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राहुल गाँधी की डिलिवरी कराई, प्रियंका और उनके बच्चों की भी: कोरोना से डॉ. भंडारी की मौत, वाड्रा ने कहा- हमेशा याद रखूँगी

दिल्ली के गंगाराम अस्पताल की वरिष्ठ डॉक्टर और स्त्री रोग विशेषज्ञ एसके भंडारी का निधन हो गया है। वे कोरोना से संक्रमित थीं। उन्होंने ही कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष और केरल के वायनाड से सांसद राहुल गाँधी की डिलिवरी कराई थी।

86 वर्षीय डॉ. एसके भंडारी लंबे समय तक गाँधी परिवार की डॉक्टर रहीं। राहुल की बहन और कॉन्ग्रेस महासचिव प्रियंका गाँधी वाड्रा तथा उनके बच्चों की भी डिलिवरी उन्होंने ने ही कराई थी। प्रियंका ने उन्हें याद करते हुए कहा है कि उन्होंने ही मेरे भाई, मेरी, मेरे बेटे और मेरी बेटी की डिलिवरी कराई थी।

उन्होंने ट्वीट कर कहा, “डॉ. एसके भंडारी, सर गंगाराम अस्पताल की पूर्व डॉक्टर, जिन्होंने मेरे भाई, मेरी, मेरे बेटे और मेरी बेटी की डिलीवरी कराई, उनका आज निधन हो गया। सत्तर की उम्र में भी वह सुबह-सुबह खुद अस्पताल पहुँच जाती थीं। अंत तक उन्होंने अपनी हर महान गुण को बरकरार रखा। एक महिला जिसका मैं हमेशा सम्मान करती और तारीफ करती थी। एक दोस्त जिसे मैं हमेशा याद रखूँगी।”

सर गंगाराम अस्पताल के चेयरमैन डॉ. डी एस राणा ने बताया कि डॉ. भंडारी को हृदय संबंधी समस्याओं के चलते अस्पताल में भर्ती किया गया था। वे कोरोना से भी संक्रमित थीं। डॉ. भंडारी के पति भी Covid-19 से संक्रमित होने के कारण आईसीयू में भर्ती हैं।

डॉ. राणा ने बताया कि डॉ. भंडारी ने 58 वर्षों तक अस्पताल में अपनी सेवा दी। उन्होंने यह भी कहा कि डॉ. भंडारी कोरोना वायरस संक्रमण की पहली लहर के दौरान भी अस्पताल आती थीं, लेकिन हृदय संबंधी समस्या होने के कारण बाद में उन्होंने अस्पताल आना बंद कर दिया था और घर से ही मरीजों का उपचार कर रही थीं।  

दिल्ली: केजरीवाल सरकार ने फ्री वैक्सीनेशन के लिए दिए ₹50 करोड़, पर महज तीन महीने में विज्ञापनों पर खर्च कर डाले ₹150 करोड़

कोरोना वायरस के कहर से कराह रही देश की राजधानी दिल्ली में वैक्सीनेशन के लिए केजरीवाल सरकार ने बजट में 50 करोड़ रुपए का आवंटन किया है। जबकि, दिल्ली की जनसंख्या ही 2 करोड़ है। यहाँ के सभी लोगों का टीकाकरण करने के लिए कम से कम 4 करोड़ वैक्सीन डोज की आवश्यकता होगी। एक खुराक की लागत 250 रुपए या उससे कुछ ज्यादा ही है। यानी दिल्ली की पूरी आबादी के टीकाकरण के लिए कम से कम 1000 करोड़ रुपए की जरूरत होगी। ऐसे में इतनी बड़ी आबादी के लिए इतना छोटा सा बजट केजरीवाल सरकार की महामारी को लेकर कथित गंभीरता को दर्शाता है।

कोविड संकट से खराब तरीके से निपटने के लिए अपनी सरकार से नाराज लोगों को शांत करने के लिए दिल्ली की आप सरकार ने दिल्ली वासियों के लिए फ्री कोविड-19 वैक्सीनेशन प्रोग्राम-‘आम आदमी फ्री कोविड वैक्सीन’ की घोषणा की।

दिल्ली कोरोना वायरस की दूसरी लहर से सबसे ज्यादा प्रभावित राज्यों में से एक है। रेमडेसिविर सहित आइसोलेशन बेड, आईसीयू बेड, मेडिकल ऑक्सीजन समेत प्रमुख एंटीवायरल ड्रग्स की कमी दिल्ली में है। इस महामारी ने दिल्ली सरकार की इससे निपटने की तैयारियों की पोल खोलकर रख दी है। इससे इस बात का खुलासा हो गया है कि किस तरह से केजरीवाल सरकार की अक्षमता के कारण दिल्ली में संक्रमण के हालात बहुत ही बुरे रहे हैं।

वैक्सीन एकाधिकार को खत्म करने के लिए केजरीवाल ने हाल ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर कोविशील्ड और कोवैक्सीन के निर्माण का जिम्मा दूसरी कंपनियों को भी देने की माँग की थी। उन्होंने कोरोना की दूसरी लहर को बहुत ही घातक बताते हुए कहा केंद्र सरकार से पूरे देश का टीकाकरण बहुत तेजी से करने की अपील की थी।

केजरीवाल ने पीएम मोदी के नाम लिखे पत्र में कहा, “कोविड की दूसरी लहर बहुत घातक है और कई लोगों की जान लेने के बाद यह बीमारी गाँवों तक पहुँच गई है। जल्द से जल्द सभी नागरिकों को टीका लगाने की आवश्यकता है। वर्तमान में केवल दो कंपनियाँ भारत में टीके का निर्माण कर रही हैं। सिर्फ दो कंपनियों के जरिए पूरे देश को वैक्सीन मुहैया कराना संभव नहीं है। इसके लिए युद्ध स्तर पर वैक्सीन निर्माण में तेजी लाने की आवश्यकता है। ”

केजरीवाल के लिए जन स्वास्थ्य से अधिक प्रचार अहम

केजरीवाल सरकार की कथनी-करनी में अंतर को इस बात से समझा जा सकता है कि इस सरकार ने वैक्सीनेशन के लिए कुल 50 करोड़ रुपए ही आवंटित किए। इसके विपरीत, AAP ने खुद के विज्ञापन और मार्केटिंग के लिए 2021 के पहले तीन महीने में ही 150 करोड़ रुपए से अधिक का आवंटन किया था। बीते 8 अप्रैल 2021 को एक आरटीआई के जवाब से पता चला था कि अरविंद केजरीवाल सरकार ने जनवरी 2021 से मार्च 2021 के दौरान विज्ञापनों पर 150 करोड़ रुपए खर्च किए हैं।

