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4 साल पुरानी फोटो से अलका लांबा ने मंदिरों को बदनाम करने की कोशिश की, कहा- दान बटोरने के लिए खोले गए हैं

AAP की पूर्व विधायक और वर्तमान में कॉन्ग्रेस नेता अलका लांबा ने शुक्रवार (जून 12, 2020) को अपने ट्विटर अकाउंट से एक फोटो शेयर की। इस फोटो के जरिए उन्होंने आरोप लगाया कि लॉकडाउन के बाद मंदिरों को इसलिए खोला गया, ताकि भक्तों से दान लिया जा सके।

अलका लांबा ने एक हिंदू मंदिर की तस्वीर शेयर की। इस तस्वीर में भक्त मोबाइल के जरिए डिजिटल तरीके से दान करते हुए दिखाई दे रहे हैं।

अलका लांबा का ट्वीट

तस्वीर को ट्वीट करते हुए अलका लांबा ने लिखा है, “लगता है धार्मिक स्थलों को तो मात्र दक्षिणा के लिए ही खोला गया है। वरना हनुमान जी की मानें तो भगवान तो भक्तों के हृदय में वास करते हैं। ऐसा उन्होंने साबित करके भी दिखाया था। सच है ना? घरों में रहो, सुरक्षित रहो।”

अलका लांबा ने आरोप लगाया कि मंदिर केवल दान लेने के लिए उद्देश्य से खोला गया है। हालाँकि इसके पीछे की सच्चाई कुछ और है। अलका लांबा ने जिस फोटो को शेयर करते हुए ये आरोप लगाया है, वह तस्वीर 4 साल पुरानी यानी 2016 की है। इसके अलावा, यह ऑनलाइन खरीद के लिए उपलब्ध स्टॉक इमेज है।

अलका लांबा ने 4 साल पुरानी इस तस्वीर का इस्तेमाल हिंदू मंदिरो की छवि को धूमिल करने के उद्देश्य से किया और दावा किया कि मंदिर लॉकडाउन के बाद खजाना भरने के लिए खोले गए हैं। कॉन्ग्रेस नेता ने जो तस्वीर शेयर की है, उसमें भी कॉपीराइट का वॉटरमार्क देखा जा सकता है, जो यह साबित करता है कि यह फोटो स्टॉक इमेज साइट से ली गई है।

इस तस्वीर में आप देख सकते हैं कि यह 2016 की है, जहाँ लोग राजस्थान के जोधपुर के शास्त्री नगर में शनि मंदिर में दान देने के लिए PayTM का उपयोग कर रहे हैं। हालाँकि अलका लांबा ने सत्यता की पुष्टि की परवाह किए बिना यह कहते हुए हिंदू मंदिरों को बदनाम करने की कोशिश की कि देश के  ‘Unlock-1’ फेज में प्रवेश करने के दौरान जब अधिकारियों द्वारा कुछ प्रतिबंध हटाए जा रहे थे, उस समय मंदिर दान लेने में व्यस्त था।

31 मई को लॉकडाउन समाप्त होने के बाद सरकार की तरफ से कुछ राहतें दी गई। एक नई गाइडलाइन जारी की गई कि क्या करना है और क्या नहीं। इसके बाद 8 जून को ऑफिस, मॉल, रेस्टॉरेंट और धार्मिक स्थलों को खोलने का निर्देश दिया गया था।

गौरतलब है कि अलका लांबा ने इससे पहले उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के लिए ‘ढोंगी’ शब्द का प्रयोग किया और कहा कि जिन बलात्कारियों पर उनका, साक्षी महाराज का अमित शाह और पीएम मोदी का आशीर्वाद हो, उन्हें रिहा होने से कोई नहीं रोक सकता है। अलका लांबा ने कुलदीप सेंगर के रिहा होने की झूठी ख़बर पर यह प्रतिक्रिया दी थी। इसके बाद सेंगर की बेटी ऐश्वर्या ने अलका लांबा के खिलाफ उन्नाव पुलिस के समक्ष एफआईआर दर्ज करवाई थी।

भाई का ‘जहर’ बिका नहीं, बहन नमक पर बनाने चली ‘लल्लू’: कॉन्ग्रेसी मुखपत्र में प्रियंका गाँधी का इमोशनल अत्याचार

कॉन्ग्रेस का मुखपत्र है नेशनल हेराल्ड। इसका हिंदी वर्जन है नवजीवन। नवजीवन में एक लेख कॉन्ग्रेस महासचिव प्रियंका गाँधी का छपा है। शीर्षक है- प्रियंका गाँधी का लेख: अडिग और अजय ‘लल्लू’।

उत्तर प्रदेश कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष अजय कुमार लल्लू को यह कहानी (लेख की बजाए इसे कहानी कहना ज्यादा समुचित होगा) समर्पित है। इसमें प्रियंका कहती हैं, “अजय लल्लू कक्षा 6 के छात्र थे जब उन्होंने सड़क पर ठेला लगाया। दीवाली में पटाखे बेचे, बुआई के मौसम में खाद और बाकी के दिनों में नमक।”

भावनाओं में पिरोए इस कहानी पर चर्चा करने से पहले वक्त को थोड़ा पीछे ले जाते हैं। जनवरी का महीना था और साल था 2014। दिल्ली के तालकटोरा स्टेडियम में कॉन्ग्रेस का सम्मेलन चल रहा था। मनमोहन सरकार में मंत्री रहे और गाँधी परिवार के वफादार माने जाने वाले मणिशंकर अय्यर ने इसी सम्मेलन में कहा था, “मैं आपसे वादा करता हूँ कि 21वीं सदी में नरेंद्र मोदी कभी भी देश के प्रधानमंत्री नहीं बनेंगे। लेकिन अगर वो यहाँ चाय बेचना चाहते हैं तो हम उनके लिए एक जगह तलाश लेंगे।”

हालॉंकि जब उस साल हुए आम चुनावों में कॉन्ग्रेस को अपने इतिहास की सबसे शर्मनाक पराजय मिली तो अय्यर इस बयान से पलट गए। मई 2014 में एक इंटरव्यू के दौरान बीबीसी के सलमान रावी ने इस बयान को लेकर अय्यर से सवाल किया तो उनका जवाब था, “माफ कीजिएगा, इस तरह की भाषा का इस्तेमाल कर रहा हूँ। मगर यह आपका सवाल बिल्कुल बकवास है। मैंने उनको कभी चायवाला नहीं कहा और न वह कभी चायवाले ही थे। वह तो खुद अपने भाषणों में जगह-जगह इस बात को कहा करते थे। अहमद पटेल ने मुझे बताया कि वह ठेके पर कैंटीन चलाया करते थे। मैंने तो बस इतना कहा था कि प्रधानमंत्री बनने की क्षमता उनमें नहीं है।”

ऐसे में यह जरूरी हो जाता है कि आप एक बार फिर अय्यर को सुने और जान लें कि उन्होंने कहा क्या था। वीडियो कॉन्ग्रेस के ही ‘अघोषित’ चैनल एनडीटीवी से लिया गया है, ताकि कोई यह न कह सके कि इसके साथ छेड़छाड़ की गई है।

असल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बेहद सामान्य पृष्ठभूमि के परिवार से हैं। बचपन में वे वडनगर रेलवे स्टेशन पर चाय बेचा करते थे। इस तरह की पारिवारिक पृष्ठभूमि से निकलकर संघर्ष में तपकर ऊँचाइयों को छूने वाले बहुतेरे हैं। लेकिन, जब मोदी के बचपन में चाय बेचने की बात निकलकर पब्लिक डोमेन में आई तो कॉन्ग्रेस ने इसका खूब मजाक बनाया। मोदी उस समय भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार और गुजरात के मुख्यमंत्री थे। अय्यर का बयान ‘चायवाले का मजाक बनाने’ की कॉन्ग्रेस की उसी रणनीति की बानगी है।

