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कृषि मंत्री का किसानों के नाम 8 पन्ने का खुला पत्र: विपक्षी बहकावे और साजिश की बताई सच्चाई, हर बिंदु पर रखी बात

किसान आंदोलन की आड़ में विपक्षी दलों की राजनीति देख कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने आज किसानों के नाम 8 पन्नों का पत्र लिखा है। इस पत्र में उन्होंने निवेदन किया है कि किसान ऐसे राजनीतिक दलों और तथाकथित बुद्धिजीवियों के बहकावे में न आएँ जिन्होंने सालों से किसानों को सुविधा रहित रखने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा दिया।

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अपनी कृषि पृष्ठभूमि का हवाला देते हुए उन्होंने किसानों को बताया कि जिन तकलीफों से वह लोग गुजरतें है, उससे वह स्वयं भी भली भाँति वाकिफ हैं। उन्होंने कहा कि ऐसे समय में जब झूठ की दीवार तैयार करके साजिशें रची जा रही हैं तो उनका दायित्व है वस्तुस्थिति को सामने रखा जाए।

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कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने कृषि कानून के ऊपर पर फैलाए जा रहे झूठ का उल्लेख करके उसकी सच्चाई बताई। उन्होंने ध्यान दिलवाया कि कैसे कोरोना के दौर में किसानों की भूमिका ने अर्थव्यवस्था को गति दी थी और MSP पर सरकारी खरीद के सारे रिकॉर्ड तोड़ा था। लेकिन बावजूद इसके विपक्ष इस पर झूठ फैला रहा है।

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तोमर ने किसानों के उत्थान को पीएम मोदी का प्रमुख उद्देश्य कहा। उन्होंने कहा कि उनकी सरकार 6 साल से किसानों के हित में काम कर रही है, जिसका फायदा छोटे किसानों तक को हो रहा है। विभिन्न योजनाओं का मकसद समझाते हुए वह कहते हैं देश इस लक्ष्य से आगे बढ़ रहा है कि अन्नदाता उर्जादाता बने।

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उन्होंने जानकारी दी कि सरकार ने किसानों के लिए ही 1 लाख करोड़ रुपए का कृषि इंफ्रास्ट्रक्चर बनाया है और अब किसानों के लिए ही वह ये कानून लाए हैं जिसके बाद किसान कहीं भी अपनी उपज बेचने के लिए आजाद होगा।

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केंद्रीय मंत्री ने इस पत्र में उन सभी मौकों और राजनीतिक पार्टियों की चर्चा की जब किसानों के हित का हवाला देकर ऐसे बदलावों का समर्थन किया। उन्होंने हर उस बिंदु की हकीकत बताई जिस पर झूठ फैलाया जा रहा है। राजनीतिक कुचक्र की पोल खोलते हुए अपने पत्र में तोमर ने बुद्धिजीवियों को लताड़ा और इनके राजनीतिक स्वार्थ की ओर गौर करवाया।

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एक समय में स्वामीनाथन रिपोर्ट को 8 साल तक दबाए रखने वाली कॉन्ग्रेस, आजाद मंडी का माँग करने वाली AAP, कृषि सुधार की माँग करने वाले अकाली दल की मंशा पर उन्होंने सवाल उठाया।

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उन्होंने बताया कि एक विचारधारा के लोग कैसे अलग-अलग मुद्दे पर समाज में असंतोष और अराजकता फैलाने का प्रयास करते रहे हैं और आज भी ये यही सब कर रहे हैं। आंदोलन के पीछे छिपकर रची जा रही साजिश पर गौर करवाते हुए वह किसानों से अपील करते हैं कि सब किसान इस विचारधारा की मंशा को पहचानें, जिसने 62 की लड़ाई में देश का साथ नहीं दिया था।

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अपने पत्र में तोमर ने किसानों को आश्वस्त किया है कि उनकी सरकार हर तरह से किसानों को सुनने को तैयार है। उनका कहना है कि ये सुधार कानून कृषि के नए अध्याय की नींव बनेंगे और किसान इससे स्वतंत्र व सशक्त होंगे। वहीं हमारी कृषि समृद्ध और संपन्न होगी।

रायबरेली में कमला नेहरू ट्रस्ट की विवादित जमीन पर चला योगी सरकार का बुलडोजर: अवैध निर्माण ध्वस्त

उत्तर प्रदेश के रायबरेली के लखनऊ-प्रयागराज NH-30 स्थित सिविल लाइन चौराहा के बहुचर्चित करोड़ों की फर्जी कमला नेहरू ट्रस्ट नाम से दर्ज जमीन विवाद मामले को लेकर जिला प्रशासन ने अवैध रूप से कब्जा जमाए लोगों की दुकानों और मकान पर बुलडोजर चलावा दिया है। कथित तौर पर ट्रस्ट द्वारा भाजपा नेता को जमीन बेचने के बाद यह मामला पहली बार उच्च न्यायालय में गया। क्योंकि जमीन का स्थानांतरण विवादित था।

जिसके बाद उच्च न्यायालय ने जिला प्रशासन के पक्ष में फैसला दिया और इसे नजूल भूमि घोषित कर दिया। बता दें नजूल भूमि मूल रूप से ऐसी भूमि होती है, जिसका कोई दावेदार नहीं है और इसे सरकार से संबंधित माना जाता है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, सरकारी जमीन पर फर्जी तरीके से कब्जा जमाए लोगों से जमीन को सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट ने खाली करवाने के आदेश कई महीने पहले ही दिए थे। अदालत के आदेशों के बाद, ज़िला प्रशासन ने ज़मीन का अतिक्रमण करने वाले लोगों को नोटिस दिया और फिर उनकी बिजली काटी गई, लेकिन उसके बाद भी जमीन खाली नहीं नही हो पाई थी।

जिसके बाद बुधवार (16 दिसंबर, 2020) तड़के जिला प्रशासन ने जमीन पर सभी अवैध निर्माण को ध्वस्त करना शुरू कर दिया। कुछ लोगों ने पुलिस पर पथराव किया जिसके बाद पुलिस ने लाठीचार्ज का सहारा लिया लेकिन तोड़फोड़ जारी रही। इस दौरान कुछ गिरफ्तारियाँ भी की गई।

कमला नेहरू ट्रस्ट

कमला नेहरू ट्रस्ट चालीस साल पहले एक शैक्षिक समाज, स्कूल और अस्पताल बनाने के उद्देश्य से बनाया गया था। कमला नेहरू एजुकेशनल सोसाइटी की स्थापना 1976 में रायबरेली के सिविल लाइंस इलाके में सिधौली के रहने वाले कैलाश चंद्र द्वारा 1135 रुपए के वार्षिक किराए पर ली गई थी।

कथिततौर पर लड़कियों के लिए शिक्षा को बढ़ावा देने के उद्देश्य से सोसाइटी ने 30 साल के लिए जमीन को लीज पर ली थी। हालाँकि, जमीन पर कोई कार्य नहीं किया गया, कोई निर्माण नहीं हुआ और जमीन पर सैकड़ों लोगों द्वारा अवैध रूप से कब्जा कर लिया गया था। दिल्ली की पूर्व सीएम शीला दीक्षित के ससुर उमाशंकर दीक्षित, पूर्व पीएम इंदिरा गांधी के निजी सहायक यशपाल कपूर और पूर्व मंत्री शीला कौल, हाल ही में लखनऊ में जिनके घर प्रियंका गाँधी वाड्रा के रहने की व्यवस्था की गई थी, सहित सोसाइटी के सभी 8 सदस्यों का निधन हो चुका है।

जिसके बाद 2003 में एक नई समिति का गठन किया गया था। जिसमें कौल परिवार के सदस्य, पूर्व केंद्रीय मंत्री सलमान खुर्शीद और वरिष्ठ वकील ललित भसीन शामिल थे। सोसाइटी ने 2003 में भूमि को एक फ्रीहोल्ड संपत्ति घोषित कर दिया और 2016 में इसे बेचने का फैसला किया। लगभग 6 महीने से जिला प्रशासन अदालत के आदेशों के अनुसार संपत्ति को खाली कराने का प्रयास कर रहा है, लेकिन लोगों ने भूमि को खाली करने से इनकार कर दिया था।

भाजपा नेता अदिति की भूमिका

उल्लेखनीय है कि पिछले महीने भाजपा नेता व पूर्व में रायबरेली से कॉन्ग्रेस की विधायक रही अदिति सिंह ने इकोनॉमिक ऑफिसर विंग (EOW) को पत्र लिखकर कमला नेहरू एजुकेशनल सोसायटी में कथित वित्तीय अनियमितताओं की जाँच की माँग की थी। सिंह ने आरोप लगाया था कि जिस उद्देश्य के लिए इसका गठन किया गया था वह समाज की सेवा नहीं था। उन्होंने कहा कि भूमि को फ्रीहोल्ड भूमि में परिवर्तित नहीं किया जाना चाहिए था क्योंकि 100 से अधिक दुकानें थीं जिनसे लगभग 600 लोगों की दैनिक रोजी रोटी चलती है।

