भारत के साथ हाल ही में सामने आए सीमा विवाद को लेकर नक़्शे में परिवर्तन सम्बन्धी नेपाल सरकार द्वारा लाए गए संविधान संशोधन प्रस्ताव को खारिज किए जाने की माँग करने वाली जनता समाजवादी पार्टी की सांसद सरिता गिरि (Sarita Giri) के घर कुछ लोगों ने हमला किया। यहाँ तक की हमलावरों ने उनके घर पर काला झंडा लगाकर उन्हें देश छोड़ने की चेतावनी तक दे डाली। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, कहा जा रहा है कि शिकायत के बाद भी पुलिस उनकी मदद के लिए नहीं आई। यहाँ तक कि ऐसे समय में उनकी पार्टी ने भी उनसे किनारा कर लिया है।
मामला क्या है
पिछले हफ्ते नेपाल संसद की प्रतिनिधि सभा में संविधान संशोधन का प्रस्ताव पेश किया गया। नेपाल के केपी शर्मा ओली सरकार की तरफ से जिस दिन विवादित नक्शा संबंधित संविधान संशोधन प्रस्ताव को संसद में पेश किया गया था, उसी दिन नेपाल के राजपत्र में इसे प्रकाशित भी कर दिया गया। इससे पहले इस विवादित नक्शे का विरोध करने के लिए समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय जनता पार्टी का विलय कराकर नई पार्टी जनता समाजवादी पार्टी बनाई गई थी। इसी पार्टी से सरिता गिरि सांसद हैं।
लेकिन, अब संभावित विरोध की इस हालात में उनकी पार्टी भी उनके साथ खड़ी नहीं दिख रही है। प्रमुख प्रतिपक्षी दल नेपाली कॉन्ग्रेस तो पहले ही इस प्रस्ताव का समर्थन करने की घोषणा कर चुकी है। लेकिन भारत के पक्ष में रहने वाली नेपाल की मधेशी पार्टी ने भी संसद में इस बिल का विरोध नहीं किया। जनता समाजवादी पार्टी की सांसद सरिता गिरि ऐसी पहली सांसद हैं जिन्होंने इस संविधान संशोधन का विरोध किया है।
सांसद सरिता गिरि का विरोध क्यों?
नेपाल सरकार द्वारा नए नक्शे को संविधान का हिस्सा बनाने के लिए लाए गए संविधान संशोधन प्रस्ताव पर जनता समाजवादी पार्टी की सांसद सरिता गिरि ने अपना अलग से संशोधन प्रस्ताव लाते हुए उन्होंने इसे इस विवादित संविधान संशोधन को खारिज करने की माँग की थी। वहीं, उनकी पार्टी ने उनको तुरंत अपना यह संशोधन प्रस्ताव वापस लेने का सख्त निर्देश दिया। लेकिन, सरिता गिरी ने साफ-साफ कहा था कि चीन के इशारों पर नेपाल सरकार नक्शे में बदलाव करना चाहती है।
सरिता गिरि ने ये भी दावा किया था कि नेपाल की जनता भी नहीं चाहती है कि नक्शे को लेकर भारत के साथ कोई विवाद हो। उनकी राय थी कि नेपाल का नया नक्शा जारी करने से पहले नेपाल को भारत से बातचीत करनी चाहिए थी।
सरिता गिरि को NYA ने दी धमकी
गौरतलब है कि सरिता गिरि के संविधान संशोधन के इस प्रस्ताव का विरोध करने के कारण, उन पर नेपाल विरोधी रुख का आरोप लगाते हुए नेशनल यूथ एसोसिएशन (NYA) ने उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई की माँग की है। नेशनल यूथ एसोसिएशन (NYA) ने एक बयान जारी करते हुए कहा था कि देश की भावना को ठेस पहुँचाने के लिए उनके खिलाफ सख्त एक्शन लिया जाया। इतना ही नहीं NYA ने उन्हें तुरंत संसद से बर्खास्त करने की माँग भी कर डाली। यहाँ तक कि इस बिल का विरोध करने के कारण उनकी पार्टी ने भी पहले ही उनसे किनारा कर लिया है। पार्टी ने उनको तुरंत ये संशोधन प्रस्ताव वापस लेने का आदेश दिया है।
‘विवादित नक़्शे’ को नेपाल ने दी मंज़ूरी
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, नेपाल के उपप्रधानमंत्री और रक्षामंत्री ईश्वर पोखरैल के बातचीत के प्रस्ताव के कुछ ही घंटों बाद नेपाल की संसद ने देश के नए ‘विवादित’ राजनीतिक नक्शे के लिए संविधान संशोधन का प्रस्ताव पारित कर दिया। गौरतलब है कि इस नए नक़्शे के प्रस्ताव को नेपाली संसद के निचले सदन प्रतिनिधि सभा में सर्वसम्मति से पारित किया गया है। इस नए विवादित नक़्शे में लिपुलेख, कालापानी और लिम्पियाधुरा को नेपाल में दिखाया गया है।
भारत ने जताया विरोध
बता दें कि नेपाल ने सबसे पहले 18 मई को नया राजनीतिक नक्शा जारी किया था। इसमें कालापानी, लिपुलेख और लिमिपियाधुरा को अपने क्षेत्र के रूप में दिखाया था। नेपाल ने अपने नक़्शे में कुल 335 वर्ग किलोमीटर के इलाके को शामिल किया था। इसके बाद 22 मई को संसद में संविधान संशोधन का प्रस्ताव पेश किया था।
गौरतलब है कि नेपाल सरकार द्वारा लिम्पियाधुरा, कालापानी और लिपुलेख को अपने नए राजनीतिक नक़्शे में दिखाने पर भारत सरकार की कड़ी प्रतिक्रिया दी थी। भारतीय विदेश मंत्रालय ने कहा था कि देश के किसी क्षेत्र पर इस तरह के दावे को भारत द्वारा नहीं स्वीकार किया जाएगा। भारतीय विदेश मंत्रालय ने बयान जारी कर कहा कि नेपाल सरकार ने जो आधिकारिक नक़्शा जारी किया है उसमें भारतीय क्षेत्र को नेपाल में दिखाया गया है, ये एकतरफ़ा हरकत ऐतिहासिक तथ्यों और सबूतों पर आधारित नहीं है। इसका भारत विरोध करता है।
नेपाल की ओर से अपने नए राजनीतिक नक्शे में भारतीय क्षेत्र दिखाए जाने पर भारत के विदेश मंत्रालय ने नेपाल को भारत की संप्रभुता का सम्मान करने की नसीहत दी थी। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अनुराग श्रीवास्तव ने कहा था, “हम नेपाल सरकार से अपील करते हैं कि वो ऐसे बनावटी कार्टोग्राफिक प्रकाशित करने से बचें। साथ ही भारत की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान करें।”
कर्नाटक सरकार ने कक्षा पाँच तक के बच्चों के लिए ऑनलाइन क्लास पर प्रतिबंध लगा दिया है। कोरोना वायरस के कारण देशव्यापी बंद के बीच कई राज्यों के निजी स्कूलों ने बच्चों को घर पर रहकर ही ऑनलाइन क्लास देने का फैसला लिया था, जिस पर कर्नाटक सरकार ने महत्वपूर्ण फैसला लेते हुए LKG से लेकर कक्षा पाँच तक के बच्चों के लिए ऑनलाइन क्लास पर प्रतिबंध लगा दिया है।
इसके साथ ही कहा है कि ऑनलाइन कक्षाओं के नाम पर अतिरिक्त फीस वसूलने वाले स्कूलों के खिलाफ सख्त कार्रवाई भी की जाएगी और साल 2020-21 शैक्षणिक वर्ष के लिए फीस बढ़ाने पर भी रोक लगा दी गई है।
विभाग के अधिकारियों के साथ बैठक के तुरंत बाद मीडिया को जानकारी देते हुए, प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा मंत्री एस सुरेश कुमार ने कहा, “हमने आज दो बड़े फैसले लिए हैं। एलकेजी, यूकेजी और प्राथमिक कक्षाओं के लिए ऑनलाइन क्लास तुरंत बंद कर दी जानी चाहिए।”
रिपोर्ट्स के अनुसार, कर्नाटक की राज्य सरकार ने यह निर्णय प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा विभाग द्वारा कई अभिभावकों की शिकायतों के बाद लिया है। अभिभावकों का आरोप है कि कई निजी स्कूल किंडरगार्टन बच्चों के लिए भी ऑनलाइन क्लास चला रहे हैं।
Opinions from Parents & stakeholders are being sought regarding opening of Schools in our State. On June 10,11 & 12 in all the Schools Parents meetings will be held to this effect. So also regarding the way classes should be conducted in schools maintaining Social distance.
