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‘RSS नक्सलियों से भी ज्यादा खतरनाक, संघ समर्थक पैर छूकर गोली मार देते हैं’: कॉन्ग्रेसी सांसद और CM भूपेश बघेल का ज्ञान

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की टिप्पणी पर पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने तंज कसा है। उन्होंने कहा कि न भूपेश बघेल ने और न ही उनके सांसदों ने इतिहास पढ़ा है। आरएसएस के बारे में न उनकी सोच है और न ही समझ है। पारिवारिक कार्य से कवर्धा पहुँचे डॉ. रमन सिंह ने कहा कि आरएसएस राष्ट्रभक्त संगठन है। इससे बड़ा देशभक्त संगठन न तो देश में है और न ही विश्व में है। इसने संगठन के साथ-साथ पीढ़ियों का निर्माण किया। संगठन से निकले अटल बिहारी वाजपेयी, लाल कृष्ण आडवाणी और अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देश का नेतृत्व कर रहे हैं।

बता दें कि छत्तीसगढ़ प्रांत में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) में हुए नेतृत्व बदलाव के बाद मुख्यमंत्री भूपेश बघेल (CM Bhupesh Baghel) ने आरएसएस की तुलना नक्सलियों से की है। उन्होंने कहा, “जैसे नक्सलियों के बड़े कमांडर आंध्र और तेलंगाना में रहते हैं और यहाँ के लोग केवल बंदूक चलाते हैं। उसी प्रकार से आप आरएसएस में भी देखेंगे कि उसके सारे लोग नागपुर के हैं। यहाँ के लोग केवल अफवाह फैलाने की मशीन की तरह काम करते हैं।”

बस्तर प्रवास पर रवाना होने से पहले मुख्यमंत्री ने कहा कि आरएसएस के कार्यकर्ता नागपुर के बंधुआ मजदूर हो गए हैं। वे इससे उबर नहीं पा रहे हैं। बिसराराम जी स्थानीय व्यक्ति थे। छत्तीसगढ़ के माटीपुत्र थे। अब उनको भी हटा दिया गया। अब यहाँ आरएसएस का कोई आदमी स्थानीय स्तर पर कुछ बड़ा नहीं बोल सकता। सीएम भूपेश ने कहा कि आरएसएस के समर्थक पैर छूकर गोली मार देते हैं। महात्मा गाँधी की हत्या कैसे किया गया था? पहले पैर छुए फिर उनके सीने में गोली मारी।

बता दें कि संघ के संविधान के अनुसार तीन साल में निर्वाचन होता है। पिछले नौ वर्ष से बिसराराम यादव प्रांत संघचालक थे। उनका कार्यकाल पूरा होने पर रविवार (जनवरी 24, 2021) को निर्वाचन हुआ, जिसमें अस्थिरोग विशेषज्ञ डॉ. पूर्णेन्दु सक्सेना को प्रांत संघचालक चुना गया।

गौरतलब है कि इससे पहले सांसद दीपक बैज ने आरएसएस और बीजेपी को नक्सलवाद से ज्यादा खतरनाक संगठन बताया। उन्होंने यह बयान रविवार को अपने बीजापुर प्रवास के दौरान नैमेड़ में दिया। सांसद यहाँ एक क्रिक्रेट प्रतियोगिता के समापन अवसर पर पहुँचे थे। यहाँ पत्रकारों से बातचीत के दौरान सांसद ने कहा कि इलाके में सड़क निर्माण के जो विरोध हो रहे हैं वह आरएसएस और भाजपा के लोग करवा रहे हैं। सांसद यहीं नहीं रुके और बोल पड़े कि नक्सलवाद से ज्यादा खतरनाक तो ये संगठन है।

कैपिटल हिल के लिए छाती पीटने वाले दिल्ली के ‘दंगाइयों’ के लिए पीट रहे ताली: ट्रम्प की आलोचना करने वाले करेंगे राहुल-प्रियंका की निंदा?

गणतंत्र दिवस के दिन अराजकता का एक नया नमूना देख रहे हैं, जिसने ‘किसानों’ के नाम पर पूरी दिल्ली में ऐसा उत्पात मचाया है कि इतिहास में ये शर्मिंदगी के रूप में दर्ज होगा। सुप्रीम कोर्ट पहले ही तीनों कृषि कानूनों पर रोक लगा चुका है। केंद्र सरकार 1.5 वर्षों के लिए इन्हें स्थगित करने के लिए तैयार है। बावजूद इसके ‘किसान’ दंगाइयों ने दिल्ली में लाल किला पर चढ़ कर ‘खालिस्तानी झंडा’ फहरा दिया। अब जरा कैपिटल हिल कांड को याद कीजिए।

अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प का आरोप था कि चुनाव में धाँधली हुई है, इसीलिए वो हारे और जो बायडेन की जीत हुई। जिस दिन इलेक्टोरल कॉलेज के वोट्स की गिनती होनी थी, उसी दिन कैपिटल हिल में प्रदर्शनकारी घुसे और हंगामा किया। उनमें से कई अजीबोगरीब वेशभूषा में थे। बैरिकेड्स तोड़ कर और दीवारें लाँघ कर खिड़की से लोग भीतर घुस गए। जनवरी के पहले हफ्ते के अंत में हुई इस घटना के बाद पूरे वाशिंगटन डीसी को लॉकडाउन में डाल दिया गया था।

तब लिबरल गिरोह की इस पर क्या प्रतिक्रिया थी? याद कीजिए। सब ने एक स्वर से इसके लिए डोनाल्ड ट्रम्प की आलोचना की और कैपिटल हिल में घुसने वालों को स्पष्ट रूप से ‘दंगाई’ कहा। बरखा दत्त ने पूछा कि क्या अमेरिका अब दूसरों को लोकतंत्र को लेकर भाषण दे सकता है, जब ट्रम्प ने उसे शर्मिंदगी से भर दिया है। सागरिका घोष ने उसमें भी ‘भगवा झंडा लिए हिंदुत्ववादी’ को देख लिया था। राजदीप सरदेसाई ने कहा कि जब किसी एक व्यक्ति के हाथ में सारी सत्ता आ जाती है तो उसके समर्थक ऐसे ही करते हैं।

उनका इशारा किस ओर था, हम समझ सकते हैं। रवीश कुमार ने इस पर पूरा का पूरा प्राइम टाइम करके अपने अनुयायियों को इशारों में चेताया कि ऐसा भारत में भी हो सकता है। हो सकता है, सत्ता में जो भाजपा बैठी है, वो कर सकती है। इसी तरह से सारे भारतीय मीडिया के लोग इस तरह से मातम मना रहे थे, जैसे उन्हें कोई व्यक्तिगत नुकसान हुआ हो। NDTV के प्रणय रॉय ने बायडेन के शपथग्रहण के बाद ‘Yeeeeeee’ मोमेंट भी शेयर किया।

