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‘जस्टिस’ रवीश कुमार नींद से नहीं जागना चाहते क्योंकि उन्हें वही ‘दंगा साहित्य’ पसंद है जो वास्तविकता से अलग है

लप्रेक के रचनाकार रवीश कुमार का कहना है कि दिल्ली दंगों की चार्जशीट को साहित्य की नजर से देखना चाहिए। उनका कहना है कि ये चार्जशीट पढ़ने में अच्छी लगती हैं और इसी तरह बनाई भी गई हैं। जबकि लोग आज तक ‘जस्टिस’ रवीश कुमार को ही साहित्य की नजर से देख पाने में नाकाम रहे हैं।

रवीश ने ये भी कहा है कि आलोक धन्वा की लड़कियों के लिए लिखी गई कविता ‘भागी हुई लड़कियाँ’ को लड़कों को नहीं पढ़ना चाहिए क्योंकि उन्हें लड़कों से कोई उम्मीद नहीं है। लेकिन ‘फैज-परस्त’ यह वामपंथी प्रोपेगेंडाकार यह नहीं बताता है कि आलोक धन्वा ने अपनी कविता में ‘लड़कियों’ का जिक्र किया था, जिनका जिहादी मानसिकता से कोई लेना देना नहीं होता।

आलोक धन्वा की कविता की लड़कियाँ वो लड़कियाँ होती हैं, जो ‘फक हिंदुत्व’ के नारे नहीं लगातीं, या फिर जिन्हें शाहीन बाग़ में मोदी और अमित शाह को भद्दी गाली देने के लिए ‘लड़की’ नहीं होना पड़ता है, जिन्हें सस्ती लोकप्रियता, टीवी डिबेट का हिस्सा बनने और एक ‘विचारक’ वर्ग की वाहवाही के लिए या फिर उनके मानकों पर खरा उतरने के लिए हिन्दुओं की आस्था को गाली नहीं देनी होती हैं। आलोक धन्वा की कविता की लड़कियाँ वो लड़कियाँ होती हैं, जो दुर्भाग्य से रवीश कुमार जैसे एजेंडाबाजों द्वारा अपने कुतर्क को सही साबित करने के लिए इस्तेमाल की जाती हैं।

NDTV न्यायालय के न्यायमूर्ति रवीश कुमार के कल शाम प्राइम टाइम का प्रमुख किरदार अमूल्या थी। वही अमूल्या, जो फरवरी माह में ओवैसी के मंच से पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगाते हुए देखी गई थी। धीरे-धीरे लप्रेकी रवीश कुमार की कहानी में वही चिरपरिचित किरदारों के नाम सामने आने लगे। ये नाम थे – ‘गर्भवती’ सफूरा जरगर, उमर ख़ालिद, पिंजड़ा तोड़ गिरोह, लदीदा फरजाना।

यह देखना भी दिलचस्प है कि जो वामपंथ समाज के ताने-बाने को ठुकराता है, उसका उपहास करता है, जो भाई-बहन, माँ-बाप के रिश्ते से सबसे ऊपर सिर्फ ‘साथी कसम’ को रखता है, वह कुछ दिनों से एक लड़की को ‘लड़की’ होने से ज्यादा उसके गर्भ को महत्त्व दे रहा है, मानो सफूरा जरगर कभी विषय थी ही नहीं और विषय उसका गर्भ रहा हो।

जिन अपराधियों को निर्दोष बताने के लिए रवीश कुमार इस्लामिक कट्टरपंथी लदीदा फरजाना जैसों का सहारा लेना पड़ रहा हो, वो खुद उस संक्रामक विचारधारा से किस स्तर तक प्रभावित होंगे यह अंदाजा लगाया जा सकता है।

लेकिन ‘न्यायमूर्ति’ रवीश कुमार के इस दंगा साहित्य से क्रूरता से काट दिए जाने के बाद जलती आग में झोंक दिए गए 20 साल के दिलबर नेगी का जिक्र गायब था, ना ही 51 बार चाकुओं से गोदने के बाद नाले में फेंक दीए गए IB अधिकारी अंकित शर्मा का इसमें जिक्र किया गया। रवीश कुमार के करीब 45 मिनट तक चले इस दंगा साहित्य में पेट्रोल बम गायब थे, आसमानी गुलेलों का जिक्र नहीं था, पत्थरबाजी नहीं थी और ना ही इसमें काफ़िरों को सबक सिखाने वाले नारों का जिक्र था।

रवीश कुमार के सोशल मीडिया एकाउंट्स पर नजर आ रही हरकतों से देखा जा सकता है कि उनके निशाने पर अब पूरी तरह से देश के युवा हैं। यानी, ‘कूल अंग्रेजी’ संगीत पसन्द करने वाले युवा, कॉलेज, लाइब्रेरी बैठने वाले युवा। ये 18-25 वर्ष की उम्र का वो वर्ग होता है जो रियलिटी शो में बैकग्राउंड में बजने वाली गम्भीर धुन पर भावुक हो जाता है और जिंदगी में पहली बार जीवन और मृत्यु, अमीर बनाम गरीबी जैसे दार्शनिक मुद्दों पर लगभग एक-आध दिन चिन्तन करता है। वही युवा जो गिटार के साथ जब तक कुछ शब्द ना बोले जाएँ, उन्हें कविता नहीं मानता।

रवीश कुमार वामपंथ के नशे को अच्छी तरह जानते हैं। वही वामपंथ जो दंगों को ‘क्राफ्ट’ बताता है। इसलिए अब वो प्राइम टाइम में भी भावुक धुनों पर कविता करने लगे हैं। वो समय दूर नहीं जब वे युवाओं को प्रभावित करने के लिए प्राइम टाइम में लूडो खेलते हुए भी देखे जाएँगे।

कल के प्राइम टाइम में आलोक धन्वा की कविता ‘भागी हुई लडकियाँ’ के जरिए ‘न्यायमूर्ति’ रवीश कुमार ने दिल्ली दंगों में सभी आरोपितों को निर्दोष घोषित कर दिया है। उनका कहना है कि पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे चिंता का विषय नहीं होने चाहिए इसलिए अमूल्या निर्दोष है।

शो के आगे बढ़ने पर इसमें नए किरदार दिखते हैं, जिसे सफूरा जरगर के साथ गर्भवती भी बताया जाता है। रवीश कुमार ये बताना भूल गए कि दिल्ली में हुए जिन हिन्दू विरोधी दंगों की साजिश में सफूरा जरगर दोषी पाई गई हैं, उन दंगों में कई ऐसे मासूम प्रभावित हुए हैं। निर्दोषों को इस्लामिक नारों के साथ मार-काट दिया गया। वामपंथी विचारधारा के अकेले ध्वजवाहक रवीश कुमार ने इसके पीछे तर्क दिया है कि ये लोग ‘बस ट्रम्प के जरिए दुनिया का ध्यान ही तो आकर्षित करना चाहते थे।

दंगाप्रिय वामपंथी इस ‘अटेंशन’ के लिए पूरी दिल्ली को जला सकते हैं। लोगों को घसीटकर उन्हें बर्बरता से मार सकते हैं। छतों से ‘काफ़िरों’ पर पेट्रोल बम बरसा सकते हैं और पत्थरबाजी तो मानो ये अब मौलिक अधिकार समझने लगे हैं।

इस शो में रवीश कहते हैं कि JNU छात्र उमर खालिद ही क्यों बार-बार सामने आ जाते हैं। और जब उन पर गोली चलाई गई थी, तब किसीने उस घटना पर ध्यान क्यों नहीं दिया था? यहाँ पर यह बताना भी जरूरी है कि जिस एकमात्र प्राणी को उस समय उमर खालिद पर गोली लगने का गवाह बताया गया था, वह खालिद सैफ़ी भी कुछ ही दिनों पहले दिल्ली दंगों में आरोपित पाया गया है और ताहिर हुसैन और रवीश कुमार के प्रिय छात्र उमर खालिद के बीच दंगों की मीटिंग करवाने का मुख्य आरोपित है।

कविताओं के जरिए भारत के सांस्कृतिक गौरव का उपहास करने से यदि आत्ममुग्ध रवीश कुमार को फुर्सत मिले, तो उन्हें इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि वो अब बचपन में सुनाया गया कोई वो घिसापिटा चुटकुला बन कर रह गए हैं, जिसे सुनाने में भी इंसान को लज्जा महसूस करनी चाहिए, बावजूद इसके रवीश उसे उसी शान से रोजाना घिसते रहते हैं।