— S.Suresh Kumar, Minister – Govt of Karnataka (@nimmasuresh) June 3, 2020
प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा मंत्री एस सुरेश कुमार ने बुधवार (जून 10, 2020) को इसकी जानकारी देते हुए कहा कि एलकेजी से कक्षा पाँचवीं तक के बच्चों के लिए ऑनलाइन क्लास आयोजित नहीं की जा सकती हैं। उन्होंने कहा कि ऑनलाइन क्लासेज़ बच्चों के स्वास्थ्य के लिए सही नहीं है। इस बारे में कुछ ही दिन पहले उन्होंने कहा था कि अभिभावकों की शिकायत पर विचार किया जाएगा।
उन्होंने कहा कि निमहंस (NIMHANS) डायरेक्टर के एक रिपोर्ट में कहा गया था कि यह केवल 6 वर्ष से अधिक उम्र के बच्चों के लिए आयोजित किया जाना चाहिए क्योंकि एलकेजी से कक्षा पाँचवीं तक के बच्चों के स्वास्थ्य पर वर्चुअल क्लासेज का गलत प्रभाव पड़ेगा, ये बच्चों की सेहत के लिए सही नहीं हैं, लगातार कंप्यूटर, टैबलेट या फोन के सामने बैठने से बच्चों की आँखें, पीठ और मेंटल हेल्थ प्रभावित होगी, जिससे आगे चलकर उन्हें गंभीर बीमारी होने का खतरा है।
यह निर्णय लेने से पहले, विभाग ने विभिन्न विशेषज्ञों के साथ तीन दौर की चर्चा की, जिसमें प्रो एमके श्रीधर, प्रो वीपी निरंजनध्याय, डॉ जॉन विजय सागर और अन्य विभागों के साथ गृह और स्वास्थ्य विभाग शामिल थे। उन्होंने कहा कि हमने छात्रों के ज्ञान बढ़ाने के बारे में दिशा-निर्देश तैयार करने के लिए एक समिति का गठन किया है, जिसके प्रमुख प्रो एमके श्रीधर हैं।
देश में कोरोना वायरस के चलते हुए लॉकडाउन को अब धीरे-धीरे खोला जा रहा है। अनलॉक फेज-1 के लागू होने के बाद से ही इंटरनेट पर एक फ़ोटो तेजी से वायरल हो रही है, जिसमें यह दावा किया जा रहा कि देशव्यापी लॉकडाउन एक बार फिर 15 जून से लागू होने जा रहा है।
सोशल मीडिया के अलग-अलग प्लेटफॉर्म पर इस वक्त तेज़ी से एक हिंदी न्यूज़ चैनल की फ़ोटो को वायरल किया जा रहा, जिसमें यह दावा किया गया है कि लॉकडाउन 15 जून से दोबारा शुरू होने वाला है। उस फ़ोटो में यह खबर लिखी गई है कि गृह मंत्रालय ने 15 जून से देशव्यापी लॉकडाउन लागू करने की दिशा में संकेत दिया है, जिसमें दोबारा से उड़ानों और ट्रेनों पर प्रतिबंध भी शामिल है।
हालाँकि, बाद में यह पता चला कि कथित तौर पर एक हिंदी समाचार चैनल से संबंधित तस्वीर फर्जी और लोगों को गुमराह करने के लिए फैलाई जा रही थी। 15 जून से देश में एक और लॉकडाउन की अफवाहों को आधिकारिक तौर पर प्रेस सूचना ब्यूरो (PIB) की फैक्ट-चेक टीम ने खारिज किया है।
दावा: सोशल मीडिया पर फैलाई जा रही एक फोटो में दावा किया जा रहा है कि गृह मंत्रालय द्वारा ट्रेन और हवाई यात्रा पर प्रतिबंध के साथ 15 जून से देश में फिर से पूर्ण लॉकडाउन लागू किया जा सकता है।#PIBFactcheck– यह #Fake है। फेक न्यूज़ फैलाने वाली ऐसी भ्रामक फोटो से सावधान रहें। pic.twitter.com/DqmrDrcvSz
पीआईबी फैक्ट चेक के आधिकारिक ट्विटर अकाउंट ने लॉकडाउन के फिर से शुरू होने की खबर को फर्जी घोषित किया है। यह जरूरी था ताकि लॉकडाउन को लेकर लोगों के बीच फैलाए जा रहे भ्रम को खत्म किया जा सके।
गौरतलब है कि गृह मंत्रालय ने देश में फिर से लॉकडाउन को लागू करने के संबंध में कोई भी घोषणा नहीं की है। इसके अलावा लॉकडाउन को लेकर जिस खबर की फोटो को इंटरनेट पर फैलाया जा रहा है, उसको जानबूझकर अफवाह फैलाने के लिए बनाया गया है। यहाँ तक जिस चैनल की तरफ से यह दावा किया जा रहा, उसे भी इसके बारे में कोई जानकारी नहीं है।
बता दें कि 1 जून से केंद्र सरकार द्वारा दोबारा से अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने और आम जीवन को सामान्य करने लिए अनलॉक किए जाने वाले फैसले के बाद से ही लॉकडाउन को फिर से लागू करने वाली अफवाहें सामने आई थीं।
8 जून तक स्थानीय कानून प्रवर्तन अधिकारियों द्वारा अपने क्षेत्र की स्थिति के आधार पर कार्यालयों, मॉल, रेस्तरां और धार्मिक स्थलों को फिर से खोलने सहित देश ने सभी तीन चरणों को पूरा कर लिया था। सुरक्षा को मद्देनजर रखते हुए सरकार द्वारा फ्लाइट और ट्रेनों को दोबारा से चलाने के लिए नए-नए तरीके भी अपनाए जा रहे हैं।
राजस्थान कॉन्ग्रेस ने राज्यसभा चुनाव से पहले बुधवार (जून 10, 2020) को अपने विधायकों के साथ-साथ फिलहाल अपने समर्थन में खड़े निर्दलीय विधायकों को भी जयपुर के बाहरी इलाके में सुरक्षित शिफ्ट कर दिया है। राजस्थान सरकार का कहना है कि राज्य में लोकप्रिय निर्वाचित सरकार को अस्थिर करने के लिए साजिशें रची जा रही हैं।