जिसके मद्देनजर योगी सरकार ने नवंबर 2020 में कमला नेहरू ट्रस्ट के खिलाफ धोखाधड़ी के आरोपों की जाँच का आदेश दिया था।

‘भाजपाइयों को अफीम खिला दी गई है, वे एक ही लाइन रट रहे’: केजरीवाल ने विधानसभा में फाड़ी कृषि कानून की कॉपी

दिल्ली विधानसभा में कृषि कानूनों का विरोध करते हुए मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने आज (दिसंबर 17, 2020) कानून की कॉपी फाड़ दी। उन्होंने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर निशाना साधते हुए कहा कि उन्हें खुद नहीं पता ये कृषि कानून आखिर है क्या।

केजरीवाल ने कहा कि सब भाजपाइयों को अफीम खिला दी गई है और उन्हें एक लाइन रटवा दी गई है कि किसान देश में कहीं भी फसल बेच सकता है। उन्होंने कहा कि हकीकत में किसान भ्रमित नहीं हैं, बल्कि भाजपाई भ्रमित हैं।

सीएम केजरीवाल ने भाजपा पर निशाना साधते हुए पूछा कि सरकार और कितनी जान लेगी? अब तक 20 से ज्यादा किसान इस आंदोलन में शहीद हो चुके हैं। उन्होंने कहा कि आंदोलन में बैठा हर किसान भगत सिंह है। ऐसे में सरकार अंग्रेजों से बदतर न बने।

समाचार एजेंसी एएनआई के अनुसार केजरीवाल ने कानूनों पर सवाल उठाते हुए कहा कि कृषि कानून को आखिर कोरोना महामारी के दौरान संसद में पारित करने की क्या जल्दी थी? उन्होंने सरकार आरोप लगाते हुए कहा कि यह पहली बार हुआ है कि राज्यसभा में मतदान के बिना 3 कानून पारित किए गए हैं। 

आगे उन्होंने कहा, “हर किसान भगत सिंह बन चुका है। सरकार कहती है कि वह किसानों से बात कर रही है और उन्हें फायदा समझाने की कोशिश कर रही है। यूपी के मुख्यमंत्री किसानों को कह रहे हैं कि इस कानून से आपको फायदा होगा क्योंकि कोई उनसे उनकी जमीन नहीं लेगा। ये कौन सा फायदा है?”

केजरीवाल आगे पूछते हैं, “किसान देशभर में कहीं भी अपनी उपज बेच सकते हैं। आज धान के लिए एमएसपी 1835 रुपए है। यह यूपी और बिहार में 950 रुपए में बेचा जा रहा है। मैं उनसे पूछना चाहता हूँ कि ये किसान एमएसपी से ज्यादा पाने के लिए अपनी उपज कहाँ बेचने जाएँ।”

बता दें कि विधानसभा सत्र के दौरान सोमनाथ भारती और मोहिंदर गोयल ने भी तीनों कृषि कानूनों की कॉपी फाड़ी और कहा, “हम इस काले कानून को मानने से इनकार करते हैं।” इसके अतिरिक्त मंत्री कैलाश गहलोत ने सदन को संबोधित करते हुए कहा, “हम तीनों कानूनों का विरोध करते है और केजरीवाल सरकार किसानों के इस संघर्ष में हर प्रकार से उनके साथ खड़ी है।”

‘कोलकाता से आदेश आने के बाद मेरे कार्यालय पर हमला’: TMC विधायक जितेंद्र तिवारी ने जिलाध्यक्ष पद भी छोड़ा

पश्चिम बंगाल के पांडवेश्वर से तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) के विधायक जितेंद्र तिवारी ने दावा किया है कि आसनसोल नगर निगम के बोर्ड ऑफ एडमिनिस्ट्रेटर के अध्यक्ष पद से इस्तीफा देने के बाद उनके कार्यालय में तोड़फोड़ की गई है।

द पायनियर के अनुसार, तिवारी ने कहा, “कोलकाता से आए निर्देशों पर मेरे पद छोड़ने के एक घंटे बाद ही मेरे कार्यालय पर हमला कर दिया गया। अब मेरे लिए ये मुमकिन नहीं है कि मैं इनके साथ रहूँ। मैंने जिलाध्यक्ष (TMC) के पद से इस्तीफा दे दिया है।”

इससे कुछ देर पहले ही मीडिया खबरों में बताया गया था कि जितेंद्र तिवारी ने आसनसोल नगर निगम के अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया है। इसके बाद से 19 दिसंबर को उनके बीजेपी में शामिल होने के कयास लग रहे हैं।

इससे पहले उन्होंने राज्य सरकार को चेताते हुए कहा था,  “एक न एक दिन हमें निर्णय लेना ही होगा कि क्या करना है? मैंने सोच लिया है कि अगर जरूरत पड़ी तो मैं (पार्टी) छोड़ दूँगा, लेकिन लोगों के साथ बना रहूँगा।”

बता दें कि इससे पहले टीएमसी के दिग्गज नेता शुभेंदु अधिकारी ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया था और अब तिवारी ने आसनसोल नगर निगम (AMC) के अध्यक्ष पद से इस्तीफा देने के बाद जिलाध्यक्ष पद को त्याग दिया है। शुभेंदु को लेकर भी पार्टी कार्यकर्ताओं ने अनुमान लगाया है कि वे भाजपा में शामिल होंगे। उनको लेकर भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष ने भी यह घोषणा की है कि शुभेंदु पार्टी में शामिल होने वाले हैं। उनके कार्यालय में भी भगवा रंग से पुताई का काम भी शुरू हो गया है।

‘कृषि कानूनों पर लोगों को गुमराह कर रहा विपक्ष’: CM योगी ने 2 दिन में भूमाफियाओं की लिस्ट बनाने के दिए निर्देश

यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ ने आज (17 दिसंबर, 2020) बरेली में किसानों को कृषि कानूनों के फायदे बताने के साथ ही 111 परियोजनाओं का उद्घाटन किया, जिसकी लागत 972 करोड़ रुपए बताई जा रही है। इस दौरान उन्होंने विपक्ष पर जमकर हमला बोला और भू-माफियाओं के खिलाफ भी सख्त रुख दिखाते हुए दो दिनों के अंदर भूमाफियाओं की सूची तैयार कर और उन पर कार्रवाई करने के लिए लखनऊ विकास प्राधिकरण को निर्देश दिए।

सीएम योगी आदित्यनाथ ने किसानों को आश्वासन दिया कि नए कृषि कानून उनके हितों का ध्यान रखता है। नए कृषि कानूनों के बारे में योगी ने कहा कि मोदी सरकार के आने से पहले पीएम नरेंद्र मोदी ने कहा था कि खेत से लेकर खलिहान तक, बीज से लेकर बाजार तक चेन विकिसत करेंगे जो किसानों की आय 2022 तक दोगुनी करेगी। इसी पक्रिया के तरह केंद्र सरकार ने कानून बनाया है।

सीएम योगी आदित्यनाथ ने कहा, “नया कानून किसी को भी किसान की जमीन लेने की अनुमति नहीं देगा। मंडी जारी रहेगी। मंडी के बाहर फसल बेचने के लिए किसान को कोई टैक्स नहीं देना होगा। विपक्ष किसानों के लाभ को पचा नहीं पा रहा है, वे चाहते हैं कि किसान कर्ज नहीं उतार पाए।”

यूपी सीएम ने कहा कि विपक्ष को किसान को सीधा लाभ देने में परेशानी है, क्योंकि वे किसानों के हक में डकैती डालते थे। किसानों के लिए 100 रुपए दिया जाता था, 90 रुपए चट कर जाते थे। इसे रोका जा रहा है तो उन्हें परेशानी हो रही है। बिचौलिये और दलालों को बाहर किया जा रहा है। किसानों के सीधा लाभ दिया जा रहा है।

उन्होंने कहा कि जिन्हें पसंद नहीं कि एक भारत श्रेष्ठ भारत बन रहा है, वही इन नए कृषि कानूनों का विरोध कर रहे हैं। योगी ने कहा कि एक जगह धरना चल रहा है। माँग हो रही थी कि एमएसपी दी जाए। तीन कानून इससे संबंधित किए गए जिसमें एमएसपी बढ़ाने का काम किया। विपक्ष किसानों को गुमराह कर रहे हैं।

सीएम योगी ने कहा कि लखनऊ विकास प्राधिकरण को निर्देश दिए गए हैं कि वह अवैध निर्माण और भू माफियाओं की सूची दो दिनों के अंदर तैयार करे। लिस्ट तैयार होने के साथ ही अवैध निर्माण करने वाले लैंड माफियाओं पर नकेल कसी जाएगी।

सीएम ने कहा, “हम मंडी को तकनीक के साथ जोड़कर मंडी व्यवस्था को सुदृढ़ कर रहे हैं। किसान भाइयों को अच्छी सड़कें, शेड, पार्किंग और बुनियादी सुविधाएँ दे रहे हैं। लेकिन मुद्दा विहीन विपक्ष लोगों को गुमराह कर रहा है कि मंडी बंद हो जाएगी, उन्हें यह बुरा लग रहा है कि किसानों के लिए नई-नई चीजें क्यों?”

