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‘गुप्त सूत्रों’ से विकास दुबे का एनकाउंटर: राजदीप खोजी पत्रकारों के सरदार, गैंग की 2 चेली का भी कमाल

गैंगस्टर विकास दुबे को आखिरकार पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। लेकिन इस पूरे प्रकरण के दौरान कुछ वामपंथी पत्रकारों और राजदीप सरदेसाई जैसे एजेंडाबाजों द्वारा विकास दुबे के नाम पर निरंतर ही जमकर ‘जुआ’ खेला गया। यह जुआ और कुछ नहीं बल्कि विकास दुबे की सम्भावित एनकाउंटर को लेकर था।

जुलाई माह के पहले सप्ताह में ही हिस्ट्रीशीटर विकास दुबे का नाम तब सामने आया जब कानपुर स्थित चौबेपुर के बिकरू गाँव में उसे पकड़ने गई पुलिस टीम पर हमला किया गया। इसमें विकास और उसके गुंडों ने सीओ समेत आठ पुलिसकर्मियों की हत्या कर दी।

विकास दुबे इसके बाद से ही फरार था। इस घटना के बाद से ही सोशल मीडिया पर तथाकथित जर्नलिस्ट और ‘खोजी बुद्धिजीवी’ अपने काम में जुट गए। ऐसे पत्रकारों में प्रमुख नाम थे राजदीप सरदेसाई, गालीबाज ट्रोल स्वाति चतुर्वेदी और प्रोपेगेंडा वेबसाइट ‘द वायर’ की पत्रकार रोहिणी सिंह!

इन पत्रकारों की हर सुबह विकास दुबे के एनकाउंटर की सम्भावना वाले ट्वीट के साथ होते देखी जाने लगी। लेकिन इन खोजी पत्रकारों की तमाम सम्भावनाओं को तब विराम लग गया, जब आज बृहस्पतिवार (जुलाई 09, 2020) की सुबह ही पुलिस ने गैंगस्टर विकास दुबे को उज्जैन से गिरफ्तार कर लिया।

इस पूरे प्रकरण में इन प्रोपेगेंडा पत्रकारों की कॉन्स्पिरेसी थ्योरी खूब चर्चा का विषय रही। खोजी पत्रकारों ने विकास दुबे के एनकाउन्टर के लिए अपने तमाम ‘गुप्त सूत्रों’ का हवाला दिया और एनकाउंटर की सम्भावना की फर्जी ख़बरें फैलाकर पुलिस की छवि को अपने पूर्वग्रहों से धूमिल करने का प्रयास किया।

यहाँ तक कि राजदीप सरदेसाई ने विकास दुबे की गिरफ्तारी से ठीक आधे घंटे पहले ही यह दावा किया कि उसके पास बहुत से ‘बड़े नामों’ की जानकारी है, जिस कारण पुलिस उसका एनकाउंटर कर देगी। राजदीप ने इसके लिए एक पूर्व आईपीएस अधिकारी का जिक्र भी किया।

राजदीप ने ट्वीट में लिखा – “एक सेवानिवृत्त IPS अधिकारी मुझसे कहते हैं: इस बात की सम्भावना बहुत कम है कि विकास दुबे पकड़ा जाएगा; वह और उसके सहयोगी ज्यादातर एनकाउंटर कर दिए जाएँगे। वे बहुत से बड़े लोगों के बारे में बहुत सारे रहस्य जानते हैं। गैंगस्टर विकास दुबे द्वारा 8 पुलिसकर्मियों की हत्या करने के बाद भाग जाने के बाद आज 6वाँ दिन है। देखते जाइए।”

लेकिन अभी तक भी राजदीप सरदेसाई के इस दावे पर कुछ ताजा समाचार सामने नहीं आए हैं और ना ही उनके ‘सेवानिवृत आईपीएस अधिकारी’ का ही कहीं कोई जिक्र आया है। हालाँकि, ट्विटर पर इन तथाकथित पत्रकारों के फ़ेक और बुनियादहीन दावों की जमकर आलोचना देखी जा रही है।

वहीं, स्वाति चतुर्वेदी ने कल कॉन्स्पिरेसी थ्योरी की सभी हदें पार करते हुए लिखा था कि विकास दुबे नेपाल पहुँचने में कामयाब रहा है। इस ट्वीट के कुछ ही घंटों बाद विकास दुबे को उज्जैन से गिरफ्तार किया गया है।

एक अन्य ट्वीट में स्वाति चतुर्वेर्दी ने गैंगस्टर विकास दुबे की उम्र का हवाला देते हुए लिखा था कि उसकी उम्र 50 साल से ज्यादा है। इस कारण उसका एनकाउंटर नहीं बल्कि उसे गिरफ्तार किया जाना चाहिए।

इस पर रोहिणी सिंह ने ट्वीट में लिखा था कि क्योंकि बड़े लोग कहानियों को बाहर नहीं आने देना चाहते, शायद यही वजह है कि विकास दुबे का एनकाउंटर कर दिया जाएगा।

गौरतलब है कि विकास दुबे की गिरफ्तारी से पहले उसके कुछ बेहद करीबी पुलिस के साथ मुठभेड़ में मार दिए गए हैं। कानपुर में हुई 8 पुलिसकर्मियों की हत्या के बाद जब इस किस्से का उदय हुआ ही था, तब पुलिस ने घटना के करीब सात घंटे बाद हुई मुठभेड़ में विकास दुबे के चचेरे भाई और मामा को मार गिराया था।

इसके बाद विकास दुबे कि गिरफ्तारी से कुछ ही घंटों पहले पुलिस ने उसका साथ देने वाले उसके अन्य 2 साथियों को भी मार गिराया है। मारे गए अपराधियों का नाम प्रभात और रणवीर शुक्ला (बऊआ) है। पुलिस ने बुधवार (8 जुलाई, 2020) को इनका एनकाउंटर किया है।

इससे पहले पुलिस ने विकास के सबसे बड़े सहयोगी अमर दुबे को एनकाउंटर में मार गिराया। हमीरपुर में बुधवार (जुलाई 8, 2020) की सुबह यूपी एसटीएफ और हमीरपुस पुलिस को एक संयुक्त ऑपरेशन के दौरान ये सफलता मिली। अमर दुबे मध्य प्रदेश की सीमा में घुस कर फरार होने की कोशिश में लगा था।

विकास दुबे उज्जैन से गिरफ्तार: अब तक 3 गुंडे मारे जा चुके एनकाउंटर में

8 पुलिसकर्मियों की बेरहमी से हत्या करने वाले कानपुर घटना के प्रमुख आरोपित गैंगस्टर विकास दुबे को उज्जैन के महाकाल मंदिर में दर्शन करते हुए गिरफ्तार कर लिया गया है। जब उसे गिरफ्तार किया गया, उस समय वह मध्य प्रदेश के उज्जैन में महाकाल के दर्शन कर बाहर निकल ही रहा था।

गैंगस्टर विकास दुबे कई दिनों से फरार चल रहा था। उसकी तलाश कई राज्यों में उत्तर प्रदेश की पुलिस कर रही थी। विकास दुबे पर 8 पुलिसकर्मियों की हत्या करने का आरोप है।

इससे पहले विकास दुबे के दो साथी आज एनकाउंटर में ढेर हो गए। प्रभात मिश्रा पुलिस हिरासत से भागने की कोशिश कर रहा था, जिसके बाद एनकाउंटर में उसे ढेर कर दिया गया। प्रभात मिश्रा को बुधवार को फरीदाबाद से गिरफ्तार किया गया था। इसके अलावा विकास दुबे गैंग का एक और मोस्ट वांटेड क्रिमिनल बउअन शुक्ला भी इटावा में ढेर हो गया।