गुजरात, मध्य प्रदेश और कर्नाटक के बाद अब राजस्थान कॉन्ग्रेस राज्यसभा चुनाव से ठीक पहले अपने विधायकों की किलेबंदी में जुट गई है। राज्यसभा चुनाव की तीन सीटों पर चुनाव से पहले राजस्थान में चुनावी गतिविधियाँ तेज होने लगी हैं।
रिपोर्ट्स के अनुसार, इस पर मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने कहा कि कॉन्ग्रेस पार्टी के विधायक एकजुट हैं और वे किसी तरह के लोभ व लालच में नहीं आएँगे। साथ ही, उन्होंने भाजपा पर आरोप लगाया कि कुछ कॉन्ग्रेस विधायकों को 25 करोड़ रुपए तक की पेशकश की गई है और कहा कि भाजपा की कोशिश को कॉन्ग्रेस सफल नहीं होने देगी।
19 जून को होने हैं राज्यसभा चुनाव
विधायकों को 18 जून तक रिजॉर्ट में रखा जाएगा। 19 जून को राज्यसभा चुनाव होने हैं। इस सिलसिले में कॉन्ग्रेस के केंद्रीय नेता, जिनमें पार्टी के मुख्य प्रवक्ता रणदीप सिंह सुरजेवाला भी शामिल हैं, जयपुर पहुँच रहे हैं।
दरअसल, इस नए राजनैतिक संकट को देखते हुए पार्टी नेतृत्व ने रणदीप सुरजेवाला और महासचिव के सी वेणुगोपाल को जयपुर रवाना किया गया है ताकि वे राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के साथ विधायकों को एकजुट रखने में मदद कर सकें।
वर्तमान में कॉन्ग्रेस के सामने राज्य में दोहरी चुनौती है, जहाँ एक तरफ गुजरात से आए 19 कॉन्ग्रेसी विधायकों को एकजुट रखना है तो दूसरी ओर राज्य के कॉन्ग्रेसी विधयकों को भी टूटने से बचाने की चुनौती पार्टी के सामने है।
राजस्थान में इस समय 200 सदस्यों की विधानसभा में, कॉन्ग्रेस के पास 107 विधायक हैं, जिनमें 6 ऐसे विधायक भी हैं, जिन्होंने 2019 में बसपा से निकलकर कॉन्ग्रेस से नाता जोड़ लिया था। कॉन्ग्रेस को 13 निर्दलीय विधायकों का भी समर्थन प्राप्त है।
कॉन्ग्रेस ने आरोप लगाया है कि भाजपा ने मध्य प्रदेश, गुजरात और कर्नाटक की तरह ही अब राजस्थान में भी सरकार को अस्थिर करने का प्रयास कर रही है।
दिल्ली राजमार्ग पर एक होटल में कॉन्ग्रेस और उसके समर्थक विधायकों की देर रात तक चली बैठक के बाद गहलोत ने संवाददाताओं से कहा कि मीटिंग बहुत फलदायी रही और सब एकजुट होकर यहाँ से गए हैं। कल फिर बैठक होगी जिसमें पार्टी के राजस्थान प्रभारी अविनाश पांडे भी मौजूद रहेंगे।
राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने कहा – “आप सबको मालूम है कि जिस प्रकार से कभी कर्नाटक, कभी मध्य प्रदेश, कभी महाराष्ट्र, राजस्थान में चर्चा चलती रहती है। लॉकडाउन में सभी अपने जिलों के अंदर, क्षेत्रों में रहे थे, तो अच्छा हुआ हम सब लोग आपस में मिल लिए। ये प्रोग्राम बना, हम सब आज बैठे, बातचीत की। हमारे पर्यवेक्षक सुरजेवाला भी साथ बैठे थे। अच्छी बातचीत हुई। सबने अपनी भावना व्यक्त की। अच्छी मीटिंग हुई।”
इसके साथ ही अशोक गहलोत ने कहा – “देखिए गुजरात के अंदर, महात्मा गाँधी के गुजरात में क्या हो रहा है। वहाँ पर घर-घर में शराब मिलती है। इसी प्रकार से तोड़फोड़ गुजरात के अंदर, पिछली बार 2017 में 14 विधायक टूट गए, अभी 3 टूट गए और 4 पहले टूट गए थे। हॉर्स ट्रेडिंग करके कब तक राजनीति करोगे, बहुत खतरनाक खेल चल रहा है देश के अंदर।”
कोरोना वायरस की महामारी के दौरान वामपंथी मीडिया गिरोहों की कट्टरपंथी इस्लामिक विचारधारा के समर्थक ‘फैक्ट चेकर्स’ के साथ देखना बेहद दिलचस्प है। यानी, अब ऐसा प्रतीत हो रहा है मानो कोरोना के साथ-साथ एक वैश्विक आपदा अब ब्रिटिश औपनिवेशिक काल की विष्ठा, यानी BBC और ऑल्टन्यूज़ के सामने भी खड़ी है। यही वजह है कि अब दोनों ही समूह एक-दूसरे को आपस में ‘धप्पा’ मारकर अपने ज़िंदा होने का एहसास दिलाते देखे जा रहे हैं।
‘द ग्रेट ब्रिटेन’ के मुखपत्र BBC ने सिलसिलेवार फर्जी और भ्रामक खबरों के जरिए दक्षिणपंथी सरकारों के विरोध में अभियान चलाने के लिए अब भारत की सरकारी प्रेस इनफ़ॉर्मेशन ब्यूरो (PIB) को ही निशाने पर लिया है। इस काम के लिए दंगाइयों को ‘अमनपसंद’ बताने वाला बीबीसी अब अपने ‘गोदी मित्र ऑल्टन्यूज़’ की शरण में है।
दरअसल, सोशल मीडिया पर कोरोना वायरस के बीच जारी लॉकडाउन के दौरान कई प्रकार की भ्रामक और फर्जी खबरों को सोशल मीडिया पर फैलाया जाता रहा और वामपंथी मीडिया गिरोहों से लेकर मजहबी ‘फैक्ट चेकर्स’ तक ने सरकारी संस्थानों, जिनमें भारतीय रेलवे से लेकर पुलिस आदि को झूठ साबित करने के लिए अनेक प्रयास किए।
इस बीच सोशल मीडिया पर ‘PIB फैक्ट चेक’ एकाउंट ने ट्विटर पर निरंतर ऐसी खबरों का खंडन किया, जिसने आख़िरकार बीबीसी जैसी संस्थाओं को हृदयाघात देने का काम किया है। बीबीसी का दर्द उसकी नई रिपोर्ट में नजर आता है।
आज ही बीबीसी पर प्रकाशित रिपोर्ट की हेडलाइन कुछ इस तरह है – “पीआईबी का फ़ैक्ट चेक या पत्रकारों पर दबाव बनाने की क़वायद?”
