प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोमवार (20 जुलाई 2020) को दिग्गज आईटी कंपनी आईबीएम (इंटरनेशनल बिजनेस मशीन) के सीईओ अरविंद कृष्णा से बात की। यह वार्ता वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से हुई।
PM Narendra Modi interacted with IBM CEO Arvind Krishna via video conferencing today. He mentioned the strong connect of IBM with India and its huge presence in the country, with over one lakh people working across 20 cities in the company: Prime Minister’s Office (File pic) pic.twitter.com/Mb8urIwZi1
वार्ता के दौरान प्रधानमंत्री ने आईबीएम और भारत के बीच मजबूत संबंधों और देश में इसकी व्यापक मौजूदगी की बात कही। प्रधानमंत्री ने कहा कि देश के करीब 20 शहरों में आईबीएम में एक लाख से ज्यादा लोग काम कर रहे हैं।
Talking about impact of #COVID on business culture, PM said that ‘work from home’ is being adopted in a big way and the government is constantly working towards providing infrastructure, connectivity & regulatory environment to ensure that this technological shift is smooth: PMO
प्रधानमंत्री कार्यालय की ओर से साझा की गई जानकारी के मुताबिक इस दौरान व्यापार पर कोरोना वायरस वैश्विक महामारी के असर पर भी बात हुई। प्रधानमंत्री ने कहा कि वर्क फ्रॉम होम को बड़े स्तर पर अपनाया गया है और सरकार इसके लिए बुनियादी ढाँचा, कनेक्टिविटी और विनियामक वातावरण प्रदान करने की दिशा में लगातार काम कर रही है ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि यह तकनीकी बदलाव सुचारू रूप से हो।
He also discussed the technologies associated and challenges involved in the recent decision of IBM to make 75% of its employees to work from home: Prime Minister’s Office (PMO)
उन्होंने आईबीएम के उस हालिया फैसले में प्रौद्योगिकियों और चुनौतियों पर चर्चा की, जिसमें कंपनी ने 75 फीसदी कर्मचारियों को घर से काम करने के लिए तैयार किया। प्रधानमंत्री ने भारत में 200 स्कूलों में AI पाठ्यक्रम के शुभारंभ की दिशा में सीबीएसई के साथ आईबीएम द्वारा निभाई गई भूमिका की सराहना की।
PM Modi interacted with IBM CEO Arvind Krishna via video conferencing today. PM said that ‘work from home’ is being adopted in a big way&govt is constantly working towards providing infrastructure,connectivity ®ulatory environment to ensure this technological shift is smooth pic.twitter.com/cMLVofUW0O
उन्होंने कहा कि सरकार देश में तकनीक से जुड़ने को आगे बढ़ाने के लिए छात्रों को शुरुआती अवस्था में ही AI, मशीन लर्निंग आदि जैसी अवधारणाओं से परिचित कराने की दिशा में काम कर रही है। आईबीएम के सीईओ ने कहा कि प्रौद्योगिकी और डेटा के बारे में बीजगणित (Algebra) की शिक्षा बुनियादी कौशल की श्रेणी में होनी चाहिए। इसे जुनून के साथ पढ़ाया जाना चाहिए और इसे जल्दी शुरू किया जाना चाहिए।
इसके साथ ही प्रधानमंत्री ने इस बात पर जोर डाला कि यह भारत में निवेश करने का एक शानदार समय है। उन्होंने कहा कि देश तकनीकी क्षेत्र में हो रहे निवेशों का स्वागत और समर्थन कर रहा है। उन्होंने कहा कि जब दुनिया में मंदी देखी जा रही है, भारत में एफडीआई का प्रवाह बढ़ रहा है।
उन्होंने कहा कि देश एक आत्मनिर्भर भारत की दृष्टि से आगे बढ़ रहा है। अरविंद कृष्णा ने भारत में आईबीएम की विशाल निवेश योजनाओं के बारे में पीएम को जानकारी दी। इसके साथ ही उन्होंने आत्मानिर्भर भारत पर विश्वास जताया।
उन्होंने कहा कि स्वास्थ्य सेवा की दृष्टि को आगे ले जाने में आईबीएम महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। आईबीएम के सीईओ ने आयुष्मान भारत के लिए प्रधानमंत्री के दृष्टिकोण की सराहना की और बीमारियों की जल्द पहचान के लिए प्रौद्योगिकी का उपयोग करने के बारे में भी बात की।
दिल्ली के 24 अकबर रोड स्थित कॉन्ग्रेस मुख्यालय के एक कर्मचारी ने सुसाइड कर लिया। वहीं राजस्थान के चूरू जिले के सादुलपुर विधानसभा क्षेत्र से कॉन्ग्रेस विधायक कृष्णा पूनिया के घर पर सोमवार (जुलाई 20, 2020) को केंद्रीय जाँच ब्यूरो (सीबीआई) ने छापेमारी की।
A staff member at Congress office at 24, Akbar Road in Delhi, died by suicide in the servant quarter. The body was found yesterday: Delhi Police
कॉन्ग्रेस ऑफिस में शव कर्मचारी का शव सर्वेंट क्वार्टर में मिला। समाचार एजेंसी ANI के मुताबिक, कर्मचारी ने रविवार (जुलाई 19, 2020) को सर्वेंट रूम में जाकर आत्महत्या कर ली। अभी तक की जानकारी के मुताबिक मौके से कोई सुसाइड नोट नहीं मिला है। आत्महत्या की वजह भी सामने नहीं आ पाई है। फिलहाल पुलिस मामले की जाँच कर रही है।
इधर एसएचओ विष्णुदत्त विश्नोई सुसाइड मामले में पूछताछ के लिए सीबीआई की टीम कृष्णा पूनिया के घर पर पहुँची। बताया जा रहा है कि सीबीआई की टीम ने पूरे बंगले को घेर लिया था। फिलहाल पूनिया होटल फेयरमाउंट में कॉन्ग्रेस के अन्य विधायकों के साथ मौजूद हैं। छापेमारी के समय को लेकर सवाल उठ रहे हैं।
