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‘मन की बात’ पर केवल 2% डिस्लाइक भारत से… बाकी Pak-प्रेमी तुर्की और विदेशियों का कमाल: BJP का कॉन्ग्रेस पर आरोप

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हालिया वीडियो ‘मन की बात’ पर भारतीय जनता पार्टी यूट्यूब चैनल को 24 घंटे से कम समय में 7 लाख डिस्लाइक झेलने पड़े। ऐसे में कॉन्ग्रेस और आम आदमी पार्टी समर्थकों ने ये फैलाना शुरू कर दिया कि चूँकि सरकार ने JEE और NEET परीक्षाओं को कराने में अपना समर्थन दिया, इसी वजह से लोग नाराज हैं और वीडियो पर डिस्लाइक दबा कर अपना रोष जता रहे हैं।

इतना ही नहीं, रविवार को तो यह प्रोपगेंडा भी फैलाया गया कि PMO की ओर से वीडियो पर कमेंट को बंद कर दिया गया था। क्योंकि उन्हें डर था कि छात्र नाराज हैं और उस वीडियो पर अपना गुस्सा व्यक्त कर सकते हैं।

हालाँकि, मालूम हो कि सच्चाई यह नहीं है।  मन की बात प्रोग्राम शुरू होने के समय से ही वीडियोज पर कमेंट की सुविधा हमेशा बंद रहती है। ऐसा इसलिए क्योंकि ये वीडियोज यूट्यूब के उस सेक्शन में जाती है, जहाँ इन्हें ‘बच्चों के लिए’ चिह्नित किया जाता है और यूट्यूब की नीति ऐसी है कि इस सेक्शन के लिए कमेंट बंद ही होते हैं।

मगर, भाजपा विरोधियों को फैक्ट से क्या सरोकार। उनके लिए तो जब एक हथकंडा काम नहीं आया, तो उन्होंने छात्रों की नाराजगी को अपना हथियार बना लिया। इसी बाबत बीजेपी के आईटी इंचार्ज अमित मालवीय ने सोमवार को ट्वीट किया।

अपने ट्वीट में उन्होंने बताया कि एक संयोजित अभियान के तहत अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क को गठित करके इस वीडियो को डिस्लाइक करवाया गया। ट्विटर पर उन्होंने बताया कि कॉन्ग्रेस लगातार पीएम मोदी के ‘मन की बात’ वीडियो को यूट्यूब पर डिस्लाइक करवाने के प्रयास कर रही थी।

अमित मालवीय ने यह भी बताया कि यूट्यूब वीडियो पर कुल 2% डिस्लाइक भारत से आया है। जबकि 98% डिस्लाइक करने वाले अकॉउंट बाहर के हैं। इनमें अधिकांश तुर्की के सोशल मीडिया अकॉउंट हैं। यूट्यूब का स्टैटिक्स और एनालिटिकल पेज ने भी डिस्लाइक करने वाले यूजर्स का डेमोग्राफिक डेटा एडमिन को अलग-अलग जगहों का दर्शाया है।

इसके अलावा ऑपइंडिया को कई सूत्रों से पता चला है कि अंतरराष्ट्रीय सोशल मीडिया नेटवर्क के जरिए पीएम मोदी के मन की बात वाली वीडियो को डिस्लाइक करना एक पूर्व योजना का नतीजा थी।

मालवीय ने भी अपने ट्वीट में लिखा कि सोशल मीडिया वेबसाइटों पर कॉन्ग्रेस के Anti-JEE-NEET अभियान में विदेशी लोगों की भागीदारी देखी गई है। खासकर तुर्की के लोगों की। एक दिलचस्प बात यह भी देखने वाली है कि तुर्की के राष्ट्रपति द्वारा पाकिस्तान को कश्मीर मुद्दे पर समर्थन दिए जाने के कुछ दिन बाद नवंबर 2019 में कॉन्ग्रेस ने इंस्तांबुल में अपना ऑफिस खोला था।

यहाँ बता दें कि मालवीय के दावों की पुष्टि करते ट्विटर पर बड़ी तादाद में कई ऐसे लोगों के ट्वीट सामने आए हैं, जिन्होंने भारत में होने जा रहे JEE-NEET की परीक्षाओं पर केंद्र सरकार का विरोध किया, लेकिन उनका अक़ॉउंट बताता है कि वह तुर्की के हैं। इनमें से अधिकांश अकॉउंट हाल में बनाए गए हैं और इनमें प्राइवेसी भी लगाई गई है।

खास बात यह है कि ट्विटर पर मोदी विरोध में अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क ने केवल जेईई-नीट पर ही पहली बार नहीं बोला। बल्कि श्रीलंका में चुनाव के मद्देनजर भी भारत-श्रीलंका के संबंधों पर ट्वीट देखने को मिल रहे हैं।

ट्विटर पर एक तुर्की के यूजर ने श्रीलंका चुनावों के नजदीक होने पर स्वराज की एक रिपोर्ट को शेयर किया। जिसमें श्रीलंका और भारत के रिश्तों पर बात थी। इस ट्वीट के साथ यूजर ने कई हैशटैग इस्तेमाल किया। शायद ऐसा इसलिए क्योंकि वह मोदी सरकार के ख़िलाफ़ श्रीलंका के नेटवर्क को उकसाना चाहता हो।

ऐसे ही तुर्की का एक अन्य सोशल मीडिया अकॉउंट भी भारत के आंतरिक मामलों में दिलचस्पी ले रहा है। जिसे देखकर पता चलता है कि उन लोगों का जेईई-नीट से भले ही कोई लेना-देना नहीं है, मगर उन्हें ट्विटर पर मोदी सरकार के ख़िलाफ़ ट्वीट्स का प्रोपगेंडा चलाने के लिए रखा गया है।

गौरतलब है कि यह भी पहली बार नहीं है जब कॉन्ग्रेस पर अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क की मदद लेने के आरोप लगे हैं। इससे पहले साल 2017 में राहुल गाँधी की अचानक प्रसिद्धि में वृद्धि देखने को मिली थी। लेकिन यह लोग भारत से नहीं बल्कि रूस, कजाख और इंडोनेशिया के थे, जिनका साथ पाकर राहुल गाँधी की सोशल मीडिया गतिविधियों में काफी उछाल देखने को मिला था।

हालाँकि, बाद में पड़ताल में पता चला था कि राहुल गाँधी का ट्वीट ऐसे लोगों द्वारा रीट्वीट किया जा रहा था, जिनके 10 से भी कम फॉलोवर थे और वह दुनिया के किसी भी मुद्दे पर ट्वीट कर रहे थे। इस मामले में और पिछले मामलों में बस यही समानता है कि इस बार भले ही अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क तुर्की से ज्यादा जुड़ा हुआ दिखाई दे रहा है, लेकिन ये सभी बाहरी लोग वही हैं, जिनका मोदी सरकार से कोई लेना-देना नहीं है। मगर फिर भी वह जेईई-नीट पर फैसले के अलावा अन्य नीतियों पर भी रीट्वीट कर रहे हैं।

‘सेक्स लाइफ, जाति, धर्म… सब पूछा जाएगा हेल्थ कार्ड के लिए’ – Scroll फैला रहा था झूठ, NHA ने खुद किया पर्दाफाश

ऑनलाइन मीडिया पोर्टल स्क्रॉल ने 28 अगस्त को अपनी रिपोर्ट में दावा किया है कि ‘One nation one health card’ स्कीम के तहत सरकार द्वारा जारी की जाने वाली यूनिक हेल्थ आईडी के लिए कई संवेदनशील जानकारियाँ एकत्रित की जाएँगी। इस जानकारी में न केवल मेडिकल हिस्ट्री, फाइनेंस के बारे में पूछा जाएगा, बल्कि जेनेटिक्स और सेक्स लाइफ की जानकारी भी ली जाएगी।

