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‘हमारे बुद्धिजीवी सड़कों पर निकलते हैं देश जलाने के लिए, ये मानवता तभी फूटती है, जब कोई जिहादी एजेंडा हो’

कश्मीर में इस्लामिक आतंकियों द्वारा सरपंच अजय पंडिता की निर्मम हत्या पर आक्रोश व्यक्त करते हुए बॉलीवुड एक्ट्रेस कंगना रनौत (Kangna Ranaut) ने बॉलीवुड सेलेब्रिटीज़ और तथाकथित बुद्धिजीवियों को जमकर लताड़ लगाई है।

कंगना रनौत (Kangna Ranaut) ने एक वीडियो में कहा है कि तमाम मुद्दों पर बोलने वाले ऐसे मौक़ों पर चुप रह जाते हैं। साथ ही, उन्होंने पीएम नरेंद्र मोदी से कश्मीरी पंडितों को दोबारा कश्मीर घाटी में भेजने की भी अपील की है।

ट्विटर पर ‘टीम कंगना’ ने एक वीडियो पोस्ट किया है, जिसमें वो अजय पंडिता की हत्या पर अपना गुस्सा प्रकट करते हुए देखी जा सकतीं हैं। वीडियो की शुरुआत में कंगना अपने हाथों में एक प्लाकार्ड पकड़े हुए नज़र आती हैं, जिस पर लिखा है-

“I Am Hindustan. I Am Ashamed. #Justice For Ajay Pandit. Murdered In Anantnag Jammu And Kashmir.”

(हिंदी – मैं हिन्दुस्तान हूँ, मैं शर्मिन्दा हूँ। अजय पंडित के लिए न्याय। अनंतनाग, जम्मू-कश्मीर में हत्या।)

कंगना रानौत इस वीडियो में कहती हैं- “हम अक्सर देखते आए हैं, जो हमारी फ़िल्म इंडस्ट्री के होनहार कलाकार हैं या ख़ुद को बुद्धिजीवी कहते हैं, अक्सर इस तरह के कार्ड और हाथों में मोमबत्तियाँ ले कर प्रचार करते आए हैं। हाथों में पत्थर पेट्रोल बम लेकर सड़कों पर निकल जाते हैं देश को जलाने के लिए या किसी मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय बनाने के लिए। मगर उनकी यह मानवता तभी फूटती है, जब इसके पीछे कोई जिहादी एजेंडा हो। मगर किसी और को इंसाफ़ दिलाना हो तो इनके मुँह से चूँ तक नहीं होती। जिस तरह भेड़िया भेड़ की खाल में छिपा होता है, जिहादी एजेंडा वाले लोग, सेक्युलरिज़्म की खाल में छिपे रहते हैं।”

“…हिन्दुओं को ये लोग सेक्युलरिज्म सिखाते हैं। रोवर्स साइकोलोजी की भी हद होती है। जो धर्म ना कि सिर्फ मानव और हर धर्म से प्रेम करना सिखाता है, ग्रह, नक्षत्र, ब्रह्माण्ड की पूजा करना सिखाता है, उसे सेक्युलरिज्म सिखाते हैं। “

वीडियो में कंगना रानौत अजय पंडिता की हत्या का मुद्दा उठाते हुए कश्मीर में इस्लाम के इतिहास का भी ज़िक्र करती हैं। कंगना आगे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से गुज़ारिश करते हुए कहती हैं कि कश्मीरी पंडितों को कश्मीर वापस भेजा जाए। उन्हें उनकी ज़मीन वापस दी जाए और हिंदुइज़्म की फिर से स्थापना की जाए। अजय पंडिता जी का बलिदान व्यर्थ नहीं जाना चाहिए।

अजय पंडिता की हत्या

गौरतलब है कि कंगना अक्सर सामाजिक मुद्दों के प्रति मुखर रहती देखी जाती हैं और देश के स्वघोषित बुद्धिजीवी वर्ग के ‘सेलेक्टिव आउटरेज’ पर भी हमला कर उन्हें एक्सपोज करती नजर आती हैं।

उल्लेखनीय है कि हाल ही में हथियारबंद आतंकियों ने दक्षिण कश्मीर के लार्कीपोरा के लुकभावन गाँव के सरपंच अजय पंडित की सोमवार (जून 08, 2020) की शाम 6 बजे गोली मार कर हत्या कर दी। सरपंच अजय पंडित की हत्या उनके घर के बिल्कुल पास की गई और उन्हें गोली मारकर आतंकी फरार हो गए। गोली लगने के बाद उन्हें घायल अवस्था में ही अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहाँ उन्होंने दम तोड़ दिया।

फैक्ट चेक: क्या मंदिर में पूजा करने के कारण मारी अमरोहा में ‘सवर्णों’ ने ‘दलित’ को गोली? मीडिया गिरोह ने फैलाया झूठ

उत्तर प्रदेश के अमरोहा जिला स्थित हसनपुर कोतवाली क्षेत्र के गाँव डोमखेड़ा में गत 6 जून की रात 4 युवकों ने आपसी रंजिश के चलते घर में घुस कर एक युवक की गोली मारकर हत्या कर दी। मीडिया के कई प्रमुख स्रोतों ने इस खबर को स्पष्ट तौर पर यह साबित करने का प्रयास किया है कि अमरोहा में एक दलित को मंदिर में जाने के कारण गोली से मार दिया गया।

मीडिया द्वारा प्रकाशित की गईं भ्रामक और झूठी हेडलाइन

वामपंथी ‘प्रोपेगेंडा प्रमुख’ – द टेलीग्राफ़ क्विंट, वायर, लल्लनटॉप, टेलीग्राफ जैसे मीडिया गिरोह की हैडलाइन एवं अरफ़ा खानम एवं ऑल्टन्यूज़ के मोहम्मद ज़ुबैर ने भी इस फेक न्यूज़ को फ़ैलाने में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया था।

‘दलित-मंदिर’ के मामलों में हिटलर का लिंग नापने वाली वेबसाईट ‘द लल्लनटॉप’ पीछे नहीं रहती –

‘द वायर’ की एक और उपलब्धि –

सत्रह वर्षीय मृतक विकास जाटव नाम के इस युवक के परिजनों ने गाँव के ही दूसरी बिरादरी के 4 लोगों पर हत्या करने का आरोप लगाया। मृतक विकास के परिजनों ने आरोप लगाया था कि इस घटना के सात दिन पहले ही मंदिर में पूजा करने को लेकर एक विवाद हुआ जिसके चलते इस वारदात को अंजाम दिया गया। जबकि पुलिस ने जाँच के बाद जाति और मंदिर के कारण गोली मारने जैसे सभी आरोपों से अलग पाया है।

मीडिया द्वारा प्रकाशित इस खबर में दावा किया गया कि मृतक विकास के पिता ओम प्रकाश जाटव का कहना है कि 31 मार्च को कुछ लड़कों ने उनके बेटे को मंदिर में प्रवेश करने से रोका था। इन रिपोर्ट्स में यह भी कहा गया था कि इसके पहले इस तरह का भेदभाव कभी भी नहीं हुआ था और यह बात खुद विकास के पिता ने मीडिया से कथित तौर पर कही थी।

इन रिपोर्ट्स में कहा गया कि मृतक के पिता ओमप्रकाश जाटव ने आरोप लगाया था कि उनके बेटे को पीटा भी गया और जाति को लेकर अपशब्द भी कहे थे। उन्होंने कहा कि जब उनका बेटा सो रहा था, उसी वक्त उसे दो लोगों ने गोली मार दी और परिवार को धमकी देकर भाग गए।

क्या मृतक युवक की जाति के कारण हुई हत्या?

लेकिन इस घटना पर अमरोहा पुलिस ने खुद छानबीन के बाद एक वीडियो जारी कर स्पष्ट करते हुए कहा कि इस घटना में युवक की जाति और मंदिर में प्रवेश का कोई प्रसंग था ही नहीं। इस वीडियो में अमरोहा पुलिस, थाना हसनपुर क्षेत्रान्तर्गत ग्राम डोमखेड़ा में नाबालिग युवक की हत्या करने के सम्बन्ध में सुपरिटेंडेंट ऑफ पुलिस (SP) विपिन ताडा ने कहा –

“मामला दर्ज कर के जाँच शुरू कर दी है। दो की गिरफ्तारी भी हो गई है। इनका ये कहना है कि जो मृतक है उनके भाई के साथ में इनके आम के बगीचे के ठेकों का और मधुमक्खी पालन की साझेदारी थी, जिसमें कि इनके 5 हज़ार रुपए मृतक के भाई पर शेष थे। इसी बात के तकादे को लेकर मृतक और अभियुक्त पक्ष का झगड़ा हुआ, जिसके बाद अभियुक्त गाँव छोड़कर भाग गया। फिर बदला लेने के उद्देश्य से अचानक गाँव में आया और इस युवक को गोली मारकर फरार हो गया। 2 की गिरफ्तारी हो गई है, इनसे पूछताछ करके बाकियों की गिरफ्तारी भी होगी।”

मंदिर में पूजा करने को लेकर विवाद पर पुलिस ने कहा कि वे खुद मौके पर पहुँचे थे और वहाँ लोगों से बात में उन्हें पता चला कि जाँच में ऐसी कोई बात निकलकर सामने नहीं आई।

सोशल मीडिया पर इस घटना को दलित पर सवर्णों के अत्याचार के रूप में जमकर शेयर किया गया है, जबकि वास्तविकता क्विंट, वायर, लल्लनटॉप, टेलीग्राफ, ऑल्टन्यूज़ जैसे मीडिया गिरोह की हेडलाइन से अलग यह है कि यह मामला मृतक युवक की जाति या मंदिर में पूजा को लेकर नहीं बल्कि आपस में मिलजुलकर शुरू किए गए बिजनेस को लेकर था।

