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शरिया कोर्ट की कोई कानूनी औकात नहीं, आदेश मानने को बाध्य नहीं: सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला इतना भी ‘सरल-सहज’ नहीं, जानिए कब ‘काजी कोर्ट’ का फैसला होगा मान्य

सुप्रीम कोर्ट ने 28 अप्रैल 2025 को अहम फैसला सुनाते हुए कहा था कि ‘शरिया कोर्ट’, ‘काज़ी की अदालत’ या ‘दारुल-क़ज़ा’ जैसे नामों से चलने वाली अदालतों की भारत के कानून में कोई मान्यता नहीं है। सुप्रीम कोर्ट कहा कि इन अदालतों के फैसले कानूनी तौर पर बाध्यकारी नहीं हैं।

यह फैसला सुप्रीम कोर्ट ने एक मुस्लिम महिला (शाहजहान) की याचिका पर सुनाया था। 2018 में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने फैमिली कोर्ट के एक आदेश को सही ठहराया था। आदेश में मुस्लिम महिला शाहजहान को ही विवाद का कारण बताया और महिला को शौहर (गफ्फार खान) द्वारा मिलने वाले गुजारा भत्ता को मना कर दिया था। इस फैसले पर मुस्लिम महिला ने इलाहाबाद हाई कोर्ट में चुनौती दी थी।

इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट ने पलट दिया और महिला को गुजारा भत्ता देने का आदेश दिया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि याचिका दाखिल करने की तारीख से हर महीने ₹4,000 गुजारा भत्ता महिला को दिया जाए। इसके अलावा, मुस्लिम महिला के शौहर को आदेश दिया गया है कि वह बच्चों के बालिग होने तक उनकी आर्थिक जरूरतों का ख्याल रखे।

भले ही यह मामला एक मुस्लिम समुदाय से जुड़ा था, लेकिन सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला एक बड़े संवैधानिक सिद्धांत को मजबूत करता है। सिद्धांत यह है कि भारत का कानूनी सिस्टम इस्लामिक बयानों या शरिया अदालतों के जरिए किए गए फैसले से ऊपर है। हालाँकि, अगर दोनों पक्ष अपनी मर्जी से ऐसे फैसलों को मानना चाहें तो मान सकता है, लेकिन कानून उन पर कोई दवाब नहीं डालेगा। सुप्रीम कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा कि जब गुजारा भत्ता जैसे कानूनी अधिकारों की बात आती है, तो फैसला करने का अधिकार सिर्फ और सिर्फ भारतीय अदालतों के पास है।

जस्टिस सुधांशु धूलिया और अहसानुद्दीन अमानुल्लाह की बेंच ने कहा, “‘काज़ी की अदालत’, ‘(दारुल कज़ा) कजियत की अदालत’ या फिर ‘शरिया कोर्ट’… चाहे उन्हें किसी भी नाम से पुकारा जाए, कानून में उनकी कोई मान्यता नहीं है।”

दारुल कज़ा में समझौता और तलाक: एक धर्मनिरपेक्ष देश में शरिया अदालतों का विरोधाभास

इस मामले में गफ्फार खान नाम के मुस्लिम व्यक्ति ने गुजारा भत्ता देने से बचने के लिए भोपाल के एक दारुल कजा (कजियत) में तलाकनामा दाखिल किया था। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इसे पलटते हुए कहा कि ऐसे मंचों की न तो भारतीय कानून में कोई मान्यता है और न ही उनके फैसले कानूनी रुप से बाध्य किए जा सकते हैं।

गफ्फार खान और उनकी बीवी शाहजहान ने 2002 में दूसरी बार निकाह किया था। गफ्फार खान सीमा सुरक्षा बल (BSF) में काम करता है। गफ्फार और शाहजहान के 2 बच्चे हुए, लेकिन समय के साथ रिश्तों में कड़वाहट आ गई। इसी के चलते गफ्फार ने 2005 में भोपाल की ‘काज़ी की अदालत’ में तलाक की अर्जी डाली और 22 नवंबर 2005 को एक समझौते के साथ दोनों फिर से साथ में रहने के लिए मान गए।

समझौते के बाद भी रिश्ता बिगड़ा और शाहजहान ने गफ्फार पर मारपीट करने और 50,000 दहेज की माँग का आरोप लगाया। इसके अलावा शाहजहान का कहना था कि गफ्फार ने उसे और बच्चों को घर से निकाल दिया है। सितंबर 2008 में गफ्फार ने भोपाल की ‘कजियत की अदालत(दारुल कज़ा)’ में तलाक की अर्जी डाली थी।

इसके तुरंत बाद, शाहजहान ने फैमिली कोर्ट में 5 हजार गुजारा भत्ता के लिए अर्जी डाली। फैमिली कोर्ट ने कहा कि यह शाहजहान का दूसरा निकाह है, तो इसमें दहेज की माँग कोई मायने नहीं रखती और बात रही गुजारा भत्ता की तो, शाहजहान अपनी मर्जी से घर छोड़कर आई है, इसलिए केवल बच्चों के लिए गुजारा भत्ता मंजूर किया जाएगा। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने भी फैमिली कोर्ट के आदेश को बरकरार रखा था।

हालाँकि अब 2025 में इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट ने पलट दिया और गफ्फार को गुजारा भत्ता देने का आदेश दिया। जब शाहजहान ने निचली अदालतों के फैसलों को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया, तो सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कोई भी इस्लामिक अदालत भारतीय न्यायपालिका के अनुरुप फैसले नहीं कर सकती। शाहजहान ने सुप्रीम कोर्ट में कहा था कि वह अनपढ़ है और उसकी कोई आय नहीं है। इसके अलावा उसे शौहर का घर गलत तरीके से छोड़ने के लिए दोषी भी ठहराया गया था। शाहजहान ने ‘समझौता पत्र’ और शरिया अदालत के तलाक के चलते निचली अदालत के भरोसे पर भी सवाल उठाया था।

इस्लामिक अदालतों की कानूनी स्थिति पर सुप्रीम कोर्ट की फटकार (फैसला)

वर्तमान मामले के विश्लेषण में, सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कई बार कार्यवाही में ‘काज़ी की अदालत’, ‘(दारुल कज़ा) कजियत की अदालत’, और ‘शरिया कोर्ट’ जैसे निकायों का उल्लेख किया गया था। इसके जवाब में, अदालत ने अपने फैसले के ‘पोस्ट-स्क्रिप्ट’ अनुभाग में इस मामले को संबोधित किया।

मामले के तहत, अदालत ने दार-उल-कजा एक समानांतर अदालत है या नहीं और क्या ‘फतवा’ का कोई कानूनी दर्जा है या नहीं इसकी जाँच कराई थी। जिसका हवाला 2014 के विश्व लोचन मदान बनाम भारत संघ मामले में सुप्रीम कोर्ट ने दिया था।

अदालत ने कहा था कि कानूनी तौर पर जो निर्णय लिए जाते है, उसका पालन करना जरुरी होता है, जब तक कि कानून द्वारा ही उसे रद्द न कर दिया जाए। हालाँकि, दार-उल-क़ज़ा के फैसले या फतवा इनमें से किसी भी आवश्यकता को “पूरा नहीं करते”, क्योंकि दार-उल-क़ज़ा “किसी भी सक्षम विधायिका द्वारा नहीं बनाया गया है और ना ही स्वीकारा गया है।”

इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दार-उल-कजा जो भी राय या फतवा जारी करता है, वो मान्य नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने आगे कहा कि किसी भी काजी या मुफ्ती के पास अपनी राय को जबरदस्ती थोपने और फतवे जारी करने का न तो कोई अधिकार है और न ही कोई शक्ति। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि मुगल या ब्रिटिश शासन काल के दौरान जो फैसले लिए जाते रहे हो, उनकी जगह अब स्वतंत्र भारत के सवैंधानिक योजना के तहत नहीं है।

कोर्ट ने कहा, “मामले से संबंधित व्यक्ति या निकाय इसे अनदेखा कर सकता है और किसी भी अदालत में इसे चुनौती देने की कोई आवश्यकता भी नहीं है। इसे बस अनदेखा किया जा सकता है।” 2014 में उसी फैसले के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा था कि हमारी संवैधानिक योजना में जब फतवा या इस्लामी घोषणा की कोई कानूनी मान्यता नहीं है, फिर भी फतवे जारी किए गए हैं और किए जा रहे हैं।

ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड(AIMPLB) ने कहा कि पूरे देश में न्यायिक प्रणाली का एक नेटवर्क होना चाहिए, जिसमें मुस्लिम अपने विवादों का फैसला काज़ियों द्वारा करवा सकें।

हालाँकि, अदालत ने कहा था कि फतवा किसी विशेषज्ञ की एक राय हो सकती है न कि कोई डिक्री, और यह किसी भी अदालत, राज्य या व्यक्ति पर थोपी नहीं जा सकती। इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि फतवा जारी करने पर तब तक आपत्ति नहीं होनी चाहिए, जब तक कि यह कानून के तहत व्यक्तियों को दिए गए अधिकारों का उल्लंघन न करे।

सुप्रीम कोर्ट ने 2014 के विश्व लोचन मदान मामले का हवाला देते हुए कहा कि ‘काज़ी की अदालत’, ‘(दारुल कज़ा) कजियत की अदालत’, ‘शरिया कोर्ट’, चाहे उन्हें किसी भी नाम से पुकारा जाए, कानून में उनकी कोई मान्यता नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट ने फैमिली कोर्ट और इलाहाबाद कोर्ट को भी फटकारा, क्योंकि इन्होंने ‘काजी अदालत’ जैसों के ‘समझौते पत्र’ पर भरोसा जताया था। सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने जोर देकर कहा कि इस्लामिक अदालतों जैसे गैर-न्यायिक निकायों की घोषणा पर भारतीय अदालतें भरोसा नहीं कर सकती।

