दिल्ली हाई कोर्ट ने जामिया कोआर्डिनेशन कमेटी की सदस्य सफूरा जरगर को जमानत दे दी है। बता दें कि दिल्ली दंगा भड़काने में सफूरा जरगर मुख्य साजिशकर्ताओं में से एक है। जफूरा के कई वीडियो उपलब्ध हैं, जिसमें वो कश्मीर को आजादी, केरल को आजादी, बिहार को आजादी और इंकलाब की बातें करती है।
इसके अलावा जफूरा के खिलाफ सबूत हैं कि ये जाफराबाद से महिलाओं की टोली को शाहीनबाग लाती थी और दंगे से पहले जाफराबाद में जो जाम लगा था, वहाँ भी ये सक्रिय रूप से उपस्थित थी और लोगों को उकसा रही थी।
ऐसे लोग जब हार जाएँगे तो सबूत के साथ छेड़छाड़ करने की संभावना बढ़ जाती है। इसके बावजूद इसे बेल दी गई। आज दिल्ली पुलिस की तरफ से सरकार का पक्ष रख रहे सॉलीसिटर जनरल तुषार मेहता ने स्वयं कहा कि उन्हें इसमें कोई आपत्ति नहीं है, इसे बेल दे दिया जाए।
सफूरा जरगर की जमानत पर अजीत भारती का नजरिया
ये वही सफूरा है, जिसने कहा था कि पीएम मोदी और गृहमंत्री अमित शाह ‘आतंकी’ हैं और अगर इसके लिए अगर हमें जेल में भी डालें तो मैं तैयार हूँ। सफूरा आजादी और इंकलाब की बातें करती है, जो कि वामपंथियों का पसंदीदा टॉपिक है। अगर आपको कोई भी वामपंथी आजादी का नारा लगाता दिखे तो इसका मतलब 15 अगस्त वाले स्वतंत्रता से नहीं है, इसका एक ही मतलब है- हिंदुओं से आजादी। ये नारा कश्मीर से चलता आ रहा है। जहाँ पर कट्टरपंथियों ने हिंदुओं का नरसंहार किया।
मुख्य तौर पर ये चाहते हैं कि हिंदुओं को देश से ही निकाल दिया जाए और इनको अपना देश बनाने की आजादी दी जाए, इन्हें अलग वोटिंग का अधिकार मिले। ये देश के टुकड़े-टुकड़े करना चाहते हैं। ये सफूरा उसी टुकड़े-टुकड़े गैंग की सदस्य या शायद सरगना है। आपने शाहीन बाग का छलावा देखा है, जहाँ पर हिंदुत्व की कब्र खोदने की बात होती है, बुर्का में माँ काली को दिखाया जाता है, फक हिंदुत्व के पोस्टर लगाए जाते हैं, स्वास्तिक को छिन्न-भिन्न करते दिखाया जाता है।
सफूरा को बेल क्यों दिया गया, इस बारे में जब हमने गृह मंत्रालय के सूत्रों से बात करने की कोशिश की तो उन्होंने हमें कई बातें बताई। उन्होंने बताया कि सॉलिसीटर जनरल तुषार मेहता ने खुद लिखकर दे दिया कि ‘मानवीयता के आधार पर’ इसे बेल दे दिया जाए। और वो मानवीय आधार है उसका प्रेगनेंट होना।
तुषार मेहता ने जफूरा की जमानत के लिए पहली शर्त यही रखी कि आगे किसी को इस आधार पर बेल ना दिया जाए, जिसे कोर्ट ने मान लिया। वामपंथियों की हमेशा से चाल रही है कि वो नैरेटिव जीतने के लिए ही सही, स्वयं को भी नुकसान पहुँचाने की प्रवृत्ति वाले हैं।
इसी कारण इस प्रकरण को ऐसे भी देखा जाना चाहिए कि सरकार ने ऐसी किसी भी आशंका से बचने के लिए बेल के लिए स्वीकृति दी। ये लोग ऐसा करते रहे हैं, लोगों को गायब करना, मोलेस्टर और बलात्कारियों को बचाना, स्वयं का ही सर फोड़ कर सरकार पर आरोप मढ़ना इनकी दिनचर्या है।
अतः, गृह मंत्रालय के सूत्रों द्वारा दिए गए इस दृष्टिकोण को जब हम इनके पुराने कुकर्मों को देखते हैं तो यह स्पष्ट हो जाता है कि सरकार ने एक योजनाबद्ध तरीके से वामपंथियों का मुँह बंद करने के लिए एक तीर से दो शिकार किया है।
अगर दिल्ली पुलिस चाहती तो उसे बेल नहीं मिलती लेकिन सरकार ने कुछ सोचकर ही ये निर्णय लिया है। वामपंथियों और उनके गिरोह को ये बात नहीं भूलना चाहिए कि जिस कानून-व्यवस्था में उन्हें यकीन नहीं है, आज उसी ने उन्हें मानवीय आधार पर जमानत दी। ये चीज वामपंथियों को याद रखना चाहिए।
आयुष मंत्रालय द्वारा पतंजलि आयुर्वेद द्वारा कोरोना वायरस के संक्रमण का इलाज करने का दावा करने वाली आयुर्वेदिक दवा कोरोनिल के प्रचार पर फिलहाल रोक लगाने की खबर के बाद बाबा रामदेव ने कहा है कि उनका ‘व्यापार’ नहीं ‘उपचार’ करने का मंत्र है और परमिशन न भी मिले तो गरीब-अमीर को फ्री में दवा देंगे। आयुष मंत्रालय ने कंपनी को दवा की संरचना और कंपनी द्वारा लॉन्च से पहले किए गए शोध के विवरण प्रस्तुत करने के लिए कहा है।
हमारा ‘व्यापार’ नहीं ‘उपचार’ करने का मंत्र है, परमिशन न भी मिले तो गरीब-अमीर को फ्री में दवा देंगे।: योग गुरु बाबा रामदेव
बाबा रामदेव ने यहाँ बयान आयुष मंत्रालय की प्रेस रिलीज के तुरंत बाद रिपब्लिक भारत न्यूज़ चैनल पर दिया है। उन्होंने कहा कि हमारी आयुर्वेदिक दवा कोरोनिल का 100% रिकवरी रेट है और डेथ रेट जीरो है।
ज्ञात हो कि आयुष मंत्रालय ने पतंजली कंपनी से इस दवा की संरचना का विवरण और इसे तैयार करने से पहले किए गए शोध को प्रस्तुत करने के लिए कहा है। इसके साथ ही आयुष मंत्रालय ने मीडिया की खबरों पर संज्ञान लेते हुए फिलहाल पंतजलि आयुर्वेद लिमिटेड को इस दवा यानी, ‘कोरोनिल’ का विज्ञापन और ऐसे दावे को प्रकाशित करने से रोक दिया है।
आयुष मंत्रालय ने पतंजलि की दवा पर स्टेटमेंट जारी करते हुए कहा है कि मंत्रालय को इस बारे में कोई जानकारी नहीं है। मंत्रालय ने पतंजली कम्पनी से कहा है कि पहले वो अपने कागज मंत्रालय में जमा करवाएँ और तब तक किसी भी तरह का विज्ञापन या दावा करने से बचें, जब तक इस पर जाँच पूरी नहीं होती।
आयुष मंत्रालय ने राज्य सरकार, उत्तराखंड से भी इस दवाई कोरोनिल को लेकर जरूरी जानकारी माँगी है। मंत्रालय ने राज्य लाइसेंसिंग ऑथोरिटी को लाइसेंस कॉपी और प्रोडक्ट को मंजूर किए जाने से जुड़े सभी डॉक्यूमेंट माँगे हैं।
आयुष मंत्रालय ने 21 अप्रैल को जारी गैजेट नोटिफिकेशन का हवाला देते हुए कहा कि आयुर्वेदिक दवाओं की रिसर्च को लेकर बाकायदा नियम कानून जारी किए गए थे उसी के तहत कोरोना वायरस पर रिसर्च की जा सकती है।
आयुष मंत्रालय ने एक प्रेस विज्ञप्ति में कहा- “पतंजलि आयुर्वेद लिमिटेड को COVID उपचार का दावा करने वाली दवाओं के नाम और संरचना के शुरुआती विवरणों को प्रदान करने के लिए कहा गया है; जगह / अस्पताल, जहाँ COVID-19 के लिए शोध अध्ययन आयोजित किया गया था; प्रोटोकॉल, सैंपल साइज, इंस्टीट्यूशनल एथिक्स कमेटी क्लीयरेंस, सीटीआरआई (CTRI) रजिस्ट्रेशन, स्टडी और रिजल्ट, और तब तक इस तरह के दावों का विज्ञापन / प्रचार करना बंद कर दें, जब तक कि इस मुद्दे की विधिवत जाँच नहीं हो जाती।”
पतंजली ने आर्युर्वेदिक दावा द्वारा कोरोना के उपचार का दावा किया है
