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मनुस्मृति के पन्ने फाड़ना एक अपराध, नहीं होगी कोई FIR रद्द: इलाहाबाद HC ने RJD प्रवक्ता प्रियंका भारती को फटकारा, गिरफ्तारी पर रोक लगाने से भी किया इनकार

राष्ट्रीय जनता दल की प्रवक्ता प्रियंका भारती की मुश्किलें बढ़ गई हैं। लाइव टीवी पर हिन्दू ग्रन्थ मनुस्मृति के पन्ने फाड़ने के मामले में उन पर दर्ज FIR रद्द नहीं होगी। ऐसा करने से इलाहाबाद हाई कोर्ट ने मना कर दिया है। हाई कोर्ट ने इसे एक संज्ञेय अपराध करार दिया है।

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने 28 फरवरी को सुनवाई में कहा, “हमें लगता है कि हैं कि दो टीवी चैनल ‘इंडिया टीवी’ और ‘टीवी 9 भारतवर्ष’ द्वारा आयोजित लाइव टीवी बहस में एक विशेष धर्म की पवित्र पुस्तक ‘मनुस्मृति’ के पन्नों को फाड़ने का कृत्य और कुछ नहीं बल्कि प्रथम दृष्टया याचिकाकर्ता के दुर्भावनापूर्ण भावना का प्रदर्शन था और इसे बिना किसी वैध कारण के किया गया।”

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने प्रियंका भारती को फटकार लगाते हुए कहा, “हम इस तथ्य को नजरअंदाज नहीं कर सकते कि याचिकाकर्ता एक पढ़ी-लिखी और उच्च योग्यता वाली महिला हैं और वह बहस में एक राजनीतिक दल के प्रवक्ता के रूप में भाग ले रहीं थी। ऐसे में यह बात नहीं मानी जा सकती कि यह कार्य अनजाने में किया गया।”

मनुस्मृति के पन्ने फाड़ने के को इसके बाद हाई कोर्ट ने एक अपराध करार दिया। हाई कोर्ट ने कहा, “वर्तमान मामले में एक राजनीतिक दल के प्रवक्ता द्वारा लाइव टीवी बहस में एक विशेष धर्म की पवित्र पुस्तक ‘मनुस्मृति’ के कुछ पृष्ठ फाड़ने का कृत्य, प्रथम दृष्टया यह दर्शाता है कि एक संज्ञेय अपराध किया गया है।”

प्रियंका भारती की याचिका इसके बाद इलाहाबाद हाई कोर्ट ने रद्द कर दी और कोई भी राहत देने से मना कर दिया। यह याचिका प्रियंका भारती ने अलीगढ़ में उनके खिलाफ दर्ज एक मुकदमे के बाद के बाद दायर की थी। उन्होंने माँग की थी कि उनके खिलाफ FIR को रद्द कर दिया जाए।

प्रियंका भारती ने मनुस्मृति पर चालू बवाल के बीच दो टीवी चैनल पर उसके कुछ पन्ने फाड़ दिए थे। इसके बाद उनके खिलाफ कीई जगह विरोध प्रदर्शन हुए थे। अलीगढ़ में उनके खिलाफ FIR राष्ट्रीय स्वर्ण परिषद के संगठन मंत्री भरत तिवारी की तरफ से 28 दिसंबर, 2024 को दर्ज करवाई गई थी।

भरत तिवारी ने कहा था कि प्रियंका भारती की करतूत देश में सामजिक वैमन्यस्यता फैलाने वाली है। उन्होंने इंडिया TV के मालिक रजत शर्मा और TV9 चैनल के मालिक वरुण दास पर भी TRP की नीयत से प्रियंका भारती की हरकतों को बढ़ावा दिए जाने का आरोप लगाया था। उन्होंने कहा था कि इस कृत्य के चलते उनकी धार्मिक भावनाएँ आहत हुई हैं।

14 साल की दलित लड़की को अगवा किया, 2 महीने तक रेप करते रहे सलमान-जुबैर सहित 4 मुस्लिम युवक: रिपोर्ट में बताया- जबरन गोमांस खिलाया, तेजाब डाल ॐ का टैटू जलाया

उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद में 4 मुस्लिम आरोपितों ने एक दलित किशोरी को अगवा कर लिया और 2 महीने तक बंधक बनाकर उसके साथ बार-बार गैंगरेप किया। इस दौरान उसे जबरन गोमांस भी खिलाया। इतना ही नहीं, किशोरी के हाथ पर बने ॐ टैटू को मिटाने के तेजाब डालकर हाथ को जला दिया। किशोरी के परिवार की शिकायत पर पुलिस ने आरोपित सलमान को गिरफ्तार कर लिया है।

मामला मुरादाबाद के भगतपुर थाना क्षेत्र के दौलपुरी बमनिया गाँव का है। वहाँ के एक दलित परिवार की 14 साल की लड़की 2 जनवरी 2025 को गायब हो गई। इसके बाद लड़की के परिजनों ने उसे खूब खोजा, लेकिन उसका कहीं अता-पता नहीं चला। पुलिस ने उसकी गुमशुदगी की शिकायत भी दर्ज कराई गई। फिर भी पता नहीं चला। इसके बाद वह 2 मार्च को अचानक घर पहुँच गई।

उस समय उसकी हालत बेहद खराब थी। वह ढंग से चलने-फिरने में सक्षम नहीं थी। उसने दरिंदगी की जो दास्तां बताई, उसे सुनकर परिवार के लोगों के पैरों तले की जमीन खिसक गई। इस दरिंदगी को अंजाम देने वाला कोई और नहीं, बल्कि के गाँव के ही चार युवक शामिल थे। इनके नाम थे सलमान, राशिद, आरिफ और जुबैर। इसके बाद किशोरी के परिजनों ने थाने में जाकर शिकायत दर्ज की।

भगतपुर पुलिस थाने के प्रभारी संजय पांचाल ने बताया कि इस घटना को लेकर किशोरी के परिवार ने थाने में शिकायत दी थी। शिकायत में कहा गया है कि 2 जनवरी 2025 को 14 साल की दलित किशोरी दर्जी के पास कपड़े सिलाने जा रही थी। उसी दौरान सलमान, जुबैर, राशिद और आरिफ ने एक कार में उसका अपहरण कर लिया। रास्ते में उसे नशीला पदार्थ देकर बेहोश कर दिया।

जब उसकी आँख खुली तो किशोरी एक कमरे में पाई। उस समय उसके शरीर पर कोई कपड़ा नहीं था। वहाँ उसे बंधक बनाकर चारों ने कई बार उसका सामूहिक दुष्कर्म किया। इस दौरान आरोपितों ने उसे भूखा रखा। वह जब भी कुछ खाने को माँगती तो उसे गोमांस देते थे और कहते थे कि खाना है तो इसे ही खाओ। इसी दौरान उसके हाथ पर बने ओम के चिह्न को मिटाने के लिए तेजाब से हाथ जला डाला।

इस दौरान आरोपितों ने किशोरी को धमकी दी कि अगर उसने इस घटना के बारे में किसी को बताया कि तो वे उसे और उसके परिवार को जान से मार देंगे। कुछ समय के बाद आरोपित वहाँ से लेकर भोजपुर इलाके में लाकर दूसरे कमरे में बंद कर दिया। यहाँ पर मौका देखकर पीड़िता किसी तरह भाग निकली और अपने घर पहुँच गई। लगभग 2 महीने तक यह सब होता रहा।

