तमिलनाडु में इस्लामिक कट्टरपंथियों की शिकायत पर तेनस्कासी नगर (Tenskasi town) के सम्मेनकुलम गाँव (Sammenkulam village) स्थित कट्टुप्पासथी मदसामी (Kattuppasathy Madasamy) मंदिर तोड़े जाने की खबर है।
इस मंदिर का निर्माण निजी स्वामित्व वाली पट्टा भूमि पर हुआ था, जिसके प्रति नादर (Nadar) समुदाय में बहुत श्रद्धा थी। लेकिन, फिर भी कट्टरपंथियों के कहने पर प्रशासन ने इसे तुड़वा दिया और बाद में यह सफाई दे दी कि जमीन अवैध थी, जिसपर मंदिर बनाने की अनुमति नहीं थी।
द ऑर्गनाइजर की रिपोर्ट के अनुसार, स्थानीय लोगों ने बताया कि इससे पहले पॉपुलर फ्रंट ऑफ़ इंडिया (PFI), सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ़ इंडिया (SDPI) और अन्य कट्टरपंथी संगठनों ने मंदिर के नवीनीकरण के काम पर आपत्ति जताते हुए दावा किया था कि इससे समुदाय विशेष महिलाओं की निजता का हनन होगा।
इन समूहों की शिकायत के बाद जिला प्रशासन ने इस मामले पर संज्ञान लिया और हिंदुओं के प्रदर्शनों को दरकिनार करते हुए मंदिर पर बुलडोजर चलवा दिया गया।
Police in Tenkasi, Tamil Nadu demolished newly constructed Temple on private land bcz Mslims, the majority in particular area didn’t want it there
Sad state of secularism in India, Churches & Mosques can be made on govt land but they can’t even tolerate Temple on private land pic.twitter.com/C11UKbKNd4
जानकारी के मुताबिक, गाँव में 160 हिंदू नादर हैं, लेकिन दूसरे समुदाय के लोग उन्हें अपने आगे कुछ नहीं समझते। रिपोर्ट बताती है कि इस मामले के तूल पकड़ने के बाद ग्राम प्रधान के बेटे ने जिलाधिकारी से शिकायत की थी।
उसने कहा था कि उनके समुदाय के सदस्य अशिक्षित है और किसानी करके जीवन का गुजर-बसर करते हैं। पच्चईमाल ने जिला प्रशासन के सामने अपनी बात रखते हुए कहा था कि पट्ठा संख्या 1598 और 1376 में, उनके पास एक वन देवता मंदिर है, हर साल चैत्र के महीने के दौरान, वह वहाँ मिट्टी के आधार को बदलते हैं और त्योहार मनाते हैं।
हालाँकि, लॉकडाउन के कारण इस साल नादर समुदाय के लोग वहाँ अपना यह त्योहार नहीं मना पाए। लेकिन, बारिश के मौसम में पहले की मूर्ति को सुरक्षित रखने के लिए उन्हें उसकी मिट्टी बदलनी थी। इसलिए उन्होंने वहाँ मंदिर के पास सीमेंट रख दिया। लेकिन कट्टरपंथियों ने इस दौरान इसपर आपत्ति जता दी और यह कह दिया कि इससे श्रद्धालुओं को समुदाय विशेष की महिलाओं को नहाते देखने का मौका मिलेगा।
इसके बाद उन्होंने अपनी शिकायत पुलिस में दर्ज करवाई और पुलिस ने हिंदुओं की भावनाओं की कद्र किए बिना मंदिर को गिरा दिया। ग्राम प्रधान के बेटे बताते हैं कि वह मंदिर उनकी जमीन पर थी। लेकिन फिर भी प्रशासन ने उनकी नहीं सुनी और न ही इस तथ्य पर गौर किया कि नादर समुदाय के लोग वहाँ कई पीढ़ियों से पूजा करते आ रहे हैं। बाद में जब प्रश्न उठाया गया तो पुलिस ने उस जमीन को अपने रिकॉर्ड से बाहर बताया और कहा कि यहाँ मंदिर बनाने की अनुमति नही थी।
तुष्टिकरण का आरोप
कथित तौर पर नादर समुदाय के लोगों का मानना है कि जिला प्रशासन व पुलिस प्रशासन ने यह हरकत समुदाय विशेष को खुश करने के लिए की। इस घटना के बाद यह भी आरोप लगे कि तमिलनाडु के सीएम ने समुदाय के वोट बैंक के लिए यह सब किया, क्योंकि चुनाव आने वाले हैं।
दूसरी ओर, हिंदू महासभा के नेता बालसुब्रमण्यम ने पहले से भी विशाल मंदिर बनाने का आश्वासन ग्रामीणों को दिया है। इसके अलावा कई अन्य हिंदू संस्थान भी उनकी मदद में आगे आए हैं।
ग्राम प्रधान के बेटे ने यह बताया उन्होने कभी भी सरकारी जमीन पर अतिक्रमण नहीं किया और न ही सरकारी जमीन पर कोई नया निर्माण शुरू किया। साथ ही चेतावनी दी कि बहुसंख्यक समुदाय विशेष द्वारा मंदिर विध्वंस के बाद उन्हें हिंदू समुदाय का विरोध झेलना पड़ सकता है।
बता दें, तमिलनाडु में हिंदू समुदाय की भावनाओं पर ऐसा हमला पहली बार नहीं हुआ है। इससे पहले एक ईसाई संगठन के कहने पर भारत माता की मूर्ति ढके जाने का विवाद भी सामने आया था। बाद में भाजपा, आरएसएस समेत कई ग्रामीणों के प्रदर्शन से भारत माता की मूर्ति से कवर हटाया गया था।
बलूचिस्तान में करीब दो सप्ताह से जारी प्रदर्शन अब हिंसक हो गया है। प्रदर्शनकारियों द्वारा पाकिस्तानी सैनिकों को खदेड़ने का वीडियो सामने आया है। प्रदर्शन एक बलूच महिला और उसके चार साल के बच्चे की हत्या के बाद शुरू हुआ था।
प्रदर्शनकारियों ने गुरुवार (11 जून, 2020) को तैनात पाकिस्तानी सैनिकों पर पत्थर बरसाए। चेक पोस्ट आग के हवाले कर दिया। जान बचाने के लिए पाकिस्तानी सैनिक पोस्ट छोड़कर भाग खड़े हुए।
जानकारी के मुताबिक बलूच महिला और उसके बच्चे की हत्या के बाद से ही बलूचों का विरोध-प्रदर्शन जारी है। हत्या का आरोप बलूचिस्तान की सत्ताधारी पार्टी बीएपी से जुड़े लोगों पर है, जो इमरान सरकार की समर्थक है।
गुरुवार को बारबचा इलाके में प्रदर्शनकारियों ने पाक सैनिकों को खदेड़ दिया। इसका वीडियो सोशल मीडिया में वायरल हो रहा है। इसमें देखा जा सकता है कि हजारों की संख्या में बलूच प्रदर्शनकारी सेना पर पत्थर बरसा रहे हैं।
इसके बाद कुछ प्रदर्शकारियों ने पहले तो सेना की एक चेक पोस्ट को निशाना बनाते हुए उसमें तोड़फोड़ की और फिर उसको आग के हवाले कर दिया।
इस दौरान लगातार बढ़ते हिंसक प्रदर्शन को देख पाक सेना के जवानों को अपनी पोस्ट छोड़कर भागना पडा। वीडियो में आप देख सकते हैं कि सेना की चेक पोस्ट के पास एक टैंक भी खड़ा दिखाई दे रहा है।
आपको बता दें कि दो हफ्ते पहले पाकिस्तान में बलूचिस्तान प्रांत के तुरबत शहर में एक महिला मलिकनाज और उसकी चार साल की बेटी ब्राम्श की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि बलूचिस्तान आवामी पार्टी (बीएपी) के सदस्यों ने उनकी हत्या की है।