ये लिबरल गिरोह इस फेर में थे कि दिल्ली में कुछ ऐसा हो जिसका आरोप सीधा केंद्र सरकार पर मढ़ा जा सके और दिखाया जा सके कि जो कैपिटल हिल में ‘ट्रम्प ने करवाया’, वही मोदी सरकार भारत में करवा रही है। लेकिन, ‘किसान आंदोलन‘ ने उनकी कलई खोल कर रख दी। दिल्ली दंगों के समय जैसे सोशल मीडिया पर सबूत आते गए और ये बेनकाब होते गए, ठीक उसी तरह से ये लोग अब इस ‘किसान आंदोलन’ में बेनकाब हो रहे हैं।

किसानों ने पहले वादा किया कि वो हंगामा नहीं करेंगे। दिल्ली पुलिस ने अनुमति भी दे दी। रूट भी तय कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने तीनों कृषि कानूनों को तो रोक दिया, लेकिन किसानों की ट्रैक्टर रैली से पल्ला झाड़ते हुए इस पर दिल्ली पुलिस को निर्णय लेने को कहा। दिल्ली में किसान घुसे, लेकिन उन्होंने बताए गए रूट का अनुसरण न कर के सीधा लाल किला और ITO की तरफ बढ़ाना शुरू कर दिया। फिर हिंसा का दौर शुरू हुआ।

पुलिसकर्मियों के ऊपर ट्रैक्टर चढ़ाने की कोशिश की गई। महिला पुलिसकर्मी के साथ बदसलूकी हुई। एक पुलिसकर्मी बेहोश हो गया। सोशल मीडिया से राहुल गाँधी और प्रियंका वाड्रा जैसे नेता हिंसा करने वालों को और भड़काते रहे, उनका बचाव करते रहे। ट्रैक्टरों में शराब भरे हुए हैं। दिल्ली पुलिस के जवानों को तलवारें लहराते हुए खदेड़ा गया। बसों को क्षतिग्रस्त कर दिया गया। पुलिस के वाहन को भी नहीं बख्शा गया।

और इस बीच कैपिटल हिल उपद्रव की निंदा करने वाले क्या कर रहे हैं? बचाव। दंगाइयों और उपद्रवियों का बचाव। राजदीप सरदेसाई अफवाह फैलाने में लगे हुए हैं कि दिल्ली पुलिस ने ‘किसान आंदोलन’ में एक किसान को मार डाला। रोहिणी सिंह खालिस्तानी झंडे को राष्ट्रीय ध्वज बता रहीं। नरेंद्र नाथ मिश्रा पुलिस पर ही क्रूरता का आरोप लगा रहे। राहुल गाँधी ‘हिंसा से देश का नुकसान’ होने की दुहाई दे रहे।

लेकिन, इन घाघ लिबरलों के सोशल मीडिया हैंडल्स सस्पेंड नहीं होंगे। क्या जिस तरह से ये लोग ट्रम्प की आलोचना कर रहे थे, उस तरह से इस उपद्रव की आग में घी डालने का काम करने वाले राहुल-प्रियंका की निंदा कर सकते हैं? इनमें हिम्मत है? जिस तरह से कैपिटल हिल के दंगाई को दंगाई कहा, उस तरह से दिल्ली में जमा अराजकतावादियों को ये दंगाई कहने की हिम्मत रखते हैं? कैपिटल हिल के लिए छाती पीटने वाले अब ताली क्यों पीट रहे?

NDTV के पत्रकार ये समझाने में लगे हुए हैं कि लाल किला पर फहराया गया झंडा फलाँ झंडा था, फलाँ नहीं था। दंगों का महिमामंडन हो रहा है। इन सबके बीच योगेंद्र यादव भी टीवी चैनलों पर इंटरव्यू देते हुए घूम रहे हैं, ताकि ‘बुद्धिजीवियों’ के बीच दंगाइयों के पक्ष में माहौल तैयार कर सकें। ट्रम्प की आलोचना करने वाले राहुल-प्रियंका तो दूर, इच्छाधारी प्रदर्शनकारी योगेंद्र यादव के खिलाफ भी एक शब्द तक बोलने की हिम्मत नहीं रखते।

NDTV इन सबके बीच JNU के छात्रों का इंटरव्यू ले रहा है। मीडिया पर पत्थरबाजी हो रही है लेकिन मीडिया के ही लोग उन्हीं दंगाइयों को बचाने में लगे हुए हैं। किसी आंदोलन में गलती से भी कभी कोई हिंदू प्रतीक चिह्न दिख जाए तो उसे ‘भगवा आतंकवाद’ नाम दे दिया जाएगा लेकिन आज उनका सारा जोर इस बात पर है कि फलाँ झण्डा खालिस्तानी नहीं था बल्कि ये तो सिखों का पवित्र ध्वज था। यहाँ आंदोलन में धर्म घुसने से उन्हें दिक्कत नहीं होती?

एक दिन पहले यही लोग इस बात में लगे थे कि कैसे राष्ट्रपति भवन में लगाए गए नेताजी सुभाष चंद्र बोस की तस्वीर को एक अभिनेता का साबित किया जा सके। महुआ मोइत्रा की ट्वीट के बाद पत्रकारों ने एक बाढ़ सी ला दी राष्ट्रपति को बदनाम करने के लिए। 1 दिन भी नहीं बीता कि अब यही पूरा का पूरा गैंग गणतंत्र दिवस का मजाक बना कर रख देने वालों के बचाव में जुटा हुआ है। कल CAA विरोधी दंगाई थे, आज ‘किसान’ उपद्रवी हैं।

‘लाल किले पर लहरा रहा खालिस्तान का झंडा- ऐतिहासिक पल’: ऑल पाकिस्तान मुस्लिम लीग ने मनाया ‘ब्लैक डे’

गणतंत्र दिवस पर लाल किले पर ‘खालिस्तानी झंडा’ फहराने को लेकर ऑल पाकिस्तान मुस्लिम लीग (APML) काफी खुश है। पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ द्वारा स्थापित पाकिस्तानी राजनीतिक पार्टी ने इसे ‘ऐतिहासिक क्षण’ बताया है।

Pakistan Political Party celebrates the hoisting of 'Flag of Khalistan' at Red Fort
Source: Twitter

ऑल पाकिस्तान मुस्लिम ने जश्न मनाते हुए इसे ‘Flag changing ceremony’ करार दिया।

Pakistan Political Party celebrates the hoisting of 'Flag of Khalistan' at Red Fort
Source: Twitter

