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माफ़ करना, मैं तुम्हारे प्रोग्राम्स नहीं देखता: CM केजरीवाल ने की राहुल कँवल की ऑनलाइन बेइज्जती

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ने ‘इंडिया टुडे’ के पत्रकार राहुल कँवल की बेइज्जती कर दी। दरअसल, कँवल ने अपने चैनल पर एक कार्यक्रम के दौरान दिल्ली के अस्पतालों और सरकार द्वारा जारी किए गए एप का ‘रियलिटी चेक’ किया था। इसके बाद ट्विटर पर उन्होंने बखान किया कि वो इस बात से अभिभूत हैं कि सीएम केजरीवाल ने उनका शो देखा और दावा किया कि केजरीवाल ने एप्लीकेशन और अस्पतालों के बीच सामंजस्य बिठाने के लिए कुछ दिन का समय माँगा है।

राहुल कँवल ने अपने शो में दावा किया था कि दिल्ली के अस्पतालों में जो स्थिति है और दिल्ली कोरोना एप्लीकेशन में जो दिखाया जा रहा है, वो काफ़ी अलग है। कँवल ने दिल्ली के अस्तपालों के वार्डस में बदतर स्थिति होने का दावा किया था। उन्होंने कहा था कि अस्पतालों में मरीजों और उनके रिश्तेदारों का क्रंदन काफ़ी डरावना है। उनकी ट्वीट को कोट करते हुए अरविन्द केजरीवाल ने कहा, “माफ़ करना राहुल, मैं कभी तुम्हारे प्रोग्राम्स नहीं देखता।

केजरीवाल की इस ट्वीट के बाद लोगों ने राहुल कँवल का ख़ूब मजाक बनाया। एक यूजर ने लिखा कि राहुल कँवल ने हेयरकट वाला ट्वीट नहीं किया था, इसीलिए अरविन्द केजरीवाल ने उन्हें भाव नहीं दिया। बता दें कि केजरीवाल ने सागरिका घोष को हेयरकट एन्जॉय करने की सलाह दी थी। एक अन्य यूजर ने लिखा कि भाजपा के ख़िलाफ़ इतना माहौल बनाने के बावजूद उन्हें सिर्फ़ बेइज्जती ही मिली। एक अन्य यूजर ने पूछा कि कँवल अब कितने झूठ बोलेंगे?

इधर केजरीवाल ने भी शनिवार (जून 6, 2020) को कहा कि कोई भी अस्पताल किसी भी मरीज को एडमिट करने से इनकार नहीं कर सकता। उन्होंने कहा कि अगर कोरोना के लक्षण वाले मरीज आते हैं तो अस्पतालों को उन्हें एडमिट कर के उनका इलाज करना ही होगा क्योंकि अब तक कोरोना की कोई दवा नहीं आई है। उन्होंने मेडिकल कर्मचारियों को PPE किट्स पहनने की सलाह दी, अगर मरीज में कोरोना के लक्षण दिख रहे हैं तो।

‘इंडिया टुडे’ के शो में विभिन्न अस्पतालों के मरीजों से बात की थी, जिन्होंने दावा किया था कि मरीजों को अस्पतालों में एडमिट नहीं किया जा रहा है। उन्होंने अस्पतालों के प्रबंधन का भी बयान दिखाया था। एक 67 साल के कोविड मरीज की मौत का मुद्दा उठाया गया था, जिनके परिवार ने अस्पताल पर कोताही बरतने के आरोप लगाए थे। इसी शो के बारे में कँवल ने ट्विटर पर बताया, जहाँ केजरीवाल ने उन्हें जवाब दिया।

हालाँकि, ये पहली बार नहीं है जब अरविन्द केजरीवाल ने राहुल कँवल को इस तरह का जवाब दिया हो। राहुल कँवल ने एक बार केजरीवाल से उनके मंत्री रहे सोमनाथ भारती पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों पर सवाल पूछा था। कँवल ने केजरीवाल से पूछा था कि वाड्रा या भाजपा के मामले में तुरंत जाँच की माँग करने वाले केजरीवाल अपनी पार्टी में ऐसा क्यों नहीं करते? इस पर केजरीवाल ने कहा था कि उन्हें तो राहुल ने कोई कागज़ भेजा ही नहीं।

मैं आपके प्रोग्राम्स नहीं देखता: केजरीवाल ने 2014 में भी कँवल से कहा था

अरविन्द केजरीवाल ने तब भी मार्च 2014 में कहा था कि वो राहुल कँवल के कार्यक्रम देखते ही नहीं हैं क्योंकि वो इंटरेस्टिंग नहीं होते हैं। उन्होंने कँवल से कहा था कि वो बुरा न मानें लेकिन उनके प्रोग्राम्स इंटरेस्टिंग नहीं होते हैं। एक बार तो केजरीवाल ने कँवल को पीएम मोदी का प्रवक्ता तक बता दिया था। इस पर कँवल ने कहा था कि जब एक ट्रोल मुख्यमंत्री बनता है तो यही होता है। ये बहस ट्विटर पर सितम्बर 2016 में हुई थी।

डर का माहौल है… क्योंकि हिंदुत्व बड़ी निर्दयी चीज है, इससे ज्यादा लचक तो आतंकवाद में है

एक छोटा बच्चा घर में अकेला है। उसके साथ खेलने के लिए बाकी बच्चे नहीं हैं। इसलिए बेचारा वही अकेला चोर-सिपाही सबके रोल बारी-बारी से निभाता है और अपने मन को बहलाता है। उसने अपने मुँह पर चादर ढकी, एक तरफ खड़े होकर डराने के अंदाज़ में जोर से ‘हाऊ’ बोला, फिर भागकर दूसरी तरफ जाकर दुबक कर बैठ गया और डरने का नाटक करने लगा।

बच्चे के खेल तक सब ठीक है, लेकिन यही खेल कुछ बड़े लोग भी खेल रहे हैं। खेल कुछ इस तरह है- यथार्थ से एंड्रॉमेडा गैलेक्सी (Andromeda Galaxy) जितनी दूर की बातों की कपोल कल्पना करें, फिर उन्हें बंगलुरु सोनिक बूम जैसे रहस्यमय विस्फोटक स्वर में व्यक्त कर दें और ये लीजिए ‘डर का माहौल’ तैयार है। अब बस उसे तहे दिल से महसूस कराना बाकी है। इसके लिए आप लंबी-गहरी साँस लें और एक अन-अनुभूत पीड़ा के साथ संजीदा आवाज में बोलें- ‘चारों ओर डर का माहौल है’। आज इससे ज्यादा क्रांतिकारी कुछ और नहीं हो सकता। 

डर के माहौल के इन सुरों को अगर ठीक से सुनना है तो आपको 7.1 Surround Sound System वाले ध्वनि यंत्र का प्रयोग करना चाहिए। ताकि आप इस multi-channel audio को ठीक से सुन सकें। तब आपको पता चलेगा कि इस महाभीति गान का प्रथम स्वर ‘सा’ वाममार्गियों के कोने से आता है, ‘रे’ कॉन्ग्रेस व अनुषंगी पार्टियों से, ‘ग’ अति जागरूक पत्रकारों से, ‘म’ मुंबई वाले कलाकारों से, ‘प’ का पंचम स्वर पाकिस्तान वाली दिशा से, ‘ध’ धमाके वाले शांतिदूतों से, ‘नि’ निर्मल हृदय छात्र-छात्राओं की ओर से।

इस तरह ‘मिले सुर मेरा तुम्हारा’ की विशुद्ध संगीतमयता के साथ छद्म मानवाधिकार, उदारता, सेक्युलरिज्म आदि थीम के गीत गाए जाते हैं। इनका सुर एक इसलिए है क्योंकि इन सबको, चाहे वो पाकिस्तान हो या हमारे देश की सेवाभावी पार्टियाँ, इन्हें एक ही चीज से खतरा है और वो है हिंदुत्व।

गजब की बात ये है कि इन लोगों को हिन्दुओं के खिलाफ कोई भी प्रोपेगेंडा करने के लिए अतिवादी हिंदुत्व या उग्र हिंदुत्व जैसी औपचारिकता की भी जरूरत नहीं पड़ती है। सीधे हिंदुत्व शब्द में ही वो दहशत समेट दी जाती है जो इस देश के करोड़ों अल्पसंख्यकों में डर का माहौल दिखाने और दुनिया भर में इसे बदनाम करने के लिए पर्याप्त है। लेकिन आप ये भी न सोचें कि सभी हिंदू खतरनाक हैं।

मौसमी हिंदुत्व को इससे बचाकर रखा गया है। मौसमी हिंदुत्व, मौसमी जनेऊ, मौसमी ब्राह्मण ये तो दुनिया के सबसे भोले-भाले प्राणी हैं। ये प्राय: उच्च राजवंशी, जगदद्धारक, अवतारी महापुरुष होते हैं, जिन्हें स्वयं ब्रह्मा ने इस धरा के कल्याण के लिए भेजा है। इसलिए इस लेख में जब भी हिंदुत्व की बात हो तब आप मौसमी हिंदुत्व को उससे बाहर ही रखें, क्योंकि ऐसे भोले-भाले प्राणियों को हिंदुत्व के लपेटे में लाने से अहिंसा के व्रत का उल्लंघन हो जाता है।