इस हत्या के बाद से ही बलूचों का प्रदर्शन जारी है। खबर यह भी है कि पाकिस्तान की सेना बलूचों के खिलाफ ग्राउंड जीरो क्लियरेंस ऑपरेशन चला रही है। इस ऑपरेशन के तहत बलूचिस्तान की आजादी की माँग करने वाली बलूच लिबरेशन आर्मी और बलूच लिबरेशन फ्रंट को खत्म किया जा रहा है। आपको बता दें कि बीते कुछ दिनों में बलूच और पख्तून नेताओं की हत्या के कई मामले सामने आए हैं।
‘जिन्ने मेरा दिल लुटिया गाने’ से नेम और फेम कमाने वाले भारतीय-कनाडाई पंजाबी गायक जसविंदर सिंह (Jazzy B) ने अपने नए गाने में खालिस्तान का समर्थन किया है। अपने नए गाने “Putt Sardara De” के जरिए उसने ऑपरेशन ब्लू स्टार में मारे गए जरनैल सिंह भिंडरावाले का महिमामंडन भी किया है।
इस गाने में उसने सिखों के लिए अलग देश खालिस्तान की माँग का भी समर्थन किया है। गाने को लिखने वाले का नमा अमित बोवा है।
गाने में नजर आ रहे लोगों ने बड़े-बड़े हथियार थाम रखे हैं। गाने के बोल के जरिए सिखों को बताया जा रहा है कि भारत में उनके के साथ जो भी हुआ, उसके लिए वह कैसे अपना बदला ले सकते हैं।
गाने में कहा गया है कि किसी को भी सिखों से ख़िलवाड़ नहीं करना चाहिए, क्योंकि उनका इतिहास आक्रमक रहा है। वह भिंडरावाले की तरह हमेशा शिकार के भूखे रहते है।
इस गाने में एक जगह भिंडरावाले की भी वीडियो क्लिप है। साथ ही गाने में उन सिखों को भी इंगित किया गया है जो भारतीय जेलों में बंद हैं। करीब 5 मिनट की वीडियों में जैज़ी बी नाम से मशहूर इस गायक ने हर प्रकार से भारत के ख़िलाफ़ माहौल बनाने की कोशिश की है।
इतना ही नहीं, एक साक्षात्कार में जैज़ी बी ने इसका बचाव करते हुए कहा कि उसने भारत में सिखों पर होते अत्याचारों के कारण इस गाने को गाया है। जैज़ी बी ने कहा, चूँकि सिखों को भारत में सम्मान नहीं दिया जाता, इसलिए उन्हें इस खालिस्तान के लिए लड़ना चाहिए।
यहाँ बता दें, इस गाने के सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर इसकी काफी आलोचना की जा रही है। लोगों ने इस पर काफी आपत्ति जताई गई है। लेकिन जैज़ी बी ने यहाँ भी लोगों को यही कहकर सफाई दी कि लोगों को मालूम ही नहीं है कि भिंडरावाले कौन थे।
@majorgauravarya did guy @jazzyb released a new song glorifying a terrorist Bhindrawala who was a mass killer. It’s clear he’s trying 2 incite people up in Punjab. He himself is sitting in UK. I think he wants azaadi too. Plz bring him up on next discussion.
जैज़ी ने अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए इस ट्वीट में भिंडरेवाला को अपना हीरो बताया और लोगों से अपील की कि वे उनके भाषणों को सुनें, जो इस समय में यूट्यूब और अन्य वीडियो वेबसाइट पर मौजूद है।
उल्लेखनीय है कि यह पहली बार नहीं जब जैज़ी बी ने खालिस्तान के समर्थन में अपना मत रखा हो। इससे पहले उसने ‘शहीद कौम दे’ नाम से एक गाना रिलीज किया था। इसके अलावा कई साक्षात्कार में भी वह खालिस्तान के समर्थन में बोल चुका है। उसे कई बार यह कहते सुना गया है कि भारत में सिखों को सम्मान नहीं मिलता।
वर्तमान में यूके में रहने वाले इस पंजाबी गायक ने अपने हालिया इंटरव्यू में कहा था कि भारत में सिखों की कोई पहचान नहीं है।
इससे पहले सोशल मीडिया पर गालीबाजी और गंदगी फैलाने के लिए कुख्यात पंजाबी रैपर हार्ड कौर ने खालिस्तानी चोले में दिखाई पड़ी थी। ट्विटर पर जारी वीडियो में वह न सिर्फ़ कट्टर खालिस्तानियों के साथ दिखाई पड़ी थी, बल्कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह को लेकर अपशब्द भी कहे थे।
यह देखना कितना दिलचस्प है कि भौतिकवादी पाश्चात्य देश खुद को जहाँ धार्मिक जीवनशैली से जितना मुक्त दिखाने का आडंबर करते हैं, उसके मूल में सारी दुनिया को ईसाइयत में तब्दील करने का लक्ष्य पलता है। इनके तरीके बेहद लुभावने हैं और पहनावे आकर्षक। इतने आकर्षक कि एक बार के लिए इन्हें देखकर एक सम्पन्न व्यक्ति भी इन्हें अपनाना चाहता है।
पूरा विश्व जिस समय कोरोना वायरस की महामारी से जूझ रहा है, उस समय उत्तराखंड संक्रमण के साथ-साथ मिशनरी धर्मांतरण से भी संघर्ष कर रहा है।
जहाँ हिन्दू जनेऊ पहनने, तिलक लगाने को बीते समय की बात कहते हैं और अपने धार्मिक क्रियाकलापों के अनुसरण करने में हिचकिचाते हैं, वहीं बाहरी देशों के आतताई, खुलकर दूसरों के धर्म में सेंध लगाते हुए यह साबित करते देखे जाते हैं कि ‘परमपिता जीसस’ ने बस हाथ के इशारे से तूफ़ान को रोककर अपने चेलों को तूफ़ान से बचाया और चेलों से भजन गवाकर उन्हें ‘चंगा’ किया। (यह सब आधा-अधूरा ज्ञान उस ‘जीसस भजन संग्रह’ और ‘परमपिता परमेश्वर की कहानियों’ से साभार- जो ‘ईसाई पर्यटक’ मुझे भी थमा गए थे।”
कार्ल मार्क्स ने कहा था कि धर्म अफ़ीम है। ईसाई मिशनरियों ने इस अफ़ीम को ग्रामीण और वंचितों की रगों में भरने का पूरा इंतजाम कर रखा है। मिशनरियों द्वारा अब इस अफ़ीम को चावल-राशन-बाइक-मुर्गा आदि में तब्दील कर दिया गया है। इस अफ़ीम के बदले वो उनसे उनके भविष्य से तो वंचित कर ही रहे हैं, साथ ही उनके वर्तमान के साथ भी घिनौना षड्यंत्र कर रहे हैं।
ऑपइंडिया पर इसाई धर्मांतरण पर आवाज उठाने के बाद जबरदस्त प्रतिक्रिया लोगों की ओर से देखने को मिली। उत्तराखंड राज्य के लगभग हर जिले से लोगों ने सम्पर्क कर अपने गाँव और कस्बे का हाल बताया। इसमें सबसे ज्यादा हैरान करने वाले देहरादून के पास के इलाकों के लोगों का अनुभव था। इनका कहना है कि देहरादून के पास रहने के बावजूद उनके नजदीकी गाँव के गाँव ईसाई बना दिए गए।
उत्तराखंड में वंचित और पिछड़े वर्ग की आर्थिक-सामाजिक परिस्थितियों का लाभ लेकर ईसाई मिशनरी किस प्रकार देवभूमि कहे जाने वाले उत्तराखंड राज्य को धर्मांतरण से प्रभावित कर रहे हैं यह सभी तथ्य हैरान करते हैं।
लेकिन उत्तराखंड के इस जनजातीय समाज में या तो हर कोई उतना ही वंचित है या फिर उतना ही संपन्न और इसका किसी की जाति से कोई भी सम्बन्ध नहीं है। लगभग हर परिवार के पास अपने खेत हैं, पशुधन है और अपने हुनर के अनुसार काम है। फिर ऐसे में अनुसूचित जाति को वंचित कहना कम से कम उत्तराखंड की दृष्टि में तो पूरे समाज के साथ भेदभाव कहा जा सकता है।
