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अब नहीं बचा श्रीनगर का एक भी आतंकवादी, इससे पहले आतंकी मुक्त हुए थे त्राल और डोडा

जम्मू कश्मीर में आतंकवाद के खिलाफ जारी अभियान में बड़ी कामयाबी हाथ लगी है। कश्मीर पुलिस ने बताया है कि अब श्रीनगर जिले का एक भी आतंकी जिंदा नहीं बचा है।

जिले का आखिरी आतंकी लश्कर कमांडर इशफाक रशीद खान था। उसे शनिवार को एक अन्य आतंकी के साथ मार गिराया गया था।

जम्मू-कश्मीर पुलिस ने अपने ट्विटर हैंडल से जानकारी देते हुए कहा है कि श्रीनगर जिले का कोई भी आतंकी अब कश्मीर में सक्रिय नहीं है। श्रीनगर जिले का रहने वाला एक ही आतंकी बचा हुआ था जिसे सुरक्षाबलों ने शनिवार को श्रीनगर के बाहरी इलाके मे मार गिराया है। मारे गए आतंकी का नाम इशफाक रशीद खान था जो लश्कर का टॉप कमांडर था।

जम्मू-कश्मीर में पिछले कुछ महीनों से आतंकियों का सफाया करने के लिए सेना ने ऑपरेशन चलाया हुआ है। जिसमें इस साल अब तक 138 आतंकी मारे गए हैं। इनमें आतंकी संगठनों के टॉप कमांडर भी शामिल हैं। सेना द्वारा किए गए लगातार एनकाउंटर और सर्च ऑपरेशन ने घाटी में आतंकियों की कमर तोड़ दी है।

कुछ दिन पहले जम्मू-कश्मीर के पुलिस महानिदेशक (DG) दिलबाग सिंह ने आतंकियों के खिलाफ चलाए जा रहे तलाशी अभियान को लेकर एक प्रेस कॉन्फ्रेंस किया था। उन्होंने जानकारी दी थी कि, “ऑपरेशन बहुत सफल रहे हैं। इनमें से ज्यादातर ऑपरेशन क्लीन हैं। एक आतंकवादी को मारने से कोई खुशी नहीं मिलती है, लेकिन तथ्य यह भी है कि बंदूक थामने वाला शख्स सभी के लिए खतरा है। हम इस खतरे को अनदेखा नहीं कर सकते। मुझे यह कहते हुए खुशी हो रही है कि नई भर्ती (आतंकी) में भारी कमी आई है।”

गौरतलब है कि, जम्मू-कश्मीर में पारिंपोरा के रणबीरगढ़ इलाके में सुरक्षाबलों ने शनिवार (25 जुलाई, 2020) सुबह हुई एक मुठभेड़ में लश्कर-ए-तैयबा के 2 आतंकियों को ढेर कर दिया था। इनमें एक लश्कर का टॉप कमांडर इशफाक राशिद था। दूसरे आतंकी का नाम एजाज अहमद था।

मारा गया आतंकी इशफाक राशिद श्रीनगर के सोजिथ इलाके में रहने वाला था। इशफाक लश्कर-ए-तैयबा का टॉप कमांडर था। वह 2018 में लश्कर का टॉप कमांडर बना था। उसका ठिकाना श्रीनगर था।

इससे पहले जून में पुलिस ने पुलवामा जिले के त्राल को हिजबुल मुजाहिद्दीन के आतंकियों से पूर्ण रूप से मुक्त कराने और श्रीनगर के डोडा इलाके को आतंकी मुक्त करवाने की जानकारी दी थी।

मोहम्मद इस्माइल को ‘फेक बाबा’ बता मीडिया ने दिया ‘हिंदू स्पिन’, कोरोना इलाज के नाम पर लोगों को देता था धोखा

साइबराबाद पुलिस ने लोगों को धोखा देने के आरोप में 50 वर्षीय मोहम्मद इस्माइल और उसके सहयोगी को गिरफ्तार किया है। वह कथित रूप से जनता को धोखा दे रहा था और दावा कर रहा था कि वह कोरोना वायरस का इलाज कर सकता है।

इस्माइल को शनिवार (जुलाई 25, 2020) को गिरफ्तार किया गया। पुलिस ने इस्माइल पर धोखाधड़ी और महामारी अधिनियम की प्रासंगिक धाराओं के तहत आरोप लगाया है।

वह हाफिज़पेट के मार्तंडा नगर में मरीजों के घर पर जाकर उनका ‘इलाज’ किया करता था। उसकी प्रथाओं के बारे में जानने के बाद, पुलिस ने मामले का स्वत: संज्ञान लिया और इस्माइल और उसके साथियों को गिरफ्तार कर लिया। मियापुर पुलिस स्टेशन के इंस्पेक्टर एस वेंकटेश ने बताया कि इस्माइल और उसके सहयोगी के खिलाफ बयान देने के लिए दो पीड़ित सामने आए हैं।

वह अपनी विशेष प्रार्थनाओं का उपयोग करके मौसमी बुखार को ठीक करने के लिए प्रसिद्ध था और पिछले चार वर्षों से सक्रिय था। जब कोविड -19 महामारी ने देश में अपनी जड़ें फैलानी शुरू कीं, तो उसने इसी का इलाज करने का दावा करना शुरू कर दिया। उसने व्हाट्सएप ग्रुपों पर भी अपना सन्देश फैला रखा था।