BBC की शिकायती हेडलाइन
बीबीसी की इस दर्दभरी हेडलाइन के भीतर जाने पर पता चलता है कि यह लेख सिर्फ और सिर्फ फेक न्यूज़ और भ्रामक तथ्य फैलाने की स्वीकृति माँगने के अलावा और ज्यादा कुछ नहीं कहती है। दिलचस्प बात यह है कि भ्रामक खबर फैलाने की ‘परमिशन’ और आजादी माँगती बीबीसी की यह रिपोर्ट जिन लोगों का हवाला देती है, उसमें कुछ ऐसे फैक्ट चेकर्स के नाम शामिल हैं जो लगभग हर रोज ही ऑपइंडिया के फैक्ट चेक में झूठे और फर्जी साबित किए जाते रहे हैं।
इसमें बीबीसी ने उस ‘ऑल्टन्यूज़’ का भी हवाला दिया है, जिसने अरबीना खातून की मौत के लिए भारतीय रेलवे को जिम्मेदार ठहराने के लिए 7 दिन लगाए और आखिर में निष्कर्ष यही निकला कि वो इतनी माथापच्ची के बावजूद भारतीय रेलवे को इसके लिए जिम्मेदार नहीं ठहरा पाए। लेकिन ऑल्टन्यूज़ के ऐसे कारनामों की एक बड़ी लिस्ट है, जिसमें हाल ही में गर्भवती हथिनी की मौत की हर रोज अपडेट होने वाली ‘डेवलपिंग स्टोरी’ भी एक है।
बीबीसी ने ऑल्टन्यूज़ के फर्जी फैक्ट चेक के जरिए PIB के फैक्ट चेक को फर्जी साबित करने का असफल प्रयास किया है
बीबीसी शायद यह तथ्य नहीं जानना चाहेगा कि उनका गोदी फैक्ट चेकर ऑल्टन्यूज़ इस स्टोरी को सिर्फ इसलिए पाँच दिन में पाँच सौ बार (इसकी पुष्टि ऑल्टन्यूज़ पर छोड़ी जाती है) अपडेट करता रहा क्योंकि इस मामले में हथिनी की मौत के जिम्मेदारों के नाम रोजाना बदलते रहे और ऑल्टन्यूज़ उन नामों में मजहब ढूँढकर उन्हें छुपाता रहा।
क्या बीबीसी में सच सुनने की क्षमता है?
बीबीसी ने इसी रिपोर्ट में दावा किया है कि उनके संवाददाताओं को स्वास्थ्य मंत्रालय जानकारी नहीं देता है और उन्हें खुद अस्पतालों के चक्कर काटने होते हैं। साथ ही, यह भी दावा किया गया है कि स्वास्थ्य मंत्रालय की प्रेस ब्रीफ़िंग का समय निश्चित नहीं है।
ऐसा नहीं है कि बीबीसी सच को ढूँढना नहीं चाहता, लेकिन सच के सामने आने पर क्या बीबीसी इसे सामने रखने की क्षमता रखता भी है यह सबसे बड़ा सवाल होना चाहिए।
सरकार और संस्थाओं की क्रियाविधि को संदेहास्पद बताने वाला यह बीबीसी उसी संगठन का हिस्सा है, जिसके खिलाफ सोशल मीडिया पर लोगों का आक्रोश ‘डिफाइंड बीबीसी’ की शक्ल में देखा जा सकता है। विदेशों में अश्वेतों द्वारा चलाए जा रहे दंगों को ‘शान्तिपूर्ण’ बताने वाला यह बीबीसी सत्य से कितना वास्ता रखता है वो उनकी इन्हीं सम्पादकीय नीतियों से स्पष्ट हो जाता है।
वास्तव में, जिस ‘शांतिपूर्ण’ तरीके से बीबीसी तथ्यों को ‘ट्विस्ट’ कर पूरी बेशर्मी के साथ पेश करता है, शांतिपूर्ण होने का यदि कोई मानक होता है तो उसमें बीबीसी के प्रोपेगेंडा को सबसे ज्यादा शांतिपूर्ण घोषित कर दिया जाना चाहिए।
बीबीसी की ‘वैश्विक फजीहत’ पर एक नजर, जिसका फैक्ट चेक गोदी फैक्ट चेकर्स नहीं करेंगे
बीबीसी विदेशों में हो रहे दंगों में दंगाइयों को ‘विशेष कारण से’ बचाने के लिए पहले उनकी आधी तस्वीर शेयर करता है। जब बीबीसी की इस हरकात का विरोध होता है तो बीबीसी चुपके से इस तस्वीर को अपनी रिपोर्ट में माफ़ी माँगते’ हुए बदल देता है। इसे इन तस्वीरों के माध्यम से समझा जा सकता है –
जिस तस्वीर को बीबीसी ने क्रॉप कर के इस्तेमाल किया था
बीबीसी के शांतिपूर्ण दंगाइयों की पूरी तस्वीर
बीबीसी इन दंगों को ‘शांतिपूर्ण’ साबित करने के लिए आधी तस्वीरें इस्तेमाल करता है
बीबीसी की करामात सामने आने पर बीबीसी ने माफ़ी माँगते हुए इसे बदल दिया –
बीबीसी तथ्यों पर कितना यकीन करता है, उसका हाल बयाँ करती तस्वीरें
BBC मानता है कि ये दंगाई Peaceful, यानी ‘शांतिपूर्ण’ और अमनपसंद हैं
PIB के फैक्ट चेक को संदेहास्पद बताने वाली बीबीसी की इस रिपोर्ट का सबसे हास्यास्पद हिस्सा इसके ठीक बीच में है, जहाँ पर बीबीसी ने लिखा है –
“फ़ैक्ट चेक पोर्टल ‘ऑल्ट न्यूज़’ के संस्थापकों में से एक प्रतीक सिन्हा पीआईबी द्वारा मेहनत से लिखी गयी ख़बरों को लगातार ख़ारिज करने का ‘फ़ैक्ट चेक’ कर रहे हैं।”
यदि सोशल मीडिया पर लोगों की छानबीन करते रहना, लोगों की निजी जानकारी सार्वजानिक करना ‘बड़ी मेहनत’ कहलाता है तो बीबीसी ‘रिवर्स इमेज फैक्ट चेकर’ यानी, ऑल्टन्यूज़ के बारे में कुछ भी गलत नहीं कह रहा है। इसके अलावा ऑल्टन्यूज़ फेक न्यूज़ और फर्जी प्रोपेगेंडा को दिशा देने के जिस मेहनती काम को कर रहा है, उसके बारे में ऑपइंडिया के ‘फैक्ट चेक’ सेक्शन में काफी विस्तृत वर्णन उपलब्ध है।
