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हिन्दू नाबालिग से गैंगरेप में शामिल शाहनवाज को सेना ने सौंपा, सिलीगुड़ी से लेकर साहिबगंज पहुँची पुलिस

झारखंड के साहिबगंज जिले में नाबालिग हिंदू से गैंगरेप के सभी आरोपितों को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। तीसरे आरोपित आरोपित शाहनवाज शेख को सेना ने पुलिस को सौंप दिया। इसके बाद ट्रांजिट रिमांड पर पुलिस उसे सिलीगुड़ी से साहिबगंज लेकर आई।

घटना 25 मई की है। आम चुनने के लिए बगीचे में गई पीड़िता के साथ इदगार शेख, शाहनवाज शेख और एकरामुल शेख ने रेप किया था। मामला दो समुदाय से जुड़ा होने के कारण इलाके में तनाव पैदा हो गया था।

इस मामले में सबसे पहले एकरामुल की गिरफ्तारी हुई थी। उसके बाद 27 मई को इदगार पकड़ा गया था। उसकी गिरफ्तारी के बाद साहिबगंज के एसपी अनुरंजन ने ऑपइंडिया से बातचीत में शाहनवाज के सेना से जुड़े होने की पुष्टि की थी। उन्होंने बताया था कि वह सेना की मेडिकल कोर टीम का हिस्सा है और उसकी गिरफ्तारी के प्रयास जारी हैं।

घटना के बाद शहनवाज भाग कर सिलीगुड़ी पहुँच गया था और अपनी यूनिट ज्वाइन कर ली थी। सेना द्वारा शाहनवाज को नियमानुसार सिलीगुड़ी में क्वारंटाइन कर रखा गया था। पुलिस को मोबाइल लोकेशन के आधार पर उसके वहाँ होने की सूचना मिली। इसके बाद पुलिस कोर्ट से वारंट लेकर पहुँची और सेना के अधिकारियों को पूरे मामले की जानकारी दी। इसके बाद आरोपित को पुलिस को सौंप दिया गया। 

इससे पहले मीडिया रिपोर्टों में बताया गया था कि शाहनवाज ईद की छुट्टियों में घर आया था और इस घटना के बाद वापस अपनी ड्यूटी पर लौट गया। घटना के बाद नाराज लोगों ने आरोपितों में से एक के पिता को घर से निकालकर उसकी पिटाई की। इसके बाद माहौल को देखते हुए वहाँ रैपिड एक्शन फोर्स के जवानों की तैनाती करनी पड़ी थी।

पीड़िता ने अपने बयान में बताया था कि 25 मई की शाम लगभग 4:00 बजे वह अपने घर के पीछे बगीचे में आम चुनने के लिए गई थी। वहॉं एकरामुल ने उसे पकड़ लिया और शोर करने पर चाकू से गला रेतने की धमकी दी।
इसके बाद उसे पकड़ कर वह पास की एक झाड़ी में ले गया।

पीड़िता ने पुलिस को बताया कि आरोपित लड़के के साथ वहाँ दो और लोग मौजूद थे। जब एकरामुल शेख ने बलात्कार किया, तब अन्य 2 लड़कों ने उसे पकड़कर रखा था। उसके बाद बारी-बारी से उन लड़कों ने भी उसके साथ बलात्कार किया। रेप के बाद तीनों युवक मोटरसाइकिल से फरार हो गए। इसके बाद पीड़िता ने घटना की सूचना अपने माता-पिता को दी।

महाराष्ट्र के पंढरपुर की वार्षिक यात्रा ‘पालकी’ और जम्मू-कश्मीर का ‘खीर भवानी’ मेला रद्द, कोरोना बनी वजह

देश में लगातार बढ़ते कोरोना मरीजों की संख्या के डर के बीच महाराष्ट्र सरकार ने महाराष्ट्र के प्रख्यात संत ज्ञानेश्वर और तुकाराम महाराज की बहुप्रतिक्षित वार्षिक “पालकी” कार्यक्रम को फिलहाल रद्द कर दिया है। वहीं जम्मू-कश्मीर के खीर भवानी मेले को फिलहाल रद्द करने का फैसला लिया गया है।