घर पहुँच कर किशोरी ने इस घटना के बारे में अपने परिजनों को बताया। इसके बाद परिजनों ने भगतपुर थाने में आरोपितों के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई। पुलिस ने आरोपितों के खिलाफ पॉक्सो और एससी/एसटी एक्‍ट में केस दर्ज कर लिया है। वहीं, एक आरोपित सलमान को भी गिरफ्तार कर लिया है। वहीं, बाकी तीन आरोपितों की गिरफ्तारी के लिए पुलिस ने लगातार दबिश दे रही है।

इस घटना को लेकर गाँव में माहौल बिगड़ गया है। इस घटना के विरोध में हिंदू संगठनों ने जमकर प्रदर्शन किया और बाकी आरोपितों की जल्दी गिरफ्तारी की माँग की है। मुरादाबाद के एसपी ग्रामीण कुंवर आकाश सिंह ने बताया है कि जल्दी ही बाकी आरोपितों को भी गिरफ्तार कर लिया जाएगा। इस घटना को लेकर मंत्री जयवीर सिंह ने कहा कि आरोपितों पर कड़ी कार्रवाई की जाएगी।

मौलाना को नहीं कबूल UCC, क्योंकि मामू की बेटी को नहीं बना सकते बेगम: कहा- इस्लाम हमारी रगों में घुसा है, इसे हम नहीं छोड़ सकते… जानिए उत्तराखंड में किन रिश्तों में अब निकाह नहीं संभव

उत्तराखंड के मौलाना समान नागरिक संहिता (UCC) कानून से नाखुश हैं। सगे रिश्तों में निकाह करने पर UCC में लगाई गई पाबंदी को लेकर मौलाना गुस्सा हैं। मौलानाओं का कहना है कि यह मुस्लिमों की हैसियत कम करने का प्रयास है। उन्होंने दावा किया है कि UCC उन पर लादा जा रहा है।

पत्रकार अदिति त्यागी से बातचीत करते हुए मौलानाओं ने यह बातें कही हैं। इसका वीडियो अब वायरल है। इस वीडियो में मौलाना कहता है, “UCC लागू करने से पहले उलेमा से राय ली गई थी, अलग जगह-जगह पर मीटिंग हुई थी। हमने इन बैठक में साफ़ कर दिया था कि इस्लाम हमारी रगों में घुसा है और इसे हम नहीं छोड़ सकते।”

आगे मौलाना ने कहा, “उसमे एक कानून बनाया है कि मामू की लड़की और फूफी की लड़की से निकाह नहीं कर सकते लेकिन हमारी शरीयत में इसकी इजाजत है। किसी ने अपनी बीवी को तलाक दिया है तो उसे (महिला) 3 महीने इद्दत करनी है, इसमें यह खत्म कर दिया गया है… यह शरीयत के भीतर दखल है। हम ये नहीं बर्दाश्त कर सकते।”

मौलाना ने कहा कि अगर राय ली गई तो मानी क्यों नहीं गई। मौलाना ने दावा किया UCC कानून उन पर लादा गया है और यही करना था तो राय लिए जाने की कोई आवश्यकता नहीं थी। मौलाना ने दावा किया कि इस्लाम पूरा मजहब है और इसमें कोई शक नहीं बचा है।

गौरलतब है उत्तराखंड में पास किए गए UCC कानून में शादी, तलाक और विरासत को लेकर कई नियम बनाए गए हैं। इनमें विशेष तौर पर शादी को लेकर स्पष्ट नियम हैं कि किस रिश्ते में शादी हो सकती है और किसके अंतर्गत शादी मानी नहीं जाएगी।

किन रिश्तों में नहीं हो सकता निकाह

UCC के अंतर्गत किन रिश्तों में निकाह को कानूनी रूप से निषिद्ध किया गया है, इसे आप नीचे दी गई सूची से समझ सकते हैं। ये सूची बताती है कि UCC लागू होने के बाद पुरुष किन महिलाओं और महिलाएँ किन पुरुषों से विवाह नहीं कर सकेंगी।

कोई भी पुरुष इन महिलाओं से विवाह नहीं कर सकेगाकोई भी महिला इन पुरुषों से विवाह नहीं कर सकेगी
बहनभाई
भांजीभांजा
भतीजीभतीजा
मांचाचा/ताऊ
मामीससुर
चाचीसाला/साडू
चचेरी बहनसौतेला भाई
फुफेरी बहनसौतेला भाई
मौसेरी बहनमौसेरा भाई
पत्नी की बहनपत्नी का भाई
सौतेली मांसौतेला पिता
सौतेली बहनसौतेला भाई
नानीदादा
सौतेली नानीसौतेला दादा
पत्नीपतिव्रता
सौतेली पत्नीसौतेला पतिव्रता
माता की बहनपत्नी का पिता (ससुर)
माता की सौतेली बहनसौतेला ससुर
दादीनाना
सौतेली दादीसौतेला नाना
पिता की सौतेली नानीसौतेला पतिव्रता (माता का सौतेला पतिव्रता)
नाती की नानीमाता का दादा
पिता की सौतेली पत्नीमाता का सौतेला दादा
पत्नी की सौतेली बहनसौतेला बेटा
पत्नी की पत्नीपोता
बहू (विधवा)बेटा का ससुर
नातिननाती
पोतीबेटी का ससुर
पोते की सौतेली बहूपोते का ससुर
बेटे की सासबेटी का ससुर
पत्नी की विधवासास का ससुर
बेटे की विधवाबेटी का ससुर
पत्नी की विधवानाती का ससुर
नाती की विधवानाना का नाना

इन सभी रिश्तों में किए गए विवाह को UCC के अंतर्गत वैध रिश्ते नहीं माना जाएगा। गौरतलब है कि हिन्दू विवाह अधिनियम के तहत यह बंदिशें पहले से देश की बहुसंख्यक आबादी पर लागू थीं। अब यह उत्तराखंड के भीतर पूरी जनता पर और हर समुदाय पर लागू होंगी।

13 जुलाई को चाहिए सरकारी छुट्टी, क्योंकि ‘काफिर राजा’ के खिलाफ हुआ था ‘इस्लामी जिहाद’: जिस आग से मोदी सरकार ने कश्मीर को निकाला, उसे फिर से भड़काना चाहते हैं कट्टरपंथी

जम्मू कश्मीर में महाराजा हरि सिंह के विरुद्ध इस्लामी जिहाद करने वालों को शहीद बताने का दौर फिर से चालू हो रहा है। हरि सिंह को काफिर मान कर जिहाद करते हुए मारे जाने वालों के नाम पर छुट्टी घोषित किए जाने की माँग चल रही है। यह छुट्टी भारत सरकार ने 2019 में खत्म कर दी थी। भाजपा ने इन इस्लामी जिहादियों को शहीद बताए जाने का विरोध किया है।

यह पूरा मामला जम्मू-कश्मीर विधानसभा के बजट सत्र में चालू हुआ। बुधवार (5 मार्च, 2025) को जम्मू कश्मीर विधानसभा में PDP के विधायक वहीद-उर-रहमान पारा ने माँग की कि 13 जुलाई का अवकाश दोबारा चालू किया जाए। उन्होंने इसे ‘शहीदी दिवस’ का दर्जा दिए जाने की माँग की।