उन्होंने अपने प्राइम टाइम में बेहद चालाकी से बताया कि दंगों की क्रोनोलॉजी जामिया में पुलिस द्वारा छात्रों को पीटने से हुई थी लेकिन इन मासूम छात्रों की पत्थरबाजी के हुनर पर दो शब्द भी नहीं रखे। उन्होंने यह नहीं बताया कि उन मासूम छात्रों के अंदर लाइब्रेरी में बैठकर पत्थरों को बटुआ बना देने का चमत्कारी गुण भी मौजूद है, जिन्हें रवीश कुमार अब अपनी TRP का आखिरी विकल्प बनाने का प्रयास कर रहे हैं।

सत्ता विरोध करना, संस्थाओं को झूठा साबित करना, गुनहगारों को दंगा साहित्य की शरण देना ही रवीश के पास अब प्रासंगिक रहने का आखिरी हथियार बाकी रह गया है। या फिर यह भी सम्भव है कि रवीश आज भी नेहरू-इंदिरा के अहंकार के उस दौर से आतंकित हैं, जब मनचाहे तरीकों से सत्ता, समाज और संस्थाओं को अपने नियंत्रण में रखा करती थी। लप्रेकी रवीश इस नींद से जागना नहीं चाहते क्योंकि उन्हें ‘दंगा साहित्य’ पसंद है।

वामपंथी उदारवादियों के प्रपंचकारियों के इस शगल की भेंट हमेशा से कितने ही बेकसूर अपनी जान गंवा देते हैं। कितने ही युवा इन दंगों में अपना भविष्य तलाशना शुरू कर देते हैं। फिर एक समय आता है, जब ये लोग वास्तव में यकीन करना शुरू कर देते हैं कि सत्ता और समाज तो वाकई में उनका दुश्मन है और वो इसे तबाह करने के हर षड्यंत्र का हिस्सा बनना चाहते हैं।

एर्टुग्रुल: एक सिरफिरा लुटेरा, हत्यारा और बलात्कारी कैसे बन गया दक्षिण एशिया के मुस्लिमों का नायक?

पिछले दिनों तुर्की के एक टेलीविजन धारावाहिक एर्टुग्रुल (Ertugrul) पर सऊदी अरब और मिस्त्र ने अपने देशों में प्रसारण पर रोक लगा दी थी। इस सन्दर्भ में मिस्त्र की सबसे प्रमुख फतवा काउंसिल ने बयान देते हुए कहा कि तुर्की इस धारावाहिक के माध्यम से मध्य पूर्व में अपना प्रभाव बढ़ाने की कोशिश कर रहा है। काउंसिल ने तुर्की के राष्ट्रपति रजब तैयब इरदुगान पर आरोप लगाते हुए कहा कि वे ‘उस्मानी साम्राज्य’ (ऑटोमन एम्पायर) को फिर से स्थापित करना चाहते है। यह अरब देशों की संप्रभुता को ख़त्म कर उन्हें उस्मानी साम्राज्य के अधीन करने की रणनीति है।

तुर्की और अरब देशों का यह टकराव कोई नया नहीं है, बल्कि इसका इतिहास शताब्दियों पुराना है। इस तथ्य को समझने के लिए हमें इस्लाम धर्म के संस्थापक पैगम्बर मोहम्मद के कालखंड को टटोलना होगा। जब 632 ईसवी में पैगम्बर का निधन हुआ, तो उनके बाद खिलाफत की शुरुआत हुई।

खिलाफत का मतलब साफ है कि सम्पूर्ण विश्व का इस्लाम ही एकमात्र धर्म रहेगा और केंद्रीय शक्ति के तौर पर एक बादशाह यानी खलीफा होगा। इस सोच के साथ पहला खलीफा अबू बकर बना, जो कि एक अरबी था। इसी के नेतृत्व में इस्लाम का प्रसार अरब से बाहर होना शुरू हुआ। दो साल के अंतर्गत फिलिस्तीन पर अरबों का कब्ज़ा हो गया। सीरिया और मेसोपोटामिया जैसी पुरानी संस्कृतियों पर भी इस्लामिक हमले शुरू हो गए।

अबू बकर के बाद उमर, उस्मान, अली और हसन को खलीफा बनाया गया। चूँकि इसका सम्बन्ध सीधे पैगम्बर मोहम्मद से था, इसलिए इस खिलाफत को राशिदुन कहा गया। इन्होंने अपनी राजधानी मदीना को बनाया। इस खिलाफत के दौर में सीरिया, फिलिस्तीन, मिस्त्र, इराक, ईरान, त्रिपोली, मंगोलिया, बुखारा, ताशकंद, समरकंद, अरमेनिया, जार्जिया और अजरबेजान पर इस्लाम का कब्जा हो चुका था।

राशिदुन खिलाफत में खलीफा हसन के दौरान आपसी तनाव चरम पर पहुँच गया था। जिसका फायदा उठाकर सीरिया के शासक मुआविया ने उम्मैय्यद खिलाफत की स्थापना की। अब इस्लाम का केंद्र मदीना की जगह दमिश्क बन गया। इस दौरान इस्लाम का फैलाव स्पेन से लेकर भारत के सिन्धु प्रदेश तक हो चुका था।

इन बीते वर्षों में उम्मैय्यद खलीफाओं ने अरबों की ताकत को लगभग ख़त्म कर दिया था। अरबों के पास अब जो कुछ बचा था, उसे अब्दुल्ला अब्बास ने 749 ईसवी में समाप्त कर दिया। अब्बास एक अफगानी मूल का था, जिसने विद्रोह कर उम्मैय्यद की जगह अब्बासिद खिलाफत की शुरुआत की।

प्रसिद्ध इतिहासकार एचजी वेल्स अपनी पुस्तक ‘ए शोर्ट हिस्ट्री ऑफ़ द वर्ल्ड’ में इस परिवर्तन का वर्णन करते हैं, “उम्मैय्या खिलाफत के सभी पुरुषों का नरसंहार कर उनके शवों को एक जगह इकट्ठा किया, फिर उस पर एक चमड़े की चादर बिछाकर अब्बास ने अपने समर्थकों के साथ खाना खाया। वस्तुतः यह शिया और सुन्नी संघर्ष था, क्योंकि उम्मैय्य्द सुन्नी थे और अब्बासिद शिया थे। खिलाफत के इस तीसरे स्वरुप- अब्बासिद की राजधानी दमिश्क के स्थान पर बग़दाद बन गई।

इस खिलाफत के दौरान दसवी-ग्यारहवीं शताब्दी में तुर्कों ने इस्लाम धर्म अपना लिया था। वे सामान्यतः घुमंतू लोग थे, जो कि दूसरी-तीसरी शताब्दी से अल्ताई पर्वत श्रृंखला, येनिसेय नदी के दक्षिण और बैकाल झील के इलाकों में घुमा करते थे। एक लम्बे अंतराल के दौरान इन तुर्कों ने एकजुट होकर अपनी राजनैतिक ताकत को मजबूत कर लिया था। इस क्रम में, दसवीं सदी के आसपास से इनके और अब्बासिद खलीफाओं के बीच मध्य एशिया में लगातार कई अभियान हुए। इन लगातार युद्धों से अब्बासिद कमजोर होते चले गए और धीरे-धीरे इस्लाम की केंद्रीय ताकत तुर्कों के पास चली गई।

इन तुर्कों में ओग़ुज़ एक प्रभावशाली जाति थी और इसमें काई कबीला सबसे प्रमुख था। एर्टुग्रुल इसी काबिले के मुखिया सुलेमान शाह का बेटा था। सुलेमान का राज्य उत्तर-पूर्वी ईरान में था। दूसरी तरफ मध्य एशिया में मंगोलों का प्रभुत्व तेजी से फैलता जा रहा था। 13वीं शताब्दी की शुरुआत में मंगोलों ने उत्तर-पूर्वी ईरान पर हमला कर दिया, जिससे सुलेमान को वहाँ से भागना पड़ा। सीरिया के रास्ते में फरात नदी को पार करते समय वह घोड़े से गिर गया और वहीं उसकी हत्या कर दी गई। एलेग्जेंडर डब्लू. हिडन अपनी पुस्तक ‘The Ottoman dynasty’ (1895) में शाह की मौत पर लिखते हैं कि उनके बेटों की मौजूदगी में उन्हें नदी में डुबाया गया था।

