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गलवान में मारे गए सैनिकों के परिवार पर चीन सख्त, आवाज कुचलने में जुटी कम्युनिस्ट सरकार

भारतीय सेना से संघर्ष भड़काने वाले चीन ने अभी तक ये खुलासा नहीं किया है कि गलवान के हिंसक झड़प में उसके कितने सैनिक मारे गए। बता दें कि चीनी सैनिकों के धोखे की कार्रवाई में 20 भारतीय जवान वीरगति को प्राप्त हो गए थे। चीन के 43 सैनिकों के मारे जाने की बात सामने आई थी लेकिन अब तक उसने कोई आँकड़ा सार्वजनिक नहीं किया है। चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के इस निर्णय से मारे गए सैनिकों के ही परिवार नाराज़ हैं

चीन की सरकार अब सैनिकों के परिजनों पर दबाव डाल कर चुप कराने में लगी हुई है, जिन्होंने भारत-चीन संघर्ष में अपनी जान गँवाई। अब उनके परिजन वेइबो सहित अन्य चीनी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के माध्यम से अपना आक्रोश दिखाने में लगे हुए हैं। चीन सरकार के कुछ तबकों ने अपने अधिकारियों के मारे जाने की बात स्वीकारी है। चीन का मीडिया भी इस बात को मानता है, लेकिन वो आँकड़े नहीं रहा दे रहा।

चीन की सरकार की कथित गोपनीयता की नीति पर सैनिकों के परिवार आहत हैं और आवाज़ उठा रहे हैं, लेकिन न तो वहाँ का मीडिया उनकी सुन रहा है और न ही सरकार द्वारा उनके लिए कुछ किया जा रहा है। उलटा उन्हें चुप कराने की कोशिशें हो रही है। इससे पता चलता है किस चीन अपने ही देश के लिए जान देने वाले सैनिकों की और उनके परिजनों की कोई कदर नहीं करता है।

इससे पहले केंद्रीय मंत्री जनरल वीके सिंह ने गलवान घाटी संघर्ष को लेकर जानकारी दी थी कि इस झड़प में चीन के दोगुने सैनिक मारे गए थे। उन्होंने कहा था कि हमारे 20 सैनिक वीरगति को प्राप्त हुए हैं तो चीन के इससे ज्यादा सैनिक मारे गए। लेकिन चीन कभी भी सार्वजनिक रूप से इस बात को स्वीकार नहीं करेगा। उन्होंने ध्यान दिलाया था कि चीन में हर चीज छुपाई जाती है। हमारे सैनिकों ने बदला लेकर बलिदान दिया है।

उन्होंने खुलासा किया था कि भारत ने चीन के कई सैनिकों को पकड़ा था, लेकिन बाद में उन्हें छोड़ दिया गया। ‘एबीपी न्यूज़’ को इंटरव्यू देते हुए उन्होंने ऐसा कहा। जनरल सिंह ने कहा कि पिछले सप्ताह गलवान घाटी में भारत और चीन के बीच हुए संघर्ष के दौरान ऐसा हुआ था। हालाँकि, चीन की तरफ से इस बारे में कुछ नहीं कहा गया है। अब उन सैनिकों के परिजनों को चुप कराने वाली ख़बर के बाद ये बात सच साबित होती दिख रही है।

TMC समर्थकों ने BJP जिला सचिव को मारी गोली: बोले दिलीप घोष, बंगाल पुलिस की मौजूदगी में हुआ हमला

पश्चिम बंगाल के पूर्वी मिदनापुर जिले के खजूरी में सत्तारुढ़ तृणमूल कॉन्ग्रेस के समर्थकों और भारतीय जनता पार्टी के समर्थकों के बीच हुई झड़प के दौरान भाजपा के जिला सचिव को गोली मार दी गई। गोली भाजपा सचिव के बाएँ हाथ में लगी।

घटना रविवार (जून 28, 2020) दोपहर की है। स्थानीय पुलिस द्वारा की गई शुरुआती जाँच में पता चला कि यह घटना तब घटी जब भाजपा समर्थकों का समूह ने पार्टी के जिला सचिव पबित्रा दास के नेतृत्व में स्थानीय तृणमूल पंचायत के फैसले के खिलाफ प्रदर्शन किया। पंचायत ने फ्लोटिंग टेंडर के बिना चक्रवात अम्फान में उखड़े पेड़ों को बेचने का कथित तौर पर फैसला लिया था।

एक पुलिस अधिकारी ने कहा, “जब भाजपा कार्यकर्ता प्रदर्शन कर रहे थे तो तृणमूल कॉन्ग्रेस के समर्थक वहाँ इकट्ठे हो गए। कुछ ही समय में दोनों समूहों के बीच झड़प शुरू हो गई।”

पुलिस अधिकारी ने बताया कि झड़प के दौरान पबित्रा दास के बाएँ हाथ में गोली लगी। वो वहीं पर गिर पड़े। जब बीजेपी के समर्थक वहाँ पर पहुँचे तो उन्होंने उनके हाथ से खून निकलते देखा। दास को तुरंत स्थानीय अस्पताल में भर्ती कराया गया।

पुलिस ने कहा कि नंदीग्राम से सटे खजुरी में कई मकानों में तोड़फोड़ की गई, जो वाम मोर्चा शासन के दौरान बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के नेतृत्व में बड़े पैमाने पर भूमि अधिग्रहण आंदोलन का गवाह बना।

भाजपा की बंगाल ईकाई के अध्यक्ष दिलीप घोष ने आरोप लगाया कि तृणमूल समर्थकों ने पुलिसकर्मियों की उपस्थिति में दास और अन्य भाजपा समर्थकों पर हमला किया। उन्होंने कहा, “दास हमारी पार्टी के बहुत सक्रिय कार्यकर्ता हैं। उन्होंने स्थानीय पंचायत सदस्यों के अवैध कृत्य के खिलाफ विरोध किया। जब सत्ता पक्ष के समर्थकों ने हमला किया तो पुलिस मूकदर्शक बनकर खड़ी रही।”

पूर्वी मिदनापुर के कोंताई में तृणमूल कॉन्ग्रेस के सांसद शिशिर अधिकारी ने कहा कि उनकी पार्टी का कोई भी समर्थक घटना में शामिल नहीं था।

गौरतलब है कि पिछले दिनों पश्चिम बंगाल के सोनारपुर में बीजेपी नेता नारायण विश्वास की नृशंस हत्या कर दी गई। पहले मृतक को गोली मारी गई और जब वो जख्मी होकर नीचे गिर गए, तो हमलावरों ने धारदार हथियार से उनकी हत्या कर दी।

बंगाल के बीरभूम के नानूर इलाके में 47 वर्षीय भाजपा कार्यकर्ता शंकरी बागड़ी की 21 अक्टूबर 2019 को टीएमसी कार्यकर्ताओं ने गोली मारकर हत्या कर दी थी। झड़प में 6 अन्य भाजपा समर्थक भी घायल हो गए थे।

