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दिव्यता के पुनरुद्धार से दिव्य ऊर्जा के संचार तक, सोमनाथ मंदिर का हुआ कुंभाभिषेक: समझें कितना अहम है ये वैदिक अनुष्ठान, शास्त्रों में कहाँ है जिक्र

सोमनाथ केवल एक मंदिर नहीं है। यह भारत की संस्कृति, आस्था, आध्यात्मिकता और निरंतर पुनर्जागरण का जीवंत प्रतीक है। कई आक्रमणों, विनाश और पुनर्निर्माण का साक्षी रहा यह ज्योतिर्लिंग सदियों से सनातन संस्कृति की अडिगता को दर्शाता आया है। लेकिन ‘सोमनाथ अमृतपर्व-2026’ के दौरान जो हुआ, उसे केवल एक धार्मिक अनुष्ठान कहना पर्याप्त नहीं होगा।

पुनर्निर्मित सोमनाथ मंदिर के इतिहास में पहली बार मंदिर के शिखर पर वैदिक परंपरा के अनुसार कुंभाभिषेक किया गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उपस्थिति में संपन्न हुई इस वैदिक परंपरा ने सोमनाथ के आध्यात्मिक इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ दिया है।

11 तीर्थस्थलों से लाए गए पवित्र जल से मंदिर के शिखर का अभिषेक किया गया, वैदिक मंत्रोच्चार के बीच विशेष कुंभ को शिखर तक पहुँचाया गया और केवल तीन मिनट में पूरे मंदिर पर पवित्र जल का अभिषेक हुआ। आइए जानते हैं कि यह कुंभाभिषेक क्या होता है? इसे क्यों किया जाता है और शास्त्रों में इसका क्या महत्व बताया गया है।

‘कुंभ’ और ‘अभिषेक’ के पीछे का वैदिक अर्थ

‘कुंभाभिषेक’ शब्द संस्कृत के 2 शब्दों ‘कुंभ’ और ‘अभिषेक’ से मिलकर बना है। कुंभ यानी जल से भरा पवित्र कलश और अभिषेक यानी पवित्र स्नान या देवता पर पवित्र जल चढ़ाने की प्रक्रिया। वैदिक परंपरा में कुंभ को केवल एक पात्र नहीं माना जाता, बल्कि इसे सृष्टि, जीवन, ऊर्जा और देवत्व का प्रतीक माना गया है।

वैदिक मान्यताओं में जल को शुद्धि और जीवनशक्ति का सबसे महत्वपूर्ण तत्व बताया गया है। ऋग्वेद में जल को ‘अमृत’ के समान माना गया है और कई यज्ञों एवं वैदिक अनुष्ठानों में कलश स्थापना को देवशक्ति के आह्वान से जोड़ा गया है। आगम शास्त्रों विशेष रूप से शैव आगमों में मंदिर के शिखर पर पवित्र जल के माध्यम से देवशक्ति की पुनः स्थापना की परंपरा का विस्तार से वर्णन मिलता है।

कुंभाभिषेक: अनुष्ठान से बढ़कर मंदिर की जीवंतता और दिव्यता का पुनरुद्धार

दक्षिण भारत के प्राचीन मंदिरों में कुंभाभिषेक को अत्यंत महत्वपूर्ण धार्मिक प्रक्रिया माना जाता है। मान्यता है कि मंदिर केवल पत्थरों और शिल्पों से बना ढाँचा नहीं होता, बल्कि उसमें देवत्व की प्राणशक्ति स्थापित होती है। समय के साथ इस आध्यात्मिक ऊर्जा के पुनर्जागरण के लिए विशेष वैदिक अनुष्ठान किए जाते हैं, जिन्हें कुंभाभिषेक कहा जाता है।

मंदिर में स्थापित दैवी ऊर्जा को वैदिक विधियों के माध्यम से फिर से सक्रिय और पवित्र किया जाता है, जिसके अंतर्गत मंदिर के शिखर और गर्भगृह पर पवित्र जल से अभिषेक किया जाता है। इसी कारण दक्षिण भारत के कई मंदिरों में हर 10 से 12 वर्ष में कुंभाभिषेक किया जाता है।

मंदिर के जीर्णोद्धार, पुनर्निर्माण, विस्तार या लंबे समय बाद उसकी आध्यात्मिक ऊर्जा को पुनः स्थापित करने के लिए यह विधि संपन्न की जाती है।

आगम परंपरा के अनुसार, वैदिक मंत्रोच्चार के माध्यम से कलश में स्थापित देवशक्ति को मंदिर के शिखर तक पहुँचाया जाता है और फिर शिखर से पूरे मंदिर पर उस पवित्र जल का अभिषेक किया जाता है। इसे मंदिर की आध्यात्मिक चेतना के पुनर्जीवन से जोड़कर देखा जाता है।

सोमनाथ के लिए यह अनुष्ठान ऐतिहासिक क्यों?

सोमनाथ मंदिर के इतिहास में इस विधि का महत्व केवल इसलिए नहीं है कि यह पहली बार आयोजित हुई, बल्कि इसलिए भी है क्योंकि सोमनाथ भारत के सांस्कृतिक पुनर्जागरण का प्रतीक रहा है। कई बार तोड़े गए इस मंदिर का स्वतंत्रता के बाद पुनर्निर्माण हुआ और इसे राष्ट्रीय गौरव से जोड़ा गया।

अब पहली बार मंदिर के शिखर पर कुंभाभिषेक होने से सोमनाथ की परंपरा में एक नया वैदिक आयाम जुड़ गया है। विधि के दौरान 11 तीर्थस्थलों के जल का उपयोग भी प्रतीकात्मक रूप से बेहद महत्वपूर्ण माना गया। हिंदू परंपरा में अलग-अलग तीर्थों के जल को आध्यात्मिक शक्ति और पवित्रता के संगम के रूप में देखा जाता है।

एक तरह से यह अभिषेक केवल सोमनाथ मंदिर का नहीं, बल्कि पूरे भारतीय तीर्थ परंपरा की सांस्कृतिक एकता का प्रतीक बन गया।

प्राचीन परंपरा और आधुनिक तकनीक का संगम

इस विधि का एक रोचक पहलू यह भी था कि इसमें परंपरा के साथ आधुनिक तकनीक का उपयोग किया गया। लगभग 8 फीट ऊँचा और 760 किलो वजनी विशाल कुंभ तैयार किया गया था, जिसमें 1100 लीटर पवित्र जल रखा गया। क्रेन की मदद से उसे मंदिर के शिखर तक पहुँचाया गया और बाद में सेंसर आधारित तकनीक के जरिए केवल तीन मिनट में पूरा अभिषेक संपन्न किया गया।

यह दृश्य केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं था, बल्कि हजारों वर्ष पुरानी वैदिक परंपरा और आधुनिक भारत के अद्भुत संगम का प्रतीक भी था। एक ओर वैदिक मंत्रोच्चार गूँज रहे थे तो दूसरी ओर आधुनिक तकनीक के माध्यम से इस भव्य विधि का संचालन किया जा रहा था।

सोमनाथ में संपन्न हुआ यह कुंभाभिषेक याद दिलाता है कि हिंदू मंदिर परंपरा केवल इतिहास या आस्था का विषय नहीं है, बल्कि यह एक निरंतर जीवित और विकसित होती संस्कृति है। शायद यही कारण है कि सदियों के संघर्षों के बाद भी सोमनाथ न केवल अस्तित्व में बना रहा, बल्कि नई ऊर्जा और नए वैभव के साथ बार-बार पुनर्जीवित हुआ है।

(यह रिपोर्ट मूल रुप से गुजराती में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

गुजरात में स्थापित होगी भारत की पहली मिनी-माइक्रो LED डिस्प्ले यूनिट, इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन को मिलेगी मजबूती: जानें इस तकनीक के बारे में सब कुछ

भारत पिछले कुछ वर्षों से केवल एक मैन्युफैक्चरिंग हब बनने तक सीमित नहीं रहना चाहता, बल्कि वह दुनिया के एडवांस टेक्नोलॉजी मैप पर अपनी मजबूत पहचान बनाने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। सेमीकंडक्टर से लेकर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग तक दुनिया भर में चल रही टेक्नोलॉजी की दौड़ में अब भारत भी तेजी से अपनी मौजूदगी दर्ज करा रहा है और इसमें गुजरात अहम भूमिका निभा रहा है।

अब इसी दिशा में गुजरात के धोलेरा में देश की पहली मिनी/माइक्रो LED डिस्प्ले फैब यूनिट स्थापित होने जा रही है। केंद्र सरकार ने इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन के तहत इस प्रोजेक्ट को मंजूरी दे दी है। इस प्रोजेक्ट के तहत क्रिस्टल मैट्रिक्स लिमिटेड धोलेरा में लगभग 3068 करोड़ के निवेश से गैलियम नाइट्राइड (GaN) आधारित मिनी/माइक्रो-LED डिस्प्ले फैब्रिकेशन फैसिलिटी स्थापित करेगी।

अब तक भारत में इस तरह की एडवांस डिस्प्ले टेक्नोलॉजी का निर्माण नहीं होता था और देश को इसके लिए मुख्य रूप से आयात पर निर्भर रहना पड़ता था। खासकर चीन, दक्षिण कोरिया और ताइवान जैसे देश इस क्षेत्र में आगे रहे हैं। अब भारत पहली बार स्थानीय स्तर पर ऐसी तकनीक विकसित करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।

क्या है मिनी-माइक्रो LED टेक्नोलॉजी?

आज स्मार्टफोन, स्मार्टवॉच, प्रीमियम टेलीविजन, EV और AR/VR डिवाइसेज की दुनिया में डिस्प्ले टेक्नोलॉजी बेहद महत्वपूर्ण बन चुकी है। स्क्रीन जितनी ज्यादा चमकदार, ऊर्जा-कुशल और पतली होगी, यूजर एक्सपीरियंस उतना ही बेहतर माना जाता है। मिनी और माइक्रो LED टेक्नोलॉजी को डिस्प्ले तकनीक की अगली पीढ़ी माना जा रहा है।

फिलहाल दुनिया के अधिकांश डिवाइसेज में LCD या OLED स्क्रीन का इस्तेमाल होता है, लेकिन मिनी/माइक्रो LED डिस्प्ले इनके मुकाबले ज्यादा ब्राइटनेस, बेहतर कॉन्ट्रास्ट, कम बिजली खपत और लंबी लाइफ-साइकिल प्रदान करते हैं।

खासकर माइक्रो-LED टेक्नोलॉजी को भविष्य के डिवाइसेज के लिए बेहद अहम माना जा रहा है, क्योंकि यह फोल्डेबल डिस्प्ले, ऑटोमोटिव डैशबोर्ड, ऑगमेंटेड रियलिटी ग्लासेस और अल्ट्रा-प्रीमियम टीवी के लिए आदर्श मानी जाती है।

अगर इसे आसान भाषा में समझें तो अब तक भारत ऐसी स्क्रीन खरीदने वाला देश था, लेकिन धोलेरा में बनने वाली यह फैसिलिटी भारत को ‘उपभोक्ता’ से ‘निर्माता’ बनाने की दिशा में एक बड़ी कड़ी साबित हो सकती है।

गैलियम नाइट्राइड (GaN) क्या है और इसका महत्व क्यों बढ़ रहा है?