हाल ही में पारित सुप्रीम कोर्ट के आदेश में कहा गया है, “जैसा कि विश्व लोचन मदान (ऊपर) में उल्लेख किया गया है, ऐसे इस्लामिक संस्था द्वारा अगर कोई भी फैसला लिया जाता है, वो किसी पर भी थोपा नहीं जा सकता है। ऐसे फैसले को कानून की नज़र में तभी सही ठहराया जा सकता है जब प्रभावित पक्ष फैसले को स्वीकार करता है और ऐसी कार्रवाई किसी अन्य कानून का उल्लंघन नहीं करती है।” सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर जोर देते हुए कहा कि ऐसे फैसले केवल उन पक्षों के बीच ही मान्य किया जा सकता है, जो इसे स्वीकारते हैं। इसके अलावा किसी तीसरे पक्ष पर लागू नहीं किया जा सकता।

शाहजहान और गफ्फार खान दोनों का ही ये दूसरा निकाह था, तो दहेज की माँग की कोई संभावना नहीं है। निचली अदालत की इस टिप्पणी को सुप्रीम कोर्ट ने’आधारहीन’ बताया और कहा कि ऐसी टिप्पणी “कानून के सिद्धांतों से अनजान” थी।

सुप्रीम कोर्ट ने आगे कहा कि फैमिली कोर्ट का यह मानना कि शाहजहान ने अपने शादीशुदा जीवन में कलह पैदा किया, केवल अटकलों पर आधारित था और इसमें कोई सबूत नहीं था।

अब सुप्रीम कोर्ट ने गफ्फार खान को हर महीने 4000 रुपये गुजारा भत्ता देने का निर्देश दिया है। गुजारा भत्ता तब से लागू किया जाएगा, जब फैमिली कोर्ट में इसकी याचिका दाखिल करने की गई थी। इसके अलावा बच्चों को दिया जाने वाला गुजारा भत्ता भी फैमिली कोर्ट में गुजारा भत्ता याचिका दाखिल करने की तारीख से देना होगा।

क्या शरिया अदालतें भारतीय मुसलमानों के लिए ‘सर्वोच्च’ हैं?

बता दें कि बीते कुछ सालों में कई मुस्लिम मौलवियों और राजनेताओं ने संविधान से ऊपर शरिया को प्राथमिकता देने वाले बयान दिए हैं। कई ने यह दावा भी किया है कि भारतीय मुसलमान केवल शरिया का पालन करेंगे। इसका हालिया उदाहरण 14 अप्रैल 2025 को सामने आया, जब झारखंड सरकार के मंत्री हफीजुल हसन ने कहा कि उनके लिए शरिया संविधान से पहले है।

हसन ने उस अल-तक्किया का खुलासा किया, जिसका इस्तेमाल इस्लामवादी अक्सर ‘धर्मनिरपेक्षवादियों’ को मूर्ख बनाने के लिए करते हैं, जैसा कि उन्होंने कहा, “हम कुरान को अपने दिलों में और संविधान को अपने हाथों में रखते हैं।”

साल 2023 में ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने दावा किया था कि भारत में 100 से अधिक शरिया अदालतें हैं और भारत के सभी मुस्लिम बहुल जिलों में ऐसी इस्लामी अदालतें स्थापित करना उनका इरादा है। 2018 में भी मुस्लिम निकाय ने कहा था कि वह देश के सभी जिलों में दारुल-क़ज़ा (शरिया अदालतें) खोलने की योजना बना रहा है।

AIMPLB ने 2020 में मुस्लिमों से आग्रह किया था कि वे अपने विवादों को हल करने के लिए शरिया जैसी अदालतों को दरवाजा खटाखटाएँ, न कि भारतीय न्यायपालिका का। इसे पहले भी भारत के उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी ने देश के हर जिले में शरीयत अदालतें खोलने का दावा किया था और कहा था कि सभी समुदायों को अपने व्यक्तिगत कानून का पालने करने का अधिकार है।

जबकि AIMPLB, मुस्लिम तुष्टीकरण करने वाले राजनेता और इस्लामावादी लगातार मुस्लिमों को प्रेरित करते हैं कि वे अपने विवादों को हल करने के लिए शरिया या दारुल-कजा का सहारा ले, जिससे इस्लामी धार्मिक लाइनों पर काम करने वाली समानांतर न्यायपालिका को मजबूत किया जा सके।

जैसा की शाहजहाँ मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि केवल भारत के संविधान के तहत स्थापित वैधानिक अदालतें ही विवादों का फैसला कर सकती हैं। विवादों को निपटाने के लिए गैर-न्यायिक संस्थाओं का सहारा लेना देश के धर्मनिरपेक्ष कानूनी ढाँचे को कमजोर करता है।

इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि भारत की दूसरी अदालतें खुद इस्लामिक अदालतों को वैधता प्रदान करेगी या फिर कानूनी अधिकारों का सुलह करने के लिए गैर-न्यायिक इस्लामिक संस्था के फैसले पर भरोसा करेगी, तो भारत में न्यायिक प्रणाली के अस्तित्व का मतलब ही क्या?

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले ने फिर से वैधानिक कानून की प्रधानता को स्थापित किया है। साथ ही कहा कि इस्लामिक अदालतें या कोई गैर-कानूनी संस्थाएँ, जो फैसले लेती है, वे कानूनी रुप से किसी पर थोपी नहीं जा सकती है।

मूल रूप से ये रिपोर्ट श्रद्धा पांडे ने अंग्रेजी में लिखी है। इस लिंक पर क्लिक कर इसे पढ़ सकते हैं।

‘ट्रेन के डिब्बे जैसा हो गया है हाल, जो पहले घुस गया दूसरे को घुसने नहीं देना चाहता’: सुप्रीम कोर्ट, जानिए क्यों आरक्षण को बताया ‘रेल यात्रा’ की तरह

देश में आजकल आरक्षण को लेकर ख़ूब बहस चल रही है। कोई आकर सामान्य वर्ग के ग़रीबों को मिल रहे EWS आरक्षण को ‘कैंसर’ बताकर चला जाता है तो कोई चुनावों के दौरान डर दिखाता है कि भाजपा जीत गई तो आरक्षण ख़त्म कर देगी। राजद-सपा जैसे दल और इसके चट्टे-बट्टे 90% आरक्षण की बातें करते हैं। इसी बीच सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश सूर्यकांत ने आरक्षण पर दिलचस्प टिप्पणी करते हुए इसकी तुलना रेल यात्रा से की है। भारत में रेलवे यात्रा का सबसे सुगम माध्यम है और प्रतिदिन औसतन ढाई करोड़ लोग इससे यात्रा कर रहे होते हैं।

ट्रेनों में यात्रा करने के लिए टिकट कटाना होता है, अगर आप जनरल में सफर नहीं कर रहे हैं तो आपकी सीट पहले से तय होती है। जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि आरक्षण उस रेल यात्रा की तरह हो गया है, जहाँ कम्पार्टमेंट में पहले से जमे लोग दूसरों को नहीं घुसने देना चाहते हैं। महाराष्ट्र के स्थानीय निकाय के चुनावों में OBC को आरक्षण को लेकर सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई के दौरान उन्होंने ये टिप्पणी की। इस पीठ में जस्टिस NK सिंह भी शामिल थे।

वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने याचिकाकर्ता की तरफ से जिरह करते हुए कहा कि राज्य सरकार द्वारा गठित बाँठिया आयोग ने स्थानीय निकाय के चुनावों में OBC के लिए 27% आरक्षण की सिफारिश ये देखे बिना की थी कि वो राजनीतिक रूप से पिछड़े हैं। उन्होंने कहा कि राजनीतिक पिछड़ापन सामाजिक व शैक्षणिक पिछड़ापन से अलग है, और OBC वर्ग को स्वतः ही राजनीतिक रूप से पिछड़ा नहीं माना जा सकता। इसी पर जस्टिस सूर्यकांत ने कहा, कि बात ये है कि हमारे देश में आरक्षण का कारोबार रेलवे की तरह हो गया है, जहाँ पहले से बोगी में जमे लोग किसी और को नहीं घुसने देना चाहते।

उन्होंने कहा कि पूरा खेल यही है और याचिकाकर्ताओं का खेल भी यही है। इसपर टिप्पणी करते हुए गोपाल शंकरनारायणन ने कहा कि बोगियाँ पीछे से भी जोड़ी जा रही हैं। जस्टिस सूर्यकांत ने आगे कहा, “जब आप समावेशिता का सिद्धांत अपनाते हैं, तो राज्यों को ज़्यादा वर्गों को पहचानना ही पड़ेगा – सामाजिक रूप से पिछड़े, राजनीतिक रूप से पिछड़े, और आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग। तो फिर फायदे से उन्हें वंचित क्यों रखा जाए? फायदा सिर्फ़ एक ही ख़ास परिवार या कुछ गिने-चुने समूहों तक ही क्यों सीमित रहे?”

सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने इस दौरान मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा कि महाराष्ट्र में लंबे समय से अटके स्थानीय निकाय के चुनावों को अब आगे सिर्फ़ इसीलिए नहीं टाला जा सकता क्योंकि OBC आरक्षण पर पेंच फँसा हुआ है। अब पीठ ने इस विषय में राज्य सरकार की राय माँगी है और तबतक के लिए सुनवाई स्थगित कर दी गई है। अगस्त 2022 में सुप्रीम कोर्ट ने इसे लेकर यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दिया था, तभी से चुनाव अटके पड़े हैं।

नए आदेश में चुनाव आयोग को 4 हफ्ते के भीतर स्थानीय निकाय चुनाव को लेकर अधिसूचना जारी करने व OBC के लिए आरक्षण की व्यवस्था जैसे 2022 से पहले थी फ़िलहाल वैसी ही रखने के लिए कहा गया है। साथ ही ये प्रयास करने के लिए कहा गया है कि चुनाव की पूरी प्रक्रिया 4 महीने के भीतर पूर्ण हो जाए। हालाँकि, सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि अगर वैसी कोई स्थिति बनती है तो इसे आगे बढ़ाने के लिए अनुमति ली जा सकती है।

‘मंदिरों के सामने थूका, पेशाब किया, मूर्तियाँ तोड़ीं’: मुर्शिदाबाद के हिन्दुओं ने बताया कैसे दंगाई मुस्लिम भीड़ ने मचाई तबाही, मिले हुए थे TMC के पार्षद-विधायक