दिल्ली दंगों के दौरान 13 धार्मिक स्थलों को बनाया गया था निशाना, RTI से खुलासा

उत्तर-पूर्वी दिल्ली में फरवरी माह के आखिर में सीएए विरोध के नाम पर हुई हिंदू विरोधी हिंसा में दंगाइयों ने 13 धार्मिक स्थलों को अपना निशाना बनाते हुए उनको नुकसान पहुँचाया था। दिल्ली पुलिस ने इन मामलों में 13 प्राथमिकी दर्ज करते हुए 33 लोगों को गिरफ्तार किया है। इसका खुलासा दिल्ली पुलिस द्वारा RTI के तहत दिए जवाब से हुआ है।

उत्तर-पूर्वी दिल्ली के अतिरिक्त पुलिस उपायुक्त एवं जन सूचना अधिकारी एम.ए रिज़वी के हस्ताक्षर से जारी जवाब में बताया गया है कि सांप्रदायिक हिंसा के दौरान एक समुदाय विशेष के 11 धार्मिक स्थलों को क्षतिग्रस्त किया गया था। पुलिस ने इन घटनाओं के संबंध में 11 प्राथमिकियाँ दर्ज की हैं और 31 लोगों को गिरफ्तार किया है। इनमें से सात को जमानत मिल गई है और चार मामलों में आरोप-पत्र दाखिल कर दिए गए हैं।

दूसरे आरटीआई आवेदन के जवाब में पुलिस ने बताया कि अन्य समुदाय विशेष के दो धर्मस्थलों को क्षतिग्रस्त किया गया था। इस बाबत दो प्राथमिकियाँ दर्ज की गई हैं और दो लोगों को गिरफ्तार किया गया है। इस संबंध में गिरफ्तार किसी भी आरोपी को ज़मानत नहीं मिली है, जबकि एक मामले में आरोप-पत्र दायर कर दिया गया है।

अन्य आरटीआई आवेदन के जवाब में पुलिस ने बताया कि जाफराबाद, कर्दमपुरी और चाँदबाग में सीएए के खिलाफ हुए प्रदर्शनों और दंगों के सिलसिले में ज्योतिनगर, दयालपुर और जाफराबाद थानों में कुल 190 प्राथमिकियाँ दर्ज की गई हैं और 357 लोगों को गिरफ्तार किया गया है। पुलिस के पास इस बात की जानकारी नहीं है कि कितने गिरफ्तार लोगों को जमानत पर छोड़ा गया है, लेकिन पुलिस का कहना है कि 25 मामलों में आरोप-पत्र दायर कर दिए गए हैं।

आरटीआई आवेदन के जवाब में पुलिस ने बताया कि 23 फरवरी को मौजपुर चौक पर सीएए के समर्थन में हुए प्रदर्शन के सिलसिले में वेलकम थाने में तीन प्राथमिकियाँ दर्ज की गईं और 16 लोगों को गिरफ्तार किया गया था। इनमें से सात को जमानत मिल गई है।

वकील यूनुफ नकी द्वारा RTI के तहत माँगी गई के जानकारी में दिल्ली पुलिस से दंगों के दौरान दर्ज की गई प्राथमिकियों की प्रति और गिरफ्तार किए गए लोगों के नाम भी माँगे थे। लेकिन पुलिस ने किसी भी आरोपी का नाम, प्राथमिकियों की प्रति और दंगाइयों द्वारा बनाए गए धार्मिक स्थलों का पता देने से साफ इनकार कर दिया। पुलिस ने इस मामले के पीछे सांप्रदायिक रूप से संवेदनशील’ होना बताया और इसके लिए आरटीआई अधिनियम 2005 की धारा आठ (1) (ए,जी,जे और एच) का हवाला दिया है।

गौरतलब है कि उत्तर-पूर्वी दिल्ली में फरवरी के आखिर में सीएए विरोध के नाम पर हुए हिंदू विरोधी दंगों में कुल 53 लोगों की मौत हो गई थी और 500 से ज्यादा लोग घायल हुए थे। इतना ही नहीं संसद में दंगों पर चर्चा के दौरान मार्च महीने में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने बताया था कि हिंसा के दौरान 371 दुकानों और 142 घरों को आग लगाई गई थी। शाह के मुताबिक दिल्ली पुलिस ने दंगों के संबंध में 700 से अधिक प्राथमिकी दर्ज की है।

हमारे भाइयों ने भी भारत को दे दिया वोट… ख्‍वाजा आसिफ ने संसद में इमरान की बखिया उधेड़ी: देखें Video

पिछले दिनों भारत भारी बहुमत से संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) का अस्थायी सदस्य चुना गया था। दुनिया भर में भारत के बढ़ते कूटनीतिक प्रभाव से ति​लमिलाए पाकिस्तानी सांसद ने इस मुद्दे पर प्रधानमंत्री इमरान खान को सदन में ही लताड़ लगाई।

पूर्व विदेश मंत्री और पीएएलएन (PML-N) के सांसद ख्वाजा आसिफ ने गुरुवार (25 जून, 2020) को इसे पाकिस्तान की कूटनीतिक विफलता करार देते हुए अस्थायी सदस्यता हासिल करने के लिए भारत की प्रशंसा की।

14 मिनट के संबोधन में आसिफ ने कहा, “यूएनएससी (UNSC) में अस्थायी सदस्य बनना कोई बड़ी बात नहीं है। लेकिन 192 में 184 वोट लेना बहुत बड़ी बात है। हमारे तमाम सो-कॉल्‍ड ब्रदर मुल्‍क जो हैं, उन्‍होंने एक लाइन से उनको (भारत) वोट दिया। अमूमन 150-160 वोट से देश अस्थायी सदस्य चुने जाते हैं। लेकिन उन्हें 184 वोट मिले।”

आसिफ ने इमरान खान सरकार से हकीकत का सामना करने को कहते हुए कहा कि वह हर मोर्चे पर नाकाम रही है। चाहे वह विदेश नीति हो, स्वास्थ्य नीति हो या फिर अर्थव्यवस्था। सब कुछ असफल हो रहा है।

उन्होंने कहा कि यह हालत केवल इमरान खान के कारण है। यह तभी बदल सकता है जब हम उनसे छुटकारा पा लेंगे। वे जब तक कुर्सी पर रहेंगे तबाही का सिलसिला जारी रहेगा।

आसिफ ने आतंकवादी ओसामा बिन लादने को शहीद बताने के लिए भी इमरान खान को फटकार लगाई। उन्होंने कहा, “वह पाकिस्तान में आतंकवाद लेकर आया। वह अव्वल नंबर का दहशतगर्द था। उसने मेरे देश को बर्बाद कर दिया है। लेकिन हमारे प्रधानमंत्री उसे शहीद कह रहे हैं।”

गौरतलब है कि भारत ने UNSC के चुनाव में 192 वैध वोटों में से 184 वोट हासिल कर अस्थायी सदस्यता हासिल की थी। इस चुनाव को जीतने के लिए 128 वोटों की जरूरत होती है। लेकिन भारत ने दो-तिहाई से ज्यादा वोट हासिल किए है।

