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लहराया गया खालिस्तानी झंडा, लगे भारत विरोधी नारे: वॉशिंगटन में किसान समर्थन की आड़ में खालिस्तान की माँग

कृषि कानून के विरोध की आड़ में खालिस्तान की माँग सामान्य हो चली है। गणतंत्र दिवस पर पंजाब के किसानों का हिंसात्मक रूप व मनमानी देखने के बाद हर ओर जहाँ पूरे आंदोलन की मंशा पर सवाल उठ रहे हैं, वहीं अमेरिका के वॉशिंगटन डीसी में खालिस्तान समर्थकों ने कानून के विरोध में भारतीय दूतावास के बाहर प्रदर्शन किया और खालिस्तानी झंडे लहराए।

समाचार एजेंसी ANI द्वारा जारी तस्वीरों में देख सकते हैं कि कई लोगों के हाथों में खालिस्तान के झंडे थे। कुछ पर लिखा है कि हम किसान हैं आतंकी नहीं।

वॉशिंगटन के प्रमुख प्रदर्शनकारियों में से एक, नरेंद्र सिंह ने कृषि कानूनों को ‘भारत के मानव अधिकारों और लोकतंत्र का उल्लंघन’ कहा। वह बोले कि वो लोग हर साल 26 जनवरी को काला दिवस के रूप में मनाते हैं, लेकिन इस साल हम भारत में किसानों के साथ एकजुटता से खड़े हैं।

उल्लेखनीय है कि अमेरिका में खालिस्तानी समर्थक समय-समय पर अपनी ओर से खालिस्तान की माँग करते रहते हैं। 1 माह पहले भारतीय दूतावास के पास महात्मा गाँधी की प्रतिमा पर खालिस्तान का झंडा लहराया गया था। जिसे देख इस बार दूतावास और गाँधी मूर्ति के चारों ओर सुरक्षा बढ़ा दी गई थी।

यदि भारत में 26 जनवरी को हुई अराजकता पर बात करें तो मालूम हो कि गणतंत्र दिवस पर कथित किसानों के हिंसक प्रदर्शन के कारण 153 पुलिसकर्मी घायल हो गए हैं। इनमें से 2 आईसीयू में भर्ती हैं। पुलिस ने कल की घटना के संबंध में 7 एफआईआर दर्ज की हैं।

वहीं दिल्ली की सीमाओं पर अब अर्धसैनिक बलों की तैनाती कर दी गई है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने शाम को दिल्ली के पुलिस कमिश्नर, केंद्रीय गृह सचिव और IB के चीफ से मुलाकात कर स्थिति की समीक्षा की।

केंद्रीय गृह मंत्रालय पूरे घटनाक्रम पर कड़ी नजर रख रहा है। ITO, नांगलोई कर गाजीपुर में अधिक संख्या में जवानों की तैनाती होगी। 10 CRPF की कंपनियाँ और 5 अन्य सशस्त्र बलों की कंपनियाँ दिल्ली के लिए रवाना हो गई हैं।

ट्रैक्टर पलटने के बाद जिंदा था ‘किसान’, प्रदर्शनकारी अस्पताल नहीं ले गए… न पुलिस को ले जाने दिया: ‘Times Now’ का खुलासा

मंगलवार (जनवरी 26, 2021) को गणतंत्र दिवस के मौके पर देश की राजधानी में घुस कर ‘किसान’ प्रदर्शनकारियों ने दिन भर हिंसा की। इस दौरान एक प्रदर्शनकारी की मौत भी हो गई। वो ट्रैक्टर से स्टंट मारते हुए पुलिस बैरिकेडिंग तोड़ रहा था, लेकिन अपनी ही ट्रैक्टर पलटने के कारण खुद उसके नीचे आ गया। अब ‘टाइम्स नाउ’ की पद्मजा जोशी ने इस घटना को लेकर बड़ा खुलासा किया है।

उन्होंने कहा, “इस महीने की शुरुआत में जब सुप्रीम कोर्ट इस मामले पर सुनवाई कर रहा था तो CJI बोबडे ने कहा था कि अगर कुछ गलत हो जाता है तो उस खून के भागी हम लोग नहीं बनना चाहते। आज जो भी हुआ है, वो इन्हीं प्रदर्शनकारियों के हाथों पर लगा हुआ खून है। एक 24 साल के युवा किसान की मृत्यु हो गई और लोगों ने इसे पुलिस के अत्याचार के रूप में दुष्प्रचारित किया। लेकिन, वास्तविकता में जो हुआ वो बात कुछ और ही है।”

बता दें कि ‘Times Now’ के प्रियांक त्रिपाठी मौके पर मौजूद थे और उन्होंने अपनी आँखों से इस हादसे को देखा। उन्होंने देखा कि जब खून से लथपथ उक्त किसान को दिल्ली पुलिस वहाँ से निकाल कर बचाने की कोशिश कर रही थी और अस्पताल लेकर जा रही थी, तब वहाँ मौजूद ‘किसान प्रदर्शनकारियों’ ने ऐसा नहीं करने दिया। पद्मजा जोशी ने संवाददाता प्रियांक के हवाले से ये खुलासा किया और इसे ‘भयावह वास्तविकता’ करार दिया।

‘टाइम्स नाउ’ की रिपोर्ट में प्रियांक को मौके पर मौजूद देखा जा सकता है और वो पूरे घटनक्रम की कमेंट्री कर रहे हैं। इस दौरान उन्होंने दिखाया कि कैसे उक्त किसान प्रदर्शनकारी की ट्रैक्टर पलट गई, जिसके बाद वो बेहोश हो गया। ट्रैक्टर से तेल निकल कर सड़क पर बह रहा था। लेकिन वहाँ ज्यादा से ज्यादा प्रदर्शनकारी जमा हो जाते हैं और वो सभी वहाँ स्थित भाजपा के दफ्तर के पास इकट्ठा होते हैं।

इस दौरान उन्होंने बताया कि इन ‘किसान’ प्रदर्शनकारियों ने दिल्ली पुलिस पर जम कर पत्थरबाजी भी की है और वो फिर से पथराव पर उतारू हैं, जबकि पुलिस उन्हें रोकने की कोशिश में लगी हुई है। उन्होंने भाजपा दफ्तर को भी निशाना बनाया।