मरीजों के परिवार की आर्थिक स्थिति के आधार को देखते हुए ‘उपचार’ के लिए 5000 से 50000 रुपए तक वसूलता था। हाल ही में उसने घातक बीमारी का इलाज करने के बहाने एक मरीज से 40,000 रुपए ऐंठे थे। उसने दावा किया कि ऐसी बीमारियों को ठीक करने के लिए उनके पास असाधारण शक्तियाँ मौजूद हैं।

पुलिस ने लोगों से अनुरोध किया है कि अगर उन्हें कोरोना वायरस के लक्षण दिखते हैं तो डॉक्टर से संपर्क करें, न कि किसी धर्मगुरु से।

हालाँकि एक बात जो इस गिरफ्तारी के बारे में नहीं बदली, वह यह है कि लगभग हर मेनस्ट्रीम मीडिया हाउस ने इसे फकीर या मौलवी कहने के बजाय कोरोना बाबा या फेक बाबा कहकर हिंदू स्पिन देने की कोशिश की। वैसे यह पहली बार नहीं है जब मीडिया ने गलत तरीके से अंधविश्वास फैलाने के लिए हिंदू धर्म को बदनाम करने की कोशिश की है।

गौरतलब है कि मई 2020 में नई दुनिया समेत कई मीडिया पोर्ट्ल्स ने हेडलाइन में आलिम की जगह ‘तांत्रिक’ शब्द का प्रयोग किया। साथ ही जादू-टोना करने वाले मौलवी की जगह एक पुजारी का स्केच लगा दिया था।

ऐसे ही एक अन्य मामले में अनवर खान निकाह हलाला के नाम पर एक युवती का बलात्कार करता है। पुलिस के सामने उसने अपना गुनाह भी कबूला है। महिला उसके खिलाफ नामजद FIR करती है। लेकिन NDTV जैसे न्यूज़ चैनल चूँकि अपराधी मुस्लिम है तो उसे ‘तांत्रिक’, ‘बाबा’, ‘धर्मगुरु’ जैसे शब्दों का प्रयोग करते हुए मामले को स्पिन देकर तथाकथित सामाजिक सौहार्द बनाए रखने की कोशिश करता है।

नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी की कारस्तानी, ऑनलाइन पेपर में कश्मीर पर बताया भारत का कब्जा

सोशल मीडिया में प्रश्न पत्र वायरल हो रहा है। यह नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी, दिल्ली के द्वितीय सेमेस्टर का ऑनलाइन मूल्यांकन पत्र है। इसमें कश्मीर के लिए उसी तरह की भाषा का इस्तेमाल किया गया है जैसा पाकिस्तान करता है।

वायरल प्रश्न पत्र में भारत के अभिन्न हिस्से कश्मीर को ‘भारत अधिकृत कश्मीर’ (Indian Occupied Kashmir) बताया गया है।

सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा प्रश्न पत्र

इस मूल्यांकन पत्र के वायरल होने के बाद सोशल मीडिया पर बहस छिड़ गई है। सोशल मीडिया पर तो कई लोग मूल्यांकन पत्र तैयार करने वाले प्रोफेसर के खिलाफ कार्रवाई की भी माँग कर रहे हैं।

सोशल मीडिया में दावा किया जा रहा है कि इस मूल्यांकन पत्र को प्रोफेसर विनोद कुमार ने जुलाई में LLM के छात्रों के लिए तैयार किया था। प्रोफेसर विनोद कुमार, नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी में सेंटर फॉर ह्यूमन राइट्स एंड सबाल्टर्न स्टडीज़ के निदेशक हैं। सोशल मीडिया पर दावा किया जा रहा है कि यह प्रश्न पत्र 2019 के बैच के छात्रों के लिए तैयार किया गया था, जिसका ऑनलाइन टेस्ट 2020 में हुआ।

ट्विटर पर लोगों ने इसके लिए उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया को भी घेरा है, क्योंकि यह उनके विभाग के ही अधीन आता है। बता दें कि मनीष सिसोदिया के पास फिलहाल शिक्षा, उच्च शिक्षा, जन निर्माण विभाग (पीडब्ल्यूडी), शहरी विकास, स्थानीय निकाय, भूमि एवं भवन तथा रेवेन्यू विभाग हैं।

सोशल मीडिया पर लोगों ने इस पत्र को शेयर करते हुए दिल्ली पुलिस से इनके खिलाफ एक्शन लेने की अपील की है। लोगों का कहना है कि इनके और पड़ोसी मुल्क के रवैये में कोई अंतर नहीं है। लोगों ने तो यहाँ तक कह दिया कि ये किसी गद्दार से कम नहीं हैं। इनके खिलाफ सख्त कार्रवाई होनी चाहिए।

एक सोशल मीडिया यूजर्स ने कहा कि ये गलती नहीं, बल्कि प्लान्ड है। वहीं एक अन्य यूजर ने लिखा, “ये देखिए सर, क्या हो रहा है। ये शिक्षक अपना ही देश तोड़ने जैसी चीजें सिखाते हैं। आज अरेस्ट नहीं किया तो कल ये आपके बच्चों को भी गलत सिखाएँगे और उनके बच्चों को भी और उनके घर भी तुड़वा देंगे। कुछ कार्रवाई कर दीजिएगा।”

बता दें कि इससे पहले दिल्ली हाई कोर्ट ने नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी, दिल्ली में राष्ट्रीय राजधानी के छात्रों के लिए 50 प्रतिशत सीट आरक्षित रखने के फैसले पर रोक लगा दी थी। दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा था कि यथास्थिति बनाई रखी जाए। नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी प्रसाशन ने दिल्लीवासियों के लिए 50 फीसदी सीट आरक्षित कर दिए थे, जिस पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने इस पर रोक लगा दिया था।