CM योगी ने कहा कि विपक्ष को इस बात से परेशानी है कि कि जम्मू-कश्मीर से धारा 370 क्यों हटा दिया? उन्होंने कहा कि जम्मू-कश्मीर का पूरा बजट चार परिवार हजम कर जाते थे, वहाँ की जनता को इसका लाभ नहीं मिल पाता था। जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद और अलगाववाद की जड़ें समाप्त हो सकें, इसके लिए धारा 370 समाप्त होनी आवश्यक थी।

राम मंदिर पर विपक्षियों को घेरते हुए सीएम योगी आदित्यनाथ ने कहा कि विपक्ष अयोध्या में राम मंदिर निर्माण को बर्दाश्त नहीं कर सकता और पीएम नरेंद्र मोदी ने काम शुरू कर दिया है। विपक्षी हमेशा अयोध्या जाने से डरते रहे हैं।

योगी ने कहा कि बरेली का एयरपोर्ट जल्द शुरू होगा। जब तक चार साल पूरे होंगे, तब तक चार नौजवानों को नौकरी मिल चुकी होगी। यूपी में जल्द फिल्म सिटी आ रही है। इसलिए काम करने को तैयार हो जाइए। फिल्म सिटी में भी सरकार युवाओं को मौके देगी।

कुछ याद आ रहा है वो माह था दिसम्बर: जब मुस्लिम भीड़ें और वामपंथी देश को फूँकने के लिए साथ आए

हमें भी जलवागाह-ए-नाज़ तक ले चलो मूसा
तुम्हे ग़श आ गया तो हुस्न-ए-जाना कौन देखेगा

यहाँ ‘जलवागाह-ए-नाज’ था जामिया नगर और ‘हुस्न-ए-जाना’ था आग की उठती लपटें, पत्थर बरसाती इस्लामी भीड़ और बदहवास दौड़ते आम नागरिक। 11 दिसंबर को नागरिकता संशोधन विधेयक कानून बन कर राष्ट्र के सामने आ चुका था, और इसी दौरान पूरे देश को दहलाने की साजिशें रची जा रही थीं। इसका अंत 23-24-25 फरवरी के दिल्ली के हिन्दू विरोधी दंगों और नरसंहार के रूप में हुआ।

आज तमाम वामपंथी पोर्टल एक साल पहले की वारदातों को याद कर रहे हैं। साल भर पहले ‘हिन्दुओं से आजादी‘ के नारे लगाने से ले कर ‘अब गलियों में निकलने का वक्त आ गया है’ कह कर, तब अनाम (और अब आरोपित) शरजील इमाम के मुँह से इस्लामवादियों की साजिशों का खुलासा हो रहा था कि उनके तथाकथित आंदोलन का मकसद ‘CAA’ नहीं है, बल्कि वो पूरे देश के पाँच सौ शहरों को बंद करना चाहते हैं, और पूरे उत्तरपूर्व को भारत से अलग करने की इच्छा रखते हैं।

यही वो समय था जब ऑल्ट न्यूज ने नासा प्रदत्त सॉफ्टवेयर द्वारा जामिया के मुस्लिम पत्थरबाजों के हाथ के पत्थरों को वॉलेट और फोन कह कर प्रपंच फैलाया था और आगजनी करने के बाद लाइब्रेरी में पनाह खोजती मुस्लिम भीड़ को सुरक्षा बलों ने कैम्पस में घुस कर पकड़ा था क्योंकि पेट्रोल बम और पत्थरों से लैस भीड़ यूनिवर्सिटी को आग लगाते या वहाँ की छात्राओं का रेप ही कर डालते, कोई नहीं जानता।

जामिया नगर और जामिया मिल्लिया इस्लामिया में तीन दिन जो दंगे हुए, उस पर वामपंथी मीडिया ने लगातार प्रपंची रिपोर्टिंग शुरु कर रखी थी क्योंकि उन्हें आने वाले दंगों में मुस्लिम भीड़ों के सुनियोजित षड्यंत्रों को भी तो डिफेंड करना था। उन्होंने वही किया भी, लेकिन सत्य छुपता नहीं। ताहिर हुसैन, खालिद सैफी, लदीदा, सफूरा, उमर खालिद, फारुक फैजल समेत कई चेहरों के साथ उत्तरपूर्व दिल्ली के मौजपुरी, जाफराबाद, चाँदबाग, करावलनगर, गोकुलपुरी, मोहनपुरी आदि इलाकों में पूरा घटनाक्रम स्मार्टफोन के दौर में लाइव स्ट्रीम हो रहा था।

जलवागाह-ए-नाज और हुस्न-ए-जाना की कहानी

जामिया नगर फूँका जा रहा था, बसों में आग लगाई गई ताकि उसके सीएनजी सिलिंडर फटें तो पूरे इलाके को अपने साथ ले कर बर्बाद हों। लेकिन दिल्ली पुलिस की बहादुरी की दाद देनी होगी कि तमाम नकारात्मक रिपोर्टिंग के बावजूद, उन्होंने हिम्मत के साथ उस आग पर काबू पाया, भले ही मनीष सिसोदिया जैसे लोग उनके द्वारा ढोए जा रहे पानी को पेट्रोल बता कर फेक न्यूज फैलाते रहे।

यही था वो जलवागाह जिस पर शरजीलों, खालिदों, लदीदाओं, जरगरों, हुसैनों को नाज था। जलवा यह था कि शहर को फूँकने की तैयारी थी, पाँच सौ शहरों के मुस्लिम नागरिकों को चैलेंज किया जा रहा था कि क्या वो सड़कों पर आ कर पूरा शहर जाम नहीं कर सकते। इस्लामी आतंकियों और दंगाइयों को लिए हिंसा और आगजनी ही तो सामाजिक खूबसूरती के पैमाने हैं।

शरीर पर बम लपेट कर फट जाना हो, या फिर शहरों को आग लगा देना हो, यही तो वो हुस्न-ए-जाना है, जिस पर ये आहें भरते हुए ‘तौबा-तौबा’ कह कर नजर लगने से बचाते हैं। इन दंगाइयों को आग से अत्यधिक प्रेम है, तभी तो इन्होंने अपने घरों पर पत्थर और पेट्रोल बमों की शीशियाँ इकट्ठा कर रखा था।

ऊपरी शेर में ‘हमें भी’ का जो सर्वनाम प्रयुक्त हुआ है, वो बकैत कुमार जैसों के लिए है जो इन दंगाइयों की हर करतूत को, कानून की जानकारी होने के बाद भी जायज ठहरा रहे थे कि यह तो ‘विरोध के स्वर’ हैं। जबकि विरोध का ‘स्वर’ आग बन कर बसों और घरों में घुस रहा था, वो नहीं दिखा। ये सारे प्रोपेगेंडाबाज लोग स्टूडियो से बैठकर इस पूरे प्रकरण में दंगाइयों को विद्यार्थी, पत्थर को वॉलेट, हिंसा को मतभिन्नता और आगजनी को ‘एक समाज के भीतर का गुस्सा’ कह कर जायज ठहराते रहे।

इस शेर में बकैत कुमार जैसे यही तो कहते हैं कि ‘हमें भी वहाँ तक ले चलो, कहीं दंगाइयों को गश्त लग गया तो जलते शहर को कौन डिफेंड करेगा!’ जाहिर सी बात है कि अगर आपके पास सत्य और घटना का विवरण नहीं हो तो आप प्रपंच ठीक से गढ़ नहीं पाएँगे। आपके पास जब जानकारी हो कि जब बस जल रहा था, तो पुलिस वाले भी वहीं थे, तो आप कह सकते हैं कि पुलिस वाले भी तो आग लगा सकते हैं। आपके पास जानकारी हो कि गोली चलाने वाला शाहरुख़ दाढ़ी रखता है, तभी तो आप उसे अनुराग मिश्रा बुलाएँगे।

बकैत कुमारों और उनके गिरोह को स्टेबल डेमोक्रेसी, यानी स्थिर लोकतंत्र अच्छा लग ही नहीं सकता क्योंकि लोकतंत्र में तो विरोध और आंदोलन होते रहना चाहिए। बकौल रवीश कुमार, विरोध का न होना मरे हुए लोकतंत्र की निशानी है। जबकि, यह जरूरी नहीं है कि लोकतंत्र को जीवित मानने के लिए बिना बात का विरोध चलता रहे।

अराजकतावादी वामपंथ और पत्थर-बम ले कर सड़कों पर अकारण उतरी मजहबी भीड़ वह कॉकटेल है, जिसकी तासीर आग की है। वामपंथियों का मूल लक्ष्य ही होता है कि हर जगह इतनी तबाही फैला दो कि सब कुछ बर्बाद होने के बाद तुम्हें ही एक विकल्प मान लिया जाए, क्योंकि तुम कभी अपनी लोकप्रियता के कारण सत्ता में आ ही नहीं सकते। तुम सत्ता में चुन कर इसलिए नहीं आ सकते क्योंकि तुम्हारी प्रवृत्ति में ही आगजनी, हिंसा और सरकारों के खिलाफ विद्रोह समाहित है।

