उत्तरी दिल्ली नगर निगम के तहत आने वाले डॉक्टर्स पिछले चार महीनों से वेतन का भुगतान नहीं करने पर आंदोलन कर रहे हैं। इस पर दिल्ली के हिंदू राव अस्पताल के डॉक्टर और कर्मचारियों ने कल, 16 अक्टूबर को दिल्ली स्थित जंतर-मंतर पर विरोध-प्रदर्शन करने का फैसला लिया है। उत्तरी दिल्ली नगर निगम के मेयर जय प्रकाश का कहना है कि दिल्ली में 6 साल से अरविंद केजरीवाल सरकार है और पिछले 6 सालों से ही ये संकट है।
ज्ञात हो कि अभी तक मेडिकल स्टाफ सिर्फ अस्पताल परिसर में ही विरोध-प्रदर्शन कर रहा था, लेकिन अब उन्होंने सड़क पर उतरने का फैसला लिया है। हिन्दू राव अस्पताल के साथ ही उत्तरी दिल्ली नगर निगम द्वारा संचालित कस्तूरबा अस्पताल के रेजिडेंट डॉक्टर्स एसोसिएशन (आरडीए) ने भी वेतन न मिलने के कारण बुधवार (अक्टूबर 14, 2020) से एक सप्ताह की हड़ताल पर जाने का फैसला किया और वेतन न मिलने पर इस्तीफा देने की धमकी भी दी है।
डॉक्टर्स और मेडिकल स्टाफ की इस समस्या पर बृहस्पतिवार (अक्टूबर 15, 2020) को उत्तरी दिल्ली नगर निगम के महापौर जयप्रकाश ने कहा है कि उन्होंने कल ही हिंदू राव और कस्तूरबा गाँधी समेत करीब 6 अस्पतालों के कर्मचारियों की 1 महीने की सैलरी जारी कर दी है और बकाया सैलरी भी जल्द से जल्द दे दी जाएगी।
समाचार एजेंसी एनआई के मुताबिक, हिंदू राव अस्पताल के डॉक्टरों की हड़ताल पर उत्तरी दिल्ली नगर निगम के मेयर जय प्रकाश ने कहा, “डॉक्टरों की तीन महीने की सैलरी बकाया थी, उसमें से एक महीने का वेतन मैंने कल रात को जारी करा दिया। सिर्फ दो महीने का वेतन बकाया है, जैसे महीना पूरा होगा एक महीने का वेतन हम और जारी कर देंगे।”
जयप्रकाश ने इसके पीछे दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल को दोषी ठहराते हुए कहा, “दिल्ली में 6 साल से अरविंद केजरीवाल सरकार है और पिछले 6 सालों से ही ये संकट है। दिल्ली सरकार ज़िम्मेदार रवैया अपनाते हुए हमारे इस साल के जो 1600 करोड़ रुपए और पिछले साल के 9,000 करोड़ रुपए रोक रखे हैं, उसे जारी करे और दिल्ली की जनता के साथ खिलवाड़ न करे।”
उन्होंने कहा कि नगर निगम की कमाई के 2 ही साधन हैं, पहला- राजस्व, संपत्ति कर, विज्ञापन, कार पार्किंग, लाइसेंस, नक्शे पास करने की फीस, चालान और जुर्माने इकट्ठा होने वाला पैसा और दूसरा साधन वो पैसा, जो ग्रांट के तौर पर दिल्ली सरकार से मिलता है। जयप्रकाश का कहना है कि पिछले 4-5 महीने से दिल्ली सरकार ने एक भी रुपया नहीं दिया है।
केरल के सोना तस्करी मामले में राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (एनआईए) ने हैरान कर देने वाला खुलासा किया है। कोच्चि की विशेष अदालत में एनआईए ने इस बात का संकेत देते हुए कहा है कि सोना तस्करी मामले में भारत के मोस्ट वांटेड आतंकवादी दाऊद इब्राहिम की भूमिका हो सकती है।
एनआईए ने बताया कि यह जानकारी खुफ़िया इनपुट से मिली है कि सोने की तस्करी के दौरान मिले रुपयों का इस्तेमाल आतंकवादी और राष्ट्र विरोधी गतिविधियों के लिए किया गया था। इसके अलावा एनआईए ने विशेष अदालत में इस बात पर भी ज़ोर दिया कि फ़िलहाल इस संदिग्ध भूमिका की जाँच करने की ज़रूरत है।
बुधवार (14 अक्टूबर 2020) को एनआईए ने केरल सोना तस्करी मामले में कोच्चि की विशेष अदालत के सामने अपना पक्ष रखा। एनआईए ने बताया कि सोना तस्करी के कुछ आरोपितों के सम्बंध दाऊद गिरोह से हैं और वह कई बार तंज़ानिया भी जा चुके हैं। तंज़ानिया में दाऊद का नेटवर्क काफी बड़े पैमाने पर काम करता है। आने वाले समय में इस पूरे मामले में हमें और बड़े नतीजे हासिल हो सकते हैं। इसके अलावा एनआईए ने यह भी कहा कि मामले में जाँच आगे बढ़ाने के लिए सभी आरोपितों को 180 दिन की न्यायिक हिरासत में रखा जाना अत्यंत आवश्यक है।
दरअसल, आरोपितों ने अदालत में गैर क़ानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम के प्रावधानों को चुनौती दी थी। चुनौती देने के लिए यह तर्क पेश किया गया था कि तस्करी आर्थिक अपराध की श्रेणी में आती है लिहाज़ा इस प्रकरण का कोई आतंकवादी पहलू नहीं है। एनआईए ने इस दलील के जवाब में कहा था कि सोना तस्करी मामले के कुछ आरोपितों के सम्बंध राष्ट्र विरोधी ताकतों से है।
अदालत में एनआईए ने यह भी कहा कि इस मामले के आरोपित नंबर 5 केटी रमीज़ और आरोपित नंबर 13 शराफुद्दीन ने कई बार तंज़ानिया का दौरा किया था। इसके अलावा उन्होंने दाऊद के सम्पर्क वाले फिरोज़ ‘ओएसिस’से मुलाक़ात की और देश में हथियारों की तस्करी पर चर्चा की। इसके अलावा एनआईए के मुताबिक़ रमीज़ ने बताया कि तंज़ानिया में उसका हीरे का कारोबार था और उसने सोना यूएई में बेचा था।
एनआईए ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद सैंक्शन कमेटी की तरफ से दाऊद पर की गई टिप्पणी का उल्लेख भी किया था। साथ ही अफ्रीका में अमेरिका के डिपार्टमेंट ऑफ़ ट्रेज़री की तरफ से दाऊद गैंग की गतिविधियों पर प्रकाशित फैक्ट शीट भी जोड़ी गई है। इसके पहले रमीज़ कोझिकोड हवाई अड्डे पर रिवॉल्वर के साथ पकड़ा जा चुका था और पकड़े जाने पर उसने कहा था कि वह शूटिंग एसोसिएशन का सदस्य था।
बिहार की राजनीति में एक लंबे समय से अपराध और राजनीति एक सिक्के के दो पहलू माने जाते रहे हैं। शायद इसी वजह से नेता दबंगों और अपराधियों की ओट में वोट से अपनी झोली भरने को आतुर दिखते थे। वैसे बिहार में तो बाहुबलियों का शुरू से ही बोलबाला रहा है। चाहे सिवान का शहाबुद्दीन हो या मोकामा का अनंत सिंह। इनके जुर्म की कहानियाँ पूरे देश में कुख्यात हैं।
हालाँकि अब भी राजनीति में बाहुबलियों का बोलबाला है, मगर कई चीजें वक्त के साथ सीमित हुई हैं और बदलाव देखा जा सकता है। कई पुराने बाहुबली अब भी ठसक के साथ राजनीति में मौजूद हैं। लेकिन कई पुराने आरोपों से निकल कर पूरी तरह ‘जनता के सेवक’ बन चुके हैं। इन्हीं में से एक हैं- जन अधिकार पार्टी के मुखिया और पूर्व सांसद राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव (Pappu Yadav)।
हत्या-अपहरण जैसे 31 संगीन केसों में आरोपित बाहुबली पप्पू यादव विधानसभा चुनाव में लोगों से अपराध मुक्त बिहार बनाने का वादा कर रहे हैं। तीन दशक पहले 1990 में मधेपुरा के सिंहेश्वर विधानसभा सीट से चुनाव जीत कर अपनी सियासी पारी का आगाज करने वाले पप्पू यादव की गिनती बिहार के उस बाहुबली नेता के तौर पर होती है, जिसके नाम का खौफ एक जमाने में बिहार से लेकर दिल्ली तक नेता खाते थे। एक बार के विधायक और पाँच बार के सांसद पप्पू यादव इस बार विधानसभा चुनाव में मधेपुरा से चुनावी मैदा में उतर रहे हैं, वो भी मुख्यमंत्री के प्रत्याशी के तौर पर।
लालू यादव के साथ ही बिहार की राजनीति में बाहुबली पप्पू यादव का भी सियासी उदय
साल 1990 का बिहार एक ओर लालू यादव के मुख्यमंत्री पद पर ताजपोशी का गवाह बन रहा था, तो दूसरी ओर अपराध की दुनिया के कई नामों के सियासी उदय होने का साक्षी भी बन रहा था। लालू यादव के साथ ही बिहार की राजनीति में बाहुबली पप्पू यादव का भी सियासी उदय होता है।