भाजपा ने किया वाकआउट

विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष और भाजपा विधायक सुनील शर्मा ने इसका जोरदार प्रतिरोध किया। उन्होंने कहा, “वे शहीद नहीं बल्कि देशद्रोही थे।” सुनील शर्मा ने स्पष्ट कर दिया कि महाराजा हरि सिंह के विरुद्ध विद्रोह करने वाले को क्रांतिकारी नहीं बल्कि कट्टरपंथियों की भीड़ थी।

सुनील शर्मा के नेतृत्व में भाजपा ने विधानसभा से वाकआउट कर दिया। सुनील शर्मा ने बाहर कहा कि शहीदों के नाम पर गद्दारों को सम्मान नहीं दिया जा सकता। सुनील शर्मा ने कहा, “मैं आज आपको बताना चाहता हूँ कि 13 जुलाई, 1932 को मारे गए लोगों ने पहले एक हिंदू इलाके में आग लगाई और फिर महाराजा के शासन के खिलाफ बावला शुरू किया। इन लोगों को कॉन्ग्रेस पार्टी ने शहीद बना दिया था, लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के शासन में इन्हें शहीद नहीं माना जा सकता।”

किश्तवाड़ से भाजपा विधायक शगुन परिहार ने भी इस मामले में नेशनल कॉन्फ्रेंस और PDP पर हमला बोला। उन्होंने कहा, “13 जुलाई के नाम पर छुट्टी माँग रहे हैं, वह लोग गद्दार थे। यह लोग कश्मीरी पंडितों की बात नहीं करते, 90 के दशक के विषय में बात नहीं करते… महाराजा का राज्य यह लोग चाहते हैं लेकिन उनका सम्मान नहीं करते। यह लोग पाकिस्तान का सम्मान करते हैं, जिसकी वजह से हमारे लाखों लोग मारे गए।”

क्यों हो रहा 13 जुलाई पर बवाल?

इस पूरे बवाल की जड़ 9 दशक पहले की एक तारीख 13 जुलाई, 1931 से जुड़ी है। दरअसल, 13 जुलाई, 1931 को श्रीनगर की सेंट्रल जेल के बार महाराजा हरि सिंह की सेना ने 21 इस्लामी दंगाइयों को गोली मार दी थी। यह इस्लामी दंगाई जेल पर हमला करने आए थे और महाराजा हरि सिंह का तख्तापलट करना चाहते थे।

1948 में जब जम्मू कश्मीर का विलय भारत में हो गया और नेशनल कॉन्फ्रेंस राज्य की सत्ता में आई तो इन्हें शहीद का दर्जा दे दिया गया। इस दिन राज्य में छुट्टी भी घोषित की गई। इनको ‘लोकतंत्र’ के लिए आंदोलन करने वाला क्रांतिकारी बताया गया। इनके लिए एक सूफी संत की मजार के पास एक स्मारक भी बनाया गया था।

यह छुट्टी दशकों तक इसी तरह चलती रही थी। हालाँकि, 2019 में मोदी सरकार ने अनुच्छेद 370 हटाने के बाद यह छुट्टी खत्म कर दी थी। हालाँकि, अब जम्मू कश्मीर में नेशनल कॉन्फ्रेंस की सरकार में यह छुट्टी दोबारा चालू करने की माँग की गई है। इस पर भाजपा को सख्त ऐतराज है।

क्या है 13 जुलाई के शहीदों की सच्चाई

कश्मीर में कट्टर मानसिकता वाले लगातार 13 जुलाई की घटना को महाराजा हरि सिंह के खिलाफ क्रान्ति और जनआंदोलन करार देते हैं। इसे ‘कश्मीर शहीद दिवस’ बताते हैं। कहा जाता है कि यह महाराजा के कथित क्रूर शासन के खिलाफ एक विद्रोह था। जबकि असल में यह एक ‘काफिर’ हिन्दू शासक के खिलाफ लड़ाई थी।

इस सम्बन्ध में कश्मीरी पंडित एक्टिविस्ट सुशील पंडित ने एक लेख में काफी अच्छे से समझाया था। वो मानते हैं कि आधुनिक कश्मीर का पहला नरसंहार तभी हुआ था, वो भी पूरी साजिश के साथ। सैकड़ों लोगों की हत्या कर दी गई, ज़िंदा जला दिया गया, विकलांग बना दिया गया और नदी में फेंक दिया गया। महिलाओं का यौन शोषण और बलात्कार हुआ। कइयों के घर लूट लिए गए तो कइयों को इस्लाम अपनाने के लिए मजबूर किया गया।

उन्होंने बताया है कि कैसे जब पुलिस ने दंगाइयों पर कार्रवाई की तो उनमें से कुछ की मौत हो गई, जिसके बाद उनके गिरोह द्वारा उन्हें ‘शहीद’ बता दिया गया और स्वतंत्र भारत में जम्मू कश्मीर की नई सरकार ने उन आतंकियों के कृत्यों को ‘पवित्र’ बनाने के लिए नायकों की तरह उनका सम्मान करते हुए 13 जुलाई को उन्हें याद किया जाने लगा। आइए, अब जानते हैं कि असल में उस दिन हुआ क्या था। उस समय जम्मू कश्मीर के स्वायत्त राजा थे हरि सिंह।

तब जम्मू कश्मीर के साथ-साथ लद्दाख, गिलगिट-बाल्टिस्तान, मुजफ्फराबाद-मीरपुर और अक्साई चीन के अलावा शक्सगाम घाटी के इलाके भी उनके क्षेत्र का हिस्सा हुआ करते थे। लेकिन, अंग्रेज उनसे कुछ इलाके छीनना चाहते थे। महाराजा हरि सिंह उन दुर्लभ राजाओं में से एक थे, जिनका शासन मुस्लिम बहुल इलाके में था। इसीलिए, अंग्रेजों ने एक साजिश के तहत पेशवर के एक अहमदी अब्दुल क़दीर को खानसामा के वेश में श्रीनगर में स्थापित कर दिया।

इसके बाद ‘अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (AMU)’ के शेख मोहम्मद अब्दुल्लाह को भी लाया गया। वो एक राजनीतिक महत्वाकांक्षा वाला व्यक्ति हुआ करता था, जिसकी पुश्तें आज भी जम्मू कश्मीर को अपनी बपौती समझती हैं। ख़ानक़ाह मोहल्ला स्थित ‘शाह-ए-हमदान’ में एक सार्वजनिक सभा हुई, जहाँ अब्दुल क़दीर ने एक भड़काऊ भाषण दिया। महाराजा के विरुद्ध जंग के लिए कुरान का हवाला दिया गया। उसने भड़काया कि एक ‘काफिर’ कैसे मुस्लिमों के ऊपर राज कर सकता है, इसकी इस्लाम में सख्त मनाही है।

कानून के अनुसार जिस गोहत्या पर प्रतिबंध था, उसके लिए उसने मुस्लिमों को खुल कर उकसाया। उसे जब राजद्रोह के आरोप में गिरफ्तार किया गया तो दंगे भड़क गए। कानूनी प्रक्रिया में बाधा डालने की कोशिशें हुईं। मज़बूरी में जेल परिसर में ही सुनवाई होती थी। 13 जुलाई को भी एक ऐसी ही सुनवाई थी। लेकिन, भीड़ ने वहाँ हमला कर दिया और जज के चैंबर में घुसने की कोशिश करने लगे। भीड़ ने पुलिस पर हमला बोल दिया और आगजनी शुरू कर दी।