अब थोड़ा आगे बढ़ते हैं। 2018 के आखिर में एक साक्षात्कार के दौरान पीएम मोदी ने कहा कि ‘पकौड़ा बेचना’ भी एक तरह का काम है। अगले साल आम चुनाव थे। इसलिए कॉन्ग्रेसियों ने इस बयान का भी जमकर मजाक उड़ाया। तत्कालीन कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गॉंधी ने इसका मखौल बनाते हुए कहा था, “मेक इन इंडिया, स्टार्ट अप इंडिया, सिट डाउन इंडिया, पकौड़ा…। शुरू में उन्होंने मेक इन इंडिया की बात की फिर स्टार्ट अप इंडिया की बात की, इसके बाद स्टैंड अप इंडिया की बात की और आखिर में वह पकौड़ा पर जाकर रुके।”

इससे आप समझ सकते हैं कि सामान्य पृष्ठभूमि के छोटे-छोटे रोजगार करने वाले लोगों के लिए कॉन्ग्रेस का शीर्ष नेतृत्व कितनी हीन भावना रखता है। लेकिन, समय का चक्र देखिए कि आज उसी राहुल गॉंधी की बहन, उसी गाँधी परिवार की सदस्य प्रियंका गॉंधी एक प्रदेश के अपने पार्टी अध्यक्ष के बचपन में ठेला लगाने, पटाखे, खाद और नमक बेचने की कहानी बेच रही हैं।

नवजीवन में प्रकाशित प्रियंका गॉंधी का कथित लेख

इतना ही नहीं इस कहानी में प्रियंका गाँधी ने यह भी बताया है कि लल्लू दिल्ली में एक झुग्गी में मजदूरों के साथ रहते थे। उनकी रोजाना कमाई थी 90 रुपया। फिर वह बताती है कि दो साल बाद लल्लू दिल्ली से लौटकर कैसे कॉन्ग्रेस में सक्रिय हुए और विधायक बने। वगैरह, वगैरह।

लल्लू ने अपने जीवन में क्या-क्या किया है और क्या-क्या पाया है, इस पर बात करने की बजाए हम यह जानते हैं कि वे फिलहाल चर्चा में क्यों हैं।

लल्लू मई में बसों की गलत जानकारी और धोखाधड़ी के आरोप में गिरफ्तार किए गए थे। उनकी जमानत याचिका पर 12 जून को इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने सुनवाई की। सरकार से जवाब मॉंगते हुए अदालत ने सुनवाई की अगली तारीख 16 जून की मुकर्रर की है। ध्यान देने वाली बात यह है कि 12 जून को ही लल्लू को समर्पित प्रियंका गॉंधी का लेख नवजीवन में प्रकाशित हुआ है।

लेकिन, इस पूरे लेख में प्रियंका गाँधी ने उन सवालों का जवाब नहीं दिया है जो लॉकडाउन के दौरान उनकी बस पॉलिटिक्स के कारण उठे थे। यहॉं तक कि रायबरेली की कॉन्ग्रेस विधायक अदिति सिंह ने भी इस मामले में पार्टी के स्टैंड का विरोध किया था। अदिति सिंह ने ट्वीट कर कहा था था, “आपदा के वक्त ऐसी निम्न सियासत की क्या जरूरत, एक हजार बसों की सूची भेजी, उसमें भी आधी से ज्यादा बसों का फर्जीवाड़ा। 297 कबाड़ बसें, 98 ऑटो रिक्शा व एबुंलेंस जैसी गाड़ियाँ, 68 वाहन बिना कागजात के, ये कैसा क्रूर मजाक है। अगर बसें थीं तो राजस्थान, पंजाब, महाराष्ट्र में क्यूँ नहीं लगाई।”

एक अन्य ट्वीट में उन्होंने कहा था, “कोटा में जब यूपी के हजारों बच्चे फँसे थे तब कहाँ थीं ये तथाकथित बसें। तब कॉन्ग्रेस सरकार इन बच्चों को घर तक तो छोड़िए, बॉर्डर तक ना छोड़ पाई। तब योगी आदित्यनाथ ने रातों रात बसें लगाकर इन बच्चों को घर पहुँचाया। खुद राजस्थान के सीएम ने भी इसकी तारीफ की थी।”

इन सवालों के जवाब देने की बजाए कॉन्ग्रेस ने अदिति सिंह को पार्टी की महिला विंग के महासचिव पद से हटा दिया था। तुर्रा ये कि अपने लेख में लल्लू की गिरफ्तारी की चर्चा करते हुए प्रियंका गॉंधी ने यूपी सरकार पर उनके खिलाफ कई धाराओं में फर्जी मुकदमे लादने का आरोप मढ़ दिया है।

प्रियंका बखूबी जानती थीं कि जब वे यूपी सरकार पर बदले की भावना से कार्रवाई के आरोप लगाएँगी तो वे सारे सवाल फिर खड़े होंगे जिसके कारण लॉकडाउन के दौरान प्रवासी मजदूरों के नाम पर सियासत करने को लेकर कॉन्ग्रेस और उनकी छीछालेदर हुई थी। इसलिए किसी किस्सागोई की तरह उन्होंने अपनी कहानी भावनाओं में लपेट कर शुरू की है।

उन्नाव रेप पीड़िता के दर्द को बेचने के साथ उन्होंने अपनी इस कहानी की शुरुआती की है। साथ ही साथ यह भी बताया है कि लल्लू उन्हें ‘दीदी’ और वे उन्हें ‘अजय भैया’ के नाम से संबोधित करती हैं। आगे उन्होंने 40 साल के लल्लू (2017 में लगातार दूसरी बार विधायक चुने गए थे) के बचपन और जवानी का संघर्ष बेचा है। आखिर में वे अपनी बस पॉलिटिक्स पर आती हैं। इस दौरान प्रियंका गॉंधी ने भरपूर कोशिश की है कि भावनाओं का डोज कम नहीं हो ताकि कोई वे सवाल नहीं पूछ सके जिसका वह जवाब नहीं देना चाहतीं।

ये वही प्रियंका गॉंधी हैं जो मैनपुरी में फसल काटने को लेकर ठाकुरों के दो समूहों के विवाद को दलित की पिटाई बताकर परोस चुकी हैं। ये वही प्रियंका गॉंधी हैं जिन्होंने बीते साल दिसंबर में लखनऊ में ड्यूटी कर रहीं महिला अधिकारी पर गला दबाने और जमीन पर गिराने का आरोप लगा दिया था। जबकि इस घटना के वीडियो में प्रियंका के साथ खड़े ‘गुंडे’ ही महिला अधिकारी के साथ धक्का-मुक्की करते नजर आए थे।

जाहिर है प्रियंका गॉंधी का संवेदनाओं से कोई साबका नहीं है। उन्होंने भावनाओं के चूल्हे पर अपनी सियासी रोटी सेंकने की कोशिश की है।

ऐसी ही कोशिश उनके भाई राहुल गॉंधी ने 20 जनवरी 2013 को किया था। पार्टी उपाध्यक्ष बनने पर जयपुर में कॉन्ग्रेस के चिंतन शिविर को संबोधित करते हुए राहुल गॉंधी ने भावना से सराबोर 38 मिनट का एक भाषण दिया था। ‘सत्ता जहर है’ वाले इस मशहूर भाषण पर उस समय मीडिया लहालोट हो गई थी।

