भारत में समुदाय विशेष, महिलाओं, और आदिवासियों को ‘दुनिया को नोटिस’ करने के लिए ‘ब्लैक लाइव्स मैटर’ विरोध प्रदर्शन की तरह विरोध करने का आग्रह कर उन्हें भड़काने वाले एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया के पूर्व कार्यकारी निदेशक आकार पटेल का ट्विटर एकाउंट ‘इंडिया’ के लिए सस्पेंड (विदस्टैंड) कर दिया गया है।
इस पर राजदीप सरदेसाई आकार पटेल के बचाव में उतर गए हैं। राजदीप ने आकार पटेल के अकाउंट सस्पेंड होने पर ट्वीट किया है, जिसमें उन्होंने लिखा है – “
“ट्विटर एक अजीब हालात में: यह पूर्व एमनेस्टी प्रमुख और पत्रकार आकार पटेल को ब्लॉक करता है, लेकिन अपमानजनक अनाम हैंडल को सांप्रदायिक जहर उगलना जारी रखने की अनुमति देगा.. एक स्पष्ट पारदर्शी नीति की आवश्यकता है।
Twitter in a strange space: blocks former Amnesty head and journalist @Aakar__Patel account but will allow abusive anonymous handles to continue to spew communal venom.. need to have a clear transparent policy..
भड़काऊ ट्वीट करने के बाद पत्रकार और एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया के कार्यकारी निदेशक आकार पटेल के खिलाफ FIR दर्ज की गई थी। उनके खिलाफ में बेंगलुरु के जेसी नगर पुलिस स्टेशन के पुलिस इंस्पेक्टर नागराजा डीआर द्वारा मुकदमा दर्ज कराया गया है।
इसमें पटेल पर आरोप लगाया गया है कि उन्होंने पूरे भारत में अमेरिका की तरह के विरोध-प्रदर्शन आयोजित करने के लिए अल्पसंख्यक समुदायों के लोगों को भड़काने और उकसाने की कोशिश की।
दरअसल, 31 मई को आकार पटेल ने ‘कोलोराडो टाइम्स रिकॉर्डर’ के एक ट्वीट के हवाले से एक ट्वीट किया था, जिसमें अमेरिका में विरोध-प्रदर्शन कर रहे लोगों का एक वीडियो शेयर किया गया था। इस वीडियो के साथ ट्वीट में आकार पटेल ने लिखा था कि भारत के खास समुदाय, दलितों, आदिवासियों, महिलाओं और गरीबों को भी इनकी तरह विरोध-प्रदर्शन करने की आवश्यकता है। इसे दुनिया देखेगी। प्रदर्शन करना भी एक कला है।
भड़काऊ ट्वीट के कारण FIR हो चुकी है दर्ज
आकार पटेल के खिलाफ आईपीसी की धारा 505 (1)(बी), धारा 153 (दंगा भड़काने के इरादे से गलत तरीके से उकसाना) और धारा 117 के तहत मुकदमा दर्ज किया गया है।
पुलिस अधिकारियों ने कहा है कि साइबर क्राइम पुलिस और राज्य के खुफिया अधिकारी अमेरिका में हिंसक विरोध प्रदर्शन में लिप्त लोगों की प्रतिक्रियाओं पर नजर रखे हुए हैं। एक अधिकारी ने कहा कि वह मामले की जाँच में जुटे हुए हैं।
आकार पटेल ने ‘कोलाराडो टाइम्स रिकॉर्डर’ का एक वीडियो क्लिप पोस्ट किया था जिसमें दिख रहा है कि हज़ारों लोग कोलाराडो के कैपिटोल बिल्डिंग के पास अश्वेत अमरीकी नागरिक जॉर्ज फ़्लॉयड की हत्या के ख़िलाफ़ विरोध-प्रदर्शन कर रहे हैं।
हालाँकि, आकार पटेल द्वारा पोस्ट किए गए वीडियो में एक शांतिपूर्ण विरोध दिखाया गया था। लेकिन अमेरिका में चल रहे विरोध-प्रदर्शनों में हिंसा, दंगा, आगजनी और लूटपाट जमकर हुई है। आपको बता दें कि मिनियापोलिस में एक श्वेत पुलिस अधिकारी द्वारा अफ्रीकी अमेरिकी जॉर्ज फ्लॉयड की कथित हत्या के बाद बड़े स्तर पर विरोध-प्रदर्शन हुए, लेकिन बाद में ये हिंसा और दंगों में तब्दील हो गए।
इतना ही नहीं प्रदर्शनकारियों ने पुलिस टीमों पर भी हमला किया है। ऐतिहासिक स्थानों सहित पुलिस वाहनों को निशाना बनाते हुए उग्र प्रदर्शनकारियों ने दुकानों को लूटा और कई घरों व सार्वजनिक संपत्तियों को आग के हवाले कर दिया।
इसके बाद से भारत में वाम उदारवादी समुदाय से इसी तरह के हिंसक विरोध-प्रदर्शनों का आह्वान कर रहे हैं। इसे देखते हुए अमेरिका में हुई हिंसा की तर्ज पर भारत में हिंसा को उकसाने वाली पोस्टों को लेकर सुरक्षा एजेंसियाँ सतर्क हो गई हैं।
अपने खिलाफ दर्ज मुकदमे पर प्रतिक्रिया देते हुए आकर पटेल ने डेक्कन हेराल्ड को बताया कि मुझे नहीं लगता कि यह मामला दर्ज किया जाना चाहिए था। मुझे नहीं लगता इस केस में कुछ आगे हो सकेगा।
बिहार के सीतामढ़ी जिले से सटे नेपाल सीमा पर गोलीबारी में एक की मौत हो गई और तीन अन्य जख्मी हो गए। घटना शुक्रवार (12 जून 2020) की है। नेपाली सुरक्षा बलों ने 15 राउंड फायरिंग की।
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार सोनबरसा थाना क्षेत्र के पिपरा परसाइन पंचायत अंतर्गत लालबदी स्थित जानकी नगर गाँव में कुछ मजदूर खेत में काम कर रहे थे कि अचानक नेपाली सुरक्षा बलों ने फायरिंग कर दी। इसमें नागेश्वर राय के 25 वर्षीय पुत्र डिकेश कुमार की मौत हो गई।
सशस्त्र सीमा बल (SSB) के डीजी कुमार राजेश चंद्रा के अनुसार सुबह 8:40 मिनट पर पर एक परिवार नेपाल जा रहा था। नेपाली सुरक्षा बलों ने उन्हें रोका और वापस जाने को कहा। इस दौरान कहासुनी हो गई। नेपाली सुरक्षा बलों ने 15 राउंड फायरिंग की जिसमें तीन लोग जख्मी हो गए।
उन्होंने बताया कि एक नागरिक को नेपाली सुरक्षा बलों ने हिरासत में भी लिया है। उसकी रिहाई के लिए बातचीत की जा रही है। सब कुछ सीमा पर नेपाल के हिस्से में हुआ।
Bihar: One dead, two injured in firing in Sitamarhi near India-Nepal border, confirms Sashastra Seema Bal IG of Bihar sector. Locals allege it was caused due to firing from Nepal side. pic.twitter.com/zr5YaJN9YE
विनोद राम के पुत्र उमेश राम के दाहिना हाथ में तो सहोरबा निवासी बिंदेश्वर ठाकुर के पुत्र उदय ठाकुर को दाएं जाँघ में गोली लगी है। घायल भारतीय नागरिकों का सीतामढ़ी के निजी अस्पताल में इलाज के लिए भर्ती कराया गया है।
स्थानीय लोगों के अनुसार नेपाली सुरक्षा बलों ने गाँव के वशिष्ठ राय के पुत्र लगन राय को अपने कब्जे में भी ले रखा है। उसको गोली का लगी हैं या नहीं, इसकी जानकारी नहीं मिल पाई है। भारत-नेपाल सीमा पर इस तरह की यह पहली घटना करार दी जा रही है।
