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G7 में भारत को शामिल करने की बात, डोनाल्ड ट्रम्प ने कहा – ‘पुराना हो गया समूह, नहीं करता सही नुमाइंदगी’

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने कोरोना वायरस के प्रकोप को देखते हुए जून में होने वाले G7 समिट को सितंबर तक टालने का निर्णय लिया है। साथ ही इस समिट में भारत सहित अन्य देशों को भी शामिल करने की बात कही है।

अमेरिकी राष्ट्रपति ने कहा, “मैं इस समिट को स्थगित कर रहा हूँ क्योंकि मुझे ये नहीं लगता कि दुनिया में जो चल रहा है, उसकी ये सही नुमाइंदगी करता है। यह देशों का बहुत ही पुराना समूह हो गया है।”

जी-7 में दुनिया के सबसे बड़ी और संपन्न अर्थव्यवस्थाओं वाले देश शामिल हैं। अब नए देशों में भारत, रूस, साउथ कोरिया और ऑस्ट्रेलिया को आमंत्रित करने की बात कही गई है। फिलहाल इस वक्त जी-7 में अमेरिका, इटली, जापान, कनाडा, फ्रांस, जर्मनी, ब्रिटेन शामिल हैं।

वाइट हाउस प्रवक्ता ने नए देशों को शामिल करने को लेकर बताया कि ट्रंप अमेरिका के बाकी पारंपरिक सहयोगियों और कोरोना वायरस से प्रभावित देशों को लाना चाहते हैं। और चीन द्वारा फैलाए गए इस चीनी वायरस को लेकर चीन के भविष्य के बारे में बात करना चाहते हैं।

बता दें कि 46वाँ जी-7 शिखर सम्मेलन पहले वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए वॉशिंगटन में 10 से 12 जून के बीच करने की योजना थी। लेकिन कोविड-19 को मद्देनजर रखते हुए इसे आख़िरी जून तक बढ़ा दिया गया था। अब इसे सितबंर तक टाल दिया गया है।

हर साल जी-7 में शमिल देशों की अंतरराष्ट्रीय मुद्दों और अर्थव्यवस्था को लेकर बैठक होती है। जिसमें कोई एक देश इसकी अध्यक्षता करता है। इस बार इसकी अध्यक्षता अमेरिका कर रहा है। इस सम्मेलन को आयोजन करने वाले देश अपनी तरफ से अतिथि के तौर पर किसी भी एक या दो देशों को आमंत्रित करते हैं। पिछले साल फ्रांस के राष्ट्रपति एमैनुअल मैक्रों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को जी-7 शिखर सम्मेलन के लिए आमंत्रित किया था।

जी-7 में फिलहाल 7 देश शामिल हैं, इसलिए इसे ग्रुप ऑफ सेवन भी कहा जाता है। ये समूह खुद को कम्यूनिटी ऑफ वैल्यूज यानी मूल्यों का आदर करने वाला समुदाय मानता है। स्वतंत्रता और मानवाधिकारों की सुरक्षा, लोकतंत्र और क़ानून का शासन और समृद्धि तथा सतत विकास, इसके प्रमुख सिद्धांत हैं।

‘TikTok हटाने से चीन लद्दाख में कब्जाई जमीन वापस कर देगा’ – मिलिंद सोमन पर भड़के उमर अब्दुल्ला

लद्दाख के लोकप्रिय इंजीनियर सोनम वांगचुक ने जनता को सलाह दी है कि वो चीनी ऐप्स का प्रयोग न करें, जिसके बाद लोगों ने अपने मोबाइल से चायनीज ऐप्स हटाने शुरू कर दिए। मॉडल मिलिंद सोमन से लेकर अभिनेता अरशद वारसी तक ने उनकी बातों को समझा और उस पर अमल किया। उन लोगों ने अपने फॉलोवर्स से भी ऐसा ही करने की गुजारिश की। लेकिन जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला को ये सब रास नहीं आया।

बता दें कि सोनम वांगचुक ने उसी पहाड़ी के पास बैठ कर वीडियो बनाया था, जिसकी दूसरी ओर चीनी सेना ने तनाव पैदा किया हुआ है। उन्होंने जानकारी दी थी कि भारतीय सेना तो चीनी सैनिकों की इस हिमाकत को रोकने में लगी हुई है लेकिन क्या जनता का भी कुछ फर्ज नहीं बनता है? वांगचुक ने आमजनों को ‘दोतरफा लड़ाई’ की सलाह देते हुए चीनी प्रोडक्ट्स का प्रयोग बंद करने की सलाह दी थी और साथ ही ख़ुद भी उनका प्रयोग न करने की बात कही थी।

इसके बाद मिलिंद सोमन ने उनका वीडियो शेयर करते हुए कहा कि उन्होंने चाइनीज ऐप टिक-टॉक को अलविदा कह दिया है। इस खबर को ‘फ्रेंड्स ऑफ आरएसएस’ ने शेयर किया, जिससे उमर अब्दुल्ला चिढ़ गए। उन्होंने तुरंत मिलिंद सोमन के इस क़दम पर तंज कसते हुए लिखा, “समस्या का समाधान हो गया। टिक-टॉक अब ये सुनिश्चित करेगा कि चीन लद्दाख के उन क्षेत्रों को खाली कर दे, जहाँ उसने कब्जा किया हुआ है।

भारत-चीन के सैनिकों के बीच तनाव और चीनी सैनिकों के घुसपैठ को रोकने वाली भारतीय सेना के उच्चाधिकारियों द्वारा स्पष्ट कहा गया है कि सीमा पर कहीं भी घुसपैठ रोकने को वो सक्षम हैं। इधर लद्दाख में चीनी सैनिकों द्वारा भारतीय ज़मीन कब्जाए जाने की जो बातें सामने आ रही हैं, वो झूठी हैं। भारत में चीन के राजदूत ने कहा है कि इस मसले को कूटनीतिक तौर पर हल किया जाना चाहिए। लेकिन, उमर अब्दुल्ला ने कहा कि चीन ने लद्दाख के इलाकों को कब्जा लिया है। व्यंग्य में ही सही, लेकिन एक पूर्व मुख्यमंत्री होने के नाते अपने ही देश पर विदेशी सैनिक के कब्जे की झूठी बात कोई कैसे कर सकता है?