यहाँ पर बीबीसी ने भी ऑल्टन्यूज़ की उसी फर्जी कहानी का जिक्र किया है, जिसमें लाख कोशिशों के बावजूद भी ऑल्टन्यूज़ मुज़फ़्फ़रपुर स्टेशन पर महिला की मौत के बारे में सिर्फ और सिर्फ प्रपंच करते हुए नग्न अवस्था में ही नजर आया है। ख़ास बात यह है कि ऑल्टन्यूज़ ने मुजफ्फरपुर की इस घटना के लिए बीबीसी के रिपोर्टर्स की ही मदद ली थी। और जब वहाँ से इस्लामिक विचारधारा के समर्थक ऑल्टन्यूज़ को ‘मनमुताबिक’ बयान नहीं मिला तो उसने अपने आधार पर ही न्याय सुनाते हुए साबित करने का प्रयास किया कि महिला की मौत भारतीय रेलवे की ही कथित लापरवाही से ही हुई।
हालाँकि, रेलवे ने इस से सम्बंधित तमाम सुबूत भी सामने रखे थे और इस बारे में यही निष्कर्ष सामने आया था कि श्रमिक ट्रेन पर बैठी अरबीना खातून की मौत उनके मुज़फ़्फ़रपुर (बिहार) पहुँचने से कुछ घंटे पहले हो गई। इस समय उनके साथ में उनकी बहन कोहिनूर और बहनोई वजीर थे।
वजीर ने मौत के वक्त जो बयान दिया और पुलिस के पास दर्ज बयान, वो यह था कि अपने पति द्वारा त्याग दिए जाने के बाद अरबीना की मानसिक हालत अच्छी नहीं थी, और वो बीमार भी थी। ट्रेन पर उनकी स्थिति बिगड़ गई और रास्ते में वो अल्लाह को प्यारी हो गईं।
यहीं से ऑल्टन्यूज़ का काम शुरू हुआ था क्योंकि इस घटना में ऑल्टन्यूज़ के पास ‘पीड़ित’ मुस्लिम तो थी ही, साथ-साथ भारतीय रेलवे की छवि को धूमिल करने का भी ‘अवसर’ था, जिसके बारे में ऑपइंडिया विस्तार से बता चुका है।
यहाँ पर ही PIB ने भी सरकारी सूत्रों के हवाले इस फर्जी खबर का फैक्टचेक कर के बताया कि भोजन-पानी से वंचित होने और भूख से मरने की बातें झूठी हैं। वजीर ने स्वयं ही बयान दिया था (जिसका ज़िक्र ऑल्टन्यूज ने भी किया है) कि ट्रेन पर खाना-पानी की समस्या नहीं थी। ये सब जब हो गया, तो प्रपंची प्रतीक सिन्हा से रहा नहीं गया क्योंकि इसमें ‘हिन्दू-मुस्लिम’ का स्कोप दिखा।
फिर पूरी योजना के तहत, नासा आदि के सॉफ्टवेयर के इस्तेमाल कर के पत्थर को वॉलेट बताने वाले प्रतीक सिन्हा ने, इस फैक्टचेक का फैक्टचेक करने का दावा किया और आखिर में जब निराशा हाथ लगी तो अपने बड़े भाई बीबीसी की शरण में पहुँच गया, जिसका नतीजा बीबीसी की PIB को निशाना बनाती यह रिपोर्ट है।
बीबीसी ने अपनी इस रिपोर्ट में ऑल्टन्यूज़ के हवाले से अनेकों बार फैक्ट चेक के ‘अंतरराष्ट्रीय मानदंड’ का इस्तेमाल किया है। लेकिन कहीं भी यह जिक्र नहीं किया है कि ऑल्टन्यूज़ सिर्फ इस कारण किसी खबर को पाँच दिन में पाँच सौ बार अपडेट करता है क्योंकि उस अपराध में अपराधी एक मुस्लिम निकल आता है। ना ही इस बात का जिक्र मिलता है कि क्या लोगों की निजी जानकारी सार्वजानिक करने का जिम्मा भी ‘अंतरराष्ट्रीय मानदंड’ ही ऑल्टन्यूज़ के संस्कारविहीन हिन्दूफ़ोबिया से ग्रसित संस्थापकों को देते हैं? खैर, ऑल्टन्यूज़ के फर्जी फैक्ट चेक्स का इतिहास इस सबसे अलग है।
बीबीसी की इस रिपोर्ट की आखिरी में शेष गरिमा भी तब ध्वस्त हो जाती है, जब इसमें द वायर की प्रोपेगेंडा पत्रकार रोहिणी सिंह का भी जिक्र नजर आता है। ये वही रोहिणी सिंह हैं, जो यूँ तो हमेशा से सोशल मीडिया पर पत्रकारिता के नाम पर सरकार विरोधी प्रपंचों में शामिल नजर आती हैं लेकिन कोरोना वायरस के दौरान मानों इनकी जिम्मेदारी बढ़ गई और इन्होने फेक खबरों का स्ट्राइक रेट बढ़ा दिया। इसके अलाव पत्रकारिता में रोहिणी सिंह का योगदान इतिहास है।
बीबीसी के लिए सबसे बेहतर यही होगा कि वो पहले से ही गिरी हुई गरिमा को ऑल्टन्यूज़ जैसे निम्नस्तरीय प्रपंचकारियों की शरण में जाकर और नीचे गिराने के बजाए पहले शांतिपूर्ण प्रदर्शनों की परिभाषा तय करे और दंगाई मानसिकता को शांति का नाम देकर ‘शांतिप्रियों’ के खिलाफ़ छुपा हुआ एजेंडा ना चलाए। साथ ही, यह भी फैक्ट चेकर्स समुदाय पर एक एहसान ही माना जाएगा, यदि बीबीसी ब्रिटेन में मुस्लिमों द्वारा की जा रही हिंसा के वीडियो बिना काटे प्रकाशित करने का साहस जुटा सके।
भारत में फैक्ट चेक के लिए PIB पहले से ही मौजूद है, जिसके पास सरकारी तथ्य ‘यहाँ-वहाँ’ से और ‘रिवर्स इमेज सर्च’ के माध्यम से तथ्य जुटाने वाले फैक्ट चेकर से कहीं ज्यादा विश्वसनीय तथ्य पहले से ही मौजूद हैं।
मध्य प्रदेश के रतलाम के नयापुरा क्षेत्र में झाड़ फूँक और पानी देकर इलाज करने वाले असलम की मौत कोरोना से होने के बाद प्रशासन में हड़कंप मच गया है। जब प्रशासन ने असलम के संपर्क में आए लोगों की लिस्ट निकाली तो वो काफी लंबी-चौड़ी निकली। इसके बाद उन लोगों का सैंपल लिया गया, जिसमें से 19 लोग कोरोना पॉजिटिव पाए गए हैं।