भारत का कार्यकाल 1 जनवरी 2021 से शुरू होगा। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में कुल 15 देश हैं। इनमें पाँच अमेरिका, रूस, फ्रांस, ब्रिटेन और चीन स्थायी सदस्य हैं। 10 देश अस्थायी सदस्य होते हैं। भारत आठवीं बार सुरक्षा परिषद का अस्थायी सदस्य चुना गया है।

ब्रिटेन में कोरोना वैक्सीन का क्लीनिकल ट्रायल: इंसान को दी पहली खुराक, जानवरों पर सफल रहा था परीक्षण

दुनिया भर में कहर बरपा रही महामारी के बीच हर किसी को कोरोना वायरस की वैक्‍सीन का इंतजार है। कोरोना वायरस महामारी से निपटने के लिए पूरी दुनिया एक साथ मिलकर काम कर रही है। इस बीच कोरोना वैक्सीन को लेकर अच्छी खबर आई है।

ब्रिटेन में कोरोना वैक्सीन का इंसानों पर परीक्षण करने की तैयारी शुरू हो गई है। लंदन के इंपीरियल कॉलेज की क्लीनिकल टीम को इसके लिए एक स्वस्थ प्रतिभागी मिल गया है। लंदन के इंपीरियल कॉलेज के शोधकर्ताओं द्वारा तैयार किए गए वैक्सीन की खुराक इस स्वस्थ प्रतिभागी को दी गई।

फिलहाल प्रतिभागी ने अपना नाम गुप्त रखने के लिए कहा है। बताया जा रहा है कि क्लीनिकल टीम उस प्रतिभागी की निगरानी कर रही है। फिलहाल वो बिल्कुल स्वस्थ और सुरक्षित हैं।

इस वैक्सीन का ट्रायल लंदन के इंपीरियल कॉलेज में 300 लोगों के ऊपर किया जाएगा। यह RNA (saRNA) बेस्‍ड वैक्‍सीन है। यह वैक्सीन के विकास में क्रांति ला सकता है और साथ ही वैज्ञानिकों को भी उभरती हुई बीमारी के बारे में फौरन पता चल सकता है।

ब्रिटेन की सरकार ने 41 मिलियन पाउंड से अधिक इस टीके के निर्माण के लिए दिए हैं। कई वैज्ञानिकों ने आगाह किया है कि इस वैश्विक महामारी को प्रभावी टीके से ही रोका जा सकता है, जिसे विकसित करने में सामान्य तौर पर कई वर्ष लग सकते हैं। बता दें कि इस प्रोजक्ट की अगुवाई इंपीरियल कॉलेज के प्रोफेसर रॉबिन शटॉक कर रहे हैं।

प्रोफेसर रॉबिन शटॉक ने इस बारे में बात करते हुए कहा, “पहला प्रतिभागी हमारे saRNA वैक्सीन प्लेटफॉर्म के लिए एक महत्वपूर्ण कदम है, जो पहले कभी मनुष्यों में नहीं हुआ था। अब हम परीक्षण के लिए बेसब्री से प्रतिभागी का इंतजार कर रहे हैं ताकि हम वैक्सीन की सुरक्षा और इसकी एंटीबॉडी का उत्पादन करने की क्षमता का आकलन कर सकें।”

उन्होंने आगे बताया कि जिस प्रतिभागी को पहली खुराक दी गई है, उसे चार सप्ताह के भीतर दूसरा बूस्टर खुराक दिया जाएगा। कई अन्य प्रतिभागियों को आने वाले दिनों में पहली खुराक दी जाएगी।

इम्पीरियल कॉलेज की प्रोफेसर डॉ. कैटरीना पोलक ने कहा, “इस महत्वपूर्ण कार्य का हिस्सा बनना एक विशेषाधिकार है और हमारी टीम हमारे प्रतिभागियों के उत्साह और समर्थन के लिए बेहद आभारी हैं, जिनके बिना क्लीनिकल रिसर्च संभव नहीं है।”

जानकारी के मुताबिक किसी भी नई वैक्सीन की ट्रायल के लिए पहले किसी स्वस्थ इंसान को वायरस से संक्रमित किया जाता है और फिर उसमें वैक्सीन की खुराक डालकर शोध किया जाता है। इसके लिए प्रतिभागी स्वेच्छा से खुद ही सामने आते हैं। उनके ऊपर ही ये ट्रायल किया जाता है।

बताया जा रहा है कि इस वैक्सीन का जानवरों पर किया ट्रॉयल सफल रहा है। फिलहाल दुनिया भर में 120 जगहों पर कोरोना की वैक्सीन बनाने के लिए प्रयास किए जा रहे हैं। इनमें 13 जगहों पर मामला क्लीनिकल ट्रायल तक पहुँचा है।

सैकड़ों करोड़ रुपए सरकार (जनता) से… और चलाते हैं चीनी प्रोपेगेंडा: PTI से प्रसार भारती तोड़ सकती है रिश्ते

प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया (पीटीआई) इन दिनों एक नई मुश्किल में है। ऐसा इसलिए क्योंकि पीटीआई ने चीनी राजदूत को अपना प्रोपेगेंडा फैलाने के लिए मंच प्रदान किया था।

समाचार एजेंसी के साथ हुए एक साक्षात्कार में चीनी राजदूत सन वीडोंग ने गलवान घाटी में हुए टकराव के लिए पूरे दोष को भारत के ऊपर डाल दिया था। लेकिन आश्चर्य यह कि इस दौरान एक बार भी PTI ने चीनी राजदूत को सवालों से नहीं घेरा या उनके प्रोपेगेंडा फैलाने पर अंकुश लगाने की कोशिश की।

भारत सरकार ने PTI के संचालन के खिलाफ कठोर कदम उठाने का पूरा मन बना लिया है। वो भी PTI बोर्ड के कई लोगों द्वारा विचार साझा किए जाने के बाद सरकार ने यह सोचा है।

कल की रिपोर्ट में हमने बताया था कि प्रसार भारती ने चीनी राजदूत के साक्षात्कार को देखते हुए पीटीआई के साथ अपने संबंधों की समीक्षा करने का फैसला किया है। उस इंटरव्यू को कुछ लोगों ने चीनी कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा जारी किया गया एक प्रेस रिलीज तक बता कर समाचार एजेंसी का मखौल उड़ाया था।

ऑपइंडिया को विश्वस्त सूत्रों से पता चला है कि पीटीआई की ‘देश विरोधी’ रिपोर्टिंग प्रसार भारती को नागवार गुजरी है। ऐसे में प्रसार भारती पीटीआई के साथ अपने संबंधों को आगे नहीं बढ़ाना चाहती। इसे लेकर हमें बताया गया कि पीटीआई से संबंधों पर निर्णय के बारे में जल्द ही अवगत कराया जाएगा।

सूत्रों के अनुसार 1980 के बाद से पीटीआई को करीब 200 करोड़ रुपए पब्लिक फंड के तौर पर मिले हैं, जबकि जनता के प्रति इनकी जवाबदेही नगण्य रही है। आज की तारीख में यह फंड 400 से 800 करोड़ रुपए के निवेश के बराबर है अगर हम घटते-बढ़ते ब्याज दरों के अनुसार इसका आकलन करें तो।