अभिनेता अरशद वारसी ने भी लिखा कि वो सतर्कता से हर उस चीज का प्रयोग बंद करने जा रहे हैं, जो चाइनीज है। हालाँकि, उन्होंने माना कि चीनी प्रोडक्ट्स हमारे जीवन का हिस्सा बन चुके हैं और उन्हें छोड़ने में समय लगेगा लेकिन वो जल्द ही ‘चाइनीज फ्री’ बन जाएँगे। उन्होंने लोगों से कहा कि आपको भी ऐसा ही करने की कोशिश करनी चाहिए। उन्हें इसके लिए पाकिस्तानियों के गुस्से का सामना भी करना पड़ा।

एक मोहम्मद आकिब ने उन्हें रिप्लाई देते हुए लिखा कि वो भी अपने जीवन से भारत को बैन करने जा रहा है। उसने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को ‘फासिस्ट’ करार देते हुए दावा किया कि भारत में दूसरे मजहब पर अत्याचार हो रहा है और अरशद वारसी चुप हैं? उसने लिखा, “चीन ने डंडा दिया है तो आपकी आँखें बाहर आ रही हैं?” उसने अरशद वारसी पर तंज कसते हुए कहा कि तुम कितने ‘बहादुर’ हो, इसकी थाह लग गई है।

एक अन्य पाकिस्तानी अरशद खान ने भी जम्मू कश्मीर का मुद्दा उछाल कर उन्हें घेरने की कोशिश की। उसने कहा कि अरशद वारसी सिर्फ़ फ़िल्मी डायलॉग ही मार रहे हैं और कश्मीर में ‘समुदाय विशेष पर हो रहे जुर्म’ पर उन्होंने चुप्पी साध रखी है। इधर उमर अब्दुल्ला द्वारा चायनीज प्रोडक्ट्स के बॉयकॉट किए जाने का मजाक उड़ाने पर लोगों ने उसकी क्लास भी ली और चीन के प्रति सहानुभूति का कारण पूछा।

लेबर पार्टी और ईसाई संस्थाओं के टट्टुओं का समूह है ‘स्टॉप फंडिंग हेट’: भारत-विरोधी जेरेमी कोर्बिन से है सम्बन्ध

हाल के दिनों में विदेशी ताक़तों व मीडिया द्वारा विभिन्न चुनावों में हस्तक्षेप किए जाने को लेकर काफ़ी कुछ कहा-सुना जा चुका है। इसी तरह का कुछ अमेरिका में हुआ, जहाँ वामपंथियों की हार और डोनाल्ड ट्रम्प की जीत को रूस से जोड़ दिया गया और रूस द्वारा चुनावों में हस्तक्षेप की बात दुष्प्रचारित की गई। जहाँ भी जनता ने अपने लोकतान्त्रिक अधिकारों का प्रयोग कर फैसला लिया, वामपंथियों ने रूस को दोष दे दिया। यहाँ तक कि ब्रेक्सिट में भी। यहाँ, हम ‘स्टॉप फंडिंग हेट’ की बात कर रहे हैं।

हालाँकि, विदेशी हस्तक्षेप कोई नई बात नहीं है लेकिन यहाँ हम चर्चा करेंगे ‘स्टॉप फंडिंग हेट’ नामक संस्था की। दरअसल, विदेशी हस्तक्षेप का मकसद ही होता है कि किसी देश में अपने फायदे के लिए दखल देना। अपने हित के लिए किसी अन्य देश के राजनीतिक क्रियाकलापों में अप्रत्यक्ष हिस्सेदारी। ये उसके उलट है, जो पश्चिमी देश हल्ला मचाते रहते हैं। चुनावी हस्तक्षेप से कहीं ज्यादा बड़ी चीज है राजनीतिक हस्तक्षेप। ये सबसे सामान्य हथियार है, किसी देश में अपना दखल मजबूत करने का।

पश्चिमी देशों ने इतने सारे ‘सिविल सोसाइटी’ संस्थाएँ कुकुरमुत्तों की तरह पैदा कर रखी हैं कि वो हर उस देश में दखल देते हैं, जिसके पश्चिमी देशों से भविष्य में बराबरी करने की सम्भावना है या जो तेज़ी से आगे बढ़ रहा है। ऐसे एनजीओ का काम ही यही होता है कि वो ये सुनिश्चित करें कि उनके नैरेटिव के अनुसार चीजें चलती रहें। ऐसा न होने पर वो सीधा राजनीतिक और सामाजिक हस्तक्षेप पर उतर आती हैं।

ऑपइंडिया के खिलाफ़ ‘स्टॉप फंडिंग हेट’ का दुष्प्रचार अभियान

‘स्टॉप फंडिंग हेट’ इसी तरह की एक संस्था है। ये एक कम्युनिटी है, जो यूके में एक कम्पनी के रूप में रजिस्टर्ड है। हाल ही में उन्होंने ऑपइंडिया के खिलाफ एक दुष्प्रचार अभियान चलाया, जो अभी भी बदस्तूर जारी है। उनका प्रमुख उद्देश्य है कि ऑपइंडिया के रेवेन्यु पर वार किया जाए। वो चाहते हैं कि हमें कम्पनियों द्वारा एडवरटाईजमेंट न मिले, ताकि ऑपइंडिया के पास वित्त की कमी हो जाए। वो हमें कंगाल करने का लक्ष्य लेकर चल रहे हैं।

इसका कारण एकदम स्पष्ट है। ऑपइंडिया एक दक्षिणपंथी मीडिया प्लेटफार्म है, जो अक्सर वामपंथी मीडिया के बने-बनाए ढाँचे को चुनौती देता है और वो ये चीज बर्दाश्त नहीं कर पाते। वो नैरेटिव कुछ इस तरह से गढ़ता है कि लोग हर चीज को वामपंथ के चश्मे से पढ़ने को विवश हो जाएँ। जो भी उनके द्वारा बनाए गए नियमों पर नहीं चलता, ये ठेकेदार उन्हें नुकसान पहुँचाने के लिए उसकी फंडिंग और रेवेन्यु पर वार करते हैं। वो उसके सञ्चालन को रोकने में पूरी ताक़त झोंक देते हैं ताकि वो इनके विरुद्ध खड़ा भी न रह सके।

अगर वो इसमें सफल रहते हैं तो मीडिया में दक्षिणपंथ का नामोंनिशान मिट जाएगा और उन्होंने जो धारणाएँ और अपने नियम-कायदे बना रखे हैं, उसे चुनौती देने वाला कोई नहीं रह जाएगा। वो ऐसा कर सकते हैं या नहीं, इस सम्बन्ध में हम जवाब दे चुके हैं। लेकिन हाँ, वो हमेशा अपने इस उद्देश्य की पूर्ति में प्रयासरत रहते हैं। अगर वो सफल रहते हैं तो भारत की राजनीति पर उसका क्या दुष्प्रभाव होगा, ये छिपा नहीं है।

भारत में वामपंथी मीडिया संस्थानों का सबसे प्रमुख कार्य है हिन्दू संस्थाओं के खिलाफ दुष्प्रचार फैलाना और उनके बारे में फेक न्यूज़ फैलाना। ऑपइंडिया ऐसी कई हरकतों को रंगे हाथों पकड़ कर उसका खुलासा कर चुका है। जहाँ तक ”स्टॉप फंडिंग हेट’ की बात है, ये अर्नब गोस्वामी के चैनल ‘रिपब्लिक टीवी से भी चिढ़ता है और उस पर एडवरटाईजमेंट देने वाली कम्पनियों को धमकाता रहता है, दबाव बनाता है।

दुनिया भर में कुख्यात है ‘स्टॉप फंडिंग हेट’

इसने ‘द सन’, ‘द डेली मेल’ और ‘द डेली एक्सप्रेस’ जैसे अख़बारों को भी धमकाने की कोशिश की, जो यूके में सक्रिय हैं। वहाँ उन्हें वामपंथियों का खूब समर्थन मिला, जिन्हें ऐसे संस्थानों की प्रताड़ना पर मजा आता है जो उनके विरोधी हैं। इसकी वेबसाइट कहती है कि ये प्रचार सामग्री मुहैया कराने वाली कम्पनियों को उन प्रकाशनों से दूर रहने के लिए कहता है, जो घृणा फैलाते हैं।इसके नाम पर ये केवल दक्षिणपंथी पोर्टलों को निशाना बनाता है, इस्लामी और कट्टरपंथियों को नहीं।