गत शुक्रवार को उत्तर प्रदेश पुलिस, कानपुर के चौबेपुर में हिस्ट्रीशीटर विकास दुबे को पकड़ने पहुँची थी। जहाँ विकास दुबे ने अपने साथियों के साथ मिलकर पुलिसवालों पर हमला कर दिया था। जिसमें प्रदेश के डिप्टी SP देवेंद्र मिश्रा समेत आठ पुलिसकर्मियों ने अपनी जान गंवा दी थी। हिस्ट्रीशीटर विकास दुबे पर 60 आपराधिक मामले दर्ज है।

सावन में माँस न खाना ढोंग, बकरीद में बकरियों को काटना ईमान: वामपंथियों का फिर जागा हिन्दूफोबिक ज्ञान

आपने अक्सर देखा होगा कि कुछ वामपंथी लिबरल्स हिंदू धर्म, उनके देवी देवताओं, उनकी मान्यताओं और त्योहारों को लेकर तमाम तरह की हिन्दूफोबिया से ग्रसित अनर्गल बातें करते हुए नजर आते हैं। कभी वो हिन्दुओं के रीति-रिवाजों, परम्पराओं को लेकर अपने घटिया कुतर्क को महान तर्क के रूप में पेश करते हैं, तो कभी त्योहारों खासतौर से नवरात्र और सावन के समय नॉनवेज (माँसाहारी) नहीं खाने को लेकर मजाक उड़ाते हुए नजर आते हैं।

यही वामपंथी बुद्धिजीवी लोग इस्लाम में बुरके, तीन तलाक, निक़ाह हलाला, जैसी कई बुराइयों पर चुप्पी साध लेते है। वहाँ इनका तर्क कुंद और जबान आवाज खो देती है। लिखना तो ये सामाजिक सद्भाव में भूल जाते हैं। वहीं हिंदुओं को सॉफ्ट टारगेट समझ कर उनकी मान्यताओं पर व्यंग्य करने में क्षण भर भी देर नहीं लगाते हुए जी जान से लग जाते हैं।

आपको पिछला नवरात्र याद होगा। तब भी ऐसे वामपंथी इसी तरह शुरू हो गए थे और अब जब सावन का महीना शुरू हो चुका है, तब लिबरल्स भी इस वक़्त अपने घटिया एजेंडे के साथ जाग चुके है। जहाँ वो बकरीद पर मारी जा रहीं सैकड़ों बकरियों को लेकर आँख मूँद लेते है, वहीं सावन में नॉन वेज नहीं खाने को ढोंग बताते हैं।

सावन में भगवान शिव की पूजा के लिए दूध चढ़ाने पर इन्हें दूध की बर्बादी सहित कई ज्ञान और सिद्धांत याद आएँगे। ये वामपंथी हमेशा सिर्फ हिंदुओं की आलोचना करते हुए नजर आएँगे और इसी कर्म से खुद को सेकुलर बताएँगे।

सोशल मीडिया से लिए गए ऐसे ही कुछ स्क्रीनशॉट आपको दिखाती हूँ, जिसमें नॉनवेज खाने को लेकर वामपंथियों ने हाल ही में और पिछले साल भी इसी समय फर्जी प्रोपगंडा फैलाने की कोशिश की है।

यहाँ तो मैं कुछ ही स्क्रीनशॉट दे रही हूँ, बाकी आपकी भी नजर पड़ी होगी ऐसे और भी टिप्पणियों और व्यंग्यबाणों पर। ये तमाम मझे हुए वामपंथी अपने आपको नास्तिक बताते हैं और इसकी आड़ में हिंदुओं की भावनाओं का मजाक उड़ाते हैं। दूसरी ओर यही अन्य धर्मों और मजहब के आगे ये भीगी बिल्ली बन जाते हैं। इन्हें पता होता है कि ऐसी कोई भी अनर्गल बात अगर इन लोगों ने ईसाई या ख़ास समुदाय को लेकर लिखी तो उन्हें इसका गंभीर परिणाम भुगतना पड़ सकता है।

वैसे इन वामपंथियों की जानकारी के लिए बता दूँ कि सावन में माँस नहीं खाने को लेकर धार्मिक कारणों के साथ कुछ वैज्ञानिक तर्क भी है। जिनके बारे में इन ‘बुद्धिजीवियों’ ने जानने की भी कोशिश नहीं की होगी। हिंदू मान्यताओं के अनुसार सावन के महीने में किसी जीव-जंतु की हत्या करना भी पाप माना जाता है। इसलिए सावन के महीने में नॉन वेज न खाकर लोगों को पाप से बचना चाहिए।

सावन के मौसम में नॉन वेज नहीं खाने को लेकर कई साइंटिफिक वजहें भी हैं। जैसे- इस मौसम में लगातार बारिश होती है। जिसके चलते वातावरण में कीड़े, मकोड़े की संख्या बढ़ जाती है। कई अन्य बीमारियाँ जैसे डेंगू, चिकनगुनिया होने लगती हैं, जो जानवरों को भी बीमार कर देती हैं। जिसके बाद इनका सेवन करने का मतलब है, सीधे बीमारियों को दावत देना। इसलिए कहा जाता है कि सावन के दौरान इंसान को माँस-मछली नहीं खाना चाहिए। अगर आप पूरी बारिश के मौसम में मांसाहार से बचें तो ये और अच्छा माना गया है।

वहीं वैज्ञानिक यह भी बताते हैं कि इस महीने में लगभग हर दिन लगातार बारिश होती है और आसमान में बादल छाए रहते हैं। जिसके कारण इस महीने में कई बार सूर्य और चंद्रमा दर्शन भी नहीं देते। सूरज की रोशनी कम मिलने की वजह से हमारी पाचन शक्ति कमजोर हो जाती है। हमारे शरीर को नॉनवेज खाने को पचाने में ज्यादा समय लगता है। पाचन शक्ति कमजोर होने की वजह से खाना नहीं पचता है, जिसकी वजह से पाचन सहित स्वास्थ्य संबंधी बीमारियाँ उत्पन्न हो जाती हैं। यही कारण है कि इन महीनों में माँसाहार नहीं खाने की सलाह दी जाती है।

कुछ जानकारों का यह भी कहना है कि इस महीने में मछलियाँ, पशु, पक्षी सभी में गर्माधान करने की संभावना होती है। अगर किसी गर्भवती मादा का माँस खाने के लिए उसकी हत्या की जाती है तो इसे भी हिंदू धर्म में पाप बताया जाता है। वहीं वैज्ञानिक दृष्टि से देखा जाए तो अगर कोई इंसान गर्भवती जीव को खा लेता है, तो उसके शरीर में हार्मोनल समस्याएँ भी हो सकती हैं।

थोड़ी और गहराई में जाऊँ तो आध्यात्मिक दृष्टि से ध्यान, साधना और पूजा में मांस को वर्जित माना गया है। नॉनवेज के सेवन से चित्त का भटकाव भी साधना में सबसे बड़ी बाधा है। दूसरा सावन का यह महीना साधना-सत्कर्म के शास्त्रों में विशेष तौर पर निर्धारित किया गया है। तो ऐसे में जो धार्मिक और आध्यात्मिक वजहों या व्रत आदि के कारण नॉनवेज नहीं खा रहे है या मांसाहार की आड़ लेकर सम्पूर्ण हिन्दू धर्म की मान्यताओं-परम्पराओं का मजाक उड़ाना कहाँ तक उचित है आप खुद ही विचार कर सकते हैं।

ऐसे में जहाँ भी वामपंथी-लिबरल्स आपको आपके हिन्दू धर्म-परंपरा को मानने और पालन करने को लेकर ज्ञान दें, वहीं इन्हें या तो पूरी तरह इग्नोर करें या इन्हें ज्ञान देने का नया अवसर देते हुए दूसरे मजहबों की कुछ प्रचलित कुरीतियों की याद दिलाएँ। इन्हें वहीं जलील करें, ये साइड से निकल जाएँगे।