लाइव वीडियो में संवाददाता ने बताया कि जहाँ एक्सीडेंट के बाद किसान बेहोश पड़ा था, वहाँ अन्य प्रदर्शनकारी लाठी और तलवार लेकर खड़े होकर पुलिस को धमका रहे थे। उसे इलाज के लिए नहीं ले जाने दिया जा रहा था। ट्रैक्टर पलटने से घायल किसान का पुलिस इलाज कराना चाहती थी, लेकिन प्रदर्शनकारियों के चलते उसकी मौत हुई।

इसी दौरान ‘इंडिया टुडे’ के पत्रकार राजदीप सरदेसाई ने एक और फेक न्यूज़ फैला दी थी और पोल खुलने पर अपना ट्वीट चुपके से डिलीट भी कर दिया। उन्होंने लिखा था कि लिखा कि इसकी मौत पुलिस की गोली से हुई है। लेकिन, असलियत ये थी कि ड्राइवर ने काफी तेज रफ्तार से चल रहे ट्रैक्टर को अचानक से मोड़ दिया, जिसकी वजह से संतुलन बिगड़ गया और ट्रैक्टर पलट गया। अब ट्विटर पर ‘अरेस्ट राजदीप सरदेसाई’ ट्रेंड हो रहा है।

11.5% की आर्थिक वृद्धि दर, 2021 में भारत के लिए IMF का अनुमान: एकमात्र बड़ा देश, जो बढ़ेगा दहाई अंकों के साथ

अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) ने भारत की अर्थव्यवस्था को अगले वित्तीय वर्ष (2021-22) में 11.5 प्रतिशत तक उछाल देने का अनुमान लगाया। 26 जनवरी 2021 को IMF ने अपनी ताजा वर्ल्ड इकॉनमिक आउटलुक रिपोर्ट में यह दर्शाया है।

दुनिया जब कोरोना वायरस महामारी से लड़ रही है तो बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में भारत एकमात्र देश है, जिसकी आर्थिक वृद्धि दर इस साल दहाई अंक में होने का अनुमान है। वैश्विक परिदृश्य देखें तो यह भारत के लिए बड़ी खबर है। साल 2021 के लिए वैश्विक ग्रोथ 5.5% रहने का अनुमान इसी IMF रिपोर्ट में है।

चीन से भी आगे

विकास दर की बात करें तो भारत चीन से भी आगे रहने वाला है। साल 2021 में 8.3% की अनुमानित विकास दर के साथ चीन भारत के बाद दूसरी सबसे तेजी से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था होगी।

तेजी से बढ़ती भारत की अर्थव्यवस्था 2022 में भी जारी रहेगी। साल 2022 में भारत की वैश्विक विकास दर 6.8% रहने का अनुमान लगाया गया है, जबकि चीन की विकास दर 5.6% रह सकती है।

पूरी दुनिया का हाल

IMF की वर्ल्ड इकॉनमिक आउटलुक रिपोर्ट के अनुसार (साल 2021 के लिए) अमेरिकी के लिए 5.1, जापान के लिए 3.1, इंग्लैंड के लिए 4.5, चीन के लिए 8.1, रूस के लिए 3.0 और सऊदी अरब के लिए 2.6 प्रतिशत की विकास दर का अनुमान है।

इसी रिपोर्ट के अनुसार साल 2022 की बात करें तो फ्रांस में 4.1, इटली में 3.6, स्पेन में 4.7, जापान में 2.4, इंगलैंड में 5, कनाडा में 4.1, चीन में 5.6, सऊदी अरब में 4, ब्राजील में 2.6 और दक्षिणी अफ्रीका में 1.4 प्रतिशत की विकास दर का अनुमान है।

153 पुलिसकर्मी घायल, 7 FIR दर्ज: किसी का सर फटा तो कोई ICU में, राकेश टिकैत ने पुलिस को ही दिया दोष

दिल्ली में गणतंत्र दिवस के मौके पर ‘किसान’ प्रदर्शनकारियों ने जिस तरह से ‘शर्मतंत्र’ का प्रदर्शन किया, उस अराजकता की वीडियो एवं तस्वीरें दुनिया भर में भारत का नाम खराब कर रही हैं। अब दिल्ली पुलिस ने इन मामलों को लेकर 7 FIR दर्ज की है। दिन भर चले हिंसा के इस खेल में 153 पुलिसकर्मी घायल हो गए हैं। किसानों ने जगह-जगह पुलिस के साथ झड़प की, जिसमें ये घायल हुए। 2 पुलिसकर्मी लोकनायक अस्पताल और सुश्रुत ट्रॉमा सेंटर के ICU में भर्ती हैं।

अधिकतर पुलिसकर्मियों के हाथ-पाँव और सिर पर चोटें आई हैं। एक वीडियो में देखा जा सकता है कि कैसे लाल किले में घुसे लाठी-डंडों और तलवारों से लैस प्रदर्शनकारियों के खदेड़ने के कारण पुलिस के जवानों को दीवार कूद-कूद कर जान बचानी पड़ रही है। वहाँ पुलिस के जवानों की लाठी से पिटाई की गई है। इसके बाद ITO और नांगलोई में हिंसा देखने को मिली। दोपहर के कुछ बाद तक घायल पुलिसकर्मियों का आँकड़ा 86 था, जो शाम तक 153 हो गया

दिल्ली पुलिस के एडिशनल PRO अनिल मित्तल ने बताया कि अधिकतर पुलिसकर्मियों को लाल किला और नांगलोई चौक इलाके में चोटें आई हैं और वो जख्मी हुए हैं। नॉर्थ जिले में 41, ईस्ट में 34, वेस्ट में 27, द्वारका में 30, शाहदरा में 5, आउटर-नॉर्थ में 12 और साउथ जिले में 4 पुलिसकर्मी जख्मी हुए। लोकनायक और सुश्रुत के अलावा लेडी हार्डिंग मेडिकल कॉलेज, अरुणा आसफ अली और लाल बहादुर शास्त्री अस्पतालों में इनका इलाज चल रहा है।

दिल्ली गेट स्थित दिल्ली सरकार के लोक नायक हॉस्पिटल में सबसे ज्यादा पुलिसकर्मी भर्ती हैं। वहाँ के एक वरिष्ठ डॉक्टर ने बताया कि वहाँ 11 जख्मी पुलिसकर्मी भर्ती हुए हैं। 40 वर्ष के एक पुलिसकर्मी के सिर में गंभीर रूप से जख्म हुआ है। उन्हें ICU में निगरानी के लिए रखा गया है। CT स्कैन रिपोर्ट सामान्य आई है। उन्हें 1 दिन और ICU में रहना पड़ेगा। सुश्रुत में 58 पुलिसकर्मी भर्ती हुए थे, जिनमें से कई डिस्चार्ज भी हुए हैं।