वहीं मनीष सिसोदिया ने साफ किया था कि दिल्ली सरकार के अंतर्गत आने वाले विश्वविद्यालयों, जिसमें नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी भी शामिल है, में अब कोई परीक्षाएँ नहीं ली जाएँगी। परीक्षाओं के बिना पिछले वर्ष या पिछले सेमेस्टर के अंकों के आधार पर छात्रों को डिग्री दे दी जाएगी। ताकि वे अपनी अगली कक्षाओं में पढ़ाई की तैयारी कर सकें, या जिन्हें नौकरी करना है, वे अपने भविष्य को ध्यान में रखते हुए आगे बढ़ सकें।

मेरे जैसों के लिए भारत घर था और हमेशा रहेगा: 1994 में अफगानिस्तान से आए सरदार इकबाल सिंह

अफगानिस्तान में पिछले कुछ वक्त में हिंदुओं और सिखों के साथ उत्पीड़न की कई घटनाएँ सामने आई है। इसके बाद भारत सरकार ने अफगानिस्तान के 700 सताए सिखों को जल्द ही देश लाने और आश्रय देने का फैसला किया है। खबरों के अनुसार सरकार सभी आवश्यक औपचारिकताओं को पूरा कर स्वतंत्रता दिवस से पहले इन्हें भारत लाने की तैयारी कर रही है।

सरकार ने 11 अफगान नागरिकों को 6 महीने का वीजा दिया है। ये आज (26 जुलाई, 2020) ही भारत पहुँचे हैं।

इसी अमन नाम के एक शख्स ने अपने ब्लॉग के लिए एक अफगान सिख का इंटरव्यू किया है। @Amaanbali नामक ट्विटर अकाउंट से उन्होंने इसे साझा किया है। इंटरव्यू देने वाले सरदार इकबाल सिंह अफगान गृहयुद्ध की शुरुआत में ही भारत आ गए थे। जब वे भारत आए थे तब उनकी बेटी लगभग एक साल की थी। उनके साथ उस समय 17 और परिवार भारत आए थे।

इकबाल सिंह ने अमन से कहा, “मैं अफगानिस्तान में गृह युद्ध शुरू होने के बाद 1994 में भारत आ गया। तब परिस्थियाँ अलग थीं और मुझे लगता है कि यह एक सही निर्णय था। मेरी शादी 1988 में हुई और उस वक्त मैं वहाँ से चला आया। तब जसप्रीत (बेटी) एक साल की थी। मैं नहीं चाहता था की जसप्रीत किसी भी तरह से परेशान हो। मुझे अब भी याद है कि मैंने जलालाबाद में अपने बैंक खातों को बंद कर उसमें मौजूद सभी पैसे निकाल लिए थे। यह एक भावनात्मक दिन था।”

इक़बाल सिंह ने बताया कि भारत में जीवन शुरू में मुश्किल था। शुरुआत में वे पश्चिमी दिल्ली में गुरुद्वारा सिंह साहेब में रहते थे। कुछ सालों में उनके पास बचे पैसे भी खर्च हो गए। हालाँकि, शुरुआती आठ वर्षों के बाद उनकी स्थित सामान्य हो गई थी।

वे कहते हैं, ” मैं एक भारतीय की तरह सामान्य जिंदगी मेट्रो शहर में गुजरने लगा। जो काम पर जाता है और शाम को अपने परिवार के पास वापस आता है। इसलिए शुरूआती 8 सालों में हुई परेशानियों को छोड़ कर मैं बाकी जिंदगी किसी अन्य व्यक्ति के समान ही जिया।”

उन्होंने कहा, “अग्रवाल साहब (जो करोल बाग में बैग बेचते हैं) उन्हीं समस्याओं का सामना करते हैं, जो मैं करता हूँ। हमारे साथ नस्लीय भेदभाव नहीं किया जाता है, न ही हमें कोई नीचा दिखाता है। भारतीय सिख समुदाय का अफगान सिखों के प्रति गहरा सम्मान है और वे हमेशा अफगानिस्तान के सिखों के लिए पूछते रहते हैं।”

इकबाल सिंह ने बताया कि अवैध संपत्ति पर कब्जा, अपहरण, हत्या, बलात्कार और धमकियाँ ऐसे ही कई मुद्दे थे, जिनका अफगान सिख सामना करते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि अगर वे तालिबान का सफाया कर देते हैं तो वे अफगानिस्तान में दोबारा बसने को तैयार हैं। लेकिन यह सिर्फ कल्पना मात्र है। उन्होंने कहा कि एक समय था जब उन्होंने एक अफगानी के रूप में संयुक्त राज्य अमेरिका को अराजकता के लिए दोषी ठहराया था। लेकिन अब, उन्हें लगता है कि दोनों पक्षों को दोषी ठहराया जाना चाहिए।

यह पूछे जाने पर कि वे भारत ही क्यों आए, इकबाल सिंह ने बताया कि पश्चिमी देशों में आर्थिक रूप से संपन्न लोगों ने पलायन किया। लेकिन मेरे जैसे मध्यम वर्ग के लोगों के लिए, भारत घर था और हमेशा रहेगा। उन्होंने यह भी बताया कि नागरिकता संशोधन अधिनियम से जुड़े सवालों का जवाब देने से वे बचते हैं, क्योंकि हालिया विरोध प्रदर्शनों के दौरान ऐसे कई मौके आए हैं जब उनके बयानों को गलत तरीके से पेश किया गया।