J&K में भाजपा नेता वसीम बारी की हत्या के बाद 10 पुलिसकर्मी गिरफ्तार, जेपी नड्डा बोले – व्यर्थ नहीं जाएगा बलिदान

जम्मू-कश्मीर पुलिस ने बड़ी कार्रवाई करते हुए बांदीपुरा में भाजपा के एक पूर्व जिलाध्यक्ष वसीम बारी (Wasim Bari) और उनके परिवार के दो सदस्यों की मौत के बाद 10 पुलिसकर्मियों को हिरासत में ले लिया है, ये सभी पुलिसकर्मी शेख वसीम के पीएसओ के रूप में तैनात थे।

हिरासत में लिए गए पुलिसकर्मियों को शेख वसीम बारी के निजी सुरक्षा अधिकारियों (पीएसओ) के रूप में रखा गया था। बीजेपी युवा मोर्चा ने बृहस्पतिवार (जुलाई 09, 2020) को सुबह 9.15 बजे जम्मू प्रेस क्लब के सामने धरना प्रदर्शन का आह्वान किया था।

दस PSO के इस दल के पास वसीम बारी और उनके परिवार की सुरक्षा की जिम्मेदारी थी। हमले के समय, ये पुलिसकर्मी भवन की पहली मंजिल पर बैठे थे। इस मंजिल पर बारी का परिवार रहता है और यहाँ एक दुकान भी है।

जम्मू-कश्मीर के बांदीपोरा जिले में आतंकियों ने बुधवार (जुलाई 08, 2020) देर शाम भाजपा के जिलाध्यक्ष वसीम बारी की हत्या कर दी थी। आतंकवादियों ने वसीम बारी के अलावा उनके पिता और भाई की भी गोली मारकर हत्या कर दी गई। उमर भाजपा की जिला युवा इकाई का सदस्य थे, जबकि उनके पिता बशीर शेख भाजपा के जिला उपाध्यक्ष रह चुके थे।

रिपोर्ट्स के अनुसार, पुलिस ने बताया कि इस घटना में उनके पिता और भाई की भी मौत हो गई। उन्होंने बताया कि हमला करने के बाद आतंकी मौके से फरार हो गए। पुलिस और सुरक्षाबलों ने मौके पर पहुँचकर पूरे इलाके को घेर लिया और बड़े स्तर पर खोज अभियान जारी है।

केंद्रीय मंत्री डॉ जितेंद्र सिंह ने ट्विटर पर बताया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वसीम बारी और उनके परिवार की हत्या के बारे में पूछताछ की। डॉ सिंह ने ट्वीट में लिखा, “टेलीफोन पर, पीएम नरेन्द्र मोदी ने वसीम बारी की निर्मम हत्या के बारे में पूछताछ की। उन्होंने वसीम के परिवार के प्रति संवेदना भी व्यक्त की।”

भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा ने कहा, “वसीम बारी की हत्या से पार्टी को भारी नुकसान हुआ है। मैं उनके परिवार के प्रति गहरी संवेदना जाहिर करता हूँ। पूरी भाजपा पीड़ित परिवार के साथ खड़ी है। मैं भरोसा देता हूँ कि उनका बलिदान व्यर्थ नहीं जाएगा।”

विकास दुबे के 3 गुंडे अब तक ढेर: प्रभात और रणवीर (बऊआ) मारे गए पुलिस एनकाउंटर में

कानपुर मुठभेड़ का मास्टरमाइंट विकास दुबे पुलिस की पकड़ से बाहर है। वहीं पुलिस ने अब हिस्ट्रीशीटर विकास दुबे का साथ देने वाले उसके अन्य 2 साथियों को मार गिराया है। मारे गए अपराधियों का नाम प्रभात और रणवीर शुक्ला (बऊआ) है। पुलिस ने बुधवार (8 जुलाई, 2020) को इनका एनकाउंटर किया है।

रिपोर्ट्स के अनुसार विकास गैंग के बदमाश प्रभात मिश्रा को पुलिस ने फरीदाबाद के ओयो होटल से पकड़ा था। जहाँ विकास दुबे की भी छुपे होने की खबर थी। प्रभात को फरीदाबाद के कोर्ट में पेश किया गया था। जिसके बाद यूपी पुलिस उसे ट्रांजिट रिमांड पर कानपुर ला रही थी।

आईजी मोहित अग्रवाल ने बताया कि प्रभात को लाते वक़्त कानपुर हाइवे पर भौंती के पास पुलिस की गाड़ी पंचर हो गई थी। जिसका फ़ायदा प्रभात ने उठाने की कोशिश की। उसने गाड़ी में बैठे एसटीएफ के पुलिस इंस्पेक्टर से पिस्तौल छीनी और पुलिस कस्टडी से भागने की कोशिश की। जिस पर तुरंत कार्रवाई करते हुए पुलिस ने उसे मार गिराया। इस मुठभेड़ में कुछ सिपाही भी घायल हुए।

आईजी कानपुर मोहित अग्रवाल ने आगे जानकारी दी कि दूसरे एनकाउंटर में विकास दुबे गैंग का मोस्ट वांटेड क्रिमिनल रणवीर उर्फ बउअन उर्फ बऊआ इटावा में मार गिराया गया। उस पर 50,000 इनाम भी था। वह कानपुर में हुए 8 पुलिसकर्मियों की हत्या का एक आरोपी भी था।

रिपोर्ट्स के अनुसार रणवीर शुक्ला ने आधी रात महेवा के पास हाईवे से एक स्विफ्ट डिजायर कार को लूटा था। जिसके चलते पुलिस ने उसे काचुरा रोड पर घेर लिया। सरेंडर करने की जगह उसने पुलिस पर ताबड़तोड़ फायरिंग कर दी। जिसपर जवाबी कार्रवाई करते हुए पुलिस ने उसे ढेर कर दिया। लेकिन मौका देखते ही उसके अन्य तीन साथी भागने में कामयाब हो गए। पुलिस ने इलाके की नाकाबंदी कर दी है। और अन्य लोगों की तलाश जारी है।

गौरतलब है कि घटना को अंजाम देने वाले विकास दुबे के गुर्गो पर पुलिस शिकंजा कसती जा रही है। इससे पहले पुलिस ने विकास के सबसे बड़े सहयोगी अमर दुबे को एनकाउंटर में मार गिराया है। हमीरपुर में बुधवार (जुलाई 8, 2020) की सुबह यूपी एसटीएफ और हमीरपुस पुलिस को एक संयुक्त ऑपरेशन के दौरान ये सफलता मिली। अमर दुबे मध्य प्रदेश की सीमा में घुस कर फरार होने की कोशिश में लगा था।

इस एनकाउंटर में दो पुलिसकर्मियों भी घायल हुए हैं। एडिशनल डायरेक्टर जनरल ऑफ पुलिस (ADG, लॉ एंड आर्डर) प्रशांत कुमार ने बताया था कि कानपुर में पुलिसकर्मियों की हत्या मामले में अमर दुबे नामजद आरोपित था। उन्होंने बताया कि अमर दुबे के ऊपर 25,000 रुपए का इनाम रखा गया था। उसके खिलाफ कई आपराधिक मामले दर्ज हैं। पुलिस ने उन सभी को खँगालना शुरू कर दिया है।

वहीं अब पुलिस ने 8 पुलिसकर्मियों की बेरहमी से हत्या करने वाले खूंखार गैंगस्टर विकास दुबे की मदद और दबिश की मुखबरी करने के आरोपों में निलंबित चल रहे चौबेपुर के पूर्व SHO विनय तिवारी को गिरफ्तार कर लिया गया है और सब इंस्पेक्टर केके शर्मा की भी गिरफ्तारी हुई है।