एक ट्विटर यूजर आलोक भट्ट द्वारा शेयर किए गए आरटीआई से पता चला है कि जनवरी 2021 में AAP सरकार द्वारा विज्ञापनों पर 32.52 करोड़ रुपए खर्च किए गए थे, फरवरी 2021 में 25.33 करोड़ रुपए और मार्च 2021 में 92.48 करोड़ रुपए खर्च किए गए थे। ऐसे हालात में जब कोरोना की दूसरी लहर से राष्ट्रीय राजधानी की स्वास्थ्य सेवाएँ चरमरा रही हैं, केजरीवाल सरकार ने औसतन हर दिन 1.67 करोड़ रुपए विज्ञापन पर खर्च किए हैं।

इसमें कुल खर्च प्रिंट मीडिया, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और इंटरनेट के माध्यम से विज्ञापन और प्रचार में किया गया है। केजरीवाल सरकार ने बीते 2 साल में अपने प्रचार-प्रसार में 800 करोड़ रुपए से अधिक का खर्च किया है।

इससे यह स्पष्ट होता है कि केजरीवाल सरकार के लिए उसका पीआर मैनेजमेंट दिल्ली के सभी लोगों को फ्री वैक्सीन देने से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है। हाल ही में अरविंद केजरीवाल ने ऐलान किया था कि दिल्ली सरकार जल्द ही कोरोना वैक्सीन खरीदने के लिए वैश्विक स्तर पर निविदा जारी करेगी। लेकिन, केवल 50 करोड़ रुपए के छोटे से बजट के साथ ये संभव नहीं दिख रहा है।

केजरीवाल सरकार की अपनी जिम्मेदारियों को केंद्र पर डालने की प्रवृति रही है, जैसा कि उन्होंने हाल ही में केंद्र सरकार को सभी राज्यों की ओर से टीके खरीदने का सुझाव दिया था। ऐसे में इस बात से कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि वो केंद्र सरकार से दिल्ली के लोगों के मुफ्त टीकाकरण अभियान के लिए बिल भरने को कहें।

कोरोना की दूसरी लहर से दिल्ली की हालत खराब

राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में पिछले महीने कोरोना वायरस का ऐसा विस्फोट हुआ कि इसके मामलों में तेजी से वृद्धि हुई। हालात ये हो गए कि राष्ट्रीय राजधानी के अस्पतालों में ऑक्सीजन के लिए मारामारी शुरू हो गई। इसके अलावा दिल्ली के अस्पतालों में बड़ी मात्रा में कोविड बेड, एंटीवायरल ड्रग्स आदि की भारी किल्लत देखने को मिली। हालात इतने अधिक खराब हो गए थे कि राज्य में एक जिम्मेदार सरकार की कमी के चलते मरीजों के रिश्तेदारों को ट्विटर जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर मदद माँगनी पड़ा।

इतना ही नहीं दिल्ली के अस्पताकेजरीवाल सरकार के लिए उसका पीआर मैनेजमेंट दिल्ली के सभी लोगों को फ्री वैक्सीन देने से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है।लों ने एक सुर से आम आदमी पार्टी सरकार पर कोरोना के कुप्रबंधन और ऑक्सीजन की पर्याप्त सप्लाई नहीं करने का आरोप लगाया था। अस्पतालों का कहना था कि ऑक्सीजन नहीं मिलने से मरीजों की मौतें हुईं। अगर दिल्ली सरकार ने हालात को ठीक से संभाला होता तो संकट को टाला जा सकता था।

राष्ट्रीय राजधानी में ऑक्सीजन की आवश्यकता को पूरा करने में दिल्ली सरकार की अक्षमता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वे अक्सर शहर में ऑक्सीजन की आवश्यकता के संबंध में अपनी खुद की ही बातों का खंडन करते रहते हैं।

ऑक्सीजन सप्लाई को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने जब एनसीआर में ऑक्सीजन आपूर्ति, वितरण और उपयोग का ऑडिट करने के लिए एक पैनल गठित करने का आदेश दिया, तो आश्चर्यजनक तरीके से केजरीवाल सरकार ने गुरुवार (13 मई) को ऐलान कर दिया कि उनके पास जरूरत से ज्यादा ऑक्सीजन है। केंद्र सरकार चाहे तो इसे दूसरे राज्यों को दे सकती है।

गौरतलब है कि अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व वाली AAP सरकार ने कहा था कि राष्ट्रीय राजधानी को ऑक्सीजन संकट से बाहर आने के लिए दिल्ली को कम से कम 976 मीट्रिक टन ऑक्सीजन हर दिन चाहिए। इसके लिए आप सरकार केंद्र सरकार को लगातार दोषी ठहरा रही है कि वो आवश्यक 976 मीट्रिक टन ऑक्सीजन नहीं दे रहा है। हालाँकि, सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के मुताबिक जब केंद्र सरकार ने प्रतिदिन दिल्ली को 730 मीट्रिक टन ऑक्सीजन की सप्लाई शुरू कर दी, तो केजरीवाल ने यह कहना शुरू कर दिया कि उनके पास पर्याप्त मात्रा में ऑक्सीजन है।

महाराष्ट्र: 1814 अस्पतालों का ऑडिट, हर जगह ऑक्सीजन सेफ्टी भगवान भरोसे, ट्रांसफॉर्मर के पास स्टोर किए जा रहे सिलेंडर

महाराष्ट्र के अस्पतालों की दुर्दशा को उजागर करती एक रिपोर्ट सामने आई है। इसके मुताबिक राज्य के 1814 अस्पतालों का ऑडिट किया गया। हर जगह बड़ी लापरवाही सामने आई। सरकारी और प्राइवेट, दोनों तरह के अस्पताल इस मामले में एक जैसे हैं। क्या मुंबई और क्या सुदूर का नंदुरबार, हर जगह एक जैसे ही हालात मिले हैं। तकनीकी विशेषज्ञों ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि प्रदेश के अस्पतालों में मेडिकल ऑक्सीजन सप्लाई सिस्टम के रखरखाव में ढिलाई हो रही है।

मिड-डे की रिपोर्ट के अनुसार जाँच में विशेषज्ञों को कहीं ऑक्सीजन सिलेंडर खुले मिले, तो कहीं पाइप लीक। हालात बिगड़ने या किसी मशीन के रुकने पर अस्पतालों के पास बैकअप की कोई सुविधा नहीं मिली। खराब हुई चीजों को ठीक करने वाले मूलभूत उपकरण भी नहीं थे। इसके अलावा अस्पतालों में प्रशिक्षित स्टाफ भी नहीं थे इस सिस्टम को मेंटेन कर सके।