NDTV के पूर्व पत्रकार की कंपनी में काम करने वाले जर्नलिस्ट को कोरोना, भावुक वीडियो को राहुल गाँधी ने किया शेयर

कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी ने मंगलवार (जून 9, 2020) को ट्विटर पर दिल्ली के एक पत्रकार की वीडियो शेयर की। इस वीडियो में पत्रकार मदद की गुहार लगाते नजर आए। वीडियो में उन्हें कहते सुना जा सकता है कि उनके घर में बच्चों समेत सबको कोरोना हो गया है। 

GO News इंडिया के लिए काम करने वाले दिल्ली के पत्रकार अजय झा ने कहा कि उनका परिवार बड़ी परेशानी में है। उनके परिवार के दो लोगों की मौत भी कोरोना के कारण हो गई है।

कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी ने पत्रकार की वीडियो ट्वीट करते हुए लिखा, “अजय जैसे मेरे सैकड़ों भाई-बहनों के लिए- हम आपका दुख बाँटते हैं। हम आपको सुरक्षित करने के लिए हर चीज करेंगे। हम एक साथ इसको हराएँगे।”

पत्रकार अजय अपने वीडियो में बताते हैं कि कुछ समय पहले उसके सास-ससुर की कोरोना के कारण मौत हो गई थी और प्रशासन ने उनके शव को उनके घर से काफी दिनों बाद निकाला।

अजय कहते हैं, “मेरे घर में सब कोरोना पॉजिटिव हैं। मैं, मेरी पत्नी और मेरी दो बेटियाँ। पिछले 10 दिनों में 2 सदस्य गुजर चुके हैं। मेरी पत्नी के पिता पहले गए। फिर मेरी सासु-माँ भी गुजर गईं। दोनों का शव काफी समय तक घर में रखा रहा। लेकिन कोई लेने नहीं आया।”

अपनी वीडियो में अजय ने यह भी आरोप लगाया कि भले ही दिल्ली में केजरीवाल सरकार दावे कर रही है। लेकिन हकीकत यह है कि लोग सिर्फ़ भगवान भरोसे हैं।

उन्होंने इस वीडियो के जरिए अपने लिए व परिवार के लिए मदद माँगी। उन्होंने बताया कि उनका परिवार धीरे-धीरे टूट रहा है। वे बहुत हिम्मत कर रहे हैं। लेकिन उन्हें नहीं मालूम चल रहा कि आगे क्या होगा। उन्हें मदद चाहिए। इलाज चाहिए।

GO News में अजय झा पंकज पचौरी के लिए करते हैं काम

उल्लेखनीय है कि जिस पत्रकार अजय झा का वीडियो राहुल गाँधी ने शेयर किया है, वह GO News में काम करते हैं। GO News को पंकज पचौरी चलाते हैं। इस चैनल से पहले पंकज एनडीटीवी में पत्रकार रह चुके हैं। NDTV बाद में उन्होंने मनमोहन सिंह के सलाहकार के रूप में भी काम किया है।

हाल में अजय झा ने सोशल मीडिया पर कॉन्ग्रेस के हालिया स्पीक अप अभियान को कवर किया था। इस अभियान के तहत कई कॉन्ग्रेस कार्यकर्ताओं ने सरकार से माँग की थी कि वह लॉकडाउन के कारण प्रभावित हुए लोगों की मदद करें।

ऐसे ही एक अन्य वीडियो में अजय झा ने बताया था कि कैसे कॉन्ग्रेस पार्टी स्पीक अप कैंपेन के जरिए गरीब, प्रवासी, छोटे व्यापारियों की मदद करने के लिए प्रयासरत है।

गौरतलब है कि जिस समय राहुल गाँधी ने अपने ट्विटर पर अजय झा का वीडियो शेयर किया, लोगों ने तुरंत उनकी मंशा पर सवाल उठाने शुरू कर दिए।

यूजर्स ने राहुल गाँधी से पूछा कि क्या उन्हें महाराष्ट्र के हालात मालूम हैं, जहाँ आँकड़ा देखते-देखते 82,000 पार कर रहा है। लोग पूछ रहे हैं कि आखिर आज पत्रकार को आश्वासन देने वाले राहुल गाँधी ने महाराष्ट्र के लोगों के लिए क्या किया?

इजरायल को गाली और रोहिंग्या को ताली: दक्षिण अफ्रीका के एक अभियान में आनंद शर्मा का नाम, भारतीय हितों की अनदेखी

अमेरिका में जॉर्ज फ्लॉयड की हत्या के बाद ये ख़बर और इसके विरोध की चर्चा पूरी दुनिया में होती रही। अमेरिका में दंगे हो रहे हैं, मॉल्स को लूटा जा रहा है और पुलिस से झडपें हो रही हैं। ये सब कम्युनिस्ट और एंटीफा वालों द्वारा किया जा रहा है। कई लोग भारत में भी कुछ ऐसे ही दंगे भडकाने की बातें कर रहे हैं। भारत में ‘ब्लैक लाइव्स मैटर’ की तर्ज पर समुदाय विशेष के समर्थन में हैशटैग ट्रेंड कराया गया। ये सब अफ्रीकन अमेरिकी समुदाय और भारतीय में रह रहे समुदाय विशेष की तुलना करते हुए किया गया। इन सबके बीच आपको पता है कि आनंद शर्मा दक्षिण अफ्रीका में क्या कर रहे थे?

भारत में दूसरे मजहब वालों को सड़क पर आने और उन्हें हिंसा करने के लिए भड़काने की कोशिश की जा रही है। हालाँकि, दोनों समुदायों की तुलना की ही नहीं जा सकती। भारत में मजहब के नाम पर ही देश का विभाजन हुआ और पाकिस्तान बना। इसके बाद भी यहाँ के संविधान द्वारा समुदाय विशेष को बराबरी से भी बढ़ कर सुविधाएँ दी जाती रही हैं। उनके लिए कई सारी योजनाएँ आती हैं। अल्पसंख्यकों के लिए भारत में कई नीतियाँ हैं।

जबकि अफ़्रीकी अमेरिकी समुदाय की बात करें तो उनके पूर्वजों को अफ्रीका से स्लेव्स बना कर लाया गया था। भारत में रहने वाले दूसरे समुदाय को कभी भी स्लेवरी से नहीं जूझना पड़ा। अमेरिका में भी इस्लामी कट्टरवादियों ने जॉर्ज फ्लॉयड की हत्या के विरोध को अपना हथियार बनाना चाहा। वहाँ भी ‘ला इलाहा इल्लालाह’ के नारे गूँजे। इसी बीच तुष्टिकरण के लिए कुख्यात कॉन्ग्रेस पार्टी ने भी एक नया खेल शुरू कर दिया।

दक्षिण अफ्रीका में वहाँ के राष्ट्रपति रामाफोसा के नेतृत्व में एक एंटी-रेसिज्म अभियान लॉन्च किया गया। दक्षिण अफ्रीका की सत्ताधारी पार्टी अफ्रीकन नेशनल कॉन्ग्रेस ने एक प्रेस रिलीज इस सम्बन्ध में जारी किया। साथ ही इसके लिए अलायन्स बनाने की बात कही गई, जिसमें ‘कॉन्ग्रेस ऑफ साउथ अफ्रीकन ट्रेड यूनियंस’ भी शामिल है। शुरू में इस अभियान से ऐसा लगा कि ये दक्षिण अफीका के लिए है और वैश्विक स्तर पर नहीं है।

दक्षिण अफ्रीका में ANC का अभियान, पढ़िए विज्ञप्ति

दक्षिण अफ्रीका में भी ‘ब्लैक’ लोगों की हत्या हो जाती है, जिस बारे में ये दल चुप रहता है। एक स्थानीय अख़बार में इसकी आलोचना की गई। स्थानीय अख़बार ने कहा कि एएनसी के ट्रैक रिकॉर्ड को देखा जाए तो उसके द्वारा इस अभियान को लॉन्च करना उसके दोहरे रवैये का प्रदर्शन है क्योंकि दक्षिण अफ्रीका में भी ‘ब्लैक’ लोगों की जिंदगी से खिलवाड़ नहीं होना चाहिए और पार्टी अभी तक वहाँ चीजें ठीक करने में सफल नहीं हो पाई है।

दक्षिण अफ्रीका के अख़बारों और पार्टी द्वारा जारी किए गए प्रेस नोट को देखें तो ऐसा प्रतीत होता है कि ये अभियान देश के आन्तरिक मुद्दों को लेकर है, ग्लोबल स्टेज पर इसका कोई रोल नहीं होगा। हालाँकि, उस प्रेस रिलीज के दूसरे पेज पर एक ऐसे व्यक्ति का नाम है, जिसे आप मिस नहीं कर सकते और आपको वो चीज खटकेगी ही। पैनलिस्ट्स की सूची में आनंद शर्मा भी शामिल हैं, जो राज्यसभा में उप नेता प्रतिपक्ष हैं।

इस अभियान को एक वर्चुअल टॉक के माध्यम से लॉन्च किया जाना है और दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति वहाँ अपना बयान देने वाले थे। इसके बाद एक पैनल डिस्कशन आयोजित किया गया था, जिसमें पैनलिस्टों को अपनी-अपनी राय साझा करनी थी। कुल 8 पैनलिस्टों में से 7 दक्षिण अफ्रीका के हैं जबकि सिर्फ़ एक भारत से और वो हैं आनंद शर्मा। कॉन्ग्रेस के जाने-माने नेता आनंद शर्मा। आनंद शर्मा ने डिस्कशन में हिस्सा भी लिया।

