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रथ यात्रा रोकने की साजिश: एक अनजाने NGO को इतने बड़े वकील उतारने के लिए फंड कहाँ से आए?

भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने जो रोक लगाई थी उसे हटा लिया है। सोमवार (जून 22, 2020) को सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने शर्तों के साथ रथयात्रा निकालने की अनुमति दी है।

यात्रा पर रोक लगाए जाने के बाद कई याचिकाएँ दाखिल कर शीर्ष अदालत से पुनर्विचार का आग्रह किया गया था। इन याचिकाओं में कहा गया था कि जगन्नाथ रथयात्रा सदियों पुरानी परंपरा है। इससे करोड़ों लोगों की आस्था जुड़ी है। इस यात्रा को सिर्फ पुरी में ही निकालने की इजाजत दी जाए।

याचिका में माँग की गई थी कि पुरी की मुख्य रथ यात्रा को ही अनुमति दे दी जाए। कोर्ट से आग्रह किया गया कि यात्रा निकालने और पूजा के लिए लाखों लोगों के बजाय सिर्फ 500-600 लोगों को ही अनुमति दी जाए। इस दौरान कोरोना से बचाव संबंधी सभी गाइडलाइन और सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करने का भरोसा भी दिलाया गया।

ओडिशा विकास परिषद की तरफ से पेश हुए वरिष्ठ वकील

यहाँ पर गौर करने वाली बात ये है कि जगन्नाथ यात्रा को रोकने के लिए ‘ओडिशा विकास परिषद’ की तरफ से सुप्रीम कोर्ट में याचिका दी गई थी। ‘ओडिशा विकास परिषद’ NGO का नाम शायद ही कभी प्रकाश में आया हो। ये एक अनजाना सा ही नाम है, मगर इसने मुकुल रोहतगी, रंजीत कुमार जैसे वरिष्ठ वकील को अपना पक्ष रखने के लिए रखा।

ऐसे में ये सवाल खड़ा होना स्वाभाविक है कि ये NGO नक्सलियों द्वारा या फिर ईसाई मिशनरियों द्वारा बनाया गया है, या फिर पहले से ही था।

रथयात्रा रोकने की साजिश पर अजीत भारती का नजरिया

इससे पहले इस एनजीओ ने 5 जून को होने वाले स्नान पूर्णिमा पर रोक लगाए जाने को लेकर ओडिशा हाईकोर्ट का रुख किया था कि अगर ये उत्सव मनाया गया तो महामारी फैल जाएगा। जब देश पहले से ही कोरोना जैसी खतरनाक बीमारी से जूझ रही है, ऐसे में इस तरह की बातें करना भय को बढ़ावा देने से ज्यादा कुछ नहीं है।

अगर ओडिशा विकास परिषद को कोरोना को फैलने से रोकने, लोगों को इसके प्रति जागरुक करने या फिर उनकी स्वास्थ्य को लेकर इतनी ही चिंता थी, तो क्या उन्होंने इसको लेकर किसी प्रकार का अभियान चलाया? किसी तरह की सेवा प्रदान की? इस बारे में कहीं कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है। 

खैर, ये एक अनजाना सा नाम है, जिसे एक जरिया के तौर पर इस्तेमाल किया गया। ये लोग स्नान पूर्णिमा को रुकवाना चाहते थे। इस मामले में केंद्र सरकार ने भी हाथ खड़े कर दिए थे कि यह राज्य सरकार का विषय है कि वो इसे करवाना चाहती है या नहीं।

शुक्रवार तक जब तक कि रोक हटवाने की मुहिम पब्लिक मूवमेंट नहीं बनी थी, न तो केंद्र सरकार, न राज्य सरकार और न ही कोई भी पार्टी इसको लेकर गंभीर थी। किसी भी बीजेपी नेता ने न तो इसको लेकर ट्वीट किया और न ही कोई मुहिम चलाई।

हम चाहते हैं कि रथ यात्रा की परंपरा चलती रहे, लेकिन हम ये नहीं चाहते कि लोग इकट्ठा हों, क्योंकि ये महामारी का समय है। अगर हम भी ऐसा करेंगे तो तबलीगी जमात और हम में क्या अंतर रह जाता है। स्नान पूर्णिमा के दिन वहाँ पर पुजारियों और संतों के अलावा एक भी इंसान नहीं आया। इतनी समझ तो है हिंदू में।

मगर ओडिशा विकास परिषद का तो ये मकसद था ही नहीं। ये नक्सली, आतंकियों के हिमायती, हिंदू से घृणा करने वाले और वामपंथी विचारधारा की पूरी लॉबी हिंदुओं के हर प्रतीक को नष्ट करना चाहती है। महामारी के इस समय में हिंदुओं के परंपरा को तोड़ना चाहती है।

और फिर बाद में इसको लेकर ताना भी देती है कि हमने जगन्नाथ रथ यात्रा रुकवा दिया। हमने तो तुम्हारे भगवान को 70 सालों तक टेंट में बैठाकर रखा। इसे सुनकर हिंदुओं के मन में हीन भावना आती है कि 80% आबादी हमारी है, सरकार भी इसी मुद्दे पर सत्ता में आती है, लेकिन इसके बावजूद ओडिशा विकास परिषद जैसा संस्थान सीधा सुप्रीम कोर्ट पहुँच जाता है। लोग इसकी गंभीरता को नहीं समझ पाते हैं। 

जब सुप्रीम कोर्ट ने रथ यात्रा की इजाजत दे दी तो लिबरल गिरोह ने एक नया प्रपंच फैलाना शुरू किया कि आफताब हुसैन नाम के मुस्लिम लड़के ने रथ यात्रा की परंपरा टूटने से बचा लिया। हाँ, ये सच है कि मुस्लिम लड़के ने भी सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की थी। मगर वो इकलौता नहीं था। और भी लोग थे जिन्होंने याचिका दायर की।

गजपति महाराज जैसे लोग थे जो सुप्रीम कोर्ट की रोक के बाद से ही इसे हटाने के लिए अलग-अलग स्तरों पर प्रयास कर रहे थे। लेकिन लिबरल गिरोह का प्रोपेगेंडा देखिए, पहले तो रथ यात्रा न हो इसके लिए तमाम प्रयास किए और जब यह प्रयास सफल नहीं हुआ, कोर्ट ने मंजूरी दे दी तो सिक्यूलर छवि के नाम पर एक मुस्लिम याचिकाकर्ता को हीरो बनाया जा रहा है।

