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बाढ़ के नाम पर प्रियंका गाँधी ने ट्वीट की पुरानी फोटो, सोशल मीडिया में हुईं ट्रोल

कॉन्ग्रेस महासचिव प्रियंका गाँधी ने सोमवार (जुलाई 20, 2020) को ट्वीट कर कॉन्ग्रेस कार्यकर्ताओं और नेताओं से असम और बिहार में आई बाढ़ की वजह से प्रभावित लोगों की मदद करने की अपील की। उन्होंने साथ में दो तस्वीरें भी शेयर कीं, जो बाढ़ की भयावहता को दिखाती हैं।

प्रियंका गाँधी ने ट्विटर पर लिखा, “असम, बिहार और यूपी के कई क्षेत्रों में आई बाढ़ से जनजीवन अस्त-व्यस्त है। लाखों लोगों पर संकट के बादल छाए हुए हैं। बाढ़ से प्रभावित लोगों की मदद के लिए हम तत्पर हैं। मैं कॉन्ग्रेस कार्यकर्ताओं व नेताओं से अपील करती हूँ कि प्रभावित लोगों की मदद करने का हर संभव प्रयास करें।”

अब इस ट्वीट को लेकर प्रियंका गाँधी खुद ही घिर गई है। प्रियंका के ट्वीट को यूजर्स ने हाथों हाथ लेते हुए जहाँ प्रियंका पर जमकर निशाना साधा है वहीं कुछ ने इसे ठीक करने की सलाह भी दी है।

सच क्या है?

प्रियंका गाँधी ने अपने ट्वीट में जिन तस्वीरों का इस्तेमाल किया है वे पुरानी हैं। इनमें से एक तस्वीर साल 2019 की है और दूसरी साल 2017 की।

पहली तस्वीर

तस्वीर को गूगल पर रिवर्स इमेज सर्च करने से हमें One India नाम की वेबसाइट पर 24 जुलाई, 2019 यानी पिछले साल का आर्टिकल मिला, जिसमें इस तस्वीर का इस्तेमाल किया गया था। आर्टिकल का शीर्षक, ‘Bihar-Assam flood: Death toll mount to 174’ था।

तस्वीर के साथ कैप्शन लिखा गया था, ‘असम के बाढ़ प्रभावित मोरीगाँव जिले में जलमग्न गाँव की तस्वीर।’ फोटो के लिए समाचार एजेंसी पीटीआई को क्रेडिट दिया गया था।

दूसरी तस्वीर

रिवर्स इमेज सर्च के ज़रिए हमें Hindustan Times का 31 अगस्त, 2017 को छपा आर्टिकल मिला। खबर का शीर्षक, ‘Google announces $1 mn for flood relief in India, Nepal, Bangladesh’ था और इसी तस्वीर का इस्तेमाल किया गया था।

तस्वीर के लिए पीटीआई को क्रेडिट दिया गया था और इसे बिहार के अररिया जिले का बताया गया था।

निष्कर्ष

प्रियंका गाँधी ने असम और बिहार की बाढ़ के नाम पर जो तस्वीरें ट्वीट की हैं वे 2020 की नहीं बल्कि साल 2019 और 2017 की हैं।

गौरतलब है कि ये पहली बार नहीं है जब कॉन्ग्रेस नेता ने इस तरह से गलत तस्वीर शेयर कर फर्जी खबर फैलाने की कोशिश की है। कुछ दिनों पहले कॉन्ग्रेस प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने मोदी सरकार को नीचा दिखाने के लिए मंगलवार (मई 19, 2020) अपने ट्विटर अकाउंट से नेपाल की एक तस्वीर को शेयर करते हुए लिखा था, “न्यू इंडिया का सच!” इस तस्वीर में एक महिला अपने बच्चे को पीठ पर बाँधे साइकल से जा रही थी। रणदीप सुरजेवाला के ट्वीट करते ही लोगों ने बता दिया कि यह तस्वीर भारत का नहीं, बल्कि नेपाल के नेपाल का है। वो भी 2014 का। 

सुरजेवाला ने इससे पहले एक तस्वीर शेयर करते हुए कहा था, “मोदी जी, इन्हीं को जहाज़ में बिठाने का सपना बेचा था ना!” हालाँकि जिस तस्वीर को पोस्ट कर के सुरजेवाला, PM मोदी से सवाल कर रहे थे, वो उनकी ही पार्टी यानी, कॉन्ग्रेस शासित राज्य छत्तीसगढ़ की निकली।

इसके अलावा ‘दलित कॉन्ग्रेस’ नाम के ट्विटर एकाउंट से एक ऐसी तस्वीर शेयर की गई थी, जिसमें एक व्यक्ति को अपनी पीठ पर बूढ़ी महिला को ले जाते हुए देखा जा सकता था। कॉन्ग्रेस के इस ट्विटर अकाउंट में बताया गया था कि यह कॉन्ग्रेस का SC विभाग है। हालाँकि, बाद में खुलासा हुआ कि जिस तस्वीर को कॉन्ग्रेस के एकाउंट शेयर कर रहे थे, वो बांग्लादेशी रोहिंग्याओं की थी।

वेस्ट यूपी के 14 लाख गुर्जरों के नाराज़ होने का डर, MP में भी मुश्किल: जानिए क्यों पायलट से समझौते के मूड में प्रियंका गाँधी

राजस्थान में सचिन पायलट की बगावत के बाद अशोक गहलोत ने उन्हें और उनके साथी नेताओं को बाहर निकालने की प्रक्रिया शुरू कर दी। इधर प्रियंका गाँधी के हस्तक्षेप के बाद उनसे बातचीत शुरू हो गई और समझौते की अटकलें आने लगीं। ख़ुद सचिन पायलट ने स्वीकार किया था कि उनकी प्रियंका गाँधी से ‘व्यक्तिगत रूप से’ बातचीत हुई है, लेकिन इसका कोई निष्कर्ष नहीं निकल पाया है। इन सबकी जड़ में ‘गुर्जर समाज’ का डर है।

प्रियंका गाँधी आखिर सचिन पायलट के जाने से इतनी बेचैन क्यों हैं? वो इतना तो ज़रूर चाहती रही होंगी कि अगर पायलट जाएँ भी तो कॉन्ग्रेस की ऐसी छवि न बने कि उसने सचिन पायलट के साथ कुछ गलत किया है। उनके डर का कारण क्या था? दरअसल, राजेश पायलट कभी देश में गुर्जरों के सबसे बड़े नेता माने जाते थे। सचिन पायलट ने उनकी विरासत सँभाल रखी है। ऐसे में प्रियंका के डर का कारण हम आपको बताते हैं।

इसे समझने के लिए आपको पश्चिमी उत्तर प्रदेश की जातीय अंकगणित को समझना पड़ेगा चूँकि इस पूरे मामले की जड़ मे भी जाति ही है, हमें भी जाति की बात करनी ही पड़ेगी। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में यूँ तो माना जाता है कि राजपूतों की जनसंख्या ज्यादा है, लेकिन वहाँ सबसे ज्यादा प्रभाव गुर्जरों अथवा गुज़्जरों का है, जो किसी भी पार्टी की हार-जीत में निर्णायक भूमिका में होते हैं। प्रियंका गाँधी कि नजर इसी वोट बैंक पर है।

‘एबीपी न्यूज’ के सीनियर कोरेस्पोंडेंट आदेश रावल ने ख़बर दी है कि 26 जुलाई को सोहना के रिठोज गाँव मे गुर्जर समाज के लोगों ने बैठक बुलाई है। बैठक मे राजस्थान के सभी गुर्जर विधायकों से कहा जाएगा कि वो सचिन पायलट को अपना समर्थन दे। अगर ऐसा नही किया तो विधायकों का सामाजिक तौर पर बहिष्कार किया जाएगा। राजस्थान में फिलहाल 9 गुर्जर विधायक हैं, जो कॉन्ग्रेस पार्टी में हैं।