निर्दोष भारतीय नागरिकों पर नेपाल पुलिस द्वारा गोली चलने के बाद भारत-नेपाल की बिहार से लगती सीमा पर भारतीय एसएसबी और स्थानीय पुलिस लालबंदी की तैनाती कर दी गईं हैं। मामले को लेकर जाँच के भी आदेश दे दिए गए हैं।
बता दें कि हाल ही में नेपाल ने 18 मई को नया राजनीतिक नक्शा जारी किया था। इसमें कालापानी, लिपुलेख और लिमिपियाधुरा को अपने क्षेत्र के रूप में दिखाया था। नेपाल ने अपने नक़्शे में कुल 335 वर्ग किलोमीटर के इलाके को शामिल किया था। इसके बाद 22 मई को संसद में संविधान संशोधन का प्रस्ताव पेश किया था।
गौरतलब है कि नेपाल सरकार द्वारा लिम्पियाधुरा, कालापानी और लिपुलेख को अपने नए राजनीतिक नक़्शे में दिखाने पर भारत सरकार की कड़ी प्रतिक्रिया दी थी। भारतीय विदेश मंत्रालय ने कहा था कि देश के किसी क्षेत्र पर इस तरह के दावे को भारत द्वारा नहीं स्वीकार किया जाएगा। भारतीय विदेश मंत्रालय ने बयान जारी कर कहा कि नेपाल सरकार ने जो आधिकारिक नक़्शा जारी किया है उसमें भारतीय क्षेत्र को नेपाल में दिखाया गया है, ये एकतरफ़ा हरकत ऐतिहासिक तथ्यों और सबूतों पर आधारित नहीं है। इसका भारत विरोध करता है।
वहीं जनता समाजवादी पार्टी की सांसद सरिता गिरि ने नेपाल सरकार द्वारा नए नक्शे को संविधान का हिस्सा बनाने के लिए लाए गए संविधान संशोधन प्रस्ताव पर अपना अलग से संशोधन प्रस्ताव लाते हुए उन्होंने इसे इस विवादित संविधान संशोधन को खारिज करने की माँग की थी। वहीं, उनकी पार्टी ने उनको तुरंत अपना यह संशोधन प्रस्ताव वापस लेने का सख्त निर्देश दिया। लेकिन, सरिता गिरी ने साफ-साफ कहा था कि चीन के इशारों पर नेपाल सरकार नक्शे में बदलाव करना चाहती है।
सरिता गिरि ने ये भी दावा किया था कि नेपाल की जनता भी नहीं चाहती है कि नक्शे को लेकर भारत के साथ कोई विवाद हो। उनकी राय थी कि नेपाल का नया नक्शा जारी करने से पहले नेपाल को भारत से बातचीत करनी चाहिए थी।
कोरोना मरीजों के उपचार में लापरवाही और संक्रमण से मरे लोगों के शव के साथ दुर्व्यवहार पर सुप्रीम कोर्ट ने नाराजगी जताई है। दिल्ली की केजरीवाल सरकार को फटकार लगाते हुए उससे जवाब मॉंगा है।
शीर्ष अदालत ने कहा है कि दिल्ली के अस्पतालों का बुरा हाल है। शवों के साथ अनुचित व्यवहार किया जा रहा है। कुछ शव कूड़े में मिले हैं। यह बताता है कि लोगों के साथ जानवरों से भी बदतर सलूक किया जा रहा है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दिल्ली के सरकारी अस्पताल शवों का तरीके से रखरखाव नहीं कर रहे। कोरोना संक्रमितों की मौत के बाद उनके परिजनों को सूचना नहीं दी जा रही। कुछ मामलों में परिजन अपनों के अंतिम संस्कार में शामिल तक नहीं हो पाए। दिल्ली के लोकनायक जयप्रकाश हॉस्पिटल (LNJP) की स्थिति को गंभीरता से लेते हुए अदालत ने उससे भी जवाब तलब किया है।
Supreme Court says that the Government hospitals in Delhi aren’t giving due care and concern to the bodies. The patients’ families aren’t even informed about deaths. In some cases, families haven’t been able to attend the last rites too. https://t.co/493yw5xZVS
जस्टिस एमआर शाह ने कहा, “लाशें किस तरह से रखी जा रही हैं? ये क्या हो रहा है? अगर लाशों के साथ ऐसा सलूक हो रहा है, अगर लाशें कचरे के ढेर में मिल रही हैं तो यह इंसानों के साथ जानवरों से भी बदतर सलूक है।”
शीर्ष अदालत ने इस मामले पर स्वत: संज्ञान लेते हुए मामले की सुनवाई जस्टिस अशोक भूषण, जस्टिस संजय किशन कौल और जस्टिस एमआर शाह की पीठ को सौंपा था। शुक्रवार (12 जून, 2020) को पीठ ने शव के रखरखाव के तरीके पर दिल्ली सरकार पर सख्त टिप्पणी की। कहा कि होम मिनिस्ट्री की गाइडलाइंस का अनुपालन नहीं हो रहा है। अस्पताल डेड बॉडी का सही तरह से रखरखाव और निपटारा नहीं कर रहे।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हमें शवों से ज्यादा जिंदा मरीजों की चिंता है। उनकी भी काफी दुर्दशा हो रही है, उन्हें शवों के साथ रहना पड़ रहा है, यह काफी दुर्भाग्यपूर्ण है। सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली में कोरोना टेस्ट की संख्या कम करने पर भी चिंता जताई। कहा कि सरकारी अस्पताल में बेड खाली पड़े हैं, लेकिन लोगों को मरीजों को लेकर इधर-उधर भागना पड़ रहा है।
सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली के अलावा महाराष्ट्र, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल को भी इस मामले में नोटिस जारी किया है। इन राज्यों के मुख्य सचिव से कोरोना संक्रमितों के उपचार की स्थिति को लेकर रिपोर्ट मॉंगी गई है। मामले की अगली सुनवाई बुधवार को होगी। शीर्ष अदालत ने संक्रमितों की मौत के बाद उनके शव रखरखाब को लेकर आई मीडिया रिपोर्टों के बाद इस मामले पर संज्ञान लिया था।
सवर्णों द्वारा अनुसूचित जाति के लोगों पर अत्याचार की झूठी और भ्रामक ख़बरें आजकल सोशल मीडिया ही नहीं बल्कि मुख्यधारा की मीडिया में भी आम होती नजर आ रही हैं। हाल ही में एक झूठी खबर में यह साबित करने का प्रयास किया गया था कि अमरोहा में एक युवक को दलित होने के कारण मंदिर में प्रवेश नहीं करने दिया गया और उसे गोली मार दी गई और अब एक नए प्रकरण में भी दलितों पर ‘ऊँची जाति’ वालों द्वारा अत्याचार का नैरेटिव बनाने के लिए झूठी खबर प्रकाशित की जा रही हैं।
कुछ ऐसी रिपोर्ट्स सामने आई हैं, जिनमें दावा किया गया कि लखनऊ के बरौली खलीलाबाद गाँव में गत 04 जून को एक ब्राह्मण व्यक्ति के घर से चोरी करते पकड़े जाने के बाद तीन दलितों को बाँधकर पीटा गया, उनके साथ बदसलूकी की गई और उनके गले में ‘जूतों की माला’ पहनाकर उनकी परेड करवाई गई।
ये कौन हैं??