बता दें कि केंद्र सरकार, राज्य सरकार, बीजेपी नेता संबित पात्रा, जगन्नाथ संस्कृत जन जागरण मंच, अंतरराष्ट्रीय हिंदू महासभा संघ, लक्ष्मी बिस्बाल आदि की तरफ से कई याचिकाएँ सुप्रीम कोर्ट में दी गई थी, जिसमें कहा गया कि मंदिर में 1172 सेवक हैं। इन सभी का कोविड-19 टेस्ट किया जा चुका है जो निगेटिव आया है। तीनों रथ खींचने के लिए 750 लोगों की आवश्यकता होती है। मंदिर के पास 1172 सेवक हैं। ये लोग ही रथों को खींचकर गुंडिचा मंदिर तक ले जा सकते हैं। इस तरह रथयात्रा बिना बाहरी लोगों के शामिल हुए भी निकाली जा सकती है।

मगर एनडीटीवी, द वायर जैसी कई मीडिया संस्थान मे मुस्लिम लड़के आफताब का ऐसे महिमामंडन किया कि उसने हिंदुओं की परंपरा को टूटने से बचा लिया और हिंदुओं को इसके लिए उसका आभारी होना चाहिए। मीडिया पोर्टल ने इसके माध्यम से मुस्लिम की हिन्दू देवताओं के प्रति ‘आस्था’ दिखाने का भी भरसक प्रयास किया।

दिल्ली दंगा: राजधानी स्कूल के मालिक फैजल फारुख को बेल, स्कूल की छत से हिंदुओं पर फेंके गए थे पत्थर-पेट्रोल बम

दिल्ली की एक अदालत ने शनिवार को फैजल फारुख (Faisal Farooque) को जमानत दे दी। वह राजधानी स्कूल का मालिक और प्रिंसिपल है। उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हिंदू विरोधी दंगों के दौरान इस स्कूल का इस्तेमाल अटैक बेस की तौर पर किया गया था।

स्कूल की छत पर एक बड़ा गुलेल लगाया था। इसकी मदद से हिंदुओं और उनकी संपत्तियों और पेट्रोल बम से निशाना बनाया गया था। दंगों में इस स्कूल को कोई नुकसान नहीं पहुॅंचा था। लेकिन इस ठीक बगल में स्थित स्कूल तबाह हो गया था।

फैजल फारुख को जमानत देते हुए अदालत ने कहा कि पिंजरा तोड़, पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया और मरकज से उसके संबंध में प्रथम दृष्टया प्रमाण नहीं हैं। दिल्ली पुलिस की चार्जशीट में इन संगठनों के साथ फैजल के संबंधों की ओर इशारा किया गया है। कोर्ट ने यह भी कहा कि दंगों के वक्त फैजल मौके पर मौजूद था इसे साबित करने के लिए भी साक्ष्य नहीं हैं।

दरअसल दिल्ली पुलिस फारुख और निजामुद्दीन मरकज के बीच संबंधों की जाँच कर रही है। दिल्ली पुलिस ने उसके पीएफआई, पिंजरा तोड़ और मरकज के संपर्क में होने की बात कही थी।

इससे भी महत्वपूर्ण बात यह थी कि वह जिन लोगों के साथ संपर्क में था वह निजामुद्दीन मरकज के प्रभावशाली लोग थे। दिल्ली पुलिस ने जाँच के दौरान पाया था कि फारुख दिल्ली दंगों से एक दिन परहले देवबंद भी गया था। अब क्राइम ब्रांच दिल्ली दंगों में निजामुद्दीन मरकज की भूमिका की जाँच कर रही है।

उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुए हिंदू विरोधी दंगों के दौरान दंगाइयों ने दिल्ली के दयालपुर क्षेत्र में स्थित राजधानी स्कूल को अपना गढ़ बना लिया था। फैसल फारूक राजधानी स्कूल का मालिक है। दिल्ली दंगों में संलिप्तता के आरोप में फैसल को दिल्ली पुलिस ने मार्च महीने में गिरफ्तार किया गया था। दिल्ली पुलिस ने फारुख को 18 अन्य लोगों के साथ गिरफ्तार किया था।

क्राइम ब्रांच के अनुसार फैसल फारूक दिल्ली में तीन स्कूलों का मालिक है;

क्राउन पब्लिक स्कूल, सीलमपुर
राजधानी स्कूल, शिव विहार
विक्टोरिया पब्लिक सीनियर सेकेंडरी स्कूल, वजीराबाद रोड

इतना ही नहीं फारुख ने 2014 में यमुना विहार C-1/9 में लगभग 6 करोड़ में एक संपत्ति खरीदी थी। वर्ष 2017 में यमुना विहार में लगभग 7.5 करोड़ रुपये मूल्य का सी-3/59ए खरीदा। वर्ष 2018 और 2019 में यमुना विहार में 2 दुकानें 10 करोड़ में खरीदी और 2020 में यमुना विहार में बी-1/1 की संपत्ति लगभग 10 करोड़ में खरीदी।

क्राइम ब्रांच को जाँच में पता चला कि फारुख कथित रूप से पीएफआई और निजामुद्दीन मरकज के साथ जुड़े लोगों के संपर्क में था। यही कारण था कि पुलिस पीएफआई और उनकी संपत्तियों के कनेक्शन की जाँच कर रही थी।

रिपोर्ट्स के अनुसार दिल्ली दंगों के दौरान दंगाइयों ने राजधानी स्कूल को अपना केन्द्र बनाते हुए उसकी छत से ही गोलियाँ चलाईं थीं। उसकी छत पर लगी बड़ी लोहे की गुलेल का उपयोग पेट्रोल बम, एसिड, ईंट, पत्थरों को दूर तक फेंकने के लिए किया गया था। इस दौरान दंगाइयों की भीड़ ने राजधानी स्कूल की छत से रस्सियों की मदद से डीआरपी कॉन्वेंट स्कूल के परिसर में उतरकर स्कूल में आग लगा दी थी।

इस मामले में दिल्ली पुलिस द्वारा चार्जशीट दाखिल कर दी गई है। यह रिपोर्ट 5 मार्च को दिल्ली के न्यू मुस्तफाबाद स्थित राजधानी स्कूल शिव विहार के परिसर के बाहर 24 फरवरी को हुए दंगों में दर्ज की गई थी। यह शिकायत डीआरपी कॉन्वेंट स्कूल के मालिक और प्रबंधक द्वारा दर्ज कराई गई थी। यह स्कूल राजधानी स्कूल के भवन से सटा हुआ है।

चार्जशीट में कहा गया है कि 24 फरवरी को मुस्लिम परिवारों के बच्चों को उनके माता-पिता स्कूल से जल्दी लेकर चले गए, जो साबित करता है कि दंगा पूर्व नियोजित था। इतना ही नहीं दिल्ली पुलिस को राजधानी स्कूल की छत से काँच की बोतलें, टाइल्स, रस्सी और लोहे की गुलेलें मिलीं थीं, जिसकी मदद से दंगाइयों ने हिंदुओं और उनके घरों को निशाना बनाया था।

महाराष्ट्र में ₹5000 करोड़ के 3 चीनी प्रोजक्ट पर रोक, चीनी माल के आयात में ₹1 लाख करोड़ की कमी लाएगा CAIT