राजस्थान की राजनीति अब उत्तर प्रदेश को प्रभावित कर रही है। वेस्ट यूपी में अकेले गौतम बुद्ध नगर में 3 लाख गुर्जर हैं। इसी तरह ढाई लाख गुर्जर सहारनपुर में हैं। मेरठ-हापुड़, गाजियाबाद और अमरोहा में इनकी जनसँख्या डेढ़-डेढ़ लाख है। मुजफ्फरनगर में ये सवा लाख की संख्या में हैं। कुल मिला दें तो पूरे पश्चिमी यूपी में 14 लाख गुर्जर हैं, जो कॉन्ग्रेस के लिए मुसीबत का सबब बनने जा रहे हैं। यही प्रियंका के ‘डर’ का कारण है।

सचिन पायलट को राजस्थान में गुर्जर-मीणा एकता का प्रतीक माना जाता है। ख़बर आई है कि हरियाणा के नूह स्थित आईटीसी ग्रैंड होटल में जहाँ सचिन पायलट गुट के विधायक रुके हुए हैं, वहीं पर गुर्जरों के दिग्गज नेता धर्मपाल राठी का फार्म हाउस है। उनके पास लगातार राज्य के कई इलाक़ों के गुर्जरों नेताओं और कार्यकर्ताओं के फोन आ रहे हैं। उनके घर पर लोगों की भीड़ जुट रही है।

‘एनडीटीवी’ की एक ख़बर के अनुसार, धर्मपाल राठी द्वारा गुर्जर महापंचायत बुलाने की अफवाह भर से वहाँ कई नेताओं का जमावड़ा लग गया। राठी ने स्पष्ट कर दिया है कि वो सचिन पायलट के साथ खड़े हैं। हालाँकि, कोरोना के दौर में उन्होंने महापंचायत की बात से इनकार किया। लेकिन, लोग लगातार पहुँच रहे हैं।

अब आप सोचिए, जब एक अफवाह का इतना असर होता है तो गुर्जरों ने सच में शक्ति-प्रदर्शन कर दिया तो उससे कॉन्ग्रेस को कितना नुकसान पहुँचेगा।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के हापुड़ में इसका असर देखने को मिल भी रहा है। वहाँ ‘युवा गुर्जर महासभा’ ने सचिन पायलट के पक्ष में आवाज़ बुलंद करते हुए कॉन्ग्रेस का विरोध किया। गुर्जर समाज ने आरोप लगाया कि राजेश पायलट ने अपनी पूरी ज़िंदगी कॉन्ग्रेस को दे दी, लेकिन उनके साथ भी षड्यंत्र रचा गया था। उन्होंने धमकाया कि गुर्जर समाज आन्दोलनों के लिए ही जाना जाता है। उन्होंने कॉन्ग्रेस की निंदा की।

अगर आप उपर्युक्त बयानों को देखें तो इससे गुर्जरों के गुस्से का अंदाज़ा लग जाता है। गुर्जर समाज हमेशा से अपने समुदाय के हितों को लेकर सजग रहा है और समय-समय पर कड़ा रुख अख्तियार करता रहा है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में 30 जिले हैं, जहाँ प्रियंका गाँधी गुर्जर वोटरों को नाराज नहीं करना चाहती हैं और इसीलिए वो सचिन पायलट से समझौते के पक्ष में हैं। गुर्जर समाज का डर उनके सिर चढ़ कर बोल रहा है।

ये किसी से छिपा नहीं है कि उत्तर प्रदेश को प्रियंका गाँधी ने आजकल अपने इगो का मुद्दा बनाया हुआ है और वो सीएम योगी आदित्यनाथ पर लगातार हमलावर रही हैं। वो आए दिन यूपी के मुद्दों का राष्ट्रीयकरण करने की फिराक में रहती हैं। ऐसे में प्रियंका दूसरे राज्य की गलती को अपनी राजनीतिक नाकामी का कारण नहीं बनने देना चाहतीं। यूपी के 2022 विधानसभा चुनावों में गुर्जरों का वोट मायने रखेगा।

फ़रवरी 2019 में राजस्थान में गुर्जर समाज ने बड़ा आंदोलन किया था और तब भी सचिन पायलट ने चुप्पी साधी हुई थी। सरकारी नौकरी और शिक्षा में आरक्षण को लेकर हुए आंदोलन ने अशोक गहलोत को बेचैन भी कर दिया था। इससे पहले जब भी गुर्जर समाज का आंदोलन हुआ है, सचिन पायलट ने उसके पक्ष में आवाज़ बुलंद करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। वो अपने समुदाय के साथ हमेशा खड़े रहे हैं।

जयपुर के अलावा अजमेर और भरतपुर भी तब गुर्जर आंदोलन के कारण तनाव और हिंसा का शिकार बना था। सचिन पायलट की तब की चुप्पी से साफ़ हो जाती है कि उनके और अशोक गहलोत के सम्बन्ध काफी पहले से अच्छे नहीं थे और जिस तरह से गहलोत ने स्वीकार किया कि डेढ़ साल से उनकी बातचीत नहीं हुई है, ये चीजें और स्पष्ट हो जाती हैं। गुर्जर नेता लेफ्टिनेंट कर्नल (रिटायर्ड) किरोरी सिंह बैंसला पहले ही भाजपा में आ चुके हैं।

हरियाणा में जिस तरह से दुष्यंत चौटाला ने भाजपा के साथ मिल कर सरकार बनाई, उससे वहाँ ही नहीं बल्कि वहाँ से सटे दिल्ली में भी जाट वोटरों से कॉन्ग्रेस का मोहभंग हो गया। लेकिन, गुर्जरों का पार्टी से दूर होना कई राज्यों में बड़ी समस्याएँ पैदा कर सकता है। मध्य प्रदेश में उपचुनाव होने हैं। 26 में से अधिकतर सीटें गुर्जरों के प्रभाव वाले ग्वालियर-चम्बल संभाग में हैं। ऐसे में भाजपा को इसका फायदा मिलना तय है।

समय देख कर भाजपा ने अपने पुराने गुर्जर नेताओं को मध्य प्रदेश में आगे किया है। साथ ही सिंधिया गुट से एक गुर्जर नेता को मंत्री भी बनाया गया है। भले ही सचिन पायलट गुर्जरों के सर्वमान्य नेता नहीं रहे हों, लेकिन कॉन्ग्रेस द्वारा उनके साथ जो सलूक किया गया है उसे मुद्दा बना कर कम से कम उनकी पहचान का तो भाजपा फायदा उठा ही सकती है। सिंधिया पहले ही पायलट के पक्ष में मुखर रहे हैं।

आज सचिन पायलट राजस्थान में 49 विधानसभा सीटों पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से दखल रखते हैं। उन्हें प्रदेश अध्यक्ष बनाने जाने के बाद उन्होंने जम कर मेहनत की और अपने पिता के समर्थकों को निराश नहीं किया। राजस्थान में उन्हें गुर्जर और मीणा समुदाय के बीच होने वाले संघर्षों को थामने वाला व्यक्ति भी माना जाता है। दोनों समुदाय अक्सर लड़ते रहते थे और आरक्षण को लेकर आंदोलन होते रहते थे।

अगर आप अभी भी सोशल मीडिया खँगालेंगे तो पाएँगे कि गुर्जर समाज के लोगों ने सचिन पायलट के पक्ष में अशोक गहलोत के खिलाफ मोर्चा खोल रखा है। कई युवा गुर्जरों ने तो वीडियो बना कर भी पायलट के पक्ष में आवाज़ बुलंद की है। वहीं कइयों ने धमकी भरे स्वर अपनाए। स्थानीय स्तर के गुर्जर नेताओं ने भी अपनी पार्टी लाइन से इतर जाकर पायलट का समर्थन किया है। इससे कॉन्ग्रेस चिंतित है।

2018 के चुनाव को ही उदाहरण के रूप में लीजिए। पूर्वी राजस्थान में 49 सीट गुर्जर-मीणा का गढ़ हैं। इनमें से 42 सीटों पर कॉन्ग्रेस को विजय मिली, जो सचिन पायलट की ही मेहनत का परिणाम था। एक तो उन्हें सीएम पद नहीं दिया गया और ऊपर से सरकार में भी उन्हें हाशिए पर धकेल दिया गया। अब देखना ये है कि सचिन पायलट किस करवट बैठते हैं, लेकिन राजस्थान में बड़ा बदलाव तो तय ही है।

पप्पू की छवि में बँधे राहुल गाँधी को इस बात की चिंता है कि चीन मोदी की छवि बर्बाद कर देगा!