रिपोर्ट में कुल मिलाकर यह बताया गया कि  ‘comprehensive data protection law’ की अनुपस्थिति में सरकार लोगों की संवेदनशील जानकारियाँ एकत्रित कर रही है। ज्ञात रहे कि स्क्रॉल में डेटा प्वाइंट्स को ‘संवेदनशील पर्सनल डेटा’ कहा गया है क्योंकि उसमें फाइनेंशियल डिटेल्स, शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य, सेक्स लाइफ, मेंटल रिकॉर्ड, जेंडर और सेक्सुएलिटी, जाति, धर्म जैसी चीजों के बारे में पूछा जाएगा।

इस आर्टिकल का मुख्य उद्देश्य लोगों के मन में यूनिक आईडी को लेकर प्रश्न खड़ा करना था। तभी तो इसमें कहा गया है कि यह स्वास्थ्य मिशन नैतिक चिंताओं की वजह बन गया है। लेख की मानें तो लोगों से डेटा एकत्रित करना उनकी स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का जवाब नहीं है। लेकिन हो सकता है यह कॉर्पोरेट के लिए अनुकूल हो।

बता दें कि स्क्रॉल के इस आर्टिकल में कॉर्पोरेट के हस्तक्षेप पर मुख्यत: लोगों का ध्यान आकर्षित करवाया गया। साथ ही लोगों की राय जानने के लिए एक हफ्ते की समय सीमा को बेहद कम बताया गया है। इनके अलावा ऐसे बिंदु तर्क के तौर पर रखे गए, जिसके द्वारा यह बताया गया कि इस स्कीम में आम जनमानस के अधिकार हाशिए पर हैं।

अब इस रिपोर्ट के पब्लिश होने के तीन दिन बाद NHA ने इस पर संज्ञान लिया। उन्होंने इस रिपोर्ट को गलत व्याख्या करने वाला और सनसनीखेज लेख बताया है। उन्होंने स्पष्ट किया है कि सरकार ने ऐसी कोई व्यक्तिगत जानकारी नहीं ली और न ही उनका ऐसे निजी सवाल पूछने का कोई इरादा है। हेल्थ आईडी के लिए रजिस्टर करने हेतु केवल नाम, जन्म का साल, राज्य और जिला ही जरूरी है।

स्क्रॉल के झूठे दावों वाले लेख को देखकर NHA ने भ्रम की स्थिति मिटाने के लिए यह भी साफ किया है कि पब्लिक फीडबैक के लिए उन्होंने 2 हफ्तों का समय दिया था, जिसे बाद में एक और सप्ताह यानी 10 सितंबर तक के लिए बढ़ा दिया गया। यानी जिस एक हफ्ते की समय सीमा को लेकर स्क्रॉल शिकायत कर रहा है, वो समय सीमा तीन हफ्ते की है।

NHA ने यह भी साफ किया कि स्वास्थ्य आईडी के निर्माण के लिए आधार को अनिवार्य बनाने के लिए कानूनी रूप से अनुमति नहीं है। रिपोर्ट में डेटा कलेक्शन को सेंसिटिव पर्सनल डेटा कहने पर, NHA ने बताया कि इस शब्द का प्रयोग सूचना प्रौद्योगिकी (उचित सुरक्षा अभ्यासों व प्रक्रियाओं और संवेदनशील व्यक्तिगत डेटा या सूचना) नियम, 2011 और व्यक्तिगत डेटा संरक्षण (पीडीपी) बिल के अनुसार किया गया है।

उन्होंने बताया कि उक्त परिभाषा के अनुसार, संवेदनशील डेटा में पर्सनल डेटा फाइनेंशियल जानकारी, सेक्सुअल ओरियंटेशन, राजनैतिक मत आदि होते हैं। लेकिन ड्राफ्ट पॉलिसी में अभी तक ऐसा कोई खंड नहीं है, जहाँ कहा गया हो कि इन जानकारी के लिए पूछा गया है। इसके अलावा इस शब्द के प्रयोग का अर्थ यह भी है कि अगर कभी NDHM के सूचना तंत्र पर किसी प्रकार का एनकाउंटर होता है तो सेंसिटिव पर्सनल डेटा के अंतर्गत रखी गई जानकारी को सबसे ज्यादा सुरक्षा और प्राइवेसी दी जाएगी।

यहाँ बता दें कि एक राष्ट्र और एक कार्ड का जिक्र प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 74वीं स्वतंत्रता दिवस की स्पीच के दौरान किया था। उन्होंने नेशनल डिजिटल हेल्थ मिशन का उल्लेख करते हुए बताया था कि यूनिक हेल्थ आई़डी हर नागरिक को इस स्कीम के तहत मिलेगी और ये सुविधा सबके लिए वैकल्पिक होगी। इसके लिए जो डेटा चाहिए होंगे, उनमें व्यक्ति की मेडिकल हिस्ट्री जैसे टेस्ट, डायनॉसिस, और ट्रीटमेंट आदि की जानकारी होगी।

GDP पर झूठ फैला रहा था इंडिया टुडे ग्रुप का बिजनेस टुडे… लोगों ने खोल दी पोल, करना पड़ा ट्वीट डिलीट

कोरोना महामारी के कारण सभी काम ठप्प होने से अर्थव्यवस्था पर गहरा असर पड़ा है। ऐसे में केवल सोशल मीडिया पर फेक न्यूज फैलाने का कारोबार ही तेजी से चल रहा है। हाल में यह काम भारत की जीडीपी की तुलना अन्य देशों की जीडीपी से करते हुए बिजनेस टुडे ने की।

बिजनेस टुडे ने एक ग्राफ शेयर किया। इस ग्राफ में संस्थान ने G7 देशों की जीडीपी ग्रोथ दर्शाई। ग्राफ में दावा किया गया कि यह जीडीपी ग्रोथ का आँकड़ा अप्रैल-जून 2020 के बीच का है। हालाँकि आलोक वाजपेयी नाम के ट्विटर यूजर ने इसकी पोल खोल कर रख दी। 

उन्होंने दावा किया कि बिजनेस टुडे जो ग्राफ सोशल मीडिया पर फैला रहा है, उसमें भारत के आँकड़े Q2 YOY (इस वर्ष की तिमाही की तुलना पिछले साल की तिमाही से करना) पैमाने पर हैं। जबकि बाकी देश के आँकड़े  QoQ (Q2 Vs Q1) 2020 के पैमाने (इस वर्ष की तिमाही की तुलना इसी वर्ष की किसी अन्य तिमाही से करना) पर। अगर यही पैमाना सबके लिए रखा जाता तो अमेरिका की जीडीपी -33%, कनाडा की -38.7% फ्रांस की -18.9% और इटली की -17.7% होती।

यहाँ बता दें कि बिजनेस टुडे ने जिस समय भारत की जीडीपी -23.9% दिखाकर यह बताना चाहा है कि कोरोना में नुकसान भले ही सबको हुआ है, मगर इसका असर भारत पर सबसे ज्यादा पड़ा है। उस समय, गौर करने लायक बात यह है कि तुलना के समय किसी भी चीज का पैमाना एक बराबर रखना सबसे प्रमुख शर्त होती है। 

मसलन, यदि कोई व्यक्ति अपने व्यवसाय में हुए नफा-नुकसान की तुलना अपने प्रतिद्वंद्वी से करता है तो वह उसके उतने ही नफा-नुकसान को समझने के लिए एक समय सीमा निर्धारित करता है और फिर दोनों के प्रॉफिट-लॉस की तुलना करता है। 