महाराष्ट्र सरकार ने चीनी प्रोजेक्ट्स को लेकर बड़ा फैसला लिया है। चीन की तीन कंपनियों के साथ हुए करार पर रोक लगा दी है। राज्य सरकार ने मैग्नेटिक महाराष्ट्र 2.0 समिट में तीन चीनी कंपनियों के साथ पाँच हजार करोड़ के निवेश के प्रोजेक्ट साइन किए थे। 

महाराष्ट्र के उद्योग मंत्री सुभाष देसाई ने कहा कि राज्य सरकार ने यह फैसला केंद्र सरकार के परामर्श से लिया है। उन्होंने बताया कि भारत-चीन सीमा पर 20 भारतीय सैनिकों के बलिदान होने से पहले इन समझौतों पर हस्ताक्षर किए गए थे। उन्होंने बताया कि विदेश मंत्रालय ने चीनी कंपनियों के साथ किसी भी अन्य समझौते पर हस्ताक्षर न करने की राज्य सरकार को सलाह दी है।

उन्होंने बताया कि मैग्नेटिक महाराष्ट्र 2.0 समिट में राज्य सरकार ने दुनिया भर की कंपनियों से 12 समझौतों पर हस्ताक्षर किए गए थे जिनमें तीन चीनी कंपनियाँ भी शामिल थीं। 

इसमें पुणे में तालेगाँव में ऑटोमोबाइल विनिर्माण इकाई स्थापित करने के लिए चीन की ग्रेट वॉल मोटर्स के साथ 3,770 करोड़ रुपए का MoU साइन किया था। इसके अलावा चीन की फोटॉन और पीएमआई इलेक्ट्रो मोबिलिटी के बीच 1,000 करोड़ रुपए की साझेदारी शामिल है। अन्य चीनी कंपनियों में, एक हेंगली इंजीनियरिंग कंपनी थी, जो तालेगाँव प्रोजेक्ट में 250 करोड़ रुपए के निवेश के साथ अपने दूसरे चरण का विस्तार करने वाली थी। कंपनी की तरफ से कहा गया था कि इस प्रोजेक्ट से 150 नौकरियाँ पैदा होंगी। 

इससे पहले, व्यापारियों के संगठन कन्फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स (CAIT) ने महाराष्ट्र सरकार से चीन की तीन कंपनियों के साथ सहमति ज्ञापन (MoU) रद्द करने की माँग की थी। CAIT ने इस बारे में मुख्यमंत्री उद्भव ठाकरे को एक पत्र भी लिखा था मुख्यमंत्री को लिखे पत्र में CAIT ने कहा कि हाल ही में महाराष्ट्र सरकार ने चीन की तीन कंपनियों के साथ जो समझौता किया है, उसे चीन के खिलाफ देशवासियों के रोष और आक्रोश को देखते हुए तुरंत रद्द कर देना चाहिए।

वहीं उत्तर प्रदेश भी चीनी उत्पादों को बहिष्कार किए जाने की तैयारी में है। उत्तर प्रदेश के ऊर्जा मंत्री श्रीकांत शर्मा ने कहा कि राज्य अपने ऊर्जा क्षेत्र के लिए कोई भी चीनी उत्पाद नहीं खरीदेगा। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार यह सुनिश्चित करेगी कि विक्रेता चीन में बने सामानों की आपूर्ति या उपयोग नहीं करे।

नोएडा की करीब 20 हजार MSME निर्माण प्रक्रिया में चीनी उत्पादों और उपकरणों के बहिष्कार करने का निर्णय पहले ही कर चुकी हैं। यह निर्णय सामूहिक रूप से गौतम बुद्ध नगर में MSME क्षेत्र के संघ द्वारा लिया गया था। गौतम बुद्ध नगर में MSME एसोसिएशन के अध्यक्ष ने सभी कारखानों को पत्र लिखकर चीनी उत्पादों के बहिष्कार का अनुरोध किया है।

वहीं CAIT ने चीनी सामानों के बहिष्कार के लिए चलाए जा रहे राष्ट्रीय अभियान ‘भारतीय सामान-हमारा अभिमान’ के तहत सोमवार (जून 22, 2020) को दिल्ली के करोल बाग में चीनी वस्तुओं की होली जलाई। इस मौके पर CAIT के महासचिव प्रवीण खंडेलवाल ने कहा, “हमने दिसंबर 2021 तक चीनी माल के आयात में 1 लाख करोड़ रुपए की कमी करने का फैसला किया है।”

इसके साथ ही प्रवीण खंडेलवाल ने कहा कि देश भर के व्यापारियों एवं नागरिकों में चीनी वस्तुओं के बहिष्कार को लेकर बेहद उत्साह और बड़ा समर्थन प्राप्त है। उन्‍होंने कहा कि इस अभियान की पहली बानगी अगस्त महीने में राखी के त्योहार पर दिखेगी, जब इस वर्ष देशभर की बहनें चीनी राखी का बहिष्कार कर भारतीय राखी अपने भाइयों की कलाई पर बाँधेगी।

इसी तरह जन्माष्टमी का त्योहार भी पूर्ण भारतीय संस्कृति के अनुरूप मनाया जाएगा, जिसमें चीनी वस्तुओं का कोई स्थान नहीं होगा। साथ ही उन्होंने महाराष्‍ट्र के मुख्‍यमंत्री उद्धव ठाकरे के फैसले को स्वागतयोग्य बताया और कहा कि ये देश के नागरिकों की भावनाओं का सम्मान है।  

पूरे देश में उत्साह और आनंद का माहौल है, जय जगन्नाथ: रथयात्रा को मँजूरी मिलने पर अमित शाह

ओडिशा में भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा निकालने की सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को सशर्त मॅंजूरी दे दी। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने इस फैसले के लिए पूरे देश को बधाई दी है।

उन्होंने ट्वीट कर कहा, “आज का दिन हम सबके लिए, विशेषकर ओडिशा के हमारे भाइयों-बहनों और भगवान जगन्नाथ के भक्तों के लिए एक शुभ दिन है। रथयात्रा को सुप्रीम कोर्ट की मॅंजूरी मिलने से पूरे देश में उत्साह और आनंद का माहौल है। जय जगन्नाथ!”