राहुल गाँधी अपनी गंभीर वीडियो शृंखला में दोबारा चेहरे पर करुआ तेल (या सोया सॉस) मल कर भारत-चीन सीमा विवाद पर बोलने आए हैं। बात यह है कि जिस व्यक्ति और पार्टी को जनता ने प्रासंगिकता से दूर कर दिया हो, अपना संसदीय क्षेत्र छोड़ कर दक्षिण का रास्ता नापना पड़ा, वो मोदी की छवि पर बात करता है तो हास्यास्पद ही लगता है।

राहुल गाँधी चेहरे पर एक नकली दर्द के साथ आज के वीडियो में समझाना चाह रहे हैं कि भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सबसे बड़ी उपलब्धि/सकारात्मकता उनकी ‘56 इंच’ वाली छवि है जिसे चीन ने समझ लिया है और उसे चैलेंज कर रहा है।

राहुल गाँधी के नए वीडियो का क्या औचित्य है?

नए वीडियो में राहुल कहते हैं कि पीएम मोदी के सामने एक मजबूत नेता की छवि बनाए रखना मजबूरी है और चीन इसी का फायदा उठाकर पीएम मोदी की छवि पर चोट कर रहा है। अब सोचिए जरा कि एक बार राहुल गाँधी ने भी मोदी की इमेज को ही लेकर अपनी बात रखी थी।

उन्होंने तब कहा था कि मोदी की इमेज ही उनकी सबसे बड़ी ताकत है और वह उसे बर्बाद कर देंगे। अब राहुल गाँधी की इन बातों से ये तो पता चलता है कि राहुल गाँधी न केवल पीएम मोदी को लेकर चीन जैसी सोच ही रखते हैं, बल्कि इन दोनों का मकसद भी उनकी छवि से खिलवाड़ करना ही है।

राहुल गाँधी आगे वीडियो में कहते हैं कि उनकी चिंता ये है कि चीनी हमारी सीमा में आ घुसे हैं और वो बिना रणनीति के कुछ नहीं करते। उनके दिमाग में एक संसार का नक्शा खिंचा हुआ है और वो उसी के हिसाब से काम करते हैं। उसी के हिसाब से उसे आकार देते हैं।

अब राहुल गाँधी की ये बात सुनकर आपको नहीं लगा कि कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष की ये लाइनें बाहुबली फिल्म से प्रेरित है या बिल्कुल उस जैसी ही हैं। याद करिए फिल्म का एक सीन जहाँ माहिष्मति का एक धोखेबाज पहले कालकेयी को नक्शा भिजवाता है, सेना से जुड़े सारे भेद खोलता है और फिर बाद में पकड़े जाने पर राजदरबार में गंभीर भाव के साथ चेताता है कि आखिर कालकेयी की सेना बहुत खतरनाक है। वो जिस राज्य में घुसते हैं उसे अपना बना लेते है।

राहुल गाँधी की बातों को और उस कैरेक्टर को जोड़ कर देखिए, कोई अधिक फर्क़ नहीं है। क्योंकि यही वो राहुल गाँधी हैं जिनकी कॉन्ग्रेस ने राजीव गाँधी फाउंडेशन के नाम पर चीन के साथ मिलकर दुष्कृत्य किए और भारत की अर्थव्यवस्था तक को (फ्री ट्रेड अग्रीमेंट आदि के जरिए) नीलाम करने की सोची। लेकिन अफसोस ये उसमें असफल रहे।

आगे राहुल गाँधी देश की आंतरिक सुरक्षा पर बात करते हैं और मोदी सरकार पर सवाल उठाते हैं। हैरत ये है कि ये सवाल किस आधार पर उठाया जा रहा है और पूछ कौन रहा है। क्या राहुल गाँधी ये बात नहीं जानते कि जिस नेता पर वो सवाल उठा रहे हैं, उस नेता के नेतृत्व में बालाकोट और उरी जैसे स्ट्राइक्स को अंजाम दिया जा चुका है। लेकिन जब ऐसी ही स्थिति यूपीए कार्यकाल में आई तो उन्होंने आईएफ के अनुरोध के बाद भी उन्हें छूट नहीं दी और सैनिक सिर्फ़ बदले की आग में खुद ही झुलस के रह गए।

राहुल गाँधी चीन पर चिंता जाहिर करते हैं। वो भी चेहरे पर बिना किसी शर्म के भाव के। क्या उन्हें इतना भी नहीं पता कि वो यूपीए सरकार ही थी जिसने चीन को बिना किसी विरोध के पूर्वी लद्दाख में 640 किमी कब्जाने दिया था।

राहुल गाँधी हमें सामरिक रणनीतियाँ और वैश्विक राजनीति की पाठशाला में दो और तीन मिनट के वीडियो से सब कुछ समझाने वाले? वहीं न जिन्हें बोलते हुए ये भी नहीं मालूम कि कोई एक ही घटना दिन और रात में एक साथ नहीं हो सकती और जो भाषण देते हुए सबके बीच बोल देते हैं कि this morning I woke up at night.

हैरत की बात हैं कि आज गाँधी परिवार के युवराज और जनता के बीच पप्पू नाम से मशहूर राहुल जी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से सवाल कर रहे हैं और देश को जवाब देने की बात कर रहे हैं। जबकि वे खुद कब-कब अपनी गलतियों को मानने के लिए सामने आए हैं…ये सबको मालूम है।

बहुत पुरानी बात मत करिए। साल 2019 की बात कीजिए। लोकसभा चुनाव में भारी दावों के बाद भी करारी शिकस्त ने जब कॉन्ग्रेस का मनोबल तोड़ दिया। राहुल गाँधी ने पार्टी का हौसला बढ़ाने की बजाय विदेश यात्रा पर जाना उचित समझा। आज यही व्यक्ति कह रहे है कि वो देखना चाहते हैं कि नरेंद्र मोदी चीन की चालाकियों का क्या जवाब देंगे। जवाब देंगे भी या केवल अपने हथियार उनके आगे डाल देंगे।

राहुल गाँधी और कॉन्ग्रेस से कुछ सवाल

आज राहुल गाँधी प्रधानमंत्री से उन सवालों के जवाब माँग रहे हैं जिन पर आए दिन मीडिया में खबरें आ रही हैं और खुद पीएम भी विपक्षी नेताओं के साथ बैठक कर चुके हैं। स्थिति क्या है इसकी पल-पल की खबरें आमजन को है। लेकिन क्या कभी राहुल गाँधी ने खुद से पूछा है कि वो आम जनता के सवालों के जवाब में उन्हें क्या परोस रहे हैं।

राहुल गाँधी वेबिनार में पब्लिक के नाम पर कॉन्ग्रेस कार्यकर्ताओं को बिठाते हैं और उन्हीं के चुनिंदा व पहले से मालूम प्रश्नों का उत्तर भी देते हैं। क्या उनका कोई फर्ज नहीं है कि वे सामने आए और उन सवालों पर विराम लगाए जिन्हें लेकर कॉन्ग्रेस की छवि दिन पर दिन बिगड़ रही है।