एपीएमएल ने अपने आधिकारिक ट्विटर हैंडल के माध्यम से कहा, “शांतिप्रिय सिख प्रदर्शनकारी ने लाल किले से भारतीय झंडा को हटा दिया और निशान साहिब ध्वज को फहरा दिया, जो कि सिख लोगों के लिए काफी पवित्र है।” इसके साथ ट्विटर हैंडल से ‘सिख किसानों और मुसलमानों’ से ‘मजबूत रहने’ का भी आग्रह किया।

Pakistan Political Party celebrates the hoisting of 'Flag of Khalistan' at Red Fort
Source Twitter

लाल किले पर फहराया गया झंडा सिख ध्वज बताया जा रहा है, लेकिन भारत के खिलाफ सिख भावनाओं को और भड़काने के लिए पाकिस्तानी स्पष्ट रूप से दोनों के बीच अंतर नहीं कर रहे हैं। यह भी उल्लेख करना उचित है कि आतंकवादी संगठन सिख फॉर जस्टिस ने माँग की थी कि गणतंत्र दिवस पर खालिस्तानी झंडा फहराया जाए।

पाकिस्तानी राजनैतिक दल इसे भारतीय गणतंत्र के लिए ‘काला दिवस’ बता रहा है। विरोध करने वाली भीड़ की कार्रवाइयों से भारत को भारी शर्मिंदगी हुई है। हालाँकि, कॉन्ग्रेस पार्टी राष्ट्रीय राजधानी में व्यापक अराजकता का जश्न मना रही है। कॉन्ग्रेस पार्टी ने इसे ‘रिपब्लिक की शक्ति’ नाम दिया है।

उल्लेखनीय है कि सीमावर्ती इलाकों में पुलिस बैरिकेड तोड़ने और प्रदर्शनकारियों द्वारा दिल्ली के कई हिस्सों में पुलिस के साथ भिड़ंत के बाद किसानों के विरोध प्रदर्शन ने एक हिंसक रूप ले लिया है। दिल्ली के अलग-अलग इलाकों में मंगलवार (जनवरी 26, 2021) को हिंसा हुई है।

बता दें कि गणतंत्र दिवस के मौके पर किसानों ने ट्रैक्टर रैली निकालने की बात कही थी। लेकिन मंगलवार सुबह से ही दिल्ली की अलग-अलग सीमाओं पर उत्पात की स्थिति देखने को मिली है। दिल्ली के गाजीपुर बॉर्डर, आईटीओ समेत अन्य कई इलाकों में पुलिस और प्रदर्शनकारियों में भिड़ंत हुई है।

प्रदर्शन कर रही भीड़ ने पुलिस कर्मियों पर हमला कर दिया, पुलिसकर्मी पर पथराव करने का प्रयास किया और तलवार, रॉड और पत्थरों से पुलिस पर हमला किया। उन्होंने सभी नियमों और कानूनों की अवहेलना की, बैरिकेड्स को तोड़ दिया और राष्ट्रीय राजधानी की सड़कों पर बेवजह अराजकता फैला दी।

वीडियो: जब दंगाई को किसी ने लाल किला पर तिरंगा लगाने दिया, और उसने फेंक दिया!

केंद्र सरकार के तीन नए कृषि कानूनों के विरोध में जारी किसानों का विरोध प्रदर्शन आज ट्रैक्टर रैली के दौरान हिंसक हो उठा। दिल्ली की सीमा से घुसे किसानों की भीड़ इतनी उन्मादी हो पड़ी कि लाल किला परिसर में भी दाखिल हो गए और वहाँ निशान साहब का झंडा फहरा दिया गया।

इस सब उपद्रव के बीच एक चर्चा जोरों पर रही कि ‘क्या किसानों ने तिरंगा झंडा हटाया’? यह सवाल अभी तक भी बहस का विषय बना हुआ है। कथित किसान विरोध प्रदर्शन के दौरान सिख झंडों के बीच खालिस्तानी उकसावे की बहस का भी जमकर बोलबाला रहा। मंगलवार (जनवरी 26, 2021) दोपहर लाल किले पर पहुँचे किसानों को एक गुंबद के शीर्ष पर एक झंडा लगाते हुए देखा गया। एक अन्य प्रदर्शनकारी ने उस जगह पर अपना झंडा लगा दिया, जहाँ पर प्रधानमंत्री हर वर्ष स्वतन्त्रता दिवस के मौके पर तिरंगा फहराते आए हैं।

एक वीडियो, जो सोशल मीडिया पर बड़े स्तर पर वायरल हो रहा है, में देखा जा सकता है कि उपद्रवियों की भीड़ में से लाल किले पर एक आदमी सिखों का झंडा चढ़ाने खम्बे पर चढ़ रहा है। भीड़ में से जब एक आदमी ने उसकी ओर राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा बढ़ाया तो उसने बेहद अपमानजनक तरीके से तिरंगे को दूर फेंक दिया।

‘बेफिटिंग फैक्ट्स’ नाम के ट्विटर यूजर ने ये वीडियो शेयर करते हुए लिखा है कि जो लोग आज के उपद्रव को ऐतिहासिक पल बता रहे हैं, उन्हें यह देखना चाहिए कि उन्होंने हमारे राष्ट्रीय ध्वज को किस तरह से फेंक दिया।

यह वीडियो ऐसे समय में वायरल हो रहा है, जब लिबरल जमात और तमाम निष्पक्ष पत्रकार मिलकर गणतंत्र दिवस पर किसानों द्वारा किए गए इस उपद्रव को ‘क्लीन चिट’ देने का प्रयास कर रहे हैं। इनमें से कई पत्रकार ऐसे हैं जो यही ट्वीट करते देखे जा रहे हैं कि लाल किले पर तिरंगा को नहीं हटाया गया और उसका अपमान नहीं किया गया।

गणतंत्र दिवस की सुबह से ही किसानों का प्रदर्शन उग्र होता गया। इस बीच, दिल्ली के DDU मार्ग पर एक व्यक्ति की ट्रैक्टर पलटने के कारण मौत हो गई। आईटीओ के पास पूरे चौक पर सैकड़ों की संख्या में किसान ट्रैक्टर लेकर खड़े रहे। जिसे लेकर समाचार चैनल ‘इंडिया टुडे’ के पत्रकार राजदीप सरदेसाई ने एक और फेक न्यूज़ फैला दी और पोल खुलने पर अपना ट्वीट चुपके से डिलीट भी कर दिया।

