्रमोद ने बताया कि भारतीय रक्षा बलों की एकीकृत सैन्य योजना के तहत नौसेना के वाहक युद्ध समूह, सतही युद्धपोत, पनडुब्बियाँ और विमानन परिसंपत्तियाँ पूर्ण युद्ध तत्परता के साथ तुरंत समुद्र में तैनात कर दी गईं।

उन्होंने खुलासा किया कि पहलगाम आतंकी हमले के 96 घंटों के भीतर, अरब सागर में हुई कई गोलीबारी के दौरान नौसेना ने अपने अभियानों और रणनीति का मूल्यांकन और सुधार किया।

भारतीय नौसेना ने कराची सहित समुद्र और ज़मीन पर सटीक लक्ष्यों को किसी भी समय भेदने की पूरी तैयारी और क्षमता प्रदर्शित की, जिससे यह स्पष्ट हो गया कि भारतीय नौसेना निर्णायक और निवारक मुद्रा में उत्तरी अरब सागर में पूरी मजबूती से तैनात रही। यह रहा आपके पैराग्राफ का पुनर्लेखन जिसमें सभी महत्वपूर्ण जानकारियाँ स्पष्ट और प्रभावशाली रूप में समाहित हैं।

15 जनवरी को मुंबई के नौसेना डॉकयार्ड में, प्रधानमंत्री नरेंद्रमोदी ने तीन प्रमुख नौसैनिक जहाजों INSसूरत, INS नीलगिरि और INS वाघशीर को राष्ट्र को समर्पित करते हुए घोषणा की कि भारत एकउभरती हुई वैश्विक समुद्री शक्ति बन रहा है।

उन्होंने इसे समुद्री सुरक्षा और रक्षा उत्पादन क्षेत्र में बड़ी छलांग करार दिया। बीते दस वर्षों में, भारतीय नौसेना ने 33 युद्धपोत और 7 पनडुब्बियाँ अपने बेड़े में जोड़ी हैं, जिनमें से 39 जहाज भारत में निर्मित हैं।

इनमें भारत का पहला स्वदेशी विमानवाहक पोत INS विक्रांत और परमाणु पनडुब्बियाँ INS अरिहंत और INS अरिघात शामिल हैं जो देश की स्वतंत्र नौसैनिक निर्माण क्षमता और सामरिक आत्मनिर्भरता का प्रतीक हैं।

निष्कर्ष

पाकिस्तान की छवि जहाँ आतंकवादी संगठनों से जुड़ी पहचान तक सीमित है, वहीं भारत एक उभरती हुई वैश्विक शक्ति के रूप में स्थापित हो चुका है। भारत ने विशिष्ट गुटों के साथ गठबंधन से बचते हुए संतुलित और स्वतंत्र विदेश नीति अपनाई है। वह QUAD (भारत, ऑस्ट्रेलिया, जापान, अमेरिका) और I2U2 (भारत, इज़राइल, यूएई, अमेरिका) जैसे बहुपक्षीय मंचों का हिस्सा है, साथ ही रूस के साथ मजबूत व्यापारिक और रक्षा संबंध भी बनाए रखता है।

भारत ने इजरायल के साथ रणनीतिक भागीदारी कायम की है, जबकि सऊदी अरब, मिस्र, कुवैत, यूएई, बहरीन, अफगानिस्तान, मालदीव और फिलिस्तीन जैसे मुस्लिम बहुल देशों के साथ भी सौहार्दपूर्ण संबंध बनाए हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इन आठ देशों से उनके सर्वोच्च नागरिक सम्मान से नवाज़ा गया है। यह भारत की व्यापक और संतुलित कूटनीति का प्रमाण है।

रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान जब वैश्विक स्तर पर रूस से संबंध तोड़ने का दबाव था, भारत ने संतुलन और लचीलापन दिखाते हुए अपनी स्वतंत्र विदेश नीति को बनाए रखा। भारत ने न केवल रूस से रणनीतिक साझेदारी बनाए रखी, बल्कि युद्ध के समाधान के लिए लगातार बातचीत और शांति का मार्ग अपनाने की सलाह दी। यह रुख वैश्विक राजनीति में भारत की बढ़ती भूमिका को दर्शाता है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत ने अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में एक प्रभावशाली उपस्थिति दर्ज कराई है, विशेष रूप से संकटों के समय। कोविड-19 महामारी के दौरान, जब कई पश्चिमी शक्तियाँ आत्मकेंद्रित रुख अपना रही थीं, भारत ने ‘वैक्सीन मैत्री’ पहल के जरिए दर्जनों गरीब और विकासशील देशों को जीवन रक्षक टीकों की आपूर्ति की। इससे भारत की वैश्विक नेतृत्व क्षमता और मानवीय दृष्टिकोण उजागर हुआ।

भारत आज न केवल ज़रूरतमंदों की मदद करने की क्षमता रखता है, बल्कि अपनी संप्रभुता और राष्ट्रीय सुरक्षा के खिलाफ किसी भी खतरे का निर्णायक और विनाशकारी जवाब देने में भी पूरी तरह सक्षम है।

‘ऑपरेशन सिंदूर’ ने साबित किया कि भारत अब सिर्फ जवाब देने वाला नहीं, बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन को आकार देने वाला देश है। चाहे दुश्मन हों या वैश्विक समुदाय, भारत की इस सक्रिय भूमिका ने दुनिया की सियासत बदल दी है। भारत अब बहुध्रुवीय दुनिया में एक मजबूत और स्थायी ताकत है।

(यह रिपोर्ट मूल रूप से अंग्रेजी में रुक्मा राठौर ने लिखी है, इसका हिंदी अनुवाद विवेकानंद मिश्रा ने किया है।)

3 मुख्य एयरबेस पर मिसाइल गिरते ही निकल गई थी पाकिस्तान की हवा, तुरंत मदद के लिए पहुँचा अमेरिका के पास: अब सामने आ रहा सारा सच, जानें भारत ने कैसे आतंकी मुल्क को डाला खौफ में

जम्मू कश्मीर के पहलगाम में 22 अप्रैल 2025 को हुए हमले के जवाब में भारत ने ऑपरेशन सिंदूर चलाया। 7 मई 2025 को पाकिस्तान और POK में 9 आतंकी ठिकानों को ध्वस्त करने के बाद 10 मई 2025 को भारतीय वायुसेना ने एयर स्ट्राइक कर पाकिस्तान के 11 हवाई अड्डों पर हमला किया। इनमें पाक के सबसे महत्वपूर्ण 3 एयरबेस- जकोबाबाद, चकलाला (रावलपिंडी) और सरगोधा हवाई अड्डे भी थे। इन हमलों से पाकिस्तानी सेना में भूचाल आ गया।

असल में ये 3 सैन्य हवाईअड्डे पाकिस्तान के पास अमेरिका से भेजे गए F-16 फाइटर जेट्स के रखरखाव, संचालन और डिप्लॉयमेंट के लिए सबसे जरूरी हैं। इसके अलावा यहाँ पर ट्रेनिंग और सशस्त्र जखीरे जैसे आवश्यक चीजें भी हैं।

चकलाला पर हमला खास तौर पर इसलिए भी जरूरी था क्योंकि यह पाकिस्तान का एक ट्रांसपोर्ट हब होने के साथ साथ एयर-रिफ्यूलिंग एसेट के लिए भी सबसे महत्वपूर्ण जगह है। इसी जगह पर पाकिस्तान के प्रमुख ट्रांसपोर्ट स्वाड्रन्स हैं और यहीं से लड़ाकी विमानों की सीमा बढ़ाई जाती है। C-130 हरक्यूलिस और IL-78 मिड-एयर रिफ्यूलर जैसे विमान यहाँ पर रखे जाते हैं। ये लॉजिस्टिक्स और स्ट्रैटेजिक एयरलिफ्ट ऑपरेशन के लिए जरूरी हैं।