विश्व प्रसिद्ध जगन्नाथ रथ यात्रा 23 जून को निकलनी है।

शाह ने लिखा, “यह मेरे साथ-साथ देशभर के करोड़ों श्रद्धालुओं के लिए हर्ष की बात है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने न केवल श्रद्धालुओं की भावनाओं को समझा, बल्कि इस मामले का सकारात्मक हल निकले, इसके लिए तुरंत प्रयास शुरू किए, जिससे हमारी यह महान परंपरा कायम रही। कल शाम मैंने प्रधानमंत्री जी की सलाह पर गजपति महाराज जी (पुरी के राजा) और पुरी के शंकराचार्य जी से बात की और यात्रा को लेकर उनके विचारों को जानकर प्रधानमंत्री जी को अवगत कराया। आज सुबह प्रधानमंत्री के निर्देश पर सॉलिसिटर जनरल से भी बातचीत की।”

अमित शाह ने फोन के जरिए पुरी के गजपति महाराज दिव्य सिंहदेव के साथ मंदिर की व्यवस्थाओं को लेकर चर्चा भी की है।

सोमवार (22 जून, 2020) को श्रीजगन्नाथ मंदिर के मुख्य प्रशासक डॉ. किशन कुमार की अध्यक्षता में स्थानीय नीलाचल भक्त निवास में रथयात्रा को लेकर बैठक हुई, जिसमें जिलाधिकारी बलवंत सिंह भी मौजूद रहे। बलवंत सिंह ने बताया कि रथयात्रा को लेकर श्रीक्षेत्र धाम पूरी तरह से तैयार है। सुप्रीम कोर्ट के सभी निर्देशों का पालन किया जाएगा।

सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में मामले पर हुई सुनवाई के बाद कोर्ट ने शर्तों के साथ जगन्नाथ रथयात्रा को निकालने की अनुमति जारी कर दी। कोर्ट ने कहा है कि पुरी रथ यात्रा स्वास्थ्य से समझौता किए बिना मंदिर समिति, राज्य और केंद्र सरकार के समन्वय के साथ आयोजित की जाएगी।

इस रथयात्रा को निकाले जाने को लेकर सुप्रीम कोर्ट में 16 पिटीशन दाखिल की गईं थीं। इसके बाद मामले में चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया एसए बोवडे ने तीन जजों की एक बेंच गठित की। इस बेंच में सीजेआई एसए बोबडे, जस्टिस एएस बोपन्ना और जस्टिस दिनेश माहेश्वरी शामिल हैं।

इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने 23 जून को निकलने वाली जगन्नाथ रथयात्रा पर रोक लगा दी थी। सुप्रीम कोर्ट ने कोरोना संक्रमण के खतरे को देखते हुए एक स्थान पर लाखों लोगों के जमा होने की अनुमति नहीं दी थी।

सुप्रीम कोर्ट में दायर की गई याचिकाओं में कहा गया था कि जगन्नाथ रथयात्रा सदियों पुरानी परंपरा है, जिसमें करोड़ों लोगों की आस्था है। इस यात्रा को सिर्फ पुरी में ही निकालने की इजाजत दी जाए। माँग की गई थी कि पुरी की मुख्य रथयात्रा को ही अनुमति दे दी जाए।

साथ ही कोर्ट से आग्रह किया गया था कि यात्रा निकालने और पूजा करने के लिए लाखों लोगों के बजाय सिर्फ 500-600 लोगों को ही अनुमति दी जाए। इस दौरान कोरोना से बचाव संबंधी सभी गाइडलाइन और सोशल डिस्टेंसिंग का पालन किया जाएगा।

इतना ही नहीं इस माँग को लेकर बीजेपी नेता संबित पात्रा की ओर से भी सुप्रीम कोर्ट में पिटीशन दाखिल की थी। याचिका में उन्होंने कहा था कि भगवान जगन्नाथ के उन 800 सेवायतों के माध्यम से भक्तों की मंडली के बिना रथयात्रा को निकालने की अनुमति दी जा सकती है।

चीन से लगी LAC पर माउंटेन फोर्स की तैनाती, ऊँचाई वाले इलाके में गुरिल्ला युद्ध करने में हैं दक्ष

गलवान में चीनी धोखे के बाद भारत अब उससे लगती सीमा पर सेना की तैनाती लगातार बढ़ा रहा है। इसी कड़ी में माउंटेन फोर्स की तैनाती 3488 किमी लंबी वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर की गई है। माउंटेन फोर्स के जवान ऊँचाई वाले इलाके में गुरिल्ला युद्ध करने में खास तौर से निपुण होते हैं।

हिंदुस्तान टाइम्स ने शीर्ष आधिकारिक सूत्रों के हवाले से यह खबर दी है। सूत्रों ने सेना को चीनी सेना कि किसी भी हरकत का जवाब देने का आदेश दिया गया है। माना जाता है कि माउंटेन फोर्स के जवानों को भारत ने पिछले दशकों में उत्तरी फ्रंट पर लड़ने के लिए प्रशिक्षित किया है। चीनी सेना जहॉं सड़क के रास्ते सैन्य साजो-सामान सीमा पर ला रहे हैं, वहीं माउंटेन फोर्स का दस्ता ऊँचाई वाले इलाके में गुरिल्ला युद्ध के लिए ट्रेंड होते हैं, जैसा हम करगिल के युद्ध में देख चुके हैं।

एक पूर्व आर्मी चीफ के हवाले से बताया गया है, “पहाड़ों पर युद्ध करना खासा मुश्‍किल होता है। माउंटेन फोर्स को खास इसी तरह के इलाके में युद्ध के लिए ट्रेंड किया जाता है। ये उत्तराखंड, लद्दाख, गोरखा, अरुणाचल और सिक्‍किम की पहाड़ियों में युद्ध करने में माहिर हैं। पहाड़ों पर आर्टिलरी और मिसाइल के निशाना चूक जाने की आशंका अधिक होती है। ऐसे में माउंटेन फोर्स की तैनाती से सेना को बड़ी ताकत मिली है।”

इंडिया टुडे ने एक अधिकारी के हवाले से बताया है कि प्वाइंट 14 को लेकर हुई लड़ाई के बाद से गलवान घाटी और पैंगोंग लेक में दोनों देशों के बीच तनाव जारी है। 15 जून के बाद से स्थिति में कोई बदलाव नहीं आया है। दोनों सेनाओं के बीच विश्वास की कमी आई है। यहाँ निचले हिस्सों में टैंक और तोपों की भी तैनाती की गई है।

भारत ने किसी भी परिस्थिति से निपटने के लिए सभी विकल्पों को खोल दिया है। साथ ही अपनी सेना को खुली छूट दी है। इससे साफ है कि भारत पैंगोंग लेक में विशेष अभियान शुरू कर सकता है।

लेह के रिटार्यड कर्नल सोनम वांगचुक ने कहा कि हमें लद्दाख स्काउट्स की बटालियनों को और बढ़ाना चाहिए, क्योंकि स्काउट्स के सैनिक इस क्षेत्र से संबंधित हैं, वे जगह और पर्यावरण के अनुकूल हैं और इलाके से परिचित भी हैं जो हमारे लिए बेहद महत्वपूर्ण है।

आपको बता दें कि 15 जून को गलवान घाटी में चीनी सेना के साथ हुई हिंसक झड़क में भारत के 20 सैनिक वीरगति को प्राप्त हो गए थे। इसके बाद से ही सीमा पर तनाव जारी है। भारत ने अपने सैनिकों को खुली छूट देते हुए तीनों सेनाओं को हथियार खरीदने के लिए 500 करोड़ रुपए के आपात फंड को भी मंजूरी दी।