This happened in Lucknow’s Khalilabad village on 4 June.
Dalit men were beaten up, tonsured, paraded with shoe garland around their neck.
प्रोपेगेंडा वेबसाइट ‘द क्विंट’ की एक रिपोर्ट को शेयर करते हुए कुछ चिरपरिचित एजेंडाबाजों ने ‘दलित लाइव्स मैटर’ (Dalit Lives Matter) हैशटैग के साथ इस झूठी खबर को शेयर करना शुरू किया। ऐसा करने वालों में वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण सबसे पहले व्यक्ति थे।
एक कदम आगे जाते हुए कश्मीरी पत्रकार रकीब हमीद नाइक, जो ‘द वायर’ और ‘द कारवां’ जैसे वामपंथी प्रोपेगेंडा वेबसाइट्स के लिए भी लिखते हैं, ने यह भी दावा किया कि COVID -19 के बीच जारी लॉकडाउन के दौरान दलितों के खिलाफ ऊँची-जाति की क्रूरता में अचानक उछाल आया है।
इसके बाद ‘द क्विंट’ की इस तथाकथित रिपोर्ट को कई अन्य लोगों द्वारा भी शेयर किया गया। ‘द क्विंट’ में 11 जून को प्रकाशित इस सनसनीखेज लेख का शीर्षक है – “UP में 3 दलितों के साथ मारपीट, सिर मुँड़वा कर गाँव में घुमाया।”
Three Dalit men were tied up, beaten, forcefully tonsured and paraded around with shoes hung around their necks in Lucknow’s Barauli Khalilabad village by the upper caste men. https://t.co/iw3VkxBTBJ
— IndianAmericanMuslimCouncil (@IAMCouncil) June 11, 2020
क्या कहती है ‘द क्विंट’ की झूठी रिपोर्ट
‘द क्विंट’ की इस रिपोर्ट में लिखा है – “उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में तीन दलित लोगों के साथ मारपीट की खबर सामने आई है। तीनों के साथ मारपीट की गई, जबरन सिर मुँड़वा दिया गया और गले में जूते टाँगगकर उन्हें घुमाया गया। ये घटना लखनऊ के बरौली खलिलाबाद गाँव में 4 जून की बताई जा रही है।”
PGI पुलिस स्टेशन इंचार्ज केके मिश्रा के हवाले से ‘द क्विंट’ ने लिखा – “तीन दलित लोगों को कथित तौर पर एक ब्राह्मण शख्स के घर से पंखा चुराते हुए देखा गया। परिवार के तीन लोगों को पकड़ने के बाद, गाँव के और लोग भी इकट्ठा हो गए और फिर भीड़ ने उन्हें पीटना शुरू कर दिया। उन्हें और अपमानित करने के लिए, उन्होंने उनका सिर मुँडवा दिया और गले में चप्पलें टाँगकर उन्हें गाँव में घुमाया।”
इस खबर को जातिवादी स्वरुप देकर अन्य समाचार स्रोतों ने भी इसे प्रकाशित किया है।
पुलिस ने स्पष्ट किया कि इस घटना में कोई जातिगत एंगल था ही नहीं
हालाँकि, अमरोहा की घटना की तरह ही ‘द क्विंट’ के ये दावे भी सच नहीं हैं। लखनऊ पुलिस ने इस पर स्पष्ट किया है कि इस दुर्भाग्यपूर्ण घटना का जातिगत पूर्वग्रह से कोई लेना-देना नहीं था और यह महज एक चोरी का मामला था।
लखनऊ पुलिस ने कहा कि उस दिन गाँव से दो घटनाओं की सूचना मिली थी। पहली घटना में, कुछ चोरों को ग्रामीणों ने चोरी के सामान के साथ रंगे हाथों पकड़ा था। चोर सवर्ण और अनुसूचित, दोनों ही जाति के थे और इन मीडिया पोर्टलों द्वारा किए गए दावों के विपरीत कि वे सभी दलित थे।
लखनऊ में दलित युवकों के साथ ब्राह्मण समुदाय द्वारा अपमानजनक कृत्य मामले में भैया @BhimArmyChief के आगाह के बाद 02 लोगों की गिरफ्तारी हुई है। अन्य की दबिश की जा रही है।@lkopolice किसी भी आरोपी को छोड़े न। सबकी गिरफ्तारी सुनिश्चित की जाए। जातीय जुल्म हरगिज मंजूर नहीं। pic.twitter.com/I1ZKN7RXxI
— Chandra Shekhar Aazad (@BhimArmyChief_) June 10, 2020
वास्तव में, जिन ग्रामीणों ने उन चोरों को रंगे हाथों पकड़ा था, वे गुस्से में थे, उन्हें पीटा और उनके सिर के बाल काट दिए। लखनऊ पुलिस ने पुष्टि की कि आरोपितों के साथ-साथ उन ग्रामीणों के खिलाफ भी मामले दर्ज किए गए हैं, जिन्होंने आरोपितों को पीटा और दुर्व्यवहार किया।
पुलिस ने पुष्टि की कि दो ग्रामीण, जो मुंडन और पीटने वालों में से थे, उन आरोपितों को पहले ही गिरफ्तार किया जा चुका है। घटना में शामिल बाकी ग्रामीणों की तलाश में पुलिस लगी हुई थी। बयान में यह भी कहा गया है कि चोरों की पिटाई और परेड करने वाले लोग भी कई जातियों के थे। यानी, जैसा कि ‘द क्विंट’ और अन्य समाचार स्रोतों ने इसे सवर्ण और दलित का मुद्दा बताने का प्रयास किया है, वह बेबुनियाद और झूठा है।
अमरोहा की घटना को भी मीडिया गिरोह ने दिया था जातिवादी एंगल
उत्तर प्रदेश के अमरोहा जिला स्थित हसनपुर कोतवाली क्षेत्र के गाँव डोमखेड़ा में गत 6 जून की रात 4 युवकों ने आपसी रंजिश के चलते घर में घुस कर एक युवक की गोली मारकर हत्या कर दी। मीडिया के कई प्रमुख स्रोतों ने इस खबर में स्पष्ट तौर पर यह साबित करने का प्रयास किया है कि अमरोहा में एक दलित को मंदिर में जाने के कारण गोली से मार दिया गया।
जबकि वास्तविकता स्वयं अमरोहा पुलिस ने सामने रखी। इस घटना पर अमरोहा पुलिस ने खुद छानबीन के बाद एक वीडियो जारी कर स्पष्ट करते हुए कहा कि इस घटना में युवक की जाति और मंदिर में प्रवेश का कोई प्रसंग था ही नहीं। इस वीडियो में अमरोहा पुलिस, थाना हसनपुर क्षेत्रान्तर्गत ग्राम डोमखेड़ा में नाबालिग युवक की हत्या करने के सम्बन्ध में सुपरिटेंडेंट ऑफ पुलिस (SP) विपिन ताडा ने कहा –