वामपंथियों ने भारत में केरल और बंगाल में हिंसा का नंगा नाच करने के बाद, आगे बढ़ते लोकतंत्र में राष्ट्रव्यापी स्तर पर कुछ खास कर नहीं पाए हैं। चूँकि अब उनका सत्य हर जगह बाहर है, और उनके द्वारा चलाई गई सत्ताओं को वैश्विक और राष्ट्रीय स्तर पर लोगों ने आँक लिया है, अतः उनके पास समर्थन में कोई बता नहीं।

तब ये लोग मुस्लिम छात्रों को, अज्ञानी मजहबी भीड़ों को अपना अजेंडा चलाने के लिए उकसाते हैं। पोस्टर ये बनाते हैं, नुक्कड़ नाटक ये करते हैं, भीड़ों को लिए जामिया में कंट्रोल रूम के विचार ये देते हैं, और पैदल सिपाही के तौर पर मस्जिदों के लाउडस्पीकर से आती आवाज एक भीड़ को सड़क पर उतार देती है।

इसके दूसरे स्तर पर मीडिया का समर्थन मिल जाने से इन्हें यह उम्मीद रहती है कि वैसे भी हैं तो खलिहर और निकम्मे ही, जेल में भोजन का इंतजाम हो ही जाता है, दंगे करा देने से चर्चा में रहते ही हैं, और जेल में जब तक रहते हैं ‘एक्टिविस्ट’ और ‘छात्र’ का तमगा छाती पर चिपका ही रहता है। इन्होंने वो भी समाँ देखा है जब बाईस साल की कानूनी और अदालती प्रक्रिया के बाद फाँसी पर चढ़ाए गए मुसलमान आतंकी की बरसी यह कह कर मनाई जाती है कि ये तो एक्सट्राजुडिशियल किलिंग है!

इसी विश्वास के साथ दिसम्बर 2019 में PFI समेत अन्य इस्लामी संगठनों से फंडिंग और समर्थन के साथ, तीन तलाक, आर्टिकल 370, रामजन्मभूमि और NRC-CAA के झटकों से बिलबिलाए एक समुदाय ने दिसम्बर में दिल्ली समेत पूरे देश को दंगों की आग में झोंकने की योजना बनाई। भला हो हमारे वीर पुलिस जवानों का, जिन्होंने जामिया के दंगों को तीन दिन में बंद कर दिया, और फिर उत्तरपूर्व दिल्ली के दंगों को भी उतने ही दिन में समेट दिया।

वरना इन वामपंथी लम्पटों और इस्लामी भीड़ों की जिद और हिंसा की बलि कितने हिन्दू चढ़ते, और कितने जिले फूँके जाते, इसकी कल्पना रीढ़ में ठंढी सिहरन उतार देती है।

जामिया दंगों के एक साल

इसलिए, उन दिनों को याद करना आवश्यक है ताकि हम भूल न जाएँ कि इसके पीछे कौन थे, मीडिया में कौन इस हिंसा को डिफेंड कर रहा था, ये कैसे हुआ था, उस दिन क्या-क्या हुआ था। उन तीन दिनों की कहानी को विस्तार से याद करना आवश्यक है क्योंकि हिन्दुओं में त्वरित स्मृतिलोप की आवृत्ति देखी गई है।

(नीचे की सामग्री मेरी आने वाली, अप्रकाशित, पुस्तक से ली गई है)

15 दिसम्बर का दिन दिल्ली में बहुत बड़ी घटना को अंजाम देने के उद्देश्य से याद रखा जाएगा। जामिया नगर में, एक सुनियोजित षड्यंत्र के तहत, दंगाइयों ने दिल्ली परिवहन निगम (DTC) की तीन बसों को आग लगा दिया। तीनों ही बसों में CNG के बड़े-बड़े सिलिंडर थे, जो कि अगर फट जाते तो उस सघन आबादी वाले इलाके का क्या हाल होता, यह आप सोच सकते हैं। इस घटना के साथ ही, दो और घटनाओं का जिक्र आवश्यक हो जाता है ताकि इनकी योजना पर से पर्दा हटे। 23-24-25 फरवरी के उत्तरपूर्व दिल्ली दंगो के दौरान भजनपुरा इलाके के पेट्रोल पम्प में आग लगाई गई थी, और चाँद बाग में हिन्दू की पुत्री के विवाह के रसोई घर में, जहाँ कई कमर्शियल सिलिंडर रखे हुए थे, उस पर पेट्रोल बम फेंके गए थे। हर जगह इन दंगाइयों ने शुरु से ही सिलिंडर या अतिप्रज्ज्वलनशील ईंधन के भंडारों को निशाना बनाया ताकि एक-दो पेट्रोल बम की बोतल से हजारों जानें ली जा सके!

जामिया नगर में जब उपद्रवियों ने इन बसों को आग के हवाले कर दिया तब उसमें ड्राइवर और अन्य कर्मचारी मौजूद थे। सारे स्टाफ किसी तरह अपनी जान बचा कर भागे। ये बहुत बड़े स्तर पर हो रही हिंसा का एक बड़ा हिस्सा था। पत्थरबाजी, पेट्रोल बम फेंकना और लाठी-डंडों से पुलिस पर लगातार हमले हो रहे थे। तब, पुलिस ने उपद्रवियों को खदेड़ने के लिए लाठीचार्ज किया और आँसू गैस के गोले छोड़े। जामिया के छात्रों ने बसों को जलाए जाने में अपना हाथ होने से इनकार कर दिया और कहा कि वो सिर्फ शांतिपूर्ण प्रदर्शन के पक्षधर थे, उनका हिंसा से कोई लेना-देना नहीं थ।

इसी समय, दिल्ली सरकार की तरफ से एक फेकन्यूज को हवा दी गई जिसमें दंगाइयों से निपटते पुलिसकर्मियों के बारे में उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने ट्विटर पर कुछ फोटो शेयर कर दावा किया कि ‘दिल्ली पुलिस भाजपा के इशारों पर बसों को आग के हवाले कर रही है।’ ये दावा उन्होंने एक वीडियो को शेयर कर के किया जिसमें एक पुलिसकर्मी पीले रंग के डब्बे में कोई तरल पदार्थ ले कर जाते हुए दिखता है जो वो जलती हुई बस पर डालता है। सिसोदिया ने बड़ी ही चालाकी से उस तरल पदार्थ को तेल/पेट्रोल मान लिया और कहा कि पुलिस ही आग लगा रही है ताकि जामिया के बच्चों को फँसाया जा सके। इसी से संबंधित एक और खबर आई कि जहाँ ये वारदात हुई, उसी इलाके में मनीष सिसोदिया की पार्टी के विधायक अमानतुल्लाह भी वहाँ देखे गए थे।

इसी दिन जामिया मिल्लिया इस्लामिया इलाके में चल रही नारेबाजी का एक वीडियो सामने आया। इसमें जामिया के छात्रों की भीड़ बहुत ही स्पष्ट स्वरों में हिन्दुओं के खिलाफ नारेबाजी करते सुने जा सकते थे। हिन्दूघृणा से लबालब इन नारों का एक राजनैतिक मसले के विरोध में क्या औचित्य था शायद जामिया का ही कोई पीएचडीधारक बता पाएगा। वीडियो में जामिया के छात्र सामूहिक तौर पर, पहले से ही हिन्दूघृणा से सने ‘आजादी’ के नारे लगा रहे थे, और उसी में आगे उन्होंने वह छलावा भी त्याग दिया और सीधे-सीधे ‘हिन्दुओं से आज़ादी’ के नारे लगाने लगे।

13 और 15 दिसम्बर को जामिया इलाके में जो हुआ, उस पर जब दिल्ली पुलिस ने जून 4, 2020 को दिल्ली हाई कोर्ट में हलफनामा दायर किया, तो पूरी योजना सामने आ गई। दिल्ली पुलिस ने हाईकोर्ट को बताया कि पिछले साल दिसंबर माह में नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) के ख़िलाफ हुई हिंसा एक सुनियोजित घटना थी। क्राइम ब्रांच ने कहा, “जामिया हिंसा कोई छोटी-मोटी घटना नहीं थी। बल्कि सुनियोजित घटना थी, जहाँ दंगाइयों के पास पत्थर, लाठियाँ , पेट्रोल बम, ट्यूबलाइट आदि पहले से थीं। इससे साफ होता है कि भीड़ का इरादा केवल कानून-व्यवस्था को बाधित करना था।”