विशेषज्ञों ने कई अस्पताल में पाया कि वहाँ फायर सेफ्टी के लिए ऑडिट भी नहीं किया गया था। कुछ अस्पतालों में तो ऑक्सीजन सिलेंडर बिजली ट्रांसफॉर्मर के पास रखे हुए थे।

सबसे हैरान करने वाला केस आदिवासी बहुल नंदुरबर जिले के पहाड़ी इलाकों में बने अस्पतालों में सामने आया। वहाँ ऑक्सीजन की सप्लाई तक नहीं थी। बता दें कि राज्य के अस्पतालों में ऑडिट का निर्देश, ऑक्सीजन सप्लाई की किल्लत और नासिक के अस्पताल में 22 मरीजों की जान जाने के बाद दिया गया था।  

इसके बाद इजीनियरिंग, पॉलिटेक्विक और टेक्निकल संस्थानों के विशेषज्ञों ने अस्पतालों का निरीक्षण किया। जाँच के बाद नोडल ऑफिसर नियुक्त किए गए टेक्निकल एजुकेशन के निदेशक ने सरकार रिपोर्ट सौंप दी है। इस रिपोर्ट में 9 मई तक के हालात बताए गए हैं।

एक्सपर्ट्स की इस टीम ने अपनी जाँच में ऑक्सीजन को स्टोर करने वाली जगह, उसकी सुरक्षा, पाइप डिस्ट्रिब्यूशन सिस्टम, अन्य उपकरण व आपातकाल प्लॉनिंग में बैकअप सप्लाई जैसे चीजों को प्रमुखता से परखा। एक्सपर्ट्स की इस टीम को ये भी निर्देश थे कि ये जिलाधिकारी को जरूरी बदलाव और मरम्मत को लेकर सलाह दें।

कुल मिलाकर 335 सरकारी और 1,479 प्राइवेट अस्पतालों को ऑडिट किया गया। फिलहाल सिर्फ 254 सरकारी और 1465 निजी अस्पतालों की ऑडिट के निष्कर्ष सरकार को दी गई है। डॉ. वाघ ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि अगर लीकेज को रिपेयर कर दिया जाए तो राज्य में ऑक्सीजन में तीव्रता से कमी आने पर भी लोकल स्तर पर ज्यादा ऑक्सीजन उपलब्ध हो सकती है। उन्होंने यह भी कहा कि इस ऑडिट रिपोर्ट से मिशन ऑक्सीजन में SOP बनाने में मदद होगी, जो राज्य को पर्याप्त मात्रा ऑक्सीजन उपलब्ध कराने में केंद्रित होगा।

हनुमान भक्ति से सरप्लस ऑक्सीजन… लेकिन विज्ञापन में फोटो सिर्फ सीएम साहब की: मंत्री जी की प्रेस कॉन्फ्रेंस

प्रेस कॉन्फ्रेंस में मंत्री जी ने घोषणा की; अब हमारे पास सरप्लस ऑक्सीजन है। सरप्लस का अर्थ है जो सर के ऊपर प्लस मतलब अधिक हो जाए। और इस सरप्लस की वजह से हमारे मन में जिम्मेदारी कुलांचे मारने लगी है। इन कुलांचों को रोकने के लिए हम आस-पास के राज्यों को ऑक्सीजन देना चाहते हैं। 

यह सुनकर पत्रकार चकित थे। उन्हें यह तो पता था कि ऑक्सीजन हवा में रहती है लेकिन उनकी समझ में तुरंत यह नहीं आया कि हवा में घुमते-घुमते ये मंत्री जी के राज्य में कैसे सरप्लस हो गई? केंद्र ने भी ऑक्सीजन को ऐसा कोई आदेश नहीं दिया कि जाओ और मंत्री जी के राज्य में सरप्लस हो जाओ। अपनी उत्सुकता को शांत करने के लिए उनमें से एक ने पूछा; ये ऑक्सीजन सरप्लस हुई कैसे? 

वे बोले; बस समझिए कि हो गई। 

एक और पत्रकार ने पूछा; कहीं ये ऑडिट की वजह से तो सरप्लस नहीं हुई?

मंत्री जी बोले; ऑडिट की वजह से कभी कुछ सरप्लस हुआ है क्या? हमें ये पता था कि ऑडिट की वजह से चीजें कम होती हैं। इसीलिए हम ऑडिट के खिलाफ थे। 

पत्रकार; पर जनता का मानना है कि ऑडिट की वजह से ही सरप्लस हुआ होगा। 

मंत्री जी; जनता तो कुछ भी मान लेती है। जनता तो यह भी मान लेती है कि हल्ला क्लिनिक विश्व स्तरीय है। वह तो ये भी मान लेती है कि अमेरिकी सरकार उसकी नक़ल करके अपने देश में वैसा ही क्लिनिक बनवाना चाहती है। हमारे सीएम साहब ट्वीट करके बताते हैं कि फलाना मूवी अच्छी है, सो देख आओ तो वह सीएम साहब की बात भी मान लेती है। ऐसे में आप जनता के मानने पर न जाएँ। आप पत्रकार हैं, आप हमेशा की तरह वो मानें, जो हम कह रहे हैं।

इस बात पर आधे दर्जन पत्रकारों और मंत्री जी ने जोरदार ठहाके लगाए।     

एक और पत्रकार ने सवाल किया; आपको कब पता चला कि ऑक्सीजन सरप्लस हो गई है?

मंत्री जी बोले; मंगलवार के दिन। हमारे सीएम साहब हनुमान चालीसा पढ़कर जैसे ही उठे, उन्हें स्वास्थ्य सचिव ने फोन करके बताया कि सर ऑक्सीजन सरप्लस हो गई। 

पत्रकार बोले; इसका मतलब क्या यह मान लिया जाए कि ये ऑक्सीजन हनुमान चालीसा पढ़ने से सरप्लस हुई है?

मंत्री जी बोले; यह कहना अभी जल्दबाजी होगी पर इससे इंकार भी नहीं किया जा सकता। आप लोग तो जानते हैं कि हमारे सीएम साहब हनुमान जी के परम भक्त हैं। 

एक ‘नकली’ पत्रकार बोला; यह तो कोई वैज्ञानिक आधार वाली बात नहीं हुई। 

मंत्री जी; क्यों नहीं हुई? हनुमान जी हवा में उड़ते थे कि नहीं?

पत्रकार ने घबरा कर सहमति में सिर हिलाते हुए बोला; हाँ, वो तो है। 

मंत्री जी ने फट से कहा; और हवा में ऑक्सीजन है। हनुमान जी हवा में उड़ते थे, हवा में ऑक्सीजन है और हमारे सीएम साहब हनुमान जी के भक्त हैं। और कौन सा वैज्ञानिक आधार चाहिए आपको? 
 