इस पूरे प्रोजेक्ट का एक महत्वपूर्ण हिस्सा गैलियम नाइट्राइड (GaN) टेक्नोलॉजी है। आमतौर पर सेमीकंडक्टर निर्माण में सिलिकॉन आधारित तकनीक का उपयोग किया जाता है, लेकिन GaN को अगली पीढ़ी का हाई-परफॉर्मेंस सेमीकंडक्टर मटेरियल माना जा रहा है। GaN तेज गति से पावर ट्रांसफर कर सकता है, कम गर्मी पैदा करता है और ज्यादा ऊर्जा-कुशल होता है।

इसलिए इसका उपयोग केवल डिस्प्ले टेक्नोलॉजी तक सीमित नहीं है, बल्कि इलेक्ट्रिक व्हीकल्स, डिफेंस इलेक्ट्रॉनिक्स, 5G इंफ्रास्ट्रक्चर और एडवांस कम्युनिकेशन सिस्टम्स में भी तेजी से बढ़ रहा है। यानी धोलेरा का यह प्रोजेक्ट केवल स्क्रीन निर्माण तक सीमित नहीं है, बल्कि भारत को कंपाउंड सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम में प्रवेश दिलाने वाला कदम भी माना जा रहा है।

PIB के अनुसार, यह फैसिलिटी मिनी/माइक्रो-LED डिस्प्ले मॉड्यूल्स के साथ-साथ GaN फाउंड्री सर्विसेज भी उपलब्ध कराएगी और यहाँ 6-इंच वेफर्स पर एपिटैक्सी जैसी एडवांस प्रक्रियाएँ भी की जाएँगी।

चीन-ताइवान पर निर्भरता कम करने की दिशा में बड़ा कदम

पिछले कुछ वर्षों में दुनिया ने सेमीकंडक्टर सप्लाई चेन के महत्व को करीब से देखा है। कोरोना महामारी, अमेरिका-चीन व्यापार युद्ध और ताइवान को लेकर बढ़ते जियोपॉलिटिकल तनाव के बाद दुनिया के कई देशों को यह समझ आया कि चिप्स और एडवांस इलेक्ट्रॉनिक्स के लिए कुछ गिने-चुने देशों पर अत्यधिक निर्भरता जोखिम भरी हो सकती है।

भारत के लिए भी यह एक बड़ी चुनौती रही है। क्योंकि स्मार्टफोन से लेकर ऑटोमोबाइल और डिफेंस सिस्टम्स तक लगभग हर क्षेत्र में सेमीकंडक्टर और एडवांस डिस्प्ले कंपोनेंट्स की जरूरत पड़ती है। ऐसे में देश के भीतर मैन्युफैक्चरिंग क्षमता विकसित करना केवल आर्थिक जरूरत नहीं, बल्कि रणनीतिक आवश्यकता भी बन गया है।

धोलेरा में बनने वाला यह मिनी/माइक्रो LED फैब यूनिट इसी व्यापक रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। इसका सीधा मतलब यह है कि भारत अब केवल इलेक्ट्रॉनिक्स असेंबल करने वाला देश नहीं रहना चाहता, बल्कि भविष्य की तकनीकों के मूलभूत कंपोनेंट्स भी देश में ही तैयार करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।

आम लोगों की जिंदगी से इसका क्या संबंध है?

सेमीकंडक्टर या डिस्प्ले फैब्रिकेशन जैसे शब्द आम लोगों को अक्सर काफी तकनीकी लगते हैं, लेकिन वास्तव में इन तकनीकों का सीधा संबंध रोजमर्रा की जिंदगी से है। आने वाले समय में स्मार्टफोन, स्मार्ट टीवी, इलेक्ट्रिक व्हीकल्स, वियरेबल डिवाइसेज और AR/VR प्रोडक्ट्स में जो एडवांस डिस्प्ले देखने को मिलेंगे, वही तकनीक अब भारत में बनाने की तैयारी की जा रही है।

सरकार द्वारा जारी जानकारी के अनुसार, धोलेरा की यह फैसिलिटी हर साल 72,000 स्क्वेयर मीटर मिनी/माइक्रो LED डिस्प्ले पैनल्स और 24,000 सेट RGB वेफर्स का उत्पादन कर सकेगी। यानी यह सिर्फ एक फैक्ट्री नहीं, बल्कि ऐसी औद्योगिक क्षमता है जो अगले दशक की कंज्यूमर इलेक्ट्रॉनिक्स इकोनॉमी में भारत को और मजबूत स्थिति दिला सकती है।

इसके साथ ही हजारों हाई-टेक नौकरियाँ पैदा होंगी और स्थानीय युवाओं को मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में नए अवसर मिलेंगे।

‘आत्मनिर्भर भारत’ को मिलेगी रफ्तार

पिछले कुछ वर्षों में ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ जैसे शब्द लगातार चर्चा में हैं, लेकिन धोलेरा का यह प्रोजेक्ट दिखाता है कि यह विजन अब जमीन पर भी दिखाई देने लगा है। क्योंकि आत्मनिर्भरता केवल आयातित उत्पादों को असेंबल करने से नहीं आती, बल्कि तब आती है जब कोई देश कोर टेक्नोलॉजी में अपनी खुद की निर्माण क्षमता विकसित करता है।

धोलेरा का यह मिनी/माइक्रो LED फैब यूनिट उसी दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है। यह प्रोजेक्ट भारत को भविष्य की डिस्प्ले टेक्नोलॉजी, कंपाउंड सेमीकंडक्टर्स और एडवांस इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग के क्षेत्र में नई पहचान दिला सकता है।

एक समय था जब ऐसी अत्याधुनिक तकनीक केवल अमेरिका, ताइवान, दक्षिण कोरिया और चीन जैसे देशों तक सीमित मानी जाती थी। अब भारत भी उसी वैश्विक प्रतिस्पर्धा में अपनी मजबूत जगह बनाने की कोशिश कर रहा है और धोलेरा में बनने वाली यह फैसिलिटी शायद उस बदलाव का सबसे बड़ा प्रतीक बन सकती है।

(यह रिपोर्ट मूल रुप से गुजराती में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

घर से करें काम, खाने का तेल कम यूज करें, कार पूल करें… देशवासियों से PM मोदी की 7 अपील: जानिए क्यों कहा- पेट्रोल-डीजल बचाएँ, एक साल तक न खरीदें सोना

दुनिया में युद्धों को लेकर फैले संकट के बीच भारत को आत्मनिर्भर और मजबूत अर्थव्यवस्था बनाने के उद्देश्य से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोगों से कुछ खास अपील की हैं। पीएम मोदी ने आम लोगों से जीवनशैली में छोटे-छोटे बदलाव अपनाकर देशहित में योगदान देने की बात कही गई है। प्रधानमंत्री मोदी रविवार (11 मई 2026) को तेलंगाना के दौरे पर थे और वहाँ सिकंदराबाद में आयोजित एक कार्यक्रम में बोलते हुए उन्होंने लोगों से ये अपील की हैं। पीएम मोदी ने लोगों से विदेशी मुद्रा बचाने की अपील की और इसके लिए उन्होंने कई रास्ते भी बताए हैं।

उन्होंने कहा, “भारत तेजी से विकसित होने के लक्ष्य की तरफ आगे बढ़ रहा है। लेकिन कई विराट चुनौतियों का मुकाबला भी कर रहा है। कोरोना काल के दौरान ही दुनिया सप्लाई चेन के बहुत बड़े संकट से गिर गई थी। कोविड के बाद यूक्रेन में युद्ध शुरू हो गया। उसने दुनिया की परेशानियाँ और बढ़ा दी। फूड, फ्यूल, फर्टिलाइजर इन तीनों चीजों पर गंभीर प्रभाव पड़ा है।”

उन्होंने कहा कि पिछले 2 महीने से हमारे पड़ोस में युद्ध चल रहा है और इसका भारत पर गंभीर असर हुआ है। उन्होंने कहा, “युद्ध की वजह से पूरी दुनिया में पेट्रोल, डीजल, गैस और फर्टिलाइजर के दाम आसमान को भी पार कर गए हैं। जब सप्लाई चेन पर संकट लगातार बना रहे तो हम कितने भी उपाय कर ले मुश्किलें बढ़ती ही जाती है।”

पीएम मोदी ने कहा, “अब देश को सर्वोपरि रखते हुए, माँ भारती को सर्वोपरि रखते हुए, हमें एकजुट होकर के लड़ना होगा। हमें याद रखना है देश के लिए मरना ही सिर्फ देशभक्ति नहीं होती है। देश के लिए जीना और देश के प्रति अपने कर्तव्यों को निभाना भी देशभक्ति होती है।”

पेट्रोल-डीजल की खपत घटाने पर जोर

PM मोदी ने कहा कि हमें कुछ संकल्प लेने होंगे, जैसे एक बड़ा संकल्प है पेट्रोल-डीजल का संयम से इस्तेमाल करना। उन्होंने कहा, “हमें पेट्रोल डीजल का उपयोग कम करना होगा। शहरों में जहाँ मेट्रो है, वहाँ हम तय करें कि हम मेट्रो का ही उपयोग करेंगे। ज्यादा से ज्यादा मेट्रो में ही जाएँगे। अगर कार में ही जाना जरूरी है तो फिर कार पुल करने का प्रयास करें।”

उन्होंने कहा, “अगर सामान भेजना हो तो रेलवे गुड्स के जो ट्रेन होती है रेलवे की सर्विज से भेजें ताकि इलेक्ट्रिक रेलवे होने के कारण पेट्रोल-डीजल की जरूरत ना पड़ती है। इलेक्ट्रिक व्हीकल का ज्यादा से ज्यादा उपयोग करें।”

वर्क फ्रॉम होम को प्राथमिकता देने की अपील

पीएम मोदी ने लोगों से घर से काम करने की अपील की है। उन्होंने कहा, “हमने कोरोना के समय में वर्क फ्रॉम होम की व्यवस्था विकसित की और हमें आदत भी हो गई थी। आज उन व्यवस्थाओं को हम फिर से शुरू करें तो वह देश हित में होगा। वर्क फ्रॉम होम, ऑनलाइन कॉन्फ्रेंसेस, वर्चुअल मीटिंग्स, इनको हमें फिर से प्राथमिकता देनी है।”

एक साल तक सोना खरीदने से बचने की सलाह

प्रधानमंत्री ने एक वर्ष तक लोगों से सोना ना खरीदने की अपील की है। पीएम मोदी ने कहा कि सोना खरीदने में बहुत अधिक विदेशी मुद्रा खर्च होती है। उन्होंने कहा, “एक जमाना था जब संकट आता था, कोई युद्ध होता था तो लोग देश हित में सोना दान दे देते थे। आज दान की जरूरत नहीं है लेकिन देश हित में हमको यह तय करना पड़ेगा कि साल भर तक घर में कोई भी फंक्शन हो, कोई भी कार्यक्रम हो, हम सोने के गहने नहीं खरीदेंगे। सोना नहीं खरीदेंगे। विदेशी मुद्रा बचाने के लिए हमारी देशभक्ति हमें चुनौती दे रही है और हमें इस चुनौती को स्वीकार करते हुए विदेशी मुद्रा को बचाना होगा।”