वहाँ भी एक पुलिसकर्मी के सिर में गंभीर चोट आई है, जिसके बाद वो शॉक की अवस्था में हैं। पलवल-फरीदाबाद सीमा पर भी किसान प्रदर्शनकारियों ने पुलिस के साथ हिंसा की। पलवल के एसपी और उनके एक साथी अधिकारी पर तो लगभग ट्रैक्टर चढ़ा ही दिए गए थे, लेकिन वो बाल-बाल बचे। कई बार निवेदन के बावजूद ‘किसानों’ ने पुलिस की एक न सुनी। वहाँ ट्रैक्टर रैली की अनुमति ही नहीं थी। पुलिस लगातार किसान नेताओं से बातचीत की कोशिश करती रही।

दिल्ली के पूर्वी जिले में इस सम्बन्ध में 3 FIR दर्ज की गई है। द्वारका और शाहदरा जिले में एक-एक मामला दर्ज किया गया है। पुलिसकर्मियों की पिटाई, लाल किले में अतिक्रमण, वाहनों की तोड़-फोड़ और हिंसा के मामले में अभी और प्राथमिकी दर्ज होने वाली है। जिस एक किसान की मौत हुई है, वो खुद ट्रैक्टर से बैरिकेडिंग तोड़ने के लिए स्टंट्स करते हुए मारा गया, क्योंकि उसका ट्रैक्टर ही पलट गया। मीडिया के एक वर्ग ने अफवाह फैलाई थी कि वो पुलिस की गोली से मरा।

प्रस्तावित ट्रैक्टर रैली के सम्बन्ध में दिल्ली में पुलिस ने किसान नेताओं के साथ कई दौर की बैठकें कर के उन्हें रूट समझाया था। शाम को राकेश टिकैत ने पुलिस पर गलत रूट बताने के आरोप लगाते हुए कहा कि ‘बेचारे’ किसानों को रास्ता नहीं पता था, इसीलिए वो भटक गए। सुबह 8:30 बजे ही सिंघु सीमा पर 7000 ट्रैक्टर एकत्र हो गए थे। उनकी अगुआई निहंग कर रहे थे। लुटियन जोन में घुसने के लिए पुलिस के जवानों को पीटा गया।

दिल्ली की सीमाओं पर अब अर्धसैनिक बलों की तैनाती कर दी गई है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने शाम को दिल्ली के पुलिस कमिश्नर, केंद्रीय गृह सचिव और IB के चीफ से मुलाकात कर स्थिति की समीक्षा की। केंद्रीय गृह मंत्रालय पूरे घटनाक्रम पर कड़ी नजर रख रहा है। ITO, नांगलोई कर गाजीपुर में अधिक संख्या में जवानों की तैनाती होगी। 10 CRPF की कंपनियाँ और 5 अन्य सशस्त्र बलों की कंपनियाँ दिल्ली के लिए रवाना हो गई हैं।

लालकिला में देर तक सहमें छिपे रहे 250 बच्चे, हिंसा के दौरान 109 पुलिसकर्मी घायल; 55 LNJP अस्पताल में भर्ती

दिल्ली में किसान ट्रैक्टर रैली का सबसे बुरा प्रभाव पुलिसकर्मियों पर पड़ा है। मंगलवार (जनवरी 26, 2021) सुबह से हुई इस हिंसा में घायल हुए पुलिसकर्मियों की संख्या 109 हो गई है। दिल्ली पुलिस ने एक बयान जारी करते हुए कहा है कि हिंसा में शामिल लोगों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाएगी। इससे पहले जारी बयान में इस हिंसा में 83 पुलिसकर्मी घायल होने की बात सामने आई थी, जिनमें से 55 पुलिसकर्मी LNJP अस्पताल में भर्ती हैं। दिल्ली पुलिस ने इसकी जानकारी दी। बताया गया कि ये पुलिसकर्मी आईटीओ और लाल किले में किसानों से टकराव के दौरान घायल हुए हैं। पुलिसकर्मियों को एलएनजेपी हॉस्पिटल में भर्ती किया गया है। किसानों को काबू करने में लगे पुलिसकर्मी खुद हिंसा का शिकार हो गए। सुबह से चल रही रैली में किसानों ने पूरी दिल्ली को हिला के रख दिया। किसानों के दंगाई रूप ने राजधानी में बवाल मचा दिया।

दिल्ली के ज्वाइंट पुलिस कमिश्नर आलोक कुमार ने कहा कि ट्रैक्टर रैली में पुलिस कर्मियों के साथ मारपीट करने वालों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाएगी।

वहीं, दिल्ली पुलिस के पीआरओ ईश सिंघल ने बताया कि प्रदर्शनकारी कुछ स्थानों पर हिंसक हो गए। उपद्रवियों के हमले में कई पुलिस कर्मी घायल हो गए। उपद्रवियों ने इस दौरान सार्वजनिक संपत्तियों को भी नुकसान पहुँचाया। पुलिस ने संयम बरता और जरूरत पड़ने पर ही बल का प्रयोग किया।

पीआरओ ईश सिंघल ने कहा, “किसानों के साथ हुई मीटिंग में कुछ रूट तय किए गए थे। दिल्ली पुलिस ने उसके हिसाब से अपना बंदोबस्त किया। मगर किसान आंदोलनकारी ने इस रूट को नहीं माना। वो तय समय से पहले ही चल पड़े। कई जगह हिंसक घटनाओं को भी अंजाम दिया। जिसमें दिल्ली पुलिस के कई लोग घायल हुए हैं और सार्वजनिक संपत्तियों का भी नुकसान हुआ है। दिल्ली पुलिस ने फिर भी काफी संयम रखा और जरूरत के हिसाब से ही बल का इस्तेमाल किया। अभी भी मेरी किसान प्रदर्शनकारियों से यही अपील है कि वो जो तय रास्ते हैं, उसी से वापस लौट जाएँ और शांति बनाए रखें।”

बता दें कि किसान संगठनों से कई दौर की बातचीत के बाद दिल्ली में ट्रैक्टर परेड का रूट और समय तय किया गया था। लेकिन किसानों ने समय से पहले ही मनमर्जी से रूट बनाकर ट्रैक्टर परेड शुरू कर दी और कई जगहों पर हिंसा फैलाई, जिसमें कई पुलिसकर्मी घायल हो गए।