रिपोर्ट के अनुसार विकास दुबे को भगाने के पीछे विनय तिवारी और केके शर्मा का हाथ बताया जा रहा है। इन लोगों ने ही दबिश के दौरान पुलिस की जान खतरे में डाली थी और उन्हें मरता हुआ छोड़ कर भाग गए थे।

क्या है सुकन्या देवी रेप केस जिसमें राहुल गाँधी थे आरोपित, कोर्ट ने कर दिया था खारिज

राजीव गाँधी फाउंडेशन पर जाँच को लेकर कल एक टीवी डिबेट में बीजेपी प्रवक्ता संबित पात्रा और कॉन्ग्रेस के प्रवक्ता गौरव बल्लभ के बीच बहस आगे बढ़ते-बढ़ते एक पुराने रेप के मामले पर अटक गई जिसमें राहुल गाँधी को आरोपित बनाया गया था। हालाँकि, बाद में सुप्रीम कोर्ट ने उस आरोप को ख़ारिज कर दिया था।

इस डिबेट में राजीव गाँधी फाउंडेशन में सोनिया गाँधी की भूमिका और उस पर लगे हालिया आरोपों के मद्देनजर जाँच को कॉन्ग्रेस प्रवक्ता ने जहाँ चीन से ध्यान हटाने वाला बताकर ख़ारिज करना चाहा। और साथ ही साथ रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और अमित शाह की तुलना रेपिस्ट अपराधी जोड़ी रंगा-बिल्ला से कर दी। यहाँ तक की राजीव गाँधी फाउंडेशन पर चीन से धन हासिल करने के आरोपों से पीछा छुड़ाने के लिए बीजेपी पर चीन से धन प्राप्त करने का आरोप भी लगाया।

जिस पर बीजेपी प्रवक्ता संबित पात्रा ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कॉन्ग्रेस प्रवक्ता को करारा जवाब दिया और इस असंगत तुलना पर खरी-खोटी सुनाई। साथ ही बीजेपी के दो शीर्ष नेताओं की तुलना रेपिस्ट रंगा-बिल्ला से करने पर कॉन्ग्रेस प्रवक्ता को सुकन्या देवी रेप केस याद दिला दिया। जिसमें पूर्व कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी भी आरोपित थे।

अब जब सुकन्या देवी मामला फिर से उछला है तो आइए जानते हैं कि क्या था सुकन्या देवी रेप केस, जिसमें खुद कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी भी आरोपित बनाए गए थे।

क्या था ‘सुकन्या देवी’ मामला

सुकन्या देवी मामला उस आरोप से संबंधित है, जिसमें राहुल गाँधी और उनके दोस्तों पर यूपी के एक स्थानीय कॉन्ग्रेस नेता की बेटी सुकन्या देवी के साथ 2006 में अमेठी में बलात्कार करने का आरोप लगाया लगाया गया था। शुरू में इस आरोप को कई ब्लॉगर्स द्वारा उठाया गया था। उसमें कहा गया था कि कथित घटना को लेकर शिकायत करने के लिए सोनिया गाँधी से मिलने के बाद लड़की और उसके माता-पिता गायब हो गए थे।

आरोपों में कहा गया कि सुकन्या, बलराम सिंह नामक कॉन्ग्रेस कार्यकर्ता की बेटी थी, और वह आरोपित राहुल गाँधी की बहुत बड़ी प्रशंसक थी। आरोप लगाया गया कि जब राहुल गाँधी अमेठी गेस्ट हाउस में अपने दोस्तों के साथ पार्टी कर रहे थे, तो वह उनसे मिलने के लिए वहाँ गई थीं, जहाँ आरोपित राहुल गाँधी और उनके 7 दोस्तों ने उनका कथित तौर पर बलात्कार किया था, जिनमें से 2 ब्रिटेन के थे और 2 अन्य इटली के थे।

जाहिर है कि वह किसी तरह इस घटना के बाद भाग निकली और कई लोगों से संपर्क किया लेकिन कोई भी मदद के लिए आगे नहीं आया। आरोपों में यह भी कहा गया कि सुकन्या देवी अपने पिता बलराम सिंह और माँ सुमित्रा देवी के साथ सोनिया गाँधी और मानवाधिकार आयोग से मिलीं, मगर उसके बाद उसका पूरा परिवार लापता हो गया। आरोप यह भी था कि ध्रुपद नाम का वीडियोग्राफर और एक न्यूज चैनल का एक कैमरामैन, जिन्होंने सुकन्या का बयान रिकॉर्ड किया था, उसके बाद वो भी लापता हो गए।

हालाँकि, उस समय इन आरोपों को मेन स्ट्रीम मीडिया ने पूरी तरह से नजरअंदाज किया और केवल कुछ सोशल मीडिया यूजर्स द्वारा इसे उठाया गया, लेकिन जब 2011 में सपा विधायक किशोर समरते ने इसे उठाया तो मीडिया को इसकी रिपोर्ट करने के लिए मजबूर होना पड़ा। समरीते ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय में एक मामला भी दायर किया था, जिसमें कथित बलात्कार और सुकन्या के माता-पिता के गायब होने को लेकर जाँच की माँग की गई थी।

विधायक ने कहा था कि जब वह गाँव गए थे, तो उन्होंने पाया था कि उसके परिवार ने घर को छोड़ दिया था और पड़ोसी उस परिवार के दिल्ली जाने के बाद रहस्यमय तरीके से गायब होने की बात से अनजान थे।

लेकिन अदालत के आदेश पर पुलिस द्वारा की गई जाँच में आरोपों में कोई सच्चाई नहीं पाई गई। जाँच में पाया गया कि किशोर समरिते द्वारा बताया गया परिवार का पता मौजूद नहीं है। इसके अलावा, गजेंद्र पाल नाम के एक अन्य व्यक्ति ने बलराम और सुकन्या के दोस्त के रूप में अदालत में एक और याचिका दायर की थी, जिसमें कहा गया था कि समरिते ने एक झूठी याचिका दायर की थी जो राजनीति से प्रेरित थी।

जाँच में यह भी पाया गया कि बलराम सिंह ने अपना घर बेच दिया था और दूसरी जगह चले गए थे, और उनकी पत्नी और बेटी के नामों का ब्लॉगों में गलत उल्लेख किया गया था। उनकी पत्नी सुशीला देवी थीं और उनकी सबसे बड़ी बेटी कीर्ति सिंह थीं। उन्होंने जानकारी दी थी कि मीडिया में दावा करने वाले कुछ लोग उनके घर आए थे और उन्हें सुकन्या देवी की तस्वीर दिखाते हुए पूछा कि क्या वह उनकी बेटी है। उन्होंने उन्हें बताया था कि यह एक अलग महिला थी न कि उनकी बेटी।

इसके बाद याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया था कि कीर्ति देवी एक अलग महिला थी, और उसे इस केस को कमजोर करने के लिए इसमें शामिल किया गया था।

मगर हाईकोर्ट ने दोनों याचिकाकर्ताओं, किशोर सम्राट और गजेंद्र पाल को जुर्माना भरने के लिए कहा था। किशोर पर ‘झूठ’के आधार पर एक याचिका दायर करने के लिए 50 लाख रुपए का जुर्माना लगाया गया था, जिसमें से 25 लाख कीर्ति सिंह को, 20 लाख राहुल गाँधी को और 5 लाख यूपी के डीजीपी को इनाम के रूप में दिए जाने थे।

दूसरी ओर, गजेंद्र पर 5 लाख का जुर्माना लगाया गया था, क्योंकि उनके पास मामले में उनका उस परिवार से कोई संबंध नहीं था। इस तथ्य के बावजूद कि परिवार ने कोई शिकायत दर्ज नहीं की थी, अदालत ने गजेन्द्र पाल को उस परिवार को अदालत में घसीटने के लिए भी फटकारा।