मुस्लिम बहुल मुर्शिदाबाद जिले में 11 अप्रैल 2025 को नए वक्फ संशोधन अधिनियम के खिलाफ प्रदर्शन के नाम पर हिंदू समुदाय के खिलाफ बड़े पैमाने पर हिंसा, तोड़फोड़, आगजनी और टारगेटेड हमले देखने को मिले।

ऑपइंडिया ने अपनी रिपोर्ट्स में विस्तार से बताया है कि कैसे हिंदुओं को चुन-चुनकर निशाना बनाया गया, जिसमें उनके घर, दुकानें और मंदिर शामिल थे। यह तबाही 11 अप्रैल 2025 को जुम्मा नमाज के बाद वक्फ कानून के खिलाफ प्रदर्शन के नाम पर शुरू हुई और 12 अप्रैल 2025 तक चली।

हालात इतने खराब हो गए कि हजारों हिंदुओं को मुर्शिदाबाद के अपने घर छोड़कर नावों के जरिए पास के मालदा जिले में भागना पड़ा।

22 अप्रैल को इनसाइट के पत्रकारों की टीम ने हिंसा से प्रभावित मुर्शिदाबाद का दौरा किया और उन हिंदू परिवारों से मुलाकात की, जिन्होंने मुस्लिम भीड़ के कहर में सब कुछ खो दिया।

पीड़ितों ने हत्या, हिंदू मंदिरों और घरों पर हमलों और मस्जिदों से हिंसा के लिए मिल रहे डायरेक्शन की भयानक कहानियाँ सुनाईं।

पीड़ितों ने स्थानीय पुलिस की निष्क्रियता, टीएमसी पार्षदों की मिलीभगत और यह भी बताया कि उग्र मुस्लिम भीड़ के लिए पार्टी से जुड़ाव मायने नहीं रखता था।
सभी ने एक स्वर में कहा कि उनकी हिंदू पहचान ही इस चरमपंथी हमले की वजह थी, जैसा कि इनसाइट ने 1 मई 2025 को अपने यूट्यूब चैनल पर 30 मिनट के ग्राउंड रिपोर्ट में सबकुछ बताया।

मुर्शिदाबाद में हिंदू विरोधी दंगों की पीड़ित परुल दास ने बताया कैसे उनके पति और बेटे को मुस्लिम भीड़ ने मार डाला, पुलिस 4 घंटे बाद आई।

इनसाइट टीम ने हरगोबिंद दास के परिवार से मुलाकात की, जिन्हें उनके बेटे चंदन दास के साथ 11 अप्रैल 2025 को एक मुस्लिम भीड़ ने काटकर मार डाला था।

इस हत्या के सिलसिले में चार इस्लामी कट्टरपंथियों कालू नादर, दिलदार नादर, इंजमाम उल हक और जियाउल शेख को गिरफ्तार किया गया।

हरगोबिंद दास की विधवा पारुल दास ने बताया, “पहले उन्होंने उनकी उस दुकान को तोड़ा। सब कुछ लूट लिया और चले गए। बाद में वे वापस आए और हमारी रसोई तोड़ दी। फिर उन्होंने छत पर पत्थर, काँच और बोतलें फेंकी। दूसरी तरफ से बाड़ के पास से पत्थर और ईंटें फेंके। तीसरी बार जब वे आए, तो उनके पास फावड़े, कुदाल और अन्य नुकीले हथियार थे।”

पारुल दास ने बताया कि कैसे उनके पति और बेटे को मुस्लिम भीड़ ने मार डाला। उन्होंने कहा, “पिता और बेटा वहाँ खड़े थे। उन्होंने पिता-पुत्र को बाहर खींच लिया। पिता को नाले के पास काट दिया। मेरे बेटे को उस पेड़ के नीचे मार डाला।”

जब उनसे पूछा गया कि क्या उन्हें पुलिस से कोई मदद मिली, तो परुल दास ने कहा, “नहीं, कुछ भी नहीं। अगर पुलिस होती तो तीसरी बार हत्याएँ नहीं होतीं। वे (पुलिस) 4 घंटे बाद आए।”

इस असहाय महिला ने बताया कि उसने टीवी पर दिखाए गए वीडियो से अपराधियों की पहचान की। उन्होंने कहा कि हम डरे हुए हैं और यहाँ बीएसएफ की स्थाई तैनाती की माँग कर रहे हैं।

पारुल दास ने बताया कि वह अब अपने घर में नहीं रह सकतीं क्योंकि उसके दरवाजे नहीं हैं। जब उनसे पूछा गया कि उनके पति और बेटे को क्यों मारा गया, तो उन्होंने कहा, “मैं क्या कहूँ? हमारी किसी से दुश्मनी नहीं थी।”

बता दें कि पारुल दास और उनकी बहू पिंकी दास को तृणमूल कॉन्ग्रेस के गुंडे और पश्चिम बंगाल पुलिस परेशान कर रही है।

हिंदू पीड़ित ने दी TMC पार्षद की कारस्तानी की गवाही

एक हिंदू व्यक्ति दीपेन मंडल ने मुस्लिम भीड़ द्वारा की गई हिंसा में टीएमसी पार्षद की मिलीभगत को उजागर किया। दीपेन मंडल ने बताया, “पार्षद वहाँ (घटनास्थल पर) मौजूद था। अगर वह चाहता तो इस तबाही को रोक सकता था।”

उन्होंने आगे बताया, “अमीरूल (समशेरगंज से टीएमसी विधायक) आया था। उसे सब पता था। उसके आने के बाद इस तरफ से हमला हुआ। जो लोग उसके साथ थे, उन्होंने भी तोड़फोड़ और लूट में हिस्सा लिया।”

दीपेन मंडल ने कहा, “अगर पार्षद को पता नहीं था, तो गाँव वाले यहाँ कैसे आए और तबाही मचाई? वहाँ मकबूल आलम है। उसके गाँव के लोग हमारे गाँव पर हमला करने कैसे आ गए? अगर उसने उन्हें मना किया होता, तो वे नहीं आते।”

उन्होंने बताया कि कैसे उन्हें और उनके परिवार को अपना गाँव छोड़कर मालदा के पर लालपुर में 7-9 दिनों तक रहना पड़ा। उन्होंने पूछा, “यह आपके अपने लोगों के साथ पश्चिम बंगाल में हो रहा है, जो एक जगह से दूसरी जगह जाने को मजबूर हैं। दूसरे लोग आ सकते थे। लेकिन ममता को समय नहीं मिला?”

उन्होंने बताया कि पुलिस ने उन्हें मालदा से भगा दिया और वापस मुर्शिदाबाद भेज दिया। मंडल ने कहा, “उन्होंने (पुलिस) हमें जबरदस्ती वापस भेज दिया… पुलिस ने कहा कि वे केस दर्ज करेंगे। हमें जाने को कहा। हमें कहा कि हम तुम्हें यहाँ नहीं रख सकते। उन्होंने हमें हटाने के लिए कई बहाने बनाए।”

उन्होंने यह भी बताया कि कैसे मुस्लिमों ने एक मंदिर में तोड़फोड़ की और पास की एक दुकान में घुसने की कोशिश की।

एक हिंदू महिला बनवासी मंडल ने दुख जताया, “अगर यहाँ बीएसएफ कैंप होता, तो हमारी जिंदगी आसान हो जाती। हमें नुकसान की भरपाई चाहिए। घर में कुछ भी नहीं है। न चावल, न दाल, न पहनने को कुछ। सब कुछ जलकर राख हो गया।”

मुस्लिमों ने मंदिर के सामने थूका और पेशाब किया, देवर को ‘अल्लाह’ और ‘बिस्मिल्लाह’ बोलने के लिए किया मजबूर

एक हिंदू महिला झारना मंडल ने बताया कि कैसे मुस्लिमों ने उनके देवर पर हमला किया और शनिवार (12 अप्रैल) को एक मंदिर में तोड़फोड़ की। उन्होंने यह भी बताया कि भीड़ ने मंदिर के सामने थूका और पेशाब किया।

उन्होंने बताया, “उन्होंने (मुस्लिमों ने) मंदिर के सामने थूक दिया और पेशाब किया… कम से कम 2000 से 5000 लोग आए और इस मंदिर को तोड़ दिया… उन्होंने शनिवार को इस मंदिर को तोड़ा।” मंडल ने इनसाइट टीम को बताया कि उनके देवर को पीटा गया और ‘अल्लाह’ और ‘बिस्मिल्लाह’ बोलने के लिए मजबूर किया गया।

झारना मंडल ने बताया, “6 लोगों ने मेरे देवर को पकड़ा और उस जगह पर बुरी तरह पीटा। उन्होंने उसे ‘अल्लाह’ और ‘बिस्मिल्लाह’ बोलने के लिए मजबूर किया। उन सबने मेरे देवर से कहा कि सब गाँव से भाग जाओ।”

मंडल ने कहा कि न तो पुलिस और न ही गाँव के प्रधान उनकी मदद के लिए आए। उन्होंने कहा, “कोई पुलिस नहीं थी। 5 जवान थे, जो डरकर भाग गए… उन्होंने (मुस्लिमों ने) पुलिस को कहा कि भाग जाओ वरना मार देंगे। किसी ने हमारी मदद नहीं की, न तो प्रधान ने, न ही पुलिस ने। मैं उनके पैरों पर गिर गई, उनसे हमारी रक्षा करने की भीख माँगी, लेकिन वे नहीं आए। हमारे पूरे गाँव ने उनके पैर पकड़े और विनती की।”

मंडल ने आगे बताया कि बॉर्डर सिक्योरिटी फोर्स (बीएसएफ) ने उनकी जान बचाई, वरना गाँव वाले मर गए होते। उन्होंने कहा, “बीएसएफ ने हमें बचाया। अगर बीएसएफ नहीं आता, तो हम जिंदा नहीं होते। हम मर गए होते। हमें बीएसएफ कैंप चाहिए। हमें सुरक्षा चाहिए। हमें ममता की पुलिस नहीं चाहिए।”

पीड़ित समर दास ने बताया कैसे मस्जिदों ने मुस्लिम भीड़ को उकसाया, टीएमसी का सदस्य होने के बावजूद हिंदुओं को सताया गया