तैयारी का आलम यह था कि 17 दिसम्बर को इस हिंसा के बारे में खुलासा करते हुए साउथ ईस्ट दिल्ली के एडिशनल डीसीपी कुमार ज्ञानेश ने कहा, “पुलिस ने जब आँसू गैस के गोले छोड़े, तब उससे बचने के लिए प्रदर्शनकारियों ने भींगे हुए कम्बलों का प्रयोग किया। ये उनके पास बड़ी तादाद में थे। इससे पता चलता है कि वो पूरी तैयारी के साथ आए थे।” उन्होंने स्पष्ट कहा कि ये विरोध प्रदर्शन स्वाभाविक नहीं था, बल्कि जो कुछ भी हिंसक वारदातें हुईं उसकी पहले से योजना बनाई गई थी। यह भी बयान जारी किया गया कि जामिया हिंसा के दौरान कम से कम दस हार्डकोर अपराधी वहाँ मौजूद थे। जाहिर है कि स्थानीय लोगों/विद्यार्थियों के समर्थन या सहयोग के बिना न तो 750 फर्जी पहचानपत्र बनाए जा सकते हैं, न ही PFI के 150 कट्टरपंथी छुपे रह सकते हैं।

इसी दिन, जामिया यूनिवर्सिटी की दीवारों पर पीएम मोदी की तुलना हिटलर से करते हुए चित्र बनाए गए थे और उनके ख़िलाफ़ घृणित नारे लिखे गए। वहीं, अमित शाह के मरने की दुआ करते हुए कैंपस की दीवारों पर लिखा गया कि ‘अमित शाह दुनिया छोड़ो’। ये बात और है कि जामिया विश्वविद्यालय प्रशासन हमेशा यही कहता पाया गया कि जो भी हुआ उसमें, या जामिया की हिंसा में छात्र-छात्रा मौजूद नहीं थे, ये बाहरी लोगों का काम है। रविवार (15 दिसंबर) को जामिया के जनसम्पर्क अधिकारी अहमद अज़ीम ने कहा, “विश्वविद्यालय परिसर में न तो प्रदर्शन हुआ और न ही यह विरोध जामिया का था। बड़ी संख्या में स्थानीय लोगों ने इसमें भाग लिया। हमने छात्रों के साथ बातचीत की, अब वे शांतिपूर्ण तरीके से विरोध कर रहे हैं।”

उसी दिन (15 दिसंबर) को एक नई नौटंकी ने जन्म लिया। अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (AMU) के छात्रों को एक बहाना मिल गया कि वो भी ‘विरोध प्रदर्शन’ करें। इस तरह के विरोध कि ‘हम जामिया के छात्रों के साथ हैं’ कई यूनिवर्सिटी में होने लगे, लेकिन कहीं भी ये हिंसक नहीं हुए। वामपंथी गैंग का मकड़जाल इतना व्यापक है कि वो ह्यूस्टन और MIT तक में तख्तियों के साथ चार बच्चों को खड़े कर के अपने विरोध को वैश्विक ही नहीं ब्रह्मांड के स्तर का विरोध बना लेते हैं। ख़ैर, AMU में भी विरोध का मुद्दा यही था कि दिल्ली के जामिया मिलिया इस्लामिया में हुई पुलिस कार्रवाई गलत और बर्बरतापूर्ण थी।

इस पर आक्रोश जताते हुए प्रदर्शन के लिए निकली छात्रों की भीड़ परिसर का मुख्य गेट तोड़कर AMU सर्किल पर आ गई। पुलिस ने इन्हें पानी की बौछार कर रोकने की कोशिश की, लेकिन छात्रों ने रुकने के बजाय पुलिस पर पथराव किया। हालाँकि, जवाबी कार्रवाई में पुलिस ने लाठीचार्ज कर छात्रों को दौड़ाने का प्रयास किया। मगर इस बीच छात्र पथराव के अलावा गोली भी चलाने लगे। इस हिंसक और उन्मादी प्रदर्शन में प्रॉक्टोरियल टीम, DIG डॉ. प्रीतेंदर सिंह, SP (सिटी) अभिषेक कुमार के अलावा RAF व पुलिस के 20 जवान घायल हो गए। इसके अलावा 30 छात्रों को भी चोटें आई। हालात काबू में पाने के लिए पुलिस आँसू के गोले छोड़ते हुए कैंपस में अंदर घुस गई। रात 11 बजे तक चले इस टकराव के बाद पुलिस ने एएमयू के अंदर से 8 युवकों को गिरफ्तार किया और देखते ही देखते पूरा कैंपस छावनी में बदल गया।

15 की रात को AMU की ताजातरीन नौटंकी से प्रभावित हो कर लखनऊ के नदवा कॉलेज में भी ‘जामिया के छात्रों के समर्थन में’ के नाम पर भी माहौल बिगड़ने की खबर आई। कॉलेज के छात्रों ने भारी पथराव किया और रविवार की देर रात गेट पर खड़े होकर नारेबाजी भी की थी। हालाँकि उस समय सूचना मिलते ही आधा दर्जन थानों की पुलिस ने मौक़े पर पहुँचकर सभी छात्रों को तुरंत गेट के अंदर कर दिया था। मगर 16 दिसंबर की सुबह फिर बड़ी तादाद में छात्र इकट्ठा हुए और वापस पथराव किया। इसके बाद मौक़े पर मौजूद पुलिस कॉलेजों के गेट को बंद कर दिया, और कुछ समय में स्थिति को नियंत्रण में लिया।

वहीं, पश्चिम बंगाल में तीसरे दिन (16 दिसंबर को) भी मजहबी उन्माद के शिकार दंगाइयों ने रेलवे संपत्ति को अपना निशाना बनाना जारी रखा। उन्होंने 16 को मुर्शिदाबाद के पास रेलवे स्टेशनों में तोड़फोड़ और आगजनी की, पटरियों पर टायर जला कर ट्रेनों को रोका और पथराव किया। मौक़े पर पहुँची पुलिस के वाहन को भी फूँक दिया। अगले दिन, रेलवे ने बंगाल में इन तीन दिनों में हुई हिंसा, लूटपाट, आगजनी से हुए नुकसान को ₹250 करोड़ का बताया, जिसके और भी बढ़ने की आशंका जताई गई। 17 दिसंबर को ईस्टर्न रेलवे ने बताया कि उसके 15 स्टेशनों को तबाह कर दिया गया। कई स्टेशनों पर कैश बॉक्स को लूट लिया गया। कई इलाक़ों में ‘रेल रोको अभियान’ और बंद का आयोजन किया गया, जिससे साउथ-ईस्ट रेलवे को 16 करोड़ रुपयों का नुकसान हुआ।

13 और 15 के दंगों के बाद भी, जामिया का माहौल सामान्य नहीं हो पा रहा था। अब यहाँ के प्रदर्शनकारियों ने मीडिया को निशाना बनाना शुरू किया। इसमें समाचार एजेंसी ANI के दो कर्मचारियों पर 16 दिसंबर की दोपहर को हमला कर दिया गया, जब वे जामिया मिल्लिया इस्लामिया के प्रदर्शनकारी छात्रों को कवर करने गए थे। उसी दिन ABP न्यूज़ की पत्रकार से बदसलूकी का भी वीडियो सामने आया था। इसके पहले भी जब 13 दिसंबर को प्रदर्शन शुरू हुए थे तो एक समूह ने पत्रकारों पर हमला कर दिया था, घेर लिया था और उनके काम में बाधा डालने की भरपूर कोशिश की थी- उनके कान पर खड़े हो कर चिल्ला रहे थे, ताकि पत्रकार न अपने फ़ोन पर बात कर पाए, न ही माइक में कुछ बोल पाए। इसके अलावा ज़ी न्यूज़ के पत्रकार राहुल सिन्हा ने दावा किया था कि अन्य दो मीडिया कर्मियों को मारने-पीटने के बाद उनके चैनल के पत्रकारों को बाकायदा निशाना बनाकर ढूँढ़ा जा रहा था।

इसी हिंसक दौर में आपको शाहीन अब्दुल्लाह का नाम याद कर लेना चाहिए। ये वही आदमी है, या फिर छात्र कह लीजिए, जो पुलिस से बचते हुए वहीं जाकर छिपता है जहाँ लदीदा और आयशा रहती है। लदीदा और आयशा खुल्लमखुल्ला जिहाद और इस्लामी युद्ध की चेतावनी देने वाली वो जिहादनें हैं जिन्होंने सीधा कहा कि इस ‘प्रदर्शन’ का नारा सेकुलर हो ही नहीं सकता और जिन्हें उनके सहयोग में आना है उन्हें इस्लामी नारे लगाने ही होंगे।

17 दिसंबर को एक जहरीला वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ। इस वीडियो का चेहरा उस दिन किसी को पता नहीं चल पाया, लेकिन बाद इसकी पहचान शरजील इमाम के रूप में हुई। शरजील इमाम शाहीन बाग का मास्टरमाइंड भी कहा जाता है। इसके कुछ विषैले वीडियो जिसमें विशुद्ध हिन्दूघृणा, महात्मा गाँधी को फासीवादी कहना, संविधान और न्यायपालिका को इस्लामविरोधी होने की बातें कही गई हैं, वो दिल्ली दंगों की पृष्ठभूमि में वैचारिक ईंधन प्रदान करने वाला बन कर सामने आया। हालाँकि, 28 जनवरी को जहानाबाद (बिहार) से गिरफ्तारी के बाद, जिसमें उस पर उन्मादी भाषण और देशद्रोह की धाराएँ लगी थी, शरजील ने यह आरोप लगाया कि उसके वीडियो से छेड़छाड़ हुई है। 29 जुलाई, 2020 को सुबह खबर आई कि सेंट्रल फोरेंसिक साइंस लैबोरेट्री ने शरजील के वीडियो में उसी की आवाज होने की बात कही है।