उन्होंने बताया कि हाल ही में दिल्ली एंटी सीएए प्रदर्शन के दौरान करोलबाग बाजार में काफी युवा लड़की और लड़के आते थे और सीएए पर हमारी राय माँगते थे। बाद में वे उसे बदल देते थे। इसके साथ ही हमने भारत सरकार को दस्तावेजों और पासपोर्ट बनाने के लिए धन्यवाद देते हुए एक वीडियो बयान भी दिया है। हम खुद को अब भारतीय कह सकते हैं। कुछ लोगों को इससे भी समस्या है।

इकबाल सिंह ने बताया कि जब वे भारत आए थे तो उन्हें मजबूरी के कारण अपनी संपत्ति को बाजार मूल्य से बहुत कम कीमत पर बेचना पड़ा था। अब वे एक मोबाइल रिपेयरिंग की दुकान के मालिक है। उनका मकान मालिक एक हिंदू है। उन्होंने यह भी बताया कि कभी-कभार किराया समय पर नहीं दे पाने पर मकान मालिक उनसे कोई जबरदस्ती नहीं करते।

बकौल इकबाल सिंह, भारत सरकार को अफगानिस्तान से आने वाले सिखों की स्थिति को सुधारने के लिए उनके फाइनेंसियल वेलफेयर का ध्यान रखना है। उन्होंने अफगानिस्तान से सिखों को भारत लाने पर भी खुशी जताई है।

आदित्य ठाकरे के बेस्ट फ्रेंड हैं करण जौहर, उन्हें पूछताछ के लिए नहीं बुलाया जाएगा: सुशांत सुसाइड केस पर टीम कंगना

बॉलीवुड अभिनेत्री कंगना रनौत ने उद्धव ठाकरे की शिवसेना-एनसीपी-कॉन्ग्रेस सरकार पर बड़ा आरोप लगाया है। उनका कहना है कि सुशांत सिंह राजपूत आत्महत्या मामले में मुंबई पुलिस फिल्म निर्देशक करण जौहर को कभी पूछताछ के लिए नहीं बुलाएगी, क्योंकि वे आदित्य ठाकरे के बेस्ट फ्रेंड हैं।

यह बात टीम कंगना ने सुमित ठाकुर नाम के ट्विटर यूजर के पोस्ट पर कमेंट करते हुए कही है। कंगना खुद सोशल मीडिया में नहीं हैं और @KanganaTeam नामक ट्विटर हैंडल से वे अपना पक्ष रखती रहती हैं। वहीं आदित्य ठाकरे महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे के बेटे और राज्य सरकार में मंत्री हैं।

टीम कंगना ने कहा है, “वे उन्हें कभी नहीं बुलाएँगे, क्योंकि वे आदित्य उद्धव ठाकरे के बेस्ट फ्रेंड हैं। यह उनकी सरकार है और उन्होंने कंगना के इंटरव्यू से पहले ही यह केस बंद कर दिया। यह इस बात का सबूत है कि वे अपने दोस्तों को बचा रहे हैं।”

ठाकुर ने करण जौहर की फोटो के साथ ट्वीट किया था, “35 दिन हो गए हैं और अब भी सबसे बड़े संदिग्ध करण जौहर को सुशांत सिंह राजपूत केस में पूछताछ के लिए नहीं बुलाया गया है। मैं एडवोकेट रसपाल सिंह रेणु के जरिए मुंबई पुलिस के खिलाफ बॉम्बे हाईकोर्ट में पीआईएल दाखिल कर रहा हूॅं ताकि सार्वजनिक हित में स्वतंत्र और निष्पक्ष जॉंच हो सके।”

सोशल मीडिया पर कई लोगों ने टीम कंगना के बयान का समर्थन किया है। इससे पहले यह खबर आई थी कि इस मामले में मुंबई पुलिस ने पूछताछ के लिए करण जौहर के मैनेजर को बुलाया है।

गायक सोनू निगम ने भी कंगना रनौत की सराहना की है। उन्होंने कहा कि कंगना इतनी मजबूत हैं, तभी वो अपने मन की बात इतने सही तरीके से बोल पाती हैं। सोनू निगम ने कहा कि उनके मन में कंगना के लिए काफी सम्मान है, क्योंकि पिछले 4-5 वर्षों से वो जो कर रही हैं, उसके लिए सोच में स्पष्टता होनी ज़रूरी है और साहस भी होना चाहिए। उन्होंने कंगना के उस आरोप का भी समर्थन किया, जिसमें उन्होंने महेश भट्ट पर चप्पल फेंकने का आरोप लगाया था।

बता दें कि फ़रवरी 2020 में कंगना रनौत की बहन रंगोली चंदेल फ़िल्म निर्माता एवं निर्देशक महेश भट्ट से जुड़ा एक वाकया बताया था। महेश भट्ट चाहते थे कि कंगना रनौत उनकी फ़िल्म में फिदायीन यानी आत्मघाती हमलावर का किरदार अदा करें। कंगना को ये रोल पसंद नहीं आया और उन्होंने इनकार कर दिया। महेश इस बात से इतने आग-बबूला हो गए कि उन्होंने कंगना को चप्पल दे मारी।

इधर बॉलीवुड अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की मौत की जाँच कर रही मुंबई पुलिस सोमवार (जुलाई 27, 2020) को फिल्म निर्देशक महेश भट्ट को पूछताछ के लिए बुलाएगी। महाराष्ट्र के गृह मंत्री अनिल देशमुख ने इसकी जानकारी दी है। अनिल देशमुख ने जोर देते हुए कहा कि निर्देशक को सुशांत की कथित आत्महत्या के संभावित कारणों की जाँच के तहत पुलिस के सामने गवाही देनी होगी।