सूत्रों ने हमें बताया कि प्रसार भारती के अधिकारियों का मानना ​​है कि पीटीआई निजी मीडिया संस्थानों के मुकाबले सार्वजनिक संस्थानों से कितना शुल्क लेता है, इसमें और अधिक पारदर्शिता की जरूरत है। चिंता की बात यह भी है कि पीटीआई के बोर्ड में अधिकांश निदेशक निजी मीडिया संस्थामों से हैं।

प्रसार भारती का मानना ​​है कि निजी समाचार पत्रों और समाचार चैनलों से उनकी सदस्यता के लिए जितना शुल्क लिया जाता है, उससे कहीं अधिक पीटीआई उनसे वसूलता है। ऐसे में पब्लिक ब्रॉडकास्टर का मानना है कि शुल्क को लेकर पारदर्शिता होनी ही चाहिए। अब यह पता चला है कि PTI और प्रसार भारती के बीच व्यावसायिक संबंधों की गहनता से समीक्षा की जा रही है।

पीटीआई जिस रास्ते पर चल रही थी, प्रसार भारती के अधिकारियों के लिए यह अब बर्दाश्त के बाहर हो गया। भविष्य में पीटीआई को सरकारी फंडिंग मिलेगी या नहीं, कुछ ही दिनों में इसका फैसला हो जाएगा। वैसे तो समाचार एजेंसी का सांप्रदायिक रूप से फर्जी समाचारों और राजनीतिक मामलों पर फर्जी खबरों को फैलाने का इतिहास रहा है। लेकिन चीन को अपना प्रोपेगेंडा फैलाने के लिए पीटीआई ने अपना मंच देकर हर सीमा को पार कर दिया।

समाचार एजेंसी की कमाई कैसे?

पीटीआई एक समाचार एजेंसी है और वह खबरें देकर ऐसे लोगों से धन अर्जित करती है, जिन्होंने एजेन्सी की सदस्यता ले रखी है। इस प्रकार समाचार एजेंसी रिपोर्ट इकट्ठा करके उसमें रुचि रखने वाली पार्टियों को बेचकर उससे अपनी इनकम लेती है। उदाहरण के लिए PTI की रिपोर्ट्स मुख्यधारा की मीडिया में दिखती है। ठीक उसी सरह से अन्य समाचार एजेंसियाँ जैसे एएनआई, आईएएनएस और यूएनआई के साथ-साथ वैश्विक एजेंसियाँ जैसे रॉयटर्स और एपी आदि भी हैं।

फर्जी खबरों का लंबा इतिहास

मौजूदा विवाद के अलावा पीटीआई का फर्जी खबरों को फैलाने का एक लंबा इतिहास रहा है। समाचार एजेंसी की ओर से मिली रिपोर्ट को अधिकांश मीडिया बिना किसी संपादन के प्रकाशित करते हैं। इसके कारण व्यक्तिगत मीडिया हाउसों की तुलना में समाचार एजेंसियों की ओर से आई फर्जी खबरें अधिक लोगों तक पहुँचती हैं।

पिछले वर्ष जुलाई में एक रिपोर्ट पेश करते हुए PTI ने दावा किया था कि वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने संसद में कहा है कि विमुद्रीकरण का अर्थव्यवस्था पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा है। कई मीडिया हाउसों द्वारा इस भ्रामक रिपोर्ट को चलाए जाने के बाद वित्त मंत्री को खुद स्पष्ट करना पड़ा कि उन्होंने ऐसा कोई बयान नहीं दिया है।

राजनीतिक मसलों पर भी न्यूज एजेंसी फेक न्यूज को हवा देती रही है। दिल्ली विधानसभा चुनाव से पहले पीटीआई ने दावा किया था कि AAP के केवल 25 फीसदी उम्मीदवारों पर ही गंभीर आपराधिक मामले हैं। जबकि असल में यह संख्या 51 फीसदी थी। PTI ने इसी रिपोर्ट में BJP और कॉन्ग्रेस के डेटा के साथ भी छेड़छाड़ किया था।

2017 में प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया ने दावा किया था कि यूपी सरकार ने राज्य में माध्यमिक और उच्च शिक्षा के लिए बजटीय आवंटन में भारी कटौती की थी। उसी वर्ष पीटीआई ने एक और ऐसी खबर चलाई थी, जिसमें दावा किया गया था कि पूर्व रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर ने एक टीवी समाचार एंकर के द्वारा अपमानजनक सवाल पूछे जाने के बाद पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में 2016 के सर्जिकल स्ट्राइक का प्लान किया था, जबकि यह पूरी तरह से गलत था।

पिछले साल हुए सीएए विरोधी दंगों के बाद यूपी सरकार ने सार्वजनिक और निजी संपत्तियों के नुकसान के लिए पैसे वसूलने के लिए दंगाइयों की संपत्ति को जब्त करने का निर्णय लिया था, लेकिन इस कदम को भी पीटीआई ने गलत तरीके से पेश किया और दावा किया था कि योगी आदित्यनाथ ने हिंसा में शामिल लोगों के खिलाफ ‘बदला’ लेने की कसम खाई थी।

ये समाचार एजेंसी PTI द्वारा फर्जी समाचारों के कुछ उदाहरण थे। हकीकत में PTI हमेशा से फर्जी और भ्रामक खबरें चलाता है, जिसे मीडिया संस्थान आँख मूँद कर पब्लिश करते हैं और यह बहुत बड़े पाठक वर्ग तक पहुँचता है।

भीम की भलाई से मीम सुलगे: J&K के डोमिसाइल पर इस्लामी प्रोपेगेंडा, अरबी मीडिया ने कहा- समुदाय विशेष वाले डरे हुए हैं

वैसे वे ‘जय भीम-जय मीम‘ का नारा लगाते नहीं थकते। लेकिन, इतिहास ऐसा साक्ष्यों से भरा पड़ा है जो बताते हैं कि कैसे इस नारे का इस्तेमाल दलितों को छलने, अधिकारों से वंचित रखने, प्रताड़ना देने और यहॉं तक उनके नरसंहार के लिए भी किया गया।

यह सिलसिला आज भी रुका नहीं है। आए दिन दलितों को समुदाय विशेष वालों द्वारा निशाना बनाने की खबरें आती ही रहती है। आर्टिकल 370 और 35-A के कवच तले जम्मू-कश्मीर में दलित ही नहीं, गैर इस्लामी और बाहर से आए तमाम लोगों का पीढ़ी दर पीढ़ी शोषण हुआ। उन्हें अधिकारों से वंचित रखा गया।

बीते साल केंद्र सरकार ने इसे समाप्त कर जम्मू-कश्मीर को केंद्र शासित प्रदेश बना दिया। वहॉं डोमिसाइल की नई नीति लागू की। इसके तहत वंचितों को स्थायी निवासी होने का प्रमाण-पत्र दिया जा रहा है।

लेकिन, इस्लाम के नाम पर इसके खिलाफ भी प्रोपेगेंडा शुरू हो गया है। इसमें केवल जम्मू-कश्मीर की पारिवारिक सियासी पार्टियॉं या फिर लिबरल-वामपंथी गिरोह ही शामिल नहीं है। उम्माह के नाम पर अरबी मीडिया भी घृणा फैलाने के कारोबार में लगा है।