जफराबाद के एक हिंदू व्यक्ति समर दास ने भी इनसाइट टीम को बताया कि कैसे मुस्लिम भीड़ ने उनके घर को घेर लिया।

समर दास ने बताया, “भीड़ ने मेरे घर में घुसकर पत्थर और ईंटें फेंकी। मेरे सिर पर चोट लगने से मैं गिर गया। फिर उन्होंने मेरे घर में घुसकर अलमारी तोड़ दी और 2 भरी सोना और 20,000 रुपये नकद ले गए। मैंने अपनी आँख की सर्जरी के लिए बंधन बैंक से पैसे निकाले थे। उन्होंने मेरी पत्नी की गर्दन पर चाकू रखकर कीमती सामान और झुमके माँगे।”

दास ने कहा, “उन्होंने धमकी दी है कि मेरा घर जला देंगे। उन्होंने मेरे घर पर बम फेंके। मेरे दो भाई घायल हो गए। मेरी बेटी भी बम हमले में चोटिल हुई। अभी के लिए बीएसएफ की मौजूदगी की वजह से हम सुरक्षित हैं।” उन्होंने बताया कि बार-बार फोन करने के बावजूद पुलिस 4 घंटे तक नहीं आई। स्थानीय तृणमूल कॉन्ग्रेस का विधायक कहीं नहीं दिखा।

हिंदू व्यक्ति ने बताया कि पार्टी से जुड़ाव मायने नहीं रखता। उन्होंने कहा, “आप इन जले हुए घरों को देख सकते हैं। अगर टीएमसी नेताओं ने समय पर कार्रवाई की होती तो यह इस तरह नहीं जलता। मैं भी तृणमूल कॉन्ग्रेस से हूँ, फिर भी मेरा घर निशाना बना।”

उन्होंने कहा, “सिर्फ इसलिए कि हम हिंदू हैं। पास के मुस्लिम घरों को कुछ नहीं हुआ। वे सुरक्षित हैं। उन्होंने सिर्फ इन हमलों को अंजाम दिया। यह सब उन्होंने पहले से प्लानिंग बनाकर किया।”

समर दास ने एक चौंकाने वाला खुलासा किया कि कैसे जफराबाद में हिंदू समुदाय पर हमला करने के लिए मुस्लिमों को एक मस्जिद से निर्देश दिए गए। उन्होंने बताया, “शनिवार रात को सारीतला मस्जिद के माइक से घोषणा की गई थी। कि (मुस्लिमों को) फज्र की नमाज के बाद हथियारों के साथ मैदान में उतरना है।”

हिंदू व्यक्ति ने बताया कि मुस्लिम बहुल इलाके में जिंदगी कितनी मुश्किल हो गई है। उसने कहा, “हम पश्चिम बंगाल में अपनी मातृभूमि पर हमले झेल रहे हैं, जैसे बांग्लादेश में हिंदुओं पर हमले हो रहे हैं। हमें पूजा करने से रोका जा रहा है। हमारे मंदिरों को आग लगाई जा रही है। देवी-देवताओं की मूर्तियों को तोड़ा और जलाया जा रहा है। हमारा गुनाह क्या है? यह सनातन धर्म पर हमला है।”

समर दास ने ममता बनर्जी, उनके पार्टी नेताओं फिरहाद हकीम और कुणाल घोष पर जफराबाद के हिंदू समुदाय की दुर्दशा को लेकर उदासीन होने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा, “मुस्लिम यहाँ राज करना चाहते हैं। वे जफराबाद से हिंदुओं को उखाड़ फेंकना चाहते हैं। यह उनका पक्का इरादा है। फिर भी हमारी राज्य की मुख्यमंत्री के कानों में कुछ नहीं जा रहा। यहाँ हिंदुओं पर हमले हो रहे हैं। अगर गुजरात में किसी मुस्लिम का कुत्ता मर जाए, तो हमारी ममता सरकार इसे बंगाल में मुद्दा बना देती है।”

दास ने कहा, “10-11 दिन हो गए (हमले को)। बच्चों को ठीक से खाना नहीं मिला। वे सो नहीं पा रहे। वे डर में हैं कि उनके साथ कुछ हो जाएगा। स्कूल जाने वाले बच्चों की पढ़ाई रुक गई है।”

उन्होंने पश्चिम बंगाल सरकार से हिंदुओं के पुनर्वास और बसाने की माँग की, जो उग्र मुस्लिम भीड़ की हिंसा का शिकार हुए। समर दास ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से भी मदद माँगी।

जब 94 साल पहले हुई थी जाति जनगणना और सबसे अधिक निकले थे ब्राह्मण! 4000+ जातियों से लेकर मंडल-कमंडल तक, समझिए जातीय राजनीति का गणित

मोदी सरकार की केन्द्रीय कैबिनेट की राजनीतिक मामलों की समिति ने हाल ही में जातिगत जनगणना को मंजूरी दी। देश भर में जातिवार आँकड़े नई जनगणना के साथ ही जुटाए जाएँगे। विपक्ष ने इसे जहाँ अपने दबाव का असर बताया तो वहीं मोदी सरकार ने स्पष्ट किया कि कॉन्ग्रेस और INDI गठबंधन लगातार इस मामले पर धोखा करते आए हैं। यह जातिवार आँकड़े कब सामने आएँगे, यह सभी स्पष्ट नहीं हुआ है। सरकार ने भी अगली जनगणना की समयसीमा को लेकर कोई समयसीमा तय नहीं की है।

जातिगत जनगणना बीते कुछ वर्षों से भारतीय राजनीति में चर्चित शब्द रहा है। उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी, बिहार में राजद और राष्ट्रीय स्तर पर कॉन्ग्रेस ने इसको लेकर खूब हल्ला किया है। जातिगत जनगणना का यह नया प्रयास कब होगा, यह स्पष्ट नहीं है लेकिन इसके साथ ही देश की पहली जातिगत जनगणना की चर्चा भी हो रही है। इसे 1931 में ब्रिटिश शासन के अंतर्गत करवाया गया था। 1931 में हुई इस जनगणना में कई ऐसी जानकारियाँ सामने आई थीं, जिनकी लगभग 90 वर्षों बाद भी भारतीय राजनीति में प्रासंगिकता है।

क्यों करवाई थी अंग्रेजों ने जातिगत जनगणना?

मोदी सरकार ने बताया है कि उसने यह जनगणना का फैसला इसलिए लिया है ताकि समाज आर्थिक और सामाजिक रूप से मजबूत रहे और देश की प्रगति बिना किसी अवरोध के जारी रहे।वर्तमान परिप्रेक्ष्य में भले ही यह जातिगत जनगणना इसलिए करवाई जा रही हो ताकि देश में समाजिक रूप से पिछड़े लोगों के विषय में जाना जा सके, लेकिन अंग्रेजों के यह जातिगत जनगणना करवाने के पीछे कुछ और कारण थे।

अंग्रेज भारत पर शासन बनाए रखने के लिए अलग-अलग तरीके अपनाते थे। जातिगत जनगणना भी इसी का एक हिस्सा था। जातिगत जनगणना से अंग्रेजों को जानना चाहते थे कि किस इलाके में कौन सा जातीय समूह मजबूत है और उनके लिए समस्या बन सकता है। इसके अलावा वह उस समय देश में चल रहे जातीय आंदोलनों को भी कमजोर करना चाहते थे, क्योंकि यह आंदोलन कभी-कभार जातीय आधार से उठकर अंग्रेजों से आजादी के विरोध का प्रतीक बन जाते थे।

जातिगत जनगणना के समय भारत के जनगणना आयुक्त रहे JH हट्टन ने 1931 की रिपोर्ट में भी इन प्रदर्शनों और आंदोलनों के विषय में लिखा है। अंग्रजों के जातिगत जनगणना करवाने का एक और कारण यह था कि तब ब्रिटिश आर्मी में भर्ती बड़े स्तर पर जाति आधारित होती थी। ब्रिटिश आर्मी में जाट रेजिमेंट, महार रेजिमेंट, राजपूत रेजिमेंट समेत कई जाति आधारित रेजिमेंट थीं। कई जातियों को अंग्रेज ‘मार्शल रेस’ (लड़ाका कौमें) कहते थे।

ऐसे में देशव्यापी आँकड़े जान कर अंग्रेज अपनी सेना भी उसी हिसाब से मजबूत करना चाहते थे। जाति आधारित जनगणना से उन्हें स्पष्ट होता कि किन जातियों को बड़ी संख्या में भर्ती किया जा सकता है। इन सबके अलावा आँकड़ों का एक फायदा अंग्रेजों को अपना प्रशासनिक ढाँचा मजबूत करने में था। कई ऐसी जातियाँ थीं, जो ब्रिटिश शासन के दौरान बड़ी संख्या में सरकारी सेवा में थीं। इन सबके विषय में भी अंग्रेजों ने जानकारी जुटाई गई थी।

क्या निकले थे परिणाम?