सुलेमान के तीन बेटों में एर्टुग्रुल सबसे छोटा था। पिता की हत्या के बाद दो बड़े भाइयों ने मंगोलों की गुलामी स्वीकार कर ली। जबकि एर्टुग्रुल को एक तुर्क-पर्शियन सेज्लुक सल्तनत की सुरक्षा का काम मिल गया। इस सल्तनत पर बाइज़ेंटाइन (पूर्वी रोमन साम्राज्य) की तरफ से लगातार हमले होते रहते थे। एर्टुग्रुल का काम इन हमलों से सल्तनत की रक्षा करना था। इसलिए उसे पश्चिमी आनातोलिया (वर्तमान तुर्की का हिस्सा) के आसपास सल्तनत के अधीन शासन करने का प्रभार दिया गया। अनातोलिया की सीमा मंगोलों से लगती थी।

साल 1277 तक मंगोलों ने पर्शिया, ईराक और पूर्वी आनातोलिया पर कब्ज़ा कर लिया था। इससे तुर्क-पर्शियन सेज्लुक सल्तनत लगभग समाप्त होने की कगार पर पहुँच गई। इस स्थिति का फायदा उठाकर एर्टुग्रुल जैसे छोटे जागीरदारों ने अपने रियासतों को स्वतंत्र घोषित करना शुरू कर दिया। तीन साल बाद यानी 1280 में जब एर्टुग्रुल की मृत्यु हुई तो उसकी जागीर का नेतृत्व उसके बेटे उस्मान को मिला।

एर्टुग्रुल के बारे में कुछ ज्यादा कुछ भी ख़ास नहीं लिखा गया है। इतिहासकारों ने अधिकतर ध्यान उसके बेटे उस्मान और उस्मानी साम्राज्य के विस्तार पर दिया है।

फिर भी एर्टुग्रुल के बारे में एलेग्जेंडर डब्लू. हिडन ने थोड़ा-बहुत जरूर लिखा है। अपनी पुस्तक में वे उससे सम्बंधित एक मिथ्य का जिक्र करते हुए लिखते हैं, “एर्टुग्रुल ने एक अजीब सा सपना देखा, जिसमें वह किसी अनजान जगह पर एक संन्यासी से मिला। जहाँ उसने एक पुस्तक को देखकर पूछा कि यह क्या है? उसे जवाब मिला कि यह कुरान है। एर्टुग्रुल ने उस पुस्तक को पूरी रात बैठकर पढ़ा। लगातार पढ़ने के चलते सुबह उसकी आँख लग गई। तभी उसे एक आवाज़ सुनाई दी- अब तुमने मेरे शब्दों को इतनी इज्जत के साथ पढ़ा है इसलिए तुम्हारे वंशजों को इस दुनिया में लगातार सम्मान मिलेगा।”

इसके विपरीत, वाशिंगटन विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर पीटर एफ शुगर ने ‘हिस्ट्री ऑफ़ ईस्ट सेंट्रल यूरोप’ पुस्तक में एर्टुग्रुल को ‘गाजी’ कहकर संबोधित किया है। इस्लाम में ‘गाजी’ की उपाधि मूर्तिपूजकों, गैर-मुस्लिमों, अल्लाह को न मानाने वाले अथवा काफिरों की हत्या करने वाले को दी जाती है।  

वास्तव में तुर्क आक्रमणकारी थे, जो कि सिर्फ लूटपाट, हत्या और गैर-मुस्लिमों पर अमानुषिक अत्याचार के लिए ही बदनाम रहे। इनका पूरा इतिहास हिन्दुओं, यहूदियों और ईसाइयों के नरसंहारों से भरा हुआ है। इजरायली इतिहासकार बैनी मोरिस ने डोर जीएवी के साथ मिलकर ‘द थर्टी इयर जेनोसाइड– द टर्किज डिस्ट्रक्शन ऑफ़ इट्स क्रिस्चियन माइनॉरिटीज’ पुस्तक लिखी है। अपनी इस पुस्तक में उन्होंने उस्मानी साम्राज्य द्वारा 25 लाख ईसाइयों की हत्या का जिक्र किया है।     

इन्ही तुर्कों में से एक बाबर ने 16वीं शताब्दी की शुरुआती दशकों में भारत पर हमला किया था। राणा सांगा की हार के बाद बाबर ने हिन्दुओं की हत्या कर उनके सिर का एक स्तंभ बनवाया। चंदेरी के दुर्ग पर भी कब्जा करने के बाद उसने हिन्दुओं के सिरों की एक मीनार बनवाई थी। हिन्दुओं के खिलाफ इन अत्याचारों के लिए बाबर को भी एर्टुग्रुल की तरह ‘गाजी’ की उपाधि दी गई थी।

बाबर के वंशजों को मुग़ल कहा गया। इसमें गैर-मुस्लिमों पर अत्याचारों का सबसे क्रूरतम उदाहरण औरंगजेब ने पेश किया था। उसने हजारों हिन्दू मंदिरों का ध्वंस किया और नए मंदिरों के निर्माण पर रोक लगवा दी। उसके आदेश पर बनारस, मथुरा, पाटन, जोधपुर, उदयपुर, अयोध्या और हरिद्वार जैसे अनेक धार्मिक स्थानों पर मंदिरों को तोड़ दिया गया। हिन्दुओं पर अतिरिक्त टैक्स लगाए गए। उन्हें उनके त्यौहार और जन्मोत्सव मनाने पर भी मनाही थी। इसके अतिरिक्त हिन्दुओं का बड़ी संख्या में नरसंहार किया और उन्हें जबरन इस्लाम में धर्मान्तरित करवाया गया।

इस तरह तुर्कों ने विश्व के कई हिस्सों पर कब्जा किया, वहाँ की संपत्तियों को लूटा, लड़कियों का बलात्कार किया, बच्चों और औरतों को गुलाम बनाया और करोड़ों की संख्या में गैर-मुस्लिमों का जबरन धर्म-परिवर्तन अथवा नरसंहार किया। इसके अलावा, इसी बीच तुर्की के बादशाहों ने खुद ही अपने को खलीफा भी घोषित कर दिया और अरबों पर भी अपना अधिपत्य बना लिया था।

तुर्कों के इस अमानवीय सत्ता का अंत प्रथम विश्वयुद्ध के बाद साल 1924 में जाकर हुआ। दरअसल, आपसी गृहयुद्ध और सत्ता के प्रति अहंकार ने कथित तुर्की खलीफा को कमजोर  कर दिया था। अतंतः प्रथम विश्व युद्ध की समाप्ति तक तुर्कों के उस्मानी साम्राज्य को ब्रिटेन और फ्रांस ने मिलकर बिलकुल खत्म कर दिया।

वर्तमान में तुर्की फिर से अपनी इस सत्ता को पाने की कोशिश कर रहा है। इस सन्दर्भ में उसने अत्याचारों के उस्मानी कालखंड को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने के लिए एर्टुग्रुल का सहारा लिया। ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि उस्मानी साम्राज्य की शुरुआत एर्टुग्रुल के साथ ही होती है। इसके लिए तुर्की में एर्टुग्रुल पर साल 2014 में एक धारावाहिक बनाया गया, जिसे वहाँ के मुस्लिमों ने बेहद पसंद किया।

इस बढ़ती लोकप्रियता को भुनाने के लिए पाकिस्तान के सरकारी टेलीविज़न (PTV) ने भी एर्टुग्रुल को अपने यहाँ प्रसारित करना शुरू कर दिया। पीटीवी ने इस सीरीज को उर्दू में डब किया, जिसके बाद इसने पाकिस्तान के साथ ही भारत के कट्टरपंथियों पर अपना प्रभाव बनाना शुरू कर दिया। अभी इस धारावाहिक को नेटफ्लिक्स पर भी इंग्लिश सबटाइटल के साथ प्रसारित किया जा रहा है।

आज एक सिरफिरा लुटेरा, हत्यारा और बलात्कारी कैसे दक्षिण एशिया- भारत और पाकिस्तान के मुस्लिमों का नायक हो सकता है? वास्तव में, गलती उनकी भी नहीं है। यह पूरा खेल जिहादी-लेफ्ट इतिहासकारों का है, जिन्होंने पिछले 70 सालों में विदेशी हमलावरों को ‘नायक’ के तौर पर पेश किया है। जबकि राजा दाहिर, पृथ्वीराज चौहान, राजा हेमू, राणा सांगा, महाराणा प्रताप जैसे नायकों को इतिहास के पन्नों में समेट दिया गया। 

फैक्ट चेक: क्या भूत भी बना रहे हैं बॉडी? जानिए क्या है इस खुले हुए जिम में बॉडी बनाने वाले भूतों का सच