Q2 YOY और QoQ (Q2 Vs Q1) में अंतर

जैसे यदि किसी व्यापारी को साल 2018 के Q1 (साल के पहले तीन महीने- जनवरी-फरवरी- मार्च) से लेकर साल 2019 के Q1 में अपने व्यवसाय में 20% का फायदा हुआ है, तो वह इसी अवधि (साल 2018 के Q1 से साल 2019 का Q1) में अपने प्रतिद्वंद्वी को हुए फायदे को मापता है। ऐसा नहीं होता कि वह अपने सालाना मुनाफे को उसके मासिक मुनाफे से तुलना करेगा।

अब यही गणित शायद बिजनेस टुडे ने आँकड़े दर्शाते हुए सबके सामने रखना जरूरी नहीं समझा। आलोक बाजपेयी के अनुसार उन्होंने Q2 यानी साल के अगले तीन मास, जैसे- अप्रैल, मई, जून की जीडीपी की तुलना साल दर साल वाले पैमाने से (Year to Year) से की। वहीं, अन्य देशों की जीडीपी ग्रोथ की तुलना एक ही साल के दो क्वार्टर में की। यानी अप्रैल-मई-जून 2020 की तुलना साल 2020 के जनवरी, फरवरी, मार्च से। 

आलोक बाजपेयी आगे लिखते हैं, “और यह सारा इतिहास है। यदि हम सभी नकारात्मकता पर कम समय और उत्पादकता पर अधिक समय खर्च करते हैं, तो भारत इस महामारी के दूसरे पक्ष की तुलना में अधिक मजबूत होगा।”

वह यह भी कहते हैं कि -23.9 % केवल वर्ष दर वर्ष का आँकड़ा है। मुमकिन है कि साल 2021 में ऐसी ही तुलना में +40% बढ़त देखने को मिले। इसलिए जरूरी है कि हम अपनी शक्तियों से इन तीन महीनों को बेहतर बनाने का प्रयास करें। आशा है कि आज जो रो रहे हैं, वो कल खुशी में शामिल होंगे।

इसी प्रकार अर्थशास्त्री सुरजीत भल्ला बिजनेस टुडे के फर्जी आँकड़े देखकर लिखते हैं, “इस महामारी ने भारत की पत्रकारिता पर असर डाला है। अब कोई फेक न्यूज फैलाने से नहीं डर रहा। ये बिजनेस टुडे का चार्ट दिखाता है कि भारत की जीडीपी ग्रोथ -23.9% साल दर साल (YOY) की तुलना के हिसाब से है, जबकि अमेरिका की तिमाही (QoQ) तुलना से यह -9.5% निकल कर आती है। अगर ईमानदारी से पत्रकारिता होती तो यूएस -38% होता। लेकिन ये बातें कौन बिजनेस टुडे को समझाए।”

यहाँ बता दें कि इनके अलावा एक आँकड़ो की लिस्ट और सामने आई है, जिसमें कई देशों के वित्तीय वर्ष तक की जीडीपी बताई जा रही है। इसमें यूएस की जीडीपी ग्रोथ -32.9%, चीन की 3.2%, जापान की -27.8%, जर्मनी की -34.7%, भारत की -23.9% और यूके की -20.4% दिखाई गई है। वहीं बिजनेस टुडे में जापान की जीडीपी ग्रोथ -7.6 है। जर्मनी की -10.1 % है और यूएस की -9.5% है।

उल्लेखनीय है कि बिजनेस टुडे के इस फर्जी दावे के बाद से कई अर्थशास्त्री अपने अपने स्तर जीडीपी ग्रोथ का प्रतिशत ट्विटर पर साझा कर रहे हैं। जिसके कारण संस्थान को अपना ग्राफ भी डिलीट करना पड़ा। अर्थशास्त्रियों द्वारा शेयर किए जा रहे कुछ आँकड़े एक दूसरे से मिलते हैं और कुछ थोड़े से अलग हैं।

हालाँकि, बावजूद इसके हर किसी का यही कहना है कि बिजनेस टुडे ने जीडीपी को आधार पर बनाकर अपना एजेंडा चलाया है। जबकि वास्तविकता सब जानते हैं कि कोरोना के कारण देश में हर काम बंद था। न कोई उत्पादन हो रहा था और न ही कोई आय हो रही थी। इसलिए, यदि काम होते हुए ये प्रतिशत इतना गिरा होता और लोग आलोचना करते तब समझ आता। मगर, सब जानने के बाद जैसे दर्शाया गया है, वह केवल वामपंथी मीडिया के प्रोपेगेंडा को दर्शाता है।

‘जय वाल्मीकि, जय श्रीराम’ – वो नारा, जिससे 52 गाँव के दलितों ने ओढ़ा भगवा, उतार फेंका फर्जी भीमवादियों का नीला गमछा

चंद्रशेखर आज़ाद उर्फ़ ‘रावण’ की भीम आर्मी हो या फिर दलितों के हितों का दावा करने वाले अन्य हिन्दू विरोधी संगठन, वो लोगों को ये कह कर बेवकूफ बनाते हैं कि सारे हिन्दू देवी-देवता फर्जी हैं और आर्यों ने हमेशा दलितों का अत्याचार किया है। दलितों और हिन्दुओं को अलग करने की इस साजिश को नाकाम किया है महर्षि वाल्मीकि ने। हरियाणा के गुहाना में हुए एक कार्यक्रम में महर्षि वाल्मीकि की मदद से विहिप और दलितों ने मिल कर फर्जी भीमवादियों के मंसूबों को नाकाम किया।

हाल ही में ख़बर आई थी कि हरियाणा के गुहाना से ‘जय वाल्मीकि, जय श्रीराम’ का नारा दिया गया है। वहाँ एक कार्यक्रम में विहिप के कार्याध्यक्ष आलोक कुमार ने कहा था कि अनुसूचित जाति के लोग हिंदू समाज के अटूट अंग हैं और कोई भी साजिश उन्हें अलग नहीं कर सकती। हिंदूवादी नेताओं और विहिप के पदाधिकारियों ने ध्यान दिलाया कि कैसे असदुद्दीन ओवैसी जैसे मौकापरस्त नेता ‘जय भीम, जय मीम’ का नारा देकर दलितों को बरगलाते हैं।

ऑपइंडिया ने इस कार्यक्रम के बारे में और जानकारी जुटाई, जिसके बाद पता चला कि गुहाना के 52 गाँवों में से प्रत्येक से इसमें दो-दो युवकों को बुलाया गया था। ये सभी दलित और वाल्मीकि समुदाय के युवक थे, जिन्होंने भीम आर्मी जैसे संगठनों और फर्जी नारा देने वालों के बहकावे में आकर हिन्दू धर्म से विमुख होना शुरू कर दिया था। हिन्दू धर्म में वापस उनकी श्रद्धा लाने और उन्हें अपनी जड़ों की तरफ लौटाने में काम आए महर्षि वाल्मीकि।

वही महर्षि वाल्मीकि, जो रामायण के रचयिता हैं और भगवान श्रीराम के समकालीन भी। उन्होंने भगवान के अवतरण से पहले ही उनकी पूरी गाथा लिख दी थी। इसके साथ-साथ ‘आनंद रामायण’ और ‘योग वशिष्ठ’ के लेखक के रूप में भी उन्हें जाना गया है। आज भी दलित समुदाय में एक बड़ा वर्ग उन्हें अपना पूर्वज मानता है। भीम आर्मी जैसे संगठन उन्हें हिंदुत्व से अलग कर के देखते हैं और उनके नाम पर दलितों को बरगलाते हैं।

इसके लिए एक उदाहरण देखिए। अक्टूबर 2019 में जब भीम आर्मी का मुखिया ‘रावण’ दंगे करने, सरकारी अधिकारियों के साथ बदतमीजी करने और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाने के आरोप में तिहाड़ जेल में बंद था, तब उसने वाल्मीकि जयंती को मुद्दा बनाते हुए आरोप लगाया था कि जेल में होली और दिवाली के उलट इसे मनाने की इजाजत नहीं दी जा रही है, जो भेदभाव को दिखाता है।