जैसा कि आज भी होता है, जम कर मुस्लिम भीड़ ने पत्थरबाजी भी शुरू कर दी। जेल के कैदियों ने भी वहाँ से भागने का प्रयास शुरू कर दिया। पुलिस बल ने सारे पैंतरे आजमा लिए, लेकिन मुस्लिम भीड़ तितर-बितर नहीं हुई। कुछ कैदियों को भगा भी दिया गया। इसके बाद स्थानीय DM ने गोली चलाने के आदेश दिए। हरि पर्वत किले की तरफ भी भीड़ चल पड़ी थी। लाठीचार्ज का कोई असर नहीं हो रहा था। महराजगंज तब व्यापारियों का अड्डा हुआ करता था, जहाँ जम कर लूटपाट मचाई गई।

सुशील पंडित लिखते हैं कि इसके बाद भोरी कदल से लेकर आईकदल तक एक लंबी दूरी में हिन्दुओं की दुकानों को तहस-नहस कर दिया गया और चीजें लूट ली गईं। सफाकदल, गंजी, खुद और नवाकदल जैसे इलाकों में भी जम कर लूटपाट हुई। बाजार में बही-खातों को जला दिया गया और हिन्दू दुकानदारों में भगदड़ मच गई। लाखों के सामान लूट लिए गए, ये सड़कों पर तहस-नहस कर के फेंक दिए गए। हालाँकि, इस दौरान किसी मुस्लिम के दुकान में घुस कर लूटपाट की कोई खबर नहीं आई।

श्रीनगर के विचारनाग में मुस्लिम भीड़ अलग से जुटी हुई थी। वहाँ समृद्ध हिन्दुओं के साथ अत्याचार किया गया और उनकी महिलाओं का यौन शोषण हुआ। जब तक सेना आई, तब तक मुस्लिम भीड़ ने हिन्दुओं का बड़ा नुकसान कर दिया था। इसके बाद ‘बुद्धिजीवी’ गिरोह काम पर लगा और उसने इसे ‘सामंती सत्ता के विरुद्ध लोकतांत्रिक विद्रोह’ नाम दे दिया। याद कीजिए, मोपला मुस्लिमों द्वारा केरल में किए गए बड़े स्तर के नरसंहार को भी ‘जमींदारों के खिलाफ किसानों का विद्रोह’ कह दिया गया था।

जबकि, असल में कश्मीर में 13 जुलाई, 1931 को जो भी हुआ, वो एक हिन्दू राजा के विरुद्ध इस्लामी जंग था। शेख मोहम्मद अब्दुल्लाह का भी इन दंगों को भड़काने में बड़ा हाथ था। उसे गिरफ्तार कर जेल भी भेजा गया। हालाँकि, अगले ही साल महाराजा ने उसे माफ़ी दे दी और उसने ‘ऑल जम्मू एंड कश्मीर मुस्लिम कॉन्फ्रेंस’ का गठन कर के लोगों को भड़काना शुरू कर दिया। मीरपुर में हिन्दुओं ने भाग कर जान बचाने की कोशिश की। बाद में उनमें से सैकड़ों को शरणार्थी बन कर रहना पड़ा।

हिन्दुओं के गाँव जलाए, मंदिर तोड़े

उस समय इस घटना को देखने वाले बुजुर्गों ने बताया था कि कैसे कइयों को बेरहमी से मार डाला गया और इस्लाम अपनाने को भी कइयों को मजबूर किया गया। मंदिरों और गुरुद्वारों पर हमले की कई घटनाएँ सामने आईं। गुरुग्रंथ साहिब सहित कई पवित्र सनातनी पुस्तकों को जला दिया गया और देवी-देवताओं की प्रतिमाओं को खंडित किया गया। इसे ’88 ना शौरांश’ कहते हैं, अर्थात 88 का नरसंहार। विक्रम संवत के हिसाब से तब 1988 चल रहा था।

उस घटना के बाद के सैकड़ों परिवार और उनकी पुश्तें दशकों तक पुनर्वास के लिए संघर्ष करती रहीं। खुद अंग्रेजी रिकार्ड्स की मानें तो 31 मंदिरों-गुरुद्वारों को पूरी तरह तबाह कर दिया गया। 600 के आसपास जबरन इस्लामी धर्मांतरण के मामले सामने आए। सुक्खचैनपुर और संवल (मीरपुर) के हिन्दुओं को सबसे ज्यादा नुकसान हुआ। अंग्रेज लिखते हैं कि जहाँ भी दंगाई पहुँचे, स्थानीय मुस्लिम जनसंख्या ने उनका साथ दिया।

कुछ हिन्दुओं के गाँवों को तो एकदम से वीरान ही बना दिया गया, ऐसी लूटपाट और तबाही मचाई गई। इसके बाद 18 जनवरी, 1932 को भी हिन्दुओं के 50 गाँवों पर हमला हुआ और 300 घरों को लूटा गया। इनमें से 40 को आग के हवाले कर दिया गया। इतना ही नहीं, 40 हिन्दुओं को जबरन मुस्लिम बनाया गया। थन्ना गाँव में 20 जनवरी, 1932 को फिर से 36 घरों में लूटपाट हुई और 8 को फूँक दिया गया। सोहाना गाँव में 84 घरों में लूटपाट हुई और एक अन्य गाँव में 28 जनवरी को लूटपाट हुई।

जिस कश्मीर को महाराजा रणजीत सिंह ने अफगानों के चंगुल से छुड़ाया था और फिर डोगरा राजाओं ने हिन्दू शासन की स्थापना की, वहाँ के गैर-मुस्लिमों को सदियों के अत्याचार से राहत मिली। लेकिन, इस घटना के बाद से पुनः कश्मीर में पंडितों का नरसंहार शुरू हो गया। वहाँ भारत का संविधान स्वतंत्रता के बाद भी लागू नहीं हो पाया और मुट्ठी भर अलगाववादियों के अलावा अब्दुल्लाह-मुफ़्ती मिल कर यहाँ इस्लामी शासन चलाते रहे।

मोदी सरकार में रुका गद्दारों का सम्मान

जुलाई 2020 में ऐसा पहली बार हुआ, जब कश्मीर में दंगाइयों को श्रद्धांजलि नहीं दी गई। मोदी सरकार के कारण ये संभव हो पाया। आधुनिक कश्मीर में हिन्दुओं को संगठित तरीके से खदेड़ना के कार्य तभी शुरू हुआ था। अंग्रेजों के षड्यंत्र और इस्लामी भीड़ की हिंसा ने एक हिन्दू सत्ता को उखाड़ने के लिए हिन्दुओं का नरसंहार किया और बाद में ‘बुद्धिजीवियों’ ने इसे एक अलग रंग दिया। महाराजा हरि सिंह ने इन घटनाओं की जाँच के लिए हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश बरजोर दलाल की अध्यक्षता वाली एक समिति को दी।