उत्तर प्रदेश के झाँसी का एक वीडियो वायरल हो रहा है। इस वीडियो के आधार पर दावा किया जा रहा है कि एक पार्क में स्थित झूले में भूत एक्सरसाइज कर रहा है। ये एक खुले जिम की तरह का पार्क है, जहाँ विभिन्न तरह के व्यायाम के लिए यंत्र लगे हुए हैं। ऐसे में सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हुआ, जो रात के अँधेरे का था। इस वीडियो में अँधेरे में झूला अपने-आप हिलते हुए दिखाई दे रहा है।

पूर्व क्रिकेटर आकाश चोपड़ा ने भी इस वीडियो को ट्वीट करते हुए बताया कि ये उन्हें व्हाट्सप्प से प्राप्त हुआ है। उन्होंने पूछा कि कौन व्यायाम कर रहा है यहाँ? सोशल मीडिया पर इसे लेकर तरह-तरह के दावे किए गए। किसी ने कहा कि भूत बॉडी बना रहा है तो किसी ने वहाँ भूतों द्वारा खेलने की बात कही। ये मामला झाँसी पुलिस तक भी पहुँचा, जिसके बाद वो भी ‘भूत’ का पता लगाने के लिए उस पार्क में स्थित झूले के पास पहुँचे।

ये वीडियो झाँसी के सीपरी बाजार स्थित कांशीराम पार्क का है। शुक्रवार (जून 12, 2020) को दिन भर झूले और भूत वाली बात धड़ल्ले से सोशल मीडिया में शेयर होती रही। पार्क में पहुँचे क्षेत्राधिकारी ने पहली ही मीडिया को बताया था कि ग्रीस के कारण ऐसा हो रहा है। बाद में यूपी पुलिस ने सोशल मीडिया के माध्यम से इसे स्पष्ट किया। आसपास के क्षेत्रों में भी इसे लेकर चर्चा का बाजार गर्म था।

झाँसी पुलिस ने अपनी तहकीकात के बाद बताया कि उक्त झूले में ग्रीस काफ़ी अधिक है, जिसके कारण एक बार अगर कोई इसे हिला दे तो ये कुछ सेकण्ड्स तक हिलता ही रहता है। साथ ही पुलिस ने जानकारी दी कि किसी शरारती तत्व ने झूला हिलाकर वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर डाल दिया है। पुलिस ने जाँच की और झूले को हिलाकर उसका वीडियो बनाया। उस वीडियो को भी कई जगह शेयर करते हुए भूत वाला दावा किया गया।

फ़िलहाल, यूपी पुलिस उन शरारती तत्वों को तलाश रही है। पुलिस ने बताया है कि भूत की बात अफ़वाह है। इससे पहले यूपी के आईपीएस अधिकारी राहुल श्रीवास्तव ने भी जानकारी दी कि ऐसा करने वाले असामाजिक तत्वों को जल्द ही ‘हॉन्टेड’ लॉकअप में डाला जाएगा। श्रीवास्तव ने बताया कि पुलिस को जैसे ही इस अफवाह की सूचना मिली, वो मौके पर पहुँची। ‘मूविंग स्विंग’ नामक झूले को लेकर ये अफवाह फैलाई गई।

हत्या के दोषी को केरल के सीएम सहित वामपंथी कुनबे की श्रद्धांजलि, 51 बार पार्टी के बागी नेता को चाकु से गोदा था

केरल के मुख्यमंत्री पी विजयन ने शुक्रवार को विवादों को न्योता देते हुए पीके कुंजानाथन को श्रद्धांजलि दी। हत्या के मामले में दोषी करार दिए गए कुंजानाथन का गुरुवार (11 मई 2020) को निधन हुआ था। विजयन सहित केरल CPI(M) के नेता उन्हें श्रद्धांजलि देने के लिए इस कदर जुटे जैसे किसी नायक की मौत हुई हो।

आंतों में इंफेक्शन होने की वजह से तिरुवनंतपुरम के मेडिकल कॉलेज हॉस्पिटल में कुंजानाथन हो गया था। वे 72 वर्ष के थे। कोझिकोड जिले में सीपीआई (एम) के बागी नेता टीपी चंद्रशेखरन की 2012 में हत्या कर दी गई थी। इस मामले में कुंजानाथन सहित 11 लोग 2014 में दोषी पाए गए थे। हालॉंकि तबीयत खराब होने की वजह से कुंजानाथन को बाद में जमानत दे दी गई थी।

सीपीआई (एम) की कन्नूर एरिया कमिटी के मेंबर रहे कुंजानाथन सीएम विजयन के सहयोगी रहे थे। रामचंद्रन की हत्या में उन्हें उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी। मुख्यमंत्री पिनारई विजयन ने उनके निधन पर शोक व्यक्त करते हुए कहा कि वे ऐसे कॉमरेड थे जिसने नि:स्वार्थ भाव से पार्टी की सेवा की।

अपने फेसबुक पोस्ट में विजयन ने दावा किया कि कुंजानाथन एक प्रतिबद्ध सामाजिक कार्यकर्ता थे। उन्होंने अपना पूरा जीवन समाज की सेवा में बिताया।

हालाँकि, मुख्यमंत्री द्वारा एक हत्या के आरोपी की जयजयकार और प्रशंसा करना सोशल मीडिया यूज़र्स को अच्छा नहीं लगा। साथ ही नागरिकों ने भी एक हत्यारे को सपोर्ट करने पर सीएम को खूब-खरी खोटी सुनाई।

केवल विजयन ही नहीं, सीपीआई (एम) की केंद्रीय समिति के सदस्यों सहित कई कम्युनिस्ट नेताओं ने कुंजानाथन को श्रद्धांजलि दी। वे अस्पताल भी उनका हालचाल लेने जाते थे। उनके निधन पर ‘शहीद जो कभी नहीं मरेगा’ के नारे भी लगे।

साल 2012 में टीपी चंद्रशेखरन ने वैचारिक मतभेदों के कारण पार्टी छोड़ दी थी। इसके बाद कम्युनिस्ट पार्टी के कार्यकर्ताओं द्वारा क्रूरतापूर्वक उनकी हत्या कर दी गई थी। जाँच से पता चला था कि चंद्रशेखरन को 51 बार चाकू मारा गया था।

पुलिस को बाद में जाँच के दौरान यह भी पता चला था कि चंद्रशेखरन की हत्या का मास्टरमाइंड कुंजानाथन था। जुलाई 2014 में अदालत ने सीपीआई (एम) नेता को दोषी ठहराया था। हालाँकि इसके बाद में वे विवादों में रहे। 2016 में राज्य में वामपंथी सरकार की वापसी के बाद उन्हें अक्सर परोल दिया जाने लगा। इस साल 14 मई को उन्हें इलाज के लिए तीन महीने की जमानत दी गई थी।

बता दें कि छह साल की सजा के दौरान कुंजानाथन ने 400 से अधिक दिनों के परोल का लाभ उठाया। इस दौरान वे पार्टी के कार्यक्रमों में भी शिरकत करते थे। हत्या का दोषी होने के बावजूद उन्हें सीपीआई (एम) क्षेत्रीय समिति का नेता चुना गया था।

सरकारी खजाने को वामपंथी चपत: CPI (M) के पूर्व राज्यसभा सांसद 7 बार ट्रेन में चढ़े, 63 टिकट का पैसा माँगा

मुफ़्त रेल टिकटों की सुविधा की आड़ में कुछ सांसद एवं पूर्व सांसद किस तरह सरकारी पैसों की बर्बादी करते हैं, इसका उदाहरण CPI (M) के एक पूर्व राज्यसभा सांसद की करतूत से सामने आया है।

इस पूर्व राज्यसभा सदस्य ने जनवरी 2019 में 63 ट्रेन टिकट बुक की। लेकिन इनमें से केवल 7 ट्रेन टिकट का ही उन्होंने लाभ लिया। बावजूद इसके बाकी टिकट कैंसिल नहीं कारवाई। बाद में सभी 63 टिकट के रिम्बरस्मेंट यानी, बिल भुगतान की माँग की। इसके कारण रेल मंत्रालय को संसद सचिवालय द्वारा ₹1,46,920 का अतिरिक्त भुगतान करना पड़ेगा।

इस पूर्व वामपंथी सांसद का नाम सार्वजानिक नहीं किया गया है। मीडिया रिपोर्टों में बताया गया है कि वे पश्चिम बंगाल से सीपीआई (एम) के पूर्व राज्यसभा सदस्य थे।