इसके साथ ही उसने पूछा था कि क्या दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल वाल्मीकि के अस्तित्व को नहीं मानते? उसने जेल में वाल्मीकि जयंती के लिए व्यवस्था न किए जाने पर अनशन करने और सीएम केजरीवाल के घर के बाहर धरना देने की धमकी दी थी। हैरानी की बात तो ये है कि वाल्मीकि-वाल्मीकि का रट्टा लगाने वाला ये आदमी एक प्रदर्शन में मंदिर में तोड़फोड़ का आरोपित भी था।

अब वापस हरियाणा के गुहाना की ओर लौटते हैं। हमने इस कार्यक्रम के बारे में अधिक जानकारी के लिए विश्व हिन्दू परिषद (विहिप) के इंटरनेशनल जॉइंट सेक्रेटरी डॉक्टर सुरेंद्र जैन से बातचीत की। उन्होंने ऑपइंडिया को बताया कि दलितों का एक बड़ा वर्ग हिन्दू विरोधी विभाजनकारी संगठनों के प्रभाव में आकर हिंदुत्व से भटक गया था, जिसे वापस लाने के लिए विहिप ने लगातार प्रयास किया।

हालाँकि, वो ‘जय वाल्मीकि, जय श्रीराम’ नारे का पूरा क्रेडिट वाल्मीकि समुदाय को देते हुए कहते हैं कि ये विहिप का नारा नहीं है, अपितु, वाल्मीकि समुदाय ने खुद ये नारा देकर विहिप को यह काम सौंपा। उन्होंने बताया कि इसकी पहल ख़ुद वाल्मीकि समुदाय ने ही की है। उन्होंने याद दिलाया कि कैसे आंबेडकर ने तत्कालीन सरसंघचालक गुरु गोलवलकर से आग्रह किया था कि वो हिन्दू संतों से कह कर इसकी घोषणा करवाएँ कि छुआछूत हिन्दू समाज का हिस्सा नहीं है।

साथ ही उन्होंने हरियाणा के गुहाना में वाल्मीकि मंदिर परिसर में बन रहे समरसता भवन की भी बात की, जिसका निर्माण जल्द ही पूरा हो जाएगा। डॉक्टर जैन ने बताया कि फर्जी भीमवादियों ने जानबूझ कर महर्षि वाल्मीकि को नीले कपड़ों में दिखाना शुरू कर दिया था जबकि हमेशा से उन्हें और संत रविदास जैसी विभूतियों को भगवा वस्त्रों में ही दिखाया जाता रहा है। उन्होने कहा कि ये एक एजेंडे के तहत किया गया।

डॉक्टर जैन ने कहा कि विहिप शुरू से ही समाज में छुआछूत ख़त्म करने का काम कर रहा है। गुहाना में हुए कार्यक्रम के बारे में उन्होंने जानकारी दी कि उसमें और भी लोगों को बुलाया जाता लेकिन चूँकि कार्यक्रम को सोशल डिस्टेन्सिंग के नियमों का पालन करते हुए संपन्न कराना था, इसीलिए 52 गाँवों से दो-दो लोग ही बुलाए गए थे। उन्होंने महर्षि वाल्मीकि और भगवान श्रीराम को एक-दूसरे का पूरक करार दिया।

इसके बाद हमने रिटायर्ड न्यायाधीश पवन कुमार से संपर्क किया, जो उस कार्यक्रम का अहम हिस्सा थे और वाल्मीकि महासभा कमिटी के अध्यक्ष भी हैं। उन्होंने ऑपइंडिया को बताया कि लगभग एक दशक पहले हुए एक संघर्ष में एक दलित युवक की हत्या कर दी गई थी, जिसके बाद दलितों और कथित उच्च-जाति के लोगों के बीच की खाई बढ़ी और इसी का फायदा उठा कर कुछ संगठनों ने दलितों का इस्तेमाल किया।

वो बताते हैं कि कई दलितों को मिशनरियों ने लुभा कर ईसाई मजहब में धर्मान्तरण करा दिया। उन्होंने बताया कि इसी घटना के बाद से दलित समुदाय के लोग हिन्दू धर्म और इसकी विचारधारा से दूर जाने लगे। उन्होंने बताया कि उन्हें अपनी जड़ों की तरफ वापस लाने के लिए काफी दिनों से प्रयास चल रहा था। हिन्दू संगठन उन्हें समझाने में लगे थे कि कैसे विभाजनकारी ताकतें उनका इस्तेमाल कर रही हैं।

उन्होंने कहा कि दलितों को ये सच्चाई बताई गई कि जो भी लोग और संगठन उन्हें हिन्दू धर्म से विमुख करने में लगे हुए हैं, उनके मंसूबे राजनितिक हैं और वो राजनीतिक फायदे के लिए ही ऐसा कर रहे। उन्हें समझाया गया कि ऐसे संगठनों का देश की एकता और अखंडता से कोई लेना-देना नहीं है। उन्होंने कहा कि दलितों को मुख्यधारा में लाने के लिए और देश की अखंडता बनाए रखने के लिए ये प्रयास किए गए।

पूर्व जज ने बताया कि भीम आर्मी के चंगुल में आए अन्य दलितों को भी चिह्नित कर उन्हें हिन्दू धर्म की मुख्यधारा में वापस लाने का प्रयास जारी है। उन्होंने दलित युवक की हत्या वाले मामले को भी फिर से खोलने के लिए हरियाणा सरकार से अपील करते हुए कहा कि योग्य जाँच एजेंसी को इसकी जाँच दी जाए क्योंकि दोषियों को सजा मिलने के बाद ही पीड़ितों को शांति मिलती है और उनका रोष कम होता है।

पूर्व जज पवन कुमार ने कहा कि जब हम अपने ही लोगों का ख्याल नहीं रखेंगे तो उनके भटकने की सम्भावना ज्यादा है और वो दूसरों के प्रभाव में आ जाते हैं। उन्होंने आशा जताई कि गुहाना के वाल्मीकि मंदिर में बनने वाला समरसता भवन भी कोरोना आपदा ख़त्म होते-होते तैयार हो जाएगा। साथ ही उन्होंने हिन्दू समाज के अन्य वर्गों को भी दलितों के साथ सही बर्ताव करने की सलाह दी, ताकि वो किसी और चंगुल में न फँसें।

विश्व हिन्दू परिषद के पदाधिकारियों ने ये भी जानकारी दी कि दिल्ली में उनके द्वारा जितने भी रामलीला कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं, उन सबकी शुरुआत वाल्मीकि पूजन से होती है और परदे पर महर्षि वाल्मीकि को दिखाया जाता है। इसी तरह अयोध्या के राम मंदिर परिसर में भी महर्षि वाल्मीकि का मंदिर होगा, उनकी प्रतिमा स्थापित की जाएगी। इस तरह महर्षि वाल्मीकि आज हिन्दू समाज के पुनरुत्थान का कार्य दिव्यलोक से ही कर रहे हैं।

हाल ही में हमने बताया था कि कैसे विश्व हिन्दू परिषद (विहिप) ने 5000 ऐसे पुजारियों को प्रशिक्षित कर विभिन्न मंदिरों में नियुक्त किया है, जो एससी-एसटी (दलित) समुदाय से आते हैं। संगठन के निवेदन के बाद विभिन्न राज्य सरकारों ने भी अपने पैनल में इन पुजारियों को जगह दी है। खासकर दक्षिण भारत में संगठन को इस कार्य में खासी सफलता मिली है। अकेले तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश में एससी-एसटी (दलित) समुदाय के 2500 पुजारियों को प्रशिक्षित किया गया है।