खबरों के मुताबिक उपमुख्यमंत्री अजीत पवार ने महाराष्ट्र में कोरोनो वायरस महामारी के बीच घोषणा की है कि दो संतों की चाँदी के पादुकाओं की वार्षिक तीर्थयात्रा को रद्द कर दिया गया है, अब इन्हें पुणे से जहाज के द्वारा पंढरपुर ले जाया जा सकता है। इस निर्णय की घोषणा उप मुख्यमंत्री अजीत पवार और मंदिर के ट्रस्टियों के बीच हुई बैठक के बाद की गई है।

डिप्टी सीएम अजीत पवार ने कहा कि पुणे, सतारा और कोलापुर सोलापुर जिले में लगातार कोरोना वायरस के केस बढ़ रहे हैं। इसलिए पालकी यात्रा को रद्द करने का फैसला लिया गया है।

“भले ही हम पुणे से सीमित लोगों को यात्रा निकालने की अनुमति दे दें, मगर संभावना है कि रास्ते में हजारों लोग इसमें शामिल हो जाएँगे। ऐसी स्थिति में भीड़ को नियंत्रित करना बेहद मुश्किल होगा और इससे संक्रमण फैलने का खतरा बढ़ जाएगा।”

उन्होंने आगे कहा परिवहन का जरिया मौसम की स्थिति को ध्यान में रखते हुए तय किया जाएगा। अगर हवाई यात्रा उपयुक्त नहीं है, तो पालकी को बस द्वारा ले जाया जाएगा। आपको बता दें कि यह यात्रा जून के महीने में मानसून के दौरान निकलती है।

पंढरपुर में हर साल जुटते हैं लाखों श्रद्धालु

हर साल जून के महीने में होने वाली पालकी यात्रा में महाराष्ट्र, कर्नाटक और तमिलनाडु से लाखों की संख्या में श्रद्धालु शामिल होते हैं। श्रद्धालू पुणे से दो साधुओं की पादुकाओं की रथ लेकर पंढरपुर तक जाते हैं, जो कि करीब 200 किमी की यात्रा करते हैं। लगभग 19-20 दिनों तक चलने वाली इस यात्रा के बाद 15 लाख से अधिक श्रद्धालु पंढरपुर में इकट्ठा होते हैं।

बैठक में अलांदी और देहु देवस्थान के ट्रस्टियों ने सरकार से 25 श्रद्धालुओं के साथ पादुकाओं को ले जाने की अनुमति देने का आग्रह किया था। इस प्रस्ताव को खारिज कर दिया गया था।

देहु पालकी सोलह समिति के अध्यक्ष मणिकराव मोरे ने कहा, “हालाँकि हम खुश नहीं हैं, मगर हम सरकार के फैसले का पालन करेंगे, क्योंकि हम ऐसा कुछ भी नहीं करना चाहते हैं जिससे संक्रमण फैले।” ट्रस्टियों ने कहा कि दो संतों की पादुकाओं को आषाढ़ी एकादशी से एक दिन पहले पंढरपुर को लेकर आएँगे, जो कि 1 जुलाई को पड़ता है।

वहीं दूसरी ओर जम्मू कश्मीर के वार्षिक खीर भवानी मेला और यात्रा के मौके पर शनिवार 30 मई, 2020 को माता खीर भवानी मंदिर में कुछ श्रद्धालुओं ने प्रार्थना की। संतों ने कहा कि हमने लोगों से सरकारी निर्देशों का पालने करने को कहा है। दरअसल, इस मेले में 80 हजार से अधिक लोग शामिल होते हैं, लेकिन इस बार कुछ ही लोग शामिल हुए हैं। कोरोना संक्रमण के चलते फिलहाल मेले के रद्द कर दिया गया है।

जब लोकमान्य तिलक की प्रेस को बिकने से बचाने के लिए लोगों ने जुटाए थे ₹3 लाख

यह देखना दिलचस्प है कि आज के समय में भी पाश्चात्य बौद्धिक साहित्य का दास इस देश का बौद्धिक दैन्य वर्ग, जो खुद को पत्रकारिता का एकमात्र सिपहसलार घोषित कर चुका है, महज इस तथ्य से रूठ जाता है कि सत्य का कोई दूसरा पहलू भी हो सकता है, जो कि उनके द्वारा तय परिभाषा के दायरे में न आता हो।