लेकिन नहीं। प्रश्नों पर विराम तभी लगता है जब संतोषजनक जवाब मिले। मगर, कॉन्ग्रेस पर अपने किए कुकर्मों का कोई उत्तर नहीं है। राहुल गाँधी जैसा व्यक्ति अगर आज वीडियो के माध्यम से यह संदेश देने की कोशिश कर रहा है कि चीन क्या करना चाहता है, और क्यों करना चाह रहा है, तो लोगों को सँभल जाना चाहिए।

साथ ही इन बातों पर विचार करना चाहिए कि ऐसे लोगों को देश की सुरक्षा पर बोलने का आखिर क्या अधिकार है जिन्होंने देश को नीलाम करने तक की प्लानिंग कर ली हो? क्या ऐसे लोगों को याद नहीं कि इतिहास में इनके कितने कुकर्म दर्ज हैं जिनका खुलासा आजतक हो रहा है। मगर कारनामे हैं कि खत्म होने का नाम नहीं ले रहे।

ये कुछ सवाल हैं जो राहुल गाँधी की इन वीडियोज पर सहमति दर्ज करने से पहले जनता को मुखर होकर उनसे करने चाहिए। पूछिए राहुल गाँधी से और कॉन्ग्रेस से कि 2007 और 2008 में सोनिया गाँधी चीन क्यों गई थी? आखिर क्यों राहुल गाँधी बार-बार चीनी राजनयिकों के साथ या उसके दूतावास में जाते हैं?

डोकलाम मामले के दौरान वो चीनियों से क्यों मिल रहे थे? कैलाश मानसरोवर यात्रा की आड़ में वो किस राजनयिक से मिल रहे थे? क्या कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ चाइना के साथ 2008 में भारतीय राष्ट्रीय कॉन्ग्रेस द्वारा किए करार के अंतर्गत यह भी आता है कि यहाँ इस पार्टी का बड़ा नेता अपने ही राष्ट्र की सामरिक क्षमता ही नहीं, सेना के मनोबल पर भी सवाल उठाएगा? 

अपने पार्टी के बेहतर और युवा नेताओं को अपने समर्थकों समेत बाहर जाने से न रोक पाने वाले राहुल गाँधी अंतरराष्ट्रीय संबंधों पर वीडियो में चेहरे पर सोया सॉस लगा कर जो ज्ञान देते हैं, अपने घर की आग क्यों नहीं बुझा पाते? शायद इसलिए क्योंकि उन्हें शी जिनपिंग पर सचिन पायलट या ज्योतिरादित्य सिंधिया से ज्यादा भरोसा है।

साथ ही, अचानक से गोरे-गोरे, कूल डूड बने फिरने वाले डिम्पल वाले चेहरे को, चिरयुवा कहे जाने वाले राहुल गाँधी इतना उदासीन और साँवलेपन के साथ क्यों परोस रहे हैं? क्या उन्हें अब गरीबों से जुड़ने के लिए इस तरह की नस्लभेदी राह लेनी पड़ रही है जहाँ गरीबों, मजदूरों का समझाने के लिए चेहरे का रंग गहरा करना पड़ रहा है?

मुस्कुराते हुए डिम्पलों की जगह कपाल पर पड़ी सिलवटों ने क्यों ले लिया है? क्या पीआर टीम ने कहा है कि इससे अब वो समझदार और गंभीर व्यक्तित्व के तौर पर सुने जाएँगे? क्या अब उन्हें पप्पू की जगह श्री पप्पू सिंह जी महाराज कह कर लोग बुलाएँगे?

बात यह है कि सियार नीले रंग के पानी की नाद में कूद कर भले ही रंग बदल ले, आचरण सियारों वाला ही रहेगा। जिस व्यक्ति को सुबह वो कब उठा इसका ख्याल नहीं रहता, इंटरनेट पर मूर्खताओं से भरे वीडियो बच्चों के हँसी-मजाक के काम में आते हैं, वो राष्ट्रीय प्रतिरक्षा, सीमा सुरक्षा और सामरिक नीतियों पर ज्ञान देने लगे, तो बड़ा ‌अजीब लगता है।

राहुल गाँधी को भले ही यह लगता हो कि मोदी की छवि उन्हें चीन का चुनाव नहीं जितवा सकती, लेकिन मोदी को चीन का चुनाव जीतने की जरूरत है भी नहीं। ये बात और है कि राहुल और सोनिया गाँधी ने चीन की सरकार और पार्टी के साथ जो करार किए हैं, उनसे वो वहाँ के पीपुल्स हॉल की सदस्यता अवश्य पा जाएँगे और वहाँ उन्हें यहाँ वाली ‘पप्पू’ की छवि का भी सामना नहीं करना पड़ेगा।

वीडियो का सारांश यह है कि भारत को चीन पर हमला कर देना चाहिए। यहाँ राहुल की मंशा यही है कि कॉन्ग्रेस पर जो चीन से हारने का दाग लगा हुआ है और भारतीय जमीन चीन को दे देने की बात हर जुबान पर है, वो भाजपा द्वारा चीन से लड़ कर हारने के बाद ‘तुम भी तो हार गए’ कहने से बराबर हो जाएगा।

ये बात और है कि वैश्विक रक्षा विशेषज्ञ वैसा नहीं सोचते और भारतीय सेना चीन से लड़ कर निपटने में अब सक्षम है। तो, राहुल गाँधी का यह सपना भी उनके प्रधानमंत्री बन पाने के सपने की तरह ही रंग बदलते चेहरे और पिता की तरह सर के बालों की शैली में लगातार हो रहे परिवर्तन के बावजूद, अधूरा ही रह जाएगा।

बेहतर मांस के लिए अल्लाह के जानवरों को तेज धार चाकू से काटें, कुर्बानी पढ़ते रहें: PETA की समुदाय विशेष को 8 सलाह

पशु अधिकारों की रक्षा के लिए संघर्ष करने का दावा करने वाली अंतरराष्ट्रीय संस्था PETA जहाँ एक तरफ हिन्दू घृणा का प्रदर्शन करते हुए हिन्दुओं के हर एक त्यौहार को बदनाम करने की कोशिश करती है, वहीं दूसरी तरफ इस्लाम के त्यौहारों को लेकर चुप रहती है। PETA इंडिया ने अपनी वेबसाइट पर PETA यूएस द्वारा रिकमेंड किए गए एक कंटेंट को प्रमोट किया है, जो इस्लाम और ख़ास समुदाय से जुड़ा हुआ है।

PETA की वेबसाइट पर ‘एनिमल इस्लाम’ नामक एक वेबसाइट का प्रचार किया गया है और कहा गया है कि यहाँ उन लोगों की मदद के लिए एक उम्दा कंटेंट्स हैं, जो जानवरों को मारने में विश्वास नहीं रखते हैं। उसने समुदाय विशेष के उन लोगों को इस वेबसाइट पर विजिट करने की सलाह दी है, जो अपने समुदाय के भीतर इस्लामी विधि के हिसाब से दया और करुणा को बढ़ावा देना चाहते हैं। साथ ही उसने दावा किया कि उसकी हेल्प टीम ईद पर भी जानवरों को बचाने के लिए 24 घंटे कॉल पर उपलब्ध है।

साथ ही उसने जानवरों को मारने के लिए भी कई विधियाँ बताई हैं। ये आश्चर्यजनक है क्योंकि PETA उन हिन्दुओं को शाकाहारी बनने की सलाह देता है, जिनमें से कई पहले से ही शाकाहारी हैं और सामान्यतः उनके किसी भी त्यौहार में जीव-हत्या नहीं होती। लेकिन जब बात इस्लाम की आती है तो PETA जानवरों को मारने की विधि बताने लगता है। फिर वो शाकाहार की बातें क्यों करता है?