‘नकली’ पत्रकार कन्विंस नहीं हुआ। वो बोला; आपके सीएम साहब को हनुमान जी का भक्त हुए अभी सवा साल ही हुए। आस-पास के राज्यों के सीएम तो बचपन से हनुमान जी के भक्त हैं। और वे लोग तो इतने बड़े भक्त हैं कि उन्होंने विवाह भी नहीं किया है।  

मंत्री जी; अरे ये तो और बड़ा प्रूफ है। वे पुराने भक्त हैं इसीलिए उनके पास ऑक्सीजन ही ऑक्सीजन थी क्योंकि हनुमान जी की कृपा से उन्हें कभी कमी ही न हुई। 

एक और पत्रकार बोला; कमी तो उन्हें भी थी पर उन्होंने शोर नहीं मचाया।  

मंत्री जी बोले; शोर मचाना सबसे नहीं हो पाता। आपने वो मुहावरा नहीं सुना कि साधु मचाए शोर?

पत्रकार; लेकिन मुहावरा तो कुछ और है शायद? 

मंत्री जी बोले; हम पॉलिटिक्स बदलने का वादा करके आए थे। उसे बदलने के बाद हमारे पास सरप्लस समय और इच्छाशक्ति थी तो हमने मुहावरा भी बदल दिया।    

एक और पत्रकार बोला; अच्छा ये जो ऑक्सीजन सरप्लस हुई है, जब अखबारों में इस सरप्लस का विज्ञापन छपेगा तो फोटो सीएम साहब की होगी या हनुमान जी की?

प्रश्न सुनकर मंत्री जी बोले पड़े; देखिए विज्ञापन में फोटो तो सीएम साहब की ही छपेगी। माना कि हनुमान जी की कृपा से ऑक्सीजन सरप्लस हुई है पर चालीसा का पाठ तो सीएम साहब ने ही किया था। 

पत्रकार; तो विज्ञापन केवल सरप्लस ऑक्सीजन का छपेगा या आस-पास के राज्यों को जो ऑक्सीजन ऑफर की जा रही है, उसका भी छपेगा?

मंत्री जी; गुड क्वेश्चन। फिलहाल यह कह पाना अभी मुश्किल है। इसे लेकर सीसीए जल्द ही फैसला लेगी। 

पत्रकार; सीसीए?

मंत्री जी; अरे कैबिनेट कमिटी ऑन एडवर्टीजमेंट। आपके चैनल पर तो हम विज्ञापन देते आए हैं। आपको ये भी नहीं पता?

पत्रकार झेंप गया। धीरे से मंत्री जी से बोला; इसे लेकर एडिटर साहब से शिकायत मत कीजिएगा। मंत्री जी ने आश्वासन दिया कि वे ऐसा नहीं करेंगे। सब खुश थे। मंत्री जी इस बात से कन्विंस थे कि अब जनता के मन में ऑक्सीजन सम्बंधित सवाल नहीं उठेंगे। 

हर पत्रकार के घर की बेल बजी। सबने अपना-अपना डोर खोल कर देखा तो डिलीवरी बॉय समोसा और गुलाब जामुन का पैकेट लिए खड़ा था।      

राजीव गाँधी अस्पताल में कोरोना से जरनैल सिंह की मौत, 2009 में चिंदबरम पर जूता फेंक चर्चा में आए थे

पत्रकार से नेता बने जरनैल सिंह का शुक्रवार (14 मई 2021) को दिल्ली में निधन हो गया। 47 साल के जरनैल सिंह कोरोना संबंधित जटिलताओं के कारण बीते 12-13 दिन से राजीव गाँधी सुपर स्पेशलिटी अस्पताल में भर्ती थे। आम आदमी पार्टी (AAP) के विधायक रहे सिंह, पूर्व केंद्रीय मंत्री पी चिंदबरम पर जूता फेंक चर्चा में आए थे। वे 2015 में राजौरी गार्डन से विधायक चुने गए थे। पेशे से पत्रकार और लेखक जरनैल सिंह ने 1984 के सिख दंगों के पीड़ितों के साथ काम किया था।

सिंह अप्रैल के आखिरी सप्ताह में कोरोना वायरस से संक्रमित हो गए थे। इसके बाद उन्हें राजीव गाँधी सुपर स्पेशलिटी अस्पताल में भर्ती किया गया था जहाँ शुक्रवारको उनकी मृत्यु हो गई

सिंह का नाता विवादों से भी रहा। अप्रैल 2009 में कॉन्ग्रेस नेता जगदीश टाइटलर को 1984 के सिखों दंगों में क्लीनचिट दिए जाने पर उन्होंने तत्कालीन गृह मंत्री पी. चिदंबरम पर जूता फेंका था। इस घटना के बाद जरनैल सिंह को उनके संस्थान ने निकाल दिया था। उस समय सिंह ने कहा था कि उनके विरोध करने का तरीका गलत हो सकता है, लेकिन अपने किए के लिए वे माफी नहीं माँगेंगे।

2015 में विधायक बनने वाले जरनैल सिंह ने 2014 में पश्चिमी दिल्ली से लोकसभा चुनाव भी लड़ा था, लेकिन हार गए थे। इसके अलावा उन्होंने पंजाब के वर्तमान मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह और पूर्व प्रकाश सिंह बादल के खिलाफ भी चुनाव लड़ा था। वे दिल्ली में पंजाबी अकादमी का उपाध्यक्ष भी रहे थे। अगस्त 2020 में हिन्दू देवी-देवताओं पर किए गए आपत्तिजनक फेसबुक पोस्ट के कारण जरनैल सिंह को आप ने सस्पेंड कर दिया था, तब से वे राजनीति से दूर थे।

71 वर्षों में पहली महिला प्रधान: UP में रीता वर्मा ऐसे लड़ रहीं कोरोना से, 20000 लोगों में फैला रहीं जागरूकता

लखनऊ-सुल्तानपुर हाइवे पर गोसाईंगंज विकासखंड की ग्राम पंचायत है कबीरपुर। पिछले दिनों हुए त्रिस्तरीय ग्राम पंचायत चुनावों में कबीरपुर ने नया कीर्तिमान स्थापित किया है। पिछड़ी जाति के लिए आरक्षित इस ग्राम पंचायत की जनता ने पुरुष प्रत्याशियों के मुकाबले एक पढ़ी-लिखी योग्य महिला को अपना प्रधान चुना। 33 वर्षीय स्नातक रीता वर्मा ने आजादी के बाद से पहली महिला ग्राम प्रधान के रूप में गाँव की कमान सँभाली। 

