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U से UGLY का मतलब समझाने वाली स्कूल की दो शिक्षिकाओं श्रावणी मंडल, बरणाली दास पर गिरी गाज, हुईं सस्पेंड

पश्चिम बंगाल सरकार ने U से UGLY का मतलब समझाने के लिए एक काले व्यक्ति के चित्र को प्रयोग करने वाली वर्धमान म्युनिसिपल गर्ल्स हाई स्कूल की प्रधान शिक्षिका और एक अन्य शिक्षिका को बृहस्पतिवार (11 जून,2020) को निलंबित कर दिया गया।

मीडिया द्वारा इस मामले को उठाने के बाद इसपर तुरंत एक्शन लिया गया। घटना को संज्ञान में लाने के लिए शिक्षा मंत्री पार्थ चटर्जी ने मीडियाकर्मियों को धन्यवाद भी दिया। उन्होंने बताया कि यह दुर्भावनापूर्ण और आपराधिक मामला है। जिसको लेकर स्कूल की दो शिक्षकों श्रावणी मंडल और बरणाली दास को सस्पेंड कर दिया गया हैं।

शिक्षा मंत्री पार्थ चटर्जी ने मीडिया से कहा, “यह पुस्तक शिक्षा विभाग द्वारा निर्दिष्ट पाठ्यपुस्तकों का हिस्सा नहीं है। स्कूल ने स्वयं यह किताब शामिल की है। छात्रों के मन में पूर्वाग्रह स्थापित करने वाले किसी भी कृत्य को हम कतई बर्दाश्त नहीं करेंगे।”

क्या था मामला

दरअसल, पश्चिम बंगाल के बर्दवान जिले के एक प्राथमिक स्कूल में वर्णमाला और शब्दों का ज्ञान देने वाली बच्चों की किताब में U का अर्थ UGLY बताया गया और UGLY का मतलब समझाने के लिए इसमे एक काले व्यक्ति के चित्र को प्रयोग में लाया गया। काले रंग को बदसूरती का पर्याय बताने वाले चित्र को पाठ्यक्रम की किताबों में देखते हुए,पढ़ने वाले बच्चों के माता-पिता ने उनकी किताब में दर्शाए गए एक चित्रण को लेकर विरोध किया था।

यह किताब पश्चिम बंगाल के पूर्वी बर्दवान जिले के बर्दवान शहर में स्थित सरकारी सहायता प्राप्त म्युनिसिपल गर्ल्स हाई स्कूल के प्री-प्राइमरी डिपार्टमेंट की थी।

इस पुस्तक में ब्लैक मैन को लेकर यह विवाद उस समय सामने आया, जब अमेरिका के मिनियापोलिस में पुलिस हिरासत में एक काले व्यक्ति जॉर्ज फ्लॉयड की मौत के बाद दुनिया, विशेष रूप से अमेरिका में नस्लवाद के खिलाफ विरोध प्रदर्शन जारी है।

इंडिया टुडे की रिपोर्ट के अनुसार, इस संबंध में कोलकाता ईवनिंग कॉलेज के शिक्षक सुदीप मजूमदार ने कहा, “मेरी बेटी इस नगर निगम हाई स्कूल में पढ़ रही है। मैं अपनी बेटी को पढ़ाते हुए इस विषय पर आया था। इस तरह से एक काले व्यक्ति को बदसूरत कहकर बच्चों को शिक्षित करना पूरी तरह से गलत है।”

उन्होंने कहा, “इस किताब को जल्द ही वापस ले लिया जाना चाहिए। किसी भी स्थिति में, बच्चों को अश्वेतों के नाम पर दी जा रही शिक्षा उनके कोमल दिलों को हीन भावना से भरने और अश्वेतों के साथ भेदभाव करने का काम करेगी। यह गलत है।”

इसके बाद स्कूल प्राथमिक शिक्षा के जिला निरीक्षक स्वप्न कुमार दत्त ने भी इस हरकत को गलत बताया था। वहीं, इस मामले पर जिला इंस्पेक्टर ने भी कहा था कि “इस तरह की किताब स्कूल द्वारा दी गई आधिकारिक किताब नहीं है। हम इसके बारे में अभी स्कूल से बात करेंगे। अगर जरूरत हो तो किताब बदलनी चाहिए। ”

गौरतलब है कि बंगाल के स्कूलों में बच्चों को पढ़ाई जाने वाली किताबों में ऐसी त्रुटि पहली बार सामने नहीं आई है। इससे पहले पश्चिम बंगाल के ही एक स्कूल की किताब में फ्लाइंग सिख के नाम पर फरहान अख्तर की तस्वीर दिखाई गई थी। जबकि ये बात सर्वविख्यात है कि फ्लाइंग सिख की उपाधि भारतीय एथलीट मिल्खा सिंह को मिली

ओवैसी के एंटी CAA रैली में ‘पाकिस्तान जिंदाबाद’ के नारे लगाने वाली अमूल्या लियोना को देर रात मिली जमानत

‘पाकिस्तान जिंदाबाद’ का नारा बुलंद करने वाली 19 वर्षीय अमूल्या लियोन की जमानत याचिका को बेंगलुरु की एक अदालत ने गुरुवार (11 मई, 2020) रात को स्वीकार कर लिया है। अमूल्या लियोना, वह लड़की है, जिसने 20 फरवरी को एक एंटी-सीएए-एनआरसी रैली में ‘पाकिस्तान जिंदाबाद’ का नारा बुलंद किया था। 

देश विरोधी नारे लगाने के जुर्म में उसकी गिरफ्तारी हुई थी। गिरफ्तारी के 90 दिन की अवधि के अंदर यानी कि 20 मई तक बंगलूरू पुलिस को उसके खिलाफ चार्जशीट दाखिल करना था। मगर अवधि पूरे होने के बाद भी पुलिस द्वारा उसके खिलाफ कोई चार्जशीट नहीं दाखिल की गई। जिसके चलते मजिस्ट्रेट कोर्ट ने उसे ‘डिफॉल्ट जमानत’ दे दी है। अमूल्या के खिलाफ पुलिस की तरफ से तीन जून को एफआईआर दर्ज किया गया था।