मसलन, एक ओर प्रेस की आजादी की वकालत की जाती है तो दूसरी तरफ पत्रकारिता की परिभाषाएँ गढ़ी जा रही है। सोशल मीडिया पर कमोबेश हर दूसरे दिन गतानुगतिक वाम-उदारवादियों को लोगों को पत्रकारिता के सर्टिफिकेट बाँटते देखा जा सकता है।

अभिव्यक्ति की आजादी के लिए राष्ट्रवादी विचारधारा को वही संघर्ष आज भी देखना पड़ता है, जिससे एक समय लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक को गुजरना पड़ा था।

वही लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक, जिन्हें अपनी राष्ट्रवादी सोच के कारण ‘अशांति का जनक’ कहा गया। उन्हें ऐसा कहने के पीछे कई कारणों में से एक उनकी ओजस्वी भाषा थी, जिसने तत्कालीन समाज को तत्परता से स्वराज्य के विषय पर सोचने पर मजबूर किया।

क्या ही संयोग है कि हम सबने हाल ही के कुछ वर्षों में महसूस किया कि किस तरह से दक्षिणपंथी विचारधारा पर भी ऐसे ही कई तरह के आरोप लगाए जाते रहे हैं और ऐसे संस्थान या उस विचारधारा के समर्थकों को ‘समाज में अशांति फैलाने’ वाला साबित करने के प्रयास किए गए। यह सब किस कारण किया गया? तिलक पर दो बार राजद्रोह के आरोप लगाए गए? आख़िर वह किस कारण हुआ था? वैचारिक वर्चस्व की जंग में विपरीत विचारधारा परएफ़आईआर-वादी’ संगठन तब भी थे और आज भी ऐसे उदाहरण मौजूद हैं।

इन्हीं सब घटनाओं के बीच आज ‘हिंदी पत्रकारिता दिवस’ है। इस पर सबसे पहले लोकमान्य बाल गंगाधार तिलक का नाम का स्मरण हो आना भी वाज़िब है, जिन्हें मराठा दैनिक समाचार पत्र ‘केसरी’ और ‘महरात्ता’, जो कि एक अंग्रेजी साप्ताहिक था, में उनके लेखन के लिए अंग्रेजों द्वारा दो बार राजद्रोह के आरोप में गिरफ़्तार किए गए।

जब प्रेस को गिरवी होने से बचाने के लिए जुटाया था चंदा

‘सर’ वेलेंटाइन चिरोल लंदन टाइम्स के इंपीरियल विभाग के निदेशक थे। चिरोल ने वर्ष 1910 के बाद ‘द इंडियन अनरेस्ट’ (The Indian Unrest) नामक पुस्तक में भारत की राजनीतिक स्थिति पर कुछ आक्रामक लेख प्रकाशित किए।

इसी में उसने लोकमान्य तिलक को ‘भारतीय अशांति का जनक’ भी कहा था। चिरोल ने भारत में क्रांतिकारियों के साथ लोकमान्य के संबंधों को स्थापित करने का प्रयास किया और लिखा कि बंगाल में बम विस्फ़ोट और तेजी से बढ़ रहे गुप्त सोसायटी के प्रेरक और आयोजक तिलक ही थे। इस किताब में चिरोल ने तिलक के ‘चितपावन’ ब्राह्मण वंश के बारे में कई तरह की आपत्तिजनक बातें लिखीं थीं।

चिरोल ने मुख्यतः छह आधारों पर लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक को बदनाम करने की कोशिश की थी –

  • नासिक के कलेक्टर जैक्सन की हत्या
  • रैंड की हत्या
  • ताई महाराज केस
  • ब्लैकमेल
  • जिम्नास्टिक सोसाइटीज
  • गौ-रक्षक समाज