उसका कहना है कि कुछ लोगों ने आगे आकर इसकी स्थापना तब की, जब अख़बारों द्वारा लगातार घृणा फैलाई जा रही थी और उन्हें रोकने वाला कोई नहीं था। उनका कहना है कि इन इन अख़बारों की कमाई का प्रमुख जरिया कम्पनियाँ हैं जो इन्हें प्रचार सामग्री देती है और इसीलिए जैसे ही इनकी कमाई घटेगी, ये घृणा फैलाना बंद कर देंगे। साथ ही वो ये भी दावा करता है कि अल्पसंख्यकों को मीडिया में लम्बे समय से घृणा का शिकार बनाया जा रहा है।

इसके पीछे कौन लोग हैं?

दरअसल, ‘स्टॉप फंडिंग हेट’ के बोर्ड सदस्यों में जितने भी लोग हैं, वो सब के सब किसी न किसी घोर वामपंथी संगठनों से ताल्लुक रखते हैं। जैसे, रिचर्ड विल्सन ‘एमनेस्टी इंटरनेशनल‘ का सदस्य है। ये एक ऐसा एनजीओ है, जो जम्मू कश्मीर से लेकर अन्य मुद्दों पर भारत को बदनाम करने में पूरी ताक़त लगा देता है। उसका सीधा कहना है कि उसके संस्था का उद्देश्य है कि मीडिया वैसे ही काम करे, जैसा वो चाहता है।

वो कहता है कि वही चीजें प्रकाशित करो, जो उसकी संस्था या उसके लोग चाहते हैं। वो कहता है कि वो लिखो, जैसा वो चाहता है नहीं तो वो हर उस मीडिया संस्थान के खिलाफ जाएगा, जो इससे इनकार कर देंगे। यानी वो राजनीतिक पक्षपात के छत्र तले मीडिया पर लगाम लगाना चाहता है। एक अन्य एनजीओ की सदस्य रोजी इलम भी इसके बोर्ड में बैठी हुई हैं। वो फिलिस्तीन की समर्थक हैं। साथ ही वो इजरायल पर जबरन फिलिस्तीन की जमीन पर अवैध कब्जा करने का आरोप लगाती हैं।

साथ ही उन्होंने ब्रिटेन के चुनाव में कोर्बिन का समर्थन किया था, जिसकी इतनी बुरी हार हुई कि लेबर पार्टी की लुटिया ही डूब गई। कैथरिन टेलर इस अभियान की डायरेक्टर थीं, जिन्होंने 2019 में इस्तीफा दे दिया था। वो लेबर पार्टी से लम्बे समय तक जुडी रही हैं। इसके अलावा इमाम आत्ता का भी नाम आता है, जिसके बारे में बताया गया है कि वो खास समुदाय के खिलाफ होने वाले अत्याचारों पर नज़र रखता है।

भारत को क्यों सावधान रहना चाहिए?

हर ओर से देखने पर लगता है कि ये संस्था और इसका अभियान लेबर पार्टी से जुड़ा हुआ है, जिसका भारत विरोधी इतिहास रहा है। इसके बोर्ड के सदस्य अपनी इच्छा के अनुसार राजनीति को ढालना चाहते हैं। ये ऑक्सफेम इंडिया से अलग नहीं है, जो कॉन्ग्रेस को भारत के सिविल सोसाइटी संगठनों के साथ गठबंधन करने को कहता है। साथ ही ये एमनेस्टी वगैरह जैसी संस्थानों की तरह दूसरे देशों की राजनीति और क्रियाकलाप में दखल देने का भी काम करता है।

SFH की वेबसाइट

भारत में मीडिया को लोकतंत्र का चौथा खम्भा माना जाता है, ऐसे में कोई विदेशी ताकत आकर ये तय करने लगे कि क्या छ्पेगा और क्या नहीं, ये हमारे लिए सतर्क रहने वाली बात होनी चाहिए। अगर विदेशी संस्थाएँ भारतीय मीडिया को डिक्टेट करने लगे तो फिर भारत के लिए ये चिंताजनक है, यहाँ की राजनीति के लिए भी सही नहीं है। हालाँकि, अभी तक हमे ये स्पष्ट नहीं पता चला है कि कौन-कौन इस अभियान को फंड कर रहे हैं।

जिस तरह से इसके जेरेमी कोर्बिन के साथ सम्बन्ध हैं, इसाई संस्थाओं के साथ सम्बन्ध हैं और लेबर पार्टी के साथ जुड़ाव है, ये भारत के लिए किसी भी स्थिति में एक आदर्श स्थिति नहीं है और विपरीत प्रभाव डालने वाला है। अन्य मीडिया संस्थानों को भी इससे सतर्क रहना चाहिए और इसके प्रोपगंडा के आगे झुकना नहीं चाहिए।

नोट: यह OPINDIA की संपादक नूपुर जे शर्मा द्वारा मूलरूप से इंग्लिश में लिखे इस लेख का संक्षिप्त अनुवाद है।

कश्मीर में भारतीय सेना की ताबड़तोड़ कार्रवाई से पाक में खलबली: ‘ISI ने हि‍जबुल सरगना सैयद सलाहुद्दीन पर कराया हमला’

अक्सर पाकिस्तान में बैठकर भारत में आतंकी हमलों की योजना बनाने वाले हि‍जबुल मुजाहिदीन के सरगना सैयद सलाहुद्दीन पर हमले की खबर सामने आई है। इस हमले में सलाहुद्दीन गंभीर रुप से घायल हुआ है, जिसे अस्पताल में भर्ती कराया गया है। बताया जा रहा है कि ये हमला 25 मई को इस्लामाबाद में आतंकी संगठन हिजबुल मुजाहिदीन के ठिकाने के पास हुआ था।

आशंका जताई जा रही है कि आतंकी सरगना पर यह हमला पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आइएसआइ ने करवाया है, जिसका उद्देश्य सलाहुद्दीन को भयभीत करना था, न कि उसकी हत्या करना। दरअसल, पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी दशकों से सलाहुद्दीन का इस्तेमाल भारत विरोधी गतिविधियों के लिए कर रही हैं। सलाहुद्दीन यूनाइटेड जिहाद काउंसिल नामक पाकिस्तान समर्थक आतंकवादी समूहों के गठबंधन का प्रमुख भी है।

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, आईएसआई ने सलाहुद्दीन को भारत सरकार के कदम के खिलाफ घाटी में बड़े पैमाने पर हमले का निर्देश दिए थे, लेकिन वह ऐसा करने में नाकाम रहा, जिससे आईएसआई नाराज हो गई। इसके बाद आईएसआई ने उसे अपना समर्थन वापस लेने का संदेश देना शुरू कर दिया है।