खाने के तेल के इस्तेमाल में कटौती की बात

पीएम मोदी ने खाने के तेल के कम इस्तेमाल करने की भी बात कही है। उन्होंने कहा, “खाने के तेल के आयात के लिए भी बहुत बड़ी मात्रा में हमें विदेशी मुद्रा खर्च करनी पड़ती है। हर परिवार अगर खाने के तेल में खाने का तेल का जो उपयोग करता है अगर वह कुछ कमी करें मैंने बार-बार कहा है 10% कम करो। अगर हम तेल खाना कम करें ना तो भी वह देशभक्ति का बहुत बड़ा काम है। इससे देश सेवा भी होगी और देह सेवा भी होगी। इससे देश के खजाने का स्वास्थ्य भी सुधरेगा और परिवार के हर सदस्य का स्वास्थ्य भी अच्छा रहेगा।”

प्राकृतिक खेती अपनाने का आह्वान

किसानों से रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता घटाकर प्राकृतिक खेती की ओर बढ़ने की अपील की गई है। पीएम मोदी ने कहा, “हम बहुत बड़ी मात्रा में बाहर से केमिकल फर्टिलाइजर इंपोर्ट करते हैं। केमिकल फर्टिलाइजर खेती के कारण हमारी धरती माँ को बहुत पीड़ा हो रही है। हमारे खेत बर्बाद हो रहे हैं। अगर आज हम अपने खेत को नहीं बचाएँगे तो भविष्य में फसलों पर भी खतरा आ जाएगा। इसलिए बहुत जरूरी है कि हम केमिकल फर्टिलाइजर की खपत 25%, 30%, 40%, 50% उसको घटाए आधी कर दें और हम इस उसके साथ-साथ नेचुरल फार्मिंग की तरफ बढ़े।”

पीएम मोदी ने कहा, “हम फर्टिलाइजर का उपयोग कम करके विदेशी मुद्रा भी बचा सकते हैं और साथ-साथ अपने खेत को बचा सकते हैं। हमारी ये धरती माँ को बचा सकते हैं और यह हमें करना ही होगा। आज वैश्विक संकटों से जो चुनौतियाँ आई है, हमें उन चुनौतियों को पार करना ही होगा।”

स्वदेशी उत्पादों को बढ़ावा देने की अपील

पीएम मोदी ने एक बार फिर ‘वोकल फॉर लोकल’ के मंत्र को अपनाने का आग्रह किया है। पीएम मोदी ने कहा, “हम मेड इन इंडिया चीजें खरीद कर भी विदेशी मुद्रा बचा सकते हैं। हमारे देश में स्थानीय उत्पादन की कोई कमी नहीं है। चाहे जूते हो, पर्स हो, बैग हो, हमें स्वदेशी पर बल देना चाहिए। मेरा आग्रह है कि नए विदेशी प्रोडक्ट हमें नहीं खरीदने चाहिए। और वाकई हमें कई बार अंदाजा तक नहीं होता कि रोजमर्रा की कितनी सारी चीजें विदेशी है जो हम ऐसे ही यूज कर रहे हैं।”

उन्होंने कहा, “जब मैं बात स्वदेशी की करता हूँ तो लोगों को लगता है कि दिवाली के दिए खरीदो मतलब स्वदेशी हो गया। यह तो भ्रम फैलाने वाली बातें हैं। इससे सफलता नहीं मिलती है। हमें घर के उपयोग में आने वाले सामान की लिस्ट बनानी है। देखना चाहिए कितनी विदेशी चीजें घुस गई है। फिर इस लिस्ट से हमें हो सके उतना जल्दी स्वदेशी में बदलना चाहिए।”

एक साल तक विदेश यात्रा टालने का सुझाव

पीएम मोदी द्वारा देशवासियों से गैर-जरूरी विदेशी यात्राओं से बचने की भी अपील की गई है। उन्होंने कहा, “आजकल जो विदेशों में घूमने का, विदेशों में वैकेशन पर जाने का मिडिल क्लास में कल्चर बढ़ता जा रहा है। हमें तय करना होगा कि जब यह संकट का काल है और हमारी देशभक्ति हमें ललकार रही है तो कम से कम एक साल के लिए हमें विदेशों में जाने की बातों को टालना चाहिए। भारत में बहुत सारी जगह है। वहाँ हम जा सकते हैं।”

5 भाषाओं की जानकार, स्टालिन की राजनीतिक सलाहकार और अब बनीं ‘विजय सरकार’ की सबसे युवा मंत्री: जानें- कौन हैं 29 साल की एस कीर्तना

तमिलनाडु में सी जोसेफ विजय के नेतृत्व में TVK सरकार का गठन (10 मई 2026) हो गया । 9 मंत्रियों ने पद और गोपनीयता की शपथ ली, लेकिन सबसे ज्यादा चर्चा सबसे कम उम्र की मंत्री कीर्तना की हो रही है। वह मंत्रिमंडल का एकमात्र महिला चेहरा भी हैं।

सिवाकासी विधानसभा क्षेत्र के इतिहास में 70 साल में पहली बार एक महिला चुनाव जीती है। इस लिहाज से भी 29 साल की कीर्तना का विधायक बनना ऐतिहासिक है। तमिलनाडु जैसे हिन्दी विरोधी राज्य में कीर्तना का फर्राटेदार हिन्दी बोलना सबको आकर्षित कर रहा है।

मंत्री पद की शपथ लेने के बाद उन्होंने कहा कि यह यकीन नहीं होता, क्योंकि किसी दूसरे राज्य में ऐसा कैबिनेट मंत्री नहीं होगा, कोई हमें ऐसा मौका भी नहीं देगा… हम दुनिया को दिखाने जा रहे हैं कि हम सरकार कितनी अच्छी तरह चला सकते हैं।

2026 में पहली बार उन्होंने चुनावी राजनीति में कदम रखा। टीवीके ने उन्हें उस सीट से उतारा, जहाँ 7 दशकों में कभी भी कोई महिला चुनाव नहीं जीत सकी। इसके बावजूद कीर्तना ने पूरी जी-जान से चुनाव प्रचार किया और अपने नेता फिल्मों से राजनीति में आए सी विजय जोसेफ को सीएम बनाने के लिए उन्हें वोट देने की अपील की।

कीर्तना को 68709 वोट मिले। उन्होंने अपने निकटतम प्रतिद्वंदी डीएमके उम्मीदवार अशोकन जी को 11670 वोटों के अंतर से हराया। कीर्तना का कहना है कि देश के हर नागरिक को राजनीति में शामिल होना चाहिए। आगे आइए और समाज के लिए काम करिए।

तमिल, अंग्रेजी, हिन्दी समेत 5 भाषाओं की जानकार कीर्तना का कहना है कि पार्टी की ऐतिहासिक जीत और वह भी गठन के मात्र दो साल बाद खुद में करिश्माई है।


वह लोगों को यह बताना चाहती है कि कैसे उनकी पार्टी मात्र 2 सालों में सत्ता तक का सफर पूरा किया। वह अपने नेता का संदेश पूरे देश में पहुँचाना चाहती हैं, ताकि ज्यादा से ज्यादा लोग उनकी बातों को समझ सके, इसलिए हिन्दी बोल रही हैं।

कौन है एस कीर्तना

टीवीके की विधायक एस कीर्तना अब तमिलनाडु की मंत्री हैं। उन्होंने राजनीतिक सलाहकार के रूप में पूर्व सीएम एमके स्टालिन समेत कई नेताओं के लिए काम किया है। उनके विधानसभा क्षेत्र सिवाकासी में पटाखा फैक्ट्री काफी हैं, इसलिए इसे भारत का पटाखा राजधानी भी कहा जाता है।

कीर्तना का जन्म तमिलनाडु के विरुधुनगर में 1996 मे हुआ था। उनके पिता संपथ वहाँ टीचर थे। कीर्तना ने मदुरै यूनिवर्सिटी से गणित में बीएससी किया और फिर पुडुचेरी सेंट्रल यूनिवर्सिटी से स्टैटिस्टिक में एमएससी की डिग्री हासिल की। उनकी शुरुआती पढ़ाई तमिल में हुई फिर अंग्रेजी में हायर एजुकेशन प्राप्त किया।

तमिलनाडु में हिन्दी विरोधी माहौल के बावजूद कीर्तना ने हिन्दी सीखी और उनकी भाषा पर पकड़ काफी अच्छी है। कीर्तना का मानना है कि हिन्दी भाषा देशभर में संवाद और पहचान बनाने में मदद करती है। उनका बहुभाषी व्यक्तित्व उन्हें तमिलनाडु के दूसरे राजनीतिक चेहरों से अलग करता है। चुनाव प्रचार के दौरान कीर्तना के कई इंटरव्यू हिन्दी में आए, तो लोगों को उनके ‘हिन्दी प्रेम’ का पता चला। शपथ ग्रहण के बाद कीर्तना ने कहा कि तमिलनाडु और यहाँ की जनता के लिए आज बहुत बड़ा दिन है, इस पल का सबको बेसब्री से इंतजार था।

टीवीके ने विधानसभा चनाव में 108 सीटें हासिल की थीं. उन्हें 118 का जादुई आँकड़ा पार करना था। ऐसे में कॉन्ग्रेस-लेफ्ट और वीएसके का समर्थन हासिल कर पार्टी ने 120 का आँकड़ा पा लिया।

पहले MV होंडियस पर ‘हंतावायरस’, अब कैरिबियन प्रिंसेस पर मिला ‘नोरोवायरस’: जानें- कैसे संक्रमण हब बन रहे लग्जरी क्रूज और क्यों Norovirus है सबसे बड़ा सिरदर्द

समंदर में तैरते लग्जरी क्रूज लंबे समय से लोगों के लिए शाही छुट्टियों का प्रतीक रहे हैं। आलीशान कमरे, फाइव स्टार होटल जैसी सुविधाएँ, दुनियाभर के व्यंजन, कसीनो, थिएटर और कई देशों की यात्रा का अनुभव इन्हें खास बनाता है। अब यही लग्जरी क्रूज जहाज एक नई चिंता की वजह बन रहे हैं। पिछले कुछ वर्षों में कई क्रूज जहाजों पर संक्रामक बीमारियों के मामले तेजी से बढ़े हैं जिसके चलते इन्हें संक्रमण फैलने के बड़े केंद्रों के रूप में देखा जाने लगा है।

कोविड-19 महामारी के दौरान डायमंड प्रिंसेस की भयावह तस्वीरों ने दुनिया को पहली बार दिखाया था कि अगर किसी वायरस ने जहाज में एंट्री कर ली, तो हजारों लोगों के बीच उसे रोकना कितना मुश्किल हो जाता है। अब एक बार फिर दुनिया की नजरें क्रूज शिप पर फैले नोरोवायरस और हंतावायरस के मामलों पर टिक गई हैं। कुछ दिनों पहले ‘MV होंडियस‘ नाम के एक आलीशान जहाज पर हंतावायरस के मामले सामने आए थे।

अब कैरिबियन प्रिंसेस जहाज पर 100 से ज्यादा यात्री और क्रू मेंबर नोरोवायरस से बीमार पड़ गए। उल्टी, दस्त और तेज पेट दर्द जैसी शिकायतों ने पूरे जहाज को प्रभावित कर दिया। इससे पहले भी कई क्रूज जहाजों पर इसी वायरस ने सैकड़ों लोगों को संक्रमित किया है।

सवाल यह है कि आखिर नोरोवायरस इतना खतरनाक क्यों माना जाता है? और क्यों दुनिया की सबसे महँगी और हाईटेक क्रूज इंडस्ट्री भी इसे पूरी तरह रोक नहीं पा रही?