आनंद शर्मा ने दक्षिण अफ्रीका के कार्यक्रम को किया सम्बोधित

उन्होंने कार्यक्रम में नेल्सन मंडेला और महात्मा गाँधी की बात करते हुए अपनी बात शुरू की। कोलोनिज्म और रेसिज्म की बातें करते हुए आनंद शर्मा ने एएनसी को आईएनसी का भाई तक बता दिया। अमेरिका में हो रहे दंगों के बारे में बोलते हुए उन्होंने इसे ‘कॉल ऑफ एक्शन’ करार दिया और साथ ही कहा कि ये बराबरी के अधिकार के लिए हो रहा है। उन्होंने अफ़्रीकी राष्ट्रपति को ‘कॉमरेड’ कह कर संबोधित किया।

उन्होंने न्याय, सहिष्णुता, स्वीकार्यता और ऐसे कई पंचिंग शब्दों का प्रयोग करके अपने भाषण को वजनदार बनाने की कोशिश की। वहीं अफ़्रीकी राष्ट्रपति ने मानवता के लिए एक साथ खड़े होने की अपील की। उन्होंने इस दौरान रोहिंग्याओं पर भी ‘अत्याचार’ होने की बात कह दी। उन्होंने इजरायल पर फिलिस्तीन के इलाकों पर अवैध कब्जे का आरोप लगाया और आलोचना की। उन्होंने कहा कि फिलिस्तीनियों को उनके अधिकारों से वंचित रखा जा रहा है।

अपने सम्बोधन में आनंद शर्मा ने कहा कि भारत के लोगों को न्याय के लिए खड़ा होना चाहिए। ये बात ही बेहूदा है क्योंकि भारत अमेरिका के आंतरिक मामलों में क्यों बोलेगा? हाल ही में जब डोनाल्ड ट्रम्प ने कश्मीर और फिर बाद में चीन को लेकर मध्यस्थता करने की बात कही थी तो भारत ने इससे इनकार कर दिया था क्योंकि ये हमारा आंतरिक मामला है। अब भारत इसके विपरीत जाकर दूसरों के आंतरिक मामले में दखल क्यों देगा?

हालाँकि, कॉन्ग्रेस का इस मामलों में यही बचाव का बयान रहता है कि किसी नेता ने कुछ किया है तो उसने अपने व्यक्तिगत दायरे में, इससे पार्टी का कोई लेनादेना नहीं है। बता दें कि जब 2016 में पीएम मोदी दक्षिण अफ्रीका दौरे पर गए थे तो कुछ संगठनों ने उनके खिलाफ प्रदर्शन किया था। वहाँ के व्यापारी गुप्ता ब्रदर्स ने तो उन्हें गिरफ्तार करने की माँग तक कर दी थी। ऐसे में आनंद शर्मा किन लोगों का साथ दे रहे हैं?

दक्षिण अफ्रीका के नेताओं की तो अपनी मजबूरी है क्योंकि वहाँ समुदाय विशेष की जनसंख्या पाकिस्तान से भी ज्यादा है और वो वोट के लिए फिलिस्तीन का पक्ष लेकर इजरायल को भला-बुरा कहते रहते हैं। हाँ, चीन और दक्षिण अफ्रीका के रिश्ते ज़रूर अच्छे हैं। हाल ही में बीजिंग ने उसे अपना स्ट्रेटजिक पार्टनर बनाया है। इसीलिए वहाँ के राष्ट्रपति ने रोहिंग्या की बात तो की लेकिन उइगर की नहीं। ऐसे में आनंद शर्मा वहाँ किसका हित साधने गए थे, ये सवाल तो कॉन्ग्रेस से बनता है।

महाराष्ट्र पुलिस किसके कहने पर मुझे मेरा प्रोग्राम करने से रोकना चाहती है: थाने पहुँचे अर्नब गोस्वामी ने देरी पर उठाए सवाल

कॉन्ग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गाँधी के खिलाफ कथित तौर पर की गई टिप्पणी मामले में दर्ज एफआईआर के सिलसिले में रिपब्लिक टीवी के एडिटर इन चीफ अर्नब गोस्वामी बुधवार (जून 10, 2020) को पूछताछ के लिए एनएम जोशी पुलिस स्टेशन पहुुँच गए हैं। 

हालाँकि, उन्होंने आरोप लगाया है कि उनके पूछताछ में जानबूझ कर देरी की जा रही है। उन्होंने कहा, “मेरे सूत्रों ने मुझे बताया है कि बड़े पुलिसकर्मियों ने आदेश दिया है कि मुझे रोका जाए। मुझसे इंतजार करवाया जाए। मुझे समझ में नहीं आता कि ये एक पत्रकार के साथ ऐसा क्यों कर रहे हैं। मैं अंदाजा यही लगा सकता हूँ कि ये चाहते हैं कि मैं अपना प्रोग्राम ‘पूछता है भारत’ न कर पाऊँ और रिपब्लिक इंग्लिश पर जो मेरा डिबेट प्रोग्राम है, वो न कर पाऊँ। इससे उन्हें क्या खुशी होगी, समझ में नहीं आ रहा है।”

अर्नब गोस्वामी आगे कहते हैं, “मैं एक बार फिर से इनसे आग्रह कर रहा हूँ कि मेरी पूछताछ शुरू कीजिए। और अगर कोई इनके आका इनको निर्देश दे रहे हैं कि अर्नब को रोको, उसको देर करवाओ, तो मैं बता दूँ कि मेरे CFO की पाँच घंटे से पूछताछ चल रही है। उन्होंने लंच तक नहीं किया है। मैं खुद पुलिस स्टेशन के बाहर खड़ा हूँ। बिना कोई कारण बताए बेवजह मुझे रोका जा रहा है। यह गलत, अनैतिक और असंवैधानिक भी है।”

उन्होंने बताया कि पूछताछ के लिए उनको 2 बजे का समय दिया गया था और वो 2 बजे पुलिस स्टेश पहुँच गए थे। मगर फिर भी उन्हें रोका जा रहा है। उन्होंने कहा कि वो जानना चाहते हैं कि मुंबई पुलिस उन्हें उनका प्रोग्राम करने से क्यों रोकना चाहती है। क्यों पुलिस उन्हें उनके कर्तव्य से रोक रही है। उन्होंने पुलिस से अनुरोध किया कि वो उन्हें उनके प्रोग्राम करने की इजाजत दें, जल्द से जल्द उनकी पूछताछ शुरू करें।

साथ ही उन्होंने यह भी बताया, “जब मैंने उनसे पूछा कि मुझे क्यों रोका जा रहा है, मेरे CFO एस सुंदरम से इतनी देर से क्यों पूछताछ हो रही है तो पुलिस ने कहा कि ये मेरी मनमर्जी है, हम जितनी देर चाहें, आपको रोक सकते हैं, इंतजार करवा सकते हैं। CFO से पूछताछ कर सकते हैं।”

इससे पहले अर्नब गोस्वामी ने कहा था, “मैं कानून का पालन करने वाले एक जिम्मेदार नागरिक के रूप में यहाँ आया हूँ और कानून का पालन करूँगा। मेरे खिलाफ सारे केस फर्जी हैं। सवालो से डरने वाला नहीं हूँ। सत्य की जीत होगी।”

अर्नब गोस्वामी ने मंगलवार (जून 9, 2020) को कहा था, “मुंबई पुलिस आयुक्त को चिंता नहीं करनी चाहिए। मैं दोपहर ठीक दो बजे पुलिस स्टेशन में हाजिर हो जाऊँगा। पुलिस ने मुझे एक और समन भेजा है। मैं पाँच मिनट पहले ही पहुँच जाऊँगा। न रुकेंगे न झुकेंगे हम हर दिन पूछेगें, क्योंकि सच हमारे साथ है।”

बता दें कि सोमवार (जून 8, 2020) देर रात पुलिस ने समन जारी कर गोस्वामी को दूसरे दौर की पूछताछ के लिए बुधवार को दिन में 11 बजे हाजिर होने का आदेश दिया था। लेकिन बाद में मंगलवार को समय संशोधित कर दो बजे कर दिया गया था।  

गौरतलब है कि महाराष्ट्र के पालघर में दो साधुओं की मॉब लिंचिंग पर सोनिया गॉंधी की चुप्पी को लेकर अर्नब ने कहा था, “सोनिया गाँधी तो खुश हैं। वो इटली में रिपोर्ट भेजेंगी कि देखो, जहाँ पर मैंने सरकार बनाई है, वहाँ पर हिन्दू संतों को मरवा रही हूँ। वहाँ से उन्हें वाहवाही मिलेगी। लोग कहेंगे कि वाह, सोनिया गाँधी ने अच्छा किया। इन लोगों को शर्म आनी चाहिए। क्या उन्हें लगता है कि हिन्दू चुप रहेंगे? आज प्रमोद कृष्णन को बता दिया जाना चाहिए कि क्या हिन्दू चुप रहेंगे? पूरा भारत भी यही पूछ रहा है। बोलने का समय आ गया है।”

इस मामले को लेकर छत्तीसगढ़, उत्तराखण्ड, महाराष्ट्र, राजस्थान, मध्य प्रदेश, कर्नाटक समेत देश के कई राज्यों में रिपब्लिक टीवी और अर्नब गोस्वामी के खिलाफ एफआईआर दर्ज की जा चुकी है। 

कॉन्ग्रेसी कार्यकर्ताओं के बीच मारपीट, जमकर चले लात-जूते… बीच-बचाव को आए जिलाध्यक्ष का फाड़ डाला कुर्ता