दरअसल राज्यसभा सांसदों को और पूर्व राज्यसभा सांसदों को रेलवे में नि:शुल्क असीमित यात्रा की सुविधा मिलती है। इसके पूरा भार राज्यसभा सचिवालय को उठाना होता है।

संसद के प्रत्येक सदस्य को नियमानुसार पत्नी सहित AC-1 में मुफ़्त यात्रा की सुविधा उपलब्ध होती है। इसके अलावा, इनके साथ यात्रा करने वाले एक अटेंडेंट को भी सेकेंड क्लास AC कोच या एग्जीक्यूटिव क्लास में किसी भी समय पूरे भारत में मुफ्त टिकट अथवा पास प्राप्त है।

सीपीआई (एम) के इस पूर्व राज्यसभा सांसद ने जिन सात टिकटों का इस्तेमाल किया उसकी लागत केवल ₹22,085 है। लेकिन उन्होंने उन्होंने अन्य टिकट कैंसिल नहीं कराया जिसकी वजह से सरकारी खजाने पर ₹1,46,920 का अतिरिक्त भर पड़ा। साल 2019-20 में ऐसे टिकटों जिन पर यात्रा नहीं हुई, लेकिन वो कैंसिल भी नहीं कराए गए, रेलवे ने राज्यसभा सचिवालय को ₹7.8 करोड़ रुपए का बिल भेजा है। ये सभी टिकट माननीय राज्यसभा सांसदों के हैं।

इसी तरह एक वर्तमान राज्यसभा सांसद ने जितने टिकट बुक कराए, उनमें से सिर्फ़ 15% टिकटों पर ही यात्रा की। इस तरह उनके द्वारा बर्बाद किए गए 85% टिकटों का भुगतान अब राज्यसभा सचिवालय को करना है।

ab टिकट कैंसिल नहीं कराया तो खुद करना होगा भुगतान

राज्यसभा सचिवालय को कई सांसदों और पूर्व सांसदों को कई टिकट बुक करने और अभी तक भुगतान की माँग नहीं करने के कई उदाहरण मिले हैं। लेकिन अब यदि राज्यसभा का कोई सदस्य ट्रेन का टिकट बुक करने के बाद यात्रा नहीं करता है, तो उसे खुद किराए का भुगतान करना होगा।

राज्यसभा के महासचिव दीपक वर्मा की ओर से सदस्यों को जारी परामर्श में दी गई जानकारी में यह स्पष्ट किया गया है कि वे यात्रा नहीं करने की स्थिति में ट्रेन बुकिंग को कैंसल करें और अगर ऐसा नहीं करते हैं तो किराया उनसे वसूला जाएगा।

परामर्श में कहा गया है कि रेल मंत्रालय ने भुगतान के दावे का जो ब्यौरा दिया है उसके मुताबिक कुछ सदस्यों ने एक ही दिन एक ही अथवा दूसरे स्टेशनों से जाने वाली कई ट्रेनों में टिकट बुक कराए। उपराष्ट्रपति एम वेंकैया नायडू ने राज्यसभा सचिवालय को निर्देश दिया था कि इस मुद्दे को उनके संज्ञान में लाया जाए।

तकनीकी कारणों से हैं बाध्य

फ़िलहाल राज्यसभा सचिवालय ने सांसदों के ये बिल भुगतान अदा करने से मना कर दिया है। राज्यसभा सचिवालय ने रेलवे से आग्रह किया है कि वो सिर्फ उन्हीं टिकटों का किराया वसूल करे, जिन पर सांसदों ने वास्तव में यात्रा भी की हो, लेकिन रेलवे नियमों का हवाला देते हुए इस बात पर क़ायम है कि जो टिकट कैंसिल नहीं कराए गए, उनका पैसा राज्यसभा सचिवालय को देना ही होगा।

इसके पीछे बड़ी वजह यह है कि वर्तमान में रेलवे के पास अपनी ओर से आम नागरिक और सांसदों में भेद करने का कोई नियम नहीं है। सम्भव है कि रेलवे जल्द ही लोकसभा और राज्यसभा के सांसदों द्वारा ट्रेन बुकिंग के बीच अंतर करने के लिए अपने सॉफ्टवेयर में बदलाव करे।

NIA की गिरफ्त में तानिया परवीन: हाफिज सईद को करती थी रिपोर्ट, हथियारों की ट्रेनिंग लेने जाना था पाकिस्तान

तानिया परवीन को शुक्रवार (जून 12, 2020) को केंद्रीय जाँच एजेंसी (NIA) ने अपनी हिरासत में ले लिया। वह दमदम सेंट्रल जेल में बंद थी। कोलकाता पुलिस की स्पेशल टास्क फोर्स (STF) ने उसे उत्तर 24 परगना जिले के बादुरिया से लश्कर-ए-तैयबा से संबंध रखने के आरोप में गिरफ्तार किया था।

बताया जा रहा है कि NIA की पूछताछ में तानिया से लश्कर-ए-तैयबा से जुड़ी काफी जानकारी मिल सकती है, जिसका खुलासा उसने अब तक नहीं किया है। उसने बंगाल समेत किन-किन राज्यों में कितने स्लीपर सेल तैयार किए हैं इसका भी पता लगाया जाएगा। इसके साथ ही NIA उससे पूछताछ कर यह पता लगाने की कोशिश करेगी कि उसने सेना के कितने कर्मचारियों को हनीट्रैप में फँसाया था एवं उसके इस अभियान में और कौन-कौन शामिल हैं।

तानिया परवीन को 20 मार्च 2020 को गिरफ्तार किया गया था। इसके बाद उसे 14 दिन की पुलिस हिरासत में भेज दिया गया था। बताया जाता है कि तानिया 10 साल पहले बांग्लादेश से घुसपैठ कर भारत में आई थी। वह लश्कर के लिए युवाओं की भर्तियाँ करती थी। सरकारी सूचनाओं को पाने के लिए वो हनी-ट्रैपिंग का सहारा लेती थी। कई बड़े अधिकारियों व नेताओं तक उसकी पहुँच होने की बात कही जाती है। 

तानिया के पास से कई पाकिस्तानी सिम कार्ड्स मिले थे। उसके पास से जब्त की गई डायरी और दस्तावेजों से पता चला है कि उसने काफ़ी संवेदनशील सूचनाएँ जुटा ली थी। वह मुंबई के 26/11 हमलों के मास्टरमाइंड और आतंकी सरगना हाफ़िज़ सईद से भी 2 बार बातचीत कर चुकी है। वो पिछले 2 साल से लश्कर के लिए सक्रिय रूप से काम कर रही थी और उस क्षेत्र में कई बार भड़काऊ भाषण भी दे चुकी है।

पश्चिम बंगाल की सोशल टास्क फोर्स द्वारा पूछताछ में पता चला था कि आतंकी तानिया परवीन के व्हाट्सप्प ग्रुप में हाफ़िज़ सईद के दो करीबियों के नंबर मिले थे। इन्हीं दोनों के माध्यम से मुंबई हमले का मास्टरमंड तानिया को सन्देश भेजा करता था। तानिया को हवाला का जरिए रुपए भी भेजे गए थे। गिरफ़्तारी से पहले वो बांग्लादेश सीमा पर विभिन्न आतंकी संगठनों को एकजुट कर बड़े हमले की साजिश रचने में लगी हुई थी। उसके बैंक खाते में करोड़ों रुपए का लेन-देन हो रहा था, इसके बाद से ही परवीन की गतिविधियों पर संदेह होने लगा था।

उल्लेखनीय है कि तानिया का मुख्य लक्ष्य इस्लामिक राज्य की स्थापना करना था। इसके लिए उसे खूँखार वैश्विक आतंकी संगठन आईएसआईएस से प्रेरणा मिली थी। वो उसी तर्ज पर काम करते हुए एक इस्लामिक स्टेट की स्थापना करना चाहती थी। पाकिस्तान से उसके आकाओं ने उसे कई भड़काऊ पुस्तकें भेजी थीं, जिसे पढ़ कर उसकी सोच और भी कट्टरवादी हो गई थी।

तानिया ने मुर्शिदाबाद में कई आतंकी शिविर भी बना रखे थे, जहाँ वो अपने लोगों को भड़काऊ भाषण देने के लिए प्रशिक्षण देती थी। वहाँ वो लोगों को ‘जिहाद’ सिखाती थी और आतंकी गतिविधियों के संचालन के गुर भी सिखाती थी। वो कुछ दिनों बाद अत्याधुनिक हथियार चलाने की ट्रेनिंग लेने पाकिस्तान जाने वाली थी। वह बांग्लादेश होकर पाकिस्तान जाने वाली थी, जहाँ वो आईएसआई अधिकारियों से मिलने वाली थी। वो आतंकी संगठन के लिए मोटी रकम भी जुटा रही थी।

