ईरान और इजरायल-अमेरिका युद्ध के बाद से होर्मुज स्ट्रेट से तेल और गैस आने में दिक्कत आ रही है। इस बीच राष्ट्रपति ट्रंप ने दावा किया है कि ईरान अमेरिका को 20 तेल टैंकर भेज रहा है। उनके मुताबिक, ये टैंकर सोमवार (30 मार्च 2026) सुबह से होर्मुज के रास्ते गुजरना शुरू करेंगे और हर दिन दो टैंकर यहाँ से निकलेंगे। कुछ ऐसा ही दावा पाकिस्तान ने भी किया है।
Iran gave us 20 big boats of oil going through the Hormuz Strait says US President Trump pic.twitter.com/lPWy6kfV9s
पाकिस्तान के विदेश मंत्री ने भी पाकिस्तान के झंडे तले 20 ऑयल टैंकर के होर्मुज स्ट्रेट से निकालने पर ईरान की मंजूरी की बात कही है। अब सवाल ये उठता है कि ये पाकिस्तान के झंडे लगे तेल टैंकर अमेरिका के हैं या पाकिस्तान के, जिसका दावा राष्ट्रपति ट्रंप कर रहे हैं।
इससे पहले भी राष्ट्रपति ट्रंप दावा कर चुके हैं कि पाकिस्तानी झंडे वाले जहाजों के जरिए उन्होंने 10 टैंकर तेल होर्मुज स्ट्रेट से निकलवाया है। इस पर ईरान ने कड़ी आपत्ति दर्ज की थी।
20 पाकिस्तानी झंडे वाला टैंकर होर्मुज स्ट्रेट से निकलेंगे- डाक
पाकिस्तान के विदेश मंत्री इशाक डार ने कहा है कि ईरान ने 20 और पाकिस्तानी झंडे लगे जहाजों को होर्मुज स्ट्रेट से गुजरने की इजाजत दे दी है। एक्स पर उन्होंने पोस्ट शेयर करते हुए इसे ‘शांति का संकेत’ कहा।
खास बात है कि पाक विदेश मंत्री ने पोस्ट को अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस, विदेश मंत्री मार्को रुबियो, अमेरिकी राजदूत स्टीव विटकॉफ और ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची को भी टैग किया है। इस पोस्ट को अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने सोशल मीडिया ट्रूथ पर शेयर भी किया है।
पाकिस्तानी विदेश मंत्री इशाक डाक ने अपने पोस्ट में लिखा है कि उन्हें ये खबर शेयर करते हुए बेहद खुशी हो रही है कि ईरान सरकार ने पाकिस्तानी झंडे वाले 20 और जहाजों को स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से गुजरने की इजाजत दे दी है। इसके तहत 2 पाकिस्तानी जहाजें यहाँ से हर दिन गुजरेंगी।
I am pleased to share a great news that the Government of Iran has agreed to allow 20 more ships under the Pakistani flag to pass through the Strait of Hormuz; two ships will cross the Strait daily.
This is a welcome and constructive gesture by Iran and deserves appreciation. It…
पाकिस्तानी विदेश मंत्री ने ईरान के कदम का स्वागत करते हुए इसे उपयोगी और सराहनीय कहा। साथ ही इसे शांति का एक संकेत बताया, जो पश्चिम एशिया में स्थिरता लाएगा।
अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने ईरान का ‘गिफ्ट’ कहा
अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा कि ईरान ने अमेरिका को तेल से लदे 20 जहाज होर्मुज स्ट्रेट से भेजे हैं। उन्होंने कहा कि वह इस कदम को परिभाषित तो नहीं कर सकते, लेकिन उन्हें लगता है कि सम्मान के रूप में ईरान ने 20 ऑयल टैंकर भेजे हैं। ये जहाज सोमवार (30 मार्च 2026) की सुबह से निकलना शुरू कर रहा है। ये कुछ दिनों तक चलेगा।
अब पाकिस्तान के विदेश मंत्री और अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप की बात को एक साथ देखा जाए, तो ये पता चलता है कि 20 ऑयल से लदे जहाज स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से निकलना शुरू हो गए हैं। लेकिन सवाल यही है कि पाकिस्तानी झंडे तले निकल रहा ये जहाज वाकई पाकिस्तान का है या सचमुच ईरान ने अमेरिका को ‘गिफ्ट’ भेजा है। ये भी हो सकता है कि पिछली बार की तरह अमेरिका का तेल पाकिस्तान अपना बता कर ईरान से मंजूरी ले ली हो और ये ऑयल टैंकर होर्मुज स्ट्रेट से सुरक्षित निकाल रहा हो। वैसे पाकिस्तान इस युद्ध को खत्म करने में मध्यस्थता के नाम पर दलाल की भूमिका ही निभा रहा है।
मिडिल ईस्ट की जटिल राजनीति में एक और बड़ा मोड़ तब आया, जब अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ने कुछ बेहद खुलकर और विवादित बयान दिए। फ्लोरिडा में आयोजित फ्यूचर इन्वेस्टमेंट इनिशिएटिव कॉन्फ्रेंस में बोलते हुए ट्रंप ने सऊदी अरब के वास्तविक शासक और क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान (MBS) के साथ अपने रिश्तों को लेकर तीखी टिप्पणी की। उनका एक बयान वायरल हो गया, जिसमें उन्होंने कहा कि मौजूदा हालात में सऊदी नेता ‘Kissing my a**’ कर रहे हैं।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, ट्रंप ने अपने राष्ट्रपति कार्यकाल में अमेरिका की वापसी को लेकर एक बातचीत का जिक्र किया। उन्होंने दावा किया कि MBS को इतनी मजबूत अमेरिकी वापसी की उम्मीद नहीं थी। ट्रंप ने कहा, “उसे नहीं लगा था कि ऐसा होगा… उसे नहीं लगा था कि वो मेरी खुशामद करेगा… उसे लगा था कि मैं भी एक कमजोर अमेरिकी राष्ट्रपति ही रहूँगा… लेकिन अब उसे मेरे साथ अच्छा व्यवहार करना पड़ रहा है।” हालाँकि इन तीखे शब्दों के साथ ट्रंप ने MBS की तारीफ भी की और उन्हें ‘शानदार इंसान’ और ‘योद्धा’ बताया।
ये बयान ऐसे समय में आए हैं जब अमेरिका और इज़राइल, 28 फरवरी से ईरान के खिलाफ एक बड़े सैन्य अभियान में लगे हुए हैं। The New York Times की रिपोर्ट के अनुसार, अंदरखाने MBS ट्रंप को इस युद्ध को जारी रखने के लिए प्रेरित कर रहे हैं और इसे ईरान को कमजोर करने का ‘ऐतिहासिक मौका’ बता रहे हैं। हालांकि, सार्वजनिक तौर पर सऊदी अरब ने शांति की बात की है और अपने सीमाओं की सुरक्षा पर ध्यान दिया है। इसके बावजूद ट्रंप के इस बयान ने खासकर भारतीय उपमहाद्वीप के मुस्लिम समुदाय में नाराजगी पैदा कर दी।
भारतीय उपमहाद्वीप के मुसलमानों की प्रतिक्रिया
भारतीय उपमहाद्वीप के मुसलमानों की प्रतिक्रिया तेज रही और ‘उम्मा’ (वैश्विक मुस्लिम समुदाय) की भावना से जुड़ी हुई दिखी। पत्रकार सबा नकवी ने 28 मार्च को X पर एक लंबा पोस्ट लिखा। उन्होंने अपने पोस्ट में अल-कायदा आतंकी ओसामा बिन लादेन का जिक्र किया और सऊदी शासकों को ‘मक्का और मदीना के दो पाक मस्जिदों का संरक्षक’ कहा।
उन्होंने लिखा, “ओसामा बिन लादेन सऊदी अरब से निकला था, पहले सोवियत संघ के खिलाफ जिहाद के लिए और बाद में अपने ही देश के अमेरिका के करीब होने के खिलाफ। 9/11 हमले में कई सऊदी शामिल थे।” 9/11 जैसे आतंकी हमले को ‘ऑपरेशन’ कहना इस घटना को वैध ठहराने जैसा माना गया।
नक़वी यहीं नहीं रुकीं। उन्होंने सऊदी शाही परिवार के भारत दौरे का जिक्र करते हुए कहा कि वे अक्सर गाँधी समाधि या सूफी दरगाहों पर नहीं जाते। लेकिन उनका मुख्य सवाल था, “क्या दो पाक मस्जिदों के संरक्षक इस अपमान को नजरअंदाज कर सकते हैं?” उनके शब्दों से ऐसा लगा कि वे धार्मिक आधार पर प्रतिक्रिया भड़काने की कोशिश कर रही हैं।
यह नाराजगी तेजी से फैली। X पर सक्रिय सानिया सैयद ने लिखा, “शर्मनाक और घटिया! ट्रंप सऊदी क्राउन प्रिंस के लिए बेहद अपमानजनक भाषा इस्तेमाल कर रहे हैं। क्या आप अपने सबसे बड़े सहयोगी देश के नेता के लिए ऐसे बोलते हैं?” इस तरह की प्रतिक्रियाओं में सऊदी नेता का अपमान, पूरी मुस्लिम दुनिया का अपमान माना गया।
पाकिस्तान में भी प्रतिक्रिया तेज रही। एक पाकिस्तानी पत्रकार ने ट्रंप का वीडियो शेयर किया, जिसमें उन्होंने कहा, “उसे नहीं लगा था कि वो मेरी खुशामद करेगा… अब उसे मेरे साथ अच्छा रहना होगा।” इस वीडियो को साझा करने का मकसद सऊदी नेतृत्व के कथित अपमान को दिखाना था।
पाकिस्तानी यूजर फैसल राँझा ने आर्थिक पहलू उठाते हुए कहा कि सऊदी अरब ने अमेरिका में भारी निवेश किया है, फिर भी ट्रंप उनका मजाक उड़ा रहे हैं। उन्होंने लिखा, “उम्मा को इससे सीख लेनी चाहिए और इस तरह की बदतमीजी से आगे बढ़ना चाहिए।” इस बयान में ‘उम्मा’ को प्राथमिकता दी गई।
खामेनेई के लिए शोक यानी सीमाओं से परे वफादारी
यह रुझान तब और साफ दिखा जब ईरान के सर्वोच्च नेता Ayatollah Ali Khamenei की मौत के बाद भारत के कुछ हिस्सों में शोक मनाया गया। खामेनेई अक्सर भारत की आलोचना करते थे, लेकिन उनकी मौत पर जम्मू-कश्मीर, उत्तर प्रदेश और मुंबई में शोक प्रदर्शन हुए।
कश्मीर के लाल चौक में प्रदर्शनकारियों ने उन्हें ‘शेर’ बताया और कहा कि उनके जैसे और लोग पैदा होंगे। इमामबाड़ों पर काले झंडे लगाए गए, जो आमतौर पर करबला जैसी बड़ी धार्मिक त्रासदी में ही किया जाता है।
अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में छात्रों ने ग़ायबाना नमाज-ए-जनाजा पढ़ी। एक्टिविस्ट एसएम ताहिर हुसैन ने कहा कि कई लोगों के लिए खामेनेई सिर्फ शिया नेता नहीं, बल्कि पूरे मुस्लिम समुदाय का प्रतीक थे। यह दिखाता है कि ‘उम्मा’ से जुड़े नेताओं के लिए भावनात्मक प्रतिक्रिया काफी मजबूत होती है।
ईरान के लिए जकात और पहलगाम पर चुप्पी
‘उम्मा’ को प्राथमिकता देने का एक और उदाहरण कश्मीर में देखा गया, जहाँ ईरान के समर्थन में लोग घर-घर जाकर चंदा जुटा रहे हैं। लोगों ने सोना, पैसा और यहाँ तक कि मवेशी तक जकात (दान) में दे दिए। एक महिला ने 30 साल से रखा सोना दान कर दिया, जबकि गांदरबल के एक युवक ने अपनी Royal Enfield बाइक बेच दी।
एक स्थानीय निवासी ने कहा, “ईरान पर इस युद्ध से भारी तबाही हुई है, दुनिया को कम से कम मदद तो करनी चाहिए।”
हालाँकि यही उत्साह घरेलू घटनाओं में नहीं दिखा। पिछले साल 22 अप्रैल को हुए पहलगाम आतंकी हमले में मारे गए लोगों के लिए इस तरह का कोई चंदा अभियान या बड़ी मदद नहीं देखी गई।
वफादारी का सवाल
डोनाल्ड ट्रंप के MBS पर बयान, खामेनेई के लिए शोक और ईरान को दिए गए जकात… इन सभी घटनाओं में एक समान पैटर्न दिखता है। सबा नकवी जैसे लोगों के लिए उनकी प्राथमिक निष्ठा ‘उम्मा’ के साथ दिखती है, न कि अपने देश के साथ।
जब सऊदी या ईरान के नेताओं का अपमान होता है, तो इसे मजहबी स्तर पर लिया जाता है। लेकिन जब अपने ही देश में आतंकी हमले होते हैं, तो वैसी प्रतिक्रिया नहीं दिखती। इससे यह सवाल उठता है कि क्या धार्मिक पहचान और ‘उम्मा’ की भावना राष्ट्रीय एकता से ऊपर रखी जा रही है।