अंग्रेजों द्वारा करवाई यह जातिगत जनगणना काफी मुश्किलों भरी थी। रिपोर्ट में हट्टन में बताया है कि कहीं लोग जाति गलत बताते हैं तो कहीं वह 10 वर्ष के भीतर अपनी जाति बदल लेते हैं। इसके अलावा रिपोर्ट में बताया गया है कि कई लोग अपने घर की गिनती भी नहीं करवाना चाहते थे।

इस जनगणना से सामने आया कि तब भारत (आज के स्वरुप जैसा) की आबादी लगभग 27 करोड़ थी। इसके भीतर अलग-अलग जातियों की संख्या बताई गई थी। रिपोर्ट से सामने आया था कि तब देश में एक जाति के तौर पर सबसे बड़ी संख्या ब्राह्मणों की है।

रिपोर्ट में बताया गया था कि 1931 के अनुसार, देश में 1.5 करोड़ से अधिक ब्राह्मण आबादी थी। रिपोर्ट बताती है कि तब बंगाल में 14 लाख से अधिक ब्राह्मण जबकि ओडिशा और बिहार में लगभग 9 लाख ब्राह्मण थे। इसके अलावा बॉम्बे राज्य में 11 लाख से अधिक ब्राह्मण थे। मद्रास में भी ब्राह्मण 14 लाख 73 हजार ब्राह्मण थे।

जाटवों को इस जातिगत जनगणना में दूसरा सबसे बड़ा समूह बताया गया था। उनकी संख्या 1.2 करोड़ जबकि राजपूतों को तीसरा सबसे बड़ा समूह बताते हुए उनकी जनसंख्या 81 लाख बताई गई थी। इसके अलावा अहीर, तेली, ग्वाला , कायस्थ और कुम्हार जैसी जातियों की संख्या भी बड़ी संख्या में थी इनकी आबादी 30 लाख से अधिक बताई थी।

इस जनगणना में सामने आया था कि देश में 4000+ जातियाँ हैं। हालाँकि, यह जातियाँ बाद में बढ़ती चली गईं। इसी रिपोर्ट में और भी कठिनाइयाँ सामने आई थीं। जाति को लेकर तब भी समाज में कई समस्याएँ थी, जो इस रिपोर्ट के लिए आँकड़े जुटाने वालों ने इकट्ठा की थी।

आजादी के बाद भी राजनीति को करती रही प्रभावित

1931 में हुई यह जातिगत जनगणना आने वाले दशकों तक भारतीय राजनीति को प्रभावित करती रही। इसमें बताया गया था कि देश में अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) की आबादी 52% है। इसी के आधार पर आगे ‘पिछड़े पावें 100 में 60’ जैसी राजनीति चालू हुई। यही राजनीति आगे चल कर मंडल-कमंडल की राजनीति में भी बदली।

इसी के आधार पर मंडल आयोग का गठन किया गया था। मंडल आयोग के आधार पर ही विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार ने आरक्षण में उन जातियों को शामिल करने का फैसला लिया, जो पहले इनमें नहीं आती थी। इससे पहले केवल अनुसूचित जातियों और जनजातियों को आरक्षण मिला करता था।

VP सिंह की सरकार ने इसमें OBC को आरक्षण दिया। मंडल आयोग का देश में कड़ा विरोध भी हुआ था। 1990 के बाद से जाति आधारित राजनीति में भी तेजी आई। इसके पीछे भी बड़ा कारण यही मंडल आयोग था और मंडल आयोग का आधार अंग्रेजों की बनाई यह रिपोर्ट थी।

इस घटना के 30 वर्ष बीतने के बाद एक बार फिर से जाति की राजनीति ने जोर पकड़ लिया है। विपक्षी पार्टियों के ने जाति जनगणना को लेकर सरकार को घेरा, लेकिन मोदी सरकार के इस फैसले के बाद अब उनके हाथ से एक बड़ा मुद्दा भी निकल गया है।

नई जनगणना कब होगी, अभी यह स्पष्ट नहीं है लेकिन यह जरूर साफ़ है कि यह जाति की राजनीति तभी तक है जब तक इसका हौव्वा खड़ा किया गया है। चाहे कर्नाटक हो या बिहार, जाति आधारित सर्वे आने के बाद उस पर कोई बात नहीं होती।

क्योंकि 1990 के बाद से कुछ ही जातियों को आरक्षण का अधिक लाभ मिला है, अगर दोबारा से इसे वर्गीकृत किया गया तो उन्हें ही सबसे अधिक नुकसान होगा। ऐसे में INDI गठबंधन के दल इसे केवल मुद्दा बनाते हैं, आगे के एक्शन प्लान को लेकर कुछ नहीं बनाते।

राम मंदिर और हिन्दू राष्ट्र से घृणा, EWS का विरोधी, राहुल गाँधी का सलाहकार… जिसे वक्फ कानून का विरोधी ‘हिन्दू संगठन’ बता रहा मीडिया, चौंका देगा उसके मुखिया का काला सच

जैसा कि हम सबको पता है, हाल ही में केंद्र सरकार वक़्फ़ संशोधन क़ानून लेकर आई। न केवल इस विधेयक पर संसद के दोनों सदनों में आधी-आधी रात तक चर्चाएँ हुईं, बल्कि इससे पहले इसे ‘संयुक्त संसदीय समिति’ (JPC) के पास भी भेजा गया था जिसने दर्जनों हितधारकों से बातचीत की व ग्राउंड जीरो पर जाकर भी स्थिति का अध्ययन किया। इसके बावजूद विपक्षी दलों से लेकर तमाम इस्लामी-लिबरल संगठन इस क़ानून के विरोध में आ गए। सुप्रीम कोर्ट तक में मामला दायर कर दिया गया।

अब एक और संगठन है, जो वक्फ संशोधन क़ानून के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुँचा है। “हिन्दू संगठन वक़्फ़ संशोधन क़ानून के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट पहुँचा, कहा – इससे मुस्लिमों के अस्तित्व को ख़तरा” – इस शीर्षक को पढ़कर आपको क्या लगता है? ऐसा प्रतीत होगा जैसे हिन्दुओं और हिन्दू हित के लिए कार्य करने वाली कोई संस्था केंद्र सरकार से ख़ुश नहीं है, अब हिन्दू संगठन भी वक़्फ़ बोर्ड के समर्थन में उतर आए हैं। वो वक़्फ़ बोर्ड, जो लगातार हिन्दुओं की जमीनें निगलता ही चला जा रहा है।

नए वक़्फ़ क़ानून से कैसे चिढ़ सकता है कोई हिन्दू संगठन?

अब ये बताने की आवश्यकता नहीं है कि कैसे तिरुचिरापल्ली में कावेरी नदी के किनारे स्थित तिरुचेंथुरई गाँव में पूरे के पूरे गाँव पर वक़्फ़ बोर्ड ने अपना दावा ठोक दिया। पटना के फतुहा में पीढ़ियों से रह रहे हिन्दुओं के घरों पर वक़्फ़ बोर्ड ने नोटिस चिपका दिया। केरल के मुनंबम में 600 ईसाई परिवारों की 404 एकड़ जमीन वक़्फ़ बोर्ड ने कब्ज़ा ली, जिनमें से अधिकतर मछुआरे हैं। किसी भी गली-मोहल्ले में मजार-दरगाह-मस्जिद-मदरसे बनाकर उसे वक़्फ़ की संपत्ति बता देना और फिर आस-पड़ोस की जमीनें हड़पने एक प्रकार का उद्योग बन गया था।

डेमोग्राफी बदलने के लिए ऐसा किया जा रहा था। इसीलिए, केंद्र सरकार ने वक़्फ़ बोर्ड में सुधार करते हुए ये प्रावधान किया कि वक़्फ़ की संपत्ति के मामले में स्थानीय कमिश्नर फ़ैसले ले सकेंगे। साथ ही सेन्ट्रल व राज्यों के वक़्फ़ बोर्ड्स में ग़ैर-मुस्लिमों को सदस्य बनाए जाने का प्रावधान लाया गया क्योंकि ये मजहब नहीं बल्कि संपत्ति का मामला है। बिना पंजीकरण वक़्फ़ की संपत्ति नहीं मानी जाएगी। वक़्फ़ भारत में रक्षा मंत्रालय व रेलवे के बाद सबसे बड़ा संपत्ति मालिक बन गया था, ऐसे में लिबरल गिरोह को उसमें सुधार पसंद नहीं आया।

फ़िलहाल नए क़ानून के कुछ प्रावधानों पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के कारण रोक लग रखी है। अब आते हैं ताज़ा ख़बर पर। ‘श्री नारायण मानव धर्म ट्रस्ट’ ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर कहा है कि श्री नारायण गुरु की शिक्षा के हिसाब से सभी व्यक्ति व समाज के हित एक-दूसरे पर निर्भर हैं, ऐसे में संस्था इस प्रकरण पर मुँह बंद करके सिर्फ़ तमाशा नहीं देख सकती। उसने इस क़ानून को सच्चाई के विरुद्ध बताते हुए कहा कि मुस्लिम समाज व सामाजिक न्याय पर इसका भयानक असर पड़ेगा।

‘श्री नारायण मानव धर्म ट्रस्ट’ और G मोहन गोपाल की याचिका में क्या

असल में इस ‘श्री नारायण मानव धर्म ट्रस्ट’ का न तो नारायण से कुछ लेना-देना है, न ही ‘श्री’ से और न ही धर्म से। श्री नारायण गुरु के नाम पर ये अपना धंधा चला रहे हैं। श्री नारायण गुरु तो स्वामी श्रद्धानन्द से भी मिले थे, जिनकी अब्दुल रशीद ने गोली मारकर हत्या कर दी थी। स्वामी श्रद्धानंद पूरे देश में घर-वापसी का अभियान चला रहे थे और उनके नेतृत्व में आर्य समाज ने केरल में मोपला मुस्लिमों द्वारा हिन्दुओं के नरसंहार के बाद पुनर्जागरण का अभियान चलाया, इसी क्रम में वो श्री नारायण गुरु से मिले थे।

अब आते हैं इस संस्था पर। इसका मुखिया है G मोहन गोपाल, जो कि अधिवक्ता है। G मोहन गोपाल ने 2023 में इसकी स्थापना की थी। जब लिबरल विचारधारा वाला कोई व्यक्ति अचानक से हिन्दुओं के नाम पर कोई संस्था लेकर आ जाए, तो शक होना लाजिमी है। फिर उसे ऐसे प्रचारित किया जाए कि मोदी सरकार के वक़्फ़ क़ानून के ख़िलाफ़ कोई हिन्दू संगठन खड़ा हो गया है, तब तो ये शक यकीन में बदल जाता है। आइए, अब आपको बताएँगे कि ये G मोहन गोपाल है कौन, लेकिन उससे पहले जानिए सुप्रीम कोर्ट में इसने क्या तर्क दिए हैं।

याचिका में कहा गया है, “ये विवादित क़ानून मजहबी स्थल को ग़ैर-मजहबी घोषित करते हुए इस्लामी क़ानून के ऊपर अपने नियम थोपता है। यह क़ानून संसद के अधिकार क्षेत्र से बाहर है और संविधान का उल्लंघन है। ये मुस्लिमों को मिले अधिकारों का उल्लंघन करता है। वक़्फ़ वर्षों से उनके आर्थिक आधार का प्रमुख स्रोत रहा है। नए क़ानून से ये ख़त्म हो जाएगा।” सोचिए, यहाँ इस्लामी क़ानून अर्थात शरिया को बचाने के लिए ‘हिन्दू संगठन’ की आड़ में वक़्फ़ को सही ठहराया जा रहा है।