“मामला दर्ज कर के जाँच शुरू कर दी है। दो की गिरफ्तारी भी हो गई है। इनका ये कहना है कि जो मृतक है उनके भाई के साथ में इनके आम के बगीचे के ठेकों का और मधुमक्खी पालन की साझेदारी थी, जिसमें कि इनके 5 हज़ार रुपए मृतक के भाई पर शेष थे। इसी बात के तकादे को लेकर मृतक और अभियुक्त पक्ष का झगड़ा हुआ, जिसके बाद अभियुक्त गाँव छोड़कर भाग गया। फिर बदला लेने के उद्देश्य से अचानक गाँव में आया और इस युवक को गोली मारकर फरार हो गया। 2 की गिरफ्तारी हो गई है, इनसे पूछताछ करके बाकियों की गिरफ्तारी भी होगी।”
अमरोहा की घटना को भी डाली और सवर्णों के बीच संघर्ष साबित करने वाला गिरोह भी ‘द क्विंट’ की ही तरह वामपंथी प्रोपेगेंडा का हिस्सा थे, जिसमें प्रमुख नाम, टेलीग्राफ और अपने फैक्ट चेकर होने का दावा करने वाले ऑल्टन्यूज़ के संस्थापक थे।
सोशल मीडिया पर इस घटना को दलित पर सवर्णों के अत्याचार के रूप में जमकर शेयर किया गया, जबकि वास्तविकता क्विंट, वायर, लल्लनटॉप, टेलीग्राफ, ऑल्टन्यूज़ जैसे मीडिया गिरोह की हेडलाइन से अलग यह है कि यह मामला मृतक युवक की जाति या मंदिर में पूजा को लेकर नहीं बल्कि आपस में मिलजुलकर शुरू किए गए बिजनेस को लेकर था।
पश्चिम बंगाल सरकार ने U से UGLY का मतलब समझाने के लिए एक काले व्यक्ति के चित्र को प्रयोग करने वाली वर्धमान म्युनिसिपल गर्ल्स हाई स्कूल की प्रधान शिक्षिका और एक अन्य शिक्षिका को बृहस्पतिवार (11 जून,2020) को निलंबित कर दिया गया।
मीडिया द्वारा इस मामले को उठाने के बाद इसपर तुरंत एक्शन लिया गया। घटना को संज्ञान में लाने के लिए शिक्षा मंत्री पार्थ चटर्जी ने मीडियाकर्मियों को धन्यवाद भी दिया। उन्होंने बताया कि यह दुर्भावनापूर्ण और आपराधिक मामला है। जिसको लेकर स्कूल की दो शिक्षकों श्रावणी मंडल और बरणाली दास को सस्पेंड कर दिया गया हैं।
West Bengal suspends two at Bardhaman school after book terms dark-skinned as ‘ugly’
शिक्षा मंत्री पार्थ चटर्जी ने मीडिया से कहा, “यह पुस्तक शिक्षा विभाग द्वारा निर्दिष्ट पाठ्यपुस्तकों का हिस्सा नहीं है। स्कूल ने स्वयं यह किताब शामिल की है। छात्रों के मन में पूर्वाग्रह स्थापित करने वाले किसी भी कृत्य को हम कतई बर्दाश्त नहीं करेंगे।”
क्या था मामला
दरअसल, पश्चिम बंगाल के बर्दवान जिले के एक प्राथमिक स्कूल में वर्णमाला और शब्दों का ज्ञान देने वाली बच्चों की किताब में U का अर्थ UGLY बताया गया और UGLY का मतलब समझाने के लिए इसमे एक काले व्यक्ति के चित्र को प्रयोग में लाया गया। काले रंग को बदसूरती का पर्याय बताने वाले चित्र को पाठ्यक्रम की किताबों में देखते हुए,पढ़ने वाले बच्चों के माता-पिता ने उनकी किताब में दर्शाए गए एक चित्रण को लेकर विरोध किया था।
यह किताब पश्चिम बंगाल के पूर्वी बर्दवान जिले के बर्दवान शहर में स्थित सरकारी सहायता प्राप्त म्युनिसिपल गर्ल्स हाई स्कूल के प्री-प्राइमरी डिपार्टमेंट की थी।
इस पुस्तक में ब्लैक मैन को लेकर यह विवाद उस समय सामने आया, जब अमेरिका के मिनियापोलिस में पुलिस हिरासत में एक काले व्यक्ति जॉर्ज फ्लॉयड की मौत के बाद दुनिया, विशेष रूप से अमेरिका में नस्लवाद के खिलाफ विरोध प्रदर्शन जारी है।
इंडिया टुडे की रिपोर्ट के अनुसार, इस संबंध में कोलकाता ईवनिंग कॉलेज के शिक्षक सुदीप मजूमदार ने कहा, “मेरी बेटी इस नगर निगम हाई स्कूल में पढ़ रही है। मैं अपनी बेटी को पढ़ाते हुए इस विषय पर आया था। इस तरह से एक काले व्यक्ति को बदसूरत कहकर बच्चों को शिक्षित करना पूरी तरह से गलत है।”
उन्होंने कहा, “इस किताब को जल्द ही वापस ले लिया जाना चाहिए। किसी भी स्थिति में, बच्चों को अश्वेतों के नाम पर दी जा रही शिक्षा उनके कोमल दिलों को हीन भावना से भरने और अश्वेतों के साथ भेदभाव करने का काम करेगी। यह गलत है।”
इसके बाद स्कूल प्राथमिक शिक्षा के जिला निरीक्षक स्वप्न कुमार दत्त ने भी इस हरकत को गलत बताया था। वहीं, इस मामले पर जिला इंस्पेक्टर ने भी कहा था कि “इस तरह की किताब स्कूल द्वारा दी गई आधिकारिक किताब नहीं है। हम इसके बारे में अभी स्कूल से बात करेंगे। अगर जरूरत हो तो किताब बदलनी चाहिए। ”
गौरतलब है कि बंगाल के स्कूलों में बच्चों को पढ़ाई जाने वाली किताबों में ऐसी त्रुटि पहली बार सामने नहीं आई है। इससे पहले पश्चिम बंगाल के ही एक स्कूल की किताब में फ्लाइंग सिख के नाम पर फरहान अख्तर की तस्वीर दिखाई गई थी। जबकि ये बात सर्वविख्यात है कि फ्लाइंग सिख की उपाधि भारतीय एथलीट मिल्खा सिंह को मिली
‘पाकिस्तान जिंदाबाद’ का नारा बुलंद करने वाली 19 वर्षीय अमूल्या लियोन की जमानत याचिका को बेंगलुरु की एक अदालत ने गुरुवार (11 मई, 2020) रात को स्वीकार कर लिया है। अमूल्या लियोना, वह लड़की है, जिसने 20 फरवरी को एक एंटी-सीएए-एनआरसी रैली में ‘पाकिस्तान जिंदाबाद’ का नारा बुलंद किया था।
Karnataka: A Bengaluru court granted bail to Amulya Leona who raised the slogan of ‘Pakistan zindabad’ at an anti-CAA-NRC rally on February 20, last night. (File pic) pic.twitter.com/WgoBQGO5Wk
देश विरोधी नारे लगाने के जुर्म में उसकी गिरफ्तारी हुई थी। गिरफ्तारी के 90 दिन की अवधि के अंदर यानी कि 20 मई तक बंगलूरू पुलिस को उसके खिलाफ चार्जशीट दाखिल करना था। मगर अवधि पूरे होने के बाद भी पुलिस द्वारा उसके खिलाफ कोई चार्जशीट नहीं दाखिल की गई। जिसके चलते मजिस्ट्रेट कोर्ट ने उसे ‘डिफॉल्ट जमानत’ दे दी है। अमूल्या के खिलाफ पुलिस की तरफ से तीन जून को एफआईआर दर्ज किया गया था।