शपथ लेने के बाद ही रीता वर्मा ने गाँव के विकास की कमान सँभाल ली है। हिन्दुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार वे गाँव की सुरक्षा के जिम्मे के साथ ही गाँव में घूम-घूम कर लोगों को कोविड नियमों के पालन, बचाव और स्वास्थ्य संबंधी जानकारियाँ दे रही हैं।

दरअसल चुनाव के बाद गाँव के कई लोग बीमार पड़ने लगे थे। जिसके बाद रीता वर्मा ने मोर्चा सँभाला। वह कहती हैं, “चुनाव के तुरंत बाद, कई लोग बीमार हो गए। कई बुखार से पीड़ित थे, लेकिन वे कोविड टेस्ट कराने में संकोच कर रहे थे। तब मैंने लगभग 20,000 लोगों के अपने गाँव में कोरोना वायरस के बारे में जागरूकता पैदा करने के लिए एक अभियान शुरू किया।”

उन्होंने कहा, “मैंने निवासियों, विशेष रूप से वरिष्ठ नागरिकों को परीक्षण के महत्व के बारे में प्रेरित किया ताकि संक्रमण आगे न फैले, और कीमती जीवन बच जाए। उठाए गए इन कदमों की वजह से आज हमारा गाँव लगभग कोरोना मुक्त हो गया है।”

उनके पति, उमेश कुमार वर्मा ने कहा, “जब उन्होंने चुनाव लड़ने की इच्छा व्यक्त की तो मैं हैरान रह गया। आप सोच सकते हैं कि वह एक औसत गृहिणी है, लेकिन वह हमेशा स्वच्छता, सड़कों और गाँव में स्वास्थ्य के बुनियादी ढाँचे की कमी की समस्याओं के बारे में मुखर रही हैं। उन्होंने महिलाओं में स्वास्थ्य और स्वच्छता के बारे में जागरूकता पैदा किया।”

जानकारी के मुताबिक वर्मा को लगभग 50% वोट मिले और उन्होंने मौजूदा प्रधान को भारी अंतर से हराया। अगले दिन से, उन्होंने कोविड के उचित व्यवहार के महत्व के बारे में ग्रामीणों को शिक्षित करने के लिए अपना अभियान शुरू किया। उन्होंने हर गली में टीमों का गठन किया, जो बिना मास्क और सोशल डिस्टेंसिंग का उल्लंघन करने वाले निवासियों की आवाजाही पर रोक लगाती हैं।

उनका अगला एजेंडा कबीरपुर में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (पीएचसी) या एक औषधालय खोलना है। वह कहती हैं, “वर्तमान में, जो कोई भी बीमार पड़ता है उसे इलाज के लिए गोसाईंगंज जाना पड़ता है। मैंने PHC या एक औषधालय की आवश्यकता के लिए अधिकारियों को लिखा है ताकि चिकित्सा बुनियादी ढाँचे की कमी के कारण लोगों की मृत्यु न हो। इसके अलावा, मैंने वर्तमान परीक्षण समय के दौरान लोगों को लॉकडाउन, सामाजिक दूरी और स्वच्छता के महत्व के बारे में जागरूक करने के लिए हर गली में समूह बनाए हैं। मैंने नालों और गलियों को साफ रखने के लिए अतिरिक्त सफाई कर्मियों को भी कहा है। अगर मुझे वे नहीं मिले, तो हम इसे स्वयं करने के लिए कार सेवा करेंगे।”

बता दें कि वर्ष 1952 में पंचायत का गठन होने के बाद से कबीरपुर कभी महिला सीट नहीं हुई। इसके चलते महिलाओं को चुनाव लड़ने का मौका ही नहीं मिला। 1799 वोटरों वाली कबीरपुर की सीट इस बार भी पिछड़ी जाति के लिए आरक्षित हुई थी। इस बार युवाओं ने पंचायत की कमान महिला के हाथों में सौंपने का इरादा बनाकर पुरुष प्रत्याशी के खिलाफ महिला प्रत्याशी के रूप में रीता वर्मा को उतारा। 

मतदाताओं ने उमेश वर्मा की पत्नी रीता वर्मा पर दाँव लगाया। राजनीति में भाग्य आजमाने चुनावी दंगल में कूदीं रीता ने महिलाओं की टोली के साथ घर-घर जाकर समर्थन माँगा। गाँव की महिलाओं ने महिला प्रधान बनाकर इतिहास रचने की ठानी और उनकी टोली में शामिल हो गईं।

दो मई को परिणाम घोषित होने पर रीता वर्मा ने चुनाव जीतकर नया कीर्तिमान बनाया। आखिरकार गाँव को पहली बार महिला प्रधान मिली। कोरोना संक्रमण के दौरान रीता गाँव में लोगों को जागरूक कर रही हैं। उन्हें कोविड नियमों का पालन करने की सीख दे रही हैं और साथ ही उनकी स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों का हल भी बता रही हैं।

नीति आयोग ने की योगी सरकार की ‘Test-Trace-Treat मॉडल की तारीफ, बताया कोविड के खिलाफ जंग में ‘बेहद प्रभावशाली’

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के बाद अब नीति आयोग ने भी कोविड प्रबंधन के लिए उत्तर प्रदेश की योगी सरकार के मॉडल की जमकर तारीफ की है। आयोग ने यूपी के इस मॉडल को अन्य राज्यों के लिए नजीर बताया है। नीति आयोग के आधिकारिक ट्विटर हैंडल से इस संबंध में दो महत्वपूर्ण ट्वीट किए गए हैं।

नीति आयोग ने एक ट्वीट में कोरोना मरीजों का पता लगाने और संक्रमण का फैलाव रोकने के किए उन्हें होम आइसोलेट करने के लिए योगी सरकार द्वारा चलाए गए ट्रिपल टी (ट्रेस, टेस्ट और ट्रीट) के अभियान की सराहना की है तो दूसरे में यूपी के ऑक्सीजन ट्रांसपोर्ट ट्रैकिंग सिस्टम की। नीति आयोग की टिप्पणी ने कोरोना को काबू में करने में योगी सरकार की रणनीति पर एक तरह से मुहर भी लगा दी है।

नीति आयोग ने की योगी सराकर की तारीफ

डब्यूएचओ द्वारा कोविड मैनेजमेंट के लिए योगी सरकार की तारीफ के बाद गुरुवार (मई 13, 2021) देर शाम नीति आयोग के ट्विटर हैंडल से भी कोविड के खिलाफ लड़ाई में यूपी सरकार के प्रयासों की सराहना की गई।