इन दावों की पोल खोलना बड़ी बात नहीं है क्योंकि अब सारी चीजें जगजाहिर हैं। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह बता चुके हैं कि कैसे पट्टे पर दी गई वक्फ बोर्ड की 20,000 संपत्तियाँ अचानक से शून्य हो गईं। ये किसने बेचीं, पैसे कहाँ गए? फिर ग़रीब मुस्लिमों को इसमें से क्या मिला? जब कमाई हो ही नहीं रही थी, फिर ‘आर्थिक आधार’ ख़त्म होने का थोथा कुतर्क क्यों? दूसरा, आप एक साथ संविधान की वकालत और शरिया क़ानून का बचाव नहीं कर सकते हैं।

कौन है G मोहन गोपाल: ‘हिन्दू राष्ट्र’ का विरोधी, राम मंदिर से घृणा

अब आते हैं G मोहन गोपाल पर, कथित हिन्दू संगठन का मुखिया। ये व्यक्ति ‘हिन्दू राष्ट्र’ का मजाक उड़ाता रहा है और कहता रहा है कि ये न्यायपालिका को भी अपने कब्जे में ले रहा है। उप-राष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने जब दिल्ली हाईकोर्ट के जज के घर भारी मात्रा में कैश मिलने को लेकर बयान दिया तब G मोहन गोपाल ने इसे ‘राजा कुछ भी कर सकता है’ वाली पुरानी मानसिकता को बढ़ावा देना करार दिया। यहाँ तक कि उसने ‘हिन्दू राष्ट्र’ को RSS का एक शताब्दी पुराना प्रोजेक्ट बताया, जिसमें अधिनायकवाद और वर्णक्रम के आधार पर व्यवस्था होगीएक सदी पुराना यह प्रोजेक्ट, जिसकी अगुवाई राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ कर रहा है, भारत में एक धर्म आधारित, अधिनायकवादी और वर्णक्रम पर आधारित हिंदू राष्ट्र स्थापित करने की कोशिश है।

The Leaflet’ पर छपे एक लेख में उसने लिखा कि भाजपा शासित राज्यों को हिन्दू राष्ट्र वालों ने विधायिका और कार्यपालिका पर कब्ज़ा कर रखा है। सोचिए, ‘हिन्दू संगठन’ का संस्थापक जो ‘हिन्दू राष्ट्र’ और RSS का विरोध करता है। वक़्फ़ का समर्थन करता है। उसने लिखा था कि न्यायपालिका का नियंत्रण ‘हिन्दू राष्ट्र’ ताक़तों का अगला क़दम होगा। उसने लिखा कि ‘हिन्दू राष्ट्र’ वाले ऐसी व्यवस्था चाहते हैं जहाँ ब्राह्मण सबकुछ शास्त्रों और सनातन धर्म के हिसाब से फ़ैसले लें।

क्या इसी भाषा का इस्तेमाल हिन्दू विरोधी गिरोह नहीं करता है? अब आगे बढ़ते हैं। आप ये जानकर चौंक जाएँगे कि ये एक ऐसा ‘हिन्दू संगठन’ है जो राम मंदिर से भी घृणा करता है। जब ‘श्री नारायण धर्म परिपालन योगम’ के जनरल सेक्रेटरी वेल्लापल्ली नतेशन ने जब राम मंदिर में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा वाले दिन (22 जनवरी, 2024) के दिन सभी हिन्दुओं को अपने घर में दीये जलाने की अपील की थी, तब भी G मोहन गोपाल की संस्था ने इसका विरोध किया था।

श्री नारायण गुरु के नाम पर चलाता है अपना प्रपंच

उसका कहना था कि ये नारायण गुरु की विचारधारा के विरुद्ध है। इस दौरान ये लोग ये भूल जाते हैं कि श्री नारायण गुरु ने अपने ग्रन्थ ‘अनुकम्पा दशकम’ में जगद्गुरु शंकराचार्य की प्रशंसा की है। उनके दर्शन की जड़ें अद्वैत वेदांत में ही थीं। शंकराचार्य ने माँ दुर्गा की स्तुति के रूप में ‘महिषासुर मर्दिनी स्त्रोत्र’ की रचना की, वो केरल में ही जन्मे थे, ऐसे में केरल में उनके या उनकी विचारधारा से प्रेरित संतों का नाम लेकर हिन्दू विरोधी प्रपंच चलाया जाता है और मीडिया बिना फैक्ट-चेक किए इसे धड़ल्ले से छापता भी है।

नारायण गुरु ने आदि शंकराचार्य को अपना गुरु बताया है। नारायण गुरु ज्ञान भक्ति मार्ग की बात करते हुए भी जगद्गुरु शंकराचार्य द्वारा दिखाए गए रास्ते पर चलने की सलाह देते हैं। अतः, ये साफ़ है कि G मोहन गोपाल की संस्था न तो केरल का प्रतिनिधित्व करती है, न हिन्दुओं का, न श्री नारायण गुरु का और न जगद्गुरु शंकराचार्य का। ये वो संस्था है जिसने राम मंदिर ध्वस्त कर बनाए गए बाबरी ढाँचे में कारसेवा का विरोध करते हुए कहा था कि मुस्लिमों को मस्जिद से वंचित कर दिया गया।

उसने मंदिर के बजट को लेकर भी सवाल उठाया था कि, जबकि सच्चाई ये है कि राम मंदिर बनवाने के लिए केंद्र सरकार ने मात्र एक रुपए का चन्दा दिया। 5000 करोड़ रुपए से भी अधिक की रकम हिन्दुओं ने चंदे के जरिए जुटाई। केरल में हिन्दू समुदाय का एक बड़ा हिस्सा ‘ईळवा’ समुदाय का है, राज्य की जनसंख्या का एक चौथाई। इन्हें प्रभावित करने के लिए इसी समुदाय से आने वाला G मोहन गोपाल असल में कॉन्ग्रेस के लिए बल्लेबाजी कर रहा है।

ग़रीबों को आरक्षण का विरोधी, चुनी हुई सरकार से भी दिक्कत

G मोहन गोपाल EWS आरक्षण का भी विरोधी है। उसने कहा था कि जिन दलों ने इस आरक्षण का समर्थन किया, ख़ुद उन्हीं दलों में SC/ST का कोई प्रतिनिधित्व नहीं है। यानी, अब कौन से दल में कौन अध्यक्ष बनेगा और कौन महासचिव, ये भी G मोहन गोपाल की मर्जी से तय होगा। वो बार-बार भारत में Oligarchy (अल्पमत का प्रतिनिधित्व) होने की बात करता है। वो आरक्षण को भी ख़तरनाक विचारधारा बताता रहा है और इसके लिए डॉ आंबेडकर को उद्धृत करता रहा है।

वैसे जो व्यक्ति प्रशांत भूषण जैसों के साथ मंच साझा करता हो और बाबरी ढाँचा ध्वस्त किए जाने को मुस्लिमों साथ हुआ अन्याय बताता हो, उसकी विश्वसनीयता क्या हो सकती है समझ जाइए। प्रशांत भूषण जबतक पीएम मोदी और भाजपा को गाली न दे दे, तबतक उसके पेट में नाश्ता नहीं पचता है। प्रोपेगंडा पोर्टल ‘The Wire’ के कार्यक्रम में G मोहन गोपाल ने यहाँ तक कह दिया था कि न्यायपालिका को उखाड़ फेंकने की साजिश रची जा रही है और सुप्रीम कोर्ट में सरकार द्वारा अपने लोग भरे जा रहे हैं।

वो कॉलेजियम को भी सलाह देता है कि किस तरह से जज चुने जाने चाहिए और किस तरह के नहीं, यानी उसे जुडिशरी पर भी भरोसा नहीं है। उसे लोकतांत्रिक चुनावी प्रक्रिया पर भी भरोसा नहीं है, तभी उसे भारत की चुनी हुई सरकार ‘अल्पमत प्रतिनिधत्व वाली’ नज़र आती है। वो हिजाब का भी समर्थन करता है। सोचिए, जी व्यक्ति को देश के किसी तंत्र पर भरोसा नहीं है, वक़्फ़ क़ानून से लेकर EWS तक से चिढ़ है – उस व्यक्ति का क्या इलाज है? वो तो कुंठित ही कहलाएगा न।

इसी तरह, ‘साउथ फर्स्ट’ के कार्यक्रम में भी उसने संविधान के ख़तरे में होने का रोना रोते हुए EWS आरक्षण का विरोध किया था। उसका कहना था कि कोई भी पिछड़ा समाज आरक्षण में रुचि नहीं रखता है बल्कि उसे प्रतिनिधित्व चाहिए। उसने कहा था कि कुछ ही समूह मिलकर सरकार चला रहे हैं। G मोहन गोपाल का मानना है कि ‘सवर्णों’ के अलावा बाकी सब जाति से बाहर हैं, इसीलिए जाति जनगणना की जगह सामाजिक जनगणना शब्द का इस्तेमाल किया जाना चाहिए।

NSUI का पूर्व अध्यक्ष, राहुल गाँधी का क़रीबी सलाहकार

अबतक आपने जान लिया होगा कि कॉन्ग्रेस का ही एजेंडा G मोहन गोपाल आगे लेकर चलता है। आपने बिलकुल ठीक समझा है, लेकिन इसे और पुख्ता कर देते हैं। G मोहन गोपाल कॉन्ग्रेस पार्टी के छात्र संगठन NSUI का अध्यक्ष रहा है। NSUI ने उसकी एक तस्वीर भी साझा की थी, जिसमें वो संगठन के मंच पर दिखाई दे रहा है। उसके पीछे लगे पोस्टर पर लिखा है – “इंदिरा देश की नेता है, देश का मस्तक ऊँचा है।” NSUI के गठन के बाद G मोहन गोपाल संगठन का दूसरा अध्यक्ष ही बना था।