गौरतलब है कि एआईएमआईएम (AIMIM) प्रमुख सांसद असदुद्दीन ओवैसी की रैली में ‘पाकिस्तान जिंदाबाद’ के नारे लगाने वाली अमूल्या लियोना की जमानत याचिका बंगलुरु की एक स्थानीय अदालत ने बुधवार 10 जून को खारिज करते हुए सिविल और सेशन जज ने कहा था कि अगर अमूल्या को जमानत दी जाती है, तो वह फरार हो सकती है।

जज विद्याधर शिरहट्टी ने यह भी कहा था कि अमूल्या लियोना जमानत दिए जाने पर ऐसे कार्यों में संलिप्त हो सकती हैं जो कि शांति को नुकसान पहुँचा सकता है। सरकारी वकील ने तर्क दिया कि आरोपित अमूल्या लोगों को कानून और व्यवस्था की समस्या पैदा करने के लिए उकसाने की कोशिश कर रही थी। वकील ने अदालत के समक्ष यह भी बताया कि वह उन गतिविधियों में भी शामिल थी जिसमें एक छात्र प्रदर्शन के दौरान “फ## हिंदुत्व” लिखा हुआ पोस्टर लह​रा रहा था।

सरकारी वकील ने कहा कि उसे जमानत दे दी जाती है तो वह दोबारा से ऐसे अपराध कर सकती है। हालाँकि, आरोपित के बचाव में कहा गया कि वह पाकिस्तान और भारत सहित सभी देशों के जिंदाबाद के नारे लगा कर यूनिवर्सल ह्यूमैनिटी का संदेश देने की कोशिश कर रही थी।

पाकिस्तान के समर्थन में नारे लगाने पर उसे गिरफ्तार कर लिया गया और भारतीय दंड संहिता की धारा 124 A (देशद्रोह) के तहत मामला दर्ज होने के बाद उसे 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया था।

बता दें जाँच के दौरान, अल्ट्रा लेफ्ट-विंग प्रदर्शनकारी अमूल्या लियोना ने इस बात खुलासा किया था कि इन सब प्रदर्शनों के लिए उसे पैसे दिए गए थे। उसने यह भी कहा था कि कैसे पिछले साल दिसंबर में नागरिकता संशोधन अधिनियम के खिलाफ आंदोलन शुरू होने के बाद इस विरोध-प्रदर्शन को आयोजन करने वाले लोग उसके सारे खर्चे उठा रहे थे।

वहीं अमूल्या लियोना को गिरफ़्तारी से एक महीने पहले एक यूट्यूब चैनल पर इंटरव्यू देते हुए भी देखा गया था। जहाँ वो भारत विरोधी एजेंडे का समर्थन करने के लिए वामपंथियों के तौर-तरीकों को समझा रही थी। इंटरव्यू में उसने कहा था कि इन सब प्रदर्शनों के लिए उन्हें पैसे दिए जाते थे। साथ ही उनके भाषण और नारे ‘विरोध प्रदर्शन’ का आयोजन करने वाले समूह तैयार करते हैं।

प्रदर्शनकारियों ने अब नई दुनिया के खोजकर्ता कहे जाने वाले कोलंबस की मूर्ति को तोड़ा, निशाने पर हैं उपनिवेशवाद के प्रतीक

अश्वेत जॉर्ज फ्लॉयड की मौत के बाद अमेरिका के कई शहरों में नस्लवाद को लेकर बड़े स्तर पर विरोध प्रदर्शन और हिंसा हो रही हैं। विरोध प्रदर्शनकारियों ने अब वहाँ पर उपनिवेशवाद और अश्वेतों की गुलामी को समर्थन देने वालों की मूर्तियों को निशाना बनाना शुरू कर दिया है और उन्हें हटाए जाने की माँग भी जोर-शोर से उठ रही हैं। इसी बीच, बॉस्टन, मियामी और वर्जीनिया में क्रिस्टोफर कोलंबस (Christopher Columbus s) की मूर्तियों को तोड़ दिया गया।

मिनेसोटा प्रांत की राजधानी सेंट पॉल शहर में प्रदर्शनकारियों ने जिस इतालवी खोजकर्ता कोलंबस की मूर्ती की गर्दन काटी है, उन्हें स्कूल की किताबों में नई दुनिया (The New World) का खोज करने वाले इंसान के रूप में पढ़ाया जाता है। इसके साथ ही, कई लोगों द्वारा मूल अमेरिकियों के खिलाफ नरसंहार के प्रतीक के रूप में भी वह जाने जाते हैं। उनकी प्रतिमाओं को बड़े स्तर पर नुकसान पहुँचाया जा रहा है।

अमेरिकी मूल के कार्यकर्ताओं ने कोलंबस को सम्मानित करने के विरुद्ध लड़ाई लड़ी है। उनका कहना है कि अमेरिका में उनके अभियानों से पूर्वजों का नरसंहार किया गया था। मिनेसोटा के सेंट पॉल में गुस्साए प्रदर्शनकारियों ने कोलंबस की 10 फीट की कांस्य प्रतिमा के चारों और रस्सी लगाई और मूर्ति को पत्थर की चौकी से खींचकर उखाड़ दिया गया।

क्रिस्टोफर कोलंबस की प्रतिमा को 10 जून, 2020 को गिरा दिया गया

अमेरिकी सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि कोलंबस द्वारा अमेरिका की खोज के चलते ही उपनिवेश और उनके पूर्वजों का नरसंहार हुआ था। वर्ष 1492 में कोलंबस भारत की खोज के लिए निकले थे, लेकिन उन्होंने गलती से अमेरिकी महाद्वीप की खोज की थी।

क्रिस्टोफर कोलंबस 

कोलंबस को लंबे समय से ‘नई दुनिया’ का ‘खोजकर्ता’ कहा जाता है, हालाँकि लेइफ एरिकसन (Leif Eriksson) जैसे ‘वाइकिंग’ (डेनमार्क मूल के खुनी लूटेरे) ने कई शताब्दियों पहले उत्तरी अमेरिका का दौरा किया था।

प्रदर्शनकारियों ने जेफरसन डेविस की प्रतिमा भी तोड़ दी है। अमेरिका के रिचमंड, सेंट पॉल और बोस्टन शहरों में बुधवार (जून 10, 2020) को इन प्रतिमाओं को तोड़ने के मामले सामने आए। प्रदर्शनकारियों ने एक दिन पहले ही रिचमंड में कोलंबस की वर्ष 1927 में स्थापित प्रतिमा उखाड़कर झील में फेंक दी थी।