महाराजा हरि सिंह ने लंदन के गोलमेज सम्मेलन में भारतीय एकता की बात की थी, उसी के बाद अंग्रेज सेनाधिकारी मेजर बोट ने अब्दुल कदीर नाम के पठान को वहाँ लाकर बसाया। ये सब एक साजिश का हिस्सा था। ब्रिटिश ने सत्ता सँभालने के बाद अब्दुल कदीर को 1.5 साल में ही रिहा कर दिया, जबकि उसे 5 साल की जेल हुई थी। कादियाँ नगर के अहमदिया समुदाय ने इस पूरे मामले में अंग्रेजो की खासी मदद की। इस रिपोर्ट में पता चला कि अंग्रेज अधिकारी वेकफील्ड जानबूझ कर उस दिन जेल के पास स्थिति को काबू करने नहीं गया, जबकि सुरक्षा का नियंत्रण उसके पास ही था।

4 जुलाई, 1931 को कुरान की बेअदबी की खबर सामने आई, जबकि ऐसा कुछ भी नहीं हुआ था। लेकिन, वेकफील्ड ने जाँच के बाद कुरान के तौहीन की बात प्रचारित की और मुस्लिमों को भड़काया। श्रीनगर में महाराजा हरि सिंह के खिलाफ भड़काऊ सामग्रियाँ भेजी गईं। वेकफील्ड की जगह प्रधानमंत्री बनाए गए हरि कृष्ण कौल ने मुस्लिम दंगाइयों से राज्य का समझौता कराया, लेकिन दंगे नहीं रुके। देश के कई हिस्सों में इस्लामी दंगों का पैटर्न यही रहा है, आज भी यही है।

पूरे बदन में लपेटकर सोना लाती थी कर्नाटक के DGP की हिरोइन बिटिया, साल भर में 30 बार दुबई गई: एक राजनेता का भी निकला कनेक्शन, ब्लैकमेलिंग का भी दावा

सोने की तस्करी में पकड़ाई तमिल एवं कन्नड़ फिल्मों की मशहूर अभिनेत्री रान्या राव ने इस काम के लिए एक खास तरह का जैकेट बनवा रखा था। इसे वह अपने शरीर, कमर और जाँघ पर बाँधती थी और उसमें सोने की बिस्किट भरकर लाती थी। रान्या को राजस्व खुफिया निदेशालय (DRI) के अधिकारियों ने 14.80 किलोग्राम सोने के साथ रान्या को बेंलगुरु एयरपोर्ट से 3 मार्च को गिरफ्तार किया था।

रान्या राव कर्नाटक के वरिष्ठ IPS अधिकारी के. रामचंद्र राव की सौतेली बेटी हैं। रामचंद्र राव इस समय कर्नाटक राज्य पुलिस आवास निगम में पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) के पद पर तैनात हैं। इस पद का प्रभार उन्हें अक्टूबर 2023 में मिला था। रान्या राव को आपराधिक अपराध न्यायालय ने 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में भेज दिया है।

एक नेता और कुछ अधिकारियों पर नजर

शुरुआती जाँच में इस पूरे तस्करी रैकेट में एक राजनेता की मिलीभगत भी सामने आई है। हालाँकि, जाँच एजेंसियों ने उसका नाम उजागर नहीं किया है। सूत्रों के हवाले से TOI ने बताया है कि बेंगलुरु के केंद्रीय व्यापारिक जिले में एक आभूषण बुटीक द्वारा तस्करी के सोने खरीदे गए थे। ये सोना एक प्रमुख राजनेता की ओर से खरीदा गया था। अधिकारी अब इसके लिए भुगतान के तरीकों का पता लगा रहे हैं।

बता दें कि रान्या राव की गिरफ्तारी के बाद DRI ने अभिनेत्री के बेंगलुरु के लेवली रोड अपार्टमेंट के उनके फ्लैट में भी छापेमारी की थी। फ्लैट में 2.10 करोड़ रुपए के डिजाइनर ज्वैलरी और 2.70 करोड़ रुपए नकद मिले हैं। इस मामले में DRI ड्रग तस्कर, नेता, व्यवसायी, अधिकारी, पुलिस आदि के नेटवर्क की जाँच कर रही है।

रान्या को बचाने की कोशिश करने वाला कॉन्स्टेबल गिरफ्तार

शादी के बाद रान्या अपने पति जतिन हुक्केरी के साथ लगातार अंतरराष्ट्रीय यात्राएँ कर रही थीं। वे दोनों वहाँ भी जा रहे थे, जहाँ उनका कोई व्यवसाय या पारिवारिक संबंध नहीं था। इतना ही नहीं, वह पिछले 15 दिनों में दुबई की चार बार यात्रा कर चुकी थीं। पिछले एक साल में वह 30 बार दुबई देशों की यात्रा कर चुकी हैं। इसको लेकर अधिकारियों को शंका हुई और वे रान्या पर निगाह रखने लगे।

इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर चुकीं रान्या जब 3 मार्च को एमिरेट्स की फ्लाइट्स से उतरीं तो उन्होंने स्थानीय पुलिसकर्मियों को फोन करके घर तक एस्कॉर्ट देने के लिए कहा। पिता के DGP होने के कारण रान्या एयरपोर्ट पर हमेशा एस्कॉर्ट की माँग करती थी। इससे वह जाँच से बच जाती थी। हालाँकि, 3 मार्च को DRI ने उनकी तलाश ली तो लगभग 17.30 करोड़ रुपए की 14.80 किलोग्राम सोना बरामद हुआ।

बेंगलुरु एयरपोर्ट पर तैनात कान्स्टेबल बसवराज ने रान्या की मदद की थी। जब अधिकारियों ने रान्या राव की जाँच करनी चाही तो बसवराज ने उन्हें रोक दिया था और कहा था, “तुम्हें पता है ये कौन हैं? ये डीजीपी रामचंद्र राव की बेटी हैं।” इसके बावजूद DRI के अधिकारियों ने रान्या राव की तलाश ली और इस मामले का खुलासा किया। बसवराज को हिरासत में लेकर पूछताछ की जा रही है।

हर ट्रिप के 12-13 लाख रुपए लेती थी रान्या, बोली- ब्लैकमेल किया गया

एक अधिकारी ने कहा, “अपनी पिछली चार यात्राओं में उसने इसी प्रकार का पैटर्न अपनाया तथा ऐसे कपड़े पहने, जिससे वह तस्करी किए गए सोने की बेल्ट को छुपा सके।” न्यूज18 ने सूत्रों के हवाले से अपनी रिपोर्ट में बताया है कि रान्या राव ने पूछताछ में अधिकारियों से कहा कि सोने की तस्करी के लिए उसे ब्लैकमेल किया गया था। हालाँकि, यह दावा कितना सही है, यह जाँच के बाद ही पता चलेगा।

सूत्रों का कहना है कि हर बार दुबई की यात्रा की में वह कई किलोग्राम सोना लेकर आई हैं। कहा जा रहा है कि रान्या राव तस्करी किए गए सोने के लिए 1 लाख रुपए प्रति किलोग्राम के हिसाब से पैसे लिए थे। इसका मतलब है कि रान्या हर ट्रिप में उनकी 12 से 13 लाख रुपए की कमाई हुई। बेटी की गिरफ्तारी पर IPS रामचंद्र राव को सदमा लगा है।

रामचंद्र राव ने कहा, “चार महीने पहले ही उसकी (33 साल की रान्या राव की) शादी हुई है। तब से अब तक वह हमसे मिलने नहीं आई है। हमें उसके या उसके पति (आर्टिटेक्ट जतिन हुक्केरी) के व्यवसाय के बारे में कोई जानकारी नहीं है।” उन्होंने कहा कि IPS के रूप में उनके करियर पर कोई काला धब्बा नहीं है और कानून अपना काम करेगा।