सूत्रों के मुताबिक 250 बच्चे, जो 26 जनवरी की परेड में हिस्सा लेने आए थे, वे लाल क़िले में फँस गए थे, डरे सहमे बच्चे क़रीब तीन घंटे तक ठिठुरते हुए में छिपे रहे, रोते रहे, बिलखते रहे, आंदोलनकारियों के हुड़दंग को देख डर से काँपते रहे, थोड़ी देर पहले पुलिस ने उन्हें रेस्क्यू किया।

केंद्र के नए कृषि कानूनों के खिलाफ आंदोलनरत किसानों की मंगलवार (जनवरी 26, 2021) को गणतंत्र दिवस के मौके पर राजधानी में ट्रैक्टर परेड दौरान कई जगहों पर हिंसा हुई है। किसान तय रूट को ना मानते हुए आईटीओ और लाल किले जा पहुँचे। लाल किले पर कुछ किसानों ने अपना झंडा भी फहरा दिया। जिसके बाद पुलिस ने किसानों पर लाठीचार्ज करते हुए आँसू गैस के गोले दागे।

ट्रैक्टर परेड में हुई हिंसा पर दिल्ली पुलिस की ओर से कहा गया है कि आज के ट्रैक्टर रैली के लिए दिल्ली पुलिस ने किसानों के साथ तय हुए शर्तों के अनुसार काम किया और आवश्यक बंदोबस्त किया। दिल्ली पुलिस ने अंत तक काफी संयम का परिचय दिया, परन्तु आंदोलनकारियों ने तय शर्तों की अवहेलना की और तय समय से पहले ही अपना मार्च शुरू कर दिया और साथ ही आंदोलनकारियों ने हिंसा व तोड़-फोड़ का मार्ग चुना, जिसको देखते हुए दिल्ली पुलिस कानून और व्यवस्था बनाए रखने के लिए संयम के साथ ज़रूरी कदम उठाए। इस आंदोलन से जन संपत्ति को काफी नुकसान हुआ है और कई पुलिसकर्मी घायल हुए हैं।

दिल्ली पुलिस मुख्यालय के सामने रखे बैरिकेड्स को किसानों ने ट्रैक्टर से तोड़ दिया। मध्य दिल्ली में बैरिकेड तोड़ने के साथ ही पुलिस वाहनों को भी किसानों ने क्षतिग्रस्त कर दिया। आईटीओ में कुछ प्रदर्शनकारी एक पुलिसकर्मी को निर्ममता से पीट रहे थे। इस बीच एक हिस्से ने उस पुलिसकर्मी को बचाया भी। ट्रैक्टर पर बैठे प्रदर्शनकारी ने पुलिसकर्मियों पर ट्रैक्टर चढ़ाकर कोशिश की। 

आईटीओ में खड़ी सरकारी बसों में तोड़फोड़ की गई। यही नहीं, आईटीओ में ही डीटीसी बस को पलटने का प्रयास हुआ। घोड़े पर बैठे निहंगों ने बैरिकेडिंग तोड़ दिया। इस प्रदर्शन ने किसानों के बेशकीमती ताज पर एक नायाब ‘काला’ अध्याय जोड़ा है। यह सब कुछ हो रहा है लेकिन किसान नेताओं का कहना है कि सब शांतिपूर्ण चल रहा है।

Video: किसानों के हमले में दीवार से एक-एक कर गिरते रहे पुलिसकर्मी, 109 घायल

‘किसान’ प्रदर्शनकारियों द्वारा आज दिल्ली स्थित लाल किले (Red Fort) पर पुलिस पर किए हमले का एक वीडियो सामने आया है। समाचार एजेंसी ANI द्वारा शेयर किए गए इस वीडियो में देखा जा सकता है कि भीड़ द्वारा किए गए हमले से पुलिसकर्मी एक-एक कर लाल किले की दीवार से नीचे गिरते जा रहे हैं।

पत्रकार सुशांत सिन्हा ने भी एक वीडियो शेयर करते हुए ट्वीट में लिखा है, “CAA के बाद ये दूसरा मौका है जब देश की राजधानी जल रही, देश का सिर शर्म से झुक रहा है और लोग पूछने पर मजबूर हैं कि गृहमंत्री कर क्या रहे हैं। तो अगर आप चिरनिद्रा से जाग जाएँ तो कृपाकर कुछ ऐक्शन लें ताकि देश में कानून का राज है पता चले।”

इस वीडियो में भी किसान प्रदर्शनकारियों को पुलिस का पीछा करते हुए उन्हें भगाते देखा जा सकता है।

दिल्ली में मंगलवार (जनवरी 26, 2021) सुबह से हुई इस हिंसा में घायल हुए पुलिसकर्मियों की संख्या 109 हो गई है। दिल्ली पुलिस ने एक बयान जारी करते हुए कहा है कि हिंसा में शामिल लोगों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाएगी।

किसानों के समूहों द्वारा लाल किले पर अपना झंडा फहराने के बाद गृहमंत्री अमित शाह ने दिल्ली में कानून और व्यवस्था की स्थिति का जायजा लिया। प्रदर्शनकारियों को अब पुलिस ने लाल किला क्षेत्र से हटा दिया है। हिंसा के कारण दिल्ली के कुछ हिस्सों में इंटरनेट सेवाएँ भी निलंबित कर दी गईं।

गणतंत्र दिवस की सुबह से ही दिल्ली की सीमाओं पर अराजकता और हाथापाई के दृश्य सामने आते रहे। किसानों के समूहों ने बैरिकेड्स और पुलिस चौकियों को तोड़ दिया और राष्ट्रीय राजधानी में प्रवेश किया। पुलिस ने समूहों को नियंत्रण में लाने के लिए दिल्ली के मुकरबा चौक, नाँगलोई में आँसू गैस का इस्तेमाल किया। इसके अलावा, आईटीओ, अक्षरधाम में भी झड़पें हुईं।

बिहारी-गुजराती-तमिल-कश्मीरी किसान हो तो डूब मरो… क्योंकि किसान सिर्फ पंजाबी-खालिस्तानी होते हैं, वही अन्नदाता हैं