लेकिन ये 2020 का भारत है। मेनस्ट्रीम मीडिया के प्रोपेगेंडा को हर कदम पर तार-तार करने के लिए एक पैरलेल मीडिया है। ऐसे में प्रियंका गॉंधी अपनी ही इमोशनल अत्याचार में उलझी नजर आतीं हैं। कहानी के अंत में उन्होंने लिखा है, “अजय लल्लू उस भारत के सच्चे नागरिक हैं जिसके लिए महात्मा गॉंधी ने लड़ाई लड़ी थी। वे इंसाफ के हकदार हैं। उनके साथ न्याय होना चाहिए।” यकीनन ये महात्मा गॉंधी का भारत है और कॉन्ग्रेस के कुकर्मों का इंसाफ भी कर रही है।

‘भारत के बेटे’ की हत्या पर राजनीति न करे कॉन्ग्रेस: अजय पंडिता की बेटी ने शशि थरूर को लताड़ा

कश्मीर में पिछले दिनों सरपंच अजय पंडिता की आतंकवादियों ने हत्या कर दी थी। इस मामले को सियासी रंग देने की कोशिश करने पर पंडिता के परिजनों ने कॉन्ग्रेस नेता शशि थरूर को जमकर सुनाया है।

दिवंगत अजय पंडिता की बेटी नियंता ने शुक्रवार (जून 12, 2020) को कहा कि कॉन्ग्रेस को भारत के बेटे (son of India) की हत्या पर राजनीति नहीं करनी चाहिए। उन्होंने कहा कि उनके पिता की हत्या पर राजनीति करने की जरूरत नहीं है। उनका परिवार किसी से कुछ नहीं माँग रहा। उन्हें बस इंसाफ चाहिए।

रिपब्लिक टीवी से बात करते हुए नियंता ने कहा, “मैं इस मामले का राजनीतिकरण करने की आवश्यकता समझ नहीं पाई। उन्होंने अपने नाम के साथ भारती शब्द इसलिए जोड़ा था क्योंकि वह देश के साथ जुड़ना चाहते थे, न कि किसी राजनीतिक दल के साथ।”

उन्होंने आगे कहा, “मैं राजनीति को लेकर अभी अनजान हूँ। लेकिन मुझे जो पता है वो यह कि मेरे पिता ने जो कुछ भी किया वह राजनीति के लिए नहीं था। हम न्याय चाहते हैं और कुछ नहीं।”

अजय पंडिता की बेटी के अलावा उनके पिता ने भी बेवजह मामले का राजनीतिकरण करने के आरोप में कॉन्ग्रेस नेता शशि थरूर की निंदा की। उन्होंने कहा, “शशि थरूर क्या जानते हैं? अजय ने इस देश के लिए सबसे बड़ा बलिदान दिया है। उनका बयान पूर्ण रूप से गलत है। हम न्याय चाहते हैं। राजनीतिक नेतृत्व इस घटना को तोड़-मरोड़कर पेश करेगा, लेकिन हम न्याय चाहते हैं।”

क्या बोला था शशि थरूर ने?

अजय पंडिता की हत्या के बाद कॉन्ग्रेस नेता शशि थरूर ने इस पूरे मामले को कॉन्ग्रेस पर हमला करार दिया था। थरूर ने लिखा था, “धर्मनिरपेक्षता और लोकतंत्र के लिए खड़े होने के लिए कश्मीर से केरल तक कॉन्ग्रेसियों की हत्या की जा रही है। संदेश साफ है- कॉन्ग्रेस मुक्त भारत।”

अनुपम खेर ने दिया शशि थरूर को जवाब

इस ट्वीट के बाद बॉलीवुड कलाकार अनुपम खेर ने भी उन्हें आड़े हाथों लिया और पूछा कि आखिर उनकी सोच के साथ क्या हो गया है। उन्होंने लिखा, “प्रिय, शशि थरूर!! आप एक शिक्षित व्यक्ति हैं। आपकी सोच को क्या हो गया है? इस परिदृश्य में जब एक आतंकवादी कश्मीर से कन्याकुमारी तक किसी को मारता है, तो वह एक भारतीय को मार देता है। राजनीतिक दल का सदस्य नहीं होता। घुमा फिराकर बात करने का क्‍या तरीका है!! संगत का इतना बुरा असर!!”

बता दें, 8 जून को जम्मू-कश्मीर के अनंतनाग जिले के लोकभवन लरकीपोरा में सरपंच अजय पंडिता की गोली मारकर हत्या की गई थी। पुलिस ने बताया था कि सोमवार (08 जून, 2020) की शाम करीब 6 बजे कुछ आतंकवादियों ने 40 वर्षीय सरपंच अजय पंडिता उर्फ भारती को गोली मार दी। घटना को अंजाम देकर आतंकवादी मौके से फरार हो गए थे। घटना को उस समय अंजाम दिया गया था कि जब सरपंच अपने बागान में थे।

उनकी हत्या के बाद आतंकवादियों को चेतावनी देते हुए नियंता ने कहा था, “तुझे क्या लगता है, तूने अजय भारती को मारा है। उनका शेर अभी जिंदा है। जिंदा नहीं छोड़ूँगी तुम्हें। एक गोली तो मारुँगी मैं उसे, सिर्फ एक गोली जाएगी मेरी तरफ से उसे। मेरे पापा मुझे शेरा बुलाते थे और मैं हूँ वो। मैं किसी से नहीं डरती। सामने बोल रही हूँ कि जिसने भी मेरे पापा के साथ ऐसा किया है, उसकी गर्दन हाथ में पकड़कर ऐसे तोड़ूँगी न कि उसकी रुह तक काँपनी चाहिए।”

बंगाल: शवों के साथ बर्बरता वाले वीडियो पर गवर्नर ने माँगा जवाब, कहा- घिनौने तरीके से दुखी हूँ

पश्चिम बंगाल में शवों को घसीटने का मामला तूल पकड़ता जा रहा है। सोशल मीडिया पर वायरल हुए वीडियो के बाद मामले का संज्ञान लेते हुए राज्यपाल जगदीप धनखड़ ने राज्य के मुख्य सचिव और गृह सचिव से जवाब माँगा है।

मामले पर शुक्रवार (12 जून, 2020) को पश्चिम बंगाल के राज्यपाल जगदीप धनखड़ ने ट्वीट कर कहा, “मैं उस घिनौने तरीके से दुखी हूँ, जिसमें 14 शवों को सड़क पर घसीटा गया था। मैंने मुख्य सचिव और गृह सचिव को पत्र लिखा है। गृह सचिव ने जवाब दिया है। उनकी प्रतिक्रिया इस तरह की है जैसे इस जगह पर प्रोटोकॉल लागू नहीं था।”

राज्यपाल ने आगे लिखा कि सवाल तो यह है ही की ये मौतें कोरोना से हुई हैं या नहीं। जिस तरह से शवों को घसीटा गया, ये देखकर मुझे पीड़ा हो रही है।

आपको बता दें कि पश्चिम बंगाल में एक श्मशान घाट पर कुछ शवों को जलाने के दौरान इलाके में बदबू फैल गई थी। इस पर स्थानीय लोगों की भीड़ जमा हो गई और विरोध के साथ हंगामा करने लगी। इसके बाद नगर निगम के कर्मचारियों ने अधजली लाशें घसीटते हुए गाड़ी में भरी।

इस अमानीय घटना का वीडियो सोशल मीडिया में वायरल हो गया। हालाँकि प्रशासन ने इससे इनकार किया है। सोशल मीडिया पर आए वाडियो में आप देख सकते हैं कि कर्मचारी कोलकाता में गारिया शवदाह गृह में रखे शवों को हुक से घसीटते हुए बाहर खड़ी गाड़ी में फेंक रहे हैं।

इस मामले को लेकर मचे हंगामे के बाद अब राज्य प्रशासन में हड़कंप मच गया है। वहीं ममता सरकार ने दलील दी कि शव कोरोना पीड़ितों के नहीं थे। कोलकाता पुलिस ने भी कहा कि शव कोरोना पीड़ितों के नहीं थे, कानूनी कार्रवाई की जा रही है।