तो हम बात कर रहे थे कि हिंदुत्व बड़ी निर्दयी चीज़ है। इससे ज्यादा लचक तो आतंकवाद में पाई जाती है। अच्छा आतंकवाद, बुरा आतंकवाद, भटके हुए बच्चे, तरक्की और वाजिब तालीम से महरूम नौजवान, डरे-सहमे युवा, एशियन पेंट्स के पास भी इतना विविधतापूर्ण शेडकार्ड मिलना मुश्किल है।

हिंदुत्व का खतरा इतना सर चढ़कर बोल रहा है कि हाल ही में पहले तो पाकिस्तान के विदेश मंत्री ने ट्वीट कर बताया कि उन्होंने पीएम मोदी की इस्लाम विरोधी, हिंसक और क्षेत्रीय अस्थिरता वाली हिंदुत्ववादी या द्रविड़ ऐसी ही किसी विचारधारा के खिलाफ अनेक बार संयुक्त राष्ट्र संघ और अंतर्राष्ट्रीय इस्लामिक संगठनों से शिकायत की है। फिर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ने ट्वीट करके चिंता जाहिर की कि तानाशाह मोदी की सरकार न केवल भारत के अल्पसंख्यकों, जो कि इस समय भारत में दोयम दर्जे के नागरिक हैं उनके लिए, बल्कि क्षेत्रीय शांति के लिए भी खतरा है।

इमरान खान के पास खतरा भाँपने की छठी इन्द्रियनुमा कौन सी तकनीक है पता नहीं, जो खतरे की इतनी पक्की पूर्वसूचना दे देते हैं। इतनी पक्की सूचना के लिए वाकई या तो अच्छी तकनीक चाहिए या फिर खतरे का तूफ़ान खुद ये सूचना दे कि वो आ रहा है तब वो सही होगी। मिनिमम-मैक्सिमम वाली घटना के बाद इनकी तकनीक पर तो भरोसा नहीं किया जा सकता, इसलिए खतरे के आने की सूचना खुद खतरे ने दी है यही मानना पड़ेगा।

क्षेत्रीय शांति के लिए खतरे के तूफ़ान का अभी एक वीडियो भी पाकिस्तान से आया था जिसमें वो पूर्वसूचना दे रहा है कि हम आ गए हैं कश्मीर में, गजवा-ए-हिंद के लिए निकल पड़े हैं, बिल्कुल इमरान खान की सूचना से मेल खाता हुआ।

पता नहीं पाकिस्तान में ऐसे कौन से फ़िल्टर लगे आईने बेचे जाते हैं, जिसमें उन्हें अपना चेहरा बड़ा सुहाना नज़र आता है। पूरी की पूरी माइनॉरिटी के गायब होने से बने गड्ढे और जगह-जगह पर उभरते आतंरिक विद्रोहों के बर्बरता पूर्वक कुचले गए अपने ही चेहरे के फोड़े नज़र नहीं आते। खुद के दामन पर लगे बलूचियों, अहमदियों, हिंदुओं के संहार के छींटें नज़र नहीं आते। या हो सकता है उनके दाग अच्छे हों, क्योंकि अंतर्राष्ट्रीय राजनैतिक दाँव-पेंचों के सर्फ में सब धुलते रहते हैं।

जिस हिंदुत्व का रोना रोकर पाकिस्तान से लेकर भारत तक ये वाममार्गी इसे खतरनाक जताने की कोशिश करते हैं उसका न तो दहशतगर्दी का अतीत है, न वर्तमान। फिर भी वही है खतरा। सवाल तो ये उठना चाहिए कि अगर इस्लाम पाकिस्तान सहित कितने ही दूसरे देशों का आधिकारिक धर्म हो सकता है और बहुत से देशों का राष्ट्रीय धर्म ईसाई धर्म है, तो हिंदुत्व भारत का आधिकारिक धर्म क्यों नहीं हो सकता? वो भी तब जब देश का बँटवारा हुआ ही धर्म के नाम पर था।

ये तो उल्टा इस्लामी देशों से उत्पीड़ित होकर आए हिन्दुओं को भी भारत में शरण देने का विरोध कर रहे हैं। फिर हिंदू किस देश में जाएगा? CAA के विरोध में ये लोग सड़कों पर ऐसे जम गए जैसे इस सड़क के संवैधानिक बैरिकेड्स हों। इस विरोध का सीधा सपाट मतलब यही है कि पाकिस्तान ने तुम्हें निकाल दिया, हिन्दुस्तान में हम तुम्हें रहने नहीं देंगे।

सारा मानवाधिकार गधे के सींग की तरह गायब हो गया। या हिंदू मानव की श्रेणी में नहीं आता? या भारत को शुरू में ही हिंदू राष्ट्र न बनाना गलती थी? बन जाता तो कम से कम आज उन उत्पीड़ित हिन्दुओं के लिए इस दुनिया में कहीं तो जगह होती। इतने स्पष्ट विरोधाभासों के बावजूद जो लोग उदारवाद के नाम पर इन घनघोर अनुदारवादी विचारों के पक्षधर बन जाते हैं, उनका सच और न्याय से कोई नाता नहीं है। ऊपर से धर्म निरपेक्षता और अभिव्यक्ति की आजादी के ढिंढोरे के शोर में चलती तुष्टिकरण की छेनियाँ देश की अखंडता को तार-तार करने पर तुली हैं, लेकिन फर्क किसे पड़ता है?

जिसे देखो वही हमें बिन माँगी सीख देने आ जाता है। अतिथि बनकर दूसरों के घर में लूट मचाने वाले अंग्रेज हमें कहते रहे कि हम असभ्य हैं, इसलिए वो हमें सभ्यता सिखाने आए हैं और हम में से बहुत से मान भी गए। जिस भारत ने दुनिया को विकसित हड़प्पा सभ्यता दी, उस पर हड़पने की सभ्यता थोंप दी गई और उस पर भी तुर्रा ये कि हम पिछड़े और वो सभ्यता के ब्रह्मा, विष्णु, महेश।

अब सामने हैं चरमपंथी, उग्रवादी, अराजक वाममार्गी जो सर्वाधिक सहिष्णु हिंदुत्व को उदारता और धर्म निरपेक्षता सिखा रहे हैं। जिन्हें चार गाँवों में बहुसंख्यक होते ही अपना अलग वर्चस्व चाहिए वो देश की अस्सी प्रतिशत धर्म निरपेक्ष आबादी को असहिष्णु बता रहे हैं। जैसी सभ्यता और उदारता इन लोगों के द्वारा औरों को सिखाई जा रही है, उसका एक अंश भी कोई इस्तेमाल कर ले तो धरती से शांति सदा के लिए गायब हो जाएगी।

दिल्ली दंगों में ताहिर हुसैन की जगह किसी हिंदू के खिलाफ चार्जशीट दाखिल हो जाती तो क्या कोहराम मच जाता, इसकी आप कल्पना कर सकते हैं। लेकिन अब ये रोना शुरू हो चुका है कि उसे उसके मजहब की सजा मिल रही है। कुछ लोगों ने हथिनी का भी धर्म देख लिया, लेकिन अब जब गिरफ्तार आरोपितों के नाम सामने आ गए तो दोहरे मानदंडों वाले विश्लेषक इस पूरे केस को हाथी के साइज से घटाकर चींटी जितना बना डालेंगे। ऐसे आचरण को विशुद्ध हिंदी भाषा में पाखंड कहते हैं।

इस भारत धरा पर अब एक पाखंड खंडिनी ध्वजा राजनैतिक और सामाजिक क्षेत्र में भी गाड़ने की जरूरत है, ताकि इन दोहरे मानदंडों के पाखंड को सोचने पर मजबूर किया जा सके। ‘कंटकेनैव कंटकम्’ मतलब ये कि काँटा, काँटे से ही निकलता है, कॉटन से नहीं। इन कुतर्की लोगों को इन्हीं की भाषा में जवाब देना होगा। ये तभी संभव है जब भारत का नागरिक जागरूक और न्यायशील बनेगा।

हर व्यक्ति अपने स्तर से इस पाखंड का खंडन करे, किसी भी माध्यम से, चाहे आपको सुनने वाले एक या दो लोग ही क्यों न हों। याद करें अपने बचपन के जज्बातों को। तब हममें से किसने नहीं चाहा था कि हम भी देश के लिए कुछ करना चाहते हैं। जागरूक होना और दूसरों को भी जागरूक बनाना उस कुछ करने का सबसे अनिवार्य हिस्सा है, लोकतंत्र का सबसे बड़ा हथियार है और हर एक के वश की बात है।

ऋषि दयानंद ने मनुष्य की परिभाषा बताते हुए लिखा है, “मनुष्य उसी को कहना जो मननशील होकर अपने समान औरों के सुख-दुःख और हानि-लाभ को समझे। अन्यायकारी बलवान से कभी न डरे और धर्मात्मा निर्बल से भी डरता रहे।” इसलिए मनुष्य बनें और बिना डरे अपनी अभिव्यक्ति की आजादी का उपयोग करें। हमारी स्वाभाविक उदारता, अतिथि सत्कार और सहिष्णुता का मानव मूल्यों से रहित स्वार्थी ताकतों ने हमेशा गलत फायदा उठाया है। हमें ये सुनिश्चित करना है कि अब ऐसा न हो।