इन वायुसेना अड्डों पर भारत के हमले से पाकिस्तान एक तरह से पंगु हो गया है। चकलाला पाकिस्तान के रणनीतिक योजनाओं के विभाग (Strategic Plans Division) के भी सबसे पास में स्थित है, जहाँ पर देश के परमाणु शस्त्रागार की देखरेख की जाती है।

इस हमले ने इस्लामाबाद को घुटनों पर ला दिया है। इसी के कारण पाकिस्तान को अमेरिका से बीचबचाव की दरख्वास्त करनी पड़ गई।

जनरल मुनीर ने वॉशिंगटन के आगे फैलाए हाथ

इस हमले को 1971 के बाद से सबसे बड़ा भारतीय सैन्य हमला कहा जा रहा है। पाकिस्तानी फौज के प्रमुख जनरल असीम मुनीर ने अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो से मुलाकात कर भारत के साथ बढ़ रहे तनाव को कम करने के लिए अमेरिका को दखल देने की गुजारिश की।

पाकिस्तान की गुजारिश के कुछ समय बाद रुबियो ने दोनों देशों से बातचीत शुरू करने के पेशकश की। साथ ही इस मुद्दे पर भारत के विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर से चर्चा की। अमेरिका ने मध्यस्थता करने और भारत और उसके पड़ोसी देश के बीच भविष्य के संघर्षों को कम करने में मदद करने का प्रस्ताव भी दिया।

इसके तुरंत बाद, पाकिस्तान के सैन्य संचालन महानिदेशक (DGMO), मेजर जनरल काशिफ अब्दुल्ला ने भारतीय अधिकारी लेफ्टिनेंट जनरल राजीव घई से बात कर दुश्मनी रोकने की पेशकश की। भारतीय अधिकारियों ने इस प्रस्ताव को पाकिस्तान के एयर डिफेंस और सैन्य इंफ्रास्ट्रक्चर को धराशायी करने का प्रत्यक्ष सबूत माना।

वायु सेना की बेहतरी ने क्षेत्रीय सैन्य संतुलन को किया मजबूत

भारत ने कुल 11 पाकिस्तानी एयरबेस और दो राडार साइट्स को निशाना बनाया। इतने कम समय में इतना बड़ा हमला कर सैना के लिए एक ‘नया सामान्य’ स्थापित कर दिया है।
पाकिस्तान की प्रतिक्रिया देने में अक्षमता उसके ध्वस्त हो चुके वायु रक्षा तंत्र और भारतीय सशस्त्र बलों की बेहतरीन क्षमता को दिखाती है जो उसकी पुरानी सैन्य तैयारियों के कारण ऐसी हुई।

भारत के हमलों ने दोनों देशों के बीच बढ़ रहे तकनीकी अंतराल को भी सबके सामने रख दिया। भारतीय अधिकारियों ने कहा कि पाकिस्तान की खुद को बेचारा दिखलाने की आदत ने ही उसे अमेरिका से मदद की गुहार लगाने पर मजबूर कर दिया। 10 मई को भारत की सैन्य शक्ति के प्रदर्शन ने भारतीय उपमहाद्वीप में रणनीतिक गणनाओं को एक बार फिर परिभाषित कर दिया है।

हालाँकि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बार-बार दावा किया है कि उनके दखल के कारण ही भारत और पाकिस्तान के बीच युद्धविराम हुआ। लेकिन भारत ने किसी भी तीसरे पक्ष की भूमिका को पूरी तरह से नकारा है। ट्रंप ने यह भी कहा कि उन्होंने व्यापार को ‘हथियार’ की तरह इस्तेमाल किया ताकि दोनों देशों को सीजफायर के लिए सहमत किया जा सके, लेकिन भारत ने इसे भी सिरे से खारिज कर दिया।

