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लाल किले के भीतर दंगाइयों का आंतक: चकनाचूर हुए काउंटर पर लगे शीशे, उखाड़ दिए गए रेलिंग व बैनर

दिल्ली के लाल किले पर गणतंत्र दिवस के दिन किसान दंगाइयों ने खूब उत्पात मचाया। न केवल तिरंगे का अपमान करते हुए उन्होंने वहाँ सिख झंडा किले से फहराया बल्कि अंदर भी काफी तोड़फोड़ की। आज घटना की अगली सुबह सारे नुकसान की तस्वीरें सामने आ गई हैं।

समाचार एजेंसी एएनआई द्वारा जारी तस्वीरों में देख सकते हैं। शीशे चकनाचूर पड़े हैं। काउंटर को पलट दिया गया है। सारी चीजें तितर-बितर हैं। एजेंसी का कहना है कि ये तस्वीर टिकट काउंटर, मेटल डिटेक्टर गेट की हैं। जहाँ टूटे शीशों के अलावा लाल किले में पुलिसकर्मियों की टोपियाँ भी पड़ी हैं।

न्यूज 18 के अनुसार, लाल किले में घुसी भीड़ ने उपद्रव के दौरान न केवल टिकट काउंटर को पूरी तरह फोड़ा। उन्होंने इसके साथ लगे बोर्डों को भी निकाल कर फेंक दिया। वहीं एसी और रेलिंग को उखाड़कर भी नीचे कर दिया गया है।

यहाँ मालूम हो कि किसान ट्रैक्टर रैली के बाद जहाँ लाल किला को काफी हानि पहुँची है, वहीं पूरे आयोजन का सबसे बुरा प्रभाव पुलिसकर्मियों पर पड़ा है। आज सुबह तक इस हिंसा में घायल हुए पुलिसकर्मियों की संख्या 109 हो गई है। दिल्ली पुलिस ने एक बयान जारी करते हुए कहा है कि हिंसा में शामिल लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी। दिल्ली के ज्वाइंट पुलिस कमिश्नर आलोक कुमार ने कहा कि ट्रैक्टर रैली में पुलिस कर्मियों के साथ मारपीट करने वालों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई होगी।

बता दें कि कल उपद्रवी किसानों ने दिल्ली पुलिस मुख्यालय के सामने रखे बैरिकेड्स को तोड़ने के साथ ही पुलिस वाहनों को भी क्षतिग्रस्त कर दिया था। आईटीओ में कुछ प्रदर्शनकारी एक पुलिसकर्मी को निर्ममता से पीटते दिखे थे। इस बीच एक हिस्से ने उस पुलिसकर्मी को बचाया भी। दूसरी जगह ट्रैक्टर पर बैठे प्रदर्शनकारी ने पुलिसकर्मियों पर ट्रैक्टर चढ़ाने कोशिश की थी। आईटीओ में खड़ी सरकारी बसों में तोड़फोड़ हुई थी। घोड़े पर बैठे निहंगों ने बैरिकेडिंग को तोड़ा था।

इस्लामी हो या खालिस्तानी… निशाना हिन्दू ही है: एक ही ट्रेंड को बार-बार देख कर भी केंद्र और SC शांत क्यों?

दिल्ली दंगों के दौरान महिला पत्रकारों के साथ बदसलूकी हुई थी। ‘किसान आंदोलन’ के दौरान हुई ट्रैक्टर रैली में महिला पुलिसकर्मियों के साथ दुर्व्यवहार हुआ। ‘दिल्ली दंगों’ में कई पुलिसकर्मी घायल हुए थे। अब भी ये आँकड़ा 153 का है। तब भीड़ मुस्लिम बहुल इलाकों से निकली थी। अभी पंजाब से आकर बैठी हुई है। तब भी कॉन्ग्रेस उनके साथ थी, अब भी इनके साथ है। तब भी निशाना एक कानून था, अबकी निशाना 3 कानून हैं।

दिल्ली के हिन्दू विरोधी दंगे और खालिस्तानी आंदोलन: समानताएँ

तब भी कपिल मिश्रा को बलि का बकरा बनाने की कोशिश हुई थी। अब अपने में से ही एक का ‘त्याग’ कर के उसे भाजपा का आदमी बताया जा रहा है। तब हिन्दुओं के घर और दुकान जले थे। अब लाल किले पर खालिस्तानी झंडे फहराए गए। तब मीडिया ताहिर हुसैन के डॉक्टर्ड वीडियो के जरिए उसे निर्दोष साबित कर रहा था, आज मीडिया ये बताने में लगा है कि वो फलाँ झंडा था, उसका चिलाँ महत्व है।

तब इस्लामी चरमपंथी थे, अब खालिस्तानी चरमपंथी हैं। तब कोई शाहरुख़ खान पुलिस के सामने बंदूक लेकर खड़ा था, अब ‘किसान’ प्रदर्शनकारियों ने पुलिसकर्मियों को तलवारों के दम पर खदेड़ा। तब भी फेक न्यूज़ फैला कर पुलिस को बदनाम किया गया। अब भी राजदीप सरदेसाई जैसों ने स्टंट करते हुए मरे किसान को पुलिस की गोली का शिकार बता दिया। तब भी योगेंद्र यादव थे, अब भी योगेंद्र यादव हैं।

चाहे वो भीमा-कोरेगाँव हिंसा हो, दिल्ली दंगे हो या फिर ‘किसानों’ द्वारा की गई हिंसा हो – वामपंथी, इस्लामी चरमपंथी और खालिस्तानी कट्टरवादी गैंग एक ही थाली के चट्टे-बट्टे हैं, जो योगेंद्र यादव जैसे कई डोरों से बँधे हुए हैं। JNU में विकलांगों को आगे किया जाता है, जामिया में छात्रों को, भीमा-कोरेगाँव में दलितों को, दिल्ली दंगों में महिलाओं को और ‘किसान आंदोलन’ में बुजुर्ग सिखों को। पूरे आंदोलन को सही साबित करने के लिए ये इनका अनिवार्य पैटर्न है।