3 साल से लश्कर से जुडी तानिया को ‘जिहाद’ का प्रशिक्षण इन्हीं किताबों के जरिए मिला। पुलवामा में सीआरपीएफ के जवानों पर हुए हमले के बाद उसकी फोटो शेयर कर के तानिया ने आतंकियों की प्रशंसा भी की थी। तानिया अक्सर मदरसों का दौरा करती थी और वहाँ भड़काऊ भाषण देकर लश्कर के लिए लोग जुटाती थी।

उसका उद्देश्य युवाओं, ख़ासकर छात्र-छात्राओं को कट्टरपंथी बना कर उन्हें आतंकी संगठनों से जोड़ना था। तानिया ने मुर्शिदाबाद में कई आतंकी शिविर भी बना रखे थे, जहाँ वो अपने लोगों को भड़काऊ भाषण देने के लिए प्रशिक्षण देती थी। वहाँ वो लोगों को ‘जिहाद’ सिखाती थी और आतंकी गतिविधियों के संचालन के गुर भी सिखाती थी। वो कुछ दिनों बाद अत्याधुनिक हथियार चलाने की ट्रेनिंग लेने पाकिस्तान जाने वाली थी। वह बांग्लादेश होकर पाकिस्तान जाने वाली थी, जहाँ वो आईएसआई अधिकारियों से मिलने वाली थी। 

J&K: अनंतनाग और कुलगाम में मुठभेड़, 4 आतंकी ढेर, 2 हिजबुल मुजाहिदीन के

जम्मू-कश्मीर के अनंतनाग में सुरक्षाबलों को बड़ी कामयाबी मिली है। शनिवार (जून 13, 2020) तड़के सुरक्षाबलों ने दो आंतवादियों को मार गिराया है। मारे गए दोनों आतंकवादी हिजबुल मुजाहिदीन के हैं।

इनके पास से गोला-बारूद के साथ 2 पिस्तौल और 3 ग्रेनेड बरामद हुए हैं। यह ऑपरेशन अब खत्म हो गया है। ऑपरेशन में भारतीय सेना की किसी प्रकार की क्षति नहीं हुई है।

जानकारी के मुताबिक अनंतनाग जिले के लल्लन में खुफिया इनपुट पर आज सुबह एक संयुक्त ऑपरेशन चलाया गया था। आतंकियों की तरफ से गोलीबारी के बाद मुठभेड़ में तब्दील हो गया। इस दौरान हिजबुल के दो आतंकियों को ढेर कर दिया गया।

इसके अलावा कश्मीर जोन के पुलिस ने ट्वीट करते हुए बताया कि कुलगाम के निपोरा इलाके में 2 आतंकियों को मार गिराया गया है। सुरक्षाबलों को खुफिया एजेंसियों से खबर मिली थी कि कुलगाम के निपोरा में आतंकवादी छिपे हुए हैं। इसके बाद भारतीय सेना के जवानों ने स्थानीय पुलिसकर्मियों की मदद से इलाके में सर्च ऑपरेशन चलाया। इस दौरान आतंकवादियों की ओर से गोली चलाई गई तो जवानों ने भी जवाबी फायरिंग की। 

काफी देर तक चले मुठभेड़ में सुरक्षाबलों ने दो आतंकवादियों को मार गिराया। मारे गए आतंकवादियों की अभी शिनाख्त नहीं हो पाई है। सर्च ऑपरेशन जारी है। अधिकारियों ने बताया कि आतंकवादियों की पहचान के अलावा यह पता करने की कोशिश की जा रही है कि वे किस आतंकवादी संगठन से जुड़े हुए थे।

गौरतलब है कि बुधवार (जून 10, 2020) को कश्मीर के शोपियाँ में सुरक्षाबलों ने 5 आतंकियों को मार गिराया था। पुलिस ने बताया था कि मारे गए आतंकी हिजबुल मुजाहिदीन और लश्कर-ए-तैयबा से जुड़े हुए थे।

इससे पहले 8 जून को शोपियाँ के पिंजूरा इलाके में हुई मुठभेड़ में 4 आतंकी मारे गए थे। उससे एक दिन पहले रेबेन इलाके में 5 आतंकियों को सुरक्षाबल ने ढेर किया था। कुल मिलाकर 24 घंटों में सुरक्षाबलों ने 9 आतंकियों को मौत के घाट उतार दिया था।

जम्मू-कश्मीर के डीजीपी दिलबाग सिंह ने इन लगातार मुठभेड़ों के बारे में जानकारी देते हुए बताया था कि हाल के अभियानों में हिजबुल मुजाहिदीन के 9 आतंकवादी मारे गए हैं। पिछले 2 सप्ताह में 9 बड़े ऑपरेशन किए गए, जिसमें 22 आतंकवादियों का खात्मा किया गया है। इनमें आतंकी संगठनों के 8 शीर्ष कमांडर शामिल हैं।

जम्मू-कश्मीर के सुरक्षाबलों ने इस साल 11 जून तक 100 से ज्यादा आतंकवादियों को मार गिराया था। इनमें से 68 आतंकियों को 1 अप्रैल से 10 जून के बीच मार गिराया गया, जब कोरोना संक्रमण से निपटने के लिए पूरे देश में लॉकडाउन लागू था।

असम: आदिवासी युवक रितुपर्णा पेगु का गला रेता, हुसैन, इब्राहिम और उनकी अम्मी समेत 5 गिरफ्तार

असम के गुवाहाटी में एक आदिवासी हिन्दू युवक रितुपर्णा पेगु (Rituparna Pegu) को गला काटकर मौत के घाट उतार दिया गया। नूनमाटी पुलिस (Noonmati police) ने शुक्रवार (जून 12, 2020) दोपहर रितुपर्णा पेगु की निर्मम हत्या के मामले में 5 आरोपितों को गिरफ्तार किया है।

गिरफ्तार आरोपितों की पहचान दुलाल अली, इब्राहिम अली, इब्राहिम की अम्मी मनोवर खातुन, हुसैन अली और अरमान अली (Dulal Ali, Ibrahim Ali, Manowara Khatun, Hussain Ali and Arman Ali) के रूप में की गई है।

बताया जा रहा है कि यह विवाद एक कुर्सी को लेकर था। रिपोर्ट्स के अनुसार, ACP देबराज उपाध्याय ने इस हत्या के बारे में कहा, “यह घटना अरमान होम फर्निशिंग नामक एक दुकान में हुई। वहाँ आरोपित हुसैन अली और रितुपर्णा पेगू दुकान के अंदर बैठे थे। सब कुछ ठीक चल रहा था, लेकिन वे एक कुर्सी को लेकर बहस में उलझ गए। माहौल गरम होने पर रितुपर्णा पेगू ने आरोपित को थप्पड़ मार दिया। इस पर हुसैन अली आगबबूला हो गया। उसके परिवार के सदस्य भी घटनास्थल पर पहुँचे और रितुपर्णा पेगु की पिटाई शुरू कर दी। हुसैन अली ने उसे पीछे से धक्का दिया और पेगू सड़क किनारे गिर गया जहाँ उसकी मौत हो गई।”

जिस दुकान में यह वारदात हुई उसके मालिक अरमान अली ने कहा, “उनकी लड़ाई किसी चीज को लेकर हुई। बहस शुरू होने के बाद, हुसैन अली अपने परिवार के सदस्यों को लेकर आए, जिससे हादसा हुआ। मैंने ऐसा होने से रोकने की कोशिश की, लेकिन हुसैन ने रितुपर्णा की पीठ पर चाकू से वार किया।”

रितुपर्णो की हत्या के कई वीडियो सोशल मीडिया पर भी शेयर किए जा रहे हैं और इस निर्मम हत्या को लेकर लोग काफी आक्रोशित हैं।

गिरफ्तार किए गए आरोपितों में से एक, अरमान अली उस दुकान के मालिक हैं, जहाँ रितुपर्णा पेगु (Rituparna Pegu) को चाक़ू से मारा गया और हुसैन अली इस स्टोर में काम करता है। पाँचों आरोपितों के खिलाफ आईपीसी की धारा 147/148/149/302 के तहत नूनमाटी पुलिस स्टेशन में केस नंबर 294/20 के तहत मामला दर्ज किया गया है।