इसके अलावा, भारतीय सेनाओं और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने स्पष्ट रूप से कहा है कि इसे सीजफायर के तौर पर नहीं, बल्कि एक समझ के रूप में देखा जाना चाहिए। भारत आने वाले दिनों में भी पाकिस्तान के व्यवहार का आकलन करता रहेगा और उसके अनुसार ही अब एक्शन लेगा। भारत के अनुसार, ऑपरेशन सिंदूर जारी है।

भारत ने UN से की TRF के खिलाफ कार्रवाई की माँग

एक ओर पाकिस्तान भारत के हमलों से हुए नुकसान को छिपाने की कोशिश कर रहा है तो दूसरी ओर, नई दिल्ली ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में लश्कर-ए-तैयबा की सहायक संगठन द रेजिस्टेंस फ्रंट (TRF) को आतंकवादी संगठन घोषित करने की माँग की है। इसे लेकर भारत ने अपना डिप्लोमैटिक कैंपेन तेज कर दिया है। TRF ने 22 अप्रैल 2025 को पहलगाम आतंकी हमले की जिम्मेदारी ली थी। इस घटना में पाकिस्तान की भूमिका को सामने लाने वाला एक दस्तावेज प्रस्तुत किया गया है। हालाँकि इस्लामाबाद चीन के समर्थन से, UNSC में TRF को सुरक्षा देने का अब भी प्रयास कर रहा है।

क्या ‘सोम यज्ञ’ करने से सच में होती है वर्षा… वैज्ञानिकों ने ‘सनातन परंपरा’ पर शुरू किया शोध, उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर में अनुष्ठान से हुई शुरुआत

सनातन में यज्ञ और हवन का महत्व वैदिक काल से ही चला आ रहा है। भगवान श्री राम के जन्म से लेकर पूर्वजों की श्रद्दांजलि देने के लिए आज भी यज्ञ का ही सहारा लिया जाता है। सनातन की इसी परंपरा में सूखे जैसी आपदा के समाधान के लिए ‘सोम यज्ञ’ करवाया जाता था।

मान्यताएँ कहती हैं कि इससे बारिश हो भी जाती थी। अब इसी वैदिक मान्यता की पुष्टि और यज्ञ की वैज्ञानिकता को परखने के लिए मध्य प्रदेश में शोध किया जा रहा है।

मध्य प्रदेश विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद (MPCST)भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान इंदौर (IIT Indore) और भारतीय उष्णकटिबंधीय मौसम विज्ञान संस्थान के वैज्ञानिक इस शोध में प्रतिभाग कर रहे हैं।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, 24 अप्रैल 2025 को लगभग 15 वैज्ञानिकों की टीम ने मध्य प्रदेश के उज्जैन स्थित महाकालेश्वर मंदिर में इस प्रयोग को किया। उन्होंने वैदिक अनुष्ठानों के अनुसार सोम यज्ञ किया। इसके बाद उन्होंने 24 अप्रैल से 29 अप्रैल तक मौसम में बदलाव, एयरोसोल बिहेवियर और तापमान में परिवर्तन समेत कुछ अन्य पहलुओं की जाँच की।

यज्ञ का पौराणिक महत्व

वैज्ञानिकों के अनुसार, पौराणिक समय में सोम यज्ञ के लिए समोवल्ली (सरकोस्टेमा ब्रेविस्टिम्मा) नामक एक पौधे के रस का उपोग किया जाता था। मान्यता है कि देशी गाय के दूध से बने घी के साथ मिलाकर जब इस पौधे के रस को अग्नि में डाला जाता है तो न सिर्फ वातावरण शुद्ध होता है बल्कि बादलों का संघनन भी बढ़ जाता है।

नमी बढ़ने के बाद यज्ञ के आस पास की जगहों पर बारिश होती है। अध्यात्मिक तौर पर यज्ञ और हवन का महत्व विज्ञान से कहीं न कहीं जुड़ा हुआ भी है। हवन में डाले जाने वाले गुड़ और घी से ऑक्सीजन बनता है। इससे निकलने वाले धुएँ से 94% हानिकारण जीवाणु और विषाणु खत्म हो जाते हैं।