Rajasthan: A CBI team reaches the residence of Congress MLA Krishna Poonia in connection with the alleged suicide of Churu SHO Vishnu Dutt Vishnoi, say sources
बता दें कि इसी साल 23 मई को विश्नोई ने कमरे में फंदे से लटककर आत्महत्या कर ली थी। इस घटाने के बाद पुलिस महकमे में हड़कंप मच गया था। इस घटना के बाद राजनीति भी गरमा गई थी, क्योंकि स्थानीय कॉन्ग्रेस विधायक कृष्णा पूनिया पर विश्नोई को प्रताड़ित करने के आरोप लगे थे।
हालाँकि, पूनिया ने इन सभी आरोपों से इनकार कर दिया था। वहीं, विश्नोई के परिजनों ने भी विरोध जताते हुए शव लेने से इनकार कर दिया था और उनकी रिपोर्ट पर राजगढ़ थाने में आईपीसी की धारा 306 के तहत मामला दर्ज किया गया था। इस घटना की सीबीआई जाँच की माँग की गई थी।
थाने के स्टाफ ने भी स्थानीय कॉन्ग्रेस विधायक कृष्णा पूनिया और उनके समर्थकों पर झूठी शिकायतें करने का आरोप लगाया है। इसी मामले में कृष्णा पूनिया से सीबीआई पूछताछ करना चाह रही है।
गौरतलब है कि कॉन्ग्रेस विधायक कृष्णा पूनिया को हाल ही में राज्य सरकार ने जेड श्रेणी की सुरक्षा उपलब्ध करवाई है। पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि खुफिया विभाग की ओर से जारी आदेश के बाद विधायक और उनके पति को सुरक्षा प्रदान की गई है। गहलोत सरकार ने कॉन्ग्रेस विधायक को मिल रही धमकियों के मद्देनजर यह फैसला लिया था। हालाँकि पूनिया को जेड सुरक्षा देने की प्रदेश सरकार के फैसले पर सोशल मीडिया में लोगों ने काफी आपत्ति जताई थी।
बता दें कि विष्णुदत्त विश्नोई की आत्महत्या के बाद थाने के पुलिसकर्मियों ने सामूहिक तबादले की गुहार लगाई थी। उन्होंने पत्र में लिखा था कि राजगढ़ थाने में तैनात सभी लोग डरे हुए और इस घटना से दुखी हैं। उनका मनोबल टूट गया है। इसलिए उन सभी का कहीं और सामूहिक तबादला कर दिया जाए।
इतिहासकार रामचंद्र गुहा जैसा और पत्रकार आरफा खानम शेरवानी जैसी। कल्पना करिए कि इनके बीच हुई बातचीत का बॉयप्रोडक्ट क्या निकलेगा। बिलकुल सही समझा आपने। पीएम मोदी के लिए भरपूर घृणा और भाजपा के लिए ढेर सारी नफरत।
साक्षात्कार के नाम पर वामपंथ प्रमाणित अलग-अलग क्षेत्रों की दो कालजयी शख्सियतें द वायर पर एक साथ बैठीं। मकसद अलग-अलग विषयों पर नरेंद्र मोदी के ख़िलाफ़ जहर उगलना।
दिक्कत क्या है? भाजपा का आना या फिर कॉन्ग्रेस के हाथ से सत्ता जाना
इंटरव्यू की शुरुआत से ही आरफा अपने मेहमान रामचंद्र गुहा से भाजपा सरकार पर सवाल शुरू करती है। सवालों से ज्यादा उनके शब्दों में इस बात की नाराजगी झलकती है कि आखिर मोदी प्रदेशों में पार्टी की सरकार बनाने पर क्यों आतुर हैं।
वो पूछती हैं कि आखिर केंद्र में बैठे लोग क्यों राज्यों में सरकार गिरा रहे हैं? क्या इससे लोकतंत्र सुरक्षित रह गया है? रामचंद्र गुहा भी अपनी पर्सनेलिटी के हिसाब से इन सवालों का जवाब देते हैं। लेकिन मध्यप्रदेश में कॉन्ग्रेस सरकार गिरने से आहत दोनों वामपंथ सर्टिफाइड वरिष्ठ भूल जाते हैं कि राज्य सरकार बनने पर जिस भाजपा को आज लोकतंत्र का खतरा करार दिया जा रहा है, उसी भाजपा के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार को 13वें लोकसभा चुनाव में सियासी उलटफेर के चलते अपनी केंद्र से हाथ धोना पड़ा था। लोकतंत्र पर खतरा उस समय नहीं आया था शायद। क्योंकि लोगों ने उसे राजनीति का हिस्सा मान लिया था।
आज मध्यप्रदेश में सीट जाने का दुख है। मगर, ये नहीं समझना चाहते कि इसके पीछे भाजपा उत्तरदायी कैसे है? क्या सिंधिया के मन में खटास भाजपा ने पैदा की या फिर कॉन्ग्रेस के उस नेतृत्व ने जो आज भी परिवारवाद के पुराने ढर्रे पर पार्टी को नेहरू की कॉन्ग्रेस साबित करना चाहता है और काबिल नेताओं को दरकिनार कर। आज राजस्थान में भी जो हालत है- क्या उसके लिए जिम्मेवार बीजेपी है या फिर सीएम गहलोत जैसे कॉन्ग्रेसी ओल्ड गार्डों का अहंकार। जिन्होंने पायलट की काबिलियत को हमेशा से नकारा।
हर कोई इस बात को जानता है कि मध्यप्रदेश में ज्योतिरादित्य सिंधिया और राजस्थान में सचिन पायलट ने कॉन्ग्रेस को जिताने के लिए क्या कुछ नहीं किया। उनकी क्षमताओं की अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि जब सिंधिया पार्टी से हटे तो मध्यप्रदेश में सरकार गिर गई और जब पायलट गए तो कई नेताओं ने उनका समर्थन किया।
आरफा खान्नम और रामचंद्र गुहा आज भाजपा को लोकतंत्र पर खतरा बता रहे हैं। लेकिन इस पर बात नहीं करते कि कॉन्ग्रेस पार्टी में वे कौन सी कमियाँ हैं जिसके कारण जरा सी सियासी बयार पर उसकी कुर्सी हिल जाती है।
राजनीति का स्वरूप मोदी ने बदला और मीडिया का वामपंथ ने?
साक्षात्कार में बात निकलती है कि पिछले कुछ सालों में राजनीति का स्वरूप बहुत बदल गया है। बिलकुल बदला है और समय की माँग है राजनीति में बदलाव। संसाधन, माध्यम, तकनीक, बौद्धिकता, सजगता कुशलता सब इस बदलाव में बराबर के हिस्सेदार हैं। मगर, कोई बता सकता है कि मीडिया का स्वरूप क्यों बदला? और क्यों बदला मीडिया के सवाल पूछने का ढंग?
क्या कारण है कि राजनीति गलियारों में मची हलचल का आँकलन करने से ज्यादा मीडिया के लिए सवाल ये है कि आखिर ये क्यों हुआ और कैसे इसे लोकतंत्र के लिए घातक कहा जाए। आखिर क्यों सूचनाओं से ज्यादा प्रोपेगेंडा परोसा जा रहा है? क्यों ऐतिहासिक घटनाओं का उल्लेख से ज्यादा उनका महिमामंडन हो रहा है?