भारतीय सेना ने दिया LOC पर मुँहतोड़ जवाब: पाकिस्तान की 2 चौकियाँ नष्ट, 1 मेजर रैंक के अधिकारी सहित 5 सैनिक ढेर

पाकिस्तानी सेना को एलओसी पर अपनी नापाक हरकत का खामियाजा एक बार फिर भुगतना पड़ा। पाक सेना ने राजौरी जिले के तरकुंडी सेक्टर में भारी गोलाबारी की, जिसमें भारतीय सेना के नायक वीरगति को प्राप्त हो गए। वहीं, सेना का एक जवान और छुट्टी पर घर आए एक पुलिसकर्मी घायल हो गए। भारतीय सेना की पाक के इस सीजफायर उल्लंघन पर जवाबी कार्रवाई करते हुए पाक सेना की दो चौकियाँ पूरी तरह नष्ट कर दिन। साथ ही पाक सेना के एक मेजर रैंक के अधिकारी सहित पाँच सैनिकों के मारे जाने की सूचना है। 

गौरतलब है कि पाकिस्तानी सेना की तरफ से बुधवार (10 जून,2020) और गुरुवार (11 जून, 2020) को राजौरी के तरकुंडी सेक्टर में की जा रहीं गोलाबारी का भारतीय सेना ने मुँह तोड़ जवाब देते हुए पाक सेना की दो चौकियाँ पूरी तरह नष्ट कर दी। साथ ही पाक सेना के एक मेजर रैंक के अधिकारी सहित पाँच सैनिकों को मार गिराया।

कोरोना काल के दौरान पाकिस्तानी सेना लगातार जम्मू-कश्मीर में नियंत्रण रेखा (एलओसी) पर संघर्ष विराम का उल्लंघन कर रही है। वहीं बुधवार रात को भी राजौरी जिले के मंजाकोटे और तारकुंडी सेक्टर में पाक सेना ने भारतीय सेना की अग्रिम चौकियों को और रिहायशी क्षेत्रों को निशाना बनाकर एक साथ अचानक मोर्टार दागने शुरू कर दिए थे।

पाक की तरफ से किए गए हमले के दौरान पंजाब बटाला के गाँव हरचोवाल के रहने वाले जवान नायक गुरचरण सिंह (28) वीरगति को प्राप्त हाे गए और 1 पुलिसकर्मी भी घायल हो गया। पाक की तरफ से की जा रही गोलीबारी में वहाँ रहने वाले कुछ मवेशी भी इसकी चपेट में आ गए। साथ ही स्थानीय मकानों को भी नुकसान पहुँचा है।

भारतीय सेना की कार्रवाई में 5 सैनिकों के मारे जाने और चौकियों के तबाह होने से बौखलाई पाक सेना ने गुरुवार रात को जम्मू कश्मीर के राजौरी और पुंछ सेक्‍टर में सीजफायर का उल्‍लंघन किया। पाकिस्‍तानी सेना की ओर से लगातार इन सेक्‍टर में फायरिंग की गई। जिसमें आसपास के गाँवों में भी कई गोले बारूद गिरे। जिसकी वजह से वहाँ खौफ का माहौल बना हुआ है।

बता दें पाकिस्तानी सेना लगातार भारत में घुसपैठ करने की कोशिश कर रही हैं। उनकी कोशिशों को नाकाम करते हुए भारतीय सैनिकों ने पिछले साल के मुकाबले इस साल पाक के कई सैनिकों को मार गिराया हैं। 10 दिन में ही पाकिस्तान सेना ने 114 बार सीजफायर का उल्लंघन किया है।

गौरतलब है की इसी हफ्ते जम्मू कश्मीर के अनंतनाग जिले में आतंकियों ने सोमवार (जून 8, 2020) को कॉन्ग्रेस के हिंदू सरपंच अजय पंडिता (भारती) की गोली मारकर हत्या कर दी थी। अजय पंडिता की हत्या उस वक्त की गई, जब वो बागान में गए हुए थे। आतंकियों ने पीछे से उन पर वार कर मौत की नींद सुला दी। कश्मीर में हिंदुओं की हत्या कोई नई बात नहीं है और अजय पंडिता की हत्या भी इसीलिए हुई, क्योंकि वो एक कश्मीरी पंडित हिंदू थे।

विदेश मंत्री जयशंकर ने हिंदूफ़ोबिक USCIRF को वीजा देने से किया मना, कहा- विदेशी हस्तक्षेप स्वीकार नहीं

केंद्र सरकार ने अमेरिकी अंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता आयोग (US Commission for International Religious Freedom) की टीम को वीजा देने से मना कर दिया है। यह टीम भारत में धार्मिक स्वतंत्रता का आकलन करने के लिए आना चाहती थी। इस पर सरकार ने स्पष्ट कह दिया है कि भारतीयों के संविधान संरक्षित अधिकारों पर किसी विदेशी संस्था को बोलने का हक नहीं है।

विदेश मंत्री एस जयशंकर ने 1 जून को भाजपा सांसद निशिकांत दूबे को लिखे एक पत्र में USCIRF को जमकर लताड़ लगायी है। उन्होंने अमेरिका के अंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता आयोग (USCIRF) द्वारा नागरिकता संशोधन विधेयक (CAA) पारित होने पर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के खिलाफ प्रतिबंधों की माँग उठाने के मुद्दे को उठाया था।

उल्लेखनीय है कि ‘यूनाइटेड स्टेट्स कमीशन ऑन इंटरनेशनल रिलीजियस फ्रीडम यानी, USCIRF ने इसी साल अप्रैल माह में अमेरिकी सरकार को सलाह दी थी कि वह धार्मिक स्वतंत्रता के मामले में भारत को ‘कंट्रीज ऑफ पर्टिकुलर कंसर्न’ यानी विशेष चिंता वाले देशों में शामिल करे।

निशिकांत दूबे ने पिछले साल लोकसभा में नागरिक संशोधन बिल (CAA) पास होने के बाद USCIRF द्वारा गृह मंत्री अमित शाह पर पाबंदी लगाने की माँग के मुद्दे उठाया था। इसके अलावा गत बुधवार को जारी अमेरिका की आधिकारिक ‘2019 अंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता रिपोर्ट’ में भी भारत में अल्पसंख्यकों के खिलाफ हमलों और भेदभाव पर चिंता जताई गई है।