जब जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 के प्रावधानों को निरस्त किए जाने के बाद से ही पाकिस्तानी और चीनी मीडिया में ये प्रपंच फैलाया जा रहा है कि इससे कश्मीरियों को डर के साए में धकेल दिया गया है। भले ही पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों की जनसंख्या कई गुना कम हो गई हो या चीन के शिनजियांग में 20 लाख उइगरों को बंधक बना रखा जाता हो।

अब लोगों को डोमिसाइल सर्टिफिकेट मिलने पर नागरिकता मिलने पर अरब का मीडिया भी इसमें कूद गया है।

‘अरब न्यूज़’ लिखता है कि जम्मू-कश्मीर में ‘डेमोग्राफिक इंजीनियरिंग’ का भय वास्तविकता में बदल रहा है क्योंकि सरकार ने 25,000 ‘बाहरियों’ को वहाँ बसाते हुए नागरिकता देने का फ़ैसला लिया है। जम्मू कश्मीर को देश का एकमात्र मजहब बहुल प्रदेश बताते हुए तथाकथित विशेषज्ञों के हवाले से दावा किया है कि क्षेत्र के डेमोग्राफी में बदलाव के लिए मोदी सरकार ने अप्रैल 2020 में नए नियम बनाए।

साथ ही जम्मू-कश्मीर के आईएएस अधिकारी नवीन चौधरी द्वारा वहाँ डोमिसाइल सर्टिफिकेट प्राप्त करने की भी चर्चा की है। बता दें कि पूर्वी बिहार से ताल्लुक रखने वाले चौधरी जम्मू-कश्मीर में 26 सालों तक कार्यरत रहे हैं। साथ ही एनसीपी और पीडीपी जैसी पार्टियों के हवाले से दावा किया गया है कि जम्मू-कश्मीर के संसाधनों और अधिकारों को छीनने के लिए ये बदलाव किए गए हैं, जिन्हें कश्मीरी आज तक ‘बचाते’ आए हैं।

इसके अलावा यूजुअल सस्पेक्ट ‘अल जज़ीरा’ भी पीछे नहीं रहा और उसने दावा किया कि हज़ारों लोगों को नागरिकता दिए जाने के बाद कश्मीर में रहने वाले मजहब के लोगों में डेमोग्राफी के शिफ्ट होने का डर बैठ गया है। साथ ही भारत-विरोधी रुख रखने वाले अमेरिका में राष्ट्रपति पद के डेमोक्रेट उम्मीदवार जो बिडेन का बयान प्रकाशित किया गया है, जिसमें उन्होंने भारत को कश्मीरियों के अधिकारों की रक्षा करने की सलाह दी है। बता दें कि जम्मू-कश्मीर मामले में भारत विदेशी हस्तक्षेप के विरुद्ध रहा है।

जो बिडेन ने कहा है कि असहमति के अधिकार को दबाना, इंटरनेट प्रतिबंधित करना और शांतिपूर्ण प्रदर्शनों पर लगाम कसना लोकतंत्र के विरुद्ध है। एक कश्मीरी के हवाले से ‘अल जज़ीरा’ लिखता है कि कश्मीर दूसरा फिलिस्तीन बन रहा है। साथ ही वो ‘बाहरियों’ के वहाँ बसने और नौकरियों से वंचित रखने के पक्ष में ‘डेमोग्राफिक बैलेंस’ का बेहूदा तर्क देता है। साथ ही उसने कथित एक्टिविस्ट्स से इसे विनाशकारी करार दिया है।

सबसे पहली बात तो ये है कि सरकार ने ऐसा कोई नियम नहीं बनाया है कि कोई भी व्यक्ति नागरिकता के लिए अप्लाई कर देगा और वो जम्मू-कश्मीर का नागरिक बन जाएगा। ऐसा इसीलिए, क्योंकि जिन्हें नागरिकता मिली है वो पहले से ही राज्य में रह रहे हैं। फिर डेमोग्राफिक बदलाव की बात कहाँ आई? नियमानुसार, जिन्होंने जम्मू-कश्मीर में 15 वर्ष गुजारे हैं अथवा जो 7 साल अध्ययनरत हैं, उन्हें ही नागरिकता देने का प्रावधान है।

वहाँ रजिस्टर हो चुके प्रवासी या ऐसे सरकारी अधिकारियों के बच्चों, जिन्होंने कम से कम 10 साल तक वहाँ सेवा दे चुके हैं, वो ही नागरिकता के योग्य हैं। ऐसे में सवाल ये है कि क्या जो लोग वर्षों से उस क्षेत्र की सेवा कर रहे हैं, उन्हें वहाँ की नागरिकता मिलने का अधिकार तक नहीं, वो भी अपने ही देश में? क्या अरबी मीडिया चाहती है कि सबकुछ एकतरफा रहे। ‘बैलेंसिंग’ तो इसी में है कि दोनों पक्षों को एक-दूसरे से फायदा हो।

क्या आप जानते हैं कि जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 हटने से सबसे ज्यादा फायदा किसे हुआ? दलितों को, वहाँ के वाल्मीकि समुदाय को। वही वाल्मीकि समुदाय, जो 1957 से ही वहाँ रह रहे हैं और जिसके अधिकतर लोग दशकों से बतौर सफाई कर्मचारी काम कर रहे हैं। एक दलित व्यक्ति ने बताया था कि वो वकील बनना चाहता है, लेकिन अगस्त 2019 से पहले तक ये असंभव था, क्योंकि उसे डोमिसाइल सटिफिकेट ही नहीं मिलता।

एक दलित महिला को बीएसएफ के राज्यवार भर्तियों से निकाल दिया गया था, जिसके बाद उसने सुप्रीम कोर्ट में अर्जी दी थी। उसे मज़बूरी में पढ़ाई छोड़नी पड़ी थी। हालाँकि, अनुच्छेद 370 पर सरकार के निर्णय के बाद उसने अपनी पढ़ाई फिर से चालू की। एक अन्य दलित युवक ने कहा था कि उसका परिवार पिछले तीन पीढ़ियों से जम्मू-कश्मीर में जातिगत भेदभाव का शिकार रहा है, इसका साक्षी रहा है।

क्या अरबी मीडिया चाहता है कि ये दलित ऐसे ही पीढ़ी दर पीढ़ी गुलामी करते रहें और इन्हें इनका अधिकार न मिले? ये कहाँ का न्याय है कि गरीबों को उनका अधिकार सिर्फ़ इसीलिए न दिया जाए क्योंकि किसी स्थान विशेष मे किसी समुदाय विशेष कि बहुलता को बनाकर रखना है। सवाल डेमोग्राफी का नहीं, समानता का है। क्या किसी हिन्दू बहुल राज्य में किसी अन्य मजहब के लोगों को न बसने देने के पीछे ऐसा तर्क दिया जा सकता है कि इससे हिंदुओं मे डर बन जाएगा?