गौरतलब है कि एआईएमआईएम (AIMIM) प्रमुख सांसद असदुद्दीन ओवैसी की रैली में ‘पाकिस्तान जिंदाबाद’ के नारे लगाने वाली अमूल्या लियोना की जमानत याचिका बंगलुरु की एक स्थानीय अदालत ने बुधवार 10 जून को खारिज करते हुए सिविल और सेशन जज ने कहा था कि अगर अमूल्या को जमानत दी जाती है, तो वह फरार हो सकती है।
जज विद्याधर शिरहट्टी ने यह भी कहा था कि अमूल्या लियोना जमानत दिए जाने पर ऐसे कार्यों में संलिप्त हो सकती हैं जो कि शांति को नुकसान पहुँचा सकता है। सरकारी वकील ने तर्क दिया कि आरोपित अमूल्या लोगों को कानून और व्यवस्था की समस्या पैदा करने के लिए उकसाने की कोशिश कर रही थी। वकील ने अदालत के समक्ष यह भी बताया कि वह उन गतिविधियों में भी शामिल थी जिसमें एक छात्र प्रदर्शन के दौरान “फ## हिंदुत्व” लिखा हुआ पोस्टर लहरा रहा था।
सरकारी वकील ने कहा कि उसे जमानत दे दी जाती है तो वह दोबारा से ऐसे अपराध कर सकती है। हालाँकि, आरोपित के बचाव में कहा गया कि वह पाकिस्तान और भारत सहित सभी देशों के जिंदाबाद के नारे लगा कर यूनिवर्सल ह्यूमैनिटी का संदेश देने की कोशिश कर रही थी।
पाकिस्तान के समर्थन में नारे लगाने पर उसे गिरफ्तार कर लिया गया और भारतीय दंड संहिता की धारा 124 A (देशद्रोह) के तहत मामला दर्ज होने के बाद उसे 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया था।
बता दें जाँच के दौरान, अल्ट्रा लेफ्ट-विंग प्रदर्शनकारी अमूल्या लियोना ने इस बात खुलासा किया था कि इन सब प्रदर्शनों के लिए उसे पैसे दिए गए थे। उसने यह भी कहा था कि कैसे पिछले साल दिसंबर में नागरिकता संशोधन अधिनियम के खिलाफ आंदोलन शुरू होने के बाद इस विरोध-प्रदर्शन को आयोजन करने वाले लोग उसके सारे खर्चे उठा रहे थे।
वहीं अमूल्या लियोना को गिरफ़्तारी से एक महीने पहले एक यूट्यूब चैनल पर इंटरव्यू देते हुए भी देखा गया था। जहाँ वो भारत विरोधी एजेंडे का समर्थन करने के लिए वामपंथियों के तौर-तरीकों को समझा रही थी। इंटरव्यू में उसने कहा था कि इन सब प्रदर्शनों के लिए उन्हें पैसे दिए जाते थे। साथ ही उनके भाषण और नारे ‘विरोध प्रदर्शन’ का आयोजन करने वाले समूह तैयार करते हैं।
अश्वेत जॉर्ज फ्लॉयड की मौत के बाद अमेरिका के कई शहरों में नस्लवाद को लेकर बड़े स्तर पर विरोध प्रदर्शन और हिंसा हो रही हैं। विरोध प्रदर्शनकारियों ने अब वहाँ पर उपनिवेशवाद और अश्वेतों की गुलामी को समर्थन देने वालों की मूर्तियों को निशाना बनाना शुरू कर दिया है और उन्हें हटाए जाने की माँग भी जोर-शोर से उठ रही हैं। इसी बीच, बॉस्टन, मियामी और वर्जीनिया में क्रिस्टोफर कोलंबस (Christopher Columbus s) की मूर्तियों को तोड़ दिया गया।
VIDEO: A statue of Christopher Columbus in Boston has been beheaded, as calls to remove sculptures commemorating colonizers and slavers sweep the US.https://t.co/CICkVM4wg6pic.twitter.com/MpURt87ydK
मिनेसोटा प्रांत की राजधानी सेंट पॉल शहर में प्रदर्शनकारियों ने जिस इतालवी खोजकर्ता कोलंबस की मूर्ती की गर्दन काटी है, उन्हें स्कूल की किताबों में नई दुनिया (The New World) का खोज करने वाले इंसान के रूप में पढ़ाया जाता है। इसके साथ ही, कई लोगों द्वारा मूल अमेरिकियों के खिलाफ नरसंहार के प्रतीक के रूप में भी वह जाने जाते हैं। उनकी प्रतिमाओं को बड़े स्तर पर नुकसान पहुँचाया जा रहा है।
अमेरिकी मूल के कार्यकर्ताओं ने कोलंबस को सम्मानित करने के विरुद्ध लड़ाई लड़ी है। उनका कहना है कि अमेरिका में उनके अभियानों से पूर्वजों का नरसंहार किया गया था। मिनेसोटा के सेंट पॉल में गुस्साए प्रदर्शनकारियों ने कोलंबस की 10 फीट की कांस्य प्रतिमा के चारों और रस्सी लगाई और मूर्ति को पत्थर की चौकी से खींचकर उखाड़ दिया गया।
क्रिस्टोफर कोलंबस की प्रतिमा को 10 जून, 2020 को गिरा दिया गया
अमेरिकी सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि कोलंबस द्वारा अमेरिका की खोज के चलते ही उपनिवेश और उनके पूर्वजों का नरसंहार हुआ था। वर्ष 1492 में कोलंबस भारत की खोज के लिए निकले थे, लेकिन उन्होंने गलती से अमेरिकी महाद्वीप की खोज की थी।
क्रिस्टोफर कोलंबस
कोलंबस को लंबे समय से ‘नई दुनिया’ का ‘खोजकर्ता’ कहा जाता है, हालाँकि लेइफ एरिकसन (Leif Eriksson) जैसे ‘वाइकिंग’ (डेनमार्क मूल के खुनी लूटेरे) ने कई शताब्दियों पहले उत्तरी अमेरिका का दौरा किया था।
प्रदर्शनकारियों ने जेफरसन डेविस की प्रतिमा भी तोड़ दी है। अमेरिका के रिचमंड, सेंट पॉल और बोस्टन शहरों में बुधवार (जून 10, 2020) को इन प्रतिमाओं को तोड़ने के मामले सामने आए। प्रदर्शनकारियों ने एक दिन पहले ही रिचमंड में कोलंबस की वर्ष 1927 में स्थापित प्रतिमा उखाड़कर झील में फेंक दी थी।
पाकिस्तानी सेना को एलओसी पर अपनी नापाक हरकत का खामियाजा एक बार फिर भुगतना पड़ा। पाक सेना ने राजौरी जिले के तरकुंडी सेक्टर में भारी गोलाबारी की, जिसमें भारतीय सेना के नायक वीरगति को प्राप्त हो गए। वहीं, सेना का एक जवान और छुट्टी पर घर आए एक पुलिसकर्मी घायल हो गए। भारतीय सेना की पाक के इस सीजफायर उल्लंघन पर जवाबी कार्रवाई करते हुए पाक सेना की दो चौकियाँ पूरी तरह नष्ट कर दिन। साथ ही पाक सेना के एक मेजर रैंक के अधिकारी सहित पाँच सैनिकों के मारे जाने की सूचना है।