एक गुणी व्यक्ति ही किसी दूसरे के गुण की कीमत समझ सकता है। स्वार्थी व्यक्ति नहीं। इसलिए इससे पहले कि ये प्रोपेगेंडा संचालित लोग अपने कुतर्कों से आपको अपने से ही नफ़रत करना सिखा दें, आपको जागना होगा। अपनी विशेषताओं को पहचानें और खुद पर लग रहे आरोपों का थोड़ा तुलनात्मक अध्ययन करें, वरना ये ‘उल्टा चोर कोतवाल को डाँटे’ का खेल यूँ ही चलता रहेगा और आप खुद को चोर समझने भी लगेंगे।

हो सकता है कि कुछ युवाओं को इस जागरूकता अभियान में शामिल होना पिछड़ापन लगे, क्योंकि ज्यादातर पढ़े-लिखे युवा ही इस वामपंथी मायाजाल में जकड़े हुए हैं। लेकिन हमें ये भी याद रखना चाहिए कि बदलाव के मोड़ पर ये संशय एक आम बात है, जिसमें व्यक्ति का निर्णय ही उसे सही या गलत साबित करता है। 

आइए अंत में एक विचार पवित्र वेद संहिता का भी सुनते चलें। जो वेद हमें सहिष्णुता सिखाते हैं, वही हमें ये भी सिखाते हैं कि असामाजिक तत्वों का क्या समाधान करना है। क्रांति के नाम पर दंगे भड़काने वाले अराजक तत्वों के प्रति राज्य का क्या कर्तव्य है। इसके लिए वेद में लिखा गया है,

विजानीहि आर्यान् ये च दस्यवो बर्हिष्मते रन्धया शासदव्रतान्।
शाकी भव यजमानस्य चोदिता विश्वेत्ता ते सधमादेषु चाकन।।

इसका मतलब है, “हे शासक! अपने राज्य के अच्छे सृजनशील लोगों और निर्माण की अपेक्षा ध्वंसात्मक कार्यों में रूचि रखने वालों अर्थात् इन दोनों ही प्रकृति के लोगों को जानो। यजनशील कार्यों यानी परहित में लगे व्यक्तियों की रक्षा करो और कुत्सित अर्थात् निंदनीय कार्यों में संलिप्त लोगों को कठोर दंड दो। प्रजा पालन के लिए राजा को राज्य के भीतर के दस्युओं को दंड देना है और बाह्य शत्रुओं से युद्ध करना है। इस कर्तव्य को शक्तिशाली शासक ही निभा सकता है, इसलिए तुम शक्तिशाली बनो।”

किसानों की सब्जियों को गाड़ी से रौंदने वाला दरोगा सस्पेंड: CM योगी ने आरोपित के वेतन से दिलवाया पीड़ितों को मुआवजा

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने उन किसानों को न्याय दिलाया है, जिनकी सब्जियों के ऊपर से पुलिस की गाड़ी गुजरी थी। न सिर्फ़ ग़रीब किसानों के नुक़सान की भरपाई की गई बल्कि आरोपित सब इंस्पेक्टर को भी सस्पेंड कर दिया गया। ये घटना एक वीडियो के वायरल होने के बाद से चर्चा में आई, जिसका मुख्यमंत्री ने तुरंत संज्ञान लिया। ये घटना प्रयागराज की है। वायरल वीडियो में देखा जा सकता है कि पुलिस की गाड़ी ने किसानों की सब्जियों को रौंद डाला।

सीएम योगी के सख्त होने के बाद घूरपुर के एसआई सुमित आनंद को एसएसपी ने त्वरित रूप से लाइन हाजिर किया। उन्हें सस्पेंड किए जाने के बाद उनके ख़िलाफ़ जाँच बैठा दी गई है। घूरपुर में बुधवार (जून 3, 2020) को साप्ताहिक मंडी लगी थी। ये वीडियो उसी दिन का है। प्रयागराज पुलिस ने भी ट्विटर पर इसे दरोगा का कृत्य करार दिया और साथ ही निलंबन की सूचना दी। लोगों ने इसके लिए योगी सरकार को धन्यवाद दिया।

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने वरिष्ठ अधिकारियों को निर्देश दिया कि वो घटनास्थल पर जाएँ और एक-एक पीड़ितों से मिल कर कुल नुकसान का हिसाब लगाएँ। साथ ही नुकसान के भरपाई का भी आदेश दिया गया। इसके बाद वरिष्ठ अधिकारियों ने ग़रीब पीड़ितों से मिल कर उन्हें हुए नुकसान पर खेद प्रकट किया। पुलिस ने वहाँ पहुँच कर पीड़ितों से मुलाक़ात की और मुख्यमंत्री कार्यालय से आए आदेश का पालन किया गया।

‘दैनिक जागरण’ की ख़बर के अनुसार, सूबे के इतिहास में यह संभवतः पहली बार हुआ है जब किसी दरोगा के कृत्य पर ख़ुद मुख्यमंत्री ने इस तरह से संज्ञान लिया हो। इस कार्रवाई को भविष्य के लिए सीख बताया जा रहा है और साथ ही ये सन्देश भी दे दिया गया है कि योगी सरकार किसानों को लेकर ख़ासी संवेदनशील है। निर्णय लिया गया है कि आरोपित दरोगा के वेतन से ही नुकसान की भरपाई की जाएगी। अब तक 11 किसानों को मुआवजा दिया भी जा चुका है जबकि अन्य के बारे में सूचना इकट्ठी की जा रही है।

यमुनापार के एसपी चक्रेश मिश्रा ने ख़ुद घटनास्थल पर पहुँच कर किसानों व सब्जी विक्रेताओं से माफ़ी माँगी। कहा जा रहा है कि लॉकडाउन के कारण सिर्फ बुधवार और शुक्रवार को बाजार लगाने की अनुमति दी गई थी लेकिन कुछ किसानों ने गुरुवार को भी मंडी लगा दी। सरकारी वाहन से पहुँचे दरोगा ने उन सब्जियों को रौंद डाला और साथ ही अभद्र टिप्पणी भी की। कुछ लोगों ने इस घटना का वीडियो बना लिया, जो वायरल हो गया।

तोते से भी सस्ती 8 साल की जोहरा की जिंदगी, हसन सिद्दीकी और उसकी बीवी ने पीट-पीटकर मार डाला

पाकिस्तान में एक दंपति ने आठ साल की जोहरा शाह की पीट-पीटकर हत्या कर दी। जोहरा उनके घर में काम करती थी। घटना रावलपिंडी के एक पॉश इलाके की है।

बच्ची का गुनाह यह था कि उसने ​गलती से पिंजड़ा खोल दिया और उसमें बंद तोते उड़ गए। सोशल मीडिया पर घटना के तूल पकड़ने के बाद पुलिस ने आरोपित हसन सिद्दीकी और उसकी बीवी को गिरफ्तार कर लिया है।

जानकारी के मुताबिक जोहरा शाह को आरोपित हसन सिद्दीकी ने करीब चार महीने पहले अपने एक वर्षीय शिशु की देखभाल करने के लिए रखा था। साथ ही सिद्दीकी ने उसके माता-पिता से लड़की की पढ़ाई-लिखाई का खर्चा देने का वादा किया था।

दरअसल दक्षिणी पंजाब के मुजफ्फरगढ़ के कोट अडू गाँव की रहने वाली लड़की हसन के घर में पिजड़ों की सफाई कर रही थी। इसी बीच उसने गलती से दरवाजा खोल दिया और उसमें बंद दो महॅंगे तोते उड़ गए। इसी बात को लेकर सिद्दीकी और उसकी पत्नी उम्म कुलसुम ने लड़की को बेरहमी से पीटा।

एफआईआर के मुताबिक शाह के चेहरे, पैर, पसलियों और हाथों पर चोट के निशान थे। उसे बेगम अख्तर रुखसाना मेमोरियल अस्पताल में भर्ती कराया गया जहाँ इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई। पोस्टमार्टम के बाद उसका शव परिजनों को सौंप दिया गया।

सोशल मीडिया पर घटना के वायरल होने के बाद पुलिस ने आरोपित दंपति को गिरफ्तार कर लिया। पाकिस्तान के मानवाधिकार मंत्री शिरीन मजारी ने बताया कि मामला उनके संज्ञान में है और आरोपितों को 4 दिन की रिमांड पर भेज दिया गया है। मंत्रालय ने बाल श्रम कानून 1991 में संशोधन का भी प्रस्ताव दिया है।

मामले की जाँच करने वाले पुलिस अधिकारी मुख्तार अहमद ने बताया, “हमने दंपति को गिरफ्तार कर लिया है। उन्होंने अपना अपराध कबूल कर लिया है।” उन्होंने कहा कि बच्ची को उसके निजी अंगों में भी लात मारी गई थी और उससे खून बह रहा था।