सलाहुद्दीन ने पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (पीओके) के नेता राजा फारूक हैदर और अन्य से संपर्क किया और आईएसआई से घाटी में हमले करने का वादा किया। इस बीच आईएसआई ने हिजबुल कैडर को पर्याप्त प्रशिक्षण, हथियार और गोला-बारूद उपलब्ध कराना बंद कर दिया।

बताया जा रहा है कि सलाहुद्दीन और उसके आईएसआई हैंडलर के बीच पिछले साल अगस्त में ही जम्मू एवं कश्मीर से अनुच्छेद 370 के निरस्त होने के बाद से फासला होना शुरू हो गया था।

आपको बता दें कि हाल ही में कश्मीर में मारा गया आतंकी रियाज नायकू हिजबुल मुजाहिदीन का ही कमांडर था। कश्मीर में आतंकी वारदातों में कमी आने पर आइएसआइ ने सलाहुद्दीन पर गतिविधियाँ बढ़ाने के लिए दबाव बढ़ा दिया।

नाइकू के मारे जाने के बाद सलाहुद्दीन ने कहा था कि कश्मीर घाटी में भारतीय सुरक्षा बलों की स्थिति मजबूत है। ऐसा कहते हुए उसका एक वीडियो सामने आया था। सलाहुद्दीन को नायकू की मौत पर शोक व्यक्त करने के लिए रावलपिंडी में आयोजित एक सभा में यह कहते हुए सुना गया कि पांच सुरक्षाकर्मियों की हत्या के बाद भी भारतीय सुरक्षा बल की स्थिति मजबूत बनी हुई है।

गौरतलब है कि जम्‍मू-कश्‍मीर के बड़गाम में जन्मा आतंकी सैयद सलाहुद्दीन वर्ष 1987 में जम्‍मू-कश्‍मीर में चुनाव भी लड़ चुका है, लेकिन वह हार गया था। 71 वर्षीय सलाउद्दीन पाकिस्‍तान के कब्‍जे वाले कश्‍मीर में रहता है, लेकिन उसकी पत्नी हिंदुस्तान में ही रहती है। सैयद सलाहुद्दीन को अमेरिका ने अमेरिका ने वैश्विक आतंकवादी घोषित कर रखा है। सलाहुद्दीन कश्मीर में आतंकियों को ट्रेनिंग देता है।

दिल्ली में कोरोना से 398 या 1036 मौतें? आँकड़ों को लेकर बीजेपी, कॉन्ग्रेस नेताओं ने केजरीवाल सरकार पर उठाए सवाल

दिल्ली में कोरोना मरीजों की संख्या दिन प्रतिदिन तेजी से बढ़ती चली जा रही है। इस बीच कोरोना से मरने वाले मरीजों की संख्या को लेकर एक बार फिर केजरीवाल सरकार पर विपक्षियों ने सवाल खड़े किए हैं। साथ ही केजरीवाल सरकार पर मौतों के आँकड़ों को छिपाने का आरोप भी लगाया है।

अब दिल्ली में कोरोना से मौतों के आँकड़ों को लेकर दिल्ली प्रदेश कॉन्ग्रेस कमिटी के पूर्व अध्यक्ष अजय माकन ने ट्वीट करते हुए अरविंद केजरीवाल सरकार को कठघरे में खड़ा किया है। माकन ने ट्वीट करते हुए लिखा, “कल रात तक दिल्ली में 1036 का दाह संस्कार कोविड प्रोटोकॉल से हुआ है। परंतु मृत्यु का सरकारी आँकड़ा 392 है। असलियत- निगम बोध-439, पंजाबी बाग-389, आईटीओ-164, मंगोल पुरी-22, बुलंद मस्जिद-22”

अजय माकन ने केजरीवाल सरकार पर आरोप लगाते हुए आगे लिखा कि देर रात को सरकार की ओर से मौतों के आँकड़े जारी किए जा रहे हैं। ताकि कोई अखबार न छाप सके। साथ ही उन्होंने लिखा कि सरकार चुपके-चुपके जो जानकारी दे रही, वो भी आधी-अधूरी है।

दरअसल, 29 फरवरी के हेल्थ बुलेटिन को दिल्ली सीएमओ ने शेयर किया है। इसमें बताया गया है कि दिल्ली में कोरोना के अब तक 17 हजार से ज्यादा मामले सामने आ चुके हैं। वहीं, ऐक्टिव केस की संख्या 9,142 है, जबकि इससे मरने वालों की संख्या 398 हो गई है।

दिल्ली बीजेपी अध्यक्ष मनोज तिवारी ने कहा है कि दिन-प्रतिदिन जिस तरह कोरोना वायरस संक्रमण के मामले बढ़ रहे हैं इससे लोगों के सामने अरविंद केजरीवाल सरकार की स्वास्थ्य व्यवस्था की हकीकत उजागर हो गई है।

अखबारों में विज्ञापन देने के लिए सरकार पर सवाल उठाते हुए तिवारी ने कहा, “यह साफ है कि विज्ञापन पर करोड़ों रुपए खर्च करने के बावजूद कोरोना वायरस संक्रमण से निपटने के लिए केजरीवाल सरकार के पास कोई रणनीति नहीं है।’

वहीं बीजेपी नेता कपिल मिश्रा ने भी एक ट्वीट करते हुए अपना ही एक वीडियो शेयर किया, जिसमें कपिल मिश्रा को दिल्ली में कोरोना से होने वाली मौतों के आँकड़ों को लेकर केजरीवाल सरकार पर आँकड़े छिपाने का आरोप लगाया और दावा किया कि कई डाटा के मुताबिक दिल्ली में अभी तक कोरोना से मरने वालों की संख्या 1000 से अधिक हो गई है, जबकि सरकार गलत आँकड़ों को पेश कर लगातार दिल्ली की जनता से झूठ बोल रही है।

आपको बता दें कि इससे पहले कोरोना के मामलों की जानकारी देते हुए दिल्ली के स्वास्थ्य मंत्री सत्येंद्र जैन ने बताया कि दिल्ली में अब तक 398 लोगों की मौत हो चुकी है। वहीं, सिसोदिया ने कहा कि घबराने की कोई जरूरत नहीं है, क्योंकि दिल्ली में स्वस्थ होने का प्रतिशत करीब 50 फीसदी तक है।

उन्होंने आगे कहा कि जब तक लोगों में संक्रमण के लक्षण नहीं दिखते हैं तब तक अस्पताल आने की कोई जरूरत नहीं है और ऐसे करीब 80-90 फीसदी मरीज घर में ही आइसोलेशन में रहकर स्वस्थ हुए हैं। गौरतलब है कि इससे पहले भी MCD के नेताओं ने दिल्ली सरकार पर आँकड़ें छिपाने का आरोप लगाया था।

LockDown-5: 30 जून तक बढ़ाया गया लॉकडाउन, पहले चरण में रेस्टोरेंट, धार्मिक स्थल, सैलून खोलने की इजाजत

देश में लगातार बढ़ते कोरोना मरीजों की संख्या से चिंतित केन्द्र सरकार ने एक बार फिर पूरे देश में जारी लॉकडाउन को 30 जून तक के लिए बढ़ा दिया, लेकिन इस बार 8 जून से कंटेनमेंट जोन के बाहर प्रतिबंधित एरिया को चरणों के हिसाब से खोला जाएगा। यह पाँचवाँ मौका है कि जब केन्द्र सरकार की ओर से लॉकडाउन की अवधि को बढ़ाया गया है।