गौरतलब है कि पाकिस्तानी सेना की तरफ से बुधवार (10 जून,2020) और गुरुवार (11 जून, 2020) को राजौरी के तरकुंडी सेक्टर में की जा रहीं गोलाबारी का भारतीय सेना ने मुँह तोड़ जवाब देते हुए पाक सेना की दो चौकियाँ पूरी तरह नष्ट कर दी। साथ ही पाक सेना के एक मेजर रैंक के अधिकारी सहित पाँच सैनिकों को मार गिराया।
Indian Army causes heavy damage to Pakistan Army posts across LoC
कोरोना काल के दौरान पाकिस्तानी सेना लगातार जम्मू-कश्मीर में नियंत्रण रेखा (एलओसी) पर संघर्ष विराम का उल्लंघन कर रही है। वहीं बुधवार रात को भी राजौरी जिले के मंजाकोटे और तारकुंडी सेक्टर में पाक सेना ने भारतीय सेना की अग्रिम चौकियों को और रिहायशी क्षेत्रों को निशाना बनाकर एक साथ अचानक मोर्टार दागने शुरू कर दिए थे।
After losing jawan in ceasefire violation, Indian Army destroys Pakistan military posts across LoC.https://t.co/xTIeZRNUet
पाक की तरफ से किए गए हमले के दौरान पंजाब बटाला के गाँव हरचोवाल के रहने वाले जवान नायक गुरचरण सिंह (28) वीरगति को प्राप्त हाे गए और 1 पुलिसकर्मी भी घायल हो गया। पाक की तरफ से की जा रही गोलीबारी में वहाँ रहने वाले कुछ मवेशी भी इसकी चपेट में आ गए। साथ ही स्थानीय मकानों को भी नुकसान पहुँचा है।
भारतीय सेना की कार्रवाई में 5 सैनिकों के मारे जाने और चौकियों के तबाह होने से बौखलाई पाक सेना ने गुरुवार रात को जम्मू कश्मीर के राजौरी और पुंछ सेक्टर में सीजफायर का उल्लंघन किया। पाकिस्तानी सेना की ओर से लगातार इन सेक्टर में फायरिंग की गई। जिसमें आसपास के गाँवों में भी कई गोले बारूद गिरे। जिसकी वजह से वहाँ खौफ का माहौल बना हुआ है।
बता दें पाकिस्तानी सेना लगातार भारत में घुसपैठ करने की कोशिश कर रही हैं। उनकी कोशिशों को नाकाम करते हुए भारतीय सैनिकों ने पिछले साल के मुकाबले इस साल पाक के कई सैनिकों को मार गिराया हैं। 10 दिन में ही पाकिस्तान सेना ने 114 बार सीजफायर का उल्लंघन किया है।
गौरतलब है की इसी हफ्ते जम्मू कश्मीर के अनंतनाग जिले में आतंकियों ने सोमवार (जून 8, 2020) को कॉन्ग्रेस के हिंदू सरपंच अजय पंडिता (भारती) की गोली मारकर हत्या कर दी थी। अजय पंडिता की हत्या उस वक्त की गई, जब वो बागान में गए हुए थे। आतंकियों ने पीछे से उन पर वार कर मौत की नींद सुला दी। कश्मीर में हिंदुओं की हत्या कोई नई बात नहीं है और अजय पंडिता की हत्या भी इसीलिए हुई, क्योंकि वो एक कश्मीरी पंडित हिंदू थे।
केंद्र सरकार ने अमेरिकी अंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता आयोग (US Commission for International Religious Freedom) की टीम को वीजा देने से मना कर दिया है। यह टीम भारत में धार्मिक स्वतंत्रता का आकलन करने के लिए आना चाहती थी। इस पर सरकार ने स्पष्ट कह दिया है कि भारतीयों के संविधान संरक्षित अधिकारों पर किसी विदेशी संस्था को बोलने का हक नहीं है।
विदेश मंत्री एस जयशंकर ने 1 जून को भाजपा सांसद निशिकांत दूबे को लिखे एक पत्र में USCIRF को जमकर लताड़ लगायी है। उन्होंने अमेरिका के अंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता आयोग (USCIRF) द्वारा नागरिकता संशोधन विधेयक (CAA) पारित होने पर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के खिलाफ प्रतिबंधों की माँग उठाने के मुद्दे को उठाया था।
India is a secular and sovereign country and any attempts to malign India’s reputation by falsifying the extent of religious freedom in our country won’t be tolerated. Furthermore, India is capable of handling its internal issues. @narendramodi@AmitShah@JPNadda@ANI@PTI_Newspic.twitter.com/zq9Vzdhdrn
— Dr Nishikant Dubey (@nishikant_dubey) June 10, 2020
उल्लेखनीय है कि ‘यूनाइटेड स्टेट्स कमीशन ऑन इंटरनेशनल रिलीजियस फ्रीडम यानी, USCIRF ने इसी साल अप्रैल माह में अमेरिकी सरकार को सलाह दी थी कि वह धार्मिक स्वतंत्रता के मामले में भारत को ‘कंट्रीज ऑफ पर्टिकुलर कंसर्न’ यानी विशेष चिंता वाले देशों में शामिल करे।
निशिकांत दूबे ने पिछले साल लोकसभा में नागरिक संशोधन बिल (CAA) पास होने के बाद USCIRF द्वारा गृह मंत्री अमित शाह पर पाबंदी लगाने की माँग के मुद्दे उठाया था। इसके अलावा गत बुधवार को जारी अमेरिका की आधिकारिक ‘2019 अंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता रिपोर्ट’ में भी भारत में अल्पसंख्यकों के खिलाफ हमलों और भेदभाव पर चिंता जताई गई है।
विदेश मंत्री जयशंकर द्वारा भाजपा सांसद निशिकांत दूबे को लिखे इस पत्र में कहा गया है कि USCIRF भारत में धार्मिक आजादी की स्थिति के संबंध में पूर्वग्रहयुक्त, गलत और भ्रामक टिप्पणियाँ करने के लिए जाना जाता है। उन्होंने कहा कि हम इस तरह की बातों का संज्ञान नहीं लेते और पहले भी भारत के बारे में गलत जानकारी देने वाली रिपोर्ट्स का खंडन कर चुके हैं, जिस कारण हम इस तरह की संस्थाओं की बातों को तवज्जो नहीं देते।