दिल्ली दंगों में दिखाया गया कि कैसे मुस्लिमों ने हिन्दुओं को बचाया। बेंगलुरु में मुस्लिम भीड़ उग्र हो जाती है तो उसे ह्यूमन चेन बनाते हुए दिखाया जाता है। इसी तरह अब खालिस्तानी आंदोलन में प्रदर्शनकारियों को एक एम्बुलेंस को रास्ते देते हुए दिखाया जा रहा है। तब हिन्दू विरोधी नारेबाजी और पोस्टरों का इस्तेमाल हुआ था, अब देश के राष्ट्रीय ध्वज का अपमान हुआ है। तब पूरे देश में कई शाहीन बाग़ बना दिए गए थे, अब पूरे देश में आंदोलन की तैयारी है।

सुप्रीम कोर्ट ने कृषि कानूनों को रोका, किसान संगठनों ने शुरू कर दिया नंगा नाच

तीनों कृषि कानूनों को चुनौती देते हुए कई याचिकाएँ दायर की गई थीं। सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि विरोध प्रदर्शन करने से किसी को रोका नहीं जा सकता। किसान नेताओं के वकीलों ने CJI के सामने ही झूठे वादे किए। देश के सर्वोच्च न्यायालय ने इन कानूनों पर रोक लगा दी, कमिटी गठित कर दी – लेकिन किसान नेताओं ने न्यायपालिका का सम्मान नहीं किया। कमिटी के एक सदस्य को इस्तीफा देना पड़ा।

सुप्रीम कोर्ट ने तीनों कानूनों के लागू होने पर रोक लगा दी। फिर भी किसान कहते रहे कि उन्हें इन सब पर यकीन नहीं। असल में इनके दो धड़े होते हैं, जिसका खुलासा CAA विरोधी आंदोलन के समय ही हो गया था। एक धड़ा सड़क पर जम कर अराजकता फैलाता है और एक बड़े अधिवक्ताओं का समूह सुप्रीम कोर्ट में उनके बचाव के लिए खड़ा रहता है। सुप्रीम कोर्ट में वो जो कहते हैं, सड़क पर उसका उलटा करते हैं।

याद कीजिए दिसंबर 2020 के मध्य में जब दिल्ली में जामिया वाले दंगे कर रहे थे। जामिया मिलिया इस्लामिया और अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के छात्रों ने दंगे कर के पुलिस को बदनाम किया। मामला सुप्रीम कोर्ट गया तो CJI बोबडे ने क्या कहा था? उन्होंने कहा था कि पहले दंगे बंद करो, पत्थरबाजी बंद करो, तब सुनवाई होगी। उन्होंने स्पष्ट कह दिया था कि जब तक हिंसा और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाना बंद नहीं करेंगे, वो मामले को नहीं सुनेंगे।

उनका कहना था कि वो छात्र हैं तो इसका मतलब ये नहीं कि वो कानून को अपने हाथ में ले लेंगे। अंतर क्या है? तब वो ‘छात्र’ थे, अब ‘किसान’ हैं। बार-बार सुप्रीम कोर्ट और न्यायपालिका को अँधेरे में रख कर इस तरह की करतूतें की जाती हैं। दिल्ली के हिन्दू विरोधी दंगों में कपिल मिश्रा और अनुराग ठाकुर जैसे जनप्रतिनिधियों को ही कोर्ट में घसीट लिया गया था। आखिर क्या कारण है कि बार-बार यही ट्रेंड अपनाया जाता है और विधायिका व न्यायपालिका को पता नहीं चलता?

जब सुप्रीम कोर्ट ने कृषि कानूनों को रोक दिया तो उसे किसानों को भी गणतंत्र दिवस के दिन ट्रैक्टर रैली न निकालने को कहना चाहिए था, ऐसा सोशल मीडिया पर भी लोगों का मानना था। लेकिन, सुप्रीम कोर्ट ने इसके लिए दिल्ली पुलिस को निर्णय लेने को कहा और पूछा कि क्या केंद्र सरकार को हम याद दिलाएँगे कि उनके पास शक्तियाँ हैं? शक्ति तो कानून बनाने की भी थी, लेकिन क्या हुआ? रोक लगी उस पर।

उपद्रवियों से खुद को अलग कर लेना, या भाजपा को जिम्मेदार ठहरा देना

JNU में जब वामपंथी छात्रों ने हॉस्टलों में घुस-घुस कर ABVP के छात्रों की पिटाई की थी, तब मीडिया में उन्हें ‘भाजपाई’ साबित करने के लिए एक अलग सी ही होड़ मच गई थी। मीडिया चैनलों ने नकाबपोशों से लेकर ऑडियो रिकॉर्डिंग्स तक निकाल कर दावा किया कि ये तो ABVP के ही छात्र थे, जो मास्क पहन कर लेफ्ट के छात्रों को पीट रहे थे। जबकि वास्तविकता साफ़ दिख रही थी कि अस्पतालों में भर्ती अधिकतर पीड़ित ABVP के हैं।

अब राकेश टिकैत कह रहे हैं कि दीप सिद्धू, जिसने लाल किला पर सिख झंडा फहराया और जिसके पीछे-पीछे सैकड़ों प्रदर्शनकारी उपद्रव करते हुए घूम रहे थे – वो भाजपा का आदमी है। इसके लिए तस्वीर शेयर की जा रही है कि वो भाजपा के फलाँ नेता के साथ दिखा था। तस्वीरें तो मनमोहन सिंह और नरेंद्र मोदी की भी ढेर सारी हैं साथ में। तो क्या ये दोनों किसी मेले में भटके हुए दो भाई हो गए?

तस्वीरें तो राकेश टिकैत की राजनाथ सिंह के साथ भी है। लेकिन, इसका मतलब ये थोड़े हुआ कि उनका रिमोट कंट्रोल देश के रक्षा मंत्री के हाथ में है! कुछ किसान नेता उपद्रवियों से पल्ला झाड़ रहे हैं, कुछ पुलिस पर आरोप लगा रहे, कुछ इसे देशव्यापी बनाना चाहते हैं, कुछ मीडिया फुटेज से खुश हैं तो कुछ अराजकता में अपनी राजनीतिक जमीन सींच रहे। हाल ही में गुरनाम चढूनी नामक किसान नेता पर कॉन्ग्रेस से 10 करोड़ रुपए लेने का आरोप लगा। साथी किसान नेताओं ने ही लगाया था।

कपिल मिश्रा और अनुराग ठाकुर को दिल्ली दंगों के लिए जिम्मेदार ठहराने वाले आज कह रहे हैं कि अरे केंद्र सरकार कानून वापस ले ही लेती तो क्या हो जाता? तब तो राम मंदिर, अनुच्छेद 370, तीन तलाक, CAA और कृषि कानूनों – इन सभी को वापस लेना पड़ेगा क्योंकि इन सबका विरोध करने वाले एक ही समूह के लोग थे। अराजकता का भय दिखा कर विकास नहीं होने दिया जाएगा। प्रधानमंत्री अपने आवास से निकलेंगे तो इसका भी विरोध होगा। तो क्या वो घर में बैठे रहेंगे?