मिशनरी स्कूल के संचालकों द्वारा शेयर किए गए एक वीडियो में दिया गया सन्देश
इस तस्वीर में सन्देश अधूरा है। बाइबिल में इसका पूरा वर्णन इस तरह से है – “Go therefore and make disciples of all nations, baptizing them in[a] the name of the Father and of the Son and of the Holy Spirit”
जिसका हिंदी में अर्थ है, “इसलिए तुम जाओ, सब जातियों के लोगों को चेला बनाओ और उन्हें पिता, और पुत्र और पवित्र आत्मा के नाम से बप्तिज्मादो, और उन्हें सब बातें जो मैंने तुम्हें आज्ञा दी हैं, मानना सिखाओ। और देखो, मैं जगत के अन्त तक सदा तुम्हारे संग हूँ (मत्ती 28:19-20)।”
बप्तिज्मा
बाइबिल में बताया गया है कि प्रभु यीशु ने अपने 12 प्रेषितों को शिष्य बनाने के लिए कहा और उन्हें उन सभी चीजों का निरीक्षण करन सिखाया, जो उन्होंने उन्हें करने की आज्ञा दी थी। एक शिष्य, एक शिक्षक, धर्म या विश्वास का अनुयायी या ‘बिलिवर’ होता है।
पवित्र पुस्तक बाइबिल के अनुसार, यह उद्घोष अपने स्वर्गारोहण से ठीक पहले यीशु ने कहा था। यह बप्तिज्मा के लिए यीशु के आज्ञा है। बाइबिल में बताया गया है कि बप्तिज्मा के अतिमहत्वपूर्ण होने का कोई और कारण नहीं, क्योंकि यीशु ने इसकी आज्ञा दी है।
बप्तिज्मा पिता, पुत्र और आत्मा के नाम से दिया जाता है। ये मिल कर एक ‘मसीही बप्तिज्मा’ को बनाते हैं। इस विधान के द्वारा एक व्यक्ति को कलीसिया (चर्च) की संगति में स्वीकार कर लिया जाता है। यह सब जानकारी इसलिए दी जानी आवश्यक हैं, ताकि ऑनलाइन बाइबिल क्लासेज़ का उदेश्य स्पष्ट हो सके।
प्रलोभन के बदले वंचितों की आस्था का व्यापार
एक ओर जहाँ हिन्दू धर्म हमेशा से ही सिर्फ और सिर्फ अपने दैनिक जीवन की गतिविधियों और आवश्यकताओं से ही अपनी संस्कृति को जोड़कर उसे अपना धर्म मानता आया, वहीं दूसरी ओर लाक्षित तरीकों से अन्य धर्म के लोगों ने इसे ही निशाना बनाने के अनेकों प्रयास किए हैं।
हम जानते हैं कि सदियों से मुगलों द्वारा हिंदुओं के बर्बरतापूर्ण धर्मांतरण और फिर ईसाइयों द्वारा, विशेषकर दक्षिण भारतीय गोवा जैसे राज्यों में खुद को सभ्यता का सूर्य बताने वाले ‘व्हाइटमैन बर्डेन सिद्दांत’ के उपासक, यही हिंदुओं को ईसाई बनाने वाले किस प्रकार अपना ध्येय पूरा करने में सफल रहे हैं।
दुर्भाग्यवश, जिस वंचित वर्ग को ईसाई मिशनरी अपना शिकार बनाते हैं, वह ईसाईयों द्वारा धर्मांतरण के इस बर्बर इतिहास को नहीं जानता। ना ही वह वर्ग इस धर्मांतरण के पीछे की व्यापक साजिश और उनके आडंबरों के भ्रम से ही परिचित है।
उत्तराखंड राज्य को यूँ तो ईसाई मिशनरियों ने बहुत गहराई से प्रभावित किया है, लेकिन जब इनके द्वारा आपदा, महामारी जैसी परिस्थितियों को धर्मांतरण का आसान जरिया बनाते देखा जाता है तब यह भेद करना मुश्किल हो जाता है कि क्या वास्तव में ये समाज के तालमेल को खंडित करने का प्रयास कर रहे हैं, या फिर ये वास्तव में उस देवता की सच्ची सेवा कर रहे हैं, जिसके नाम पर ईसाई मिशनरी वंचितों की आस्था का व्यापार कर लेते हैं।
कोरोना महामारी और ऑनलाइन बाइबिल क्लास
उससे भी बड़ी हैरान कर देने वाली बात जो देखने को मिली है वो ये कि कोरोना वायरस के दौरान जारी लॉकडाउन के बीच ईसाई मिशनरी तकनीक के इस्तेमाल से अपने एजेंडा को जारी रखने में सक्षम हैं।
ईसाई मिशनरी गाँव के युवाओं को ‘बाइबिल क्लास’ का ज्ञान देने के लिए उनसे लगातार सम्पर्क कर रहे हैं। ग्रामीण युवा इनसे लैपटॉप और इंटरनेट के जरिए जुड़कर वीडियो कॉन्फ्रेंस के द्वारा इन क्लासेज को अटेंड कर रहे हैं।
मिशनरी स्कूलों द्वारा इन्टरनेट पर दी जाने वाली मिशनरी क्लासेज़, जिनका प्रयोग अब उत्तराखंड के युवाओं पर किया जा रहा है –
यहाँ पर ये जिक्र करना भी आवश्यक है कि जहाँ आजकल महानगरों से घर लौटे हुए लोग ‘वर्क फ्रॉम होम’ के लिए अच्छे इंटरनेट या ब्रॉडबैंड सर्विस बड़ी मुश्किल से इस्तेमाल कर पा रहे हैं, वहीं ईसाई मिशनरियों के धर्मांतरण की गिरफ्त में आए युवा उनसे लगभग रोजाना ही ऑनलाइन बाइबिल क्लास ले रहे हैं।
20-25 की उम्र के ये उन परिवारों के युवा हैं, जिनके घर में आय का कोई साधन नहीं है। ये किसी रोजगार का हिस्सा नहीं हैं। खेती की जमीन ये लोग वर्षों पहले या तो बाहरी लोगों के हवाले कर चुके हैं, या फिर वो बंजर हैं। ऐसे में बेहतरीन तकनीक का इस्तेमाल और ‘लाइफस्टाइल’ सभी ग्रामीणों को हैरान करता है।
मिशनरी स्कूलों का सबसे बड़ा खेल और ब्रेनवॉश करने का षड्यंत्र तो यह है कि ना ही ये युवा खलकर अपनी संदिग्ध गतिविधियों के बारे में किसी से कहते हैं और ना ही ग्रामीण लोग सब कुछ जानने के बावजूद किसी कानूनी कार्रवाई के भय से इस बारे में अपनी पहचान स्पष्ट करना चाहते हैं।
ऐसे में ईसाइयों द्वारा किया जा रहा यह धर्मांतरण एक पहेली बनकर उभरा है और शासन और प्रशासन की नजरों से भी सुरक्षित है। युवाओं को दिए जा रहे लालच से वो एक प्रकार का नशा उन्हें उपलब्ध करवा रहे हैं।
नाम न बताने की शर्त पर कुछ लोगों का कहना है कि इन मिशनरी शिक्षाओं का केंद्र मसूरी में ही किसी जगह पर है, जहाँ समय-समय पर पार्टी, सैर और अन्य लुभावनी गतिविधियाँ आयोजित करवाई जाती हैं। वर्ष 2009-10 के आसपास एक बार मैंने स्वयं भी इनके ही एक दल से मित्रता कर इनकी कार्यशैली के बारे में कुछ जानकारियाँ जुटाईं थीं। जिनसे मैं कुछ नतीजों पर पहुँचने में सक्षम रहा।
जिन युवाओं के कंधों पर समाज की मुख्यधारा से जुड़ने की जिम्मेदारी होनी चाहिए थी, मिशनरियों द्वारा उन्हें मुख्य शिक्षा से ही विमुख कर उन्हें ब्रेनवॉश तो किया ही जा रहा है, साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जाता है कि वो आने वाले समय में अपने समाज और अपनी सांस्कृतिक सभ्यता से ही कट जाएँ।
विज्ञान के समय में इस मजहबी बाइबिल की शिक्षा को लेकर यदि वो ‘पादरी’ बनते भी हैं, तो ऐसा कर के अपनी आने वाली पीढ़ियों को वो कौन सा भविष्य सौंपने जा रहे हैं? NCERT और स्कूल के सिलेबस की जगह पर बाइबिल के दोहे पढ़कर किस भविष्य की नींव रखी जा रही है?