जानकारी के मुताबिक असलम के संपर्क में आने वाले लोगों के कोरोना पॉजिटिव आने का मामला लगातार बढ़ता जा रहा है। लोगों के लगातार संक्रमित पाए जाने के बाद प्रशासन ने कड़ा रुख अपनाया और प्रशासनिक अमले के निर्देश पर शहर एसडीएम लक्ष्मी गामड़ की मौजूदगी में शहर में अलग-अलग बैठकर झाड़ फूँक और पानी से उपचार करने का दावा करने वाले 29 लोगों को एहतियात के तौर पर क्वारंटाइन सेंटर भेजा है। जिसमें बीमारी के लक्षण नजर आएँगे उनका कोरोना टेस्ट कराया जाएगा। इसकी रिपोर्ट आने के बाद भी इन लोगों को छोड़ा जाएगा।
बता दें कि असलम के पास लोग कोरोना का इलाज कराने आते थे और वह लोगों का हाथ चूमकर कोरोना को भगा रहा था। रतलाम में मंगलवार (जून 9, 2020) को मिले 24 कोरोना पॉजिटिव में से 13 लोग नयापुरा के झाड़-फूँक करने वाले असलम के संपर्क में आने वाले हैं। असलम की 4 जून को कोराेना से मौत हो गई थी। उसके संपर्क में आने वालों के सैंपल लिए थे। इससे पहले 7 जून को नयापुर से 6 कोरोना पॉजिटिव मिले थे। ये भी असलम के संपर्क में आए थे। यानी कि अब तक जिले के कुल 85 मरीजों में से 19 तो असलम के कारण ही संक्रमित पाए गए।
मंगलवार को 200 लोगोंं की रिपोर्ट सामने आई, जिसमें से 24 पॉजिटिव व 176 निगेटिव निकले। नोडल अधिकारी डॉ प्रमोद प्रजापति ने बताया कि संक्रमण का पता चल सका, ये बड़ी बात है। सभी संक्रमितों की कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग की जाएगी। एक भी संक्रमित हुआ तो कई को खतरा हो सकता है। प्रमोद प्रजापति का कहना है कि ऐसे लोगों से इसलिए खतरा है, क्योंकि ये झाड़-फूँक करते हैं और फूँका हुआ पानी आदि लोगों को देते हैं।
हालाँकि, नई दुनिया समेत कई अन्य मीडिया पोर्टल ने एक बार फिर से असलम के आगे ‘बाबा’ लगाकर इसे हिंदू स्पिन देने की कोशिश की। ये पहला मामला नहीं है, जब अखबार ने ऐसा करने की कोशिश की। इससे पहले भी आरोपित ‘मुस्लिमों’ की न केवल पहचान छिपाई गई, बल्कि इस चक्कर में हिंदुओं को बदनाम करने के लिए कई युक्तियाँ प्रयोग में लाई। रेप आरोपित मुस्लिम आलिम असलम फैजी को ‘तांत्रिक’ बताया और साथ ही जादू-टोना करने वाले मौलवी की जगह एक पुजारी का स्केच लगा दिया गया था।
अर्थव्यवस्था को लेकर आ रही लगातार बुरी खबरों के बीच एक बेहद अच्छी खबर सामने आई है। अमेरिकी क्रेडिट रेटिंग एजेंसी फिच रेटिंग्स (Fitch Ratings) ने कहा है कि अगले वित्त वर्ष के दौरान भारतीय अर्थव्यवस्था के जबरदस्त उछाल मारने की उम्मीद है। दुनिया की तीन बड़ी क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों में शुमार फिच रेटिंग्स ने अपनी हालिया रिपोर्ट में कहा है कि भारतीय अर्थव्यवस्था अगले वित्त वर्ष यानी कि 2021-22 में 9.5 फीसदी की दर से बढ़ने की उम्मीद है।
इस साल कोरोना का कहर
फिच रेंटिग्स ने ये बातें बुधवार (जून 10, 2020) को जारी एक रिपोर्ट में कही। फिच रेटिंग्स ने अनुमान जताया है कि मौजूदा वित्त वर्ष यानी 2020-21 में भारतीय अर्थव्यवस्था में 5 फीसदी की कमी दर्ज की जा सकती है। अर्थव्यवस्था में इस बड़ी गिरावट की वजह जाहिर तौर पर कोरोना वायरस का संक्रमण ही है। फिच रेटिंग्स ने बुधवार को APAC सॉवरेन क्रेडिट ओवरव्यू जारी किया है, जिसमें एशिया-पैसिफिक क्षेत्र की अर्थव्यवस्थाओं के बारे में अनुमान दिया गया है।
जीडीपी ग्रोथ वापस पटरी पर लौट जाएगी
रिपोर्ट में बताया गया है कि वैश्विक संकट के बाद भारतीय अर्थव्यवस्था “BBB” श्रेणी के अन्य देशों के मुकाबले ज्यादा बढ़ोतरी दर हासिल करेगी। इसमें कहा गया है कि अगर भारत के वित्तीय क्षेत्र की स्थिति और ज्यादा नीचे नहीं जाती है, तो 2021-22 में भारतीय अर्थव्यवस्था 9.5 फीसदी की दर से बढ़ेगी।
इसमें कहा गया है, “कोविड-19 महामारी ने देश के वृद्धि परिदृश्य को कमजोर किया है। इसकी अन्य प्रमुख वजह सरकार पर भारी कर्ज के चलते कई चुनौतियाँ भी पैदा होना है।”
दुनिया का सबसे बड़ा लॉकडाउन
25 मार्च से भारत में लगे लोग डाउन का जिक्र करते हुए फिच रेटिंग्स ने कहा है कि भारत में दुनिया का सबसे बड़ा लॉकडाउन लोड आया था, जिसके चलते तकरीबन सभी आर्थिक गतिविधियाँ रुक गई थी। इसके बाद लॉकडाउन को लगातार बढ़ाया गया, जो कि 4 मई से कुछ शर्तों के साथ खुलना शुरू हुआ। लेकिन देश में फिलहाल कोरोना वायरस संक्रमितों की संख्या लगातार बढ़ रही है।
सरकार और RBI के उपाय
फिच ने अपनी रिपोर्ट में कोरोना संकट से निपटने के लिए केंद्र सरकार और आरबीआई की तरफ से किए गए उपायों का भी जिक्र किया है। आरबीआई ने नीतिगत दरों में कटौती के जरिए मौद्रिक नीति को आसान बना दिया। इसके अलावा लंबी अवधि के रेपो ऑपरेशन के माध्यम से लिक्विडिटी बढ़ाने का इंतजाम किया।