हो सकता है कई लोगों को लगे कि ये सब तो पिछली बातें हैं, उनकी शंका का समाधान भी किए देते हैं। वो कॉन्ग्रेस पार्टी के वर्तमान सर्वेसर्वा राहुल गाँधी का भी करीबी है। वो ‘राजीव गाँधी इंस्टिट्यूट ऑफ कंटेम्पररी स्टडीज’ का डायरेक्टर था, साथ ही ‘इंडिया टुडे’ ने मार्च 2014 में उसे राहुल गाँधी का करीबी सलाहकार बताया था। केरल प्रदेश कॉन्ग्रेस कमिटी ने 2014 के लोकसभा चुनाव के लिए उम्मीदवार के रूप में उसके नाम का भी प्रस्ताव रखा था

वो एक अमीर परिवार से आता है, उसके पिता पुलिस में IGP रहे हैं। वो सनातन शास्त्रों का भी विरोधी है। राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा के बाद उसने BBC से कहा था कि भारत में धर्मनिरपेक्षता को लेकर संविधान सभा से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक कन्फ्यूज्ड है। उसका कहना है कि सभी धर्मों से समान दूरी बनाने का विचार भी ब्राह्मणवादी ग्रंथों से लिया गया है। 1994 में सुप्रीम कोर्ट ने वैदिक सिद्धांत ‘सर्व धर्म समभाव’ को लेकर Secularism को परिभाषित किया था। इसे G मोहन गोपाल ने अजीब बताया था, यानी वो वेदों का भी विरोधी है।

जहाँ से फोटो कॉपी कराती थी स्कूल-कॉलेज की लड़कियाँ, वहाँ से नंबर निकालता था इसराइल मोहम्मद: शिवा शर्मा बन फँसाता था, फोन में मिले कई वीडियो

मध्य प्रदेश के भोपाल, इंदौर के बाद अब दमोह में लव जिहाद का मामला सामने आया है। इसराइल मोहम्मद ने शिवा शर्मा बनकर सोशल मीडिया पर हिंदू युवतियों को अपने जाल में फँसाया। लड़कियों की आपत्तिजनक तस्वीरें भी उसके मोबाइल फोन में मिले हैं। इसका खुलासा तब हुआ जब साइबर कैफे में आधार कार्ड की फोटो कॉपी कराने पहुँचा।

पुलिस ने जालसाजी का मामला दर्ज कर लिया है। लव जेहाद के राज्य में बढ़ रहे मामलों को देखते हुए स्टेट एसआईटी का गठन किया गया है। ATS की पूछताछ में लव जिहाद के सबूत मिले।

आरोपित की पहचान पन्ना जिले के गुन्नौर गाँव निवासी इसराइल मोहम्मद खान के रूप में हुई है। सोशल मीडिया पर खुद को शिवा शर्मा बताकर हिंदू युवतियों से दोस्ती करता था। गुरुवार (01 मई 2025) को एक हिन्दू युवती को शादी का झाँसा देकर दमोह लाया। यहाँ एवरेस्ट लॉज में रुका, इससे पहले आधार कार्ड की फोटोकॉपी कराने साइबर कैफे पहुँचा।

यहाँ जब आरोपित ने फोटोकॉपी कराने के लिए ऑनलाइन ₹15 रुपए की पेमेंट की तो उसका असली नाम उजागर हुआ। इससे साइबर कैफे संचालक को शक हुआ क्योंकि आधार कार्ड में उसका नाम शिवा शर्मा था। संचालक ने तुरंत हिंदू संगठन के कार्यकर्ताओं को सूचना दी। कार्यकर्ता उसे घसीटकर पुलिस थाने लेकर पहुँचे। थाने में इसराइल के खिलाफ फर्जी दस्तावेजों का इस्तेमाल करने पर धारा 319 के तहत केस दर्ज किया गया।

बाद में पुलिस को आरोपित के मोबाइल फोन में कई युवतियों संग आपत्तिजनक फोटो मिले। पहले मामला केवल जालसाजी का था, लेकिन मामला गंभीर होने के चलते आतंकवाद निरोधक दस्ता (ATS) को सूचना दी गई। अब ATS की जाँच में लव जिहाद के सबूत मिले हैं। जाँच एजेंसी अब इसी एंगल से मामले की पड़ताल कर रही है। हालाँकि अब तक उसके खिलाफ लव जिहाद के मामले में किसी पीड़िता ने शिकायत नहीं की है।

इसराइल के मोबाइल में हिंदू युवतियों से चैटिंग

सोमवार (05 मई 2025) को भोपाल ATS ने आरोपित इसराइल मोहम्मद से पूछताछ की, जिसमें कई अहम खुलासे हुए। आरोपित हिंदू नाम से सोशल मीडिया पर हिंदू युवतियों को फँसाता था। आरोपित के जब्त किए गए मोबाइल फोन में तीन युवतियों से अवैध संबंध और करीब 12 युवतियों से चैटिंग की जानकारी मिली। आरोपित पन्ना जिले के गुन्नौर की एक मस्जिद में भी जाता था। वहाँ किन लोगों से मिलता था इसकी भी जानकारी जुटाई जा रही है।

फोटोकॉपी की दुकान से हिंदू लड़कियों की लिस्ट तैयार की

जाँच में यह भी सामने आया कि इसराइल दमोह जिले की एक मुसलमान व्यक्ति की दुकान से हिंदू युवतियों के नाम और नंबर की लिस्ट बनाता था। इस दुकान में युवतियाँ अपने स्कूल और कॉलेज के लिए निजी दस्तावेजों की फोटो कॉपी कराने के लिए आती थी। इसीलिए वह आसानी से उनके बारे में जानकारी निकाल लेता था। इसके बाद सोशल मीडिया पर शिवा शर्मा नाम से उनसे दोस्ती करता था। फिर उन्हें प्रेम जाल में फँसाकर आपत्तिजनक फोटो और वीडियो बना लेता था।

CSP अभिषेक तिवारी ने बताया कि इसराइल के खिलाफ अब तक किसी पीड़िता ने शिकायत दर्ज नहीं करवाई है। अगर इस मामले में किसी भी पीड़िता की शिकायत आती है तो आगे की कार्रवाई की जाएगी।

जब तक इस्लाम है दुनिया में आतंकवाद रहेगा, गैरमुस्लिम और महिलाएँ रहेंगी असुरक्षित: तस्लीमा नसरीन, लेखिका को कट्टरपंथियों के कारण छोड़ना पड़ा था बांग्लादेश

बांग्लादेश से निर्वासित और भारत में शरण लेने वाली लेखिका तस्लीमा नसरीन ने इस्लाम और आतंकवाद का कनेक्शन जोड़ा है। उनका कहना है कि “जब तक इस्लाम रहेगा, आतंकवाद भी जिंदा रहेगा। गैर-मुसलमानों को कोई सुरक्षा नहीं मिलेगी, स्वतंत्र विचारकों और तर्कवादियों को कोई सुरक्षा नहीं मिलेगी, महिलाओं को कोई सुरक्षा नहीं मिलेगी।”

उन्होने आगे कहा कि “जब तक इस्लाम जीवित रहेगा, फूल मुरझाते रहेंगे, बच्चे मरते रहेंगे, लाखों मरे हुए कबूतर की तरह गिरते रहेंगे। इस्लाम की कोख से नफरत पैदा होती रहेगी, बदसूरत राक्षस पैदा होते रहेंगे।”

दिल्ली साहित्य महोत्सव में अपने विचार रखते हुए तस्लीमा नसरीन ने कहा कि इस्लाम पिछले 1400 सालों में थोड़ा भी नहीं बदला इसलिए बच्चों को सिर्फ धार्मिक किताबें पढ़ाना बेहद खतरनाक है। तस्लीमा नसरीन ने भारत को अपना घर बताते हुए कहा कि जब वो यूरोप या अमेरिका में रही तो हमेशा पराई रही, लेकिन जब कोलकाता आई तो लगा कि जैसे अपने घर लौटी हैं।

इस्लामी कट्टरता, महिला अधिकार, मानवाधिकार और लोकतांत्रिक मूल्यों की बात करते हुए उन्होने कहा कि
“जब तक इस्लाम जीवित रहेगा, कोई भी राज्य सभ्य नहीं बन पाएगा, कट्टरता हावी रहेगा “

यूनिफॉर्म सिविल कोड का समर्थन करते हुए तस्लीमा नसरीन ने कहा कि भारत, बाग्लादेश जैसे देशों में सभी नागरिकों के लिए एक जैसा कानून होना चाहिए। मदरसों की शिक्षा पर सवाल उठाते हुए उन्होने कहा कि बच्चों को संपूर्ण ज्ञान यहाँ नहीं मिल सकता।

तस्लीमा नसरीन ने कहा कि 2016 के ढाका हमले में मुसलमानों को इसलिए मार दिया गया क्योंकि वे कलमा नहीं पढ़ पाए थे। 22 अप्रैल 2025 को पहलगाम में भी आतंकवादियों ने पर्यटकों को कलमा पढ़ने के लिए कहा। जब आस्था को तर्क और मानवता पर हावी होने दिया जाता है, तो यही होता है।”

पहले हिन्दू संत चिन्मय दास की बेल पर लगाई रोक, अब उन्हें मर्डर मामले में भी किया गिरफ्तार: 6 महीने से जेल में किया है बंद, बांग्लादेश में हिन्दुओं का उत्पीड़न जारी

बांग्लादेश में हिन्दुओं के उत्पीड़न में पूरा सरकारी तंत्र शामिल हो गया है। उनके निशाने पर वे लोग हैं, जो हिन्दुओं के लिए आवाज उठा रहे हैं। हिन्दुओं के अधिकारों के लिए बोलने वाले ISKCON संत चिन्मय दास को भी जेल में रखने के लिए बांग्लादेश का पूरा तंत्र लगा गया है। उन्हें एक और मुकदमे में गिरफ्तार दिखाने का आदेश बांग्लादेश के एक कोर्ट ने दिया है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, चटगाँव के एक कोर्ट में जज SM अलाउद्दीन ने यह आदेश सोमवार (5 मई, 2025) को दिया है। जज ने आदेश दिया है कि चिन्मय कृष्ण दास को एक वकील की हत्या के मामले में आरोपित का दर्जा दिया जाए और उन्हें इसमें भी गिरफ्तार दिखाया जाए।

