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मृतक पुजारी के परिवार के लिए जुटाए ₹25 लाख, गाँधी जी का संदेश लेकर राजस्थान पहुँचेंगे BJP नेता कपिल मिश्रा

राजस्थान के करौली जिले के सपोटरा इलाके में जमीन विवाद में जिंदा जलाए गए पुजारी बाबूलाल वैष्णव की मौत के बाद दिल्ली के भाजपा नेता कपिल मिश्रा रविवार (अक्टूबर 11, 2020) दोपहर को करौली पहुँचेंगे। वे पुजारी बाबूलाल वैष्णव के परिजनों से मुलाकात कर उन्हें करीब 25 लाख रूपए की आर्थिक सहायता सौंपेंगे।

मंदिर के पुजारी को जिन्दा जलाए जाने और उनकी मृत्यु की घटना के बाद भाजपा नेता कपिल मिश्रा ने सोशल मीडिया के जरिए एक अपील कर मृतक पुजारी के परिवार को आर्थिक मदद करने की अपील की थी। इसके बाद कई सामाजिक संस्थाओं और लोगों ने बढ़कर आर्थिक मदद के लिए हाथ आगे बढ़ाए।

बाबूलाल वैष्णव नाम के पुजारी को कथित तौर पर 6 लोगों ने आग लगा दी थी, वो मंदिर की भूमि को हथियाना चाहते थे। भाजपा नेता ने रविवार को ट्विटर पर लिखा, “हम दिल्ली से निकल चुके हैं पुजारी जी के परिवार से मिलने के लिए। पूरी दुनिया से पुजारी के परिवार के लिए 25 लाख रुपए इकट्ठे हुए हैं। महात्मा गाँधी द्वारा बताए सबसे आखिरी, कमजोर, असहाय, निर्बल व्यक्ति का प्रतीक है पुजारी जी और उनका परिवार।”

कपिल मिश्रा ने सफर के बीच ही एक वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर पोस्ट किया, जिसमें उन्होंने बताया कि वो बाबूलाल वैष्णव के घर जाने के लिए दिल्ली से निकल चुके हैं। इसके साथ ही वो वीडियो में कहते हैं, “पिछले 2 दिनों में, हमने उनके परिवार की आर्थिक मदद करने के लिए एक अभियान चलाया था। हमने उनके परिवार के लिए लगभग ₹ 25 लाख रुपए एकत्र किए हैं। हम इसे परिवार को सौंप देंगे। मैं उन सभी को धन्यवाद देना चाहता हूँ जिन्होंने अपने परिवार के लिए आर्थिक मदद भेजी है।”

वीडियो में आगे कपिल मिश्रा ने कहा, “महात्मा गाँधी ने कहा था समाज का आखिरी व्यक्ति, सबसे कमजोर, असहाय, निर्बल उसको अगर सच में समझना है तो पुजारी के परिवार को देखिए। पुजारी का परिवार वह आखिरी व्यक्ति है, जिसे कोई भी दबंग आकर उसे कुचलने का प्रयास करता है। अत्याचार करता है। आज मुझे कम से कम इस बात का संतोष है कि हम नानाजी देशमुख के जन्मतिथि के दिन समाज के उस आखिरी व्यक्ति के लिए कुछ कर पा रहे हैं।”

राजस्थान में करौली जिले के बूकना गाँव में जमीन को लेकर दो पक्षों के बीच विवाद में 50 वर्षीय पुजारी बाबूलाल वैष्णव को पेट्रोल डालकर जिंदा जला दिया गया। बताया जाता है कि बुधवार शाम को कैलाश, शंकर, नमो, किशन, रामलखन जमीन पर कब्जा कर छप्पर तानने लग गए। बुजुर्ग पुजारी ने उन्हे रोकने का प्रयास किया तो आरोपितों ने बाजरे की कड़बी और पेट्रोल की बोतल डालकर आग लगा दी। इससे पुजारी बुरी तरह झुलस गए।

बाबूलाल वैष्णव को गंभीर हालत में जयपुर के एसएमएस अस्पताल में भर्ती कराया गया था और शुक्रवार सुबह उन्होंने दम तोड़ दिया। इस बीच, राज्य के साधुओं ने मंदिर के पुजारी की हत्या के विरोध में सड़कों पर उतरकर प्रदर्शन किया। बाबूलाल गाँव के राधागोविंद मंदिर के प्रधान पुजारी थे।

पुलिस ने पुजारी पर पेट्रोल डालने के मुख्य आरोपित कैलाश मीणा को गिरफ्तार कर लिया है। पूरे मामले में पुलिस-प्रशासन की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं। ‘दैनिक भास्कर’ की खबर के अनुसार, प्रशासन इस मामले को शुरुआत में ‘आत्मदाह’ बताती रही। पुजारी ने मौत से पहले ही आरोपित कैलाश का नाम ले लिया था, बावजूद इसके उसे गिरफ्तार करने में पुलिस ने 24 घंटे का समय लगा दिया। लोगों की माँग है कि इस मामले के जाँच अधिकारी को भी हटाया जाए। शाम 6 बजे पुजारी का शव गाँव पहुँचा, जिसके बाद पीड़ित परिजनों ने शव का अंतिम संस्कार से इनकार कर दिया।

भारत की अंतरिक्ष उड़ान को रोकने वाला सिनेटर आज बनना चाह रहा US प्रेसिडेंट, भारतीय समुदाय से माँग रहा वोट

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्विटर पर एक थ्रेड के जरिए एविएशन सिक्योरिटी विशेषज्ञ और लेखक शिरीष थोराट ने एक वाकया शेयर किया है। यह आगामी अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में डेमोक्रेट उम्मीदवार जो बायडेन द्वारा 28 साल पहले लिए गए उस फैसले को याद करता है, जिससे भारत को खासा नुकसान हुआ था।

शिरीष थोराट ने इसे ‘इंडियन क्रायोजेनिक इंजन एंड अ यूएस सिनेटर’ नाम दिया है। इसमें बताया गया है कि किस तरह रूस पर नियंत्रण के लिए अमेरिका ने 90 के दशक की शुरुआत में उसे 2400 करोड़ डॉलर की आर्थिक सहायता की पेशकश की थी।

इसी दौरान ‘क्रायोजेनिक इंजन’ के लिए भारत और रूस के बीच एक करार होने जा रहा था, जिसके तहत भारत रूस से 25 करोड़ डॉलर में इसे खरीदने वाला था। रूस उस वक़्त आर्थिक रूप से उतनी अच्छी स्थिति में नहीं था और उसे अमेरिका से आर्थिक सहायता की ज़रूरत भी थी। उस वक़्त इन इंजिन्स की भारत को आवश्यकता भी थी, खासकर PSLV और GSLV से आगे बढ़ने के लिए। ये इंजन फ्यूल और ऑक्सीडायजर से चलते हैं।

अमेरिका के राष्ट्रपति जॉर्ज एच डब्ल्यू बुश को इससे कोई आपत्ति नहीं थी, लेकिन एक अमेरिकी सिनेटर ने ऐन समय पर वीटो लगा कर कहा कि अगर रूस भारत के साथ इस करार को करता है तो फिर उसे अमेरिकी सहायता नहीं मिलेगी। ये वो दौर था, जब चीन जम कर रूस की तकनीकें खरीद रहा था और इसका भरपूर फायदा उठाते हुए आगे बढ़ रहा था। अमेरिका और उक्त सिनेटर को इससे कोई मतलब नहीं था।

चीन और रूस के बीच चल रहे इस खरीद-बेच को लेकर वो आँख मूँदे रहे। जिस सिनेटर ने रूस-भारत की इस करार को रोक कर भारत की अंतरिक्ष की उड़ान में बाधा पहुँचाई, वो आज अमेरिकी चुनाव में राष्ट्रपति का उम्मीदवार है और उसका नाम है जो बायडेन।

1992 में ‘लॉस एंजेल्स टाइम्स’ के एक लेख में इस खबर के डिटेल्स प्रकाशित हुए थे। शिरीष ने इसका स्क्रीनशॉट शेयर करते हुए बताया कि उनकी लाख कोशिशों के बावजूद ट्विटर ने उन्हें इस लेख का लिंक नहीं लगाने दिया, न जाने क्यों।

इस खबर में बताया गया है कि कैसे सीनेट के फॉरेन रिलेशंस कमिटी ने रूस से कहा कि वो भारत के साथ 250 मिलियन डॉलर के करार पर आगे बढ़ा तो उसे 24 बिलियन डॉलर की अमेरिका की आर्थिक सहायता नहीं मिलेगी। जो बायडेन ने तब इसे ‘खतरनाक’ बताते हुए इसे रोकने के लिए प्रस्ताव दिया था। उन्होंने इसे मानवाधिकार और आर्म्स करारों के उल्लंघन के साथ जोड़ कर देखा था। आज जो बायडेन भारतीय समुदाय का वोट माँग रहे हैं।

जो बायडेन की पार्टी ने भारतीय मूल की कमला हैरिस को उप-राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाया है। जो बायडेन की वेबसाइट पर दावा किया गया है कि फॉरेन रिलेशंस कमिटी’ के अध्यक्ष के रूप में उन्होंने हमेशा अमेरिकी-भारतीयों का ध्यान रखा। उनका दावा है कि डोनाल्ड ट्रम्प के कार्यकाल में भारतीयों को भेदभाव और हमले का सामना करना पड़ा है। उन्होंने भारतीयों को धार्मिक क्रियाकलाप के लिए अस्थायी आर-1 वीजा देने की बात भी कही है।

हाल के दिनों में ओसामा बिन लादेन की 33 वर्षीय भतीजी नूर ने कहा था कि जब बराक ओबामा अमेरिका के राष्ट्रपति थे और जो बायडेन उप-राष्ट्रपति हुआ करते थे, उस दौर में आईएसआईएस को बढ़ने का अच्छा-खासा मौक़ा मिला। नूर का मानना है कि इसी कारण खूँखार वैश्विक आतंकी संगठन आईएसआईएस का यूरोप तक प्रसार हुआ। उन्होंने कहा कि डोनाल्ड ट्रम्प ने ये दिखा दिया है कि वो विदेशी ताकतों से अमेरिका को और हमें बचा सकते हैं।

राहुल गाँधी की आँखो में सेक्युलर सितारा बनने की चाह में हरीश ‘फ़ूड ब्लॉगर’ रावत ने उत्तराखंड की पारंपरिक टोपी को संघी टोपी बताया

‘चोर जो चोरी करता तो कम पिटता बाप का नाम बताकर और पिटा’ – यह एक मशहूर कहावत है, लेकिन उत्तराखंड में अपनी पार्टी-लाइन की विचारधारा की भाँग बोने को आतुर राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री, पार्ट टाइम फ़ूड ब्लॉगर और कॉन्ग्रेस के कद्दावर नेता हरदा उर्फ़ हरीश चंद्र सिंह रावत जी का यह डिलीट किया हुआ फेसबुक पोस्ट इसका एक नायाब नमूना है।

पिछले विधानसभा चुनावों में दोनों विधानसभा सीट से हारने वाले कॉन्ग्रेसी नेता हरीश रावत ने शनिवार (अक्टूबर 10, 2020) की शाम फेसबुक पर एक दीक्षांत समारोह की तस्वीर, जिसमें कि मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत भी मौजूद थे, शेयर की और इसमें मौजूद लोगों द्वारा पहने गए परिधान को ‘भगवाकरण’ से जोड़ दिया। इससे पहले कि राज्य के सांस्कृतिक गौरव के अपमान की इस ‘उपलब्धि’ को राहुल गाँधी को दिखाकर अपने नम्बर बढ़ाते, उन्हें अज्ञात कारणों से यह पोस्ट डिलीट करनी पड़ी।

हरीश रावत की वो पोस्ट, जो ‘अज्ञात’ कारणों से डिलीट कर दी गई

पारम्परिक परिधान, संस्कृति और खादी के प्रचार के उद्देश्य से UGC द्वारा यह राय दी गई थी कि लोग औपनिवेशिक काल की परम्परा से हटकर अपनी संस्कृति से जुड़े परिधान पहनकर ही दीक्षांत समारोह में आएँ और सभी विश्वविद्यालय अपने रीजनल अटायर में दीक्षांत समारोह करें। BHU से लेकर,मुंबई, झारखण्ड आदि के विश्वविद्यालयों ने इस परम्परा का अनुसरण किया।

लेकिन कॉन्ग्रेस के खानदान विशेष की पार्टी लाइन से हरदा कैसे बगावत करते? जाली वाली टोपी के प्रेम में ‘हरदा’ अपने राज्य की पारम्परिक सांस्कृतिक पहचान को भूलकर उसे संघी बता देते हैं। हरदा सफ़ेद और हरे के प्रेम में इतना डूब चुके हैं कि वह अपनी संस्कृति का उपहास बनाने तक का मौका नहीं चूक रहे।

ऐसे कैसे चलेगा हरदा?

अक्सर देखा गया है कि कॉन्ग्रेस के ‘भारत तोड़ो’ प्रोजेक्ट के कमांडरों के सिपहसालारों की फेहरिश्त में हरदा भी स्थान रखते हैं। हरदा जिस टोपी को देखकर हिन्दू घृणा और कदाचित अवचेतन में समेटी पहाड़ियों के प्रति नफ़रत से भर उठे, जिसका सीधा तार भगवाकरण व आरएसएस से जोड़ कर ‘फेक न्यूज़’ फैलाने लगे, दरअसल वह सदियों से पहने जाने वाला उत्तराखंड राज्य का परिधान पहाड़ी टोपी है, जिस पर ‘नेहरू कैप’ का पर्चा भी कॉन्ग्रेस ने ही लगाया था।

बाइस इंची इस पहाड़ी टोपी को स्वयं हरदा कई बार पहन चुके हैं। ख़ास बात यह है कि हरदा को पहाड़ी टोपी के बजाए जालीदार टोपी का स्मरण अधिक रहता है। जिसकी अपनी टोपी में छेद ही छेद हों उनको दूसरों की टोपी पर बात नही करनी चाहिए। हरीश रावत इस पारम्परिक पहनावे का पहले भी अपमान कर चुके हैं।

पहाड़ो के गाँव में आज भी बुजुर्ग यह टोपी पहनते हैं। उन्होंने कभी आरएसएस की शाखा में हिस्सा नहीं लिया। वो नेहरू के नाम से भी परिचित नहीं हैं। बस सुबह उठकर सबसे पहले इस टोपी को अपने सर पर रखकर अपनी खेती और किसानी की दैनिक दिनचर्या में लीन हो जाते हैं।

लेकिन हरदा की दिनचर्या इससे हटकर है। किसान वो हैं नहीं और सांस्कृतिक गौरव के सम्मान की इजाजत उन्हें उनकी पार्टी लाइन देती नहीं! उनकी आस्था जिस परिवार की मिट्टी में बसती है, उसकी चरणधूल को किसी सुबह अगर वो अपने सर रखना भूल जाएँ तो यह चौंकाने वाली बात अवश्य होगी। यही वजह है कि राज्य की संस्कृति पर किए गए इस हमले के कुत्सित प्रयास पर माफ़ी माँगने के बजाय हरदा ने एक और जहर बुझा पोस्ट किया और अब भी पारम्परिक परिधान को आरएसएस से जोड़ते नजर आए –

भगवा से नफ़रत क्यों?

पहली बात यह कोई आरएसएस की सभा नही है, जैसा हरीश चंद्र सिंह रावत जी ने ख़ुद माना है और अगर यह किसी विश्वविद्यालय का दीक्षांत समारोह है तो उसमें पारंपरिक परिधान पहनने में किसी को भी चनुने काटने जैसी कोई आपत्ति हो यह बौखलाहट से ज्यादा कुछ भी नहीं।

हरदा के हिसाब से यह तस्वीर लखनऊ में दिखाई जाए तो आरएसएस की सभा प्रतीत होगी। अच्छा! तो इस ‘कु’तर्क से बनारस हिंदू विश्विद्यालय का साड़ी, धोती कुर्ता, पगड़ी पहनकर दशकों से होने वाला दीक्षांत समारोह आरएसएस का सदस्यता अभियान ठहरता है। इस व्यापक भगवाकरण का जिम्मेदार कॉंग्रेस नहीं? अगर नहीं तो अब किसी राज्य के किसी विश्विद्यालय द्वारा पारंपरिक परिधान में दीक्षांत कराने पर आखिर इतनी हायतौबा क्यों।

राहुल गाँधी की भक्ति में उसी मानसिक स्तर तक पहुँच गए हरदा

हरीश रावत का सोशल मीडिया प्रोफाइल अगर आप देखेंगे तो यही नजर आता है कि अधिकतर समय वो पार्टी के हमेशा से ही ‘पीएम इन वेटिंग’ रहे राहुल गाँधी के पोस्ट शेयर करते हैं या फिर उनके नाम का ही कलमा बाँचते नजर आते हैं। इसके अलावा वो एक काम और भी करते देखे जाते हैं और वो है ‘फ़ूड ब्लॉगिंग’ का। आखिरी बार जब हरीश रावत फ़ूड ब्लॉगिंग के लिए मशहूर हुए थे, तब वो ‘लाल पानी से विकास का रास्ता’ निकालते देखे गए थे।

आज हरीश रावत ने राहुल गाँधी के मानसिक स्तर का पोस्ट भी कर दिया और उसे डिलीट भी कर दिया। रावत जी ने एचएनबी मेडिकल विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह का फ़ोटो शेयर करते हुए इसे RSS की सभा कहा है। गौर से देखने का निवेदन भी किया।

इस निवेदन और अपने पुर्वग्रह में हरदा भूल जाते हैं कि ये टोपी उत्तराखंड के पारम्परिक पहनावे का हिस्सा है जो गढ़वाल और कुमाऊँ, दोनों जगह समान रूप से पहनी जाती है। पोस्ट जिस वजह से भी डिलीट किया गया हो लेकिन हर जगह RSS को देखने, भगवाकरण हो जाने का भय हरदा अपने मन से हटा नही पा रहे हैं। यह रह-रहकर यदाकदा दिख ही जाता है, वो भी बिना गौर किए हुए।

लोन लेना अब आसान: ‘स्वामित्व योजना’ का शुभारम्भ, SMS से मिलेगा लिंक, इंटरनेट से डाउनलोड कीजिए ‘संपत्ति कार्ड’

ग्रामीण भारत में बदलाव के लिए बड़े सुधारों की ओर क़दम बढ़ाने के क्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार (अक्टूबर 11, 2020) को ‘स्वामित्व योजना’ का शुभारम्भ करते हुए एक लाख भू-संपत्ति मालिकों को ‘संपत्ति कार्ड’ के वितरण का मार्ग प्रशस्त किया, जिसके बाद ये लोग इंटरनेट से ही इसे डाउनलोड कर सकेंगे। इसका लिंक ग्रामीणों को SMS से ही मिल जाएगा। इसके तहत 6 राज्यों के 763 गाँवों के लोग लाभान्वित होंगे।

इस योजना का प्रमुख उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों को ‘रिकॉर्ड ऑफ राइट्स’ देने के लिए संपत्ति कार्ड का वितरण किया जाना है। इसका क्रियान्वयन 4 वर्ष में क्रमबद्ध तरीके से किया जाएगा। इसे 2020 से 2024 के बीच पूरा किया जाना है और देश के 6.62 लाख गाँवों को इसके तहत कवर किया जाएगा। इस योजना से भू-संपत्ति मालिक अपने संपत्ति को वित्तीय संपत्ति के तौर पर इस्तेमाल कर सकेंगे।

इस अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस ‘संपत्ति कार्ड’ को प्राप्त करने वाले 1 लाख लोगों को बधाई देते हुए कहा कि आज आपके पास एक अधिकार है, एक कानूनी दस्तावेज है कि आपका घर आपका ही है, आपका ही रहेगा। उन्होंने उम्मीद जताई कि ये योजना हमारे देश के गाँवों में ऐतिहासिक परिवर्तन लाने वाली है और साथ ही कहा कि आत्मनिर्भर भारत अभियान में आज देश ने एक और बड़ा कदम उठा दिया है क्योंकि ‘स्वामित्व योजना’ गाँवों में रहने वाले हमारे भाई-बहनों को आत्मनिर्भर बनाने में बहुत मदद करने वाली है।

बकौल पीएम नरेंद्र मोदी, जब संपत्ति का रिकॉर्ड होता है, जब संपत्ति पर अधिकार मिलता है तो नागरिकों में आत्मविश्वास बढ़ता है, निवेश के लिए नए रास्ते खुलते हैं, और बैंक से कर्ज आसानी से मिलता है, रोजगार-स्वरोजगार के रास्ते बनते हैं। उन्होंने कहा कि पूरे विश्व के बड़े-बड़े एक्सपर्ट्स इस बात पर जोर देते रहे हैं कि जमीन और घर के मालिकाना हक की, देश के विकास में बड़ी भूमिका होती है।

पीएम नरेंद्र मोदी ने कहा कि गाँव के कितने ही नौजवान हैं, जो अपने दम पर कुछ करना चाहते हैं, लेकिन घर होते हुए भी उन्हें अपने घर के नाम पर बैंक से कर्ज मिलने में कई बार दिक्कतों का सामना करना पड़ता था। ‘स्वामित्व योजना’ के तहत बने प्रॉपर्टी कार्ड को दिखाकर, बैंकों से बहुत आसानी से कर्ज मिलना सुनिश्चित हुआ। उन्होंने भरोसा जताया कि बीते 6 सालों से हमारे पंचायती राज सिस्टम को सशक्त करने के लिए जो प्रयास चल रहे हैं, उनको भी स्वामित्व योजना मज़बूत करेगी।

अपनी सरकार के कामकाज पर बोलते हुए पीएम मोदी ने कहा कि पिछले 6 वर्षों में पुरानी कमी को दूर करने के लिए लगातार काम किया जा रहा है। आज देश में बिना किसी भेदभाव, सबका विकास हो रहा है, पूरी पारदर्शिता के साथ सबको योजनाओं का लाभ मिल रहा है। उन्होंने याद दिलाया कि 6 दशकों तक गाँव के करोड़ों लोग बैंक खातों, शौचालय, गैस कनेक्शन और घर से वंचित थे। इस दौरान पीएम मोदी ने जयप्रकाश नारायण और नानाजी देशमुख को भी याद किया।

प्रधानमंत्री ने विपक्ष पर निशाना साधते हुए कहा कि यूरिया की नीमकोटिंग से जिनके गैर-कानूनी तौर तरीके बंद हो गए, दिक्कत उन्हें हो रही है। किसानों के बैंक खाते में सीधा पैसा पहुँचने से जिनको परेशानी हो रही है, वो आज बेचैन हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि छोटे किसानों, पशुपालकों, मछुआरों को किसान क्रेडिट कार्ड मिलने से जिनकी काली कमाई का रास्ता बंद हो गया है, उनको आज समस्या हो रही है।

ज्ञात हो कि ‘स्वामित्व’ केंद्र सरकार के पंचायती राज मंत्रालय द्वारा शुरू की गई एक योजना है। इसके बारे में प्रधानमंत्री ने राष्ट्रीय पंचायती राज दिवस, 24 अप्रैल, 2020 को घोषणा की थी। इस योजना का उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों को ‘रिकॉर्ड ऑफ राइट्स’ देने के लिए संपत्ति कार्ड का वितरण किया जाना है। अलग-अलग राज्यों में संपत्ति कार्ड को अलग-अलग नाम दिए गए हैं। इसका इस्तेमाल लोन आदि के आवेदन समेत अन्य आर्थिक लाभ के लिए किया जा सकेगा।

नेपाल: विपक्षी नेताओं ने ओली सरकार को निकम्मा बताते हुए चीनी कब्जे के दिए पुख्ता सबूत

ओली सरकार बार-बार नेपाल के हुमला इलाके में चीनी घुसपैठ से इनकार कर रही है। वहीं, मुख्य विपक्षी दल नेपाली कॉन्ग्रेस के नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री जीवन बहादुर शाही ने दावा किया है कि उन्हें चीनी अतिक्रमण के पुख्ता सबूत मिले हैं। उन्होंने नेपाल की ओली सरकार को निकम्मा बताते हुए कहा कि स्थलगत निरीक्षण के बाद हमारा निष्कर्ष है कि हमारी जमीन पर चीन द्वारा अवैध रूप से कब्जा किया गया है और चीन से कूटनीतिक वार्ता का कोई विकल्प नहीं है।

हाल ही में चीन द्वारा नेपाली क्षेत्र में घुसपैठ कर नौ इमारतों के निर्माण का जायजा लेने हुमला से निर्वाचित प्रदेश सांसद जीवन बहादुर शाही, हुमला जिले के लापचा गए थे। जिसके बाद उन्होंने दावा किया है कि उन्हें अतिक्रमण के पुख्ता सबूत मिले हैं।

खबरहब न्यूज़ को दिए अपने एक इंटरव्यू में शाही ने बताया कि उन्हें जमीन पर हुए अतिक्रमण के बारे में विस्तृत जानकारी है। उन्होंने बताया कि,”हमें सूचित किया गया था कि चीन ने नेपाल की भूमि पर अतिक्रमण किया है और यहाँ तक ​​कि पिलर 12 पर हमारी सीमा रेखा पार करने वाली संरचनाओं का निर्माण भी शुरू कर दिया है।”

उन्होंने कहा, “नेपाल सरकार चीन द्वारा किए गए अतिक्रमण को छुपाने की कोशिश कर रही है, जबकि हमने खुद देखा है कि चीन ने इमारतों का निर्माण किया है। हमारे साथ फील्ड विजिट पर कुछ सरकारी अधिकारी भी मौजूद थे और उन्होंने भी इस गड़बड़ी को महसूस किया है।” शाही ने जोर देते हुए कहा, “मुझे नहीं पता आखिर क्यों सरकार कहती है कि चीन ने हमारे क्षेत्र में घुसपैठ नहीं की है?”

शाही ने आगे कहा, “सीमा स्तंभों का मूल सिद्धांत यह है कि जब भी कोई नया स्तंभ स्थापित किया जाना है, तो उसे पहले दोनों पक्षों के अधिकारियों के समन्वय में व्यवस्थित किया जाना चाहिए। हालाँकि, इस सिद्धांत का उल्लंघन किया गया है। चीन द्वारा पिलर 12 नवनिर्मित है।”

अतिक्रमण के बारे में खुलकर बोलते हुए शाही ने कहा, “चीन ने हुमला के लोगों के लिए भोजन की सप्लाई करने वाले ट्रकों को अनुमति देने से मना कर दिया है। यहाँ के लोगों का जीवन नरक बन चुका है। सीमावर्ती इलाके के लोग चीन की इन हरकतों की वजह से बहुत पीड़ित हैं।”

साथ ही, उन्होंने कहा, “जिस टेलीफोन टावर को मैंने इस क्षेत्र में स्थापित करने का प्रयास किया था, उसे चीन ने नष्ट कर दिया है और इसकी जगह स्थानीय लोगों को चीनी सिग्नल और चीनी टॉवर का उपयोग करने के लिए मजबूर कर रहा है।”

उन्होंने बताया कि चीन द्वारा नेपाल के इलाके में किए गए अतिक्रमण के पर्याप्त सबूत आम जनता के पास हैं। उन्होंने नेपाली सरकार पर हमला करते हुए कहा,”सरकार वास्तविकता को स्वीकार नहीं करना चाहती है। मेरे पास अतिक्रमण के सबूत है। जरूरत पड़ने पर मैं आपको सबूत भी दे सकता हूँ।”

नेपाल भूमि पर चीन द्वारा किए गए अतिक्रमण और ओली सरकार के रवैए को लेकर जीवन बहादुर शाही हुमला ने कहा, “मैं सिमिकोट लौटकर एक रिपोर्ट तैयार करूँगा और इसे एनसी सेंट्रल कमेटी को सौंप दूँगा। पार्टी इस मुद्दे पर आगे फैसला करेगी। इसके अलावा मुझे पता चला है कि हुमला के सहायक मुख्य जिला अधिकारी को सच बोलने के लिए माफी माँगने के लिए कहा गया है। मैं इन मुद्दों को प्रांत सभा में भी उठाऊँगा।”

गौरतलब है कि, हुमला के लापचा-लिमी क्षेत्र की हालिया तस्वीरों से पता चला था कि चीन ने क्षेत्र में अब तक नौ इमारतें बना ली हैं। बावजूद इसके भारतीय इलाकों पर दावा ठोकने वाले नेपाल के प्रधानमंत्री केपी ओली ने अपनी जमीनों पर हो रहे अतिक्रमण पर चुप्पी साध रखी है।

ज्ञात हो कि हाल ही में नेपाल की सत्तारूढ़ पार्टी नेपाली कम्यूनिस्ट पार्टी ने यूनिफाइड नेपाल नेशनल फ्रंट के साथ हाथ मिलाकर ग्रेटर नेपाल के लिए एक नया अभियान शुरू किया है। इस अभियान में भारतीय शहरों जैसे देहरादून और नैनीताल को नेपाल का होने का दावा किया है। अपने अवैध दावे में भारतीय शहर उत्तराखंड, हिमाचल, उत्तर प्रदेश, बिहार और सिक्किम को भी अपने ‘ग्रेटर नेपाल’ अभियान में नेपाल का हिस्सा बताया है।

लड़की के परिवार वाले और हत्या: आमिर खान की फिल्म से लेकर ‘ऑनर किलिंग’ पर अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट तक

क़यामत से क़यामत तक फिल्म का नाम बदल कर रखा गया था। जब ये बननी शुरू हुई थी तो इसका नाम “नफरत के वारिस” रखा गया था। मंसूर खान की निर्देशक के रूप में और आमिर खान की फ़िल्मी हीरो के तौर पर तो ये पहली फिल्म थी ही, साथ ही चीन में रिलीज़ होने वाली आमिर खान की पहली फिल्म भी यही थी। इसी साल “तेज़ाब” और “शहंशाह” भी आई थी इसलिए 1988 में सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्मों में ये तीसरे नंबर पर रही। फिल्म के गाने भी अच्छे खासे प्रसिद्ध हुए थे और कुछ तो अब भी गुनगुना लिए जाते हैं।

जैसे लोग ये फिल्म बना रहे थे, उसमें ये किधर झुकाव को बढ़ावा दे रही होगी, ये समझना कोई मुश्किल नहीं है। इसमें कुछ ठाकुरों (राजपूतों) को दिखाया जाता है, जो किसी गाँव में रहते हैं। जमींदारी प्रथा के सदियों पहले ख़त्म होने के बाद भी ये जैसे-तैसे खेती करके गुजारा करने वाले लोग नहीं बल्कि बड़े जमींदार हैं। एक परिवार की लड़की का प्रेम प्रसंग दूसरे परिवार के युवक से चल रहा होता है, और युवती गर्भवती हो जाती है।

लड़का शादी से इंकार करता है, लड़की आत्महत्या करती है और लड़की के परिवार का एक व्यक्ति उस लड़के की हत्या कर डालता है। हत्या के आरोप में वो जेल भी जाता है, परिवारों में दुश्मनी भी शुरू हो जाती है और जैसा की आम नैरेटिव होना चाहिए, बिल्कुल वैसे ही इन परिवारों की महिलाओं को किसी फैसले में अपनी राय देने या फैसला लेने की इजाजत भी नहीं होती। जिस लड़की ने आत्महत्या की थी, उस परिवार का लड़का जब बड़ा होता है तो उसका प्रेम प्रसंग दूसरे परिवार की लड़की से शुरू हो जाता है।

जिसके पिता ने बरसों पहले उनके परिवार के एक नौजवान की हत्या की थी, उसी लड़के से भला वो लड़की की शादी करवाने को क्यों तैयार होते? झगड़े के फिर से बढ़ने की एक नई वजह शुरू हो जाती है। परिवारों के शादी के विरुद्ध होने पर लड़का लड़की घर से भाग जाते हैं। लड़की के परिवार वाले लड़के की हत्या के लिए किराए के गुंडे लाते हैं। फिल्म के अंत का सबको पता ही होगा, लड़के को बचाते हुए लड़की मारी जाती है और उसके गम में लड़का आत्महत्या कर लेता है। इस फिल्म के प्रचार के लिए आमिर खान ने एक नए तरीके का इस्तेमाल किया था।

उनका चेहरा पहले ही जाना पहचाना नहीं था ऊपर से उन्होंने बिना चेहरे वाले पोस्टर कई जगह लगवाए। इन पर जो प्रचार की लाइन थी, वो कहती थी “आमिर खान कौन है? पड़ोस वाली लड़की से पूछो!” अब अगर फिल्म के जरिए गढ़े गए नैरेटिव पर आएँ तो सबसे पहले “ऑनर किलिंग” को देखना होगा। ये भारतीय समाज के लिए 1980-90 के दौर में कोई समस्या नहीं थी। उस दौर में ना तो इस तरह की ज्यादा घटनाएँ सुनाई देती थीं, ना ही होती थीं।

जिन समुदायों में आज भी ये समस्या है, उसमें “राजपूताना” कहलाने वाला क्षेत्र काफी पीछे आएगा। भारत के बाहर देखें तब जरूर ये समस्या विश्वव्यापी लगने लगती है। गज़ाला खान की हत्या के प्रकरण में 2005 में डेनमार्क में ऐसा एक मामला प्रकाश में आया था, जिसमें पाकिस्तानी मूल के परिवार ने गज़ाला खान की हत्या कर दी थी। फ़िनलैंड में ऐसा एक मामला 2015 में पहली बार सामने आया, जिसमें इराकी मूल के लोगों को सजा हुई और दोबारा इसी किस्म के एक मामले में 2019 में भी एक इराकी ही पकड़ा गया था।

कई इस्लामिक मुल्कों में ऐसे मामले प्रकाश में आते रहे हैं और ये सब अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों के भी विषय रहे हैं। पाकिस्तान में ऐसी हत्याओं के लिए बाकायदा “कारो-कारी” लफ्ज़ इस्तेमाल किया जाता है। ऐसे मुद्दों पर इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ़ पाकिस्तान के कई मानवाधिकार कार्यकर्त्ता, लम्बे समय से काम भी करते आ रहे हैं। बीबीसी की रिपोर्टों की मानें तो सिर्फ 1999 से 2004 के बीच इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ़ पाकिस्तान में “ऑनर किलिंग” के कम से कम 4000 मामले हुए थे।

इस किस्म के मामलों पर अभी ध्यान इसलिए चला जाता है क्योंकि हाथरस मामले में अब पुलिस सूत्रों को पता चल रहा है कि दोनों परिवारों में पहले से रंजिश चली आ रही थी। इसके बाद भी पिछले कुछ दिनों में ही दोनों परिवारों के दो लोग 100 बार एक दूसरे से फोन पर बातचीत कर रहे थे। डकैती-हत्या जैसे हिंसक अपराधों के मामले में अक्सर ऐसा पाया जाता है कि अपराधी किसी फिल्म से प्रेरित होकर उसकी नक़ल करने निकले होते हैं।

“क़यामत से क़यामत तक” जैसी फिल्मों के जरिए सेट किया गया नैरेटिव भी कहता है कि अक्सर ऐसे मामलों में लड़की के परिवार वाले ही हत्या में शामिल होते हैं। शायद वक्त आ गया है जब हम स्थापित नैरेटिव पर सवाल उठा कर देखें। बाकी जब कहते हैं कि फ़िल्में समाज का आइना होती हैं तो वो कितना सच होता है, ये तो सोचना ही चाहिए। फ़िल्मी हीरो-हीरोइन के स्टाइल के बालों का कट या कपड़ों का स्टाइल समाज को कॉपी करते तो देखा ही होगा। सच में फ़िल्में समाज का आइना है या समाज फिल्मों के आईने सा होता है?

सलमान के साथ निकाह और धर्म परिवर्तन के बाद जोया शेख बनी कानपुर की लड़की, माँ ने लगाया अत्याचार का आरोप

उत्तर प्रदेश का कानपुर शहर पिछले कुछ समय से लव जिहाद के मामलों के चलते चर्चा में बना हुआ है। इसी बीच धर्म परिवर्तन और निकाह का एक और मामला सामने आया है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार एक युवती पिछले कई दिनों से लापता थी। कई दिनों बाद जब उस युवती की जानकारी मिली तब वह ज़ोया शेख बन चुकी है। युवती के माँ के मुताबिक़ सलमान नाम के युवक ने उनकी बेटी को बहला फुसला कर धर्म परिवर्तन कराया और इसके बाद निकाह कर लिया। 

कानपुर के पनकी थाना क्षेत्र के अंतर्गत रहने वाली 20 वर्षीय युवती अपनी माँ के साथ दादा नगर स्थित फैक्ट्री में काम करने के लिए जाती थी। नज़दीक में स्थित लाल कॉलोनी में युवती की मौसी भी रहती हैं, इसलिए युवती अक्सर वहाँ भी जाती थी। उस क्षेत्र में सलमान नाम का युवक बनियान का कारखाना चलाता है। इसी दौरान दोनों के बीच बातचीत शुरू हुई। युवती के परिजनों के अनुसार सलमान ने उनकी बेटी का ब्रेन वाश किया और इसके बाद अपने साथ ले गया। 

इस घटनाक्रम के सम्बंध में युवती की माँ ने पनकी थाना क्षेत्र में 6 अक्टूबर को गुमशुदगी का मामला दर्ज कराया था। शिकायत में युवती की माँ ने बताया कि उनकी बेटी 5 अक्टूबर से लापता थी लेकिन फिर भी पुलिस ने कोई सक्रियता नहीं दिखाई। उनका कहना था कि कई दिनों बाद वह अपनी बेटी के बारे में जानकारी के लिए थाने गई तो वहाँ उन्हें पता चला कि उनकी बेटी ज़ोया बन गई है। सलमान नाम के युवक ने उसके साथ निकाह और कोर्ट मैरिज भी कर ली है। 

इसके अलावा भी युवती की माँ ने कई आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि उनकी बेटी पर दबाव बना कर धर्म परिवर्तन कराया गया है। सलमान नाम का युवक उनकी बेटी को बंधक बना कर उस पर अत्याचार करता है। उनके अनुसार अगर बेटी सामने आकर यह बात स्वीकार कर लेती है कि यह सब कुछ उसकी मर्ज़ी से हुआ है, तब वह कुछ नहीं कहेंगी। 

इसके अलावा उन्होंने कहा कि वह कई दिनों से पनकी थाने के चक्कर लगा रही हैं लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई। युवती की माँ ने शनिवार को इस मामले की शिकायत एसआईटी के नोडल अधिकारी दीपक भूकर से मुलाक़ात कर की। उन्होंने न्याय की गुहार लगाते हुए मामले में निष्पक्ष जाँच की माँग की। जिस पर एसआईटी के नोडल अधिकारी ने एसआईटी जाँच का भरोसा दिलाया है।     

वहीं पनकी थाना के थानाध्यक्ष अतुल कुमार सिंह ने ऑप इंडिया से बात करते हुए इस मामले की जानकारी दी। उन्होंने कहा, 

“महिला ने गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कराई थी। वह कई स्थानीय पत्रकारों के साथ आई थीं। उन्होंने (युवती की माँ) बताया कि उनकी बेटी बिना बताए घर से चली गई है। उस दिन डाक से हाईकोर्ट की सूचना आई थी कि युवती ने सातवें महीने (जुलाई) में ही शादी कर ली थी। उसकी शादी 6-7-2020 को ही हो गई थी। हाईकोर्ट में रिट संख्या 14335 के तहत, इसमें हाईकोर्ट ने बाकायदा डायरेक्शन दे दिया कि इस नाम (ज़ोया) से परिवर्तन करके युवती ने शादी कर ली। इसलिए इन पर किसी प्रकार की कानूनी कार्रवाई न की जाए। यह आदेश 23 सितंबर 2020 को आ गया था और युवती की माँ ने शिकायत दर्ज कराई हाईकोर्ट से नोटिस मिलने के बाद। अब हाईकोर्ट का निर्देश जारी होने के बाद हम कोई कार्रवाई नहीं कर सकते हैं।”      

सिंहासन खाली हुई लेकिन जनता नहीं, सत्तालोलुप नेता आए: जेपी के वो चेले, जिन्होंने उड़ा दी गुरु की ही ‘धज्जियाँ’

एक गुड़िया की कई कठपुतलियों में जान है,
आज शायर ये तमाशा देख कर हैरान है।
ख़ास सड़कें बंद हैं तब से मरम्मत के लिए,
यह हमारे वक्त की सबसे सही पहचान है।
एक बूढ़ा आदमी है मुल्क में या यों कहो,
इस अँधेरी कोठरी में एक रौशनदान है।

इस कविता में ‘गुड़िया’ किसे कहा गया है और कौन वो ‘बूढ़ा आदमी’ है, ये आपको समझने में दिक्कत नहीं होनी चाहिए। जब आपको बताया जाए कि दुष्यंत ने ये कविता आपातकाल के आसपास लिखी थी, तब तो आप समझ ही जाएँगे। जब पूरे देश में लोकतंत्र का हनन हो रहा था, तब जयप्रकाश नारायण भारत की सबसे बड़ी उम्मीद बन कर सामने आए और ये भी जानने लायक है कि आज हम यूपी-बिहार में जिन नेताओं को राजनीति का धुरंधर मानते हैं, वो जेपी आंदोलन की ही उपज हैं।

जेपी की हस्ती का अंदाज़ा इसी से लगा लीजिए कि आज दुनिया की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक पार्टी का मुखिया उनके ही छात्र आंदोलन की सीढ़ियाँ चढ़ कर निकला है। भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा बिहार आंदोलन का हिस्सा रहे हैं। आपातकाल के समय हर सक्रिय युवा नेता को कभी न कभी जेपी से प्रेरणा मिली, आशीर्वाद मिला। लेकिन, बिहार एक ऐसा राज्य है, जहाँ जेपी के चेलों ने जनता को सबसे ज्यादा निराश किया।

जयप्रकाश नारायण के सहारे उपजे बिहार में कई नेता

यूपी-बिहार ही नहीं, लगभग पूरे देश में कई ऐसे बड़े नेता हैं, जो आज राजनीति के इस मुकाम पर इसीलिए हैं क्योंकि उन पर कभी न कभी जेपी का हाथ था। दिवंगत अरुण जेटली हों या बिहार में लालू यादव, नीतीश कुमार, रामविलास पासवान, सुशील कुमार मोदी और रविशंकर प्रसाद से लेकर यूपी के मुलायम सिंह यादव, या फिर दिल्ली और गुजरात के कई नेता – जयप्रकाश नारायण के आंदोलन से निकले चेहरे सत्ता में छाए रहे।

लेकिन, यहाँ सबसे बड़ा सवाल है कि क्या जेपी के चेलों ने उसी रास्ते को अपनाया, जो वो चाहते थे? कहीं से भी ऐसा नहीं लगता। ऐसा इसीलिए, क्योंकि बिहार में जेपी आंदोलन से जो 3 प्रमुख चेहरे निकल कर सामने आए, उन तीनों ने ही सत्ता से चिपके रहने में कोई कसर नहीं छोड़ी। साथ ही जेपी आंदोलन के सेनानियों को पेंशन देने के अलावा उन्होंने कोई ऐसा काम नहीं किया, जिसके लिए उतना बड़ा आंदोलन हुआ था।

आपको एक छोटा सा वाकया सुनाते हैं। लालू यादव हाल के दिनों में एक चुनाव के दौरान एक बड़े चैनल पर इंटरव्यू के लिए बैठे हुए थे। वहाँ एक वरिष्ठ पत्रकार ने उनसे पूछ दिया कि जेपी आंदोलन से देश को, या बिहार को, क्या फायदा हुआ? लालू यादव ने जवाब दिया कि हम लोग नेता बन गए, हो गया आंदोलन का उद्देश्य पूरा। पत्रकार ने पलट कर पूछा ज़रूर कि आपको नेता बनाने के लिए जेपी आंदोलन थोड़ी हुआ था, लेकिन लालू ने चिर-परिचित अंदाज़ में हँस-बोल कर सवाल को घुमा दिया।

लालू यादव ने खुल कर कह दिया, लेकिन जेपी आंदोलन से निकले नेताओं के पास एक यही जवाब है – “हम नेता बन गए।” शायद इन नेताओं का उद्देश्य ही था कि इन्हें ‘नेता’ बनना है। ये चीजें इनके मन में तब भी थीं, जब ये अपने छात्र जीवन में जेपी के छत्र तले कुलाँचे भर रहे थे। जैसा कि हम जानते हैं, लालू यादव 1973 में पटना विश्वविद्यालय के छात्र संघ के अध्यक्ष चुने गए थे। तब नीतीश और सुशील उनके मातहत हुआ करते थे।

उन्हीं छात्र नेताओं में नरेंद्र सिंह भी थे, जिनके हवाले से संतोष कुमार ने अपनी पुस्तक ‘बंधू बिहार’ में लिखा है कि एक बार मोरारजी देसाई पटना आए थे तो उनका इंट्रो देने के लिए मंच पर गए लालू यादव ने खुद ही लंबा-चौड़ा भाषण दे दिया और गायब हो गए। बाद में उन्होंने बताया कि मोरारजी देसाई के बोलने के बाद उन्हें कौन सुनता, इसीलिए उन्होंने ऐसा किया। युवाओं में महत्वाकांक्षा अच्छी बात है, लेकिन यही महत्वाकांक्षा जब लालच और अतिआत्मविश्वास में बदल जाए तो चीजें गड़बड़ होने लगती हैं।

लालू यादव: छात्र राजनीति का सबसे बड़ा चेहरा, राजनीति का सबसे बड़ा ‘Let-down’

छात्र राजनीति के दिनों में जिस तरह से लालू यादव ने अपनी छवि बनाई थी और अपने हलके-फुल्के अंदाज़ से बड़े नेताओं से लेकर जनता तक का दिल जीता था, उन्हीं लालू यादव ने अपने मुख्यमंत्रित्व काल में जनता को इतना निराश किया कि उनके 15 वर्ष के कार्यकाल (राबड़ी यादव का भी) को जंगलराज की संज्ञा दी गई। जेपी आंदोलन के सबसे बड़े सिपाहियों में से एक लालू यादव आज चारा घोटाला मामले में जेल में बंद हैं।

लालू यादव ने जय प्रकाश नारायण के आशीर्वाद से बने जनता दल से इसीलिए नाता तोड़ लिया, ताकि वो सत्ता पर आसीन रहें। राष्ट्रीय जनता दल का गठन हुआ और इस पार्टी ने उसी कॉन्ग्रेस से हाथ मिलाया, जिसका विरोध कर-कर के लालू यादव नेता बने थे। बिहार विधानसभा के बाहर कई दिनों तक छात्रों का धरना-प्रदर्शन चला था, उन्होंने लाठियाँ खाईं, गिरफ्तारियाँ दीं – लालू ने इन सबके लिए जिम्मेदार पार्टी से ही हाथ मिला लिया।

कॉन्ग्रेस के जिस तानाशाही ‘मीसा एक्ट’ का विरोध करने के लिए उन्होंने अपनी बेटी का नाम मीसा भारती रखा था, वही मीसा भारती बाद में राजद-कॉन्ग्रेस गठबंधन की तरफ से राज्यसभा पहुँची। लालू यादव ने हमेशा ‘फैमिली फर्स्ट’ का फॉर्मूला अपनाया और उसी सिद्धांत को चकनाचूर करते रहे, जिसका जेपी ने ज़िंदगी भर पालन किया। जयप्रकाश नारायण ने ज़िंदगी भर वंशवादी कॉन्ग्रेस और गाँधी परिवार का विरोध ही किया।

कभी लालू यादव जयप्रकाश नारायण के पाँव पड़ गए थे और उन्हें बिहार के छात्रों का नेतृत्व करने को कहा था, लेकिन जब अपने से आगे की पीढ़ी को बागडोर देने की बात सामने आई तो उन्होंने अपने बेटे तेजस्वी यादव को उप-मुख्यमंत्री और तेज प्रताप यादव को मंत्री बनाया। राजद में पप्पू यादव से लेकर सम्राट चौधरी तक, जो भी आगे पंक्ति का नेता उभरा या जिसने भी पार्टी में लोकतंत्र की बात की – उसे निकाल बाहर किया गया।

बिहार में 15 वर्षों तक खून बहता रहा और सरकार भी बाहुबलियों को पालती रही। हत्याएँ, बलात्कार, अपहरण और रंगदारी के सिवा इन 15 वर्षों में बिहार ने कुछ नहीं देखा। सरकार चलाने के नाम पर घोटाले होते रहे और चुनाव के दौरान ‘मतपेटियों से जिन्न’ निकलता रहा। इन सबके बीच जयप्रकाश नारायण, उनकी ‘सम्पूर्ण क्रांति’ और उनके सिद्धांत कहीं खो गए। लालू आज भी नहीं बदले हैं। उनकी अनुपस्थिति में बेटे पार्टी चला रहे हैं।

नीतीश कुमार और सुशील मोदी: उम्मीदें जगाई भी, फिर मिटाई भी

लालू यादव की तरह ही नीतीश कुमार भी उसी कद के नेता बन कर उभरे। हाँ, इसमें उन्हें जरा देर ज़रूर हुई। जेपी आंदोलन के दौरान के अपने साथी लालू यादव के जंगलराज के छुटकारे से जनता को सबसे बड़ी उम्मीद उन्हीं से थी। 2005 में वो मुख्यमंत्री बने और उप-मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी के साथ मिल कर सरकार चलाई भी। पहले कार्यकाल के दौरान सब ठीक रहा और जनता को लगने लगा था कि बिहार अब प्रगति के पथ पर अग्रसर है।

सड़कें बननी शुरू हुईं, बिजली का काम तेज़ हुआ और सबसे बढ़कर अपराध पर लगाम लगा। लेकिन 2010 में हुए विधानसभा चुनाव के बाद सब कुछ बदल गया और देश में राजनीतिक शून्य को देखते हुए कई नेताओं की तरह नीतीश कुमार का भी प्रधानमंत्री बनने का सपना हिलोरे मारने लगा। भाजपा से गठबंधन टूटा, वो अपने धुर-विरोधी लालू यादव से जा मिले और जिस परिवार को जनता ने राजनीतिक रूप से दफन कर दिया था, वो अचानक से सक्रिय हो उठा।

नीतीश कुमार ने फिर लालू यादव का साथ छोड़ा और भाजपा के साथ मिल कर सरकार बना ली। अब वो फिर से भाजपा के साथ गठबंधन में चुनावी मैदान में उतरने की तैयारी में हैं। इस बीच उन्होंने भाजपा से गठबंधन टूटने और लालू के साथ चुनाव लड़ने के बीच जीतन राम माँझी को मुख्यमंत्री बनाया लेकिन उनका ये स्टंट भी फेल रहा। सत्ता में बने रहने के लिए इतने यू-टर्न लिए उन्होंने कि ‘गुड गवर्नेंस’ या सुशासन कब का पीछे छूट गया।

सरकार में दो नंबर के नेता सुशील कुमार मोदी छात्र जीवन से ही संगठन में दो नंबर की ही भूमिका में रहे और उन्होंने भी हमेशा सत्ता को ही चुना। पटना यूनिवर्सिटी छात्र संघ में लालू यादव के अध्यक्षीय कार्यकाल में महासचिव रहने से लेकर नीतीश-भाजपा गठबंधन के निर्विरोध उप-मुख्यमंत्री तक, उन्होंने सत्ता में बने रहने को ही अंतिम नियति मान लिया और कभी नीतीश के कुशासन को लेकर मुँह नहीं खोला।

पटना में 2019 में आए जलजमाव के दौरान जनता ने देखा कि कैसे बिहार के उप-मुख्यमंत्री को ही परिवार सहित रेस्क्यू करना पड़ा। आजकल उनकी ज़िंदगी इन तीन कार्यों पर टिकी हैं – ट्विटर पर बयान देना, उस बयान का अखबार में छपना और फिर अख़बार की उस कटिंग का फिर ट्वीट बनना। चारा घोटाला मामले में खुलासा करने और विरोध में सबसे आगे रहे सुशील मोदी का काम अब यही बचा है कि रोज जनता को लालू के जंगलराज की याद दिलाओ।

जेपी के बड़े सेनानियों से जनता को मिली सिर्फ निराशा

जयप्रकाश नारायण को जनता पार्टी को अपने सिद्धांतों से भटक कर दूर जाते हुए देखने के लिए अपने निधन का इन्तजार नहीं करना पड़ा। ये सब उनके जीवनकाल में ही शुरू हो गया था। जिस तरह महात्मा गाँधी चाहते थे कि कॉन्ग्रेस भंग कर दिया जाए लेकिन आज़ादी के बाद कोई उनका सुनने वाला तक न था, वही हाल जेपी का भी हो गया था। उनके अंतिम दिनों में तो कई लोग उन्हें पहचान तक नहीं पाते थे।

इसी तरह मुलायम सिंह यादव ने भी उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में सत्ता को कुछ इस तरह भोगा कि उनके परिवार के 50 से अधिक सदस्य पंचायत से लेकर मुख्यमंत्री तक कई बड़े पदों पर रहे। मुलायम सिंह यादव के घर की तस्वीर जब आती है, तो अमेरिका का वाइट हाउस भी उसके सामने फीका लगता है। ‘समाजवाद’ के नाम पर रामभक्तों पर गोलियाँ चलवाने और मुस्लिम तुष्टिकरण के अलावा शायद ही कुछ उनकी उपलब्धि हो।

दिवंगत रामविलास पासवान जेपी आंदोलन से पहले ही नेता बन चुके थे और वो जब विधायक बने थे, तब लालू-नीतीश छात्र ही थे। रामविलास पासवान के भाई रामचंद्र पासवान 2 बार समस्तीपुर के सांसद रहे। उनके एक भाई पशुपति कुमार पारस फ़िलहाल सांसद हैं और खगड़िया के अलौली से 7 बार विधायक रह चुके हैं। उनके बेटे पार्टी संभाल रहे हैं। भतीजा सांसद है। वो भी ज़िंदगी भर ‘दलित नेता’ का टैग लिए जीते रहे।

जिस परिवारवाद के शासन के खिलाफ जयप्रकाश नारायण ने लड़ाई का बीड़ा उठाया था और जिनके नेतृत्व में राष्ट्रकवि ने ‘सिंहासन खाली करो’ का नारा दिया था, आज उनके सिद्धांतों को उनके ही चेले चूर-चूर कर रहे हैं। दक्षिण में जाएँ तो एचडी देवेगौड़ा पीएम रहे, उनके बेटे सीएम रहे। अब जनता दल नाममात्र का बचा है और जेपी के विचार भी। जमीन पर लड़ने वाले जेपी सेनानियों को चंद रुपए का पेंशन मिला, बस!

‘…मेरे सामने वो उसे पीटते रहे’: राहुल हत्याकांड में लड़की दोस्त ने लिए अपने भाइयों मुहम्मद और अफरोज का नाम

दिल्ली के आदर्श नगर क्षेत्र में राहुल राजपूत की मौत के मामले में अब सीसीटीव फुटेज भी सामने आ गया है, जिसमें उसकी महिला मित्र के सामने ही आरोपित उसकी पिटाई करते हुए दिख रहे हैं। राहुल की बुधवार (अक्टूबर 7, 2020) को ही मौत हो गई। सीसीटीवी फुटेज में किशोरी के साथ ही राहुल राजपूत को देखा जा सकता है, जिसमें दोनों एक दूसरे के साथ चल रहे हैं। साथ ही कुछ और लड़के भी दिखते हैं।

‘दैनिक जागरण’ की खबर के अनुसार, सीसीटीवी फुटेज में दिख रहे लड़के वही आरोपित हैं, जिन्होंने राहुल राजपूत की पिटाई की थी। 19 वर्षीय राहुल राजपूत दिल्ली यूनिवर्सिटी (DU) के स्कूल ऑफ ओपन लर्निग (SOS) से बीए अंग्रेजी ऑनर्स की पढ़ाई कर रहा था। उक्त किशोरी उसकी दोस्त थी, जिससे किशोरी के परिजन खफा थे। पुलिस ने इसे दो परिवारों के बीच का विवाद बता कर इसे साम्प्रदयिक एंगल न देने की अपील की है।

सीसीटीवी फुटेज में बुधवार की शाम 6:53 का समय दिख रहा है। ये घटना से कुछ देर पहले की ही है। इसके बाद किशोरी के सामने ही उसके भाई मुहम्मद राज, अफरोज व उसके रिश्तेदारों ने राहुल की लात-घूँसों से जम कर पिटाई की थी। आँत फटने के बाद राहुल राजपूत की मौत हो गई। आदर्श नगर थाना पुलिस इस सीसीटीवी फुटेज की जाँच के बाद किशोरी से भी पूछताछ करेगी। राहुल घर में बच्चों के ट्यूशन के प्रस्ताव को लेकर बातचीत करने की बात कह कर निकला था।

ताज़ा सूचना ये सामने आ रही है कि जब राहुल की बेरहमी से पिटाई की गई, तब किशोरी दोस्त भी उसके साथ ही थी। किशोरी का घर जहाँगीरपुरी में स्थित है। शाम को उसके घर न पहुँचने के बाद वहाँ किशोरी के भाई ने उसे फोन किया और फिर रिश्तेदारों के साथ आ धमका। बताया जाता है कि किशोरी के परिजन पहले भी राहुल को धमकी दे चुके थे। पीड़ित परिवार का कहना है कि पिटाई के समय राहुल को किशोरी बचाने की कोशिश कर रही थी।

सीसीटीवी फुटेज के हवाले से बताया गया है कि पिटाई से पहले किशोरी के परिजनों ने राहुल के साथ नोंकझोंक की और किशोरी को भी भला-बुरा कहा। किशोरी राहुल को लेकर आगे बढ़ गई, जिससे भड़के परिजनों ने पिटाई शुरू कर दी। साथ ही किशोरी को भी धमका कर वहाँ से भगा दिया। किशोरी ने इस वारदात के बाद अपने परिवार के साथ रहने से इनकार कर दिया है, जिसके बाद उसे ‘नारी निकेतन’ में रखा गया है।

राहुल राजपूत की दोस्त का बयान (साभार: Zee News)

शाम 6:46 की एक वीडियो फुटेज में किशोरी बैग लटका कर राहुल के साथ चल रही है। इसके बाद 7:12 में राहुल अकेले घर लौटते दिख रहे हैं, जो संभवतः पिटाई के बाद का वीडियो है। बाद में राहुल के परिजन उसे अस्पताल लेकर गए, जहाँ उसकी मौत हो गई। डीसीपी विजयंता राम का कहना है कि उन्हें रात के 12 बजे इस वारदात की सूचना मिली। पुलिस इन फुटेज की जाँच कर रही है, जिसके बाद आगे की कार्रवाई की जाएगी।

किशोरी का कहना है कि पुलिस अगर चाहती तो राहुल को बचा सकती थी। किशोरी ने बताया कि वो पूरे दिन राहुल के साथ थी और उसकी तबियत ठीक नहीं थी। उसने बताया कि उसके मामा के बेटे ने राहुल की चाची को कॉल कर के राहुल को मिलने के लिए बुलाया, जहाँ वो भी साथ गई। ‘इंडिया टुडे’ को किशोरी ने बताया कि वो कहती रही कि राहुल की तबियत खराब है, उसे मत मारो – लेकिन वो उसे पीटते रहे। किशोरी ने बताया कि उसके भाइयों ने उसकी एक न सुनी।

उधर राहुल राजपूत की दुर्भाग्यपूर्ण मौत के बाद आम आदमी पार्टी (AAP) नेता पवन कुमार शर्मा ने एक बयान जारी किया। AAP ने इस बयान में मुस्लिम युवकों द्वारा की गई इस भीड़ हत्या में धार्मिक एंगल न लाने की ‘अपील’ की है। पवन कुमार शर्मा ने कहा कि दोषियों को सजा मिलेगी। जिसके साथ अन्याय हुआ है, उसे न्याय मिलेगा। इसके साथ ही उनका कहना था कि घटना को किसी तरह का जातिगत या धार्मिक एंगल की तरफ मोड़ना राजनीति करना होगा।

‘बॉलीवुड माफिया मेरी हत्या कर के इसे आत्महत्या बता देगा’ – अभिनेत्री पायल घोष ने PM मोदी से लगाई गुहार

अभिनेत्री पायल घोष ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से अपनी सुरक्षा की गुहार लगाई है। उन्होंने आशंका जताई है कि ‘बॉलीवुड माफिया’ न सिर्फ उनकी हत्या कर सकता है, बल्कि उस हत्या को आत्महत्या का रूप भी दे सकता है। ऋचा चड्ढा द्वारा मानहानि के केस का सामना कर रहीं अभिनेत्री पायल घोष अपने छोटे से करियर में जूनियर एनटीआर और ऋषि कपूर जैसे बड़े कलाकारों के साथ काम कर चुकी हैं। वो टीवी सीरियल ‘साथ निभाना साथिया’ का भी हिस्सा रही हैं।

हाल ही में वो फिल्म निर्देशक अनुराग कश्यप पर बलात्कार का आरोप लगा कर सुर्ख़ियों में आई थीं, जिसके बाद अब उन्हें अपनी जान का डर सता रहा है। उन्होंने कहा कि पूरा का पूरा ‘बॉलीवुड गैंग’ उन्हें दबाने और अपमानित करने में लगा हुआ है। अभिनेत्री पायल घोष ने प्रधानमंत्री कार्यालय और नरेंद्र मोदी के हैंडल्स को ट्विटर पर टैग करते हुए अपनी हत्या की आशंका जताई। उन्होंने कहा कि उनकी हत्या को कुछ भी साबित किया जा सकता है।

इससे पहले अभिनेत्री ऋचा चड्ढा ने दावा किया था कि वो पायल घोष के खिलाफ मानहानि का मामला जीत चुकी हैं लेकिन घोष ने इस दावे को नकारते हुए उन्हें फटकार लगाई थी। अपने आरोप में तीन अभिनेत्रियों का नाम लेने की बात पर पायल घोष ने कहा कि ये उनके नहीं बल्कि अनुराग कश्यप के शब्द थे। उन्होंने कहा कि ‘स्मैश पैट्रिआर्की’ की बात करने वाला आदमी जब किसी लड़की के सामने इस तरह से तीन अन्य महिलाओं के नाम ले सकता है तो आप समझ सकते हैं कि वो किस किस्म का व्यक्ति है।

पायल घोष ने ‘SpotBoye’ से बातचीत करते हुए कहा कि उन्होंने इस चीज को सार्वजनिक कर के ये दिखाने की कोशिश की है कि जब अनुराग कश्यप उनके सामने इन तीनों के नाम ले सकते हैं तो दूसरों के सामने भी ऐसे ही करते होंगे। उन्होंने पूछा कि क्या इससे उनकी छवि को नुकसान नहीं पहुँचता? ऋचा चड्ढा से माफ़ी माँगने के सवाल पर उन्होंने कहा कि कोर्ट में जज ने ही इस मामले में सेटलमेंट करने की सलाह दी।

उन्होंने कहा कि ऋचा चड्ढा उनका लक्ष्य नहीं है बल्कि वो तो बीच में कूद गईं। उन्होंने जानकारी दी कि चड्ढा के वकील ने उनके वकील को बताया कि ऋचा को सोशल मीडिया पर गालियाँ पड़ रही हैं और वो ट्रॉल्स का सामना कर रही हैं। उन्होंने कहा कि वो एक महिला होने के नाते उनकी बात समझती हैं लेकिन साथ ही पूछा कि ऋचा चड्ढा इतनी निश्चित कैसे हैं कि अनुराग कश्यप ने उनका नाम नहीं लिया होगा?

उन्होंने कहा कि वो सिर्फ इसीलिए माफ़ी माँग रही हैं क्योंकि उनका नाम लेने से उन्हें कोई दर्द हुआ होगा लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि अनुराग कश्यप ने ऋचा चड्ढा का नाम नहीं लिया था, एकदम लिया था। पायल ने कहा कि उन्होंने ऋचा के सम्मान का ख्याल रखा और वो सोशल मीडिया पर उन्हें अपमानित करने में लगी ही हैं और प्रचार कर रही हैं कि वो जीत गईं। उन्होंने कहा कि ऋचा सच में जीत चाहती हैं तो 5-10 साल तक केस लड़े और जीते।

एक पोस्ट में पायल घोष ने आरोप लगाया था कि ’प्रसिद्ध निर्देशक’ 600 से अधिक महिलाओं के साथ सोया था। एक अन्य पोस्ट में, उन्होंने कहा था, “मुझे बहुत सी बातें कहने का मन कर रहा है, लेकिन मेरा परिवार मुझे इस पर कुछ भी बात करने की अनुमति नहीं दे रहा है और मुझे सभी ट्वीट्स को हटाने के लिए कहा गया है।हाल ही में उन्होंने अपनी इस पुरानी पोस्ट के स्क्रीनशॉट्स शेयर किए थे।