जिस जगह पर यज्ञ किया जाता है उस जगह को पवित्र माना जाता है। इसके पीछे का कारण ये है कि यज्ञ के धुएँ से उस जगह पर जीवाणुओं का स्तर लगभग एक माह तक नहीं बढ़ पाता। इससे न केवल घर में शुद्धता रहती है पर साथ ही फसलों में भी कीड़े नहीं लग पाते।

आस्था और विज्ञान का मिश्रण

वैज्ञानिकों का कहना है कि यह करने के पीछे उनका उनका उद्देश्य इस परंपरा की सत्यता को प्रमाणित करना था। इस शोध को पीरा करने में अक्षय कृषि परिवार नाम के एक गैर सरकारी संगठन (NGO) ने अपनी भूमिका निभाई थी।

रिपोर्ट्स के अनुसार, भारतीय मौसम विभाग के सेवानिवृत्त वैज्ञानिक राजेश माली ने बताया कि ये शोध 24 अप्रैल 2025 को शुरू हुआ था और आगे कई वर्षों तक चलेगा। इसके परिणाम से न केवल पौराणिक मान्यताओं पर लोगों का विश्वास बढ़ सकेगा पर साथ ही हमारे ऋषि मुनियों के ज्ञान की ख्याति भी बढ़ेगी।

राजेश ने बताया,”शोध में हम लगभग 13 उपकरणों का उपयोग करके अलग-अलग चीजों को माप रहे हैं। इन उपकरणों में से एक ‘क्लाउड कंडेनसेशन न्यूक्लियर काउंटर’ (CCN काउंटर) यज्ञ वाली जगह और उसके आसपास के पर्यावरण में बादल में मौजूद एयरोसोल कणों की सांद्रता पर काम करता है।

वहीं दूसरा मुख्य उपकरण ‘टेथरसॉन्ड’ एक सेंसरयुक्त गु्ब्बारा होता है। ये वायुमंडल में नमी, तापमान, दबाव आदि को जाँचता है। एक अन्य उपकरण स्कैनिंग मोबिलिटी पार्टिकल साइजर (SMPS) से आस पास की एयरोसोल की घटनाओं की गणना के लिए उपयोग किया जाता है।

कई बार रिकॉर्ड हो रहा डेटा

आईआईटीएम के क्षेत्रीय कार्यालय के एक अन्य वैज्ञानिक डॉ. यांग लियान के अनुसार, वैज्ञानिकों की टीम इस शोध में आगे के तुलनात्मक अध्ययन करने के लिए लगातार डेटा रिकॉर्ड कर रही है।

उन्होंने कहा, “उपकरणों से सभी डेटा लेने के बाद हम यज्ञ के प्रभाव से पर्यावरण पर हुए असर का विश्लेषण करेंगे। इसके लिए हम दिन में चार बार डेटा रिकॉर्ड कर रहे हैं। सुबह और शाम के अलावा यज्ञ के दौरान भी दो बार डेटा रिकॉर्ड किया जा रहा है।”

MPCST के निदेशक और शोध टीम के एक सदस्य अनिल कोठारी ने कहा, “यह अध्ययन विज्ञान और भारत के ऋषि मुनियों के द्वारा दी गई जानकारियों के बीच एक पुल की तरह काम करेगा। शोध के पूरा होने के बाद पर्यावरण और विज्ञान के क्षेत्र में नई जानकारी सामने आ सकती है।”

अक्षय कृषि परिवार के संयोजक गजानंद डांगे का कहना है कि अगर इस शोध के परिणाम उत्साहजनक नहीं मिलते हैं तो वैज्ञानिकता को परखने के लिए नई मशीनें भी लाईं जा सकती हैं। उन्होंने कहा, “इस शोध का उद्देश्य सदियों पुरानी पारंपरिक मान्यताओं को वैज्ञानिक प्रमाण देना है।”