PETA ने जानवरों की हत्या करते समय क्या करना चाहिए और क्या नहीं, इस सम्बन्ध में सलाह जारी किया हुआ है। हिन्दुओं को शाकाहारी बनने की शिक्षा देने वाला PETA समुदाय विशेष को जानवरों को किन विधियों से मारने की सलाह देता है, वो देखिए:

  1. जानवरों को मारते समय एकदम सावधानी से हैंडल करें। किसी भी प्रकार का तनाव या क्रूरता हराम है। इससे गलत तरीके से खून निकलने लगेगा और माँस भी ठीक तरह का नहीं मिलेगा। एक जानवर को मारते समय वहाँ दूसरे जानवर को न रखें, ताकि वो एक-दूसरे की हत्या को देख नहीं पाएँ।
  2. चाकू की धार को एकदम तेज़ कर के रखें। उसे बार-बार धार दें। उसकी लम्बाई ठीक रखें। इसकी लम्बाई 45 सेंटीमीटर होनी चाहिए। चाकू को जानवरों को न देखने दें, नहीं तो वो डर जाएँगे।
  3. जानवर को ‘क्विब्ला’ की दिशा में रखें। उसकी गर्दन को किसी छेद या नाले में रख कर उसे मारें ताकि खून वहीं बह जाए। जानवर के ऊपर खड़ा नहीं हों। अगर जानवर बड़े आकार का है तो उसकी हत्या करते समय लोगों की मदद लें, जो उसके पाँवों को पकड़ सकते हैं।
  4. काफी अच्छे तरीके से जानवर की हत्या करें। तीन से ज्यादा बार वार न करें। गले के पास जितनी भी नसें हैं, उन सबको काट डालें। साँस और भोजन की नली को काट डालें। उस समय ‘क़ुर्बानी की दुआ’ पढ़ते रहें। जानवर को हाथ-पाँव मारने दें, ताकि खून जल्दी-जल्दी निकल जाए।
  5. ये याद रखें कि किसी की भी जान लेना सिर्फ अल्लाह के हाथ में है। हम अल्लाह द्वारा बनाई गई दुनिया का एक हिस्सा हैं, इसीलिए ज़िंदा रहने के लिए हम ऐसा करते हैं। दूसरे जीवों की तरह हमें भी अपना अस्तित्व बचाना है।
  6. जानवर को काटने के बाद 6 मिनट तक उसका खून बहने दें। भेंड़ या बकरों के मामले में 5 मिनट तक ब्लीडिंग होने दें।
  7. दूसरे जानवर को काटने से पहले खून को एकदम साफ़ कर दें क्योंकि खून की गंध से दूसरे जानवरों को तनाव होता है।
  8. याद रखें कि ये जानवर अल्लाह द्वारा बनाए हुए हैं और जन्नाह (जन्नत) जाते हैं। अगर हम उसके साथ बुरा व्यवहार करते हैं तो इसके लिए हमें जिम्मेदार ठहराया जाएगा।

PETA ने खास मजहब के लिए जानवरों को काटने का सबसे बेहतरीन तौर-तरीका बताया है। साथ ही सलाह दी है कि क़ुरबानी से पहले जानवरों को खरीदें और उनका पालन-पोषण करें, फिर देखें कि आप उन्हें काट सकते हैं या नहीं। PETA ने खास मजहब को कहा है कि अगर आप उन जानवरों को नहीं काट सकते तो किसी को नहीं काटें। लेकिन, फिर भी काटने को लेकर तौर-तरीके बताए गए हैं।

शेफाली वैद्य ने PETA की वेबसाइट के स्क्रीनशॉट्स शेयर कर के उसके दोहरे रवैये का खुलासा किया। उन्होंने ऑपइंडिया को बताया था कि PETA ने पिछले 48 घंटों मे सारा का सारा ध्यान उन्हें ट्रोल करने में लगाया है और इसके सिवा कुछ नहीं किया है। उन्होंने कहा कि एक अंतरराष्ट्रीय संस्था एक महिला को निशाना बनाने में अपनी सारी ऊर्जा खर्च कर रहा है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि PETA एक ट्रोल के सिवा कुछ नहीं है।

शेफाली वैद्य ने इस दौरान PETA को दी गई चुनौती पर भी बात की, जिसमें उन्होंने ईद पर उसके द्वारा बैनर लगाने पर शाकाहारी बन जाने की बात कही थी। शेफाली ने कहा कि उनकी चुनौती का जवाब देने कि बजाए PETA दुनिया भर की बातें कर रहा है और ट्रोलिंग में लगा हुआ है। शेफाली वैद्य का सवाल था कि आखिर 2 दिन से एक इंटरनेशनल इन्स्टिट्यूशन एक प्राइवेट इन्डविजूअल को निशाना बनाने में क्यों लगा हुआ है?

13 बार में ऐसे पहुँचा 300 किलो सोना: केरल के वामपंथी मंत्री साथ 16 कॉल, मुख्यमंत्री विजयन से पूछताछ की माँग

5 जुलाई को तिरुवनंतपुरम हवाई अड्डे से 30 किलोग्राम सोना जब्त होने के बाद से केरल सोना तस्करी कांड गर्माया हुआ है। रिपोर्ट्स के अनुसार, UAE के डिप्लोमैटिक मिशन के कुछ कर्मचारियों की मदद से जुलाई 2019 से लेकर अब तक कम से कम 300 किलोग्राम सोने की तस्करी हुई। इसे 13 खेप में बिना जाँच के पास किया गया। इनमें से कुछ का वजन 70 किलो तक भी था।

अब इसी के मद्देनजर वरिष्ठ कॉन्ग्रेस नेता रमेश चेन्निथला ने रविवार (जुलाई 19, 2020) को इस मामले में सीएम पिनराई विजयन से पूछताछ करने की माँग उठाई है। उन्होंने कहा कि सोने की तस्करी के सनसनीखेज मामले में मुख्यमंत्री कार्यालय की भूमिका की जाँच होनी चाहिए और सीएम पिनराई विजयन से भी पूछताछ होनी चाहिए।

विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष ने भी सोने की तस्करी के मामले में मीडिया से बात करते हुए सीएम कार्यालय पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि इस मामले में मुख्य आरोपित के साथ सीएम कार्यालय के उच्चाधिकारियों के शामिल होने की खबरें सामने आने के बाद कार्यालय की अक्षमता और वहाँ फैला भ्रष्टाचार उजागर हो गया है।

हिंदुस्तान की रिपोर्ट में सूत्रों के हवाले से बताया गया है कि इस मामले पर आगे की जाँच के लिए कुछ कार्यक्रमों की जाँच हो रही है। एनआईए ने भी 4 लोगों को गिरफ्तार कर लिया है और सीमा शुल्क ने भी अब तक 13 लोगों को गिरफ्तार किया है। अब इन लोगों से पूछताछ के बाद जिन लोगों के नाम सामने आए, उन्हें भी जल्द सूचित किया जाएगा।

गौरतलब है कि इससे पहले भी 5 जुलाई को मामले के खुलासे के बाद इस केस में पिनराई विजयन का कार्यालय शक के घेरे में आया था। बताया जा रहा था कि ‘डिप्लोमेटिक इम्युनिटी’ का सहारा लेकर सोने की तस्करी की गई और साथ ही एयरपोर्ट से भी इस सोने को पास कराने के लिए इसके सहारा लिया गया।

सोने की इस तस्करी में स्वप्ना सुरेश नामक अधिकारी का नाम आया था और स्वप्ना का नाम आते ही उसके फोन कॉल्स से यह खुलासा हुआ था कि वह सुरेश और पीआर सरिथ राज्य के बड़े नेताओं से लगातार संपर्क में थी।