इस वीडियो के बारे में उस वक्त लिखा गया था कि एक शख्स (जिसकी पहचान नहीं हो पाई है) मुसलमानों को सड़कों पर आने और दिल्ली में चक्का जाम करने के लिए उकसाता हुआ दिखाई दे रहा था। वीडियो में शरजील इमाम छात्रों की एक भीड़ को ललकारते और दुत्कारते हुए कहता है, “हमारी ख्वाहिश और हमारी आरजू ये है कि दिल्ली में चक्का जाम हो। सिर्फ दिल्ली में ही नहीं, पूरे देश में, जहाँ मुसलमान कर सकता है। मुसलमान हिन्दुस्तान के 500 शहरों में चक्का जाम कर सकता है। अब उसमें रोड ब्लॉक करने वाला कौन है? वो भाजपा नहीं है, वो कॉन्ग्रेस नहीं है, वो है जमीयत उलेमा-ए-हिंद, वो है जमात-ए-इस्लामी।”

आगे वीडियो में शरजील इमाम उनके मुस्लिम होने पर लानतें भेजते हुए कहता है, “क्या मुसलमानों की इतनी हैसियत भी नहीं कि उत्तर भारत के शहरों को बंद किया जा सके। यूपी में शहरी मुसलमानों की आबादी 30 फीसदी से ऊपर है। क्या आपको शर्म नहीं आती? अरे भाई शर्म करो, आप यूपी में चक्काजाम क्यों नहीं कर सकते? कैसे चल रहा है वह शहर? बिहार का वह इलाका जहाँ से मैं आता हूँ, वहाँ ग्रामीण मुस्लिम आबादी 6% है, जबकि शहरी मुस्लिम आबादी 24% है। हिन्दुस्तान का मुसलमान शहरी है। वो शहर में रहता है। शहर बंद कीजिए और जो रास्ते में आता है, उसे मना कीजिए, उसे भगाइए।” उसने कुरान का हवाला देते हुए कहा था कि जो उन्हें (मुसलमानों को) अपने घर से निकाले, उसे वो अपने घर से निकाल दें।

17 दिसंबर को ही सीलमपुर में दोपहर एक बजे से एक उन्मादी भीड़ सड़कों पर उतर आई और नए नागरिकता (संशोधन) कानून को हटाने की माँग करने लगी। तात्पर्य यह है कि ऊपर से विरोध और शांतिपूर्ण प्रदर्शन का चोला पहना था। लेकिन, थोड़ी देर देखते ही देखते प्रदर्शन ने उग्र रूप से ले लिया। इसके बाद पथराव शुरू हो गया। उग्र भीड़ ने छोटे बच्चों से भरे स्कूल बस को भी नहीं छोड़ा। बस में मौजूद स्टाफ ने जान पर खेल कर बच्चों की रक्षा की वरना यह मजहबी उन्माद से ग्रस्त भीड़ उनका क्या करती यह आप समझ सकते हैं। सीलमपुर से जाफराबाद जाने वाली ‘66 फुटा रोड’ पर आवागमन को पूरी तरह से बंद कर दिया। स्थिति बिगड़ते देखकर पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को हटाने के लिए आँसू गैस के गोले दागे। ‘इंडिया टुडे’ से बातचीत में दिल्ली एक एक उपद्रवी ने कहा: “हमारे क्षेत्र में कई दिनों से अनाउंसमेंट हो रही थी कि कि मंगलवार को इतने बजे एनआरसी और सीएए के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन होगा। कई लोगों को पहले से ही पता था और जिन्हें नहीं पता था, उन्होंने मस्जिदों से अनाउंस कर के कहा गया कि आप सड़क पर उतरो।”

यहाँ भी ‘प्रदर्शन’ का तरीका बिलकुल उसी चरणबद्ध प्रक्रिया से संचालित हो रहा था जैसा कि बाकी जगह में हुआ: पत्थर इकट्ठा कर के रखना, पेट्रोल बम तैयार रखना, पुलिस दिखे तो हमला करना, DTC की बसों को फूँकना/क्षति पहुँचाना। ये सारी चीजें सड़क पर चलती भीड़ स्वतः इकट्ठा नहीं कर सकती। पुलिस के कई अधिकारियों ने, इन दंगों पर बात करते हुए, और दिल्ली के हिन्दू विरोधी दंगों की योजना पर चार्जशीट में भी, लिखा है कि इस तरह की वस्तुएँ (जो हथियार की तरह, इस बड़ी मात्रा में प्रयोग में आती हैं) वो कोई राह चलते न तो इकट्ठा कर सकता है, न चुन सकता है, न बोतल में पेट्रोल डाल कर बना सकता है।

इसी दिन एक वीडियो आया था जिसमें सीलमपुर में हुए दंगों के बीच एक उन्मादी ने पेट्रोल बम फेंकने के क्रम में अपना ही हाथ उड़ा लिया। वो बम फेंक रहा था लेकिन शायद उचित प्रशिक्षण न मिल पाने की वजह से जब तक वो उसे फेंक पाता, वो हाथ ही में फट गया, और उसके हाथ के चीथड़े उड़ गए। इस उन्मादी दंगाई की पहचान रईस के रूप में हुई। पुलिस के अनुसार, घटना के बाद से रईस ने अपनी पहचान छिपाई हुई थी और जीटीबी अस्पताल में अपना इलाज करवा रहा था। लेकिन, तलाश में जुटी पुलिस को उसकी जानकारी मिल गई। जिसके बाद उसे गिरफ्तार किया गया।

(पुस्तक के अंश यहाँ समाप्त होते हैं)

तीन दिनों में एक पायलट प्रोजेक्ट कर लिया गया था

इन तीन दिनों की हिंसा के बाद पूरे देश में पुलिस सचेत हो चुकी थी। 18 दिसंबर को देश के कुछ इलाकों में सावधानी के तौर पर पहले ही हिंसा न हो, इसकी तैयारी कर ली गई थी। ख़ुफ़िया सूत्रों से बंगलुरु प्रशासन को सूचना मिली कि देश के कई हिस्से में हो रहे विरोध प्रदर्शन की तरह ही, यहाँ भी कुछ असामाजिक तत्व विरोध की आड़ में हिंसा फैला सकते हैं। दिल्ली-यूपी में हुए उपद्रव और दंगाइयों के उन्मादी हिंसा की घटनाओं के बाद के बाद बेंगलुरु पुलिस अतिरिक्त सतर्कता बरतने पर विवश थी। पूरे बंगलुरु में 3 दिनों के लिए धारा-144 लागू कर दिया गया ताकि कहीं भी भीड़ के रूप में इकट्ठे होकर प्रदर्शन न कर सके। इसका परिणाम यह रहा कि आने वाले दिनों में बंगलुरु से किसी भी तरह की बड़ी हिंसक घटना की खबर नहीं आई।

इसके बाद भी उत्तर प्रदेश समेत कई राज्यों में हिंसा का दौर रुक-रुक कर कई दिनों तक चला, लोगों की जानें भी गईं, लेकिन दंगाइयों को दामाद और जीजा बना चुके स्टूडियो एंकरों और वामपंथी लम्पटाधीशों ने इन्हें जायज कहना जारी रखा। हर तरह की हिंसा के सबूत मुस्लिम भीड़ों के होने की कहानी कहती रही, लेकिन उन्हें ‘पीड़ित समुदाय’, ‘अल्पसंख्यकों को विश्वास में नहीं ले पा रही हैं सरकार, जैसे जुमलों के सहारे ‘ये उनका गुस्सा है, मजबूरी है क्योंकि उन्हें लगता है उन्हें देश से निकाल दिया जाएगा’ के नाम पर बचाया जाता रहा।

आज भी कमोबेश वही हो रहा है। वामपंथी पोर्टलों पर नैरेटिव बदलने की कोशिशें जारी हैं। वो यह सोच रहे हैं कि साल भर बाद हिन्दू समाज और रिसते घावों को चाटती दिल्ली भूल गए होंगे कि साल भर पहले उसके सीने पर छुरा मारने वाले, और कपड़ों पर आग लगाने वाले लोगों की पहचान क्या थी। लेकिन, जिस तरह दंगों के थमते ही ऑपइंडिया ने लगातार ग्राउंड रिपोर्टिंग करते हुए उसकी सच्चाई बताई, वैसे ही हम हर साल, हर संबंधित मुद्दों पर, इन दंगों की याद करते रहेंगे।

हम यह बताते रहेंगे कि कैसे मानवाधिकारों की कविताओं, तिरंगे झंडे, भारत के नक्शे और मुस्लिम औरतों-बच्चों की आड़ में पूरे देश को जलाने की साजिश रची गई थी। हम यह बताते रहेंगे कि मरने वालों की संख्या और मजहब इन दंगों की विभीषिका की असली कहानी नहीं कहता, बल्कि मृतकों को मारने का तरीका बताता है कि तैयारी किसने की थी, और वो बर्बर, आतंकी, हिंसक तरीका किस मजहब का है जो अंकित शर्मा को चार घंटों तक चाकुओं से गोदती है, दिलबर नेगी के हाथ-पाँव काट कर जलती आग में फेंक देती है, कॉन्स्टेबल रतनलाल को खींच ले जाती है।