किसानों की परिभाषा आज दिल्ली की सीमाओं से बैरिकेड तोड़कर लाल किला पहुँचने के बाद मानक बन गई है। अब से शायद किसान वही होगा जो पंजाब से संबंध रखता होगा और जिसकी विचारधारा में खालिस्तानी भी खुद को जुड़ा हुआ महसूस कर पाएँगे। यदि इसके अलावा कोई राजस्थान, मध्यप्रदेश, कश्मीर, तमिलनाडु, यूपी, बिहार का किसान खुद को ‘अन्नदाता’ कहता पाया गया तो उसे वामपंथी व मीडिया गिरोह वहीं खबरदार कर देगें।

आखिर इतने दिनों से जो नैरेटिव इस गिरोह ने भुनाया उसका अंत इतने सारे राज्यों के अन्नदाता चुप बैठके कर दें! ये कैसे हो सकता है? आज राष्ट्रीय राजधानी में भड़की अराजकता देखने के बाद दूसरे राज्यों के कृषको को भले ही ये लगे कि अच्छा हुआ जो वो विपक्ष के भ्रम जाल में नहीं फँसे। 

लेकिन, गिरोह के लोगों के मुताबिक आज यही वो क्षण है जब दूसरे राज्य के किसानों को चेहरे पर संतुष्टि का भाव दिखाने से ज्यादा चुल्लू भर पानी में डूब मरने के लिए व्याकुल होना चाहिए। या मुमकिन हो तो खुद ही अपने ‘किसान’ होने की उपाधि उन प्रदर्शनकारियों को लाकर दे देनी चाहिए, जो खेती का ‘क-ख-ग’ न जानते हुए भी ढाई महीने से दिल्ली सीमा पर भीड़ बढ़ाते रहे और उनके कारण सोशल मीडिया पर एक दिशा में एजेंडा फलता-फूलता रहा।

इस बीच मध्यप्रदेश में जो किसानों ने नए कृषि कानूनों पर खुशी व्यक्त करके किसान कौम की थू-थू कराई है उसे तो शायद ही कभी ‘पूरे देश के अन्नदाता’ अर्थात दिल्ली की सीमाओं पर एकत्रित सच्चे किसान भुला पाएँ। राजस्थान में भी देखिए सत्ता में कॉन्ग्रेस होने के बावजूद पंचायत चुनाव में बीजेपी का बोल बाला हो गया। ये उन ग्रामीणों की अपनी कौम से दगाबाजी नहीं तो क्या है। आखिर कॉन्ग्रेस ने क्या कमी छोड़ी होगी भड़काने में! फिर भी अपने विवेक पर इस बात को समझ पाए कि उनके लिए कौन सी स्कीम सही है कौन सी नहीं।

आम जन के लिए संभव है कि इन ढाई महीनों के बीच में कई बार मन में ख्याल आया हो कि आखिर केवल गैर भाजपा शासित प्रदेशों से किसान इस आंदोलन का हिस्सा क्यों हो रहे हैं। अगर नए कृषि कानून इतने ही गलत हैं तो एक कृषि प्रधान देश से तो फिर कोने-कोने से आंदोलन होने चाहिए और आपके कान में न तो कहीं अन्य जगह से आंदोलन की आवाज पहुँची न उस पर हुई मीडिया खबर!

दरअसल, वास्तविकता ये है कि आप इतने दिनों से एक ऐसी भीड़ के जमावड़े को किसान का आंदोलन कहते रहे। जिसकी परिभाषा वामपंथी मीडिया गिरोह और विपक्षियों ने गढ़ी और जिसका पूरा ड्राफ्ट एक साल पहले हुए शाहीन बाग मॉडल के आधार पर तैयार हुआ।

तुलना कीजिए कि 1 साल पहले जैसे भारतीय मुसलमानों को इस बात को जानने में कोई दिलचस्पी नहीं थी कि सीएए/एनआरसी से भारतीय मुसलमानों का कोई नुकसान होगा। वैसे ही इस बार भी हालत यही है। तमाम राज्य के किसानों को मालूम है कि मंडी को लेकर आए नए नियम उन्हें अपनी आय तय करने की आजादी देंगे। मगर, दिल्ली सीमा पर प्रदर्शनकारी बार बार APMC और MSP को लेकर प्रश्न खड़े करते रहे। नतीजतन, धीरे-धीरे वहाँ इतनी भीड़ इकट्ठा हो गई कि कुछ लोग तो यही सोचने में लटक गए कि इतने सारे बुजुर्ग गलत थोड़ी हो सकते हैं।

गणतंत्र दिवस के दिन देश की राजधानी ने साल के साथ उन घटनाओं को दर्ज किया है जिसकी कल्पना भी कोई नहीं कर सकता था। बाहरी ताकतों से देश को बचाने के लिए सुरक्षाबल अलर्ट थे, लेकिन किसे उम्मीद थी ऐसा दंगा वो मचाएँगे जो कल तक शांतिपूर्ण ट्रैक्टर रैली निकालने की कसमें खा रहे थे। किसान एकता दिखाने की बात कर रहे थे।

ऐसा प्रदर्शन जिसमें कॉन्ग्रेस और आम आदमी पार्टी अपनी समांतर राजनीति करते रहे। वामपंथी कट्टरपंथी दिल्ली हिंसा के आरोपितों की रिहाई की माँग में जुट गए और खालिस्तानियों ने खुलेआम झंडा फहराहने पर इनाम घोषित कर दिया। तो सोचिए उस प्रदर्शन के क्या मायने थे और क्यों इसे जारी रखा जा रहा था? असली किसान की माँग ये तो नहीं होतीं।

यकीन करिए, आज दिल्ली के कोने-कोने से आ रही तस्वीर बिलकुल हैरान करने वाली नहीं है। शुरुआत में ही इस बात के कयास लग गए थे कि पिछले साल की भाँति कहीं इस साल भी राजधानी संघर्ष से न जूझे। आज वह अटकलें सही साबित हुईं। पहले पुलिस को झूठा आश्वासन देकर दिल्ली में एंट्री की गई। सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाया गया। फिर उन्हें घेर घेर कर मारा गया… मगर, सोशल मीडिया के क्रांतिकारियों के पास बात जब इस हिंसा के ख़िलाफ़ आपत्ति दर्ज कराने की आई तो मीडिया के एक तय ध़ड़े ने फिर मोर्चा संभालते हुए ये दिखा दिया कि पुलिस ने अन्नदाता पर हमला किया और बाद में वह भड़के।