इसके अलावा वह केरल के उच्च शिक्षा मंत्री केटी जलील से भी टच में थी। केरल के उच्च शिक्षा मंत्री और CPI (M) नेता केटी जलील और आरोपित स्वप्ना सुरेश के बीच कॉल डेटा रिकॉर्ड से पता चला था कि दोनों के बीच 16 कॉल किए गए थे और वह निरंतर सम्पर्क में थे।

बता दें कि स्वप्ना सुरेश केरल गोल्ड तस्करी केस की प्रमुख आरोपित है। इससे पहले, NIA ने UAE से दुबई में रहने वाले तीसरे आरोपित फैसल फरीद के प्रत्यर्पण की माँग की थी। NIA ने यह भी दावा किया था कि सोने की तस्करी आतंकी गतिविधियों की फंडिंग के लिए की जा रही थी।

‘राम नेपाल के, रावण श्रीलंका का… और भारत बंदरों का देश’ – देवदत्त पटनायक ने किया हनुमान और भैरव का अपमान

हिन्दू धर्म-ग्रंथों पर दर्जनों किताबें लिख कर खुद को माइथोलॉजी विशेषज्ञ बताने वाले देवदत्त पटनायक ने एक बार फिर से सोशल मीडिया पर अपनी हिन्दू घृणा को प्रदर्शित किया है। हिन्दूफोबिया से ग्रसित देवदत्त पटनायक ने इस बार हनुमान का मजाक बनाया है।

देवदत्त पटनायक ने एक तरफ नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली के उस बयान को आगे बढ़ाया, जिसमें उन्होंने श्रीराम के नेपाल में जन्म लेने की बात कही थी, वहीं दूसरी तरफ उन्होंने भारत को बंदरों का देश करार दिया। ये सब करने के लिए उन्होंने रामायण का सहारा लिया।

देवदत्त पटनायक, जिन्हें सोशल मीडिया पर कुछ लोग देवदत्त ‘नालायक’ भी कहते हैं, ने ट्विटर पर लिखा कि रामायण के बारे में जो नई बातें सामने आ रही हैं, उसने हिंदुत्व ब्रिगेड को आक्रोशित और बेचैन कर दिया है। उन्होंने लिखा कि भगवान श्रीराम नेपाल के थे और रावण श्रीलंका का था। साथ ही आगे लिखा कि भारत बंदरों का देश है।

इस ट्वीट के साथ देवदत्त पटनायक ने भगवान हनुमान का चित्र डाला, जो बताता है कि वो उनका अपमान करने के लिए ऐसा कर रहे हैं। लोगों ने उनके इस ट्वीट की जम कर निंदा की।

देवदत्त पटनायक ने एक अन्य ट्वीट में भैरव का भी अपमान किया। उन्होंने लिखा कि हिंदुत्व के लोग कहते हैं कि हम सब मूर्ख हैं, तब भी हमारे पर हँसो मत। इसके बाद उन्होंने अजीबोगरीब दावा किया कि हिन्दू धर्म में हँसने को डरावना बताया गया है। इसके बाद उन्होंने तंज कसते हुए लिखा कि भैरव के अट्टहास से तो विज्ञान की राहें खुल जाती हैं।

इस ट्वीट के साथ उन्होंने भैरव का चित्र भी लगाया। बता दें कि हिन्दू धर्म में काल भैरव की अधिकतर तंत्र साधना करने वालों द्वारा पूजा की जाती है और उन्हें भगवान शिव से जोड़ कर देखा जाता है।

देवदत्त पटनायक लोगों की आलोचना से इतना डर गए कि उन्होंने अपनी इस दोनों ट्वीट्स में रिप्लाइज को भी ऑफ कर दिया, अर्थात कोई भी उनके इस ट्वीट का जवाब नहीं दे सकता। आलोचना से डरते हुए उन्होंने ऐसा किया।

सोशल मीडिया पर लोगों ने कहा कि हिंदुत्व पर कई मोटी-मोटी किताबें लिखने वाला आज एक सवाल से भी भाग रहा है और आलोचना को बर्दाश्त नहीं कर पा रहा है। हिन्दू घृणा फैलाने में लगे देवदत्त पटनायक आए दिन इस तरह के ट्वीट्स कर के हिंदुओं की भावनाओं को ठेस पहुँचाते रहते हैं।

इससे पहले पटनायक ने कहा था कि हिंदुत्व यह मानता है कि सीता को क़ैद में रखने के लिए लक्ष्मण रेखा बनाई गई थी जबकि हिंदुइज्म कहता है कि रावण को रोकने के लिए लक्ष्मण रेखा बनाई गई थी। देवदत्त पटनायक ने ऐसा ट्वीट कर हिंदुत्व पर निशाना साधा था। इसके बाद लोगों ने उन्हें उनका ही एक पुनारा ट्वीट याद दिला दिया था, जिसमें उन्होंने लक्ष्मण रेखा से जुड़ी कहानी को ही काल्पनिक करार दिया था।

देवदत्त पटनायक सोशल मीडिया पर माँ-बहन की गालियाँ देने के लिए भी जाने जाते हैं। एक बार सवाल पूछने वाले को जवाब देते हुए देवदत्त पटनायक ने अजीबोगरीब भाषा का इस्तेमाल किया था। उन्होंने लिखा था कि उन्होंने आज ही अपनी माँ (जो मर चुकी हैं) से बात की है और वह बिलकुल खुश हैं। साथ ही उन्होंने दावा किया था कि उनके सभी पूर्वज स्वर्ग में हैं और हँसी-ख़ुशी हैं। उन्होंने ट्विटर यूजर को लिखा था कि तुम्हारे सारे पूर्वक नरक में बिलख-बिलख कर रो रहे हैं।

जो फिल्म हुई हिट, मेघना गुलजार ने उसके लेखक का क्रेडिट छीन लिया: हटाया था फिल्म फेयर से भी नाम

बॉलीवुड फिल्ममेकर मेघना गुलज़ार एक बार फिर राज़ी फ़िल्म को लेकर विवादों में आ गई हैं। दरअसल साल 2018 में आई इस फ़िल्म की कहानी को लिखने वाले लेखक हरिंदर सिक्का ने उन पर गंभीर आरोप लगाए हैं। 

सिक्का का कहना है कि गुलज़ार ने पूरी फिल्म का क्रेडिट पाने के लिए उनके साथ ज्यादतियाँ कीं। उनका कहना है कि उनका नाम फिल्म फ़ेयर से हटाया गया। उन्हें जयपुर लिटरेचर फेस्ट में जाने से रोका गया। साथ ही उनकी बुक भी समय पर पब्लिश नहीं होने दी गई।

रिपब्लिक टीवी से बात करते हुए सिक्का ने कई खुलासे किए। उन्होंने बॉलीवुड लॉबी पर बात करते हुए कहा कि उनके पास इस बात के सबूत हैं कि जयपुर लिटरेचर फेस्ट से एक शख्स के कहने पर उन्हें हटाया गया। उन्होंने जयपुर लिटरेचर फेस्ट हेड की स्टेटमेंट भी ऑन टीवी पढ़ी। जिसमें हेड ने कहा था कि 35 साल के करियर में कभी भी किसी एक व्यक्ति का नाम हटाने के लिए उन पर इतना दबाव नहीं बनाया गया। 

उन्होंने बताया कि उनका नाम हर जगह से हटाया गया और जब बात ओरिजिनल स्टोरी को अवॉर्ड मिलने की आई तो भी अंधाधुंध को वो अवॉर्ड दे दिया गया, जो फ्रेंच मूवी की कॉपी थी।

अपनी बात रखते हुए उन्होंने छपाक फ़िल्म में लक्ष्मी अग्रवाल की वकील के साथ हुई नाइंसाफी को भी गौर करवाया। उन्होंने कहा कि उनका इस इंडस्ट्री से कोई लेना देना नहीं है। वो बहुत बढ़िया क्षेत्र से आते हैं। लेकिन आज वो ये सब सिर्फ़ इसलिए बता रहे हैं क्योंकि उनके साथ भी ये सब बाहरी होने के कारण किया गया।