दीप सिद्धू ने किस तरह से बरखा दत्त के शो में खालिस्तानी आतंकी भिंडरवाले का बचाव किया और उसे अपना नायक बताया, ये वीडियो सामने आ चुका है। ये सारे पत्रकार मिल कर चाहे इन हिंसक नेताओं पर कितनी भी सफेदी डालें, उनकी करतूतें दिख ही जा रही हैं। लाल किला में जिस तरह से पुलिसकर्मियों को दीवार फाँद-फाँद कर अपनी जान बचानी पड़ी, ये सबने देखा है। अब डैमेज कंट्रोल, पल्ला झाड़ना और भाजपा पर ब्लेम गेम नहीं चलेगा

कोर वोटरों की भावनाओं का सम्मान करे केंद्र सरकार

जनता ने नरेंद्र मोदी को सिर्फ विकास के लिए नहीं चुना है। परमाणु परीक्षण हो, राजमार्गों का जाल बिछाना हो, कारगिल विजय हो या फिर सर्व शिक्षा अभियान हो – विकास वाजपेयी ने भी खूब किया था। भाजपा को देश की जनता ने, हिंदुओं ने, इसलिए भी लाया है ताकि हमारे इतिहास, हमारी संस्कृति और हमारी सनातन विरासत पुनर्जीवित हो। वामपंथी इतिहासकारों का वर्चस्व ख़त्म हो। फर्जी बुद्धिजीवी तेल लेने जाएँ।

यही जनता जब इस्लामी भीड़ को सड़कों पर सरेआम हिन्दुओं के घरों और दुकानों को जलाते हुए देखती है तो उसका विश्वास हिलता है। यही हिन्दू जब उन्हीं वामपंथी फर्जी बुद्धिजीवियों को नैरेटिव सेट करते हुए देखते हैं तो वो निराश होते हैं। यही मध्यम वर्ग जब किसी खास वर्ग को अराजकता के माध्यम से पूर्ण बहुमत वाली पार्टी को अपने सामने झुकाते हुए देखता है तो उसे अपने वोट की कीमत नगण्य लगती है।

आज लोग पूछ रहे हैं कि जब आम जनता को महीनों पहले से अंदाज़ा था कि ट्रेंड के हिसाब से राजधानी में अराजकता फैलाई जा सकती है, फिर नेताओं और अधिकारियों को इसकी आशंका न रही हो – ऐसा कैसे हो सकता है। आज लोग सवाल उठा रहे हैं कि खुलेआम अराजकतावादी और धमकी भरी बातें करने वाले कैसे खुले साँड़ बने हुए हैं? लोग जानना चाहते हैं कि आतंकवाद पर सख्त सरकार इन पिद्दियों से क्यों नहीं सख्ती से निपटती?

जनता देख रही है कि किसी गरीब ने मास्क नहीं लगाया तो उसे जुर्माना देना पड़ रहा है (जो उसकी जान बचाने के लिए जायज हो सकता है), लेकिन हजारों लोग बिना मास्क के महीनों बैठ जाते हैं और सारे कोरोना दिशा-निर्देशों का पालन नहीं करते, तो उनका कुछ नहीं उखड़ता। जनता देख रही है कि हेलमेट न होने पर हजारों फाइन लगता है लेकिन हजारों ट्रैक्टर विरोध के नाम पर निकलते हैं तो किसके पास कौन सा लाइसेंस है, कोई चेक तक नहीं करता।

‘केदारनाथ’ और ‘राम मंदिर’ पर किसान दंगाइयों का आतंक, 26 जनवरी परेड वाले मंदिर का गुंबद तोड़ा

राजधानी दिल्ली में गणतंत्र दिवस के मौके पर ‘किसान’ दंगाइयों ने तिरंगा के अपमान के साथ ही राम मंदिर और केदारनाथ मंदिर को निशाना बनाते हुए राम मंदिर की झाँकी के कुछ हिस्सों को तोड़ दिया। दंगाइयों ने अयोध्या श्रीराम मंदिर की झाँकी के लिए बनाए गए राम मंदिर के गुम्बद को निशाना बनाकर उसे तोड़ डाला। ये दोनों झाँकी कल गणतंत्र दिवस की परेड में दिखाई गई थीं।

समाचार चैनल ‘आज तक’ की एक रिपोर्ट में एक व्यक्ति इस बात की जानकारी दे रहा है। विकास का कहना है कि कल राम मंदिर की झाँकी एकदम सही हालत में यहाँ पर मौजूद थी, लेकिन दंगाइयों ने सुरक्षाकर्मियों के सामने ही केदारनाथ मंदिर की झाँकी को निशाना बनाया और राम मंदिर की प्रतिमा के ऊपर के गुंबद को तोड़ दिया। विकास ने कहा कि सुरक्षाकर्मियों ने किसी तरह से मंदिर की प्रतिमा को क्षतिग्रस्त होने से बचाया।

वहीं, गणतंत्र दिवस के मौके पर दिल्ली में हुई हिंसा में एक्शन लेते हुए दिल्ली पुलिस ने करीब 200 प्रदर्शनकारियों को हिरासत में ले लिया है। इन पर हिंसा करने, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाने और पुलिसकर्मियों पर हमला करने का आरोप लगा है।

मंगलवार को हुए इन ‘किसान दंगों’ में अब तक कुल 22 FIR दर्ज की जा चुकी हैं। पुलिस ने कहा कि वे सत्यापन करने के बाद गिरफ्तारी कर रहे हैं। दंगों में 230 से ज्यादा लोगों के घायल होने की खबर है।

राष्ट्रीय राजधानी में लाल किले और किसान विरोध स्थलों पर कई स्थानों पर सुरक्षा कड़ी कर दी गई है। मंगलवार के दिन ट्रैक्टर परेड के लिए निर्धारित मार्ग से दूर, सैकड़ों प्रदर्शनकारियों ने सीमाओं पर बैरिकेड्स को तोड़ दिया और पुलिस के साथ भिड़ गए। उन्होंने कई जगहों से दिल्ली में प्रवेश किया और गणतंत्र दिवस पर लाल किले पर धावा बोलते हुए तिरंगे का भी अपमान किया।