क्या है नोरोवायरस और क्यों माना जाता है इतना खतरनाक?

नोरोवायरस एक बेहद संक्रामक वायरस है जो पेट और आंतों को संक्रमित करता है। इसे आम भाषा में ‘स्टमक फ्लू’ या ‘वॉमिटिंग वायरस’ भी कहा जाता है, हालाँकि यह फ्लू वायरस नहीं होता। यह वायरस इंसान के पाचन तंत्र पर हमला करता है और कुछ ही घंटों में व्यक्ति को गंभीर रूप से बीमार बना सकता है।

संक्रमित व्यक्ति को अचानक उल्टी, पानी जैसे दस्त, पेट में ऐंठन, मतली, बुखार, कमजोरी और शरीर में दर्द जैसी समस्याएँ शुरू हो जाती हैं। कई मामलों में शरीर में पानी की भारी कमी यानी डिहाइड्रेशन भी हो जाता है, जो बुजुर्गों, बच्चों और कमजोर इम्यूनिटी वाले लोगों के लिए जानलेवा साबित हो सकता है।

नोरोवायरस की सबसे बड़ी खतरनाक बात इसकी संक्रमण फैलाने की क्षमता है। मेडिकल एक्सपर्ट्स के मुताबिक किसी व्यक्ति को बीमार करने के लिए वायरस के बहुत कम कण ही काफी होते हैं। यानी अगर किसी संक्रमित व्यक्ति ने किसी सतह को छू लिया और दूसरे व्यक्ति ने वही सतह छूकर खाना खा लिया तो संक्रमण फैल सकता है।

वायरस का केंद्र कैसे बन रहे क्रूज शिप?

पब्लिक हेल्थ एक्सपर्ट्स क्रूज शिप को ‘सेमी-एनक्लोज्ड इकोसिस्टम’ कहते हैं। मतलब हजारों लोग लंबे समय तक एक सीमित जगह में एक साथ रहते हैं। आधुनिक मेगा क्रूज जहाजों पर 6 हजार से ज्यादा यात्री और करीब 2 हजार क्रू मेंबर मौजूद होते हैं। यह तैरते हुए छोटे शहर जैसा होता है लेकिन फर्क इतना है कि यहाँ सोशल डिस्टेंसिंग लगभग नामुमकिन होती है।

यात्री एक ही लिफ्ट, डाइनिंग हॉल, थिएटर, स्विमिंग पूल, कसीनो और रेलिंग का इस्तेमाल करते हैं। बार-बार छुई जाने वाली सतहें वायरस फैलाने का सबसे बड़ा जरिया बन जाती हैं। नोरोवायरस कई दिनों तक सतहों पर जिंदा रह सकता है। ऐसे में अगर एक भी संक्रमित व्यक्ति जहाज पर मौजूद हो, तो कुछ ही घंटों में वायरस सैकड़ों लोगों तक पहुँच सकता है।

क्रूज जहाजों का डाइनिंग सिस्टम भी संक्रमण फैलाने में बड़ी भूमिका निभाता है। बुफे सिस्टम में एक ही सर्विंग स्पून और ड्रिंक स्टेशन का इस्तेमाल सैकड़ों लोग करते हैं। अगर कोई संक्रमित व्यक्ति खाने के आसपास पहुँच जाए, तो वायरस तेजी से फैल सकता है। यही वजह है कि क्रूज शिप पर फैलने वाले ज्यादातर संक्रमण खाने और साझा सतहों से जुड़े होते हैं।

नोरोवायरस कैसे फैलता है और इसे रोकना इतना मुश्किल क्यों?

नोरोवायरस मुख्य रूप से संक्रमित भोजन, पानी, सतहों और व्यक्ति-से-व्यक्ति संपर्क के जरिए फैलता है। यह वायरस इतना जिद्दी होता है कि सामान्य सफाई से भी कई बार पूरी तरह खत्म नहीं होता। कई कीटाणुनाशक उत्पाद भी इस पर उतना असर नहीं दिखाते जितना दूसरे वायरस पर दिखता है।

सबसे बड़ी चुनौती यह है कि संक्रमित व्यक्ति लक्षण दिखने से पहले ही वायरस फैलाना शुरू कर देता है। यानी कोई यात्री खुद को पूरी तरह स्वस्थ महसूस करते हुए जहाज पर चढ़ सकता है और अगले 24 घंटे में सैकड़ों लोगों के संपर्क में आ सकता है। यही वजह है कि बोर्डिंग के समय की हेल्थ स्क्रीनिंग अक्सर बेअसर साबित होती है।

क्रू मेंबर्स का रोल भी बेहद अहम होता है। जहाज के कर्मचारी छोटे और भीड़भाड़ वाले कमरों में रहते हैं और दिनभर यात्रियों के संपर्क में रहते हैं। कोई कर्मचारी बीमार होने के बावजूद काम करता रहे, तो वह सुपर-स्प्रेडर बन सकता है। कई बार नौकरी खोने या आइसोलेशन के डर से कर्मचारी तुरंत बीमारी रिपोर्ट नहीं करते, जिससे संक्रमण और तेजी से फैलता है।

क्रूज इंडस्ट्री के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द क्यों बन चुका है नोरोवायरस?

अमेरिकी स्वास्थ्य एजेंसी CDC के मुताबिक, हर साल हजारों लोग क्रूज जहाजों पर नोरोवायरस से संक्रमित होते हैं। पिछले साल 18 अलग-अलग क्रूज आउटब्रेक में 2200 से ज्यादा लोग बीमार पड़े थे। इस साल भी कई बड़े जहाज इसकी चपेट में आ चुके हैं। हाल ही में कैरिबियन प्रिंसेस जहाज पर 102 यात्री और 13 क्रू मेंबर संक्रमित पाए गए।

इससे पहले स्टार प्रिंसेस जहाज पर भी करीब 200 लोग बीमार पड़े थे। हर बार कंपनियाँ जहाज को सैनिटाइज करने और सफाई बढ़ाने का दावा करती हैं, लेकिन इसके बावजूद वायरस लौट आता है। इसके पीछे एक बड़ा कारण ‘टर्नओवर टाइम’ है। एक क्रूज खत्म होने और दूसरे के शुरू होने के बीच सिर्फ कुछ घंटों का अंतर होता है।

इतने कम समय में हजारों यात्रियों को उतारना, पूरे जहाज की डीप क्लीनिंग करना मुश्किल है। कहीं थोड़ी भी लापरवाही रह जाए, तो वायरस अगले सफर में फिर सक्रिय हो सकता है।

कोविड-19 के बाद क्या बदला और फिर भी खतरा क्यों बना हुआ है?

कोविड महामारी ने क्रूज इंडस्ट्री को पूरी तरह हिला दिया था। डायमंड प्रिंसेस जहाज पर 700 से ज्यादा लोगों का संक्रमित होना दुनिया के लिए चेतावनी बन गया। इसके बाद एयर फिल्ट्रेशन सिस्टम, मेडिकल प्रोटोकॉल और सैनिटाइजेशन प्रक्रियाओं में बड़े बदलाव किए गए।

अब कई जहाजों में HEPA फिल्टर लगाए गए हैं, मेडिकल टीम को मजबूत किया गया है और सफाई के नियम सख्त किए गए हैं। CDC का वेसल सेनिटेशन प्रोग्राम (Vessel Sanitation Program) जहाजों का नियमित निरीक्षण भी करता है। लेकिन इसके बावजूद वायरस का खतरा पूरी तरह खत्म नहीं हुआ।

एक कारण यह भी है कि जहाज की मूल बनावट को बदलना आसान नहीं है। हजारों लोगों के लिए बने बंद गलियारे, साझा वेंटिलेशन और कॉमन एरिया अब भी संक्रमण फैलाने के लिए अनुकूल माहौल तैयार करते हैं। यही वजह है कि हेल्थ एक्सपर्ट्स मानते हैं कि क्रूज शिप पर संक्रमण का खतरा पूरी तरह खत्म करना लगभग असंभव है।

यात्रियों को क्या सावधानी बरतनी चाहिए?

एक्सपर्ट्स मानते हैं कि अब यात्रियों को सिर्फ क्रूज कंपनियों के भरोसे नहीं रहना चाहिए। खुद की सावधानी सबसे बड़ा बचाव है। सफर के दौरान बार-बार हाथ धोना, सैनिटाइजर का इस्तेमाल करना और बिना हाथ साफ किए खाना खाने से बचना बेहद जरूरी है। जहाज पर किसी व्यक्ति में इसके लक्षण दिखाई दें, तो तुरंत मेडिकल टीम को जानकारी देनी चाहिए।

बुफे सिस्टम में इस्तेमाल होने वाले साझा बर्तनों को छूने के बाद हाथ साफ करना भी जरूरी है। कमजोर इम्यूनिटी वाले लोगों, बुजुर्गों और छोटे बच्चों को क्रूज यात्रा से पहले डॉक्टर की सलाह जरूर लेनी चाहिए। अंटार्कटिका जैसे दूरदराज इलाकों की यात्रा करने वालों के लिए खतरा और भी ज्यादा होता है, क्योंकि वहाँ आसपास बड़े अस्पताल मौजूद नहीं होते।

क्या भविष्य में और बढ़ेगा खतरा?

क्रूज टूरिज्म तेजी से बढ़ रहा है। खासकर अंटार्कटिका और दूरदराज के इलाकों की यात्राओं का ट्रेंड पिछले कुछ सालों में काफी बढ़ा है। लाखों लोग हर साल इन जहाजों पर सफर कर रहे हैं। लेकिन जितनी तेजी से यह इंडस्ट्री बढ़ रही है, उतनी ही तेजी से संक्रमण का खतरा भी बढ़ता जा रहा है।

हेल्थ एक्सपर्ट्स का मानना है कि भविष्य में सिर्फ नोरोवायरस ही नहीं बल्कि खसरा, लीजियोनेयर्स रोग, ई कोलाई और दूसरे संक्रामक रोग भी क्रूज इंडस्ट्री के लिए बड़ी चुनौती बन सकते हैं। ऐसे में कंपनियों को सिर्फ लग्जरी और मनोरंजन पर नहीं, बल्कि हेल्थ सिक्योरिटी और मेडिकल इंफ्रास्ट्रक्चर पर भी भारी निवेश करना होगा।

कभी पिता पर किया केस तो अब एक्ट्रेस के लिए तलाक: चाइल्ड एक्टर से सुपरस्टार और अब तमिलनाडु के CM बने जोसेफ विजय, जानें उनके बारे में सबकुछ

तमिलनाडु में फिल्मी दुनिया के सुपरस्टार और अब नेता बने सी जोसेफ विजय ने रविवार (10 मई 2026) को तमिलनाडु के नए मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ग्रहण कर ली। चेन्नई के जवाहरलाल नेहरू इंडोर स्टेडियम में हुए समारोह में राज्यपाल ने उन्हें पद और गोपनीयता की शपथ दिलाई।

उनकी पार्टी तमिलगा वेत्री कझगम (TVK) ने इस चुनाव में शानदार प्रदर्शन करते हुए राज्य की राजनीति में नई ताकत के रूप में अपनी जगह बनाई है। हालाँकि विजय की यह राजनीतिक जीत जितनी बड़ी मानी जा रही है।