आज जिन दिल्ली सीमा पर बैठे कथित किसानों के लिए मीडिया की संवेदनाएँ जिस तरह से निकल निकलकर बाहर आ रहीं है। वह क्यों मानेंगे कि आखिर यूपी बिहार, तमिल, और कश्मीर में भी खेती करने वाले अन्नदाता हैं जिन्हें अपनी ऊपज बेचने की चिंता उतनी ही है जितनी पंजाब के अन्नदाताओं को। उनके लिए तो वही सच है जिनसे उन्हें ब्रेकिंग न्यूज मिले।

मीडिया इतने दिनों से आपको ये दिखाने को आतुर है कि दिल्ली की ठंड में ठिठुरने वाले सैंक़़ड़ों किसानों की हालत की जिम्मेदार भाजपा है। लेकिन मीडिया आपको उनसे रू-ब-रू नहीं करवाएगा जो कृषि कानून आने से पहले भी और बाद में भी सुबह सुबह ठंड में घर से निकल कर रोज अपने खेत जाते हैं और जिनकी बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए मोदी सरकार पर्याप्त प्रयास कर रही है।

वो ये नहीं बताएगा आपको कि जो कॉन्ग्रेस इस मुद्दे पर किसानों को भड़का रही है, उसके अपने राज्य में कितने किसान कर्ज के तले दबकर सांस नहीं ले पा रहे। ये मीडिया आपको ये भी नहीं बताएगा कि मोदी सरकार कि प्राथमिकताओ में किसान का उत्थान सर्वोपरि है और जो कानून वो लेकर आए हैं वह दशकों की माँग थी ।

जर्मनी, आयरलैंड, स्पेन आदि में भी हो चुकी हैं ट्रैक्टर रैलियाँ, लेकिन दिल्ली वाला दंगा कहीं नहीं हुआ

आज गणतंत्र दिवस के मौके पर किसान प्रदर्शनकारियों द्वारा बैरिकेड तोड़ दिए गए, पुलिसकर्मियों पर हमला किया गया और लाल किले पर तिरंगा का अपमान कर सिख झंडा फहरा दिया गया। मंगलवार (जनवरी 26, 2021) के दिन यह सब ट्रैक्टर रैली के नाम पर किया गया क्योंकि सुप्रीम कोर्ट की सलाह के बाद दिल्ली पुलिस की ओर से किसानों को कुछ जगहों पर ट्रैक्टर रैली निकालने की इजाजत दी गई थी।

सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली में किसानों की प्रस्तावित ट्रैक्टर परेड पर रोक लगाने से इनकार करते हुए कहा था कि ट्रैक्टर परेड को दिल्ली में होने देना है या नहीं, ये सुरक्षा व्यवस्था से जुड़ा मामला है और इसका निर्णय दिल्ली पुलिस को करना है। मंगलवार सुबह से ही दिल्ली की अलग-अलग सीमाओं पर हजारों की संख्या में प्रदर्शन कर रहे किसानों ने ट्रैक्टरों के साथ दिल्ली में धावा बोल दिया, जिसमें तेज रफ्तार से ट्रैक्टर चला रहे एक व्यक्ति की स्टंट दिखाते हुए मौत भी हो गई।

लेकिन क्या अन्य देशों में भी भारत के जैसे ही विरोध प्रदर्शन के नाम पर इसी तरह से हिंसक ट्रैक्टर रैलियाँ की जाती हैं? आयरलैंड, जर्मनी, स्पेन में भी कई मौकों पर ट्रैक्टर रेलियाँ आयोजित की जाती हैं।

विरोध के ये तरीके यूरोपीय देशों तक ही सीमित नहीं हैं; जापान, न्यूज़ीलैंड और दक्षिण अफ्रीका समेत कई राष्ट्रों में समय-समय पर ट्रैक्टर परेड होती रही हैं। जर्मनी में किसानों द्वारा कानूनों के विरोध में ट्रैक्टर परेड का आयोजन किया गया था। लन्दन, स्पेन, नीदरलैंड जैसे देशों में ट्रैक्टर रेलियों का इस्तेमाल विरोध प्रदर्शन के मॉडल के रूप में किया जाता रहा है।

‘ट्रैक्टर परेड’ का यूरोपीय मॉडल

विदेशों में होने वाले विरोध प्रदर्शन के तरीकों से अलग, भारत में होने वाले विरोध प्रदर्शनों का स्वरुप पिछले कुछ वर्षों में बदला है। खासकर गत वर्ष हुए नागरिकता कानून के विरोध प्रदर्शनों के बाद से भारत में लिबरल गिरोह और वामपंथियों ने मजहबी उन्मादियों के साथ मिलकर विरोध प्रदर्शनों की नई परिभाषा गढ़ी है।

बीते पाँच सालों के दौरान लग्जमबर्ग से लेकर लंदन और बर्लिन से लेकर डबलिन तक कई यूरोपीय शहरों में ट्रैक्टर परेड की घटनाएँ सामने आती रहीं। इन ट्रैक्टर रैलियों का उद्देश्य भी किसानों और कृषि संबंधी विषयों पर अपना विरोध दर्ज करना था।

स्पेन में भी वर्ष 2017 में एक शो में सैकड़ों किसानों ने बार्सिलोना से ट्रैक्टर रैली का आयोजन किया था। तब ये किसान स्पेन से अलग होने के लिए वे कैटेलोनिया का समर्थन कर रहे थे और स्पेन से अलग देश बनाने के लिए कैटलोनिया में जारी जनमत संग्रह के बीच हिंसक झड़पें भी हुई थीं। लेकिन दिल्ली में जो आज हुआ, स्पेन के किसानों ने वो नहीं किया, हालाँकि वो भी अन्नदाता ही थे।

वर्ष 2014 में जर्मनी की कृषि नीतियों, विशेष रूप से औद्योगिक खेती के खिलाफ विरोध करने के लिए लगभग 50 किसानों ने बर्लिन से अपने ट्रैक्टर परेड का आयोजन किया। इस परेड में लगभग 10,000 प्रदर्शनकारियों ने जर्मन चांसलर भवन के बाहर अपना विरोध दर्ज किया था। उनका नए पर्यावरण नियमों के खिलाफ वे कहते हैं कि उनकी आजीविका को खतरा है। नवम्बर 2019 में जर्मनी के बर्लिन शहर में भी हज़ारों की संख्या में ट्रैक्टर सवार किसान पहुँचे थे।