कोरोनिल बनाने वाली आयुर्वेदिक कंपनी पतंजली का दावा है कि यह नोवेल कोरोना वायरस या SARS-CoV-2 वायरस के कारण होने वाली साँस की बीमारी यानी, COVID -19 के इलाज का पहला आयुर्वेदिक इलाज है।
पतंजलि योगपीठ बाबा रामदेव और आचार्य बालकृष्ण ने प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान कोरोना वायरस से जंग को ‘दिव्य कोरोनिल टैबलेट’ समेत तीन दवाइयाँ लॉन्च की हैं। इस ‘कोरोना किट’ में कोरोनिल के अलावा श्वासारी वटी और अणु तेल भी हैं। रामदेव का कहना है कि तीनों को साथ इस्तेमाल करने से कोरोना का संक्रमण खत्म हो सकता है और महामारी से बचाव भी संभव है।
पतंजली कंपनी के अनुसार, कोरोना किट, जो 30 दिनों के लिए है, केवल ₹545 में उपलब्ध कराया जाएगा। रामदेव ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि इस दवा ने 3-7 दिनों के भीतर ‘100 फीसदी रिकवरी रेट’ दिखाया है।
बिहार की राजनीति में एक पार्टी एक नई धुरी बन कर भरने की कोशिश में है और उसका नाम है Plurals, जिसकी संस्थापक पुष्पम प्रिया चौधरी हैं। वो जदयू के विधान पार्षद रहे विनोद चौधरी की बेटी हैं। उनके दादा उमाशंकर चौधरी समता पार्टी के दिनों में नीतीश ने क़रीबी रहे हैं। बिहार में उनके प्रचार अभियान के बाद उनका नाम नया नहीं है, ख़ासकर युवाओं को उनके बारे में सब कुछ पता है। Plurals ने लाखों जॉब्स क्रिएट करने का वादा किया है। Plurals के ही एक नेता हैं अनुपम सुमन।
लेकिन, अब पार्टी के बारे में कुछ ऐसा सामने आया है जो इसके द्वारा प्रचारित की जा रही नीतियों और सिद्धांतों के एकदम विपरीत है। ये इस पार्टी के दोहरे रवैये की ओर इशारा करता है। Plurals से सम्बद्ध ‘Young Bihar Movement’ (YBM) ने कई लोगों को नौकरी पर हायर किया और बाद में अचानक से निकाल दिया। यहाँ तक कि उन्होंने नोटिस तक नहीं दिया और सैलरी भी लगभग एक महीने की देरी से दी, वो भी बार-बार तगादा करने के बाद।
YBM और Plurals का रिश्ता: क़रीबी हैं अनुपम सुमन और पुष्पम प्रिया चौधरी
YBM के प्रेसिडेंट हैं अनुपम सुमन, जैसा कि उसकी वेबसाइट पर भी दिखाया गया है। राजधानी पटना के पूर्व नगर निगम आयुक्त अनुपम सुमन Plurals के जनरल सेक्रेटरी हैं। इसीलिए, इस बात से अचम्भा नहीं होना चाहिए कि YBM के कर्मचारियों ने उनसे Plurals के लिए काम कराए जाने की बात कही है। हालाँकि, जॉइनिंग से पहले उनसे ये बात छिपाई गई थी कि YBM का Plurals से कोई रिश्ता है।
पुष्पम प्रिया चौधरी ने कभी सार्वजनिक रूप से आईआरएस अधिकारी रहे अनुपम सुमन से समर्थन माँगा था। वो अनुपम सुमन के साथ पहले भी काम कर चुकी हैं। पुष्पम ने कहा था कि वो अनुपम से निवेदन करती हैं कि हम सब साथ आकर बिहार को बदलें। जब अनुपम बिहार टूरिज्म डेवलपमेंट काॅरपोरेशन में थे, तब पुष्पम प्रिया चौधरी भी उनके ही साथ थी। बाद में उन्होंने Plurals जॉइन की और राजनीति में आ गए।
यहाँ हमने अनुपम सुमन और Plurals के रिश्ते की बात इसीलिए की है क्योंकि हम जो बताने जा रहे हैं, उसके लिए ये आवश्यक है। पुष्पम प्रिया चौधरी ने दो पन्नों का पत्र लिख कर अनुपम सुमन की तारीफ की थी और साथ ही उन्हें ‘इंटेलिजेंस और अंडरस्टैंडिंग’ वाला व्यक्ति बताया था। उन्होंने कई बार लिखा था कि अनुपम सुमन को उनके साथ आना ही होगा और अंततः हुआ भी यही। अब आते हैं वापस YBM पर।
YBM की वेबसाइट पर अनुपम सुमन की बायोग्राफी दी गई है
पटना में 2019 के मानसून में आए बाढ़ को याद कीजिए, जब जलजमाव से पूरा शहर परेशान था। तब बिहार के नगर विकास मंत्री ने अक्टूबर में पटना के म्युनिसिपल कमिश्नर रहे अनुपम सुमन पर आरोप लगाया था कि उनकी वजह से नालियों और ड्रेनेज की साफ़-सफाई का काम अटका रहा। उनका कहना था कि अनुपम सुमन उनकी बात नहीं सुनते थे और सीधा CMO से बातचीत करते थे। बकौल मंत्री, सुमन ने पूरे 1 साल के कार्यकाल में जरा सा भी काम नहीं किया।
2 महीने काम करवाया, अचानक नौकरी से निकाला: क्या कहते हैं YBM के पूर्व-कर्मचारी
ऑपइंडिया ने ‘यंग बिहार मूवमेंट (YBM)’ के तीन कर्मचारियों से बातचीत की, जिन्होंने इस बात की पुष्टि की कि उनसे दो महीने काम करवाया गया और फिर अचानक से टर्मिनेशन लेटर देकर नौकरी से निकाल दिया गया। यहाँ तक कि नियमानुसार उन्हें नोटिस भी नहीं दिया गया और 2 महीने लगभग पूरे होने के बाद सैलरी दी गई। अचानक नौकरी से निकाले जाने से इन कर्मचारियों का करियर संकट में आ गया है।
हमारी बात YBM में कार्यरत रहे राजीव (बदला हुआ नाम) से हुई। राजीव को भी अप्रैल 2020 में ज्वाइन कराया गया था। YBM की तरफ से उनका इंटरव्यू लिया गया और उसके बाद उन्हें जॉइन करने कहा गया। उनके साथ ही 4-5 लोगों को हायर किया गया था। राजीव बताते हैं कि उन्हें पोलिटिकल रिफॉर्म्स पर रिसर्च का काम दिया गया था। उन्होंने 15 अप्रैल से YBM में काम करना शुरू किया था।
Plurals के जेनरल सेक्रेटरी हैं YBM के प्रेसिडेंट अनुपम सुमन
उन्होंने बताया कि पहले उन्हें नहीं बताया गया था कि उन्हें Plurals के लिए काम करने को कहा जाएगा। वो बताते हैं कि कम्पनी ने उन्हें ज्वाइन करने के कुछ दिनों बाद बताया कि वो Plurals के लिए काम करते हैं। उनसे बार-बार कहा जाता था कि वो ऐसे काम करें कि Plurals जब सत्ता में आ जाए तो ये चीजें काम आ जाएँ। उन्होंने बताया कि उनलोगों को काम करते हुए 50 दिन हो गए थे लेकिन उन्हें एक रुपए भी सैलरी नहीं दी गई।
राजीव ने बताया कि जब सैलरी के लिए तगादा किया जाता था तो वो कभी ‘टेक्निकल ग्लिच’ की बातें करते थे तो कभी लॉकडाउन की वजह से बैंक ट्रांज़ैक्शन में समस्या होने की बात कहते थे। बार-बार ये कहा जाता था कि 2 दिन में सैलरी आ जाएगी या फिर कभी अगले हफ्ते सैलरी आने की बात कही जाती थी। राजीव बताते हैं कि अंत में जून के पहले हफ्ते में उनलोगों को 2 महीने की सैलरी देकर निकाल दिया गया।
ऑपइंडिया को पता चला है कि कुल 4 लोगों को इसी तरह से निकाल बाहर किया गया। इनमें से 3 से हमने बातचीत की, जिन्होंने इस सूचना की पुष्टि की है। राजीव ने कहा कि भिखारी की तरह बार-बार अपने हक़ के रुपए माँगने के बावजूद उन्हें सैलरी नहीं दी जाती थी और उलटा सुनने को मिल जाता था। उन्होंने कहा कि जो पार्टी लाखों जॉब्स क्रिएट करती है, उसके द्वारा इस तरह का व्यवहार किया जाता आश्चर्यजनक है।