पाकिस्तान में श्रम कानून बच्चों और कम उम्र के लोगों के काम करने पर रोक लगाता है। इसके बाद भी घरों में काम करने वालों की दुर्दशा चिंताजनक है। अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) के मुताबिक पाकिस्तान में 8.5 मिलियन से अधिक घरेलू कामगार हैं, जिनमें कई महिलाएँ और बच्चे शामिल हैं। कथित तौर पर, उन्हें मासिक या वार्षिक आधार पर रखा जाता है, और पाकिस्तान में उनके खिलाफ हिंसा से जुड़े कई मामले सामने आए हैं।

पिछले साल जनवरी में लाहौर में 16 साल की उज्मा की हत्या उसके नियोक्ताओं ने सिर्फ इसलिए कर दी थी, क्योंकि उज्मा ने उनका कुछ खाना खा लिया था। इस घटना के बाद पंजाब प्रांत की सरकार ने घरेलू कामगारों के लिए पंजाब घरेलू कामगार अधिनियम बनाया।

घरेलू कामगार यूनियन के महासचिव आरूमा शहजाद ने कहा, “इस कानून के बावजूद पंजाब में अभी भी बड़ी संख्या में घरेलू कामगार बिना किसी पंजीकरण के अवैतनिक काम कर रहे हैं और बच्चों को मरने तक प्रताड़ित किया जा रहा है।” उन्होंने कहा कि श्रमिकों को सामाजिक सुरक्षा कार्ड नहीं मिले हैं और सरकार को इसका संज्ञान लेना चाहिए।

हथिनी की मौत के बाद ऑल्टन्यूज ने मुस्लिम आरोपितों को बचाने की कोशिश में किए खबर में कई बदलाव

केरल में गर्भवती हथिनी की मौत के मामले की जाँच तेज हो गई है। पुलिस ने जानकारी दी है कि मामले के दो आरोपित अभी भी फरार हैं। पलक्कड़ पुलिस अधीक्षक जी शिवा विक्रम ने फरार होने वाले लोगों के नाम अब्दुल करीम और उसका बेटा रियासुद्दीन बताया है। दोनों ही अंबालाप्पारा के निवासी हैं।

दरअसल, दोनों के उस संपत्ति के मालिक होने का संदेह है, जहाँ से आरोपित पी विल्सन को गिरफ्तार किया गया है। इस मामले में दो प्राथमिकी दर्ज की गई है। एक पुलिस ने जबकि दूसरी प्राथमिकी वन विभाग द्वारा दर्ज कराई गई है।

आरोपितों के नाम सामने आने पर ऑल्टन्यूज़ की बदलती ‘डेवलपिंग स्टोरी’

गर्भवती हथिनी की मौत की खबरों से एक ओर देशभर में आक्रोश का माहौल था, तो दूसरी तरफ ऑल्ट न्यूज़ जैसे कुछ फैक्ट चेकर बस एक ऐसे मौके के इन्तजार में थे, जिसके जरिए किसी ना किसी तरह से इस घटना का सम्बन्ध हिन्दू आस्था से जोड़कर उन्हें बदनाम किया जा सके। ये वही ऑल्टन्यूज़ हैं, जिन्होंने 7 दिन तक अरबीना खातून की मौत पर प्रपंच गढ़ते हुए यह साबित करने का हर प्रयास किया कि उनकी मौत का कारण भारतीय रेलवे है। ऑल्टन्यूज़ ही नहीं बल्कि बॉलीवुड के प्रगतिशीलों ने भी फ़ौरन इस हथिनी की मौत के लिए ‘गणेश को पूजने वाले हिन्दुओं’ की आस्था से जोड़ने का काम किया।

हालाँकि, हुआ यह कि जल्द ही, खबरें सामने आईं कि अपराधियों का संबंध मुस्लिम समुदाय से था और यह बात तब सामने आई जब इस्लामिक प्रचार वेबसाइट ऑल्टन्यूज़ ने कहानी को तोड़ने और अपराधियों को अपनी विचारधारा के स्वरूप में ढालने के लिए हमेशा की ही तरह एक ‘डिबंक’ करता ‘फैक्ट चेक’ प्रकाशित किया।

इस मामले में ऑल्टन्यूज़ द्वारा किए गए दो ‘फैक्ट-चेक’ सामने आए। एक केरल जिले के बारे में था, जहाँ यह घटना हुई थी, और दूसरा, सोशल मीडिया पर प्रसारित होने वाले मुस्लिम अपराधियों के नामों का फैक्ट चेक करने वाला! दोनों फैक्ट चेक बेहद भ्रामक और फर्जी थे, जिन्हें एक-एक कर विस्तार से यहाँ बताया जा रहा है –

ऑल्टन्यूज़ के 2 सनसनीखेज फैक्ट चेक, जो अभी भी ‘डेवलपिंग स्टोरी’ हैं

यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि ये दोनों फर्जी और भ्रामक फैक्ट चेक अभी भी ऑल्टन्यूज वेबसाइट पर हैं और अपने ‘होम पेज’ पर प्रमुखता से प्रदर्शित किए जा रहे हैं, और ये रिपोर्ट लिखे जाने तक भी ‘फ़ीचर पोस्ट’ के तौर पर बरकरार है।

ऑल्टन्यूज़ का होम पेज

ऑल्टन्यूज़ का पहला फैक्ट चेक – मल्लापुरम नहीं पलक्कड़, मुस्लिमों को बदनाम करने का प्रयास

ऑल्टन्यूज़ का पहला फैक्ट चेक तब सामने आया जब मेनका गाँधी द्वारा केरल के मुस्लिम बहुल जिले मल्लापुरम को लेकर एक नोट जारी किया, जिसमें कहा गया था कि केरल के मुस्लिम बहुल जिले मल्लापुरम में पशु क्रूरता के मामले देखे गए हैं और बार-बार अनुरोध करने के बाद भी कोई कार्रवाई नहीं की गई है।

इस पर ऑल्टन्यूज़ ने इस जानकारी का फैक्ट चेक करते हुए कहा कि यह घटना वास्तव में पपलक्कड़ में हुई थी और मल्लापुरम का नाम केवल मुस्लिम समुदाय को निशाना बनाने के लिए सामने लाया जा रहा है।

इस तथाकथित फैक्ट चेक में ऑल्टन्यूज़ ने लिखा कि भारत में अधिकांश मामलों की तरह ही इस घटना में भी मुस्लिमों के खिलाफ माहौल बनाने का प्रयास किया गया है।

इस रिपोर्ट में, ऑल्टन्यूज़ ने केरल के वन मंत्री और मुख्यमंत्री के हवाले से कहा कि यह घटना पलक्कड़ में हुई है। हालाँकि, यह जानकारी सही है, ऑल्टन्यूज़ ने बेशर्मी के साथ यह दावा किया कि मल्लापुरम जिले का नाम लाने की वजह से मुस्लिमों की छवि को नुकसान पहुँचा है।

ऑल्टन्यूज़ द्वारा यह ‘फैक्ट चेक’ जून 04, 2020 को प्रकाशित किया गया था और कल तक भी इसमें किसी को कुछ भी गलत नजर नहीं आता, सिवाए इसके कि ऑल्टन्यूज़ ने इसके जरिए भरपूर कोशिश की कि हिन्दू मुस्लिमों से नफरत करते हैं। हालाँकि बाद में पता चला कि आरोपित मूल रूप से मल्लापुरम जिले का निवासी था और रबर की खेती का काम करता था। यहाँ पर समस्या यह है कि इस रिपोर्ट की वास्तविकता सामने आने के बाद भी यह रिपोर्ट लिखे जाने तक अपडेट नहीं किया गया है।

5 जून को जिसे गिरफ्तार किया गया, वह अपराधी एक पी विल्सन था और अन्य दो, जो फरार हो गए थे, उनकी पुष्टि दो मुस्लिम व्यक्तियों – अब्दुल करीम और बेटे रियासुद्दीन के रूप में की गई थी।

अब चूँकि, ऑल्टन्यूज़ द्वारा पहले यह माहौल तैयार करने का प्रयास किया गया कि इस खबर में मुस्लिमों का नाम लेकर मुस्लिमों को निशाना बनाया जा रहा है, तो उसी तर्क के साथ अब ऑल्टन्यूज़ को यह माफ़ी माँगते हुए अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से इस बात का भी जिक्र करना चाहिए कि उनका पहला फैक्ट चेक एकदम बेबुनियाद और कल्पना पर आधारित था, जिसमें उन्होंने कहा कि मुस्लिमों को निशाना बनाने के लिए यह खबर चलाई जा रही है, क्योंकि अब जो आरोपित सामने आए हैं, दुर्भाग्य से वह मुस्लिम ही हैं।

दूसरा फैक्ट चेक – मुस्लिम आरोपितों के नाम सामने आने पर ऑल्टन्यूज़ की धूर्तता

जैसे ही उस मामले ने तूल पकड़ा और यह प्रकरण आगे बढ़ा, 5 जून को, कई व्यक्तियों ने ट्वीट कर जानकारी दी कि हथिनी की मौत के जघन्य अपराध के लिए जिन दो अपराधियों को गिरफ्तार किया गया था, वे दो व्यक्ति अमजथ अली (Amzath Ali) और थामीम शेख (Thamim Shaikh) थे। इस सूचना के बारे में सबसे पहले ट्वीट करने वालों में से एक केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण राज्य मंत्री के मीडिया सलाहकार अमर प्रसाद रेड्डी थे।