इसके बाद किशोर समरीते ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था, लेकिन शीर्ष अदालत ने भी 2012 में आरोपों को खारिज कर दिया था, और समरिते पर 5 लाख रुपए का जुर्माना लगाया था, जबकि उच्च न्यायालय के जुर्माने को 50 लाख रुपए से घटाकर 10 लाख रुपए कर दिया था।

अदालत ने उल्लेख किया था कि “कोई भी साक्ष्य नहीं है” यह दिखाने के लिए कि कथित घटना 2006 में हुई थी। इसके अलावा, समरिते ने सुनवाई के दौरान यू-टर्न लेते हुए कहा था कि उन्हें इस मामले की कोई व्यक्तिगत जानकारी नहीं है और उन्होंने सपा नेतृत्व के निर्देश पर यह याचिका दायर की थी।

ज्योति बसु: सामूहिक हत्याओं का वो वामपंथी प्रतीक जिसे भारत भूल चुका है

पश्चिम बंगाल की एक जगह है जहाँ गंगा की दो धाराएँ हुगली और पद्मा समंदर में जाकर मिलती हैं। यहीं है एक सुनसान सा दलदली द्वीप मरीचझापी। इसी जगह पर तत्कालीन ज्योति बसु की वामपंथी सरकार ने हजारों हिन्दू शरणार्थियों को सिर्फ इसीलिए मार दिया था क्योंकि उन्होंने भारत के विभाजन के खिलाफ मतदान किया था।

1979 में तत्कालीन ज्योति बसु सरकार की पुलिस व सीपीएम काडरों ने बांग्लादेशी हिंदू शरणार्थियों के ऊपर जिस निर्ममता से गोलियाँ बरसाईं उसकी दूसरी कोई मिसाल नहीं मिलती। जान बचाने के लिए दर्जनों लोग समुद्र में कूद गए थे। अब तक इस बात का कहीं कोई ठोस आँकड़ा नहीं मिलता कि उस मरीचझापी नरसंहार में कुल कितने लोगों की मौत हुई थी। प्रत्यक्षदर्शियों का अनुमान है कि इस दौरान 1000 से ज्यादा लोग मारे गए। लेकिन, सरकारी फाइल में केवल दो मौत दर्ज की गई।

ज्योति बसु वह सामूहिक कातिल है जिसे इतिहास भूल गया है। आज उनका जन्मदिन है। उनका जन्म 8 जुलाई 1914 को कलकत्ता के एक उच्च मध्यम वर्ग बंगाली परिवार में हुआ था। उनकी शुरुआती पढ़ाई कोलकाता के लोरेटो स्कूल और फिर सेंट जेवियर स्कूल में हुई। इसके बाद वो कानून के उच्च अध्ययन के लिए इंग्लैंड रवाना हो गए, जहाँ ग्रेट ब्रिटेन की कम्युनिस्ट पार्टी के संपर्क में आने के बाद राजनैतिक क्षेत्र में उन्होंने कदम रखा। 

इसकी कहानी शुरू होती है भारत के विभाजन से। भारत का विभाजन ऐसी दर्दनाक घटना है जिससे मिले घाव कभी भरे नहीं जा सकते। भारत जिसे मातृभूमि माना जाता है उसे टुकड़ों में बाँट दिया गया। तत्कालीन नेताओं और जिहादी मानसिकता के लोगों ने अपने निजी स्वार्थ के लिए देश का विभाजन करा दिया।

विभाजन भारत के दोनों ओर हुआ था। पूर्व और पश्चिम। पूर्वी पाकिस्तान और पश्चिमी पाकिस्तान। ट्रेन से भरकर लाशें आ रही थी। पश्चिमी पाकिस्तान के हिस्से में कुछ वक्त में स्थिति कुछ सामान्य हुई लेकिन पूर्वी क्षेत्र जलता रहा।

इसी वजह से विस्थापन की जो प्रक्रिया पश्चिम में थम चुकी थी वह पूर्व में लगातार होती रही। बांग्लादेश से धार्मिक रूप से उत्पीड़न झेलने के बाद बांग्लादेशी हिन्दू भारत में शरण लेने आते गए। यह वही लोग थे जिन्होंने 1946 के मतदान के समय भारत के विभाजन के विरोध में मतदान किया था, लेकिन कम्युनिस्ट पार्टी ने विभाजन के पक्ष में मतदान किया था।

बांग्लादेश (तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान) से बाद में आने कारण लोगों को नागरिकता नहीं दी जा रही थी। 1971 के युद्ध के दौरान एक करोड़ से अधिक हिन्दू शरणार्थी भारत आए जिनमें अधिकतर नाम शूद्र अर्थात दलित समुदाय से थे। उन्हें भारत सरकार ने कैम्पों में रखा और नागरिकता नहीं दी। पश्चिम बंगाल के दलदली सुंदरबन डेल्टा में मरीचझापी नामक द्वीप पर बांग्लादेश से भागे करीब 40,000 शरणार्थी एकत्रित हो चुके थे।

बांग्लादेश से आए शरणार्थियों में ज्यादातर बेहद गरीब परिवारों और दलित समुदाय से आते थे। गरीबों, दलितों, वंचितों और मजदूर वर्ग की पार्टी होने का दावा करने वाले वामपंथी दलों ने सत्ता में आने पर शरणार्थियों को नागरिकता देने का वादा किया।

1977 में सरकार आने के बाद वामपंथी दल ने इस बात को दोहराया भी। इसके बाद छत्तीसगढ़, दंडकारण्य, असम और अन्य क्षेत्रों में रहने वाले बांग्लादेशी हिंदुओं ने बंगाल की तरफ पलायन किया। लेकिन किसी तरह की सहायता ना होते देख उन्होंने सुनसान दलदली द्वीप मरीचझापी में अपना ठिकाना बनाया।

इसी जगह पर उन्होंने खेती शुरू की, विद्यालय शुरू किए और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र की व्यवस्था की। लेकिन वामपंथी सरकार को 1947 में भारत विभाजन के विरोध में किए गए मतदान का बदला लेने की सनक ने इन हिन्दू शरणार्थियों के लिए मरीचझापी को “खूनी द्वीप” बना दिया।

100 से अधिक पुलिस जहाज और 2 स्टीमर भेजकर राज्य की कम्युनिस्ट सरकार ने द्वीप की पूरी घेरे बंदी कर दी। वहाँ से आवागमन के सारे रास्ते बंद कर दिए गए। द्वीप चारों तरफ से समुद्र से घिरा हुआ था, इसकी वजह से वहाँ पीने के पानी का एकमात्र स्त्रोत था। उसमें भी सरकारी आदेश के बाद जहर मिला दिया गया।

वामपंथी सरकार के केवल इस आर्थिक घेरेबंदी के दौरान ही 2000 से अधिक लोग मारे गए थे। मरने वालों में छोटे छोटे दुधमुँहे बच्चे भी शामिल थे। मजबूरी में हिन्दू शरणार्थी लोगों को द्वीप से निकलना पड़ा।

कुछ लोगों को वहीं मार दिया गया। मार कर लाशों को समुद्र में ही फेंक दिया गया। सुंदरवन के जंगलों में लाशों को छोड़ दिया गया जिसे खाकर वहाँ के बाघ आदमखोर बन गए

यह सब कुछ जो हुआ वह जलियाँवाला बाग नरसंहार के बराबर या उससे अधिक ही जघन्य था। लेकिन इस मामले को कभी मुख्यधारा की खबरों में जगह नहीं मिली। कभी वामपंथी दलों से इस मुद्दे पर प्रश्न नहीं पूछा गया।

अगर कायदे से देखा जाए तो इस भयानक नरसंहार के बाद ज्योति बसु को तुरंत पद छोड़ना देना चाहिए था। शायद उन्हें गिरफ्तार भी कर लिया जाना चाहिए था, मगर ऐसा कुछ नहीं हुआ। इसके विपरीत जिस समय ज्योति बसु ने पश्चिम बंगाल के सीएम के रूप में इस्तीफा दिया, उन्होंने भारत के सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री के रूप में इतिहास रचा था। उन्होंने तो इस नरसंहार पर सहानुभूति भी नहीं व्यक्त की।

आज भी वही वामपंथी दल, पत्रकार, बुद्धिजीवी हिन्दू शरणार्थियों को नागरिकता देने के खिलाफत कर रहे हैं। आखिर कुछ लोगों के द्वारा लिए गए फैसले की वजह से उनकी जमीन, उनकी मातृभूमि में उनके साथ ही धार्मिक उत्पीड़न होता है तो उसके लिए वो लोग जिम्मेदार कैसे हैं?