उतनी ही उनकी जिंदगी विवादों से भी घिरी रही है। फिल्मी करियर से लेकर परिवार, राजनीति और निजी जीवन तक, कई बार उनका नाम सुर्खियों और विवादों में रहा है।

फिल्मी दुनिया से राजनीति तक का सफर

विजय ने अपने करियर की शुरुआत तमिल सिनेमा से की थी और धीरे-धीरे वे एक बड़े सुपरस्टार बन गए। उनकी फिल्मों ने उन्हें भारी लोकप्रियता दी और उनके लाखों फैंस बन गए।

इसी फैन फॉलोइंग को उन्होंने बाद में सामाजिक संगठन और राजनीतिक आधार में बदल दिया। 2009 में उन्होंने अपने फैन क्लब को मक्कल इयक्कम नाम देकर सामाजिक कार्यों से जोड़ दिया। बाद में 2024 में उन्होंने अपनी राजनीतिक पार्टी तमिलगा वेत्री कझगम (TVK) बनाई।

पार्टी ने तेजी से लोकप्रियता हासिल की और 2026 के विधानसभा चुनाव में मजबूत प्रदर्शन करते हुए सरकार बनाने की स्थिति में पहुँच गई। विजय ने दो सीटों से चुनाव लड़कर जीत हासिल की और राज्य की राजनीति में एक नया अध्याय जोड़ दिया।

पिता के साथ विवाद और कानूनी लड़ाई

विजय की जिंदगी का सबसे चर्चित विवाद उनके पिता एस ए चंद्रशेखर के साथ रहा है, जो खुद एक फिल्म निर्देशक हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार, 2020 के आसपास उनके पिता ने विजय की अनुमति के बिना उनके नाम से एक राजनीतिक पार्टी रजिस्टर कराने की कोशिश की थी।

इस कदम का विजय ने खुलकर विरोध किया और यहाँ तक कि अपने माता-पिता के खिलाफ अदालत में केस भी दर्ज कराया, ताकि उनके नाम और छवि का राजनीतिक इस्तेमाल रोका जा सके।

इस घटना के बाद परिवार में काफी तनाव आ गया था और लंबे समय तक दोनों के बीच दूरी बनी रही। हालाँकि बाद में कुछ अवसरों पर परिवार को साथ देखा गया, जिससे रिश्तों में हल्की नरमी की उम्मीद जताई गई।

इनकम टैक्स और फिल्मी करियर से जुड़े विवाद

विजय के फिल्मी करियर के दौरान भी कई विवाद सामने आए। खासकर 2015 से 2020 के बीच इनकम टैक्स विभाग ने उनके घर और दफ्तरों पर छापेमारी की थी। आरोप था कि उनकी फिल्मों पुली और बिगिल से जुड़ी कमाई में टैक्स अनियमितताएँ हुई हैं।

बाद में इस मामले में लगभग 15 करोड़ रुपए की आय छिपाने का मामला सामने आया और उन पर 1.5 करोड़ रुपए का जुर्माना भी लगाया गया, जिसे कोर्ट ने सही ठहराया। हालाँकि विजय की टीम ने हमेशा यह दावा किया कि उन्होंने सभी टैक्स नियमों का पालन किया है और कानूनी प्रक्रिया के तहत ही मामला आगे बढ़ाया गया है।

चुनावी राजनीति और फिल्म विवाद

राजनीति में आने के बाद भी विजय के लिए रास्ता आसान नहीं रहा। उनकी फिल्म जन नायकन को लेकर भी कई विवाद सामने आए। फिल्म को सेंसर बोर्ड से मंजूरी मिलने में देरी हुई और इसके कुछ हिस्से लीक होने की भी खबरें आईं। इससे फिल्म के निर्माताओं को भारी नुकसान का सामना करना पड़ा।

इसके अलावा फिल्म से जुड़े कानूनी और वित्तीय विवादों ने भी चर्चा बटोरी, जिससे उनकी राजनीतिक छवि पर भी असर पड़ने की बात कही गई।

करूर भगदड़ और सुरक्षा सवाल

विजय की एक राजनीतिक रैली के दौरान करूर में हुए भगदड़ हादसे ने भी बड़ा विवाद खड़ा किया। इस घटना में कई लोगों की जान जाने की खबर सामने आई थी।

इसके बाद सुरक्षा व्यवस्था और भीड़ प्रबंधन को लेकर गंभीर सवाल उठे। इस मामले में जाँच एजेंसियों ने भी पूछताछ की और राजनीतिक स्तर पर भी आलोचना हुई। विजय ने इसे एक दुर्भाग्यपूर्ण घटना बताया और कहा कि यह एक साजिश के तहत फैलाया गया आरोप भी हो सकता है, हालाँकि जाँच जारी रही।

निजी जीवन और तलाक की खबरें

तमिलनाडु के नए मुख्यमंत्री और अभिनेता विजय की पत्नी के संग विवाद भी सामने आया था। करीब 27 साल पुराने वैवाहिक रिश्ते में आई दरार ने 27 फरवरी 2026 को विजय की पत्नी संगीता सोरनालिंगम ने चेंगलपट्टू फैमिली कोर्ट में तलाक की याचिका दायर की।

यह याचिका स्पेशल मैरिज एक्ट, 1954 की धारा 27(1)(a) और 27(1)(d) के तहत दाखिल की गई। कोर्ट ने विजय को 20 अप्रैल 2026 को व्यक्तिगत रूप से पेश होने का नोटिस जारी किया है।

विजय और संगीता की शादी 25 अगस्त 1999 को हिंदू और ईसाई दोनों रीति-रिवाजों से हुई थी। लंबे समय तक दोनों को तमिल फिल्म इंडस्ट्री के चर्चित और मजबूत कपल्स में गिना जाता रहा, लेकिन अब रिश्तों में आई खटास खुलकर सामने आ चुकी है।

तलाक याचिका में संगीता ने आरोप लगाया है कि साल 2021 में उन्हें विजय के एक अभिनेत्री के साथ कथित एक्सट्रामैरिटल रिश्ते की जानकारी मिली थी। उनका दावा है कि उस समय रिश्ते को खत्म करने का आश्वासन दिया गया था, लेकिन बाद में भी यह संबंध जारी रहा। अर्जी में यह भी कहा गया है कि दोनों पिछले दो वर्षों से अलग रह रहे हैं, हालाँकि इसकी सार्वजनिक घोषणा नहीं की गई थी।

इसी बीच विजय का नाम अभिनेत्री त्रिशा कृष्णन के साथ भी जोड़ा जाता रहा है। दोनों ने कई सुपरहिट फिल्मों में साथ काम किया है और उनकी ऑन-स्क्रीन केमिस्ट्री हमेशा चर्चा में रही है।

विजय और त्रिशा को कई मौकों पर साथ देखे जाने के बाद अफवाहों ने और जोर पकड़ लिया। हालाँकि अब तक न तो विजय, न संगीता और न ही त्रिशा ने इन चर्चाओं पर कोई स्पष्ट बयान दिया है।

एक मिसाइल और दुश्मन के कई ठिकाने तबाह, भारत ने MIRV तकनीक वाली एडवांस ‘अग्नि’ का किया परीक्षण: जानें कैसे काम करता है यह अचूक ‘ब्रह्मास्त्र’

सोचिए, आसमान से एक बिजली कड़कती है और वह जमीन पर गिरने से पहले कई हिस्सों में बँटकर दुश्मन के अलग-अलग ठिकानों को एक साथ राख कर देती है। सुनने में यह किसी पौराणिक कथा के अस्त्र जैसा लगता है, लेकिन भारत के वैज्ञानिकों ने इसे हकीकत बना दिया है।

8 मई 2026 की शाम, जब ओडिशा के तट पर सूरज ढल रहा था, तभी डॉ एपीजे अब्दुल कलाम द्वीप से एक ऐसी मिसाइल निकली जिसने न सिर्फ आसमान को जगमगा दिया, बल्कि भारत के दुश्मनों की नींद भी उड़ा दी। यह कोई साधारण मिसाइल नहीं थी, यह ‘अग्नि’ परिवार की वह एडवांस मिसाइल थी जो अब एक साथ कई शिकार करने में सक्षम है।

क्या है यह नई शक्ति और कैसे करती है काम?

साधारण मिसाइलें एक बार में एक ही लक्ष्य (Target) पर वार करती हैं। लेकिन इस नई एडवांस अग्नि मिसाइल की खासियत इसकी MIRV (मल्टीपल इंडिपेंडेंटली टार्गेटेबल री-एंट्री व्हीकल) तकनीक है। आसान भाषा में समझें तो यह एक ‘बस’ की तरह है।

जैसे एक बस में कई यात्री बैठते हैं और बस अपनी यात्रा के दौरान अलग-अलग स्टॉप पर यात्रियों को उतारती जाती है, वैसे ही यह मिसाइल अपने साथ कई परमाणु हथियार (वॉरहेड्स) लेकर उड़ती है। अंतरिक्ष में पहुँचने के बाद यह मिसाइल अलग-अलग दिशाओं में अपने इन हथियारों को छोड़ देती है। नतीजा यह होता है कि एक ही मिसाइल से दुश्मन के पाँच-छह अलग-अलग शहर या सैन्य ठिकाने एक साथ तबाह किए जा सकते हैं।

DRDO का ‘मेक इन इंडिया’ चमत्कार

इस महाशक्तिशाली मिसाइल को हमारे वैज्ञानिकों की संस्था DRDO (रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन) ने तैयार किया है। सबसे गर्व की बात यह है कि इसे बनाने में देश की प्राइवेट इंडस्ट्रीज ने भी पूरा सहयोग दिया है।

परीक्षण के दौरान मिसाइल ने बंगाल की खाड़ी से उड़ान भरी और हिंद महासागर में हजारों किलोमीटर दूर रखे गए अलग-अलग लक्ष्यों को बिल्कुल सटीक तरीके से भेदा। जमीन पर लगे रडार और समुद्र में तैनात युद्धपोतों ने इसकी हर हरकत पर नजर रखी और पाया कि मिसाइल ने हर कसौटी पर खुद को सौ फीसदी सही साबित किया है।

दुश्मन के लिए इसे रोकना क्यों है नामुमकिन?