ये मीडिया संस्थान कहते हैं कि फलाँ इलाके में समुदाय विशेष वाले बहुलता में भी हैं और साथ ही डरे हुए भी हैं। ये कैसा तर्क है? वाल्मीकि समाज के लोग तो 1957 में पंजाब से लाकर बसाए गए थे, लेकिन आज तक उन्हें जम्मू-कश्मीर का निवासी नहीं माना गया और उन्हें स्थायी निवास प्रमाण-पत्र, जिसे PRC कहा जाता है- नहीं दिया गया। राज्य सरकार ने वाल्मीकि समुदाय के लोगों को अपने यहाँ रोजगार देने के लिए नियमों में परिवर्तन कर यह लिख दिया कि इन्हें केवल ‘सफ़ाई कर्मचारी’ के रूप में ही अस्थायी रूप से रहने का अधिकार है और नौकरी दी जाएगी।

आज जब शेष भारत में ऐसा माहौल है कि एक जाति सूचक शब्द बोलने पर सजा हो जाती है तब जम्मू-कश्मीर राज्य वाल्मीकि समुदाय को जाति-प्रमाण पत्र तक जारी नहीं करता था, जिससे इस समुदाय के लोगों को अनुसूचित जातियों के लिए बनाए गए विशेष प्रावधानों और सरकारी योजनाओं के लाभ से वंचित रहना पड़ता था। आज उनसे माफी माँगने कि जगह अरबी मीडिया चाहता है कि उन्हें ऐसे ही बदहाल छोड़ दिया जाए?

अरबी मीडिया को अरब महाद्वीप के अल्पसंख्यकों कि चिंता करनी चाहिए क्योंकि ‘फोर्ब्स’ कि एक रिपोर्ट मे स्पष्ट कहा गया था कि सऊदी अरब व अन्य देशों में अल्पसंख्यकों को प्रताड़ित किया जाता है। यहाँ तक कि सऊदी में खुले में एक चर्च तक को ऑपरेट होने की इजाजत नहीं मिलती। ईशनिंदा में लोगों को फँसाया जाता है।

आखिर क्या कारण है कि अरब देशों में नियम-कानून इस्लाम के आधार पर तैयार किए जाते हैं या फिर इस्लामी तौर-तरीके से प्रेरित होते हैं। महिलाओं के अधिकार से लेकर अल्पसंख्यकों की प्रताड़ना और नॉन-इस्लामी नागरिकों को इस्लाम के अनुसार चलने के लिए बाध्य करना, क्या ऐसी घटनाएँ नहीं होतीं? जाहिर है इस्लाम के नाम पर प्रोपेगेंडा फैलाने वालों से जम्मू-कश्मीर के दलितों की चिंता की उम्मीद नहीं रखी जा सकती।

जिहाद और शरिया के पैरोकारों से यह भी पूछा जाना चाहिए कि जम्मू-कश्मीर की डेमोग्राफी कब बदली थी? इसमें सबसे बड़ा बदलाव तो तब आया था, जब कश्मीरी पंडितों को वहाँ से भगाया गया, उनकी महिलाओं के साथ बलात्कार किया गया, मस्जिदों से अनाउंस कर उनका नरसंहार किया और उनकी संपत्ति व मातृभूमि से उन्हें वंचित कर अपने ही देश में शरणार्थी बना दिया गया। अरबी मीडिया इस पर बात क्यों नहीं करता?

एक घटना आपको याद दिलाते हैं। मार्च 23, 2003 की रात 7 आतंकवादी पुलवामा के हिन्दू बहुल नदीमार्ग गाँव में घुसे और सभी हिन्दुओं को चिनार के पेड़ के नीचे इकठ्ठा करने लगे। रात के 10 बजकर 30 मिनट पर इन आतंकियों ने 24 हिन्दुओं की गोली मार कर हत्या कर दी। गौर करने वाली बात थी कि 23 मार्च को पाकिस्तान का राष्ट्रीय दिवस मनाया जाता है। ऐसी कई सामूहिक हत्याओं से क्या डेमोग्राफी में बदलाव नहीं आया?

असल में अब जी भी हो रहा है, वो इन्हीं घटनाओं को रोकने के लिए हो रहा है। कश्मीर के जिले अब आतंकवादियों से मुक्त होते जा रहे हैं क्योंकि सेना और सशस्त्र बलों को खुली छूट मिली है। अब पत्थर फेंकने को जो बिडेन या अरबी मीडिया ‘अहिंसक प्रदर्शन’ कहते हैं, तो ये अलग बात है। असल में जम्मू-कश्मीर में 370 को निरस्त किए जाने से लेकर दलितों को नागरिकता तक, ‘वास्तविक बैलेंसिंग’ प्रक्रिया यही तो है।

लॉकडाउन का फायदा उठा रेलवे ने पूरे किए 200 प्रोजेक्ट, सालों से अटकी पड़ी थी: अब बढ़ेगी स्पीड, सफर ज्यादा सुरक्षित

भारतीय रेलवे ने लॉकडाउन के दौरान ट्रेनों की बेहद कम आवाजाही का फायदा उठाते हुए 200 अति महत्वपूर्ण और काफी समय से लंबित प्रोजेक्ट का काम पूरा कर लिया है। इसकी जानकारी भारतीय रेलवे की तरफ से जारी एक प्रेस रिलीज में दी गई है।

लॉकडाउन के शुरुआती समय में ट्रेनों का परिचालन पूरी तरह बंद था। मौजूदा समय में भी मात्र विशेष ट्रेनें ही चल रही हैं। इसी बात का लाभ उठाते हुए रेलवे ने 200 लंबित परियोजनाओं को पूरा कर लिया है। इनमें से कई परियोजनाएँ सुरक्षा और ट्रेनों की गति बढ़ाने में महत्वपूर्ण साबित होने वाली हैं। 

ये परियोजनाएँ पुराने पुलों की मरम्मत, यार्ड रीमॉडलिंग, रेल लाइनों का दोहरीकरण, विद्युतीकरण और सीजर क्रॉसओवर के नवीकरण आदि से संबंधित थी, जो कई सालों से लंबित पड़ी थी। इनके रूके होने की वजह से ट्रेनों की गति बढ़ाने में दिक्कत आ रही थी।

पार्सल ट्रेनों और मालगाड़ियों के माध्यम से चलने वाली सभी आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति सुनिश्चित करने के अलावा, भारतीय रेलवे ने इस लॉकडाउन अवधि के दौरान कई वर्षों से लंबित इन रख-रखाव कार्यों को पूरा कर लिया।

लॉकडाउन अवधि के दौरान भारतीय रेलवे द्वारा कई वर्षों से लंबित रख-रखाव कार्यों पर ध्यान केंद्रित किया गया, जिनके लिए लंबी अवधि तक यातायात सेवा को निलंबित रखने की आवश्यकता थी। ये कार्य कई वर्षों से लंबित पड़े हुए थे और रेलवे के सामने गंभीर चुनौतियाँ उत्पन्न कर रहे थे। उन्होंने इस लॉकडाउन की अवधि को ‘जीवन में मिले हुए एक सुनहरे अवसर’ के रूप देखा और बचे हुए रख-रखाव कार्यों का निपटारा करने और रेल सेवा को प्रभावित किए बिना काम का निष्पादन करने की योजना बनाई।