यह खबर सामने आते ही ऑल्टन्यूज़ ने फ़ौरन नया ‘फैक्ट चेक’ जारी किया, जिसका शीर्षक था – “केरल हथिनी की मौत के बारे में अमजथ अली और थामिम शेख की गिरफ्तारी को लेकर झूठा दावा।” इस फैक्ट चेक की शुरुआत में लिखा गया कि भारतीय मुस्लिमों को निशाना बनाने के लिए यह खबर अब अलग मुद्दा बन गई है जो कि ‘भारतीय मुस्लिमों को निशाना बनाने’ को लेकर है।

ऑल्टन्यूज़ का फैक्ट चेक

दिलचस्प बात यह है कि अपराधियों में से 2 के मुस्लिम होने के बाद, इस लाइन को उनके ‘फैक्ट चेक’ में से चुपके से हटा दिया गया है। पूरे फैक्ट चेक के बाद अंत में दावा किया गया कि इस अपराध में कोई ‘मुस्लिम एंगल’ नहीं था, और ऑल्टन्यूज़ ने चुपचाप अपनी रिपोर्ट को ‘अपडेट’ कर दिया।

ऑल्टन्यूज़ ने अब ये लाइन चुपचाप डिलीट कर दी है

और जैसा कि आप यहाँ पर संलग्न स्क्रीनशॉट में देख सकते हैं – ऑल्टन्यूज़ ने रिपोर्ट के आखिर में लिखा है कि रबर का कारोबार करने वाले अब्दुल करीम और उसके बेटे रियासुद्दीन, जो कि इस आरोप में ‘संदिग्ध’ हैं, की जानकारी के साथ यह अपडेट कर दी गई है, जैसा कि पुलिस का भी बयान है।

ऑल्टन्यूज़ अभी भी अपने इस दावे पर खड़ा है कि इसमें मुस्लिम नजरिए जैसी कोई बात नहीं थी और यह मुस्लिमों को निशाना बनाने के लिए गढ़ी गई, साथ ही यह भी रिपोर्ट को ‘डेवलपिंग स्टोरी’ बताते हुए खत्म किया है।

ऑल्टन्यूज़ की 5 दिन से रोजाना डेवलप होती स्टोरी

इस अपराध में मुस्लिम आरोपितों के नाम सामने आने के बावजूद भी ऑल्टन्यूज की हेडलाइन अभी पूर्ववत और भ्रामक ही हैं, जो कि यही सन्देश देती नजर आती हैं कि मुस्लिमों का इस केस से कोई सम्बन्ध नहीं है।

ऑल्टन्यूज़ के साथ समस्या कहाँ पर है

ऑल्टन्यूज़ अपने चुनिन्दा मुद्दों पर यह कहने से पीछे नहीं हटता है कि उन्होंने पुलिस से बात की। यहाँ भी उन्होंने कुछ ऐसा ही काम कर चतुराई दिखाने की कोशिश करते हुए लिखा कि उन्होंने पलक्कड़ के पुलिस अधीक्षक जी शिवा विक्रम से बात की। ऑल्टन्यूज़ ने कहा कि अपराधियों के मुस्लिम होने का दावा फर्जी है और इस मामले में एक पी विल्सन को गिरफ्तार किया गया था।

हालाँकि, संदिग्धों के नाम अब्दुल करीम और उसके बेटे रियासुद्दीन के नाम सामने आने के बाद, ऑल्टन्यूज़ ने इस पैराग्राफ को बरकरार रखते हुए एक और जोड़ा – “मलयालम न्यूज़ स्रोत मातृभूमि और जन्मभूमि का कहना है कि रबर प्लान्टेशन के मालिक, जहाँ विल्सन काम करता है, भी इस मामले में संदिग्ध हैं। अब्दुल करीम और रियासुद्दीन अभी फरार हैं और यह जानकारी भी हमें पुलिस अधीक्षक जी शिवा विक्रम ने दी है।”

यह भाग ऑल्टन्यूज़ ने बाद में जोड़ा है

पुलिस के बयानों पर चुनिन्दा सहमति

अब यहाँ पर यह पूरी तरह से संभव है कि जब ऑल्टन्यूज़ ने पहले पुलिस अधिकारी से बात की, तो पुलिस अधिकारी ने कहा होगा कि या तो वह इन नामों की पुष्टि नहीं कर सकते हैं या फिर अभी तक ‘अमजथ अली’ और ‘थामिम शेख’ नाम सामने नहीं आए हैं।

या फिर यह भी हो सकता है कि पुलिस अधिकारी ने उनसे कहा हो कि वो अभी इन खबरों के बारे में कुछ भी स्पष्ट नहीं कह सकते और जो नाम सामने आ रहे हैं, वह फेक भी हो सकते हैं। हालाँकि, इस्लामिक विचारधारा के समर्थक ऑल्टन्यूज़ के पुराने रिकॉर्ड को देखकर यह कहा जा सकता है कि उन्होंने मुस्लिम समुदाय के नाम सामने आने की वजह से पुलिस के बयान से ही छेड़छाड़ कर दी हो।

अब यह कहा जा सकता है कि ऑल्ट न्यूज़ द्वारा किए गए दोनों फैक्ट चेक कम से कम मूल आधार पर सही पाए गए हैं। पहले में, यह घटना पलक्कड़ में हुई थी, न कि मल्लापुरम में और दूसरी में, कि अपराधी के नाम वास्तव में अमजथ अली और थामीम शेख नहीं थे (लेकिन वास्तव में अब्दुल करीम और उसका बेटा रियासुद्दीन थे)।

हालाँकि, ऑल्टन्यूज़ का यह दावा कि यह घटना सिर्फ मुस्लिमों को निशाना बनाने के लिए सामने लाई जा रही है, अभी भी झूठ है और ऑल्टन्यूज़ द्वारा सिर्फ मुस्लिम अपराधियों को सुरक्षा कवच और विक्टिम कार्ड देने के उद्देश्य से ही कही गई। यही बात उनके फैक्ट चेक के हेडलाइन और एक्सर्पट से भी जाहिर होती है।

इस सबके बीच एक महत्वपूर्ण बात यह है कि ऑल्टन्यूज़ दावा करता है कि वह फैक्ट चेकर यानी, तथ्यों की जाँच करने वाली वेबसाइट हैं, जबकि उनके कारनामों से यही सन्देश मिलता है कि वह सिर्फ और सिर्फ इस्लामिक अपराधियों को बचाने के लिए तथ्यों को जरूरत के अनुसार ढालने और उन्हें तोड़-मरोड़कर पेश करने वाली वेबसाइट से ज्यादा और कुछ भी नहीं हैं और यह साबित करने के लिए ऑल्टन्यूज़ की रोजाना अपडेट हो रही यह ‘डेवलपिंग स्टोरी’ ही काफी है कि वह वास्तविकता के साथ कितना बैर रखते हैं।

NDTV भी ‘डेवलपिंग स्टोरी’ की तर्ज पर ही बदल रहा है हेडलाइन

ऐसा ही कुछ कारनामा NDTV की हेडलाइन भी करती देखी जा सकती हैं, जिन्होंने इस पूरी स्टोरी को रोजाना नई जानकारियों के सामने आने पर बेहद धूर्तता से पहले ‘हथिनी को पटाखों से भरा अनानास खिलाया’ गया से लेकर ‘हथिनी ने पठाखों से भरा अनानास खाया’ तक में तब्दील कर दिया।

ऑपइंडिया को पुलिस से डराना: ‘प्रेस स्वतंत्रता’ टुटपुँजिया वामपंथी पत्रकारों या बड़ी संस्थाओं की बपौती नहीं

‘प्रेस स्वतंत्रता’ टुटपुँजिया वामपंथी पत्रकारों या बड़े संस्थानों के बाप की जागीर नहीं है, कि जब चाहे पुलिस लगा दो! वो मेरी और ऑपइंडिया की भी है, टाइम्स ऑफ इंडिया पत्रकार की भी है, और अगर ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ जोड़ दें तो, सड़क किनारे भुट्टा बेचते छोटे व्यापारी की भी है।

किसी भी राज्य की पुलिस, हमारे पीछे अपनी राजनैतिक मजबूरियों के कारण भले ही लग जाए, लेकिन वो हमसे खबरें डिलीट नहीं करवा सकते। कानूनी रूप से लड़ोगे, हम पहले से ज्यादा तैयार हैं। हम यहाँ टिकने आए हैं, खबरें डिलीट करने नहीं।

न ही हम ‘अभी ‘फलाँ पत्रकार’, ‘स्कोडा गिल्ड’ का गुप्ता चुप क्यों है’ वाली बातें कहेंगे क्योंकि वो बेकार की बातें हैं। ये नंगे लोग नहाएँगे क्या, और निचोड़ेंगे क्या! हमें इनसे न तो उम्मीद है, न ही उन्हें इस लायक समझते हैं कि वो हमारा प्रतिनिधित्व करें। हम अपने प्रतिनिधि स्वयं हैं।