गणतंत्र दिवस पर दिल्ली पुलिस की ओर से किसानों को कुछ जगहों पर ट्रैक्टर रैली निकालने की इजाजत दी गई थी। लेकिन मंगलवार सुबह से ही दिल्ली की अलग-अलग सीमाओं पर हजारों की संख्या में प्रदर्शन कर रहे किसानों ने ट्रैक्टरों के साथ दिल्ली में धावा बोल दिया।

प्रदर्शनकारियों ने बैरिकेड्स को तोड़ा और आईटीओ, लाल किले पर उत्पात मचाया। दिल्ली के आईटीओ पर किसानों और पुलिस के बीच जमकर संघर्ष भी हुआ है। किसानों ने दिल्ली में घुसने के लिए कुछ बैरिकेड्स तोड़ दिए थे। दिल्ली के बीचों बीच आईटीओ पर भी किसान और पुलिस के बीच झड़प देखने को मिली। प्रदर्शनकारी हाथ में डंडे लेकर पुलिसकर्मियों को दौड़ाते और अपने ट्रैक्टरों को वहाँ खड़ी बसों को टक्कर मारते दिखे। कुछ प्रदर्शनकारियों ने तो पुलिस को रौंदने के इरादे से भी तेज रफ्तार में ट्रैक्टर दौड़ाए।

एक पुलिसकर्मी के साथ कुछ किसान प्रदर्शनकारियों द्वारा दिल्ली स्थित आईटीओ में मारपीट और हाथापाई का वीडियो सामने आया है। हाथ में डंडे लिए इन प्रदर्शनकारियों द्वारा पुलिसकर्मी को सड़क पर घेर लिया गया और उनके साथ हाथापाई की गई। तभी उन्हीं प्रदर्शनकारियों में से कुछ लोगों ने आकर बीच-बचाव कर पुलिसकर्मी को सुरक्षित खींच निकाला।

देशी-विदेशी शराब से लदी मिली प्रदर्शनकारी किसानों की ट्रैक्टर: दिल्ली पुलिस ने किया सीज, देखें तस्वीरें

जो आशंका शुरु से जताई जा रही थी, वो सही साबित हो रही है। ‘किसान आंदोलन’ के नाम पर देश विरोधी ताकतें देश की राजधानी दिल्ली में हिंसा फैलाने की साजिश लंबे समय से रच रही थीं। आज वो आशंका सच साबित हुई है जब दिल्ली में ट्रैक्टर रैली के नाम पर पत्थरबाजी, आगजनी और गुंडागर्दी की जा रही है।

इस बीच पुलिस ने शराब से भरे एक ट्रैक्टर को सीज किया है। सामने आए फोटो में देखा जा सकता है कि पूरा ट्रैक्टर शराब से भरा हुआ है। यानी कि शराब के नशे में ट्रैक्टरों को चलाया जा रहा है। देशी और विदेशी शराब से भरे इस ट्रैक्टर में नमकीन के पैकेट्स भी हैं। जबकि ट्रैक्टर रैली के लिए जारी की गई गाइडलाइन में साफ तौर पर लिखा था कि इस दौरान किसी भी तरह के नशीले पदार्थों का सेवन वर्जित होगा। ये तस्वीरें सवाल उठाती है कि क्या वाकई ये आंदोलनकारी किसान हैं? 

वहीं आंदोलन कर रहे किसानों का दिल्ली पुलिस के साथ मंगलवार (जनवरी 26, 2021) को टकराव हो गया है। कई किसानों का पुलिस के साथ आमना-सामना भी हुआ। कृषि कानूनों के विरोध में प्रदर्शन कर रहे किसानों के राष्ट्रीय राजधानी के आईटीओ पहुँचने के बाद दिल्ली में आगे की ओर बढ़ने की कोशिश पर पुलिस के साथ भिड़ंत हुई। पुलिस ने बल प्रयोग करते हुए लाठीचार्ज किया और आँसू गैस के गोले दागे।

किसानों ने तय समय से पहले विभिन्न सीमा बिंदुओं से अपनी ट्रैक्टर परेड शुरू की। किसान अनुमति नहीं मिलने के बावजूद मध्य दिल्ली के आईटीओ पहुँच गए। प्रदर्शनकारी हाथ में डंडे, तलवार लेकर पुलिस कर्मियों को दौड़ाते हुए दिखे। पुलिस ने भी लाठीचार्ज और आँसू गैस के गोले छोड़कर भीड़ को तितर-बितर करने का प्रयास किया।

दिल्ली पुलिस ने मंगलवार को प्रदर्शनकारी किसानों से अपील की है कि वे कानून को हाथ में नहीं लें और शांति बनाए रखें। पुलिस की यह अपील राष्ट्रीय राजधानी में कई स्थानों पर पुलिस और प्रदर्शनकारी किसानों के बीच झड़प की घटना के बीच आई है। पुलिस ने किसानों से कहा कि वह पूर्व निर्धारित मार्ग पर ही ट्रैक्टर परेड़ निकाले।

बता दें कि किसानों के ट्रैक्टर मार्च के लिए अलग-अलग बॉर्डर से रूट तय किए गए थे, जिसे किसानों ने नहीं माना और कई जगह तय रूट की धज्जियाँ उड़ाईं गई। इतना ही नहीं रूट को तोड़ किसान लाल किले के अंदर तक जा घुसे और प्राचीर में खड़े होकर हथियार लहराने लगे।

राष्ट्रीय राजधानी में कई स्थानों पर पुलिस और प्रदर्शनकारी किसानों के बीच झड़पों के बाद मध्य एवं उत्तर दिल्ली के 10 से ज्यादा मेट्रो स्टेशनों पर प्रवेश और निकास द्वार बंद कर दिए गए।

मुंगेर में माँ दुर्गा भक्तों पर गोलीबारी करने वाले सभी पुलिस अधिकारी बहाल, जानिए क्या कहती है CISF रिपोर्ट

बिहार पुलिस द्वारा दुर्गा प्रतिमा विसर्जन जुलूस पर बर्बरता बरतने के महीनों बाद सभी निलंबित अधिकारियों को वापस सेवा में बहाल कर दिया गया है। दैनिक भास्कर ने अपनी रिपोर्ट में इसकी जानकारी दी। पिछले साल 26 अक्टूबर को बिहार के मुंगेर में दुर्गा प्रतिमा विसर्जन के दौरान लाठीचार्ज और फायरिंग में अनुराग पोद्दार की मौत हो गई थी। कई अन्य लोग घायल हो गए थे। पुलिसिया क्रूरता की इस घटना ने एक अलग ही तस्वीर दिखाई थी।