विदेश मंत्री जयशंकर द्वारा भाजपा सांसद निशिकांत दूबे को लिखे इस पत्र में कहा गया है कि USCIRF भारत में धार्मिक आजादी की स्थिति के संबंध में पूर्वग्रहयुक्त, गलत और भ्रामक टिप्पणियाँ करने के लिए जाना जाता है। उन्होंने कहा कि हम इस तरह की बातों का संज्ञान नहीं लेते और पहले भी भारत के बारे में गलत जानकारी देने वाली रिपोर्ट्स का खंडन कर चुके हैं, जिस कारण हम इस तरह की संस्थाओं की बातों को तवज्जो नहीं देते।

जयशंकर ने आगे कहा – “विदेश मंत्रालय पहले ही USCIRF के बयान को गलत और गैरजरूरी बताकर अस्वीकृत कर चुका है। हम अपनी स्वायत्ता और संविधान के तहत नागरिकों को मिले मौलिक अधिकारों के मामले में किसी विदेशी हस्तक्षेप को स्वीकार नहीं करेंगे।”

इस संस्था ने पहली बार 2002 के गुजरात दंगों के दौरान भारत को ‘कंट्रीज ऑफ पर्टिकुलर कंसर्न’ में रखने की माँग की थी। USCIRF की सालाना रिपोर्ट में कहा गया था कि भारत में धार्मिक आजादी के उल्लंघन पर अतिरिक्त चिंता करने की जरूरत है और भारत धार्मिक आजादी के उल्लंघन में शामिल है।

इंदिरा गाँधी अपदस्थ: आज ही के दिन जस्टिस सिन्हा ने ‘फासीवादियों’ के दबाव के बावजूद सुनाया था ऐतिहासिक फैसला

लोकतंत्र की हत्या, फासीवाद, संस्थाओं का दुरुपयोग… ये सब कुछ ऐसे चुनिन्दा शब्द हैं, जो वर्ष 2014 से ही अचानक से कॉन्ग्रेस के प्रिय नारे बने रहे। लेकिन यह सभी शब्द कॉन्ग्रेस ने आखिर सीखे कहाँ से। इसके लिए 12 जून का इतिहास जानना आवश्यक है।

जाहिर सी बात है कि आज की कॉन्ग्रेस के लिए देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और उनकी बेटी इंदिरा गाँधी इतना कुछ छोड़ गए हैं कि अगर अब कभी भी यह राजनीतिक दल सत्ता में वापसी ना करे, तब भी इन्हें अपने राजनीतिक विचारधारा का भरण-पोषण कर पाने में शायद ही कोई परेशानी आएगी।

आज का दिन उस ऐतिहासिक पल का गवाह है जब फासीवादी, तानाशाह और निरंकुश इंदिरा गाँधी को इलाहाबाद की अदालत में दोषी ठहराया गया था। जून 12, 1975 की सुबह इलाहाबाद हाईकोर्ट का कोर्टरूम भीड़ से पूरी तरह भर चुका था।

आज ही के दिन जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा ( Justice JML Sinha) ‘राजनारायण बनाम इंदिरा गाँधी’ के मामले में अंतिम फ़ैसला सुनाने जा रहे थे। यह एक दुर्लभ अवसर था, जब अदालतों में एक राजनीतिक लड़ाई लड़ी जा रही थी।

जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा

इस निर्णय से पहले जस्टिस जगमोहन सिन्हा किन-किन परिस्थितियों से गुजरे और उनके फैसले को प्रभावित करने के लिए इंदिरा गाँधी द्वारा किस-किस तरह के तरीके अपनाए गए, आज कॉन्ग्रेस को यह सब शायद ही याद होगा।

दरअसल, इंदिरा गाँधी को इस कोर्टरूम में खड़ा करने के पीछे कारण 1971 में रायबरेली के लोकसभा चुनाव में इंदिरा गाँधी की जीत थी। यह वही लोकसभा चुनाव था, जिसमें इंदिरा गाँधी को जबरदस्त सफलता मिली थी और वो खुद रायबरेली से चुनाव जीती थीं।

इस चुनाव में इंदिरा गाँधी ने संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के उम्मीदवार राज नारायण (Raj Narain) को आश्चर्यजनक रूप से बड़े अंतर से हराया था। आश्चर्यजनक इस कारण – क्यों की अखाड़ा राजनीति को भारतीय राजनीति का हिस्सा बनाने वाले समाजवादी राज नारायण इस चुनाव में अपनी जीत को लेकर इतने ज्यादा निश्चिंत थे कि वो अपनी जीत का जश्न और विजय जुलूस भी निकाल चुके थे।

बनारस के शाही परिवार से जुड़े होने के बावजूद राज नारायण ने रायबरेली में अपनी राजनीतिक लड़ाई शुरू करने का फैसला किया। लेकिन नतीजे आने पर कहानी पूरी तरह उलट गई। राज नारायण चुनाव हार गए। कुल मतों का केवल एक-चौथाई हिस्सा ही उनके पक्ष में था, जबकि इंदिरा गाँधी ने उन्हें लगभग दो-तिहाई मतों से हरा दिया।

लोकसभा चुनाव में मिली इस हार ने ही राजनारायण को हाईकोर्ट का रुख करने के लिए प्रेरित किया और इंदिरा गाँधी पर चुनाव जीतने के लिए सरकारी मशीनरी और संसाधनों का दुरुपयोग करने पर उनका चुनाव निरस्त करने की अपील की। स्वतंत्र भारत में यह एक अनोखा मुकदमा साबित होने जा रहा था।

आखिरकार भारत के किसी प्रधानमंत्री को पहली बार अदालत के सामने पेश होने का हुक्म दिया गया। राज नारायण की तरफ से यह मुकदमा लड़ रहे मशहूर वकील शान्ति भूषण, (प्रशांत भूषण के पिता) ने कहा था –

“इंदिरा गाँधी के कोर्ट में प्रवेश करने से पहले जस्टिस सिन्हा ने कहा – अदालत में लोग तभी खड़े होते हैं जब जज आते हैं, इसलिए इंदिरा गाँधी के आने पर किसी को खड़ा नहीं होना चाहिए, लोगों को प्रवेश के लिए पास बाँटे गए थे।”