इसके बाद हमारी बात पूजा (बदला हुआ नाम) से हुई, जिन्होंने राजीव की बातों से अपना समर्थन जताया। पूजा ने बताया कि सबके घर में रुपए की ज़रूरत थी, किसी का लोन था तो किसी को अपने बीमार माता-पिता की देखभाल करनी थी लेकिन बावजूद इसके सैलरी जॉइन करने के 2 महीने बाद दी गई और ऊपर से बिना किसी नोटिस पीरियड के निकाल बाहर किया गया। पूजा ने बताया कि उन्होंने सैलरी के लिए जब कम्पनी के व्हाट्सप्प ग्रुप में लिखा तो उलटा उन्हें ही फटकार लगाया गया।
उन्हें इकनोमिक रिफॉर्म्स पर काम दिया गया था। उन्हें रिपोर्ट्स बना कर शेयर करने को कहा जाता था। बाद में उन्होंने जब संस्थान को सैलरी के लिए लिखते हुए ‘Accountability’ और ‘Communication’ जैसे शब्दों का प्रयोग किया था, जिस पर सीनियर्स ने आपत्ति जताई। कम्पनी के व्हाट्सप्प ग्रुप में सभी कर्मचारियों ने जब सैलरी के लिए लिखा, तब जाकर उन्हें सैलरी तो मिली लेकिन नौकरी से निकाल दिया गया।
कर्मचारियों को भेजे गए ‘टर्मिनेशन लेटर’ में YBM ने लिखा कि उनका प्रमुख उद्देश्य ज़मीनी स्तर पर काम करना था और कोरोना वायरस आपदा की वजह से कम्पनी अपने प्रोजेक्ट को जारी रखने में अक्षम है, इसीलिए कोई सकारात्मक विकल्प सामने न आने के कारण प्रोजेक्ट को बंद किया जा रहा है। YBM ने लिखा कि काफी विचार-विमर्श करने के बाद वो बड़े दुःख से कर्मचारियों को ये सूचना देता है कि वो उनकी सेवाएँ समाप्त करता है और भविष्य में प्रोजेक्ट फिर से शुरू होने पर उन्हें काम देने में उसे ख़ुशी होगी।
इसके बाद हमारी बात माधव (बदला हुआ नाम) से हुई, जिन्होंने कहा कि उनके साथ भी YBM ने इसी तरह का व्यवहार किया। उन्होंने तो यहाँ तक कहा कि उनलोगों से Plurals का सदस्यता फॉर्म भी भरवाने की कोशिश की गई थी लेकिन उन्होंने किसी तरह इससे इनकार कर दिया। साथ ही उनसे ये भी कहा जाता था कि वो Plurals के लिए चुनाव प्रचार हेतु वालंटियर्स जुटाएँ। एक कर्मचारी को 100 वालंटियर्स लाने कहा गया था।
ऑपइंडिया ने YBM की एचआर समीक्षा से संपर्क किया, जिन्होंने पहले तो कहा कि वो इस विषय पर बाद में बात करेंगी। बाद में कॉल करने पर उन्होंने पूछा कि आरोप किसने लगाया है। इसके बाद वो पूछने लगीं कि उनका नंबर हमारे पास कहाँ से आया। उन्होंने द्वारा सवालों का जवाब दिए बिना और अपना पक्ष रखे बिना ही कॉल कट कर दिया गया। बाद में कॉल करने पर पता चला कि उन्होंने हमारे नंबर को ब्लॉक कर दिया है।
बाबा रामदेव की पतंजलि आयुर्वेद द्वारा कोरोना वायरस के संक्रमण का इलाज करने का दावा करने वाली आयुर्वेदिक दवा कोरोनिल को लॉन्च करने के बाद, आयुष मंत्रालय ने कंपनी से इस दवा की संरचना का विवरण और इसे तैयार करने से पहले किए गए शोध को प्रस्तुत करने के लिए कहा है। इसके साथ ही आयुष मंत्रालय ने मीडिया की खबरों पर संज्ञान लेते हुए फिलहाल पंतजलि आयुर्वेद लिमिटेड को इस दवा यानी, ‘कोरोनिल’ का विज्ञापन और ऐसे दावे को प्रकाशित करने से रोक दिया है।
Ministry has taken cognizance of news in media about Ayurvedic medicines developed for #COVID19 treatment by Patanjali Ayurved Ltd. The company asked to provide details of medicines & to stop advertising/publicising such claims till the issue is duly examined: Ministry of AYUSH pic.twitter.com/OBpQlWAspu
आयुष मंत्रालय ने पतंजलि की दवा पर स्टेटमेंट जारी करते हुए कहा है कि मंत्रालय को इस बारे में कोई जानकारी नहीं है। मंत्रालय ने पतंजली कम्पनी से कहा है कि पहले वो अपने कागज मंत्रालय में जमा करवाएँ और तब तक किसी भी तरह का विज्ञापन या दावा करने से बचें, जब तक इस पर जाँच पूरी नहीं होती।
आयुष मंत्रालय ने राज्य सरकार, उत्तराखंड से भी इस दवाई कोरोनिल को लेकर जरूरी जानकारी माँगी है। मंत्रालय ने राज्य लाइसेंसिंग ऑथोरिटी को लाइसेंस कॉपी और प्रोडक्ट को मंजूर किए जाने से जुड़े सभी डॉक्यूमेंट माँगे हैं।
आयुष मंत्रालय ने 21 अप्रैल को जारी गैजेट नोटिफिकेशन का हवाला देते हुए कहा कि आयुर्वेदिक दवाओं की रिसर्च को लेकर बाकायदा नियम कानून जारी किए गए थे उसी के तहत कोरोना वायरस पर रिसर्च की जा सकती है।
आयुष मंत्रालय ने एक प्रेस विज्ञप्ति में कहा- “पतंजलि आयुर्वेद लिमिटेड को COVID उपचार का दावा करने वाली दवाओं के नाम और संरचना के शुरुआती विवरणों को प्रदान करने के लिए कहा गया है; जगह / अस्पताल, जहाँ COVID-19 के लिए शोध अध्ययन आयोजित किया गया था; प्रोटोकॉल, सैंपल साइज, इंस्टीट्यूशनल एथिक्स कमेटी क्लीयरेंस, सीटीआरआई (CTRI) रजिस्ट्रेशन, स्टडी और रिजल्ट, और तब तक इस तरह के दावों का विज्ञापन / प्रचार करना बंद कर दें, जब तक कि इस मुद्दे की विधिवत जाँच नहीं हो जाती।”
गौरतलब है कि आज ही हरिद्वार में योग गुरु स्वामी रामदेव ने कोरोना वायरस की दवा ‘कोरोनिल’ को लॉन्च करते हुए दावा किया था कि आयुर्वेद पद्धति से जड़ी-बूटियों के गहन अध्ययन और अनुसंधान के बाद बनी यह दवा कोरोना वायरस के इलाज में सक्षम है।
पतंजली का दावा- 3 से 7 दिनों के भीतर ‘100% रिकवरी रेट’
कोरोनिल बनाने वाली आयुर्वेदिक कंपनी पतंजली का दावा है कि यह नोवेल कोरोना वायरस या SARS-CoV-2 वायरस के कारण होने वाली साँस की बीमारी यानी, COVID -19 के इलाज का पहला आयुर्वेदिक इलाज है।
पतंजलि योगपीठ बाबा रामदेव और आचार्य बालकृष्ण ने प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान कोरोना वायरस से जंग को ‘दिव्य कोरोनिल टैबलेट’ समेत तीन दवाइयाँ लॉन्च की हैं। इस ‘कोरोना किट’ में कोरोनिल के अलावा श्वासारी वटी और अणु तेल भी हैं। रामदेव का कहना है कि तीनों को साथ इस्तेमाल करने से कोरोना का संक्रमण खत्म हो सकता है और महामारी से बचाव भी संभव है।
पतंजली कंपनी के अनुसार, कोरोना किट, जो 30 दिनों के लिए है, केवल ₹545 में उपलब्ध कराया जाएगा। रामदेव ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि इस दवा ने 3-7 दिनों के भीतर ‘100 फीसदी रिकवरी रेट’ दिखाया है।