गृह मंत्रालय की ओर से जारी किए गए आदेश के मुताबिक कंटेनमेंट जोन के बाहर वो सभी गतिविध‍ियाँ फिर से शुरू हो सकेंगी जिन पर अब तक पाबंदी लगी थी, लेकिन ऐसा चरणबद्ध तरीके से किया जाएगा। गाइडलाइंस के मुताबिक, लॉकडाउन तीन फेज में खुलेगा।

सरकार ने पहले फेज के तहत 8 जून से धार्मिक स्थल, होटल, सैलून, रेस्टोरेंट खोलने की इजाजत दे दी है। हालाँकि, सरकार ने शर्तों के साथ खोलने की अनुमति दी है।

दूसरे फेज के तहत स्कूल-कॉलेज खोलने का फैसला केंद्र ने राज्यों पर छोड़ दिया है। जुलाई में राज्य इस पर फैसला लेंगे। वहीं देशभर में रात 9 बजे से सुबह 5 बजे तक कर्फ्यू लागू रहेगा, लेकिन लोग एक राज्य से दूसरे राज्य जा सकेंगे। इस दौरान लोगों को अब पास दिखाने की भी जरूरत नहीं होगी।

दूसरी ओर फिलहाल, अंतरराष्ट्रीय उड़ानें, मेट्रो रेल का संचालन, सिनेमा हॉल, जिम, स्विमिंग पूल, थिएटर, बार और ऑडिटोरियम, असेंबली हॉल पूरी तरह से बंद रहेंगे। आशंका जताई जा रही है कि सरकार तीसरे चरण में इस पर फैसला ले सकती है।

एक बार फिर 65 साल से ज्यादा के लोग, गर्भवती महिलाएँ, पहले से बीमारियों से ग्रसित व्यक्ति और 10 साल से छोटे बच्चों को घर में ही रहने की सलाह दी गई है।

आपको बता दें कि कोरोना वायरस से निपटने के लिए पूरे देश में 25 मार्च से लॉकडाउन का दौर जारी है। लॉकडाउन 4.0 की अवधि 31 मई को खत्म हो रही थी, लेकिन देश में लगातार बढ़ते कोरोना मरीजों की संख्या को देखते हुए सरकार ने एक बार फिर लॉकडाउन की अवधि को बढ़ा दिया है।

गौरतलब है कि देश में कोरोना के मरीजों की संख्या अब तेजी से बढ़ती चली जा रही है। स्वास्थ्य मंत्रालय की रिपोर्ट के मुताबिक शनिवार (30 मई, 2020) सुबह तक देश में अब तक कुल कोरोना के 1,73,763 मरीज सामने आ चुके हैं, जबकि 4971 लोगों की मौत हो चुकी है।

इतना ही नहीं पिछले 24 घंटे में सबसे ज्यादा नए केस और सबसे ज्यादा मौतें हुई हैं। पिछले 24 घंटे में 7964 नए मामले सामने आए हैं, जबकि 265 लोगों की मौत हो चुकी है।

टुटपुँजिया कॉमेडियन कामरा बना यूट्यूब पर 12 लाख ‘डिसलाइक’ पाने वाला शख़्स, लोगों ने कहा- बेटा! तुझसे ना हो पाएगा

हाल ही में युट्यूबर कैरी मिनाटी वीडियो बना कर टिक-टॉक वालों को ऐसा रोस्ट किया कि विरोधी खेमे में हडकंप मच गया था। टिक-टॉक की रेटिंग पर लोगों ने गहरा वार किया। अब ख़ुद को कॉमेडियन बताने वाले ट्विटर ट्रोल कुणाल कामरा ने कैरी मिनाटी को लेकर एक वीडियो बना कर उन्हें रोस्ट करने का दावा किया लेकिन असल में उनकी ख़ुद की बेइज्जती हो गई। यूट्यूब पर लोगों ने उन्हें जम कर गाली दी और वीडियो भी डिसलाइक किया।

सबसे पहले समझते हैं कि कुणाल कामरा के इस वीडियो को कैसा रिस्पॉन्स मिला। इसके लिए हमें आँकड़ों की बात करनी पड़ेगी। अगर अब तक के यूट्यूब आँकड़ों की मानें तो तथाकथित कॉमेडियन कुणाल कामरा के इस वीडियो को अब तक करीब 45 लाख लोगों ने देखा है। ये कैरी मिनाटी के वीडियो की तुलना में कहीं नहीं ठहरता क्योंकि उनकी वीडियो पर इससे 10 गुना से भी ज्यादा व्यूज आए थे। वहीं लाइक और डिसलाइक का अनुपात देखने लायक है।

कुणाल कामरा के इस वीडियो को 2.70 लाख लोगों ने लाइक किया है, वहीं ‘आजा बेटा कैरी तेको रोस्ट सिखाएँ’ नामक इस वीडियो को 12 लाख लोगों ने डिसलाइक किया है। इस हिसाब से सीधे 4 गुना लोगों ने इस वीडियो को नापसंद किया है, उनकी तुलना में जिन्होंने इसे पसंद किया है। 12 लाख डिसलाइक के साथ कुणाल कामरा सबसे ज्यादा डिसलाइक पाने वालों की सूची में आ गए हैं। साथ ही लोगों ने उसने कहा- “बेटा, तुमसे ना हो पाएगा।”

कैरी मिनाटी को रोस्ट करने चले थे, हो गई बेइज्जती

एक व्यक्ति ने कमेन्ट सेक्शन में लिखा कि वो कैरी मिनाटी का फैन नहीं है लेकिन उसे लगता है कि अब कुणाल कामरा के जोक्स पर तनिक भी हँसी नहीं आती। एक ने उन्हें अपनी कॉमेडी स्किल्स पर काम करने की सलाह दी और साथ ही कहा कि दूसरों के बारे में शिकायत करने से पहले वो ख़ुद कुछ सीखें। एक ने लिखा कि उन्हें इस वीडियो में कैरी मिनाटी के जो क्लिप्स थे, उस पर ही ज्यादा हँसी आई। कइयों ने गुस्से में कुणाल कामरा के चैनल को ही अनसब्सक्राइब कर डाला।

इस तरह से कैरी मिनाटी का रोस्ट करने चले कुणाल कामरा का ही जनता ने रोस्ट कर दिया। इसके बाद ट्विटर पर बौखलाए कामरा ने कैरी मिनाटी के फैंस को भाजपा आईटी सेल कह कर अपनी भड़ास निकाली। वहाँ पर लोगों ने उनकी एक बार फिर से बड़ी बेइज्जती की। एक ने तो उन्हें कहा कि हर लाइन बोलने के बाद ‘ओह’ कह देने से वो हँसने वाली बात नहीं हो जाती। एक ने तो कहा कि उसने बिना देखे ही डिसलाइक कर डाला।