‘1962 से भी ज्यादा घातक हमला झेलेगी भारतीय सेना’ – चीनी मीडिया ने संपादकीय में दी गीदड़-भभकी

लद्दाख में चीनी सैनिकों को उनके आक्रामक रुख का करारा जवाब दिया भारत की सेना ने। महाशक्ति बनने का ढोंग रचने वाले चीन को यह ग्लोबल बेइज्जती के जैसा लगा। 29-30 अगस्त की रात को हुए इस घटनाक्रम के बाद से चीनी मीडिया लगातार प्रोपेगेंडा फैला रहा है।

वामपंथी देश चीन में मीडिया कुछ और नहीं बल्कि सरकार का मुखपत्र होता है। ऐसा ही एक मुखपत्र है ग्लोबल टाइम्स (Global Times)। इसका संपादक है हू शिन (Hu Xijin)। इन्हें खबरों से मतलब नहीं होता, इनका काम है चीन सरकार की नीतियों को इंग्लिश में लिख कर पूरी दुनिया तक पहुँचाना।

लद्दाख में मुँह की खाने के बाद सबसे पहले चीनी संपादक ने जो ट्वीट किया, उसको देखिए।

अपने यहाँ (मतलब अपने देश के) के संपादक सोशल मीडिया पर कभी-कभी अपने विचार भी लिख देते हैं। चीन में ऐसा नहीं है। शक के आधार पर ऐसा मान भी लिया जाए कि ग्लोबल टाइम्स के संपादक हू शिन ने अपने विचार ट्वीट किए हैं तो आइए एक नजर डालते हैं इस वेबसाइट में प्रकाशित हुए संपादकीय पर।

1 सितंबर को प्रकाशित संपादकीय
1 सितंबर को ही प्रकाशित हुए संपादकीय की आखिरी लाइन

अपने संपादकीय के छठे पैराग्राफ में ग्लोबल टाइम्स लिखता है:

यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि नई दिल्ली (मतलब भारत) शक्तिशाली चीन का सामना कर रहा है। पीएलए (चीनी सेना) के पास उसके देश के हर इंच की सुरक्षा करने के लिए पर्याप्त बल है। चीनी लोगों ने अपने सरकार को समर्थन दिया है, जो भारत को भड़काने की कोशिश नहीं कर रहा, लेकिन वह चीन के क्षेत्र में अतिक्रमण करने की अनुमति भी नहीं देता है। दक्षिण-पश्चिमी सीमा क्षेत्रों में चीन रणनीतिक रूप से दृढ़ (मजबूत) है और किसी भी परिस्थिति के लिए तैयार है। यदि भारत शांति से रहना चाहता है तो चीन इसका स्वागत करता है। यदि भारत प्रतिस्पर्धा में शामिल होना चाहता है, तो चीन के पास भारत की तुलना में अधिक उपकरण और क्षमता है। यदि भारत सैन्य प्रदर्शन (मतलब सीमा पर सैनिकों को खुली छूट) करना चाहेगा, तो पीएलए (चीनी सेना) भारतीय सेना को 1962 की तुलना में अधिक गंभीर नुकसान करवाने के लिए बाध्य है।

चीनी मीडिया की गीदड़-भभकी बहुत हुई। अब बात वैश्विक परिदृश्य की। 2020 न तो 1962 है और न ही आज का भारत तब जैसा है। तब के भारतीय नेतृत्व और आज के भारतीय नेतृत्व में बहुत अंतर है। वैश्विक परिदृश्य की बात करें तो 59 ऐप्स के हटने भर से चीन बिलबिला गया है। अगर 159 पर चोट किया जाए तो चीनी शीर्ष नेतृत्व पागलखाना तलाशता फिरेगा।

चीनी मीडिया को अपने संपादकीय पन्ने या स्पेस को पैसा, बाजार, कंपनी, TikTok जैसे मुद्दों तक सीमित रखना चाहिए। इसी में उनकी भलाई है। युद्ध न हम चाहते हैं न विश्व। लेकिन क्षमता किसमें कितनी है, यह गलवान से लेकर 29/30 अगस्त की रात को पैंगोंग त्सो (PangongTso) में हुए घटनाक्रम से समझा जा सकता है।

भारत सीमा पर चीनी सेना को सख्त जवाब देने के लिए तैयार, अजीत डोभाल के साथ मीटिंग में तय हुई व्यापक रणनीति: रिपोर्ट

29-30 अगस्त को भारत और चीन की सेना के बीच पैंगोंग त्सो झील के दक्षिणी तट पर झड़प हुई थी। लेकिन, इस बार चीनी सेना अपने उद्देश्य में कामयाब नहीं हो पाई। भारतीय सेना ने उन्हें मौके से खदेड़ दिया था। टकराव के इस मुद्दे को सुलझाने के लिए दोनों देशों के बीच चोशुल में ब्रिगेड कमांडर स्तर की एक बैठक भी हुई है। दोनों देशों की सरकारों के प्रतिनिधियों ने भी इस मुद्दे पर अपना-अपना पक्ष रख दिया है। इस मुद्दे पर राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल की अध्यक्षता में एक उच्च स्तरीय बैठक भी हुई है।   

सोमवार (30 अगस्त 2020) को हुई इस बैठक में खुफ़िया एजेंसी समेत सेना के कई दिग्गज अधिकारी शामिल हुए थे। उन्होंने दोनों देशों की सेना के बीच हुए इस टकराव के संबंध में चर्चा की। इंटेलिजेंस ब्यूरो के निदेशक अरविन्द कुमार और रॉ के सचिव सामंथ गोयल ने विश्लेषण दिया कि आगामी महीनों में चीन की तरफ से क्या गतिविधियाँ हो सकती हैं। इस बैठक में केंद्रीय गृह सचिव अजय भल्ला भी मौजूद थे। 

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, एक वरिष्ठ अधिकारी ने बैठक के दौरान कहा हम चीन के इस प्रयास को नाकाम करने में सफल हुए। लेकिन हम इस मामले पर चर्चा कर चुके थे कि आने वाले समय में हमारी रणनीति क्या होगी। उन्होंने यह भी कहा कि भारत एलएसी पर ज़्यादा संख्या में सुरक्षाबल तैनात करेगा। चीन भी हमारे विरुद्ध यही रणनीति अपना सकता है इसलिए हमें पूरी तरह तैयार रहना होगा। इंटेलिजेंस एजेंसी द्वारा किए गए मूल्यांकन के अनुसार कई चोटी नुमा क्षेत्रों में चीन की मज़बूत पकड़ है। 

उस क्षेत्र के दक्षिणी इलाके की दो ऊँची जगहों पर चीन का कब्ज़ा है, जिसमें चोशुल और पैंगोंग त्सो झील मुख्य हैं। एक नौकरशाह ने कहा अगर चीनी सेना की तरफ से एलएसी पर कोई भी संदिग्ध गतिविधि होती है तो भारतीय सेना को उसके लिए तैयार रहना होगा। उन्होंने बेहद स्पष्ट तौर पर कहा कि किसी भी तरह का विवाद होने पर भारतीय सेना तैयार है। ख़बरों की मानें तो सरकारी सूत्रों के मुताबिक़ रेज़ंग ला समेत कई संवेदनशील इलाकों में सेना भेजी गई है। सोमवार को लद्दाख के राज्यपाल राधा कृष्ण कुमार ने राज्य मंत्री जीके रेड्डी से दिल्ली में इस मुद्दे पर मुलाक़ात की थी। उन्होंने इस मामले पर एक रिपोर्ट दी कि भारतीय सेना की तरफ से सीमा पर तनाव ख़त्म करने के लिए क्या प्रयास किए जा रहे हैं।