आजकल दुनिया के कई देशों के पास ऐसी तकनीक है जो आने वाली मिसाइल को हवा में ही मार गिराती है। लेकिन भारत की इस MIRV तकनीक ने उस सुरक्षा घेरे को बेकार कर दिया है। जब एक मिसाइल से दस अलग-अलग हथियार अलग-अलग गति और दिशा में निकलेंगे, तो दुश्मन का डिफेंस सिस्टम भ्रमित (Confuse) हो जाएगा।

वह एक को रोकेगा तब तक बाकी नौ अपना काम कर चुके होंगे। यही कारण है कि इस परीक्षण के बाद चीन और पाकिस्तान जैसे देशों में हलचल मच गई है, क्योंकि अब भारत की पहुँच और मारक क्षमता कई गुना बढ़ गई है।

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने थपथपाई वैज्ञानिकों की पीठ

इस ऐतिहासिक सफलता के बाद देश के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने खुद सोशल मीडिया और आधिकारिक बयान के जरिए वैज्ञानिकों को बधाई दी। उन्होंने कहा, “यह परीक्षण भारत की रक्षा तैयारियों को एक अविश्वसनीय मजबूती देता है। बदलती सुरक्षा चुनौतियों और बढ़ते खतरों के बीच, हमारे वैज्ञानिकों, भारतीय सेना और इंडस्ट्री ने मिलकर देश का सिर फख्र से ऊँचा कर दिया है।”

ओडिशा से बांग्लादेश तक दिखा अद्भुत नजारा

जब यह मिसाइल शाम के वक्त छोड़ी गई, तो आसमान में एक नारंगी और सफेद रंग की लंबी पूंछ जैसा नजारा दिखा। यह इतना चमकदार था कि इसे सिर्फ ओडिशा में ही नहीं, बल्कि पड़ोसी देश बांग्लादेश के कॉक्स बाजार तक देखा गया। लोगों को लगा कि कोई पुच्छल तारा या उड़नतश्तरी (UFO) जा रही है, लेकिन असल में वह भारत की सुरक्षा की नई गारंटी ‘अग्नि’ थी।

दुनिया के चुनिंदा देशों के क्लब में भारत

इस सफल परीक्षण के साथ ही भारत अब दुनिया के उन गिने-चुने देशों (जैसे अमेरिका, रूस, चीन, फ्रांस और ब्रिटेन) की कतार में मजबूती से खड़ा हो गया है जिनके पास एक मिसाइल से कई निशाने साधने की तकनीक है। यह मिसाइल शांति का प्रतीक है क्योंकि यह बताती है कि भारत की तरफ आँख उठाने वाले का अंजाम क्या होगा। यह वैज्ञानिकों की तपस्या और ‘आत्मनिर्भर भारत’ के संकल्प की जीत है।

जिस कॉन्ग्रेस के खिलाफ भ्रष्टाचार विरोधी मंच पर दिखे विजय, आज उसी ‘हाथ’ के साथ सरकार बनाने की तैयारी: अन्ना आंदोलन के समय का वीडियो हो रहा वायरल

तमिलनाडु की राजनीति में अभिनेता से नेता बने विजय जोसेफ और उनकी पार्टी तमिलगा वेट्री कझगम (TVK) सबसे ज्यादा चर्चा में हैं। विधानसभा चुनाव में शानदार प्रदर्शन करते हुए 108 सीटें जीतने के बाद विजय राज्य की सत्ता के सबसे बड़े दावेदार बनकर उभरे हैं। लेकिन इसी बीच सोशल मीडिया पर विजय का एक पुराना वीडियो कई सवाल खड़े कर रहा है।

विजय का एक पुराना वीडियो वायरल हो रहा है, जिसमें वह कॉन्ग्रेस के खिलाफ अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन का समर्थन करते दिखाई दे रहे हैं। इससे पहले कॉन्ग्रेस की राष्ट्रीय प्रवक्ता डॉ रागिनी नायक ने विजय के साथ अपनी पुरानी तस्वीर साझा कर कॉन्ग्रेस और विजय के रिश्तों को पुराना बताने की कोशिश की थी।

विजय का 15 साल पुराना वीडियो आया सामने

दरअसल विजय का लगभग 15 साल पुराना वीडियो सोशल मीडिया पर अचानक वायरल हुआ। यह वीडियो साल 2011 के अन्ना हजारे आंदोलन के दौरान का बताया जा रहा है, जब देश में तत्कालीन UPA सरकार और कॉन्ग्रेस के खिलाफ भ्रष्टाचार के मुद्दे पर माहौल बना हुआ था। वीडियो में विजय दिल्ली के रामलीला मैदान में अन्ना आंदोलन के मंच पर दिखाई देते हैं।

मंच पर कुमार विश्वास उन्हें अन्ना हजारे से मिलवाते हैं और बाद में विजय अपने संबोधन में अन्ना हजारे की तारीफ करते हुए कहते हैं, “बिना किसी राजनीतिक पृष्ठभूमि के और केवल अपनी कोशिशों से उन्होंने (अन्ना हजारे ने) पूरे देश में समर्थन की लहर जगा दी है और शासन से भ्रष्टाचार को खत्म करने का बीड़ा उठाया है।”

यही वीडियो अब राजनीतिक बहस का केंद्र बन गया है। सोशल मीडिया पर लोग सवाल उठा रहे हैं कि जो विजय कभी कॉन्ग्रेस सरकार के खिलाफ चल रहे भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के समर्थन में खड़े दिखाई दे रहे थे, आज वही कॉन्ग्रेस उनकी बैसाखी यानी सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत बन गई है।

सत्ता की राजनीति में बदले समीकरण, कॉन्ग्रेस पर भी उठे सवाल

तमिलनाडु चुनाव परिणाम आने के बाद से कॉन्ग्रेस और TVK की नजदीकियाँ लगातार चर्चा में हैं। विजय की पार्टी 108 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है और उसने कॉन्ग्रेस समेत 112 विधायकों के समर्थन का दावा किया है। हालाँकि अब तक राज्यपाल की ओर से सरकार बनाने का न्योता नहीं मिलने पर TVK कार्यकर्ताओं ने विरोध प्रदर्शन भी किया।

इसी बीच कॉन्ग्रेस के समर्थन को लेकर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तेज हो गए हैं। आलोचकों का कहना है कि कॉन्ग्रेस ने सत्ता के समीकरण साधने के लिए अपने पुराने सहयोगी DMK को पीछे छोड़ दिया और अब विजय के सहारे सत्ता में हिस्सेदारी तलाश रही है।

वहीं दूसरी तरफ विजय को लेकर भी सवाल खड़े किए जा रहे हैं कि क्या उनकी राजनीति भी अब उसी पारंपरिक सत्ता व्यवस्था का हिस्सा बनती जा रही है, जिसके खिलाफ कभी उन्होंने सार्वजनिक रूप से समर्थन जताया था।

वायरल वीडियो और तस्वीरों को जोड़कर कई यूजर्स यह तर्क दे रहे हैं कि विजय की राजनीति में अब वही दल और वही चेहरे शामिल हो रहे हैं, जिनके खिलाफ कभी अन्ना आंदोलन के दौरान भ्रष्टाचार विरोधी माहौल बनाया गया था। ऐसे में विपक्षी खेमे और सोशल मीडिया पर यह चर्चा तेज हो गई है कि क्या सत्ता तक पहुँचने की राजनीति ने विजय की पुरानी छवि और उनके सार्वजनिक स्टैंड को बदल दिया है।

फिलहाल तमिलनाडु की राजनीति में विजय का तेजी से बढ़ता प्रभाव और कॉन्ग्रेस के साथ उनकी नजदीकियाँ दोनों ही राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बने हुए हैं। वहीं वायरल वीडियो ने इस राजनीतिक बहस को और भी तेज कर दिया है।

खावड़ा से धोलेरा तक: रिन्यूएबल एनर्जी में अग्रणी गुजरात, कैसे तैयार कर रहा है भारत का ग्रीन एनर्जी कॉरिडोर

भारत की अर्थव्यवस्था, उद्योग और ऊर्जा सुरक्षा को लेकर पिछले एक दशक में जिन बदलावों की सबसे ज्यादा चर्चा हुई है, उनमें रिन्यूएबल एनर्जी अब एक केंद्रीय विषय बन चुकी है। दुनिया भर में तेल और गैस पर आधारित अर्थव्यवस्थाएँ अब धीरे-धीरे स्वच्छ ऊर्जा (Clean Energy) की ओर बढ़ रही हैं। जलवायु परिवर्तन, कार्बन उत्सर्जन, भू-राजनीतिक तनाव और ऊर्जा आयात पर बढ़ती निर्भरता ने लगभग हर बड़े देश को इस बात पर सोचने के लिए मजबूर कर दिया है कि भविष्य की अर्थव्यवस्था आखिर किस ऊर्जा पर टिकेगी। भारत भी इसी बदलाव के दौर से गुजर रहा है। इस राष्ट्रीय परिवर्तन के भीतर अगर किसी एक राज्य ने खुद को सबसे आक्रामक और सबसे रणनीतिक तरीके से स्थापित किया है, तो वह गुजरात है।

आज गुजरात देश में रिन्यूएबल एनर्जी क्षमता के मामले में पहले स्थान पर पहुँच चुका है। राज्य की कुल रिन्यूएबल एनर्जी क्षमता करीब 47,178 मेगावाट तक पहुँच गई है। इसमें लगभग 29,303 मेगावाट सोलर एनर्जी, 15,642 मेगावाट विंड एनर्जी, 2103 मेगावाट हाइड्रो एनर्जी और 130 मेगावाट बायो एनर्जी शामिल है। इतना ही नहीं, रूफटॉप सोलर क्षमता में भी गुजरात देश में नंबर एक बन चुका है और राज्य में 6,881 मेगावाट से अधिक रूफटॉप सोलर क्षमता स्थापित की जा चुकी है।

ये केवल आँकड़े नहीं हैं। इनके पीछे एक लंबी नीति, भूगोल, मजबूत औद्योगिक ढाँचा, बंदरगाहों का नेटवर्क, बड़े निवेश, आधुनिक ट्रांसमिशन इंफ्रास्ट्रक्चर और भविष्य की अर्थव्यवस्था को ध्यान में रखकर की गई व्यापक तैयारी छिपी हुई है।

गुजरात का यह मॉडल केवल बिजली उत्पादन तक सीमित नहीं है। राज्य वास्तव में एक ऐसे ग्रीन एनर्जी इकोसिस्टम की ओर बढ़ रहा है, जिसमें बिजली उत्पादन से लेकर उद्योग, निर्यात, ग्रीन हाइड्रोजन, बैटरी, सेमीकंडक्टर और भविष्य के मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर तक सब कुछ एक-दूसरे से जुड़ा हुआ हो। यही वजह है कि ‘खावड़ा से धोलेरा तक’ की लाइन अब सिर्फ एक भौगोलिक संदर्भ नहीं रह गई है बल्कि यह भारत के उभरते हुए ग्रीन एनर्जी कॉरिडोर की वास्तविक तस्वीर बन चुकी है।

जब गुजरात ने ऊर्जा को भविष्य की अर्थव्यवस्था की तरह देखना शुरू किया

भारत में लंबे समय तक ऊर्जा नीति का मतलब मुख्य रूप से कोयला, थर्मल प्लांट और पारंपरिक बिजली उत्पादन ही रहा। रिन्यूएबल एनर्जी को कई वर्षों तक केवल एक पूरक स्रोत के रूप में देखा जाता था। लेकिन गुजरात उन शुरुआती राज्यों में शामिल रहा, जिसने सोलर और विंड एनर्जी को सिर्फ पर्यावरणीय मुद्दा नहीं बल्कि एक बड़े आर्थिक अवसर के रूप में देखना शुरू किया। यही सोच आगे चलकर राज्य को देश के सबसे बड़े रिन्यूएबल एनर्जी हब में बदलने की वजह बनी।