वहीं केंद्र सरकार ने जीडीपी के 10 फीसदी के बराबर राहत पैकेज (20 लाख करोड़ रुपए) का ऐलान किया। 2019-20 में सरकारी ऋण पहले से ही जीडीपी के 70 प्रतिशत पर था, जो ‘बीबीबी’ रेटिंग वाले देशों के औसतन 42 प्रतिशत से काफी अधिक है। मगर अब भारत के पब्लिक डेब्ट / जीडीपी का अनुपात 2020-21 में जीडीपी के 84 प्रतिशत तक बढ़ने का अनुमान है।
‘द वायर’ की पत्रकार आरफा खनम शेरवानी को एक बार फिर से फर्जी खबर शेयर करते हुए पाया गया। अमरोहा पुलिस ने आरफा खानम शेरवानी द्वारा फैलाए जा रहे झूठ का खुलासा किया और साथ ही उन्होंने पत्रकार के खिलाफ आगे की आवश्यक कार्यवाही के लिए साईबर सेल को अवगत कराया, ताकि वो इस पर उपयुक्त कार्रवाई कर सकें।
बता दें कि आरफा ने एक ट्वीट के हवाले से कहा था कि एक दलित लड़के को इसलिए मार दिया गया, क्योंकि उसने मंदिर में प्रार्थना की थी। साथ ही उन्होंने यह भी लिखा था कि दुनिया में कोई भी समुदाय ऐसा नहीं है, जिसे दलित की तुलना में अधिक सताया और उत्पीड़ित किया जाता हो। यह अत्याचार कब खत्म होगा? उन्होंने यह ट्वीट #DalitLivesMatter हैशटैग के साथ किया था।
Dalit boy killed for praying in a temple. There’s no community in the world that’s more persecuted and oppressed than the Dalit community in India. When will this tyranny end ? #DalitLivesMatterhttps://t.co/GSOEvXtGmm
हालाँकि, आरफा के ट्वीट के एक घंटे के भीतर, अमरोहा पुलिस के आधिकारिक ट्विटर अकाउंट ने जवाब दिया। उन्होंने अफवाहों को बढ़ावा देना अपराध का मकसद बताया। अमरोहा पुलिस स्पष्टीकरण जारी करते हुए इसे दुर्भाग्यपूर्ण बताया और साथ ही उन्होंने जानकारी दी कि यह विवाद 5000 रुपए को लेकर दोनों पक्षों के बीच जमीनी विवाद की लड़ाई थी।
ग्राम डोमखेडा थाना हसनपुर, अमरोहा मे घटना के सम्बन्ध मे पुलिस द्वारा शीघ्र कार्यवाही कर 03 अभियुक्तो को गिरफ्तार कर जेल भेजा गया। दोनो पक्षो के मध्य बाग की बटाई के 5000 रुपये को लेकर विवाद होना विवेचना में पाया गया । पीडित पक्ष की आर्थिक व अन्य साहयता हेतु कार्यवाही की जा रही है।
अमरोहा पुलिस, थाना हसनपुर क्षेत्रान्तर्गत ग्राम डोमखेड़ा में नाबालिग युवक की हत्या करने के सम्बन्ध में सुपरिटेंडेंट ऑफ पुलिस (SP) विपिन ताडा ने कहा कि इस घटना में युवक की जाति और मंदिर में प्रवेश का कोई प्रसंग था ही नहीं। मामले में कार्रवाई करते हुए 3 अभियुक्तों को गिरफ्तार किया गया है। उन्होंने बताया कि पीड़ित पक्ष की आर्थिक व अन्य सहायता हेतु कार्यवाही की जा रही है।
सुपरिटेंडेंट ऑफ पुलिस विपिन ताडा ने बताया, “मृतक के भाई और अभियुक्त पक्ष के बीच आम के बगीचे के ठेकों का और मधुमक्खी पालन की साझेदारी थी, जिसमें कि इनके 5 हज़ार रुपए मृतक के भाई पर शेष थे। इसी बात के तकादे को लेकर मृतक और अभियुक्त पक्ष का झगड़ा हुआ, जिसके बाद अभियुक्त गाँव छोड़कर भाग गया। फिर बदला लेने के उद्देश्य से अचानक गाँव में आया और इस युवक को गोली मारकर फरार हो गया। 3 की गिरफ्तारी हो गई है, इनसे पूछताछ करके बाकियों की गिरफ्तारी भी होगी।”
हालाँकि, पुलिस द्वारा स्पष्टीकरण जारी करने से पहले काफी लोगों ने इस फर्जी खबर को काफी लोगों ने शेयर किया था, जिसमें मेनस्ट्रीम मीडिया के हिंदुस्तान टाइम्स, टेलीग्राफ, इंडिया टुडे आदि शामिल थे।
भारतीय सेना के सेवानिवृत्त अधिकारियों ने कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी सहित देश के विपक्षी दलों को राष्ट्रीय सुरक्षा और संप्रभुता जैसे संवेदनशील मुद्दों पर गैर-जिम्मेदाराना बयान देने के मामले पर आड़े हाथों लिया। उन्होंने राहुल गाँधी के हालिया बयान को राष्ट्रहित के ख़िलाफ़ बताया।
उन्होंने कहा कि चीन के साथ सीमा विवाद पर कॉन्ग्रेस नेता के ट्वीट और बयान उनकी अज्ञानता दर्शाते हैं या फिर पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के जमाने में हुई ऐतिहासिक भूलों को नजरअंदाज करने की सोची-समझी रणनीति का हिस्सा हैं।
भारतीय सेना के लेफ्टिनेंट जनरल नितिन कोहली, लेफ्टिनेंट जनरल आरएन सिंह और मेजर जनरल एम श्रीवास्तव समेत 9 पूर्व आर्मी अफसरों ने यह बयान जारी किया।
इस बयान में कहा गया, “हम सीनियर आर्म्ड फोर्सेज वेटरंस के समूह के तौर पर गलत सोच से प्रभावित और गलत वक्त में दिए गए राहुल गाँधी के बयानों और उनके ट्वीट्स की कड़ी निंदा करते हैं जिनके जरिए राहुल ने भारत-चीन सीमा विवाद से निपटने को लेकर हमारी सेना और सरकार पर सवाल उठाए हैं।”
बयान में पूछा गया कि क्या राहुल गाँधी नहीं जानते हैं कि नेहरू ने तिब्बत को प्लेट में सजाकर चीन को सौंप दिया था और चीन ने अक्साई चीन में सड़कें बना लीं, बाद में इस पर उस समय कब्जा कर लिया जब नेहरू प्रधानमंत्री थे?