IPS रामचंद्र राव का विवाद में आया था नाम

हालाँकि, रामचंद्र राव पर भी जब्त की हुई रकम को कम दिखाने का आरोप लगा था। The Week की रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2014 में रामचंद्र राव जब दक्षिणी रेंज के IG थे। उस समय मैसूर के येलवाल के पास कालीकट जाने वाली एक निजी बस को रोककर तलाशी ली गई थी। मैसूर दक्षिण पुलिस ने केरल के चार व्यापारियों द्वारा ले जाई जा रही राशि को जब्त की थी।

पुलिस ने जब्त की हुई रकम 20 लाख रुपए बताई थी। हालाँकि, केरल के इन व्यापारियों ने आरोप लगाया था कि उनकी कुल 2.27 करोड़ रुपए जब्त की थी। इतना ही नहीं, पीड़ित व्यापारियों ने पुलिस पर आरोप लगाया था कि एक दूसरे व्यापारी के साथ मिलकर उन्हें लूटा गया है। बस पर छापेमारी करने वाले अधिकारियों में से एक रामचंद्र राव का गनमैन प्रकाश भी था।

हालाँकि, रामचंद्र राव ने इन व्यापारियों द्वारा लगाए गए आरोपों से इनकार किया था। हालाँकि, भारी विरोध को देखते हुए उनका तुरंत तबादला कर दिया गया था। बाद में राज्य की CID ​​ने कहा था कि रामचंद्र राव और एक पुलिस उपाधीक्षक की ओर से बहुत बड़ी चूक हुई थी। उनके संज्ञान में लाया गया था कि IG से जुड़े एक गनमैन सहित कुछ पुलिसकर्मी डकैती में शामिल थे।

जिस गाँव के लिए बेटी हैं माँ गंगा, अब वहीं पहुँचे PM मोदी: उत्तराखंड का 3 साल में 13वाँ दौरा, पूजा-अर्चना के बाद बोले- राज्य के लिए जो संकल्प लिए, वह पूरे हो रहे

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी उत्तराखंड के दौरे पर गए हैं। पीएम मोदी का यह दौरा माँ गंगा की पूजा-अर्चना को समर्पित है। पीएम मोदी उत्तराखंड के उस गाँव में पहुँचे हैं, जहाँ माँ गंगा को बेटी की तरह पूजा जाता है। पीएम मोदी का उत्तराखंड का यह तीन साल के भीतर 13वां दौरा है।

गुरुवार (6 मार्च, 2025) को पीएम मोदी उत्तराखंड के उत्तरकाशी पहुँचे हैं। उत्तरकाशी में पीएम मोदी का यह दौरा मुखवा गाँव में हो रहा है। मुखवा हर्षिल के पास मौजूद एक गाँव है। यहाँ पीएम मोदी ने माँ गंगा के मंदिर में पूजा-अर्चना भी की है।

मुखवा में माँ गंगा का शीतकालीन निवास है। गंगोत्री धाम से माँ गंगा को सर्दियों के मौसम में मुखवा गाँव ले आया जाता है। मुखवा में उनके मंदिर इसके बाद आरती और पूजा रोज होती है। म्ख्वा में माँ गंगा को ग्रामीण बेटी की तरह मानते हैं और गंगोत्री के कपाट खुलने पर उन्हें विदा करते हैं।

गंगोत्री धाम में पूजा करने वाले पुजारी भी इसी मुखवा गाँव के रहने वाले होते हैं। कहा जाता है कि आदि शंकराचार्य ने मुखवा गाँव में माँ गंगा की पीठ स्थापित की थी। यहाँ के मंदिर में माँ गंगा की पुरानी मूर्ति स्थापित है। इसकी सालों भर पूजा चलती है।

पीएम मोदी ने यहीं पर आरती में हिस्सा लिया है। यहाँ उन्हें मंदिर की तरफ गंगाजल भी भेंट किया गया। यह क्षेत्र तिब्बत सीमा से भी ज्यादा दूर नहीं है। पीएम मोदी इससे पहले काशी में भी माँ गंगा के तट पर कई बार पूजा अर्चना कर चुके हैं। उन्होंने 2014 में भी कहा था कि काशी में माँ गंगा ने उन्हें बुलाया है।

हर्षिल पहुँचे प्रधानमंत्री मोदी ने यहाँ एक रैली को भी हरी झंडी दिखाई है। यह बाइक रैली हर्षिल से जादुंग तक जाएगी। पीएम मोदी ने इसके बाद यहाँ आयोजित एक जनसभा को भी संबोधित किया है। इस जनसभा में इतनी भीड़ आई कि कुर्सियाँ कम पड़ गईं।

पीएम मोदी ने अपने भाषण की शुरुआत माणा में हुए हादसे में मारे गए लोगों को श्रद्धांजलि दी। पीएम मोदी ने कहा, “उत्तराखंड की देवभूमि ऊर्जा से ओतप्रोत है… माँ गंगा के शीतकालीन गद्दी स्थल पर आकर यहाँ मैं धन्य हो गया हूँ। माँ गंगा की कृपा से मुझे उत्तराखंड की सेवा करने का मौक़ा मिला है।”

पीएम मोदी ने कहा, “माँ गंगा का स्नेह है कि मैं उनके मायके मुखवा गाँव आया हूँ, यहाँ मुझे मुखीमठ में पूजा का सौभाग्य प्राप्त हुआ है… कुछ साल पहले मैं जब बाबा केदार के दर्शन के लिए मैं उनके चरणों में गया था तब मेरे मुंह से कुछ भाव प्रकट हुए थे। मैंने कहा था कि यह दशक उत्तराखंड का है।”

उन्होंने कहा, “बाबा केदार के आशीर्वाद से वह भाव सच्चाई में बदल रहे हैं… यहाँ उत्तराखंड की प्रगति के लिए नए रास्ते खुल रहे हैं। उत्तराखंड का जन्म जिसके लिए हुआ था, अब वह पूरे हो रहे हैं। हमारे संकल्प पूरे हो रहे हैं।” पीएम मोदी का यह भाषण आप नीचे लगे वीडियो में सुन सकते हैं।

पीएम मोदी ने इस दौरान हाल ही में सोनप्रयाग से केदारनाथ तक मंजूर की गई रोपवे की बधाई दी। पीएम मोदी ने कहा कि अब पहाड़ों पर नया इन्फ्रा बन रहा है। उन्होंने कहा कि 1962 युद्ध में खाली करवाए गए दो गाँव वापस बसाए जाने का प्रयास चल रहा है।

बेंगलुरु में ओड़िया साइनबोर्ड देख भड़का कन्नड़ गुंडा, धमकी से डर कर रेस्टोरेंट मालिक ने बोर्ड उतारा: वायरल वीडियो देख लोग पूछ रहे सवाल

कर्नाटक के बेंगलुरु में स्थानीय भाषा के चलते एक और विवाद सामने आया है। यहाँ ‘डिलिशियस पखाल (Delicious pakhal)’ नाम के ओड़िया रेस्टोरेंट के मालिक को एक कन्नड़ भाषी आदमी ने आकर धमकी दी कि वो रेस्टोरेंट के ऊपर से उस साइनबोर्ड को हटाए जिसमें ओड़िया भाषा में रेस्टोरेंट का नाम लिखा है।

वायरल वीडियो में देखा जा सकता है कि कार में बैठा युवक रेस्टोरेंट के कर्मचारी को बुलाता है और पूछताछ शुरू करता है। वह पूछता है कि आखिर बोर्ड पर ओड़िया भाषा में रेस्टोरेंट का नाम क्यों लिखा है?