बता दें कि कुणाल कामरा ने एक हवाई यात्रा के दौरान ‘रिपब्लिक न्यूज़’ के संपादक अर्नब गोस्वामी के साथ बदतमीजी की थी। अर्नब अपनी सीट पर बैठे हुए थे और कान में हेडफोन लगाए हुए थे। कुणाल कामरा अर्नब के पास पहुँच गया और उसने उन्हें ‘डरपोक’ बताया था। उसने अपने इस घटिया हरकत का वीडियो भी शूट कर लिया था। इसके बाद तमाम एयरलाइन्स ने उन्हें प्रतिबंधित कर दिया था।

विपक्षी नेताओं, वामपंथी पत्रकारों ने AIIMS में घटिया PPE किट-मास्क को लेकर फैलाया था फेक न्यूज़: PIB फैक्ट चेक में खुलासा

दिल्ली के एम्स हॉस्पिटल में 50 से अधिक स्वास्थ्य कर्मियों का कोरोना पॉजिटिव मिलना किसी खतरे की घंटी से कम नहीं है। क्योंकि इसने इस संक्रमण की महामारी से जूझते हुए हमारे फ्रंट लाइन वारियर्स को भी अपनी चपेट में ले लिया है। रिपोर्ट्स के अनुसार, एम.बी.बी.एस के छात्र, रेजिडेंट डॉक्टर, मेस वर्कर्स, नर्सेस और अटेंडेंटस सभी कोरोनावायरस संक्रमण के शिकार हुए है।

जहाँ एक तरफ फ्रंट लाइन वर्कर्स निःस्वार्थ भाव से बिना थके, बिना रुके देश में संक्रमण की बढ़ती संख्या को रोकने में मदद कर रहें हैं। वहीं कुछ ऐसे लोग हैं जो केंद्र सरकार को नीचा दिखाने और उग्र महामारी से निपटने में सरकार के प्रयासों को विफल करने के लिए तमाम असत्यापित और कथित रूप से फर्जी खबरों का फैलाने में कोई कमी नहीं छोड़ रहे हैं। ऐसे तथाकथित पत्रकार, लिबरल गैंग के लोग फेक न्यूज़ फैलाने में जी-जान से लगे हैं।

पत्रकार रुनझुन शर्मा ने कल (29मई,2020) एक ट्वीट किया था। जिसमें एम्स के डॉक्टरों को कोट करते हुए लिखा था, कि उन्हें दिए जा रहे एन 95 मास्क और पीपीई की गुणवत्ता को लेकर वो सभी परेशान है। डॉक्टरों ने कथित तौर पर इंटरव्यू में दावा किया कि उन्हें जो मास्क और पीपीई प्रदान किए गए थे, वे बुनियादी MoHFW सुरक्षा मानकों को पूरा नहीं करते थे और इन पर आवाज उठाना एफआईआर और अपने करियर के खतरे में डालना है।

हालाँकि, पीआईबी ने पत्रकार रुनझुन के दावे को खारिज करते हुए दावा किया कि एम्स के डॉक्टरों और स्वास्थ्य कर्मियों को दिए गए उपकरणों की गुणवत्ता स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा निर्धारित मानकों को पूरा करती है। जिनका मूल्यांकन स्वयं एम्स समिति द्वारा प्रमाणित किया गया है। इसमें यह भी कहा गया है कि 95 प्रतिशत से अधिक कोरोनोवायरस मामलों में रोगी देखभाल करने से ट्रांसमिशन का कोई सबूत नहीं मिला है।

पीआईबी की आधिकारिक फैक्ट-चेकिंग के तुरंत बाद ही सीएनएन न्यूज 18 के पत्रकार रुनझुन शर्मा ने अपने ऑरिजिनल ट्वीट को हटा दिया।

CNN न्यूज 18 के पत्रकार रुनझुन शर्मा ने डॉक्टरों और अन्य स्वास्थ्य कर्मचारियों के देखभाल को लेकर केंद्र सरकार की तरफ से भेजे गए सेफ्टी इक्विपमेंट के स्टैंडर्ड को लेकर सरकार की नाकामयाबी को दर्शाते हुए फेक न्यूज़ ट्वीट किया था जिसे गलत साबित होने के बाद डिलीट कर दिया। लेकिन, ट्वीट हटाए जाने से पहले कई विपक्षी सांसदों, विधायकों, अभिनेताओं और पत्रकारों सहित कई प्रमुख हस्तियों द्वारा उस फर्ज़ी ट्वीट को शेयर किया गया था।

पत्रकार फेय डी सूजा, जिनकी केंद्र सरकार के खिलाफ पूर्वाग्रह जगजाहिर है, उन्होंने रुनझुन के ट्वीट को “अविश्वसनीय” टिप्पणी के साथ रीट्वीट करते हुए इसी झूठ को बढ़ावा दिया।

राज्यसभा सदस्य और वरिष्ठ कॉन्ग्रेस नेता जयराम रमेश ने भी सीएनएन न्यूज 18 के पत्रकार द्वारा पोस्ट की गई फर्जी खबर को अपनी टिप्पणी के साथ रीट्वीट किया। और इस फर्जी घटना पर अपनी पीड़ा व्यक्त करते हुए, सवाल उठाया कि स्वास्थ्य मंत्री क्या कर रहे हैं।

अभिनेता से नेता बनी मिमी चक्रवर्ती, जो कि जादवपुर निर्वाचन क्षेत्र से तृणमूल कॉन्ग्रेस की सांसद हैं। उन्होंने एम्स के स्वास्थ्य कर्मियों के बीच फैले कोरोनोवायरस को लेकर पीएम मोदी पर कटाक्ष किया।

मिमी ने फर्ज़ी खबर को कोट करते हुए भारतीय पीएम और कनाडाई पीएम के बीच तुलना की। उन्होंने कहा कि कनाडाई पीएम ने सभी डॉक्टरों और हेल्थकेयर कर्मचारियों के लिए सुरक्षात्मक गियर और डबल वेतन सुनिश्चित किया, जबकि भारतीय पीएम ने भारतीयों को बर्तन बजाने, दीया जलाने और भारतीयों से आत्मनिर्भर बनने का आग्रह किया।

एक अन्य टीएमसी सांसद नुसरत जहाँ, जिन्होंने हाल ही में कोरोना काल अपने कर्तव्यों का पालन न करते हुए टिकटोक पर अपने डांस वीडियो डालती और अपने डांस मूव्स का बचाव करती नजर आई थीं, वो भी तब जब उनके निर्वाचन क्षेत्र में प्रवासी और जनता भोजन की माँग कर रही थी। उन्होंने भी डॉक्टरों और वर्कर्स के लिए कथित घटिया हेल्थकेयर उपकरण के बारे में फेक न्यूज़ फैलाने में आगे बढ़कर अपना योगदान दिया। ट्वीट को शेयर करते हुए उन्होंने बीजेपी नेता अमित मालवीय पर भी हमला किया था।

बालासोर से कॉन्ग्रेस के लोकसभा उम्मीदवार, नवज्योति पटनायक ने रुनझुन के फेक न्यूज़ को साझा किया और लिखा कि सरकार देश के COVID-19 योद्धाओं के लिए गुणवत्ता वाले चिकित्सा उपकरणों को उपलब्ध कराने में लापरवाही बरत रही है।