इसके कुछ देर बाद मार्च 18, 1975 को इंदिरा गाँधी अदालत पहुँची और उन्हें तकरीबन पाँच घंटों तक चुनाव और अपने निर्वाचन से समबन्धित सवालों के जवाब दिए।

इंदिरा गाँधी के खिलाफ उस मुक़दमें में राजनारायण के वकील रहे शांति भूषण ने अपनी आत्मकथा ‘कोर्टिंग डेस्टिनी’ में लिखा है –

“जब मैंने बहस शुरू की तो मुझे लगा कि जज इस मुक़दमें को कोई ख़ास महत्व नहीं दे रहे हैं। लेकिन तीसरे दिन के बाद से मैंने नोट किया कि उन पर मेरी दलीलों का असर होने लगा है और वो नोट्स लेने लगे हैं।”

इसमें जिक्र किया गया है कि किस प्रकार से जस्टिस सिन्हा अपने फैसले को गोपनीय रख पाने में सफल रहे और इसके लिए उन्हें इंदिरा गाँधी सरकार ने ‘गायब’ होने तक को मजबूर कर दिया था। जस्टिस जगनमोहन सिन्हा को देहरादून से कुछ विशेष लोगों के टेलिफ़ोन जाते थे और उन्हें अपने फैसले पर अनुकूल दिशा में निर्णय देने के लिए बाध्य करते थे।

देहरादून से जस्टिस सिन्हा को फोन करने वाले और कोई नहीं बल्कि चीफ़ जस्टिस माथुर थे जिन्होंने उनसे कहा कि गृह मंत्रालय के संयुक्त सचिव पीपी नैयर ने उनसे मिल कर अनुरोध किया है कि फ़ैसले को जुलाई तक स्थगित कर दिया जाए। जस्टिस सिन्हा इस बात से इतने निराश और दुखी हुए कि वो तुरंत हाईकोर्ट गए और रजिस्ट्रार को आदेश दिया कि वो दोनों पक्षों को सूचित कर दें कि फ़ैसला 12 जून को सुनाया जाएगा।

राज नारायण की ओर से यह केस लड़ रहे शान्ति भूषण के बेटे प्रशांत भूषण ने अपनी किताब ‘द केस दैट शुक इंडिया’ में लिखा हैं –

“सिन्हा अपना फ़ैसला सुकून के माहौल में लिखना चाहते थे। लेकिन जैसे ही अदालत बंद हुई, उनके यहाँ इलाहाबाद के एक कॉन्ग्रेस संसद सदस्य रोज़ रोज़ आने लगे। इससे जस्टिस सिन्हा बेहद नाराज़ हुए और उन्हें उनसे कहना पड़ा कि वो उनके यहाँ न आएँ। लेकिन जब वो इस पर भी नहीं माने तो सिन्हा ने अपने पड़ोसी जस्टिस पारिख से कहा कि वो उन साहब को समझाएँ कि वो उन्हें परेशान न करें।”

फैसले को लेकर दबाव बनाने वालों से जस्टिस सिन्हा इतने उकता चुके थे कि उन्हें अपने उज्जैन में होने की झूठी खबर तक फैलानी पड़ी थी। यहाँ तक कि उन्हें सुप्रीम कोर्ट का जज बनाने तक का भी लालच दिया गया। हालाँकि, यह भी एक सत्य है कि जब फैसला इंदिरा गाँधी के पक्ष में नहीं हुआ तो इसके बदले जस्टिस सिन्हा कभी भी सुप्रीम कोर्ट के जज नियुक्त नहीं किए गए। यह कॉन्ग्रेस की शासन प्रणाली का एक बहुत ही छोटा सा उदाहरण है।

12 जून की सुबह जस्टिस सिन्हा के सामने उनका 255 पेजों का दस्तावेज़ रखा हुआ था, जिस पर उनका निर्णय लिखा हुआ था। सुबह दस बजे अदालत की कार्यवाही शुरू करते हुए जस्टिस सिन्हा ने कहा, “मैं इस केस से जुड़े हुए सभी मुद्दों पर जिस निष्कर्ष पर पहुँचा हूँ, उन्हें पढूँगा।”

कुछ देर रुकने के बाद जस्टिस सिन्हा ने कहा – “याचिका स्वीकृत की जाती है।”

जून 12, 1975 को इंदिरा गाँधी के निर्वाचन पर फैसला देने के बाद जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा

‘इंदिरा गाँधी अपदस्थ’

जस्टिस सिन्हा ने अपने आदेश में लिखा कि इंदिरा गाँधी ने अपने चुनाव में भारत सरकार के अधिकारियों और सरकारी मशीनरी का इस्तेमाल किया। जस्टिस सिन्हा ने इंदिरा गांधी को राजपत्रित सरकारी अधिकारियों की सहायता प्राप्त करने का दोषी ठहराया, जिसमें यशपाल कपूर भी शामिल थे, जो कि पीएम के सचिवालय के साथ स्पेशल ड्यूटी पर एक अधिकारी के रूप में काम कर रहे थे। साथ ही, अदालत ने इंदिरा गाँधी को याचिकाकर्ता, राजनारायण को कानूनी लागत का भुगतान करने का भी आदेश दिया।

जस्टिस सिन्हा ने अपने आदेश में लिखा कि इंदिरा गाँधी ने अपने चुनाव में भारत सरकार के अधिकारियों और सरकारी मशीनरी का इस्तेमाल किया। जन प्रतिनिधित्व कानून में इनका इस्तेमाल भी चुनाव कार्यों के लिए करना ग़ैर-क़ानूनी था। इन्हीं दो मुद्दों को आधार बनाकर जस्टिस सिन्हा ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी का रायबरेली से लोकसभा के लिए हुआ चुनाव निरस्त कर दिया।

जून 12, 1975 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति जगमोहन लाल सिन्हा ने चुनावी दुर्भावनाओं के कारण रायबरेली चुनाव को ‘नल एंड वॉइड’ घोषित किया। इसके साथ ही जस्टिस सिन्हा ने अपने फ़ैसले पर बीस दिन का स्थगन आदेश दे दिया। यानी, सत्तारूढ़ दल को इंदिरा गाँधी का विकल्प खोजने के लिए 20 दिनों का समय दिया गया था।