और हमारे ‘टिकने’ से मतलब है कि हम यहाँ ठहरेंगे, अपना आकार बदलेंगे और पत्रकरिता की दिशा और दशा तय करेंगे। हमने ‘समुदाय विशेष’ की नौटंकी बंद करवा दी है, और बाकियों ने अपराधियों का नाम लेना शुरु कर दिया है। अभी और भी बहुत कुछ बदलेगा

बात यह नहीं है कि हम पर सुप्रीम कोर्ट के वकीलों से ले कर राजनैतिक पार्टियों के नेताओं, इस्लामी कट्टरपंथियों और नक्सलियों ने खुजली वाले, केसविहीन कुत्तों के झुंड की तरह हम पर हमला बोला है, वो तो करेंगे ही क्योंकि उनकी नग्न चमड़ी हमने ही झुलसाई है। बात यह है कि भौंकना उनकी प्रकृति है और हमारी प्रकृति है सप्तबाण संधान से उनका मुख बंद करना।

यह समझना कठिन नहीं है एक ट्वीट पर पुलिस संज्ञान क्यों लेती है, और बिना कोर्ट में केस ले जाए, सीधे एक खबर को डिलीट करने का निर्देश (आदेश के लहजे में कि हम पुलिस बोल रहे हैं) दे देती है। मीडिया और सोशल मीडिया के बीच की क्षीण होती भित्ति के कारण, निजी भी सार्वजनिक हो चुका है। अतः कोई हिन्दूघृणा बेचेगा/बेचेगी, तो हम उस पर मुखर हो कर लिखेंगे।

ऑपइंडिया (अंग्रेजी) की सम्पादिका नुपुर शर्मा का ट्वीट

सैकड़ों सालों से दबाई जाती आवाजें एक पूरी जनसंख्या के रूप में गूँगी रह कर सहने को विवश होती रही है। पत्रकारिता के मानदंड वो तय नहीं करेंगे जिन्होंने इतिहास और संस्कृति का शीलहरण किया है। ऐसे हर मानदंड हम तोड़ेंगे क्योंकि वो जनभावना के विरोध में है। एक को प्राथमिकता, दूसरे को नीची निगाह… ये बंद होना चाहिए।

सलमान को ‘रमेश (बदला हुआ नाम)’ कह कर उसके बलात्कार को हिन्दुओं के ऊपर फेंकना, दूसरे मजहब के आलिम के लिए हिन्दू ‘तांत्रिक’ जैसे शब्द और भगवा वस्त्रों वाला कार्टून लगा कर किस तरह की प्रस्तुति हो रही है पत्रकारिता की? क्या हम यह दिखाना चाहते हैं कि एक मजहब अपराध नहीं करता?

या वो यह जताना चाहते हैं कि उनके द्वारा किए गए अपराधों पर लिखना निषिद्ध है? नहीं, उन सबके नाम लिखे जाएँगे, उनके द्वारा किए गए अपराधों का वर्णन ऐसे होगा कि आपके सामने वो चलचित्र बन कर उभरे, उसके ‘लव जिहाद’, ‘रेप जिहाद’ और बाकी अपराधों को आप देख-समझ पाएँगे। सामाजिक अपराध को सामाजिक अपराध कहेंगे और मजहबी को मजहबी।

डरने से तो हम रहे, तुम लार टपकाते लकड़बग्घों का झुंड बन कर आते रहो… हम शिकार के लिए बैठे हैं क्योंकि तुम्हारे लिए हमने जो लैंडमाइन लगाए हैं, वो विस्फोटक नहीं, सामान्य लोगों की खुली आँखें हैं। वो तुम्हारी नग्नता को देखेंगे, और बचे-खुचे वस्त्र भी हर लेंगे। बाकी काम हम अपने पत्रकारिता का हैलोजैन जला कर कर देंगे।

सड़क पर चलते पत्रकार को सत्तारूढ़ नेताओं ने भी गोली मरवाई है, कट्टरपंथियों ने भी हमले किए हैं, इनबॉक्स में धमकियाँ भी आती हैं… लेकिन पत्रकारिता रुक जाएगी क्या? उँगलियों की अंतिम हलचल तक लेख लिखे जाते रहेंगे, होंठों की आख़िरी ज़ुम्बिश तक हम बोलते रहेंगे।

पत्रकारिता ‘ब्लू टिक’ वाली संस्थाओं या व्यक्तियों के सत्यापन का मोहताज नहीं। जिसके पास लिखने की क्षमता है, जो बोल सकता है, वो पत्रकार है। जो विसंगतियों पर बोलता/लिखता है, वृहद् समाज तक ले जाता है, वो पत्रकार है। ट्विटर-फेसबुक माध्यम हैं, और गूँगे बना दिए गए लोगों की स्वरतंत्री है।

ले आओ… कानूनी शब्दावली से भरे दस्तावेज ले कर आओ… हमें डराओ, धमकाओ, पुलिस स्टेशन में बारह घंटे बिठाओ, हमारे परिवार को परेशान करो… फर्क नहीं पड़ता क्योंकि हमें जो पढ़ते हैं, सुनते हैं, वो जानते हैं कि क्या हो रहा है। तुम न्याय व्यवस्था का प्रयोग कर हमें डराने में व्यस्त रहो, हम उसी व्यवस्था के सहारे जीतेंगे।

केजरीवाल सरकार के दो विरोधाभासी आदेशों ने कोरोना को लेकर सर गंगाराम अस्पताल के डॉक्टरों के लिए खड़ी की मुसीबत

दिल्ली में कोरोना वायरस के बढ़ते सक्रिय मामलों के बीच, राज्य सरकार ने कथित तौर पर दो विरोधाभासी आदेश जारी किया। जिसकी वजह से सर गंगाराम अस्पताल के डॉक्टरों के लिए मुसीबत खड़ी हो गई है।

3 जून को, अरविंद केजरीवाल की अगुवाई वाली दिल्ली सरकार ने कथित तौर पर अस्पताल को आदेश दिया था कि वह ICMR के दिशानिर्देशों की धज्जियाँ उड़ाते हुए कोरोना वायरस संक्रमितों का टेस्ट करना बंद कर दे।

नोटिस में लिखा था, “जिले को पता चला है कि अस्पताल आज भी RT, PCR ऐप का उपयोग नहीं कर रहा है। अस्पताल को यह बताने के लिए निर्देशित किया जाता है कि उन्होंने आदेश की प्राप्ति के दो दिनों के बाद भी RT PCR ऐप के माध्यम से सैंपल इकट्ठा करना शुरू क्यों नहीं किया है। कोरोना वायरस संदिग्ध / पुष्टि के मामलों के लिए RT PCR सैंपलिंग को तत्काल प्रभाव से रोका जाना चाहिए।”

उसी दिन, दिल्ली सरकार ने एक और घोषणा की कि 675 बेड वाले सर गंगाराम हॉस्पिटल को कोरोना वायरस मरीजों के इलाज के लिए 80 प्रतिशत बेड आरक्षित करने होंगे। डॉक्टरों का कहना है कि एक तरफ कोरोना संक्रमितों का टेस्ट करने से मना करना और दूसरी तरफ उनके इलाज के लिए बेड की संख्या बढ़ाना विरोधाभासी आदेश है, जिसकी वजह से काफी मुश्किलें हो रही हैं।

सर गंगा राम अस्पताल में मेडिकल ऑन्कोलॉजिस्ट और बोन मैरो ट्रांसप्लांट विशेषज्ञ डॉ श्याम अग्रवाल ने बताया कि उनके पास कैंसर के मरीज के लगातार फोन आ रहे हैं, जिन्हें कीमोथैरेपी दी जानी है। उन्होंने बताया, “हमने यह सुनिश्चित किया है कि उन्हें हर दो सप्ताह में एक बार कोरोना वायरस परीक्षण कराना चाहिए क्योंकि कोविड पॉजिटिव वाले रोगी पर कीमोथैरेपी विनाशकारी हो सकती है। हमने उन्हें बताया है कि यदि परीक्षण नहीं किया जाता है, तो यह (कीमोथैरेपी) उनके लिए हानिकारक हो सकता है।”

अग्रवाल को कैंसर मरीजों ने बताया कि कई लैब ने टेस्ट करना बंद कर दिया है। ऐसे में वो अपना टेस्ट कहाँ पर करवाएँ? इस तरह दिल्ली सरकार के आदेश की वजह से कैंसर के मरीज बिना इलाज के रहने को मजबूर हैं।

बुधवार को हॉस्पिटल के लैब में कोरोना वायरस टेस्ट के लिए 174 सैंपल एकत्र किए गए थे। टेस्ट बंद होने से पहले अस्पताल में प्रतिदिन 150 से 170 सैंपलों का टेस्ट हुआ करता था। वहीं डॉक्टरों के मुताबिक एक दिन में लगभग 30-40 सर्जरी की जाती थी। मगर गुरुवार से टेस्ट के साथ सर्जरी भी बंद हो गई। सब कुछ ठप हो गया है।