इसके अलावा रक्षा मंत्रालय ने भी चीन की तरफ से बढ़ती हुई गतिविधियों को देख कर ठोस कदम उठाए हैं। रक्षा मंत्रालय ने पिनाका मल्टी लॉन्च आर्टिलरी रॉकेट सिस्टम की 6 रेजिमेंट के लिए 2580 करोड़ रुपए के समझौते पर मोहर लगाई। इसकी मारक क्षमता लगभग 40 किलोमीटर है। इन 6 पिनाका रेजिमेंट में 114 लांचर और ऑटोमेटेड मशीन गन भी हैं। इस पूरी यूनिट में BEML के 330 सशस्त्र वाहन भी शामिल हैं। 

US-India Strategic Partnership Forum (USISPF) को संबोधित करते हुए विदेश मंत्री जयशंकर ने भी इस मुद्दे पर कई अहम बातें कहीं। उन्होंने कहा, “भारत अपने पड़ोसी देश चीन के विस्तार से अच्छी तरह परिचित है। लेकिन चीन को भी यह भूलना नहीं चाहिए कि भारत ने भी काफ़ी ऊँचाई हासिल की है।” इसके अलावा भारतीय सेना ने चीनी सेना की तरफ से हुई घुसपैठ के बाद पैंगोंग त्सो झील के दक्षिणी तट के ऊँचाई वाले हिस्सों पर कब्ज़ा किया। 

चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) ने सोमवार (अगस्त 31, 2020) को पूर्वी लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) के पास पैंगोंग त्सो में गतिरोध के लिए भारतीय सेना को दोषी ठहराया था और ‘आग्रह’ कर रहा था कि भारत अपने सैनिकों को क्षेत्र से वापस जाने के आदेश दे। सोमवार देर शाम जारी एक बयान में, पीएलए के पश्चिमी थिएटर कमांड (डब्ल्यूटीसी) ने आरोप लगाया कि भारतीय सैनिकों ने एलएसी का उल्लंघन किया था। 

पैंगोंग त्सो के दक्षिण बैंक और रेकिन पास को क्रॉस कर आगे बढ़ रहे थे। उन्होंने यह भी कहा कि पीएलए जवाबी कार्रवाई कर रही है। सरकारी समाचार एजेंसी शिन्हुआ (Xinhua) ने डब्ल्यूटीसी के प्रवक्ता सीनियर कर्नल झांग शुइली के हवाले से कहा था, “31 अगस्त को भारतीय सेना ने दोनों पक्षों के बीच पिछली बहु-स्तरीय वार्ता में हुई सहमति को तोड़ा और गैरकानूनी रूप से पैंगोंग के दक्षिणी तट के पास फिर से लाइन पार की, इन कारणों से सीमा पर तनाव पैदा हो रहा है।”

गौरतलब है कि 29 और 30 अगस्त की रात को चीनी सैनिकों ने भारतीय सीमा क्षेत्र में फिर से घुसपैठ की कोशिश की थी। हालाँकि, उन्हें मुँह की खानी पड़ी थी। भारतीय सैनिकों ने पैंगोंग त्सो (PangongTso) के दक्षिण तट पर घुसपैठ कर रहे चीनी सैनिकों को खदेड़ दिया था। भारतीय सेना के पीआरओ, कर्नल अमन आनंद ने सोमवार (31 अगस्त) को कहा कि पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA, चायनीज सैनिक) के सैनिकों ने 29 और 30 अगस्त (शनिवार और रविवार) की रात को पैंगोंग त्सो झील के दक्षिणी तट पर दोनों देशों के बीच बनी आम सहमति का उल्लंघन किया। कर्नल अमन आनंद ने बताया, “29/30 अगस्त की रात को, पीएलए सैनिकों ने दोनों देशों के बीच चल रही राजनयिक व्यस्तताओं के दौरान पिछली सर्वसम्मति का उल्लंघन किया और सीमा-स्थिति को बदलने के लिए उत्तेजक सैन्य एक्शन को अंजाम दिया।”

…जब RSS के मंच से प्रणब मुखर्जी ने भरी थी ‘राष्ट्रवाद’ की हुँकार

पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी का सोमवार (31 अगस्त 2020) को देहांत हो गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक भावुक संदेश में उन्हें कद्दावर स्टेट्समैन बताते हुए कहा है कि उन्होंने देश की विकास यात्रा में अपनी अमिट छाप छोड़ी। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) ने इसे अपूरणीय क्षति बताया है।

भारत रत्न प्रणब मुखर्जी ने 2018 में संघ के एक कार्यक्रम में बतौर मुख्य अतिथि शिरकत की थी। ‘संघ शिक्षा वर्ग-तृतीय’ नामक यह कार्यक्रम 7 जून 2018 को नागपुर के संघ मुख्यालय में हुआ था। प्रणब मुखर्जी के इस फैसले ने कॉन्ग्रेस को भी असहज कर दिया था। लेकिन उस दिन देश के प्राचीन इतिहास से लेकर उसकी संस्कृति तक प्रणब मुखर्जी ने जो कुछ कहा, वह बीते कल में भी प्रासंगिक था और आने वाले कल में भी प्रासंगिक रहेगा।  

प्रणब मुखर्जी की संघ के कार्यक्रम में उपस्थिति और भाषण ने देश को एक बड़ी बहस की ठोस ज़मीन दी थी। लोगों के लिए यह हैरान करने वाला था कि आखिर ऐसा हुआ कैसे? उन्होंने अपनी विचारधारा के विपरीत इतना बड़ा फैसला कैसे लिया? कुछ का मानना था कि वह इतिहास के प्राचीन पन्नों में इंगित धुँधली गाथाओं में उलझे रह गए। इसके उलट कुछ का कहना था कि वह मात्र भारत की गौरवगाथा का व्याख्यान था। इस प्रकार की तमाम प्रतिक्रियाएँ नज़र आईं लेकिन जो नहीं नज़र आया वह था उनकी मौजूदगी और बातों के असल मायने।

प्रणब मुखर्जी ने अपने संबोधन में भारत शब्द का उल्लेख कुल 27 बार किया। तीन बार हिन्दी में भारत कहा और 24 बार India। 12 बार Nationalism यानी राष्ट्रवाद का जिक्र किया। 9 बार Nation यानी देश और 5 बार Patriotism अर्थात देशभक्ति की बात की।

इनसे स्पष्ट होता है कि सम्पूर्ण भाषण में उनके विचारों की प्राथमिकता किस ओर थी? सीधा सा अर्थ है यदि देश के पहले पहले नागरिक को राष्ट्रवाद शब्द पर इतना ज़ोर देना पड़ा तो अब तक हम वाकई में इस शब्द के अर्थ के दायरे से कोसों दूर थे और हैं भी। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या राष्ट्रवाद को समझने के हमारे पैमाने सही हैं? यह ऐसा शब्द है जिसकी परिभाषा देने का प्रयास अनेक लोगों ने किया, लेकिन सवाल यह है कि उनमें से कितने सफल रहे? प्रणब मुखर्जी ने इस शब्द की अहमियत समझते हुए सुनने और समझने वालों को निराश नहीं किया। इसलिए उन्होंने सर्वप्रथम उन दार्शनिकों का उल्लेख किया जिन्होंने भारत की समृद्धता को समझने के शुरुआती क़दम उठाए।

इसके बाद उन्होंने देश के प्राचीन शिक्षण संस्थानों तक्षशिला, नालंदा और विक्रमशिला का उल्लेख किया और कहा कि इस प्राचीन विश्वविद्यालय व्यवस्था का 1800 वर्षों से अधिक समय तक विश्व में वर्चस्व था। इतने दुर्लभ तथ्यों का अर्थ मात्र इतना सा था कि हम हमेशा से सम्पन्न, प्रबुद्ध, अखंड और प्रबल रहे हैं। जहाँ चंद्रगुप्त मौर्य और चक्रवर्ती सम्राट अशोक सरीखे राजाओं के हाथ में कमान रही। ‘राष्ट्रवाद’ हमारी संस्कृति का अटूट हिस्सा है।  