इन तस्वीरों के साथ लिखे गए संदेश हैरान करते हैं
ग्रामीण युवा, जिन्हें सरकारी स्कूलों ने ठीक से अंग्रेजी तक नहीं पढ़ाई, वो अब हिंदी में बाइबिल के अध्याय पढ़ रहे हैं। उनके सोशल मीडिया एकाउंट्स में सिर्फ वह चीजें शेयर की गई हैं, जो उन्हें किसी मिशनरी अध्याय के अनुसार अब तक के जीवन के लिए अपराधी बताती हैं।
पहले प्रचार फिर ‘प्रचारक’ में तब्दील होते ग्रामीण युवा
मिशनरियों के निशाने पर जो स्थानीय युवा हैं, उन्हें तो शायद इस बात की भनक भी ना हो कि जिस सच्चाई को वो अपने आस-पास के लोगों से छुपाते फिर रहे हैं, उन्हीं की तस्वीरें यही मिशनरी अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर ‘अचीवमेंट’ के रूप में अपने बीच के लोगों के साथ गर्व से शेयर कर रहे हैं।
इसका उदाहरण स्थानीय युवाओं के हाथों में “पवित्र बाइबिल” के ये संग्रह हैं जो मिशनरी स्कूल के संचालकों ने अपने अन्य मित्रों के साथ सोशल मीडिया पर शेयर किए हैं –
जैसे कि हमने पहले भी यह बात रखी थी कि उत्तराखंड राज्य का यह सुदूर इलाका, जो कि अब जाकर कहीं मुख्यधारा से जुड़ पाया है, हमेशा से ही मिशनरियों के निशाने पर रहा। ये लोग यहाँ आकर ग्रामीणों के साथ इतने घुल-मिल गए कि वो उनकी बोली-भाषा, रीति रिवाज और उनके आम जीवन का हिस्सा बन गए।
जो आज सामने नजर आ रहा है, वह वास्तव में कई वर्षों की चरणबद्ध प्रक्रिया का नतीजा है। स्थानीय लोग इस धर्मांतरण की महामारी को लेकर खुद भी इतने जागरूक नहीं थे, जो वो कभी इस विषय को महत्व देते।
इन तस्वीरों में आप देख सकते हैं कि बाहरी लोग भारत ही नहीं बल्कि उत्तराखंड की सीमा से लगे नेपाल को भी निशाना बना रहे हैं, जहाँ कि मिशनरी शिक्षा लेकर ये युवक गाँव-गाँव लौटकर चर्च का निर्माण करेंगे।
लेकिन यह भी विचारणीय बात है कि जिस अनुसूचित आबादी के युवा आज कुछ प्रलोभनों के कारण बाइबिल क्लास में रुचि ले रहे हैं, उसी अनुसूचित जाति के कुछ ही दूरी के गाँव के लोग आज अच्छी शिक्षा लेकर अपने भविष्य में निवेश कर रहे हैं, बेहतरीन रोजगार के लायक खुद को बनाने में सक्षम हैं यहाँ तक कि कुछ ऐसे भी उदाहरण हैं जो आज अच्छे राजकीय पदों पर भी आसीन हैं और युवाओं के प्रेरणास्रोत हैं।
लेकिन, एक पहलू यह भी है कि जिस बड़े मिशनरी अभियान से अनुसूचित जाति के युवाओं को अंधकार में धकेलने का काम किया जा रहा है, उस पर समाज स्वयं भी आगे आकर उनकी मदद करने, उन्हें इस क्षणिक प्रलोभन के दलदल से निकालने में मदद नहीं करना चाहता है। हालाँकि, अब यह ईसाइयत इन युवाओं में अपनी इतनी गहरी पैठ बना चुका है कि यह काम वास्तव में खतरनाक भी होता जा रहा है, जिसे कि इसकी तह में जाने वाले महसूस कर सकते हैं।
यह भी तय है कि ऐसी पहल करने वाले को बड़े संघर्ष और चुनौती से गुजरना होगा। लेकिन यदि उत्तराखंड के इस जनजातीय इलाके के सामंजस्य को बरकरार रखना है, और युवाओं को इस धर्मांतरण से बचाना है, तो इसे सरकार और स्थानीय लोगों को साथ मिलकर काम करना ही होगा।
महाराष्ट्र के पालघर में हम देख चुके हैं, ईसाइयों ने जिस आदिवासियों की आबादी को अपने चावल-राशन योजना से ब्रेनवाश करने का काम किया, वही भीड़ साधुओं की मॉब लिंचिंग करती नजर आई है। ऐसे में यदि यह सिलसिला हर राज्य को लीलने लगा तो भारत की संस्कृति बहुत लम्बे समय तक इसका परिचय रह पाने में सक्षम नहीं रहेगी।
गाजियाबाद पुलिस ने 25 वर्षीय दलित युवक विवेक कुमार जाटव की हत्या की गुत्थी को सुलझा लिया है। विवेक की हत्या दो हफ्ते पहले हुई थी। घटना को उस समय अंजाम दिया गया था जब वह अपने ऑफिस से घर लौट रहा था।
स्वराज्य की पत्रकार स्वाति गोयल शर्मा की रिपोर्ट के मुताबिक, इस संबंध में विवेक के परिजनों ने उसके सहकर्मियों पर संदेह जताया था। लेकिन पड़ताल में पुलिस ने तीन बदमाशों को गिरफ्तार किया। इनकी पहचान अपराधिक रिकॉर्ड वाले मोहम्मद मोहसिन, मोहम्मद आदिल, और मोहम्मद सलमान के रूप में हुई है।
इन तीनों ने पुलिस के आगे अपना जुर्म कबूल कर लिया है। गाजियाबाद के एसपी नीरज जदाऊँ ने बताया कि मोहम्मद मोहसिन के ख़िलाफ़ चोरी और पशुओं के साथ बर्बरता करने के कारण पहले से ही 10 केस दर्ज हैं।
#GhaziabadPolice की लीना ? ने विवेक नाम के युवक की हत्या का ब्लाइंड केस सुलझाने में मदद की। तीनों आरोपी मोहसिन, आदिल और सलमान ने विवेक की मोटरसाइकिल टकरा जाने जैसी मामूली बात पर हत्या कर दी थी #SSP_GZB ने इनाम में लीना को नया पट्टा,रस्सी और गद्दा दिया @uppolice@ANINewsUPpic.twitter.com/GEStWm9vFq
स्वराज की रिपोर्ट के अनुसार, मृतक के पिता को अपने पुत्र का शव 1 जून की दोपहर मटियाला गाँव के खेत में पड़ा मिला था। यानी उनके निवास स्थान कौशल्या गाँव से करीब 5 किलोमीटर दूर। इसके बाद उन्होंने आरोप लगाया कि मुमकिन है इन सबके पीछे उनके बेटे के साथ काम करने वालों का हाथ हो, क्योंकि विवेक ने उनके ख़िलाफ़ शिकायत की थी।