यह वामपंथ की पुरानी आदत है कि दलितों, गरीबों, वंचितों, अल्पसंख्यकों के नाम से खुद को पेश कर गरीबों और दलितों का शोषण किया जाता है। मरीचझापी की घटना सबसे बड़ा उदाहरण है किस तरह वामपंथ भारत में भारतीय मूल के धर्मों से नफरत करता है और उनका नरसंहार चाहता है।

वामपंथियों के देशविरोधी कृत्यों का एक पूरा काला इतिहास है। वामपंथी जब भी मुँह खोलते हैं देशविरोधी भाषा ही बोलते हैं। यह किसी से छिपा नहीं है। साल 1962 के युद्ध के बाद भी ज्योति बसु ने सार्वजनिक रूप से एक रैली में घोषणा की थी कि “चीन आक्रामक नहीं हो सकता है।”

वर्ष 1977 में भारी बहुमत के साथ सत्ता में आए लेफ्ट फ्रंट ने हत्या को संगठित तरीके से राजनीतिक हथियार के तौर पर इस्तेमाल करना शुरू किया। वैसे, सीपीएम काडरों ने वर्ष 1969 में ही बर्दवान जिले के सेन भाइयों की हत्या कर अपने राजनीतिक नजरिए का परिचय दे दिया था। वह हत्याएँ बंगाल के राजनीतिक इतिहास में सेनबाड़ी हत्या के तौर पर दर्ज है। वर्ष 1977 से 2011 के 34 वर्षों के वामपंथी शासन के दौरान जितने नरसंहार हुए उतने शायद देश के किसी दूसरे राज्य में नहीं हुए।

वैसे मशहूर बांग्ला कहावत ‘जेई जाए लंका सेई होए रावण’ यानी जो लंका जाता है वही रावण बन जाता है। इसी तर्ज पर सत्ता संभालने वाले तमाम दलों ने इस दौरान इस हथियार को और धारदार ही बनाया है। 

वर्ष 2011 में ममता बनर्जी की अगुवाई में तृणमूल कॉन्ग्रेस के सत्ता में आने के बाद भी राजनीतिक हिंसा का दौर जारी रहा। दरअसल, लेफ्ट के तमाम काडरों ने धीरे-धीरे तृणमूल का दामन लिया था। यानी दल तो बदले लेकिन चेहरे नहीं। अब धीरे-धीरे बीजेपी के सिर उभारने के बाद एक बार फिर नए सिरे से राजनीतिक हिंसा का दौर शुरू हुआ है।

केरल से मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य रहे एपी अब्दुललाकुट्टी ने कॉन्ग्रेस पार्टी के विधायक रहने के दौरान कम्युनिस्ट सरकार की वर्तमान क्रूरता नहीं बल्कि अतीत में की गई क्रूरता की भी पोल खोल दी थी। एपी अब्दुललाकुट्टी फिलहाल केरल भाजपा के उपाध्यक्ष हैं।

5 मार्च 2008 को कन्नूर जिले में पार्टी कार्यकर्ताओं की बैठक के हवाले से उन्होंने अपने आलेख में लिखा है कि जो पिनरायी विजयन अभी केरल की मार्क्सवादी सरकार के मुख्यमंत्री हैं, उस समय सीपीएम के सेक्रेटरी थे। उन्होंने कहा थ कि विजयन ने अपने कार्यकर्ताओं को साफ संदेश दिया था कि केरल में पश्चिम बंगाल के मॉडल को अपनाया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि जिस प्रकार वहाँ अपने दुश्मनों का एक बिना बूँद खून बहाए जिंदा में दफना दिया जाता है वही फार्मूला केरल में भी लागू किया जाना चाहिए।

विजयन ने स्पष्ट रूप से कहा था कि केरल में भी अपने राजनीतिक दुश्मनों को सबक सिखाने के लिए उन्हें जिंदा जमीन में गाड़ देना चाहिए। उन्होंने विस्तार से बताते हुए लिखा कि एक गड्ढा बनाने के बाद में उसमें काफी मात्रा नमक रखकर आदमी को वहीं दफना देना चाहिए। क्योंकि इससे पुलिस को कभी कोई सुराग नहीं मिलेगा।

एपी अब्दुललाकुट्टी के इस खुलासे यह तो तय हो गया है कि कम्युनिस्ट कितने क्रूर होते हैं। पश्चिम बंगाल में यदि कम्युनिस्टों ने इतने दिनो तक शासन किया है तो वह लोकप्रियता के आधार पर नहीं बल्कि क्रूरता के आधार पर। इसी के उदाहरण थे भारत के सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहने वाले ज्योति बसु।

कंगना रनौत की टीम ने किया पूजा भट्ट पर पलटवार, पूछा- आपके पिता सुशांत-रिया के रिश्ते में इतनी रुचि क्यों ले रहे थे?

एक्टर सुशांत सिंह राजपूत के निधन के बाद बॉलीवुड में भाई-भतीजावाद के बारे में बहस तेज हो गई है और बॉलीवुड के दिग्गजों के साथ-साथ स्टार किड्स भी नेटिजन्स के प्रकोप का सामना कर रहे हैं।

इन सभी के बीच महेश भट्ट की बेटी पूजा भट्ट ने अपने ट्विटर पर भाई-भतीजावाद का बचाव किया और दावा किया कि फैक्ट को कोई नहीं जानना चाहता, फिक्शन में सबकी रूचि है। इसके साथ ही उन्होंने यह भी दावा किया कि कंगना रनौत को उनके कैंप ने ही लॉन्च किया था।

इसके बाद कंगना की टीम ने उन पर पलटवार करते हुए कई ट्वीट किए और पूछा कि आपके पिता सुशांत और रिया के रिश्ते में इतने इंट्रेस्टेड क्यों थे। 

टीम कंगना रनोट ने बुधवार (जुलाई 8, 2020) को किए अपने ट्वीट में लिखा, “प्रिय पूजा भट्ट, अनुराग बासु के पास वो पैनी निगाहें थीं, जिन्होंने कंगना की प्रतिभा को खोजा था। हर कोई जानता है कि मुकेश भट्ट कलाकारों को पैसे देना पसंद नहीं करते। प्रतिभाशाली लोगों को मुफ्त में पाना उनके लिए फेवर की तरह है। कई स्टूडियो ये काम अपने दम पर करते हैं लेकिन इस बात से आपके पिता को उन पर चप्पल फेंकने का, उन्हें पागल कहने का और उन्हें अपमानित करने का लाइसेंस नहीं मिल जाता।”