गौरतलब है कि बंगाल में अभी तक कोरोना वायरस संक्रमण के कुल 9768 मामले सामने आ चुके हैं, जबकि कुल 442 मौतें हो चुकी हैं।

रायबरेली की MLA अदिति सिंह ने कॉन्ग्रेस के Whatsapp ग्रुप भी छोड़े, ट्विटर पर पहले ही मिटा चुकी हैं पार्टी का नाम

उत्तर प्रदेश के रायबरेली से कॉन्ग्रेस विधायक अदिति सिंह ने शुक्रवार (जून 12, 2020) को पार्टी के सभी व्हॉट्सअप ग्रुपों को छोड़ दिया। रिपब्लिक भारत ने सूत्रों के हवाले से यह जानकारी दी है।

इससे पहले अदिति सिंह ने अपने आधिकारिक ट्विटर अकाउंट से कॉन्ग्रेस का नाम हटा दिया था और उसकी जगह उन्होंने अपना हैंडल @AditiSinghRBL कर लिया था। उनके ट्विटर से INC (Indian National Congress) हटाते ही ट्विटर ने अदिति के आईडी से ब्लूटिक हटा दिया था।

इस दौरान , अदिति सिंह ने अपने सोशल मीडिया की प्रोफाइल से कॉन्ग्रेस के नाम सहित राहुल और सोनिया गाँधी की फोटो भी हटा दी थी। विधायक के इस तेवर के बाद माना जा रहा था कि वह अब पार्टी से जल्दी ही किनारा कर सकती हैं।

इससे पहले ज्योतिरादित्य सिंधिया ने अपना ट्विटर प्रोफाइल और बॉयो बदला था। इसके कुछ महीनों बाद मध्य प्रदेश में बड़ा सियासी उलटफेर हुआ और कमलनाथ सरकार गिर गई थी।

अब उसी तरह कॉन्ग्रेस के गढ़ रायबरेली सदर की विधायक भी अलग राह चुनती दिख रही हैं। अदिति सिंह की इस कवायद को कहीं न कहीं उनकी पार्टी से बगावत से जोड़कर देखा जा रहा है। बता दें पिछले कुछ समय से अदिति सिंह और कॉन्ग्रेस पार्टी के बीच सब ठीक नहीं चल रहा।

पिछले दिनों ये खबरें भी आईं थीं कि अदिति सिंह को कॉन्ग्रेस ने महिला विंग के महासचिव पद से हटा दिया गया है। नवंबर में अदिति की विधायक की सदस्यता खत्म करने को लेकर भी कॉन्ग्रेस ने यूपी विधानसभा अध्यक्ष हृदय नारायण दीक्षित को नोटिस दिया गया था। अदिति ने जम्मू-कश्मीर से आर्टिकल 370 हटाने का भी समर्थन किया था।

अदिति सिंह ने गाँधी जयंती पर पार्टी के व्हिप का उल्लंघन करते हुए यूपी विधानसभा के विशेष सत्र में हिस्सा लिया था, जिसके बाद उन्हें नोटिस भी भेजा गया था। हालाँकि कॉन्ग्रेस विधायक ने नोटिस को ठेंगा दिखा दिया था।

लॉकडाउन के दौरान कॉन्ग्रेस और योगी सरकार में बसों की सियासत गर्म हुई तो अदिति सिंह का ट्वीट चर्चा का विषय बना। इसमें उन्होंने कॉन्ग्रेस, महाराष्ट्र और राजस्थान सरकार पर सवाल खड़े किए थे। इस पूरे मामले में विधायक अदिति सिंह ने योगी सरकार के रुख का समर्थन किया था।

अदिति सिंह ने ट्वीट कर लिखा था, “आपदा के वक्त ऐसी निम्न सियासत की क्या जरूरत, एक हजार बसों की सूची भेजी, उसमें भी आधी से ज्यादा बसों का फर्जीवाड़ा। 297 कबाड़ बसें, 98 ऑटो रिक्शा व एबुंलेंस जैसी गाड़ियाँ, 68 वाहन बिना कागजात के, ये कैसा क्रूर मजाक है। अगर बसें थीं तो राजस्थान, पंजाब, महाराष्ट्र में क्यूँ नहीं लगाई।”

इसके अलावा उन्‍होंने एक और ट्वीट में लिखा था, “कोटा में जब यूपी के हजारों बच्चे फँसे थे तब कहाँ थीं ये तथाकथित बसें, तब कॉन्ग्रेस सरकार इन बच्चों को घर तक तो छोड़िए, बॉर्डर तक ना छोड़ पाई। तब योगी आदित्यनाथ ने रातों रात बसें लगाकर इन बच्चों को घर पहुँचाया। खुद राजस्थान के सीएम ने भी इसकी तारीफ की थी।”

तमिलनाडु में समुदाय विशेष की शिकायत के बाद मंदिर पर पुलिस ने बुलडोजर चलवाया: रिपोर्ट

तमिलनाडु में इस्लामिक कट्टरपंथियों की शिकायत पर तेनस्कासी नगर (Tenskasi town) के सम्मेनकुलम गाँव (Sammenkulam village) स्थित कट्टुप्पासथी मदसामी (Kattuppasathy Madasamy) मंदिर तोड़े जाने की खबर है।

इस मंदिर का निर्माण निजी स्वामित्व वाली पट्टा भूमि पर हुआ था, जिसके प्रति नादर (Nadar) समुदाय में बहुत श्रद्धा थी। लेकिन, फिर भी कट्टरपंथियों के कहने पर प्रशासन ने इसे तुड़वा दिया और बाद में यह सफाई दे दी कि जमीन अवैध थी, जिसपर मंदिर बनाने की अनुमति नहीं थी।

द ऑर्गनाइजर की रिपोर्ट के अनुसार, स्थानीय लोगों ने बताया कि इससे पहले पॉपुलर फ्रंट ऑफ़ इंडिया (PFI), सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ़ इंडिया (SDPI) और अन्य कट्टरपंथी संगठनों ने मंदिर के नवीनीकरण के काम पर आपत्ति जताते हुए दावा किया था कि इससे समुदाय विशेष महिलाओं की निजता का हनन होगा। 

इन समूहों की शिकायत के बाद जिला प्रशासन ने इस मामले पर संज्ञान लिया और हिंदुओं के प्रदर्शनों को दरकिनार करते हुए मंदिर पर बुलडोजर चलवा दिया गया।

जानकारी के मुताबिक, गाँव में 160 हिंदू नादर हैं, लेकिन दूसरे समुदाय के लोग उन्हें अपने आगे कुछ नहीं समझते। रिपोर्ट बताती है कि इस मामले के तूल पकड़ने के बाद ग्राम प्रधान के बेटे ने जिलाधिकारी से शिकायत की थी।

उसने कहा था कि उनके समुदाय के सदस्य अशिक्षित है और किसानी करके जीवन का गुजर-बसर करते हैं। पच्चईमाल ने जिला प्रशासन के सामने अपनी बात रखते हुए कहा था कि पट्ठा संख्या 1598 और 1376 में, उनके पास एक वन देवता मंदिर है, हर साल चैत्र के महीने के दौरान, वह वहाँ मिट्टी के आधार को बदलते हैं और त्योहार मनाते हैं।

हालाँकि, लॉकडाउन के कारण इस साल नादर समुदाय के लोग वहाँ अपना यह त्योहार नहीं मना पाए। लेकिन, बारिश के मौसम में पहले की मूर्ति को सुरक्षित रखने के लिए उन्हें उसकी मिट्टी बदलनी थी। इसलिए उन्होंने वहाँ मंदिर के पास सीमेंट रख दिया। लेकिन कट्टरपंथियों ने इस दौरान इसपर आपत्ति जता दी और यह कह दिया कि इससे श्रद्धालुओं को समुदाय विशेष की महिलाओं को नहाते देखने का मौका मिलेगा। 