इस वकील की मौत चिन्मय कृष्ण दास की गिरफ्तारी के बाद हुए प्रदर्शन में हुई थी। पुलिस ने चटगाँव की अदालत से कहा है कि वह 3 और केस में चिन्मय कृष्ण दास को गिरफ्तार दिखाने का आदेश दे। इन पर सुनवाई मंगलवार (5 मई, 2025) को होनी है।

वकील की हत्या के मामले में चिन्मय कृष्ण दास की रिहाई के लिए प्रदर्शन करने वाले और भी कई हिन्दू आरोपित बनाए गए हैं। चिन्मय कृष्ण दास पर यह कार्रवाई उनकी जमानत रद्द करने के बाद की है। बांग्लादेश के सुप्रीम कोर्ट ने इससे पहले 30 अप्रैल, 2025 को हाई कोर्ट के आदेश पर रोक लगा दी थी।

हाई कोर्ट ने अपने आदेश में संत चिन्मय दास को जमानत दे दी थी। लेकिन इसके एक दिन बाद ही सुप्रीम कोर्ट ने इस आदेश पर रोक लगा कर चिन्मय कृष्ण दास के जेल से बाहर आने के रास्ते बंद कर दिए थे। अब उन्हें और भी मामलों में आरोपित बना दिया गया है, अब उनके रिहा होने की उम्मीदें और भी कम हो गई हैं।

क्यों गिरफ्तार हुए थे चिन्मय कृष्ण दास?

25 अक्टूबर, 2024 को बांग्लादेश के चटगाँव में हिन्दुओं ने एक रैली आयोजित की थी। इस रैली का नेतृत्व चिन्मय कृष्ण दास कर रहे थे। यह रैली चटगाँव में ऐतिहासिक लाल दीघी मैदान में आयोजित की गई थी। इसमें हजारों हिन्दू शामिल हुए थे। चटगाँव में यह रैली हिंदुओं पर इस्लामी कट्टरपंथियों के हमलों के विरोध में आयोजित की गई थी।

इस रैली के दौरान हिन्दुओं ने भगवा झंडे लहराए और सरकार से कार्रवाई की माँग की। चटगाँव में हुई इस रैली के कारण इस्लामी कट्टरपंथी बिदक गए। उन्होंने इस रैली में एक जगह पर एक भगवा झंडा, बांग्लादेश के झंडे से ऊँचा लहराता हुआ देख लिया।

इसी के आधार पर फिरोज खान नाम के एक शख्स ने चटगाँव में ही चिन्मय कृष्ण दास समेत 19 लोगों के खिलाफ FIR दर्ज करवाई थी। फिरोज खान ने आरोप लगाया था कि बांग्लादेश का झंडा नीचे करके लहराया जा रहा था जो इसका अपमान है और यह देशद्रोह का कार्य है। फिरोज ने आरोप लगाया था कि इससे चिन्मय कृष्ण दास देश में अशांति लाना चाहते हैं।

इसके बाद चिन्मय कृष्ण दास को गिरफ्तार कर लिया गया तगा। उन्हें चटगाँव की अदालत में पेश किया गया। यहाँ मजिस्ट्रेट काजी नजरुल इस्लाम ने उन्हें देशद्रोह का आरोपित मानते हुए जमानत देने से इनकार कर दिया और जेल भेज दिया था।


सुप्रीम कोर्ट के किस जज के पास कितनी प्रॉपर्टी, कैसे हुई नियुक्ति… पहली बार सार्वजनिक: जस्टिस वर्मा के घर लगी आग में मिले थे जले हुए नोटों के बंडल

सुप्रीम कोर्ट ने न्यायाधीशों की संपत्ति का विवरण वेबसाइट पर अपलोड कर दिया है। वेबसाइट पर 33 में से केवल 21 जजों की जानकारी दी गई है। बाकी जजों ने अपनी संपत्ति का ब्यौरा सुप्रीम कोर्ट को सौंपा है। सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला दिल्ली हाईकोर्ट के जज यशवंत वर्मा के घर से कैश मिलने के विवाद के बाद लिया था।

वेबसाइट में सुप्रीम कोर्ट ने नियुक्त होने वाले जजों के नाम, अनुभव, उनकी नियुक्ति की समेत उनका किसी पहले से सेवा दे रहे जज के साथ रिश्ते आदि की जानकारी भी सार्वजनिक की है।

पारदर्शिता बढ़ाने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (5 मई 2025) को कहा है कि उसने न्यायाधीशों की संपत्ति का विवरण अपनी वेबसाइट पर अपलोड कर दिया है। यह जानकारी न्यायालय के उस फैसले को देखते हुए लिया गया है जिसमें संपत्ति का ब्यौरा सार्वजनिक डोमेन में लाने की बात कही गई है, हालाँकि वेबसाइट पर 33 में से केवल 21 जजों की जानकारी ही देखी जा सकती है।

सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि “भारत के सर्वोच्च न्यायालय की पूर्ण अदालत ने 1 अप्रैल, 2025 को निर्णय लिया है कि इस न्यायालय के न्यायाधीशों की संपत्ति का विवरण इस न्यायालय की वेबसाइट पर अपलोड करके सार्वजनिक डोमेन में रखा जाएगा। न्यायाधीशों की संपत्ति का विवरण जो पहले से उपलब्ध है, उसे अपलोड किया जा रहा है। बाकी जजों की जानकारी मिलने पर अपलोड की जाएगी।”

सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला दिल्ली हाईकोर्ट के जज यशवंत वर्मा के घर से कैश मिलने के विवाद के बाद लिया था। जस्टिस वर्मा के सरकारी बंगले में 14 मार्च को आग लगी थी। आग बुझाने के लिए आई फायर सर्विस टीम को जस्टिस वर्मा के घर से अधजले नोट मिले थे।

सुप्रीम कोर्ट ने किया नियुक्ति की प्रक्रिया को सार्वजनिक

सुप्रीम कोर्ट ने अपनी वेबसाइट पर हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में नियुक्तियों की पूरी प्रक्रिया की जानकारी दी है जिसमें राज्य सरकारों और केन्द्र सरकार से मिलनेवाला इनपुट और सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम के रोल के बारे में बताया गया है। इसका मकसद पारदर्शिता लाना और जनता को जागरूक बनाना है।

इसमें 9 नवंबर 2022 से अब तक हाईकोर्ट के जजों की नियुक्तियों को लेकर सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने जो प्रस्ताव रखा था उसे अपलोड किया गया है। कॉलेजियम ने 221 नामों की सिफारिश पिछले ढ़ाई साल में की थी। इनमें से 29 उम्मीदवारों के नामों को सरकार ने मंजूरी दी। इसमें ओबीसी 21, अत्यंत पिछड़ा वर्ग 7, एससी 7 और एसटी 5 शामिल हैं।

इसमें जानकारी दी गई है कि कोई भी उम्मीदवार किसी रिटायर्ड या मौजूदा सुप्रीम कोर्ट या हाईकोर्ट के जज का रिश्तेदार या परिवार तो नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने जिन नामों की सिफारिश की थी उनमें से 11 जजों में 6 के पिता, 3 के रिश्तेदार और 1-1 के भाई या ससुर पूर्व में या वर्तमान में जज हैं।

राज ठाकुर बन इकरार पाशा ने हिन्दू महिला को फँसाया, भेद खुलते ही मारपीट कर इस्लाम कबूलने का बनाने लगा दबाव: भाइयों से करवाया रेप, UP के मुरादाबाद की घटना

उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद में रहने वाली एक हिंदू महिला ने लव जिहाद का मामला दर्ज कराया है। पीड़ित हिंदू महिला का कहना है कि इकरार पाशा ने अपना नाम राज ठाकुर बताकर पीड़िता से शादी की। शादी के बाद पता चला कि उसका असली नाम इकरार है और वह मुस्लिम है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, पीड़ित महिला ने आरोप लगाया कि आरोपित इकरार और उसके परिवार वाले उस पर धर्म बदलने का दबाव बना रहे हैं। पीड़िता ने बताया है कि जब उसने मना किया तो उन लोगों ने उसे जबरदस्ती मांस खिलाया और उसके साथ मारपीट की।

पीड़ित महिला ने यह भी आरोप लगाया कि इकरार के भाइयों ने उसके साथ दुष्कर्म किया और उसके बच्चों को बंदूक दिखाकर डराया-धमकाया। पीड़िता ने बताया कि उसकी इकरार पाशा से मुलाकात 2022 में हुई थी। उसने बताया कि इकरार पाशा तब राज ठाकुर बनकर माथे पर तिलक लगाया करता था और हाथ में कलावा भी बाँधता था।

पीड़िता ने यह भी बताया कि हिंदू बनकर ही उसने पीड़िता से दोस्ती की और अपने प्रेमजाल में फंसाया। पीड़ित हिन्दू महिला से आरोपित इकरार पाशा ने मंदिर में शादी की थी। यह भी सामने आया है कि किसी को इकरार के मुस्लिम होने का पता ना चले, इसके लिए वह घर में पूजा-पाठ किया करता था।

पीड़िता ने आगे बताया कि शादी होने के ढाई साल तक इकरार पाशा ने अपने घर वालों से नहीं मिलाया था। लेकिन शक के आधार पर पीड़िता ने इकरार के विषय में खोजबीन की तो पता चला कि उसका पति हिंदू नहीं मुस्लिम है। यह भी पता चला कि इकरार पाशा पहले से शादीशुदा है और उसके 3 बच्चे भी है।

पीड़िता ने जब इसका विरोध किया और इकरार पाशा के पास जवाब माँगने पहुँची, तो उसने जान से मारने की धमकी दी और धर्म परिवर्तन के लिए कहा। महिला ने इस विषय में मझोला थाने में शिकायत की थी। हिन्दू संगठनों ने इस मामले में SSP मुरादाबाद से मिलकर कार्रवाई करने की माँग की है।

SSP सतपाल अंतिल ने कहा है कि महिला की शिकायत की जाँच की जाएगी और उचित कार्रवाई की जाएगी।