विरुदनगर के कॉन्ग्रेस सांसद, मणिकाम टैगोर ने एक ट्वीट पोस्ट किया जिसमें कहा कि स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन एम्स हेल्थकेयर कार्यकर्ताओं को उपकरण प्रदान करने के लिए जिम्मेदार हैं। वायनाड मेडिकल कॉलेज पर राजनीति का स्वास्थ्य मंत्री पर आरोप लगाते हुए, टैगोर ने कहा कि कोरोनोवायरस संकट के दौरान उनके प्रदर्शन को गैर जिम्मेदाराना तक कह दिया।

पत्रकारिता की उबड़-खाबड़ पगडंडी पर महिलाओं का संघर्ष कैसा: बिहार के एक छोटे से शहर की लड़की की आपबीती

बदलते वक्त के साथ समाज भी करवटें ले रहा है। हर क्षेत्र में बदलाव हो रहा है। बदलाव से पत्रकारिता का क्षेत्र भी अछूता नहीं है। यकीनन, मीडिया में पहले की तुलना में अब महिलाओं के लिए ज्यादा अवसर हैं। लेकिन जो चीज बदलती नहीं दिख रही वह है मीडिया हाउस की पुरुषवादी सोच। लिहाजा जगह बनाने का महिला पत्रकारों का संघर्ष भी लंबा होता है।

मैं बिहार के दरभंगा में पली-बढ़ी। यहीं से 2011 में बारहवीं की परीक्षा पास की। इसी दौरान टीवी स्क्रीन पर महिला पत्रकारों को बड़े-बड़े मुद्दों पर बेबाकी से पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर अपनी बात रखते देख मैंने भी इस क्षेत्र में अपना करियर बनाने की सोची।

राष्ट्र और समाज के प्रति जिम्मेदारी के बोध से भी मेरा इस पेशे की तरफ झुकाव हुआ। आज भी मेरा पक्का यकीन है कि पत्रकारिता तभी तक जीवित है जब तक उसमें अंश मात्र भी ‘देशहित’ मौजूद है। यह भाव पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है, लेकिन बाजार के बोझ तले दब जरूर गया है।

मेरे लिए अपने करियर के रूप में पत्रकारिता का चुनाव करना और फिर उस मार्ग पर चलना इतना आसान नहीं था। मेरे सामने कई चुनौतियाँ थीं। मैं बिहार के एक छोटे से शहर दरभंगा की रहने वाली हूँ और मैंने अपनी बारहवीं तक की पढ़ाई वहीं से किया। उन दिनों विद्याथियों को क्या करना है, कौन से क्षेत्र में करियर बनाना है, ये सब पहले से ही तय होता था। पहली से दसवीं तक स्कूल में और फिर 11-12वीं कॉलेज में। अगर बच्चे ने साइंस लिया है, तो फिर बारहवीं पास करने के बाद इंजीनियरिंग या मेडिकल करना है। यह सब पहले से ही तय होता है।

प्राय: हर घर में यही होता था और अगर घर के बड़े बच्चे ने ऐसा किया तो छोटों पर ऐसा करने का दबाव और ज्यादा हो जाता है। मेरे घर में भी यही हुआ था। हमारे बड़े भैया ने 12वीं के बाद इंजीनियरिंग की और छोटे भाई का भी यही प्लान था। ऐसे में मैंने पत्रकारिता को चुना। हालाँकि मेरे घरवालों को इससे कोई ऐतराज नहीं था, लेकिन समस्या यह थी कि मेरे शहर में पत्रकारिता की पढ़ाई नहीं होती थी और मुझे घर से बाहर भेजते उनका मन नहीं मान नहीं रहा था। बेटियों को लेकर जो डर हर माँ-बाप के मन में होता था, उनके मन में भी था और शायद यह स्वाभाविक भी था।

खैर, अपने मन को मनाते हुए और मेरे मन को रखते हुए वो इसके लिए तैयार हुए और मेरा एडमिशन मुजफ्फरपुर के बाबा साहेब भीमराव अम्बेडकर बिहार यूनिवर्सिटी (BRABU) के लंगट सिंह कॉलेज (LS College) में हुआ। यहाँ पर घर से दूर हॉस्टल में रहकर मैंने पत्रकारिता के बैचलर की पढ़ाई की। इसके बाद मैंने हरियाणा के गुरु जंभलेश्वर यूनिवर्सिटी से पत्रकारिता के मास्टर की पढ़ाई की। 

अब बारी आती है नौकरी की। मैंने दिल्ली में नौकरी की तलाश शुरू की। नौकरी तलाशने के दौरान इंटरव्यू में मुझे कई दिक्कतों का सामना करना पड़ा। कभी अनुभव न होने की दलील दी गई तो कभी छोटे शहर से पढ़ाई करने की। मैंने देखा कि कई जगहों पर योग्यता की जगह पर ब्रांड को वरीयता दी जाती है। कई मीडिया संस्थान तो विज्ञापन में भी सीधा लिख देती हैं कि उन्हें IIMC पास आउट ही चाहिए, फिर चाहे उसमें योग्यता हो या न हो। 

मैं ऐसा कतई नहीं कह रही कि IIMC में पढ़े लोगों में योग्यता नहीं होती। मेरे कहने का सीधा सा मतलब ये है कि नौकरी के लिए ब्रांड की बजाय योग्यता को तरजीह दी जाए। ये बात मैं ऐसे ही नहीं कह रही। जिस दौरान मैं नौकरी तलाश रही थी, मेरी एक दोस्त IIMC से पास आउट होकर एक बड़े और नामी मीडिया हाउस में काम कर रही थी। उसने मुझे सलाह दी कि मैं भी IIMC से एक साल का डिप्लोमा कोर्स कर लूँ तो एक अच्छी तनख्वाह के साथ नौकरी रखी हुई है। 

जैसा कि मैंने ऊपर बताया कि हर जगह अनुभव की माँग की जाती थी। अनुभव तो काम करने से ही आएगा और चूँकि मैंने कहीं काम नहीं किया था तो ये भी एक मुद्दा था। मेरी दोस्त ने बताया कि IIMC से पढ़ाई करने के बाद कोई अनुभव के बारे में भी नहीं पूछा जाता। खैर, उसी दौरान मेरी बात एक और पत्रकार दोस्त से हुई, वह भी काम की तलाश में थी। वो पहले काम कर रही थी, मगर उस समय उसने काम छोड़ रखा था, जब मैंने उससे इसका कारण पूछा तो मैं अंदर से थोड़ी सी डर गई।

मैं यहाँ पर उसके बारे में ज्यादा डिटेल में तो नहीं लिख सकती हूँ, मगर उस तरफ इशारा जरूर कर सकती हूँ। उसने मुझे अपने ऑफिस के माहौल के पुरुषवादी सोच और उनकी गंदी नजरों के बारे बताया। उसने बताया कि उसे वक्त-बेवक्त बुला लिया जाता था। काम करने की कोई टाइमिंग नहीं होती थी। कंधे पर, पीठ पर हाथ रखना आम बात हो गई थी, जिससे तंग आकर उसने एक दिन बिना आगे-पीछे सोचे इस्तीफा दे दिया। 