जब यह घटना हुई थी उस समय लिपि सिं​ह मुंगेर की एसपी हुआ करती थीं। इस घटना के बाद उन्हें चुनाव आयोग ने हटा दिया था। हालाँकि, अब बिहार सरकार ने पोस्टिंग की प्रतीक्षा में रही लिपि सिंह को सहरसा का एसपी बनाया है। इसी तरह, तत्कालीन जिला मजिस्ट्रेट राजेश मीणा को सहकारिता विभाग में रजिस्ट्रार नियुक्त किया गया है। वहीं, पुलिस प्रमुख (कासिम बाजार स्टेशन) शैलेश कुमार को नौगछिया पुलिस स्टेशन में स्थानांतरित कर दिया गया है।

बिहार सरकार ने IAS और IPS अधिकारियों के बड़े पैमाने पर स्थानांतरण का आदेश दिया था। देर रात की अधिसूचना में 13 पुलिस अधीक्षकों (एसपी) के साथ बारह जिलों के मजिस्ट्रेट (डीएम) को बदल दिया गया। वहीं, तत्कालीन पुलिस उप महानिरीक्षक (DIG) मनु महाराज ने एक विशेष जाँच दल (SIT) के गठन का आदेश दिया। प्रभारी डीआईजी शफीउल हक ने बताया कि पुलिस की बर्बरता के वायरल वीडियो की जाँच की जा रही है और आरोपितों के खिलाफ उचित कार्रवाई की जाएगी।

CISF की रिपोर्ट क्या कहती है?

हालाँकि, पूर्व मुंगेर एसपी लिपि सिंह ने शुरू में गोलीबारी की किसी भी घटना से इनकार किया था, लेकिन CISF ने अपनी आंतरिक रिपोर्ट में यह स्पष्ट कर दिया कि पुलिस और CISF ने भक्तों पर गोलीबारी की थी। रिपोर्ट के अनुसार, दुर्गा विसर्जन जुलूस के दौरान पुलिस और भक्तों के बीच हाथापाई हो गई। CISF की रिपोर्ट में दावा किया गया कि पुलिस ने भीड़ को नियंत्रित करने के लिए भक्तों पर गोलियाँ चलाईं, जिसके बाद CISF के 20 कर्मियों ने 13 राउंड फायरिंग भी की।

मगध आयुक्त की जाँच रिपोर्ट, पीड़ित परिवार को कोई मुआवजा नहीं

चुनाव आयोग ने मामले की जाँच करने और 7 दिनों में एक निष्कर्ष रिपोर्ट सौंपने के लिए मगध रेंज के आयुक्त, असंगमा चुआ आवा को मुंगेर भेजा था। असंगमा ने मुंगेर का दौरा किया और स्थानीय लोगों और सुरक्षा कर्मियों से पूछताछ की। दैनिक भास्कर ने बताया कि जाँच रिपोर्ट चुनाव आयोग को सौंप दी गई है लेकिन अभी तक इसे सार्वजनिक नहीं किया गया है। सूत्रों का हवाला देते हुए, हिंदी दैनिक ने कहा कि मगध रेंज के आयुक्त ने मुंगेर के एसपी लिपि सिंह और डीएम राजेश मीणा पर 1 घंटे देरी से अपराध स्थल पर पहुँचने का आरोप लगाया है।

मृतक अनुराग के पिता अमरनाथ पोद्दार ने जानकारी दी कि उन्हें बिहार सरकार से अभी तक कोई मुआवजा नहीं मिला है। उन्होंने वासुदेवपुर ओपी प्रभारी सुशील कुमार को नामजद अभियुक्त बनाया था। इसके बावजूद पुलिस द्वारा पुत्र का शव दिए जाते समय उनका हस्ताक्षर गलत तरीके से लेकर अज्ञात के विरूद्ध मामला दर्ज कर दिया गया। जिसके विरूद्ध केस दर्ज करवाया है। इसके साथ ही ग्रामीणों और पीड़ित के रिश्तेदारों ने बिहार पुलिस पर आरोपितों को बचाने और मामले को दबाने का आरोप लगाया है।

अनुराग पोद्दार की मौत

मुंगेर गोलीकांड के बाद लिपि सिंह को ‘जनरल डायर‘ का नया नाम मिला था। दुर्गा पूजा समिति से जुड़े लोगों ने उस समय दावा किया था कि लिपि सिंह के सामने ला-ला कर विसर्जन में शामिल लड़कों को पीटा गया था। रात में वीरान सड़क पर माँ की प्रतिमा पड़ी हुई थी। अनुराग पोद्दार के पिता के बयान को आधार बनाते हुए पुलिसकर्मियों के खिलाफ FIR दर्ज की गई थी। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा था कि पुलिस की चलाई गोली से उनके बेटे की हत्या हुई।

विधानसभा चुनाव से पहले दुर्गा पूजा विसर्जन समारोह के दौरान बिहार के मुंगेर शहर में फैली हिंसा में एक भक्त की मौत हो गई। एसपी मुंगेर लिपि सिंह ने भक्तों पर पुलिस द्वारा की गई बर्बरता का बचाव किया था। जिसमें दावा किया गया कि भक्तों ने पथराव कर आगामी हिंसा को भड़काया। बता दें कि पुलिस कर्मियों ने निर्दयता से मुंगेर जिले में दुर्गा जुलूस निकालते भक्तों पर हमला किया था। भक्तों पर लाठी चार्ज किया गया और उन पर गोली चलाई गई, जिसमें एक 18 वर्षीय हिंदू लड़के की मौत हो गई।

‘असली’ हार्वर्ड प्रोफेसर श्रीकांत दातार को मोदी सरकार ने दिया पद्मश्री, अभी हैं बिजनेस स्कूल के डीन

हार्वर्ड बिजनेस स्कूल (Harvard Business School) के 11वें डीन के तौर पर 1 जनवरी 2021 को नियुक्त होने वाले श्रीकांत दातार आज उन 119 लोगों की सूची में शामिल हैं जिन्हें 2021 के पद्म अवार्ड्स से सम्मानित किया गया। मोदी सरकार ने देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान में उनके अलावा दो अन्य भारतीय अमेरिकियों को भी यह पुरस्कार दिया।

‘फाइबर ऑप्टिक्स के जनक’ के रूप में जाने जाने वाले नरिंदर सिंह कपानी को मरणोपरांत पद्म विभूषण देने का ऐलान हुआ। वहीं अमेरिका के भारतीय मूल के नागरिक रतन लाल ओहियो स्टेट यूनिवर्सिटी में मृदा विज्ञान के प्रोफेसर हैं, जिन्हें इस साल पद्म श्री से सम्मानित किया गया है।