असम में अब सौरभ दास की निर्मम हत्या, सेसा नदी में फेंकी लाश: रहीमुद्दीन, बहादुर अली समेत 3 गिरफ्तार

असम के डिब्रूगढ़ जिले के लेजाई में एक और हिन्दू युवक की हत्या के बाद तनाव फैल गया है। मृत युवक की पहचान सौरभ दास के रूप में हुई है। जानकारी के मुताबिक शुक्रवार (जून 19, 2020) रात बदमाशों ने सौरभ की हत्या कर लाश कथित तौर पर सेसा नदी में फेंक दी।

पुलिस ने हत्या के सिलसिले में रहीमुद्दीन अली और बहादुर शाह अली समेत तीन लोगों को गिरफ्तार किया है। उनसे पूछताछ की जा रही है।

स्थानीय लोगों के अनुसार, सौरभ की हत्या लव अफेयर संबंधी विवादों में हत्या की गई है। वहीं कुछ लोगों का कहना है कि सौरभ शुक्रवार यानी हत्या वाले दिन रहीमुद्दीन अहमद के घर गया था और उनके बीच गर्मागर्म बहस हो गई थी।

एक स्थानीय निवासी ने कहा, “यह एक पूर्व नियोजित हत्या है। हम घटना की उचित जाँच की माँग करते हैं। हम तब तक चुप नहीं रहेंगे, जब तक दोषियों को सख्त सजा नहीं मिल जाती।”

लेजाई के एक अन्य निवासी ने कहा, “हम अब ऐसी घटनाओं को बर्दाश्त नहीं करेंगे। हम दोषियों को मृत्युदंड देने की माँग करते हैं। अगर हमारी माँग पूरी नहीं हुई, तो हम आंदोलन तेज करेंगे।”

सौरभ दास की हत्या के विरोध में शनिवार (जून 20, 2020) को लेजाई क्षेत्र के निवासियों ने राष्ट्रीय राजमार्ग 37 को ब्लॉक कर दिया और टायर जलाकर विरोध दर्ज कराया। उत्तेजित भीड़ ने दोषियों को मृत्युदंड देने की माँग की।

इस बीच, डिब्रूगढ़ जिला प्रशासन ने लेजाई और बोर्डोइबाम क्षेत्रों में बिगड़ती कानून-व्यवस्था को देखते हुए जिले में धारा 144 लागू कर दी गई है। इस आदेश का उल्लंघन करना धारा 188 आईपीसी के तहत दंडनीय है।

गौरतलब है कि इससे पहले 22 मई को सनातन डेका की साइकिल दो युवकों की स्कूटी से टकराई और स्कूटी पर खरोंच आ गई थी। स्कूटी चालकों को वह मामूली सी खरोंच देखकर इतना गुस्सा आया कि पहले उन्होंने सनातन को खुद पीटा और फिर अपने तीन अन्य साथियों को बुलवाकर उसे इतना मारा कि उसकी मौके पर ही मौत हो गई। पुलिस ने इस मामले में फैजुल हक और युसूफउद्दीन अहमद को गिरफ्तार किया था।

इसके बाद 29 मई 2020 को 23 वर्षीय देबाशीष गोगोई की मॉब लिंचिंग करके हत्या कर दी गई थी। देबाशीष के पिता ने बताया कि उनकी आँखों के सामने ही उनके बेटे को मारा-पीटा जाता रहा। इस मामले में आसिफ नायक, अशोक सावरा, सचिन सावरा और राधेश्याम कुर्मी चौकीदार दीपक छाबरा को गिरफ्तार किया गया था। इसी तरह मुस्लिम युवकों ने रितुपर्णा नाम के युवक की दिनदहाड़े हत्या कर कर दी थी। मामले में दुलाल अली, इब्राहिम अली, इब्राहिम की अम्मी मनोवर खातुन, हुसैन अली और अरमान अली को गिरफ्तार किया गया था

गालीबाज कर्मचारी पर एक्शन लेने की बात पर फेसबुक ने साधी चुप्पी, सवालों का जवाब देने से किया इनकार

सोशल मीडिया पर आपत्तिजनक टिप्पणी करने के कारण ऑपइंडिया ने पिछले दिनों प्रशांत किशोर के साथ काम करने वाले सिद्धार्थ मजूमदार नाम के युवक पर रिपोर्ट की थी। खबर में हमने उस युवक का कनेक्शन न केवल प्रशांत किशोर से पाया, बल्कि ये भी बताया कि ट्विटर पर अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल करने वाला यह युवक फेसबुक का ही कर्मचारी है।

इस खबर के बाद फेसबुक ने ऑपइंडिया की रिपोर्ट पर संज्ञान लिया। ऑपइंडिया की रिपोर्ट पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए फेसबुक ने हमसे बताया कि ऐसे मामलों को फेसबुक बेहद गंभीरता से लेता है। हालाँकि जब हमने उनसे आधिकारिक तौर पर संपर्क करके पूछा कि अब उस गालीबाज कर्मचारी के ऊपर क्या एक्शन लिया जाएगा, तो उन्होंने हमें ये बताने से मना कर दिया।

18 जून को ऑपइंडिया ने सिद्धार्थ मजूमदार पर अपनी रिपोर्ट में बताया था कि कैसे सिद्धार्थ अपने विरोधियों पर न्यायसहाय नाम के अपने अलग अकाउंट के जरिए अभद्र टिप्पणी करता है। कैसे एक के बाद एक सिरों को जोड़ते हुए हम उसकी हकीकत तक पहुँचे। हमने एक आर्टिकल के जरिए पहले उसका पुराना अकाउंट जाँचा, जो sid_mazumdar के नाम से ही था।

इसके बाद हम सिद्धार्थ के कुछ अन्य आर्टिकल्स तक पहुँचे। धीरे-धीरे पता चला कि वह Citizens for Accountable Governance का संस्थापक है और प्रशांत किशोर के साथ काम भी करता है। आगे की पड़ताल में हम उसके linkendIn के अकाउंट पर गए। यहाँ से हमें पता चला कि वह तो फेसबुक से जुड़ा हुआ है। वो भी पब्लिक पॉलिसी मैनेजर के पद पर।

इसके बाद सिद्धार्थ की हकीकत की सारी तस्वीर साफ होती गई। मालूम चला कि आखिर कैसे एक फेसबुक कर्मचारी दूसरे अकाउंट से भारतीयों को नीचा दिखाता है। मोदी सरकार का अपमान करता है और हिंदुओं की भावनाओं से ख़िलवाड़ करता है।

सारी सूचना इकट्ठा कर हमने सोशल मीडिया साइट से आधिकारिक तौर पर ई-मेल के जरिए संपर्क किया। पूछा कि देश की अखंडता को हानि पहुँचाने वाले अपने पब्लिक पॉलिसी मैनेजर के ख़िलाफ़ वे क्या एक्शन लेने वाले हैं?