फ्रांस में वर्ष 2015 के सितम्बर माह में खाद्यान के गिरते दामों और सस्ते आयात के खिलाफ विरोध जताने के लिए ‘1000 ट्रैक्टर सेट मोई’ प्रदर्शन का आयोजन किया गया था, जिसमें बड़ी संख्या में किसान अपने ट्रैक्टरों के साथ पेरिस के लिए रवाना हुए।

हालाँकि, किसानों की ट्रैक्टर रैलियों का अनुभव सिर्फ पेरिस के ही पास नहीं था; इसी दौरान लग्जमबर्ग में भी दूध और कृषि उत्पादों के दामों में गिरावट और सरकार से मदद की माँग को लेकर किसानों ने ट्रैक्टरों से मुख्य मार्गों की नाकेबंदी कर डाली थी। ब्रसल्स में भी योरोपीय संघ मुख्यालय के बाहर ट्रैक्टर पर सवार होकर आए किसानों और पुलिस के बीच झड़पें हुई थीं।

वहीं, नीदरलैंड्स में अक्टूबर, 2019 में ट्रैक्टर परेड का आयोजन हुआ था। तब भारी संख्या में किसानों ने सरकार की नीतियों का विरोध जताने के लिए ट्रैक्टर परेड का विकल्प चुना था। नाइट्रोजन उत्सर्जन कम करने के लिए मुर्गियों और सुअरों की संख्या कम करने सम्बन्धी नियमों का विरोध कर रहे किसान बड़ी संख्या में नीदरलैंड्स की राजधानी हेग पहुँच गए थे।

आयरलैंड की राजधानी डबलिन में नवम्बर 2019 में शहर की घेराबंदी ट्रैक्टरों से की गई थी। ट्रैक्टर रैली का नज़ारा नवम्बर, 2019 से लेकर जनवरी, 2020 तक जारी रहा। वहीं, अक्टूबर, 2020 में ब्रितानी कृषि कानूनों पर नाराजगी व्यक्त करते हुए ब्रिटेन के सैकड़ों किसान ट्रैक्टरों के साथ लंदन उतर आए थे। किसानों की माँग ब्रेग्जिट के बाद ब्रिटेन के भावी कारोबारी समझौतों में किसानों के हितों के संरक्षण की माँग कर रहे थे।

दिल्ली की ट्रैक्टर परेड

दिल्ली में जो आज के गणतंत्र दिवस के अवसर पर किसानों द्वारा ट्रैक्टर परेड के नाम पर किया गया, वह वास्तव में ऐतिहासिक है। लाल किले पर प्रदर्शनकारियों ने अपने समुदाय का झंडा फहरा दिया और एक स्टंट कर रहा ‘किसान’ तेज रफ्तार में ट्रैक्टर दौड़ाते हुए मारा गया। प्रदर्शनकारियों ने बैरिकेड्स को तोड़ा और आईटीओ, लाल किले पर उत्पात मचाया। दिल्ली के आईटीओ पर किसानों और पुलिस के बीच जमकर संघर्ष भी हुआ है। किसानों ने दिल्ली में घुसने के लिए कुछ बैरिकेड्स तोड़ दिए।

अब बारी मजहबी फैक्ट चेकर्स द्वारा इन उन्मादी प्रदर्शनकारियों को फैक्ट चेक कर ‘क्लीन चिट’ देने की है। भारत के कुछ फुल टाइम प्रदर्शनकारियों ने नागरिकता कानून के विरोध प्रदर्शनों के बाद जो स्वरुप विरोध प्रदर्शनों को दिया है, वास्तव में वह मुद्दों के विरोध के बजाय सत्ता के खिलाफ षड्यंत्र ज्यादा रहे हैं। हालाँकि, संविधान या नियम कानूनों को अपने ध्येय सिद्धि तक ही श्रेष्ठ माने जाते रहने का प्रचलन लिबरल गिरोह के लिए कब तक सकारात्मक साबित होता रहेगा, इसका जवाब समय के गर्भ में ही है।

किसानों के आंदोलन में खालिस्तानी कड़े और नारे का क्या काम?

मंगलवार (जनवरी 26, 2021) को ‘इंडिया टुडे’ के पत्रकार राजदीप सरदेसाई ने फेक न्यूज फैलाते हुए तिरंगे में लिपटी मृतक की लाश की तस्वीर अपने ट्विटर अकाउंट से शेयर करते हुए लिखा कि इसकी मौत पुलिस की गोली से हुई है। राजदीप ने ट्विटर पर लिखा, “पुलिस फायरिंग में आईटीओ पर 45 साल के नवनीत की मौत हो गई है। किसानों ने मुझे बताया कि उसका ‘बलिदान’ व्यर्थ नहीं जाएगा।” 

बता दें कि इस तस्वीर में शव के पास बैठे एक शख्स के हाथ में खालिस्तानी कड़े देखे जा सकते हैं। इसके अलावा केंद्र के तीन नए कृषि कानूनों के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे किसानों ने अपनी ट्रैक्टर परेड के दौरान लाल किले के अंदर घुस कर उस पर लाल-पीला झंडा भी फहरा दिया। प्रदर्शनकारी किसानों ने लाल किले के फाटक पर रस्सियाँ बाँधकर इसे गिराने की भी कोशिश की।

कथित किसान विरोध प्रदर्शन के दौरान सिख झंडों के बीच खालिस्तानी उकसावे की बहस का भी जमकर बोलबाला रहा। मंगलवार दोपहर लाल किले पर पहुँचे किसानों को एक गुंबद के शीर्ष पर एक झंडा लगाते हुए देखा गया। एक अन्य प्रदर्शनकारी ने उस जगह पर अपना झंडा लगा दिया, जहाँ पर प्रधानमंत्री हर वर्ष स्वतन्त्रता दिवस के मौके पर तिरंगा फहराते आए हैं।

एक वीडियो, जो सोशल मीडिया पर बड़े स्तर पर वायरल हो रहा है, में देखा जा सकता है कि उपद्रवियों की भीड़ में से लाल किले पर एक आदमी सिखों का झंडा लगाने खम्बे पर चढ़ रहा है। भीड़ में से जब एक आदमी ने उसकी ओर राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा बढ़ाया तो उसने बेहद अपमानजनक तरीके से तिरंगे को दूर फेंक दिया। झंडा फहराने के दौरान खालिस्तानी नारा भी सुना जा सकता है।