जो लोग देश की अर्थव्यवस्था पर सवाल उठा रहे हैं। क्या उन्हें नहीं मालूम कि यूपीए में भी एक फ्री ट्रेड एग्रीमेंट हुआ था। क्या उस समय विषय गर्माया था? शायद नहीं। क्योंकि तब बोलने की आजादी की नहीं थी। बात चमचागिरी की थी।
भाजपा के ख़िलाफ़ विकल्प, एकमात्र विकल्प को सर-आँखों पर बैठाने की थी और उन्हीं की नीतियों की जी हुजूरी की थी। आज जब समय बदला तो कुछ गिने-चुने शब्दों के आधार पर सवाल-जवाब हो रहा है।
अब आगे इंटरव्यू में बात करते हुए गुहा दावा करते हैं कि भाजपा की राजनीति का एक स्वरूप ये भी है कि जो उनकी बात नहीं मानता उसके पीछे जाँच एजेंसी लग जाती है और सुप्रीम कोर्ट भी अपना काम सही से नहीं कर पाती। गुहा जी के ऐसे सवालों का क्या जवाब हो खुद सोचिए।
क्या निराधार मामलों में किसी राजनेता को बेवजह फँसाया जा सकता है वो भी तब जब सबूत ही न मिले। किसी पर केस तब होता है जब उसका इतिहास काले चिट्ठों में सना हो। पूर्व मंत्री व कॉन्ग्रेस नेता चिंदंबरम का मामला लीजिए। जब चिदंबरम जेल गए तब बातें उठी कि अमित शाह का बदला है। क्या पर्याय था ऐसी अनर्गल बातों का? क्या चिंदबरम का INX घोटाले से कोई लेना देना नहीं था?
सुप्रीम कोर्ट और मीडिया को भी नहीं छोड़ा गुहा-आरफा ने
सुप्रीम कोर्ट पर सवाल उठाना भी आज इस धड़े के लिए आसान हो चुका है, क्योंकि वहाँ से सुनवाई हर तारीख पर टलने की बजाय अब फैसला आ रहा है। ऐसे लोगों को तो खुश होना चाहिए कि जिन मुद्दों पर कभी किसी ने कॉन्ग्रेस काल में सोचा नहीं था कि फैसला आ पाएगा, उन पर सुप्रीम कोर्ट तेजी से सुनवाई करके उन्हें सुलझा रहा है। मगर, नहीं, क्योंकि फैसला इनके विरुद्ध है तो न्यायपालिका पर आरोप मढ़ना इनके लिए आसान है।
आगे बात भाजपा पर आने वाले पैसे की अकॉउंटिबिलीटी की। गुहा कहते हैं कि पता ही नहीं चल रहा पार्टी के पास पैसा कहाँ से आ रहा है। कहाँ से वह विधायकों को खरीदने के लिए पैसे खर्च कर रही है।
विचार करिए, देश का इतना जागरूक नागरिक जो आज किसी पार्टी के बारे में कुछ पता लगाना चाह रहा है और सूचनाएँ उससे छिपा ली जा रही है। ऐसा मुमकिन है क्या? अगर ऐसे ही मुखर होकर इतिहासकारों और पत्रकारों की लॉबी ने कॉन्ग्रेस से उस समय में सवाल किया होता तो आज जो राजीव गाँधी फाउंडेशन के नाम पर जो कारनामे सामने आ रहे हैं, उनकी जगह उन मामलों पर हुई कार्रवाई सुर्खियों में होती और लोग ये सोच रहे होते कि विश्वासघात के नाम पर कॉन्ग्रेस कहाँ-कहाँ अव्वल रही।
चापलूसी कौन करता रहा?
दोनों बुद्धीजीवि द वायर के बैनर तले बैठकर देश के प्रधानमंत्री के लिए बोलते हैं उनका कोई सलाहकार समूह नहीं है। सिर्फ़ चापलूसी समूह है। अपनी बात को बैलेंस करते हुए एक जगह वीडियो में गुहा ये कहते नजर आते हैं कि कई जगहों पर नरेंद्र मोदी, इंदिरा गाँधी से आगे निकल गए हैं।
हालाँकि थोड़ी ही देर बाद ये कह देते हैं कि इंदिरा गाँधी ने कभी भी सेना से छेड़छाड़ नहीं की। वे अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए तरह तरह के आरोप लगाते हैं। मगर, भूल जाते हैं आपातकाल के समय क्या हुआ था? वो आपातकाल जहाँ किसी को अपने पक्ष और विपक्ष में रखने की बात ही नहीं थी। सिर्फ़ सेंसरशिप थी।
शायद गुहा ने अशोक श्रीवास्तव की नरेंद्र मोदी सेंसर नाम की वो किताब नहीं पढ़ी। जिसमें इस बात का उल्लेख है कि कॉन्ग्रेस ने कैसे एक सार्वजनिक स्थान (डीडी चैनल) को राजनीतिक प्रतिद्वंदी को निशाना बनाने के लिए उपयोग किया था। जब अमेरिका ने नरेंद्र मोदी का वीजा देने से मना कर दिया था तो उसकी खुशी मिठाई बाँटकर हुई थी। सोचिए ये कारनामा तब का है जब नरेंद्र मोदी सीएम थे।
गुहा के साक्षात्कार की गंभीरता इस बात से लगाइए कि उनका मत है कि आज के दौर में एनडीटीवी, द वायर जैसे संसथान स्वतंत्र रूप से खड़े और बाकी सारे डर गए हैं। उनका कहना है कि इन लोगों में विज्ञापन आदि का डर रहता है। रही बात एंकर्स की तो केवल रवीश कुमार को छोड़ दिया जाए तो सभी इनकी चापलूसी और चमचागिरी करते हैं। गुहा को ये सब देखकर लगता है कि हम अकबर या राणा प्रताप के समय में आ गए हैं।
अंग्रेजी अखबारों से भी गुहा हैं गुस्सा
इस साक्षात्कार के बीच में तो आपको ये भी लगेगा कि रामचंद्र गुहा मोदी सरकार की तारीफें सुनकर इतना ज्यादा थक चुके हैं कि उन्हें कोई अखबार पसंद नहीं। वो हिंदुस्तान टाइम्स से लेकर टाइम्स ऑफ इंडिया पर अपना गुस्सा उतारते हैं। उनका कहना है कि ये अखबार हफ्ते के तीन दिन नरेंद्र मोदी की तारीफ करते हैं। आक्रमक भाव के साथ गुहा पूछते हैं कि बताइए क्या ये सब पहले होता था?
आरफा खान्नम की ‘निष्पक्ष’ पत्रकारिता
यहाँ बता दे कि इस इंटरव्यू के साथ आपको रामचंद्र गुहा की कुंठा और आरफा खानम के चेहरे पर शांति का भाव बताएगा कि ये पूरा मुद्दा दोनों के लिए कितना अहम है। याद करिए यही आरफा खानम को जब इन्होंने मोहम्मद आरिफ के साथ इंटरव्यू किया था। नरेंद्र मोदी और उनकी कार्यनीति पर उनकी सहमति देखते हुए जैसे आरफा सवाल पर सवाल पूछना चाहती थीं। मगर रामचंद्र गुहा को शांत चित के साथ सुनी जा रही हैं।
आगे जब सवाल भी करती हैं तो किसी बात का कोई काउंटर नहीं बल्कि उन्हीं बातों को उन बिंदुओं से विस्तार देती हैं जिन्हें गुहा करना भूल गए। वो ताली-थाली को मिले जनसमर्थन पर सवाल उठाती है और लोगों की मंशा पर प्रश्न करती हैं। साथ ही इसी आधार पर मोदी सरकार को घेरती हैं और पूछती हैं कि इन लोगों को सड़कों पर नाचने का और सड़कों पर बम पटाखे जलाने का किसने अधिकार दे दिया?