ऑपइंडिया ने इस संबंध में फेसबुक 5 सवाल किए

  1. क्या फेसबुक को इस घटना के बारे में मालूम था?
  2. क्या सिद्धार्थ के फेसबुक से जुड़ने से लेकर अब तक उनके गाली वाले ट्वीट फेसबुक के लिए चिंता का कारण हैं? क्या फेसबुक उनके ख़िलाफ़ कोई लीगल एक्शन लेने की सोच रहा है?
  3. क्या फेसबुक को लगता है कि राजनीति में सक्रिय व्यक्ति अपने कार्यों का निर्वाहन करते हुए निष्पक्ष रह सकता है?
  4. ट्विटर पर इस बात पर जोर दिया गया है कि फेसबुक ऐसे गालीबाज और पक्षपाती कर्मचारियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई करे- क्या फेसबुक इसे लेकर कोई कार्रवाई करेगा?
  5. क्या फेसबुक के पास सोशल मीडिया के उपयोग के लिए कोई विशिष्ट नीति है जो उसके कर्मचारियों पर लागू होती है? यदि हाँ, तो नीति क्या है और सिद्धार्थ मजूमदार के आचरण से उस नीति का उल्लंघन होता है क्या?

मगर, हमारे सवालों का जवाब देने के बजाय उन्होंने ट्विटर पर एक छोटा सा बयान जारी कर दिया। इसमें उन्होंने लिखा कि ये मामला हमारे संज्ञान में आ चुका है। हम अपने सारे कर्मचारियों से नैतिक आचार संहित का पालन करने की उम्मीद करते हैं और फेसबुक इन मामलों को बहुत गंभीरता से लेता है।

फेसबुक प्रवक्ता की ओर से ये रिप्लाई पाने के बाद हमने बयान जारी करने वाले प्रवक्ता से ही बात करने का प्रयास किया। दरअसल, हम जानना चाहते थे कि क्या सिद्धार्थ के ख़िलाफ़ कोई जाँच होगी भी या उससे कोई सवाल भी पूछे जाएँगे?

हालाँकि, यहाँ फेसबुक ने हमारे पहले सवालों का जवाब देना मुनासिब नहीं समझा। लेकिन, दूसरी बार में जब एक्शन पर सवाल किया तो सफाई के तौर पर जवाब आया कि फेसबुक अपनी कार्रवाई को सार्वजनिक तौर पर नहीं बता सकता।

अब विचार योग्य बात ये है कि जिस फेसबुक ने हमारी रिपोर्ट को संज्ञान में लेते हुए बयान जारी किया कि फेसबुक ऐसे मामलों पर गंभीरता से लेता है, उसी फेसबुक में सिद्धार्थ मजूमदार अभी भी सार्वजनिक नीति प्रबंधक हैं। तो सवाल है कि ऐसी क्या कार्रवाई की जाने वाली है, जिसकी पुष्टि फेसबुक वर्तमान में नहीं कर सकता?

सिद्धार्थ मजूमदार का हालिया ट्वीट

सबसे दिलचस्प बात देखिए। हमारी रिपोर्ट के बाद और फेसबुक के संज्ञान में आने के बाद अब भी सिद्धार्थ मजूमदार लगातार ट्विटर पर जहर उगल रहा है और सुप्रीम कोर्ट जाकर एक स्वतंत्र जाँच आयोग की बात कर रहा है, क्योंकि उसे लगता है कि चीन के मामले में सरकार भ्रामक बयान दे रही है। अब देखना यही है कि क्या फेसबुक सभी चीजों की जानकारी होने के बावजूद भी उसपर एक्शन लेती है या फिर नहीं।

‘तुम्हारे लेख भड़काऊ और उत्तेजक हैं’: पत्रकारों पर FIR के बाद अब कॉन्ग्रेस ने फर्स्टपोस्ट को भेजा कानूनी नोटिस

अपने शासन वाले विभिन्न राज्यों में पत्रकारों के ख़िलाफ़ एफआईआर कराने वाली कॉन्ग्रेस ने अब फर्स्टपोस्ट को लीगल नोटिस भेजा है। मानहानि के क़ानूनी नोटिस में पार्टी ने आरोप लगाया है कि फर्स्टपोस्ट के लेख न सिर्फ़ उत्तेजक हैं, बल्कि भड़काऊ और समाज में वैमनस्य पैदा करने वाले हैं।

कॉन्ग्रेस के राज्यसभा सांसद विवेक तन्खा ने कहा कि मीडिया को सत्ताधारी पार्टी का प्रवक्ता बनने से बचना चाहिए और अपनी लिमिट में रहना चाहिए। उन्होंने फर्स्टपोस्ट को लीगल नोटिस भेजे जाने की सूचना देते हुए ट्विटर पर पूर्व केंद्रीय मंत्री पी चिदंबरम, कपिल सिब्बल और कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी को टैग किया। इसके बाद लोगों ने कॉन्ग्रेस पार्टी की ख़ासी आलोचना करते हुए कहा कि पार्टी फ्री स्पीच पर वार कर रही है।

पत्रकार अभिजीत मजूमदार ने कहा कि ये कॉन्ग्रेस की स्टाइल का ‘फ्रीडम ऑफ एक्सप्रेशन’ है। साथ ही उन्होंने फर्स्टपोस्ट के लिए लिखे गए अपने उस लेख को भी शेयर किया, जिसमें उन्होंने कॉन्ग्रेस की तुलना एक ऐसे खानदानी अमीर व्यक्ति से की है जो भले ही ग़लत जॉब में घुस गया हो, लेकिन वो पब सर्किट में लोकप्रिय है और सोशल मीडिया पर भले उत्तेजक बातें लिख कर कमेंट कमाता हो, लेकिन ज़रूरत पड़ने पर उसे अपने फोन में एक अदद नंबर तक ढ़ूँढ़ने के लिए संघर्ष करना पड़ता है।

उन्होंने अपने इस लेख में ध्यान दिलाया कि किस तरह राहुल गाँधी ने एक घायल सैनिक के पिता का वीडियो शेयर कर नरेंद्र मोदी पर निशाना साधा था। बाद में उनकी बेइज्जती तब हो गई जब सैनिक के पिता ने राहुल गाँधी को राजनीति न करने की सलाह दी। उन्होंने राहुल गाँधी द्वारा नरेंद्र मोदी को ‘सरेंडर मोदी’ बताए जाने का भी जिक्र किया। उन्होंने दिखाया कि किस तरह वो भारत विरोधी पक्ष ले रहे हैं।