आयोग ने अपने एक ट्वीट में कहा है कि उत्तर प्रदेश सरकार की तरफ से राज्य के 90 हजार से अधिक गाँवों में घर-घर जाकर कोरोना संक्रमित का पता लगाने और उन्हें आइसोलेट करने के अभियान को अन्य राज्य भी दोहरा सकते हैं। इस ट्वीट में यह भी बताया गया है कि ट्रेस, टेस्ट और ट्रीट का यह यूपी मॉडल कोरोना को काबू करने में बेहद प्रभावशाली सिद्ध हो रहा है।

ऑक्सीजन आपूर्ति पर योगी सरकार की सराहना

अपने एक अन्य ट्वीट में नीति आयोग ने उत्तर प्रदेश सरकार के ऑक्सीजन आपूर्ति के लिए किए जा रहे प्रयासों को भी सराहा। इस संबंध में आयोग ने ट्वीट किया कि उत्तर प्रदेश सरकार का ऑक्सीजन ट्रांसपोर्ट ट्रैकिंग सिस्टम बेहद प्रशंसनीय है।

यूपी ने ऑक्सीजन ट्रैकिंग के लिए एक ऐसा डैशबोर्ड तैयार किया है जिसके जरिए ऑक्सीजन टैंकरों की रियल टाइम लोकेशन का पता लगा सकते हैं। इससे तत्परता से और बेहतर ऑक्सीजन आवंटन संभव हुआ है। नतीजे के रूप में यह आँकड़े हैं कि पहले जहाँ 250 मीट्रिक टन ऑक्सीजन की उपलब्धता हो पा रही थी, अब वह 1000 मीट्रिक टन होने लगी है। 

यूपी में ‘ट्रेस, टेस्ट और ट्रीट’ अभियान का असर

वास्तव में कोरोना का फैलाव रोकने में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के ट्रेस, टेस्ट और ट्रीट के फार्मूले से प्रदेश में संक्रमण की रफ्तार बहुत तेजी से थमने लगी है। पिछले 12 दिन में एक्टिव केस की संख्या में एक लाख से अधिक की कमी हुई है। इसके साथ ही संक्रमितों के इलाज के दौरान ऑक्सीजन को लेकर शुरुआती दिक्कत भी अब समाप्त हो गई है। सीएम योगी की पहल पर शुरू ऑक्सीजन ट्रांसपोर्ट ट्रैकिंग सिस्टम से पिछले कई दिनों से यूपी में पूरे देश मे सर्वाधिक ऑक्सीजन की उपलब्धता सुनिश्चित हो रही है।

केंद्र सरकार ने लागू किया यूपी मॉडल

वहीं, ऑक्सीजन आपूर्ति को लेकर प्रदेश सरकार की ओर से लागू किए गए मॉडल को केंद्र सरकार ने भी अपनाया है। इस बारे में सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय ने अनिवार्य रूप से ऑक्सीजन कंटेनर्स, टैंकर्स और अन्य वाहनों में वीहकल लोकेशन ट्रैकिंग डिवाइस लगाने के आदेश दिए हैं। इन टैंकर्स की जीपीएस के माध्यम से उचित निगरानी और सुरक्षा सुनिश्चित की जाएगी। साथ ही यह भी देखा जाएगा कि कोई डायवर्जन या विलंब तो नहीं हो रहा है। 

गौरतलब है कि पिछले दिनों भारत में कोरोना संक्रमण के फैलते प्रकोप के बीच वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन (WHO) ने योगी सरकार के डोर-टू-डोर कैम्पेन की तारीफ की थी। WHO ने अपने एक लेख में बताया था कि कैसे योगी सरकार ने महामारी के समय में आवश्यक कदम उठाते हुए उन्हें जमीनी स्तर पर लागू किया।

लेख में कहा गया कि योगी सरकार ने ग्रामीण क्षेत्रों में COVID-19 के मद्देनजर हाउस टू हाउस एक्टिव केस फाइंडिंग शुरू की है। इस प्रक्रिया में उन्हें आइसोलेट किया गया जिनमें कोविड के लक्षण थे। WHO ने कहा कि योगी सरकार ने 1,41,610 टीमों को इस काम में लगाया है। इन टीमों में राज्य स्वास्थ्य विभाग से 21,242 सुपरवाइजर हैं, जिनका काम ये सुनिश्चित करना है कि अभियान में कोई ग्रामीण इलाका न छूटे।

दिल्ली में ऑक्सीजन सिलेंडर के बदले पड़ोसी ने रखी सेक्स की डिमांड, केरल पुलिस से सेक्स के लिए ई-पास की डिमांड

कोरोना महामारी के बीच लागू पाबंदियों और मेडिकल असुविधाओं के चलते कई ऐसे मामले आ रहे हैं, जिन्हें सुनकर आप हैरान रह जाएँगे। हाल में ऐसे ही दो मामले अलग-अलग जगहों से प्रकाश में आए। एक जगह जहाँ एक व्यक्ति ने सेक्स के लिए ई-पास बनवाने की अपील पुलिस के पास भेजी, वहीं दूसरी जगह कथित तौर पर ऑक्सीजन सिलेंडर के बदले एक लड़की को पड़ोसी ने अपने साथ सोने को कहा।

एरर बता पुलिस से माँगी माफी

कोरोना महामारी के चलते अधिकांश राज्यों में लोगों को बेवजगह घर से बाहर निकलने से मना किया गया है। जिन्हें बहुत जरूरी कामों के लिए कहीं आना-जाना है उनके लिए राज्य सरकारों ने ई-पास लेने की सुविधा दी है। लेकिन, इस नियम के चलते कई जगह पुलिस को बड़ी अजीबोगरीब रिक्वेस्ट आ रही हैं। हाल में केरल में ई-पास के लिए एक रिक्वेस्ट आई जिसमें व्यक्ति ने लिखा था कि उसे सेक्स के लिए बाहर जाना है।

कन्नूर के कन्नापुरम के इरीनेव में रहने वाले इस व्यक्ति ने वजह की जगह पर लिखा था कि वह शाम में कन्नूर की किसी जगह पर सेक्स के लिए जाना चाहता है। व्यक्ति का आवेदन चूँकि अजीब था, इसलिए असिस्टेंट कमिश्नर ने फौरन उस आदमी को पकड़कर लाने के निर्देश दिए। स्थानीय रिपोर्ट के अनुसार, वल्लापत्तन पुलिस ने उसे पकड़ा और पूछताछ के लिए थाने लाई।