इसके बाद उन्होंने अपनी शिकायत पुलिस में दर्ज करवाई और पुलिस ने हिंदुओं की भावनाओं की कद्र किए बिना मंदिर को गिरा दिया। ग्राम प्रधान के बेटे बताते हैं कि वह मंदिर उनकी जमीन पर थी। लेकिन फिर भी प्रशासन ने उनकी नहीं सुनी और न ही इस तथ्य पर गौर किया कि नादर समुदाय के लोग वहाँ कई पीढ़ियों से पूजा करते आ रहे हैं। बाद में जब प्रश्न उठाया गया तो पुलिस ने उस जमीन को अपने रिकॉर्ड से बाहर बताया और कहा कि यहाँ मंदिर बनाने की अनुमति नही थी।

तुष्टिकरण का आरोप

कथित तौर पर नादर समुदाय के लोगों का मानना है कि जिला प्रशासन व पुलिस प्रशासन ने यह हरकत समुदाय विशेष को खुश करने के लिए की। इस घटना के बाद यह भी आरोप लगे कि तमिलनाडु के सीएम ने समुदाय के वोट बैंक के लिए यह सब किया, क्योंकि चुनाव आने वाले हैं।

दूसरी ओर, हिंदू महासभा के नेता बालसुब्रमण्यम ने पहले से भी विशाल मंदिर बनाने का आश्वासन ग्रामीणों को दिया है। इसके अलावा कई अन्य हिंदू संस्थान भी उनकी मदद में आगे आए हैं।

ग्राम प्रधान के बेटे ने यह बताया उन्होने कभी भी सरकारी जमीन पर अतिक्रमण नहीं किया और न ही सरकारी जमीन पर कोई नया निर्माण शुरू किया। साथ ही चेतावनी दी कि बहुसंख्यक समुदाय विशेष द्वारा मंदिर विध्वंस के बाद उन्हें हिंदू समुदाय का विरोध झेलना पड़ सकता है।

The Bharat Mata statue was restored to its former glory in Issaki Amman temple in Kanyakumari

बता दें, तमिलनाडु में हिंदू समुदाय की भावनाओं पर ऐसा हमला पहली बार नहीं हुआ है। इससे पहले एक ईसाई संगठन के कहने पर भारत माता की मूर्ति ढके जाने का विवाद भी सामने आया था। बाद में भाजपा, आरएसएस समेत कई ग्रामीणों के प्रदर्शन से भारत माता की मूर्ति से कवर हटाया गया था।

पाकिस्तानी सेना के टैंक से नहीं डरे बलूच प्रदर्शनकारी, सैनिकों को खदेड़ा, चेक पोस्ट फूँका: देखें Video

बलूचिस्तान में करीब दो सप्ताह से जारी प्रदर्शन अब हिंसक हो गया है। प्रदर्शनकारियों द्वारा पाकिस्तानी सैनिकों को खदेड़ने का वीडियो सामने आया है। प्रदर्शन एक बलूच महिला और उसके चार साल के बच्चे की हत्या के बाद शुरू हुआ था।

प्रदर्शनकारियों ने गुरुवार (11 जून, 2020) को तैनात पाकिस्तानी सैनिकों पर पत्थर बरसाए। चेक पोस्ट आग के हवाले कर दिया। जान बचाने के लिए पाकिस्तानी सैनिक पोस्ट छोड़कर भाग खड़े हुए।

जानकारी के मुताबिक बलूच महिला और उसके बच्चे की हत्या के बाद से ही बलूचों का विरोध-प्रदर्शन जारी है। हत्या का आरोप बलूचिस्तान की सत्ताधारी पार्टी बीएपी से जुड़े लोगों पर है, जो इमरान सरकार की समर्थक है।

गुरुवार को बारबचा इलाके में प्रदर्शनकारियों ने पाक सैनिकों को खदेड़ दिया। इसका वीडियो सोशल मीडिया में वायरल हो रहा है। इसमें देखा जा सकता है कि हजारों की संख्या में बलूच प्रदर्शनकारी सेना पर पत्थर बरसा रहे हैं।

इसके बाद कुछ प्रदर्शकारियों ने पहले तो सेना की एक चेक पोस्ट को निशाना बनाते हुए उसमें तोड़फोड़ की और फिर उसको आग के हवाले कर दिया।

इस दौरान लगातार बढ़ते हिंसक प्रदर्शन को देख पाक सेना के जवानों को अपनी पोस्ट छोड़कर भागना पडा। वीडियो में आप देख सकते हैं कि सेना की चेक पोस्ट के पास एक टैंक भी खड़ा दिखाई दे रहा है।

आपको बता दें कि दो हफ्ते पहले पाकिस्तान में बलूचिस्तान प्रांत के तुरबत शहर में एक महिला मलिकनाज और उसकी चार साल की बेटी ब्राम्श की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि बलूचिस्तान आवामी पार्टी (बीएपी) के सदस्यों ने उनकी हत्या की है।

इस हत्या के बाद से ही बलूचों का प्रदर्शन जारी है। खबर यह भी है कि पाकिस्तान की सेना बलूचों के खिलाफ ग्राउंड जीरो क्लियरेंस ऑपरेशन चला रही है। इस ऑपरेशन के तहत बलूचिस्तान की आजादी की माँग करने वाली बलूच लिबरेशन आर्मी और बलूच लिबरेशन फ्रंट को खत्म किया जा रहा है। आपको बता दें कि बीते कुछ दिनों में बलूच और पख्तून नेताओं की हत्या के कई मामले सामने आए हैं।

‘जिन्ने मेरा दिल लुटिया’ फेम Jazzy B ने ​नए गाने में भड़काई खालिस्तान की आग, भिंडरावाले का महिमामंडन

‘जिन्ने मेरा दिल लुटिया गाने’ से नेम और फेम कमाने वाले भारतीय-कनाडाई पंजाबी गायक जसविंदर सिंह (Jazzy B) ने अपने नए गाने में खालिस्तान का समर्थन किया है। अपने नए गाने “Putt Sardara De”  के जरिए उसने ऑपरेशन ब्लू स्टार में मारे गए जरनैल सिंह भिंडरावाले का महिमामंडन भी किया है।

इस गाने में उसने सिखों के लिए अलग देश खालिस्तान की माँग का भी समर्थन किया है। गाने को लिखने वाले का नमा अमित बोवा है।

गाने में नजर आ रहे लोगों ने बड़े-बड़े हथियार थाम रखे हैं। गाने के बोल के जरिए सिखों को बताया जा रहा है कि भारत में उनके के साथ जो भी हुआ, उसके लिए वह कैसे अपना बदला ले सकते हैं।

गाने में कहा गया है कि किसी को भी सिखों से ख़िलवाड़ नहीं करना चाहिए, क्योंकि उनका इतिहास आक्रमक रहा है। वह भिंडरावाले की तरह हमेशा शिकार के भूखे रहते है।

इस गाने में एक जगह भिंडरावाले की भी वीडियो क्लिप है। साथ ही गाने में उन सिखों को भी इंगित किया गया है जो भारतीय जेलों में बंद हैं। करीब 5 मिनट की वीडियों में जैज़ी बी नाम से मशहूर इस गायक ने हर प्रकार से भारत के ख़िलाफ़ माहौल बनाने की कोशिश की है।

इतना ही नहीं, एक साक्षात्कार में जैज़ी बी ने इसका बचाव करते हुए कहा कि उसने भारत में सिखों पर होते अत्याचारों के कारण इस गाने को गाया है। जैज़ी बी ने कहा, चूँकि सिखों को भारत में सम्मान नहीं दिया जाता, इसलिए उन्हें इस खालिस्तान के लिए लड़ना चाहिए।