अपने इस बयान में सेवानिवृत्त आर्मी अफसरों ने सीमाई इलाकों में आधारभूत सैन्य ढाँचे के अभाव के लिए कॉन्ग्रेस को जिम्मेदार बताया। बयान में कहा गया कि भारत पर सबसे लंबे समय जिस पार्टी ने शासन किया, वही बॉर्डर इन्फ्रास्ट्रक्टर डेवलपमेंट को नजरअंदाज करने की सीधा-सीधा दोषी है।
इसमें विपक्षी दल कॉन्ग्रेस से राष्ट्रीय सुरक्षा और संप्रभुता के मुद्दों पर संवेदनशीलता और सहयोग की भावना दिखाने की अपील की गई। पूर्व अधिकारियों ने कहा कि विपक्ष को चीन के साथ सीमा विवाद का हल निकालने के लिए केवल सरकार के साथ खड़ा होना चाहिए। इसके अलावा किसी भी प्रकार का प्रयास माफी योग्य नहीं होगा।
पूर्व सैन्य अधिकारियों ने की सरकार की तारीफ
अपने बयान में पूर्व रिटायर्ड आर्मी अफसरों के इस समूह ने इस बात के लिए सरकार की सराहना भी की। उन्होंने कहा कि सरकार बॉर्डर इलाकों में तेजी से इन्फ्रास्ट्रक्चर तैयार करने को प्रतिबद्ध दिख रही है जो 1962 के चीन युद्ध के बाद से नहीं हुआ जबकि उस समय युद्ध के बाद भारत को अपनी ताकत बढ़ाने की आवश्कता थी।
उन्होंने कहा कि भारत सरकार बहुत चतुर कूटनीतिक पहल का सहारा ले रही है, साथ ही सीमा की सुरक्षा में लगे हमारे सशस्त्र बलों का भी मनोबल बढ़ा रही है।
पूर्व सैन्य अधिकारियों ने अपने बयान में कहा कि वे राहुल गाँधी के गलत समय पर गलत बयान वाले ट्वीट्स की कड़ी निंदा करते हैं जिनमें भारत चीन सीमा विवाद सुलझाने के बारे में सरकार एवं सेना पर सवाल उठाए गए हैं।
उन्होंने कहा, राहुल गाँधी के ऐसे बयान भारत के राष्ट्रीय हितों के लिए बेहद घातक हैं। पहले भी राहुल गाँधी एवं कॉन्ग्रेस नेताओं ने पाकिस्तान के कब्ज़े वाले कश्मीर में सेना एवं वायुसेना की कार्रवाइयों पर सवाल उठाए हैं।
पूर्व सैन्य अधिकारियों ने कहा कि भारतीय सशस्त्र सेनाओं की बहादुरी एवं ताकत को पूरी दुनिया स्वीकार करती है। सेनाओं को राष्ट्रीय हितों को छोड़कर केवल राजनीतिक हितों में अंधे राजनेताओं एवं राजनीतिक दलों के प्रमाणपत्र की जरूरत नहीं है।
राहुल गाँधी ने क्या कहा?
गौरतलब है कि अभी हाल में राहुल गाँधी ने चीन विवाद को लेकर प्रोपगेंडा वेबसाइट द वायर का एक लेख अपने ट्विटर पर शेयर किया था। अपने ट्वीट में उन्होंने कहा था कि चीन अंदर तक चली आई और लद्दाख में हमारा क्षेत्र हड़प लिया। इस बीच, पीएम मोदी बिलकुल शांत हैं और पूरी तरह गायब हैं।
अपने ट्वीट के जरिए उन्होंने भारत-चीन विवाद को लेकर मोदी सरकार पर निशाना साधा था। इससे पहले राहुल ने रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की ओर इशारा करते हुए एक ट्वीट किया था कि अगर हाथ के निशान पर टिप्पणी करनी समाप्त हो गई हो, तो क्या वह ये बताएँगे कि क्या चीन ने भारत के लद्दाख के एक क्षेत्र पर कब्जा कर लिया है?
बता दें, इससे पहले राहुल गाँधी ने अमित शाह के बयान पर भी टिप्पणी की थी। जिसमें गृह मंत्री अमित शाह ने कहा था कि भारत अपनी सीमा की रक्षा करने में काफी सशक्त है। जिसपर राहुल गाँधी ने मिर्जा गालिब का शायरी का इस्तेमाल करते हुए सवाल उठाए थे कि सबको मालूम है भारतीय सीमाओं की हकीकत? राहुल गाँधी ने लिखा था, “सबको मालूम है ‘सीमा’ की हकीकत लेकिन, दिल के खुश रखने को ‘शाह-यद’ ये ख्याल अच्छा है।”
पूर्वी लद्दाख में कई जगह हुई डिसइंगेजमेंट
उल्लेखनीय है कि समय के साथ और प्रयासों के मद्देनजर भारत और चीन के बीच सीमा पर तनाव कम होने की उम्मीद जताई जा रही है। खबर है कि दोनों देशों की सेनाओं ने ‘डिसइंगेजमेंट’ शुरू कर दिया है। कहा जा रहा है कि लद्दाख में तीन (03) जगह ऐसी हैं जहाँ पर दोनों देशों के सैनिक 2.5 से 3 किलोमीटर पीछे हट गए हैं। हॉट-स्प्रिंग के करीब गोगरा में पॉइंट-14, 15 और 17 में दोनों देशों के सैनिक कम से कम 2.5 से 3 किलोमीटर पीछे हट गए हैं यानि ‘डिसइंगेज’ हो रहे हैं।
इसके अलावा गोगरा में भी मई महीने की शुरूआत से दोनों देशों के बीच में तनाव चल रहा था और सैनिकों के बीच आमने-सामने की स्थिति बनी हुई थी। लेकिन अब खबर है कि यहाँ स्थिति सुधर रही है। हालाँकि, गोगरा के कुछ और ऐसे पाइंट हैं जहाँ अभी भी तनाव बरकार है।
इसके अलावा रिपोर्ट्स बताती हैं कि पीपुल लिबरेशन आर्मी ने गैलवान इलाके में भी अपने वाहन और सैनिक पीछे बुला लिए हैं। जिसके जवाब में भारत सैनिक भी पीछे आ गए हैं।