पूछताछ में व्यक्ति ने अपनी गलती के लिए माफी माँगी। उसने बताया कि उसकी एप्लीकेशन में स्पेलिंग एरर हो गया था, जिसे वह भेजने से पहले सही करना भूल गया। उसके मुताबिक वह सेक्स की जगह ‘सिक्स ओ क्लॉक’ लिखना चाहता था। पुलिस ने उसकी बात सुनकर उसकी माफी स्वीकारी और कहा कि गैर जरूरी चीजों के लिए ई-पास की डिमांड न करें। 

मालूम हो कि केरल के कन्नूर के अलावा एक हैरान करने वाला मामला सोशल मीडिया पर सामने आया है।

ऑक्सीजन सिलेंडर के बदले सेक्स

ऐसे वक्त में जब दिल्लीवासी ऑक्सीजन किल्लत के कारण दर-दर भटकने को मजबूर हैं, उस समय एक व्यक्ति ने युवती को ऑक्सीजन सिलेंडर देने के बदले उसके साथ सेक्स करने की माँग की। घटना के बारे में एक ट्विटर यूजर ने बताया है कि उसकी दोस्त की बहन को अपने बीमार पिता के लिए ऑक्सीजन चाहिए था। लेकिन उसके पड़ोसी ने सिलेंडर के बदले उसे साथ सोने को कहा।

भवरीन कंधारी नाम की लड़की ने ट्विटर पर लिखा, “मेरी सहेली की बहन जो मेरी छोटी बहन जैसी है। वह एक एलिट कॉलोनी में रहती है। उसके पड़ोसी ने बीमार पिता के लिए ऑक्सीजन सिलेंडर देने के बदले उसे साथ में सोने को कहा। इस मामले में क्या एक्शन ले सकते हैं क्योंकि %$* तो इस बात से इनकार ही करेगा।” इस पोस्ट को देखने के बाद कई यूजर्स हैरान हुए। कुछ ने उसे RWA में शिकायत करने को कहा। कुछ ने उस आदमी का नाम सोशल मीडिया पर उजागर करने की सलाह दी।

‘खान चाचा’ वाले कालरा की तरफ से HC में पेश हुए कॉन्ग्रेस MP सिंघवी, ASG ने पूछा- इस आदमी को इतना महत्व क्यों?

दिल्ली के खान चाचा रेस्टोरेंट से ऑक्सीजन कंसन्ट्रेटर मिलने के बाद चर्चा में आए करोबारी नवनीत कालरा को अग्रिम जमानत देने से दिल्ली हाई कोर्ट ने शुक्रवार (14 मई 2021) को इनकार कर दिया। उच्च न्यायालय ने इस मामले की सुनवाई 18 मई तक स्थगित कर दी है। इससे पहले गुरुवार (13 मई) को दिल्ली की एक स्थानीय अदालत ने भी कालरा की अग्रिम जमानत की याचिका खारिज कर दी थी। कालरा की ओर से दिल्ली उच्च न्यायालय में कॉन्ग्रेस सांसद अभिषेक मनु सिंघवी पेश हुए।

ऑक्सीजन कंसन्ट्रेटर की कालाबाजारी के आरोपित नवनीत कालरा की अग्रिम जमानत याचिका को जरूरत से ज्यादा महत्व दिए जाने पर दिल्ली पुलिस की ओर से पेश असिस्टेंट सॉलिसिटर जनरल (ASG) एसवी राजू ने उच्च न्यायालय में पूछा कि इस आदमी को इतना महत्व क्यों दिया जा रहा है? उन्होंने कहा कि पहले गुरुवार को न्यायालय का कार्य समय से आगे बढ़ाकर शाम को 7 बजे यह इस मामले पर सुनवाई की गई और अब ईद की छुट्टी के दिन इस मामले को सुन जा रहा है। ASG राजू ने यह भी पूछा कि इस अग्रिम जमानत याचिका में खास क्या है?  

आरोपित कालरा का बचाव करते हुए कॉन्ग्रेस सांसद और वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि नवनीत कालरा न तो आयातक हैं और न ही उत्पादक। वे कुछ रेस्टोरेंट चलाते हैं और एक पुराने फैमिली बिजनेस दयाल ऑप्टिकल्स के मालिक हैं। इस पर न्यायालय ने पूछा कि यदि कालरा आयातक या उत्पादक नहीं हैं तो किस आधार पर उन्होंने 105 ऑक्सीजन कॉन्संट्रेटर जमा कर रखे थे?

ASG एसवी राजू ने इसे कालाबाजारी का केस बताया और न्यायालय को कालरा से जब्त किए गए ऑक्सीजन कंसन्ट्रेटर के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी साझा की। उन्होंने बताया कि जब्त किए गए ऑक्सीजन कॉन्संट्रेटर में से दो की टेस्टिंग की गई। कंसन्ट्रेटर में ऑक्सीजन का आउटपुट मात्र केवल 32% पाई गई, जबकि यह 90-95% होना चाहिए। ASG एसवी राजू ने कहा कि WHO की गाइडलाइन के अनुसार भी ऑक्सीजन कंसन्ट्रेटर को कम से कम 80-85% आउटपुट देना चाहिए।  

दिल्ली उच्च न्यायालय के जस्टिस सुब्रमन्यम प्रसाद ने कालरा को किसी भी प्रकार की अग्रिम सुरक्षा देने से इनकार करते हुए सुनवाई को 18 मई 2021 तक के लिए टाल दिया।   

आपको बता दें कि 7 मई 2021 को दिल्ली पुलिस ने छापामारी करके दिल्ली के खान मार्केट के खान चाचा और टाउन हॉल रेस्टोरेंट से 105 ऑक्सीजन कंसन्ट्रेटर बरामद किए थे। 6 मई को दिल्ली पुलिस ने ही लोधी कॉलोनी के एक रेस्टोरेंट से 419 ऑक्सीजन कंसन्ट्रेटर जब्त किए थे। नवनीत कालरा इन तीनों रेस्टोरेंट का मालिक था। छापामारी के बाद से ही नवनीत कालरा का फोन बंद हो गया था और यह भी आशंका है कि उसने शहर छोड़ दिया।

जानकारी के मुताबिक कालरा चीन से ऑक्सीजन कंसन्ट्रेटर का 20-25 हजार में आयात कर उन्हें दिल्ली में 70 हजार में बेचकर भारी मुनाफा कमा रहा था। ये काम ऑनलाइन बोली लगाकर हो रहा था।

ज्ञात हो कि 2020 में जब आम आदमी पार्टी की सरकार सत्ता में वापस आई थी नवनीत कालरा को केजरीवाल सरकार द्वारा सम्मानित किया गया था। वह उन लोगों में था जिन्हें दिल्ली की आम आदमी पार्टी की सरकार ने ‘दिल्ली का निर्माता’ बताया था।  