वैज्ञानिकों का मानना है कि इस शोध के परिणाम के आधार पर आगे चलकर ग्लोबल वार्मिंग समेत कई अन्य पर्यावरणीय समस्याओं में इन पारंपरिक तरीकों का उपयोग करने पर विचार किया जा सकता है।

मियाँ शहबाज नकल तो कर लोगे, पर मोदी जैसा साहस कहाँ से लाओगे: नए भारत का आदमपुर ने किया उद्घोष, पसरूर ने पस्त पाकिस्तान की दिखाई तस्वीर

भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके पाकिस्तानी समकक्ष शहबाज की उम्र में करीब साल भर का ही अंतर है। लेकिन अपनी उपस्थिति से नरेंद्र मोदी जो प्रभाव पैदा करते हैं, उसके आगे शरीफ कहीं नहीं टिकते। यह फर्क भारतीय वायुसेना के आदमपुर एयरबेस की नरेंद्र मोदी की यात्रा और उनकी देखादेखी शरीफ का सियालकोट के पसरूर फौजी छावनी जाने के दौरान भी दिखा।

आदमपुर एयरबेस गए PM मोदी, दिखाया S-400 और MIG 29

पाकिस्तान की तरफ से यह प्रोपेगेंडा चलाया गया था कि ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के जवाब में उसने पंजाब में स्थित भारतीय वायुसेना के आदमपुर एयरबेस को तबाह कर दिया है। साथ ही यह अफवाह भी फैलाई गई कि पाकिस्तान ने इस बेस पर तैनात एयर डिफेंस सिस्टम S-400 को भी नुकसान पहुँचाया है। उल्लेखनीय है कि इस एयरबेस को पाकिस्तान ने 1965, 1971 और 1999 के युद्ध दौरान भी निशाना बनाने की कोशिश की थी, लेकिन नाकाम रहा था।

13 मई 2025 को आदमपुर एयरबेस पर जवानों के बीच पीएम मोदी, पीछे रनवे पर खड़ा दिख रहा मिग-29 (फोटो साभार: X/@narendramodi)
13 मई 2025 को आदमपुर एयरबेस पर पीएम मोदी, पीछे दिख रहा एस-400 (फोटो साभार: pib.gov.in)

सीजफायर के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आदमपुर एयरबेस पहुँचकर पाकिस्तान के सारे प्रोपेगेंडा को दुनिया के सामने ध्वस्त कर दिया। इस दौरान दुनिया ने उस S-400 को भी देखा, जिसे नुकसान पहुँचाने का दुष्प्रचार चलाया गया था। MIG-29 को भी उसी एयरबेस के रनवे पर देखा, जिसे तबाह करने के दावे थे। इस दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर जवानों तक के हावभाव, उत्साह और बातचीत सब ‘ऑपरेशन सिंदूर’ की सफलता की कहानी बता रहे थे। साथ ही पाकिस्तान के झूठों की पोल भी खोल रहे थे।

फौजी छावनी जाकर शहबाज शरीफ ने दिखाया टैंक

प्रधानमंत्री मोदी की नकल कर शहबाज शरीफ ने अपने मुल्क के पंजाब प्रांत स्थित सियालकोट के पसरूर फौजी छावनी की यात्रा कर ली। लेकिन उनमें से किसी भी एयरबेस पर जाने की हिम्मत नहीं जुटा पाए, जिन्हें ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के तहत भारतीय सेना ने तबाह कर पाकिस्तान को घुटने पर ला दिया था।

सियालकोट के पसरूर फौजी छावनी में शहबाज शरीफ ने टैंक पर चढ़कर कराया फोटो सेशन (फोटो साभार: इंडिया टुडे)