लेकिन, पड़ताल के दौरान मालूम चला कि 31 मई को विवेक ने अपने ही एक सहकर्मी को कॉल करके एक्सिडेंट की सूचना दी थी। इसके बाद उसका फोन स्विच ऑफ हो गया।
गाजियाबाद पुलिस ने इस पूरे मामले को सुलझाने के लिए ट्रैकर डॉग लीना की सहायता ली। इसके बाद लीना की मदद से वह आरोपितों के घर तक पहुँचे, जिन्होंने पकड़े जाने पर अपने जुर्म को स्वीकार कर लिया।
रिपोर्ट में बताया गया कि 31 मई को विवेक अपने काम से घर लौट रहा था। तभी उसकी बाइक एक कार से टकरा गई। इस गाड़ी में तीनों आरोपित सवार थे। जब विवेक की बाइक इनकी कार से टकराई तो विवेक स्लिप होकर रोड पर गिर गया।
इसके बाद उसने अपने एक्सिडेंट की जानकारी अपने सहकर्मी जब्बार को दी। लेकिन तब तक उस गाड़ी से एक व्यक्ति बाहर निकला और विवेक से फोन लेकर वहाँ से भागने लगा। विवेक ने अपना फोन लेने के लिए उनका पीछा किया।
भागते-भागते जब वह सुनसान इलाके में पहुँचा। तब तीनों आरोपितों ने विवेक को पकड़ लिया। यहाँ उन्होंने उसे मारा। जमीन पर पटका। फिर बेल्ट से गला घोंटने लगे।
एसपी के अनुसार, आरोपितों ने पूछताछ में बताया कि जब वह विवेक को मार रहे थे, उस समय वह उनसे लगातार अपनी जान की भीख माँगते हुए कह रहा था, “मुझे जाने दो मेरी माँ मेरा इंतजार कर रही होगी।”
लेकिन, तीनों को उसकी बातें सुनकर कोई फर्क़ नहीं पड़ा और वह तभी शांत हुए जब विवेक ने दम तोड़ दिया। इसके बाद उन्होंने विवेक के शव को जलाने के प्लान बनाया। लेकिन वह किसी कारणवश ऐसे नहीं कर पाए। इसलिए उन्होंने शव को फेंका और वहाँ से भाग गए।
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को फिर से धमकी दी गई है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार यूपी पुलिस की इमरजेंसी सर्विस के व्हाट्सएप नंबर पर एक धमकी भरा मैसेज भेजा गया है। इसमें मुख्यमंत्री आवास सहित राज्य के 50 अलग-अलग जगहों पर धमाके की धमकी दी गई है।
जी न्यूज ने पुलिस के हवाले से बताया है कि मैसेज में लिखा है, “हम पूरे उत्तर प्रदेश में धमाके करेंगे और सरकार देखती रह जाएगी।” धमकी भरे मैसेज के बाद मुख्यमंत्री आवास सहित पूरे राज्य में सुरक्षा कड़ी कर दी गई है। लखनऊ के कालिदास मार्ग पर हाई अलर्ट जारी कर दिया गया है। यहीं मुख्यमंत्री का आवास है।
जानकारी के मुताबिक मैसेज के बाद सीएम आवास के आसपास के वीआईपी इलाके में भी सघन चेकिंग शुरू कर दी गई है। साथ ही बम स्क्वॉड और डॉग स्क्वॉड की मदद से बंगले की छानबीन की जा रही है। पुलिस इस बात का पता लगाने में जुटी है कि मैसेज किसने और कहाँ से भेजा है।
मामले की गंभीरता को देखते हुए अपर मुख्य सचिव गृह अवनीश अवस्थी ने गृह विभाग के सभी सचिव और आला अधिकारी के साथ बैठक की है। मुख्य सचिव गृह अवनीश अवस्थी ने बताया कि मामले की जाँच की जा रही है।
आपको बता दें कि फिलहाल सीएम योगी को Z+ सिक्योरिटी मिली हुई है, लेकिन लगातार सीएम को मिल रही जान से मारने की धमकियों को गंभीरता से लेते हुए आईबी ने पहले भी उनकी सिक्योरिटी को लेकर अलर्ट जारी किया हुआ है।
इससे पहले भी सीएम योगी आदित्यनाथ को यूपी पुलिस की इमरजेंसी सर्विस यूपी 112 के व्हाट्सएप नंबर पर संदेश भेजकर बम से उड़ाने की धमकी दी गई थी। इसके बाद महाराष्ट्र एटीएस ने कार्रवाई करते हुए मुंबई निवासी 25 वर्षीय आरोपित कामरान को गिरफ्तार किया था, जो कि इस समय उत्तर प्रदेश पुलिस की एसटीएफ की हिरासत में है।
महाराष्ट्र एटीएस ने मुंबई के चूनाभट्टी इलाके के निवासी कामरान खान को एटीएस की कालाचौकी इकाई ने गिरफ्तार किया था। इतना ही नहीं कामरान की गिरफ्तारी के बाद भी लखनऊ पुलिस को एक धमकी भरी कॉल आई थी, जिसमें कहा गया था, “जिसे गिरफ्तार किया है, उसे छोड़ दो वरना अंजाम भुगतना पड़ेगा।”
पूछताछ में आरोपित कामरान ने बताया था कि उसे योगी आदित्यनाथ को धमकी देने के बदले एक करोड़ रुपये देने का वादा किया गया था। हालाँकि कामरान ने यह नहीं बताया था कि उसे पैसों का ऑफर किसने दिया था।
दक्षिण कश्मीर में 8 जून को आतंकवादियों के हाथों मारे गए सरपंच अजय पंडिता भारती के परिवार को जम्मू-कश्मीर प्रशासन ने गुरुवार (11 जून, 2020) को 20 लाख रुपए की अनुग्रह राशि प्रदान की है।
रिपोर्ट्स के अनुसार जम्मू कश्मीर के उपराज्यपाल गिरीश चंद्र मुर्मू ने अजय पंडिता भारती के परिवार के सदस्यों के साथ मुलाकात की और उनके प्रति अपनी गहरी संवेदनाएँ व्यक्त की।
उपराज्यपाल ने अजय पंडिता को श्रद्धांजलि भी अर्पित किया और कहा कि उनके द्वारा दिए गए सर्वोच्च बलिदान को हमेशा याद रखा जाएगा और उम्मीद जताई कि इस तरह के नृशंस कृत्य के अपराधियों को मानवता के खिलाफ अपने अपराध का एहसास होगा।
LG Murmu met the family members of the martyred Sarpanch, Ajay Pandita Bharti and handed over the ex-gratia relief 20 Lakhs to the family.