बाबा रामदेव ने कहा कि पूरा देश और दुनिया जिस क्षण की प्रतीक्षा कर रहा था वह आज आ गया है, कोरोना की पहली आयुर्वेदिक दवा तैयार हो गई है। बाबा रामदेव ने कहा कि मेडिसिन के ट्रायल के दौरान तीन दिन के अंदर 69% संक्रमित इससे ठीक हो गए। इसके अलावा, मेडिसन के ट्रायल के दौरान सात दिन में 100% कोरोना मरीज नेगेटिव हो गए।
भारत ने पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान को मंगलवार (जून 23, 2020) को करारा झटका दिया है। आतंकी और जासूसी गतिविधियों को लेकर भारत अब नई दिल्ली स्थित पाकिस्तान उच्चायोग के कर्मचारियों की संख्या घटाकर आधी कर देगा। यह जानकारी विदेश मंत्रालय ने दी है।
विदेश मंत्रालय के अनुसार भारत सरकार ने फैसला किया है कि दिल्ली स्थित पाकिस्तानी उच्चायोग में 50 फीसदी कर्मचारी कम किए जाएँगे। इसी तरह इस्लामाबाद स्थित भारतीय उच्चायोग में भी 50 फीसदी कर्मचारी कम करने का फैसला लिया गया है।
Govt of India has taken the decision to reduce staff strength in the Pakistan High Commission in New Delhi by 50%. It would reciprocally reduce its own presence in Islamabad to the same proportion: Ministry of External Affairs (MEA) pic.twitter.com/DymjMrT8MW
दिल्ली स्थिति पाकिस्तानी उच्चायोग के प्रभारी अधिकारी को विदेश मंत्रालय ने फिर से तलब किया। इस दौरान उच्चायोग के अधिकारियों के जासूसी करने और आंतकी संगठने के संपर्क में रहने का मुद्दा उठाया गया। जिसमें हाल में दो अधिकारियों के रंगे हाथ पकड़े जाने का भी उदाहरण दिया गया, जिन्हें देश से बाहर कर दिया गया था।
Pakistan’s Charge d’ Affaires was summoned today&informed that India repeatedly expressed concern about activities of officials of his High Commission. They’ve been engaged in espionage&dealings with terror orgs.2 officials caught red-handed&expelled on 31 May was an example: MEA pic.twitter.com/Ye7gQnuNrg
विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अनुराग श्रीवास्तव ने कहा कि पाकिस्तान का व्यवहार वियना कन्वेंशन के अनुरूप नहीं है। द्विपक्षीय समझौतों के तहत उनके राजनयिक, कांसुलर अधिकारियों का व्यवहार उचित नहीं है। पाकिस्तान ने समानांतर रूप से इस्लामाबाद में भारतीय उच्चायोग के अधिकारियों को उनके वैध राजनयिक कार्यों को करने से रोकने के लिए लगातार प्रयास करता रहा है।
हाल ही में पाकिस्तान में उच्चायोग में काम करने वाले दो भारतीय अधिकारियों का बंदूक की नोक पर अपहरण किया गया और उनके साथ बेहद ही बुरा व्यवहार किया गया जिसे लेकर भारत ने पाकिस्तान को फटकार भी लगाई थी।
यही नहीं पाकिस्तान की ओर से झूठे दावे किए गए कि इन अधिकारियों की गाड़ी से एक शख्स गंभीर रूप से घायल हो गया था और अधिकारी उसे छोड़कर फरार हो गए थे, जिसके बाद उन्हें गिरफ्तार किया गया। हालाँकि, भारत के पाकिस्तान पर दबाव बनाने के बाद इन अधिकारियों को उनके वाहन सहित इस्लामाबाद स्थित भारतीय उच्चायोग में पहुँचाया गया।
भारतीय अधिकारी ने पाकिस्तानी एजेंसियों की बर्बरता का जिक्र करते हुए कहा कि पड़ोसी मुल्क के इस तरह के बर्ताव से साफ होता है कि वह भारतीय अधिकारियों के साथ किस तरह का सलूक करता रहा है। भारत लौटे इन अधिकारियों ने पाकिस्तानी एजेंसियों के हाथों हुए बर्बर व्यवहार का पूरा विवरण भारत सरकार को दिया है। जिसके बाद भारत ने यह फैसला किया है।
चीन द्वारा भारतीय सीमाओं का अतिक्रमण देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के कार्यकाल के कुछ कटु अनुभवों का नतीजा है। भ्रमजीवी मीडिया लाख प्रयास करें फिर भी वह ये सत्य नहीं छुपा सकते कि लद्दाख क्षेत्र की गलवान घाटी में हो रही सैनिकों की रक्तरंजित झड़प युगद्रष्टा जवाहरलाल नेहरू के मन में पलने वाली कम्युनिस्ट राज्य के ‘माओ-चाऊ व्हाट्सएप ग्रुप’ का सदस्य बनने की इच्छा का ही परिणाम है।
हालाँकि, बावजूद इन सभी तथ्यों के, नेहरू के नमक में डूबे ‘नेहरूवादी दल’ तत्परता से अपने उस भूलों के पर्याय ‘महानायक’ के लिए फील्डिंग करते देखे जा सकते हैं, जिसकी छत्रछाया में वो आज किसी की फील्डिंग करने लायक बन सके हैं।
चीन की सेना द्वारा पूर्वी लद्दाख क्षेत्र में किए जा रहे उपद्रव के बाद सोशल मीडिया से लेकर न्यूज़ चैनल्स तक में प्रधानमंत्री को निशाना बनाते हुए बयानवीर यह कहते सुने जा रहे हैं कि मोदी ने चीन के सामने समर्पण कर दिया है। राहुल गाँधी तो पीएम मोदी को ‘सरेंडर मोदी’ तक कह चुके हैं।
लेकिन क्या पूर्वी लद्दाख की सीमा पर चीनी सैनिकों के साथ झड़प में भारत ने पहली बार अपने जवान खोए हैं? क्या वास्तव में चीन को लेकर भारत की स्थिति आज नेहरू के समय से कमजोर है? लेकिन प्रमाण तो यह बताते हैं कि जवाहरलाल नेहरू ने यही बात स्वीकार करने में कई वर्ष गँवा दिए कि लद्दाख में कुछ हो रहा है, जो ‘चिंताजनक’ है।
इस समयावधि में भारत ने लद्दाख में अपनी सीमा के एक बड़े भू-भाग को ही नहीं, बल्कि कई जवानों तक को खो दिया था, लेकिन उस दौरान साम्राज्यवादी कम्युनिस्टों के देश में ‘चाऊ-माओ’ (चाऊ एन-लाइ और माओत्से तुंग) के बीच अपने लिए वैश्विक छवि तलाश रहे नेहरू को कभी इतनी फुर्सत नहीं हो सकी कि वह इस बात की सार्वजानिक घोषणा करते या कम से कम इसे स्वीकार करते।
आज बात-बात में ’56 इंच’ की डिबेट करने के लिए उत्सुक भारतीय मीडिया शायद ही यह तथ्य जानता हो या स्वीकार करने की हिम्मत रखता हो कि जवाहरलाल नेहरू जब चाइनीज कम्युनिस्ट कॉकटेल का हिस्सा बनने और उनकी वाहवाही के लिए मरे जाते थे, तब चाइनीज आधिकारिक मीडिया नेहरू के लिए जो विशेषण इस्तेमाल करता था वो कुछ इस तरह थे – ‘ब्रिटिश साम्राज्यवादी और दौड़ता कुत्ता’ (Running dog of imperialism), ‘राष्ट्रवाद का नाटक करने वाला नेहरू’, ‘च्यांग-काई-शेक का दूसरा नाम’।
मीडिया के एक हिस्से के भ्रमजीवियों की मानें तो 1962 में नेहरू द्वारा संसद में पहली बार जब अक्साई चीन का नाम लिया गया था, तब तक भारत के गश्ती दलों ने चीन के साथ झड़प में जान नहीं गँवाई थी? जबकि सवाल यह बनता है कि क्या तब तक जवानों के बलिदान और चीन की घुसपैठ को तत्कालीन सरकार ने स्वीकार किया था?