गणतंत्र दिवस की सुबह से ही किसानों का प्रदर्शन उग्र होता गया। इस बीच, दिल्ली के DDU मार्ग पर एक व्यक्ति की ट्रैक्टर पलटने के कारण मौत हो गई। आईटीओ के पास पूरे चौक पर सैकड़ों की संख्या में किसान ट्रैक्टर लेकर खड़े रहे। जिसे लेकर समाचार चैनल ‘इंडिया टुडे’ के पत्रकार राजदीप सरदेसाई ने एक और फेक न्यूज़ फैला दी और पोल खुलने पर अपना ट्वीट चुपके से डिलीट भी कर दिया।

‘गणतंत्र किसी के बाप की जागीर है, ट्रैक्टर रोके तो बकल उतार दिए जाएँगे, बैरिकेड्स तोड़ेंगे’: टिकैत और चढूनी ने खुलेआम दी थी धमकी

दीप सिंह सिद्धू तो खालिस्तानी समर्थक है ही और वो उस गिरोह का भी सदस्य है, जो ‘किसान आंदोलन’ के पीछे है और जिसे गणतंत्र दिवस के दिन ‘किसानों’ की ट्रैक्टर रैली के दौरान दिन भर हिंसा की। एक दीप सिद्धू ही नहीं, बल्कि इसी गिरोह के कई नेता हैं जिन्होंने हिंसा की धमकी दी थी। किस-किस से पल्ला झाड़ेंगे? यहाँ हम 2 किसान नेताओं राकेश टिकैत और गुरनाम सिंह चढूनी के 2 धमकी भरे बयानों के बारे में बताएँगे, जिनसे पता चलता था कि गणतंत्र दिवस को क्या होने वाला है।

नीचे संलग्न किए गए वीडियो में टिकैत कहते सुनाई दे रहे हैं, “देश को गणतंत्र दिवस मनाने का अधिकार है। किसी के बाप की जागीर है गणतंत्र दिवस। ये गणतंत्र दिवस दुनिया का किसान मनाएगा। दुनिया की सबसे बड़ी परेड होगा। कौन रोकेगा किसान को। अगर ट्रैक्टर को रोका गया तो उसका इलाज होगा। अगर किसी ने रोका तो उसकी बकल उतार दी जाएगी। कौन रोकेगा ट्रैक्टर को? कोई नहीं रोकेगा। खबरदार जो किसी ने भी ट्रैक्टर को रोका। आप बकवास कर रहे हैं।”

वहीं एक बयान है गुरनाम सिंह चढूनी का। इसमें वो कहते हैं, “हमें बुलाने का मकसद क्या है? खाली तारीख देने के लिए बैठक बुलाती है सरकार। उन्होंने 15 तारीख को आने को कहा और 7 लोगों को ही लाने के लिए बोला। अब 7 जाएँगे कि 60, ये तो हम फैसला कर के ही बताएँगे। लेकिन, बात ये है कि सरकार कुछ मानने को तैयार नहीं है। सरकार जिद पर अड़ गई है। हम 26 तारीख को सरकार को चेतावनी देने वाले हैं।”

मंगलवार (जनवरी 26, 2021) को प्रस्तावित हिंसा को लेकर उन्होंने तभी कहा था, “उस दिन हमने सभी किसानों से कहा है कि वो तैयारी कर के अपने ट्रैक्टरों के साथ आ जाएँ और हम सब जबरदस्ती पुलिस की बैरिकेड्स तोड़ कर दिल्ली में घुसेंगे। सरकार गोली मारे, लाठी मारे या जो करना है करे। लेकिन, ये फाइनल मैच होगा। उस दिन जो भी होगा, वो सरकार की जिम्मेदारी होगी। ये हमारी बात नहीं सुन रहे।”

किसान संगठनों ने ऐलान किया है कि फ़रवरी 1, 2021 को जब देश की संसद में बजट पेश किया जा रहा होगा, तब वो फिर से संसद की तरफ मार्च करेंगे। उन्होंने कहा कि मंगलवार (जनवरी 26, 2021) को हुई जबरदस्त हिंसा के बावजूद ये योजना स्थगित नहीं की गई है। किसान नेता राकेश टिकैत ने खालिस्तानी समर्थक दीप सिद्धू से पल्ला झाड़ते हुए उसे भाजपा का कार्यकर्ता बता दिया है। हिंसा पर उन्होंने कहा कि गलती पुलिस की है। 

लाइव TV में दिख गया सच तो NDTV ने यूट्यूब वीडियो में की एडिटिंग, दंगाइयों के कुकर्म पर रवीश की लीपा-पोती

कृषि कानून के विरोध में किसान प्रदर्शनकारियों ने हर जगह भारत की थू-थू करवा दी, लेकिन NDTV पत्रकार रवीश कुमार अब भी हिंसक तत्वों के कुकर्मों पर लीपा-पोती करके उसे ढकने की कोशिशों में लगे हैं। सड़कों पर हुई हिंसा, लाल किला पर जमा भीड़, तिरंगे का अपमान और घायल पुलिसकर्मियों की तस्वीरें जहाँ कल दोपहर से सोशल मीडिया पर तैर रही हैं, वहीं रवीश कुमार अब भी यही प्रयास कर रहे हैं कि किसी तरह सारी अराजकता को शांतिपूर्ण प्रदर्शन कह दिया जाए।

अपनी इन्हीं कोशिशों को सफल करने के लिए रवीश का और उनके संस्थान का एक नया कारनामा उजागर हुआ है। दरअसल, रवीश के लाइव शो कवरेज में उनके रिपोर्टर ने ग्राउंड से रिपोर्ट दी जिसमें दंगाई स्वयं बता रहे थे कि अधिकारों की लड़ाई के लिए वह हिंसा कर रहे हैं। मगर, जब शो की वीडियो यूट्यूब पर अपलोड हुई तो उससे वो सेक्शन बिलकुल गायब था।