अब जाहिर है कि ये अधिकार नरेंद्र मोदी ने या भाजपा सरकार ने उन्हें नहीं दिया। ये उसी लोकतंत्र देश के नागरिक हैं। जिनकी मनमर्जियाँ उनके घरों की गलियों में तब भी चल रही थी जब कॉन्ग्रेस थी और वही मनमर्जियाँ अब भी चल रही हैं। इसके अलावा द वायर की गंभीर पत्रकार को जरूरत है ऐसे सवाल पूछने से पहले ये समझने की कि जब नरेंद्र मोदी ने दोनों कार्य करने की अपील लोगों से की तो देश में लॉकडाउन लगाकर। उनका मकसद वही था जो उन्होंने कहा। मगर लोगों ने उसे गलत समझकर क्या किया। इसका ठीकरा वो नरेंद्र मोदी के सिर माथे नहीं फोड़ सकतीं। आरफा आगे अपने शो में नरेंद्र मोदी को कम्युनल इंदिरा गाँधी कहलवाना चाहती हैं और गुहा कहते हैं कि कम्युनल तो हैं ही साथ में घमंडी भी हैं।
इस इंटरव्यू को सुनिए और महसूस कीजिए कि एक वामपंथ सर्टिफाइड इतिहासकार की बातों में बैलेंस करने के नाम पर नरेंद्र मोदी से समकक्ष इंदिरा गाँधी का उदहारण जरूर है। मगर, ये स्पष्ट रूप से कहने की क्षमता नहीं है कि इंदिरा गाँधी के राज में कुछ भी गलत हुआ।
उनके बातों से साफ पता चलता है कि इंदिरा गाँधी यदि कभी गलत के चरम पर भी पहुँची तो भी वो नरेंद्र मोदी से हर मायने में कम थीं। उनके मुताबिक नरेंद्र मोदी को भारत की और भारत की संस्कृति की समझ नहीं है। लेकिन इंदिरा गाँधी को थी। इंटरव्यू में गुहा स्पष्ट तौर पर कहते हैं कि वे नरेंद्र मोदी की विचारधारा के साथ हिंदुत्व के ख़िलाफ़ हैं। लेकिन क्या करें भारत के पास अभी कोई विकल्प भी नहीं है।
आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री जगन मोहन रेड्डी की पार्टी के बागी सांसद रघुराम कृष्णम राजू ने राम मंदिर निर्माण के लिए अपनी 3 महीने की सैलरी 3.96 लाख रुपए दान में दिए हैं। उन्होंने सोमवार (जुलाई 20, 2020) को इसकी घोषणा की।
बता दें कि अगस्त 5 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अयोध्या में राम मंदिर का भूमि-पूजन करेंगे। सांसद रघुराम कृष्णम राजू ने राम मंदिर तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के अध्यक्ष महंत नृत्य गोपाल दास के नाम पत्र लिख कर चेक सौंपा।
ज्ञात हो कि प्रधानमंत्री मोदी 5 अगस्त की सुबह सुबह 11 बजे अयोध्या पहुँचेंगे। बताया जा रहा है कि पीएम मोदी सुबह 11 बजे से दोपहर 1 बजकर 10 मिनट तक अयोध्या में रहेंगे। 5 अगस्त को भूमि पूजन का कार्यक्रम सुबह 8 बजे शुरू होगा। विहिप का कहना है कि द्वितीया सह तृतीया तिथि अपने आप में सर्वार्थ सिद्धि योग वाली है। देश के प्रधानमंत्री बनने के बाद पहली बार नरेंद्र मोदी अयोध्या जाएँगे।
सांसद रघुराम कृष्णम राजू ने कहा कि देश-विदेश के करोड़ों हिन्दुओं की तरह वो भी उस क्षण का दर्शन करने को बेताब हैं, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अयोध्या में राम मंदिर की नींव रखेंगे और भूमि-पूजन करेंगे। हाल ही में उन्होंने आंध्र प्रदेश में गायों की देखभाल के लिए आवाज़ उठाई थी। सांसद ने मुख्यमंत्री जगन मोहन रेड्डी को पत्र लिख कर राज्य में गोशाला डेवलपमेंट कमिटियों के गठन की माँग की थी।
उन्होंने कहा था कि मंदिरों और कई गैर-सरकारी संगठनों ने गायों की देखभाल का जिम्मा ले रखा है लेकिन उनके गोशालों में गायें मर रही हैं, ऐसे में राज्य में गोशाला कमिटी की ज़रूरत है। उन्होंने गोरक्षा हेतु ऐसा करने की अपील की थी। सांसद रघुराम कृष्णम राजू ने कहा कि ये मुद्दा हिन्दुओं के दिल के काफी नजदीक है। वो अक्सर हिन्दुओं की भावनाओं के लिए आवाज़ उठाते रहते हैं।
रघुराम कृष्णम राजू उद्योगपति भी हैं, जिन्होंने बाद में राजनीति का रुख कर लिया। हाल ही में जब तिरुपति तिरुमला देवस्थानम बोर्ड ने मंदिर की संपत्ति को नीलाम करने का निर्णय लिया था, तब उन्होंने हिन्दुओं की भावनाओं को देखते हुए इसके ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई थी। हाउस-साइट डिस्ट्रीब्यूशन और बालू बेचने में हुए भ्रष्टाचार को लेकर भी उन्होंने मंदिर प्रशासन पर सवाल खड़े किए थे, जिसके बाद उनकी अपनी ही पार्टी विधायकों के साथ तू-तू-मैं-मैं हुई थी।
मई 2020 में वो ‘टाइम्स नाऊ’ पर डिबेट के दौरान इस बात को ऑन एयर शो में मानते नज़र आए थे कि आंध्र प्रदेश में धर्मांतरण की प्रक्रिया तेजी से चालू है। लेकिन साथ ही उन्होंने ये भी कहा था कि इसमें सरकार का कोई हाथ नहीं है। उन्होंने कहा था कि ऐसा नहीं है कि ये कन्वर्जन की प्रक्रिया सिर्फ आंध्र प्रदेश में चल रही है, बल्कि वो तो ये कह रहे हैं कि ये पूरे देश में हो रहा है। उन्होंने इसके मिशनरियों के ‘मनी-पॉवर’ को जिम्मेदार ठहराया था।
इसके बाद उन्हें अपनी ही पार्टी के नेताओं से जान से मार डालने की धमकी मिलनी शुरू हो गई थी। उनका कहना था कि चुनाव भी उन्होंने अपने ही दम पर जीता है, इसमें जगन मोहन रेड्डी के चेहरे का कोई योगदान नहीं है। बता दें कि रघुराम कृष्णम राजू पहले भाजपा में थे। इसके बाद चुनाव आते ही उन्होंने वाईएसआरसीपी (YSRCP) का दामन थाम लिया था। उससे पहले वो चंद्रबाबू नायडू की टीडीपी में भी रहे थे।