जब यह पुस्तक प्रकाशित हुई तब बाल गंगाधर तिलक ने साल 1908 से लेकर 1914 तक राजद्रोह के मामले में मांडले (वर्तमान म्यांमार) में जेल की सज़ा काट रहे थे। भारत में प्रेस की स्वतन्त्रता पर ऐसा हमला पहली बार हुआ था। लोकमान्य तिलक ने अपने अखबार ‘केसरी’ में मुज़फ्फरपुर में क्रांतिकारी खुदीराम बोस और प्रफुल्ल चाकी के मुक़दमे पर लिखते हुए तुरंत ‘स्वराज’ की माँग उठाई थी।

मांडले जेल में तिलक का अधिकांश समय ‘गीता रहस्य’ और कोर्ट में अपनी दलीलें लिखने में गुजरता था

इस मुकदमे में तिलक की वकालत मोहम्मद अली जिन्ना ने की थी, जो कि अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत में एक उदारवादी थे लेकिन स्वतन्त्रता तक एक प्रमुख कट्टरपंथी बनकर उभरे।

जिन्ना ने इस मुकदमे में तिलक को ज़मानत दिलाने की कोशिश की, लेकिन ये कोशिश सफल नहीं हो सकी और आखिरकार तिलक को 6 सालों के लिए जेल भेज दिया गया। यह भी एक दूसरा सत्य है कि खिलाफत आन्दोलन में गाँधी की भूमिका के बाद से उनसे दूरी बनाकर रखने वाले जिन्ना, तिलक के बहुत करीबी थे।

वर्ष 1916 में तिलक और जिन्ना के बीच हिंदू-मुस्लिम एकता और दोनों समाजों की सत्ता में भागीदारी को लेकर एक समाधान निकाला गया। 1920 में तिलक की मृत्यु के बाद जिन्ना भी कॉन्ग्रेस की राजनीति से दूर होते चले गए। माना जाता है कि यदि यह फॉर्मूला कायम रहता तो देश का विभाजन नहीं होता।

राजद्रोह की सजा के बाद

राजद्रोह के आरोप में सजा काटने के बाद जेल से निकलते ही 1915 में उन्होंने चिरोल पर मुकदमा किया था। सरकार की देरी के कारण वह सितम्बर 1918 में शिकायत दर्ज करने के लिए लन्दन रवाना हुए। इंग्लैंड जाने की अनुमति उन्हें इस शर्त पर दी गई कि वे किसी भी तरह की राजनीतिक गतिविधि में शामिल नहीं होंगे।

लोकमान्य तिलक ने चिरोल से कहा कि वह माफी माँगे और भारतीय युद्ध राहत कोष में योगदान करे। हालाँकि, उन्हें इसमें जीत की आशा बहुत कम थी और हुआ भी यही। आखिर में ज्यूरी ने फैसला चिरोल के ही पक्ष में दिया।

लेकिन इस मुकदमे के बाद चिरोल तिलक के व्यक्तित्व से बेहद प्रभावित हुआ और 1926 में तिलक के देहांत के बाद एक दूसरी पुस्तक लिखते हुए तिलक के साहस और उनके लक्ष्य के प्रति समर्पण की जमकर तारीफ़ की।

चिरोल से मुकदमा लड़ते हुए तिलक को करीब तीन लाख रुपए की हानि हुई थी। यही नहीं, उन्हें अपना घर, गायकवाड़ वाड़ा और केसरी-महरात्ता प्रिंटिंग प्रेस को गिरवी रखना पड़ा। ऐसे में उनके समर्थकों ने चन्दा इकठ्ठा किया और लगभग तीन लाख रुपए कुछ ही समय में जमा हो गए।

वर्ष 1905 में, लोकमान्य तिलक ने बड़ौदा के महाराजा सयाजीराव गायकवाड़ से पुणे में ‘गायकवाड़ वाड़ा’ खरीदा था। वर्तमान में इस स्थान को ‘तिलक वाड़ा’ या ‘केसरी वाड़ा’ (केसरी अखबार के प्रधान कार्यालय के कारण) के रूप में जाना जाता है।