इसके अलावा, फिल्म निर्माता करण जौहर के मैनेजर को भी तलब किया गया है। देशमुख ने कहा कि अगर जरूरत लगी तो खुद करण जौहर को भी हाजिर होने को कहा जा सकता है। उन्होंने कहा कि जाँच से पता चलेगा कि क्या फिल्म इंडस्ट्री में गुटबाजी है, जो फिल्म उद्योग में लोगों के उत्पीड़न का कारण बनता है, जैसा कि कंगना ने आरोप लगाया है।

सुशांत सिंह राजपूत आत्महत्या मामले में सीबीआई जाँच की माँग भी तेज़ होते जा रही है। पूर्व केंद्रीय मंत्री सुब्रमण्यन स्वामी ने पीएम मोदी को पत्र लिख कर ये माँग रखी है, जिसे प्रधानमंत्री द्वारा रिसीव कर लिया गया है। उन्होंने वकील ईशकरण भंडारी को इस मामले को देखने को कहा है। शेखर सुमन, शेखर कपूर और शत्रुघ्न सिन्हा सहित कई बड़ी फ़िल्मी हस्तियों ने इस माँग को दोहराया है। बिहार में इस घटना को लेकर खासा आक्रोश है।

ब्लूमबर्ग की एजेंडा पत्रकारिता: रामजन्मभूमि को अब भी विवादित कहने वालों- गाड़ी वाला आया माथे से भूसा निकाल

धर्म हमेशा से संवेदनशील मसला रहा है। संवेदनशील इसलिए क्योंकि इसके इर्द-गिर्द भ्रम ख़ूब फैलाए जाते हैं। ऐसा करता कौन है? जवाब हैरान करने वाला है, जिन्हें ऐसा नहीं करना चाहिए। समाचार समूह ब्लूमबर्ग ने अपनी रिपोर्ट में रामजन्मभूमि के लिए ‘Disputed’ यानी विवादित शब्द का इस्तेमाल किया है।

ख़बर देने वाले समूहों की बुनियाद ही इस बात पर टिकी होती है कि वे तथ्यों पर बात करें। जो सच है वही बताएँ। लोगों के सामने अपना नज़रिया या अपनी विचारधारा लेकर न आएं। अफ़सोस जिन पर इतनी बड़ी ज़िम्मेदारी है, वही इसका मज़ाक बना रहे हैं। देश उस रास्ते पर चलता रहे जिसका अंत शांति हो, यह तय करने के लिए एक पूरा का पूरा तंत्र काम करता है। इस तंत्र का सबसे बड़ा चेहरा है देश की अदालतें और उनमें भी सबसे ऊपर है सर्वोच्च न्यायालय।

ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट

देश की सबसे बड़ी अदालत ने पिछले साल ही साफ़ शब्दों में कहा था कि विवादित ज़मीन पर राम मंदिर बनेगा। इसका एक मतलब साफ़ है कि आज की तारीख़ वह ज़मीन किसी भी सूरत में विवादित नहीं है। आखिर होगी भी कैसे? देश की सबसे बड़ी अदालत से ऊपर कौन हो सकता है।

सर्वोच्च न्यायालय ने जो आदेश में कहा वही सत्य और वही तथ्य। ऐसा तथ्य जो समाज के पत्थर पर सबसे मोटी लकीर है। भले लाख ऐसा समझा और सोचा जाए कि इतना पर्याप्त है, लेकिन कुछ लोग ठीक यहीं से नई बहस की ज़मीन तैयार करते हैं। 

लोकतांत्रिक व्यवस्था और अभिव्यक्ति के देश में बहस की ज़मीन के लिए जगह भी हमेशा ही रहती है। लेकिन सच के दायरे से हट कर नहीं और न ही लोगों के बीच भ्रम फैला कर। ऐसी बातें सतह पर बहुत सामान्य नज़र आती हैं, एक बार में पढ़ कर नज़रअंदाज़ करने लायक। यह रवैया स्वभाव में कितना लचर है कि एक समाचार समूह बड़ी सहजता से राम जन्मभूमि को “disputed site” कहकर निकल जाता है, जबकि ऐसे शब्दों से दूरी बनाने में अदालतों ने कई दशक खर्च कर दिए। कितने लोग खप गए इसका हिसाब ही नहीं। 

इस बात की कल्पना ही कितनी भयानक है अगर किसी दूसरे धर्म से संबंधित किसी भी मुद्दे पर ऐसी टिप्पणी हो जाए तो उसके बाद की सामाजिक तस्वीर क्या होगी? लेकिन इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बावजूद एजेंडा और भ्रम कुछ लोगों की प्राथमिकता है।

पत्रकारिता के छात्रों को ‘social responsibility theory’ पढ़ाई जाती है। यानी समाज के प्रति हमारी ज़िम्मेदारी क्या है? हम समाज को अपने हिस्से से क्या देते हैं? यही दो सवाल जब “disputed site” लिखने वालों से पूछा जाएगा तब उनका जवाब क्या होगा।