यहाँ बता दें, इस गाने के सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर इसकी काफी आलोचना की जा रही है। लोगों ने इस पर काफी आपत्ति जताई गई है। लेकिन जैज़ी बी ने यहाँ भी लोगों को यही कहकर सफाई दी कि लोगों को मालूम ही नहीं है कि भिंडरावाले कौन थे।

जैज़ी ने अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए इस ट्वीट में भिंडरेवाला को अपना हीरो बताया और लोगों से अपील की कि वे उनके भाषणों को सुनें, जो इस समय में यूट्यूब और अन्य वीडियो वेबसाइट पर मौजूद है।

उल्लेखनीय है कि यह पहली बार नहीं जब जैज़ी बी ने खालिस्तान के समर्थन में अपना मत रखा हो। इससे पहले उसने ‘शहीद कौम दे’ नाम से एक गाना रिलीज किया था। इसके अलावा कई साक्षात्कार में भी वह खालिस्तान के समर्थन में बोल चुका है। उसे कई बार यह कहते सुना गया है कि भारत में सिखों को सम्मान नहीं मिलता।

वर्तमान में यूके में रहने वाले इस पंजाबी गायक ने अपने हालिया इंटरव्यू में कहा था कि भारत में सिखों की कोई पहचान नहीं है।

इससे पहले सोशल मीडिया पर गालीबाजी और गंदगी फैलाने के लिए कुख्यात पंजाबी रैपर हार्ड कौर ने खालिस्तानी चोले में दिखाई पड़ी थी। ट्विटर पर जारी वीडियो में वह न सिर्फ़ कट्टर खालिस्तानियों के साथ दिखाई पड़ी थी, बल्कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह को लेकर अपशब्द भी कहे थे।

मिशनरियों के चंगुल में उत्तराखंड: ईसाइयत के प्रचार और प्रचारक बनाने को ऑनलाइन ‘बाइबिल क्लासेज’

यह देखना कितना दिलचस्प है कि भौतिकवादी पाश्चात्य देश खुद को जहाँ धार्मिक जीवनशैली से जितना मुक्त दिखाने का आडंबर करते हैं, उसके मूल में सारी दुनिया को ईसाइयत में तब्दील करने का लक्ष्य पलता है। इनके तरीके बेहद लुभावने हैं और पहनावे आकर्षक। इतने आकर्षक कि एक बार के लिए इन्हें देखकर एक सम्पन्न व्यक्ति भी इन्हें अपनाना चाहता है।

पूरा विश्व जिस समय कोरोना वायरस की महामारी से जूझ रहा है, उस समय उत्तराखंड संक्रमण के साथ-साथ मिशनरी धर्मांतरण से भी संघर्ष कर रहा है।

जहाँ हिन्दू जनेऊ पहनने, तिलक लगाने को बीते समय की बात कहते हैं और अपने धार्मिक क्रियाकलापों के अनुसरण करने में हिचकिचाते हैं, वहीं बाहरी देशों के आतताई, खुलकर दूसरों के धर्म में सेंध लगाते हुए यह साबित करते देखे जाते हैं कि ‘परमपिता जीसस’ ने बस हाथ के इशारे से तूफ़ान को रोककर अपने चेलों को तूफ़ान से बचाया और चेलों से भजन गवाकर उन्हें ‘चंगा’ किया। (यह सब आधा-अधूरा ज्ञान उस ‘जीसस भजन संग्रह’ और ‘परमपिता परमेश्वर की कहानियों’ से साभार- जो ‘ईसाई पर्यटक’ मुझे भी थमा गए थे।”

कार्ल मार्क्स ने कहा था कि धर्म अफ़ीम है। ईसाई मिशनरियों ने इस अफ़ीम को ग्रामीण और वंचितों की रगों में भरने का पूरा इंतजाम कर रखा है। मिशनरियों द्वारा अब इस अफ़ीम को चावल-राशन-बाइक-मुर्गा आदि में तब्दील कर दिया गया है। इस अफ़ीम के बदले वो उनसे उनके भविष्य से तो वंचित कर ही रहे हैं, साथ ही उनके वर्तमान के साथ भी घिनौना षड्यंत्र कर रहे हैं।

ऑपइंडिया पर इसाई धर्मांतरण पर आवाज उठाने के बाद जबरदस्त प्रतिक्रिया लोगों की ओर से देखने को मिली। उत्तराखंड राज्य के लगभग हर जिले से लोगों ने सम्पर्क कर अपने गाँव और कस्बे का हाल बताया। इसमें सबसे ज्यादा हैरान करने वाले देहरादून के पास के इलाकों के लोगों का अनुभव था। इनका कहना है कि देहरादून के पास रहने के बावजूद उनके नजदीकी गाँव के गाँव ईसाई बना दिए गए।

उत्तराखंड में वंचित और पिछड़े वर्ग की आर्थिक-सामाजिक परिस्थितियों का लाभ लेकर ईसाई मिशनरी किस प्रकार देवभूमि कहे जाने वाले उत्तराखंड राज्य को धर्मांतरण से प्रभावित कर रहे हैं यह सभी तथ्य हैरान करते हैं।

लेकिन उत्तराखंड के इस जनजातीय समाज में या तो हर कोई उतना ही वंचित है या फिर उतना ही संपन्न और इसका किसी की जाति से कोई भी सम्बन्ध नहीं है। लगभग हर परिवार के पास अपने खेत हैं, पशुधन है और अपने हुनर के अनुसार काम है। फिर ऐसे में अनुसूचित जाति को वंचित कहना कम से कम उत्तराखंड की दृष्टि में तो पूरे समाज के साथ भेदभाव कहा जा सकता है।

हालाँकि, वंचितों की इस लड़ाई को शहरों में रहने वाले वो सम्पन्न लोग अवश्य कमजोर करते हैं, जो प्रमोशन में आरक्षण की माँग के लिए धर्मांतरण की धमकी देते देखे जाते हैं।

मिशनरी स्कूल के संचालकों द्वारा शेयर किए गए एक वीडियो में दिया गया सन्देश

इस तस्वीर में सन्देश अधूरा है। बाइबिल में इसका पूरा वर्णन इस तरह से है – “Go therefore and make disciples of all nations, baptizing them in[a] the name of the Father and of the Son and of the Holy Spirit”

जिसका हिंदी में अर्थ है, “इसलिए तुम जाओ, सब जातियों के लोगों को चेला बनाओ और उन्हें पिता, और पुत्र और पवित्र आत्मा के नाम से बप्तिज्मा दो, और उन्हें सब बातें जो मैंने तुम्हें आज्ञा दी हैं, मानना सिखाओ। और देखो, मैं जगत के अन्त तक सदा तुम्हारे संग हूँ (मत्ती 28:19-20)।”

बप्तिज्मा

बाइबिल में बताया गया है कि प्रभु यीशु ने अपने 12 प्रेषितों को शिष्य बनाने के लिए कहा और उन्हें उन सभी चीजों का निरीक्षण करन सिखाया, जो उन्होंने उन्हें करने की आज्ञा दी थी। एक शिष्य, एक शिक्षक, धर्म या विश्वास का अनुयायी या ‘बिलिवर’ होता है।

पवित्र पुस्तक बाइबिल के अनुसार, यह उद्घोष अपने स्वर्गारोहण से ठीक पहले यीशु ने कहा था। यह बप्तिज्मा के लिए यीशु के आज्ञा है। बाइबिल में बताया गया है कि बप्तिज्मा के अतिमहत्वपूर्ण होने का कोई और कारण नहीं, क्योंकि यीशु ने इसकी आज्ञा दी है।