उन्होंने कहा कि बारहवीं शताब्दी में तरायण का युद्ध हार कर इस देश ने 600 वर्षों का आततायी मुग़ल शासन झेला। उसके बाद भी उस संस्कृति की तमाम अच्छाइयाँ इस देश ने स्वयं में समाहित की। इतना ही नहीं अंग्रेजों के देश को तबाह करने के प्रयास के बावजूद इस देश ने अपना असल स्वरूप नहीं खोया।

प्रणब मुखर्जी ने कहा था कि सबके लिए ज़रूरी है कि लोगों का लोगों से “संवाद” बना रहे। इसलिए कहा गया है “to the people, for the people, by the people”। एक सौ बीस करोड़ से अधिक आबादी, 122 भाषाओं और 7 मुख्य धर्मों वाले इस देश की अखंडता हमेशा बनी रहनी चाहिए।

सत्य यही है कि अपना जीवन एक विचारधारा को समर्पित कर देने के बाद अंत में एकदम उलट विचारों वाले लोगों के बीच आकर ऐसी बातें कहना अद्भुत निर्णय था। किसी और नेता के लिए ऐसा कल्पना करना भी असम्भव है।

हमारे इलाके में दाखिल हो गए हैं भारतीय सैनिक, उन्हें वापस बुलाया जाए: चीन

चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) ने सोमवार (अगस्त 31, 2020) को पूर्वी लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) के पास पैंगोंग त्सो में गतिरोध के लिए भारतीय सेना को दोषी ठहराया है और ‘आग्रह’ कर रहा है कि भारत अपने सैनिकों को क्षेत्र से वापस जाने के आदेश दे।

सोमवार देर शाम जारी एक बयान में, पीएलए के पश्चिमी थिएटर कमांड (डब्ल्यूटीसी) ने आरोप लगाया कि भारतीय सैनिकों ने एलएसी का उल्लंघन किया और पैंगोंग त्सो के दक्षिण बैंक और रेकिन पास को क्रॉस कर आगे बढ़ रहे हैं। उन्होंने यह भी कहा कि पीएलए जवाबी कार्रवाई कर रही है।

सरकारी समाचार एजेंसी शिन्हुआ (Xinhua) ने डब्ल्यूटीसी के प्रवक्ता सीनियर कर्नल झांग शुइली के हवाले से कहा, “31 अगस्त को भारतीय सेना ने दोनों पक्षों के बीच पिछली बहु-स्तरीय वार्ता में हुई सहमति को तोड़ा और गैरकानूनी रूप से पैंगोंग के दक्षिणी तट के पास फिर से लाइन पार की, इन कारणों से सीमा पर तनाव पैदा हो रहा है।”

झांग ने कहा है कि चीन ने भारतीय सेना के इस कदम का कड़ा विरोध किया है और यह चीन की क्षेत्रीय संप्रभुता का घोर उल्लंघन है। इससे चीन-भारत सीमा क्षेत्रों में अशांति पैदा हो रही है और धोखा किया जा रहा है। झांग के अनुसार, भारत को अपने सीमावर्ती सैनिकों को रोकना चाहिए और इस क्षेत्र से हटना चाहिए। उन्होंने कहा कि चीन किसी भी सम्भावित परिस्थिति के लिए तैयारियाँ कर रहा है।

भारतीय सेना के बयान पर एक सवाल के जवाब में चीनी विदेश मंत्रालय ने कहा कि पीएलए के सैनिक कभी भी लाइन पार नहीं करते हैं। भारतीय सेना ने सोमवार सुबह ही चीनी सेना पर समझौते के उल्लंघन का आरोप लगाया था।

वहीं, राष्ट्रीय सुरक्षा विश्लेषक नितिन गोखले ने कहा है कि 29-30 अगस्त की रात को भारतीय सेना ने संदिग्ध पीएलए गतिविधियों पर ध्यान दिया, जिसके जवाब में वे दक्षिण बैंक ऑफ पैंगोंग त्सो में एलएसी पर चले गए। उन्होंने कहा कि भारतीय सैनिकों ने एलएसी का उल्लंघन नहीं किया था।

बताया जा रहा है कि भारत ने यह स्पष्ट कर दिया है कि चीन को सीमा से पूरी तरह से सेना को हटाना होगा और इसके लिए पीएलए को अपनी 20 अप्रैल की स्थिति में लौटना होगा। भारतीय सेना के बयान पर एक सवाल के जवाब में चीनी विदेश मंत्रालय ने कहा कि पीएलए के सैनिक कभी भी लाइन पार नहीं करते हैं।

गौरतलब है कि तनाव की यह स्थिति 29 अगस्त को पैंगोंग त्सो झील के दक्षिणी किनारे पर चीनी सेना द्वारा किए गए सैन्य आक्रमण की घटना के बाद देखी गई है। चीनी सेना की 200 मजबूत दल 29 अगस्त को लगभग 11 बजे भारतीय सेना के पैंगोंग त्सो स्थानों के पास पहुँच गई थी। यहाँ पर चीनी सेना भारतीय सेना से उलझ गई और दोनों सेनाओं के बीच हिंसक झड़प हुई।

वहीं, चीनी मुखपत्र ग्लोबल टाइम्स ने भी भारतीय सेना पर सीमा क्रॉस करने के आरोप लगाए हैं। ग्लोबल टाइम्स के अनुसार, चीन ने भारत से आग्रह किया है कि वह भारतीय सेना को वापस लौटने के आदेश दे।

ग्लोबल टाइम्स के प्रधान संपादक जिजिन ने एक ट्वीट में कहा कि पैंगोंग त्सो झील का दक्षिणी तट चीन के वास्तविक नियंत्रण में है और इस मामले पर पीएलए के बयान में दावा किया गया है कि भारतीय सैनिकों ने दक्षिण तट में KAC को अवैध रूप से पार कर चीन की संप्रभुता का गंभीर उल्लंघन किया है। हु जिजिन ने भी अपने ट्वीट में जवाबी कार्रवाई की आशंका का जिक्र किया है।

5 अक्टूबर को दोपहर 2 बजे विजय माल्या हाजिर हो: भगोड़े की पुनर्विचार याचिका सुप्रीम कोर्ट ने खारिज की

अवमानना मामले में दोषी पाए गए भगोड़े कारोबारी विजय माल्या को सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका लगा है। सुप्रीम कोर्ट ने भगोड़े व्यापारी विजय माल्या को पाँच अक्टूबर को दोपहर 2 बजे व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने का निर्देश दिया है। इसके साथ ही कोर्ट ने गृह मंत्रालय को भी उस दिन कोर्टरूम में माल्या की उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिए कहा है।

बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने विजय माल्या की उस याचिका को खारिज कर दिया है, जिसमें उसने अदालत की अवमानना मामले में 2017 में सुनाए गए आदेश पर पुनर्विचार का अनुरोध किया गया था। जस्टिस यूयू ललित और जस्टिस अशोक भूषण की एक बेंच ने मामले पर सुनवाई करते हुए कहा, ‘‘हमें इस पर पुनर्विचार करने का कोई आधार नजर नहीं आता। इसलिए यह पुनर्विचार याचिका खारिज की जाती है।’’