जस्टिस सिन्हा के इस फैसले पर लंदन के ‘द टाइम्स’ अख़बार ने लिखा था कि ये निर्णय उसी तरह था, जैसे प्रधानमंत्री को ट्रैफ़िक नियम के उल्लंघन करने के लिए उनके पद से हटा दिया जाए।

राज नारायण की याचिका में इंदिरा गाँधी के खिलाफ शामिल 7 में से 5 मुद्दों पर अदालत ने इंदिरा गाँधी को राहत दी थी, लेकिन दो मुद्दों पर इंदिरा गाँधी को दोषी पाया गया। जस्टिस सिन्हा ने जो फैसला सुनाया था उसके अनुसार जन प्रतिनिधित्व कानून के तहत अगले 6 सालों तक इंदिरा गाँधी को चुनाव लड़ने से अयोग्य ठहराया गया था।

कोर्ट के निर्णय के बाद इंदिरा के खिलाफ विरोध के स्वर उठने लगे थे

यही वो फैसला था, जिसने देश को इंदिरा गाँधी की जिद पर आपातकाल की आग में झोंका था। यानी, एक अपराध को कम करने के लिए इंदिरा गाँधी ने उस से भी बड़ा दूसरा अपराध करना बेहतर और जरुरी समझा। जून 12, 1975 को आए इलाहाबाद हाईकोर्ट के इस फैसले के बाद जून 25, 1975 को लगा आपातकाल 21 माह, यानी मार्च 21, 1977 तक रहा।

अखबारों में आपातकाल की घोषणा

इंदिरा गाँधी के खिलाफ आए एकमात्र फैसले ने उनसे वो सब करवाया, जिसे फासीवाद, तानाशाही और लोकतंत्र की हत्या कहा जाता है। ये वही इंदिरा गाँधी थी, जिसने खुद को क़ानूनन अभेद्य बनाने के लिए न्यायपालिका को ही पंगु बनाने का विचार किया और संविधान में तमाम अलोकतांत्रिक संशोधन करने शुरू किए।

21 जुलाई से शुरू होने वाले मानसून सत्र के आने तक तमाम सांसद जेल में थे और जो बाकी थे उन्होंने संसद का ही बहिस्कार कर दिया। इस कदम ने इंदिरा गाँधी को और भी अधिक निरंकुश बना दिया था। फिर पत्रकारों की गिरफ्तारी से लेकर सामाजिक कार्यकर्ताओं के खून से लोकतंत्र के इतिहास का यह कलंकित अध्याय लिखा गया।

यही वो समय था जब इंदिरा गाँधी ने नेहरु और गाँधी के उद्वरण प्रकाशित करने वाले अखबारों तक को प्रतिबंधित कर दिया, कई फिल्मों पर रोक लगा दी गई संजय गाँधी के फैसलों पर ही दिल्ली और राजनीतिक बंदियों का भाग्य निर्धारित होने लगा।

आज के तथाकथित बुद्धिजीवियों और इन्टरनेट-उदारवादियों को 12 जून का दिन आवश्यक रूप से स्मरण होना चाहिए। ताकि उनके सम्मुख लोकतंत्र की हत्या और इसके वास्तविक गुनहगारों का सटीक विवरण पता रहे।

विजय माल्या को अपने यहाँ शरण न दें: भारत ने ब्रिटेन से कहा- भगोड़ा कारोबारी अपील करे तो ठुकरा दें

भगोड़े शराब व्यवसायी विजय माल्या को वापस लाने के लिए केंद्र सरकार लगातार प्रयास कर रही है। इसी कड़ी में उसने ब्रिटेन से विजय माल्या को अपने यहॉं शरण नहीं देने की अपील की है। भारत सरकार ने ब्रिटेन से कहा है कि यदि इस संबंध में वह अपील करे तो उसे ठुकरा दें। माल्या के प्रत्यर्पण को लेकर विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अनुराग श्रीवास्तव लगातार ब्रिटेन के संपर्क में बने हुए हैं।

विदेश मंत्रायल के प्रवक्ता अनुराग श्रीवास्तव ने कहा कि विजय माल्या के जल्द प्रत्यर्पण के लिए हम ब्रिटेन के अधिकारियों के संपर्क में हैं। हमने ब्रिटेन के पक्ष से भी अनुरोध किया है कि यदि माल्या की ओर से शरण की अवधि बढ़ाने को लेकर कोई अर्जी उनके पास आती है तो वह उस पर विचार न करें।

खबरों के मुताबिक विजय माल्या ने ब्रिटेन से इस आधार पर शरण माँगी है कि अगर उसे भारत में प्रत्यर्पित किया जाता है, तो उसे यातनाएँ दी जाएगी। इस मामले के बारे में जानकारी रखने वाले कुछ लोगों ने नाम न छापने की शर्त पर कहा कि ब्रिटेन के पक्ष ने 4 जून को ब्रिटिश उच्चायोग के प्रवक्ता द्वारा दिए गए बयान से अलग माल्या के मामले में कोई और टिप्पणी नहीं की थी और यह लंबे समय से चली आ रही नीति के तहत है।

दरअसल एक हफ्ते पहले ब्रिटेन ने कहा था कि एक गोपनीय कानूनी पेंच के चलते माल्या का प्रत्यर्पण अटका हुआ है, लेकिन वह जल्द से जल्द इस मामले को निपटाने की कोशिश कर रहा है। इसके बाद ही ब्रिटेन के रुख ने नई अटकलों को जन्म दिया कि भारत में वित्तीय अनियमितताओं के आरोपों का सामना कर रहा 64 वर्षीय व्यवसायी विजय माल्या ब्रिटेन में शरण के लिए आवेदन कर सकता है।

आपको बता दें कि इससे पहले भारत प्रत्यर्पण के खिलाफ विजय माल्या की अपील को हाईकोर्ट ने खारिज़ कर दिया था। माना जा रहा है कि इससे अब विजय माल्या के पास प्रत्यर्पण से बचने के लिए कोई कानूनी विकल्प नहीं बचेगा।

लंदन हाईकोर्ट ने 20 अप्रैल को फैसला सुनाया था। हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा था कि विजय माल्या ने भारतीय बैंकों को धोखा दिया है और उसे प्रत्यर्पित किया जाना चाहिए। उस वक्त माल्या ने लोअर कोर्ट वेस्टमिनस्टर मजिस्ट्रेट कोर्ट के प्रत्यर्पण के आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी, लेकिन वहाँ भी उसे झटका लगा था।