(मूल रूप से ये लेख अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल लेख पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)
चाहे मिडिल ईस्ट का मौजूदा संकट हो या कुछ समय पहले भारत द्वारा पाकिस्तान के खिलाफ चलाया गया ‘आपरेशन सिंदूर’। इन हमलों-युद्धों से एक बात को साफ नजर आ रही है कि आधुनिक युद्ध की प्रकृति बदल गई है, भारी टैंकों-सैनिकों की जगह हल्के ड्रोन ने लेनी शुरू कर दी है। खासकर सस्ते और बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होने वाले ड्रोन अब किसी भी देश की सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा बन चुके हैं।
दुश्मन देश अब ‘ड्रोन स्वार्म’ यानी एक साथ हजारों ड्रोन भेजकर डिफेंस सिस्टम को भेदने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसे माहौल में भारत ने अपनी वायु रक्षा क्षमता को और मजबूत करने के लिए एक अहम फैसला लिया है।
भारत के रक्षा मंत्रालय ने रूस की सरकारी रक्षा निर्यात कंपनी JSC रोसोबोरोनएक्सपोर्ट के साथ 445 करोड़ रुपए का समझौता किया है जिसके तहत भारतीय सेना के लिए 2K22M तुंगुस्का एयर डिफेंस सिस्टम (Tunguska Air Defence System) खरीदा जाएगा। यह सौदा न केवल स्ट्रैटेजिक दृष्टि से अहम है बल्कि यह डिफेंस सेक्टर में भारत-रूस के सहयोग की निरंतरता को भी दिखाता है।
Ministry of Defence inks Rs 858 crore contracts for Tunguska Air Defence Missile System & Inspection (Depot Level) of P8I Aircraft
The contract for the procurement of Tunguska Air Defence Missile Systems, valued at Rs 445 crore, for the Indian Army, was signed with JSC… pic.twitter.com/9Atto14v0V
अब छोटे, सस्ते और आसानी से बनाए जाने वाले ड्रोन सबसे बड़ा खतरा बनकर सामने आए हैं। ये ड्रोन बहुत कम ऊँचाई पर उड़ते हैं और अक्सर रडार की पकड़ में आसानी से नहीं आते। इसी वजह से पारंपरिक एयर डिफेंस सिस्टम के लिए इन्हें पहचानना और समय रहते रोकना मुश्किल हो जाता है।
भले ही भारत के पास S-400 जैसा आधुनिक एयर डिफेंस सिस्टम मौजूद है, जो दूर से आने वाले तेज और बड़े लक्ष्यों को मार गिराने में बेहद सक्षम है लेकिन छोटे आकार और धीमी गति वाले ड्रोन इसके लिए चुनौती बन सकते हैं। ऐसे ड्रोन अचानक हमला करते हैं और संख्या में ज्यादा होने पर डिफेंस सिस्टम को भ्रम में डाल सकते हैं।
इसी समस्या को देखते हुए अब सेना अपना फोकस उन प्रणालियों पर बढ़ा रही है जो कम ऊँचाई पर उड़ने वाले खतरों को खत्म करने में माहिर हों। यानी ऐसे सिस्टम जो तेजी से प्रतिक्रिया दे सकें और छोटे लक्ष्यों को भी सटीकता से निशाना बना सकें।
तुंगुस्का इसी तरह की एक खास प्रणाली है। इसे इस तरह डिजाइन किया गया है कि यह ड्रोन, हेलीकॉप्टर और क्रूज मिसाइल जैसे खतरों को आसानी से पहचानकर तुरंत नष्ट कर सके। खास बात यह है कि यह नजदीकी दूरी पर भी बेहद प्रभावी तरीके से काम करती है।
तुंगुस्का: मिसाइल और गन का घातक मिक्स
तुंगुस्का प्रणाली की सबसे बड़ी ताकत इसका अनोखा ‘हाइब्रिड’ डिजाइन है। आसान शब्दों में समझें तो यह एक ही प्लेटफॉर्म पर दो तरह के हथियारों का इस्तेमाल करती है- मिसाइल और तेज रफ्तार गन। यही वजह है कि यह अलग-अलग दूरी और परिस्थितियों से आने वाले खतरों से एकसाथ निपट सकती है।
इसमें इस्तेमाल होने वाली 9M311 श्रेणी की मिसाइलें करीब 8 से 10 किलोमीटर तक दूर मौजूद लक्ष्य को मार सकती हैं और लगभग 3500 मीटर की ऊँचाई तक उड़ रहे खतरों को भी खत्म कर सकती हैं। यानी अगर कोई दुश्मन हेलीकॉप्टर, ड्रोन या क्रूज मिसाइल थोड़ी दूरी से हमला करने की कोशिश करता है तो ये मिसाइलें उसे रास्ते में ही रोक सकती हैं।
इसके अलावा, इसमें लगी दो 30 मिमी की ऑटोमैटिक गन इसकी ताकत को और बढ़ा देती हैं। ये गन इतनी तेज हैं कि एक मिनट में लगभग 5000 गोलियाँ दाग सकती हैं। इसका मतलब है कि अगर कोई छोटा या तेज लक्ष्य बहुत करीब आ जाए जैसे ड्रोन या लो-फ्लाइंग मिसाइल तो यह सिस्टम तुरंत फायरिंग करके उसे नष्ट कर सकता है।
कुल मिलाकर तुंगुस्का को ऐसे समझा जा सकता है जैसे सुरक्षा की आखिरी ढाल। जब दूर की मिसाइलें काम कर चुकी होती हैं और खतरा नजदीक पहुँच जाता है, तब यह सिस्टम तेजी से प्रतिक्रिया देकर दुश्मन के हमले को वहीं खत्म कर देता है। यही वजह है कि इसे ‘क्लोज-इन वेपन सिस्टम’ कहा जाता है और मौजूदा वक्त के युद्ध के बदलते हालातो में इसकी भूमिका और अहम हो जाती है।
रडार, ट्रैकिंग के साथ-साथ इलेक्ट्रॉनिक युद्ध में बढ़त
तुंगुस्का में 360 डिग्री कवरेज वाला अत्याधुनिक रडार सिस्टम लगा होता है जो करीब 18 किलोमीटर की दूरी तक हवाई लक्ष्यों का पता लगा सकता है। इसके साथ डिजिटल फायर कंट्रोल सिस्टम जुड़ा होता है और यह लक्ष्य को सटीकता के साथ ट्रैक कर उसे नष्ट करने में मदद करता है।
इसकी एक और महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि यह इलेक्ट्रॉनिक जैमिंग की स्थिति में भी काम कर सकता है। यदि दुश्मन रडार सिस्टम को बाधित करने की कोशिश करता है तो यह ऑप्टिकल ट्रैकिंग के जरिए लक्ष्य पर निशाना साध सकता है। यह क्षमता आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक युद्ध के माहौल में इसे और अधिक विश्वसनीय बनाती है।
युद्धक्षेत्र में गतिशीलता और रणनीतिक उपयोग
तुंगुस्का को ट्रैक्ड आर्मर्ड चेसिस पर लगाया गया है जिससे यह टैंक और अन्य बख्तरबंद वाहनों के साथ कठिन इलाकों में भी आसानी से चल सकता है। यह प्रणाली युद्धक्षेत्र में लगातार मूव करती सेना के साथ तालमेल बनाए रखते हुए उन्हें हवाई खतरों से सुरक्षा प्रदान करती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह प्रणाली भारत के मल्टी लेयर्ड एयर डिफेंस सिस्टम में एक महत्वपूर्ण कड़ी का काम करेगी। यह न केवल अग्रिम मोर्चे पर तैनात सैनिकों की रक्षा करेगी बल्कि बड़े एयर डिफेंस सिस्टम और महत्वपूर्ण सैन्य ठिकानों को भी सुरक्षा प्रदान करेगी।
सैन्य आधुनिकीकरण का हिस्सा
यह सौदा ऐसे समय में हुआ है जब रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता वाली रक्षा अधिग्रहण परिषद ने करीब 2.38 लाख करोड़ रुपए के रक्षा प्रस्तावों को मंजूरी दी है। प्रस्तावों में सिर्फ एयर डिफेंस सिस्टम ही नहीं बल्कि टैंक के लिए आधुनिक गोला-बारूद, उन्नत संचार नेटवर्क, धनुष तोप और ऐसी निगरानी प्रणालियाँ भी शामिल हैं जो बिना रनवे के काम कर सकती हैं। साफ है कि सेना को हर मोर्चे पर मजबूत करने की व्यापक तैयारी चल रही है।
तुंगुस्का प्रणाली की खरीद को सिर्फ एक साधारण रक्षा सौदे के तौर पर नहीं देखा जा सकता। यह इस बात का संकेत है कि भारत अब युद्ध के बदलते रूप को समझते हुए अपनी रणनीति को अपडेट कर रहा है। पहले जहाँ युद्ध बड़े टैंकों, लड़ाकू विमानों और पारंपरिक हथियारों पर आधारित होते थे तो वहीं अब तकनीक और ड्रोन के असीमित खतरों का दौर है।
अमेरिकी कॉन्ग्रेस में 25 मार्च 2026 को एक रिपोर्ट पेश की गई, जिसने एक बार फिर पाकिस्तान की आतंकवादी गतिविधियों के हब होने की भूमिका को उजागर किया गया है। रिपोर्ट में पाकिस्तान की जमीन से चलने वाले कई आतंकवादी संगठनों की पहचान की गई है, जो भारत को निशाना बनाने की कोशिश कर रहे हैं और उनका साफ लक्ष्य है जम्मू-कश्मीर को हथियाने की कोशिश।
रिपोर्ट का नाम ‘पाकिस्तान में आतंकवादी और अन्य मिलिटेंट ग्रुप्स’ था, इसमें पाकिस्तान के अंदर चल रहे आतंक पारिस्थितिकी तंत्र का स्ट्रक्चर्ड आकलन दिया गया और उन्हें उनके काम के फोकस और विचारधारा के आधार पर कैटेगरी में बाँटा गया।
कॉन्ग्रेस रिसर्च सर्विस की रिपोर्ट में कहा गया कि पाकिस्तान कई गैर-राजकीय मिलिटेंट ग्रुप्स के लिए बेस भी था और टारगेट भी था, जिनमें से कई 1980 के दशक से सक्रिय थे। इसमें आगे कहा गया कि लगातार सैन्य अभियानों और काउंटर टेरर ऑपरेशन्स के बावजूद ये आतंकवादी संगठन काफी क्षमता के साथ काम करते रहे।
पाकिस्तान से चलने वाले आतंकवादी ग्रुप्स की पाँच कैटेगरी
रिपोर्ट ने पाकिस्तान से जुड़े आतंकवादी संगठनों को पाँच बड़ी कैटेगरी में बाँटा, जैसे ग्लोबली ओरिएंटेड ग्रुप्स, अफगानिस्तान ओरिएंटेड मिलिटेंट्स, भारत और कश्मीर फोकस्ड संगठन, घरेलू ओरिएंटेड ग्रुप्स और शिया कम्युनिटी को निशाना बनाने वाले अलग-अलग ग्रुप्स।
रिपोर्ट में 15 ग्रुप्स की जाँच की गई, जिनमें से 12 को अमेरिकी कानून के तहत फॉरेन टेररिस्ट ऑर्गनाइजेशन्स घोषित किया जा चुका था। इस क्लासिफिकेशन से पाकिस्तान से चलने वाले आतंकवादी संगठनों के स्केल और विविधता का पता चला। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि पाकिस्तान खुद 2003 से आतंकवाद से काफी प्रभावित रहा, जिसमें मौतें 2009 में सबसे ज्यादा हुईं। लेकिन थोड़े समय की गिरावट के बाद आतंकवाद से जुड़ी मौतें फिर बढ़ गईं और 2025 में 4001 तक पहुंच गईं, जो पिछले एक दशक में सबसे ज्यादा थीं।
आतंक नेटवर्क को खत्म करने में फौजी अभियानों की नाकामी
रिपोर्ट में की गई एक मुख्य बात यह थी कि पाकिस्तान के फौजी ऑपरेशन्स का आतंकवादी संगठनों के खिलाफ सीमित प्रभाव पड़ा। इसमें दावा किया गया कि बड़े-बड़े अभियान, एयर स्ट्राइक्स और बड़े पैमाने पर इंटेलिजेंस आधारित ऑपरेशन्स ने भी इन नेटवर्क को तोड़ने में नाकाम रहे।
रिपोर्ट में आगे कहा गया कि लाखों-लाख ऐसे ऑपरेशन्स किए गए। फिर भी अमेरिका और यूएन द्वारा नामित आतंकवादी संगठन पाकिस्तानी इलाके से काम करते रहे। इस निष्कर्ष ने इस्लामाबाद द्वारा किए गए काउंटर टेरर उपायों के इरादे और प्रभावशीलता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए।
खास बात यह कि मई 2025 में जब भारत ने पहलगाम आतंकवादी हमले के जवाब में ऑपरेशन सिंदूर के तहत आतंकवादी संगठनों के कई हबों को नष्ट किया, तो पाकिस्तानी सेना ने न सिर्फ भारतीय शहरों पर हमला करने की कोशिश की बल्कि भारतीय ऑपरेशन्स में मारे गए आतंकियों के फ्यूनरल प्रोसेसन में भी हिस्सा लिया।