उत्तर प्रदेश में कॉन्ग्रेस कार्यकर्ताओं के बीच मारपीट की खबर सामने आ रही है। इटावा में कॉन्ग्रेस नेताओं की बैठक हो रही थी। इस दौरान किसी बात को लेकर विवाद हो गया। जिसके बाद बैठक में जमकर मारपीट हो गई। नेता एक दूसरे पर जूता और चप्पल चलाने लगे।

कॉन्ग्रेस पार्टी के कार्यकर्ताओं की बैठक के दौरान हुई भिड़ंत में बीच-बचाव करने आए जिलाध्यक्ष के भी कपड़े तक फट गए। बताया जा रहा है कि शहर अध्यक्ष पल्लव दुबे और पूर्व युवा अध्यक्ष अरुण यादव के बीच किसी बात पर बहस हो गई। बहस सुनकर दोनों तरफ से समर्थक आ गए और बहस हो गई।

लेकिन बात बहस पर रूकी नहीं। दोनों ओर से जमकर लात जूते चल गए। बीच बचाव में कॉन्ग्रेस जिलाध्यक्ष मलखान सिंह यादव समेत अन्य नेताओं के कुर्ते भी फट गए। पुलिस ने मौके पर पहुँच कर मामला शांत कराया।

कॉन्ग्रेस पार्टी के कार्यकर्ताओं का नेताओं के प्रति अंदर दबा गुस्सा अब बाहर आने लगा है। इसकी ही बानगी बुधवार (जून 10, 2020) को इटावा पार्टी कार्यालय में देखने को मिली। नगर पालिका स्थित जिला कॉन्ग्रेस कार्यालय में महारसोई संचालन को लेकर कार्यकर्ता आपस में भिड़ गए और जमकर लात जूते चले। दोनों पक्षों ने तहरीर दी है। अभी तक मुकदमा दर्ज नहीं हुआ है।

जानकारी के मुताबिक शहर अध्यक्ष पल्लव दुबे ने अरुण यादव को गुंडा बताया और जान से मारने की नियत से हमला करने का आरोप लगाया। साथ ही उन्होंने अरुण यादव पर 2000 रुपए और मोबाइल छीनने का भी आरोप लगाया। वहीं अरुण यादव ने भी पल्लव दुबे पर आरोप लगाया कि उन्हें दो दिन पहले धमकी दी गई थी और उन पर जान से मारने की नीयत से हमला किया गया था। उन्होंने पुलिस से सुरक्षा की माँग की है और पार्टी में गुटबाजी का भी आरोप लगाया है।

इसके साथ ही बताया जा रहा है कि इस विवाद की एक वजह यह भी हो सकती है कि चार दिन पहले कॉन्ग्रेस हाईकमान ने युवा जिलाध्यक्ष जितेंद्र यादव को पद से हटा दिया था। इसको लेकर पार्टी कार्यकर्ताओं में मतभेद चल रहा था।

इस संबंध में जितेंद्र यादव ने शहर अध्यक्ष पल्लव दुबे पर टिप्पणी की थी। जिसके बाद से पल्लव दुबे को शक है कि अरुण यादव ने उनके खिलाफ साजिश की है। इसी को लेकर दोनों के समर्थकों के बीच मतभेद चल रहा था, जिसका गुबार बुधवार को फूट पड़ा। कॉन्ग्रेस की राष्ट्रीय महासचिव प्रियंका गाँधी वाड्रा ने पार्टी को मजबूत करने के लिए नेताओं को निर्देश दिया है, लेकिन नेता मारपीट में उलझे हुए हैं।

मस्जिदों में अल्कोहल वाले सैनिटाइजर का प्रयोग हराम, अल्लाह के घर को नापाक न बनाएँ: मरकज के फतवे पर देवबंद की मुहर

बरेलवी मरकज द्वारा मस्जिदों में अल्कोहल युक्त सेनेटाइजर के प्रयोग को हराम बताया गया। अब दारुल उलूम के मोहतमिम मुफ्ती अबुल कासिम नोमानी का कहना है कि ये बिलकुल ही दुरुस्त फतवा है। उन्होंने दोहराया कि सैनिटाइजर में अल्कोहल होता है और अल्कोहल का प्रयोग मस्जिद में किसी भी हालत में नहीं किया जा सकता, ये इस्लाम के ख़िलाफ़ है। मस्जिदों को सैनिटाइज करने के किए दारुल उलूम ने क्लोरीन व अन्य केमिकलों के इस्तेमाल की सलाह दी है।

बता दें कि कोरोना वायरस संक्रमण से बचाव के लिए विशेषज्ञों ने उन्हीं सैनिटाइजरों के इस्तेमाल की सलाह दी है, जिनमें अल्कोहल की मात्रा कम से कम 70% हो। सुन्नी बरेली मरकज के दारुल इफ्ता से जारी किए गए फतवे में मस्जिदों में अल्कोहल युक्त सैनिटाइजर का छिड़काव करने को प्रतिबंधित करते हुए फतवा जारी कर दिया गया है। दारुल उलूम देवबंद ने इस फतवे का समर्थन किया है और जायज ठहराया है। ‘हिंदुस्तान’ की ख़बर के अनुसार, मोहतमिम ने कहा:

सेनेटाइज करने के लिए क्लोरीन सहित कई अन्य प्रकार की चीजें भी उपलब्ध हैं। ऐसे में अल्कोहल वाले सेनेटाइजर को मस्जिदों में क्यों प्रयोग किया जाए। देवबंद समेत सभी मस्जिदों में क्लोरीन से ही सेनेटाइज किया जा रहा है। मस्जिद में आने वाले लोग भी बगैर अल्कोहल वाला सेनेटाइजर इस्तेमाल कर रहे हैं या फिर साबुन से हाथ धो रहे हैं। इसीलिए ये फतवा बिल्कुल सही है।

इससे पहले दरगाह आला हजरत स्थित सुन्नी मरकजी दारुल इफ्ता के मुफ्ती अब्दुर्रहीम नश्तर फारूकी ने कहा था कि इस्लाम में अल्कोहल को हराम करार दिया गया है, अतः सैनिटाइजर का इस्तेमाल मस्जिदों में बिलकुल नहीं किया जाए। उन्होंने आगे फ़रमाया था कि मस्जिद अल्लाह का घर है और अल्लाह के घर को नापाक नहीं होने दिया जाना चाहिए। हालाँकि, इस बयान के बाद सोशल मीडिया पर उन्हें ट्रोल भी किया गया।

बता दें कि अनलॉक-1 के तहत 8 जून से सरकार ने सभी धार्मिक स्थलों को खोलने के निर्देश दिए थे और इसके साथ ही कुछ अनिवार्य दिशा-निर्देश भी जारी किए गए थे। सैनिटाइजर से धार्मिक स्थलों को सैनिटाइज कराया जाना इन्हीं निर्देशों में से एक था। मुफ़्ती के बयान के बाद लोगों ने उन्हें याद दिलाया कि सैनिटाइजर ही नहीं बल्कि कई केमिकल्स में अल्कोहल होते हैं। इस्लामिक मुल्कों में भी इसका प्रयोग किए जाने की बात कई लोगों ने बताई।

जमात रजा मुस्तफा के मीडिया प्रभारी समरान खान ने भी प्रेस में बयान जारी करते हुए कहा कि मुसलामानों को चाहिए कि अल्कोहल वाला सैनिटाइजर इस्तेमाल कर के अपनी नमाजें बर्बाद न करें। उनका पूछना था कि अगर जगह ही नापाक हो गई तो फिर वहाँ नमाज कैसे अदा किया जा सकता है? सभी मस्जिदों के इमामों को भी कह दिया गया है कि जब नमाज के वक़्त परफ्यूम लगाने की इजाजत नहीं है तो अल्कोहल का प्रयोग कैसे किया जा सकता है।

संत महा योगेश्वर हत्याकांड: लाश के नाम पर बची चंद हड्डियाँ, 21 दिनों तक फॉरेंसिक जाँच के बाद प्रशासन ने सौंपा शव

पंजाब के रूपनगर में मई 17, 2020 को ‘श्री मुनि देशम आश्रम’ में अवधूत अखाड़ा के 85 वर्षीय संत महा योगेश्वर महात्मा की लाश मिली थी। बताया गया था कि एक सप्ताह पहले ही उनकी हत्या कर दी गई थी, जिस कारण उनका मृत शरीर क्षत-विक्षत हो गया था। इसके बाद डेड बॉडी को जाँच के लिए फॉरेंसिक विभाग में ले जाया गया लेकिन अभी तक कुछ अता-पता नहीं है कि जाँच में क्या निकला। और न ही 21 दिनों तक उनके शिष्यों को उनकी डेड बॉडी मिली।

क्या कहना है विभिन्न संगठनों का?

विभिन्न संगठनों ने न सिर्फ़ इस हत्याकांड की निंदा की है बल्कि पंजाब सरकार और स्थानीय प्रशासन के रवैये पर भी सवाल खड़ा किया है। ‘पहला कदम’ नामक गैर-सरकारी संगठन ने कहा कि इस घटना के सामने आए 23 दिन बीत चुके हैं लेकिन अभी तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई है। इस हत्याकांड में 4 लोगों के शामिल होने की बात कही गई थी लेकिन अभी तक सिर्फ़ 2 लोगों को ही गिरफ़्तार किया गया है।

हालाँकि, विभिन्न संगठनों द्वारा अंतिम-संस्कार के लिए उनके शरीर की माँग किए जाने के बाद अंततः प्रशासन ने बुधवार (जून 10, 2020) को उनका मृत शरीर शिष्यों को सौंप दिया। मृत शरीर के नाम पर बस हड्डियों की कुछ टुकड़ियाँ बची हैं, जिसे देख कर किसी का भी दिल दहल जाए। ‘पहला कदम’ के डायरेक्टर डॉक्टर विपिन सिंह चौहान एवं अधिवक्ता अमन कुमार ने पूछा है कि पुलिस द्वारा अब तक सभी आरोपितों को गिरफ़्तार न किए जाने के पीछे वजह क्या थी?