गौरतलब है कि 64 वर्षीय विजय माल्या पर भारत के कई बैंकों के साथ 11 हज़ार करोड़ से ज्यादा की धोखाधड़ी करने का आरोप है। माल्या मार्च 2016 में देश छोड़कर लंदन चला गया था।

अजय पंडिता की हत्या के बाद फिर कश्मीरी पंडितों का पलायन, 50 से ज्यादा हिंदू पंच-सरपंचों के कश्मीर छोड़ने का दावा

जम्मू-कश्मीर के अनंतनाग जिले में सरपंच अजय पंडिता की हत्या के बाद डर और खौफ का माहौल है। खबर है कि कश्मीरी पंडितों ने एक बार फिर घाटी से पलायन शुरू कर दिया है।

इंडिया टुडे के रिपोर्टर सुनील भट्ट की रिपोर्ट के अनुसार अब तक करीब 50 पंच-सरपंच घाटी छोड़कर जम्मू आ चुके हैं। यह दावा ऑल जम्मू एंड कश्मीर पंचायत कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष अनिल शर्मा ने की है।

अनिल शर्मा ने इंडिया टुडे से बातचीत में बताया कि अजय पंडिता की मौत के बाद उन्हें कई सरपंचों के कॉल आ रहे हैं। उनमें काफी डर है। अनिल ने कहा कि अब तक उनके 19 साथी इस बर्बरता का शिकार हो चुके हैं।

वे कहते हैं कि उन्होंने कई बार पंच-सरपंचों के लिए सुरक्षा माँगी थी। लेकिन समय रहते सुनवाई नहीं हुई। अनिल शर्मा बताते हैं कि उनकी जानकारी के अनुसार अब तक 50 से ज्यादा कश्मीरी पंडित पंच-सरपंच घाटी छोड़कर जम्मू आ गए हैं। उनमें अजय पंडिता की मौत से काफी डर है।

उनके मुताबिक, इस घटना से केवल कश्मीरी पंडित नहीं घबराए हुए, बल्कि अल्पसंख्यक सिख समुदाय के सरपंच भी काफी डरे हुए हैं। इसी कारण वह जम्मू-कश्मीर एलजी और गृह मंत्री अमित शाह से माँग करते हैं कि उन्हें सुरक्षा मुहैया कराया जाए।

मीडिया चैनल से बात में उन्होंने अलगाववादियों को सुरक्षा मुहैया कराए जाने को लेकर अपनी नाराजगी जताई और बार-बार कहने के बावजूद पंचों को सुरक्षा न मिलने पर शिकायत की। उन्होंने कहा कि इस समय पंचों में ऐसा डर है कि उनकी माँग बस यही है कि उन्हें सुरक्षा दी जाए। वरना वह अपने-अपने पद से त्यागपत्र देने को तैयार हैं।

अनिल शर्मा के अलावा पुलवामा के एक सरपंच मनोज पंडिता ने इंडिया टुडे को बताया, “अजय पंडिता हमारे बहादुर साथी थे। हम उनकी हत्या से काफी हतप्रभ हैं। हमें अपनी जिंदगी का भी डर है। इसलिए हम घाटी छोड़ जम्मू आए हैं।”

इसके अलावा घाटी छोड़कर जम्मू आ चुकी एक महिला पंचायत सदस्य ने बताया, “मैं व्यक्तिगत काम से कुछ हफ्ते पहले जम्मू आई थी। लेकिन अब अजय पंडिता की हत्या के बाद, मैं घाटी नहीं लौटूँगी। प्रशासन हमें सुरक्षा प्रदान करने में विफल रहा है।”

उल्लेखनीय है कि 90 के दशक में इस्लामिक बर्बरता के कारण साढ़े 3 लाख से ज्यादा कश्मीरी पंडित घाटी छोड़ने पर मजबूर हो गए थे। आज हिंदू सरपंच की मौत ने घाटी में रह रहे सैंकड़ो हिंदुओं के मन में फिर से उस डर को व्याप्त कर दिया है। इसके कारण उन्हें पलायन के अलावा कोई और विकल्प नहीं दिख रहा।

बता दें, 8 जून को जम्मू-कश्मीर के अनंतनाग जिले के लोकभवन लरकीपोरा में सरपंच अजय पंडिता की गोली मारकर हत्या की गई थी। पुलिस ने घटना के बारे में जानकारी देते हुए बताया था कि सोमवार (08 जून, 2020) की शाम करीब 6 बजे कुछ आतंकवादियों ने 40 वर्षीय सरपंच अजय पंडिता उर्फ भारती को गोली मार दी। घटना को अंजाम देकर आतंकवादी मौके से फरार हो गए थे। घटना को उस समय अंजाम दिया गया था कि जब सरपंच अपने बागान में गए थे।

J&K: इस साल 100 आतंकी ढेर, लॉकडाउन में 68 मारे गए, हथियारों की खेप के साथ आमिर वानी और वसीम वानी पकड़ा गया

जम्मू-कश्मीर में सुरक्षा बलों ने इस साल अब तक 100 से ज्यादा आतंकियों को मार गिराया। इनमें से 68 को 1 अप्रैल से 10 जून के बीच मार गिराया गया, जब कोरोना संक्रमण से निपटने के लिए पूरे देश में लॉकडाउन लागू था। इस बीच, पंजाब पुलिस ने लश्कर के दो आतंकियों को गिरफ्तार कर घाटी में बड़े हमले की साजिश को नाकाम कर दिया है।

पंजाब पुलिस ने आमिर हुसैन वानी और वसीम हसन वानी को पठानकोट में पकड़ा। दोनों आतंकी हमले के लिए घाटी में हथियार लेकर जाने की कोशिश में थे। इनके पास से 10 हेंड ग्रेनेड, एक एके -47 राइफल, दो मैग्जीन और 60 कारतूस बरामद किए गए हैं।

आमिर और वसीम शोपियाँ जिले के रहने वाले बताए जा रहे हैं। दोनों ट्रक से कश्मीर जा रहे थे। खबरों के मुताबिक इन दोनों आतंकियों से अश्फाक डार ने हथियार को पंजाब से कश्मीर लाने के लिए कहा था। अश्फाक पहले जम्मू-कश्मीर पुलिस में था, जिसे पहले ही भगोड़ा घोषित किया जा चुका है। अब अश्फ़ाक लश्कर के लिए काम करता है।