इसके अलावा रिपोर्ट्स में सुझाव दिया गया कि पाकिस्तान आतंकवादी आउटफिट्स को भारतीय स्ट्राइक्स में नष्ट हुए इंफ्रास्ट्रक्चर को फिर से बनाने में मदद कर रहा था। जबकि अमेरिकी कॉन्ग्रेस की रिपोर्ट ने पाकिस्तान द्वारा आतंकवादी संगठनों को स्पॉन्सर करने की भूमिका को स्पष्ट रूप से विस्तार से नहीं बताया, लेकिन पिछले एक साल में जो हुआ उससे पहले से भी ज्यादा साफ हो गया कि पाकिस्तानी अधिकारी खुद देश में बढ़ते आतंकवादी समस्या के लिए जिम्मेदार थे।
भारत और कश्मीर फोकस्ड आतंकवादी ग्रुप्स
रिपोर्ट ने भारत को निशाना बनाने वाले आतंकवादी संगठनों पर काफी जोर दिया। रिपोर्ट में नाम लिए गए सबसे प्रमुख ग्रुप्स में लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद, हिजबुल मुजाहिदीन, हरकत-उल-मुजाहिदीन और हरकत-उल-जिहाद इस्लामी शामिल थे।
लश्कर-ए-तैयबा, जिसके नेता हाफिज सईद हैं, को एक बड़ी और अच्छी तरह से संगठित संस्था बताया गया जिसमें कई हजार आतंकवादी थे। यह पाकिस्तान के पंजाब प्रांत और पाक अधिकृत जम्मू-कश्मीर में आधारित था और प्रतिबंधों से बचने के लिए अपना नाम बदलकर जमात-उद-दावा कर लिया था। रिपोर्ट ने 2008 के मुंबई आतंकवादी हमलों में इसकी भूमिका और कई अन्य बड़े हमलों को याद किया।
जैश-ए-मोहम्मद, जिसकी स्थापना 2000 में मसूद अजहर ने की, को जम्मू-कश्मीर को पाकिस्तान में मिलाने की कोशिश करने वाला एक और मुख्य ग्रुप बताया गया। करीब 500 हथियारबंद आतंकियों के साथ यह ग्रुप भारत, अफगानिस्तान और पाकिस्तान में काम करता था। 2001 में भारतीय संसद पर हमले में इसकी भूमिका भी बताई गई।
पाक अधिकृत जम्मू-कश्मीर और पाकिस्तान के शहरी केंद्रों से काम करने वाले हरकत-उल-मुजाहिदीन को 1999 में इंडियन एयरलाइंस फ्लाइट आईसी 814 के हाइजैकिंग से जोड़ा गया। इस घटना ने आखिरकार मसूद अजहर की रिहाई का रास्ता खोला, जिसने बाद में जैश-ए-मोहम्मद की स्थापना की।
हिजबुल मुजाहिदीन को जम्मू-कश्मीर में काम करने वाले सबसे पुराने मिलिटेंट ग्रुप्स में से एक बताया गया, जिसमें 1500 तक कैडर थे। रिपोर्ट में दावा किया गया कि इसके सदस्य मुख्य रूप से ‘एथनिक कश्मीरी’ थे जो या तो आजादी चाहते थे या पाकिस्तान में शामिल होना चाहते थे।
हालाँकि भारतीय सुरक्षा विश्लेषकों ने ऐसे चरित्रणों का बार-बार विरोध किया, उन्होंने बताया कि जम्मू-कश्मीर ऑपरेशन्स में निष्क्रिय किए गए काफी संख्या में आतंकियों की जड़ें मुख्य भूमि पाकिस्तान में थीं, खासकर पंजाब से।
रिपोर्ट में तथ्यात्मक गलतियाँ भी हैं
रिपोर्ट ने विस्तृत ओवरव्यू दिया, लेकिन कुछ विवरणों ने सटीकता पर सवाल खड़े किए। उदाहरण के लिए, जैश-ए-मोहम्मद के संस्थापक मसूद अजहर को ‘कश्मीरी मिलिटेंट लीडर’ बताया गया, जबकि वे पाकिस्तान के पंजाबी मूल के माने जाते हैं।
इसी तरह हिजबुल मुजाहिदीन के कैडर्स को मुख्य रूप से ‘एथनिक कश्मीरी’ बताना कश्मीर में काउंटर टेरर ऑपरेशन्स की जमीनी हकीकत से पूरी तरह मेल नहीं खाता। ऐसी असंगतियां बाहरी आकलनों की सीमाओं को उजागर करती हैं जो पुरानी या अधूरी जानकारी पर निर्भर हो सकते हैं।
ग्लोबली ओरिएंटेड आतंकवादी ग्रुप्स और क्षेत्रीय लिंकेज
रिपोर्ट ने पाकिस्तान से चलने वाले ग्लोबली ओरिएंटेड मिलिटेंट संगठनों की भी जाँच की, जिसमें अल कायदा और उसके सहयोगी शामिल थे। अल कायदा, जिसकी स्थापना 1988 में हुई, सालों तक काफी कमजोर होने के बावजूद कई पाकिस्तान आधारित ग्रुप्स से लिंकेज बनाए रखे हुए था।
इसका क्षेत्रीय सहयोगी 2014 में बना अल कायदा इन इंडियन सबकॉन्टिनेंट पाकिस्तान के अंदर हमलों और सैन्य संपत्तियों के खिलाफ प्रयासों में शामिल पाया गया।
एक और बड़ा इकाई जिस पर जोर दिया गया वह इस्लामिक स्टेट खोरासान प्रांत था, जो मुख्य रूप से अफगानिस्तान में काम करता है लेकिन पाकिस्तान में तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान के पूर्व सदस्यों और अन्य मिलिटेंट गुटों के जरिए मौजूदगी बनाए रखता है।
अफगानिस्तान ओरिएंटेड नेटवर्क और सेफ हेवन की चिंताएँ
रिपोर्ट ने पाकिस्तानी इलाके से चलने वाले अफगानिस्तान फोकस्ड मिलिटेंट ग्रुप्स की लंबे समय से मौजूदगी का जिक्र किया। अफगान तालिबान, जिसने 2021 में अफगानिस्तान में सत्ता वापस हासिल की, को ऐतिहासिक रूप से क्वेटा, कराची और पेशावर जैसे शहरों से काम करते बताया गया।
एक और मुख्य ग्रुप हक्कानी नेटवर्क को पाक-अफगान बॉर्डर के पास ऑपरेशनल लिंकेज वाला बताया गया और पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी से जुड़ा माना गया, जिसका इस्लामाबाद ने इनकार किया।
आतंकियों को पालने-पोसने वाली नीतियाँ भी उजागर
रिपोर्ट ने घरेलू ओरिएंटेड आतंकवादी ग्रुप्स जैसे तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान को भी उजागर किया, जिसे पाकिस्तान के अंदर काम करने वाला सबसे घातक मिलिटेंट संगठन बताया गया। 2500 से 5000 लड़ाकों की अनुमानित ताकत के साथ यह ग्रुप पाकिस्तानी राज्य को उखाड़ फेंकने और शरिया कानून लागू करने की कोशिश कर रहा था।
इसके अलावा बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी और जैश अल-अदल जैसे एथनिक सेपरेटिस्ट ग्रुप्स और लश्कर-ए-जहंगवी और सिपाह-ए-सहाबा पाकिस्तान जैसे सेक्टेरियन आउटफिट्स को भी नाम दिया गया, जिन्होंने ऐतिहासिक रूप से शिया कम्युनिटी को निशाना बनाया।
वैश्विक जाँच के केंद्र में पाकिस्तान
रिपोर्ट में कहा गया कि पाकिस्तान अपने काउंटर टेरर रिकॉर्ड के लिए अंतरराष्ट्रीय जाँच के दायरे में बना रहा। इसमें कहा गया कि देश को 2018 में इंटरनेशनल रिलीजियस फ्रीडम एक्ट के तहत ‘कंट्री ऑफ पार्टिकुलर कंसर्न’ घोषित किया गया था और तब से हर साल इसे बनाए रखा गया।
इसने अमेरिकी स्टेट डिपार्टमेंट की 2023 की कंट्री रिपोर्ट्स ऑन टेररिज्म का भी हवाला दिया, जिसमें कहा गया कि पाकिस्तान ने आतंकवादी गतिविधियों को रोकने के लिए कुछ कदम उठाए, लेकिन कुछ मदरसों के जरिए उग्रवादी विचारधारा को बढ़ावा देने वाली कट्टरता को लेकर चिंताएँ बनी रहीं।
अमेरिकी कॉन्ग्रेस द्वारा पेश की गई रिपोर्ट ने लंबे समय से चली आ रही वैश्विक आकलन को मजबूत किया कि पाकिस्तान आतंकवादी संगठनों की एक बड़ी रेंज को होस्ट और सपोर्ट करता है, जिनमें से कई सीधे भारत को निशाना बनाते हैं और जम्मू-कश्मीर में क्षेत्रीय बदलाव की कोशिश करते हैं।
(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)
दिल्ली हमेशा से ही सिनेमा का गवाह रही है। लुटियंस दिल्ली की चौड़ी सड़कें, चांदनी चौक की चहल-पहल और पुरानी दिल्ली की संकरी गलियाँ-हर जगह कहानियाँ बसी हैं। अब राजधानी इस रिश्ते को और गहरा बनाने जा रही है। 25 से 31 मार्च 2026 तक दिल्ली सरकार मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता और कला-संस्कृति विभाग की महत्वाकांक्षी परियोजना के तहत International Film Festival Delhi (IFFD) 2026 का आयोजन कर रही है। भारत मंडपम सहित शहर के कई स्थानों पर यह उत्सव चल रहा है।
यह महोत्सव सिर्फ फिल्में दिखाने तक सीमित नहीं है। यह दिल्ली को वैश्विक सिनेमा का केंद्र बनाने का प्रयास है। देश-विदेश के अभिनेता, निर्देशक, निर्माता और फिल्म प्रेमी एक मंच पर आ रहे हैं। इससे न सिर्फ फिल्म निर्माण को बढ़ावा मिलेगा, बल्कि दिल्ली का पर्यटन भी नई ऊँचाइयों को छू सकेगा।
उद्घाटन समारोह: क्या रहा अनुभव?
25 मार्च को भारत मंडपम में लाल कालीन बिछाई गई। मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने उत्सव का उद्घाटन किया। हेमामालिनी, शर्मिला टैगोर, कंगना रानौत, अर्जुन कपूर, निमरत कौर, विक्की कौशल, भूमि पेडनेकर जैसी कई हस्तियाँ मौजूद रहीं। उद्घाटन समारोह की पहली फिल्म ‘सिरात’ (Sirât) थी।
मंच पर सांस्कृतिक कार्यक्रम हुए, ऑडियो-विजुअल प्रस्तुति ने भारतीय सिनेमा की यात्रा दिखाई। लेकिन उद्घाटन सत्र पूरी तरह जादू नहीं बिखेर पाया। एंकर के टेलीप्रॉम्प्टर में गड़बड़ी हुई, माइक अचानक बंद हो गया। दर्शकों की संख्या भी कम थी। बड़े मंच पर कलाकारों का प्रदर्शन प्रभावित हुआ। तालियाँ और दर्शकों की प्रतिक्रिया किसी भी कलाकार के उत्साह को दोगुना कर देती है, लेकिन वहाँ यह कमी महसूस हुई।
ये गलतियाँ पहला प्रयास होने के कारण स्वाभाविक हो सकती हैं। लेकिन इतने बड़े आयोजन में ऐसी कमियाँ नजरअंदाज नहीं की जा सकतीं। जो एजेंसी इस उत्सव को संभाल रही है, अगर उसमें कोई कमी रही हो तो दिल्ली सरकार को अगले दिनों में उसके साथ बेहतर समन्वय करना चाहिए। गलतियों को सुधारने का पूरा मौका मिलना चाहिए।
उत्सव की खासियत और कार्यक्रम
IFFD 2026 में 47 देशों की 140 से अधिक फिल्में दिखाई जा रही हैं। भारतीय और अंतरराष्ट्रीय फीचर फिल्में, डॉक्यूमेंट्री, शॉर्ट फिल्में, एनिमेशन और हाइब्रिड फॉर्मेट शामिल हैं। भारत मंडपम, पीवीआर-आईनॉक्स थिएटर, पब्लिक स्पेस, आउटडोर लोकेशन और मोबाइल एलईडी यूनिट्स पर स्क्रीनिंग हो रही हैं।
सभी कार्यक्रम मुफ्त हैं, लेकिन जगह की सीमा के कारण पहले से रजिस्ट्रेशन जरूरी है। वेबसाइट https://www.iffdelhi.com/ पर रजिस्ट्रेशन चल रहा है।
मुख्य आकर्षण
CineXchange: फिल्म मार्केट जहां फिल्मकार अपनी परियोजनाएँ पिच कर सकते हैं, डील हो सकती है।
मास्टरक्लास और पैनल चर्चाएँ: मनोज बाजपेयी, अनुपम खेर, बोमन ईरानी, इम्तियाज अली, शेखर कपूर, राकेश ओमप्रकाश मेहरा, भूमि पेडनेकर जैसी हस्तियाँ शामिल हैं।
क्लासिक फिल्में: गुरु दत्त की जन्म शताब्दी पर ‘प्यासा’ की 4K रिस्टोर्ड वर्जन सहित कई पुरानी फिल्में दिखाई जा रही हैं। शोले की रिस्टोर्ड प्रिंट भी स्क्रीन पर लौट रही है।
महिला फिल्मकारों पर फोकस: ‘Her Lens’ जैसी पहल से महिलाओं की फिल्मों को जगह मिल रही है।
सांस्कृतिक संध्या: सोनम कालरा, अशीष विद्यार्थी, रिकी केज जैसी कलाकारों के कार्यक्रम।
असम की कई फिल्में भी चयनित हुई हैं, जैसे ‘मोरोमोर देउता’, ‘गनाराग’ आदि। इससे क्षेत्रीय सिनेमा को बढ़ावा मिल रहा है।
दिल्ली के लिए क्यों जरूरी है यह उत्सव?