गुजरात के पास कई ऐसे प्राकृतिक और औद्योगिक फायदे पहले से मौजूद थे जिन्हें बाद में ग्रीन एनर्जी मॉडल में बदला गया। राज्य के पास लंबी समुद्री तटरेखा है, कच्छ और सौराष्ट्र जैसे विशाल खुले क्षेत्र हैं, तेज हवाएँ हैं, उच्च सोलर रेडिएशन वाला भूभाग है और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यहाँ पहले से मजबूत औद्योगिक आधार मौजूद था। जहाँ देश के कई हिस्सों में रिन्यूएबल एनर्जी केवल बिजली उत्पादन तक सीमित रही तो वहीं गुजरात ने इसे उद्योगों, निर्यात और भविष्य की मैन्युफैक्चरिंग से जोड़कर देखना शुरू किया।

यही कारण है कि आज गुजरात में रिन्यूएबल एनर्जी सिर्फ खेतों के बीच लगे कुछ सोलर पैनलों तक सीमित नहीं है। यहाँ विशाल सोलर पार्क, विंड कॉरिडोर, हाइब्रिड एनर्जी प्रोजेक्ट्स, ग्रीन हाइड्रोजन योजनाएँ, आधुनिक ट्रांसमिशन नेटवर्क और इंडस्ट्रियल स्मार्ट सिटीज एक-दूसरे से जुड़ी हुई दिखाई देती हैं। यही व्यापक तस्वीर गुजरात को बाकी राज्यों से अलग पहचान देती है।

खावड़ा: जहाँ रेगिस्तान के बीच तैयार हो रहा है भारत का सबसे बड़ा ग्रीन पावर हब

अगर गुजरात के ग्रीन एनर्जी मॉडल का सबसे बड़ा प्रतीक खोजा जाए तो वह कच्छ का खावड़ा क्षेत्र है। पाकिस्तान सीमा के पास स्थित यह इलाका कभी मुख्य रूप से बंजर जमीन, रेगिस्तानी क्षेत्र और सीमावर्ती भूभाग के रूप में जाना जाता था। लेकिन आज यही क्षेत्र दुनिया के सबसे बड़े रिन्यूएबल एनर्जी प्रोजेक्ट्स में से एक के रूप में उभर रहा है।

खावड़ा में विकसित किया जा रहा हाइब्रिड रिन्यूएबल एनर्जी पार्क केवल एक सामान्य सोलर प्रोजेक्ट नहीं है। यह सोलर और विंड एनर्जी दोनों को जोड़कर तैयार किया जा रहा विशाल ऊर्जा केंद्र है। इस क्षेत्र की सबसे बड़ी ताकत इसका भूगोल है। यहाँ विशाल खाली जमीन उपलब्ध है, साल के अधिकांश समय तेज धूप रहती है और मजबूत हवा का प्रवाह भी मौजूद हैं।

यह परियोजना अभी पूरी तरह शुरू नहीं हुई है लेकिन इसके बड़े हिस्से ऑपरेशनल हो चुके हैं और हजारों मेगावाट क्षमता पहले ही बिजली उत्पादन शुरू कर चुकी है। आने वाले वर्षों में इसकी क्षमता को और बढ़ाया जाना है। कई रिपोर्ट्स में इसे दुनिया के सबसे बड़े रिन्यूएबल एनर्जी पार्क्स में शामिल बताया जा रहा है।

खावड़ा का महत्व केवल उसके आकार में नहीं है। इसका असली महत्व इस बात में है कि यह भारत की भविष्य की ऊर्जा रणनीति का परीक्षण क्षेत्र बनता जा रहा है। यहाँ सिर्फ बिजली उत्पादन नहीं हो रहा बल्कि बड़े पैमाने पर ट्रांसमिशन इंफ्रास्ट्रक्चर भी तैयार किया जा रहा है ताकि यह ऊर्जा देश के दूसरे हिस्सों और औद्योगिक क्लस्टर्स तक पहुँच सके। यहीं से ग्रीन एनर्जी कॉरिडोर की वास्तविक तस्वीर सामने आती है। क्योंकि गुजरात केवल उत्पादन नहीं कर रहा बल्कि उत्पादन से लेकर उपभोग तक की पूरी सीरीज तैयार कर रहा है।

खावड़ा से धोलेरा तक: बिजली उत्पादन से भविष्य की औद्योगिक व्यवस्था तक

गुजरात की रणनीति को समझने के लिए खावड़ा और धोलेरा को एक साथ देखना जरूरी है। अगर खावड़ा ऊर्जा उत्पादन का केंद्र बन रहा है, तो धोलेरा उस ऊर्जा पर आधारित भविष्य की औद्योगिक अर्थव्यवस्था का प्रतीक बनता दिखाई देता है। धोलेरा स्पेशल इन्वेस्टमेंट रीजन, जिसे भारत का सबसे महत्वाकांक्षी स्मार्ट इंडस्ट्रियल सिटी प्रोजेक्ट माना जाता है, केवल रियल एस्टेट या शहरीकरण की परियोजना नहीं है। इसे भविष्य की औद्योगिक व्यवस्था को ध्यान में रखकर विकसित किया जा रहा है। यहाँ सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग, इलेक्ट्रिक व्हीकल इकोसिस्टम, बैटरी स्टोरेज, ग्रीन हाइड्रोजन और एडवांस्ड मैन्युफैक्चरिंग जैसे क्षेत्रों पर विशेष जोर दिया जा रहा है।

यहीं पर गुजरात का मॉडल सामान्य रिन्यूएबल एनर्जी मॉडल से अलग नजर आता है। राज्य केवल बिजली उत्पादन नहीं करना चाहता बल्कि वह बिजली के इर्द-गिर्द भविष्य की औद्योगिक अर्थव्यवस्था भी खड़ी करना चाहता है। इसका मतलब यह है कि कच्छ के खावड़ा जैसे क्षेत्रों में पैदा होने वाली रिन्यूएबल एनर्जी आगे चलकर धोलेरा जैसे इंडस्ट्रियल हब्स को ऊर्जा उपलब्ध करा सकेगी। यानी एक तरफ विशाल सोलर और विंड प्रोजेक्ट्स होंगे, तो दूसरी तरफ उन्हीं के आधार पर सेमीकंडक्टर यूनिट्स, ग्रीन हाइड्रोजन प्लांट्स, बैटरी इकोसिस्टम और निर्यात-उन्मुख मैन्युफैक्चरिंग विकसित की जाएगी। यह केवल ऊर्जा परिवर्तन नहीं बल्कि एक बड़े औद्योगिक परिवर्तन की भी शुरुआत है।

सरकार की भूमिका

गुजरात का रिन्यूएबल एनर्जी मॉडल केवल प्राकृतिक संसाधनों की वजह से सफल नहीं हुआ है। इसके पीछे लंबे समय से चल रही नीतिगत तैयारी भी शामिल है। राज्य सरकार ने कई स्तरों पर काम किया, जिसने रिन्यूएबल एनर्जी प्रोजेक्ट्स के लिए अनुकूल माहौल तैयार किया। सबसे पहले बड़े पैमाने पर जमीन उपलब्ध कराई गई। रिन्यूएबल एनर्जी परियोजनाओं के सामने सबसे बड़ी चुनौती भूमि अधिग्रहण की होती है लेकिन कच्छ जैसे क्षेत्रों में विशाल भूमि उपलब्ध होने के कारण बड़े सोलर और विंड प्रोजेक्ट्स संभव हो सके। इसके साथ ही ट्रांसमिशन इंफ्रास्ट्रक्चर में भी निवेश किया गया ताकि उत्पादित बिजली को आसानी से ग्रिड से जोड़ा जा सके।

गुजरात ने हाइब्रिड रिन्यूएबल प्रोजेक्ट्स पर भी विशेष जोर दिया। इसका मतलब यह है कि सोलर और विंड दोनों को एक साथ विकसित किया जाए ताकि ऊर्जा उत्पादन अधिक स्थिर और प्रभावी बन सके। इसके साथ राज्य ने निजी निवेश को भी बड़े स्तर पर आकर्षित किया। यही वजह है कि अडानी ग्रुप, टाटा ग्रुप और रिलायंस इंडस्ट्री जैसी बड़ी कंपनियाँ गुजरात में ग्रीन एनर्जी सेक्टर में भारी निवेश कर रही हैं।

रूफटॉप सोलर के मामले में भी गुजरात का मॉडल अलग दिखाई देता है। राज्य में रूफटॉप सोलर को बड़े पैमाने पर अपनाया गया है। इसकी एक बड़ी वजह नीति समर्थन और अपेक्षाकृत तेज अमल को भी माना जाता है। इसके अलावा गुजरात के बंदरगाहों और इंडस्ट्रियल कॉरिडोर्स ने भी रिन्यूएबल एनर्जी मॉडल को मजबूती दी है। बंदरगाहों की उपलब्धता का अर्थ यह है कि भविष्य में ग्रीन हाइड्रोजन, अमोनिया और अन्य ऊर्जा उत्पादों के निर्यात की संभावनाएँ भी लगातार बढ़ेंगी। यही कारण है कि गुजरात को केवल बिजली उत्पादन के केंद्र के रूप में नहीं बल्कि संभावित ग्रीन एक्सपोर्ट हब के तौर पर भी देखा जा रहा है।

रिन्यूएबल एनर्जी के पीछे छुपा बड़ा भू-राजनीतिक और आर्थिक खेल

गुजरात का ग्रीन एनर्जी मॉडल केवल राज्य के विकास तक सीमित नहीं है। इसके पीछे भारत की बड़ी रणनीतिक जरूरतें भी जुड़ी हुई हैं। भारत आज भी अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयातित तेल और गैस के जरिए पूरा करता है। मध्य-पूर्व में तनाव बढ़ने पर ऊर्जा की कीमतों में उछाल आता है जिसका सीधा असर भारत की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। ऐसी स्थिति में रिन्यूएबल एनर्जी अब केवल पर्यावरण का मुद्दा नहीं रह गई है बल्कि यह ऊर्जा सुरक्षा का भी बड़ा प्रश्न बन चुकी है।

इसी संदर्भ में गुजरात की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है। अगर बड़े पैमाने पर सोलर, विंड और ग्रीन हाइड्रोजन इकोसिस्टम विकसित होता है तो भारत धीरे-धीरे आयातित ईंधन पर अपनी निर्भरता कम कर सकता है। इसके साथ ही दुनिया की बड़ी कंपनियाँ अब ऐसी सप्लाई चेन की तलाश में हैं जो ‘क्लीन एनर्जी’ पर आधारित हो। यही वजह है कि भविष्य की मैन्युफैक्चरिंग अर्थव्यवस्था में ग्रीन पावर एक बड़े प्रतिस्पर्धात्मक लाभ के रूप में उभर रही है।

इसका मतलब यह है कि आने वाले समय में केवल यह मायने नहीं रखेगा कि कौन सा राज्य ज्यादा उद्योग स्थापित कर रहा है बल्कि यह भी महत्वपूर्ण होगा कि वे उद्योग किस प्रकार की ऊर्जा पर चल रहे हैं। यही वह जगह है, जहाँ गुजरात खुद को भविष्य की अर्थव्यवस्था के लिए तैयार करता दिखाई दे रहा है।

केवल बिजली नहीं, रोजगार, उद्योग और निवेश का नया मॉडल

रिन्यूएबल एनर्जी को लेकर अक्सर यह धारणा बनाई जाती है कि यह केवल पर्यावरण से जुड़ा मुद्दा है। लेकिन गुजरात का मॉडल दिखाता है कि इसे औद्योगिक विकास, निवेश और रोजगार से भी जोड़ा जा सकता है। जब किसी राज्य में बड़े पैमाने पर सोलर और विंड प्रोजेक्ट्स आते हैं, तो उनके साथ ट्रांसमिशन इंफ्रास्ट्रक्चर, मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स, लॉजिस्टिक्स, मेंटेनेंस इकोसिस्टम और कुशल कर्मचारियों की जरूरत भी होती है। अगर उसी ऊर्जा के आधार पर सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रिक व्हीकल और बैटरी उद्योग विकसित होते हैं तो उसका प्रभाव और भी व्यापक हो जाता है।

धोलेरा जैसे क्षेत्रों को इसी दृष्टिकोण से देखा जा रहा है। अगर भविष्य में ग्रीन एनर्जी आधारित मैन्युफैक्चरिंग इकोसिस्टम विकसित होता है, तो गुजरात भारत के औद्योगिक मानचित्र पर और अधिक मजबूत स्थिति में पहुँच सकता है। यह भी ध्यान देने वाली बात है कि दुनिया की कई बड़ी अर्थव्यवस्थाएँ अब कार्बन न्यूट्रल या लो-कार्बन सप्लाई चेन की ओर बढ़ रही हैं। ऐसी स्थिति में वही कंपनियाँ और देश ज्यादा आकर्षक माने जाएँगे, जो स्वच्छ ऊर्जा पर आधारित उत्पादन करने में सक्षम होंगे। गुजरात खुद को इसी वैश्विक बदलाव के अनुरूप तैयार करता दिखाई दे रहा है।

भारत का पहला ग्रीन इंडस्ट्रियल स्टेट बन रहा गुजरात!