AI जेनरेटेड तस्वीर छपवाकर ‘आसमान का शहंशाह’ होने का मुगालता पालने वाला पाकिस्तान इस यात्रा के दौरान कुछ भी ऐसा प्रदर्शित नहीं कर पाया, जिससे उसकी सेना की क्षमता का दुनिया को पता चले। सबसे हास्यास्पद तो यह रहा कि जिस लड़ाई में लड़ाकू विमानों, मिसाइल, ड्रोन, यूएवी, एयर डिफेंस सिस्टम का इस्तेमाल हुआ, उसके बारे में संदेश देने के लिए टैंक पर चढ़कर पाकिस्तानी प्रधानमंत्री ने फोटो सेशन कराया।

PM मोदी का सीधा संदेश, शरीफ की घिसीपिटी बातें

भारत से बदला लेंगे– यह पैदाइश के बाद से ही पाकिस्तान की सियासत और फौज का तकिया कलाम है। 1947, 65, 71, 99 के युद्ध में पराजय, मुल्क का विभाजन होने के बाद भी पाकिस्तान इस एक लाइन से आगे नहीं बढ़ पाया। बदला लेने की यह बात कहते-सुनते पाकिस्तान की कई पीढ़ियाँ खाक हो गई, उसके बाद सर्जिकल स्ट्राइक हो या एयर स्ट्राइक या फिर ‘ऑपरेशन सिंदूर’ भारत ने पाकिस्तान को घर में घुसकर लगातार मारा, लेकिन वह इस एक लाइन से आगे नहीं बढ़ पाया।

टैंक पर चढ़कर भी लस्त-पस्त शहबाज शरीफ ‘1971 की जंग का आपने इस जंग में बदला ले लिया’ वाला डायलॉग से आगे नहीं बढ़ पाए। जिस मुल्क की सीमा में घुसकर भारत ने आतंकी ठिकानों से लेकर एयरबेस तक तबाह कर दिए, एयर डिफेंस सिस्टम और हथियारों को भोथरा कर दिया, जिसके ड्रोन-मिसाइल भारतीय सेना ने पतंग की तरह काट गिराए, उस मुल्क का प्रधानमंत्री जब बदला लेने का दंभ भरता है तो न उसके हावभाव में विश्वास दिखता है, न उसके शब्दों में। यही शरीफ के इस संबोधन में परिलक्षित भी हो रहा था। मार खाई फौज में मरे हुए आत्मविश्वास से भरोसा पैदा नहीं किया जा सकता। लिहाजा शरीफ की यात्रा के जो वीडियो सामने आए हैं, उसमें पाकिस्तानी फौजियों का निस्तेज दिखना आश्चर्यजनक नहीं है।

इसके ठीक उलट प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का संबोधन ‘नया भारत’ का उद्घोष था। उनके हर एक शब्द से ऑपरेशन सिंदूर और भारतीय सेना के पराक्रम का जयघोष हो रहा था। संबोधन के दौरान उनका हावभाव, भारत माता के जयकारे बता रहे थे कि भारत का मनोबल और खुद में विश्वास किस स्तर का है।

उन्होंने कहा;

PM मोदी की नकल कर ली, पर वह लकीर नहीं खींच पाए शरीफ

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संबोधन के एक-एक शब्द की तरह आदमपुर की उनकी यात्रा के संदेश भी स्पष्ट हैं। आदमपुर उस मजबूत भारत का प्रतीक है, जो आतंकी मुल्क की गुहार पर अपनी सैन्य कार्रवाई स्थगित कर सकता है। लेकिन जिसमें फिर से आतंकी गतिविधि या फौजी दुस्साहस का मुँहतोड़ जवाब अपनी शर्तों और अपने तरीकों से देने का पराक्रम भी है। जो बताता है कि वह शांति का पक्षधर है, लेकिन दुश्मन को मिट्टी में मिलाना भी अच्छी तरह से जानता है।

दूसरी तरफ शहबाज शरीफ के शब्द उतने ही पुराने, घिसेपिटे और उलझे हुए हैं, जितना पुराना पाकिस्तान। उनकी यात्रा के संदेश उतने ही ऊर्जाहीन हैं, जितनी पाकिस्तानी फौज की हालत है।