— Jammu-Kashmir Now (@JammuKashmirNow) June 11, 2020
जम्मू-कश्मीर सरकार की तरफ से पूर्ण समर्थन का आश्वासन देते हुए, उपराज्यपाल ने वीरगति को प्राप्त सरपंच के परिवार को अनुग्रह राहत राशि प्रदान की। 20 लाख के राहत राशि में 5 लाख रुपए सिक्योरिटी रिलेटेड एक्सपेंडिचर से, 1 लाख रुपए प्रदेश (जम्मू) सरकार की तरफ से, 4 लाख रुपए उपराज्यपाल के रिलीफ फंड की तरफ से और 10 लाख रुपए पंचायत वेलफेयर फंड की तरफ से शामिल है।
Ajay Pandita Bharti, a #Sarpanch in south #Kashmir's #Anantnag, was shot from a close range by terrorists & killed near his residence.
Speaking to IANS Niyanta said the family currently in #Jammu will soon be moving back to Kashmir.
वहीं सरपंच अजय पंडिता भारती की हत्या को लेकर कपिल मिश्रा ने इस्लामिक आतंकवाद के खिलाफ 14 जून को देश और दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में रहने वाले हिंदुओ से सोशल डिस्टेंसिग को मद्देनजर रखते हुए इतिहास के सबसे बड़े वर्ल्डवाइड प्रोटेस्ट करने का आह्वान किया है।
14 जून सन्डे को
भारत और दुनिया के 100 शहरों में एक साथ
कश्मीर में आतंक के खिलाफ एक साथ#AjayPandita जी को श्रद्धांजलि
उन्होंने कहा सभी लोग अपनी सुविधा अनुसार इस्लामिक आतंकवाद के विरोध में फ़ोटो, वीडियो, ऑडियो या संदेश वाले प्लेकार्ड के साथ सोशल मीडिया में अपनी फ़ोटो, शहर और देश के नाम के साथ पोस्ट और शेयर करने की बात की है।
साथ ही उन्होंने इस प्रदर्शन में एकजुटता की मिशाल पेश करने के लिए #HinduUnitedAgainstTerror लिख कर सोशल मीडिया पर ट्रेंड कराने की बात भी कहीं हैं। और लोगों को ये संदेश दिया है कि अब हम चुप नहीं बैठेंगे।
आतंकवादियों द्वारा अजय पंडिता भारती की हत्या
बता दें, जम्मू-कश्मीर के अनंतनाग जिले के लोकभवन लरकीपोरा में सरपंच अजय पंडिता की गोली मारकर हत्या की गई थी। पुलिस ने घटना के बारे में जानकारी देते हुए बताया था कि सोमवार (08 जून, 2020) की शाम करीब 6 बजे कुछ आतंकवादियों ने 40 वर्षीय सरपंच अजय पंडिता उर्फ भारती को गोली मार दी।
घटना को अंजाम देकर आतंकवादी मौके से फरार हो गए थे। घटना को उस समय अंजाम दिया गया था कि जब सरपंच अपने बागान में गए थे। आस-पास के लोगों ने पंडिता को नजदीकी अस्पताल में भर्ती कराया, जहाँ डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। अजय पंडिता कॉन्ग्रेस से जुड़े हुए थे और लुकबावन इलाके के सरपंच थे।
ओडिशा की राजधानी भुवनेश्वर के नयागढ़ जिले में महानदी के जल में 500 साल पुराने गोपीनाथ मंदिर के अवशेष दिखाई दिए हैं। कहा जा रहा है इससे पहले यह मंदिर 11 साल पहले नजर आया था। इसके बाद इसके अग्र भाग के दर्शन पानी का स्तर कम होने से अब फिर हुए हैं। इसे देखने के लिए पद्मवती गाँव के पास काफी संख्या में लोग पहुॅंचे।
बता दें, नयागढ़ जिल में यह खोज INTACH की महानदी वैली हेरिटेज साइट्स डॉक्यूमेंटेशन प्रोजेक्ट का हिस्सा है। प्रोजेक्ट असिस्टेंट दीपक कुमार नायक ने ऐतिहासिक धरोहरों के बारे में रूचि रखने वाले रवीन्द्र कुमार राणा की मदद से इस साइट का मुआयना किया और बताया कि गोपीनाथ मंदिर भगवान श्रीकृष्ण का ही मंदिर था।
फेसबुक पोस्ट में दीपक कुमार नायक ने इस मंदिर को प्रोजेक्ट में शामिल करने तक की पूरी कहानी साझा की है। उन्होंने बताया कि अतीत में पद्मवती गाँव सतपतना का हिस्सा था। यानी 7 गाँव का गठजोड़। 19 वीं शताब्दी में नदी के स्तर में भारी बदलाव आने के कारण यहाँ के लोग ऊँचे स्थानों पर जा बसे। इस दौरान ग्रामीणों ने न केवल खुद के स्थान को बदला, अपितु मंदिर के देवताओं को भी अपने साथ ले गए।
स्थानीय लोगों के मुताबिक, उस जगह करीब 22 मंदिर थे। जो पानी का स्तर बढ़ने के बाद नदी में विलीन हो गए। गोपीनाथ मंदिर का अग्र भाग पानी का स्तर कम होने पर इसलिए दिखाई देता है, क्योंकि यह उस समय का समय बड़ा मंदिर था। लोग बताते हैं कि इससे पूर्व भगवान गोपीनाथ मंदिर के मस्तक के दर्शन 11 वर्ष पूर्व हुए थे। पर तब यह बहुत कम समय के लिए उभरा था। लेकिन, पिछले एक साल में इसके दर्शन 4-5 बार हुए हैं।
दीपक कुमार नायक के अनुसार, तीन महीने पहले उन्हें उनके मित्र रवींद्र राणा ने कॉल करके इस बारे में बताया था। इससे पहले उन्हें संबलपुर में कुछ नदीजल में लीन हुए मंदिर के बारे में पता था लेकिन महानदी घाटी के निचले-मध्य क्षेत्र में जलमग्न मंदिर के बारे में सुनना उनके लिए एक असाधारण बात थी। बस फिर क्या? इसके बाद उन्होंने अपने प्रोजेक्ट कॉर्डिनेटर को इस संबंध में बताया और उन्होंने इसे अपने अभियान “Mahanadi Valley Heritage Sites Documentation” का हिस्सा बनाया।
दीपक के अनुसार, अनिल धीर, उनकी बातें सुनकर और स्पॉट पर जाने को तैयार हुए और उन्होंने 3 तीन दिन के अंदर जाकर इस जगह का मुआयना करने का मन बनाया। लेकिन कोविड-19 के कारण उनका प्लान चौपट हो गया। पर, जैसे ही कुछ दिन पहले लॉकडाउन खत्म हुआ, वह फौरन जगह पर गए। लेकिन करीब तीन बार उन्हें मंदिर जल के अंदर मिला।
दीपक कहते हैं कि उन्होंने हर बार कोशिशों के असफल होने पर अपनी उम्मीद छोड़ दी थी कि वह शायद इस जगह को दस्तावेजों में न शामिल कर पाएँ। लेकिन 7 जून को अचानक उनके मित्र राणा बाबू ने उन्हें बताया कि मंदिर का ऊपरी भाग अब नदी में कुछ दिनों से दिखने लगा है। यह सुनते ही दीपक ने अपने वरिष्ठ अनिल धीर को इस बारे में बताया। लेकिन दुर्भाग्यवश उस समय अनिल उनके साथ साइट पर नहीं जा पाए।