शो की क्लिप में देख सकते हैं कि रवीश कुमार ने उस सेक्शन की जगह एक वायरल होती वीडियो का इस्तेमाल किया। किंतु ये बताना जरूरी नहीं समझा कि कैसे उसमें प्रदर्शनकारी दिल्ली पुलिस पर हमला बोल रहे हैं और उनके चलते पुलिस को दीवारों से नीचे छलांग मारनी पड़ रही है।

यूट्यूब पर अपलोड वीडियो में एनडीटीवी ने खुद को न्यूट्रल दिखाने के लिए उसी सेक्शन को हटाया, जिसमें लाल किले पर पहुँचे लोग बता रहे थे कि वह वहाँ क्यों आए हैं।

रवीश ने कहा – किसान उग्र नहीं हुए, जोश में थे

बात यही खत्म नहीं हुई। रवीश ने कथित किसानों के उग्र बर्ताव को नजरअंदाज करते हुए कहा कि प्रदर्शन तो बहुत शांतिपूर्ण तरह से शुरू हुआ था। लेकिन जैसे-जैसे भीड़ बेकाबू हुई, लाल किले पर अधिक से अधिक ट्रैक्टर आने लगे। रवीश ने यह भी कहा कि प्रदर्शनकारी उग्र नहीं थे बल्कि केवल जोश में थे। अगर ऐसा नहीं होता तो लाल किले को खासा नुकसान पहुँच सकता था।

उनके मुताबिक किसानों का तलवार के साथ सड़कों पर आना, लाल किला कब्जाना, घोड़े पर सवार हो पुलिस को खदेड़ना, पुलिस को जानबूझकर मारना, महिला कर्मचारी से बदसलूकी… ये सब उग्र बर्ताव का नतीजा नहीं होता। इसे जोश कहा जाता है।

उग्र ट्रैक्टर रैली ने दिया एंबुलेंस को रास्ता- NDTV

एनडीटीवी के प्रोपगेंडे की हद देखिए कि जब पूरी दिल्ली जानती है कि किसान आंदोलन के कारण सड़कें किस प्रकार बाधित रहीं, तब वह सारी बात घुमाकर यह दिखाने की कोशिश कर रहे हैं कि कैसे प्रदर्शनकारियों ने एंबुलेंस को जगह दी, जबकि सच्चाई यह थी कि वो एंबुलेंस भी उसी ट्रैक्टर रैली के कारण असुविधा झेल रही थी।

गौरतलब हो कि दिल्ली में कल सैंकड़ों की संख्या में किसान प्रदर्शनकारियों ने बैरिकेड तोड़कर सभी नियमों की धज्जियाँ उड़ाई। फिर सड़कों पर अराजकता फैला कर कानून अपने हाथ में लिया। उन्होंने न केवल अपने तय मार्ग बदले बल्कि संसद और लाल किला की ओर मार्च भी किया।

इस दौरान स्थिति को नियंत्रित करने के लिए पुलिस ने लाठी चार्ज किया व आँसू गैस के गोले छोड़े। मगर, दंगाई ने पुलिस को ही पीटना शुरू कर दिया। पूरी हिंसा ट्रैक्टर रैली में शामिल दंगाइयों की मनमानी के चलते भड़की। फिर भी एनडीटीवी ऐसे घटिया कोशिशों में लगा रहा कि वह अपने दर्शकों को बरगला कर सारा ठीकरा प्रशासन व पुलिस पर फोड़ सके।

26 जनवरी के दिन ‘पाकिस्तान जिंदाबाद’ और ‘कश्मीर वापस लेंगे’ के नारे: अरशद, इमरान समेत 4 गिरफ्तार

गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर जहाँ पूरे देश में 26 जनवरी को लेकर खुशी का माहौल था, उस समय जयपुर-भोपाल ट्रेन में पाकिस्तान जिंदाबाद और कश्मीर वापस लेंगे जैसे नारे लगाए गए। इस घटना के बाद पुलिस ने 4 युवकों को गिरफ्तार किया। पकड़े गए चारों युवक उज्जैन से अजमेर जा रहे थे।

आरोपितों के ख़िलाफ़ आईपीसी की धारा 153(ख)(1)(क) के अंतर्गत कार्रवाई हुई है। इसके तहत 3 साल की सजा का प्रावधान है। चारों आरोपितों की ट्रेन के अंदर बैठे एक वीडियो भी सामने आई है। हालाँकि इसमें वह नारे लगाते नहीं दिखाई दे रहे।

दैनिक भास्कर के अनुसार, सोमवार रात जयपुर-भोपाल एक्सप्रेस उज्जैन जंक्शन से 8.20 पर छूटी थी। इसके बाद कोच नंबर डी-2 में कुछ युवकों को राष्ट्रविरोधी बातें करते सुना गया। जब अन्य यात्रियों ने इस पर आपत्ति जताई, तो चारों युवक व उनके साथ के लोग मारपीट पर आमादा हो गए।

बात बढ़ी तो अन्य यात्रियों ने पुलिस को इसकी सूचना दे दी। लेकिन तब तक सभी आरोपित फरार होने की कोशिश करने लगे। जब ट्रेन रात 9:20 पर नागदा जंक्शन पहुँची, तो वहाँ जीआरपी ने चार युवकों को हिरासत में ले लिया। वहीं इनके कुछ साथी फरार हो गए।

टीआई ने घटना के संबंध में बताया कि पकड़े गए युवकों में शाजापुर का अरशद और इमरान खान और उज्जैन के आगर रोड सम्राट नगर निवासी जैदखान व खंदार मोहल्ला निवासी साहेबुद्दीन हैं। चारों और फरार हुए उनके साथी अजमेर जा रहे थे।

बता दें कि इस पूरे मामले में उज्जैन के अंकपात मार्ग निवासी सूरज सेन ने शिकायत करवाई है। सूरज ने आरोपितों पर इल्जाम लगाया कि वह, देश विरोधी बातें कर रहे थे, इसलिए पहले उन्होंने उन सबको ऐसा करने से मना किया। लेकिन बात मानने की बजाय युवकों ने उन्हीं के साथ मारपीट शुरू कर दी।

गौरतलब है कि इससे पहले पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगाने का मामला दिल्ली के खान मार्केट से सामने आया था। स्थानीय लोगों की शिकायत पर पुलिस ने मौके पर पहुँच कर घटना में शामिल दो पुरुषों, एक नाबालिग और तीन महिलाओं को पकड़ा था। पूछताछ के दौरान पुलिस को पता चला कि इन लोगों ने यहाँ किराए पर बाइक्स लीं और एक-दूसरे से रेस लगाने लगे। इस दौरान उन्होंने एक-दूसरे का नाम देशों के नाम पर रखा, जिनमें पाकिस्तान भी शामिल था।