आगे टीम कंगना ने लिखा, “साथ ही उन्होंने कंगना के दुखद अंत की घोषणा भी की थी। इसके अलावा वे सुशांत सिंह राजपूत और रिया की रिलेशनशिप में इतनी ज्यादा रुचि क्यों ले रहे थे? क्यों उन्होंने सुशांत के अंत की घोषणा भी की थी, कुछ सवाल हैं जो आपको उनसे जरूर पूछना चाहिए।”

इसके बाद किए अपने ट्वीट में टीम कंगना ने लिखा, “पूजा भट्ट आपकी जानकारी के लिए बता दें कि कंगना ने गैंगस्टर के साथ ही पोकिरी के लिए भी ऑडिशन दिया था और इसके लिए भी उनका चयन हो गया था। पोकिरी ऑलटाइम ब्लॉकबस्टर बन गई थी। इसलिए अगर आपकी सोच ये है कि वो जो कुछ भी हैं गैंगस्टर की वजह से हैं, तो ये पूरी तरह गलत है। पानी अपना रास्ता खुद ब खुद बना लेता है।”

गौरतलब है कि इससे पहले बुधवार सुबह पूजा ने कई ट्वीट करते हुए नेपोटिज्म को लेकर चल रही बहस पर अपना पक्ष रखा था। इसी दौरान उन्होंने कंगना का नाम लिया था।

पूजा भट्ट ने कहा था कि उनके ‘परिवार’ पर आरोप लगने की बात सुनकर उन्हें हँसी आती हैl जिसने पूरी फिल्म इंडस्ट्री की तुलना में अधिक नए प्रतिभावान-अभिनेताओं, संगीतकारों और तकनीशियनों को लॉन्च किया है। उन्होंने यह भी याद दिलाया कि बॉलीवुड अभिनेत्री कंगना रनौत को विशेष फिल्म्स द्वारा लॉन्च किया गया था, जो मुकेश भट्ट और महेश भट्ट के स्वामित्व वाली एक फिल्म निर्माण कंपनी है।

इस पोस्ट को पढ़ने के बाद कंगना की टीम ने पूजा भट्ट पर पलटवार किया है। पूजा भट्ट ने ट्वीट किया था, “कंगना रनौत एक प्रतिभाशाली अभिनेत्री हैं, मगर अगर उन्हें ‘गैंगस्टर’ में विशेष फिल्म्स द्वारा लॉन्च नहीं किया जाता तो? भले ही अनुराग बसु ने उन्हें ढूँढा था, लेकिन विशेष फिल्म्स ने उनकी सोच का समर्थन किया और इसमें निवेश किया। फिल्म कोई छोटा खेल नहीं है। हम उनके सभी प्रयासों के लिए बहुत शुभकामनाएँ देते हैं।”

वैज्ञानिक को प्रताड़ित किया, कर्मचारियों से अभद्रता: जून 2018 के पत्र से सामने आया CARA सीईओ दीपक कुमार का नया चेहरा

हमने केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के अंतर्गत आने वाली संस्था CARA के CEO रहे दीपक कुमार के बारे में कुछ अहम खुलासे किए थे। अब इसमें एक वैज्ञानिक एसके डे विश्वास को प्रताड़ित किए जाने का मामला सामने आया है, जिन्होंने तत्कालीन मंत्री मेनका गाँधी तक को पत्र लिख कर गुहार लगाई थी। जून 4, 2018 को लिखे गए पत्र में उन्होंने अपनी व्यथा सुनाई थी। दीपक कुमार और CARA को लेकर उनकी पीड़ा के बारे में हम आपको इस लेख में बताएँगे।

वैज्ञानिक विश्वास ने CARA CEO दीपक के खिलाफ मेनका गाँधी को लिखा था पत्र

वैज्ञानिक एसके डे विश्वास ने बताया था कि संस्था में उनके पीठ पीछे अपमानजनक बातें कही जाती हैं। उन्होंने बताया था कि उनके वेतन में जानबूझ कर देरी की जाती है और बिना किसी कारण के वेतन में से रकम काट ली जाती है। साथ ही उन्होंने ये भी आरोप लगाया था कि सीसीटीवी कैमरों में से एक को उन पर ही केंद्रित रखा जाता है, ताकि उनकी सारी गतिविधियाँ रिकॉर्ड की जा सके। उन्होंने लिखा था:

“ऑफसेट में मैं वरिष्ठ सलाहकार के पद के लिए मुझे चुनने के लिए धन्यवाद देना चाहता हूँ। CARA और मुझे इंटर कंट्री डिवीजन में रखते हुए, मैं 6 अक्टूबर, 2017 को शामिल हुआ। मैं ICMR में एक वरिष्ठ पद पर एक वैज्ञानिक के रूप में सेवानिवृत्त हुआ। मैंने 40 से अधिक वर्षों तक मेहनत कर के देशसेवा की। मेरा वर्षों का एक सफल करियर रहा, जिसमें अंतर्राष्ट्रीय मान्यता शामिल थी। मैं आपके ध्यान में लाना चाहता हूँ कि मेरे शामिल होने के एक महीने के बाद मैं लगातार सीईओ दीपक कुमार द्वारा परेशान किया जा रहा हूँ।”

अक्टूबर 2017 की स्थिति के बारे में बताते हुए उन्होंने जानकारी दी थी कि नए काउन्सलेट्स को CARA के 732 केसों का बैकलॉग दे दिया गया है, जिनमें ‘स्पेशल नीड्स चिल्ड्रन’ का कोई जिर्क नहीं था। उन्होंने साथ ही जानकारी दी थी कि ये सूची अपूर्ण है और कई डुप्लिकेट्स होने के कारण इनकी वैधता पर शक है। उस समय तक कुल 100 NOC पेंडिंग थे। साथ ही सिस्टम में रिकार्ड्स रखे जाने की व्यवस्था काफी खराब थी।

उन्होंने इसके बाद पत्र में अप्रैल 2018 की स्थिति का जिक्र किया है। उस समय तक अधिकतर बैकलॉग क्लियर किए जा चुके थे और मात्र 20 ही बचे हुए थे। इन मामलों का फॉलो-अप भी किया जा रहा था और 715 केसों को क्लियर किया जा चुका था। साथ ही इस अवधि में 540 मामलों में NOC दी गई थी। इन सबकी एंट्री ICMR के वैज्ञानिक रहे विश्वास ने ही की थी। इसके बाद उन्होंने अपनी शिकायतों की सूची तैयार की थी।

उन्होंने शिकायत की थी कि 8 महीने में 970 मामलों का निपटारा किए जाने के बावजूद सारे काउन्सलेट्स को बार-बार कहा जाता है कि वो काम नहीं करते हैं पर ये कोई नहीं समझना चाहता है कि अगर ऐसा है तो इतने मामले कैसे निपटा दिए गए। उन्होंने बताया था कि ‘इंटर कंट्री डिवीजन’ में इतना काम होने के बावजूद माहौल को हतोत्साहपूर्ण बना कर रखा गया है, जहाँ मिसमैनेजमेंट का बोलबाला है।

निचले अधिकारियों के साथ असभ्यता से पेश आता था CARA CEO दीपक: वैज्ञानिक विश्वास

साथ ही CEO दीपक कुमार पर काउन्सलेट्स के साथ अभद्र व्यवहार करने, गाली-गलौज करने और किसी भी छोटी-बड़ी गलती के लिए उन्हें ही कटघरे में खड़ा करने का आरोप लगाया गया था। बकौल वैज्ञानिक विश्वास, उन्हें संस्था से बाहर का रास्ता दिखाने के लिए उनके साथ साजिश की गई। सैलरी नहीं दी गई और महीनों बाद मिली भी तो काट-छाँट कर। साथ ही उन पर आरोप लगाने के लिए कई मामले प्लांट किए गए।