नूनमाटी पुलिस मामले की जाँच कर रही है। गुवाहाटी के निवासी रितुपर्णा पेगु की शुक्रवार दोपहर को चाकू मारकर हत्या कर दी गई और उसके बाद उनकी लाश को सड़क पर फेंक दिया गया।

ट्विटर पर इस घटना को शेयर करते हुई एक ट्विटर यूजर ने लिखा है कि अरमान अली और हुसैन अली ने रितुपर्णा पेगु की निर्ममता से हत्या कर दी गई।

यह घटना शहर के नूनमाटी इलाके में स्थित अरमान होम फर्निशिंग (Armaan Home Furnishing) नामक एक स्टोर में हुई। हत्या की यह पूरी घटना स्टोर के सीसीटीवी में रिकॉर्ड हो गई और सीसीटीवी फुटेज के आधार पर गिरफ्तारी की गई।

CCTV से ली गई घटना की तस्वीर (साभार – dailynv)

सोशल मीडिया पर शेयर किए जा रहे कुछ लोगों के अनुसार, मृतक युवक की हुसैन अली के साथ बहस हुई। विवाद बढ़ने पर हुसैन अली ने उसकी पीठ में चाकू मार दिया, जिसके बाद पेगु सड़क किनारे गिर गया। हालाँकि, कुछ रिपोर्ट्स में यह भी बताया जा रहा है कि रितुपर्णा पेगू को तुरंत अस्पताल ले जाया गया, लेकिन उसने वहाँ दम तोड़ दिया। यह घटना दुकान के सीसीटीवी में कैद हो गई।

सोशल मीडिया पर मृतक रितुपर्णा के बच्चे और पत्नी का वीडियो शेयर करते हुए स्क्विंट नियोन ने लिखा है, “यह 2 या 3 महीने के बच्चे के साथ रितुपर्णा पेगू (आदिवासी) की पत्नी का वीडियो है, जिसका गला आज गुवाहाटी में दिन के उजाले में हुसैन अली, इब्राहिम अली, दुलाल अली, अरमान अली और मुनवारा खातुन द्वारा तालिबानी शैली में काट दिया गया था।”

ट्विटर पर इस घटना का वीडियो शेयर करते हुए एक ट्विटर यूजर ने लिखा है कि एक आदिवासी रितुपर्णा पेगू की गुवाहाटी में अरमान अली, अली हुसैन और उसकी माँ और परिवार के सदस्यों द्वारा उसका गला काटकर हत्या कर दी गई।

फरार चल रहा तबलीगी जमात का मुखिया मौलाना साद दिल्ली की मस्जिद में दिखा, 20 लोगों के साथ पढ़ी नमाज

तबलीगी जमात का मुखिया मौलाना साद शुक्रवार (12 जून 2020) को सार्वजनिक तौर पर दिखा। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार उसने दिल्ली के जाकिर नगर की एक मस्जिद में नमाज अदा की। इस दौरान उसके साथ 20 लोग थे। इनमें एक बच्चा भी था।

तबलीगी जमात के निजामुद्दीन स्थित मरकज में लॉकडाउन के बावजूद लोगों को जमा रखने का मामला सामने आने के बाद मौलाना साद फरार चल रहा है। मार्च में मरकज कोरोना संक्रमण का हॉटस्पॉट बनकर उभरा था।

बताया जाता है कि मौलाना साद दोपहर के वक्त मस्जिद पहुॅंचा था। कुछ देर वहॉं रुकने के बाद चला गया। वह दिल्ली पुलिस की जॉंच से बचता फिर रहा है। अब तक पुलिस को अपनी कोरोना जॉंच की रिपोर्ट भी उसने नहीं सौंपी है।

क्राइम ब्रांच ने कार्रवाई करते हुए मौलाना साद समेत 7 लोगों को नोटिस भेजा था। उस समय मौलाना साद खुद को क्वारंटाइन करने की आड़ में गायब हो गया और जब पुलिस ने छानबीन शुरू की तब भी वह निकलकर सामने नहीं आया। पुलिस की पकड़ से बचने के लिए साद अलग-अलग जगह छुपता रहा।

मौलाना साद का एक ऑडियो भी सामने आया था, जिसमें वह कह रहा था कि ये ख्याल बेकार है कि मस्जिद में जमा होने से बीमारी पैदा होगी, मैं कहता हूँ कि अगर तुम्हें यह दिखे भी कि मस्जिद में आने से आदमी मर जाएगा तो इससे बेहतर मरने की जगह कोई और नहीं हो सकती।

वायरल ऑडियो में साद आगे कहता है कि अल्लाह पर भरोसा करो, कुरान नहीं पढ़ते अखबार पढ़ते हैं और डर जाते हैं, भागने लगते हैं। साद आगे कहते हैं कि अल्लाह कोई मुसीबत इसलिए ही लाता है कि देख सके कि इसमें मेरा बंदा क्या करता है। साद आगे कहते हैं कि कोई कहे कि मस्जिदों को बंद कर देना चाहिए, ताले लगा देना चाहिए क्योंकि इससे बीमारी बढ़ेगी तो आप इस खयाल को दिल से निकाल दो।

आए दिन मौलाना साद को लेकर हो रहे खुलासे की वजह से ईडी, आईटी और सीबीआई सभी इस मामले को गंभीरता से ले रहे हैं। दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच ने मरकज के जुड़ी सभी जनकरियों को इनसे साझा किया है। जिसमें हवाला कनेक्शन, विदेश से आने वाले रुपयों, मरकज पर मनी लॉड्रिंग जैसे मामले अहम है।

क्राइम ब्रांच ने तबलीगी मकरज जमात के बैंक ऑफ इंडिया के उस खाते के बारे में जानकारी हासिल की है, जिसमें पैसे आने के 24-28 घंटे के भीतर करोड़ों रुपए गायब कर दिए जाते थे। ये पैसे ज्यादा से ज्यादा 48 घंटे के भीतर अन्य खातों में ट्रांसफर कर दिए जाते थे।

क्राइम ब्रांच ने मौलाना साद के 5 करीबियों का पासपोर्ट भी जब्त कर लिए थे। इन पाँचों लोगों पर पहले से इस मामले के संबंध में एफआईआर दर्ज था। कहा जाता है कि मरकज से जुड़े हर फैसले इनसे पूछकर लिए जाते थे। ऐसे में पासपोर्ट जब्त होने के बाद अब इनमें से कोई भी मामले की जाँच पूरी होने तक देश के बाहर नहीं जा सकता है।

मुरारी बापू जी, अली-मौला इतना ही पसंद है तो टोपी लगा कर नमाज पढ़ लीजिए, सत्संग-प्रवचन का नाम क्यों ले रहे?

कुछ समय पहले किसी के नाचने पर बवाल हुआ था, मैंने सोचा बेकार का विवाद है, नहीं लिखा। फिर अली-मौला पर मुरारी बापू (Morari Bapu) की एक क्लिप देखी, जाने दिया। आज फिर वो एक क्लिप देखा जिसमें वो कह रहे हैं कि त्रिपुंडधारियों और बाबाओं को उमर खैय्याम और रूमी पढ़ना चाहिए, तब पता लगेगा बंदगी क्या है!

सवाल यह है कि क्या ऐसा कहना या मानना गलत है? बिलकुल नहीं। तो फिर मैं इस पर लिख-बोल क्यों रहा हूँ? वो इसलिए क्योंकि मेरे हिसाब से क्रिकेट की पिच पर फुटबॉल खेलना, खेल और देखने आए दर्शक, दोनों का ही, अपमान है। जैसा कि हजारों बार हम सबने सुना है कि व्यक्ति को समय, जगह, परिस्थिति और पात्र देख कर बोलना चाहिए। संतों को तो इसका विशेष ध्यान रखना चाहिए।

मुरारी बापू ने जो कहा, वो किसी महफिल में, मुशायरे में करते तो बड़ा अच्छा लगता। जिस शराब और सौंदर्य की उपमाएँ दे रहे हैं, वो अगर किसी प्राइवेट पार्टी में पीते वक्त भी देते, तो भी अच्छा रहता। लेकिन, हिन्दू श्रद्धालुओं की भरी सभा में, जब आप अली-मौला करने लगते हैं, या करवाने लगते हैं, तो आप मानें या न मानें, सेकुलरिज्म की बयार में नाक घुसाना चाह रहे हैं।

अपने कार्यक्रमों में गजल गायक को जगह देना, मनोरंजन के लिए गीत-गजल सुनना अलग बात है। लम्बी कथा हो, तो बीच-बीच में संगीत का सहारा लेना उचित लगता है। लेकिन, समस्या तब हो जाती है जब, आप उन गजलों की व्याख्या करते हुए उसमें हिन्दू और राम खींच लाते हैं। समस्या तब होती है जब आपके लिए ईश्वर और अल्लाह एक हो जाता है, भक्ति और बंदगी एक हो जाती है।

जबकि ऐसा है नहीं। मेरी बात मत मानिए, अल्लाह को मानने वाले से ही पूछ लीजिए कि क्या ईश्वर और अल्लाह एक है, समान है, जवाब आपको मिल जाएगा। अल्लाह को मानने वाला और कुछ मानता ही नहीं, वो यह गाता है ‘मोहम्मद का सानी, मोहम्मद का हमसर, न पहले था कोई, न अब है, न होगा’। फिर आप किस हिसाब से दोनों को बराबर करना चाह रहे हैं?