न भूले हैं, न भूलेंगे, न भूलने देंगे।

अर्णब मामले में कोर्ट के किसी भी नोटिस का नहीं देंगे जवाब: महाराष्ट्र के दोनों सदनों ने पास किया प्रस्ताव

महाराष्ट्र विधानसभा में रिपब्लिक टीवी के एडिटर इन चीफ अर्णब गोस्वामी के खिलाफ़ विशेषाधिकार हनन का प्रस्ताव लाया गया था। अब इस मुद्दे पर न्यायपालिका और विधायिका के टकराव की स्थिति पैदा हो गई है। महाराष्ट्र के दोनों सदनों में पारित किए गए एक प्रस्ताव में कहा गया है कि अर्णब गोस्वामी प्रकरण में सदन हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट के किसी नोटिस का न तो जवाब देगा और न ही संज्ञान लेगा। 

यह प्रस्ताव शीत सत्र के अंतिम दिन मंगलवार (15 दिसंबर 2020) को पारित हुआ। दोनों प्रस्तावों के मुताबिक़ न्यायालय के नोटिस का जवाब देने का मतलब है कि न्यायपालिका विधायिका पर नज़र रख रहा है। यह संवैधानिक प्रक्रिया के खिलाफ़ होगा। विधानसभा स्पीकर नाना पटोले ने इस प्रस्ताव के पारित होने पर कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने नोटिस और समन जारी किया है। विधानसभा स्पीकर और डिप्टी स्पीकर नरहरि जिरवाल इसका जवाब नहीं देंगे।

विधान परिषद में भी प्रस्ताव एकमत से पारित हुआ। विधान परिषद के अध्यक्ष रामराजे नाइक निंबलकर ने प्रस्ताव के पारित होने का ऐलान किया। इस सदन में भी यही कहा गया कि अगर अर्णब गोस्वामी द्वारा विशेषाधिकार उल्लंघन की कार्रवाई को न्यायपालिका में चुनौती दी जाती है तो सदन हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट के नोटिस का जवाब नहीं देगा। 

इसके अलावा विधानसभा स्पीकर नाना पटोले का यह भी कहना था कि न्यायपालिका, विधायिका और कार्यपालिका का दायरा तय है। सभी को इस दायरे का ध्यान रखते हुए ही आगे बढ़ना चाहिए, इनमें से कोई भी एक-दूसरे की कार्रवाई में दखल नहीं दे सकते हैं। वहीं विधान परिषद अध्यक्ष निंबलकर के मुताबिक़ विधायिका या प्रशासनिक अधिकारी न्यायालय के नोटिस का जवाब देता है तो इसका मतलब यह हुआ कि वह न्यायपालिका को विधायिका की कार्यप्रणाली में दखल देने का अधिकार दे रहे हैं। यह संविधान के मूलभूत ढाँचे के खिलाफ़ है।     

प्रस्ताव को लेकर दोनों ही सदनों में किसी भी तरह का विरोध नहीं हुआ। हालाँकि भाजपा विधायक राहुल नरवरेकर ने कहा कि यह प्रस्ताव सामाजिक और राजनीतिक लिहाज़ से नकारात्मक उदाहरण पेश करेगा। शिवसेना के प्रताप सरनाइक ने 8 सितंबर को अर्णब गोस्वामी के खिलाफ यह प्रस्ताव पेश किया था। उन्होंने अर्णब पर आरोप लगाते हुए कहा था कि वह मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे और एनसीपी मुखिया के लिए अभद्र भाषा का उपयोग करते हैं। सरनाइक के मुताबिक़ अर्णब अपने टीवी शो में मंत्रियों और सांसदों का भी अपमान करते हैं। इस संबंध में अर्णब गोस्वामी ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया था, इसके बाद 26 नवंबर को विधानसभा स्पीकर को नोटिस भेज कर जवाब माँगा गया था।  

ममता को चेताने के बाद TMC विधायक जितेंद्र तिवारी का इस्तीफा, कहा था- आसनसोल को केंद्र से मिले पैसे रोके

पश्चिम बंगाल के पांडवेश्वर से तृणमूल कॉन्ग्रेस के विधायक जितेंद्र तिवारी ने आज (दिसंबर 17, 2020) आसनसोल नगर निगम के बोर्ड ऑफ एडमिनिस्ट्रेटर के अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया। कयास लग रहे हैं कि वे 19 दिसंबर को बीजेपी में शामिल हो सकते हैं। इससे पहले तिवारी ने राज्य की ममता सरकार को चेताते हुए आरोप लगाया था कि विकास के लिए आसनसोल को मिले पैसे राजनीति की वजह से रोके जा रहे हैं।

बता दें कि तिवारी ने राज्य सरकार को धमकी थी कि वे जरूरत पड़ने पर पद को छोड़ देंगे। उन्होंने कहा था,  “एक न एक दिन हमें निर्णय लेना ही होगा कि क्या करना है? मैंने सोच लिया है कि अगर जरूरत पड़ी तो मैं (पार्टी) छोड़ दूँगा, लेकिन लोगों के साथ बना रहूँगा।”

तिवारी ने राज्य मंत्री फिरहाद हकीम को लेकर कहा था, “उन्होंने मुझ पर भाजपा की भाषा बोलने का आरोप लगाया। इसलिए मैं उन्हें याद दिला दूँ कि उन्होंने कोलकाता को मिनी पाकिस्तान बनाने की बात कही थी। क्या मुझे उनसे सबक लेने की जरूरत है? हम ममता बनर्जी की पार्टी में हैं।”

जितेंद्र तिवारी ने आरोप लगाया था कि उन्हें उनके विधानसभा क्षेत्र में किए गए वादों को पूरा करने से रोकने के लिए मुश्किलें खड़ी की जा रही है। वे कहते हैं, “हम जनता के प्रति जवाबदेह हैं। हमने जो वादे किए उसे लेकर हमें कहा गया कि हम उसे पूरा नहीं कर सकते। अगर हम अपने अधिकारों के बारे में बात करते हैं तो हमें पार्टी छोड़ने के लिए कहा जाता है।” उन्होंने यह भी कहा था कि उनमें इतनी क्षमता है कि वे अपनी छवि के दम पर चुनाव जीत जाएँ।

उल्लेखनीय है कि बंगाल में विधानसभा चुनाव से पहले टीएमसी की मुश्किलें लगातार बढ़ती नजर आ रही हैं। कल टीएमसी के दिग्गज नेता शुभेंदु अधिकारी ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया था और अब तिवारी ने आसनसोल नगर निगम (AMC) के अध्यक्ष पद से इस्तीफा दिया है। शुभेंदु को लेकर भी पार्टी कार्यकर्ताओं ने अनुमान लगाया है कि वे भाजपा में शामिल होंगे। उनको लेकर भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष ने भी यह घोषणा की है कि शुभेंदु पार्टी में शामिल होने वाले हैं। उनके कार्यालय में भी भगवा रंग से पुताई का काम भी शुरू हो गया है।

चले गए चंदा बाबू, तीन बेटों का बलिदान देकर जंगलराज से लड़े

चंदा बाबू चले गए। वहीं, जहॉं उनके बेटे को बर्बर तरीके से शहाबुद्दीन नाम के गुंडे ने भेजा था। चंदा बाबू भी मर उसी दिन गए थे, वो तो सॉंसे थी जो बुधवार की रात (16 दिसंबर 2020) उखड़ी। ये वही महीना है जिसकी शुरुआत में उस शहाबुद्दीन को हाई कोर्ट ने परिवार से मिलने की सशर्त पेरोल दी थी, जिसके खिलाफ चंदा बाबू ने एक लंबी कानूनी लड़ाई लड़ी।

चंदा बाबू यानी चंदेश्वर प्रसाद। कभी सीवान का एक जाना-माना दुकानदार। जिसे दुनिया ने एक ऐसे पिता के तौर पर जाना जिसके दो बेटों को तेजाब से नहला दिया गया। तीसरे की गवाह बनने पर हत्या कर दी गई। जो चौथे बेटे के मारे जाने के डर के साए में जीता रहा। लेकिन, फिर भी वह उस गुंडे के सामने नहीं झुका, नहीं टूटा, जिसे लालू-राबड़ी के राज में सीवान में अपनी सरकार चलाने की छूट मिली थी। जिसने महागठबंधन की सरकार में जेल से बाहर निकलने पर नीतीश कुमार को परिस्थितियों का मुख्यमंत्री कह दिया था।

यह घटना 2016 की है। बिहार में महागठबंधन की सरकार चल रही थी और 11 साल बाद शहाबुद्दीन जेल से बाहर निकला था। उस समय दुनिया ने टोल नाके से कानून को ठेंगा दिखाते निकले शहाबुद्दीन के काफिले को देखा था और उन साक्षात्कारों को भी जिसमें उसने बड़े रौब से कहा था कि नीतीश कुमार मास लीडर नहीं हैं। अगर जनता को मैं डॉन के रूप में पसंद हूँ तो मुझे अपनी छवि बदलने की जरूरत नहीं है।