सुप्रीम कोर्ट (SC) ने अयोध्या में राम जन्मभूमि स्थल पर खुदाई के दौरान मिली कलाकृतियों को संरक्षित करने के लिए दायर दो जनहित याचिकाएँ सोमवार (जुलाई 20, 2020) को खारिज कर दी। न्यायमूर्ति अरुण मिश्रा, न्यायमूर्ति बीआर गवई और न्यायमूर्ति कृष्ण मुरारी की पीठ ने इन याचिकाओं को गंभीरता से विचार करने योग्य नहीं पाया।
याचिका को खारिज करने के साथ ही पीठ ने याचिकाकर्ताओं पर एक-एक लाख रुपए का जुर्माना लगाते हुए उन्हें एक महीने के भीतर यह राशि जमा करने का निर्देश दिया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जनहित के नाम पर ऐसी बेकार याचिकाएँ कैसे दायर नहीं की जा सकती है। वे दंड के भागी हैं। वे दोबारा ऐसी गलती ना करें इसलिए जुर्माना लगाया गया है।
अदालत ने कहा कि पाँच सदस्यीय पीठ इस मामले में अपना फैसला सुना चुकी है। इन जनहित याचिकाओं के माध्यम से इस निर्णय को खत्म करने का प्रयास हो रहा है। पीठ ने याचिकाकर्ताओं से जानना चाहा कि उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 32 के अंतर्गत शीर्ष अदालत में याचिका क्यों दायर की।
पीठ ने कहा, “आप इस तरह की तुच्छ याचिका कैसे दायर कर सकते हैं? इस तरह की याचिका से आपका तात्पर्य क्या है? क्या आप यह कहना चाहते हैं कि कानून का शासन नहीं है और न्यायालय के पाँच न्यायाधीशों की पीठ के फैसले का कोई पालन नहीं करेगा।”
केन्द्र की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि न्यायालय को याचिकाकर्ता पर अर्थदंड लगाने के बारे में विचार करना चाहिए। पीठ ने कहा कि प्रत्येक याचिकाकर्ता पर एक-एक लाख रुपए का अर्थदंड लगाया जाता है, जिसका भुगतान एक महीने के भीतर किया जाना चाहिए।
बता दें कि ये याचिकाएँ सतीश चिंदूजी शंभार्कर और डॉ. आम्बेडकर फाउण्डेशन ने दायर की थीं। इनमें इलाहाबाद उच्च न्यायालाय में सुनवाई के दौरान अदालत की निगरानी में हुई खुदाई के समय मिली कलाकृतियों को संरक्षित करने का निर्देश देने का अनुरोध किया गया था।
इन याचिकाओं में नए राम मंदिर के लिए नींव की खुदाई के दौरान मिलने वाली कलाकृतियों को भी संरक्षित करने तथा यह काम पुरातत्व सर्वेक्षण की निगरानी में कराने का अनुरोध किया गया था।
गौरतलब है कि बौद्ध समुदाय से जुड़े लोगों ने राम जन्मभूमि पर अपना दावा जताया था। बिहार से आए दो बौद्ध मतावलंबियों ने राममंदिर के समतलीकरण के दौरान मिले प्रतीक चिह्नों को सार्वजनिक करने की माँग करते हुए राम जन्मभूमि पर अपना दावा बताया था।
बिहार से अयोध्या पहुँचे अखिल भारतीय आजाद बौद्ध धम्म सेना संगठन के भंते बुद्धशरण केसरिया ने कहा था, “अयोध्या में बन रहे राममंदिर निर्माण के लिए हुए समतलीकरण के दौरान बौद्ध संस्कृति से जुड़ी बहुत सारी मूर्तियाँ, अशोक धम्म चक्र, कमल का फूल एवं अन्य अवशेष मिलने से स्पष्ट हो गया है कि वर्तमान अयोध्या बोधिसत्व लोमश ऋषि की बुद्ध नगरी साकेत है।”
इसके साथ ही उन्होंने यह भी कहा था, “अयोध्या मसले पर हिंदू मुस्लिम और बौद्ध तीनों पक्षों ने सर्वोच्च न्यायालय में जनहित याचिका दायर की थी, लेकिन सारे सबूतों को दरकिनार कर एकतरफा फैसला हिंदुओं के पक्ष में राम जन्मभूमि के लिए दे दिया गया। इसके लिए हमारे संगठन ने राष्ट्रपति, सुप्रीम कोर्ट समेत कई संस्थाओं को पत्र लिखकर वास्तविक स्थिति से अवगत कराया है।”
उल्लेखनीय है कि शीर्ष अदालत ने पिछले साल नौ नवंबर को अपने ऐतिहासिक फैसले में अयोध्या में जन्मभूमि स्थल पर राम मंदिर निर्माण के लिये एक न्यास गठित करने का निर्णय दिया था। न्यायालय ने इसके साथ ही मस्जिद के लिये पाँच एकड़ भूमि आवंटित करने का निर्देश भी सरकार को दिया था।
भाजपा सांसद सुब्रमण्यम स्वामी ने कंगना रनौत के पक्ष में आवाज़ उठाई है और उन्हें क़ानूनी सहायता मुहैया कराने का आश्वासन दिया है। स्वामी ने कहा कि कंगना रनौत को भले ही बॉलीवुड में टॉप-3 अभिनेत्रियों में शुमार किया जाता हो लेकिन हिम्मत के मामले में उनसे ऊपर कोई नहीं है। उन्होंने ईशकरण भंडारी को इस मामले को देखने को कहा है। वो कंगना को क़ानूनी मदद देंगे।
सुब्रमण्यम स्वामी ने जानकारी दी कि कंगना रनौत के दफ्तर ने ईशकरण भंडारी से संपर्क किया है। भाजपा सांसद ने कहा कि वो ईशकरण के साथ मिल कर जल्द ही इस बात पर चर्चा करेंगे कि कंगना को इस मामले में कैसे और किस तरह से क़ानूनी सहायता मुहैया कराई जाएगी। मुंबई पुलिस के साथ कंगना की मुलाकात के दौरान क्या बातें होंगी और कैसे चीजों को हैंडल किया जाएगा।
वहीं अधिवक्ता ईशकरण भंडारी ने भी इसकी पुष्टि की है। बता दें कि सुब्रमण्यम स्वामी के अधिकतर अदालती मामलों को वही देखते हैं। भंडारी ने कहा कि जैसा कि स्वामी ने पहले ही बताया है, अगर कंगना मुंबई पुलिस को बयान देने के मामले में उनसे किसी भी प्रकार का लीगल हेल्प चाहती हैं तो वो इसके लिए तैयार हैं। बता दें कि ईशकरण को देश के सबसे काबिल युवा वकीलों में से एक गिना जाता है।