इन बातों ने मुझे अंदर तक हिलाकर रख दिया था। मगर फिर भी मैंने नौकरी की तलाश जारी रखी। हाँ, मैं सचेत जरूर हो गई थी। फिर एक दिन एक छोटी सी कंपनी में नौकरी लगी। सैलरी कुछ खास नहीं थी, और परेशानी काफी ज्यादा। मुझे घर से ऑफिस जाने में तकरीबन 2:30 से 3:00 घंटे लग जाते थे और फिर वापस आते हुए भी उतना ही। ऑफिस जाने से पहले और आने के बाद खाना बनाने का काम अलग से। खैर, जैसे-तैसे चल रहा था। मगर मैं भी खुद को उस माहौल में फिट नहीं कर पाई, क्योंकि यहाँ पर मेरी लड़ाई, पुरुषों से नहीं, बल्कि महिलाओं से ही थी।

कुछ महिलाएँ ही महिलाओं की दुश्मन होती हैं। कुछ महिलाएँ एक ऐसी सोच की शिकार होती हैं कि खुद एक दूसरे को आगे बढ़ने से रोकती हैं। मानसिकता ऐसी बना लेती हैं पुरुष की तरक्की देख लेंगी, लेकिन अपनी महिला साथी की तरक्की नहीं देख पाती। अगर कोई महिला बड़ी पोस्ट पर बैठ जाए तो शॉर्टकट अपनाने का लांछन लग जाता है। 

आज भी पत्रकारिता में महिलाओं का प्रतिशत भले ही बढ़ गया है, लेकिन महिला मुद्दों के प्रति संवेदना की कमी है। अधिकांश महिलाएँ पुरुष मानसिकता से भरी हुई हैं और ऐसी महिलाओं के संवेदना का स्तर अधिक जागरूक नहीं है। मेरे ख्याल से तो महिला मुद्दों को व्यक्तिगत तौर पर न लेकर सामाजिक नजरिए से देखने की जरूरत है, क्योंकि यह केवल उनका नहीं, पूरे समाज का मुद्दा है।

आज भी पत्रकारिता का क्षेत्र महिलाओं के लिए दाँव-पेंच से भरा हुआ है। हालाँकि महिला पत्रकारों ने उस वक्त को काफी पीछे छोड़ दिया है, जब उन्हें अमूमन फैशन शो या प्रदर्शनी कवर करने की जिम्मेदारी दी जाती थी। आज जब वे युद्ध, नागरिक संघर्ष, राजनीति, वित्त, खेल, विज्ञान और अन्य अनेक विषयों की रिपोर्टिंग कर रही हैं, तब भी उन्हें आम तौर पर पुरुष सहयोगियों की अपेक्षा कम वेतन मिलता है और उनके यह तय करने के अवसर कम मिलते हैं कि वह क्या करना चाहती है।

महिला पत्रकार को लैंगिक भेदभाव से भी गुजरना पड़ता है। कुछ जगहों पर आज भी उन्हें लड़का होने की दुहाई दी जाती है। उनका ज्ञान स्तर भी इसी आधार पर आँका जाता है। ऐसा अनुभव मैंने स्वयं भी किया है और अपनी महिला पत्रकार मित्रों के मुँह से भी कई बार सुना है। मीडिया में काफी सारी महिला रिपोर्टर हैं। लेकिन जब शीर्ष प्रबंधन की बात आती है, तो उसमें गिनी-चुनी ही पहुँच पाती हैं। हमें इस धारणा के खिलाफ भी लड़ना होता है कि एक महिला पत्रकार को ही महिला से जुड़े विषयों की रिपोर्टिंग करनी चाहिए- यह एक महिला का काम है। लेकिन यह एक महिला का काम नहीं, यह पत्रकारिता है।

बाबरी विध्वंस मामले की जल्द हो सुनवाई, लंबा न खींचा जाए: इक़बाल अंसारी की CBI कोर्ट से माँग, दर्ज होगा आरोपितों का बयान

अयोध्या में राम मंदिर और बाबरी मस्जिद का विवाद सुलझ गया है। भव्य राम मंदिर का निर्माण भी प्रारंभ हो गया है। बाबरी ध्वंस मामले के याचिकाकर्ता इक़बाल अंसारी ने कहा है कि अब इस मामले को बिना किसी राजनीति के समापन कर देना चाहिए। बाबरी मस्जिद विध्वंस मामले में इक़बाल अंसारी ही मुख्य याचिकाकर्ता है और उन्होंने कहा है कि वो इस मामले में अब लम्बी सुनवाई नहीं चाहते हैं। इसे ख़त्म किया जाना चाहिए।

उन्होंने स्पेशल सीबीआई कोर्ट से कहा है कि उन्हें सुप्रीम कोर्ट की राह पर चलते हुए जल्द से जल्द फ़ैसला सुनाएँ। उन्होंने ‘बिना समय जाया किए’ इस मामले में न्याय की माँग की है। उन्होंने कहा कि मंदिर और मस्जिद विवाद को लेकर सुप्रीम कोर्ट को जो फ़ैसला देना था वो आ चुका है, इसीलिए अब इस मामले को आराम दे देना चाहिए। उन्होंने कहा कि सबने सुप्रीम कोर्ट का निर्णय माना है, इसी तरह स्पेशल सीबीआई कोर्ट को भी बाबरी ध्वंस मामले की जल्द सुनवाई करनी चाहिए।

इक़बाल अंसारी ने कहा कि अब देश में राम मंदिर और बाबरी मस्जिद विवाद पर कोई तनाव नहीं होना चाहिए और साम्प्रदायिकता के लिए कोई जगह नहीं बचनी चाहिए। उन्होंने माँग करते हुए कहा कि ऐसे किसी भी विवाद को अब आराम देने का समय आ गया है क्योंकि अब इसे आगे नहीं ले जाया जा सकता। बता दें कि 4 जून को स्पेशल सीबीआई कोर्ट उनलोगों के बयान दर्ज करेगी, जो बाबरी विध्वंस के आरोपित हैं।

बता दें कि आरोपितों की सूची में कई बड़ी हस्तियों के नाम शामिल हैं। इनमें पूर्व उप-प्रधानमंत्री लालकृष्ण अडवाणी, पूर्व भाजपा अध्यक्ष मुरली मनोहर जोशी और मध्य प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती का नाम शामिल है। इस मामले की सुनवाई स्पेशल जज एसके यादव कर रहे हैं और सीआरपीसी की धारा 303 के तहत आरोपितों का बयान दर्ज किया जाना है। हालाँकि, अभी ये साफ़ नहीं है कि सभी 32 अभियुक्त कोर्ट में पेश होंगे का वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जारी सुनवाई होगी।

अंसारी ने कहा कि देश इस समय महामारी के कारण बीमारी व आर्थिक संकटों से जूझ रहा है ऐसे में अब किसी भी प्रकार के सांप्रदायिक मामले नहीं होने चाहिए। हालाँकि, इक़बाल अंसारी ने केस वापस लिए जाने के सम्बन्ध में कुछ नहीं कहा। इससे पता चलता है कि वो राम मंदिर मामले की तरह इसमें भी पीछे नहीं हटेगा और सुनवाई जारी रहेगी लेकिन साथ ही उसकी माँग है कि इसे जल्दी पूरा कर ‘न्याय’ दिया जाए।