आवश्यकता क्या आन पड़ी है कि आपको प्रवचन और सत्संग में अली-मौला और अल्लाह की बंदगी की याद आ रही है? एक तरफ एक मजहब है, जो कि अपने मूल रूप में प्रसारवादी, राजनैतिक और ऐतिहासिक तौर पर हिंसक और लूट-पाट से लेकर आतंक का शासन स्थापित करने पर तुला हुआ है, और दूसरी तरफ उसी की प्रसारवादी नीतियों को झेल कर हर बार खड़ा होने वाला धर्म!

दोनों एक हैं ही नहीं, आप क्यों इसको मिलाने पर तुले हुए हैं? आखिर, आवश्यकता क्या है? क्या भजन खत्म हो गए? क्या वेदवाणी का लोप हो गया? क्या उपनिषदों के सूक्तिवाक्य गायब हो गए? क्या पुराणों के सुभाषित पन्नों से उड़ गए? क्या सनातनियों के अनगिनत ग्रंथों के अनगिनत श्लोकों की कमी पड़ गई कि राम कथा के लिए जाने वाला प्रवचनकर्ता अली मौला पर न सिर्फ नाच रहा है, बल्कि उस नाच को सही भी कह रहा है?

वस्तुतः धर्म एक व्यक्तिगत विषय है, हर व्यक्ति को अपने दृष्टिकोण से उसे देखने की स्वतंत्रता है, परन्तु हर व्यक्ति की समझ का स्तर उतना ऊँचा या व्यापक नहीं होता कि वो स्वयं ही इसे समझ सके। इसी कारण कथावाचक हुए, प्रवचन करने वाले हुए, सत्संग का आयोजन होता है। ये एक सामान्य व्यक्ति को धर्म की जानकारी देने, एक बेहतर जीवन जीने का तरीका बताने का मार्ग है।

किसी अनभिज्ञ व्यक्ति को अपने टेंट में बिठा कर अली-मौला और अल्लाह की बंदगी बताना यह बताता है कि कथा का ज्ञान होना अलग बात है, और प्रवचन के नाम पर तत्कालीन राजनैतिक विषयों में रुचि लेते हुए, धार्मिकता के नाम पर सोशल मीडिया ट्रेंड का हिस्सा बनना अलग। मुरारी बापू को रामकथा कहनी चाहिए क्योंकि मंच का पूरा प्रयोजन ही वही है।

रामकथा में न तो अल्लाह आते हैं, न आने का कोई औचित्य है। कोई अल्लाह को रामकथा में ला रहा है तो इससे राम वालों को भी समस्या होनी चाहिए, और अल्लाह वालों को भी। भक्ति में श्रद्धा है, बंदगी में गुलामी है जो तथाकथित नेक बंदों से आइसिस जैसे प्रतिष्ठान बनवाती है। दोनों एक नहीं हैं, दोनों में पारिभाषिक तौर पर बुनियादी अंतर है, और वो बना रहना आवश्यक है।

आप बॉब मार्ले को सुनिए बापू जी, अरियाना ग्रांडे को सुनिए, एकॉन की धुन पर नाचिए… आपका समय, आपका घर, आपका म्यूजिक सिस्टम… लेकिन हाँ, ये काम अपने व्यक्तिगत दायरे से बाहर मत कीजिए क्योंकि आप एक व्यक्ति मात्र नहीं हैं, न ही आप एक व्यक्ति के रूप में कहीं बुलाए जाते हैं, या आपका कहीं आयोजन होता है। आपके नाम के पहले ‘राम कथावाचक’ जैसे विशेषण लगते हैं।

आपको अली-मौला में भी रुचि है तो टेंट लगवाइए और बड़े-बड़े बैनर पोस्टर पर ‘अल्लाह कथावाचक मुरारी बापू’ लिखवाइए, वहाँ गाइए और लोगों को बंदगी के मायने समझाइए। रूमी ने बहुत अच्छी बातें कही हैं, उमर खैय्याम की रुबाइयाँ भी कमाल की हैं, लेकिन कमाल का तो शकीरा का ‘हिप्स डोन्ट लाय’ भी है, कमाल तो ट्वर्किंग भी है… कीजिए! कर पाएँगे?

गाँधी बाबा वाला रोग मत फैलाइए, उसके कम्यूनिटी ट्रांसमिशन से भारत उबर नहीं पाया है। गाँधी ने दिल्ली के बंगाली कॉलोनी के एक मंदिर में कुरान पाठ करवाया था। बात यह नहीं है कि उससे क्या हो गया, बात यह है कि आवश्यकता क्या है इस दिखावे की? और हाँ, यहाँ यह सवाल भी बिलकुल जायज है कि क्या किसी मस्जिद में भारत का कट्टरपंथी रामलीला होने देगा? क्या किसी मस्जिद के लाउडस्पीकर से गीता पाठ संभव है?

और एक बात, अगर किसी समानांतर ब्रह्मांड की भारतभूमि पर बने किसी मस्जिद में अगर मजहब विशेष वाले गीता-पाठ कर भी दे, तो भी सवाल वही है कि हम क्यों अली-मौला करें! उसको गीता पढ़ना है, उसका सरदर्द है, उसको रामलीला करना है, वो करे। वो कहीं हनुमान का रोल कर रहा है, बिलकुल करे… करे क्या, हिन्दू ही बन जाए, हमें कोई समस्या नहीं। लेकिन, हिन्दुओं की रामकथा के बीच में ये रूमी और खैय्याम की बकैती नहीं होनी चाहिए।

आप ने न सिर्फ जगह और आयोजन की सीमाओं का उल्लंघन किया, बल्कि आप उससे और आगे जा कर त्रिपुंड लगाने वाले और बाकी धर्मगुरुओं पर ताना भी मार रहे हो कि उन्होंने जलालुद्दीन रूमी को नहीं पढ़ा! पढ़ा तो आपने भी बहुत कुछ नहीं होगा, लेकिन मतलब उससे नहीं है। मतलब इससे है कि जो पढ़ा है, उसे अच्छे से समझते हैं या नहीं? समझते हैं तो दूसरों में इस ज्ञान का प्रसार कीजिए।

समझने में कहीं दिक़्क़त रह गई हो, तो दोबारा पढ़िए कि किस जगह पर अल्लाह और बंदगी की बात लिखी हुई है या उस पर चर्चा करने किस श्रद्धालु ने बोला? क्या आपसे किसी ने कहा कि दोनों के अंतर गिनाएँ, या समानता बताएँ? अगर संदर्भ वह रहा हो, तो आपकी बातें ठीक लगेंगी, लेकिन संदर्भ वो नहीं था।

मेरी न तो समझ उतनी है, न ही ज्ञान का वृत्त उतना वृहद की मुरारी बापू को निर्देश दे सकूँ। एक सामान्य हिन्दू के तौर पर, पहले विवाद की उपेक्षा के बाद, दोबारा जब स्वयं का बचाव करते हुए, दूसरे धर्माचार्यों पर ताने मारने और उन्हें अज्ञानी कहने की जो धृष्टता उन्होंने की, तो मेरा भी एक लेख तो उचित ही लगता है।

आप ज्ञानी हैं, बने रहें। आपको अली-मौला करना है तो टोपी पहन लें, और भरी सभा में नमाज ही पढ़ लें, हमें समस्या नहीं है। आप अपने पैसों से दो-चार मस्जिद बनवा दें, वो भी ठीक है। लेकिन, इन सब में पारदर्शिता होनी चाहिए। रामकथा सुनने के लिए बुला कर, बिना किसी संदर्भ के अल्लाह की बंदगी के रस में डूबने की बातें कहना श्रद्धालुओं को ठगने जैसा है।

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