तिलक ने चंदे के माध्यम से जुटाए गए इस धन के बारे में सुना तो उन्होंने फ़ौरन डीवी गोखले को इंग्लैंड से एक पत्र लिखकर कहा कि भारत की जनता से कोई धन ना लिया जाए, क्योंकि तिलक का मानना था कि चिरोल मुकदमा उनका निजी मसला था।

इसके बाद लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक मई 22, 1920 को पुणे के तत्कालीन गायकवाड़ वाड़ा (अब तिलक वाड़ा) में जब डॉ. नानासाहेब देशमुख के साथ एक सभा में मौजूद थे, तभी उस चंदे से जमा करीब तीन लाख पच्चीस हजार रुपए लोगों ने तिलक को सौंपे।

आखिरकार उनके तमाम विरोध के बावजूद उन्होने यह धन स्वीकार किया और जनता को धन्यवाद करते हुए कहा कि उन्होंने सरकार से संघर्ष में यह योगदान कर के उनके जीवन के दो-चार वर्ष और बढ़ा दिए हैं।

कैसे शुरू हुए ‘केसरी’ और ‘महारात्ता’

लोकमान्य तिलक, विष्णुशास्त्री चिपलूनकर और गोपाल गणेश अगरकर ने पुणे में जनवरी 02, 1880 में ‘न्यू इंग्लिश स्कूल’ शुरू किया। महादेव बल्लाल नामजोशी, एक स्थानीय संपादक भी स्कूल का हिस्सा थे।

उसी वर्ष, इसके संस्थापकों ने स्कूल के विस्तार के लिए 2 शाखाओं में बाँटने का विचार किया। इस बारे में फैसला लिया गया कि एक कॉलेज जबकि दूसरी शाखा एक प्रिंटिंग प्रेस और एक अखबार के रूप में शुरू की जाएगी।

अखबार शुरू करने का विचार सबसे पहले विष्णुशास्त्री और नामजोशी के दिमाग में कौंधा था। तिलक और अगरकर ने इस पर अपनी सहमति दी। इसी समय नामचीन विद्वान वामनराव आप्टे भी वर्ष 1880 के अंत में स्कूल में शामिल हुए।

एक दिन आप्टे के घर में दोपहर का भोजन करते समय, तिलक, अगरकर, नामजोशी और विष्णुशास्त्री ने जनवरी 1881 में केसरी और महरात्ता समाचार पत्र शुरू करने का फैसला किया। उन्होंने तय किया कि इसके लिए आवश्यक कागजात को वे अपने स्वयं के प्रिंटिंग प्रेस से ही मुद्रित किया जाना चाहिए।

पुणे में प्रसिद्ध विंचुरकर वाड़ा, जहाँ लोकमान्य तिलक ने 1881 में ‘केसरी’ की शुरुआत की थी। 1903 तक लोकमान्य खुद यहाँ पर एक किराएदार के रूप में रहते थे। स्वामी विवेकानंद 1892 में तिलक के अतिथि के रूप में यहाँ रुके थे।

इसके संस्थापकों ने एक सामान्य बांड पर केशव बल्लाल साठे से मशीनरी का अधिग्रहण किया। यह मशीनरी ‘आर्यभूषण प्रेस’ में स्थापित की गई थी, जिसकी स्थापना 1878 में बुधवर पेठ में मोरोबाडाडा वाडा में विष्णुशास्त्री द्वारा की गई थी।

प्रेस में पहला प्रिंट ‘केसरी’ के उद्देश्यों के विवरण का था, जिस पर विष्णुशास्त्री, तिलक, अगरकर, आप्टे, नामजोशी और डॉ. गणेश गद्रे के हस्ताक्षर थे। साथ ही, इसमें विष्णुशास्त्री के प्रसिद्ध ‘निबन्धमाला’ के 66वें संस्करण को भी प्रिंट किया गया। आखिरकार जनवरी 02, 1881 और जनवरी 04, 1881 को क्रमशः महरात्ता और केसरी (द लायन) के पहले संस्करण प्रकाशित हुए।