अगली सुबह 7 बजे दीपक बैदेश्वर पहुँचे। इसके बाद उन्होंने पद्मवती गाँव जाने का सफर अपने मित्र राणा के साथ नाव के जरिए तय किया। करीब 10 मिनट बाद वह मंदिर के अग्र भाग के पास थे। मंदिर का मस्तक उन्हें स्पष्ट दिख रहा था। उन्होंने इस दौरान तस्वीर खींचकर कई प्रमाण लेने का प्रयास किया। लेकिन नदी का वेग ऐसा था कि यह सब असंभव लगने लगा।
इस बीच उनके साथ नौका में आए, बालुंकेश्वर मंदिर के पुजारी ने नदी के अग्र भाग पर कूदकर नाव को स्थिर किया और वह कुछ तस्वीर खींच पाए। बता दें सोशल मीडिया पर गोपीनाथ मंदिर की यही तस्वीरें इस समय वायरल हो रही हैं।
दीपक के अनुसार, पद्मवती गाँव में वर्तमान में स्थित गोपीनाथ मंदिर में जल में विलीन मंदिर की असली मूर्ति विद्यमान है। इसके अलावा प्रोजेक्ट असिस्टेंट दीपक कहते हैं कि गोपीनाथ मंदिर को बनाने के लिए इस्तेमाल होने वाला पत्थर वहीं लग रहा है जिनका प्रयोग 15वी व 16वीं शताब्दी में मंदिरों को बनाने के लिए किया जाता था।
उन्होंने बताया जब यह यह क्षेत्र पानी में विलीन हुआ, उस समय वहाँ कई देवता थे जिन्हें स्थानांतरित कर दिया गया था। उनमें से गोपीनाथ, नृसिंह, रास बिहारी, कामना देवी और दधिभमण उल्लेखनीय थे। जिन्हें आज भी निकटवर्ती टिकरीपाड़ा गाँव और पद्मवती गाँव में पूजा जाता है।
दैनिक जागरण की रिपोर्ट के मुताबिक पद्मावती ग्रामवासी सनातन साहू ने कहा है कि सन् 1933 में हमारा गाँव सम्पूर्ण रूप से नदी में विलीन हो गया था। उस समय हमारी उम्र 6 साल थी। हम पाँच भाई-बहनों ने पद्मवती यूपी स्कूल में शरण ली थी। उस साल बाढ़ आने के साथ नदी गतिपथ बदलकर हम सबके लिए काल बन गई थी।
INTACH की कोशिशों पर प्रोजेक्ट सचिव अनिल धीर
इस मंदिर के संबंध में और अपने प्रोजेक्ट के बारे में जानकारी देते हुए महानदी प्रोजेक्ट के प्रमुख अनिल धीर ने कहा कि इंडियन नेशनल ट्रस्ट फार आर्ट एण्ड कल्चरल हेरिटेज (इनटाक) की तरफ से डॉक्यूमेंटेशन ऑफ दि हेरिटेज आफ दि महानदी रिवर वैली प्रोजेक्ट शुरू किया गया है।
छत्तीसगढ़ से महानदी के निकलने वाले स्थान से जगतसिंहपुर जिले के पारादीप तक 1700 किमी. (दोनों तरफ) के किनारे से 5 से 7 किमी. के बीच सभी पुरानी कीर्तियों की पहचान की जाएगी। इन तमाम सामग्रियों की रिकार्डिंग की जा रही है। फरवरी महीने में इसकी सूची प्रकाशित की जाएगी।
धीर ने कहा है कि ओडिशा में ऐसे बहुत से मंदिर हैं जो पानी में डूबे हुए हैं। इसमें हीराकुद जलभंडार में 65 मंदिर शामिल हैं। नदियों में भी बहुत से मंदिर समाहित हैं, जिनका सर्वे होना चाहिए। कुछ मंदिर अभी भी खड़े हैं और कुछ ढह गए हैं। मॉडल के तौर पर गोपीनाथ मंदिर को पुन: महानदी से निकालकर जमीन में स्थापित किया जाना चाहिए।
देश में जारी कोरोना संकट के दौरान डॉक्टरों को सैलरी नहीं देने या फिर कम देने के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने गंभीरता से लेते हुए सरकार को दिशा निर्देश जारी किया है। सुप्रीम कोर्ट ने मामले पर टिप्पणी करते हुए कहा कि युद्ध के दौरान अपने सैनिकों को दुखी नहीं रख सकते। इतना ही नहीं उनकी समस्याओं को दूर करने के लिए उन्हें अतिरिक्त रुपए भी दिए जाने चाहिए।
शुक्रवार (12 जून, 2020) को सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस अशोक भूषण, एसके कौल और एमआर शाह की बेंच ने कोरोना के खिलाफ जंग लड़ रहे डॉक्टरों को सैलरी न मिलने के मामले पर सुनवाई करते हुए कहा कि इस मुद्दे पर कोर्ट को शामिल नहीं होना चाहिए और सरकार को यह मुद्दा सुलझाना चाहिए।
मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा युद्ध के समय आप अपने सैनिकों को नाखुश नहीं करते। कुछ इसी तरह कोरोना के खिलाफ लड़े जा रहे इस युद्ध में असंतुष्ट सैनिकों (डॉक्टरों) को परेशानी हो इसे देश बर्दाश्त नहीं कर सकता है। वहीं कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को अपनी शिकायत और सुझाव स्वास्थ्य मंत्रालय को भेजने के लिए भी कहा है।
केंद्र सरकार की ओर से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि अगर बेहतर सुझाव सामने आते हैं, तो उन्हें समायोजित किया जा सकता है। बेंच ने कहा कि ऐसी खबरें आ रही हैं कि कई डॉक्टरों को भुगतान नहीं किया जा रहा है।
बेंच ने कहा हमने कुछ रिपोर्ट देखी कि डॉक्टर हड़ताल पर चले गए। दिल्ली में कुछ डॉक्टरों को पिछले तीन महीनों से भुगतान नहीं किया गया है। यह चिंताजनक हैं जिनका ध्यान रखा जाना चाहिए। इसके लिए अदालत के हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए।
कोर्ट की बेंच ने आगे कहा कि केन्द्र सरकार को इस संकट के बीच युद्ध लड़ रहे डॉक्टरों के लिए और अधिक करना चाहिए। साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि उनकी समस्याओं का समाधान किया जाए।
दरअसल, एडवोकेट अमित साहनी ने कोविड-19 मरीजों के इलाज में लगे स्वास्थ्यकर्मियों को उचित वेतन और क्वारंटाइन की सुविधा उपलब्ध कराने का निर्देश देने की माँग की थी। साथ ही कहा था कि जो लोग इस संकट के बीच बिना थके, बिना हारे अपने परिवार व अपनी जान की परवाह किए बिना मरीजों का इलाज करने में लगे हुए हैं। ऐसे लोगों की दुर्दशा पर कोर्ट का तत्काल हस्तक्षेप आवश्यक है।
आपको बता दें कि कोरोना मरीजों के उपचार में लापरवाही और संक्रमण से मरे लोगों के शव के साथ दुर्व्यवहार पर सुप्रीम कोर्ट ने नाराजगी जताई है। दिल्ली की केजरीवाल सरकार को फटकार लगाते हुए उससे जवाब भी मॉंगा है।
शीर्ष अदालत ने कहा है कि दिल्ली के अस्पतालों का बुरा हाल है। शवों के साथ अनुचित व्यवहार किया जा रहा है। कुछ शव कूड़े में मिले हैं। यह बताता है कि लोगों के साथ जानवरों से भी बदतर सलूक किया जा रहा है।
मौके के हिसाब से संवेदनाओं का प्रदर्शन अब मीडिया गिरोह की पहचान बन चुका है। बीते दिनों उत्तर प्रदेश में दलितों से संबंधी दो घटनाएँ सामने आईं। एक में एक दलित युवक को गोली मारकर खत्म कर दिया गया और दूसरी घटना में दलितों के पूरे गाँव को आग के हवाले झोंक दिया गया।