बप्तिज्मा पिता, पुत्र और आत्मा के नाम से दिया जाता है। ये मिल कर एक ‘मसीही बप्तिज्मा’ को बनाते हैं। इस विधान के द्वारा एक व्यक्ति को कलीसिया (चर्च) की संगति में स्वीकार कर लिया जाता है। यह सब जानकारी इसलिए दी जानी आवश्यक हैं, ताकि ऑनलाइन बाइबिल क्लासेज़ का उदेश्य स्पष्ट हो सके।

प्रलोभन के बदले वंचितों की आस्था का व्यापार

एक ओर जहाँ हिन्दू धर्म हमेशा से ही सिर्फ और सिर्फ अपने दैनिक जीवन की गतिविधियों और आवश्यकताओं से ही अपनी संस्कृति को जोड़कर उसे अपना धर्म मानता आया, वहीं दूसरी ओर लाक्षित तरीकों से अन्य धर्म के लोगों ने इसे ही निशाना बनाने के अनेकों प्रयास किए हैं।

हम जानते हैं कि सदियों से मुगलों द्वारा हिंदुओं के बर्बरतापूर्ण धर्मांतरण और फिर ईसाइयों द्वारा, विशेषकर दक्षिण भारतीय गोवा जैसे राज्यों में खुद को सभ्यता का सूर्य बताने वाले ‘व्हाइटमैन बर्डेन सिद्दांत’ के उपासक, यही हिंदुओं को ईसाई बनाने वाले किस प्रकार अपना ध्येय पूरा करने में सफल रहे हैं।

दुर्भाग्यवश, जिस वंचित वर्ग को ईसाई मिशनरी अपना शिकार बनाते हैं, वह ईसाईयों द्वारा धर्मांतरण के इस बर्बर इतिहास को नहीं जानता। ना ही वह वर्ग इस धर्मांतरण के पीछे की व्यापक साजिश और उनके आडंबरों के भ्रम से ही परिचित है।

उत्तराखंड राज्य को यूँ तो ईसाई मिशनरियों ने बहुत गहराई से प्रभावित किया है, लेकिन जब इनके द्वारा आपदा, महामारी जैसी परिस्थितियों को धर्मांतरण का आसान जरिया बनाते देखा जाता है तब यह भेद करना मुश्किल हो जाता है कि क्या वास्तव में ये समाज के तालमेल को खंडित करने का प्रयास कर रहे हैं, या फिर ये वास्तव में उस देवता की सच्ची सेवा कर रहे हैं, जिसके नाम पर ईसाई मिशनरी वंचितों की आस्था का व्यापार कर लेते हैं।

कोरोना महामारी और ऑनलाइन बाइबिल क्लास

उससे भी बड़ी हैरान कर देने वाली बात जो देखने को मिली है वो ये कि कोरोना वायरस के दौरान जारी लॉकडाउन के बीच ईसाई मिशनरी तकनीक के इस्तेमाल से अपने एजेंडा को जारी रखने में सक्षम हैं।

ईसाई मिशनरी गाँव के युवाओं को ‘बाइबिल क्लास’ का ज्ञान देने के लिए उनसे लगातार सम्पर्क कर रहे हैं। ग्रामीण युवा इनसे लैपटॉप और इंटरनेट के जरिए जुड़कर वीडियो कॉन्फ्रेंस के द्वारा इन क्लासेज को अटेंड कर रहे हैं।

मिशनरी स्कूलों द्वारा इन्टरनेट पर दी जाने वाली मिशनरी क्लासेज़, जिनका प्रयोग अब उत्तराखंड के युवाओं पर किया जा रहा है –

यहाँ पर ये जिक्र करना भी आवश्यक है कि जहाँ आजकल महानगरों से घर लौटे हुए लोग ‘वर्क फ्रॉम होम’ के लिए अच्छे इंटरनेट या ब्रॉडबैंड सर्विस बड़ी मुश्किल से इस्तेमाल कर पा रहे हैं, वहीं ईसाई मिशनरियों के धर्मांतरण की गिरफ्त में आए युवा उनसे लगभग रोजाना ही ऑनलाइन बाइबिल क्लास ले रहे हैं।

20-25 की उम्र के ये उन परिवारों के युवा हैं, जिनके घर में आय का कोई साधन नहीं है। ये किसी रोजगार का हिस्सा नहीं हैं। खेती की जमीन ये लोग वर्षों पहले या तो बाहरी लोगों के हवाले कर चुके हैं, या फिर वो बंजर हैं। ऐसे में बेहतरीन तकनीक का इस्तेमाल और ‘लाइफस्टाइल’ सभी ग्रामीणों को हैरान करता है।

मिशनरी स्कूलों का सबसे बड़ा खेल और ब्रेनवॉश करने का षड्यंत्र तो यह है कि ना ही ये युवा खलकर अपनी संदिग्ध गतिविधियों के बारे में किसी से कहते हैं और ना ही ग्रामीण लोग सब कुछ जानने के बावजूद किसी कानूनी कार्रवाई के भय से इस बारे में अपनी पहचान स्पष्ट करना चाहते हैं।

ऐसे में ईसाइयों द्वारा किया जा रहा यह धर्मांतरण एक पहेली बनकर उभरा है और शासन और प्रशासन की नजरों से भी सुरक्षित है। युवाओं को दिए जा रहे लालच से वो एक प्रकार का नशा उन्हें उपलब्ध करवा रहे हैं।

नाम न बताने की शर्त पर कुछ लोगों का कहना है कि इन मिशनरी शिक्षाओं का केंद्र मसूरी में ही किसी जगह पर है, जहाँ समय-समय पर पार्टी, सैर और अन्य लुभावनी गतिविधियाँ आयोजित करवाई जाती हैं। वर्ष 2009-10 के आसपास एक बार मैंने स्वयं भी इनके ही एक दल से मित्रता कर इनकी कार्यशैली के बारे में कुछ जानकारियाँ जुटाईं थीं। जिनसे मैं कुछ नतीजों पर पहुँचने में सक्षम रहा।

जिन युवाओं के कंधों पर समाज की मुख्यधारा से जुड़ने की जिम्मेदारी होनी चाहिए थी, मिशनरियों द्वारा उन्हें मुख्य शिक्षा से ही विमुख कर उन्हें ब्रेनवॉश तो किया ही जा रहा है, साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जाता है कि वो आने वाले समय में अपने समाज और अपनी सांस्कृतिक सभ्यता से ही कट जाएँ।

विज्ञान के समय में इस मजहबी बाइबिल की शिक्षा को लेकर यदि वो ‘पादरी’ बनते भी हैं, तो ऐसा कर के अपनी आने वाली पीढ़ियों को वो कौन सा भविष्य सौंपने जा रहे हैं? NCERT और स्कूल के सिलेबस की जगह पर बाइबिल के दोहे पढ़कर किस भविष्य की नींव रखी जा रही है?