यह सब उस दौर की बात है जब भारत में सूचना और संचार के माध्यम आज के चीन जितने ही उपलब्ध हुआ करते थे। यह दौर तथ्यों के व्हाइटवाश का ‘स्वर्णिम युग’ था। दोहरे संवाद की तो गुंजाईश तक नहीं थी, जो जनता तत्कालीन प्रधानमंत्री को ट्विटर पर टैग कर उनसे ‘लद्दाख में क्या चल रहा है?’ जैसे सवाल करती।
एक तरह से देखा जाए तो मीडिया की जो स्थिति आज चीन की है, वह उस दौरान भारत की हुआ करती थी। हालाँकि, भारत की मजबूरी तब संशाधन-विहीनता थी। संसद ही उस समय आम लोगों और राजनेताओं की सूचना का प्रमुख जरिया हुआ करता था।
आख़िरकार जब सीमा पर हो रही हलचल की बातें खुलने लगीं तो नेहरू द्वारा दबाई गई सभी जानकारियों का ठीकरा नेहरू की कमजोर याददाश्त पर थोप दिया गया। यह तब की बात है जब चीनी आक्रमणकारियों ने तिब्बत को अपने नियन्त्रण में ले लिया था और कम्युनिस्टों को महत्व देने वाले नेहरू ने तिब्बत की बजाए चीन के पक्ष में अपना झुकाव रखा।
तिब्बत की धार्मिक पृष्ठभूमि पर चायनीज कम्युनिस्ट सत्ता के इस बलात अतिक्रमण पर भारत ने चुप्पी साध रखी थी क्योंकि उस समय चीन में भारत के राजदूत माधव पणिक्कर ने नेहरू को ‘एशिया में शांति का सूत्र’ देते हुए सलाह दी थी कि यदि इस समय चीन का साथ दिया जाए और उनसे दोस्ताना सम्बन्ध रहे तो आगे वही उनके काम आ सकते हैं।
तिब्बत में चीन ने भारत तक सड़क बनाने का काम 1950 के दशक में ही शुरू कर दिया था। लेकिन नेहरू ने अगस्त 1959 तक भी इस तथ्य को छिपाकर रखा। जब यह समाचार किसी भी प्रकार छुपा पाना नेहरू के लिए गले की हड्डी बन गया तब एक दिन आखिरकार लोकसभा में यह खबर रख दी गई और नेहरू ने कहा कि ‘तिब्बत-सिंकियांग हाइवे’ बना दिया गया है।
नेहरू द्वारा तब तक इस तथ्य को छुपाने के इस दावे की पुष्टि कुछ ही वर्ष पहले सीआईए (CIA) द्वारा सार्वजानिक किए गए एक डॉक्यूमेंट में भी होती है। सीआईए द्वारा जारी किए गए इन डॉक्यूमेंट्स में इस बात का खुलासा किया गया था कि अक्साई चिन तक आने वाली सड़क को बहुत पहले ही बना लिया गया था और भारत के लोगों को इसके बारे में कुछ भी पता नहीं चलने दिया गया।
सीआईए द्वारा बाहर लाए गए इन टॉप सीक्रेट में जुलाई 15, 1953 में लिखा गया एक नोट भी था जिसमें भारत की उत्तरी सीमाओं को लेकर कुछ जानकारी मौजूद थीं। इसका शीर्षक था- ‘चाइनीज कम्युनिस्ट ट्रूप्स, वेस्ट तिब्बत, रोड कंस्ट्रक्शन, सिंकियांग टू तिब्बत एंड लद्दाख’ (सिंकियांग से तिब्बत और लद्दाख तक सड़क का काम/Chinese Communist Troops, West Tibet, Road Construction, Sinkiang to Tibet and Ladakh)
अक्साई चिन
यह नोट उन सभी दावों की पुष्टि करता था, जिनका अब तक कितने ही भारतीय इतिहासकार सिर्फ अनुमान लगाते रहे थे, यानी चीन ने 1950 के दशक की शुरुआत में ही भारतीय क्षेत्र में एक सड़क का निर्माण शुरू कर दिया था।
यह खुलासा वर्ष 1959 में तब हुआ, जब सीआरपीएफ़ का 70 जवानों का एक गश्ती दल पूर्वी लद्दाख स्थित अक्साई चिन में देश की सीमा रेखा खींचने के लिए पास को क्रॉस कर रहा था, यहाँ उन्हें चीन की PLA (पीपल्स लिबरेशन पार्टी) के लोगों ने रोक लिया।
अक्टूबर 20, 1959 में चीनी सैनिकों ने 3 भारतीय सैनिकों को बंदी बना लिया और अगले दिन 9 जवान मार दिए गए जबकि 7 को बंधक बना लिया था। यह विषय अब इतना गंभीर हो चुका था कि अब नेहरू के पास इस तथ्य को सार्वजनिक करने के अलावा कोई दूसरा विकल्प शेष नहीं था कि अक्साई चिन क्षेत्र पर चीन ने कब्ज़ा कर लिया है।
यानी, तकरीबन एक दशक पहले से जो काम भारत की उत्तरी सीमा पर हो रहा था, दिल्ली को तब इसकी भनक तक नहीं थी या शायद तत्कालीन भारतीय नेतृत्व तब कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक भारत को ऐसी ऐतिहासिक विवादादास्पद धरोहरें देने में व्यस्त था और उसे फर्क ना पड़ता हो कि ‘लद्दाख की उस बंजर भूमि’ में कुछ उगता भी है या नहीं!