उन्होंने बताया था कि CARA के ‘इंटर कंट्री डिवीजन’ को कई प्रतिभाशाली युवा इन्हीं कारणों से छोड़ कर जा चुके हैं। उन्होंने जानकारी दी थी कि जो भी नए काउन्सलेट्स आते थे, वो CEO दीपक कुमार के व्यवहार के कारण छोड़ने की तैयारी में रहते थे या छोड़ देते थे। उन्हें भी चिट्ठी थमा दी गई कि जून 2018 के बाद संस्था को उनकी सेवाओं की आवश्यकता नहीं है। उन्होंने इसके लिए CEO दीपक कुमार को जिम्मेदार ठहराया था।

दरअसल, दीपक कुमार बैठकों में कहते थे कि मैंने इतने सीनियर काउन्सलेट्स को निकाल बाहर किया है क्योंकि वो ठीक से काम नहीं कर रहे थे और साथ ही दीपक बाकियों को भी निकाल बाहर करने की धमकी दिया करते थे। वैज्ञानिक ने पूछा था कि क्या बैठकों में इस तरह का व्यवहार किया जाना चाहिए? उन्होंने पूछा कि जब 8 महीने में इतने केसेज क्लियर हो गए, तो काम कैसे नहीं हो रहा था और उससे पहले के बैकलॉग के लिए कौन जिम्मेदार है?

उन्होंने मेनका गाँधी को भेजे पत्र में कहा था कि ये परिस्थितियाँ ऐसी थीं कि ऊपर के स्तर पर बदलाव किया जाए लेकिन निचले स्तर के कर्मचारियों को दोष दिया जाता है। उन्होंने मंत्रालय से अपील की थी कि एक स्वतंत्र कमिटी बना कर (जसिमें CARA के CEO दीपक कुमार न हों) बना कर मामले की जाँच की जाए और काउन्सलेट्स के परफॉर्मेंस की समीक्षा की जाए। उन्होंने दीपक कुमार को अयोग्य करार दिया था।

CARA के अयोग्य और अक्षम CEO दीपक को एडॉप्शन का अनुभव नहीं: वैज्ञानिक विश्वास

साथ ही वैज्ञानिक एसके डे विश्वास ने साफ़ कर दिया था कि जून 2018 के बाद उनका संस्था में बने रहने की कोई इच्छा नहीं है और एक अयोग्य जूनियर के अंतर्गत काम करने के इच्छुक नहीं हैं। उनका सबसे बड़ा आरोप था कि दीपक कुमार के पास एडॉप्शन या उसकी प्रक्रिया का कोई अनुभव नहीं है जबकि वो इसी से सम्बंधित संस्था के CEO बन कर बैठे हैं। उन्होंने पूछा था कि एडॉप्शन से सम्बंधित ज्ञान न होने के बावजूद इस तरह के व्यवहार के पीछे क्या मंत्रालय के अधिकारियों का समर्थन है?

बकौल वैज्ञानिक विश्वास, CEO दीपक कुमार के पास प्रबंधन के लिए क्षमता का भी पूर्ण अभाव था। उनका ध्यान बस इसी बात पे केंद्रित रहता था कि अपने निचले स्तर के अधिकारियों को सीसीटीवी कैमरे में बैठ कर देखते रहें और उन्हें बिना मतलब का प्रताड़ित करें। इसीलिए, उनकी माँग थी कि स्वतंत्र कमिटी द्वारा CARA सीईओ दीपक कुमार के कार्यों और परफॉरमेंस की भी समीक्षा की जाए।

भारतीयों को कारा से बच्चा गोद लेने के लिए तीन से सात साल तक प्रतीक्षा सूची में रहना पड़ता है लेकिन विदेशी ईसाई परिवारों को बहुत कम समय में बच्चा मिल जाता है। ईसाई मिशनरियों के प्रभाव का आलम यह है कि कारा के सीईओ दीपक कुमार ने कोरोना संकट और लॉकडाउन के समय भी बच्चों को विदेश भेजा। अप्रैल माह में भी विशेष विमान से ये बच्चे इटली, अमेरिका, माल्टा और जॉर्डन भेजे गए।

उनके दो भतीजे हैं अमन और शिशिर। इन दोनों को पहले तीन महीने तक एमटीएस के पद पर 10 हजार रुपए के मासिक वेतन के साथ रखा गया, उसके बाद यंग प्रोफेशनल्स के पद पर बिठा कर वेतन तीन गुना बढ़ा दिया गया। 9 महीने बाद तो इन दोनों को सलाहकार का पद थमा दिया गया और 60 हज़ार रुपए प्रतिमाह दिए जाने लगे। इस तरह की उन्होंने एक-दो नहीं बल्कि कई नियुक्तियाँ की हैं।

WHO को ट्रम्प ने दिया झटका: अमेरिका हुआ विश्व स्वास्थ्य संगठन से आधिकारिक तौर पर अलग, भेजा पत्र

कोरोना वायरस से त्रस्त अमेरिका लगातार विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की भूमिका पर सवाल उठा रहा है। ऐसे में अभी तक खबर आ रही थी कि विश्व के सबसे शक्तिशाली देश ने स्वयं को WHO से अलग करने का फैसला कर लिया है। अब खबर ये है कि WHO से अपनी सदस्यता वापस लेने के लिए ट्रंप सरकार ने संबंधित पत्र भी भेज दिया है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, 6 जुलाई, 2021 के बाद अमेरिका WHO का सदस्य नहीं रह जाएगा। 1984 में तय नियमों के तहत किसी की भी सदस्यता वापस लेने के साल भर बाद ही देश को WHO से निकाला जाता है। इसके अलावा WHO के सभी बकाए भी चुकाने होते हैं। अब अमेरिका को भी WHO के सभी बकाए चुकाने होंगे।

अमेरिकी सिनेटर रॉबर्ट मेनेन्डेज ने ट्वीट करके इस बात की पुष्टि की है। अपने ट्वीट में उन्होंने बताया कि कॉन्ग्रेस को यह नोटिफिकेशन मिली है कि POTUS ने महामारी के बीच में आधिकारिक तौर पर US को WHO से अलग कर लिया है। उनका (रॉबर्ट मेनेन्डेज) कहना है कि ट्रंप सरकार के इस फैसले से अमेरिका बीमार और अकेला पड़ जाएगा।

अमेरिकी सीनेटर के अतिरिक्त न्यूजनेशन के कंसल्टिंग एडिटर दीपक चौरसिया ने भी इस संबंध में ट्वीट किया है। उन्होंने लिखा, “अमेरिका अब WHO का सदस्य नहीं रहा। डोनाल्ड ट्रंप सरकार ने WHO को इस बाबत अपना फैसला भेज दिया है। ये WHO और अन्य देशों के लिए जबरदस्त झटका हो सकता है। साथ ही अप्रैल महीने से अमेरिकी सरकार ने WHO को फंडिंग देना भी बंद कर दिया था।”

गौरतलब है कि अमेरिका ने विश्व स्वास्थ्य संगठन पर अपना रवैया अप्रैल से ही सख्त कर दिया था। इससे पहले अमेरिका ने WHO को फंडिग देना बंद किया था और साथ ही ये कहा था कि कोरोना वायरस के चीन में उभरने के बाद इसके प्रसार को छिपाने और गंभीर कुप्रबंधन में संगठन की भूमिका की समीक्षा की जा रही है।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने कहा था, “मैं अपने प्रशासन को विश्व स्वास्थ्य संगठन के वित्त पोषण को रोकने का निर्देश दे रहा हूँ। हर कोई जानता है कि वहाँ क्या चल रहा है। WHO को अमेरिकी करदाता प्रत्येक वर्ष 400-500 मिलियन डॉलर सहयोग के तौर पर देता है और वहीं इसके विपरीत चीन संगठन को लगभग 40 मिलियन डॉलर से भी कम प्रति वर्ष योगदान के रूप में देता है।”