दिल्ली लंबे समय से राजनीति और प्रशासन का केंद्र रही है। अब वह कला और संस्कृति का भी केंद्र बनना चाहती है। मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने कहा, “सिनेमा भाषा और सीमाओं से परे लोगों को जोड़ता है। इस उत्सव के माध्यम से दिल्ली मुंबई, पुणे और गोवा के साथ कदम मिलाकर चलना चाहती है।”
कला, संस्कृति और पर्यटन मंत्री कपिल मिश्रा ने इसे ‘ऐतिहासिक पहल’ बताया। उन्होंने कहा कि दिल्ली अब सिर्फ प्रशासनिक राजधानी नहीं, बल्कि रचनात्मकता का केंद्र बन रही है। यह उत्सव दिल्ली फिल्म पॉलिसी का प्रमुख हिस्सा है। इससे स्थानीय व्यवसायों, होटलों, परिवहन और पर्यटन को फायदा होगा। फिल्मकारों, आलोचकों और दर्शकों की आमद से दिल्ली की अर्थव्यवस्था को नई गति मिलेगी। साथ ही, नए फिल्मकारों और युवा प्रतिभाओं को मंच मिलेगा।
चुनौतियाँ और भविष्य की राह
पहले दिन की कुछ कमियाँ सामने आईं। लेकिन अब अगले पाँच दिन तय करेंगे कि यह उत्सव भारत के बेहतरीन फिल्म महोत्सवों में शुमार होगा या नहीं। आंतरिक तैयारी को मजबूत करने की जरूरत है। दर्शकों की संख्या बढ़ानी होगी, तकनीकी गड़बड़ियों पर नियंत्रण रखना होगा और कार्यक्रमों को और आकर्षक बनाना होगा।
यह आयोजन अब हर साल होना है। पहली बार की गलतियों से सबक लेकर अगली बार इन्हें दोहराया नहीं जाना चाहिए। दिल्ली सरकार और संबंधित एजेंसियों को बेहतर समन्वय से काम करना होगा।
अगर यह उत्सव सफल रहा तो दिल्ली ग्लोबल फिल्म हब बन सकती है। दुनिया भर के फिल्मकार यहाँ आना पसंद करेंगे। कहानियाँ बनेगी, सहयोग बढ़ेगा और दिल्ली एनसीआर की सिनेमाई पहचान मजबूत होगी।
एक सुनहरा अवसर
IFFD 2026 दिल्ली के लिए सिर्फ एक फिल्म उत्सव नहीं, बल्कि एक सपने की शुरुआत है। फिल्मी चमक, सांस्कृतिक आदान-प्रदान और पर्यटकों की भीड़ से राजधानी सिनेमाई धमाके का गवाह बनेगी।
गलतियाँ होंगी, लेकिन उनकी चर्चा इसलिए जरूरी है ताकि भविष्य में सुधार हो और यह उत्सव हर साल और भव्य रूप ले। दिल्ली को विश्व स्तर का फिल्म केंद्र बनाने का यह सुनहरा मौका है। इसे सही दिशा में ले जाना हम सबकी जिम्मेदारी है।
आयोजन 31 मार्च तक जारी रहेगा। आइए, दिल्ली वाले मिलकर इसे सफल बनाने में अपना योगदान दें। दिल्ली अब सिनेमा की नई राजधानी बनने की ओर बढ़ रही है।
ईरान युद्ध में फँसे ट्रंप अब अपने देश में भी घिरते नजर आ रहे हैं। उनकी नीतियों के खिलाफ अमेरिका के कई शहरों में जोरदार प्रदर्शन हो रहा है। प्रदर्शनकारियों ने इसे ‘नो किंग्स’ विरोध कहा है।
‘नो किंग्स’ का मतलब क्या है
अमेरिका में ‘नो किंग्स’ प्रदर्शन का यह तीसरा दौर है। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि वे राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नीतियों का विरोध कर रहे हैं। इन नीतियों में ईरान के साथ युद्ध, संघीय इमीग्रेशन कानून, फ्यूल की बढ़ती कीमत के साथ साथ देश में बढ़ रही महँगाई हैं।
“No Kings” protesters assembled to form a message reading “TRUMP MUST GO NOW!” at Ocean Beach in San Francisco, California today pic.twitter.com/4xq9PicSvh
प्रदर्शनकारियों का कहना है कि ट्रंप हम पर एक तानाशाह की तरह राज करना चाहते हैं, लेकिन यह अमेरिका है। यहाँ असली ताकत आम लोगों के हाथों में है, न कि उन लोगों के हाथों में जो खुद को राजा समझना चाहते हैं और न ही उनके अरबपति साथियों के हाथों में है।
अमेरिका के न्यूयॉर्क, वॉशिंगटन DC और लॉस एंजिल्स सहित हर बड़े शहर में ट्रंप विरोधी प्रदर्शन हुए हैं।
28 मार्च 2026 को राजधानी वॉशिंगटन DC के डाउनटाउन की सड़कों पर मार्च निकाला गया। प्रदर्शनकारियों ने लिंकन मेमोरियल की सीढ़ियों पर कतार लगा कर खड़े हुए और ट्रंप की नीतियों का विरोध किया।
राष्ट्रपति ट्रंप, जेडी वेंस समेत कई लोगों की गिरफ्तारी की माँग
प्रदर्शनकारियों ने ट्रंप, उपराष्ट्रपति जेडी वेंस समेत कई प्रशासनिक अधिकारियों के पुतले लहराए और उन्हें पद से हटाने के साथ-साथ गिरफ्तार करने की माँग की।
‘नो किंग्स’ विरोध प्रदर्शनों का असर सबसे ज्यादा मिनेसोटा में दिखा, जहाँ जनवरी में फेडरल इमिग्रेशन एजेंट्स ने रेनी निकोल गुड और एलेक्स प्रेटी नाम के दो अमेरिकी नागरिकों की हत्या कर दी थी। उनकी मौत से लोगों में भारी गुस्सा भड़का और ट्रंप प्रशासन की इमिग्रेशन नीतियों का पूरे देश में विरोध शुरू हुआ।
देश विदेश में हो रहे प्रदर्शनों को व्हाइट हाउस ने जनता की आवाज मानने से इनकार कर दिया। इनका कहना है कि यह वामपंथी फंडिंग का नेटवर्क है। व्हाइट हाउस के प्रवक्ता के मुताबिक, यह ‘ट्रंप डेरेजमेंट थेरेपी सेशंस’ (ट्रंप-विरोधी पागलपन के सत्र) है। उन्होंने कहा कि इन प्रदर्शनों की परवाह सिर्फ वे रिपोर्टर करते हैं, जिन्हें इन्हें कवर करने के लिए पैसे मिलते हैं।
ट्रंप की रेटिंग में आ रही गिरावट
अमेरिका में ट्रंप की लोकप्रियता और रेटिंग लगातार गिर रही है। हालाँकि कई सर्वे अलग अलग रेटिंग दे रहे हैं। जानकारों के मुताबिक, अमेरिका में एप्रूवल रेटिंग वैश्विक घटनाओं के लेकर घरेलू मुद्दों तक की वजह से होती है, जो हमेशा बदलती रहती है। हालाँकि अमेरिका में बढ़ती महँगाई, फ्यूल की कमी आम लोगों को काफी परेशान कर रही है। इसका असर रेटिंग पर पड़ा है।
सिल्वर बुलेट के मुताबिक, ट्रंप के दूसरे कार्यकाल का अभी सबसे खराब रेटिंग है। ईरान युद्ध , व्यापार, टैरिफ और इमिग्रेशन से लेकर महँगाई को लेकर जनता राष्ट्रपति ट्रंप से नाराज है।
रॉयटर्स या इप्सोस सर्वे के मुताबिक, अमेरिका में मात्र 37 फीसदी लोग ही युद्ध का समर्थन कर रहे हैं जबकि 59 फीसदी इसके खिलाफ हैं। खास बात है कि डेमोक्रेट और स्वतंत्र वोटर तो इसका विरोध कर ही रहे हैं। 5 में से 1 रिपब्लिकन भी युद्ध के विरोध में हैं। ईरान में अमेरिका सेना भेजने के खिलाफ जनता का मत है।
व्हाइट हाउस में फूट पड़ा
इस सब के बीच व्हाइट हाउस में ईरान युद्ध को लेकर सिरफुटव्वल है। जानकारी के अनुसार, डोनाल्ड ट्रंप की अपनी टीम में ही इस समय दो गुट बन गए हैं और दोनों के बीच जबरदस्त खींचतान चल रही है।
एक गुट उन लोगों का है जो देश की अर्थव्यवस्था और राजनीति को संभालते हैं। इनका कहना है कि अगर यह युद्ध और लंबा खिंचा, तो पेट्रोल की कीमतें आसमान छूने लगेंगी। उन्हें डर है कि अगर आम जनता को महँगा पेट्रोल खरीदना पड़ा, तो वे ट्रंप के खिलाफ हो जाएँगे और उनका समर्थन करना बंद कर देंगे। इसलिए, ये सलाहकार ट्रंप को समझा रहे हैं कि हमें अब युद्ध रोक देना चाहिए और दुनिया से कह देना चाहिए कि हमने अपना काम पूरा कर लिया है।
वहीं दूसरी तरफ, ट्रंप की टीम में कुछ ऐसे नेता भी हैं जो युद्ध को जारी रखने के पक्ष में हैं। उनका मानना है कि अगर अभी हमला रोक दिया गया, तो ईरान इसे अपनी जीत समझेगा और बहुत जल्द परमाणु बम बना लेगा। उन्हें डर है कि अधूरा छोड़ा गया काम आगे चलकर अमेरिकी सैनिकों के लिए और भी बड़ा खतरा बन सकता है। उनका तर्क है कि ईरान को अभी पूरी तरह कमजोर करना जरूरी है।
अब राष्ट्रपति ट्रंप इन दोनों गुटों के बीच बुरी तरह फँसे हुए हैं। वे एक तरफ अपने उन समर्थकों को खुश रखना चाहते हैं जिन्होंने उन्हें इसलिए वोट दिया था क्योंकि उन्होंने दावा किया था कि वे अमेरिका को किसी नई जंग में नहीं फँसाएँगे। लेकिन दूसरी तरफ, वे दुनिया को यह भी दिखाना चाहते हैं कि वे एक मजबूत नेता है और दुश्मनों को किसी भी कीमत पर नहीं छोड़ेंगे। इसी दुविधा की वजह से वे कोई एक ठोस फैसला नहीं ले पा रहे हैं।
ईरान युद्ध में फँसे ट्रंप
दरअसल ईरान को हल्के में लेकर राष्ट्रपति ट्रंप फँस गए हैं। उन्हें अंदाजा नहीं था कि ईरान इतने दिनों तक युद्ध खींचेगा। इतना ही नहीं वह हॉर्मुज स्ट्रेट को बंद कर देगा और अमेरिका उसे खुलवाने में नाटो से मदद माँगेगा। नाटो देश अमेरिका की मदद करने से इनकार कर देंगे। यह सब अमेरिका के लिए पहली बार हुआ है, जब ब्रिटेन, फ्राँस जैसा सहयोगी देश उसकी मदद से परहेज कर रहा है।
राष्ट्रपति ट्रंप ने 5 दिनों के लिए ईरानी पॉवर प्लांट पर आक्रमण नहीं करने की बात कही, लेकिन अब न तो इजरायल रुकने को तैयार है और न ही ईरान। राष्ट्रपति ट्रंप ने ईरान युद्ध में जीत के दावे भी कर दिए। इसके जवाब में ईरान क्लस्टर मिसाइल मार रहा है। होर्मुज स्ट्रेट को रोक रखा है। अब अमेरिका के लिए युद्ध से वापस निकलने का रास्ता दिख नहीं रहा। अगर अमेरिका जमीनी कार्रवाई करता है तो उसका विरोध अमेरिका के लोग और जोर-शोर से करेंगे। एयरस्ट्राइक से बात बन नहीं रही है। ईरान के बड़े बड़े नेताओं की मौत के बाद भी युद्ध की धार कमजोर नहीं पड़ रही है, अमेरिका के लिए यही चिंता का कारण है।
अनुसूचित जाति (Scheduled Castes/SC) के लोगों के धर्मांतरण को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण स्पष्टता स्थापित की है। इसके अनुसार हिंदू, बौद्ध और सिख ही SC हो सकते हैं।
दुर्भाग्य से ऐसी कोई स्पष्टता अनुसूचित जनजाति (Scheduled Tribes/ST) और अन्य पिछड़े वर्ग (OBC) को लेकर नहीं है। यह दुर्भाग्य केवल धर्मांतरण तक ही सीमित नहीं है। आरक्षण जैसी उस व्यवस्था को भी खोखला कर रही है जो कथित जातीय उत्पीड़न की शिकार हिंदुओं को संरक्षण देने के नाम पर लाई गई थी।
सुप्रीम कोर्ट ने जो कुछ कहा है उसका सीधा-सरल अर्थ यह है कि यदि शेड्यूल कास्ट का कोई व्यक्ति धर्म से बाहर जाता है तो उसे SC श्रेणी के लाभ मिलते नहीं रह सकते। ‘घर वापसी’ की स्थिति में भी वह कुछ शर्तों को पूरा करने के बाद ही इन लाभों का योग्य माना जाएगा।
अनुसूचित जाति के धर्मांतरित व्यक्ति को SC दर्जा फिर से पाने के लिए 3 शर्तें पूरी करनी होगी;
स्पष्ट साक्ष्य जो यह बताता हो कि वह व्यक्ति मूल रूप से संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950 के तहत अधिसूचित जाति से संबंधित था।
मूल धर्म में पुन: वापसी के विश्वसनीय और ठोस साक्ष्य देने होंगे। ईसाइयत या इस्लाम पूरी तरह छोड़ने का प्रमाण देना होगा। अपनी मूल जाति के रीति-रिवाज, परंपराओं और धार्मिक प्रथाओं को स्वीकार करना होगा।
साक्ष्य देना होगा कि उसे मूल जाति के लोग पूरी तरह स्वीकार कर चुके हैं। केवल स्वयं का दावा पर्याप्त नहीं होगा। जाति की स्वीकृति आवश्यक होगी।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा है कि ये तीनों शर्तें अनिवार्य है। इन्हें पूरी तरह प्रमाणित करने का दायित्व ‘घर वापसी’ करने वाले शेड्यूल कास्ट के उस व्यक्ति की ही होगी। यदि इनमें से एक भी शर्त प्रमाणित नहीं होती है तो ‘घर वापसी’ मान्य नहीं होगी।
यहीं से यह प्रश्न खड़ा होता है कि इतनी स्पष्ट शर्तें और मानदंड ST और OBC पर क्यों लागू नहीं होते? इस जवाब के अस्पष्ट उत्तर से ही ‘क्रिप्टो क्रिश्चियन (Crypto Christian)’ पैदा होते हैं। इस अस्पष्टता के कारण ही OBC सूची में मुस्लिम घुसपैठ बढ़ती जा रही है। इतना ही नहीं, धर्म से बाहर जाने के बाद भी ST और OBC दर्जे का बना रहना आरक्षण के आधार में भी विकृति पैदा करती है।
परतंत्र भारत में कोल्हापुर, त्रावणकोर और मैसूर जैसी रियासतों में आरक्षण की व्यवस्था इसी नाम पर लाई गई थी कि इसके जरिए हिंदुओं की कथित उत्पीड़ित जातियों को संरक्षण मिलेगा। वर्तमान में जो आरक्षण की व्यवस्था है, उसका महत्वपूर्ण आधार 1932 का ‘पूना पैक्ट’ है। यह समझौता गाँधी और अंबेडकर के बीच तत्कालीन ब्रिटिश प्रधानमंत्री रेमसे मैकडॉनल्ड की साजिश को रोकने के लिए हुआ था।
हिंदुओं को विभाजित करने के उद्देश्य से मैकडॉनल्ड ने दलितों को अलग संप्रदाय की पहचान और उनके लिए अलग निर्वाचक मंडल का प्रस्ताव दिया था। लेकिन ‘पूना पैक्ट’ से यह सुनिश्चित हुआ कि अलग निर्वाचन क्षेत्र की जगह आरक्षित सीटों का प्रावधान किया जाए।
यह भी ध्यान रखने योग्य है कि शुरुआत में SC की परिभाषा को केवल हिंदुओं तक ही सीमित रखा गया था। बाद में इसे सिख (1956) और बौद्ध (1990) तक विस्तारित किया गया। आज भी मुस्लिम और ईसाई बने दलितों को SC का दर्जा नहीं मिलता है। इसका आधार यह है कि SC आरक्षण ‘हिंदू सामाजिक संरचना में अस्पृश्यता’ से जुड़ा है।
ऐसे में ST और OBC वर्ग में ईसाइयों और मुस्लिमों की घुसपैठ ‘पूना पैक्ट’ की मूल आत्मा पर प्रहार है। इस घुसपैठ के समर्थकों का कहना है कि ST पहचान धर्म की जगह, जनजातीय, भौगोलिक और सांस्कृतिक विशेषताओं से जुड़ा हुआ है। OBC की पहचान को सामाजिक और शैक्षिक पिछड़ेपन पर आधारित बताया जाता है। 1979 के ‘मंडल कमीशन’ ने भी इसे ही अधार बनाया था।
पर यह आरक्षण की मूल भावना की ‘विकृत व्याख्या’ है और धर्म से बाहर जाने वालों के लिए दोहरे लाभ (धर्म बदलने की स्वतंत्रता+आरक्षण का लाभ) की स्थिति बनाती है। जब आरक्षण की व्यवस्था का मूल उद्देश्य हिंदू समाज के भीतर के कथित जातीय भेदभाव को खत्म करना है (आज भी इस व्यवस्था को इसी कथित आधार पर पोषित किया जा रहा है) तो फिर धर्मांतरण के बाद इस ढाँचे से बाहर जाने वाले को इसका लाभ क्यों मिलना चाहिए?