कोरोना महामारी के बीच ब्लैक फंगस बीमारी का खतरा: हो रही मौत, 10 राज्यों से अभी तक संक्रमण की सूचना

कोरोना की मार झेल रहे देश के सामने ब्लैक फंगस (black fungus) के रूप में नया खतरा आ खड़ा हुआ है। भारत में कोविड-19 से संक्रमित या फिर इससे ठीक हो चुके लोगों में ‘म्यूकोरमायकोसिस’ (mucormycosis) या ब्लैक फंगस के मामले बढ़ रहे हैं।

यह एक गंभीर फंगल इंफेक्शन है, जो मरीज के फेफड़े और दिमाग पर हमला करता है और इसमें मृत्यु दर काफी अधिक है। ब्लैक फंगस से आँखों की रोशनी जाने के मामले भी सामने आए हैं।

जिन कोविड संक्रमित मरीजों को पहले से ही कोई बीमारी हो उनमें ब्लैक फंगस का खतरा बढ़ जाता है। साथ ही जिन मरीजों को डायबिटीज की समस्या हो उनमें ब्लैक फंगस का खतरा काफी अधिक होता है।

क्या है ‘म्यूकोरमायकोसिस’ या ब्लैक फंगस?

म्यूकोरमायकोसिस या ब्लैक फंगस mucormycetes नामक फंगस के कारण होता है। यह शरीर में बहुत तेजी से फैलता है। यह अक्सर साइनस, फेफड़े, त्वचा और मस्तिष्क को प्रभावित करता है। यह मुख्य रूप से उन लोगों को प्रभावित करता है जो कोरोना संक्रमित होने से पहले ही किसी अन्य बीमारी से पीड़ित रहे हों या जिनकी इम्यूनिटी कमजोर है। खासतौर पर डायबिटीज से पीड़ित लोगों में यह ज्यादा देखने को मिल रहा है क्योंकि उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता घट जाती है।

क्या हैं ब्लैक फंगस के लक्षण

भारतीय चिकित्सा विज्ञान परिषद (ICMR) के मुताबिक, ब्लैक फंगस के लक्षणों में नाक बंद होना या साइनस, साँस फूलना, खून की उल्टी, नाक से कालापन/खूनी डिस्चार्ज और गाल की हड्डी में दर्द आदि शामिल हैं। इसके अन्य लक्षणों में चेहरे के एक तरफ दर्द, सुन्नता या सूजन, नाक/तालु के जोड़ पर कालापन होना, दांतों का ढीला होना, दर्द के साथ धुंधला दिखाई देना, बुखार, त्वचा में घाव, खून का थक्का बनना और सीने में दर्द शामिल हैं।।

ब्लैक फंगस क्यों कर रहा है कोविड-19 के मरीजों को प्रभावित?

अनियंत्रित डायबिटीज से पीड़ित लोगों के कोरोना संक्रमित होने का खतरा अधिक होता है। जब ऐसा होता है, तो उनका इलाज स्टेरॉयड से किया जाता है, जो उनकी इम्युनिटी को और प्रभावित करता है। भारत में डॉक्टरों का कहना है कि गंभीर रूप से बीमार कोविड मरीजों के इलाज के प्रयोग किया जा रहा स्टेरॉयड ब्लैक फंगस के पैदा होने की वजह बना सकता है। स्टेरॉयड जहाँ फेफड़ों में जलन को कम करने का काम करता है, तो साथ ही इम्युनिटी को घटाने के साथ ही डायबिटीज से पीड़ित और इससे नहीं पीड़ित दोनों तरह के कोविड मरीजों का शुगर लेवल बढ़ा सकता है। लंबे समय तक आईसीयू में रहने वाले मरीजों में भी ब्लैक फंगस होने का खतरा अधिक रहता है।

क्या है ब्लैक फंगस से बचाव के लिए सावधानियाँ

ब्लैक फंगस के मामले डायबिटीज से पीड़ित लोगों में अधिक सामने आ रहे हैं, तो इसे देखते हुए लोगों को डायबिटीज पर नियंत्रण करने की आवश्यकता है। कोविड-19 मरीजों को डिस्चार्ज होने के बाद ब्लड में ग्लूकोज लेवल पर नजर रखनी चाहिए। यही काम डायबिटीज से पीड़ित लोगों को भी करना चाहिए, भले ही वे कोविड संक्रमित न हों। धूल वाली जगहों पर अनिवार्य रूप से मास्क का प्रयोग करें।

साथ ही कोविड मरीजों के इलाज के लिए स्टेरॉयड का अधिक प्रयोग भी इस बीमारी की वजह बन रहा है। कुछ लोग बिना डॉक्टर की सलाह के ही स्टेरॉयड प्रयोग कर रहे हैं, जो कि घातक साबित हो सकता है। साथ ही ऊपर बताए गए ब्लैक फंगस के लक्षणों में से एक भी नजर आने पर डॉक्टर से संपर्क जरूर करे।

किस राज्य में हैं ब्लैक फंगस के कितने मरीज

रिपोर्ट्स के मुताबिक, अब तक देश के 10 राज्यों में ब्लैंक फंगस के मामले सामने आ चुके हैं। इन राज्यों में गुजरात, महाराष्ट्र, दिल्ली, मध्य प्रदेश, राजस्थान, कर्नाटक, तेलंगाना, यूपी, बिहार और हरियाणा शामिल हैं।

लखनऊ में गुरुवार (13 मई) को एक महिला की ब्लैक फंगस से मौत हो गई, जिसे इस बीमारी से उत्तर प्रदेश में हुई पहली मौत माना जा रहा है।

महाराष्ट्र के स्वास्थ्य मंत्री राजेश टोपे के मुताबिक, राज्य में ब्लैक फंगस के मरीजों की संख्या 2000 तक हो सकती है। महाराष्ट्र के थाणे में बुधवार (12 मई) को दो लोगों की ब्लैक फंगस से मौत हो गई थी।

गुजरात में ब्लैक फंगस के 100 से अधिक मामले सामने आ चुके हैं और राज्य सरकार ने तो ब्लैक फंगस के मरीजों के लिए अलग वॉर्ड बनाने शुरू कर दिए हैं। मध्य प्रदेश में ब्लैक फंगस से दो लोगों की मौत हुई है जबकि इसके 50 से अधिक मामले सामने आए हैं।

वहीं राजस्थान में अब तक ब्लैक फंगस के 14 मामले सामने आए हैं, जबकि तेलंगाना में इसके करीब 60 और कर्नाटक में 30 से अधिक मामले सामने आए हैं।