यह भ्रम ऐसे लोग फैला रहे हैं जो लेमैन (भीड़ का हिस्सा) नहीं हैं। जिनके हिस्से में समाज की सबसे अहम ज़िम्मेदारी है। यह बात भले छोटी नज़र आ रही है लेकिन जितनी छोटी नज़र आती है उतनी ही धोखे में रखने वाली भी है। ऐसी बातें समाज को सालों पीछे ले जाकर पटक देती हैं, ठीक उस जगह पर जहाँ से सब शुरू हुआ था। तथ्य लिखने का हासिल भले कुछ न हो पर भ्रम की कीमत बहुत भारी होती है। यह कीमत लिखने वाले नहीं पढ़ने वाले चुकाते हैं। 

शायद इसलिए ऐसे अहम मुद्दों पर कुछ भी बताते समय तस्दीक करना सबसे अहम पड़ाव है। इसके अलावा इस बात की कल्पना करना कि “disputed site” जैसे शब्द का असर क्या पड़ेगा? हर व्यक्ति अपने दिन की शुरुआत में दुनियादारी की ओर निहारता ज़रूर है, वह ऐसी भ्रामक बात पढ़ने/सुनने/समझने की उम्मीद किसी भी सूरत में नहीं करता होगा।

असल मायनों में इस तरह की बातों का लक्ष्य और वज़न दोनों ही बहुत हल्का है। फिर भी कोई भ्रम बच गया हो तो इस मुद्दे पर तमाम लोगों से बात करने की ज़रूरत है। ख़ास कर ऐसे लोग से जिनकी ज़िंदगी का सपना यही था कि वह इस ढाँचे को आकार लेते हुए देखें। भले जानकारी देने की आड़ में कितना भी भ्रम परोसा जाए लेकिन तथ्य का कोई विकल्प नहीं होता। जो सच है दिन के अंत में वही स्वीकार किया जाता है, पंक्ति के पहले व्यक्ति से लेकर पंक्ति के अंतिम व्यक्ति तक।

जनता भोली हो सकती है पर दिग्भ्रमित नहीं। लोग समझते हैं कि ऐसी बातों के लिए गाना बनाया गया है “गाड़ी वाला आया घर से कचरा निकाल।”

मंदिरों का पैसा, मंदिरों का स्कूल, अरबी पढ़ाने के लिए रखेंगे मौलवी: केरल की वामपंथी सरकार की नई करतूत

माकपा के नेतृत्व वाली केरल की वामपंथी सरकार हिंदू विरोधी एजेंडे को बढ़ावा देने के लिए तमाम जतन में लगी रहती है। इसी कड़ी में सरकार ने त्रावणकोर देवास्वोम बोर्ड के तहत आने वाले स्कूलों में अरबी शिक्षकों की नियुक्ति का फैसला किया। इसके लिए हिंदू मंदिरों द्वारा प्रबंधित स्कूलों के फंड का इस्तेमाल किया जाएगा।

ऑर्गेनाइजर के अनुसार केरल के मंदिरों की प्रशासकीय जिम्मेदारी सॅंभालने वाले त्रावणकोर देवास्वोम बोर्ड ने अपने अधीन आने वाले स्कूलों में अरबी शिक्षकों की नियुक्ति का फैसला किया है। केरल सरकार ने उसे यह जिम्मेदारी सौंपी है। बोर्ड ने चार अरबी शिक्षकों की सूची भी फाइनल कर ली है।

अरबी शिक्षकों के लिए बोर्ड की ओर फाइनल की गई सूची में शमीरा, बुशरा बेगम, मुबाश और सुमय्या मोहम्मद के नाम हैं।

संयोग है कि, बोर्ड ने अभी तक इन स्कूलों में संस्कृत भाषा की शिक्षा देने हेतु किसी भी शिक्षक की नियुक्ति नहीं की है। संस्कृत देश की प्राचीन भाषा है और संविधान की 8 वीं अनुसूची में उल्लेखित है। वहीं अरबी का न तो इस देश से और न ही यहॉं की ज्यादातर आबादी से कोई सरोकार है।

इसके अलावा बोर्ड हिंदू मंदिरों द्वारा प्रबंधित कई स्कूलों के लिए गणित, संगीत, सामाजिक विज्ञान, हिंदी जैसे विषयों के शिक्षकों की भी नियुक्ति करेगा। ये सभी विषय केरल की कम्युनिस्ट सरकार द्वारा रेगुलेट किए जाते हैं।

गौरतलब है कि त्रावणकोर देवास्वोम बोर्ड त्रावणकोर कोचीन हिंदू धार्मिक संस्था अधिनियम XV के तहत गठित एक स्वायत्त निकाय है। त्रावणकोर देवास्वोम बोर्ड को केरल राज्य में 1,248 मंदिरों के प्रबंधन को देखने की जिम्मेदारी सौंपी गई है।

इन मंदिरों को 1949 में त्रावणकोर और कोचीन की रियासतों के एकीकरण से पहले इन मंदिरों की देखरेख त्रावणकोर के शासक करते थे। मंदिरों की देखरेख के लिए बनाए गए बोर्ड के सदस्य सरकार और स्थानीय सदस्यों द्वारा चुने जाते हैं।

शराबी पिता ने चाकू से किया हमला, बचाव में नाबालिग बेटी ने उठाई कैंची… पियानो से शुरू हुआ बखेड़ा खून पर खत्म

बेंगलुरु से एक हैरान करने वाली घटना सामने आई है। एक नाबालिग लड़की के हाथों अनजाने में उसके शराबी पिता का कत्ल हो गया। 46 मृतक ने 15 वर्षीय बेटी पर चाकू से हमला किया था। बेटी ने बचाव में कैंची उठा ली जो उसके सीने में लगी और मौत हो गई।