ऑपइंडिया के पास संत महा योगेश्वर महात्मा के मृत शरीर की तस्वीरें मौजूद हैं लेकिन ये तस्वीरें इतनी वीभत्स हैं कि हम इन्हें दिखा नहीं सकते। आपको लाश के नाम पर बस पाँव की हड्डियाँ और शरीर के कुछेक टुकड़े दिखेंगे, और कुछ नहीं। चूँकि शिष्यों का कहना है कि सनातन प्रक्रिया से विधिवत अंतिम संस्कार होना चाहिए, इसीलिए शरीर का जो भाग मौजूद हैं, उनका ही अंतिम संस्कार किया जाएगा।

‘निर्विकल्प फाउंडेशन’ ने जताया रोष (नोट- ये डेड बॉडी सौंपे जाने से पहले जारी हुआ)

एक अन्य एनजीओ ‘निर्विकल्प प्रतिष्ठान’ ने कहा कि पंजाब में आए दिन साधुओं पर हमले हो रहे हैं और सरकार इस पर मौन है। संगठन के भूपेंद्र सिंह चाहर ने विगत कुछ दिनों में साधुओं पर हुए हमले पर चिंता व्यक्त की। उनका सवाल है कि आखिर 23 दिनों तक कौन सी फॉरेंसिक जाँच की गई कि अपराधी अभी तक पुलिस की पकड़ से दूर हैं और सिर्फ़ दो लोगों को गिरफ़्तार करके इसे मामूली चोरी की घटना बताई जा रही है।

‘पहला कदम’ और ‘निर्विकल्प फाउंडेशन’, दोनों ही संगठन के लोगों ने ऑपइंडिया से बात करते हुए पुलिस की जाँच प्रक्रिया और प्रशासन के ढुलमुल रवैए पर सवाल उठाया। उनकी नाराज़गी सांसद मनीष तिवारी से भी है, जिन्होंने अभी तक इस घटना की कोई सुध नहीं ली है। आनंदपुर साहिब लोकसभा से अकाली दल के टिकट पर चुनाव लड़ने वाले पूर्व सांसद प्रेम सिंह चंदूमाजरा भी लापता हैं। लोगों ने पूछा है कि आखिर ये दोनों ही नेता हैं कहाँ?

नेताओं पर शिष्यों का सुध न लेने के आरोप

हमने मनीष तिवारी से संपर्क करने का प्रयास किया लेकिन उनसे हमारी बात नहीं हो पाई। हाँ, पूर्व सांसद प्रेम सिंह चंदूमाजरा से ज़रूर हमारी बात हुई, जिन्होंने कहा कि वो संत योगेश्वर महात्मा की हत्या के बाद उनके शिष्यों से मिलने और घटनास्थल का दौरा करने जाने ही वाले थे और तैयार भी हो गए थे लेकिन कोरोना लॉकडाउन गाइडलाइन्स के कारण उन्हें कदम पीछे खींचने पड़े। हालाँकि, उन्होंने कहा कि वो आरोपितों की गिरफ़्तारी को लेकर लगातार पुलिस के संपर्क में हैं।

संत की हत्या मामले में एनजीओ ‘पहला कदम’ ने की न्याय की माँग (बॉडी सौंपे जाने से पहले)

पूर्व सांसद ने कहा कि उन्हें इस घटना के सम्बन्ध में सूचनाएँ मिल रही हैं और कई मैसेज आ रहे हैं। हाल ही में कई स्थानीय लोगों और दिवंगत महात्मा के शिष्यों ने धरना देकर सरकार के समक्ष आरोपितों को गिरफ़्तार करने की माँग रखी। उनके एक शिष्य ने ऑपइंडिया को बताया कि संत योगेश्वर लॉकडाउन का पालन करते हुए अपने कमरे में रह रहे थे और उन्होंने लोगों के जुटान पर भी रोक लगा दी थी। बस उन्हें खाना देने लोग आते थे।

उन्होंने बताया कि पहले शव को फॉरेंसिक जाँच के लिए अमृतसर भेजा गया था लेकिन फिर खरड़ स्थित फॉरेंसिक लैब में भेज दिया गया। शिष्य का कहना है कि जब उनकी लाश मिली थी, तब उनके सिर पर एक बाल भी नहीं था और जिस तरह से लाश क्षत-विक्षत पड़ी हुई थी, उससे लगता है कि हत्या से पहले उनके साथ दुर्व्यवहार हुआ था। शिष्यों का पूछना है कि जब लॉकडाउन अमल में है तो आखिर अपराधी भाग कहाँ गए?

चोरी व लूट के कारण हुई हत्या: पुलिस

ऑपइंडिया ने शहीद भगत सिंह नगर की एसएसपी अलका मीणा से ऑपइंडिया ने जब आरोपितों की गिरफ़्तारी के बारे में सवाल किया तो उन्होंने कहा कि 4 आरोपितों की पहचान हो गई है, जिनमें से 2 को पहले ही गिरफ़्तार किया जा चुका है और बाकी दोनों की तलाश में पुलिस लगी हुई है। उन्होंने कहा कि ये चोरी व लूट की ही घटना है क्योंकि गिरफ़्तार आरोपितों के ऊपर पहले से ही ऐसी वारदातों को अंजाम देने के मामले दर्ज हैं।

मेनस्ट्रीम मीडिया में सिर्फ़ ‘रिपब्लिक टीवी’ ने इस ख़बर को चलाया

एसएसपी मीणा ने ऑपइंडिया से कहा कि पुलिस ने कभी इस बात से इनकार नहीं किया कि ये हत्या का मामला नहीं है। ये हत्या का मामला है, जिसे चोरी के लिए अंजाम दिया गया। उन्होंने कहा कि पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट के बाद फॉरेंसिक जाँच के लिए डेड बॉडी गई है, जिसकी रिपोर्ट के बारे में अभी तक कोई सूचना नहीं मिली है। कुल मिला कर पुलिस का मानना है कि ये चोरी के लिए की गई हत्या का ही मामला है।

शिष्यों ने पुलिस के वर्जन को नकारा, जताया अविश्वास

हालाँकि, महात्मा के लिए न्याय हेतु आवाज़ उठा रहे अधिवक्ता अमन कुमार पुलिस के वर्जन से इत्तेफाक नहीं रखते। उनका कहना है कि एक वयोवृद्ध महात्मा के पास 4 लोग चोरी करने क्यों आएँगे? उनका कहना है कि वो तो अपना भोजन तक ख़ुद से नहीं बनाते थे, दूसरों के घर से खाना आया करता था, ऐसे में उनके पास से चोरों को क्या मिल जाएगा और चोर समूह बना कर इतनी मेहनत क्यों करेंगे? वो पुलिस की बातों को नकार देते हैं। उन्होंने ऑपइंडिया से कहा:

“महात्मा योगेश्वर के घर में तो तो बिजली कनेक्शन तक नहीं था। सोलर सिस्टम से उनका काम चलता था। अगर एसएसपी कह रही हैं कि सारे आरोपितों की पहचान हो गई है तो बाकी दो को अभी तक क्यों नहीं गिरफ़्तार किया गया? लॉकडाउन के बावजूद ऐसा कैसे संभव है कि वो पुलिस की चंगुल से निकल जाएँ? मुझे पुलिस की जाँच प्रक्रिया पर संदेह है। मुझे इस हत्याकांड के पीछे कोई साजिश लगती है। उनका आश्रम 5 एकड़ की जमीन पर स्थित था और वो एक छोटी सी कुटिया में रहते थे, जहाँ चोरी लायक कुछ था ही नहीं कि 4 चोर घुस आएँ और इतनी बेरहमी से हत्या कर दें।”

संत महा योगेश्वर हत्या मामले में न्याय के लिए माँग करते शिष्यगण और स्थानीय लोग

अगर राष्ट्रीय मीडिया की बात करें तो सिर्फ़ ‘रिपब्लिक टीवी’ ने ही इस मामले को कवर किया है। इस मामले के सामने आने के 20 दिन बाद ‘रिपब्लिक टीवी’ इसे एक भीषण लिंचिंग का मामला बताया था। पालघर से जोड़ते हुए उस रिपोर्ट में इस घटना में न्याय के लिए आवाज़ उठाई गई थी। बाकी सभी मीडिया संस्थानों ने इस ख़बर को अभी तक नज़रअंदाज़ किया है। अब जब मृत शरीर का अंतिम संस्कार हो जाएगा, देखना है कि पुलिस की कार्रवाई से शिष्य कब संतुष्ट होते हैं।

कौन थे अवधूत अखाड़ा के संत महा योगेश्वर महात्मा?