ग्रामीण युवा, जिन्हें सरकारी स्कूलों ने ठीक से अंग्रेजी तक नहीं पढ़ाई, वो अब हिंदी में बाइबिल के अध्याय पढ़ रहे हैं। उनके सोशल मीडिया एकाउंट्स में सिर्फ वह चीजें शेयर की गई हैं, जो उन्हें किसी मिशनरी अध्याय के अनुसार अब तक के जीवन के लिए अपराधी बताती हैं।

पहले प्रचार फिर ‘प्रचारक’ में तब्दील होते ग्रामीण युवा

मिशनरियों के निशाने पर जो स्थानीय युवा हैं, उन्हें तो शायद इस बात की भनक भी ना हो कि जिस सच्चाई को वो अपने आस-पास के लोगों से छुपाते फिर रहे हैं, उन्हीं की तस्वीरें यही मिशनरी अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर ‘अचीवमेंट’ के रूप में अपने बीच के लोगों के साथ गर्व से शेयर कर रहे हैं।

इसका उदाहरण स्थानीय युवाओं के हाथों में “पवित्र बाइबिल” के ये संग्रह हैं जो मिशनरी स्कूल के संचालकों ने अपने अन्य मित्रों के साथ सोशल मीडिया पर शेयर किए हैं –

जैसे कि हमने पहले भी यह बात रखी थी कि उत्तराखंड राज्य का यह सुदूर इलाका, जो कि अब जाकर कहीं मुख्यधारा से जुड़ पाया है, हमेशा से ही मिशनरियों के निशाने पर रहा। ये लोग यहाँ आकर ग्रामीणों के साथ इतने घुल-मिल गए कि वो उनकी बोली-भाषा, रीति रिवाज और उनके आम जीवन का हिस्सा बन गए।

जो आज सामने नजर आ रहा है, वह वास्तव में कई वर्षों की चरणबद्ध प्रक्रिया का नतीजा है। स्थानीय लोग इस धर्मांतरण की महामारी को लेकर खुद भी इतने जागरूक नहीं थे, जो वो कभी इस विषय को महत्व देते।

इन तस्वीरों में आप देख सकते हैं कि बाहरी लोग भारत ही नहीं बल्कि उत्तराखंड की सीमा से लगे नेपाल को भी निशाना बना रहे हैं, जहाँ कि मिशनरी शिक्षा लेकर ये युवक गाँव-गाँव लौटकर चर्च का निर्माण करेंगे।

लेकिन यह भी विचारणीय बात है कि जिस अनुसूचित आबादी के युवा आज कुछ प्रलोभनों के कारण बाइबिल क्लास में रुचि ले रहे हैं, उसी अनुसूचित जाति के कुछ ही दूरी के गाँव के लोग आज अच्छी शिक्षा लेकर अपने भविष्य में निवेश कर रहे हैं, बेहतरीन रोजगार के लायक खुद को बनाने में सक्षम हैं यहाँ तक कि कुछ ऐसे भी उदाहरण हैं जो आज अच्छे राजकीय पदों पर भी आसीन हैं और युवाओं के प्रेरणास्रोत हैं।

लेकिन, एक पहलू यह भी है कि जिस बड़े मिशनरी अभियान से अनुसूचित जाति के युवाओं को अंधकार में धकेलने का काम किया जा रहा है, उस पर समाज स्वयं भी आगे आकर उनकी मदद करने, उन्हें इस क्षणिक प्रलोभन के दलदल से निकालने में मदद नहीं करना चाहता है। हालाँकि, अब यह ईसाइयत इन युवाओं में अपनी इतनी गहरी पैठ बना चुका है कि यह काम वास्तव में खतरनाक भी होता जा रहा है, जिसे कि इसकी तह में जाने वाले महसूस कर सकते हैं।

यह भी तय है कि ऐसी पहल करने वाले को बड़े संघर्ष और चुनौती से गुजरना होगा। लेकिन यदि उत्तराखंड के इस जनजातीय इलाके के सामंजस्य को बरकरार रखना है, और युवाओं को इस धर्मांतरण से बचाना है, तो इसे सरकार और स्थानीय लोगों को साथ मिलकर काम करना ही होगा।

महाराष्ट्र के पालघर में हम देख चुके हैं, ईसाइयों ने जिस आदिवासियों की आबादी को अपने चावल-राशन योजना से ब्रेनवाश करने का काम किया, वही भीड़ साधुओं की मॉब लिंचिंग करती नजर आई है। ऐसे में यदि यह सिलसिला हर राज्य को लीलने लगा तो भारत की संस्कृति बहुत लम्बे समय तक इसका परिचय रह पाने में सक्षम नहीं रहेगी।

‘मुझे छोड़ दो, मेरी माँ मेरा इंतजार कर रही होगी’: दलित विवेक की आदिल, सलमान और मोहसिन ने की थी हत्या, पूरी डिटेल

गाजियाबाद पुलिस ने 25 वर्षीय दलित युवक विवेक कुमार जाटव की हत्या की गुत्थी को सुलझा लिया है। विवेक की हत्या दो हफ्ते पहले हुई थी। घटना को उस समय अंजाम दिया गया था जब वह अपने ऑफिस से घर लौट रहा था। 

स्वराज्य की पत्रकार स्वाति गोयल शर्मा की रिपोर्ट के मुताबिक, इस संबंध में विवेक के परिजनों ने उसके सहकर्मियों पर संदेह जताया था। लेकिन पड़ताल में पुलिस ने तीन बदमाशों को गिरफ्तार किया। इनकी पहचान अपराधिक रिकॉर्ड वाले मोहम्मद मोहसिन, मोहम्मद आदिल, और मोहम्मद सलमान के रूप में हुई है।

इन तीनों ने पुलिस के आगे अपना जुर्म कबूल कर लिया है। गाजियाबाद के एसपी नीरज जदाऊँ ने बताया कि मोहम्मद मोहसिन के ख़िलाफ़ चोरी और पशुओं के साथ बर्बरता करने के कारण पहले से ही 10 केस दर्ज हैं।

स्वराज की रिपोर्ट के अनुसार, मृतक के पिता को अपने पुत्र का शव 1 जून की दोपहर मटियाला गाँव के खेत में पड़ा मिला था। यानी उनके निवास स्थान कौशल्या गाँव से करीब 5 किलोमीटर दूर। इसके बाद उन्होंने आरोप लगाया कि मुमकिन है इन सबके पीछे उनके बेटे के साथ काम करने वालों का हाथ हो, क्योंकि विवेक ने उनके ख़िलाफ़ शिकायत की थी।

लेकिन, पड़ताल के दौरान मालूम चला कि 31 मई को विवेक ने अपने ही एक सहकर्मी को कॉल करके एक्सिडेंट की सूचना दी थी। इसके बाद उसका फोन स्विच ऑफ हो गया।

गाजियाबाद पुलिस ने इस पूरे मामले को सुलझाने के लिए ट्रैकर डॉग लीना की सहायता ली। इसके बाद लीना की मदद से वह आरोपितों के घर तक पहुँचे, जिन्होंने पकड़े जाने पर अपने जुर्म को स्वीकार कर लिया।

रिपोर्ट में बताया गया कि 31 मई को विवेक अपने काम से घर लौट रहा था। तभी उसकी बाइक एक कार से टकरा गई। इस गाड़ी में तीनों आरोपित सवार थे। जब विवेक की बाइक इनकी कार से टकराई तो विवेक स्लिप होकर रोड पर गिर गया।

इसके बाद उसने अपने एक्सिडेंट की जानकारी अपने सहकर्मी जब्बार को दी। लेकिन तब तक उस गाड़ी से एक व्यक्ति बाहर निकला और विवेक से फोन लेकर वहाँ से भागने लगा। विवेक ने अपना फोन लेने के लिए उनका पीछा किया।

भागते-भागते जब वह सुनसान इलाके में पहुँचा। तब तीनों आरोपितों ने विवेक को पकड़ लिया। यहाँ उन्होंने उसे मारा। जमीन पर पटका। फिर बेल्ट से गला घोंटने लगे।

एसपी के अनुसार, आरोपितों ने पूछताछ में बताया कि जब वह विवेक को मार रहे थे, उस समय वह उनसे लगातार अपनी जान की भीख माँगते हुए कह रहा था, “मुझे जाने दो मेरी माँ मेरा इंतजार कर रही होगी।”

लेकिन, तीनों को उसकी बातें सुनकर कोई फर्क़ नहीं पड़ा और वह तभी शांत हुए जब विवेक ने दम तोड़ दिया। इसके बाद उन्होंने विवेक के शव को जलाने के प्लान बनाया। लेकिन वह किसी कारणवश ऐसे नहीं कर पाए। इसलिए उन्होंने शव को फेंका और वहाँ से भाग गए।