संसद में नेहरू का झूठ
इतनी लम्बी अवधि तक लोगों को गुमराह करने के बाद बजाए चीनी सेना के अतिक्रमण को स्वीकार करने के, तब नेहरू ने संसद में बिना अक्साई चिन का नाम लिए बयान दिया था- ”हमारे देश की ज़मीन पर कोई दावा नहीं किया गया है।”
अप्रैल 22, 1959 को लोकसभा में चीन द्वारा भारत के हिस्से को अपने नक़्शे में दिखाने को लेकर चल रही बहस के दौरान नेहरू का जवाब था –
“नहीं सर, मैं माननीय सदस्यों को सुझाव दूँगा कि वे कभी-कभी हांगकांग से और कभी-कभी अन्य विषम स्थानों से निकलने वाली खबरों पर ज्यादा ध्यान न दें। हमारे ऊपर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से ऐसा कोई दावा नहीं किया गया है। मेरे लिए उस प्रश्न का उत्तर देना कठिन है। हमने एक या दो छोटे सीमांत विवादों पर चर्चा की है जिसमें क्षेत्र के छोटे पथ शामिल हैं, शायद इस तरह से एक मील या ऊँचे पहाड़ों में, जहाँ कोई भी नहीं रहता है और जो लंबित हैं। हमने उनकी चर्चा की है और वर्तमान में कोई समझौता नहीं हुआ है।”
खुद को अक्साई चिन जैसी किसी चीज से एकदम अनजान बताने का प्रयास करते हुए नेहरू ने कहा- “कुछ चीनी एक मील आगे बढ़े हैं या दो.. शायद, ऊँचे पहाड़ों में। यह सत्य है। हम इसमें पूछताछ कर रहे हैं।” इस सबके बीच नेहरू पंचशील जैसे कागजी भरोसों से चीन के कम्युनिस्ट नेतृत्व को खुश करने में ही तल्लीन नजर आते थे।
नेहरू की मित्रता शायद ही अपनी निजी छवि और गौरव के अलावा किसी अन्य चीज से रह सकी हो। यदि ऐसा न होता तो भारत आज भी अपने पहले प्रधानमंत्री की भूलों के लिए अपने सैनिकों का बलिदान नहीं दे रहा होता और कॉन्ग्रेस इन सैनिकों के बलिदान में अपने सत्ता में लौटने का मार्ग नहीं तलाश रही होती।
ख़ुफ़िया विभागों से मिली जानकारी के बावजूद चुप थे नेहरू
जवाहरलाल नेहरू सरकार के दौरान इंटेलिजेंस चीफ बीएन मलिक ने भी इस रहस्य से पर्दा उठाते हुए कहा था कि ख़ुफ़िया विभाग को उनके जासूसों ने चाइनीज पीएलए की घुसपैठ की जानकारी देते हुए 1952 में ही बता दिया था कि करीब 2000 चीनी मजदूरों को अक्साई चीन इलाके में खच्चर और घोड़ों की जगह गाड़ी का रास्ता तैयार करने के काम में लगा दिया गया है।
1953 तक भारत सरकार को इस बात की स्पष्ट जानकारी थी कि गाड़ी का रास्ता पश्चिमी तिब्बत के रुडोक तक तैयार किया जा चुका है। लेकिन जवाहरलाल नेहरू ने ख़ुफ़िया विभागों की रिपोर्ट तक को कोई महत्व नहीं दिया था। इस सबके बाद 1962 की वह अपमानजनक हार नेहरू के खाते आई।
नेहरू के ‘हिंदी-चीनी भाई भाई’ के नारों के परिणामस्वरूप कई भारतीय सैनिकों ने अपनी जान गँवाई और आज एक बार फिर उसकी कीमत चुकाते नजर आ रहे हैं। और नेहरूघाटी सभ्यता के पत्रकार इस विश्लेषण में व्यस्त हैं कि क्या मोदी के नेतृत्व ने चीन के सामने समर्पण कर दिया है?
चीन की मीडिया जहाँ कुछ दिन पहले तक चीनी सैनिकों के साथ हुई इस हिंसक झड़प को ही नकार रही थी, वहीं अब यह कहते नजर आने लगी है कि चीन ने भी अपने अफ़सर गँवाए हैं हालाँकि वह स्पष्ट रूप से आँकड़े सामने नहीं रख रहे।
रही भारत के पड़ोसी देश नेपाल की बात, तो उसका इस्तेमाल विस्तारवादी कम्युनिस्ट चीन हमेशा से ही समय-समय पर विश्व का ध्यान भटकाने के लिए करता आया है। इस समय चीन लगभग हर बड़ी-छोटी आर्थिक महाशक्ति के निशाने पर है।
चीन ने इस बार एक बड़ी भूल करते हुए भारत के वर्तमान नेतृत्व को भी नेहरू जितना ही अकर्मण्य और सेना के हितों के प्रति उदासीन मान लेने की कर डाली है। चीन का मानना शायद यह था कि वर्तमान सरकार को भी नेहरू की तरह ही पंचशील की आड़ में तिब्बत से पाँव पीछे खींचने के लिए मजबूर करने जितना ही आसान काम होगा।
नेहरु ने तिब्बत से पीछे हटने को लेकर 1954 में लोकसभा में बयान दिया था – “सच तो यह है कि अगर हम उन्हें छोड़ने पर राजी नहीं होते तो हमें भी छोड़ना पड़ता।”
यह वही तिब्बत था, जिसे ऋग्वेद में ‘त्रिवष्टप’ नाम से बुलाया गया है, जो भारतभूमि का एक पवित्र हिस्सा था, जो कनिष्क और कुषाण वंश के प्रदेश थे , जिसे नेहरू ने चीन को सौंप दिया था। वर्ष 1949 तक यह तिब्बत स्वतंत्र राष्ट्र था और नेहरू ने विस्तारवादी चीन को इसे हथियाने में अनुचित सहयोग कर एक और विरासत अपनी ‘वैश्विक छवि’ के नाम कर दी।
नेहरू का तिब्बत के पक्ष पर मौन और तिब्बत में चीनी आक्रमणकारियों की सेना के प्रवेश को लेकर संयुक्त राष्ट्र संघ में चीन के समर्थन की नीति का विरोध तब युवा सांसद अटल बिहारी वाजपेयी ने किया था। वाजपेयी ने अगस्त, 1959 में भारतीय संसद में तिब्बत की मदद के बजाए आक्रमणकारियों के साथ खड़े होने वाली तत्कालीन नेहरू सरकार को कोसते हुए कहा था कि संयुक्त राष्ट्र संघ में तिब्बतियों को उनके ही देश में अल्पसंख्यक बना देने वाले चीन को मान्यता दिलाने के लिए भारत एक हद से आगे जाकर उनके साथ खड़ा है।
और यह सब जवाहरलाल नेहरू की नाक के ठीक नीचे और उनके ‘दूरदर्शी फैसलों’ से ही सम्भव हुआ। नतीजा यह हुआ कि इन फैसलों के कारण नेहरू कभी ‘माओ-चाऊ’ के व्हाट्सएप ग्रुप का हिस्सा भी नहीं बन सके और आज जब भी चीन आँख भारत को आँख दिखाने की कोशिश करता है, तो न चाहते हुए भी नेहरू का स्मरण हो आता है।
जो आज कहते हैं कि मोदी ने समर्पण किया है, चीन ने पहली बार भारत के सैनिकों का खून अगर कभी बहाया है तो वह मोदी सरकार के दौरान हुआ है, उन्हें इतिहास के उन पन्नों को जाकर टटोलना चाहिए जहाँ नेहरू के फैसलों की शर्मिदगी के अलावा बाकी कुछ भी नहीं है।
सत्य यही है कि नेहरू ने जवानों का खून भी बहने दिया था, उस बलिदान को स्वीकार तक नहीं किया, तथ्यों की लीपापोती की, सीमा भी चीन को सौंप दी थी, चीनियों की चाटुकारिता के लिए भारतीय सेना को कभी पूरी तरह विश्वास में नहीं लिया।
कॉन्ग्रेस पार्टी ने मंगलवार (जून 23, 2020) को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए कार्य समिति की तीसरी बैठक का आयोजन किया। राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने कॉन्ग्रेस कार्य समिति (सीडब्ल्यूसी) बैठक के दौरान खड़े होने की एक तस्वीर ट्वीट करते हुए कहा कि सीडब्ल्यूसी ने 20 बहादुर भारतीय सैनिकों को श्रद्धांजलि अर्पित करने के लिए दो मिनट का मौन रखा, जो गलवान घाटी में चीन के साथ हिंसक झड़प के दौरान वीरगति को प्राप्त हो गए थे।
अपनी तस्वीर साझा करते हुए अशोक गहलोत ने ट्वीट किया, “कॉन्ग्रेस कार्य समिति की आभासी बैठक में हमारे बहादुर सैनिकों को श्रद्धांजलि देने के लिए दो मिनट का मौन रखा गया, जिन्होंने भारत-चीन सीमा पर बलिदान दिया”।
In the virtual meeting of Congress Working Committee, observed two minutes silence to pay tributes to our brave soldiers, who made the supreme sacrifice on the India-China border. pic.twitter.com/XNO38UNB2H
अशोक गहलोत ने दो तस्वीरें साझा कीं। एक तस्वीर में गहलोत खड़े दिखाई दे रहे हैं, जबकि दूसरे में कॉन्ग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी बैठी हुई हैं। नेटिज़न्स ने तुरंत इस बात पर गौर कर लिया और पूछा कि जब समिति ने हमारे बहादुर सैनिकों को श्रद्धांजलि देने के लिए दो मिनट का मौन रखा, तो “मैडम” क्यों बैठी रहीं।
एक ट्विटर यूजर ने कहा कि शायद सोनिया गाँधी देश के नुकसान से अप्रभावित हैं, उन्हें इससे कोई दुख नहीं है, इसीलिए उन्होंने हमारे बहादुर सैनिकों के लिए खड़े होने और श्रद्धांजलि देने की आवश्यकता महसूस नहीं की। इस पर एक दूसरे ने जवाब दिया कि भारतीयों ने सैनिकों को श्रद्धांजलि दी है, इटालियंस ने नहीं।
Indians ne tribute diya hai Italians ne nahi. ?