जयशंकर ने आगे कहा – “विदेश मंत्रालय पहले ही USCIRF के बयान को गलत और गैरजरूरी बताकर अस्वीकृत कर चुका है। हम अपनी स्वायत्ता और संविधान के तहत नागरिकों को मिले मौलिक अधिकारों के मामले में किसी विदेशी हस्तक्षेप को स्वीकार नहीं करेंगे।”
इस संस्था ने पहली बार 2002 के गुजरात दंगों के दौरान भारत को ‘कंट्रीज ऑफ पर्टिकुलर कंसर्न’ में रखने की माँग की थी। USCIRF की सालाना रिपोर्ट में कहा गया था कि भारत में धार्मिक आजादी के उल्लंघन पर अतिरिक्त चिंता करने की जरूरत है और भारत धार्मिक आजादी के उल्लंघन में शामिल है।
लोकतंत्र की हत्या, फासीवाद, संस्थाओं का दुरुपयोग… ये सब कुछ ऐसे चुनिन्दा शब्द हैं, जो वर्ष 2014 से ही अचानक से कॉन्ग्रेस के प्रिय नारे बने रहे। लेकिन यह सभी शब्द कॉन्ग्रेस ने आखिर सीखे कहाँ से। इसके लिए 12 जून का इतिहास जानना आवश्यक है।
जाहिर सी बात है कि आज की कॉन्ग्रेस के लिए देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और उनकी बेटी इंदिरा गाँधी इतना कुछ छोड़ गए हैं कि अगर अब कभी भी यह राजनीतिक दल सत्ता में वापसी ना करे, तब भी इन्हें अपने राजनीतिक विचारधारा का भरण-पोषण कर पाने में शायद ही कोई परेशानी आएगी।
आज का दिन उस ऐतिहासिक पल का गवाह है जब फासीवादी, तानाशाह और निरंकुश इंदिरा गाँधी को इलाहाबाद की अदालत में दोषी ठहराया गया था। जून 12, 1975 की सुबह इलाहाबाद हाईकोर्ट का कोर्टरूम भीड़ से पूरी तरह भर चुका था।
आज ही के दिन जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा ( Justice JML Sinha) ‘राजनारायण बनाम इंदिरा गाँधी’ के मामले में अंतिम फ़ैसला सुनाने जा रहे थे। यह एक दुर्लभ अवसर था, जब अदालतों में एक राजनीतिक लड़ाई लड़ी जा रही थी।
जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा
इस निर्णय से पहले जस्टिस जगमोहन सिन्हा किन-किन परिस्थितियों से गुजरे और उनके फैसले को प्रभावित करने के लिए इंदिरा गाँधी द्वारा किस-किस तरह के तरीके अपनाए गए, आज कॉन्ग्रेस को यह सब शायद ही याद होगा।
दरअसल, इंदिरा गाँधी को इस कोर्टरूम में खड़ा करने के पीछे कारण 1971 में रायबरेली के लोकसभा चुनाव में इंदिरा गाँधी की जीत थी। यह वही लोकसभा चुनाव था, जिसमें इंदिरा गाँधी को जबरदस्त सफलता मिली थी और वो खुद रायबरेली से चुनाव जीती थीं।
इस चुनाव में इंदिरा गाँधी ने संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के उम्मीदवार राज नारायण (Raj Narain) को आश्चर्यजनक रूप से बड़े अंतर से हराया था। आश्चर्यजनक इस कारण – क्यों की अखाड़ा राजनीति को भारतीय राजनीति का हिस्सा बनाने वाले समाजवादी राज नारायण इस चुनाव में अपनी जीत को लेकर इतने ज्यादा निश्चिंत थे कि वो अपनी जीत का जश्न और विजय जुलूस भी निकाल चुके थे।
बनारस के शाही परिवार से जुड़े होने के बावजूद राज नारायण ने रायबरेली में अपनी राजनीतिक लड़ाई शुरू करने का फैसला किया। लेकिन नतीजे आने पर कहानी पूरी तरह उलट गई। राज नारायण चुनाव हार गए। कुल मतों का केवल एक-चौथाई हिस्सा ही उनके पक्ष में था, जबकि इंदिरा गाँधी ने उन्हें लगभग दो-तिहाई मतों से हरा दिया।
लोकसभा चुनाव में मिली इस हार ने ही राजनारायण को हाईकोर्ट का रुख करने के लिए प्रेरित किया और इंदिरा गाँधी पर चुनाव जीतने के लिए सरकारी मशीनरी और संसाधनों का दुरुपयोग करने पर उनका चुनाव निरस्त करने की अपील की। स्वतंत्र भारत में यह एक अनोखा मुकदमा साबित होने जा रहा था।
आखिरकार भारत के किसी प्रधानमंत्री को पहली बार अदालत के सामने पेश होने का हुक्म दिया गया। राज नारायण की तरफ से यह मुकदमा लड़ रहे मशहूर वकील शान्ति भूषण, (प्रशांत भूषण के पिता) ने कहा था –
“इंदिरा गाँधी के कोर्ट में प्रवेश करने से पहले जस्टिस सिन्हा ने कहा – अदालत में लोग तभी खड़े होते हैं जब जज आते हैं, इसलिए इंदिरा गाँधी के आने पर किसी को खड़ा नहीं होना चाहिए, लोगों को प्रवेश के लिए पास बाँटे गए थे।”
इसके कुछ देर बाद मार्च 18, 1975 को इंदिरा गाँधी अदालत पहुँची और उन्हें तकरीबन पाँच घंटों तक चुनाव और अपने निर्वाचन से समबन्धित सवालों के जवाब दिए।
इंदिरा गाँधी के खिलाफ उस मुक़दमें में राजनारायण के वकील रहे शांति भूषण ने अपनी आत्मकथा ‘कोर्टिंग डेस्टिनी’ में लिखा है –
“जब मैंने बहस शुरू की तो मुझे लगा कि जज इस मुक़दमें को कोई ख़ास महत्व नहीं दे रहे हैं। लेकिन तीसरे दिन के बाद से मैंने नोट किया कि उन पर मेरी दलीलों का असर होने लगा है और वो नोट्स लेने लगे हैं।”
इसमें जिक्र किया गया है कि किस प्रकार से जस्टिस सिन्हा अपने फैसले को गोपनीय रख पाने में सफल रहे और इसके लिए उन्हें इंदिरा गाँधी सरकार ने ‘गायब’ होने तक को मजबूर कर दिया था। जस्टिस जगनमोहन सिन्हा को देहरादून से कुछ विशेष लोगों के टेलिफ़ोन जाते थे और उन्हें अपने फैसले पर अनुकूल दिशा में निर्णय देने के लिए बाध्य करते थे।
देहरादून से जस्टिस सिन्हा को फोन करने वाले और कोई नहीं बल्कि चीफ़ जस्टिस माथुर थे जिन्होंने उनसे कहा कि गृह मंत्रालय के संयुक्त सचिव पीपी नैयर ने उनसे मिल कर अनुरोध किया है कि फ़ैसले को जुलाई तक स्थगित कर दिया जाए। जस्टिस सिन्हा इस बात से इतने निराश और दुखी हुए कि वो तुरंत हाईकोर्ट गए और रजिस्ट्रार को आदेश दिया कि वो दोनों पक्षों को सूचित कर दें कि फ़ैसला 12 जून को सुनाया जाएगा।