समय के साथ केसरी जनता की आवाज बन गया। जब पुणे में प्लेग की बीमारी फैली, तब आर्यभूषण प्रेस, जिसमें कि उनके समाचार पत्र छपते थे, के मालिक ने लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक से कहा कि प्रेस में कर्मचारियों की संख्या प्लेग के कारण गिरती जा रही है और इसलिए जब तक यह महामारी ख़त्म नहीं हो जाती, तब तक ‘केसरी’ की प्रतियाँ समय पर नहीं छप सकती। इस पर लोकमान्य तिलक ने दृढ़ता से उन्हें जबाव देते हुए कहा-

“आप आर्यभूषण के मालिक और मैं ‘केसरी’ का संपादक, यदि इस महामारी में हम दोनों को ही मृत्यु आ गई, तब भी हमारी मृत्यु के बाद, पहले 13 दिनों में भी ‘केसरी’ मंगलवार की डाक से जाना चाहिए।”

यह वो दौर था जब लोगों ने प्रेस की स्वतन्त्रता की आवश्यकता को समझकर तिलक के प्रेस को गिरवी रखने से बचाया था। राष्ट्रवादी लोग यह अच्छी तरह से जानते थे कि औपनिवेशिक ब्रिटिश साम्राज्य से स्वराज्य के लिए स्वतंत्र आवाज का कितना महत्व है।

आज के समय में राष्ट्रवाद को विचारधारा मानने से ही इनकार कर दिया जाता है। रक्तपिपासु कम्युनिस्ट आवाज दबाने में निपुण हैं। अपनी पत्रकारिता के इसी आडम्बर के बीच बेहद शातिर तरीके से वो यह भी साबित करते देखे जाते हैं कि उनकी ही आवाज को दबाया जा रहा है। विपरीत स्वरों को सुनने की जिस क्षमता का अभाव उस समय के ब्रिटिश शासन में था, उससे कहीं अधिक वामपंथी एजेंडाबाजों में यह अभाव आज मौजूद है।

इन्हीं आत्मरतिक वामपंथियों के द्वारा विचारधारा के वर्चस्व की तुलना प्रेस की स्वतन्त्रता से भी की जाती है। प्रेस की आजादी के सन्दर्भ में हर काल-खंड में अंतिम प्रश्न बस यही होगा कि जब सब कुछ आत्यंतिक हो, तब आप वैचारिक रूप से कितने उदासीन रह सकते हैं?

1.80 करोड़ बच्चों को योगी सरकार देगी मिड डे मील का अनाज, ₹1000 भी अभिभावकों के बैंक एकाउंट में डालने का फैसला

लॉकडाउन और कोरोना संकट के दौरान उत्तर प्रदेश की योगी सरकार जनता की सुविधाओं को मद्देनजर रखते हुए कई फैसले कर रही हैं। वहीं अब यूपी सरकार ने करीब 1.80 करोड़ बच्चों को लॉकडाउन की अवधि और गर्मी की छुट्टियों के मिड डे मील का अनाज पहुँचाने का फैसला लिया है।

साथ ही योगी सरकार की तरफ से अभिभावकों के बैंक एकाउंट में 1000 रुपए डालने की भी तैयारी है। ये सुविधा सरकार की तरफ से कन्वर्जेंस कास्ट के ज़रिए दिया जा रहा है।

अपर मुख्य सचिव रेणुका कुमार ने प्रदेश के सभी डीएम को निर्देश दिए है। जिसके अनुसार कक्षा 1 से 5 तक के बच्चों को 100 ग्राम अनाज प्रतिदिन और 4.97 रुपए प्रतिदिन मिलेगा। वहीं कक्षा 6-8 तक के बच्चों को 150 ग्राम अनाज प्रतिदिन और 7.45 रुपए प्रतिदिन मिलेगा। (बीते शैक्षिक सत्र में कन्वर्जन कॉस्ट प्राइमरी के लिए 4.48 व जूनियर में 6.71 रुपए थी। लिहाजा 24 से 31 मार्च तक की गणना इसके आधार पर होगी।)

यूपी में कुल 1,23,14,652 प्राथमिक और 57,05,194 जूनियर बच्चें सरकारी स्कूल में है। और इसी हिसाब से लगभग सरकारी व सहायता प्राप्त स्कूलों में पढ़ रहे 1.80 करोड़ बच्चों को इसका लाभ मिलेगा।