उल्लेखनीय है कि इससे पूर्व गुलज़ार पर सिक्का ने उनकी स्टोरी के साथ जस्टिस न कर पाने का आरोप लगाया था। उन्होंने कहा था कि अगर मेघना गुलजार उनकी लिखी कहानी के साथ न्याय करतीं तो फिर इस फ़िल्म को राष्ट्रीय अवार्ड जरूर मिलता।

सिक्का का कहना था कि फिल्म को राष्ट्रीय पुरस्कार जीतना चाहिए था। लेकिन उन्हें लगता है कि मेघना ने उन्हें धोखा दिया है। उनके मुताबिक निर्देशक ने वादा किया था कि वह उनकी कहानी के साथ छेड़छाड़ नहीं करेंगी। बावजूद इसके छेड़छाड़ हुई। जिसके कारण वह अब भी दुखी होते हैं।

बता दें कि मेघना गुलजार के निर्देशन में बनी राज़ी फिल्म साल 2018 में आई थी। इसे सिक्का की मशहूर किताब ‘कॉलिंग सहमत’ की कहानी पर बनाया गया था। इस फिल्म में आलिया भट्ट और विक्की कौशल ने अभिनय किया था। बॉक्स ऑफिस पर धमाकेदार कमाई करने वाली इस फिल्म को लेकर सिक्का ने प्रतिक्रिया में कहा था कि उन्हें इस किताब को लिखने में 8 साल लगे। लेकिन फिल्म बनने के बाद लगा कि उन्होंने निर्माता को चुनने में गलती कर दी, जो इस कहानी को घर-घर पहुँचाने में नाकामयाब रही।

नौशाद ने प्रेमिका के पति पर गाड़ी चढ़ा फाड़ डाला सिर, हत्या को दिया एक्सीडेंट का रूप: मो ताकी, नूर खान सहित गिरफ्तार

मुंबई में एक व्यक्ति पर प्यार का ऐसा हिंसक भूत सवार हुआ कि उसने अपनी शादीशुदा प्रेमिका के पति को ही मार डाला। साथ ही उसने इस घटना को एक्सीडेंट का रूप देने की भी कोशिश की। प्रेमिका के पति की बेरहमी से हत्या करने और फिर उसे एक्सीडेंट का रूप देने के मामले में मुख्य आरोपित नौशाद खान को गिरफ्तार कर लिया गया है। मृतक आहादुल्लाह खान गोवंडी का रहने वाला था।

‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ की खबर के अनुसार, नौशाद खान ने अपने 3 साथियों के साथ मिल कर इस हत्याकांड को अंजाम दिया था। उन तीनों को भी पुलिस ने अपने शिकंजे में ले लिया है। शिवाजी नगर पुलिस थाने ने जानकारी दी है कि मृतक सिविल प्लानिंग कांट्रेक्टर था, जिसने नौशाद से 2 लाख रुपए का लोन ले रखा था। हालाँकि, वो लोन वापस चुकाने में अक्षम रहा था। मृतक आहादुल्लाह की लाश नवीं मुम्बई के तुरभे से बरामद हुई।

उसका सिर बुरी तरह क्षतिग्रस्त था। उसकी लाश देख कर ऐसा प्रतीत हो रहा था कि एक्सीडेंट में ऐसा हुआ है। लेकिन, पुलिस की तहकीकात में सच्चाई कुछ और सामने आई। सीनियर इंस्पेक्टर किशोर गायके ने बताया कि मृतक के भाई ने नौशाद को मुख्य आरोपित बनाया था क्योंकि एक तो उससे आहादुल्लाह ने लोन ले रखा था और दूसरा यह कि उसका मृतक की बीवी के साथ प्रेम-संबंध था। इसके बाद पुलिस ने नौशाद और उसके साथियों से कड़ाई से पूछताछ की।

उसके साथियों के नाम हैं- मोहम्मद ताकी, नूर खान और राम कुमार। पूछताछ में सामने आया कि आहादुल्लाह की हत्या काफी बेरहमी से की गई थी और पुलिस की कार्रवाई से बचने के लिए अपराधियों ने इसे एक्सीडेंट का रूप दिया था। नौशाद ने आहादुल्लाह को एक पेंटिंग कॉन्ट्रैक्ट का लालच दिया था और इसी बहाने उसे तुर्भे लेकर गया था। वहाँ उसने साथियों संग मिल कर उसके सिर पर लोहे के रोड से जोरदार वार किया।

सिर पर लोहे से वार होते ही आहादुल्लाह वहीं गिर गया और गंभीर रूप से घायल हो गया। इसके बाद नौशाद ने उसे सुला कर उसके सर के ऊपर से गाड़ी चढ़ा दी। उसका सिर फटने के बाद उन्होंने समझा कि पुलिस इसे एक्सीडेंट मान कर जाँच करेगी और वो लोग बच जाएँगे। मोहम्मद ताकी ने गाड़ी चला कर उसके सिर को कुचला था। फ़िलहाल सभी आरोपितों को जेल भेज दिया गया है।

‘रंडी की मस्जिद’ पर गिरी बिजली, टूट गया गुंबद: अंग्रेज ने बनवाया, कट्टर मुस्लिमों ने दिया था यह नाम

राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में रविवार (जुलाई 19, 2020) को हुई मूसलाधार बारिश से कई इलाके प्रभावित हुए। वैसे तो बारिश के समय में यहाँ जलभराव और ट्रैफिक की समस्याएँ दिखना बेहद आम बात है। मगर कल आकाशीय बिजली का कहर भी दिल्ली में देखने को मिला।

दरअसल, दिल्ली के हौज खासी इलाके में कल आकाशीय बिजली के कारण एक ऐतिहासिक मस्जिद का गुम्बद टूट गया। मस्जिद का नाम मुबारक बेगम मस्जिद है। इसका उल्लेख कई जगहों पर ‘रंडी की मस्जिद’ नाम से भी है।

रविवार सुबह करीब 6 बजे हुई इस घटना में किसी शख्स को कोई नुकसान नहीं पहुँचा। मगर, 200 वर्षों से भी अधिक पुराने इस मस्जिद का गुम्बद (बीच वाला) पूरी तरह से टूट गया। मालूम हो कि मुबारक बेगम मस्जिद दिल्ली की हेरिटेज बिल्डिंगों में शुमार बताया जाता है। इसे सन् 1823 में बनाया गया था।

टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, मौलवी मोहम्मद जाहिद बताते हैं कि उन्होंने रविवार को बहुत तेज आवाज सुनी, जैसे आकाश गिर रहा हो। आवाज सुनते ही वो मस्जिद की ओर भागे और देखा कि ऐतिहासिक मस्जिद का गुंबद टूट गया था। उनके अनुसार, ये आकाशीय बिजली के कारण ही हुआ है।

अब मस्जिद कमिटी के सदस्य साबिर अंसारी का कहना है कि इस ऐतिहासिक विरासत को संभाले रखने के लिए इसे जल्द से जल्द ठीक कराना होगा। इसकी देखरेख दिल्ली वक्फ बोर्ड के हाथ में है।

दिल्ली वक्फ बोर्ड ने टाइम्स ऑफ इंडिया को बताया कि वे मस्जिद को ठीक कराने के लिए आर्किटेक्ट और इंजीनियरों को भेजेंगे और जल्द से जल्द मस्जिद को पहुँचे नुकसान को ठीक कराएँगे। मगर, स्थानीय निवासी अबु सुफियाँ जैसे लोगों की चिंता ये है कि अब यह मस्जिद आधुनिक डिजाइन के साथ बनवाया जाएगा। इससे यह अपना वास्तविक मूल्य खो देगा।