Absolutely the courage displayed by @KanganaTeam is exemplary & it’s absolutely essential to safeguard her interests from the Bollywood ecosystem! https://t.co/6Ntj9qBVQ0
— Ishkaran Singh Bhandari (@ishkarnBHANDARI) July 20, 2020
उन्होंने ही मुंबई पुलिस को पत्र भेज कर माँग की थी की जब तक सुशांत सिंह राजपूत की आत्महत्या मामले की जाँच नहीं हो जाए, तब तक उनके फ्लैट को पूर्णरूपेण सील कर के रखा जाए। उन्होंने इसके लिए ‘प्रिजर्वेशन ऑफ क्राइम सीन’ वाले सिद्धांत पर जोर दिया था। इसके लिए उन्होंने सुनंदा पुष्कर की मौत वाले होटल के कमरे का उदाहरण दिया था, जिसे 3 सालों तक सील रखा गया था। तब तक जाँच चलती रही थी।
ईशकरण ने कहा कि कंगना रनौत ने जो साहस दिखाया है, वो उदाहरण पेश करने वाला है। साथ ही उन्होंने बॉलीवुड के इकोसिस्टम से उनके हितों की रक्षा करने की ज़रूरत पर भी बल दिया। उन्होंने अर्नब गोस्वामी से बातचीत के दौरान कंगना द्वारा दिए गए बयानों का समर्थन करते हुए भी सुशांत मामले में सीबीआई जाँच की माँग की थी। अभी तक कंगना ने क़ानूनी मामलों को लेकर कोई बयान नहीं दिया है।
नेपोटिज्म विवाद के बीच दूसरी तरफ फिल्म निर्देशक करण जौहर का एक पुराना वीडियो वायरल होने के बाद वो लोगों की आलोचना का शिकार बने हैं। करण जौहर इस वीडियो में अभिनेत्री कंगना रनौत पर टिप्पणी करते नजर आ रहे हैं। ये वीडियो ‘लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स’ का है, जिसमें करण जौहर ये कहते सुने जा सकते हैं कि कंगना रनौत को फिल्म इंडस्ट्री छोड़ देनी चाहिए। उनके इस बयान पर उनके समर्थक तालियाँ पीटते हुए नजर आते हैं।
जिस दिन का हिंदुओं को दशकों से इंतजार था वह करीब आ गया है। 5 अगस्त को अयोध्या में भव्य श्रीराम मंदिर निर्माण के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भूमि पूजन में शिरकत करेंगे। पीएम बनने के बाद यह उनकी पहली अयोध्या यात्रा होगी।
रिपोर्टों के मुताबिक भूमि पूजन के दौरान श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के अध्यक्ष महंत नृत्य गोपाल दास लगभग 40 किलो चॉंदी की श्रीराम शिला समर्पित करेंगे। पीएम मोदी इस शिला का पूजन कर स्थापित करेंगे।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने भले इस दिन की राह खोली हो, लेकिन यह एक झटके में मुमकिन नहीं हुआ। इस दिन के लिए कई बलिदान हुए। कइयों ने अपनी पूरी जिंदगी झोंक दी। ये सब उस वक्त हुआ जब आजाद भारत में भी सत्ताधारी दल अयोध्या आंदोलन को कुचल देना चाहते थे।
यहॉं तक कि पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू भी रामलला को गर्भगृह से बेदखल करने पर अमादा थे। वरिष्ठ पत्रकार हेमंत शर्मा ने अपनी किताब ‘युद्ध में अयोध्या’ में विस्तार से इस घटना का ब्यौरा दिया है। नेहरू के मॅंसूबों को केरल के रहने वाले आईसीएस अधिकारी केकेके नायर, जो उस समय फैजाबाद के जिलाधिकारी थे ने विफल कर दिया था।
हेमंत शर्मा लिखते हैं, “उत्तर प्रदेश के कुछ मुस्लिम नेताओं और देवबंद के उलेमाओं ने नेहरू को तार भेजकर उनका ध्यान अयोध्या की ओर दिलाया। नेहरू ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री गोविंद वल्लभ पंत और राज्य के गृह मंत्री लाल बहादुर शास्त्री को तत्काल मस्जिद से मूर्तियों को हटाने के निर्देश दिए। लगातर केंद्र से संदेश लखनऊ आते और वैसे ही तार लखनऊ से फैजाबाद भेजे जाते कि मूर्तियॉं तुरंत हटाई जाएँ। 24 और 25 दिसंबर 1949 को लखनऊ में इस मुद्दे पर दिन भर उच्च स्तरीय बैठक होती रही। तय किया गया कि मूर्तियों को गर्भगृह से बाहर ले जाकर राम चबूतरे पर रखा जाएगा। पर फैजाबाद के सिटी मजिस्ट्रेट केकेके नायर इस बात पर अड़े रहे कि मूर्ति हटाने की घोषणा से मात्र से खून-खराबा होगा।”
उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्य सचिव भगवान सहाय ने इस संबंध में फैजाबाद के तत्कालीन जिलाधिकारी केकेके नायर को 23 दिसंबर को निर्देश दिए। जवाब में 26 दिसंबर को नायर ने लिखा, “मैं आज भी इसकी कल्पना नहीं कर पा रहा कि मूर्ति को वहॉं से कैसे हटाया जाए। यदि इस कार्य को धार्मिक रीति के अनुसार किया जाना है तो मुझे कोई ऐसा योग्य हिंदू पुजारी नहीं मिलेगा, जो इस काम के लिए अपने जीवन और मोक्ष को दॉंव पर लगाने का इच्छुक हो। यदि ऐसा किसी भी तरह या किसी के द्वारा भी किया जाना है तो इसके परिणामस्वरुप हिंदुओं के सभी वर्गों के विरोध का सामना सरकार को करना पड़ सकता है। मुझे स्पष्ट रूप से बताया जाना चाहिए कि क्या सरकार उस स्थिति का सामना करने के लिए तैयार है।”
इससे पहले की इस पर सरकार कोई प्रतिक्रिया देती अगले ही दिन नायर ने मुख्य सचिव को फिर एक चिट्ठी दाग दी। इस बार उन्होंने लिखा, “यदि सरकार किसी भी कीमत पर मूर्ति हटाने का फैसला लेती है तो मैं अनुरोध करूँगा कि मुझे कार्यमुक्त किया जाए और मेरा कार्यभार किसी ऐसे अधिकारी को दिया जाए, जिसे इस समाधान में वह अच्छाई दिखती हो जो मुझे दिखाई नहीं देती। जहॉं तक मेरा सवाल है मेरा विवेक मुझे ऐसा करने की इजाजत नहीं देता।”