ऐसे में यह आवश्यक हो जाता है कि अदालतें और सरकारें SC वर्ग जैसी सुरक्षा, ST और OBC वर्ग के लोगों को भी प्रदान करें या फिर जाति के आधार पर आरक्षण की व्यवस्था बंद कर, उसकी जगह आरक्षण की ऐसी राष्ट्रीय नीति लाए, जिसका आधार आर्थिक और सामाजिक मानदंड ही हों। धर्म-मजहब-जाति की सीमाओं से परे।
यदि ऐसा नहीं होता है तो आरक्षण के जरिए ‘समावेशी सामाजिक न्याय’ का ढाँचा कभी खड़ा नहीं हो पाएगा। भले ही SC, ST और OBC के लिए अलग-अलग मानदंड, ऐतिहासिक रूप से विकसित हुए हैं, पर सत्य यही है कि आज वे अप्रासंगिक हो चुके हैं।
सामाजिक न्याय, धार्मिक स्वतंत्रता और समानता के सिद्धांतों के बीच संतुलन के मानदंड अब अलग-अलग नहीं चल सकते। उन्हें एक ही करने होंगे, क्योंकि आज के समाज में आरक्षण की बहस ‘पात्रता’ से आगे बढ़कर ‘दर्शन’ पर पहुँच चुकी है।
फॉक्स न्यूज की एक खोजी रिपोर्ट से पता चला है कि चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के प्यादे नेविल रॉय सिंघम ने अपने चीन-समर्थक सूचना और नैरेटिव लॉन्ड्रिंग नेटवर्क में लगभग $600 मिलियन यानी 5692 करोड़ रुपए का निवेश किया है, जो पाँच महाद्वीपों में फैला हुआ है। सिंघम कई ऐसे संगठनों को फंडिंग दे रहा है, जो भारत-विरोधी गतिविधियों में शामिल हैं।
सिंघम का नेटवर्क को ‘हाउस ऑफ सिंघम’ कहा जाता है। एक ‘सूचना लॉन्ड्रिंग’ या ‘नैरेटिव लॉन्ड्रिंग’ मशीनरी चला रहा है। यह मशीनरी कुछ खास मुद्दों को उठाती है और उसे प्रोपेगैंडा में बदल देती है। इसका मकसद अमेरिका, भारत और दूसरे बड़े लोकतंत्रिक देशों में फूट डालना है। वहीं दूसरी तरफ चीन की छवि को ‘साम्राज्यवाद’ और ‘फासीवाद’ से बाहर निकालना और दूसरों की मदद करने वाला ‘परोपकारी’ देश के रूप में प्रचार करना है।
नेविल रॉय सिंघम के नेतृत्व वाला यह चीन-समर्थक अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क एनजीओ, एक्टिविस्ट ग्रुपों, थिंक टैंक और मीडिया आउटलेट्स से मिलकर बना है, जो चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की प्रोपेगैंडा मशीनरी के तौर पर काम करते हैं। सिंघम के कई संगठन भारत में लगातार भारत-विरोधी और चीन-समर्थक नैरेटिव को बढ़ावा दे रहे हैं।
TriContinental:सिंघम फंडिंग करता है, प्रोपेगैंडा मशीनरी उसे फैलाती है।
TriContinental मैसाचुसेट्स स्थित एक मार्क्सवादी थिंक टैंक है। ‘पत्रकार’ विजय प्रसाद इसके संस्थापक हैं, इसे नेविल रॉय सिंघम से फंडिंग मिलती है। यह चीनी प्रोपेगैंडा को बढ़ावा देता है। नेविल रॉय सिंघम इस थिंक टैंक के अंतरराष्ट्रीय सलाहकार बोर्ड में शामिल हैं। इन पर अमेरिकी गैर-लाभकारी संगठनों का इस्तेमाल करके चीनी प्रोपेगैंडा को आगे बढ़ाने का आरोप है। वह Left Word Books के संपादक और Globetrotter के मुख्य संवाददाता भी हैं।
TriContinental अपने लेखों और न्यूजलेटर्स के जरिए लगातार चीन-समर्थक और भारत-विरोधी बातें फैला रहा है। ईरान और अमेरिका-इजरायल के संयुक्त मोर्चे के बीच चल रहे युद्ध के दौरान TriContinental ने मोदी सरकार की विदेश नीति की आलोचना की। उसने हिंद महासागर में ईरानी युद्धपोत IRIS Dena के डूबने के बाद भारत की कथित चुप्पी को ‘खुद की कराई बेइज्जती’ बताया। अर्थशास्त्री बोडापति सृजना ने एक लेख में PM मोदी की इजरायल यात्रा पर भी खूब हंगामा मचाया।
TriContinental ने हिंद महासागर में IRIS Dena के डूबने को भारत की ‘नाकामी’ के तौर पर पेश किया। उसने कहा कि भारत उस ईरानी युद्धपोत की रक्षा नहीं कर पाया, जिसने भारत के मिलन 2026 नौसैनिक अभ्यास में हिस्सा लिया था। यह चौंकाने वाली गलतबयानी तब की गई, जब वह जहाज गाले से लगभग 20 नॉटिकल मील पश्चिम में, श्रीलंका की ज़िम्मेदारी वाले SAR क्षेत्र में जा चुका था।
अमेरिका ने जब हमला किया, तो वह भारत के समुद्री क्षेत्र के आस-पास भी नहीं था। भारत ने IRIS Dena को पनाह देने की पेशकश भी की थी। सिर्फ इसलिए कि IRIS Dena ने एक भारतीय नौसैनिक अभ्यास में हिस्सा लिया था, भारतीय नौसेना की यह कोई ज़िम्मेदारी नहीं थी कि वह उस ईरानी युद्धपोत को उसके घर तक सुरक्षित पहुँचाए। भारत सिर्फ मानवीय आधार पर खोज और बचाव में मदद कर सकता था, जो भारतीय नौसेना पहले से ही कर रही थी।
इस संगठन की वेबसाइट चीनी कम्युनिस्ट इतिहास और तकनीकी विकास की तारीफ करने वाले लेखों से भरी पड़ी है। इससे ऐसा लगता है कि कम्युनिस्ट शासन के तहत चीन एक ऐसी ‘आदर्श देश’ है, जिसकी नकल बाकी दुनिया को भी करनी चाहिए।
TriContinental को जनवरी 1966 में क्यूबा में हुई Tricontinental Conference से प्रेरणा मिलती है। इससे ‘राष्ट्रीय मुक्ति मार्क्सवाद’ का जन्म हुआ था। एक अंतर-क्षेत्रीय कार्यालय के अलावा TriContinental के ऑफिस अर्जेंटीना, ब्राज़ील, भारत और दक्षिण अफ्रीका में भी हैं। कार्ल मार्क्स और उनके विचार ही इस संगठन की प्रेरणा हैं।
साल 2024 में TriContinental ने कुल $857,945 का राजस्व दर्ज किया, जबकि इसका खर्च लगभग $3,745,069 रहा। इसके कोषाध्यक्ष विजय प्रशांत हैं।
चीन समर्थक ‘पीपल्स डिस्पैच’ भारत विरोधी प्रोपेगैंडा फैला रहा है
नेविल रॉय सिंघम ने चीन समर्थक और भारत विरोधी प्रोपेगैंडा फैलाने वाले कई अलग-अलग माध्यमों में लाखों डॉलर लगाए हैं। इनमें ‘पीपल्स डिस्पैच’ भी शामिल है। यहाँ विजय प्रसाद ने कई लेख लिखे हैं। ‘पीपल्स डिस्पैच’ एक मीडिया पोर्टल है, जो खुद को एक ‘अंतरराष्ट्रीय मीडिया प्रोजेक्ट’ बताता है। इसका मकसद ‘पूरी दुनिया में लोगों के आंदोलनों और संगठनों की आवाज को दुनिया के सामने लाना’ है। जनवरी 2020 के एक लेख में, प्रसाद ने JNU के प्रदर्शनकारियों के प्रति सहानुभूति जताई थी और मोदी सरकार की कड़ी आलोचना की थी।
जून 2025 में ‘पीपल्स डिस्पैच’ ने एक लेख प्रकाशित किया, जिसमें भारत की विदेश नीति को ‘शर्मनाक’ करार दिया गया। भारत ने गाजा में तत्काल युद्धविराम की माँग करने वाले स्पेन के UN प्रस्ताव पर वोटिंग से खुद को अलग कर लिया था। इसको लेकर लेख लिखा गया, जिसमें मार्क्सवादी प्रोपेगैंडा लेखक डॉ. जोसेफिन वर्गीस और वर्गी पराक्कल ने भारत की आलोचना की। उनलोगों ने फिलिस्तीन और इजरायल के प्रति भारत की नीति में आए इस कथित बदलाव का कारण तथाकथित ‘हिंदुत्व-जायोनी’ गठबंधन को बताया था।
भारत-विरोधी और हिंदू-विरोधी प्रोपेगैंडा के अलावा ‘पीपल्स डिस्पैच’ फर्जी खबरें भी फैलाता है। फरवरी 2026 में मार्क्सवादी प्रोपेगैंडा आउटलेट ने एक लेख प्रकाशित किया था। इसका शीर्षक था- ‘भारत में एक ऐतिहासिक राष्ट्रीय हड़ताल में 30 करोड़ लोग सड़कों पर’। इसमें दावा किया गया था कि करोड़ों लोग नए श्रम कानूनों और अमेरिका-भारत व्यापार समझौते के विरोध में सड़कों पर उतरे थे।
हालाँकि आंदोलन हुआ था, लेकिन ’30 करोड़’ लोगों के शामिल होने का दावा बिल्कुल गलत है। इसे वाम-उदारवादी गुट ने भी खूब प्रचारित किया था। इस तरह के बढ़ा-चढ़ाकर बताए गए आँकड़ों को अक्सर अराजकता फैलाने वाले ग्रुप, वैचारिक संकट के रूप में प्रचार प्रसार करते हैं। भारत की आबादी 140 करोड़ से भी ज्यादा है। इतने बड़े देश में, बड़े-बड़े जन-आंदोलन भी बिना पूरे देश को ठप किए हो सकते हैं।
हर विरोध प्रदर्शन को ‘अभूतपूर्व’ कहना या उसे व्यवस्था के ढहने का सबूत बताना, लोगों को गुमराह करना है। छिटपुट कुछ विरोध प्रदर्शनों के बावजूद ज्यादातर राज्यों में सामान्य जनजीवन पर कोई असर नहीं पड़ा था।
‘पीपल्स डिस्पैच’ ने कई मौकों पर हिंदुओं के प्रति अपनी खुली अवमानना दिखाई है। यह प्रोपेगैंडा आउटलेट नरेंद्र दाभोलकर, गौरी लंकेश, गोविंद पानसरे, कलबुर्गी और अन्य जैसे कट्टर वामपंथियों के प्रति सहानुभूति भी रखता है और उनका महिमामंडन भी करता है।
पीपुल्स डिस्पैच ने भारत और इजरायल के रिश्तों पर भी जमकर अपनी भड़ास निकाली थी।
‘द डिस्पैच’ इजराइल को ‘नरसंहार करने वाला’ बताकर उसे खलनायक के रूप में पेश करता रहा है, लेकिन हमास ने 7 अक्टूबर को इजरायल में नरसंहार किया, उसकी कभी भी खुलकर निंदा नहीं करता। इतना ही नहीं हैदराबाद में अडानी और एल्बिट के ड्रोन निर्माण से जुड़े संयुक्त उद्यम, टाटा के ‘प्रोजेक्ट निम्बस’ सिस्टम और इजरायल में रिलायंस जियो की साझेदारियों से बने उपक्रम को फिलिस्तीनियों के ‘नरसंहार’ से जोड़ कर भारतीय कंपनियों को बदनाश करने की कोशिश करता है।
यह प्रोपेगैंडा लेख विजय प्रसाद और सुधनवा देशपांडे के नाम से लिखा गया था। इसमें अडानी-एल्बिट डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग वेंचर के बारे में सरासर झूठ फैलाया गया था। हालाँकि यह सच था कि इजरायल ने गाजा में अपने ऑपरेशन्स में हेमर्स 900 ड्रोन का इस्तेमाल किया था, लेकिन इस बात का कोई सबूत नहीं है कि भारत ने ईरान के खिलाफ इस्तेमाल के लिए इजराइल को हेमर्स 900 ड्रोन या कोई मिसाइल एक्सपोर्ट की है। यह पूरा दावा कि हैदराबाद में अडानी-एल्बिट डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग यूनिट ईरान के खिलाफ इजरायल के युद्ध के लिए ड्रोन बना रही है, पूरी तरह से एक प्रोपेगैंडा है।
ज्यादातर इस्लामो-वामपंथी प्रोपेगैंडा पोर्टल की तरह पीपुल्स डिस्पैच ने 2020 के हिंदू-विरोधी दिल्ली दंगों को दबे-कुचले, पीड़ित मुस्लिम ‘अल्पसंख्यकों’ के खिलाफ ‘हिंदुत्व’ हिंसा के रूप में पेश करता है। जबकि, यह हिंदुओं के खिलाफ एक पहले से सोची-समझी इस्लामी साजिश थी।
यह उमर खालिद, खालिद सैफी, शरजील इमाम और गुलफिशा फातिमा जैसे इस्लामी कट्टरपंथियों को भी ‘पीड़ित’ के रूप में दिखाता है, जिन पर CAA-विरोधी प्रदर्शनों की आड़ में दंगों की साजिश रचने और उन्हें भड़काने का आरोप है।
एक लेख में पीपुल्स डिस्पैच दंगों के आरोपी मास्टरमाइंड उमर खालिद की सुनवाई में हो रही देरी पर अफसोस जताता है और इसका दोष अदालतों द्वारा बेल की सुनवाई टालने को देता है।