संत महा योगेश्वर महात्मा के बारे में कहा जाता है कि उनका जन्म सरकाघाट के एक बड़े व्यापारिक खानदान में लाला रामरखा लाल के यहाँ हुआ था लेकिन उन्होंने संन्यास लेकर धन-वैभव को पीछे छोड़ दिया था। लोगों का आरोप है कि मीडिया भी इस मुद्दे को नहीं उठा रहा है और इस कारण इस मामले में राज्य सरकार व पुलिस आसानी से बिना कुछ किए निकल गई है। उनका आश्रम नूरपुर बेदी मार्ग पर स्थित था। हत्या के बाद कमरे से बल्ब वगैरह गायब थे।

लोग बताते हैं कि बाबा हमेशा हिंदुत्व के प्रचार-प्रसार के लिए चिंतित रहते थे। असल में उनके आश्रम में बिजली तक नहीं थी, उनके अनुयायियों ने ही सोलर सिस्टम की व्यवस्था की थी। लोग उनके आश्रम पर ही उन्हें भोजन पहुँचाया करते थे। भिक्षा माँग कर गुजर-बसर होता था, इसीलिए वो खाना नहीं बनाया करते थे। हत्या के बाद लोगों ने देखा कि उनका एक बाजू गायब था। और साथ ही सिर को धड़ से अलग कर दिया गया था। उनके सिर के बाल उखाड़ लिए गए थे। पूरा कमरा खून से लथपथ था।

10 दिन में 23 आतंकियों का एनकाउंटर: शोपियाँ में फिर हिजबुल मुजाहिद्दीन और लश्कर के 5 आतंकी ढेर

कोरोना संकट के बीच जम्मू-कश्मीर में आतंकियों के ख़िलाफ़ सुरक्षाबल की कार्रवाई जारी है। बुधवार (जून 10, 2020) को कश्मीर के शोपियाँ में सुरक्षाबलों ने फिर 5 आतंकियों को मार गिराया।

एनकाउंटर शोपियाँ के सुगू इलाके में हुआ। यहाँ कश्मीर पुलिस और सुरक्षाबल ने मिलकर आतंकियों के ख़िलाफ़ संयुक्त कार्रवाई की। पुलिस के मुताबिक, ये मारे गए आतंकी हिजबुल मुजाहिद्दीन और लश्कर-ए-तैयबा से जुड़े हुए थे।

अधिकारियों के मुताबिक, सुरक्षाबल को सुगू इलाके में आतंकवादियो की उपस्थिति के बारे में इनपुट मिले थे। ऐसे में बुधवार सुबह सेना और पुलिस की संयुक्त टीम द्वारा घेराबंदी कर तलाशी अभियान शुरू किया गया। लेकिन जैसे ही सुरक्षा बलों ने आतंकियों के ठिकाने पर फोकस किया, आतंकवादियों ने गोलीबारी शुरू कर दी और मुठभेड़ होने लगी।

इसके बाद जवाबी कार्रवाई में सुरक्षा बलों ने 5 आतंकियों को मार गिराया। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, आतंकियों के साथ मुठभेड़ अभी इलाके में खत्म नहीं हुई है। पूरे इलाके में ऑपरेशन जारी है। ऐसा अनुमान है कि अभी भी गाँव में 2-3 आतंकी छिपे हुए हैं।

बता दें कि, 1 सप्ताह से भी कम समय में शोपियाँ में यह तीसरी बड़ी मुठभेड़ है, जिसमें 14 आतंकवादी मारे जा चुके हैं। इसके अलावा 2 हफ्ते (1 जून से 10 जून) में कई टॉप कमांडर्स समेत 23 आतंकी मारे गए हैं।

इससे पहले 8 जून को शोपियाँ के पिंजूरा इलाके में हुई मुठभेड़ में 4 आतंकी मारे गए थे। उससे एक दिन पहले यानी रेबेन इलाके में 5 आतंकियों को सुरक्षाबल ने ढेर किया था। कुल मिलाकर 24 घंटों में सुरक्षाबलों ने 9 आतंकियों को मौत के घाट उतार दिया था।

इस महीने की शुरूआत से अगर बात करें तो सबसे पहले 1 जून को नौशेरा सेक्टर में घुसपैठ की कोशिश करते हुए 3 पाकिस्तानी आतंकियों को सुरक्षाबलों ने मार गिराया था। 2 जून को त्राल इलाके में 2 आतंकी मारे गए। फिर 3 जून को कंगन इलाके में सुरक्षाबलों ने 3 आतंकियों को मारा। रजौरी में भी 5 जून को एक आतंकी मारा गया। 7 जून को पाँच आतंकी मरे और आज सुबह 8 जून को 4 आतंकियों का सफाया हुआ। इस प्रकार 8 दिनों के भीतर 18 आतंकियों को मारा गया और मात्र दस दिन के अंदर ये संख्या 23 तक पहुँच गई।

इससे पहले मई महीने में 4 एनकाउंटर हुए थे और पुलिस ने 6 आतंकियों को मारा था। 31 मई को कुलगाम में 2 आतंकी मरे थे। 19 मई को श्रीनगर में हिजबुल के 2 आतंकी मारे गए थे। 16 मई को डोडा में सेना सी कार्रवाई में 5 घंटे की मुठभेड़ के बाद 1 आतंकी मरा था वहीं 6 मई को हिजबुल का टॉप कमांडर रियाज नायकू मारा गया था।

रिपोर्ट के अनुसार, जम्मू-कश्मीर के डीजीपी दिलबाग सिंह ने इन लगातार मुठभेड़ों के बारे में जानकारी देते हुए बताया कि हाल के अभियानों में हिजबुल मुजाहिदीन के 9 आतंकवादी मारे गए हैं। पिछले 2 सप्ताह में 9 बड़े ऑपरेशन किए गए, जिसमें 22 आतंकवादियों का खात्मा किया गया है। इनमें आतंकी संगठनों के 8 शीर्ष कमांडर शामिल हैं।

रोजगार और मजदूरों की भलाई के लिए चीन की ‘स्किल मैपिंग’ नीति पर योगी सरकार, एक साथ होंगे कई सुधार

कोरोना संकट से समाज का कोई भी हिस्सा अप्रभावित और अछूता नहीं रहा है। इस विश्वव्यापी आपदा ने भारत में भी बाल-वृद्ध, नारी, किसान, मजदूर, व्यापारी, कर्मचारी, उद्योगपति, नौकरशाह और राजनेता आदि सभी वर्गों को बुरी तरह प्रभावित किया है। लेकिन इन सब तबकों में प्रवासी मजदूरों को सर्वाधिक दुःख और कष्ट झेलना पड़ा है।

इस बार दिल्ली, मुंबई, पुणे, सूरत जैसे रोटी और रोजगार के महानगरीय केन्द्रों से पैदल पलायन करते इन विवश प्रवासियों ने भारतवासियों की अंतरात्मा को झकझोर डाला। यह भारत-विभाजन कालीन दृश्यों की पुनरावृत्ति थी। मीडिया और सोशल मीडिया में इन दृश्यों की भरमार से सरकारें सचेत हुईं और इन अभागे और अनाथ श्रमिकों को सुरक्षित इनके गाँव-घर पहुँचाने के लिए सक्रिय हुईं।

अब यह स्पष्ट हो गया है कि कोरोना संकट अल्पकालिक आपदा नहीं, बल्कि दीर्घकालिक संकट है। इसलिए इन सरकारों की दूसरी चिंता और चुनौती घर-वापसी किए हुए अपने नागरिकों के लिए रोटी और रोजगार का जुगाड़ करना है। इसलिए पूँजी निवेश कर सकने वाले पूँजीपतियों के लिए पलक-पाँवड़े बिछाए जाने की कवायद की जा रही है।

नई औद्योगिक इकाइयों की स्थापना और पुरानी बंद पड़ी या बीमारू इकाइयों के परिचालन के लिए भी जतन किए जा रहे हैं। इसी कड़ी में उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, पंजाब, राजस्थान, गुजरात, ओडिशा और गोवा आदि राज्यों की सरकारों ने अपने श्रम-कानूनों में संशोधन किया है। ये राज्य सरकारें चीन छोड़ने वाली तमाम बहुराष्ट्रीय कंपनियों और औद्योगिक इकाइयों को आकर्षित करने की आड़ में ऐसा कर रही हैं।

उत्तर प्रदेश सरकार ने राज्यपाल की विशेष संवैधानिक शक्तियों का प्रयोग करते हुए एक अध्यादेश पारित कराया है, जिसके अंतर्गत करार के साथ नौकरी करने वाले लोगों को हटाने, नौकरी के दौरान हादसे का शिकार होने और समय पर वेतन देने जैसे तीन नियमों को छोड़कर अन्य सभी श्रम कानूनों को तीन वर्ष के लिए स्थगित कर दिया गया है। ये संशोधित नियम उत्तर प्रदेश राज्य में मौजूद सभी राज्य और केन्द्रीय इकाइयों पर लागू होंगे। इन नियमों से लगभग 15000 कारखाने और 8000 मैन्युफैक्चरिंग इकाइयाँ प्रभावित होंगी।

राज्य सरकार द्वारा जारी आदेश के अनुसार कोई कर्मचारी किसी भी कारखाने में प्रतिदिन 12 घंटे और सप्ताह में 72 घंटे से ज्यादा काम नहीं करेगा। इन संशोधित नियमों से पूर्व प्रतिदिन 8 घंटे और सप्ताह में 48 घंटे काम करने की ही सीमा थी। बारह घंटे की शिफ्ट के दौरान 6 घंटे के बाद 30 मिनट का ब्रेक दिया जाएगा। बारह घंटे की शिफ्ट करने वाले कर्मचारी की मजदूरी नियत दर के अनुरूप ही होगी। अर्थात् उसे कोई बोनस या भत्ता नहीं मिलेगा।

उल्लेखनीय है कि इस नियम के लागू होने से पहले 8 घंटे के बाद ओवरटाइम करने पर प्रति घंटे दोगुने वेतन का प्रावधान था। इन संशोधनों के पक्ष में राज्य सरकारों द्वारा यह तर्क दिया गया है कि लॉकडाउन के परिणामस्वरूप निर्जीव हो चुकी अर्थव्यवस्था में प्राण-फूँकने, बंद पड़ी आर्थिक गतिविधियों को दोबारा शुरू करने और राज्य के सभी कामगारों को रोजगार उपलब्ध कराने के लिए श्रम कानूनों में संशोधन किया गया है।