यह सवाल अब धीरे-धीरे स्वाभाविक होता जा रहा है। क्योंकि गुजरात में जो तस्वीर उभर रही है वह केवल रिन्यूएबल क्षमता बढ़ाने तक सीमित नहीं है। यहाँ बिजली उत्पादन, ट्रांसमिशन, स्टोरेज, उद्योग, निर्यात और शहरी इंफ्रास्ट्रक्चर को एक साथ जोड़ने की कोशिश दिखाई देती है।

खावड़ा में विशाल रिन्यूएबल एनर्जी उत्पादन, सौराष्ट्र और कच्छ में विंड कॉरिडोर्स, तेजी से बढ़ता रूफटॉप सोलर नेटवर्क, धोलेरा जैसे स्मार्ट इंडस्ट्रियल क्षेत्र, ग्रीन हाइड्रोजन परियोजनाएँ और बंदरगाहों पर आधारित निर्यात इंफ्रास्ट्रक्चर आदि इन सभी को एक साथ देखें तो साफ हो जाता है कि गुजरात केवल बिजली उत्पादक राज्य बनना नहीं चाहता। राज्य खुद को भविष्य की ग्रीन अर्थव्यवस्था के केंद्र के रूप में स्थापित करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।

संभव है कि आने वाले वर्षों में भारत के दूसरे राज्य भी इसी दिशा में बड़े कदम उठाएँ। लेकिन फिलहाल गुजरात ने जिस आधार, गति और रणनीतिक दृष्टि के साथ रिन्यूएबल एनर्जी को औद्योगिक विकास से जोड़ने की कोशिश की है, उसने उसे एक अलग पहचान दी है।

गुजरात की बदलती भूमिका

अगर पिछले दो दशकों के गुजरात मॉडल को ध्यान से देखा जाए तो साफ दिखाई देता है कि राज्य ने हर दौर में खुद को भारत की अगली आर्थिक दिशा के साथ जोड़ने की कोशिश की है। एक समय गुजरात को मुख्य रूप से बंदरगाहों, पेट्रोकेमिकल्स और मैन्युफैक्चरिंग के लिए जाना जाता था। इसके बाद राज्य ऑटोमोबाइल मैन्युफैक्चरिंग, इंडस्ट्रियल कॉरिडोर्स और निर्यात इंफ्रास्ट्रक्चर की वजह से चर्चा में आया। अब तस्वीर उससे कहीं आगे जाती दिखाई दे रही है। अब गुजरात खुद को भविष्य की ऊर्जा अर्थव्यवस्था के केंद्र के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रहा है।

इस बदलाव को केवल सरकारी दावों या राजनीतिक भाषणों के आधार पर नहीं समझा जा सकता। इसके पीछे जो वास्तविक परिवर्तन हो रहा है, वह जमीन पर साफ दिखाई देता है। कच्छ के विशाल रेगिस्तानी इलाकों में फैले सोलर पैनल, समुद्री हवाओं के बीच लगाए गए विंड टर्बाइन्स, नए ट्रांसमिशन नेटवर्क, ग्रीन हाइड्रोजन परियोजनाएँ और स्मार्ट इंडस्ट्रियल क्षेत्र ये सभी मिलकर एक नई औद्योगिक संरचना तैयार कर रहे हैं।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि गुजरात रिन्यूएबल एनर्जी को केवल बिजली उत्पादन के रूप में नहीं देख रहा। राज्य इसे एक पूरे आर्थिक इकोसिस्टम में बदलने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। यही वजह है कि यहाँ केवल सोलर पार्क नहीं बनाए जा रहे बल्कि इन परियोजनाओं को बंदरगाहों, मैन्युफैक्चरिंग ज़ोन्स, स्मार्ट सिटीज और निर्यात नेटवर्क्स से भी जोड़ा जा रहा है।

खावड़ा और धोलेरा का महत्व

कच्छ का इलाका लंबे समय तक मुख्य रूप से सीमावर्ती क्षेत्र, सूखा रेगिस्तानी भूभाग और कम आबादी वाले इलाके के रूप में देखा जाता था। लेकिन आज वही क्षेत्र भारत के सबसे बड़े ऊर्जा परिवर्तन का केंद्र बनता दिखाई दे रहा है। यह बदलाव केवल आर्थिक नहीं बल्कि प्रतीकात्मक भी है। जहाँ कभी रेगिस्तान और बंजर जमीन दिखाई देती थी, वहाँ अब हजारों मेगावाट क्षमता वाले सोलर और विंड प्रोजेक्ट्स स्थापित किए जा रहे हैं। विशाल ट्रांसमिशन टावर और रिन्यूएबल इंफ्रास्ट्रक्चर इस बात का संकेत देते हैं कि भारत की भविष्य की ऊर्जा कहानी अब केवल महानगरों में नहीं बल्कि सीमावर्ती इलाकों में भी लिखी जा रही है।

खावड़ा परियोजना इसी परिवर्तन का सबसे बड़ा उदाहरण है। यह केवल एक बिजली परियोजना नहीं है। यह उस सोच का प्रतीक है, जिसमें भूगोल और प्राकृतिक चुनौतियों को आर्थिक अवसर में बदला गया है। कच्छ की कठोर जलवायु, तेज हवाएँ और विशाल खाली जमीन जिन्हें कभी विकास की बाधा माना जाता था, आज रिन्यूएबल एनर्जी की सबसे बड़ी ताकत बन चुकी हैं। यही वजह है कि खावड़ा का जिक्र अब केवल तकनीकी या औद्योगिक संदर्भ में नहीं होता बल्कि यह भारत की ऊर्जा महत्वाकांक्षाओं का प्रतीक बन चुका है।

अगर खावड़ा ऊर्जा उत्पादन का केंद्र है, तो धोलेरा उस ऊर्जा पर आधारित भविष्य की अर्थव्यवस्था का प्रतीक बनता दिखाई देता है। अक्सर स्मार्ट सिटी शब्द का इस्तेमाल केवल चौड़ी सड़कों, डिजिटल नेटवर्क या शहरी इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए किया जाता है लेकिन धोलेरा का महत्व इससे कहीं अधिक व्यापक है। जिस तरह से धोलेरा को विकसित किया जा रहा है, उससे साफ दिखाई देता है कि यहाँ भविष्य के उन उद्योगों पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है, जो आने वाले दशकों की वैश्विक अर्थव्यवस्था को तय कर सकते हैं। सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग, इलेक्ट्रिक व्हीकल इकोसिस्टम, बैटरी स्टोरेज, ग्रीन हाइड्रोजन और हाई-टेक मैन्युफैक्चरिंग जैसे क्षेत्रों को ध्यान में रखकर इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार किया जा रहा है।

सबसे दिलचस्प बात यह है कि यह पूरा मॉडल रिन्यूएबल एनर्जी से जुड़ा हुआ दिखाई देता है। अगर भविष्य की फैक्ट्रियाँ साफ ऊर्जा पर चलेंगी, अगर निर्यात की और तेजी से बढ़ती मैन्युफैक्चरिंग को लो-कार्बन वाली ऊर्जा मिलेगी और अगर ग्रीन हाइड्रोजन आधारित औद्योगिक सिस्टम विकसित होंगे तो धोलेरा जैसे क्षेत्र भारत की औद्योगिक संरचना को पूरी तरह बदल सकते हैं। यानी गुजरात की मौजूदा रणनीति केवल ‘ज्यादा बिजली उत्पादन’ तक सीमित नहीं है बल्कि उस बिजली के इर्द-गिर्द भविष्य की अर्थव्यवस्था का ढाँचा तैयार करना भी उसका हिस्सा है।

भविष्य की अर्थव्यवस्था तैयार कर रहा है गुजरात

आज जब दुनिया ऊर्जा परिवर्तन के दौर से गुजर रही है तब गुजरात ने खुद को केवल एक औद्योगिक राज्य तक सीमित नहीं रखा है। राज्य जिस दिशा में आगे बढ़ रहा है, वह इस बात का संकेत देता है कि आने वाले समय में ऊर्जा, उद्योग और रणनीतिक आर्थिक शक्ति, तीनों एक-दूसरे से अलग नहीं रहेंगे।

खावड़ा में रिन्यूएबल एनर्जी उत्पादन, कच्छ और सौराष्ट्र में विंड कॉरिडोर्स, पूरे राज्य में तेजी से बढ़ता रूफटॉप सोलर नेटवर्क, धोलेरा में भविष्य की औद्योगिक संरचना, ग्रीन हाइड्रोजन परियोजनाएँ, सेमीकंडक्टर और ईवी इकोसिस्टम की तैयारियाँ अगर इन सभी को एक साथ देखें तो एक व्यापक तस्वीर उभरकर सामने आती है। यह तस्वीर केवल ‘रिन्यूएबल एनर्जी क्षमता’ की नहीं है बल्कि उस भविष्य की है जिसमें स्वच्छ ऊर्जा और औद्योगिक विकास साथ-साथ आगे बढ़ेंगे।

गुजरात का मौजूदा मॉडल यही दिखाता है कि अगर किसी राज्य के पास भूगोल, नीति, उद्योग, निवेश और दूरदृष्टि एक साथ मौजूद हों तो वह केवल बिजली उत्पादन में अग्रणी नहीं बनता बल्कि पूरे आर्थिक परिवर्तन का केंद्र भी बन सकता है। संभव है कि आने वाले वर्षों में भारत की ऊर्जा राजनीति, औद्योगिक नीति और निर्यात संरचना में बड़े बदलाव देखने को मिलें। लेकिन मौजूदा परिस्थितियों को देखें तो इतना स्पष्ट है कि गुजरात खुद को उस भविष्य के लिए पहले से तैयार करने की कोशिश कर रहा है।

(यह खबर मूल रूप से गुजराती में लिखी गई है जिस इस लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं)

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