दातार की उपलब्धियों पर यदि बात करें तो उन्होंने विश्वविद्यालय में वरिष्ठ एसोसिएट डीन के तौर पर काम करने के अलावा, अनुंधान, एक्जिक्यूटिव एज्यूकेशन, फैकल्टी डेवलपमेंट और हार्वर्ड प्रोफाइल में फैकल्टी भर्ती के लिए के लिए काम किया है।

उन्होंने बॉम्बे विश्वविद्यालय से स्नातक किया है और IIM, अहमदाबाद और इंस्टीट्यूट ऑफ कॉस्ट एंड वर्क्स अकाउंटेंट्स ऑफ इंडिया से स्नातकोत्तर की पढ़ाई पूरी करने के बाद स्वर्ण पदक भी प्राप्त किया है। वह एक चार्टर्ड एकाउंटेंट भी हैं और स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय से दो मास्टर्स डिग्री और पीएचडी की उपाधि प्राप्त कर चुके हैं।

बता दें कि दातार से पहले हार्वर्ड यूनिवर्सिटी का नाम एनडीटीवी की पूर्व कर्मचारी निधि राजदान के कारण चर्चा में आया था। उन्होंने दावा किया था कि उन्हें यूनिवर्सिटी ने पत्रकारिता पढ़ाने के लिए नियुक्त कर लिया है। बाद में पता चला कि वह तो फिशिंग अटैक का शिकार हुई थीं और वह ऑफर असली नहीं था।

राजदान के बारे में मालूम हो कि वह न्यूज़ एजेंसी प्रेस ट्रस्ट ऑफ़ इंडिया (PTI) के पूर्व एडिटर-इन-चीफ़, महाराज कृष्ण राज़दान की बेटी हैं और उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक की उपाधि प्राप्त की है। साथ ही भारतीय जनसंचार संस्थान (IIMC) से मास कम्युनिकेशन में स्नातकोत्तर की पढ़ाई की है।

तेज रफ्तार ट्रैक्टर से मरा ‘किसान’, राजदीप ने कहा- पुलिस की गोली से हुई मौत, फिर ट्वीट किया डिलीट

गणतंत्र दिवस की सुबह से ही किसानों का प्रदर्शन उग्र होता जा रहा है। इस बीच, दिल्ली के DDU मार्ग पर एक व्यक्ति की ट्रैक्टर पलटने के कारण मौत हो गई। आईटीओ के पास पूरे चौक पर सैकड़ों की संख्या में किसान ट्रैक्टर लेकर खड़े रहे। जिसे लेकर समाचार चैनल ‘इंडिया टुडे’ के पत्रकार राजदीप सरदेसाई ने एक और फेक न्यूज़ फैला दी और पोल खुलने पर अपना ट्वीट चुपके से डिलीट भी कर दिया।

दरअसल, राजदीप सरदेसाई ने तिरंगे में लिपटी मृतक की लाश की तस्वीर अपने ट्विटर अकाउंट से शेयर करते हुए लिखा कि इसकी मौत पुलिस की गोली से हुई है। राजदीप ने ट्विटर पर लिखा, “पुलिस फायरिंग में आईटीओ पर 45 साल के नवनीत की मौत हो गई है। किसानों ने मुझे बताया कि उसका ‘बलिदान’ व्यर्थ नहीं जाएगा।”

लेकिन हकीकत ये है कि आज ट्रैक्टर रैली और उपद्रव के दौरान जिस व्यक्ति की मौत हुई, वह पुलिस फायरिंग में नहीं, बल्कि ट्रैक्टर पलटने से मारा गया। दरअसल, ड्राइवर ने काफी तेज रफ्तार से चल रहे ट्रैक्टर को अचानक से मोड़ दिया, जिसकी वजह से संतुलन बिगड़ गया और ट्रैक्टर पलट गया। इस दौरान किसान की मौत हो गई। सोशल मीडिया पर लोग ‘ट्विटर’ से सवाल कर रहे हैं कि क्या फेक न्यूज़ फ़ैलाने और राजधानी में दंगे भड़काने का प्रयास कर रहे राजदीप सरदेसाई का अकाउंट प्रतिबंधित किया जाएगा या नहीं?

सत्ता विरोधी षड्यंत्रों पर गिद्ध की तरह नजर रखने वाले राजदीप सरदेसाई ने आदतन इसे अपने प्रोपेगेंडा के लिए इस्तेमाल किया और इस व्यक्ति की मौत का आरोप पुलिस के सर थोप दिया। लेकिन इस खबर की वास्तविकता सामने आते ही राजदीप सरदेसाई ने बिना माफ़ी माँगे अपने ट्वीट को डिलीट कर दिया।

वहीं, राजदीप सरदेसाई की पत्नी और पत्रकार सागरिका घोष मंगलवार सुबह से ही प्रदर्शन कर रहे किसानों को भड़काने का काम कर रही हैं। गणतंत्र दिवस (रिपब्लिक डे) की सुबह ही आन्दोलन कर रहे किसानों की तारीफ करे हुए सागरिका ने एक ट्वीट किया और लिखा कि आखिरकार ‘रिपब्लिक’ में ‘पब्लिक’ वापस लौट चुकी है।

महज एक दिन पहले ही राजदीप सरदेसाई और उनकी बीवी समेत तमाम निष्पक्ष और लिबरल पत्रकारों ने नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की एक तस्वीर को लेकर जमकर फजीहत कमाई और फेक न्यूज़ फैलाई।

उल्लेखनीय है कि गणतंत्र दिवस पर दिल्ली पुलिस की ओर से किसानों को कुछ जगहों पर ट्रैक्टर रैली निकालने की इजाजत दी गई थी। लेकिन मंगलवार सुबह से ही दिल्ली की अलग-अलग सीमाओं पर हजारों की संख्या में प्रदर्शन कर रहे किसानों ने ट्रैक्टरों के साथ दिल्ली में धावा बोल दिया।

प्रदर्शनकारियों ने बैरिकेड्स को तोड़ा और आईटीओ, लाल किले पर उत्पात मचाया। दिल्ली के आईटीओ पर किसानों और पुलिस के बीच जमकर संघर्ष भी हुआ है। किसानों ने दिल्ली में घुसने के लिए कुछ बैरिकेड्स तोड़ दिए थे।

केंद्र के तीन नए कृषि कानूनों के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे किसान अपनी ट्रैक्टर परेड लेकर नई दिल्ली के लाल किले तक घुस चुके हैं और उन्होंने लाल किले पर अपना झंडा भी फहरा दिया है। प्रदर्शनकारी किसानों ने लाल किले के फाटक पर रस्सियाँ बाँधकर इसे गिराने की कोशिश भी कीं।

मंगलवार (जनवरी 26, 2021) दोपहर लाल किले पर पहुँचे किसानों को एक गुंबद के शीर्ष पर एक झंडा लगाते हुए देखा गया। वहीं, एक अन्य प्रदर्शनकारी ने उस जगह पर अपना झंडा लगा दिया, जहाँ पर प्रधानमंत्री हर वर्ष स्वतन्त्रता दिवस के मौके पर तिरंगा फहराते आए हैं।

रिपब्लिक डे पर ये कौन से किसानों की तस्वीरें शेयर कर रही कॉन्ग्रेस? फिर हिंसा पर उतारू वो कौन हैं जो पुलिस को मार रहे?