अब सवाल उठता है कि जो लोग इसे पवित्र निशान साहिब बोल रहे हैं, वो ये बताएँ कि ये नारा और कड़ा किसका है? यह भी बताएँ कि एक किसान आंदोलन में मजहबी झंडा कहाँ से आया? उसे कैसे डिफेंड किया जाए कि तिरंगा फेंक कर मजहबी झंडा लगा दिया गया? सोचने वाली बात यह भी है कि किसान के तथाकथित आंदोलन में ‘सिख’ झंडा क्या कर रहा है? खालिस्तानी भी तो सिखों के लिए अलग देश चाहते हैं और यहाँ तिरंगे के पोल पर सिख झंडा लगा दिया गया। 

खालिस्तानी और देश के दुश्मनों के साथ मिलकर कुछ नेता पीएम नरेंद्र मोदी और देश के खिलाफ षड़यंत्र कर लाल किले पर तिरंगा उतारकर किसान आंदोलन का झंडा फहराया। देश को बदनाम करने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की आवश्यकता है। आंदोलन किसान के नाम पर किए जाते हैं, लेकिन झंडे फहराए जा रहे हैं खालिस्तान के।

इस बीच आम आदमी पार्टी के नेता अमरीक सिंह का पोस्ट भी सामने आया है, जिसमें उन्होंने कैप्शन दिया था, “राज करेगा खालसा, लाल किला फतेह।”

एक सोशल मीडिया यूजर द्वारा शेयर किए गए पोस्ट में कॉन्ग्रेस को पंजाबी एक्टर दीप सिद्धू को प्रमोट करते हुए देखा जा सकता है। बता दें कि ये वही दीप सिद्धू है, जिसने लाल किले पर खालसा का झंडा फहराने का समर्थन किया है। उसने लोगों से खालिस्तानी नारे भी लगवाए।

इसके अलावा पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की पोती महिमा शास्त्री ने राजदीप सरदेसाई के ट्वीट को शेयर करते हुए लिखा है, “मेरे दादाजी लाल बहादुर शास्त्री ने असली किसानों के लिए नारा दिया था, न कि खालिस्तानियों के लिए। क्या हमें अधिक प्रमाण की आवश्यकता है कि यह किसान आंदोलन नहीं है?”

बता दें कि राजदीप सरदेसाई ने अराजक हिंसा का वीडियो ट्वीट करते हुए लिखा था, “गणतंत्र दिवस पर और अधिक दुखद क्या हो सकता है जब जय जवान, जय किसान ITO में किसान बनाम जवान बन जाता है।”

ये भी ध्यान देने वाली बात है कि दो सप्ताह पहले प्रतिबंधित खालिस्तानी संगठन ‘सिख फॉर जस्टिस (SFJ)’ ने ऐलान किया था कि जो भी दिल्ली के लाल किला पर खालिस्तानी झंडा फहराएगा, उसे 2.5 लाख डॉलर (1.83 करोड़ रुपए) इनाम के रूप में दिए जाएँगे। 

‘RSS नक्सलियों से भी ज्यादा खतरनाक, संघ समर्थक पैर छूकर गोली मार देते हैं’: कॉन्ग्रेसी सांसद और CM भूपेश बघेल का ज्ञान

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की टिप्पणी पर पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने तंज कसा है। उन्होंने कहा कि न भूपेश बघेल ने और न ही उनके सांसदों ने इतिहास पढ़ा है। आरएसएस के बारे में न उनकी सोच है और न ही समझ है। पारिवारिक कार्य से कवर्धा पहुँचे डॉ. रमन सिंह ने कहा कि आरएसएस राष्ट्रभक्त संगठन है। इससे बड़ा देशभक्त संगठन न तो देश में है और न ही विश्व में है। इसने संगठन के साथ-साथ पीढ़ियों का निर्माण किया। संगठन से निकले अटल बिहारी वाजपेयी, लाल कृष्ण आडवाणी और अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देश का नेतृत्व कर रहे हैं।

बता दें कि छत्तीसगढ़ प्रांत में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) में हुए नेतृत्व बदलाव के बाद मुख्यमंत्री भूपेश बघेल (CM Bhupesh Baghel) ने आरएसएस की तुलना नक्सलियों से की है। उन्होंने कहा, “जैसे नक्सलियों के बड़े कमांडर आंध्र और तेलंगाना में रहते हैं और यहाँ के लोग केवल बंदूक चलाते हैं। उसी प्रकार से आप आरएसएस में भी देखेंगे कि उसके सारे लोग नागपुर के हैं। यहाँ के लोग केवल अफवाह फैलाने की मशीन की तरह काम करते हैं।”

बस्तर प्रवास पर रवाना होने से पहले मुख्यमंत्री ने कहा कि आरएसएस के कार्यकर्ता नागपुर के बंधुआ मजदूर हो गए हैं। वे इससे उबर नहीं पा रहे हैं। बिसराराम जी स्थानीय व्यक्ति थे। छत्तीसगढ़ के माटीपुत्र थे। अब उनको भी हटा दिया गया। अब यहाँ आरएसएस का कोई आदमी स्थानीय स्तर पर कुछ बड़ा नहीं बोल सकता। सीएम भूपेश ने कहा कि आरएसएस के समर्थक पैर छूकर गोली मार देते हैं। महात्मा गाँधी की हत्या कैसे किया गया था? पहले पैर छुए फिर उनके सीने में गोली मारी।

बता दें कि संघ के संविधान के अनुसार तीन साल में निर्वाचन होता है। पिछले नौ वर्ष से बिसराराम यादव प्रांत संघचालक थे। उनका कार्यकाल पूरा होने पर रविवार (जनवरी 24, 2021) को निर्वाचन हुआ, जिसमें अस्थिरोग विशेषज्ञ डॉ. पूर्णेन्दु सक्सेना को प्रांत संघचालक चुना गया।

गौरतलब है कि इससे पहले सांसद दीपक बैज ने आरएसएस और बीजेपी को नक्सलवाद से ज्यादा खतरनाक संगठन बताया। उन्होंने यह बयान रविवार को अपने बीजापुर प्रवास के दौरान नैमेड़ में दिया। सांसद यहाँ एक क्रिक्रेट प्रतियोगिता के समापन अवसर पर पहुँचे थे। यहाँ पत्रकारों से बातचीत के दौरान सांसद ने कहा कि इलाके में सड़क निर्माण के जो विरोध हो रहे हैं वह आरएसएस और भाजपा के लोग करवा रहे हैं। सांसद यहीं नहीं रुके और बोल पड़े कि नक्सलवाद से ज्यादा खतरनाक तो ये संगठन है।