नायर की चिट्ठियों से राज्य सरकार दबाव में आ गई। घबराए सहाय ने उन्हें फोन कर कहा कि वे मौके पर जैसा ठीक समझें करें। लेकिन, नेहरू लगातार अपनी चिंता जताते रहे। जब नायर सरकार की सुनने को तैयार नहीं थे तो नेहरू ने 26 नवंबर 1949 को पंत को एक तार भेजता। इसमें कहा, “अयोध्या में हुई घटनाओं से मैं परेशान हूँ। मैं गंभीरतापूवर्क उम्मीद करता हूँ कि आप इस विषय पर व्यक्तिगत रूप से ध्यान देंगे। वहॉं आपत्तिजनक उदाहरण रखे जा रहे हैं जिनके परिणाम घातक होंगे।”
मूर्तियॉं तो नहीं हटीं। पर नेहरू के प्रयास जारी रहे। 15 फरवरी 1950 को उन्होंने पंत को एक पत्र लिख अयोध्या के हालात पर जानकारी मॉंगी। साथ ही कश्मीर पर इसके कारण पड़ने वाले हालात को लेकर चिंता जताई। 5 मार्च 1950 को किशोरीलाल को लिखे पत्र में नेहरू ने कहा, “उत्तर प्रदेश सरकार ने हिम्मत से काम लिया, लेकिन जो हुआ वो कम था। फैजाबाद के अधिकारियों ने या तो बदमाशी की या फिर हालात को रोकने के लिए कोई कदम नहीं उठाया।”
यहॉं तक कि नेहरू अयोध्या भी जाना चाहते थे। पर पंत उन्हें टालते गए। यहॉं यह जानना जरूरी है कि पंत को नेहरू पसंद नहीं करते थे। पंत देश के पहले गृह मंत्री सरदार वल्लभाई पटेल के करीबी माने जाते थे। लिहाजा, नेहरू ने पटेल से भी पंत पर दबाव डलवाने की कोशिश की। 9 जनवरी 1950 को पटेल ने इस संबंध में पंत को पत्र भी लिखा। लेकिन, उन्होंने मूर्तियॉं हटाने के लिए कोई निर्देश देने की बजाए मुख्यमंत्री पंत की ओर से उठाए गए कदमों की तारीफ की। साथ ही इस समस्या के लिए अपनी पार्टी में बढ़ती गुटबंदी को भी जिम्मेदार ठहराया।
शर्मा ने अपनी किताब में जिन घटनाओं और चिट्ठियों का जिक्र किया है, उनसे जाहिर होता है कि नेहरू मूर्तियॉं हटाकर धर्मनिरपेक्ष दिखना चाहते थे। लेकिन, नायर के अड़ने और पंत तथा पटेल के नरम रुख अपनाने के कारण वे अपने इस मंसूबे में कामयाब नहीं हो पाए।
राजस्थान में चल रहे सियासी घटनाक्रम के बीच मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने सचिन पायलट पर बड़ा हमला बोला है। गहलोत ने कहा कि सचिन पायलट ने कॉन्ग्रेस की पीठ में छुरा घोंपने का काम किया है, जबकि उन्हें काफी कम उम्र में बहुत कुछ मिल गया था।
#WATCH Hum jaante the ki wo (Sachin Pilot) nikkamma hai, nakaara hai, kuch kaam nahi kar raha hai, khaali logon ko ladvaa raha hai…Main yahan baingan bechne nahi aaya hoon, main sabzi bechne nahi aaya hoon. Main CM ban’ne aaya hoon: Rajasthan CM Ashok Gehlot pic.twitter.com/VKicK8IRJP
सीएम गहलोत ने मीडिया को संबोधित करते हुए कहा, “मैं जानता था कि वो (सचिन पायलट) निकम्मा है, नकारा है, कोई काम नहीं करता है। लेकिन मैं यहाँ बैंगन बेचने नहीं आया हूँ, मुख्यमंत्री बनकर आया हूँ। हम नहीं चाहते थे कि दिल्ली में लगे कि राजस्थान में कल्चर लड़ाई-झगड़ा वाला है।”
“एक छोटी खबर भी नहीं पढ़ी होगी किसी ने कि पायलट साहब को कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष के पद से हटाना चाहिए। हम जानते थे कि वो (सचिन पायलट) निकम्मा है, नकारा है, कुछ काम नहीं कर रहा है खाली लोगों को लड़वा रहा है”: राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत pic.twitter.com/33lNUJ1xai
उन्होंने आगे कहा, “हमने कभी सचिन पायलट पर सवाल नहीं किया। सात साल के अंदर एक राजस्थान ही ऐसा राज्य है जहाँ प्रदेश कॉन्ग्रेस अध्यक्ष को बदलने की माँग नहीं की गई। न सीनियर ने, न जूनियर ने। एक छोटी खबर भी नहीं पढ़ी होगी किसी ने कि पायलट साहब को कॉन्ग्रेस प्रदेशाध्यक्ष के पद से हटाना चाहिए। हम जानते थे कि वो (सचिन पायलट) निकम्मा है, नकारा है, कुछ काम नहीं कर रहा है खाली लोगों को लड़वा रहा है।”
सीएम गहलोत ने पायलट पर निशाना साधते हुए कहा, “कल तुम अशोक गहलोत के घर के बाहर खड़े थे, परसों तुम विधानसभा अध्यक्ष सीपी जोशी के कमरे के बाहर खड़े थे। मैं तुम (सचिन पायलट) पर कैसे विश्वास करूँ? इस भाषा में वह सात साल निकाले हैं।”
गहलोत आगे कहते हैं, “फिर भी किसी ने सचिन पायलट के खिलाफ एक शब्द नहीं बोला। इतना उनका मान-सम्मान रखा। कैसे सम्मान प्रदेश अध्यक्ष को दिया जाता है, यह मैंने राजस्थान के अंदर लोगों को सिखाया। उम्र पीछे है, लेकिन पद बड़ा होता है गरिमा का। मैंने यहाँ के नेताओं को यह कल्चर सिखाया।”
गहलोत ने कहा, “मैंने पूरा मान-सम्मान दिया। वो व्यक्ति कॉन्ग्रेस की पींठ में छुरा घोंपकर जाने के लिए तैयार हो गया। यह जो खेल अभी हुआ है, वो 10 मार्च को होने वाला था। रात 2 बजे मानेसर के लिए गाड़ियाँ आ गई थी। उस षड्यंत्र को मैंने एक्सपोज किया और 10 दिनों तक अपने विधायकों को होटल में रखा।”
He (Sachin Pilot) was conspiring from past 6 months with BJP’s support. Nobody believed me when I used to say that conspiracy is going on to topple govt. Nobody knew that a person with such innocent face will do such thing. I’m not here to sell vegetables, I am CM: Rajasthan CM pic.twitter.com/Kk4TLJZ0v0