गौरतलब है कि एक ओर जहाँ इस घटना के बाद स्थानीय लोगों व मस्जिद कमिटी में इसे रिप्येर करवाने की चिंता है। वहीं, दूसरी ओर इसके खबरों में आने के बाद इसके नाम को लेकर ट्विटर पर यूजर्स चर्चा कर रहे हैं और यह जानने में उत्सुकता दिखा रहे हैं कि आखिर इस मस्जिद का नाम रंडी की मस्जिद कैसे पड़ा। तो आइए आज इसी का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य आपको बताएँ… 

रंडी की मस्जिद

ये बात उस समय की है, जब भारत में ब्रिटिशों का उदय और मुगलों का पतन हो रहा था। ब्रिटिश धीरे धीरे भारत पर काबिज हो चुके थे और डेविड ऑक्टरलॉनी (David Ochterlony) नाम का ब्रिटिश भी यहाँ का एक प्रमुख प्रशासक बन गया था। डेविड ऑक्टरलॉनी की 13 बीवियाँ थीं। इनमें से एक मुबारक बेगम भी थीं, जिनकी उम्र उन सब में सबसे कम थी।

इन्हीं के नाम पर मस्जिद का नाम रंडी की मस्जिद रखा गया। मौजूदा जानकारी के अनुसार, मुबारक बेगम जन्मजात मुस्लिम नहीं थीं। वह एक मराठा ब्राह्मण परिवार से थीं और नृत्य कला में माहिर थीं। उनका संबंध पुणे से था। लेकिन बाद में वो दिल्ली आईं और मुगलों के दरबार में नृत्य प्रदर्शन करती रहीं। इस बीच उसने इस्लाम अपना लिया।

मुबारक बेगम ने इसके बाद अपनी पहचान एक कट्टर मुस्लिम के रूप में स्थापित की। इसी बीच उसकी नजदीकियाँ सर डेविड से बढ़ने लगीं और आखिरकार एक समय में दोनों ने इस्लामिक रिवाजों के साथ शादी कर ली। दोनों के बच्चे भी हुए। लेकिन कुछ समय बाद बेगम की मौत हो गई।

डेविड ने मुबारक बेगम के इस्लाम से लगाव के कारण मुगल बाग में मस्जिद भी बनवाई। इसी का नाम मुबारक बेगम मस्जिद रखा गया। किंतु कट्टर मुस्लिम फिर भी मुबारक बेगम को उसके पेशे के साथ जोड़ कर ही देखते रहे और उन्होंने उसका नाम ‘रंडी की मस्जिद’ रख दिया।

बहुत समय तक इस मस्जिद में मुस्लिमों ने प्रवेश नहीं किया और उसे रंडी की मस्जिद ही बोलते रहे। नतीजतन इस मस्जिद का संबंध इतिहास से होने के कारण इसे तवज्जो तो दिया जाने लगा लेकिन इसका नाम रंडी की मस्जिद ही पड़ गया।

‘उस जैसी लड़की’ को इंडस्ट्री से बाहर का रास्ता दिखाओ, बाहर निकल कोई और काम करे: कंगना रनौत पर करण जौहर

फिल्म निर्देशक करण जौहर का एक पुराना वीडियो वायरल होने के बाद वो लोगों की आलोचना का शिकार बने हैं। करण जौहर इस वीडियो में अभिनेत्री कंगना रनौत पर टिप्पणी करते नजर आ रहे हैं। ये वीडियो ‘लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स’ का है, जिसमें करण जौहर ये कहते सुने जा सकते हैं कि कंगना रनौत को फिल्म इंडस्ट्री छोड़ देनी चाहिए। उनके इस बयान पर उनके समर्थक तालियाँ पीटते हुए नजर आते हैं।

वीडियो में करण जौहर कहते हैं कि वो कंगना रनौत को बार-बार ‘महिला कार्ड’ और ‘विक्टिम कार्ड’ खेलते हुए देख कर थक चुके हैं। करण जौहर ने कंगना रनौत के बारे में आगे कहा कि कोई हमेशा विक्टिम नहीं बना रह सकता है और न ही कोई हमेशा के लिए एक ही कहानी सबको बार-बार सुना सकता है। उन्होंने तंज कसा कि कंगना हमेशा कहती हैं कि फिल्म इंडस्ट्री की इस बुरी दुनिया ने उन्हें डरा-धमका कर रखा हुआ है।

इसके बाद करण जौहर ने कंगना को इंडस्ट्री छोड़ देने की सलाह दे डाली और कहा कि वो बाहर जाकर कोई और काम करें। उन्होंने कंगना रनौत से पूछा कि क्या तुम्हें कोई तुम्हारे सिर पर बंदूक रख कर फिल्में करने को बोल रहा है? ये सब कहने के दौरान करण जौहर लगातार मुस्कुरा रहे थे, जिससे सोशल मीडिया पर भी लोगों ने उनकी एक स्थापित अभिनेत्री का मजाक बनाने को लेकर आलोचना की।

सुशांत सिंह राजपूत की मौत के बाद ही बॉलीवुड में नेपोटिज्म को लेकर बहस जोरों पर है और करण जौहर व उनकी कंपनी ‘धर्म प्रोडक्शंस’ पर बाहरी प्रतिभाओं को नजरंदाज कर फिल्मी हस्तियों के परिवार से जुड़े लोगों को मौका देने के आरोप लगे हैं। इसी कड़ी मे कंगना ने आरोप लगाया था कि करण जौहर ने स्पष्ट कहा था कि ‘उनकी जैसी लड़की’ को फिल्म इंडस्ट्री से बाहर का रास्ता दिखा देना चाहिए।

दरअसल, कंगना रनौत इसी वीडियो के बारे में टिप्पणी कर रही थीं, जो अब वायरल हुआ है। कंगना रनौत ने कहा कि उन्हें इतना परेशान किया कि वो कहीं गायब होना चाहती थीं। लोग उनसे किनारा करने लगे थे और उनके रिश्तेदार अपने बच्चों को उनसे नहीं मिलने देते थे। बकौल कंगना, ऐसा इसीलिए किया जाता था क्योंकि उन्हें अपनी इज्जत खोने का डर सताता था। कंगना ने सुशांत की मौत के लिए भी बॉलीवुड के ‘माफिया गिरोह’ को जिम्मेदार ठहराया।

हाल ही में कंगना ने ‘रिपब्लिक टीवी’ पर अर्नब गोस्वामी से बात करते हुए सुशांत सिंह राजपूत की मौत को ‘हत्या’ करार दिया। साथ ही कई दिग्गज निर्माता, निर्देशकों और फिल्म प्रोड्यूसर्स पर इसका आरोप लगाया। कंगना ने कहा इन मूवी माफियाओं समेत तमाम लोगों ने मिल कर सुशांत सिंह का करियर ख़त्म किया है। उन्होंने पूछा कि अगर महेश भट्ट जानते थे कि सुशांत सिंह अच्छा महसूस नहीं कर रहे हैं तो उन्होंने सुशांत के पिता को इस बारे में क्यों नहीं बताया? 

कंगना के मुताबिक़ मुंबई पुलिस को 2 बड़े प्रोड्यूसर्स को समन भेजना चाहिए था। कारण जौहर और आदित्य चोपड़ा। कंगना ने यशराज फिल्म पर भी सुशांत सिंह राजपूत को मानसिक रूप से प्रताड़ित करने का आरोप लगाया। कंगना ने खुलासा किया कि यशराज बैनर की टैलेंट एजेंसी ने सुशांत को हायर किया था। सुशांत के लगभग सारे पेशेवर फैसले वही लेते थे। उनकी नीतियाँ इतनी भयानक थी कि एक कलाकार मन मुताबिक फैसले भी नहीं ले सकता था।