दलित युवक वाली घटना 6 जून की रात अमरोहा में घटी। घटना के प्रकाश में आते ही इसे मीडिया गिरोह ने तेजी से कवर किया। साथ ही प्रमुखता से खबरों की हेडलाइन में सवर्ण या अपर कास्ट जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया और ये बताया कि कुछ दिन पहले दलित युवक को सवर्णों ने मंदिर में जाने से भी रोका था।
कल तक जो लोग अमरोहा की घटना को दलित विरोधी बता कर राजनीति कर रहे थे, वही जौनपुर में 9जून को दलितों के घर फूंके जाने की घटना पर चुप्पी साधे बैठे हैं। क्या सिर्फ़ इसलिए क्योंकि मुख्य आरोपी अखिलेश यादव का बेहद क़रीबी जावेद सिद्धीकी है? नूर आलम और जावेद समेत अन्य पर रासुका लगाया गया। pic.twitter.com/StioTJfLlB
हालाँकि, अमरोहा पुलिस ने पड़ताल के बाद इस एंगल को पूर्ण रूप से खारिज किया। इससे साफ हो गया कि मीडिया गिरोह ने सिर्फ़ अपना प्रोपेगेंडा चलाने के लिए झूठ फैलाया।
इसके बाद 9 जून को प्रदेश में दलितों पर हमले की एक बड़ी खबर सामने आई। जौनपुर जिले के सरायख्वाज़ा क्षेत्र के भदेठी गाँव में समुदाय विशेष के लोगों ने आम तोड़ने को लेकर शुरू विवाद पर इतना विकराल रूप धारण किया कि उन्होंने दलितों के इस गाँव में आग लगा दी और जमकर उत्पात भी मचाया। इस दौरान हवाई फायरिंग हुई। वाहनों को आग में झोंका गया। भैंस और बकरियों को राख कर दिया गया। लेकिन मीडिया गिरोह इस घटना पर चुप्पी साधे बैठा रहा।
अमरोहा मामले पर जिस सक्रियता से राणा अय्यूब जैसे कट्टरपंथी, दलित विचारक और उनके हितैषी बन बैठे थे। वह सभी इस घटना पर मौन हो गए। न किसी ने इस वाकये की निंदा की और न ही दलितों के भविष्य को लेकर अपनी चिंता जाहिर की।
कारण शायद सिर्फ़ एक ही था कि अमरोहा में आरोपित सवर्ण निकल आया था, जो इनके एजेंडे के लिए फिट था। लेकिन जौनपुर में एक तो उपद्रवी भीड़ ही समुदाय विशेष से थी और दूसरा मास्टरमाइंड जावेद सिद्दीकी पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव का बेहद करीबी था। तो आखिर कैसे कोई इसपर अपनी राय रखता?
बता दें, हर मामले पर निष्पक्ष पत्रकारिता के झूठे दावे करने वाले वामपंथी मीडिया पोर्टल इस मामले में न तो अपने विचार प्रकट कर रहे है, और न ही देश में लोकतंत्र को बचाने की दुहाई देने आरफा खान्नम शेरवानी जैसी पत्रकार कुछ बोल रही हैं।
दलितों पर हुए इस बर्बरता पर प्रिंट का भी अभी तक कोई लेख सामने नहीं आया है और न ही दलितों के नाम पर अपना पूरा करियर बनाने वाले दीलीप सी मंंडल ने इस घटना का आँकलन किया है।
द वायर, जिसे पिछले दिनों कई मुद्दों पर अपनी रिपोर्टिंग के लिए लताड़ लगी, वह इस मामले को केवल आपसी विवाद का मामला बताता है।
हाँ, दिलीप सी मंडल ने हिप्पोक्रेसी की सीमा लाँघते हुए एक ट्वीट जरूर किया है। इसमें उन्होंने अपने दलित विचारक होने के साथ-साथ मुस्लिम प्रेम को बरकरार रखा है। उन्होंने अपने ट्वीट में आरोपितों के ख़िलाफ़ अपनी स्पष्ट राय रखने की जगह देश की जनसंख्या को जिम्मेदार ठहराया है और न्याय व प्रशासन पर ठीकरा फोड़ दिया है।
उन्होंने लिखा, “देश में 130 करोड़ लोग हैं। आपसी झगड़े, हिंसा, हत्याएँ तो होंगी। सवाल ये है कि ऐसी घटनाओं पर पुलिस-प्रशासन और न्यायपालिका का रुख क्या है। इसी के आधार पर तय होगा कि कोई सरकार न्यायप्रिय है या जुल्मी। इस कसौटी पर यूपी की सरकार कुछ जातियों के पक्ष में झुकी नजर आती है।”
खुद सोचिए, दिलीप सी मंडल जैसे बुद्धिजीवि आज आखिर क्यों न्याय प्रशासन की बात कर रहे हैं? क्यों यह समझाने की कोशिश कर रहे हैं कि देश की जनसंख्या इतनी अधिक है कि अपराध और हत्याएँ तो होगीं ही? ये वही लोग हैं जो सवर्णों के आरोपित होते ही उनकी जाति को मुख्य रूप से उजागर करते हैं और ऐसी हाय-तौबा मचा देते हैं कि किसी व्यक्ति विशेष को सवर्णों से घृणा ही हो जाए या वह देश में नागरिक को मिलने वाले मौलिक अधिकारों पर ही सवाल उठा दे?
ऐसा लगता है कि दलित उत्थान गिरोह विशेष के लिए टीआरपी बटोरने का शब्द मात्र है। इसके नाम पर दिलीप मंडल जैसे लोग खुद को बुद्धिजीवी के रूप में स्थापित करते हैं।
जौनपुर की घटना ने दलित हितैषी कथित बुद्धिजीवियों को ही नंगा नहीं किया है। मीडिया गिरोह, वामपंथी दलित विचारकों के अलावा अखिलेश यादव, उदित राज, मायावती, चंद्रशेखर जैसे कथित दलित हितैषी नेताओं की भी पोल खोलकर कर दी है। वे भी मौन हैं क्योंकि इस मामले में आरोपित न तो सवर्ण है और न ही बीजेपी से उनका कोई कनेक्शन। जय भीम-जय मीम के नाम पर दलितों के साथ होने वाले छलावे को यह मामला बेनकाव करता है। इसलिए सबने चुप्पी साध रखी है।
दोनों घटनाओं पर इनकी प्रतिक्रियाओं का अंतर यह भी बताता है कि कैसे मौकापरस्त गिरोह हमारे सामने किसी भी मामले को अपने एजेंडे के अनुसार पेश करता है। अपने नजरिए को ही अंतिम सत्य बताकर हम पर थोपने की कोशिश करता है।
#Jaunpur atrocities in Dalits by Peaceful people. No Liberal, no Mayawati, no Akhilesh Yadav, no Lutyen calls. But, shout out as if #GeorgeLloyd is the next door atrocity pic.twitter.com/AgASlxiqZ5
वहीं, योगी सरकार, जिसे हमेशा ब्राह्मणवाद का चेहरा बताया जाता है वह दलितों के ख़िलाफ़ हुई क्रूरता पर फौरन एक्शन में आती है और आरोपितों के ख़िलाफ़ रासुका के तहत कार्रवाई के आदेश देती है। साथ ही पीड़ितों को न्याय दिलाने की हरसंभव कोशिश करती है।
लेकिन सेकुलरिज्म को कथित खेवनहार मौन हैं। बोल भी रहे तो इस सावधानी से कि कोई दलितों पर बर्बरता के लिए समुदाय विशेष पर ऊँगली न उठा सके।