बिहार में अस्सी के दशक में जिस जातीय टकराव की शुरुआत होती है, वह नब्बे के दशक आते-आते अपने चरम पर पहुँच जाती है। जाति की राजनीति के लिए पहचाना जाने वाला बिहार अब जातीय संघर्ष की आग में जलने लगा था। भूमिहारों और यादवों की जंग की धमक बिहार ही नहीं पूरे देश में सुनाई देने लगी थी। बिहार की पावन धरती एक के बाद एक नरसंहार से लाल होती जा रही थी। जातीय संघर्ष की इस जंग में भूमिहारों का नेतृत्व रणवीर सेना कर रही थी तो उसको चुनौती देने का काम पिछड़ों के नेता पप्पू यादव कर रहे थे, जिन्होंने यादवों की अपनी अलग सेना का ही निर्माण कर डाला था।
पूर्णिया का रंगबाज
कोसी का बेल्ट, जहाँ हर बारिश में कोसी नदी अपने रौद्र रूप में तबाही मचाती थी वह इलाका अब पप्पू यादव और रणवीर सेना के टकराव में गोलियों से अक्सर गूँजता था। अगड़े और पिछड़े की जंग में पप्पू यादव ने कोसी बेल्ट में अपना वर्चस्व कायम किया और पिछड़ी जाति के युवा उनके साथ जुड़ते चले गए। 80 के दशक के अंत तक पूर्णिया, सहरसा, सुपौल, कटिहार ज़िलों में पप्पू यादव का अच्छा ख़ासा दबदबा बन चुका था।
1990 में देश में आरक्षण की आग लगी और मंडल-कमंडल की जंग सड़क पर आ चुकी थी। इसको लेकर बिहार में समाज बँट चुका था। ठाकुर, भूमिहार, अहीर, सबने एक दूसरे के खिलाफ मोर्चा खोल रखा था। कोसी बेल्ट में आनंद मोहन ने अपनी प्राइवेट आर्मी बना ली थी और उसे चुनौती देने के लिए पप्पू यादव भी अपनी सेना को लेकर तैयार थे। आए दिन वारदातें होती रहती थीं। यह वो समय था, जब पप्पू यादव और आनंद मोहन को कोसी बेल्ट का टेरर ट्विन कहा जाने लगा था।
आनंद मोहन Vs पप्पू यादव: कोसी बेल्ट का टेरर ट्विन
बिहार में गंगा के उत्तर में भूमिहारों के खिलाफ पप्पू यादव ने मोर्चा खोल रखा था। एक गाँव में एक यादव की कथित तौर पर पिटाई हुई और पप्पू यादव 60 बसों में असलहों से लैस लड़कों को लेकर उस गाँव तक पहुँच गए, वहाँ फायरिंग भी की। कहते हैं कि पप्पू यादव और उनके समर्थकों ने गाँव को लूटने की कोशिश की, लेकिन गाँव वालों ने उनकी कार को आग के हवाले कर दिया और साथ में उनके हथियारों को भी छीन लिया था। ये सिर्फ भूमिहारों और यादवों की ही जंग नहीं थी, ये जंग दो बाहुबलियों की भी थी।
मोकामा से लेकर वैशाली तक 150 किलोमीटर के एरिया में भूमिहारों और यादवों की जंग गृह युद्ध का रूप ले चुकी थी। वैशाली के कुछ गाँवों ने तो अपनी सीमाएँ सील कर दी थीं और हथियार उठा लिए थे। पप्पू यादव और आनंद मोहन के बीच की इस जंग ने जातीय हिंसा फ़ैला दी थी।
जातीय संघर्ष के सहारे अपनी सियासी रोटियाँ सेंकने वाले पप्पू यादव लगातार राजनीति की सीढ़ियाँ भी चढ़ रहे थे। विधायक बनने के एक साल बाद ही 1991 में पूर्णिया लोकसभा सीट से बतौर निर्दलीय चुनावी मैदान में वो उतरे और चुनाव जीतकर संसद भी पहुँच गए। इसके बाद 1996 के लोकसभा चुनाव में भी पप्पू यादव पूर्णिया से फिर रिकॉर्ड तीन लाख से अधिक वोटों से जीत दर्ज कर संसद पहुँचे।
डीएसपी को चलती कार के सामने धकेला
सांसद बनने के साथ ही पप्पू यादव खुलेआम कानून का मखौल उड़ाने लगे। खाकी के पहरेदार उनसे खौफ खाने लगे। यह वह दौर था, जब पप्पू यादव ने एक डीएसपी को चलती कार के सामने धकेल दिया और एक पुलिसकर्मी की मूँछ जबरन मुंड़वा दी थी। पप्पू यादव पर एक के बाद एक हत्या और अपहरण के मामले दर्ज होने लगे। सत्ता से नजदीकी होने के चलते पुलिस भी पप्पू यादव पर हाथ डालने से डरती थी। आखिरकार मुख्यमंत्री लालू यादव के आदेश पर पप्पू यादव को गिरफ्तार किया गया।
यह वह दौर था, जब पप्पू यादव के नाम से लोग खौफ खाते थे लेकिन वक्त बदलता है और 1998 के लोकसभा चुनाव में पप्पू यादव पहली बार पूर्णिया से चुनाव हार जाते हैं। बाहुबली पप्पू यादव अपनी हार के लिए माकपा नेता अजीत सरकार को जिम्मेदार मानते हैं। अजीत सरकार पूर्णिया में काफी लोकप्रिय थे और चार बार विधायकी का चुनाव जीत चुके थे।
अजीत सरकार हत्याकांड में उम्रकैद
इसी बीच जून 1998 में दिनदहाड़े माकपा नेता अजीत सरकार के साथ-साथ उनके ड्राइवर और एक साथी को पूर्णिया में गोलियों से छलनी कर दिया जाता है। अजीत सरकार का जब पोस्टमॉर्टम किया जाता है, तो उनके शरीर से 107 गोलियाँ निकलती है। कहा जाता है कि अजीत सरकार और उनके सथियों पर एके-47 से गोलियाँ बरसाईं गई थीं।
अजीत सरकार की हत्या का आरोप पप्पू यादव पर लगता है और पप्पू यादव को गिरफ्तार कर लिया जाता है। पप्पू यादव जेल जाने से बचने के लिए हर बार की तरह अपने पुराने हथकंडे अपनाते हैं लेकिन वह सलाखों के पीछे पहुँच जाते हैं।
इस बीच 1999 में दिल्ली में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली सरकार गिर जाती है और फिर लोकसभा चुनाव होते हैं और पप्पू यादव एक बार फिर जेल में रहते हुए भी पूर्णिया लोकसभा सीट से चुनाव जीत कर संसद पहुँच जाते हैं। पप्पू यादव का नाम इतना बदनाम हो चुका था कि प्यार में नहीं बल्कि डर में जनता का वोट उनकी झोली में पड़ता था।
2004 का लोकसभा चुनाव पूर्णिया से हारने वाले पप्पू यादव जो उस वक्त लालू प्रसाद यादव के सबसे करीबी नेताओं में से एक माने जाते थे, उनकी किस्मत फिर बदलती है – साल 2004 में ही। होता यह है कि 2004 के लोकसभा चुनाव में लालू यादव छपरा और मधेपुरा दो सीटों से लोकसभा चुनाव लड़ता है और दोनों से ही जीत दर्ज करता है। लालू बाद में मधेपुरा सीट छोड़ देता है और उपचुनाव में पप्पू यादव मधेपुरा से चुनाव जीतकर फिर संसद पहुँच जाते हैं।
अजीत सरकार हत्याकांड में जमानत पर बाहर चल रहे पप्पू यादव की जमानत सुप्रीम कोर्ट से खारिज हो जाती है और पप्पू यादव को बेऊर जेल भेज दिया जाता है, लेकिन जेल में उनके ऐशोआराम में कोई कमी नहीं आती है। पप्पू यादव की बैरक पर छापा मारा जाता है और उनके जूते से मोबाइल फोन बरामद होता है। उसकी डिटेल में कई नेताओं के साथ बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू यादव के निजी सचिव के नंबर पर भी बात होने की डिटेल सामने आती है। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर पप्पू यादव को दिल्ली की तिहाड़ जेल में शिफ्ट किया जाता है और जेल में पप्पू यादव पर अंकुश लगाने के लिए तिहाड़ में पहली बार मोबाइल जैमर लगाया जाता है।
अजीत सरकार हत्याकांड में 14 फरवरी 2008 को पप्पू यादव को पटना की सीबीआई कोर्ट में उम्रकैद की सजा सुनाई जाती है लेकिन इस मामले में 2013 में हाईकोर्ट से पप्पू यादव को बरी कर दिया जाता है। हाईकोर्ट से बरी होने के बाद पप्पू यादव 2014 का लोकसभा चुनाव फिर मधेपुरा से आरजेडी के टिकट पर लड़ते हैं और राजनीति के दिग्गज शरद यादव को हराकर फिर संसद पहुँच जाते हैं।
2015 में लालू यादव से विवाद के बाद पप्पू यादव को आरजेडी से निकाल दिया जाता है और विधानसभा चुनाव से ठीक पहले पप्पू यादव अपनी खुद की पार्टी जन अधिकार पार्टी बनाते हैं। 2019 के चुनाव में मधेपुरा से चुनाव भी लड़ते हैं। हालाँकि इस चुनाव में उन्हें हार का सामना करना पड़ा। इस बार पप्पू यादव सिर्फ 8 फीसदी वोट ही हासिल कर पाए।
पूरा राजनीतिक सफर देखें तो पप्पू यादव ने आरजेडी के टिकट पर पहली बार 1991 में चुनाव जीता और फिर 1996, 1999 और 2004 में भी आरजेडी से वो चुनाव जीतने में सफल रहे। लेकिन 2019 में वो अपनी जमानत तक नहीं बचा सके।
1986-87 में लालू प्रसाद यादव की राजनीति ऊपर की ओर बढ़ रही थी। इस दौर में वह बिहार में विरोधी दल का नेता बनना चाहता था। कहते हैं कि लालू की राजनीति को जमाने में तब दलित-पिछड़ा समाजवादी नेताओं के साथ बाहुबलियों ने भी काफी मदद की। इन्हीं में से पप्पू यादव और मोहम्मद शहाबुद्दीन भी था। लालू की वजह से ही पप्पू यादव राजनीति में सक्रिय हुए थे और एक समय आरजेडी चीफ से उनकी इतनी करीबी थी कि लोग उन्हें लालू का उत्तराधिकारी भी कहने लगे थे और पप्पू यादव ने भी इसकी मंशा पाल रखी थी, लेकिन वो कामयाब नहीं हो सके और 2015 में उन्हें राजद से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया।
अपनी कुख्यात छवि के लिए लालू को ठहराया दोषी
एक इंटरव्यू में पप्पू यादव ने कहा था, “मैं तो एक सीधा-सादा छात्र था। लालू का प्रशंसक था। उनको अपना आदर्श मानता था, लेकिन लालू मेरे साथ बार-बार छल करते गए। मुझे बिना अपराध किए ही कुर्सी का नाजायज फायदा उठाते हुए कुख्यात और बाहुबली बना दिया। जब लालू विरोधी दल का नेता बनना चाहते थे, उस समय इस दौड़ में अनूप लाल यादव, मुंशी लाल और सूर्य नारायण भी शामिल थे। मैं अनूप लाल यादव के घर में ही रहता था।”
पप्पू यादव आगे बताते हैं, “इसके बावजूद मैं लालू का समर्थन कर रहा था। मैंने नवल किशोर से बात कर लालू के लिए जमीन तैयार किया। लालू के नेता विरोधी दल बनने के अगले ही दिन पटना के सभी अखबारों में एक खबर प्रकाशित हुई कि कॉन्ग्रेस नेता शिवचंद्र झा की हत्या करने के लिए पूर्णिया से एक कुख्यात अपराधी पप्पू यादव पटना पहुँचा है। मैं इन सब से बेखबर था। मेरे एक मित्र नवल किशोर मुझे पटना विश्वविद्यालय के पीजी हॉस्टल ले गए।”
पप्पू यादव याद करते हुए बताते हैं कि वहाँ जाकर उन्हें पता चला कि वह एक कुख्यात अपराधी बन चुके हैं। वह आगे बताते हैं, “मैं एक ऐसा कुख्यात अपराधी था, जिसके खिलाफ तब तक किसी थाने में कोई केस तक नहीं दर्ज था। मैं तीन दिनों तक अपने एक मित्र गोपाल के कमरे में रहा। वहाँ से कोलकाता गया। पुलिस मेरे पीछे पड़ गई। मेरे घर की कुर्की हो गई। माँ-बाप को सड़क पर रात गुजारनी पड़ी। मेरे पिता लालू से मिले, लेकिन उन्होंने मदद से इनकार कर दिया।”
इंस्पेक्टर की हत्या का आरोप
12 फरवरी 1999 को दिल्ली पुलिस ने एक कुख्यात अपराधी और श्री प्रकाश शुक्ला गैंग से ताल्लुक रखने वाले गैंगस्टर राजन तिवारी को गिरफ़्तार किया। उसने दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच को पूछताछ में बताया कि उसे 15 लाख रुपयों में समाजवादी पार्टी के नेता डीपी यादव और सांसद पप्पू यादव ने हायर किया था और गाज़ियाबाद में तैनात यूपी पुलिस के इंस्पेक्टर प्रीतम सिंह की सुपारी दी थी, जिन्हें नवम्बर 1998 में राजन तिवारी और उसकी गैंग में शामिल मुन्ना शुक्ला, रितेश तिवारी और लल्लन सिंह ने मार दिया था।
राजन तिवारी ने ये भी बताया कि इसका प्लान पप्पू यादव के घर पर बना था और प्लान में डीपी यादव और पप्पू यादव के साथ राजपाल त्यागी भी शामिल था। दरअसल डीपी यादव को ख़बर मिली थी कि उसके भाई को मारने वाले अपराधी को इंस्पेक्टर प्रीतम सिंह ने ही जेल से बाहर निकाला था, इसीलिए डीपी यादव ने प्रीतम की हत्या कर अपना वर्चस्व कायम करने की कोशिश की थी। राजन तिवारी ने एक और खुलासा दिल्ली पुलिस के सामने किया कि पप्पू यादव, डीपी यादव और प्रताप मलिक ने नैनी जेल में बंद मुन्ना बजरंगी को भी मारने की सुपारी उसे दी थी लेकिन वो इसे पूरा नहीं कर सका।
दोस्त की बहन को दिल दे बैठे थे पप्पू यादव, सुसाइड की भी कोशिश की
पप्पू यादव का जेल जाना भी उनकी जिंदगी में एक अहम पड़ाव साबित हुआ। बांकीपुर जेल में बंद पप्पू यादव की मुलाकात विक्की से होती है और विक्की की बहन रंजीत को एक एलबम में टेनिस खेलते हुए देख पप्पू यादव उन्हें दिल दे बैठते हैं। जिस पप्पू यादव के नाम से पूरा बिहार थर्राता था, वह रंजीत के प्यार में ऐसा दीवाना हुआ कि नींद की गोलियाँ खाकर खुदकुशी की कोशिश भी की थी। आखिरकार कॉन्ग्रेस नेता एसएस अहलूवालिया के दखल के बाद पप्पू यादव और रंजीत 1990 में शादी के बंधन में बँध गए। पप्पू यादव ने खुद इस वाकये का जिक्र अपनी आत्मकथा ‘द्रोहकाल का पथिक’ में भी किया है। रंजीत रंजना कॉन्ग्रेस की नेता और पूर्व सांसद हैं।
खुद को भगवान भी बता चुके हैं पप्पू यादव
एक जनसंवाद रैली के दौरान उन्होंने खास परिस्थित में खुद को भगवान भी बता दिया था। उन्होंने आरोप लगाते हुए कहा था कि नीतीश, लालू और भालू ने मिलकर बिहार के हिंदू और दूसरे मजहब वालों के हाथों में पत्थर थमा दिया है। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को जुमलेबाज तक करार दे दिया। पप्पू यादव ने तब यह भी कहा था कि अगर वो साउथ में होते तो आज की तारीख में भगवान होते।
पूर्व सांसद ने कहा था, “अगर मैं दक्षिण भारत में पैदा होता तो 20 साल पहले मैं भगवान होता। अगर लालू यादव, नीतीश कुमार और रामविलास पासवान से पहले पैदा होता तो ये तीनों कभी नहीं पैदा होते। मेरे पास मगध का इतिहास है, जो दुनिया बदल सकती है।”
बिहार में पप्पू यादव के साथ PFI और SDPI का गठबंधन
बिहार की सियासत में असदुद्दीन ओवैसी की ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) ने अभी पैर जमाए भी नहीं थे कि दक्षिण भारत की दूसरी मजहबी पार्टी ने दस्तक दे दी। एआईएमआईएम के बाद अब पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI) की सियासी विंग सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (SDPI) बिहार में किस्मत आजमाने के लिए मैदान में उतर रही है।
एसडीपीआई बिहार में जन अधिकार पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष पप्पू यादव के अगुवाई में बनने वाले प्रोग्रेसिव डेमोक्रेटिक अलायंस (PDA) का हिस्सा है, जिसमें दलित नेता चंद्रशेखर आजाद की पार्टी भीम आर्मी पार्टी भी शामिल है। पप्पू यादव ने तीन छोटी पार्टियों को एक साथ लाकर बिहार में दलित-मुस्लिम-यादव वोटों का समीकरण बनाने की कवायद की है।
पप्पू यादव ने एक सभा के दौरान इसकी घोषणा करते हुए कहा था कि बिहार को बाढ़ और अपराध से मुक्ति दिलाने के लिए JAP ने पॉपुलर फ्रंट और एसडीपीआई के साथ मिलकर चलने का निर्णय लिया है। JAP, SDPI और PFI मिलकर बिहार की राजनीति में बदलाव लाएँगे और विकसित बिहार बनाएँगे। सीएए और एनआरसी के खिलाफ हुए प्रदर्शन में पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया का नाम तेजी से उभरा था। इन पर दंगा भड़काने और फंडिंग करने के आरोप लगे थे।
क्या है इस बार की तैयारी?
बिहार में होने वाले आगामी चुनाव में पप्पू यादव की जन अधिकार पार्टी (JAP) ने 150 सीटों पर चुनाव लड़ने का ऐलान किया है। पार्टी के प्रमुख पप्पू यादव ने अगस्त में ही इसकी घोषणा की है। पिछले विधानसभा चुनाव में भी जन अधिकार पार्टी ने 64 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे। तब JAP, समाजवादी पार्टी, NCP, समरस समाज पार्टी, समाजवादी जनता दल और नेशनल पीपुल्स पार्टी ने मिलकर तीसरे मोर्चा का गठन किया था।
सुशांत सिंह राजपूत के दोस्त संदीप सिंह ने रिपब्लिक टीवी और अर्नब गोस्वामी को 200 करोड़ रुपए का मानहानि नोटिस भेजा है। यह नोटिस आईपीसी की धारा 499 के तहत भेजा गया है जो धारा 500 के अंतर्गत दण्डनीय है। अपने इंस्टाग्राम पर संदीप ने यह पत्र शेयर करते हुए कैप्शन में लिखा, “यह भुगतान का समय है।”
नोटिस में संदीप की ओर से लिखा गया कि उन्हें रिपब्लिक टीवी व उसके एडिटर इन चीफ अर्नब गोस्वामी ने ‘मुख्य साजिशकर्ता’ और ‘हत्यारा’ बताया था। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि उनके खिलाफ चैनल पर चल रही न्यूज को रुकवाने के लिए चैनल के ही किसी शख्स ने उनसे मॉनेट्री बेनेफिट्स के लिए संपर्क किया था। हालाँकि उनके मना करने के बाद चैनल ने उनके खिलाफ़ कई रिपोर्ट्स लिखीं और कई संगीन आरोप लगाए।
वसूली करने का आरोप लगाते हुए नोटिस में कहा गया कि रिपब्लिक भारत ने जो संदीप सिंह पर आरोप लगाए वह सब निराधार हैं और उन्हें साबित करने के लिए कोई सबूत भी नहीं है। इसमें यह भी लिखा है कि चैनल ने स्मिता प्रकाश को बुलाकर संदीप को बदनाम करवाने का प्रयास किया। वहीं उन रिपोर्ट्स का भी जिक्र है जिनमें उनकी छवि धूमिल करने की कोशिश हुई।
नोटिस के अनुसार, 3, 5, 14, और 20 अगस्त की रिपोर्टस में आपत्तिजनक सामग्री का इस्तेमाल करके संदीप को बदनाम करने की कोशिश हुई। शो के एक सेगमेंट में उन पर यह भी आरोप लगाए गए कि उन्होंने ही एंबुलेंस से कहा था कि बॉडी को कूपर अस्पताल लेकर जाया जाए।
इसमें यह भी कहा गया कि संदीप की पीआर टीम ने मीडिया में डिस्ट्रिब्यूट करने के लिए उस समय तस्वीर क्लिक की थी। नोटिस के अनुसार रिपब्लिक टीवी की कुछ रिपोर्टों ने दावा किया कि संदीप सीबीआई जाँच के खिलाफ थे। इसमें एक #ArrestSandeepSingh हैशटैग का भी उल्लेख है जिसे रिपबल्कि भारत ने चलाया था।
नोटिस में लिखा है कि 22 से 24 अगस्त में रिपब्लिक टीवी संवाददाता उनके आवास में घुसे और उनके सिक्योरिटी गार्ड व डोमेस्टिक हेल्पर्स को परेशान किया। सुशांत के तथाकथित दोस्त संदीप के अनुसार, यह दूसरा प्रयास था उन्हें बदनाम करने का।
नोटिस में कहा गया है कि चैनल अपने प्लैटफॉर्म से इस तरह की सारी सामग्री हटाए और वास्तविक तथ्यों के साथ उनसे माफी माँगे। इस नोटिस में रिपब्लिक टीवी को 15 दिन का समय दिया गया है वरना यह मामला कोर्ट में फाइल किया जाएगा।
गौरतलब है कि 14 जून को सुशांत सिंह राजपूत का शव उनके घर में फंदे से लटका मिलने के बाद इस मामले में कई उतार-चढ़ाव देखने को मिले। उनकी प्रेमिका रिया चक्रवर्ती पर इस मामले में कई गंभीर आरोप लगे। इसके अलावा कई बॉलीवुड हस्तियाँ भी चर्चा में आईं। एक्टर के निधन के बाद उनके घर सबसे पहले पहुँचने वाले दोस्तों में संदीप का नाम होने के कारण उन पर भी कई इल्जाम लगाए गए।
इसके बाद संदीप सिंह, रिया चक्रवर्ती समेत कई लोग शक के घेरे में आ गए। वर्तमान में इस पूरे मामले की जाँच तीन जाँच एजेंसियों द्वारा की जा रही है- ईडी, एनसीबी, और सीबीआई। ड्रग मामले में गिरफ्तार होने के बाद रिया को हाल ही में बेल मिली है और उनका भाई शौविक अब भी जेल में है।
तनिष्क के विवादित वीडियो ने लव-जिहाद, हिन्दू-मुस्लिम विवाह, इनके पीछे छुपे नैरेटिव आदि विषयों को बहस का विषय बना दिया। ऐसा शायद ही कभी हुआ हो कि देश के विचारकों ने किसी भी बहस के बीच महात्मा गाँधी का जिक्र न किया हो। इसी कड़ी में सेक्स और टीनएज कॉलेज रोमांस की फिक्शन कथाएँ लिखने वाले चेतन भगत ने भी लगे हाथ एक ट्वीट कर कहा कि आज अगर महात्मा गाँधी होते तो वो इस विषय पर क्या कहते?
वास्तव में, महात्मा गाँधी खुद भी अपने हिन्दू बेटे मणिलाल का विवाह दूसरे मजहब की फातिमा से करने के खिलाफ थे। ख़ास बात यह थी कि मणिलाल फातिमा के प्रेम में पागलपन की हद तक डूबे हुए थे।
एमके गाँधी के बेटे मणिलाल और फातिमा का प्रेम सम्बन्ध तकरीबन 12 वर्षों तक चला। गाँधी के बेटे मणिलाल फातिमा से शादी करना चाहते थे। लेकिन जब उन्होंने अपने पिता एमके गाँधी से ‘परमिशन’ माँगी तो उन्होंने कई तर्क देते हुए इस शादी से स्पष्ट रूप से मना कर दिया और फ़ौरन मणिलाल का विवाह अपनी ही जाति में करवाकर मामले को ‘शांत’ कर दिया था।
गाँधी अंतरधार्मिक या अंतरजातीय विवाह के खिलाफ थे इस बात का प्रमाण अपने बेटे मणिलाल को लिखा गया उनका एक पत्र है। उनका मानना था कि ये उचित नहीं है। इससे सामाजिक संरचना और धार्मिक सदभावना को ठेस लगेगी, लिहाजा हिंदू धर्म में अंतरजातीय और अंतरधार्मिक शादियों पर प्रतिबंध उचित है।
मणिलाल करना चाहते थे ‘टिम्मी’ उर्फ़ फातिमा से विवाह
मणिलाल ने 1926 में अपने से छोटे भाई रामदास के जरिए पिता एमके गाँधी को संदेश भेजा कि वो टिम्मी (फातिमा) से शादी करना चाहते हैं। दरअसल फातिमा और उसके परिवार से एमके गाँधी के परिवार का दक्षिण अफ्रीका में रहने के दौरान गहरा रिश्ता था। इसी कारण मणिलाल को यकीन था कि उनके पिता इस शादी के लिए मान जाएँगे। लेकिन मणिलाल के पिता ने जवाब में जो पत्र भेजा, वो उनके लिए आशा के विपरीत था।
मोहनदास करमचंद गाँधी के इस पत्र में उन्होंने अपने पुत्र मणिलाल को संबोधित करते हुए लिखा था। इस पत्र को एमके गाँधी ने ‘एक मित्र के रूप में’ मणिलाल की इच्छा को ‘धर्म के विपरीत इच्छा’ कहते हुए शुरू किया! पत्र में उन्होंने जो लिखा, वह एक ‘आज्ञाकारी बेटे’ के लिए और अधिक चौंकाने वाला था। उसका सपना चकनाचूर हो गया।
एमके गाँधी इस पत्र में लिखते हैं-
“यदि तुम हिंदू होकर फातिमा के इस्लाम से जुड़े रहते हो, तो यह एक म्यान में दो तलवारें डालने जैसा होगा; या तुम अपनी आस्था से विमुख हो जाओगे। और फिर तुम्हारे बच्चों का धर्म क्या होना चाहिए? वे किस धर्म और आस्था के प्रभाव में बड़े होंगे? यह धर्म नहीं है, लेकिन केवल धर्म है, अगर फातिमा सिर्फ तुमसे शादी करने के लिए धर्मांतरण के लिए सहमत है। विश्वास एक परिधान जैसी चीज नहीं है जिसे हमारी सुविधा के अनुरूप बदला जा सकता है।”
“…धर्म के लिए एक व्यक्ति वैवाहिक जीवन को त्याग देगा, अपने घर को त्याग देगा, क्यों? यहाँ तक कि अपने जीवन को भी त्याग देगा।…ये धर्म नहीं अधर्म होगा, अगर फातिमा केवल शादी के लिए अपने धर्म को बदलना भी चाहे तो भी ठीक नहीं होगा। आस्था कोई कपड़ा नहीं, जो आप इसे कपड़े की तरह बदल लें। अगर कोई ऐसा करता है तो धर्म और घर से बहिष्कृत कर दिया जाएगा। ये कतई उचित नहीं..।”
“…ये रिश्ता बनाना समाज के लिए भी हितकर नहीं। ये शादी हिंदू मुस्लिमों पर अच्छा असर नहीं डालेगी। अंतरधार्मिक शादी करने के बाद तुम देश की सेवा के लायक नहीं रह जाओगे और शायद फीनिक्स आश्रम में रहकर ‘इंडियन ओपिनियन’ वीकली निकालने के लिए सही व्यक्ति नहीं रह सकोगे। तुम्हारे लिए भारत आना मुश्किल हो जाएगा। मैं ‘बा’ से तो इस बारे में कह भी नहीं सकता, वो तो इसकी अनुमति देने से रहीं। उसकी जिंदगी में यह हमेशा के लिए ही सबसे कड़वा अनुभव होगा।”
एमके गाँधी ने अपने बेटे को इस पत्र में लिखा, “तुम क्षणिक सुख के लिए ही ऐसी शादी के बारे में सोच रहे हो, जबकि तुम्हे मालूम नहीं कि वास्तविक सुख क्या है।”
दिलचस्प बात यह है कि मणिलाल की फातिमा से शादी तो नहीं हुई लेकिन एमके गाँधी के सबसे बड़े बेटे हरिलाल ने आगे चलकर 1936 में इस्लाम धर्म अपनाया और अपना नाम बदलकर अब्दुल्ला रख लिया था।
हैरानी की बात है कि एमके गाँधी ने कभी भी अपने परिवार से बाहर दूसरों के मामले में हिंदू-मुस्लिम विवाह के बारे में यही नजरिया नहीं अपनाया और खुलकर उन्हें समर्थन दिया। उन्होंने ऐसे ही दो विवाह- हुमायूँ कबीर (एक मुस्लिम की हिंदू बंगाली लड़की से शादी) और बीके नेहरू (जवाहर लाल नेहरू के चचेरे भाई की हंगरी की एक यहूदी से शादी) को संरक्षण दिया और इन विवाहों पर कोई आपत्ति नहीं जताई।
तनिष्क के विज्ञापन से शुरू हुआ विवाद
तनिष्क के जिस विज्ञापन से में एक हिंदू महिला की गोदभराई की रस्म को दिखाया गया था। इस लड़की की शादी मुस्लिम परिवार में हुई थी। इसमें हिंदू संस्कृति को ध्यान में रखते हुए मुस्लिम परिवार सभी रस्मों रिवाजों को हिंदू धर्म के हिसाब से करता दिखाया गया था।
विज्ञापन को लव जिहाद को बढ़ावा देने के आरोप लगने और सोशल मीडिया पर तनिष्क के बहिष्कार की अपीलों के बाद कंपनी ने विज्ञापन को वापस ले लिया। कुछ इसी तरह का विवाद होली के दौरान सर्फ एक्सेल के एक विज्ञापन को लेकर भी हुआ था।
तनिष्क का विज्ञापन आता है, जिसमें एक हिन्दू महिला की मुस्लिम परिवार में शादी दिखा कर ‘लव जिहाद’ को बढ़ावा दिया गया। तनिष्क के इस विज्ञापन पर काफी विवाद हुआ और आम लोगों की धार्मिक भावनाएँ आहत हुईं। नतीजा यह निकला कि तनिष्क ने इस मामले पर सफाई जारी की और बिना माफ़ी माँगे विज्ञापन हटा लिया। कुल मिला कर देश के बड़े ब्रांड के लिए विज्ञापन की मदद से धार्मिक समरसता को बढ़ावा देने की आड़ में नैतिक उपदेश देने का ज़रिया बन गया है।
तनिष्क ने अपने विज्ञापन में अंतर धार्मिक विवाह की आदर्श तस्वीर दिखाने का प्रयास किया, जो कि भारत में होने वाले असल अंतर धार्मिक विवाहों की सच्चाई से कहीं अलग है। विज्ञापन में ऐसा दिखाया गया कि एक मुस्लिम परिवार हिन्दू बहू की परम्पराओं के क्रियान्वन में मदद कर रहा है। एक बार के लिए हम ऐसे मामलों की सामाजिक सच्चाई को नज़रअंदाज़ भी कर दें तो एक हिन्दू और मुस्लिम के बीच शादी का क़ानूनी पहलू बहुत साफ़ तस्वीर पेश करता है। मुस्लिम क़ानून के अनुसार हिन्दू और मुस्लिम के बीच होने वाली शादी की सच्चाई कुछ ऐसी है:
हिन्दू धर्म से हट कर इस्लाम शादी को बराबर बढ़ावा देता है और ब्रह्मचर्य के सिद्धांत को सिरे से खारिज करता है। इस्लाम धर्म के अनुसार शादी समझौते या अनुबंध जैसा है, जबकि हिन्दू धर्म में इसे पवित्र प्रक्रिया और बंधन माना गया है। मुस्लिम क़ानून के अनुसार एक मुस्लिम और हिन्दू के बीच होने वाली शादी को वैधानिक नहीं माना जाता है। इसलिए बहुत से अधिकार ऐसे हैं, जिनका शादी के दौरान या शादी के बाद कोई उल्लेख ही नहीं है। सर्वोच्च न्यायालय के अनुसार ऐसी शादियों से होने वाले बच्चों का पिता की संपत्ति पर पूरा अधिकार होता है।
इस्लाम में कुल 3 तरह के निकाह होते हैं, साही, बाटिल और फ़ासिद।
साही निकाह को मुस्लिम क़ानून के अनुसार वैधानिक माना गया है, जिसमें हर प्रकार के नियमों और दिशा-निर्देशों का पालन किया जाता है। इस तरह के निकाह में पति और पत्नी दोनों के पास हर ज़रूरी अधिकार होते हैं। इस तरह के निकाह से होने वाले बच्चों का अपने माता-पिता की सम्पत्ति पर पूरा अधिकार होता है और उनके पास अपने घर वालों की पहचान होती है।
बाटिल निकाह में दम्पति को समान अधिकार नहीं मिलते हैं और इनसे होने वालो बच्चों को भी अवैध माना जाता है। इस्लामी क़ानून में निम्न कारणों के चलते इस निकाह को व्यर्थ माना जाता है:
जब दम्पति में रक्त सम्बंध हो या पूर्वज समान हों रिश्ते में ही सम्बंध हुआ हो पालन पोषण किसी दूसरे व्यक्ति की पत्नी से निकाह या क़ानूनी अटकल मौजूद होने के बावजूद विधवा से निकाह।
इस तरह के निकाह में विरासत सम्बंधी अधिकारों के लिए कोई मान्यता नहीं होती है। किसी सूरत में निकाह समाप्त होने पर पत्नी रिवाज़ी दहेज़ की अधिकारी होती है।
फ़ासिद निकाह में हिन्दू और मुस्लिम के बीच होने वाले निकाह शामिल होते हैं। इस तरह के निकाहों को मुस्लिम क़ानून के अनुसार अस्थायी माना जाता है क्योंकि इसमें तमाम औपचारिकताएँ और दिशा-निर्देश नहीं हैं। हालाँकि इस तरह की अनियमितताएँ निकाह को क़ानून के दायरे से बाहर नहीं करती हैं लेकिन उन्हें वैधानिक बनाने के लिए अनियमितताओं को हटाना पड़ेगा।
इस तरह के तमाम कारण, जिनके तहत निकाह अस्थायी या फासिद बनता है, उसमें सबसे बड़ा कारण है धर्म। हालाँकि धर्म का अंतर तब आड़े नहीं आता जब एक गैर-मुस्लिम पत्नी धर्म परिवर्तन करके इस्लाम स्वीकार कर लेती है या यहूदी अथवा ईसाई धर्म स्वीकार कर लेती है। जबकि एक गैर-मुस्लिम पति के मामले में उसे इस्लाम कबूल करना होता है। यानी एक मुस्लिम व्यक्ति के साथ मूर्ति पूजा या अग्नि की पूजा करने वाले व्यक्ति की शादी को इस्लाम के मुताबिक़ सही नहीं माना जाता है।
ऐसे में अगर हम इस क़ानून को विज्ञापन पर लागू करते हैं तो हिन्दू बहू और मुस्लिम पति के चलते यह निकाह फ़ासिद माना जाएगा। जब तक यह ख़त्म नहीं होता, तब तक इसमें कोई वैधानिक पहलू शामिल नहीं होता है और ख़त्म होने के बाद भी पत्नी सिर्फ दहेज़ की हक़दार होगी और उसका अपने पति की सम्पत्ति पर कोई अधिकार नहीं होगा। यानी तनिष्क में जिस तरह की शादी दिखाई गई है वह इस्लाम के अनुसार मान्य नहीं है क्योंकि उसका अपने पति की सम्पत्ति पर बराबर का अधिकार ही नहीं होगा।
इसके अलावा एक मूटा होता है, जिसका एक ही मतलब होता है इस्तेमाल या मज़ा। इस तरह की शादियाँ अस्थायी रूप से सिर्फ और सिर्फ क्षणिक सुख के लिए की जाती हैं। इस तरह की शादी मुस्लिमों के किसी भी वर्ग में मान्य नहीं हैं सिवाय शिया मुस्लिमों के। हालाँकि उनमें भी इस तरह की शादी का चलन लगभग न के बराबर है। इस शादी में साथ रहने की समयावधि भी तय होती है।
एक मुस्लिम व्यक्ति इस तरह की शादी का समझौता मुस्लिम, ईसाई, यहूदी या हिन्दू धर्म की महिला के साथ कर सकता है। वहीं मुस्लिम महिला किसी दूसरे धर्म के व्यक्ति के साथ इस तरह की शादी का समझौता नहीं कर सकती है। इसके अलावा शादी में समान अधिकारों के लिए कोई जगह नहीं होती है। इतना ही नहीं, एक मुस्लिम व्यक्ति इस तरह की शादी कितनी भी महिलाओं के साथ कर सकता है।
Tanishq के विज्ञापन को लेकर जारी विवाद को फेक न्यूज़ फैलाने का एक और मौका समझते हुए हिन्दू घृणा से सने प्रोपेगेंडा समाचार चैनल NDTV ने दावा किया कि कुछ लोगों ने गुजरात गाँधीधाम में तनिष्क के एक शोरूम पर हमला किया है। अब फर्जीवाड़े के बचाव में NDTV के कर्मचारी वाहियात तर्क देकर इसे सही साबित करने का प्रयास करते हुए भी देखे जा रहे हैं।
NDTV के मुताबिक, हमलावरों की भीड़ ने कथित तौर पर स्टोर मैनेजर को माफी पत्र लिखने के लिए कहा था। लेकिन वास्तव में, यह पूरी तरह से एक फेक न्यूज़ थी और पुलिस ने ऐसी किसी भी घटना से साफ़ इंकार किया।
अब NDTV अपने द्वारा चलाई गई इस फेक न्यूज़ पर सफाई देता नजर आ रहा है और इसके लिए उसने ‘हमला’ और ‘मतभेद’ जैसे शब्दों की परिभाषा तक बदल डाली है। जैसे ही NDTV के झूठ से पर्दा उठा, NDTV ने अपनी वेबसाइट पर मौजूद अपनी रिपोर्ट बदल दी कि तनिष्क स्टोर को ‘निशाना बनाया गया’ था, लेकिन ‘हमला’ नहीं किया गया।
कहानी यहीं पर समाप्त नहीं होती। अपने इस फर्जीवाड़े के खंडन होने के बाद भी, एनडीटीवी और उसके पत्रकारों ने अपने दावे पर अपना बचाव जारी रखा है कि तनिष्क स्टोर पर ‘भीड़ द्वारा हमला’ किया गया था, भले ही इस दावे के बाद उन्होंने कई बार अपनी रिपोर्ट बदल दी है।
NDTV के एक एंकर, संकेत उपाध्याय ने NDTV की फेक रिपोर्ट्स का बचाव करते हुए कहा कि गुजरात पुलिस ने वास्तव में स्वीकार किया है कि तनिष्क स्टोर को ‘धमकी’ दी गई थी। उन्होंने कहा कि कथित धमकियों के परिणामस्वरूप, प्रबंधक को एक माफीनामा लिखना पड़ा।
फेक न्यूज़ फैलाने के अपने हुनर और इसके बचाव के कुत्सित प्रयास में इसे तनिष्क स्टोर पर ‘भीड़ द्वारा हमला’ साबित करने के लिए साकेत उपाध्याय ने ’हमला’ शब्द का अर्थ ही बदल दिया। NDTV के एंकर संकेत उपाध्याय ने एक ट्वीट के जरिए समझाने का प्रयास किया है कि ‘हमला’ करने का अर्थ ‘कटु आलोचना’ या ‘किसी से सहमत ना होना’ होता है।
संकेत उपाध्याय ने दावा किया कि NDTV ने ‘भीड़ द्वारा हमला’ शब्द का इस्तेमाल किया था, क्योंकि डिक्शनरी के अनुसार, शब्द ‘अटैक’ का अर्थ है- “दृढ़ता से यह कहना कि आप किसी के साथ सहमत नहीं हैं।”
वास्तव में NDTV कुछ और नहीं बल्कि ‘असहमति’ को ‘भीड़ द्वारा किया गया हमला’ साबित करना चाहता है। उदाहरण के लिए, अगर किसी को NDTV द्वारा फर्जी समाचार दिलाया जाना नापसंद हो और वे NDTV से इसके लिए माफ़ी माँगने को कहे, तो NDTV के एंकर की समझ के अनुसार, NDTV चैनल इस बात को ‘भीड़ द्वारा किया गया हमला’ के रूप में पेश करने के लिए स्वतंत्र हैं।
NDTV ने तनिष्क स्टोर पर ‘मॉब अटैक’ की चलाई थी फेक न्यूज़
NDTV की रिपोर्ट में कहा गया था कि गुजरात के गाँधीधाम में तनिष्क स्टोर पर हमला हुआ है। हमला होने के बाद स्टोर मैनेजर के माफी पत्र में कथित तौर पर सेक्युलर विज्ञापन प्रसारित करके हिंदुओं की भावनाओं को आहत करने के लिए कच्छ जिले के लोगों से माफी माँगवाई गई।
गौरतलब है कि गुजरात के गृहमंत्री ने भी NDTV का खंडन करते हुए कहा, “NDTV द्वारा गाँधीधाम (गुजरात) के तनिष्क स्टोर पर हमले की फैलाई गई खबरें पूर्णतः झूठ और फ़र्ज़ी हैं। यह बिलकुल ही गलत मंशा से गुजरात में कानून-व्यवस्था बिगाड़ने और हिंसा भड़काने के उद्देश्य से किया गया कार्य है। मैंने इन लोगों पर मामला दर्ज करने को कहा है और फेक न्यूज चलाने वालों पर सख्त कार्रवाई के आदेश दिए हैं।”
Tanishq का विवादित वीडियो
तनिष्क के विज्ञापन में एक हिंदू महिला की गोदभराई की रस्म को दिखाया गया था। इस लड़की की शादी मुस्लिम परिवार में हुई थी। इसमें हिंदू संस्कृति को ध्यान में रखते हुए मुस्लिम परिवार सभी रस्मों रिवाजों को हिंदू धर्म के हिसाब से करता दिखाया गया था।
विज्ञापन को लव जिहाद को बढ़ावा देने के आरोप लगने और सोशल मीडिया पर तनिष्क के बहिष्कार की अपीलों के बाद कंपनी ने विज्ञापन को वापस ले लिया। कुछ इसी तरह का विवाद होली के दौरान सर्फ एक्सेल के एक विज्ञापन को लेकर भी हुआ था।
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म और व्हाट्सऐप पर एक मैसेज तेजी से वायरल हो रहा है। मैसेज में यह प्रसारित किया जा रहा है कि हिमालया ड्रग कंपनी के मालिक मुहम्मद मनल ने अपने सोशल मीडिया प्रोफाइल पर भारत विरोधी मैसेज पोस्ट किया है। वायरल वीडियो में एक आदमी को मुस्लिम युवाओं को भारत के परिप्रेक्ष्य को अपने पक्ष में बदलने के लिए उकसाते हुए सुना जा सकता है।
मुहम्मद मनल ने 1930 में हिमालया ड्रग कंपनी की स्थापना की थी। इसका मुख्यालय कर्नाटक के बेंगलुरु में स्थित है। कंपनी मुख्य रूप से स्वास्थ्य देखभाल उत्पादों का उत्पादन करती है, जिसमें आयुर्वेदिक सामग्री पर आधारित कई उत्पाद शामिल हैं। इसके उत्पाद न केवल भारत में बल्कि संयुक्त राज्य अमेरिका, मिडिल ईस्ट और दुनिया के अन्य हिस्सों में भी लोकप्रिय हैं। कंपनी वर्तमान में 106 से अधिक देशों में अपने प्रॉडक्ट बेचती है। बता दें कि 1955 में इंट्रोड्यूस किया गया हिमालया प्रोडक्ट लिव-52 (जो लिवर की बीमारियों के लिए है) कंपनी के प्रसिद्ध दवाइयों में से एक है।
वायरल मैसेज की मानें तो वीडियो में दिखाई देने वाला व्यक्ति हिमालया ड्रग कंपनी का मालिक और संस्थापक मुहम्मद मनल है। उस तरह से देखा जाए तो वीडियो में दिखने वाला व्यक्ति कम से कम सौ साल का होना चाहिए क्योंकि कंपनी की स्थापना 1930 में हुई थी। लेकिन तथ्य यह है कि कंपनी के मालिक मनल का 1986 में निधन हो गया है, इसलिए वीडियो में मौजूद व्यक्ति वो नहीं हो सकते।
गौरतलब है कि हिमालया ने 14 अक्टूबर को अपने सोशल मीडिया एकाउंट पर एक मैसेज पोस्ट करते हुए आगाह किया था कि कंपनी के बारे में नकली और मनगढ़ंत कई फर्जी सोशल मीडिया पोस्ट और मैसेज व्हाट्सएप फॉरवर्ड किए जा रहे हैं। कंपनी ने चेतावनी भी दी थी कि जिसने भी किसी भी प्रकार का फर्जी पोस्ट या मैसेज फॉरवर्ड किया है, उसे तुरंत हटा दे वरना उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
यह पहली बार नहीं है जब हिमालया ड्रग कंपनी इस तरह के मुद्दे का सामना कर रही है। मार्च 2020 में भी सोशल मीडिया और व्हाट्सएप पर इसी तरह के संदेश प्रसारित किए जा रहे थे। कई ऐसे मैसेज वायरल हुए थे, जिनमें यह बताया जा रहा था कि कंपनी आतंकवादियों को फंडिंग करती है। साथ ही पोस्ट में हिमालया ड्रग कंपनी के प्रेसिडेंट और सीईओ फिलीप हेयडन की फ़ोटो को भी निशाना बनाया गया था। पोस्ट में यह उल्लेख किया गया था कि तस्वीर में दिख रहा व्यक्ति कंपनी का संस्थापक एम मनल है।
उस समय भी कंपनी ने एक स्पष्टीकरण जारी करते हुए बताया था कि सोशल मीडिया पर हिमालया के खिलाफ सभी पोस्ट फर्जी हैं। कंपनी ने आगे कहा था कि हिमालया ड्रग कंपनी स्वतंत्रता से पहले की “मेड इन इंडिया” वेलनेस ब्रांड है, जो “हीलिंग” धर्म का अनुसरण करती है।
These misleading negative rumors, comments, & photographs about The Himalaya Drug Company that are going around on social media only spread hate & negativity. Read this article from Boom Live https://t.co/JR7hGBIWBq & get factual clarification about Himalaya. #Fakenews
कंपनी की वेबसाइट पर अगर सर्च किया जाए तो यह पता चलेगा कि वीडियो में मौजूद व्यक्ति एम मनल नहीं है। वास्तव में इस कंपनी के संस्थापक का 1986 में, लगभग 35 साल पहले निधन हो गया था। इसलिए हम इस बात का पता लगा रहे हैं कि आखिर वीडियो में मौजूद व्यक्ति कौन है।
गूगल की रिवर्स इमेज से की गई छोटी सी सर्च से यह पता लगा कि वीडियो में मौजूद शख्स सऊदी अरब में रहने वाला एक व्यक्ति है, जिसका नाम नाकी अहमद नादवी है। फेसबुक पेज पर उसकी वेबसाइट का लिंक था, लेकिन वेबसाइट पर उसके बारे में कोई जानकारी नहीं थी। यह केवल डिफ़ॉल्ट पेज था, जिसे इस साल मई में बनाया गया था।
उसका फेसबुक पेज 22 अगस्त 2020 को बनाया गया था। वह अक्सर इस्लाम को सर्वोच्च बताते हुए कंटेंट पोस्ट करता है और चाहता है कि इस्लामिया उम्माह इस दुनिया पर राज करे।
‘हिमालया ड्रग कंपनी के संस्थापक’ द्वारा एक बयान के रूप में प्रसारित किया जा रहा वायरल वीडियो अगस्त 2020 में राम मंदिर भूमि पूजन के बाद उसके फेसबुक अकाउंट पर पोस्ट किया गया था।
इसके अलावा हमें एक ही नाम और तस्वीरों के साथ दो ट्विटर अकाउंट भी मिले। एक को 2014 में बनाया गया था, जबकि दूसरा 2020 में बनाया गया था।
उसके पुराने ट्विटर अकाउंट के अनुसार, लोकेशन में दिल्ली भारत का उल्लेख था। वहीं नए एकाउंट में लोकेशन रियाद, सऊदी अरब में बताया गया। वह वर्तमान में सऊदी अरब माइनिंग कंपनी – माडेन में एक प्रशासक के रूप में काम कर रहा है।
उसका एक Youtube चैनल भी है, जो दिसंबर 2019 में बनाया गया था। अपने पहले कुछ वीडियो में इस शख्स ने NRC, CAA और अन्य मुद्दों के बारे में गलत बयान दिए थे, जो उस अवधि के दौरान चर्चा में थे। लगभग दो महीने पहले उसने सीएए विरोध में हुए दंगों के सिलसिले में गिरफ्तार किए गए शरजील इमाम, डॉ. कफील और अन्य के पक्ष में एक वीडियो भी पोस्ट किया था।
उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ स्थित विधानसभा के सामने एक महिला (पहले नाम अंजना तिवारी, बाद में आएशा रज़ा) ने आत्मदाह का प्रयास किया था। इस घटना में उसका शरीर 90 फ़ीसदी तक झुलस गया था, अब उस महिला की मृत्यु हो गई है। इस मामले में कॉन्ग्रेस के अनुसूचित प्रकोष्ठ के चेयरमैन आलोक कुमार के विरुद्ध आत्मदाह करने के लिए उकसाने का मुकदमा दर्ज किया गया।
ज़ी न्यूज़ में प्रकाशित ख़बर के अनुसार पूरा घटनाक्रम लव जिहाद का बताया गया। 8 अक्टूबर को यह घटना सबसे पहले सामने आई, जब महाराजगंज की निवासी महिला ने डीआईजी कार्यालय में शिकायत दर्ज कराई थी। इसमें उसने कहा था कि महाराजगंज के कॉन्ग्रेस नेता आलोक कुमार ने आत्मदाह के लिए उकसाया था।
इसके अलावा उसने अपनी शिकायत में लिखा था कि साल 2012 में उसकी (अंजना तिवारी की) शादी एक युवक से हुई थी। युवक नशे का आदी था, इसलिए साल 2015 में दोनों का रिश्ता टूट गया था। इसके बाद महिला ने अपनी बहन के साथ एक दुकान पर काम करना शुरू कर दिया, तभी उसकी आसिफ रज़ा नाम के युवक से बात शुरू हुई।
35 वर्षीय महिला (पहले नाम अंजना तिवारी, बाद में आएशा रज़ा) ने आसिफ नाम के युवक से निकाह किया था। लेकिन इस निकाह के पहले की कहानी रोचक है। स्थानीय मीडिया और जी न्यूज की रिपोर्ट के अनुसार निकाह से पहले आसिफ ने अंजना के साथ काफी समय तक दुष्कर्म (निकाह के नाम पर) किया था। इतना ही नहीं, निकाह के बाद आसिफ सऊदी अरब चला गया और फिर आसिफ के परिजन आएशा (निकाह के बाद अंजना का नाम) को प्रताड़ित करने लगे थे।
अन्य स्थानीय मीडिया पोर्टलों पर प्रकाशित खबर के अनुसार आसिफ ने मूल रूप से झारखंड की रहने वाली अंजना तिवारी को बहला फुसला कर अपने प्रेम जाल में फँसाया। फिर शादी का झाँसा देकर उसके साथ दुष्कर्म करता रहा। महिला ने इस तरह के तमाम अत्याचार झेलने के बाद पुलिस से शिकायत की, फिर आसिफ ने मौलवी बुला कर निकाह रचा लिया।
दैनिक जागरण में प्रकाशित खबर
दोनों का निकाह तो हो गया लेकिन इसके बाद आसिफ के परिवार वालों ने महिला (आएशा) को स्वीकार करने से मना कर दिया और फिर वह महाराजगंज में ही किराए का घर लेकर महिला के साथ रहने लगा। इसके कुछ समय बाद आसिफ दुबई चला गया और वहाँ से महिला पर धर्म परिवर्तन का दबाव (निकाह हुआ था, नाम भी बदल गया था, शायद यह दबाव धार्मिक रहन-सहन को लेकर हुआ होगा) बनाने लगा।
आसिफ ने लगातार धर्म परिवर्तन का दबाव बनाया और महिला के नकारने पर पहले बात करना बंद किया और अंत में आर्थिक मदद भी बंद कर दिया। इसके बाद वह अपने ससुराल पहुँची लेकिन वहाँ भी आसिफ के परिजनों ने उसके साथ मारपीट की और प्रताड़ित किया। इतना ही नहीं, आसिफ के परिजनों ने भी महिला पर धर्म परिवर्तन का दबाव बनाया। उन्होंने भी महिला को अंजना तिवारी से आएशा रज़ा/आएशा बेगम बनने की बात कही। इन तमाम बातों से क्षुब्ध होकर उसने यह कदम उठाया।
उत्तर प्रदेश में विधानसभा के सामने ही अंजना तिवारी ने खुद के शरीर में आग लगा कर आत्मदाह का प्रयास किया था। महिला ने जैसे ही खुद को आग लगाई, पुलिस ने पहुँच कर उसे बचाया और अस्पताल ले जाया गया। हालाँकि चिकित्सकों ने पहले ही महिला की स्थिति को गम्भीर बता दिया था। बुधवार (14 अक्टूबर 2020) से महिला की स्थिति बिगड़नी शुरू हो गई थी। अब उसकी मृत्यु की सूचना महाराजगंज और गोरखपुर पुलिस को भी दी जा चुकी है।
तनिष्क ज्वैलरी के विवादित वीडियो ‘तनिष्क एकत्वम’ के चर्चा में आने, उस पर हुए विवाद के होने और उसके नाम पर NDTV द्वारा चलाई जा रही ‘साम्प्रदायिक फेक न्यूज़’ की भरपाई में अब पूरी लिबरल जमात जुट गई है। इस भरपाई के लिए मोर्चा संभालने वालों में एक नाम प्रोपेगेंडा वेबसाइट ‘दी वायर’ की कथित जर्नलिस्ट आरफ़ा खानम शेरवानी का भी है। लेकिन इस भरपाई के लिए आरफा खानम शेरवानी ने एकबार फिर हिन्दू-घृणा का मार्ग चुनना पसंद किया।
तनिष्क के वीडियो पर जारी विवाद के बीच आरफा खानम शेरवानी ने एक ट्वीट किया। इस ट्वीट में आरफा खानम ने लिखा- “लड़की को माँ की कोख में मार देने वाले, दहेज के नाम पर ज़िंदा जला देने वाले, लड़की की ‘सही’ जगह रसोई व बिस्तर के परे न देख पाने वाले कैसे बर्दाश्त करेंगे, एक मुस्लिम घर में हिंदू बहू को प्यार-सम्मान मिले और उसकी पहचान भी सुरक्षित रह पाए। ये लड़कियों के, उनकी आज़ादी के दुश्मन हैं।”
आरफा खानम की कोशिश इस ट्वीट में हिन्दुओं के प्रति अपनी भड़ास निकालने की थी यह बात छुपी हुई नहीं है लेकिन उनके इस ट्वीट पर कुछ लोगों ने उन्हें याद दिलाया कि आरफा का यह ट्वीट तो खुद उन्हीं के मजहब यानी, इस्लाम पर हमला है।
PureWoke नाम के एक ट्विटर यूजर ने आरफा खानम के ट्वीट के जवाब में इस्लाम की पवित्र पुस्तक ‘कुरान’ की ही एक पंक्ति का स्क्रीनशॉट ट्वीट किया जिसमें इस्लाम के अनुयायियों को महिलाओं और उनकी सेक्सुएल्टी पर अधिकार के निर्देश दिए गए हैं –
इस्लाम की पाक किताब से ली गई इन पंक्तियों का हिंदी अर्थ कुछ इस तरह से है –
इसके अलावा, दुर्भाग्य से हिन्दुओं को निशाना बनाने के बजाय आरफा खानम का यह ट्वीट उनके ही खिलाफ जाता नजर आया और लोगों ने उन्हें याद दिलाया कि उनका यहाँ ट्वीट पूरी तरह से किसी धर्म के खिलाफ है। आरफा खानम शेरवानी लगातार इस पर सफाई देती नजर आ रही हैं कि उनका ऐसा विचार नहीं था।
इसी की सफाई में आरफा खानम ने लिखा, “पितृसत्ता को जब चोट लगती है तो वो धार्मिक बँटवारे का सहारा लेती है। ऊपर वाली ट्वीट किसी भी तरह हिंदू धर्म पर टिप्पणी नहीं है। बल्कि उस सोच पर है जो एक महिला को उसकी मर्ज़ी का जीवन जीने, जीवनसाथी चुनने के अधिकार से वंचित करती है, और महिला के शरीर व सेक्सुएलिटी पर क़ब्ज़ा चाहती है।”
हिन्दुओं को निशाना बनाकर लिखी गई इन बातों पर आरफा खानम लोगों को जवाब देती नजर आ रही हैं –
Nowhere in my tweet I said this is about a particular religion unless you are suggesting that dowry deaths and female foeticide only exist in that religion. Pls blame your ‘guilty conscience’ not me. https://t.co/g4fsIiqm8C
Wow !Why would you presume Hindus were singled out in referring to those evils? Why ignore the clarification in the subtweet where I said the tweet is against patriarchy in all religions? We know ‘two sides champions’ all too well. Last thing I need is your secularism certificate https://t.co/nSnti4BkhU