गुरुवार (जुलाई 23, 2020) को पुलिस ने किशोरी को हिरासत में ले लिया। घटना बुधवार रात की है। मृतक पिता अपनी 15 साल की बेटी और 9 साल के बेटे के साथ मैंत्री पैरडाइज अपार्टमेंट में रह रहा था। यह इलाका लेआउट पुलिस स्टेशन के तहत आता है।

किशोरी ने अपने चाचा को बताया था कि घटना रात 11 बजे के बाद हुई थी। वह पढ़ाई करने की कोशिश कर रही थी कि तभी उसके पिता ने नशे की हालत में बहुत जोर से पियानो बजाना शुरू कर दिया।

किशोरी के एक रिश्तेदार ने द न्यूज मिनट को बताया कि बुधवार को रात के लगभग 11 बजे किशोरी का पिता तेज आवाज में पियानो बजा रहा था। बेटी ने पिता को उसे धीमी आवाज पर बजाने के लिए कहा, क्योंकि पहले भी पड़ोसी आवाज को लेकर शिकायत कर चुके थे। वह नहीं चाहती थी कि मामला बढ़े। मगर उसके पिता ने इसे नजरअंदाज कर दिया।

इसके बाद किशोरी ने खुद जाकर वॉल्यूम कम कर दिया। इस पर पिता बेहद नाराज हो गया और रसोई में जाकर एक चाकू ले आया। फिर उसने 15 वर्षीय बेटी पर चाकू से हमला किया, जिससे उसे पीठ, कंधे और हाथ पर चोट आई। इससे वह काफी डर गई और उसने एक कैंची उठा ली और पिता को वापस जाने की चेतावनी देने लगी। हालाँकि, वह इतना भड़क गया था कि हाथापाई पर उतर आया और इस दौरान वह कैंची उसके अंदर चुभ गई।

थोड़ी देर बाद उसका भाई उठा तो उसने देखा कि पिता खून से लथपथ पड़े हैं। यह देखकर घर में चीख-पुकार मच गई। पड़ोसियों ने थाने को सूचना दी। लेकिन पुलिस के पहुँचने से पहले ही पिता की मौत हो चुकी थी।

मामले में डीसीपी (साउथ ईस्ट) श्रीनाथ महादेव जोशी ने कहा कि आईपीसी की धारा 304 के तहत मामला दर्ज किया गया है। पड़ोसी ने अपने बयान में पुलिस से व्यक्ति की मौत को आकस्मिक माना है, क्योंकि बेटी का ‘अपने पिता को मारने या चोट पहुँचाने का कोई इरादा नहीं था।’ चूँकि मृतक उसके प्रति बेहद हिंसक था और वह डर गई थी कि वह नुकसान पहुँचा सकता है या उसे मार भी सकता है, इसलिए उसने आत्मरक्षा के लिए कैंची उठा ली थी।

वहीं परिवार वालों का कहना है कि दोनों बच्चों को अपने जीवन में काफी नुकसान उठाना पड़ा है और कानूनी प्रणाली को एक ट्रांसपेरेंट विचार रखना होगा। उन्होंने बताया कि उसका नौ वर्षीय भाई चाची के साथ रह रहा है, और अब तक कम से कम तीन बार पूछताछ के लिए बुलाया गया है। वहीं किशोरी के वकील ने पुष्टि की कि उसे मामले में गिरफ्तार नहीं किया गया था।

जानकारी के मुताबिक मृतक के परिवार ने बताया कि उसे शराब की लत थी। वह एक टेक फर्म में सीनियर सॉफ्टवेयर इंजीनियर था। वर्ष 2011 में पत्नी की मौत के बाद उसने नौकरी छोड़ दी और शराबी बन गया था।

एक गाना, उसमें कुरान के शब्द और… एआर रहमान के पीछे पड़ गए थे इस्लामी कट्टरपंथी, हटाना पड़ा था हॉल से सिनेमा

सुशांत सिंह राजपूत की मौत के बाद बॉलीवुड में छिड़ी बहस का कोई अंत नज़र नहीं आ रहा है। इस मामले में मशहूर संगीतकार एआर रहमान ने भी अपना नज़रिया पेश किया है। उन्होंने बताया है कि बॉलीवुड का एक पूरा गैंग उनके खिलाफ़ काम कर रहा है। वह गैंग चाहता है कि एआर रहमान की बॉलीवुड में सक्रियता लगभग न के बराबर रह जाए। साथ ही उन्होंने इस्लाम धर्म पर बेबाकी से अपना पक्ष रखा है। 

उन्होंने मीडिया से बात करते हुए इस मुद्दे पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने कहा उनके विरोध में काम करने वाला गैंग यह सुनिश्चित करता है कि बॉलीवुड में उन्हें कम से कम काम मिले। इस गुटबाज़ी की वजह से उन्हें सिर्फ डार्क फिल्म में काम करना पड़ता है। इसके अलावा उन्हें अच्छी फिल्मों से दूर रखने का हर संभव प्रयास किया जाता है। इस बात का भी ख़याल नहीं किया जाता है कि इससे उनके करियर पर बेहद नकारात्मक असर पड़ता है। 

एआर रहमान ने बताया कि वह बॉलीवुड के निशाने पर तो रहते ही हैं। इसके अलावा उन्होंने एक ऐसी घटना का भी ज़िक्र किया जिसमें वह मौलवियों के निशाने पर आए थे। उन्हें अपनी एक छोटी सी बात को लेकर सामाजिक तौर पर डराया और प्रताड़ित किया गया था। उन्होंने बताया कि यह घटना लगभग 16 साल पुरानी है, जिसमें उन्हें इतने बुरे अनुभव से गुज़रना पड़ा। 