अड़चनों को दूर करने और सुरक्षा को बढ़ावा देने के लिए किए गए इन कार्यों में 82 पुलों का पुनर्निर्माण/ पुनरुद्धार, लेवल क्रासिंग फाटक के स्थान पर 48 सीमित ऊँचाई वाले सब-वे/ रोड अंडर ब्रिज, 16 फुट ओवर ब्रिज का निर्माण/सुदृढ़ीकरण, 14 पुराने फुट ओवर ब्रिज को ध्वस्त करना, 7 रोड ओवर ब्रिज का शुभारंभ, 5 यार्डों की री-मॉडलिंग, 1 लाइन के दोहरीकरण एवं विद्युतीकरण की शुरुआत और 26 अन्य परियोजनाएँ शामिल हैं।

इनमें से कुछ प्रमुख परियोजनाएँ निम्न हैं;

  • जोलार्पेट्टी (चेन्नई डिवीजन, दक्षिण रेलवे) में यार्ड रूपांतरण का काम 21 मई 2020 को पूरा कर लिया गया। इसने घुमाव को कम किया और बेंगलुरु के लिए गति को 60 किमी प्रति घंटा तक बढ़ाने में मदद की और इसके साथ-साथ रिसेप्शन और डिस्पैच को सुविधाजनक बनाया।
  • इसी प्रकार लुधियाना (फिरोजपुर डिवीजन, उत्तर रेलवे) में पुराने असुरक्षित फुट ओवर ब्रिज को ध्वस्त करने का काम 5 मई 2020 को पूरा कर लिया गया। 19 पटरियों और 7 यात्री प्लेटफार्मों के ऊपर बने इस 135 मीटर लंबे और पुराने फुट ओवर ब्रिज संरचना को समाप्त किया गया। 2014 में नए फुट ओवर ब्रिज के चालू होने के बाद से ही ये काम रुका हुआ था।
  • तुंगा नदी (मैसूर डिवीजन, दक्षिण पश्चिम रेलवे) पर पुल के री-गर्डरिंग का काम 3 मई 2020 को पूरा किया गया। डोंबिवली (मुंबई डिवीजन, मध्य रेलवे) के पास कोपर रोड आरओबी के असुरक्षित डेक को विखंडित करने का काम 30 अप्रैल 2020 को पूरा किया गया और इसके परिणामस्वरूप सुरक्षा में बढ़ोतरी हुई। 2019 में इस डेक को सड़क पर चलने वाले यात्रियों के लिए असुरक्षित घोषित कर दिया गया था। इसके नीचे 6 रेलवे ट्रैक हैं।
  • पूर्वोत्तर रेलवे के वाराणसी डिवीजन में विद्युतीकरण के साथ दोहरीकरण वाली दो परियोजनाओं को 13 जून को पूरा कर लिया गया था। इनमें से एक परियोजना कछवा रोड से माधोसिंह खंड पर है और दूसरी 16 किमी लंबी मंडुआडीह से प्रयागराज खंड पर है। इसके परिणामस्वरूप पूर्व-पश्चिम मार्गों पर भीड़ कम हुई है और माल ढुलाई सुविधाजनक हुई है।
  • चेन्नई सेंट्रल स्टेशन से लगे हुए 8 रेलवे ट्रैकों को पार करने वाले आरओबी को तोड़ने का काम 9 मई 2020 को पूरा किया गया। इस आरओबी को असुरक्षित घोषित कर दिया गया था और जुलाई 2016 के बाद से भारी वाहनों के लिए बंद कर दिया गया था। आरओबी को तोड़ने का काम पूरा नहीं हो पा रहा था क्योंकि इसके लिए यातायात को ज्यादा समय के लिए बाधित करने की आवश्यकता पड़ती, जिसके परिणामस्वरूप बड़े पैमाने पर ट्रेन को कैंसिल या रीशेड्यूल करना पड़ता। इससे यात्रियों को काफी परेशानी होती।
  • दक्षिण मध्य रेलवे के विजयवाड़ा डिवीजन में दो नए पुलों के निर्माण का काम 9 मई को पूरा कर लिया गया। जिसके परिणामस्वरूप ट्रेनों की परिचालन दक्षता और सुरक्षा में बढ़ोतरी हुई।
  • आजमगढ़ स्टेशन (वाराणसी डिवीजन, पूर्वोत्तर रेलवे) के सिग्नल अपग्रेडेशन का काम 23 मई को पूरा कर लिया गया।
  • बीना में रेलवे की एक खाली जमीन पर विकसित किए गए सौर ऊर्जा के माध्यम से ट्रेनों का परिचालन करने के लिए अभिनव पायलट परियोजना का व्यापक परीक्षण किया जा रहा है। 25 किलोवाट रेलवे ओवरहेड लाइन को सीधे उर्जा प्रदान करने वाली यह 1.7 मेगावॉट परियोजना, भारतीय रेलवे और भेल का एक संयुक्त उद्यम है।

कई लंबित परियोजनाओं को पूरा करने और देश के हर हिस्से में आवश्यक वस्तुएँ सुनिश्चित कराने के अलावा, भारतीय रेलवे बड़े पैमाने पर पीपीई किट और मास्क का उत्पादन कर रहा है। भारतीय रेलवे ने कोरोना वायरस आइसोलेशन वार्ड के रूप में गैर-एसी कोच भी प्रदान किए हैं।

Zomato में चीनी निवेश से उबले कर्मचारी: कइयों ने छोड़ी नौकरी, ग्राहकों से कहा- बहिष्कार करिए

जोमैटो (Zomato) में चीनी निवेश की बात सामने आने के बाद कर्मचारी विरोध कर रहे हैं। कर्मचारियों ने शनिवार को कोलकाता में कंपनी की आधिकारिक ड्रेस जलाकर अपने गुस्से का इजहार किया।

रिपोर्टों के अनुसार विरोध-प्रदर्शन कोलकाता के बेहाला में हुआ। प्रदर्शनकारियों में से कुछ ने बताया कि उन्होंने जोमैटो की अपनी नौकरी छोड़ दी है। इनलोगों ने ग्राहकों से भी फूड डिलिवरी कंपनी के बहिष्कार की अपील की है।

भारत-चीन के हालिया तनाव के बीच गलवान घाटी में हिंसक झड़प में 20 भारतीय सैनिक बलिदान हो गए थे। चीन की सेना ने धोखे से वार किया था। इसमें उसके भी 40 से अधिक सैनिक मारे गए थे। लेकिन, इस घटना के बाद से देश में चीनी उत्पादों के बहिष्कार की मॉंग ने जोर पकड़ रखा है।

जोमैटो में चीनी निवेश के विरोध में हुए प्रदर्शन में एक दर्जन डिलीवरी कर्मियों ने हिस्सा लिया। दक्षिण कोलकाता के बेहाला पुलिस स्टेशन के बाहर कंपनी के यूनिफार्म को आग के हवाले कर दिया। उन्होंने हाथ में तिरंगा लेकर “चीनी एजेंट, जोमैटो भारत छोड़ो’ जैसे नारे लगाए।