— Vigilant ???????????????? (@Vigilantlenses) June 23, 2020
एक अन्य ट्विटर यूजर ने लिखा, “वाह एक राज्य का मुख्यमंत्री खड़ा है और चमचों की राजमाता बैठी हुई हैं।”
गौरतलब है कि भारत और चीन की सेनाओं के बीच लद्दाख बॉर्डर पर गलवान घाटी के पास हिंसक झड़प में चीन के 43 सैनिकों के हताहत होने की बात मीडिया में सामने आई है, जिसमें चीन के मारे गए, घायल और गंभीर घायल चीनी सैनिक भी शामिल बताए जा रहे हैं। वहीं, भारतीय सेना ने स्पष्ट किया है कि इस झड़प में 20 भारतीय सैनिकों को वीरगति प्राप्त हुई। बताया जा रहा है कि इस झड़प के दौरान किसी तरह की कोई गोली नहीं चली है, यानी हाथापाई और पत्थरबाजी हुईं, जिनमें सैनिकों को क्षति पहुँची है।
श्रीनगर का हिलाल अहमद डार नाम का PHD स्कॉलर आतंकवादी संगठन हिजबुल मुजाहिद्दीन में शामिल हो गया है। इसकी जानकारी जम्मू पुलिस ने मंगलवार (जून 23, 2020) को दी है। हिलाल पिछले हफ्ते अपने दोस्तों के साथ सेंट्रल कश्मीर घूमने गया था। उसके बाद वह लापता हो गया।
हिलाल के परिवार ने उसे ढूँढने की बहुत कोशिश की। लेकिन कुछ मालूम नहीं चला। परिजनों ने परेशान होकर श्रीनगर में प्रेस एन्क्लेव के सामने विरोध प्रदर्शन भी किया। मगर, तब भी हिलाल का कुछ पता नहीं चल पाया। पर आज जम्मू पुलिस ने लापता युवक से संबंधित जानकारी दी।
प्रेस एनक्लेव के सामने विरोध प्रदर्शन करते हिलाल के परिजन
डीडी न्यूज श्रीनगर के अनुसार, आईजीपी विजय कुमार ने मीडिया से बातचीत में बताया कि श्रीनगर के बेमिना इलाके का हिलाल अहमद डार जो पिछले दिनों अपने दोस्तों के साथ ट्रैकिंग पर गया था और वहाँ से गायब हो गया था, वो अब आतंकी संगठन हिजबुल मुजाहिद्दीन से जुड़ गया है।
Missing Ph.D scholar Hilal Ahmad Dar from Bemina Srinagar has joined Hizbul Mujahideen outfit, says IGP Kashmir Vijay Kumar. Hilal, who is pursuing PhD from Kashmir University, went missing while on trekking to Naranag area of Central #Kashmir ‘s Ganderbal pic.twitter.com/ZxuFY9dMYa
— ?????Qurashieعرفان قریشی? (@qurashi_e) June 23, 2020
आईजीपी ने हिलाल से जुड़ी जानकारी साझा करते हुए यह भी आश्वासन दिया कि अगर हिलाल के घरवाले उसे आतंकवाद के रास्ते से वापस ले आते हैं। तो वह उसे गिरफ्तार नहीं करेंगें।
Missing PhD scholar Hilal Ahmad Dar of Bemina Srinagar, who went missing during a trekking expedition has joined Hizb militant group, says IG Police Vijay Kumar while talking with media along with DG police after wreath laying ceremony of CRPF jawan at RTC Humhama.
परिवार के अनुसार, हिलाल दिल्ली में काम करता था। हाल ही में वह कोरोनावायरस महामारी फैलने के बाद कश्मीर आया था। उसने कश्मीर यूनिवर्सिटी से पीएचडी की हुई है।
बता दें हिलाल से जुड़ी इस जानकारी को जम्मू पुलिस ने सीआरपीएफ जवान सुनील काला के श्रद्धांजलि समारोह के दौरान साझा किया। जब पत्रकारों ने आगे की जानकारी माँगी तो उन्होंने कहा कि अभी ताजा अपडेट यही है कि वह आतंकी संगठन से जुड़ गया है।
उल्लेखनीय है कि जम्मू-कश्मीर के स्थानीय युवकों को आतंकवाद का रास्ता छोड़ घरवापसी करवाने के लिए पुलिस प्रशासन पिछले कुछ सालों से बहुत मेहनत कर रही है। पुलिस लगातार उन युवकों के परिजनों को अपने बच्चों को समझाने के लिए अपील करती है, जिन्होंने आम जिंदगी को छोड़कर आतंकवाद का रास्ता अपनाया।
बिहार में विधानसभा चुनाव से पहले राज्य में सियासी हलचल शुरू हो गई है। आज इसी क्रम में लालू प्रसाद की राजद को बड़ा झटका लगा है। दरअसल, राजद के पाँच विधान पार्षदों ने पार्टी का हाथ छोड़कर सत्ताधारी पार्टी जदयू का दामन थाम लिया है।
इसके अलावा पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष रघुवंश प्रसाद ने भी अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। उन्हें लेकर कहा जा रहा है कि वह रामा सिंह के पार्टी में शामिल होने की खबरों से नाराज थे। इसलिए उन्होंने ये फैसला किया। जबकि 5 विधान पार्षदों को लेकर खबर है कि वह राजद में मौजूद वंशवाद की राजनीति और तेजस्वी यादव के नेतृत्व से परेशान हो गए थे।
राजद से इस्तीफा देने वाले पार्षदों में दिलीप राय, राधा चरण सेठ, संजय प्रसाद, कमरे आलन, और रणविजय सिंह का नाम शामिल हैं। इन सभी विधान पार्षदों ने विधान परिषद के कार्यकारी सभापति को इस बाबत चिठ्टी भी सौंप दी है। वहीं, दूसरी ओर जदयू की रीना यादव के पत्र के बाद विधान परिषद ने राजद से आए जदयू के सभी सदस्यों को मान्यता दे दी। नवभारत टाइम्स के अनुसार इन 5 विधान पार्षदों के अलावा जेडीयू से जुड़ने वाले राजद नेताओं की संख्या में बढौतरी हो सकती है।
मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो राजद में विधान परिषद (विप) उम्मीदवारों के नाम की चर्चा होते ही विवाद शुरू हो गया था। पार्टी नेता पूर्व मंत्री भोला राय के समर्थकों ने सोमवार को राबड़ी देवी के आवास 10 सर्कुलर रोड पर जाकर हंगामा किया। दरअसल, भोला राय के समर्थकों का दावा है कि उनको लालू ने भी विप भेजने का वादा किया था। पर अब तक की सूची में उनका नाम नहीं है।
JDU छोड़ RJD में भी शामिल हुए नेता