गौरतलब यह है कि श्रम क़ानून श्रमिकों के अधिकार-पत्र हैं। वे उनके लिए सुरक्षित और गरिमापूर्ण जीवन सुनिश्चित करने वाले दस्तावेज हैं। उन्हें संशोधित, स्थगित या निरस्त करना श्रमिक वर्ग की सुरक्षा, सम्मान और स्वास्थ्य के साथ समझौता करना है। यह कदम प्रतिगामी है क्योंकि श्रम-कानून बहुत लम्बे लोकतान्त्रिक संघर्ष की मानवीय उपलब्धि हैं। इसीलिए भारतीय मजदूर संघ जैसे बड़े श्रमिक संगठनों ने राज्य सरकारों के इस कदम पर कड़ी आपत्ति दर्ज की है। हालाँकि, राज्य सरकारों के इस श्रमिक विरोधी निर्णय का बहुत प्रभावी, संगठित और सक्रिय विरोध लॉकडाउन के कारण नहीं हो पा रहा है।

उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में धीरे-धीरे आधुनिक उद्योग शुरू हो रहे थे। उनके साथ रेलवे, पोस्ट ऑफिस और टेलीग्राम जैसी उपयोगी सेवाओं का भी विकास हो रहा था। इसी समय भारत में आधुनिक श्रमिक वर्ग का उदय हुआ। इस श्रमिक वर्ग को कम मजदूरी, लम्बी कार्यावधि, असुरक्षित,असुविधाजनक और अस्वस्थ वातावरण, बालश्रम आदि अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ा। यह विडंबनापूर्ण किन्तु रोचक तथ्य है कि भारत में उद्योगों में काम करने वाले श्रमिकों की दुर्दशा में सुधार की माँग भारत में कार्यरत श्रमिक वर्ग के अंदर से नहीं, बल्कि लैंकशा (Lancashire) में कपड़ा कारखानों के मालिकों की ओर से आई।

इसके पीछे मूल कारण यह था कि सस्ते श्रम के कारण कहीं भारत के उद्योग उनके प्रतिस्पर्धी न बन जाएँ। इस आशंका के वशीभूत उन्होंने एक श्रम आयोग की नियुक्ति की माँग की, जो भारतीय उद्योगों में काम करने वाले श्रमिकों की परिस्थितियों का अध्ययन कर सके। ऐसा प्रथम आयोग 1875 ई में गठित किया गया और इस आयोग की सिफारिशों के आधार पर प्रथम फैक्टरी अधिनियम-1881 पारित किया गया।

दूसरा फैक्टरी अधिनियम 1891 में पारित किया गया। किन्तु कड़वा सच यह है कि भारतीय श्रमिक वर्ग स्वतंत्रता-पूर्व से लेकर अब तक सरकार और पूँजीपतियों के गठजोड़ स्वरूप बनने वाली अन्यायपूर्ण और शोषणकारी नीतियों का सामना कर रहा है। यह अत्यंत दुखद और दुर्भाग्यपूर्ण है कि स्वतंत्रता से लेकर आज तक श्रमिक वर्ग की स्थिति में सुधार के लिए व्यापक स्तर पर श्रम कानूनों का सशक्तिकरण नहीं किया गया है, ताकि भारतीय श्रमिकों के आर्थिक स्तर और सामाजिक जीवन को बेहतर बनाया जा सके।

भूमण्डलीकरण तथा आर्थिक उदारीकरण की प्रक्रिया समकालीन विश्व-व्यवस्था के ऊपर अत्यंत व्यापक एवं गहरा प्रभाव डाल रही है। भारत भी इन प्रक्रियाओं से अछूता नहीं है और इन चुनौतियों का सामना कर रहा है। सन 1991 से देश में काफी परिवर्तन हुए हैं। अधिकांश कार्यक्षेत्रों में राज्य का स्थान निजी उद्यम ले रहे हैं। भारत में 1991 के बाद अर्थव्यवस्था में कई संरचनात्मक परिवर्तनों के द्वारा उदारीकरण की प्रक्रिया का आरंभ हुआ।

तथाकथित नीतिगत सुधारों ने अर्थव्यवस्था को उदार बना दिया है। उदारीकरण की इस प्रक्रिया में अधिक निवेश आकर्षित करने की चाह में सरकारों द्वारा अपने कई कानूनों में सुधार किए गए, जिनमें श्रम कानूनों में परिवर्तन प्रमुख है। इसके पीछे यह निजी उद्यमियों को अधिक जोखिम से बचाने और उन्हें पूँजी निवेश के लिए आकर्षित करने का तर्क दिया जाता है। लेकिन सरकारें  प्रक्रियागत जटिल ढाँचे और लालफीताशाही में सुधार न करके केवल श्रम कानूनों में बदलाव पर ही अधिक जोर डालती हैं जो कि ‘गुड गवर्नेंस’ और ‘रिफॉर्म्स’ का सरलीकरण है।

यह सही समय है जबकि सरकारों को उद्योग-धंधे लगाने में आने वाली तमाम नीतिगत और प्रक्रियागत अड़चनों को दूर करने की दिशा में काम करना चाहिए, न कि श्रम कानूनों संशोधन/स्थगन करना चाहिए। किसी भी देश के श्रम कानून कर्मचारियों और नियोक्ताओं के बीच स्पष्ट और न्यायपूर्ण संबंधों को स्थापित करने पर जोर देते हैं। इन कानूनों द्वारा श्रमिकों और कारखाना मालिकों के संबंधों को ‘चैक एंड बैलेंस’ करते हुए श्रमिक वर्ग का संरक्षण सुनिश्चित किया जाता है।

श्रम कानूनों का मुख्य उद्देश्य श्रमिकों के आर्थिक और सामाजिक हितों की रक्षा करना है ताकि उन्हें जीवन निर्वाह हेतु उचित मजदूरी, काम के तय घंटे, जोखिमों से सुरक्षा, स्वस्थ एवं अनुकूल वातावरण, बोनस, भत्ते इत्यादि उपलब्ध कराए जा सकें। सरप्लस उत्पादन से प्राप्त लाभ पर सिर्फ पूँजीपति का अधिकार नहीं होना चाहिए बल्कि उसमें श्रमिक की भी आनुपातिक हिस्सेदारी होनी चाहिए। इस लाभ के न्यायपूर्ण वितरण का उत्तरदायित्व राज्य का है। राज्य इस उत्तरदायित्व से आँखें चुराता रहा है। इसीलिए समाज में इतनी असमानता और अन्याय है और साधन, संसाधन और सुविधाओं पर मुट्ठी भर लोगों का एकाधिकार है।

भारतीय संविधान द्वारा लोकतंत्रात्मक शासन प्रणाली के रूप में संसदीय व्यवस्था को स्वीकार किया गया है। प्रत्येक लोकतंत्रीय शासन का मुख्य उद्देश्य एक कल्याणकारी राज्य की स्थापना होता है। किसी भी कल्याणकारी राज्य का लक्ष्य वर्ग विशेष का हितसाधन नहीं, बल्कि  राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक विषमताओं को दूर करना एवं सर्वजन हिताय का काम करना होता है।

हालिया श्रम कानूनों में बदलाव राज्य सरकारों की पूँजीपतियों के प्रति सहानुभूति या उनके दबाव में काम करने की प्रवृत्ति को प्रदर्शित करते हैं। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि औद्योगिक इकाइयाँ सरकारी उपक्रमों की तुलना में लोगों को रोजगार उपलब्ध कराने में अधिक सक्षम और सहायक सिद्ध होती हैं और इन औद्योगिक इकाइयों को सुचारू रूप से चलायमान रखने के लिए शासन द्वारा इनके अनुरूप उचित नियम कानून बनाए जाने चाहिए। परंतु इसके लिए श्रमिकों के मानवीय हितों एवं गरिमापूर्ण जीवन के साथ समझौता नहीं किया जाना चाहिए।

अत: विभिन्न राज्य सरकारों द्वारा पूँजीपतियों के दबाव में आकर श्रम कानूनों को कमजोर करना उचित नहीं जान पड़ता है क्योंकि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 में प्रत्येक व्यक्ति को न केवल जीवन जीने का अधिकार प्रदान किया गया है, बल्कि  इसमें गरिमापूर्ण जीवन का अधिकार भी शामिल है। यह अधिकार एक संवैधानिक गारंटी के रूप में राज्य के विरुद्ध प्रदान किया गया है, जिसे चाहकर भी राज्य द्वारा ख़ारिज नहीं किया जा सकता है। इससे स्पष्ट होता है कि भारत के संविधान निर्माताओं ने औद्योगिक कर्मकारों के जीवन को बेहतर बनाने की जिम्मेदारी सरकारों को प्रदान की है। इसीलिए राज्य का यह कर्तव्य है कि इन लोगों के जीवन को बेहतर बनाने के लिए उचित एवं उपयोगी नीति का निर्माण करे।

विकास के वर्तमान वैश्विक मापदंडों में जीडीपी वृद्धि दर सर्वप्रमुख है। दुखद पहलू यह है कि भारत भी इसी दौड़ का हिस्सा बन गया है। देश के लगभग चालीस करोड़ कामगारों की सुरक्षा और मानवीय गरिमा को संकट में डालकर जीडीपी वृद्धि दर को बढ़ाना सुखद नहीं है, क्योंकि सरकारों की प्राथमिकता में कामगारों की खुशहाली होनी चाहिए।