डॉ अग्रवाल ने एक ब्रेस्ट कैंसर रोगी की कहानी सुनाई, जिसे न चाहते हुए भी सरकारी आदेश की वजह से उन्हें छुट्टी देनी पड़ी। उन्होंने स्वीकार किया कि गुरुवार को महिला का ऑपरेशन होना तय था। मगर आवश्यक टेस्ट किए बिना उस ऑपरेशन को नहीं किया जा सकता था। इसलिए ऑन्कोलॉजिस्ट को उनके परिवार को सरकारी आदेश के बारे में समझाना पड़ा और यह जानने के बावजूद कि कैंसर फैल सकता है, रोगियों को छुट्टी देनी पड़ी। उन्होंने बताया कि पिछले 2 दिनों में तीन रोगियों की सर्जरी को इसी तरह से स्थगित किया गया।

सर गंगा राम अस्पताल में बाल रोग विशेषज्ञ ने कहा, “अगर हम बिना टेस्ट के मरीज को कोरोना वायरस पॉजिटिव मानकर इलाज करते हैं, तो मरीज के इलाज में पर्याप्त सुरक्षा (पीपीई, अलग डॉक्टर, समर्पित नर्सों के साथ एक अलग वार्ड) के लिए लाखों का खर्चा होगा और अगर मैं उसे अन्य कोरोना वायरस रोगियों के साथ रखता हूँ, तो यह मासूम बच्चा उनसे संक्रमित हो सकता है।”

सर गंगाराम अस्पताल से जुड़े 40 बेड वाले कोलमेट और 140 बेड वाले सिटी हॉस्पिटल को पहले ही कोरोना संक्रमित मरीजों के इलाज के लिए परिवर्तित कर दिया गया है। सरकारी आदेश के अनुसार, सर गंगाराम अस्पताल में केवल 20% बेड गैर-कोरोना वायरस रोगियों के लिए उपलब्ध हैं।

दिल्ली सरकार के एक प्रवक्ता ने दावा किया था कि 35 मान्यता प्राप्त ICMR प्रयोगशालाओं में से 8 आधिकारिक दिशानिर्देशों की धज्जियाँ उड़ाते हुए पाए गए थे। जिसके बाद उनके खिलाफ अस्थायी रुप से कार्रवाई की गई थी। इन प्रयोगशालाओं को व्यक्तिगत सैंपल नहीं लेने का निर्देश दिया गया था। हालाँकि, उन्होंने स्पष्ट किया कि अस्पतालों द्वारा भेजे गए नमूने को मान्यता प्राप्त प्रयोगशालाओं में संसाधित किया जाना जारी है।

जब डॉक्टरों द्वारा उठाए गए मुद्दे पर दिल्ली सरकार के प्रवक्ता से पूछा गया तो उन्होंने कहा, “दिल्ली में ICMR द्वारा अधिकृत दिल्ली में 35 लैब हैं। इनमें से आठ प्रयोगशालाओं में ICMR द्वारा निर्धारित प्रोटोकॉल का पालन नहीं किया गया था। इसलिए कार्रवाई शुरू की गई। एक अस्थाई उपाय के रूप में, इन प्रयोगशालाओं को व्यक्तिगत नमूने नहीं लेने के लिए कहा गया है। हालाँकि, विभिन्न अस्पतालों और अन्य एजेंसियों द्वारा भेजे गए नमूनों को इन प्रयोगशालाओं में संसाधित किया जाएगा।”

अपने बचाव में, सर गंगा राम अस्पताल के अध्यक्ष ने कहा कि प्रबंधन ने सरकार के नोटिस का जवाब दिया था और दोहराया कि यह एक मामूली मुद्दा था। उन्होंने जोर दिया कि टेस्ट सेवाओं को बहुत जल्द फिर से शुरू किया जाएगा।

ज्योतिरादित्य सिंधिया ने ट्विटर बॉयो से नहीं हटाया ‘BJP’, जानें क्या है सच

ब्रेकिंग न्यूज की बेतहाशा दौड़ में अक्सर मेनस्ट्रीम मीडिया गलत खबरों को उछाल देती है। ऐसा ही एक मामला फिर सामने आया है। शनिवार (जून 6, 2020) को मेनस्ट्रीम मीडिया ने ज्योतिरादित्य सिंधिया, जो कि पहले कॉन्ग्रेस में थे और बाद में बीजेपी में शामिल हो गए, को लेकर ‘खबर’ चलाई कि उन्होंने अपने ट्विटर बॉयो से बीजेपी हटा लिया है।

कई मेनस्ट्रीम मीडिया चैनलों ने इस खबर को चलाया। TimesNow और Financial Express ने इस खबर को प्रमुखता से उठाया। यह लेख भाजपा के अंदरुनी खेमे में दरार की अटकलों से भरा पड़ा था।

TimesNow article about Scindia’s Twitter profile
Financial Express article about Scindia’s Twitter profile

न्यूज ट्रैक नाम के न्यूज पोर्टल तो यहाँ तक कह दिया कि ज्योतिरादित्य सिंधिया फिर से कॉन्ग्रेस में शामिल हो सकते हैं।

Article by News Track

हालाँकि, ये खबर गलत है। ऐसा लगता है जैसे मीडिया ने आज सुबह ही उठकर ज्योतिरादित्य सिंधिया के ट्विटर प्रोफाइल को बेतरतीब ढंग से जाँचने का फैसला किया और ‘BJP’ शब्द नहीं मिलने पर इसके आधार पर एक कहानी बनाई, जो बेबुनियाद है।

सच यह है कि बीजेपी में शामिल होने के बाद भी, ज्योतिरादित्य सिंधिया ने अपने ट्विटर बॉयो में कभी भी ‘BJP’ शब्द नहीं जोड़ा। ज्योतिरादित्य सिंधिया के ट्विटर बॉयो के वेब आर्काइव में जाने पर बातें खुद ब खुद स्पष्ट हो जाती हैं।

ऑपइंडिया ने सच्चाई का पता लगाने के लिए उनके बॉयो के आर्काइव वर्जन को सर्च किया। इसमें पाया गया कि जब उन्होंने बीजेपी ज्वाइन की थी, तब भी उन्होंने अपने ट्विटर बॉयो में ‘बीजेपी’ का उल्लेख नहीं किया था।

यहाँ पर सिंधिया के ट्विटर प्रोफाइल का 17 मई के आर्काइव का स्क्रीनशॉट है, जिसमें देखा जा सकता है कि उनके ट्विटर बॉयो में बीजेपी का जिक्र नहीं है।

Archive of Twitter profile of Jyotiraditya Scindia

9 मई को भी उनके ट्विटर बॉयो में बीजेपी नहीं है।

Archive of Twitter profile of Jyotiraditya Scindia

गौरतलब है कि ज्योतिरादित्य सिंधिया 12 मार्च को बीजेपी में शामिल हुए थे।

जब हम 7 मार्च से लेकर 22 मार्च तक उनके ट्विटर प्रोफाइल में हुए परिवर्तन पर गौर करते हैं तो पाते हैं कि इस बीच उनका डिस्प्ले पिक्चर चेंज हुआ है। जब वो कॉन्ग्रेस में थे तो उन्होंने कॉन्ग्रेस पार्टी के गमछे वाला फोटो लगाया था और बीजेपी में शामिल होने के बाद यह पार्टी के अनुसार बदल गया। बीजेपी में शामिल होने के ठीक बाद भी उनके ट्विटर बॉयो में उनके बीजेपी से एसोसिएशन का उल्लेख नहीं किया गया था।

Twitter profile of Scindia on 7th March and 22nd March

इस प्रकार यह निष्कर्ष निकलता है कि ज्योतिरादित्य सिंधिया ने अपने ट्विटर बॉयो से बीजेपी नहीं हटाया है, क्योंकि उन्होंने शुरुआत से कभी इसे अपनी ट्विटर बॉयो में जोड़ा ही नहीं।

बता दें कि यह पहली बार नहीं है, जब सिंधिया के ट्विटर बॉयो को लेकर कयास लगाए जा रहे हैं। इससे पहले दिसंबर 2019 में उन्होंने अपने ट्विटर बॉयो से कॉन्ग्रेस का नाम हटाकर पार्टी छोड़ने की अटकलों को हवा दी थी। सिंधिया के पहले के ट्विटर बॉयो में लिखा था कि वह 2002 से 2019 तक गुना के पूर्व सांसद थे। यह भी लिखा था कि वे पूर्व ऊर्जा मंत्री, वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय और MoS कम्युनिकेशन्स, IT विभाग के मंत्री थे। मगर बाद में सिंधिया ने बॉयो से इन जानकारियों को हटाते हुए सिर्फ “लोक सेवक, क्रिकेट में दिलचस्पी रखने वाला” रखा था।

1 सप्ताह में 7 हिन्दू लड़कियों का अपहरण कर जबरन कराया इस्लाम कबूल: पाक के सिंध में अल्पसंख्यक बेहाल

पाकिस्तान के सिंध में एक और लड़की के जबरन इस्लाम कबूल कराने का मामला सामने आया है। ये घटना सिंध के नयनकोट क्षेत्र स्थित शाह लतीफ़ कॉलनी में गुरुवार (जून 4, 2020) को हुई। स्थानीय रिपोर्ट्स के अनुसार, वहाँ के कुछ युवक हथियारों के साथ जबरन पीड़ित युवती के घर में घुस गए और उसका अपहरण कर लिया। पीड़िता का नाम प्रियंका कुमारी है, जिसके परिवार को बन्दूक की नोंक पर धमकाया गया।