चीन की कंपनी अलीबाबा से जुडे एंट फाइनेंशियल ने 2018 में जोमैटो में 210 मिलियन अमेरिकी डॉलर का निवेश कर उसकी 14.7 प्रतिशत हिस्सेदारी (शेयर) हासिल कर ली थी। जोमैटो ने हाल ही में एंट फाइनेंशियल से 150 मिलियन डॉलर की राशि फिर से जुटाई थी।

प्रदर्शनकारियों ने कहा, “चीनी कंपनियाँ यहाँ मुनाफा कमाती हैं और उनका देश हमारी सेना पर हमला करता है। वे हमारी जमीन पर कब्जा करना चाहते हैं। ऐसा नहीं होने दे सकते।” एक प्रदर्शनकारी ने कहा, “हम भूखे मरने को तैयार हैं, पर हम किसी भी ऐसी कंपनी में काम नहीं करेंगे, जिसमें चीन ने निवेश किया हो।”

विरोध-प्रदर्शन में शामिल दीपांकर कांजीलाल ने कहा, “जोमैटो अपने व्यवसाय को चलाने के लिए चीनी कंपनी अलीबाबा के साथ मिल गई है। आज हमने जोमैटो को छोड़ दिया है और हमें उम्मीद है कि कस्टमर भी इस कंपनी का बहिष्कार करेंगे।”

जोमैटो के एक अन्य डिलिवरी एजेंट ने कहा, “चीनी हमारे पैसे का इस्तेमाल करके हमारे ही सैनिकों पर हमला कर रही हैं! अगर हमारे सैनिक सुरक्षित नहीं हैं, तो हम कैसे सुरक्षित रह सकते हैं? इसलिए हम जोमैटो का बहिष्कार करेंगे। हम में से 50-60 लोगों ने आज जोमैटो ऐप को अनइंस्टॉल कर दिया है।”

कोविड-19 महामारी के कारण हुए लॉकडाउन के चलते जोमैटो ने मई में कम से कम 520 कर्मचारियों को नौकरी से निकाल दिया था, क्योंकि महामारी के कारण उनके बिज़नेस को भारी घाटा पहुँचा था।

उल्लेखनीय हैं कि लद्दाख की गलवान घाटी में 15 जून को भारत और चीनी सैनिकों के बीच हाथापाई और संघर्ष हुआ, जिसमें भारत के 20 जवान वीरगति को प्राप्त हुए जबकि चीन के 43 से अधिक जवानों के हताहत होने की सूचना सामने आई थी। चीन ने अभी तक अपने सैनिकों की मौत का आँकड़ा नहीं बताया है। और सीमा पर संघर्ष के लिए भारत को ही दोषी ठहरा रहा है। लद्दाख में हुई हिंसक झड़प के बाद से दोनों देशों के बीच हालात तनावपूर्ण बने हुए हैं।

बता दें चीनी सेना ने पहले से ही अपने पास लाठी-डंडे, रॉड, हॉकी स्टिक, बेसबॉल क्लब, ड्रैगन पंच, पाइप, पत्थर, कीलें, बूट की नोक जमा कर रखा था। इनका ही इस्तेमाल उन्होंने हिंसा के दौरान किया था।

जयपुर में बाबा रामदेव सहित 5 के खिलाफ FIR दर्ज, कोरोनिल के भ्रामक प्रचार का लगाया आरोप

राजस्थान में शनिवार (27 जून, 2020) को योग गुरु बाबा रामदेव सहित पाँच के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई गई है। एफआईआर में पाँचों लोगों पर कोरोनिल का भ्रामक प्रचार करने का आरोप लगाया गया है।

जयपुर के पुलिस थाने में शनिवार को शिकायतकर्ता बलराम जाखड़ (एडवोकेट) की ओर से दर्ज कराई गई एफआईआर में योग गुरू बाबा रामदेव, आचार्य बालकृष्ण, वैज्ञानिक अनुराग वाष्णेय, निम्स के अध्यक्ष डॉ. बलवीर सिंह तोमर और निदेशक डॉ अनुराग तोमर को आरोपी बनाया गया है।

अतिरिक्त पुलिस आयुक्त जयपुर अशोक गुप्ता के मुताबिक राजस्थान उच्च न्यायालय के एक वकील द्वारा ज्योति नगर पुलिस थाने में शिकायत दर्ज कराई गई है। शिकायत के आधार पर पुलिस ने एफआईआर दर्ज कर ली है।

जानकारी के मुताबिक पाँचों के खिलाफ में भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 420 (धोखाधड़ी), और ड्रग्स एंड मैजिक रेमेडीज (आपत्तिजनक विज्ञापन) अधिनियम के तहत मामला दर्ज किया गया है।

इस बीच शिकायत दायर करने वाले अधिवक्ता बलराम जाखड़ ने कहा कि रामदेव और उनके सहयोगियों द्वारा “आपराधिक इरादे को खारिज करने” का दावा किया गया।

शिकायतकर्ता बलराम जाखड़ ने कहा कि 23 जून को रामदेव ने पतंजलि अनुसंधान संस्थान हरिद्वार में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस को आयोजित किया था। सम्मेलन के दौरान कई लोग मंच पर थे, और उन्होंने दावा किया कि उन्होंने कोरोनिल के लिए एक इलाज कोरोनिल विकसित किया है और यह COVID-19 संक्रमित रोगियों को तीन दिन के अंदर ठीक कर देगा।

इसके बाद आयुष मंत्रालय और केंद्र ने इन दावों का खंडन कर दिया और इन दावों से संबंधित सभी दस्तावेजों की जानकारी माँगी, लेकिन अभी तक यह सत्यापित नहीं किया गया कि यह दवा डब्ल्यूएचओ और आयुष मंत्रालय के मापदंडों को पूरा करती है।

वकील बलराम जाखड़ के अनुसार रामदेव का यह प्रयास आपराधिक इरादे की पुष्टि करता है और इसीलिए उन्होंने कानून की विभिन्न धाराओं के तहत ज्योतिनगर पुलिस स्टेशन में एक एफआईआर दर्ज कराई है।

इससे पहले केंद्रीय आयुष राज्य मंत्री श्रीपद नाइक ने कहा था कि पतंजलि आयुर्वेद को अंतिम अनुमोदन मिलने से पहले कोविड​​-19 के लिए आयुर्वेदिक दवा का विज्ञापन नहीं करना चाहिए था।

तब आचार्य बालकृष्ण ने कहा था कि कोरोनिल के निर्माण के लिए सभी प्रक्रियाओं का पालन किया गया है और कहा था कि उन्होंने लाइसेंस प्राप्त करते समय कुछ भी गलत नहीं किया है।

पतंजली कंपनी के अनुसार, कोरोना किट, जो 30 दिनों के लिए है, केवल ₹545 में उपलब्ध कराया जाएगा। बाबा रामदेव ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा था कि इस दवा ने 3-7 दिनों के भीतर ‘100 फीसदी रिकवरी रेट’ दिखाया है।