कॉन्ग्रेस की राजनीति अब सिर्फ़ विरोध पर टिकी है। पार्टी का सरोकार न नैतिकता से रहा है और न ही जनता के हित से। साल पहले भी स्थितियाँ यही दिखा रही थीं। आज भी यही कह रही हैं। एक ओर गणतंत्र दिवस जैसे पावन अवसर पर जहाँ पूरी दिल्ली का माहौल खराब कर उपद्रवी राजधानी में घुस आए हैं। कोने-कोने में हल्ला काट रहे हैं। पुलिस पर तलवार भाँज रहे हैं। उस समय कॉन्ग्रेस ने आधिकारिक ट्विटर हैंडल से ट्वीट किया है कि गणतंत्र की शक्ति को हल्के में मत लो।

सबसे दिलचस्प बात यह है कि किसानों के उपद्रव की तस्वीरें सिर्फ़ ऑपइंडिया ने नहीं देखी हैं। इन्हें पूरा देश देख रहा है। हर मीडिया चैनल इसे अलग-अलग एंगल से कवर कर रहा है। बावजूद इसके कॉन्ग्रेस एक बढ़िया क्वालिटी से कैप्चर की गई ट्रैक्ट्रर की तस्वीर शेयर करके ये दर्शा रही है कि किसान सैंकड़ों ट्रैकट्रों के साथ किस तरह पंक्तिबद्ध होकर हाथ में झंडा लेकर मार्च निकाल रहे हैं।

इस हरकत को यदि घटिया राजनीति का उत्तम उदाहरण न समझा जाए तो फिर क्या समझा जाए! ऐसे वक्त में ऐसा पोस्ट करने के दो ही मतलब हैं कि या तो कॉन्ग्रेस मानती ही नहीं है कि वह कल तक जिस किसान आंदोलन के प्रदर्शनकारियों के साथ खड़े होने के दावे कर रही थी, वो अब दिल्ली की सार्वजनिक संपत्तियों को तबाह कर रहे है। पुलिस की जान लेने पर आमादा हैं। या फिर ये उनके प्रोटोकॉल में नहीं है कि वो निम्न क्वालिटी वाली उन तस्वीरों को अपने सोशल मीडिया हैंडल से शेयर करें जिसमें साफ दिख रहा है कि कैसे लाठी, डंडो सहित हिंसा को अंजाम दिया जा रहा है।

जो तस्वीरें आज दिल्ली के कई कोनों से देखने को मिल रही हैं। उसका थोड़ा साभार कॉन्ग्रेस के हिस्से में भी जाना चाहिए। जिस तरह पिछले दिनों उन्होंने इस आंदोलन की आग में घी डालने का काम किया। उसी का नतीजा है कि राजधानी में एक बार फिर पुलिस न्याय व्यवस्था को बनाए रखने के लिए संघर्ष कर रही है।

अब गौर दीजिए, एक ओर कॉन्ग्रेस का आधिकारिक अकॉउंट है जिसमें इस उपद्रव की निंदा करने तक की हिम्मत नहीं है। दूसरी ओर इसी पार्टी के पूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी हैं जो इस मुद्दे पर ‘बस सब बोल रहे हैं इसलिए बोलना है’ की तर्ज पर ट्वीट करते हैं। मगर यह नहीं लिख पाते कि प्रदर्शन के नाम पर हो रही हिंसा किस हद तक देश की छवि को मलिन कर रही है और इससे स्पष्ट तौर पर क्या पता चल रहा है।

बैलेंस छवि बनाए रखने के लिए राहुल गाँधी लिखते हैं, “हिंसा किसी समस्या का हल नहीं है। चोट किसी को भी लगे, नुक़सान हमारे देश का ही होगा।” यहाँ तक आपको लगेगा कि राहुल बाबा सही तो कह रहे हैं आखिर नुकसान देश का ही होगा। लेकिन ट्वीट के आखिर में पढ़िए। जहाँ राहुल ने आज के दिन की सभी घटनाओं को दरकिनार करते हुए सरकार से ये कहना नहीं भूले कि देशहित के लिए कृषि विरोधी कानून वापस लो।

मंथन करिए इस बात पर कि राहुल गाँधी कौन से देश हित बात कर रहे हैं और अपने ट्वीट में वह हिंसा के लिए किसे जिम्मेदार मान रहे हैं? आज पूरा देश सवाल कर रहा है कि दिल्ली में अराजकता पैदा करने वाले ये अन्नदाता कैसे हो सकते हैं? मगर, कॉन्ग्रेस अब भी अपने प्रोपगेंडे को चलाने में ही प्रतिबद्ध है। उन्हें दिल्ली में तमाम क्षतिग्रस्त सार्वजनिक संपत्तियाँ नहीं दिख रहीं। लाल किला पर हुआ प्रदर्शनकारियों का कब्जा नहीं दिख रहा। पुलिसकर्मियों को घेरने वालों की मंशा नहीं दिख रही

और ये सब क्यों? क्योंकि देश की सबसे पुरानी पार्टी के लिए आज अस्तित्व बचाने का मतलब यही है कि भाजपा के विरोध में उठी हर आवाज का समर्थन करें। चाहे तो वो आवाज कभी कट्टरपंथियों के रूप में जामिया हिंसा और दिल्ली दंगों को अंजाम दे जाएँ। चाहे तो किसान प्रदर्शन के नाम पर खालिस्तानियों की छाप छोड़ जाएँ।

लौंडा नाच को जीवनदान देने वाले रामचंद्र मांझी, डायन प्रथा के खिलाफ लड़ रही छुटनी देवी: दोनों को पद्मश्री सम्मान

गणतंत्र दिवस के अवसर पर 7 हस्तियों को पद्म विभूषण, 10 को पद्म भूषण और 102 को पद्मश्री पुरस्कार देने का ऐलान हुआ है। कुल 119 नामों की इस सूची में कई ऐसे नाम हैं, जिनके संघर्ष की कहानी लंबी है। इन्हीं में दो नाम रामचंद्र मांझी और छुटनी देवी के हैं। 