दिलचस्प बात ये है कि ये सवाल वो व्यक्ति तब करता है जब रेस्टोरेंट पर कन्नड़ भाषा में भी रेस्टोरेंट का नाम साफ लिखा था। व्यक्ति का रवैया परखते हुए रेस्टोरेंट का कर्मचारी बहुत सहजता से जवाब देता है, “इस रेस्टोरेंट में ओडिशा का खाना मिलता है। यह खाना 90 फीसदी ओड़िया लोगों के लिए होता है इसलिए इस साइनबोर्ड को लगाया गया है।”

अजीब बात ये है कि ओड़िया रेस्टोरेंट में काम करने वाला कर्मचारी पूरी तरह से कन्नड़ में बात कर रहा था, फिर भी उस कार सवार का गुस्सा बढ़ता गया। उसने कर्मचारी को धमकी दी कि वह अपने रेस्टोरेंट से ओड़िया भाषी बोर्ड हटा दे, क्योंकि वो एक हफ्ते बाद आकर दोबारा देखेगा।

उसने कहा, “बेंगलुरु में काम करने के लिए कन्नड़ भाषा और कन्नड़ लोगों को पहली प्राथमिकता मिलनी चाहिए। क्या आपने अन्य राज्यों को हमारी भाषा में बोर्ड लगाने की अनुमति देते देखा है? यहाँ उस भाषा की अनुमति नहीं है। इसे हटा दें। मैं एक हफ़्ते में वापस आऊँगा।”

इस घटना के बाद उस रेस्टोरेंट के मालिक ने किसी विवाद से बचने के लिए अपने रेस्टोरेंट से वो बोर्ड हटा दिया जिसकी नई तस्वीरें भी सोशल मीडिया पर हैं। लेकिन, इस बीच लोग पुरानी वीडियो को शेयर करते हुए कई तरह के सवाल खड़े कर रहे हैं। खुद कन्नड़ भाषी लोग ये कह रहे हैं कि जब रेस्टोरेंट का मालिक कन्नड़ में बात कर रहा है, साइनबोर्ड सिर्फ मार्केटिंग के लिए लगाया है तो दिक्कत क्या है? वो लोग ओड़िया व्यंजन परोसते हैं तो इतना तो किया ही जा सकता है।

नोट: यह खबर मूल रूप से अंग्रेजी में प्रकाशित हुई है। आप इसे पूरा पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक कर सकते हैं।

रमजान में श्रीनाथजी मंदिर से सुनाई पड़ी पटाखों की आवाज, तो भड़क गए मुस्लिम: द्वारका में हिंदू परिवार को मकसूद और मोन समेत 4 ने बेरहमी से पीटा, 2 घायल

गुजरात के देवभूमि द्वारका के खंभालिया में 2 मार्च को श्रीनाथजी हवेली मंदिर के प्रांगण में पटाखे फोड़ने पर चार मुस्लिमों ने एक हिंदू परिवार पर हमला कर दिया। हमलावरों की पहचान मकसूद, तौसीफ, मोईन और फूलकंद के रूप में हुई है। हमलावरों ने रमजान का हवाला देते हुए जश्न मनाने पर आपत्ति जताई थी। आरोपितों ने झगड़े के दौरान हिंदू परिवार के साथ मारपीट की। इसमें एक नाबालिग समेत दो लोग घायल हो गए हैं।

इस मामले में पुलिस ने भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 115(2), 117(2), 352 और 54 के साथ-साथ गुजरात पुलिस अधिनियम की धारा 135(1) के तहत एफआईआर दर्ज की है। शिकायत के अनुसार, विपुल ठक्कर का भतीजा 20 फरवरी की रात 10 बजे मंदिर के वार्षिक उत्सव में बचे हुए पटाखों को फोड़ रहा था। इसी दौरान मकसूद, मोईन और तौसीफ लाठी-डंडे लेकर मंदिर में घुस आए।

स्रोत: गुजरात पुलिस/ऑपइंडिया गुजराती

तीनों हमलावरों ने पटाखे छोड़ रहे हिंदू परिवार को डाँटकर पटाखे जलाने से मना कर दिया। इस दौरान तीनों मुस्लिम आरोपित हिंदू परिवार से गाली-गलौज करने लगे। इसी बीच फूलकंद नाम का एक चौथा मुस्लिम वहाँ आ गया। उसके पास लकड़ी की एक छड़ी थी। इसी बीच मकसूद ने विपुल के बाएँ हाथ पर बेसबॉल बेट से हमला कर दिया। इससे विपुल के हाथ में फ्रैक्चर हो गया।

विपुल के भतीजे को भी मुस्लिमों के समूह ने पीटा। शोर सुनकर घर की महिलाएँ और पड़ोसी वहाँ आ गए। लोगों को आता देखकर हमलावर मौके से फरार हो गए। विपुल और उनके भतीजे को इस हमले में कई कई चोटें आई हैं। उन्हें इलाज के लिए अस्पताल में भर्ती कराया गया है। डॉक्टरों के अनुसार, ठक्कर के बाएँ हाथ में फ्रैक्चर हुआ है और उसके भतीजे के शरीर पर कई चोटें आई हैं।

विपुल ठक्कर ने यह भी आरोप लगाया कि हमलावरों ने न केवल उनके साथ दुर्व्यवहार किया, बल्कि मंदिर और उसके देवता का अपमान भी किया। उन्होंने कहा कि हमलावरों ने धमकी दी है कि अगर वे पटाखे जलाना जारी रखेंगे तो वे मंदिर को बंद करा देंगे और उनके परिवार को मार देंगे। ऑपइंडिया ने संबंधित पुलिस स्टेशन से बयान लेने की कोशिश की, लेकिन संपर्क नहीं हो सका।

(इस रिपोर्ट को मूलत: मेघल सिंह परमार ने ऑपइंडिया गुजराती के लिए लिखी है। आप मूल रिपोर्ट इस लिंक को क्लिक करके पढ़ सकते हैं।)

जो पत्थर दंगाइयों ने फेंके, उन्हीं से UP में बन रही पुलिस चौकी: कोर्ट भी सख्त, 10 दंगाइयों की जमानत अर्जी खारिज

उत्तर प्रदेश के संभल में जो पत्थर दंगाइयों ने पुलिस पर फेंके थे, उन्हीं से अब पुलिस चौकी बन रही हैं। संभल में इन पत्थरों से दर्जनों पुलिस चौकी बन रही हैं। इनमें से कई चौकियाँ उन्हीं इलाकों में बन रही हैं, जिनमें मुस्लिम दंगाइयों ने हिंसा की थी। जिले भर में अब कैमरे भी लगाए जा रहे हैं। वहीं पुलिस पर हमला करने वाले अब कोर्ट में जमानत के लिए चक्कर काट रहे है।

संभल के एसपी कृष्ण कुमार ने इस मामले में बताया, “पुलिस द्वारा जिन पत्थरों को उपद्रवियों द्वारा फेंका गया था, उनका उपयोग करके चौकियों की नींव रखी जा रही है। इसके अलावा शासन से मिले बजट के द्वारा चौकियों का निर्माण करवाया जा रहा है।”