इस्लामी-वामपंथी प्रोपेगैंडा गुट द्वारा फैलाए जा रहे ‘पीड़ित होने’ के नैरेटिव के विपरीत, उमर खालिद का इतने लंबे समय तक जेल में रहना उसी के अपने किए का नतीजा है। OpIndia ने पहले भी रिपोर्ट किया है कि 2023 और 2024 में हुई 14 सुनवाइयों में से, 7 बार सुनवाई में देरी या उसे टालने की गुजारिश खुद उमर खालिद ने ही की थी। इससे साफ हो जाता है कि बेल याचिका वापस लेने की वजह निश्चित रूप से सुनवाई में होने वाली तथाकथित ‘देरी’ नहीं थी। जहाँ एक ओर इस्लामी-वामपंथी इकोसिस्टम लगातार ‘अन्याय’ का रोना रो रहा है, वहीं दूसरी ओर आरोपी के वकील ‘फोरम शॉपिंग’ यानी अपनी पसंद की अदालत या जज चुनने में लगे रहे। इसमें हो रही देरी की वजह से खालिद इतने लंबे समय से जेल में सड़ रहा है।
OpIndia के इस विश्लेषण की पुष्टि पूर्व मुख्य न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़ के उस बयान से भी होती है, जिसमें उन्होंने कहा था कि असली समस्या कुछ वकीलों और राजनीतिक समूहों की मानसिकता में है, जो चाहते हैं कि उनके मामलों की सुनवाई केवल कुछ खास जजों द्वारा ही की जाए। OpIndia द्वारा कई बार रिपोर्ट की गई बात को दोहराते हुए पूर्व CJI ने कहा कि अदालत के रिकॉर्ड से पता चलता है कि सिब्बल के नेतृत्व वाली खालिद की कानूनी टीम ने फरवरी 2024 में ज़मानत याचिका को वापस लेने से पहले, कम से कम सात बार सुनवाई टालने की गुजारिश की थी।इसके बाद याचिका वापस लेते समय ‘परिस्थितियों में बदलाव’ का हवाला दिया था।
NewsClick नेविल रॉय सिंघम की फंडिंग से चलने वाला मीडिया आउटलेट, चीन-समर्थक प्रोपेगैंडा फैलाने के कारण लगातार निगरानी में रहा
नेविल रॉय सिंघम के ‘जस्टिस एंड एजुकेशन फंड’ ने दिल्ली स्थित चीन-समर्थक प्रोपेगैंडा आउटलेट न्यूजक्लिक को 10.5 मिलियन डॉलर का दान दिया था। विजय प्रसाद ने न्यूजक्लिक के लिए कई प्रोपेगैंडा लेख लिखे हैं। सीपीएम नेता वृंदा करात के भतीजे विजय प्रसाद हैं। वृंदा करात पूर्व सीपीएम ने जेनरल सेक्रेटरी प्रकाश करात की पत्नी हैं। न्यूजक्लिक को चीनी फंडिंग मिलने से जुड़े घोटाले के दौरान वृंदा करात और नेविल रॉय सिंघम के बीच हुए ईमेल आदान-प्रदान से उनके बीच के गहरे संबंधों का खुलासा पहले ही हो चुका है।
न्यूजक्लिक पहली बार तब सुर्खियों में आया, जब 2021 में यह प्रवर्तन निदेशालय की नजर उस पर पड़ी। खबरों के मुताबिक, इस पोर्टल पर धोखाधड़ी से करीब 38 करोड़ रुपए का विदेशी फंड लेने का आरोप लगा था। जब 2023 में न्यूयॉर्क टाइम्स की एक खोजी रिपोर्ट में सिंघम के नेटवर्क को कथित तौर पर चीन से मिलने वाली फंडिंग और उसके प्रोपेगैंडा का खुलासा हुआ, तो विजय प्रसाद ने इसे बकवास करार दिया।
विजय प्रसाद ‘प्रोग्रेसिव इंटरनेशनल’ के काउंसिल सदस्य भी रहे हैं। यह एक अंतरराष्ट्रीय संगठन है जो दुनिया भर में वामपंथी कार्यकर्ताओं और समूहों को लामबंद करता है। OpIndia ने पहले ही इस बात को उजागर किया था कि कैसे यह संगठन लगातार ऐसे प्रोपेगैंडा लेख और बयान प्रकाशित करता है, जो मोदी सरकार को बदनाम करने के लिए मुसलमानों को पीड़ित दिखाने वाले खतरनाक नैरेटिव को बढ़ावा देते हैं। प्रोग्रेसिव इंटरनेशनल अपने मंच पर भारत-विरोधी, खासकर हिंदू-विरोधी प्रोपेगैंडा वाले दर्जनों लेखों को जगह देता है। ये लेख हर्ष मंदर जैसे कुख्यात हिंदू-विरोधी और इस्लामी आतंकवाद के पैरोकारों द्वारा लिखे जाते हैं। प्रोग्रेसिव इंटरनेशनल की काउंसिल में जयति घोष और लेबर पार्टी के पूर्व सांसद जेरेमी कॉर्बिन जैसे इस्लामी-वामपंथी समर्थक भी शामिल हैं।
प्रोग्रेसिव इंटरनेशनल का ‘टाइड्स फाउंडेशन’ से भी जुड़ाव है। इस संगठन का एक सदस्य ‘अरब रिसोर्स एंड ऑर्गनाइजिंग सेंटर’ (AROC) है। यह हमास का समर्थन करता है और जिसे टाइड्स फाउंडेशन से फंडिंग मिलती है। टाइड्स फाउंडेशन का न्यूजक्लिक से भी सीधा रिश्ता सामने आया है।
टाइड्स फाउंडेशन कई हिंदू-विरोधी और भारत-विरोधी संगठनों को फंडिंग करता है। इस फाउंडेशन ने ‘हिंदूज़ फॉर ह्यूमन राइट्स’ (HfHR) को भी फंड दी है। इस संगठन के तार इस्लामी कट्टरपंथियों और खालिस्तानियों से जुड़े हैं। HfHR की स्थापना 2019 में दो इस्लामी कट्टरपंथी समूह ‘इंडियन अमेरिकन मुस्लिम काउंसिल’ (IAMC) और ‘ऑर्गनाइजेशन फॉर माइनॉरिटीज ऑफ इंडिया’ (OFMI) ने मिलकर की थी।
टाइड्स फाउंडेशन ने ‘अमन पब्लिक चैरिटेबल ट्रस्ट’ (AMAN) को भी फंडिंग दी थी। इस ट्रस्ट का संबंध न्यूजक्लिक-चीन फंडिंग घोटाले से है। इस घोटाले में आरोप है कि चीनी संस्थाओं ने भारत की संप्रभुता को नुकसान पहुँचाने के मकसद से न्यूजक्लिक को फंडिंग की थी।
नेविल रॉय सिंघम ने अपनी बड़ी टीम में जिन भारतीयों को शामिल किया था और जिन्होंने ‘ट्राइकंटिनेंटल’ (Tricontinental) जैसे गैर-लाभकारी संगठनों के साथ काम किया था, उनके बारे में न्यूयॉर्क टाइम्स ने कहा था कि वे चीन के एजेंडे को आगे बढ़ाने में शामिल थे। इनमें प्रबीर पुरकायस्थ, सृजना, प्रशांत और विजय प्रसाद प्रमुख थे। प्रसाद के अर्बन नक्सल पी. साईनाथ से भी गहरे संबंध हैं। साईनाथ के प्रोपेगैंडा पोर्टल PARI ने हाल ही में सिंघम के साथ संबंधों का खुलासा होने के बाद, सिंघम से जुड़े सभी संदर्भ हटा दिए थे।
न्यूजक्लिक का हिंदू-विरोधी रवैया किसी से छिपा नहीं है। इसके अलावा न्यूजक्लिक पर चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के साथ कथित संबंधों को लेकर भी जाँच चल रही है। 2023 में द न्यूयॉर्क टाइम्स की एक जाँच में एक्टिविस्ट संगठनों, गैर-लाभकारी संस्थाओं और शेल कंपनियों का एक ऐसा नेटवर्क सामने आया, जिनके चीन और चीनी प्रोपेगैंडा के साथ गहरे संबंध थे।
इस पूरे नेटवर्क की कमान नेविल रॉय सिंगहम के हाथों में थी। 2024 में दिल्ली पुलिस द्वारा दायर चार्जशीट में चीनी सरकार को ‘अंतिम वित्तपोषक’ (ultimate paymaster) बताया गया था। चार्जशीट के अनुसार, भारत-विरोधी नैरेटिव को बढ़ावा देने के लिए इन संगठनों को फंड भेजा गया था। खासकर कश्मीर और किसानों के विरोध प्रदर्शनों के दौरान फंडिंग का पता चला था। यह मामला अभी भी अदालत में विचाराधीन है।
2021 में OpIndia ने न्यूजक्लिक के लिंक्स की डिटेल में जाँच की और पता लगाया कि यह कैसे कई ऐसे लोगों से जुड़ा था, जो नियमित रूप से भारत के खिलाफ जहर उगलते हैं। अर्बन नक्सल से लेकर तीस्ता सीतलवाड़, अभिसार शर्मा और कई दूसरे लोग। OpIndia की वह जाँच यहाँ पढ़ी जा सकती है।
‘पीपुल्स फोरम’ में कश्मीर अलगाववाद, हिंदू विरोधी बातें और केरल के ‘कम्युनिस्ट’ मॉडल का जुनून था
फॉक्स न्यूज की रिपोर्ट ने पब्लिक में मौजूद रिकॉर्ड के जरिए हाउस ऑफ सिंघम के फाइनेंशियल ट्रांजैक्शन फ्लो का एनालिसिस किया और पाया कि ‘पीपल्स फोरम’ को नेविल रॉय सिंघम से $22.4 मिलियन यानी 212.49 करोड़ रुपए दिए थे।
GS डोनर्स एडवाइज़्ड फिलैंथ्रॉपी फंड फॉर वेल्थ मैनेजमेंट इंक और दो शेल कंपनियों के माध्यम से सिंघम ने कथित तौर पर छह नॉन-प्रॉफिट्स में $278 मिलियन यानी 2637 करोड़ रुपए से अधिक डाले, जिनमें से एक पीपल्स फोरम भी है।
अक्टूबर 2023 से अमेरिका में इजरायल-विरोधी प्रदर्शनों को भड़काने वाले मुख्य संगठनों में से एक पीपल्स फोरम रहा है। कोडपिंक की सह-संस्थापक और नेविल रॉय सिंघम की पत्नी जोडी इवांस ने 2017 और 2022 के बीच इस संगठन को $20.4 मिलियन यानी 24 करोड़ से ज़्यादा का दान दिया। हालाँकि, पीपल्स फोरम की प्रोपेगैंडा फैलाने वाली गतिविधियाँ सिर्फ अमेरिका तक ही सीमित नहीं हैं, बल्कि ये भारत तक फैली हुई हैं। यह संगठन 2019 से ही भारत-विरोधी नैरेटिव को बढ़ावा दे रहा है।
पिछले कुछ सालों में ‘द पीपल्स फोरम’ अपने वैश्विक दर्शकों के बीच जम्मू और कश्मीर की एक गलत तस्वीर पेश करने के लिए सेमिनार और फिल्म स्क्रीनिंग करता रहा है।
इससे पहले चीन-समर्थक प्रोपेगैंडा संगठन ने जम्मू और कश्मीर के अभिन्न अंग को भारत से अलग करने की माँग की थी और ‘आज़ादी’ की माँग करने वाले चरमपंथियों को अपना समर्थन दिया था। 18 मार्च 2019 को इस संगठन ने 1 घंटे 50 मिनट का एक सेशन आयोजित किया, जिसमें भारत को जम्मू और कश्मीर में एक ‘कब्जा करने वाली’ ताकत के तौर पर पेश किया गया। यह फोरम भारतीय क्षेत्र के इस अभिन्न अंग को ‘भारत के कब्जे वाला’ इलाका बताता है। असल में जम्मू और कश्मीर का एकमात्र हिस्सा जिस पर गैर-कानूनी कब्जा है। वह है पीओके यानी पाकिस्तान के कब्जे वाला जम्मू और कश्मीर।
इस संगठन का एक इतिहास यह भी रहा है कि यह भारत से नफरत करने वाले कट्टर लोगों और पाकिस्तान की ISI से जुड़े तत्वों को मंच देता रहा है, ताकि भारत-विरोधी नैरेटिव को बढ़ावा दिया जा सके। ऐसा ही एक महिला हैं हफ्सा कंजवाल। उसने ‘द वॉशिंगटन पोस्ट’ में लिखे एक लेख में पुलवामा आतंकी हमले की गंभीरता को कम करके दिखाने की कोशिश की थी।
2019 में कंजवाल पीपल्स फोरम द्वारा आयोजित एक सेमिनार में एक प्रशिक्षक के तौर पर शामिल हुई थीं। कंजवाल ने अपने संगठन ‘स्टैंड विद कश्मीर’ के जरिए ISI के एजेंट गुलाम नबी फई के साथ करीबी रिश्ते बनाए रखे हैं। वह एक कॉलेज में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं और ‘द पीपल्स फोरम’ के कई कार्यक्रमों में शामिल होती रही हैं।
14 सितंबर 2019 को नेविल रॉय सिंघम से पैसा पाने वाले एक संगठन ने एक कार्यक्रम आयोजित किया। इसका नाम ‘कश्मीर में आत्मनिर्णय और एकजुटता’ रखा गया था। भारत-विरोधी इस कार्यक्रम को ‘कोडपिंक’ जैसे संगठनों ने स्पॉन्सर किया था, जिसकी स्थापना नेविल रॉय सिंघम की पत्नी, जोडी इवांस ने की थी।
यह सेशन कश्मीरी और फिलिस्तीन आंदोलनों को एकजुटता करने पर केंद्रित था। इसमें कश्मीर के आत्मनिर्णय के अधिकार का समर्थन करते हुए इसके इतिहास को बताया गया। भारत और इजरायल के संबंधों का विश्लेषण किया गया, साथ ही फिलिस्तीनी और कश्मीरी एकजुटता पर जोर दिया गया।
मार्च 2023 में हफ्सा कंजवाल को उनकी किताब ‘Hostile Homelands: The New Alliance between India and Israel’ के प्रचार के लिए द पीपुल्स फोरम ने मंच दिया।
पीपल्स फोरम ने भारतीय राज्य जम्मू और कश्मीर पर बनी उनकी प्रोपेगैंडा फ़िल्म,‘आउट ऑफ साइट’ का भी प्रचार किया।