उसी समय सीवान पहुँचे वरिष्ठ पत्रकार व्यालोक पाठक ने ऑपइंडिया को बताया, “बड़रडीहा बस स्टैंड पर उतरने के बाद हम पूछते हुए चंदा बाबू के घर पहुँचे थे। मकान और दुकान साथ ही था। खिचड़ी दाढ़ी, सस्ता चश्मा और एक लुंगी के ऊपर सस्ती मटमैली गंजी पहने चंदा बाबू कुर्सी पर बैठे थे। मुझे उनके चेहरे पर दो रेखाओं का आभास हुआ जो शायद लगातार ऑंसू बहने की वजह से स्थायी निशान बन गए थे।”

अरसे से बीमार चल रहे चंदा बाबू का निधन हृदय गति रुकने से हुआ। आज भले सांत्वना देने वालों का उनके घर में ताता लगा हो, लेकिन कभी कोई भी उनके साथ दिखना नहीं चाहता था। व्यालोक पाठक बताते हैं कि उस समय शहाबुद्दीन की खौफ के कारण कोई भी चंदा बाबू के साथ दिखना नहीं चाहता था। खराब स्वास्थ्य, पत्नी की बीमारी, बेटे की विकलांगता और आर्थिक असमर्थता की उनकी लाचारी झलक रही थी। बात करते-करते आँखें भी बार-बार डबडबा जाती थी। बावजूद अंतिम साँस तक सीवान न छोड़ने और लड़ते जाने की बात कर रहे थे।

व्यालोक पाठक चंदा बाबू के जिस हौसले की बात कर रहे हैं वह उस दिन था जिस दिन उनके घर से कुछ किलोमीटर दूर प्रतापपुर में ‘सीवान का साहेब’ अपना दरबार लगाकर बैठा था। असल में रंगदारी नहीं देने और अपनी जमीन शहाबुद्दीन के हवाले न करने के कारण चंदा बाबू के दो बेटों गिरीश और सतीश का अपहरण कर लिया गया था। इसके बाद उन्हें शहाबुद्दीन के गाँव प्रतापपुर स्थित उसकी कोठी पर ले जाया गया। फिर 16 अगस्त 2004 को वहाँ दोनों भाइयों को तेज़ाब से नहलाया गया और तब तक ऐसा किया गया, जब तक उनकी तड़प-तड़प कर मौत न हो गई। इस मामले में गवाह थे चंदा बाबू के तीसरे बेटे राजीव रौशन, लेकिन कोर्ट जाते समय उनकी भी हत्या कर दी गई थी।

फिर भी चंदा बाबू उस गुंडे के खिलाफ अंत तक लड़े। यह उनकी ही लड़ाई थी जिसके कारण शहाबुद्दीन आज भी जेल में बंद है। जैसा कि व्यालोक पाठक कहते हैं, “चंदा बाबू ने उस वक्त शहाबुद्दीन के खिलाफ खड़ा होने का फैसला किया जिस वक्त उसकी तूती बोलती थी। उसके डर से कोई भी खड़ा होने की हिम्मत नहीं कर पाता था। उस वक्त वे न केवल खड़े हुए, बल्कि अपना सब कुछ गवाँ भी दिया। एक कहावत है कि अर्थी जितनी छोटी होती है उसका बोझ उतना ही बड़ा होता है। चंदा बाबू के एक नहीं तीन-तीन जवान बेटे बलिदान हुए उस युद्ध में। इसलिए जब भी जंगलराज और आतंकराज के खिलाफ खड़े होने की बात होगी चंदा बाबू याद किए जाते रहेंगे।”

यह भी विकट संयोग है कि चंदा बाबू का पूरा जीवन 16 तारीख के इर्द-गिर्द ही घूमती रही। 16 अगस्त 2004 को दो बेटे तेजाब से नहला दिए गए। 16 जून 2014 को बड़े बेटे की गोली मारकर हत्या कर दी गई। अब 16 दिसंबर 2020 को चंदा बाबू खुद दुनिया से विदा हो गए।

आज़ाद मोहम्मद ने प्रेमजाल में फँसा कर बनाया हिन्दू लड़की का अश्लील वीडियो: धर्मपरिवर्तन के विरोध पर दी वायरल करने की धमकी

यूपी के हरदोई में एक हिन्दू किशोरी ने दुष्कर्म और जबरन धर्म परिवर्तन कराने का आरोप लगाते हुए FIR दर्ज करवाई है। किशोरी का आरोप है कि आजाद मोहम्मद नाम के युवक ने पहले उसे प्रेमजाल में फँसाया। फिर दो साल तक शादी के बहाने उसके साथ बार-बार दुष्कर्म किया और वीडियो बना ली। शादी के लिए उसने इस्लाम धर्म कबूलने का जोर डाला। जब उसने इसका विरोध किया तो मोहम्मद ने उसके अश्लील फोटो को वायरल करने की धमकी दी।

पुलिस ने 10 दिसंबर को आरोपित के खिलाफ बलात्कार और पॉक्सो एक्ट के तहत मामला दर्ज किया था। फिर पीड़िता के बयान के आधार पर पुलिस ने उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म परिवर्तन प्रतिषेध अधिनियम 3/5 की धारा भी जोड़ी और आरोपित को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया।

दर्ज एफआईआर के अनुसार, नरहाई के रहने वाले आजाद मोहम्मद ने दो साल पहले गाँव की ही एक किशोरी को अपने प्रेमजाल में फँसाया, उसने शादी का झाँसा देकर किशोरी का शारीरिक शोषण किया और मौके का फायदा उठाते हुए उस दौरान उसकी अश्लील वीडियो भी बना ली, लेकिन शादी के लिए टालता रहा। 30 नवंबर को वह शादी के लिए तैयार हुआ और कोर्ट मैरिज के लिए हरदोई लेकर आया।

शादी से पहले उसने किशोरी से धर्म परिवर्तन कर निकाह करने लिए कहा। जिसका उसने विरोध किया। किशोरी के मना करते ही आजाद मोहम्मद ने उसे वीडियो वायरल करने की भी धमकी दी, लेकिन फिर भी वह टस से मस नहीं हुई। फिर आजाद उसे कोर्ट में छोड़कर चला गया। इससे नाराज किशोरी ने पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराई थी।

पुलिस अधीक्षक हरदोई ने मामले की जानकारी देते हुए कहा कि आजाद मोहम्मद नाम के युवक पर उसकी प्रेमिका ने आरोप लगाया था कि उसने प्रेम जाल में फँसाकर उसके साथ रेप किया। फिर शादी से पहले धर्म बदलने का आरोप दबाव डाला।

एएसपी अनिल कुमार यादव ने बताया कि लड़की की शिकायत पर कार्रवाई करते हुए आरोपित आजाद को बुधवार को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया है। धर्म परिवर्तन अध्यादेश 2020 के अंतर्गत हरदोई जिले की यह पहली गिरफ्तारी है। आगे की जाँच की जा रही है।

गौरतलब है कि जब-जब ग्रूमिंग जिहाद (लव जिहाद) पर सख्ती की बात आती है तो लिबरल गिरोह इसे बीजेपी और हिंदू संगठनों का दुष्प्रचार बताता है। वह इसे समस्या मानने से ही इनकार कर देता है।

इससे पहले दिल्ली के रोहिणी इलाके में रहने वाले अख्तर ने शिवा बनकर हिंदू युवती को प्रेमजाल में फँसाया। जागरण में उससे मुलाकात की और मंदिर में शादी रचाई। उसके बाद लड़की को डिमांड के नाम पर परेशान करने लगा। जब एक दिन अख्तर की झूठी पहचान उजागर हो गई तो उसने अपने भाइयों अफजल, अरशद और पिता मोहम्मद इदरीश के साथ मिलकर युवती को पीटा।

वहीं यूपी के बिजनौर में साकिब नाम के युवक ने सोनू बनकर दलित नाबालिक किशोरी को अपने प्रेमजाल में फँसाया, फिर मौका देखते ही उसे भगा ले गया। पुलिस के अनुसार थाना धामपुर के एक गाँव में 14 दिसंबर की रात मुस्लिम धर्म का एक युवक 16 वर्षीय दलित किशोरी को भगा ले गया था। लड़के ने अपना असली नाम छिपाकर सोनू बता रखा था। किशोरी को बाद में उसकी असली पहचान का पता चला।

परिजनों द्वारा दर्ज एफआईआर के अनुसार, थाना धामपुर के एक गाँव में मुस्लिम धर्म के 18 वर्षीय युवक ने 16 वर्षीय दलित किशोरी को अपना नाम सोनू बता कर दोस्ती की। फिर उसका ब्रेनवाश कर उसे अपने प्यार में फँसा लिया। 14 दिसंबर की रात वह किशोरी को लेकर फरार हो गया और निकाह करने की फिराक में था।