न्यायमूर्ति यूयू ललित की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा, “अब जबकि रिव्यू पेटिशन खारिज हो गई है, हम प्रतिवादी नंबर 3 (माल्या) को इस कोर्ट में 05.10.2020 को दोपहर 02:00 बजे पेश होने का निर्देश देते हैं। गृह मंत्रालय को उस दिन इस न्यायालय के समक्ष प्रतिवादी नंबर 3 की उपस्थिति को सुगम बनाने और सुनिश्चित करने का निर्देश भी दिया जाता है। इस निर्णय की एक प्रति गृह मंत्रालय को भेजी जाती है।”

सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश माल्या द्वारा 14 जुलाई, 2017 के फैसले के खिलाफ दायर एक समीक्षा याचिका पर आया है। माल्या को बार-बार निर्देश दिए जाने के बावजूद बैंकों को 9,000 करोड़ रुपए का भुगतान न किए जाने का अवमानना का दोषी पाया गया था।

वहीं 19 जून को सुप्रीम कोर्ट ने माल्या की अपील के संबंध में उसकी रजिस्ट्री से स्पष्टीकरण माँगा था। पीठ ने कहा था कि इससे पहले के रिकॉर्ड के अनुसार, समीक्षा याचिका पिछले तीन सालों से कोर्ट में सूचीबद्ध नहीं थी।

27 अगस्त को इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था। भगोड़े कारोबारी माल्या ने सुप्रीम कोर्ट के नौ मई 2017 के उस आदेश पर पुनर्विचार के लिए याचिका दायर की थी, जिसमें उसे न्यायिक आदेशों को दरकिनार कर अपने बच्चों के खातों में चार सौ मिलियन अमेरिकी डॉलर ट्रांसफर करने पर अदालत की अवमानना का दोषी करार दिया गया था।

नौ हजार करोड़ रुपए से अधिक के बैंक कर्ज धोखाधड़ी मामले में आरोपित माल्या फिलहाल ब्रिटेन में है। शीर्ष अदालत ने 2017 में स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के नेतृत्व वाले बैंकों के समूह की याचिका पर वह आदेश दिया था। याचिका में कहा गया था कि माल्या ने कथित रूप से विभिन्न न्यायिक आदेशों का ”खुलेआम उल्लंघन” कर ब्रिटिश कंपनी डियाजियो से प्राप्त 40 मिलियन यूएस डॉलर अपने बच्चों के खातों में ट्रांसफर किए थे।

भारतीय एजेंसियाँ उसके प्रत्यर्पण की कोशिश में जुटी हैं। लंदन हाईकोर्ट ने इस साल 14 मई को उस अर्जी को भी खारिज कर दिया, जिसमें माल्या ने प्रत्यर्पण के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील करने की इजाजत माँगी थी। इसके बाद माल्या के पास कोई कानूनी विकल्प नहीं बचा है।

तमिलनाडु: नई शिक्षा नीति के खिलाफ कैथोलिक संस्थाओं का अभियान, लोगों ने बताया खतरनाक ट्रेंड

तमिलनाडु में रोमन कैथोलिक संस्थानों ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 (NEP) के विरोध में अभियान शुरू किया है। डीएमके समेत कई विपक्षी राजनीतिक दल और गैर सरकारी संगठन इस अभियान में उनका साथ भी दे रहे हैं। बीते दिन (30 अगस्त 2020) रोमन कैथोलिक संस्थानों ने इस अभियान की शुरुआत सोशल मीडिया पर की और कहा कि तमिलनाडु में NEP 2020 न लागू की जाए। इंटरनेट यूज़र्स ने इस अभियान को ‘खतरनाक ट्रेंड’ बताते हुए इसकी खूब आलोचना की है।  

इस अभियान की शुरुआत तब हुई जब मद्रास और मल्लापोर के आर्कबिशप जॉर्ज एंटनी सैमी ने कैथोलिक शिक्षण संस्थाओं, शिक्षकों और छात्रों को नई शिक्षा नीति का बहिष्कार करने के लिए कहा। उन्होंने इस अभियान की शुरुआत फेसबुक से की इसके बाद कई सोशल मीडिया माध्यमों पर अपना विरोध दर्ज कराया। इस अभियान की अगुवाई तमिलनाडु कैथोलिक एजुकेशनल एसोसिएशन (TANCEAN) ने की। यह संस्था NEP का विरोध उस वक्त से कर रही है, जब केंद्र सरकार ने साल 2016 में इसका पहला ड्राफ्ट जारी किया था।

इसके पहले 16 अगस्त को भी इन संस्थाओं ने NEP के विरोध में अभियान चलाया था। इसमें तमाम राजनीतिक दल भी शामिल थे, उनका कहना था कि नई शिक्षा नीति को लागू करना बेहद निराशाजनक है। TANCEAN ने इस बारे में स्पष्ट राय नहीं दी थी कि उन्हें नई शिक्षा नीति के किस पहलू से परेशानी है। TANCEAN ने बिना कोई तार्किक आलोचना किए कहा कि NEP हिंदुत्व को बढ़ावा देती है।   

तमिलनाडु में नई शिक्षा नीति का विरोध
आर्कबिशप जॉर्ज एंटनी सैमी (साभार: यूट्यूब)

एंटनी सैमी ने मीडिया से बात करते हुए कहा टीएसआर कमेटी के 4 से 5 नौकरशाह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की पृष्ठभूमि से थे। उनकी माँग थी कि NEP को फिर से ड्राफ्ट किया जाए। ख़ास तौर पर इन्होंने योग और वैदिक शिक्षा दीक्षा को शामिल किए जाने पर भी विरोध जताया। NEP का ड्राफ्ट तैयार होने के बाद से ही डीएमके समेत तमिलनाडु के कई विपक्षी दल इसका विरोध करने में जुट गए थे। विरोध करने वाले राजनीतिक दलों का यह भी आरोप था कि इसमें देश के सभी लोगों पर हिंदी थोपी जा रही है।

केंद्र सरकार इस मामले में पर अपना स्पष्ट मत रख स चुकी है। उनका कहना है कि NEP में एक व्यक्ति को बहुभाषीय बनाने पर ज़ोर दिया गया है। जिससे वह ज़्यादा से ज़्यादा भाषा सीख और समझ सके, यानी उस पर कोई एक भाषा थोपी नहीं गई है। TANCEAN के नेतृत्व में तमाम ईसाई समूहों ने सीएए का भी विरोध किया था।

स्वराज्य में प्रकाशित ख़बर के अनुसार जब इस संस्था के सदस्य से संपर्क करने की कोशिश की गई तब उसने इस मुद्दे पर टिप्पणी करने से मना कर दिया। जब उनसे यह पूछा गया कि उनके हिसाब से NEP 2020 में क्या दिक्कत है? तब उसने कहा ‘भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय सचिव एच राजा जैसे नेता गोपनीय मुद्दों को ट्विटर पर सार्वजनिक बना देते हैं। जिसके बाद बेमतलब के विवाद पैदा होते हैं।’ 

इसके बाद उनसे यह भी पूछा गया कि आखिर क्यों चर्च केंद्र सरकार के प्रस्ताव (सीएए) का विरोध कर रहे थे, जिसका फायदा खुद ईसाई समुदाय को भी मिलना है। इस पर संबंधित व्यक्ति ने कहा, “मैं किसी भी तरह की बहस में नहीं पड़ना चाहता हूँ। हमने यूट्यूब में इस मुद्दे पर अपना पक्ष रखा है आप वहाँ से जानकारी ले सकते हैं।”

इस मुद्दे पर कुछ लोगों का यह भी कहना है कि तमिलनाडु में अगले साल मई महीने में चुनाव होने हैं। इसलिए हर संगठन केंद्र सरकार से जुड़े किसी भी मुद्दे पर राजनीति करने का कोई मौक़ा नहीं छोड़ना चाहते। सोशल मीडिया पर आर्कबिशप द्वारा NEP के विरोध में चलाया गया अभियान उसका ही एक उदाहरण था।