2019 के लोकसभा चुनावों से पहले, ‘द पीपल्स फोरम’ ने कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़े ‘स्टूडेंट फेडरेशन ऑफ इंडिया’ (SFI) के नेता वी. श्रीनिवास राव के साथ मिलकर एक सेमिनार आयोजित किया।
इस कार्यक्रम का शीर्षक था ‘जमीन को गर्व महसूस कराएं: भारत के किसान संघर्ष और 2019 के चुनाव’। इसका मकसद मोदी सरकार के प्रति किसानों में बढ़ रहे असंतोष का फायदा उठाना और चुनावों के नतीजों पर असर डालना था।
सेमिनार के विवरण से ही इस भारत-विरोधी संगठन का नापाक एजेंडा जाहिर हो गया था
इसमें कहा गया, “इस साल (2019) की शुरुआत में, भारत में 16 करोड़ से ज्यादा किसानों और मजदूरों ने हड़ताल की। पिछले कुछ सालों में भारत में किसान संघर्षों में जबरदस्त तेजी देखी गई, क्योंकि मोदी के शासन में भारतीय राजनीति ‘अति-दक्षिणपंथ’ की ओर झुक गई है। यह दुनिया की सबसे बड़ी आम हड़तालों में से एक थी।
लगभग तीन दशकों की नव-उदारवादी नीतियों और अपने अधिकारों पर हो रहे हमलों से थक-हारकर मजदूर सड़कों पर उतर आए। वे बेहतर आजीविका और कार्यस्थल पर लोकतंत्र की अपनी माँगों को लेकर आवाज उठा रहे थे। भारत सरकार की नीतियों के कारण, कृषि संकट बहुत गहरा गया है। मोदी सरकार के दौरान हर साल औसतन 12000 किसानों ने आत्महत्या की है।”
इसमें कोई हैरानी की बात नहीं है कि नेविल रॉय सिंघम द्वारा वित्तपोषित यह चीन-समर्थक और कम्युनिस्ट-समर्थक प्रचार संगठन ने ‘केरल मॉडल’ से जुड़ी ‘अच्छाईयों’ को फैलाता रहा है।
अप्रैल 2020 में आयोजित एक कार्यक्रम में, ‘द पीपल्स फोरम’ ने यह दावा किया, “जहाँ एक ओर भारत के प्रधानमंत्री मोदी दुनिया भर के नव-उदारवादी ‘कट्टर नेताओं’ की मिसाल पर चलते हुए, महामारी से लोगों की जान बचाने में नाकाम रहे हैं और संकट की गंभीरता को कम करके आँक रहे हैं, वहीं दूसरी ओर केरल एक बिल्कुल अलग मिसाल पेश करता है।”
इसमें कहा गया, “वामपंथी और कम्युनिस्ट पार्टियों के गठबंधन के नेतृत्व वाला केरल राज्य, अपने लोगों की भलाई के लिए सफल टेस्टिंग, संक्रमण की रोकथाम और ‘सामाजिककृत देखभाल’ के मामले में एक नया मानक स्थापित किया है। केरल में यह सब कैसे संभव हो पाया? और हम इस अनुभव से क्या सीख सकते हैं? इस चर्चा में शामिल होने के लिए शोधकर्ता सुबिन डेनिस और पत्रकार प्रशांत आर. के साथ जुड़ें।”
अक्टूबर 2019 में, नेविल रॉय सिंघम द्वारा वित्तपोषित संगठन ने राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी पर एक सेमिनार आयोजित किया और ‘हिंदुत्व’ की निंदा करने की आड़ में हिंदू धर्म पर हमला बोला।
“गाँधी, जो स्वयं एक हिंदू थे, प्रेम को एक बुनियादी मानवीय भावना और आचरण मानते थे और सभी मनुष्यों तथा समस्त सृष्टि के प्रति इस प्रेम को अपने सभी विश्वासों, सिद्धांतों और व्यवहारों में पिरोने में सफल रहे। गाँधी का हिंदू धर्म न तो संकीर्ण था और न ही किसी को बाहर करने वाला और न ही वह किसी ‘अन्य’ की पहचान करता था। गाँधी के हिंदू धर्म और आज के ‘हिंदुत्व’ के बीच अंतर करना अत्यंत आवश्यक है।”
इस्लामी-वामपंथियों के लिए हिंदुत्व शब्द का इस्तेमाल करके हिंदू धर्म पर हमला करना एक आसान तरीका बन गया है। खास बात यह है कि कार्यक्रम को ‘हिंदूज़ फ़ॉर ह्यूमन राइट्स’ (HfHR) ने भी मिलकर प्रायोजित किया था।
इससे पहले, HfHR को ‘डिसमैंटलिंग ग्लोबल हिंदुत्व’ नाम के हिंदू-विरोधी कार्यक्रम का भी समर्थन करते देखा गया था। OSINT हैंडल ‘Disinfo Lab’ के अनुसार, HfHR का गठन साल 2019 में ‘इंडियन अमेरिकन मुस्लिम काउंसिल’ (IAMC) और ‘ऑर्गेनाइजेशन फॉर माइनॉरिटीज ऑफ इंडिया’ (OFMI) ने मिलकर किया था।
‘हिंदूज फॉर ह्यूमन राइट्स’ की सह-संस्थापक सुनीता विश्वनाथ ने भी साल 2019 में ‘नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजन’ (NRC) को लेकर भारतीय मुसलमानों के बीच डर और अफरा-तफरी फैलाने की कोशिश की थी।
उन्होंने दावा किया, “हम कश्मीर के लोगों के हालिया बुरे अनुभव से और भारत के उन 19 लाख लोगों की स्थिति से खास तौर पर बहुत दुखी हैं, जो ‘नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजन’ जैसी बेतुकी चीज को थोपे जाने की वजह से बेघर हो गए हैं।”
सुनीता विश्वनाथ ‘Women for Afghan Women’ नाम के एक संगठन की सह-संस्थापक भी हैं, जिसे जॉर्ज सोरोस के Open Society Foundations (OSF)/ Open Society Institute (OSI) से फंडिंग मिलती है। अक्टूबर 2023 में, भारत में HfHr के एक्स (पहले Twitter) अकाउंट को रोक दिया गया था।
अपने Open Society Foundation के जरिए जॉर्ज सोरोस ने भारत में अशांति फैलाने की पूरी कोशिश की है। सोरोस से जुड़े संगठन भारतीय लोकतंत्र को कमजोर करने के लिए भारत-विरोधी तत्वों को समर्थन देते हैं और यह सब वे इसे ‘मजबूत’ करने के नाम पर करते हैं।
2023 में, विश्वनाथ ने Stanford University के National Press Club में एक कार्यक्रम में हिस्सा लिया, जहाँ कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी भी मौजूद थे।
सुनीता विश्वनाथ ने NYC मेयर चुनाव प्रचार के दौरान जोहरान ममदानी का समर्थन किया था। ममदानी एक डेमोक्रेट सोशलिस्ट, लगातार झूठ बोलने वाला और हिंदू-विरोधी व्यक्ति है। ममदानी ने एक बार हिंदुओं को ‘हरामी’ कहा था। उसने 2002 के गुजरात दंगों के बारे में खुलेआम झूठ फैलाया और गुजरात के मुसलमानों के काल्पनिक रूप से मिटाए जाने का दावा किया। उसे CAIR और IAMC जैसे भारत-विरोधी इस्लामी संगठनों से आर्थिक समर्थन मिला।
विश्वनाथ के संगठन HfHR की स्थापना वर्ष 2019 में दो इस्लामी समर्थक समूहों द्वारा की गई थी, जिनके नाम Indian American Muslim Council (IAMC) और Organisation for Minorities of India (OFMI) हैं।
दिलचस्प बात यह है कि नेविल रॉय सिंघम की बहन शांति सिंघम ने ‘New Yorkers for Lower Cost’ नाम की Parliamentary Action Committee (PAC) में आर्थिक योगदान दिया था। इस PAC ने पिछले New York City मेयर चुनावों के दौरान डेमोक्रेटिक सोशलिस्ट जोहरान ममदानी का समर्थन किया था। शांति सिंघम ने जून 2025 में लगभग $1,000 का योगदान दिया, जबकि उनके पति, डैनियल गुडविन ने $3,500 दान किए। गुडविन पहले नेविल रॉय सिंघम के स्वामित्व वाली Thoughtworks सॉफ्टवेयर कंपनी में एग्जीक्यूटिव के तौर पर काम कर चुके हैं।
शांति मैरी सिंघम शंघाई में CCP से जुड़े East China Normal University में एक अहम पद पर हैं। वह अपने भाई की राजनीतिक विचारधारा को मानती हैं और बताया जाता है कि इस विचारधारा को आगे बढ़ाने में उनकी अहम भूमिका है। नेविल रॉय सिंघम ने CCP की मदद से जो नेटवर्क तैयार किया है, वह एक मार्क्सवादी-माओवादी अंतरराष्ट्रीय तंत्र है।
इसे प्रतिद्वंद्वी देशों को कमजोर करने, नीतिगत निर्णयों को प्रभावित करने और भू-राजनीतिक बढ़त हासिल करने के उद्देश्य से, विभिन्न मुद्दों, गैर-लाभकारी कानूनों, डिजिटल मीडिया के माध्यम से एक हथियार के तौर पर इस्तेमाल करने के लिए डिजाइन किया गया है। यह आधुनिक विध्वंस का ही एक रूप है। स्याही और रक्त—दोनों से पोषित, यह एक सूक्ष्म, परिष्कृत और प्रभावी गठजोड़ है। इसके जरिए यह सुनिश्चित किया जाता है कि दुश्मन देश को CCP द्वारा पाली-पोसी गई दीमक ही भीतर से चाट जाएँ।
(मूल रूप से यह लेख अंग्रेजी में लिखा गया है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)
आठ वर्षों के अथक प्रयास और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की नियमित निगरानी से नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट सपने से हकीकत में तब्दील हो गया है। मार्च 2026 में एयरोड्रम लाइसेंस मिलने और शनिवार (28 मार्च 2026) को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा फेज-1 के लोकार्पण के बाद यह एयरपोर्ट पूरी तरह संचालन के लिए तैयार है। उत्तर प्रदेश को वैश्विक एविएशन हब बनाने की दिशा में मुख्यमंत्री योगी के विजन का यह सबसे बड़ा मील का पत्थर साबित होगा।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इस मेगा प्रोजेक्ट को शुरू से ही अपनी प्राथमिकता दी। उनके कुशल नेतृत्व और समयबद्ध फैसलों की वजह से 2017 में शुरू हुआ सपना 2026 में पूरा हो गया। सीएम योगी ने हर कदम पर विभागों के बीच समन्वय सुनिश्चित किया और नियमित समीक्षा बैठकें कर प्रगति की निगरानी की।
'नया उत्तर प्रदेश' आज प्रगति की एक नई उड़ान भरते हुए उद्घोष कर रहा है कि जब संकल्प मजबूत हो, साहस अडिग हो तथा आत्मविश्वास अटल हो तो कोई भी लक्ष्य दूर नहीं रह सकता है और जेवर का यह एयरपोर्ट उसी संकल्प की सिद्धि की परिणति है।
परियोजना की शुरुआत 2017 में हुई जब जुलाई में साइट क्लीयरेंस और अक्टूबर में गृह मंत्रालय से एनओसी प्राप्त हुई। इसी वर्ष जेवर को विश्व स्तर के एयरपोर्ट के रूप में विकसित करने की नींव रखी गई। 2018 में नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट लिमिटेड का गठन कर परियोजना को संस्थागत रूप दिया गया। मुख्यमंत्री योगी ने इस दौरान भूमि अधिग्रहण से लेकर पर्यावरणीय मंजूरी तक हर प्रक्रिया को तेजी से पूरा कराया।
2020 में ज्यूरिख एयरपोर्ट इंटरनेशनल एजी को कंसेशनायर चुना गया और कंसेशन एग्रीमेंट पर हस्ताक्षर हुए। सीएम योगी के निर्देश पर सभी औपचारिकताएं समय पर पूरी की गईं। अगस्त 2021 में फाइनेंशियल क्लोजर हो गया और मास्टर प्लान को मंजूरी मिली। अक्टूबर 2021 में अपॉइंटेड डेट घोषित कर निर्माण का रास्ता पूरी तरह साफ हो गया।
मार्च 2022 में निर्माण कार्य शुरू हुआ और टाटा प्रोजेक्ट्स को ईपीसी कॉन्ट्रैक्टर नियुक्त किया गया। 2022 से 2024 तक सभी महत्वपूर्ण टास्क समयबद्ध तरीके से पूरे किए गए। इस दौरान मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कई बार साइट का निरीक्षण किया और अधिकारियों को आवश्यक दिशा-निर्देश दिए। उनकी सक्रियता के कारण कोई भी बाधा लंबे समय तक नहीं टिक सकी।
28 मार्च, 2026 को PM मोदी और CM योगी Noida के जेवर अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट का करेंगे लोकार्पण