अब पूरे देश में ‘किसान’ करेंगे विरोध प्रदर्शन, हिंसा के लिए माँगी ‘माफी’… लेकिन अगला निशाना संसद को बताया

दिल्ली में गणतंत्र दिवस के शुभ मौके पर हुई ‘किसानों’ की ट्रैक्टर रैली के कारण 153 पुलिसकर्मी घायल हुए और जगह-जगह हिंसा हुई। अब भी किसान नेता अपनी गलती न मानते हुए बेशर्मी से हिंसा का बचाव कर रहे हैं, पुलिस पर ही दोष मढ़ रहे हैं और पूरे देश में प्रदर्शन की धमकी दे रहे हैं। राकेश टिकैत की भी बयानबाजी चालू है। किसान संगठनों ने कहा है कि वो केंद्र सरकार के तीनों कृषि कानूनों के खिलाफ विरोध प्रदर्शन जारी रखेंगे और इसे पूरे देश में फैलाएँगे।

किसान संगठनों ने ऐलान किया है कि फ़रवरी 1, 2021 को जब देश की संसद में बजट पेश किया जा रहा होगा, तब वो फिर से संसद की तरफ मार्च करेंगे। उन्होंने कहा कि मंगलवार (जनवरी 26, 2021) को हुई जबरदस्त हिंसा के बावजूद ये योजना स्थगित नहीं की गई है। हालाँकि, जनता व पुलिस को हुई परेशानी को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट और पुलिस-प्रशासन इस बार सख्त रवैया अख्तियार कर सकता है।

अब तक किसान संगठनों को जो भी थोड़ा-बहुत समर्थन मिल रहा था, इस पूरे दिन के हुड़दंग के बाद उनसे पूछे जा रहे सवालों का वो अजीबोगरीब जवाब दे रहे हैं। अब ये किसान नेता कह रहे हैं कि विरोध प्रदर्शन देशव्यापी हो गया है और वो तीनों कानूनों को खत्म करने के साथ-साथ MSP की गारंटी वाली माँग पर अड़े हुए हैं। शुक्रवार से बजट सेशन शुरू हो रहा है और ये किसान नेता इस उम्मीद में बैठे हैं कि विपक्षी नेता संसद में उनका बचाव करेंगे।

भाजपा और केंद्र सरकार ने भले ही इस पूरी हिंसा पर कोई आधिकारिक बयान न दिया हो, लेकिन केंद्रीय गृह मंत्रालय कानून-व्यवस्था को पुनः स्थापित करने की प्राथमिकता के साथ आगे बढ़ रहा है। सुप्रीम कोर्ट में सरकार ज़रूर किसान नेताओं के उस वादे की याद दिलाएगी, जिसमें उन्होंने प्रदर्शन के शांतिपूर्ण रहने की बात की थी। पंजाब एक ऐसा राज्य है जो संवेदनशील है, पाकिस्तान की सीमा से सटा है और खालिस्तानी अलगाववादी ताकतें सिर उठा रही हैं – यही कारण है कि किसान प्रदर्शनकारियों के खिलाफ प्रशासन सख्त नहीं हुआ।

पंजाब में चुनाव भी होने हैं, ऐसे में उस वक़्त गड़बड़ी की आशंका भी है। किसानों के लाख प्रयास के बावजूद उनका विरोध प्रदर्शन पंजाब और दिल्ली से सटे हरियाणा-उत्तर प्रदेश के इलाकों से आगे नहीं बढ़ पा रहा है। महिला किसान अधिकार मंच की कविता कुरुगंटी ने कहा कि ये उपद्रवी किसान आंदोलन का हिस्सा नहीं थे। ऑल इंडिया किसान सभा के पी कृष्णा प्रसाद को लगता है कि अब दूसरे राज्यों के किसान भी उत्साह में आकर सड़कों पर निकलेंगे।

ये सभी इस उम्मीद में चल रहे हैं कि अब ये आंदोलन पैन-इंडिया हो जाएगा। यानी अब ये किसान नेता हिंसा में भी राजनीति की खेती कर के मोदी सरकार के खिलाफ अपने अंध-विरोध को किसानों के हित में आए कृषि कानूनों के सहारे हवा देना चाहते हैं। उन्हें लगता है कि मीडिया में भले ही उनकी करतूतों के कारण नकारात्मक कवरेज मिली, ज्यादा से ज्यादा लोगों को इसके बारे में पता तो चला। इसीलिए, अब देश भर में अराजकता की तैयारी है।

वहीं किसान नेता राकेश टिकैत ने खालिस्तानी समर्थक दीप सिद्धू से पल्ला झाड़ते हुए उसे भाजपा का कार्यकर्ता बता दिया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ उसकी तस्वीर होने का दावा किया। जबकि वो बरखा दत्त सरीखों को इंटरव्यू दे-दे कर भिंडरवाला का बचाव करने में लगा हुआ था। राकेश टिकैत ने कहा कि ये किसानों का आंदोलन है और किसानों का ही रहेगा। उन्होंने दावा किया कि बैरिकेडिंग तोड़ने वालों को ये जगह छोड़नी होगी और अब वो इस आंदोलन का हिस्सा नहीं रहेंगे।

अब डैमेज कंट्रोल के लिए इस तरह के बयान दिए जा रहे हैं क्योंकि उन्हें सरकारी कार्रवाई के साथ-साथ जनभावनाओं का भी भय है। राकेश टिकैत ने दावा किया कि उन्होंने सभी आंदोलनकारियों को अपनी छड़ी लाने को कहा था, जिसमें झंडे लगे हों। लाठी-डंडों से पुलिस की पिटाई होने पर उन्होंने कहा कि आप मुझे एक भी ऐसा झंडा दिखा दीजिए, जिसमें छड़ी न हो, वो अपनी गलती स्वीकार लेंगे। उन्होंने कहा:

“हमारे किसानों के कई ट्रैक्टर वापस नहीं आए हैं। हमारे ट्रैक्टरों को पुलिस ने तोड़फोड़ डाला है। अब पुलिस को उन ट्रैक्टरों को बनवा कर हमें वापस देना होगा और नुकसान की भरपाई करनी पड़ेगी। हम जानकारी जुटा रहे हैं कि कितने ट्रैक्टर तोड़े गए। हिंसा पुलिस ने की या किसी ने भी, हम इसकी निंदा करते हैं। सबका सहयोग रहा है – किसानों का, पुलिस का। गलती पुलिस की है। उन्होंने रूट गलत दिया। बेचारे किसानों को क्या पता कि कहाँ डाइवर्जन है, कहाँ ओवरब्रिज है। वो भटक गए।”

उधर अमेरिका के वॉशिंगटन डीसी में खालिस्तान समर्थकों ने कानून के विरोध में भारतीय दूतावास के बाहर प्रदर्शन किया और खालिस्तानी झंडे लहराए। वॉशिंगटन के प्रमुख प्रदर्शनकारियों में से एक, नरेंद्र सिंह ने कृषि कानूनों को ‘भारत के मानव अधिकारों और लोकतंत्र का उल्लंघन’ कहा। वह बोले कि वो लोग हर साल 26 जनवरी को काला दिवस के रूप में मनाते हैं, लेकिन इस साल हम भारत में किसानों के साथ एकजुटता से खड़े हैं।

अब्दुल ने 14 साल की लड़की से रेप किया, वीडियो भी बनाया… उसका अब्बा धर्म परिवर्तन कर निकाह के लिए बनाया दबाव

उत्तर प्रदेश के बलिया में 14 साल की एक लड़की का रेप करने के बाद उस पर धर्म परिवर्तन का दबाव बनाने के आरोप में पुलिस ने 22 साल के अब्दुल रहमान को पकड़ा है। रहमान ने 11 जनवरी 2021 को जबरन लड़की के घर में घुस कर उसके साथ दुष्कर्म किया था। इस दौरान उसने उसकी वीडियो क्लिप भी बनाई थी, जिसे दिखा कर वह बार-बार उससे शारीरिक संबंध बनाने की बात कर रहा था। रहमान का अब्बा पीड़िता पर धर्म-परिवर्तन का दबाव बना रहा था।

पुलिस ने अब इस केस को लव जिहाद समेत अन्य उपयुक्त धाराओं में दर्ज करके रहमान और उसके अब्बा को अरेस्ट कर लिया है। दोनों को जेल भेजा जा चुका है। किशोरी के परिजनों ने शिकायत की थी कि अब्दुल के परिजन किशोरी को धर्म परिवर्तन कर निकाह करने के लिए धमका रहे थे।

हिंदुस्तान की रिपोर्ट के अनुसार, पुलिस अधीक्षक डॉ विपिन ताडा ने बताया कि बलिया शहर कोतवाली क्षेत्र में अब्दुल रहमान उर्फ गोलू बीती 11 जनवरी को एक घर में घुसा तथा 14 वर्षीय किशोरी के साथ बलात्कार किया। आरोपित ने उससे जबरन शारीरिक संबंध बना कर उसकी वीडियो भी बनाई तथा वीडियो क्लिप दिखा कर फिर से शारीरिक संबंध बनाने का दबाव बनाने लगा।

अब्दुल की इन्हीं हरकतों से तंग आकर पीड़िता ने 13 जनवरी को सारी बातें अपने माता-पिता को बताई। फिर, उसके पिता ने बलिया शहर थाने में अब्दुल रहमान उर्फ गोलू के विरुद्ध आईपीसी की कई धाराओं के ख़िलाफ़ मामला दर्ज करवाया। जानकारी के अनुसार इस केस में अब्दुल के ख़िलाफ़ बलात्कार, घर में घुसने के आरोप, पॉस्को एक्ट व उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म परिवर्तन प्रतिषेध अध्यादेश के अंतर्गत नामजद मुकदमा दर्ज हुआ।

बाद में, पुलिस अधीक्षक ने मामले की गंभीरता को देखते हुए आदेश जारी किया और आरोपित को पकड़ने के लिए टीमें गठित की। मंगलवार को अब्दुल रहमान उर्फ गोलू व उसके पिता कलीम को बलिया शहर कोतवाली क्षेत्र के रेलवे स्टेशन के पास गिरफ्तार किया गया। पुलिस के मुताबिक दोनों कहीं भागने की फिराक में थे। इन्हें पकड़ने के बाद न्यायालय में पेश किया गया और फिर जेल भेज दिया गया।

यहाँ बता दें कि उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने प्रशासन को लव जिहाद मामलों में सख्ती से निपटने के आदेश दिए हुए हैं। हाल में सीतापुर जिले में नाबालिग लड़की का अपहरण कर धर्म परिवर्तन कराने के मामले में एसीजेएम कोर्ट ने आरोपित की संपत्ति कुर्क करने का आदेश दिया था। जिसके बाद लव जिहाद आरोपित की संपत्ति के ख़िलाफ़ कार्रवाई हुई और सब डिवीजनल मजिस्ट्रेट की उपस्थिति में घर और जमीन को संलग्न किया गया। साथ ही उसकी वैन भी जब्त कर ली गई।

राजस्थान में महादेव मंदिर के 75 वर्षीय सेवादार की हत्या: हाथ-पाँव रस्सी से बँधे, मुँह में ठूँस डाला था कपड़ा

राजस्थान के करौली में पुजारी की हत्या के 4 महीने के भीतर अब राजधानी जयपुर के एक मंदिर में सेवादार की निर्मम तरीके से हत्या कर दी गई। ये वारदात सोडाला इलाके में राकड़ी स्थित मेहरा समाज के राकेश्वर महादेव मंदिर की है। सोमवार (जनवरी 25, 2021) की देर रात को मंदिर के 75 वर्षीय वृद्ध सेवादार (केयरटेकर) गिरिराज मेहरा की हत्या कर दी गई। उनके मुँह में कपड़ा ठूँसा हुआ था और हाथ-पाँव रस्सी से बाँध डाले गए थे।

मंगलवार की सुबह 6:30 बजे कुछ महिलाएँ जब पूजा के लिए पहुँची तो उन्होंने देखा कि मंदिर का कपाट बंद था, जबकि उस समय तक उसे खोल दिया जाता था। उक्त मंदिर आजाद नगर कॉलोनी में स्थित है। इसका संचालन ‘महरा समाज सेवा समिति’ करता है। जब महिलाओं के काफी आवाज़ लगाने के बाद भी मंदिर का दरवाजा नहीं खुला तो उन्होंने सेवादार गिरिराज मेहरा के बेटे राजेंद्र को फोन किया।