इस तथ्य को अनदेखा करना श्रमिकों को पूँजीपतियों की दया पर छोड़ने जैसा है। सोचनीय है कि भारत में पहले से ही श्रम कानूनों का नियोक्ताओं द्वारा ठीक से पालन नहीं किया जाता है और आए दिन होने वाली औद्योगिक दुर्घटनाओं में इन श्रम मानकों के उल्लंघन की पोल खुलती नजर आती है। वहीं, श्रम कानूनों में दी जाने वाली छूट औद्योगिक निवेश आकर्षित करने के बावजूद कामगारों को सामाजिक और आर्थिक असुरक्षा के अंधकूप में धकेलने जा रही है।

इसके लिए सरकारों को एक मध्यमार्ग निकालने की आवश्यकता है ताकि पूँजीपतियों/निवेशकों और कामगारों के हितों के बीच उचित संतुलन बनाया जा सके। यूनियनबाजी और हड़ताल जैसी गतिविधियों पर तो रोक लगाई जा सकती है, किन्तु उनके श्रम-अधिकारों और शासन-प्रशासन या न्यायालय द्वारा इन अधिकारों के संरक्षण पर कोई रोक नहीं लगानी चाहिए। वर्तमान समय में अमीर और गरीब के बीच की खाई लगातार बढ़ती जा रही है। एक तरफ जहाँ अमीर लगातार अमीर होता जा रहा है, वहीं, दूसरी ओर गरीब लगातार गरीब होता जा रहा है।

इस संदर्भ में संविधानशिल्पी डॉ भीमराव अंबेदकर का यह कथन बहुत महत्वपूर्ण है, “26 जनवरी, 1950 को हम विरोधी भावनाओं से परिपूर्ण जीवन में प्रवेश कर रहे हैं। राजनीतिक जीवन में हम समता का व्यवहार करेंगे और सामाजिक तथा आर्थिक जीवन में असमता का। इन विरोधी भावनाओं से परिपूर्ण जीवन को हम कब तक बिताते चले जाएँगे? यदि हम इसका बहुत काल तक महिमा मंडन करते रहेंगे तो हम अपने राजनीतिक लोकतन्त्र को संकट में डाल देंगे। हमें इस विरोध को यथासंभव शीघ्र ही मिटा देना चाहिए, अन्यथा जो असमता से पीड़ित हैं, वे लोग इस राजनीतिक लोकतन्त्र की उस रचना का विध्वंस कर देंगे, जिसका निर्माण इस सभा ने इतने परिश्रम के साथ किया है।”

सामाजिक और आर्थिक असमानता की यह खाई भयावह रूप से बढ़ती जा रही है। इसके त्वरित निदान की आवश्यकता है। संविधान में प्रस्तावित समतामूलक और न्यायपूर्ण समाज की नीति का उल्लंघन करके भारत के संविधान निर्माताओं की आत्मा को अनवरत चोट पहुँचाई जा रही है। साथ ही, भारत का एक जनकल्याणकारी राज्य बनने का ध्येय भी बाधित हो रहा है। जनकल्याणकारी राज्य की प्रासंगिकता अपने नागरिकों को सामाजिक- आर्थिक सुरक्षा प्रदान करने में है।

अब समय आ गया है कि सरकारें अपने सभी नागरिकों को गरिमापूर्ण जीवन का अधिकार, भोजन का अधिकार स्वास्थ्य का अधिकार, शिक्षा का अधिकार प्रदान करने के साथ-साथ रोजगार का अधिकार भी सुनिश्चित करें। रोजगार का अधिकार सुनिश्चित करते समय नियोक्ता या पूँजीपति की मनमानी पर अंकुश लगाना भी सरकारों का प्राथमिक कर्तव्य है। अर्थव्यवस्था के विकास के लिए हलकान अर्थशास्त्रियों को समझना चाहिए कि श्रमिक अर्थव्यवस्था के पहिए हैं। उन्हीं के कंधों पर चलकर अर्थव्यवस्था गतिशील होती है।

कोरोना संकट के बीच ही उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने रास्ता दिखाया है। उन्होंने 27-28 मार्च को दिल्ली से पैदल पलायन कर रहे लाखों प्रवासी मजदूरों को हजारों बसों से उनके गाँव-घर भिजवाया। इसके बाद उन्होंने कोचिंग सिटी कोटा में फँसे लाखों छात्र-छात्राओं की सुरक्षित घर-वापसी सुनिश्चित की। उनके इन प्रयासों की देखा-देखी अन्य सरकारें भी हरकत में आई। योगी आदित्यनाथ ने एक बार फिर बड़ी पहल करते हुए विभिन्न राज्यों और महानगरों से अपने गृह राज्य वापस लौट रहे उत्तर प्रदेश के प्रवासी मजदूरों की ‘स्किल मैपिंग’ का महत्वाकांक्षी अभियान शुरू किया है।

उत्तर प्रदेश में घर वापसी कर रहे लाखों श्रमिकों के दुःख-दर्द निवारण और रोटी-रोजगार के प्रबंध के लिए प्रवासी आयोग का भी गठन किया जा रहा है। इन श्रमिकों का पुनर्वास और सेवा योजन करने वाले इस आयोग का नाम ‘कामगार श्रमिक (सेवा योजन एवं रोजगार ) कल्याण आयोग’ होगा। यह आयोग श्रमिकों की स्किल मैपिंग, कौशल विकास, रोजगार और सेवा योजन आदि आवश्यकताओं की चिंता एवं व्यवस्था करेगा। यह आयोग उत्तर प्रदेश की सम्पूर्ण श्रम शक्ति की सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा सुनिश्चित करेगा।

इसके लिए उत्तर प्रदेश सरकार उन्हें दुर्घटना, बीमारी और बेरोजगारी से बचाने के लिए मुफ्त और प्रभावी बीमा कवच प्रदान करेगी। नवगठित ‘कामगार श्रमिक (सेवा योजन एवं रोजगार) कल्याण आयोग’ उत्तर प्रदेश की सम्पूर्ण श्रम-शक्ति का कौशल आधारित ब्यौरा इकट्ठा (डेटाबेस तैयार) करेगा। साथ ही, अकुशल या अर्ध कुशल श्रमिकों के लिए अल्पकालिक प्रशिक्षण का प्रबंधन करते हुए उन्हें न सिर्फ रोजगार-सक्षम बनाएगा बल्कि उन्हें विभिन्न औद्योगिक इकाइयों में सेवायोजित भी कराएगा। उत्तर प्रदेश में ही नहीं बल्कि उत्तर प्रदेश के बाहर भी उनकी सामजिक सुरक्षा और गरिमापूर्ण जीवन की गारंटी सुनिश्चित की जाएगी।

अब श्रमिक स्वयं विभिन्न औद्योगिक इकाइयों के स्वामियों और पूँजीपतियों के सामने रोजगार के लिए नहीं गिड़गिड़ाएँगे बल्कि उनकी ओर से राज्य सरकार सशर्त सेवायोजन करेगी ताकि उनका शोषण और उत्पीड़न न हो और उन्हें अमानवीय हालात में काम करने के लिए विवश न होना पड़े। उल्लेखनीय है कि चीन में श्रम-शक्ति की स्किल मैपिंग करते हुए डेटाबेस तैयार करने और विभिन्न औद्योगिक इकाइयों और स्थानों में आवश्यकतानुसार श्रम-शक्ति उपलब्ध कराने की ऐसी ही व्यवस्था है। यह व्यवस्था श्रम-शक्ति की माँग और आपूर्ति में संतुलन रखती है और शोषण की सम्भावना को न्यूनतम कर देती है।

इन्हीं प्रयासों की सुखद परिणति है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इंडियन इंडस्ट्रीज एसोसिएशन, फिक्की, लघु उद्योग भारती, नेशनल रीयल एस्टेट डेवलपमेंट काउंसिल (नारडेको) आदि के साथ समझौता पत्र (MOU) हस्ताक्षरित किया है। इससे साढ़े ग्यारह लाख से अधिक प्रवासी मजदूरों को रोजगार मिलेगा और उनका पुनर्वास हो सकेगा।

उल्लेखनीय है कि प्रवासी श्रमिकों के दुखों से द्रवित होकर और उत्तर प्रदेश सरकार की उपरोक्त पहल से प्रभावित होकर केन्द्रीय श्रम मंत्रालय ने भी असंगठित क्षेत्र के सभी कामगारों को सामाजिक सुरक्षा कवच प्रदान करने का संकल्प व्यक्त किया है। घरेलू सहायकों अर्थात कामवालियों आदि को भी इसमें शामिल किया जाएगा। इनका न सिर्फ मुफ्त बीमा कराया जाएगा बल्कि न्यूनतम वेतन और साल में एक बार घर जाने का यात्रा-व्यय भी प्रदान किया जाएगा।

असंगठित क्षेत्र में काम कर रहे सभी कामगारों को ‘अनऑर्गेनाइज्ड वर्कर आइडेंटिफिकेशन नंबर (यू-विन ) देकर पंजीकृत किया जाएगा। उन्हें राज्य के इंश्योरेंश कारपोरेशन में रजिस्टर किया जाएगा तथा ईएसआईसी की भी सुविधा दी जाएगी। अब समय आ गया है कि केंद्रीय स्तर पर एक संवेदनशील, सुविचारित और प्रभावी प्रवासन नीति (माइग्रेशन पॉलिसी) बनाई जाए और प्रवासियों और उनके परिजनों को सामाजिक सुरक्षा प्रदान की जाए। अगर यह सब धरातल पर हो पाता है तो श्रमिकों की जीवन-स्थिति के गुणात्मक सुधार में कोरोना संकट की निर्णायक भूमिका मानी जाएगी।