आँकड़ों के मुताबिक इस साल सबसे ज्यादा आतंकी हिज्बुल के मारे गए हैं। बुधवार (जून 10, 2020) को शोपियाँ में सुरक्षाबलों ने 5 आतंकियों को मार गिराया था। ये मारे गए आतंकी हिजबुल मुजाहिद्दीन और लश्कर-ए-तैयबा से जुड़े हुए थे।

बता दें कि 1 सप्ताह से भी कम समय में शोपियाँ में यह तीसरी बड़ी मुठभेड़ थी, जिसमें 14 आतंकवादी मारे जा चुके हैं। इसके अलावा 2 हफ्ते (1 जून से 10 जून) में कई टॉप कमांडर्स समेत 23 आतंकी मारे गए हैं।

इससे पहले 8 जून को शोपियाँ के पिंजूरा इलाके में हुई मुठभेड़ में 4 आतंकी मारे गए थे। उससे एक दिन पहले यानी रेबेन इलाके में 5 आतंकियों को सुरक्षाबल ने ढेर किया था। कुल मिलाकर 24 घंटों में सुरक्षाबलों ने 9 आतंकियों को मौत के घाट उतार दिया था।

रिपोर्ट के अनुसार, जम्मू-कश्मीर के डीजीपी दिलबाग सिंह ने इन लगातार मुठभेड़ों के बारे में जानकारी देते हुए बताया कि हाल के अभियानों में हिजबुल मुजाहिदीन के 9 आतंकवादी मारे गए हैं। पिछले 2 सप्ताह में 9 बड़े ऑपरेशन किए गए, जिसमें 22 आतंकवादियों का खात्मा किया गया है। इनमें आतंकी संगठनों के 8 शीर्ष कमांडर शामिल हैं।

अखिलेश यादव के करीबी जावेद सिद्दीकी सहित 34 अन्य गिरफ्तार, सभी जौनपुर में दलितों पर बर्बरता के आरोपित

उत्तर प्रदेश के जौनपुर जिले के भदेठी गाँव में मंगलवार (जून 9, 2020) रात दलितों के साथ हुई बर्बरता के मामले में पुलिस ने अब तक कुल 35 लोगों को गिरफ्तार किया है। घटनाक्रम से जुड़े मुख्य आरोपितों में से एक की पहचान सपा नेता जावेद सिद्दीकी के रूप में हुई है। जावेद को लेकर कहा जा रहा है कि वह इस पूरे मामले का मास्टरमाइंड है और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव का करीबी है। जावेद सिद्दीकी सहित 34 अन्य आरोपितों को गिरफ्तार कर लिया गया है।

एबीपी के पत्रकार विकास भदौरिया ने जावेद और अखिलेश यादव की कुछ तस्वीरें ट्वीट करते हुए कहा है, “समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव का बेहद क़रीबी जावेद सिद्दकी निकला जौनपुर में दलितों पर बर्बरता का मास्टरमाइंड, पुलिस ने किया गिरफ़्तार।”

गौरतलब है कि मंगलवार रात दलितों के गाँव में समुदाय विशेष के हमले का एक वीडियो भी सोशल मीडिया पर सामने आया है। इस वीडियो को वकील प्रशांत पटेल ने अपने ट्विटर पर शेयर किया है।

वीडियो में हम देख सकते हैं कि किस प्रकार उपद्रवी घटनास्थल पर उत्पात मचा रहे हैं और सामने खड़ी बाइक को भी खींचकर आग के हवाले कर देते हैं। इसके बाद सभी वहाँ से भाग जाते हैं।

यहाँ बता दें कि इस घटना के संबंध में पुलिस ने अब तक 57 नामजद, जबकि 100 अज्ञात लोगों के खिलाफ विभिन्न धाराओं में मुकदमा दर्ज किया है। इसके अलावा 35 आरोपितों की गिरफ्तारी के बाद, बाकी आरोपितों को पकड़ने के लिए दिन रात छापेमारी की जा रही है।

इस मामले पर स्वंय मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने संज्ञान लिया है। उन्होंने दलितों के घर फूँकने के मुख्य आरोपित नूर आलम और जावेद सिद्दीकी समेत सभी आरोपितों पर तत्काल एनएसए के तहत कार्रवाई करने का आदेश दिया है।

सीएम ने इलाके के थाना प्रभारी के खिलाफ भी कड़ी कार्रवाई का निर्देश दिया है। सीएम योगी ने सभी दलित पीड़ितों को तत्काल आवास योजना के तहत आवास और अन्य सरकारी मदद देने की बात कही है।

पूरा मामला

जिले के सरायख्वाजा थाना क्षेत्र के गाँव भदेठी में मंगलवार (9 जून, 2020) को गाँव के ही शहबाज नामक लड़के का दलित बस्ती के बच्चों से बकरियाँ चराने को लेकर विवाद हो गया था। इसके बाद दोनों समुदाय के लोगों में दिन में कहासुनी हो गई, रात में मुस्लिम पक्ष के सैकड़ों लोगों ने मिलकर लाठी-डंडों से लैस दलित बस्ती में हमला बोल दिया।

Yogi Adityanath On Jaunpur Dalit House Fire; Uttar Pradesh Chief ...

इस दौरान आरोपितों ने हवाई फायरिंग, वाहनों में तोड़फोड़ और कई घरों को आग के हवाले कर दिया था। घटना में एक भैंस और तीन बकरियाँ जल कर राख हो गईं। वहीं एक सिलेंडर में लगी आग के बाद हुए विस्फोट से भारी नुकसान हुआ।

हालात को काबू करने के लिए कई थानों की पुलिस फोर्स को रात में ही तैनात कर दिया गया था। घटना के बाद गाँव भदेठू पहुँचे जिलाधिकारी दिनेश कुमार सिंह व पुलिस अधीक्षक अशोक कुमार ने घटना स्थल मुआयना किया और स्थिति को नियंत्रण करने में लगे रहे, जिसके बाद जिलाधिकारी ने हिंसा फैलाने वालों पर सख्त कार्रवाई करने की बात कही।