उन्होंने आगे बताया, “संभल में कुल 38 आउटपोस्ट और चौकियाँ बनाई जा रही हैं। ‘सेफ संभल’ नाम का एक प्रोजेक्ट प्रशासन की मदद से पुलिस द्वारा जिले में लाया गया है। इसमें ₹3 करोड़ की लागत से चेहरा पहचान करने वाले तमाम कैमरे लगाए जा रहे हैं। यह किसी भी व्यक्ति की पहचान और उसकी गतिविधियाँ पहचानने में मदद करेंगे।”

एसपी कृष्ण कुमार ने बताया है कि अब तक संभल में 600 इस तरह के कैमरे लगाए जा चुके हैं। इसके लिए संभल के गाँवों में भी काम चल रहा है। गौरतलब है कि बीते दिनों में संभल की विवादित शाही जामा मस्जिद के सामने और अपराधियों के लिए कुख्यात मुहल्ले दीपासराय में 2 चौकियाँ स्थापित की गई थीं।

संभल में पुलिस के एक्शन के बीच अब जामा मस्जिद सर्वे के दौरान हिंसा करने वाले दंगाई कोर्ट के चक्कर काट रहे हैं। पुलिस द्वारा गिरफ्तार किए गए मुस्लिम दंगाई कोर्ट से जमानत की गुहार लगा रहे हैं। हालाँकि, उन्हें कोर्ट ने कोई राहत देने से इनकार किया है।

संभल की अदालत में बुधवार (5 मार्च, 2025) को 14 दंगाइयों ने जमानत के लिए अर्जी लगाई थी। इनमें से 4 की तारीख बढ़ा दी गई जबकि अदालत ने 10 दंगाइयों की जमानत याचिका खारिज कर दी। अदालत ने आमिद, अंसार, सुभान उर्फ मुन्ना, सुजाउद्दीन उर्फ सज्जू, दिलनवाज, मुस्तफा समेत 10 की जमानत याचिका खारिज की हैं।

संभल में इन सबके बीच दंगाइयों पर कार्रवाई भी तेजी से चल रही है। संभल पुलिस को 74 दंगाइयों में से 3 के नाम पते मालूम हो गए हैं और उनको गिरफ्तार किए जाने की तैयारी चल रही है। संभल पुलिस ने इन 74 दंगाइयों की पहचान के लिए पोस्टर लगाए थे और बाकी जिलों से मदद माँगी थी।

पुलिस अभी एक दाढ़ी वाले शख्स को भी ढूंढ रही है जो दंगाइयों को भड़का रहा था। उसके विषय में जानकारी नहीं इकट्ठा की जा सकी है। गौरतलब है कि 24 नवम्बर, 2024 को संभल की शाही जामा मस्जिद में सर्वे के दौरान इस्लामी कट्टरपंथियों ने खूब हिंसा की थी।

उन्होंने पुलिस पर पत्थर बरसाए थे और कई गाड़ियाँ तहस नहस कर दी थी। इस दौरान फायरिंग भी हुई थी। इस दंगे में 4 लोगों की मौत हुई थी। पुलिस इसके बाद लगातार संभल में सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करने में जुटी हुई है और दंगाइयों पर कार्रवाई कर रही है।

देहरादून में 11 अवैध मदरसों पर लगा ताला, कार्रवाई देख 88 भागे-भागे पहुँचे रजिस्ट्रेशन करवाने: मुस्लिम संगठन ने कहा – मदरसे के लिए मान्यता की जरूरत नहीं

उत्तराखंड में अवैध मदरसों के खिलाफ प्रशासन ने कार्रवाई तेज कर दी है। देहरादून में ही अब तक 11 अवैध मदरसों को सील किया जा चुका है। पूरे राज्य की बात करें तो पूर्व में 500 से अधिक मदरसे ऐसे चिह्नित किए गए, जिनपर कार्रवाई होनी है।

मालूम हो कि यह कार्रवाई केवल अवैध मदरसों के खिलाफ ही हो रही है वो भी इसलिए क्योंकि जाँच के दौरान जब इन्हें मौका दिया गया तो इनके पास रजिस्ट्रेशन के दस्तावेज नहीं मिले। मदरसों को सील करने के लिए आदेश 28 फरवरी को पारित किया गया था। इसके बाद उत्तराखंड मदरसा बोर्ड के पास करीबन 88 आवेदन मान्यता पाने के लिए आए। बोर्ड ने अभी तक इनमें से 51 मदरसों को मान्यता प्रदान की है।

देहरादून में अवैध मदरसे

देहरादून के जिला मजिस्ट्रेट सविन बंसल ने बताया कि सदर देहरादून तहसील में ऐसे अंपजीकृत मदरसे 16 पाए गए थे जबकि विकासनगर में 34 , डोईवाला में 6 और कलसी में 1।

जाँच के दौरान इन मदरसों के पास पंजीकरण संबंधी कोई दस्तावेज नहीं मिले। इसके बाद प्रशासन ने इन मदरसों को सील करने के लिए एक संयुक्त टीम का गठन किया। इस टीम में जिला प्रशासन, पुलिस के साथ अल्पसंख्यक आयोग और मदरसा बोर्ड के अधिकारी शामिल थे।

इस बाबत विकासनगर तहसील के उप-जिलाधिकारी विनोद कुमार ने भी बयान दिया। इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार उन्होंने बताया, “3 मार्च से अब तक नौ मदरसे सील किए जा चुके हैं। अन्य दो संस्थान डोईवाला और सदर में हैं।”

मुस्लिम संगठन का विरोध

बता दें कि इस कार्रवाई से मुस्लिम सेवा संगठन के लोग नाराज हैं। इसके अध्यक्ष नईम कुरैशी ने कहा, “मदरसा चलाने के लिए किसी मान्यता की आवश्यकता नहीं होती। सीलिंग अवैध है क्योंकि मदरसा सील करने से पहले प्रबंधकों को कोई आदेश या नोटिस नहीं दिया गया। उन्होंने इसका कारण भी नहीं बताया।”

आगे उन्होंने कहा, “हमने मंगलवार को कलेक्ट्रेट में और आज मसूरी देहरादून विकास प्राधिकरण में मस्जिद को अवैध रूप से सील करने के खिलाफ प्रदर्शन किया। हमने ज्ञापन भी सौंपा। हमने कहा कि अगर वे इस अवैध सीलिंग को नहीं रोकते हैं, तो हम सचिवालय के बाहर प्रदर्शन करेंगे।”

मान्यता प्राप्त मदरसा और गैर-मान्यता प्राप्त मदरसा

मान्यता प्राप्त मदरसे शिक्षा के लिए राज्य बोर्ड के अंतर्गत आते हैं जबकि गैर-मान्यता प्राप्त मदरसे बड़े मदरसों जैसे दारुल उलूम नदवतुल उलमा और दारुल उलूम देवबंद द्वारा निर्धारित पाठ्यक्रम के अनुसार पढ़ाई कराते हैं। अब उत्तराखंड सरकार ऐसे गैर मान्यता प्राप्त मदरसों पर कार्रवाई इसलिए कर रही है ताकि हर छात्र को मुख्यधारा से जोड़ा जा सके, बच्चों को आधुनिकता की जानकारी हो, वह NCERT का सिलेबस पढ़ें और नई चीजें सीख सकें।