यह विवाद एक फिल्म की कव्वाली से शुरू हुआ था। जिसके बाद एआर रहमान और मशहूर चित्रकार एमएफ़ हुसैन ऑल इंडिया उलेमा काउंसिल के कट्टर मौलवियों के निशाने पर आ गए थे। एआर रहमान ने एमएफ़ हुसैन की फिल्म “मीनाक्षी” के गाने का संगीत तैयार किया था। जिस पर मुस्लिम समुदाय के लोगों ने उन पर इस्लाम का अपमान करने का आरोप लगाते हुए ख़ूब विरोध किया था।        

इस्लामी कट्टरपंथियों ने “नूर-उन-अला-नूर” नाम के इस गाने को अपमानजनक (अल्लाह के लिए) बताया था। मौलवियों का आरोप था कि इस गाने के कुछ शब्द सीधे क़ुरान से लिए गए हैं। इस गाने में ही फिल्म की नायिका तब्बू को दिखाया गया था। इसके बाद तमाम इस्लामी संगठन एआर रहमान के विरोध में उतर आए थे। इसमें मिली काउंसिल, ऑल इंडिया मुस्लिम काउंसिल, रज़ा एकेडमी, जमात-ए-इस्लामी और जमात-उल-उलेमा-ए-हिन्द मुख्य रूप से शामिल थे। 

ऑल इंडिया उलेमा काउंसिल के सचिव मौलाना अब्दुल कुदुस कश्मीरी ने इस मुद्दे पर आधिकारिक बयान जारी किया था। बयान में उन्होंने कहा था, “हमारे लिए ‘नूर-उन-अला-नूर’ पवित्र शब्द है, इसे नायिका की खूबसूरती बताने के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है।”

इतना ही नहीं, इस मामले में मुंबई में शिकायत भी दर्ज कराई गई थी। यह माँग भी की गई थी कि इस गाने से यह शब्द हटा दिया जाए। इस्लामी कट्टरपंथियों और मौलवियों के लगातार विरोध के चलते “मीनाक्षी – ए टेल ऑफ़ थ्री सिटीज़” को सिनेमाघरों से बाहर निकालना पड़ा था। 

श्री 420 रोज टीवी पर दिखते हैं, दिल्ली के लिए करते कुछ नहीं: केजरीवाल पर सुब्रमण्यम स्वामी

दिल्ली में कोरोना वायरस के बढ़ते संक्रमण के बीच बीजेपी सांसद सुब्रमण्यम स्वामी ने मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को निशाने पर लिया है। स्वामी ने रविवार (जुलाई 26, 2020) को दिल्ली में केजरीवाल की अगुवाई वाली AAP सरकार पर तीखा हमला करते हुए मुख्यमंत्री को ‘श्री 420’ बताया।

सुब्रमण्यम स्वामी ट्वीट करते हुए लिखा, “मैं इस बात से प्रभावित हूँ कि देश में कुल कोरोना वायरस के मामलों में गुजरात की हिस्सेदारी मात्र 1.6% है, जबकि दिल्ली में 9% हैं। श्री 420 रोजाना केवल टीवी पर दिखाई देते हैं, लेकिन दिल्ली के लिए कुछ भी नहीं करते हैं।” 

सुब्रमण्यम स्वामी का इशारा अरविंद केजरीवाल की ओर था। दिल्ली में अभी तक 1.29 लाख से ज्यादा लोगों के कोरोना वायरस से संक्रमित होने की पुष्टि हुई है। राष्ट्रीय राजधानी में संक्रमण से अभी तक 3,806 लोगों की मौत हुई है।

बता दें कि केजरीवाल नियमित रूप से मीडिया को यह कहते हुए नजर आ रहे हैं कि दिल्ली में सक्रिय मामलों की संख्या में ‘सुधार’ हुआ है। उन्होंने दावा किया कि अधिकतम सक्रिय मामलों के मामले में दिल्ली दूसरे स्थान से 8वें स्थान पर आ गया है।

सीएम अरविंद केजरीवाल ने ट्वीट किया, “सक्रिय मामलों की संख्या के मामले में दिल्ली 8वें स्थान पर पहुँच गया है। स्थिति कुछ दिनों पहले तक खराब थी। हम दूसरे स्थान पर थे। सावधानी बरतें और सुरक्षित रहें।”

उन्होंने यह भी कहा कि कोरोना के बढ़ते मामलों के बीच राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में कम मामले नजर आए। शनिवार को, दिल्ली में 1,500 के करीब नए मामले सामने आए, जिनमें 3,806 लोगों की मौत के साथ कुल संक्रमण बढ़कर 1.29 लाख हो गया। इसकी तुलना में, गुजरात में 1,081 नए COVID-19 मामलों की सूचना है, जिसमें 2,305 लोगों की मृत्यु के साथ कोरोना संक्रमण की कुल संख्या 54,712 थी।

इससे पहले दिल्ली कॉन्ग्रेस ने भी केजरीवाल से आरटी-पीसीआर परीक्षण कराने का आग्रह किया था। दिल्ली कॉन्ग्रेस अध्यक्ष अनिल कुमार ने कहा था, “दिल्ली में कोरोना मामलों की सही संख्या निर्धारित करने के लिए सभी रैपिड एंटीजन-नेगेटिव परीक्षा परिणामों का परीक्षण गोल्ड स्टैंडर्ड आरटी-पीसीआर पर किया जाना चाहिए।”