उन्होंने आगे कहा धनराशि आरटीजीएस के माध्यम से छात्रों के माता-पिता/अभिभावकों के बैंक खाते में ट्रांसफर किया जाएगा। जिसकी पूर्ण जानकारी (अभिभावक का नाम, मोबाइल नंबर, बैंक खाता आदि) इकट्ठा करने के लिए तत्काल प्रभाव से प्रधानाचार्य व शिक्षकों को लगाया जाएगा।

इसके अलावा प्रिंसिपल को वाउचर जारी किया जाएगा। जिसमें स्कूल, छात्र-छात्रा का नाम, पंजीयन संख्या, कक्षा व खाद्यान्न की मात्रा जैसी जानकारी को भरना होगा।

सोशल डिस्टेंसिग का ख्याल रखते हुए स्कूल प्रिंसीपल एक समय में 2 से 3 अभिभावकों को स्कूल में बुलाकर खाद्यान्न और खाते से संबंधित जानकारी ले सकते हैं।

आपको बता दें यूपी सरकार आए दिन प्रवासी मजदूरों के लिए अलग-अलग योजनाओं की भी पहल कर रही हैं। ताकि गृहराज्य वापस लौटे श्रमिको को रोजगार के लिए वापस अन्य राज्यों में न जाना पड़े।

सरकार ने इंडियन इंडस्ट्री एसोसिएशन व अन्य औद्योगिक संस्थाओं के साथ 11 लाख 50 हजार लोगों को रोजगार के अवसर प्रदान करने के लिए चार एमओयू पर हस्ताक्षर किया।

कामगारों को उनके गृह जनपद में ही रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने के लिए योगी सरकार बड़ी तेजी से डेटाबेस बनाने में जुटी हुई है। इसी क्रम में करीब 14.75 लाख कामगारों की स्किल मैपिंग का काम पूरा करवा लिया गया है। अब इनकी ट्रेनिंग करवाकर इन्हें रोजगार दिया जाएगा। ट्रेनिंग के दौरान इन्हें ट्रेनिंग भत्ता भी दिया जाएगा।

इस स्किल डेवलपमेंट ट्रेनिंग से प्रवासियों के हुनर का लाभ लेकर यूपी के अर्थतंत्र को मजबूत करने की दिशा में काम शुरू कर दिया गया है। उनकी विशेषज्ञता के आधार पर उत्पादों और उत्पादन को बढ़ावा देने का भी काम किया जाएगा।

बड़े फैसलों का साल: मोदी सरकार 2.0 का पहला साल पूरे होने पर नड्डा ने गिनाई उपलब्धियाँ

मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल का एक साल पूरा होने पर बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा ने शनिवार (20 मई 2020) को दिल्ली में प्रेस कॉन्फ्रेंस किया। सरकार की एक साल की उपलब्धियॉं गिनाते हुए बताया कि बीजेपी देशभर में वर्चुअल रैलियों का आयोजन करेगी। इस दौरान पार्टी मोदी सरकार की उपलब्धियों को पेश करेगी।

नड्डा ने कहा कि मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल का पहला साल उपलब्धियों भरा रहा है। साथ ही इस वर्ष में सरकार ने कई सारी चुनौतियों का भी सामना किया है। लेकिन यह सरकार जवाबदेही वाली रही है और इसमें फैसला लेने की भी क्षमता है।

उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी ने अपने दूसरे कार्यकाल के पहले वर्ष में बहुत डिसाइसिव फैसले लिए हैं। जम्मू-कश्मीर से आर्टिकल 370 निरस्त किया, तीन तलाक पर कानून बनाया। इन फैसलों के सूत्रधार गृहमंत्री अमित शाह बने। यह सब प्रधानमंत्री जी की इच्छाशक्ति का ही नतीजा था।

नड्डा ने बताया कि वर्षों से नागरिकता संशोधन बिल लटकाया जा रहा था। अफगानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान से धार्मिक प्रताड़ना के शिकार शरणार्थियों को नागरिकता मिलनी चाहिए थी, लेकिन ये हो नहीं पा रहा था। प्रधानमंत्री मोदी ने फैसला लिया और इस फैसले के कारण आज सीएए लागू हुआ और वंचितों को मुख्यधारा में शामिल होने का मौका मिला है। 