प्रियंका कुमारी के परिवार द्वारा दिए गए बयान के अनुसार, कलीम शाह अपने हथियारबंद दोस्तों के साथ आया और प्रियंका को अगवा कर के ले गया। पिछले एक सप्ताह में पाकिस्तान के सिंध प्रान्त में सातवीं ऐसी घटना है, जहाँ किसी हिन्दू लड़की का इस तरह से जबरन इस्लामी धर्मान्तरण के लिए अपहृत कर लिया गया। अधिवक्ता और एक्टिविस्ट राहत ऑस्टिन ने सोशल मीडिया पर इस मुद्दे को उठाया। अब तक सिंध पुलिस का इस मामले में कोई बयान नहीं आया है।

इससे पहले (सोमवार) को सिंध में तीन हिन्दू लड़कियों का अपहरण करके उनका जबरन इस्लामी धर्मान्तरण कर दिया गया था और साथ ही जबरदस्ती निकाह भी करा दिया गया था। 24 घंटे के भीतर तीन अलग-अलग जगहों से ये घटनाएँ सामने आई थीं। इनमें से दो मामले तांडो मोहम्मद खान जिले से आए थे। वहाँ मजहबी युवकों ने शिवानी नाम की हिन्दू लड़की का अपहरण किया था। इसके बाद संतारा नाम की एक 15 वर्षीय नाबालिग का भी अपहरण किया गया।

पाकिस्तान के सिंध में हिन्दू लड़की के अपहरण का एक और मामला

इन दोनों को एक मौलवी द्वारा इस्लाम कबूल करवाया गया और साथ ही युवकों से इनका निकाह भी करा दिया गया। इनमें से तीसरा मामला मीरपुरखास का था। वहाँ भी भगवंती नाम की एक हिन्दू युवती का जबरन इस्लाम में धर्मान्तरण करा के एक युवक के साथ निकाह करा दिया गया। भगवंती के पिता को स्थानीय कट्टरपंथियों ने धमकी थी कि अगर उन्होंने अपनी बेटी को वापस लाने के लिए किसी भी प्रकार का प्रयास किया तो उसे मार डाला जाएगा।

भगवंती के पिता ने बताया कि स्थानीय लोगों ने उन्हें धमकाते हुए कहा कि एक बार अगर किसी ने इस्लाम अपना लिया तो फिर उसके द्वारा दोबारा फिर पुराने धर्म को स्वीकार करने का एक ही दंड है और वो है सज़ा-ए-मौत। इसी जिले में आयशा नाम की एक युवती के साथ भी इसी तरह का व्यवहार किया गया। उसके पिता कृष्ण मेघवाड ने बताया कि समारो के अयूब जन सरहंदी दरगाह पर जबरन ले जाकर इस्लाम कबूल करा दिया गया।

ये घटना मिरवाह गोर्चानी इलाके में हुई। न सिर्फ हिन्दू बल्कि इसाई और सिख लड़कियों को भी पाकिस्तान में बड़े पैमाने पर निशाना बनाया जा रहा है। कुछ लोगों का ये भी कहना है कि जिस तरह से ये घटनाएँ इतनी योजनाबद्ध तरीके से हो रही है, उसके पीछे कोई बड़ी साजिश भी हो सकती है। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान सोशल मीडिया पर अल्पसंख्यक हितों की बात करते हैं, जो अब तक सिर्फ़ दिखावा ही साबित हुआ है।

पाकिस्तान मानवाधिकार आयोग ने 335 पन्नों की 2018 में मानवाधिकार की स्थिति रिपोर्ट में कहा था कि अकेले 2018 में सिर्फ सिंध प्रांत में ही हिन्दू एवं ईसाई लड़कियों से संबंधित अनुमानित 1000 मामले सामने आए। इस रिपोर्ट के बाद पाकिस्तान सरकार ने इस बारे में कोई कार्रवाई नहीं की थी।

समाज सुधारकों से भी ऊपर थीं इंदिरा गाँधी, उनके और सावरकर के बीच कोई तुलना नहीं: कॉन्ग्रेस नेता सिद्धारमैया

कर्नाटक में नए फ्लाईओवर के नामकरण को लेकर चल रहे सियासी खींचतान के बीच पूर्व मुख्यमंत्री और कॉन्ग्रेस विधायक दल के नेता सिद्धारमैया ने पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गॉंधी को शरणा (Sharanas) जैसे समाज सुधारकों से भी बड़ा बताया है। स्वतंत्रता सेनानी और हिंदुत्व विचारक वीर सावरकर के नाम का विरोध करते हुए उन्होंने यह बात कही।

सिद्धारमैया ने पिछले हफ्ते कन्नड़ समाचार चैनल टीवी 9 को दिए इंटरव्यू में कोरोना वायरस महामारी से लेकर इस संकट पर मोदी सरकार की प्रतिक्रिया समेत तमाम मुद्दों पर बात की।

इंटरव्यू के दौरान, पूर्व सीएम ने बंगलुरु और मंगलुरु में नवनिर्मित फ्लाईओवर का नामकरण वीर सावरकर के नाम पर करने को लेकर सत्तारुढ़ भाजपा और विपक्षी दलों के बीच चल रही राजनीतिक लड़ाई के बारे में भी बात की।

सरकार के फैसले को खारिज करते हुए, पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा कि वीर सावरकर एक विवादास्पद व्यक्ति थे, जो महात्मा गाँधी की हत्या के आरोपित थे। उन्होंने विरोध करते हुए कहा कि फ्लाईओवर का नाम उनके नाम पर नहीं रखा जाना चाहिए।

इसके साथ ही कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री ने यह भी सुझाव दिया कि राज्य सरकार को स्वतंत्रता सेनानियों के नाम पर फ्लाईओवर का नाम रखना चाहिए। उन्होंने कहा, “क्या हमारे पास राज्य से 7 ज्ञानपीठ पुरस्कार प्राप्त करने वाले नहीं हैं। उनमें से किसी एक के सम्मान में रखें। क्या हमारे पास स्वतंत्रता सेनानी नहीं हैं? उनके नाम पर नाम रखें। क्या गलत है इसमें? वे कर्नाटक से हैं, और वे कन्नडिगा हैं। इसका नाम उनके नाम पर रखें।”

भाजपा पर निशाना साधने की जल्दबाजी में शायद पूर्व मुख्यमंत्री यह भूल गए कि राज्य के सात नहीं, बल्कि आठ साहित्यकारों ने साहित्य कला के क्षेत्र में योगदान के लिए प्रतिष्ठित ज्ञानपीठ पुरस्कार जीते हैं।

जब एंकर ने कॉन्ग्रेस की हिप्पोक्रेसी को उजागर करते हुए विभिन्न योजनाओं, पार्कों सार्वजनिक संपत्तियों का नामकरण स्थानीय नेताओं की अनदेखी कर गाँधी-नेहरू परिवार पर किए जाने जाने को लेकर सवाल किया तो उन्होंने कहा कि इंदिरा गाँधी और वीर सावरकर जैसे अन्य नेताओं के बीच कोई तुलना नहीं है।

एंकर ने सरकार द्वारा संचालित कैंटीनों का नामकरण राज्य के समाज सुधारकों के नाम पर न होने को लेकर भी सवाल किया, जिन्होंने सैकड़ों साल पहले इस तरह के कल्याणकारी कार्यक्रम शुरू किए थे। एंकर ने पूछा कि तत्कालीन कॉन्ग्रेस सरकार ने कैंटीन का नाम Basavannas जैसे समाज सुधारकों या फिर किसी अन्य Sharanas के नाम पर क्यों नहीं रखा।

इसका जवाब देते हुए सिद्धारमैया कहते हैं, “इंदिरा गाँधी इन सभी व्यक्तियों से ऊपर थीं, इसीलिए हमने उनके नाम पर कैंटीन का नाम रखा।” इसे आप वीडियो में लगभग 20:00 मिनट पर सुन सकते हैं।

उल्लेखनीय है कि कर्नाटक की येदियुरप्पा सरकार बेंगलुरु के येलाहांका इलाके में नवनिर्मित फालईओवर का नाम स्वतंत्रता सेनानी वीर सावरकर के नाम पर रखने का फैसला किया है। 28 मई को मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा सावरकर के जन्मदिन पर 34 करोड़ रुपए की लागत से नगरोटाथाना योजना के तहत बनाए गए 400 मीटर लंबे फ्लाईओवर का उद्घाटन करने वाले थे। हालाँकि, बाद में इसे आगे की तारीख के लिए स्थगित कर दिया गया।

इसके बाद 3 जून को मंगलुरु में पंपवेल फ्लाईओवर के फुटपाथ पर ‘वीर सावरकर फ्लाईओवर पंपवेल’ लिखा एक बैनर सामने आया। बाद में कुछ अज्ञात लोगों द्वारा बैनर हटा दिया गया था। जेडीएस और कॉन्ग्रेस ने वीर सावरकर के नाम पर फ्लाईओवर का नाम रखने को राज्य के स्वतंत्रता सेनानियों का अपमान बताया है।