गहलोत ने कहा, “पायलट को कम उम्र में सब कुछ मिल गया। पायलट ने बहुत गंदा खेला। पायलट लोगों को लड़वाने का काम करते थे, हमने साजिश का पर्दाफाश किया। वे (सचिन पायलट) भाजपा के समर्थन से पिछले छह महीनों से साजिश रच रहे थे। किसी ने भी मुझ पर तब विश्वास नहीं किया जब मैं कहता था कि सरकार को गिराने की साजिश चल रही है। कोई नहीं जानता था कि इतने निर्दोष चेहरे वाला व्यक्ति ऐसा काम करेगा। मैं यहाँ सब्जी बेचने के लिए नहीं आया हूँ, मैं मुख्यमंत्री हूँ।”
#WATCH Sachin Pilot ne jis roop mein khel khela vo bahut durbhagyapurna hai. Kisiko yakeen nahi hota ki yeh vyakti aisa kar sakta hai…maasoom chehra, Hindi English par achchi command aur pure desh ki media ko impress kar rakha hai: Rajasthan CM pic.twitter.com/gv51qOe66n
सीएम गहलोत ने कहा कि सचिन पायलट ने जिस रूप में खेल खेला वो बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है। किसी को यकीन नहीं होता कि ये व्यक्ति ऐसा कर सकता है… मासूम चेहरा, हिन्दी-अंग्रेजी पर अच्छी कमांड और पूरे देश की मीडिया को इम्प्रेश कर रखा है।
अशोक गहलोत ने कहा कि सचिन पायलट को बड़े-बड़े कॉरपोरेट उनकी फंडिंग कर रहे हैं। बीजेपी की ओर से फंडिंग की जा रही है। राजस्थान के मुख्यमंत्री ने कहा कि आज देश में गुंडागर्दी हो रही है, मनमर्जी के हिसाब से छापे मारे जा रहे हैं। मुझे दो दिन पहले ही पता लग गया था कि मेरे करीबियों के यहाँ छापे पड़ेंगे।
सचिन पायलट पर निशाना साधते हुए अशोक गहलोत ने कहा कि सचिन पायलट सिक्योरिटी छोड़कर गाड़ी चलाकर छुप कर खुद दिल्ली जाते थे। इसके साथ ही उन्होंने सवाल उठाए कि एक वकील की फीस 50 लाख होती है। इतना पैसा कहाँ से आ रहा है। पायलट का चाल, चरित्र और चेहरा सामने आ गया है।
मुख्यमंत्री गहलोत ने कहा, “सबको मालूम है, पूरा खेल भाजपा खेल रही है। इतिहास में कभी ऐसा नहीं हुआ होगा कि पार्टी का प्रदेशाध्यक्ष ही अपनी पार्टी की सरकार को गिराने में लगा रहा हो।”
शेफाली वैद्य ने PETA को लेकर उसके एक पूर्व एसोसिएट (कर्मचारी) के हवाले से बड़ा खुलासा किया है। उन्होंने एक स्क्रीनशॉट शेयर किया है, जिसके बारे में उन्होंने बताया कि ये PETA के एक पूर्व कर्मचारी का भेजा हुआ मैसेज है, जिसमें उसने अंदर की कुछ बातें बताई हैं। उक्त कर्मचारी ने 7 सालों तक PETA के लिए काम किया था, जिसके बाद उसने अपना अनुभव शेयर किया। इसमें काफी चौंकाने वाली बातें हैं।
PETA के पूर्व कर्मचारी ने बताया कि भले ही संस्था में कुछ ऐसे एक्टिविस्ट भी हैं, जो सही में पशु अधिकारों के लिए कार्यरत हैं लेकिन इसके टॉप लेवल के अधिकतर अधिकारी अमीर हैं, जो इलीट वर्ग से आते हैं। उक्त पूर्व कर्मचारी ने PETA को एक एलिटिस्ट संगठन करार दिया। उसने खुलासा किया कि PETA उन्हीं मुद्दों को छूती है, जिनसे उसे पब्लिसिटी मिलने की सम्भावना हो। वो पब्लिसिटी स्टंट करते हैं।
वो ‘भारत में मुर्गों को ट्रांसपोर्ट के दौरान उनके साथ होने वाली क्रूरता को कैसे रोकें’ जैसे मुद्दों पर रणनीति बनाने के लिए बहस करते हैं। PETA के पूर्व कर्मचारी ने ये भी बताया कि JW Marriot जैसे बड़े पाँच सितारा होटलों में उनकी बैठकें होती हैं। बैठकों में मुर्गे, माँस और अन्य जानवरों के मीट ऑर्डर किए जाते हैं। बता दें कि जीवहत्या का विरोध करने वाले PETA के कर्मचारियों का 5 स्टार होटल में बैठ कर माँस खाना उनके दोहरे रवैये को उजागर करता है।
बता दें कि PETA की वेबसाइट पर जानवरों की हत्या को लेकर ख़ास मजहब वालों को कई सलाह दी गई है। बताया गया है कि चाकू की धार को एकदम तेज़ कर के रखें। उसे बार-बार धार दें। उसकी लम्बाई ठीक रखें। इसकी लम्बाई 45 सेंटीमीटर होनी चाहिए। सलाह दी गई है कि काफी अच्छे तरीके से जानवर की हत्या करें, तीन से ज्यादा बार वार न करें और जानवर को हाथ-पाँव मारने दें, ताकि खून जल्दी-जल्दी निकल जाए।
PETA ने खास मजहब के लिए जानवरों को काटने का सबसे बेहतरीन तौर-तरीका बताया है। साथ ही सलाह दी है कि क़ुरबानी से पहले जानवरों को खरीदें और उनका पालन-पोषण करें, फिर देखें कि आप उन्हें काट सकते हैं या नहीं। PETA ने ख़ास मजहब को कहा है कि अगर आप उन जानवरों को नहीं काट सकते तो किसी को नहीं काटें। लेकिन, फिर भी काटने को लेकर तौर-तरीके बताए गए हैं।
शेफाली वैद्य ने PETA की वेबसाइट के स्क्रीनशॉट्स शेयर कर के उसके दोहरे रवैये का खुलासा किया। उन्होंने ऑपइंडिया को बताया था कि PETA ने पिछले 48 घंटों मे सारा का सारा ध्यान उन्हें ट्रोल करने में लगाया है और इसके सिवा कुछ नहीं किया है। उन्होंने कहा कि एक अंतरराष्ट्रीय संस्था एक महिला को निशाना बनाने में अपनी सारी ऊर्जा खर्च कर रहा है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि PETA एक ट्रोल के सिवा कुछ नहीं है।