भारत का सबसे बड़ा अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट है जेवर हवाई अड्डा; पाँच वर्ष के रिकॉर्ड समय में बनकर हुआ है तैयार
अक्टूबर 2025 में कैलिब्रेशन फ्लाइट सफल रही और मार्च 2026 में एयरोड्रम लाइसेंस प्राप्त हो गया। सीएम योगी ने इस पूरे सफर में कभी भी लक्ष्य से समझौता नहीं किया। उन्होंने एयरपोर्ट को केवल उड़ान भरने का स्थान नहीं बल्कि पूरे क्षेत्र के औद्योगिक लॉजिस्टिक्स और निवेश केंद्र के रूप में विकसित करने की रणनीति बनाई।
यमुना प्राधिकरण क्षेत्र में अब तेजी से औद्योगिक विकास हो रहा है। नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट लाखों रोजगार सृजित करेगा। यह निर्यात लॉजिस्टिक्स पर्यटन और निवेश को नई गति देगा। मुख्यमंत्री योगी के विजन के कारण उत्तर प्रदेश अब वैश्विक कनेक्टिविटी के नए युग में प्रवेश कर रहा है।
एयरपोर्ट के आगे का विकास मॉडल भी तैयार है। आसपास के क्षेत्रों में होटल शॉपिंग मॉल और मल्टीमॉडल ट्रांसपोर्ट हब विकसित किए जा रहे हैं। सीएम योगी ने स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि यह एयरपोर्ट यूपी की आर्थिक शक्ति को और मजबूत करेगा।
इस उपलब्धि पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट यूपी की प्रगति का प्रतीक है। उनके अनुसार यह प्रोजेक्ट केवल इंफ्रास्ट्रक्चर नहीं बल्कि युवाओं के सपनों को उड़ान देने का माध्यम है।
जेवर एयरपोर्ट उत्तर प्रदेश को ग्लोबल कनेक्टिविटी का केंद्र बनाते हुए…
प्रदेश को स्केल और स्पीड के साथ विकास की एक नई ऊंचाई तक ले जाने का कार्य भी करेगा… pic.twitter.com/p7aNrgLAim
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा फेज-1 के लोकार्पण के बाद एयरपोर्ट से नियमित उड़ानें शुरू हो जाएँगी। यह यूपी को दिल्ली एनसीआर के अलावा पूरे उत्तर भारत के लिए नया एविएशन हब बनाएगा।
मुख्यमंत्री योगी की कोशिशों से पूरा प्रोजेक्ट निर्धारित समय से पहले पूरा हो गया। आठ वर्षों का यह सफर अब नई उड़ान की शुरुआत है। यूपी सरकार का यह मॉडल पूरे देश के लिए उदाहरण बनेगा।
नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट अब एविएशन इंडस्ट्री के फलक पर चमकने को तैयार है। सीएम योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में यूपी विकास की नई ऊँचाइयों को छू रहा है।
इस्लामी-वामपंथी पोर्टल ‘द वायर’ के नाम से एक कथित लेख का स्क्रीनशॉट सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। इस वायरल स्क्रीनशॉट में दावा किया गया है कि ‘बहुजन’ कंटेंट क्रिएटर्स को पोर्न इंडस्ट्री पर ‘कब्जा’ करने की वकालत की गई है जिसे लेखक सूरज येंगड़े ने ‘आखिरी किला’ बताया है।
वायरल स्क्रीनशॉट के अनुसार, दलित अधिकार कार्यकर्ता ने तर्क दिया है कि अंबेडकरवादी विचारधारा को फैलाने के लिए पोर्नोग्राफी जैसे ‘फ्रंटियर’ में भी प्रवेश करना जरूरी है और इसके लिए ब्राह्मण महिलाओं को निशाना बनाया जाना चाहिए। हालाँकि, यह स्क्रीनशॉट भले ही येंगड़े और ‘द वायर’ के सवर्ण विरोधी रुख के कारण भरोसेमंद लगता हो लेकिन यह पूरी तरह से फर्जी और व्यंग्य के रूप में बनाया गया है।
इस वायरल स्क्रीनशॉट में जिस लेख का जिक्र है वह कभी पब्लिश ही नहीं हुआ है। इस कथित लेख की हेडलाइन “The Case for Dalit ‘Porn’ – Why Bahujan Content Creators Must Conquer this Last Frontier” लिखी गई है।
वहीं, इसकी समरी में लिखा है, “हर विचारधारा को विस्तार के लिए पॉप-कल्चर के साधनों की जरूरत होती है। जहाँ अंबेडकरवादी विचारधारा के पास ऑटो-ट्यून गाने और रील्स जैसे माध्यम मौजूद हैं लेकिन हम पोर्नोग्राफी के क्षेत्र में पीछे हैं जो सबसे ज्यादा देखे जाने वाला कंटेंट है। भले ही यह सुनने में आपत्तिजनक लगे लेकिन बहुजन कंटेंट क्रिएटर्स को इस दिशा में काम करना चाहिए जैसे कि एक ब्राह्मण या यादव हाउस वाइफ को शौचालय साफ करने आए एक सफाईकर्मी के साथ सेक्स करते दिखाना।
ऑपइंडिया ने द वायर की वेबसाइट और उसके सोशल मीडिया हैंडल्स की जाँच की जिससे यह पता लगाया जा सके कि वायरल स्क्रीनशॉट में दिखाया गया लेख कभी प्रकाशित हुआ था, उसमें कोई बदलाव किया गया था या उसे हटाया गया था। पता चला कि सुरज येंगड़े द्वारा ऐसा कोई एंटी-ब्राह्मण लेख न तो लिखा गया था और न ही द वायर ने उसे प्रकाशित किया था। हमारी रिसर्च के अनुसार, वायरल स्क्रीनशॉट के फर्जी होने की पूरी संभावना है।
द वायर के संस्थापक संपादक सिद्धार्थ वरदराजन ने 27 मार्च को X (ट्विटर) पर एक पोस्ट कर इस मामले पर प्रतिक्रिया दी। उन्होंने ‘जातिवादी और हिंदुत्व से प्रभावित हिंदुओं’ को यह फर्जी स्क्रीनशॉट बनाने और फैलाने का जिम्मेदार बताया। उनका दावा है कि इन लोगों ने एक झूठी कहानी गढ़ी और उसे ‘सम्मानित स्कॉलर’ सुरज येंगड़े और द वायर से जोड़ने की कोशिश की।
Hatred and perversity among casteist Hindus, especially those infected with Hindutva, knows no bounds. Some of them have gone to the extent of fabricating a fake 'story' based on their sick minds and tried to pin it on a respected Dalit scholar, and on The Wire. https://t.co/XKYd6g0R9X
भले ही सिद्धार्थ वरदराजन ने इस मामले में तुरंत ‘जातिवादी’ हिंदुओं और हिंदुत्व को जिम्मेदार ठहराया और सुरज येंगड़े को ‘सम्मानित स्कॉलर’ बताया लेकिन यह फर्जी स्क्रीनशॉट लोगों को इसलिए असली लगा क्योंकि यह येंगड़े की पहले से चली आ रही एंटी-ब्राह्मण बयानबाजी और द वायर की कथित एंटी-हिंदू लाइन के पैटर्न से मेल खाता हुआ दिखा।
येंगड़े ने पहले भी ‘ब्राह्मणिकल पैट्रियार्की’ जैसे विषयों पर कई लेख लिखे हैं जिनमें ब्राह्मण महिलाओं पर खास फोकस देखा गया है। उनके लेखों और सोशल मीडिया पोस्ट्स में अक्सर ऊँची जाति के हिंदुओं को इस बात के लिए निशाना बनाया जाता है कि वे ‘जाति शुद्धता’ के कारण अपनी बेटियों की शादी दलितों से नहीं करते। इसी तरह के पुराने बयानों और विचारों के कारण यह फर्जी स्क्रीनशॉट कई लोगों को पहली नजर में असली और भरोसेमंद लगा।
सुरज येंगड़े की एंटी-ब्राह्मण बयानबाजी केवल अकादमिक टिप्पणी तक सीमित नहीं है बल्कि यह कई बार खुले तौर पर महिलाओं के प्रति अपमानजनक और उन्हें वस्तु की तरह पेश करने वाली भाषा तक पहुँच जाती है जैसा कि उनके सोशल मीडिया पोस्ट्स में देखने को मिलता है। ऐसे ही एक पोस्ट में येंगड़े ने लिखा था, “ब्राह्मण लड़कियाँ दलित पुरुषों के लिए लालायित रहती हैं। मुझसे पूछो।”
एक पोस्ट में सुरज येंगड़े ने एक ब्राह्मण की पोस्ट का जवाब देते हुए ब्राह्मण समुदाय से कहा कि वे अपनी बेटियों को दलितों को ‘दे दें’ जैसे वे कोई वस्तु हों। उन्होंने इसे इस तरह पेश किया मानो अपने ‘विशेषाधिकार’ (प्रिविलेज) को दलितों के साथ साझा करना चाहिए और इसके लिए महिलाओं को ऐसी चीज समझा जाए जिसे आपस में बाँटा जा सकता है।
येगड़े पर यह आरोप भी रहा है कि वो एंटी-ब्राह्मण बातों को आगे बढ़ाने के लिए हिंदू इतिहास और शास्त्रों को तोड़-मरोड़ कर पेश करता है।
ब्राह्मण महिलाओं को लेकर की गई आपत्तिजनक बातें और उन्हें वस्तु की तरह पेश करने के अलावा येंगड़े उनके प्रति साफ तौर पर नफरत भी दिखाता है। उसने उन्हें ‘ध्यान भटकाने का हथियार’ बताते हुए कहा कि उनके लिए उसे कोई सहानुभूति नहीं है।
इस तरह की जातीय बदले की सोच और अतिवादी कल्पनाओं के कारण पोर्न इंडस्ट्री को ‘आखिरी किला’ बताने जैसे दावे भी लोगों को सच लगने लगते हैं। कई मौकों पर कुछ दलित ‘सामाजिक न्याय’ कार्यकर्ताओं द्वारा ऊँची जाति की महिलाओं को मानो इतिहास का बदला लेने के प्रतीक या ट्रॉफी की तरह ‘हासिल’ करने की बात भी कही गई है।
The so-called renowned & awarded scholar has already shown his mentality earlier.
भारत में कई ऐसे उदाहरण सामने आए हैं, जहाँ कुछ दलित कार्यकर्ताओं और एक्टिविस्ट ने खुले तौर पर सामान्य (जनरल) वर्ग की महिलाओं को वस्तु की तरह पेश किया है। सिर्फ राजनेता ही नहीं बल्कि कुछ IAS अधिकारियों तक के ऐसे बयान सामने आए हैं जिनमें यह कहा गया कि सामान्य वर्ग की महिलाएँ मानो कोई ट्रॉफी या वस्तु हैं जिन्हें ‘सामाजिक न्याय’ के एजेंडे को सफल बनाने के लिए दलितों के साथ शेयर किया जाना चाहिए।
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साथ ही, पश्चिमी लिबरल विचारधारा के प्रभाव में जहाँ खाने, संगीत और साहित्य जैसी चीजों को भी गलत और सीमित श्रेणियों में बाँटने की प्रवृत्ति है, उसी तरह भारतीय लिबरल वर्ग के कुछ लोग भी इन विचारों को कॉपी-पेस्ट करके भारत में लागू करने की कोशिश कर रहे हैं। यह तरीका मूल रूप से गलत माना जाता है क्योंकि भारतीय सांस्कृतिक विविधता और उसके पहलू पश्चिमी समाज से अलग हैं और उसका विकास अलग परिस्थितियों में हुआ है। ऐसे में पश्चिमी ढाँचे में उन्हें फिट करने की कोशिश सही नहीं बैठती।
वाइस के एक आर्टिकल का स्क्रीनशॉट
दलित भोजन, दलित संगीत, दलित ‘देवता’, दलित परंपराएँ जैसे विषयों पर कई लेख और किताबें सामने आई हैं। इनमें कुछ भारतीय लेफ्ट-लिबरल समूह पश्चिम की ‘सोशल जस्टिस’ विचारधारा से प्रभावित होकर भारत के समाज और संस्कृति को दलित बनाम ऊँची जाति जैसे सीमित खाँचों में बाँटने की कोशिश करते हैं। कई बार ये चर्चाएँ अजीब तुलना और गलत दावों तक पहुँच जाती हैं।
पोर्न को ‘कलंक खत्म करने के हथियार’ के रूप में सही ठहराने वाले एक लेख का स्क्रीनशॉट
इन्हीं बहसों के धीरे-धीरे आम हो जाने की वजह से वह वायरल स्क्रीनशॉट भी लोगों को काफी हद तक सच जैसा लगा। व्यंग्य (सटायर) समाज में चल रही चीजों को हल्के-फुल्के अंदाज में दिखाने का एक तरीका होता है। यह तथ्य कि एक अलग ‘दलित पहचान’ की चीजों को वाम-उदारवादी ‘यौन स्वतंत्रता’ के सामान्य विचारों के साथ मिलाकर वह व्यंग्यात्मक स्क्रीनशॉट बनाया गया और वह कई लोगों को ‘सच’ लगा…यह अपने आप में भी एक तरह का व्यंग्य है।
(यह खबर मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी गई है जिसे इस लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं)