Home Blog Page 4408

म्यांमार सेना ने चीन समर्थित अराकान सेना के खिलाफ तेज की कार्रवाई: आतंकवादी समूह को खत्म करने के लिए भारी गोलीबारी

म्यांमार की सशस्त्र सेना ने इस सप्ताह सोमवार को अराकान सेना के खिलाफ अपनी कार्रवाई तेज कर दी। अराकान सेना पश्चिमी रखाइन राज्य में सबसे बड़ा आतंकवादी समूह है। द इरावाडी में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, म्यांमार की थल, वायु और नौसेना बलों की तीनों विंग ने आतंकवादी समूह के खिलाफ समन्वित कार्रवाई किया।

रिपोर्ट के अनुसार, म्यांमार के सैन्य अभियानों के प्रत्यक्षदर्शी ने बताया कि वायु सेना के जेट विमानों ने जमीनी सैनिकों और नौसैनिक बलों की मदद से पहाड़ में स्थित अराकान सेना की चौकियों पर तीन बार बमबारी की थी।

बता दें, म्यांमार के सैन्य और आतंकी समूह अराकान सेना के बीच यह झड़प पिछले एक महीने से अधिक समय से चल रहा है। हमलें से परेशान निवासियों को मजबूरन संघर्षग्रस्त इलाके को छोड़ कर जाना पड़ा। इलाके में बचे लोगों ने दावा किया कि मंगलवार को म्यांमार के सैन्यबलों द्वारा किया गया हवाई हमला अब तक का सबसे भयानक हमला था।

उनके मुताबिक, सेना अब तक केवल संदिग्ध अराकान सेना के ठिकानों पर बम गिराने के लिए हेलीकॉप्टरों का इस्तेमाल करती थी। लेकिन 3 से 5 अक्टूबर के दौरान दोनों सेना के बीच क्युकतान और हेटेसवे गाँवों के बीच औंगथारजी के पास जमकर गोलीबारी हुई। एक तरफ जहाँ म्यांमार की सेना ने कहा कि उसने 4 अक्टूबर को पहाड़ी को कब्जे में लिया था। वहीं अराकान सेना ने कहा कि उन्होंने वापस से 5 अक्टूबर को पहाड़ी पर कब्जा कर लिया।

गौरतलब है कि 2009 में उत्तरार्ध में गठन के बाद से म्यांमार सेना और अराकान सेना के बीच संघर्ष चल रहा है।अलगाववादी अराकान सेना म्यांमार की सेना के साथ लंबे समय से लड़ाई में उलझी हुई है। अराकान सेना म्यांमार के रखाइन राज्य में सबसे बड़ा आतंकवादी समूह है और राजनीतिक दल यूनाइटेड लीग ऑफ़ अरकान (ULA) का सशस्त्र विंग भी है।

वहीं इस साल 23 मार्च को म्यांमार सरकार ने लोगों के अंदर डर पैदा करने और सरकार और नागरिकों के इलाकों में हमला करके देश की स्थिरता को बाधित करने के लिए अराकान सेना और उल्ला को आधिकारिकतौर ओर आतंकवादी समूह घोषित कर दिया था।

इस संगठन ने 2019 में चार पुलिस स्टेशनों पर कथित रूप से हमला किया था। जिस दौरान 20 पुलिस अधिकारी हताहत हुए। वहीं कुछ पुलिसकर्मियों की मौत भी हो गई थी।
यह भी आरोप लगाया गया है कि चीन म्यांमार की सेना के खिलाफ अपनी लड़ाई जारी रखने के लिए अराकान सेना को आधुनिक हथियार भी प्रदान कर रहा है।

गुजरात के गृहमंत्री ने NDTV पर केस दर्ज करने के दिए आदेश, तनिष्क पर फैलाया था फेक न्यूज

तनिष्क द्वारा विज्ञापन वापस लेने के बाद वामपंथी मीडिया चैनल एनडीवी ने ब्रेकिंग चलाते हुए दावा किया कि विवाद के चलते गुजरात के गाँधीधाम में तनिष्क के एक स्टोर पर हमला हुआ है।एनडीटीवी के मुताबिक, हमलावरों की भीड़ ने कथित तौर पर स्टोर मैनेजर को माफी पत्र लिखने के लिए कहा था।

अब गुजरात के गृहमंत्री ने इसका खंडन करते हुए कहा, “NDTV द्वारा गाँधीधाम (गुजरात) के तनिष्क स्टोर पर हमले की फैलाई गई खबरें पूर्णतः झूठ और फ़र्ज़ी हैं। यह बिलकुल ही गलत मंशा से गुजरात में कानून-व्यवस्था बिगाड़ने और हिंसा भड़काने के उद्देश्य से किया गया कार्य है। मैंने इन लोगों पर मामला दर्ज करने को कहा है और फेक न्यूज चलाने वालों पर सख्त कार्रवाई के आदेश दिए हैं।”

बता दें कि इससे पहले कच्छ के IPS ऑफिसर ने भी इस खबर को पूरी तरह से खंडन किया था। उन्होंने इस खबर को प्रोपेगेंडा के तहत चलाई जाने वाली खबर बताया। उन्होंने कहा था, “मीडिया चैनल दिखा रहे हैं कि तनिष्क शॉप पर हमला हुई है, दंगा हुआ है या चोरी हुआ है, तो ये यब गलत न्यूज है, फेक न्यूज है। ये एक प्रोपेगेंडा के हिसाब से चल रहा है। इसलिए इस तरह की अफवाहों पर ध्यान न दें।” उन्होंने बताया कि शोरूम के मालिक भी इस बारे में बात करना चाहते हैं।

NDTV की रिपोर्ट में कहा गया था कि गुजरात के गाँधीधाम में तनिष्क स्टोर पर हमला हुआ है। हमला होने के बाद स्टोर मैनेजर के माफी पत्र में कथित तौर पर सेक्युलर विज्ञापन प्रसारित करके हिंदुओं की भावनाओं को आहत करने के लिए कच्छ जिले के लोगों से माफी माँगवाई गई।

तनिष्क के विज्ञापन में एक हिंदू महिला की गोदभराई की रस्म को दिखाया गया था। इस लड़की की शादी मुस्लिम परिवार में हुई थी। इसमें हिंदू संस्कृति को ध्यान में रखते हुए मुस्लिम परिवार सभी रस्मों रिवाजों को हिंदू धर्म के हिसाब से करता दिखाया गया था। 

विज्ञापन को लव जिहाद को बढ़ावा देने के आरोप लगने और सोशल मीडिया पर तनिष्क के बहिष्कार की अपीलों के बाद कंपनी ने विज्ञापन को वापस ले लिया। कुछ इसी तरह का विवाद होली के दौरान सर्फ एक्सेल के एक विज्ञापन को लेकर भी हुआ था।

केंद्र सरकार ने जारी किया J&K और लद्दाख को ₹520 करोड़ का विशेष पैकेज: 10 लाख से ज्यादा महिलाओं को मिलेगा फायदा

केंद्र सरकार ने दीनदयाल अंत्योदय योजना के तहत केंद्र शासित प्रदेश जम्मू कश्मीर और लद्दाख को 520 करोड़ के विशेष पैकेज की मंजूरी दी है। इसकी जानकारी केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने स्वयं दी।

उन्होंने बताया, “दीनदयाल अंत्योदय योजना-राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन पूरे देश भर में बहुत मशहूर योजना है। मगर, कुछ तकनीकी कारणों से जम्मू कश्मीर और लद्दाख में बहुत कम महिलाएँ ऐसी थीं जिन्हें चिह्नित किया गया और जो योग्य थीं। इसलिए अब जम्मू कश्मीर और लद्दाख के लिए क्राइटेरिया बदल दिया गया है। इसमें गाँवों के दो तिहाई परिवार कवर कर लिए गए हैं और 10,58,000 महिलाएँ को 520 करोड़ रुपए के पैकेज के साथ इसका फायदा मिलेगा।”

यहाँ बता दें कि दीनदयाल अंत्योदय योजना दरअसल, देश के गरीब नागरिकों के लिए है। इसके लाभार्थियों में शहरी और गाँव दोनों के ही गरीब शामिल किए गए हैं। राष्ट्रीय आजीविका मिशन के तहत केंद्र सरकार का लक्ष्य इस योजना के माध्यम से शहरों और गाँवों के गरीब लोगों की गरीबी दूर करने पर आधारित है। यह भी प्रधानमंत्री रोजगार योजना जैसी ही योजना है। जो स्किल डेवलपमेंट के साथ ही रोजगार के अवसर सुनिश्चित करने की बात करती है।

इस योजना के 2 घटक हैं। एक का नाम दीनदयाल अंत्योदय योजना- राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन और दूसरे का नाम दीनदयाल अंत्योदय योजना-राष्ट्रीय शहरी आजीविका मिशन है। पहले घटक का उद्देश्य ग्रामीण गरीबों के लिए कुशल और प्रभावी संस्थागत मंच तैयार करना था। ताकि उन्हें स्थायी आजीविका संवर्धन के माध्यम से घरेलू आय में बढ़ोत्तरी करने में मदद मिल सके। वहीं दूसरे घटक में शहरों के गरीबों का उत्थान है।

गौरतलब है कि केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर और नरेंद्र सिंह तोमर ने आज यानी बुधवार (अक्टूबर 14, 2020) को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में हुई केंद्रीय कैबिनेट की बैठक में लिए गए फैसलों को लेकर प्रेस कॉन्फ्रेंस की थी। इस कॉन्फ्रेंस में जावड़ेकर ने यह भी बताया था कि शिक्षा मंत्रालय के स्कूली शिक्षा एवं साक्षरता विभाग के तहत केंद्र प्रायोजित नई योजना के तौर पर स्टार्स (STARS) प्रोजेक्ट को शुरू किया जाएगा।

इस प्रोजेक्ट के तहत 6 राज्य इसके दायरे में आएँगे। इनमें हिमाचल प्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, केरल और ओडिशा का नाम शामिल है। जावड़ेकर ने बताया कि यह प्रोजेक्ट विश्व बैंक द्वारा समर्थित है। इसकी लागत 5,718 करोड़ रुपए है जिसमें विश्व बैंक ने 500 मिलियन डॉलर का सहयोग किया है।

महाराष्ट्र: अनलॉक-5 में भी उद्धव सरकार ने नहीं दी मंदिरों को खोलने की अनुमति, 15 अक्टूबर से मेट्रो सहित कई अन्य सेवाएँ शुरू

महाराष्ट्र सरकार ने बढ़ते कोरोना वायरस मामलों के बीच बुधवार (अक्टूबर 14, 2020) को अनलॉक 5 के तहत अपने नए दिशा-निर्देश जारी कर दिए। एक तरफ जहाँ उद्धव ठाकरे सरकार ने मेट्रो सेवाओं को 15 अक्टूबर से शुरू करने के निर्देश दिए, वहीं दूसरी ओर मंदिरों के खोले जाने की अनुमित नहीं दी। बता दें कोविड-19 के बढ़ते प्रसार से जूझ रहीं महा विकास अगाड़ी के नेतृत्व वाली महाराष्ट्र सरकार अपने स्वयं के अनलॉकिंग पैटर्न का पालन कर रही है।

महाराष्ट्र सरकार के जारी नोटिफिकेशन में कहा गया है कि राज्य में धार्मिक स्थान, सिनेमा हॉल, स्विमिंग पूल अभी नहीं खुलेंगे। बाकी गुरुवार से मेट्रो ट्रेनों को श्रेणीबद्ध तरीके से शुरू किया जाएगा। राज्य में बिजनेस-टू-बिजनेस एक्जिबिशन की भी अनुमति दी गई है। आवश्यक कोविड-19 सावधानियों के साथ, गवर्नमेंट और पब्लिक लाइब्रेरियों को भी खोला जा रहा है। दुकानें और बाजार सुबह 9 से रात 9 बजे तक खुले रहेंगे। अन्य राज्यों में रेस्तरां खुलने के लंबे समय बाद, महाराष्ट्र ने 5 अक्टूबर से रेस्तरां और बार को खोलने की अनुमति दी थी।

वहीं कोरोना के बढ़ते संक्रमण को देखते हुए स्कूलों और शैक्षणिक संस्थानों पर भी पाबंदी लगी हुई है। अनलॉक के नए गाइडलाइन में भी इसके फिर से खोलने पर कोई फैसला नहीं लिया गया है। हालाँकि, अध्यापक 50 फीसदी क्षमता के साथ स्कूल अटैंड कर सकेंगे।

गौरतलब है कि महाराष्ट्र में मंदिरों को खोलने की अनुमति को लेकर उद्धव ठाकरे सरकार के रवैये पर महाराष्ट्र राज्यपाल ने नाराजगी व्यक्त की थी। जहाँ एक तरफ भाजपा कार्यकर्ताओं ने शिरडी के साईं बाबा और प्रभादेवी के सिद्धिविनायक मंदिर के सामने जबरदस्त विरोध प्रदर्शन किया। वहीं राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी ने सीएम उद्धव ठाकरे से पूछा है कि उन्हें कोई दिव्य प्रेम प्राप्त हुआ है या वो सेक्युलर हो गए हैं?

दरअसल, भाजपा की माँग है कि राज्य में सारे मंदिरों को खोलने की अनुमति दी जाए। राज्यपाल की आपत्ति इस बात को लेकर है कि राज्य सरकार ने जून में ही धार्मिक स्थलों को खोलने की घोषणा की थी लेकिन अब 4 महीने बाद भी मंदिर बंद ही हैं। उन्होंने ध्यान दिलाया कि सारे रेस्टॉरेंट खुले हुए हैं। राज्यपाल ने उद्धव को याद दिलाया कि वो हिंदुत्व के मजबूत पक्षधर रहे हैं और भगवान राम के लिए उन्होंने सार्वजनिक रूप से श्रद्धा व्यक्त की थी।

पालघर मामले में मुंबई पुलिस ने जारी किया अर्नब गोस्वामी को ‘कारण बताओ’ नोटिस: अच्छे बर्ताव के लिए माँगा बॉन्ड

रिपब्लिक टीवी के एडिटर इन चीफ अर्नब गोस्वामी और मुंबई पुलिस के बीच खींचतान अब भी जारी है। मुंबई पुलिस ने हाल में पालघर मामले के मद्देनजर अर्नब को सीआरपीसी की धारा 108 (1) के तहत सांप्रदायिक टिप्पणी करने के आरोप ‘कारण बताओ’ नोटिस जारी किया है।

यह नोटिस असिस्टेंट पुलिस कमिश्नर सुधीर जांबावडेकर (Sudhir Jambavdekar) द्वारा जारी किया गया है। इसमें उन्होंने स्पेशल एक्जिक्यूटिव मजिस्ट्रेट के अधिकार से पूछा है कि आखिर क्यों सार्वजनिक शांति के ख़िलाफ़ अपराध करने वाले आरोपित को एक साल की अवधि तक के लिए, सुनिश्चतता के साथ या उसके बिना बॉन्ड तामील करने को नहीं कहा जाना चाहिए।

इसमें लिखा है कि यदि वह बॉन्ड का उल्लंघन करते हैं तो उन्हें 10 लाख की पेनल्टी भरनी होगी। नोटिस में अर्नब को 16 अक्टूबर से पहले पेश होने को कहा गया है।

सार्वजनिक शांति के उल्लंघन और धर्म, जाति, भाषा स्थान के आधार पर विभिन्न समूहों के बीच दुश्मनी को बढ़ावा देने के आरोप में अर्नब पर जो केस, पिछले दिनों आईपीसी की धारा 153ए और 153बी के तहत दर्ज हुए थे, यह नोटिस उसी बाबत है। इस नोटिस में गोस्वामी के ख़िलाफ़ हुई एफआईआऱ का जिक्र है।

इनमें से एक एफआईआर में दावा किया गया है कि अर्नब ने 21 अप्रैल को पालघर केस में सांप्रदायिक दुर्भावना को उकसाने के लिए अपमानजनक टिप्पणी की और दूसरी में चैनल की कवरेज, पर सवाल उठे हैं जो 14 अप्रैल को बांद्रा स्टेशन के पास भीड़ इकट्ठ होने पर रिपब्लिक भारत ने की थी। नोटिस के मुताबिक समुदाय विशेष के लोगों के मन को चोट पहुँचाने के लिहाज से न्यूज चलाई गई थी।

गौरतलब है कि जबसे अर्नब गोस्वामी ने अपने शो में सोनिया गाँधी को एटोनियो मायनो कहा, तभी से मुंबई पुलिस उक्त मीडिया चैनल के पीछे हाथ धो कर पीछे पड़ गई थी। उस शो के कुछ ही घंटों में अर्नब के ख़िलाफ़ कई एफआईआर दर्ज हुई थीं और पुलिस ने बाद में उनसे 11 घंटे पूछताछ भी की थी। हाल में भी यदि देखें तो मुंबई पुलिस ने रिपब्लिक टीवी का नाम टीआरपी स्कैम में ले लिया था जबकि शिकायतकर्ता की एफआईआर से मालूम चला कि उसमें नाम रिपब्लिक टीवी का नहीं इंडिया टुडे का है।

‘…अगर मैं मर गया तो सलमान खान, करण जौहर, साजिद होंगे इसके जिम्मेदार’ – बॉलीवुड एक्टर ने लगाया आरोप

बॉलीवुड एक्टर और फिल्ममेकर कमाल आर खान ने अपनी जान को खतरा बताया है। बता दें कि केआरके नाम से जाने जाने वाले एक्टर अक्सर अपने ट्वीट्स को लेकर सुर्खियों में बने रहते हैं। अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की मौत को लेकर उन्होंने बॉलीवुड के दिग्गज सितारों पर जमकर हमला बोला था। साथ ही बॉलीवुड ड्रग्स कनेक्शन जैसे सभी बड़े मुद्दों पर अपनी राय ट्विटर पर बड़ी ही बेबाकी से रखी थी।

केआरके ने अपने ट्वीट में कहा कि उनको मारने की प्लानिंग की जा रही है। उन्होंने अपनी मौत की साजिश के पीछे करण जौहर, सलमान खान, आदित्य चोपड़ा, साजिद नाडियाडवाला, अक्षय कुमार को जिम्मेदार ठहराया है।

कमाल आर खान (Kamaal R Khan) ने ट्वीट में लिखा, “मैं आप सभी को बताना चाहता हूँ कि अगर मुझे कुछ भी हुआ तो इसके जिम्मेदार करण जौहर, सलमान खान, अक्षय कुमार, आदित्य चोपडा, साजिद नाडियाडवाला होंगे। इन लोगों ने मुझे खत्म करने का प्लान बना लिया है।” केआरके ने अपने इस ट्वीट में पीएम नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह और कुछ न्यूज चैनलों को टैग किया है।

बता दें कि केआरके का यह ट्वीट सोशल मीडिया पर जमकर वायरल हो रहा है। सोशल मीडिया यूज़र्स उनके ट्वीट पर अलग-अलग तरह के रिएक्शन दे रहे हैं। कई यूजर केआरके का मजाक बना रहे हैं तो कोई उनकी चिंता कर रहा है।

सुशांत केस: ‘राब्ता’ के डायरेक्टर के घर और ऑफिस पर ED ने मारा छापा, अधिकारियों ने जब्त किए कुछ डाक्यूमेंट्स

बॉलीवुड एक्टर सुशांत सिंह राजपूत केस में प्रवर्तन निदेशालय (ED) मनी लॉन्ड्रिंग के ऐंगल से जाँच कर रहा है। ईडी इस सिलसिले में कई लोगों से पूछताछ कर चुकी है। बुधवार (अक्टूबर 14, 2020) को ED ने डायरेक्टर दिनेश विजान के घर और ऑफिस में छापा मारा है। अधिकारियों ने इस दौरान विजान के घर से कुछ डॉक्यूमेंट्स लिए हैं। सुशांत ने दिनेश की फिल्म ‘राब्ता’ में काम किया था। फिल्म में कृति सेनन भी थी।

सुशांत सिंह राजपूत की मौत की गुत्थी अब तक नहीं खुल पाई है। इस केस में सीबीआई जाँच कर रही है। नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (NCB) कई गिरफ्तारियाँ कर चुका है। इस बीच खबर आ रही है कि ईडी ने ‘राब्ता’ फिल्म के डायरेक्टर दिनेश विजान के घर और ऑफिस में सर्च ऑपरेशन चलाया है।

इस फिल्म के लेन-देन पर सवाल उठाए जाए रहे थे। बताया जा रहा है कि अधिकारियों ने दिनेश से कुछ दस्तावेज लिए हैं। रिपोर्ट्स हैं कि ‘राब्ता’ के अलावा सुशांत और दिनेश के बीच एक और फिल्म को लेकर बात हुई थी। मगर वो फिल्म बन नहीं सकी। पेमेंट्स को लेकर ईडी सितंबर में दिनेश से 8 घंटे पूछताछ कर चुकी है।

जानकारी के मुताबिक, साल 2016 में दिनेश विजान ने सुशांत को पेमेंट की थी। इसको लेकर ईडी विजान से दो बार पूछताछ कर चुकी है और सुशांत के साइनिंग अमाउंट से जुड़े डॉक्यूमेंट और दूसरी जानकारी भी माँगी।

हाल ही में ईडी ने श्रुति मोदी और उदय सिंह गौरी से पूछताछ की थी। उदय सिंह गौरी, सुशांत सिंह का अकाउंट सँभालते थे। उदय सिंह गौरी ने सुशांत से उनके मौत से एक दिन पहले बात की थी। इससे पहले निर्देशक रूमी जाफरी से भी ईडी ने पूछताछ की थी।

रूमी जाफरी ने पूछताछ में बताया कि उन्होंने सुशांत को एक फिल्म का ऑफर दिया था। फिल्म में सुशांत और रिया साथ में काम करने वाले थे लेकिन लॉकडाउन की वजह से शूटिंग शुरू नहीं हो पाई थी। बता दें कि सुशांत सिंह राजपूत का शव 14 जून को बांद्रा स्थित फ्लैट में मिला था।

इस मामले ने फिल्म इंडस्ट्री को झकझोर कर रख दिया। इस केस को लेकर सीबीआई, ईडी और एनसीबी जाँच कर रही है। ड्रग्स एंगल में बॉलीवुड के कई बड़े नाम सामने आए, जिनमें दीपिका पादुकोण, श्रद्धा कपूर, सारा अली खान, रकुल प्रीत समेत कई लोगों से पूछताछ की गई है।

गौरतलब है कि हाल ही में सुशांत सिंह राजपूत की मौत के मामले में मुजफ्फरपुर की अदालत ने करण जौहर और एकता कपूर समेत 7 फ़िल्मी हस्तियों को नोटिस जारी किया। जिला एवं सत्र न्यायाधीश राकेश मालवीय की अदालत ने आदेश जारी किया कि ये सभी अक्टूबर 21, 2020 तक हाजिर हों, या फिर अपने वकीलों के माध्यम से उपस्थिति दर्ज कराएँ। इन दोनों के अलावा आदित्य चोपड़ा, संजय लीला भंसाली, साजिद नाडियावाला, एकता कपूर, भूषण कुमार और दिनेश विजया को भी नोटिस भेजा गया है।

‘गाँधीधाम में Tanishq के शोरूम पर हिन्दुओं ने किया हमला’: NDTV की फेक न्यूज़ को लिबरल लॉबी ने लिया हाथों हाथ

सोशल मीडिया पर ‘Tanishq’ ज्वेलरी के विज्ञापन वीडियो को लेकर विरोध प्रदर्शन होने के बाद गुजरात के गाँधीधाम में स्थित ‘Tanishq’ के एक स्टोर ने हिन्दुओं से माफ़ी माँगी। ‘लव जिहाद’ के महिमामंडन को लेकर हो रहे विरोध के बाद स्टोर ने माफीनामा लिख कर बोर्ड पर लगा दिया था। अब NDTV सहित पूरा वामपंथी इकोसिस्टम ये दिखाने में जुटा हुआ है कि 1 दिन पहले ‘Tanishq’ के गाँधीधाम स्थित स्टोर पर उसके वीडियो को लेकर ‘हिन्दू भीड़’ ने हमला किया, जिसके बाद उसे माफ़ी माँगने के लिए बाध्य होना पड़ा।

सबसे पहले तो NDTV ने नैरेटिव बनाने के लिए ट्विटर पर ब्रेकिंग न्यूज़ दे दिया और इसके कुछ देर बाद इस घटना पर जो लेख आया, उसमें न तो उसके सोर्स का जिक्र था, और न ही स्टोर पर हमले की घटना का कोई वर्णन था इसके बाद NDTV ने एक वीडियो डाला, जिसमें मंगलवार (अक्टूबर 11, 2020) को दोपहर 12 बजे हमले की बात कही गई। ‘सूत्रों’ के हवाले से चैनल ने कह दिया कि मैनेजर को माफीनामा लिखने को बाध्य होना पड़ा।

NDTV की फेक खबर

इसके कुछ ही देर बाद ट्विटर यूजर डॉक्टर नील ने एक ऑडियो क्लिप शेयर किया, जिसमें उन्होंने गाँधीधाम में स्थित ‘Tanishq’ के स्टोर मैनेजर से बात कर के NDTV के झूठ का पर्दाफाश किया है। उन्होंने स्टोर में कॉल कर के जब पूछा कि क्या किसी ने वहाँ हमला किया है, जैसी NDTV पर खबर आ रही है? इस पर स्टोर के मैनेजर ने कहा कि नहीं, किसी ने भी कोई हमला नहीं किया है। मैनेजर को इस झूठी खबर के बारे में कुछ पता ही नहीं था।

जैसे ही ये खबर NDTV पर आई, प्रोपेगंडा पोर्टलों ने इसे उठा कर प्रकाशित करना शुरू कर दिया। लेकिन, किसी ने भी स्टोर के मैनेजर या किसी कर्मचारी से बयान लेने की जहमत नहीं उठाई। हिन्दुओं को इसी बहाने हिंसक साबित किया जाने लगा। ‘इंडियन एक्सप्रेस’ ने तो एक अज्ञात कर्मचारी के हवाले से यहाँ तक दावा कर दिया कि 120 लोगों की भीड़ वहाँ जमा हो कर गालियाँ देने लगी और कहने लगी कि हिन्दू अब ये सब बर्दाश्त नहीं करेंगे।

अज्ञात कर्मचारी के हवाले से मीडिया संस्थान ने लिखा कि कर्मचारी कहते रहे कि गाँधीधाम शोरूम को ‘Tanishq’ के इस निर्णय के बारे में कुछ नहीं पता, और वो लोग भी हिन्दू ही हैं। बकौल ‘अज्ञात कर्मचारी’, उसे भीड़ से कहा कि कंपनी ने सिर्फ ज्वेलरी बेचने के लिए ये वीडियो बनाया था, इसका और कोई मकसद नहीं था। पुलिस ने भी स्पष्ट कहा है कि कोई हमला नहीं हुआ। कच्छ के एसपी ने इसे प्रोपेगंडा के तहत चलाई गई खबर करार दिया।

तनिष्क विवाद पर बोले जावेद अख्तर, कहा- लड़की वालों को हमेशा लड़के ‘पशु चोर’ ही लगते हैं, लोगों ने पूछा- राहुल पर क्यों चुप थे चचा!

तनिष्क को अपने विवादित विज्ञापन के कारण बड़े स्तर पर लोगों की नाराजगी झेलनी पड़ रही है। ऐसे में जावेद अख्तर अब उस एड पर आ रही प्रतिक्रिया पर अपना मत रखने मैदान में उतरे हैं।

अपने एक ट्वीट में उन्होंने कहा है कि अतंरजातीय विवाह हमेशा ही कुछ लोगों को परेशान करता है और नाराज लोग दूल्हे और परिवार को पशु चोर की तरह देखते हैं। 

सुनंदा वशिष्ठ के ट्वीट पर रिप्लाई करते हुए जावेद अख्तर ने कहा, “चाहे फिल्म हो, विज्ञापन या वास्तविक जीवन सभी जगह इंटर रिलीजियस शादी हमेशा ही कुछ लोगों को परेशान करती है, जिनमें हमेशा ही लड़की पक्ष का गुस्सा देखने को मिलता है या इससे संबंधित होता है, यह नाराजगी इस बात पर आधारित होती है कि उन्हें लगता है महिलाएँ अपनी संपत्ति की तरह हैं। नाराज लोग दुल्हे और उसके परिवार को किसी गाँव के पशु चोर रूप में देखते हैं।”

इस ट्वीट के बाद से सोशल मीडिया पर लोग जावेद अख्तर को ट्रोल कर रहे हैं। कुछ यूजर्स का सीधा सा सवाल है कि फिल्मों में चाहे बॉम्बे के रिलीज समय को याद कर लिया जाए या फिर गदर को जिसमें मुस्लिम लड़की को सिंदूर लगाने भर से विवाद खड़ा हो गया था। इसके अलावा वास्तविक जीवन में भी नुसरत जहां को मौलवियों ने कितनी धमकियाँ दी थीं यह किसी से छिपी नहीं है।

एक यूजर जावेद अख्तर के लिए लिखता है, “चाचा को बिना सच्चाई के और बर्बर विचारधारा के साथ सामंजस्य के लिए सेकुलरिज्म चाहिए।”

लोगों का जावेद अख्तर से पूछना है कि आखिर खुद को नास्तिक बताने वाले राहुल राजपूत के साथ हुई घटना पर कोई टिप्पणी क्यों नहीं कर रहे और ऐसी कुप्रथाओं के समर्थन में क्यों अपनी आवाज उठा रहे हैं।

एक नेटिजन उनको लिखता है कि सेकुलर होने और पाकिस्तानी होने में कोई अंतर नहीं है। रिपोर्टिंग के लिए सेकुलर एजेंडा बिलकुल पाकिस्तानियों जैसा है। सिर्फ़ आतंकियों का असली चेहरा दिखाकर बर्बर चेहरे को छिपा ले जाना।

इसी प्रकार अन्य ट्विटर अकॉउंट से जावेद से अपील की जाती है कि चूँकि वह फिल्म इडस्ट्री से जुड़े हुए हैं इसलिए ऐसी स्थिति को रिवर्स करके एड बनाएँ और फिर लुटियंस साथियों को उनके समर्थन में ट्वीट करने को बोलें।

गौरतलब है कि एक ओर जहाँ जावेद अख्तर के ट्वीट के बाद उसके रिप्लाई में कोई भी व्यक्ति उनके समर्थन में खड़ा नहीं दिखाई दे रहा है। वहीं कई अन्य लिरबल व कट्टरपंथी गिरोह के लोग भी इस मामले में लीपा-पोती करने में जुटे में हैं। ऐसे में तनिष्क को बहिष्कृत करने का विचार बना चुके लोग उनकी टाइम लाइन पर भी उन्हें आड़े हाथों ले रहे हैं।

‘हिंदुओं को नापसंद करने के चलते मुसलमानों के पाले में खड़े होना बड़ी भूल होगी’ – कह गए थे आंबेडकर, पढ़िए

14 अक्टूबर 1956 को नागपुर स्थित दीक्षाभूमि में बाबा साहब डॉ. भीम राव आंबेडकर ने विधिवत बौद्ध धर्म स्वीकार किया। इसी दिन महाराष्ट्र के चंद्रपुर में आंबेडकर ने सामूहिक धर्म परिवर्तन का एक कार्यक्रम भी किया और अपने 385000 अनुयायियों को 22 प्रतिज्ञाएँ दिलवाईं, जिनका सार ये था कि बौद्ध धर्म अपनाने के बाद किसी हिंदू देवी देवता और उनकी पूजा में विश्वास नहीं किया जाएगा। हिंदू धर्म के कर्मकांड नहीं होंगे और ब्राह्मणों से किसी किस्म की कोई पूजा अर्चना नहीं करवाई जाएगी। 

इसके अलावा उन्होंने मनुष्य की समानता और नैतिकता को अपनाने संबंधी प्रतिज्ञा ली थी, मगर आज के ‘नवबौद्ध’ उनके मूल्यों से कोसों दूर हैं। आंबेडकर के नाम पर राजनीतिक रोटियाँ सेंकने वाले ‘नवबौद्धों’ में समानता और अहिंसा का कोई रूप नजर नहीं आता। हाल ही में उत्तर प्रदेश के हाथरस में हुई घटना को लेकर भीम आर्मी के प्रमुख चंद्रशेखर आजाद उर्फ ‘रावण’ का हंगामा सबने देखा।

यहाँ पर गौर करने वाली बात ये है कि ‘जय भीम जय मीम’ का नारा देने वाले ‘नवबौद्ध’ रावण के लिए बाकी किसी और जाति की तो छोड़िए, दलित भी एकसमान नहीं हैं। वो दलितों को भी एक नजर से नहीं देखते हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि हाथरस में हुई घटना को लेकर ‘रावण’ की नौटंकी तो हम सबने देखी, लेकिन क्या उसी राज्य के बलरामपुर में एक और दलित लड़की के साथ हुए बलात्कार पर रावण का बयान, ट्वीट या विरोध प्रदर्शन देखने को मिला। नहीं न… क्योंकि यहाँ आरोपित ‘मीम’ थे और हाथरस में आरोपित ठाकुर थे।

इसलिए हाथरस पर ‘संवेदनाओं’ और ‘एकजुटता’ को बोरियों में भर-भर कर उड़ेला गया, लेकिन वही बोरियाँ बलरामपुर की दलित पीड़िता के लिए खाली हो जाती है। खुद को आंबेडकर का अनुयायी बताने वाले ‘नवबौद्ध’ यहाँ पर इसलिए चुप हो जाते हैं, ताकि उनका ‘जय भीम जय मीम’ वाला संतुलन बना रहे और मुस्लिम तुष्टीकरण होता रहे।

इसी तरह दिल्ली विश्वविद्यालय के 18 वर्षीय दलित छात्र राहुल की मुस्लिम लड़की के साथ प्रेम प्रसंग होने की वजह से मोहम्मद अफरोज और मोहम्मद राज ने अपने तीन अन्य साथियों के साथ मिलकर उस पर बर्बरतापूर्वक हमला किया। राहुल घायल अवस्था में ही अस्पताल पहुँचा जहाँ इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई।

बलरामपुर और दिल्ली के आदर्श नगर की घटना ने दलित हितैषी कथित बुद्धिजीवियों को नंगा ही नहीं किया बल्कि उदित राज, मायावती और चंद्रशेखर जैसे कथित दलित हितैषी नेताओं की भी पोल खोल कर रख दी है। वे मौन हैं क्योंकि इस मामले में आरोपित न तो सवर्ण हैं और न ही बीजेपी से उनका कोई कनेक्शन। जय भीम-जय मीम के नाम पर दलितों के साथ होने वाले छलावे को यह मामला बेनकाब करता है। इसलिए सबने चुप्पी साध रखी है।

दोनों घटनाओं पर इनकी प्रतिक्रियाओं का अंतर यह भी बताता है कि कैसे मौकापरस्त गिरोह हमारे सामने किसी भी मामले को अपने एजेंडे के अनुसार पेश करता है। अपने नजरिए को ही अंतिम सत्य बताकर हम पर थोपने की कोशिश करता है। हाथरस मामले पर जिस सक्रियता से राणा अय्यूब जैसे कट्टरपंथी, दलित विचारक और उनके हितैषी बन बैठे थे, वह सभी इस घटना पर मौन हो गए।

न किसी ने इस वाकये की निंदा की और न ही दलितों के भविष्य को लेकर अपनी चिंता जाहिर की। कारण शायद सिर्फ़ एक ही था कि हाथरस में आरोपित सवर्ण निकल आया था, जो इनके एजेंडे के लिए फिट था और दिल्ली में आरोपित मुस्लिम थे, इसलिए ये इनकी राजनीति के लिए फिट नहीं बैठता है।

बाबा साहब ने इस बारे में चेताया था

देश में उथल-पुथल मचा रहे वामपंथियों और बात-बात पर हर किसी को सहिष्णुता का पाठ पढ़ाने वाले यह बताएँ कि क्या किसी ने बाबा साहब को उस शिद्दत से पढ़ा भी है, उनके विचार समझने की कोशिश भी की है, जो कि आज के भारत के निर्माण में जरूरी भी है और समसामयिक भी। बाबा साहब अस्पृश्यता एवं जन्माधारित विशेषाधिकारों पर चल रही समाज व्यवस्था के कट्टर विरोधी थे।

उन्होंने हिन्दू समाज रचना के विविध पहलुओं का गंभीर चिन्तन करने के साथ भारत में मुस्लिम राजनीति का भी विस्तृत अध्ययन किया था। डॉ. आंबेडकर ने भारत पर मुसलमानों के क्रूर तथा रक्तरंजित आक्रमणों का गहराई से अध्ययन किया था। उन चाटुकारों तथा दिशाभ्रमित वामपंथी इतिहासकारों को फटकारते हुए उन्होंने लिखा है, “यह कहना गलत है कि ये सभी आक्रमणकारी केवल लूट या विजय के उद्देश्य से आए थे।”

साभार: ‘पाकिस्तान और द पार्टीशन ऑफ़ इंडिया’

बाबा साहब आंबेडकर ने अनेक उदाहरण देते हुए बताया कि इनका उद्देश्य हिन्दुओं में मूर्ति पूजा तथा बहुदेववाद को नष्ट कर भारत में इस्लाम की स्थापना करना था। इस संदर्भ में उन्होंने कुतुबुद्दीन ऐबक, अलाउद्दीन खिलजी, फिरोज तुगलक, शाहजहाँ, औरंगजेब और महमूद गजनवी की विस्तार से चर्चा की है। उन्होंने बताया कि हिंदू मंदिरों को तोड़कर उस पर मस्जिद बनाए गए। बाबा साहब दलितों की जितनी दूरी ब्रह्मणवाद से रखने के पक्ष में थे, उससे कहीं ज्यादा दूरी वो दलितों को इस्लाम से रखने के पक्ष में थे। 

साभार: ‘पाकिस्तान और द पार्टीशन ऑफ़ इंडिया’

आंबेडकर इस्लाम में महिलाओं की स्थिति को लेकर चिंतित थे। वो बहु विवाह प्रथा के खिलाफ थे। आंबेडकर बहु विवाह प्रथा को महिला मुद्दों के साथ जोड़कर देखते थे। वो मानते थे कि इससे स्त्रियों को कष्ट होता है। उनका मानना था कि इस प्रथा में उनका शोषण और दमन होता है। हिन्दू समाज में जितनी कुरीतियाँ हैं, वो सभी मुस्लिमों में हैं ही, साथ ही कुछ ज्यादा भी हैं। मुस्लिम महिलाओं के ‘पर्दा’ प्रथा पर आंबेडकर ने कड़ा प्रहार करते हुए इसकी आलोचना की थी। उनका इशारा बुर्का और हिजाब जैसी चीजों को लेकर था। इन चीजों की आज भी जब बात होती है तो घूँघट को कुरीति बताने वाले लोग चुप हो जाते हैं।

इस्लाम में भाईचारा है, लेकिन कहाँ तक?

साभार: ‘पाकिस्तान और द पार्टीशन ऑफ़ इंडिया’

डॉ आंबेडकर ने साफ-साफ बताया, “मुसलमानों के लिए हिन्दू काफ़िर हैं, और एक काफ़िर सम्मान के योग्य नहीं है। वह निम्न कुल में जन्मा होता है, और उसकी कोई सामाजिक स्थिति नहीं होती। इस्लाम विश्व को दो भागों में बाँटता है, जिन्हें वे दारुल-इस्लाम तथा दारुल हरब मानते हैं। जिस देश में मुस्लिम शासक है, वह दारुल इस्लाम की श्रेणी में आता है। और जिस किसी देश में जहाँ मुसलमान रहते हैं परन्तु उनका राज नहीं है, वह दारुल-हरब होगा। इसके अनुसार उनके लिए भारत दारुल हरब है। इस तरह वे मानव मात्र में और भाईचारे में बिल्कुल भरोसा नहीं रखते हैं। यह साबित करने के लिए और सबूत देने की आवश्यकता नहीं है कि मुसलमान हिन्दू सरकार के शासन को स्वीकार नहीं करेंगे।”

साभार: ‘पाकिस्तान और द पार्टीशन ऑफ़ इंडिया’

इसके अलावा उन्होंने जिहाद पर चर्चा करते हुए कहा था कि हिजरत के अलावा मुस्लिम कानून की एक और निषेधाज्ञा जिहाद है, जिसके तहत हर मुसलमान शासक का यह कर्तव्य हो जाता है कि इस्लाम के शासन का तब तक विस्तार करता रहे, जब तक सारी दुनिया मुसलमानों के नियंत्रण में नहीं आ जाती। ऐसे कई उदाहरण भी हैं कि उन्होंने जिहाद की घोषणा करने में संकोच नहीं किया। इस्लामी सिद्धान्तों के अनुसार मुसलमानों द्वारा जिहाद की घोषणा करना न्यायसंगत है। वे जिहाद की घोषणा ही नहीं कर सकते, बल्कि उसकी सफलता के लिए विदेशी मुस्लिम शक्ति की मदद भी ले सकते हैं, और यदि विदेशी मुस्लिम शक्ति जिहाद की घोषणा करना चाहती है तो उसकी सफलता के लिए सहायता दे सकते हैं।

साभार: ‘पाकिस्तान और द पार्टीशन ऑफ़ इंडिया’

सिर्फ इस्लाम मानने वालों तक सीमित है भाईचारा

आंबेडकर के शब्दों में इस्लाम का भ्रातृत्व सिद्धांत मानव जाति का भ्रातृत्व नहीं है। यह मुसलमानों तक सीमित भाईचारा है। समुदाय के बाहर वालों के लिए उनके पास शत्रुता व तिरस्कार के सिवाय कुछ भी नहीं है। उनके अनुसार इस्लाम एक सच्चे मुसलमान को कभी भी भारत को अपनी मातृभूमि मानने की स्वीकृति नहीं देगा। मुसलमानों की भारत को दारुल इस्लाम बनाने की महत्वाकांक्षा हमेशा रही है। डा. अम्बेडकर ने स्पष्ट शब्दों में लिखा था, “इस्लाम में राष्ट्रवाद का कोई चिंतन नहीं है। इस्लाम में राष्ट्रवाद की अवधारणा ही नहीं है। वह राष्ट्रवाद को तोड़ने वाला मजहब है।”

साभार: ‘पाकिस्तान और द पार्टीशन ऑफ़ इंडिया’

आखिर क्यों बाबा साहब बौद्ध धर्म की ओर ही गए

आंबेडकर ने इस्लाम और ईसाइयत को विदेशी मजहब माना। वह धर्म के बिना जीवन का अस्तित्व नहीं मानते थे, लेकिन धर्म भी उनको भारतीय संस्कृति के अनुकूल स्वीकार्य था। इसी वजह से उन्होंने ईसाइयों और इस्लाम के मौलवियों का आग्रह ठुकरा कर बौद्ध धर्म अपनाया क्योंकि बौद्ध भारत की संस्कृति से निकला एक धर्म है।

बाबा साहब के विचारों को समझने की जरूरत

1945 में डॉ. आंबेडकर की पुस्तक “थाट्स ऑन पाकिस्तान” प्रकाशित हुई, जिसने उनके प्रखर देशभक्त विचारों से अवगत कराया। भारत की राजनीतिक एकता को मूर्तरुप देने का जैसा शानदार कार्य सरदार पटेल ने अंजाम दिया, उसी कोटि का कार्य राष्ट्र की सामाजिक एकता को शक्तिशाली बनाते हुए बाबा साहब डॉक्टर आंबेडकर ने किया।

लेकिन दुखद है कि अलगाववाद की नीति अपनाने वाले भारत में ही रहने वाले कई लोग और वामपंथी ताकतें हमेशा इस देश को और इस एकता को खंडित करने में जुटे रहे हैं। कोरोना महामारी के बीच भी उनके यह प्रयास जारी हैं। जरूरी है कि बाबा साहब को ही नहीं उनके विचारों को भी व्यापक तरीके से तरजीह देते हुए उसे समझा जाए, अपनाया जाए।

उल्लेखनीय है कि बौद्ध धर्म को अहिंसा और प्रेम का प्रतीक माना जाता है। सम्राट अशोक ने भी शस्त्र त्याग कर बौद्ध धर्म की शिक्षा-दीक्षा ली थी। लेकिन उसी बौद्ध धर्म और आंबेडकर के नाम पर राजनीतिक रोटियाँ सेंकने वाले आज के ‘नवबौद्ध’ की सेना हिंसा और लोगों को भड़काने के अलावा कुछ नहीं करती है। चाहे वो हालिया हाथरस मामला हो या फिर सीएए के नाम पर दंगा भड़काने का। दलित परिवार को पीटने का आरोप हो या फिर स्वास्थ्यकर्मी पर हमला करने का। इन सभी कृत्यों में भीम आर्मी के नेता, कार्यकर्ता आगे रहते हैं।

आज के भीमवादी और कॉन्ग्रेस उसी नागरिकता संशोधन कानून का विरोध कर रहे हैं, जो बाबा साहब आंबेडकर का बहुप्रतीक्षित सपना था। एनडीए सरकार ने बाबा साहब आंबेडकर के एक लंबे समय से लंबित सपने को पूरा किया है, जिसकी अनुभूति वह अपने जीवनकाल में महसूस नहीं कर सके। सीएए पारित होने के साथ ही भीम आर्मी पार्टी और कॉन्ग्रेस समेत कई विरोधी दल एवं देश के बड़े वर्ग ने इस कानून का उग्र विरोध किया।

उनका कहना था कि यह डॉ. भीमराव आंबेडकर द्वारा बनाए गए संविधान के खिलाफ है, क्योंकि यह धर्मनिरपेक्षता और समानता का उल्लंघन करता है। ऐसी स्थिति में गौर करने वाली बात है कि यदि आज आंबेडकर जीवित होते तो इस अधिनियम पर उनकी क्या प्रतिक्रिया होती? 

दरअसल 1947 में देश के बँटवारे के बाद पाकिस्तान में हिन्दू और दूसरे अल्पसंख्यकों के साथ कैसा व्यवहार होगा, यह दूरदृष्टा एवं मनीषी डॉ. आंबेडकर को उसी वक्त पूर्वाभास हो गया था। बाबा साहब आंबेडकर ने अपनी किताब ‘पाकिस्तान और द पार्टीशन ऑफ़ इंडिया’ में विभाजन के कई महत्वपूर्ण अनछुए सवाल उठाए हैं। डॉ. आंबेडकर ने कहा था जब तक पाकिस्तान से एक-एक हिन्दू भारत वापस नहीं आ जाएगा तब तक विभाजन की प्रक्रिया शायद समाप्त नहीं होगी।

तो क्या आंबेडकर जानते थे कि जो गरीब पिछड़े, अनुसूचित जाति के हिन्दू पाकिस्तान में रह गए हैं वह इस्लामिक पाकिस्तान से एक दिन वापस जरूर भारत में शरण लेंगे? बाबा साहब को शायद इस बात का भान था कि जिन्ना ने भारत-पाकिस्तान का विभाजन कराते वक्त भले ही यह कहा हो पाकिस्तान इस्लामिक मुल्क न होकर धर्मनिरपेक्ष मुल्क होगा। लेकिन शायद ही उसके बातों पर किसी को भरोसा रहा हो और बाबा साहब की आशंका इस बात की तस्दीक भी करती है।

उन्होंने सभी दलितों को भी, जो पाकिस्तान में फँस गए थे, कहा था कि मुसलमानों या मुस्लिम लीग पर भरोसा करना उनके लिए घातक होगा। उनको किसी भी तरीके से भारत आ जाना चाहिए। उन्होंने तब सिर्फ पाकिस्तान ही नहीं, बल्कि निजाम के राज हैदराबाद में रह रहे दलितों को भी चेतावनी देते हुए कहा था कि उच्चवर्गीय हिंदुओं को नापसंद करने के चलते मुसलमानों के पाले में खड़े होना एक बड़ी भूल होगी। कॉन्ग्रेस पार्टी और पंडित जवाहर लाल नेहरू की मुस्लिम तुष्टिकरण नीति को लेकर उन्होंने कहा था कि वह पागलपन की हद तक मुस्लिमों के साथ हैं और अनुसूचित जातियों के लिए उनके हृदय में कोई स्थान नहीं है।

अब सोचने वाली बात है कि जिस मुस्लिम के लिए आंबेडकर ने दलितों को इतना ज्यादा चेताया था, आज भीमवादी उसी मुस्लिम के साथ गठजोड़ बनाकर घूम रहे हैं। क्या यही है उनका आंबेडकर वाला भारत? डॉ. आंबेडकर के बयानों को देखने के बाद तो यह कहना बिल्कुल भी गलत नहीं होगा कि दलित-मुस्लिम गठबंधन बनाने की कोशिश करने वाला कोई भी नेता या पार्टी आंबेडकर की विरासत के साथ धोखा कर रही है।

खुद को ‘दलितों का मसीहा’ कहने वाली मायावती और भीम आर्मी प्रमुख चंद्रशेखर उर्फ रावण भी सीएए के विरोध में और मुस्लिम के गले में हाथ डाले बैठे हैं। कारण वही वोट बैंक। अब इनके जैसे नेता भी जब डॉ. आंबेडकर का हवाला देकर इस कानून का विरोध कर रहे हैं तो उन्हें पता होना चाहिए कि यदि डॉ. आंबेडकर का वश चलता तो वह देश के बँटवारे के वक्त ही इस समस्या को खत्म कर देते और ओवैसी जैसे नेता पाकिस्तान में होते, क्योंकि डॉ. आंबेडकर के लिए वोट बैंक नहीं, बल्कि देश महत्वपूर्ण था।

बाबा साहब का नाम बेच कर अपनी राजनीतिक फसल काटने वाले दलितों के तथाकथित हितैषियों ने यदि कभी मन से बाबा साहब के विचारों को पढ़ा और समझा होता तो ‘जय भीम-जय मीम’ गठजोड़ की बात ही नहीं करते। इनकी मानें तो मुगल आततायियों ने भारत में केवल ब्राह्मण-ठाकुर और अगड़ी जाति वाले लोगों को ही चुन-चुन कर मारा। उनकी यातनाओं के शिकार केवल और केवल अगड़ी जाति की बेटियाँ और महिलाएँ हुईं। 

मुगलों ने तो जैसे अनुसूचित जातियों के लोगों को गोद में खिलाया हो, मुगलों ने सदैव ही दलित महिलाओं का सम्मान किया हो, शायद यही वजह है जो आजकल के ‘नवबौद्ध’ जिनका वास्तविक ‘बौद्ध धर्म’ के विचारों से कोई सरोकार नहीं होता वो उसी मुगल के वंशजों को अपना हितैषी और हिन्दू धर्मावलंबियों को अपना दुश्मन समझते हैं। 

आए दिन किसी भी मंच पर भारतीय संविधान लहराते हुए पहुँच जाने वाले और अपनी हर दो पंक्ति में तीन बार बाबा साहब का नाम लेने वाले दलितों के स्वयंभू नेता कभी भी मुस्लिमों के प्रति बाबा साहब के विचारों का ज़िक्र तक नहीं करते। वो विभाजन और पाकिस्तान निर्माण पर बात करना भी नहीं चाहते। सम्भवतः उन्हें इस बारे में ज्यादा ज्ञान ना हो या फिर वो इस बारे के बात करके अपनी राजनीतिक दुकान बंद नहीं करवाना चाहते।

खुद को बौद्ध धर्मावलंबी बताना और ‘नमो बुद्धाय’ का नारा देने के पीछे उनकी एक ही मनसा नजर आती है वो है हिन्दू धर्म व ब्राह्मण-क्षत्रिय एवं अगड़ी जातियों से घृणा। इस घृणा के खेल में वो इतने आगे निकल गए कि आज पूरा विश्व जिस इस्लामिक आतंकवाद से त्रस्त है, उसके हितैषी बनने में भी इन्हें कोई गुरेज नहीं। बौद्ध धर्म के मूल समानता व अहिंसावादी विचारों, जिसका जिक्र डॉ. आंबेडकर ने भी किया था, उसको ही अपना आदर्श मान कर यदि ये आगे बढ़ते तो शायद समाज मे आज इतनी वैमनस्यता नहीं होती, किन्तु अपने राजनीतिक हित को साधने हेतु ये उससे कोशों दूर निकल चुके हैं। आंबेडकर को इन्होंने ‘एक हिन्दू से बौद्ध में धर्मांतरित व्यक्ति’ के अलावा कुछ समझा ही नहीं।

मौजूदा परिपेक्ष्य में देखें तो उत्तर प्रदेश, बिहार, हरियाणा, तमिलनाडु और कई राज्यों में दलितों पर हुए अत्याचार, जिसमें आरोपित ‘मीम’ हो, उन विभत्स घटनाओं में भी आधुनिक दलित हितैषियों को साँप सूँघ जाता है, इनके मुँह से संवेदना के दो शब्द भी नहीं निकलते। वहीं आरोपित यदि अगड़ी जाति का हो तो इनके लिए सामाजिक वैमनस्यता फैलाने, दंगे भड़काने और अपनी राजनैतिक ज़मीन तैयार करने का एक सुनहरा मौका बन जाता है।

हाथरस कांड में नक्सल कनेक्शन सामने आना, राजनैतिक गिद्धों द्वारा मामले को तूल देना और नक्सली भाभी का भीम आर्मी से कनेक्शन सामने आना इस बात को दर्शाता है कि बाबा साहब के नाम पर राजनीतिक फसल काटने वाले लोग इस क्रम में इतने नीचे गिर चुके हैं कि आज के परिपेक्ष्य में डॉ. आंबेडकर के विचारों का इनसे कोई सरोकार नहीं। आज ‘जय भीम-जय मीम’ का नारा लगाने वाले शायद इस बात से वाकिफ नहीं हैं कि बाबा साहब मजहबी कट्टरता और पाकिस्तान को जन्म देने वाले ‘द्विराष्ट्रवाद’ के विचार के कितने बड़े विरोधी थे।