हालाँकि, इस विषय में एडिटर्स गिल्ड ने कुछ नहीं कहा है। जब पत्रकार अर्नब गोस्वामी से मुंबई पुलिस ने 11 घंटे लगातार पूछताछ की थी, तब भी एडिटर्स गिल्ड ने चुप्पी साध ली थी। पश्चिम बंगाल में पत्रकारों पर हमले पर भी गिल्ड चुप ही रहता है। बता दें कि महाराष्ट्र में कॉन्ग्रेस सत्ताधारी पार्टी है। पत्रकार सुधीर चौधरी को मिल रही धमकियों और अमीश देवगन को मिली जान से मारने की धमकियों पर भी गिल्ड चुप रहा था।

ट्रांसजेंडर समुदाय को समर्पित होगा नोएडा सेक्टर-50 मेट्रो स्टेशन, मिलेगी नौकरी के साथ विशेष सुविधाएँ

नोएडा मेट्रो रेल कॉरपोरेशन (NMRC) पूरे उत्तर भारत में एक अनोखी और सराहनीय पहल करने जा रहा है। इसके तहत नोएडा-ग्रेटर नोएडा की एक्वा लाइन मेट्रो के सेक्टर-50 स्टेशन को ट्रांसजेंडरों के लिए समर्पित किया जाएगा।

यहाँ ट्रांसजेंडर समुदाय को विशेष सुविधाएँ दी जाएँगी। रोजगार के अवसर दिए जाएँगे। ट्रांसजेंडर समुदाय की समाज में भागीदारी बढ़ाने के लिए मेट्रो स्टेशन पर टिकट काउंटर, हाउस कीपिंग सर्विस में भी ट्रांसजेंडर्स की ही तैनाती की जाएगी

इसका उद्देश्य समाज में ट्रांसजेंडरों की भूमिका को बढ़ावा देना है। NMRC की निदेशक रितु माहेश्वरी ने बताया कि यह ट्रांसजेंडर स्टेशन भी पिंक स्टेशन की तर्ज पर होगा। पिंक स्टेशन का उद्घाटन 8 मार्च 2020 को किया गया था। जिसमें एनएमआरसी ने महिलाओं के लिए खास इंतजाम किए थे। इसी तर्ज पर सेक्टर-50 स्टेशन ट्रांसजेंडरों को समर्पित होगा। हालाँकि यह सभी प्रकार के यात्रियों के लिए खुला रहेगा।

उन्होंने बताया कि इस स्टेशन पर बने शौचालयों के स्ट्रक्चर में बदलाव किया जाएगा। साथ ही ट्रांसजेंडर समुदाय के लिए अलग सुरक्षा जाँच पर भी विचार किया जा रहा है। उनका कहना है कि अगले एक महीने में नोएडा सेक्टर-50 मेट्रो स्टेशन ट्रांसजेंडर स्टेशन के रूप में तैयार हो जाएगा।

ट्रांसजेंडरों के लिए होंगी यह सुविधाएँ

  • एनएमआरसी द्वारा अपने स्टेशनों व ट्रेनों के अंदर सूचनाओं व घोषणाओं के जरिए ट्रांसजेंडर समुदाय के प्रति लोगों में जागरूकता फैलाने की पहल की जाएगी।
  • नोएडा मेट्रो अपने स्टॉफ को ट्रांसजेंडर समुदाय से सौहार्दपूर्ण और संवेदनशील तरीके से व्यवहार करें। इसके लिए उन्हें प्रशिक्षित भी किया जाएगा।
  • एनएमआरसी टिकट काउंटरों व अन्य क्षेत्रों में ट्रांसजेंडर समुदाय की सहभागिता सुनिश्चित की जाएगी।
  • इसके लिए ट्रांसजेंडर समुदाय के लोगों को मेट्रो स्टाफ की तर्ज पर प्रशिक्षण दिया जाएगा।
  • इसके लिए विभिन्न स्वयंसेवी संगठनों से बातचीत की जा रही है। ताकि ट्रांसजेंडर समुदाय की चुनौतियों को कम किया जा सके।

बता दें कि नोएडा-ग्रेटर नोएडा एक्वा मेट्रो लाइन ने इसी साल 8 मार्च को मेट्रो स्टेशन को महिलाओं को समर्पित करते हुए पिंक बनाया गया था। इस स्टेशन पर महिलाओं के लिए स्तनपान से लेकर सभी प्रकार की सुविधाएँ उपलब्ध हैं। इसके साथ ही यहाँ पर काफी संख्या में महिला कर्मचारी भी कार्यरत हैं।

रेजांग ला का युद्ध: जब 123 भारतीय जवानों ने 3000 चीनी सैनिकों को दी मात, 1300 की लाशें बिछा दी

कुछ लोगों ने भारत-चीन तनाव के बीच देश को डराने का ठेका ले रखा है। ये वो लोग हैं, जो चीन का गुणगान करते हुए उसे अजेय बताते हैं और भारत के बारे में ऐसे बात करते हैं जैसे हमारी सेना की शक्ति कुछ हो ही नहीं। ये वही लोग हैं, जो चाहते हैं कि आप 1962 भारत-चीन युद्ध में लद्दाख के रेजांग ला दर्रा के युद्ध को भूल जाएँ। वो चाहते हैं कि आप भारतीय सेना के गौरवमयी अतीत को भूल कर डर के साए में जिएँ।

रेजांग ला युद्ध उस लड़ाई की गाथा है, जिसके बारे में कई लोगों ने तो ये मानने से भी इनकार कर दिया था कि हमारी सेना ने इतनी बड़ी संख्या में चीनियों को मार गिराया होगा। ये युद्ध नवंबर 18, 1962 को हुआ था। 13 कुमाऊँ रेजिमेंट के मेजर शैतान सिंह के नेतृत्व में 123 सैनिक बहादुरी के प्रतिमान गढ़ इतिहास में दर्ज हो गए। कुछ ऐसा ही, जैसा सारागढ़ी किले को बचाने के लिए मुट्ठी भर सिख सैनिकों ने किया था

रेजांग ला युद्ध में भारत के 6 सैनिक ही बच पाए, जिन्होंने समय-समय पर अपने अनुभवों और साथियों की बहादुरी से दुनिया को अवगत कराया। 13 कुमाऊँ रेजिमेंट की चार्ली कम्पनी ने चुसुल में मुस्तैद होकर चीनियों के आक्रमण को ध्वस्त किया, जिससे लद्दाख शेष भारत से अलग होने से बच गया। मेजर (रिटायर्ड) गौरव आर्या अपने ब्लॉग पर लिखते हैं कि 13 कुमाऊँ रेजिमेंट को बारामुला से युद्धस्थल पर भेजा गया था।