राज नारायण की ओर से यह केस लड़ रहे शान्ति भूषण के बेटे प्रशांत भूषण ने अपनी किताब ‘द केस दैट शुक इंडिया’ में लिखा हैं –
“सिन्हा अपना फ़ैसला सुकून के माहौल में लिखना चाहते थे। लेकिन जैसे ही अदालत बंद हुई, उनके यहाँ इलाहाबाद के एक कॉन्ग्रेस संसद सदस्य रोज़ रोज़ आने लगे। इससे जस्टिस सिन्हा बेहद नाराज़ हुए और उन्हें उनसे कहना पड़ा कि वो उनके यहाँ न आएँ। लेकिन जब वो इस पर भी नहीं माने तो सिन्हा ने अपने पड़ोसी जस्टिस पारिख से कहा कि वो उन साहब को समझाएँ कि वो उन्हें परेशान न करें।”
फैसले को लेकर दबाव बनाने वालों से जस्टिस सिन्हा इतने उकता चुके थे कि उन्हें अपने उज्जैन में होने की झूठी खबर तक फैलानी पड़ी थी। यहाँ तक कि उन्हें सुप्रीम कोर्ट का जज बनाने तक का भी लालच दिया गया। हालाँकि, यह भी एक सत्य है कि जब फैसला इंदिरा गाँधी के पक्ष में नहीं हुआ तो इसके बदले जस्टिस सिन्हा कभी भी सुप्रीम कोर्ट के जज नियुक्त नहीं किए गए। यह कॉन्ग्रेस की शासन प्रणाली का एक बहुत ही छोटा सा उदाहरण है।
12 जून की सुबह जस्टिस सिन्हा के सामने उनका 255 पेजों का दस्तावेज़ रखा हुआ था, जिस पर उनका निर्णय लिखा हुआ था। सुबह दस बजे अदालत की कार्यवाही शुरू करते हुए जस्टिस सिन्हा ने कहा, “मैं इस केस से जुड़े हुए सभी मुद्दों पर जिस निष्कर्ष पर पहुँचा हूँ, उन्हें पढूँगा।”
कुछ देर रुकने के बाद जस्टिस सिन्हा ने कहा – “याचिका स्वीकृत की जाती है।”
जून 12, 1975 को इंदिरा गाँधी के निर्वाचन पर फैसला देने के बाद जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा
‘इंदिरा गाँधी अपदस्थ’
जस्टिस सिन्हा ने अपने आदेश में लिखा कि इंदिरा गाँधी ने अपने चुनाव में भारत सरकार के अधिकारियों और सरकारी मशीनरी का इस्तेमाल किया। जस्टिस सिन्हा ने इंदिरा गांधी को राजपत्रित सरकारी अधिकारियों की सहायता प्राप्त करने का दोषी ठहराया, जिसमें यशपाल कपूर भी शामिल थे, जो कि पीएम के सचिवालय के साथ स्पेशल ड्यूटी पर एक अधिकारी के रूप में काम कर रहे थे। साथ ही, अदालत ने इंदिरा गाँधी को याचिकाकर्ता, राजनारायण को कानूनी लागत का भुगतान करने का भी आदेश दिया।
जस्टिस सिन्हा ने अपने आदेश में लिखा कि इंदिरा गाँधी ने अपने चुनाव में भारत सरकार के अधिकारियों और सरकारी मशीनरी का इस्तेमाल किया। जन प्रतिनिधित्व कानून में इनका इस्तेमाल भी चुनाव कार्यों के लिए करना ग़ैर-क़ानूनी था। इन्हीं दो मुद्दों को आधार बनाकर जस्टिस सिन्हा ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी का रायबरेली से लोकसभा के लिए हुआ चुनाव निरस्त कर दिया।
जून 12, 1975 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति जगमोहन लाल सिन्हा ने चुनावी दुर्भावनाओं के कारण रायबरेली चुनाव को ‘नल एंड वॉइड’ घोषित किया। इसके साथ ही जस्टिस सिन्हा ने अपने फ़ैसले पर बीस दिन का स्थगन आदेश दे दिया। यानी, सत्तारूढ़ दल को इंदिरा गाँधी का विकल्प खोजने के लिए 20 दिनों का समय दिया गया था।
जस्टिस सिन्हा के इस फैसले पर लंदन के ‘द टाइम्स’ अख़बार ने लिखा था कि ये निर्णय उसी तरह था, जैसे प्रधानमंत्री को ट्रैफ़िक नियम के उल्लंघन करने के लिए उनके पद से हटा दिया जाए।
राज नारायण की याचिका में इंदिरा गाँधी के खिलाफ शामिल 7 में से 5 मुद्दों पर अदालत ने इंदिरा गाँधी को राहत दी थी, लेकिन दो मुद्दों पर इंदिरा गाँधी को दोषी पाया गया। जस्टिस सिन्हा ने जो फैसला सुनाया था उसके अनुसार जन प्रतिनिधित्व कानून के तहत अगले 6 सालों तक इंदिरा गाँधी को चुनाव लड़ने से अयोग्य ठहराया गया था।
कोर्ट के निर्णय के बाद इंदिरा के खिलाफ विरोध के स्वर उठने लगे थे
यही वो फैसला था, जिसने देश को इंदिरा गाँधी की जिद पर आपातकाल की आग में झोंका था। यानी, एक अपराध को कम करने के लिए इंदिरा गाँधी ने उस से भी बड़ा दूसरा अपराध करना बेहतर और जरुरी समझा। जून 12, 1975 को आए इलाहाबाद हाईकोर्ट के इस फैसले के बाद जून 25, 1975 को लगा आपातकाल 21 माह, यानी मार्च 21, 1977 तक रहा।
अखबारों में आपातकाल की घोषणा
इंदिरा गाँधी के खिलाफ आए एकमात्र फैसले ने उनसे वो सब करवाया, जिसे फासीवाद, तानाशाही और लोकतंत्र की हत्या कहा जाता है। ये वही इंदिरा गाँधी थी, जिसने खुद को क़ानूनन अभेद्य बनाने के लिए न्यायपालिका को ही पंगु बनाने का विचार किया और संविधान में तमाम अलोकतांत्रिक संशोधन करने शुरू किए।
21 जुलाई से शुरू होने वाले मानसून सत्र के आने तक तमाम सांसद जेल में थे और जो बाकी थे उन्होंने संसद का ही बहिस्कार कर दिया। इस कदम ने इंदिरा गाँधी को और भी अधिक निरंकुश बना दिया था। फिर पत्रकारों की गिरफ्तारी से लेकर सामाजिक कार्यकर्ताओं के खून से लोकतंत्र के इतिहास का यह कलंकित अध्याय लिखा गया।
यही वो समय था जब इंदिरा गाँधी ने नेहरु और गाँधी के उद्वरण प्रकाशित करने वाले अखबारों तक को प्रतिबंधित कर दिया, कई फिल्मों पर रोक लगा दी गई संजय गाँधी के फैसलों पर ही दिल्ली और राजनीतिक बंदियों का भाग्य निर्धारित होने लगा।
आज के तथाकथित बुद्धिजीवियों और इन्टरनेट-उदारवादियों को 12 जून का दिन आवश्यक रूप से स्मरण होना चाहिए। ताकि उनके सम्मुख लोकतंत्र की हत्या और इसके वास्तविक गुनहगारों का सटीक विवरण पता रहे।