दोनों को सरकार ने पद्मश्री से सम्मानित करने का निर्णय लिया है। इनमें से एक ने लौंडा नाच के नाम पर समाज में एक गायब होती परंपरा को जीवनदान दिया है और दूसरी ने डायन जैसी कुरीति की भुक्तभोगी होने के बाद उसके ख़िलाफ लंबी लड़ाई लड़ी है। 

आइए आज जब मोदी सरकार ने 26 जनवरी के इस अवसर पर इन्हें सम्मान से नवाजने के लिए कदम बढ़ाया है, तो इन दोनों के संघर्षों के बारे में बात करें और समझें कि कैसे एक सामान्य नागरिक से सम्मानित नागरिक का सफर इन्होंने तय किया।

94 साल में लौंडा नाच करने वाले रामचंद्र मांझी

भोजपुरी के मशहूर लोक कलाकार भिखारी ठाकुर के साथ काम करने वाले रामचंद्र मांझी स्वयं एक समय के बेहद चर्चित कलाकार हैं। वह 94 साल की उम्र में भी मंच पर जमकर थिरकते हैं। ऐसे में जब उन्हें पता चला कि सरकार ने उनके काम के लिए उन्हें पद्मश्री देने का ऐलान किया है, तो उनकी खुशी का कोई ठिकाना नहीं रहा। लोग उनके आवास पर उन्हें बधाई देने जाने लगे

उन्होंने पद्मश्री मिलने की बात जानकर सरकार का आभार व्यक्त किया। वहीं लौंडा नाच के बारे में बताया कि भिखारी ठाकुर द्वारा चर्चित लोक नृत्य आज हाशिए पर खड़ा है। गिनी-चुनी मंडलियाँ ही बची हैं, जो इस विधा को जिंदा रखे हुए हैं, लेकिन उनका भी हाल खस्ता ही है। नाच मंडली में अब बहुत कम ही कलाकार बचे हैं। जबकि बिहार में आज भी लोग इसे पसंद करते हैं।

बता दें कि इससे पूर्व मांझी को संगीत नाटक अकादमी अवार्ड 2017 से भी नवाजा जा चुका है।  राष्ट्रपति ने उन्हें प्रशस्ति पत्र के साथ एक लाख रुपए की पुरस्कार राशि भी प्रदान की थी। वह बताते हैं कि मात्र 10 वर्ष की उम्र में ही वह भिखारी ठाकुर के दल में शामिल हुए थे। 1971 तक उन्होंने ठाकुर के नेतृत्व में काम किया और उनके मरणोपरांत गौरीशंकर ठाकुर, शत्रुघ्न ठाकुर, दिनकर ठाकुर, रामदास राही और प्रभुनाथ ठाकुर के नेतृत्व में काम किया।

डायन कह छुटनी देवी को गाँव ने खिलाया था मल, आज सैंकड़ों महिलाओं की उम्मीद

झारखंड की छुटनी देवी को जब इस सम्मान के मिलने की बात पता चली, तब उन्हें यही नहीं पता था कि आखिर ‘पद्मश्री’ क्या होता है। उन्हें जब प्रधानमंत्री कार्यालय से बार-बार फोन आया तो उन्हें पता चला कि ये कोई बड़ी चीज जरूर है, तभी फोन आ रहा है

उन्होंने कहा कि उन्हें एक दिन दोपहर के 11 बजे फोन आया और बताया गया कि उन्हें पद्मश्री मिलने वाला है। उन्हें कुछ समझ नहीं आया, बस उन्होंने यह कह कर फोन काट दिया कि उनके पास टाइम नहीं है, एक घंटे बाद फोन करें। इसके बाद दोबारा 12:15 फोन आया। फोन करने वाले ने उन्हें समझाया कि उनका नाम, फोटो, सभी अखबार टीवी में आएगा। वह कहती हैं कि उनके गाँव वालों को जबसे यह पता चला है, तब से उनके गाँव के सभी लोग खुश हैं।

झारखंड के सरायकेला खरसावाँ जिले के भोलाडीह गाँव निवासी छुटनी महतो आज 62 साल की हैं। एक समय था कि घर वालों ने डायन के नाम पर न सिर्फ उन्हें प्रताडि़त किया, बल्कि घर से बेदखल भी कर दिया था। 8 महीने के बच्चे के साथ पेड़ के नीचे रहने वाली छुटनी के लिए वो समय इतना कठिन था कि न पति ने उनका साथ दिया और न घरवालों ने।

इसी के बाद वह अपने जैसी कई महिलाओं की ताकत बनीं। आज वह एसोसिएशन फॉर सोशल एंड ह्यूमन अवेयरनेस (आशा) के सौजन्य से संचालित पुनर्वास केंद्र चलाती है, जहाँ वह बतौर आशा की निदेशक (सरायकेला इकाई) कार्यरत हैं।

वह बताती हैं कि साल 1995 में एक तांत्रिक के कहने पर उन्हें उनके गाँव ने डायन मानकर वहाँ से निकाल दिया था। उनकी गलती बस ये थी कि उन्होंने अपनी भाभी के गर्भवती होने पर कहा था कि बेटा होगा, जबकि हुई बेटी। इसके बाद ही उन्हें डायन करार देकर मल खिलाने की कोशिश हुई और उन्हें पेड़ से बाँध कर अर्धनग्न करके उनकी पिटाई की गई।

एक दिन जब लोग उनकी हत्या की योजना बनाने लगे तो वह पति को छोड़ कर चारों बच्चों के साथ गाँव छोड़ कर भाग गईं। इसके बाद आठ महीने वह जंगल में रहीं। जब आरोपितों के खिलाफ वह केस करने गईं, तो पुलिस ने भी उनकी मदद नहीं की।

अपनी दुर्गति के बाद वह अपने जैसी महिलाओं को न्याय दिलाने के लिए खुद खड़ी हुईं। उन्होंने अपनी जैसी पीड़ित 70 महिलाओं का एक संगठन बनाया। आज ये संगठन इतना सशक्त है कि उन्हें जैसे ही सूचना मिलती है, उनकी टीम मौके पर पहुँच जाती है।

आरोपितों और अंधविश्वास फैलाने वाले तांत्रिकों पर प्राथमिकी दर्ज कराती हैं और पीड़िता को अपने साथ ले आती हैं। कानूनी कार्रवाई के बाद सशर्त घर वापसी कराती हैं। अब तक कुल 100 से अधिक महिलाओं की घर वापसी हो चुकी है। उनका संगठन आरोपितों के खिलाफ कोर्ट में भी लड़ाई लड़ता है।