गन हिल, गुरुंग पहाड़ी और मुग्गेर पहाड़ियों पर विभिन्न बटालियनों को तैनात किया गया था। इसी तरह चार्ली कम्पनी को रेजांग ला का जिम्मा सौंपा गया था। हड्डी गला देने वाली ठंड, शीत लहर और पत्थरों के बीच हमारे जवान उस परिस्थिति में लड़े, जिसके वे आदी नहीं थे। समुद्र से 16,000 फ़ीट की ऊँचाई पर उनके पास न तो कवर था और न सपोर्ट के लिए कोई और दस्ता। सबसे पहले 9वें पलटन पर 350 चीनी सेना ने आक्रमण किया।

चीनी जैसे ही नजदीक पहुँचे, भारतीय सेना के जवानों ने ऐसा आक्रमण किया कि वहाँ केवल चीनी सैनिकों की ही लाशें नज़र आईं। मेजर शैतान सिंह एक पलटन से दूसरे पलटन तक घूम-घूम कर स्थिति की समीक्षा कर रहे थे और सैनिकों का हौसला बढ़ा रहे थे। कहते हैं कि उन्होंने ऐसा युद्ध किया था कि उन्हें अपने शरीर, अपनी सुरक्षा और अपने आसपास का कुछ भान ही नहीं था। हालाँकि, इस युद्ध में 7वें और 8वें पलटन का एक भी जवान जिन्दा नहीं बचा, सब बलिदान हो गए।

मेजर गौरव आर्या ने अपने ब्लॉग में चीनी सैनिकों की संख्या 3000 के करीब बताई है। हालॉंकि इस युद्ध में जीवित बचे सैनिकों के अनुसार चीनी 5-6 हजार की संख्या में थे। चीनियों के पास अत्याधुनिक हथियार थे और बैकअप के रूप में भी उन्होंने पूरी तैयारी की हुई थी। रामचंद्र यादव और निहाल सिंह उनमें से थे, जो जिन्दा बच गए। उन्होंने भारत-चीन 1962 युद्ध के 50 वर्ष पूरे होने के मौके पर ‘एनडीटीवी 24×7’ के शो ‘वॉक द टॉक’ में बताया था कि चूँकि कोई उनकी बातों का विश्वास ही नहीं कर रहा था कि उनलोगों ने चीनियों को इतनी भारी क्षति पहुँचाई है, उन्हें कोर्ट मार्शल किए जाने तक की धमकी दी गई थी।

यादव, शैतान सिंह के रेडियो मैन थे और निहाल लाइट मशीनगन के साथ उनके गार्ड थे। उन्होंने बताया था कि 50 साल बाद भी युद्ध के उन दृश्यों को याद कर उन्हें नींद नहीं आती। निहाल ने गोली लगने के बाद अपने मशीनगन को दूसरे सैनिकों को प्रयोग के लिए दे दिया।

चीनियों ने उन्हें बंकर से निकाल कर बँधक बना लिया था। हालाँकि, वो अँधेरे का फायदा उठा कर वहाँ से भाग निकले। भागने के बाद उन्हें चीनियों की फायरिंग की आवाज़ सुनाई दी थी।

वे दोनों कहते हैं कि भले ही राजस्थान के मेजर शैतान सिंह का नाम जो भी हो, वो भगवान से कम नहीं थे। उन दोनों ने इस बात की पुष्टि की थी कि उस दिन 114 जवानों ने 1300 चीनियों को मार गिराया था। अंत में दोनों सेनाओं के बीच ‘हैंड टू हैंड कॉम्बैट’ हुआ, लेकिन उसमें भी भारतीय सेना ने चीनियों के छक्के छुड़ा दिए थे। सबसे पहले पलटन 7 पर हमला किया गया था। वो ऊपर चढ़ना चाह रहे थे और उन्होंने सबसे आगे वाली पलटन 9 पर हमला नहीं किया, सीधा 7 पर किया।

वीर चक्र पाने वाले नाइक सिंह राम के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने अपने साथियों के साथ चाकू लेकर चीनी सैनिकों पर हमला बोला था। हालाँकि, चीनी सैनिकों ने बचाव की पूरी तैयारी कर रखी थी और चाकू या ब्लेड से बार-बार वार करने के बावजूद उनका बाल भी बाँका नहीं हो रहा था। इसके बाद राम सिंह ने चीनी सैनिकों का सिर पकड़ कर पत्थर पर मारना शुरू कर दिया। वो पहलवान भी थे और इस युद्ध में सिद्धहस्त थे।

रामचंद्र यादव ने ही बताया था कि उन्होंने मेजर शैतान सिंह की मृत्यु अपनी आँखों के सामने देखी थी। वो ऐसी घड़ी पहनते थे, जो नाड़ी की धड़कन के साथ चलती थी और उसके बंद होते ही घड़ी भी बंद। जब वो दिल्ली पहुँचे तो कमांडर ने ही उनकी बातों पर यकीन करने से इनकार कर दिया और उन्हें कोर्ट मार्शल की धमकी दी। कहते हैं, भारतीय सैनिकों का मृत शरीर वहाँ पड़ा हुआ था और वो नजारा बड़ा ही ह्रदय विदारक था।

किसी के हाथ में ग्रेनेड पड़ा हुआ था और वो बलिदान हो गया था। किसी ने मृत्यु के बाद भी हाथ से मशीनगन नहीं छोड़ा था। कइयों ने मरने के बाद भी मुट्ठी में चाकू जकड़े हुए थे। लेकिन, उन्होंने चीनियों को रोक लिया था और लद्दाख बच गया। चीनियों को सबसे पहले ऊपर आते हुए नाइक हुकुम चंद ने देखा था। रात के अँधेरे में आगे बढ़ते चीनियों को रोकने के लिए उन्होंने फायरिंग रेंज खोली और उनके मंसूबों को नाकाम कर उनकी पहली लाइन को ध्वस्त किया।

इस युद्ध के बाद लता मंगेशकर ने भी ‘एक-एक ने दस को मारा’ गाना गाकर बलिदानी जवानों को श्रद्धांजलि दी थी। रामचंद्र द्वारा सुनाए गए एक वाकए के अनुसार जब उन्होंने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण के आशीर्वाद से वो लड़ेंगे तो मेजर शैतान सिंह ने कहा कि उनका सरनेम भाटी है तो क्या हुआ, वो भी एक यादव हैं और उसी जज्बे से लड़ रहे हैं। वो इसी तरह सारे जवानों का आत्मविश्वास को मजबूत किया करते थे।

इसीलिए, जब भी कोई आपके सामने चीन को अजेय बताए, तो उसे रेजांग ला याद दिलाएँ। जब कोई चीनी सैनिकों का डर दिखाए तो उसे मेजर शैतान सिंह और कुमाऊँ रेजिमेंट द्वारा लद्दाख को बचाने के लिए किए गए युद्ध की याद दिलाएँ। उन्हें बताएँ कि जब भारत-चीन युद्ध में हमारी हार की बात होती है, तो इस मोर्चे पर चीन कितनी बुरी तरह परास्त हुआ था, ये भी बच्चों को पढ़ाया जाना चाहिए।