याद दिला दें, अभी बीते दिनों जदयू के पूर्व mlc जावेद इकबाल अंसारी ने पार्टी का दामन छोड़ राजद का हाथ थामा था। अंसारी के अलावा जेडीयू के पूर्व विधायक रामनरेश सिंह की बेटी शगुन सिंह ने भी पार्टी से किनारा कर तेजस्वी के साथ काम करने का फैसला ले लिया था। इसी तरह पूर्व एडीजी अशोक गुप्ता ने भी आरजेडी के साथ आ कर विधानसभा चुनाव में जाने का फैसला किया था।
उस समय आरजेडी प्रदेश अध्यक्ष जगदानंद सिंह ने कहा था कि लोगों को अब आरजेडी में अपना भविष्य नजर आने लगा है। वे आरजेडी को सम्मानित कर रहे हैं और RJD उन्हें सम्मानित कर रही है। लालू यादव ने गरीबों का उत्थान किया है, ये वो जानते हैं।
9 सीटों पर चुनाव
बिहार विधान परिषद की 9 सीटों के लिए JDU, BJP, RJD और कॉन्ग्रेस में उम्मीदवारों के चयन की प्रक्रिया अंतिम दौर में है। जदयू ने पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतीश कुमार को इसके लिए अधिकृत कर दिया है।
राजद में तीन सीटों के लिए उम्मीदवारों के नाम लगभग तय हो चुके हैं। लेकिन इनका नाम तभी सार्वजनिक होगा, जब लालू प्रसाद इसपर अपनी मुहर लगा देंगे। वहीं प्रदेश भाजपा ने संभावित उम्मीदवारों की सूची केंद्र को भेज दी है। उधर, कॉन्ग्रेस में अनेक दावेदारों के बीच एक उम्मीदवार का चयन पार्टी नेतृत्व के लिए चुनौती है।
कोस्टल रोड प्रोजेक्ट, बृहन्मुंबई नगर निगम (BMC) की एक बड़ी और महत्वाकांक्षी परियोजना है। लेकिन अब इस परियोजना के आड़े लगभग 600 पेड़ आ रहे हैं, जिसमें से 140 पेड़ों को बीएमसी ने काटने का निर्णय लिया है और बाकी के पेड़ों का पुनर्रोपण किया जाएगा। इन पेड़ों को प्रिंसेस स्ट्रीट फ्लाइओवर से लेकर वर्ली के बीच 9 किलोमीट कोस्टल रोड प्रोजेक्ट के तहत काटा जाएगा।
परियोजना के लिए 140 पेड़ों को काटने के खिलाफ संबंधित नागरिकों द्वारा उठाए गए 176 सुझावों और आपत्तियों का जवाब देते हुए नागरिक निकाय ने अपने बचाव में तर्क दिया है कि इस परियोजना से प्रदूषण और बाढ़ में कमी आएगी एवं हरियाली में वृद्धि होगी।
परियोजना की शुरुआत में मुंबई के उपनगरों को जोड़ने और शहर की सड़कों को जाम करने का प्रस्ताव दिया गया था। प्रिंसेस स्ट्रीट फ्लाईओवर और वर्ली के बीच कोस्टल रोड प्रोजेक्ट के फेज -I के दौरान लगभग 90 हेक्टेयर जमीन को फिर से प्राप्त किया जाना है।
इस महत्वाकांक्षी कोस्टल रोड परियोजना के लिए 20 हेक्टेयर जमीन को आवंटित किया गया है, शेष 70 हेक्टेयर को ग्रीन कवर के लिए आरक्षित किया जाना है, जिसमें बीएमसी की बागान की योजना है।
BMC ने कहा कि कोस्टल रोड के उपयुक्त निर्माण के लिए ‘कुछ’ पेड़ों की कटाई ‘अनिवार्य’ है। शिवसेना द्वारा नियंत्रित निकाय ने सरकार के दिशा-निर्देशों के अनुसार 1:3 के अनुपात में पुन: वनरोपण का आश्वासन दिया। बीएमसी ने कहा कि आम लोगों को कई तरह से फायदा होगा जैसे कि प्रदूषण में कमी, ग्रीन कवर में बढ़ोतरी और समय की बचत होगी।
नागरिक निकाय ने अनुमान लगाया है कि परियोजना से लगभग 600 पेड़ प्रभावित होंगे, जिसका उद्देश्य बांद्रा-वर्ली सी लिंक के दक्षिणी छोर के साथ मरीन ड्राइव को जोड़ना है। इस परियोजना के तहत 140 पेड़ों को काट दिया जाएगा और लगभग 460 पेड़ों का प्रत्यारोपण किया जाना है।
नागरिक पर्यावरणविद् ज़ोरू भाठेना ने कहा कि यह समझ से बाहर है कि पुनर्निर्मित जमीन पर बनी सड़क के लिए 600 पेड़ क्यों प्रभावित हो रहे हैं। कार्यकर्ता ने आरोप लगाते हुए कहा –
“हम समझ सकते थे कि पाँच-दस पेड़ काटे या रोपे जा रहे हैं, लेकिन 600 एक बड़ी संख्या है। इसके अलावा, बीएमसी का दावा है कि कोस्टल रोड बनने से बाढ़ की स्थिति में कमी आएगी। हालाँकि, ऐसा लग रहा है कि बीएमसी भौतिकी, भूगोल, इतिहास और पर्यावरण अध्ययन पर उनके खुद के बनाए सिद्धांतों का पालन करती है। यह बीएमसी का बेहद ही गलत उदाहरण है।”
समुद्री संरक्षणवादी प्रदीप पाटेडे ने दावा किया कि कोस्टल रोड के निर्माण के कारण बाढ़ कम नहीं होगी। उनका कहना है कि उन्होंने ऐसी तस्वीरें देखीं है, जिनमें अशांत पानी निर्माण क्षेत्र से टकरा रहा है। उन्होंने जोर देते हुए कहा यह एक सामान्य तर्क है क्योंकि जितना अधिक आप समुद्र में भरेंगे, उतना ही बाहर निकलेगा।
वहीं परियोजना के मुख्य इंजीनियर विजय निगोत ने दोहराया कि बीएमसी उस स्तर तक नहीं पहुँची है, जहाँ वह वनों की कटाई या पुनर्रोपण पर विचार कर सकती है। उन्होंने कहा कि बीएमसी के ट्री ऑथोरिटी से अभी तक हरी झंडी नहीं मिली है।
उन्होंने स्पष्ट किया, “इसके अलावा, हम इसलिए कह रहे हैं कि बाढ़ कम हो जाएगी, क्योंकि हम एक समुद्री दीवार बनाने जा रहे हैं, और इसके कारण तुलनात्मक रूप से बाढ़ कम हो जाएगी। हमने यह दावा नहीं किया है कि बाढ़ नहीं आएगी।”
गौरतलब है कि किसी भी राज्य में सरकार बदलने पर और किसी सरकार के सत्ता में आने पर किस तरह से वहाँ की स्थितियाँ बदलती हैं, ये उसी का उदाहरण है। जब बीजेपी की सरकार में कार शेड बनाने के लिए पेड़ काटे जा रहे थे, तो शिवसेना ने इसका भरपूर विरोध किया था।
उद्धव ठाकरे ने तो यहाँ तक कह दिया था कि आगामी सरकार हमारी होगी और एक बार हमारी पार्टी सत्ता में आई तो हम आरे में पेड़ों की हत्या करने वालों से अच्छे तरीके से निपटेंगे। उन्होंने कटाई का विरोध करते हुए कहा था कि ये जो हत्यारे अधिकारी बैठे हैं, वो पेड़ों के कातिल हैं, उन्हें इसकी कीमत चुकानी होगी। जिसके बाद उन्होंने खुद ही पेड़ों को काटने का आदेश दिया था और अब कोस्टल रोड प्रोजेक्ट के लिए पेड़ों को काटने की बात सामने आ रही है।