आधे घंटे बाद सुबह के 7 बजे राजेंद्र मंदिर में पहुँचे। जब वो दीवार फाँद कर मंदिर के भीतर घुसे तो उन्होंने देखा कि उनके पिता की लाश पड़ी हुई थी। उनका शव एक बिस्तर पर पड़ा हुआ था। हाथ-पाँव बाँधने के लिए प्लास्टिक की नई रस्सी का इस्तेमाल किया गया था। न सिर्फ मुँह में कपड़ा ठूँस डाला गया था, बल्कि चेहरा भी कपड़े से ढका हुआ था। पुलिस को वारदात के बारे में सूचित किया गया। घटनास्थल पर 50 पुलिसकर्मियों की टीम पहुँची।

एडिशनल पुलिस कमिश्नर अजयपाल लांबा और डीसीपी साउथ हरेंद्र महावर वहाँ पर डॉग स्क्वायड, एफएसएल टीम और फिंगर प्रिंट टीम को लेकर जाँच के लिए पहुँचे। मृतक गिरिराज मेहरा विगत 10 वर्षों से मंदिर में बतौर सेवादार कार्यरत थे। मंदिर से मात्र आधा किलोमीटर दूर ही उनका घर है, जहाँ वो अपनी पत्नी, दो बेटों व अन्य परिजनों के साथ रहते थे। वो रात्रि को प्रतिदिन 8 बजे मंदिर का कपाट बंद कर दिया करते थे।

अन्य दिनों की भाँति सोमवार को भी उनका बेटा उनके लिए भोजन लेकर आया था और फिर चला गया था। स्थानीय लोगों ने बताया कि सेवादार गिरिराज का सबसे अच्छा व्यवहार व रिश्ते थे, ऐसे में रंजिश की आशंका नहीं है। पुलिस ने इसे सुनियोजित हत्या बताते हुए कहा कि कमरे के नजदीक मंदिर के ऑफिस के ताले टूटे हुए थे। मंदिर के पास स्थित पार्क में कुछ नशाखोर भी बैठते हैं, जिन्हें असामाजिक तत्व बताया जा रहा है।

पुलिस को आशंका है कि मंदिर पार्क में आकर नशा करने वाले किसी व्यक्ति के साथ सेवादार की टोका-टोकी या बहस हुई होगी, जो हत्या का कारण बना। चोरी के एंगल से भी जाँच की जा रही है। पुलिस का मानना है कि वारदात में किसी स्थानीय व्यक्ति का हाथ हो सकता है। या फिर हत्या के कारण को छिपाने के लिए इसे चोरी का रूप दिया गया हो सकता है। फ़िलहाल मामला दर्ज कर लिया गया है।

अक्टूबर 2020 में राजस्थान के करौली जिला स्थित सपोटरा तहसील के बूकना गाँव में पुजारी बाबूलाल वैष्णव की मौत के मामले ने प्रदेश में हलचल मचा दी थी। प्रशासन इस मामले को शुरुआत में ‘आत्मदाह’ बताती रही थी। पुजारी ने मौत से पहले ही आरोपित कैलाश का नाम ले लिया था, बावजूद इसके उसे गिरफ्तार करने में पुलिस ने 24 घंटे का समय लगा दिया था। भाजपा नेता कपिल मिश्रा ने पीड़ित परिवार की मदद की थी।

लहराया गया खालिस्तानी झंडा, लगे भारत विरोधी नारे: वॉशिंगटन में किसान समर्थन की आड़ में खालिस्तान की माँग

कृषि कानून के विरोध की आड़ में खालिस्तान की माँग सामान्य हो चली है। गणतंत्र दिवस पर पंजाब के किसानों का हिंसात्मक रूप व मनमानी देखने के बाद हर ओर जहाँ पूरे आंदोलन की मंशा पर सवाल उठ रहे हैं, वहीं अमेरिका के वॉशिंगटन डीसी में खालिस्तान समर्थकों ने कानून के विरोध में भारतीय दूतावास के बाहर प्रदर्शन किया और खालिस्तानी झंडे लहराए।

समाचार एजेंसी ANI द्वारा जारी तस्वीरों में देख सकते हैं कि कई लोगों के हाथों में खालिस्तान के झंडे थे। कुछ पर लिखा है कि हम किसान हैं आतंकी नहीं।

वॉशिंगटन के प्रमुख प्रदर्शनकारियों में से एक, नरेंद्र सिंह ने कृषि कानूनों को ‘भारत के मानव अधिकारों और लोकतंत्र का उल्लंघन’ कहा। वह बोले कि वो लोग हर साल 26 जनवरी को काला दिवस के रूप में मनाते हैं, लेकिन इस साल हम भारत में किसानों के साथ एकजुटता से खड़े हैं।

उल्लेखनीय है कि अमेरिका में खालिस्तानी समर्थक समय-समय पर अपनी ओर से खालिस्तान की माँग करते रहते हैं। 1 माह पहले भारतीय दूतावास के पास महात्मा गाँधी की प्रतिमा पर खालिस्तान का झंडा लहराया गया था। जिसे देख इस बार दूतावास और गाँधी मूर्ति के चारों ओर सुरक्षा बढ़ा दी गई थी।

यदि भारत में 26 जनवरी को हुई अराजकता पर बात करें तो मालूम हो कि गणतंत्र दिवस पर कथित किसानों के हिंसक प्रदर्शन के कारण 153 पुलिसकर्मी घायल हो गए हैं। इनमें से 2 आईसीयू में भर्ती हैं। पुलिस ने कल की घटना के संबंध में 7 एफआईआर दर्ज की हैं।

वहीं दिल्ली की सीमाओं पर अब अर्धसैनिक बलों की तैनाती कर दी गई है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने शाम को दिल्ली के पुलिस कमिश्नर, केंद्रीय गृह सचिव और IB के चीफ से मुलाकात कर स्थिति की समीक्षा की।

केंद्रीय गृह मंत्रालय पूरे घटनाक्रम पर कड़ी नजर रख रहा है। ITO, नांगलोई कर गाजीपुर में अधिक संख्या में जवानों की तैनाती होगी। 10 CRPF की कंपनियाँ और 5 अन्य सशस्त्र बलों की कंपनियाँ दिल्ली के लिए रवाना हो गई हैं।