जेपी नड्डा ने बताया कि हमारे जीवन में सदियों से एक सपना रहा कि रामलला का भव्य मंदिर बने। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया। कॉन्ग्रेस ने इस फैसले में देरी की। आज खुशी है कि प्रधानमंत्री जी ने जमीन आवंटित कर राम मंदिर ट्रस्ट को सौंप दी है।

नड्डा ने आगे बताया कि कि हमने कोरोना के खिलाफ लड़ाई में 100 से ज्यादा देशों को मदद करते हुए उन्हें दवाइयाँ भी पहुँचाई है। इस लड़ाई में प्रधानमंत्री मोदी के एक-एक आह्वान को देश ने सुना और उसका समर्थन भी किया। इसके लिए मैं देश की जनता का धन्यवाद देता हूँ। 

कई बड़े और शक्तिशाली देश कोविड-19 के खिलाफ बेबस हो गए हैं, लेकिन भारत में हालात नियंत्रण में हैं। कोरोना संकट के बीच प्रधानमंत्री ने 20 लाख करोड़ रुपए के पैकेज की घोषणा करके इसके जरिए हर सेक्टर को आत्मनिर्भर बनाने का प्रयास किया।

वहीं केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार ने अपने छह साल के कार्यकाल में कई ऐतिहासिक गलतियों को सुधारा और आत्मनिर्भर भारत की नींव रखी, जो विकास की राह पर है।

शाह ने ट्वीट करके हुए लिखा, “मैं मोदी 2.0 के एक वर्ष सफल होने पर देश के लोकप्रिय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को हार्दिक बधाई देता हूँ। यह ऐतिहासिक उपलब्धियों से परिपूर्ण रहा है।”

मोदी सरकार 2.0 के एक साल पूरे होने पर भाजपा ने ‘बड़े फैसले, कम हुए फासले’ थीम पर आधारित एक वीडियो अपने आधिकारिक हैंडल से ट्वीट किया है। करीब 10 मिनट के इस वीडियो में सरकार के कामकाज और फैसलों को दिखाया गया है। 

आपको बता दें कि पिछले दिनों राज्य इकाइयों और अन्य भाजपा कार्यकर्ताओं को भेजी चिट्ठी में पार्टी के महासचिव अरुण सिंह ने लिखा था कि सभी बड़े राज्यों की इकाइयां कम से कम दो और छोटे राज्यों की इकाइयाँ कम से कम एक वर्चुअल रैली का आयोजन करेंगी।

कम से कम 750 लोगों का रैली में शामिल होना जरूरी है। इसके अलावा देशभर में 1000 से ज्यादा ऑनलाइन कॉन्फ्रेंस का आयोजन भी किया जाएगा। वहीं, इन कॉन्फ्रेंस को करने का जिम्मा पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को सौंपा जाएगा। वरिष्ठ नेताओं को मिलाकर 150 नेता इन रैलियों को संबोधित करेंगे।  

2018 में ही तय हो गई थी निकाह की तारीख: कॉन्ग्रेस नेता इशरत जहाँ को मिली 10 दिनों की जमानत, दिल्ली दंगों में हैं आरोपित

दिल्ली में हुए हिन्दू-विरोधी दंगों के मामले में जेल में बंद इशरत जहाँ को कोर्ट से जमानत मिल गई है। कॉन्ग्रेस की पूर्व पार्षद इशरत को उनके निकाह के लिए 10 दिनों की जमानत पर रिहा किया गया है। बता दें कि कॉन्ग्रेस की पूर्व म्युनिसिपल काउंसिलर इशरत जहाँ के खिलाफ यूएपीए (ग़ैरक़ानूनी गतिविधि रोकथाम अधिनियम) के तहत कार्रवाई चल रही है। उन्होंने दिल्ली की अदालत से गुरुवार (मई 29, 2020) को जमानत के लिए गुहार लगाई थी।

बता दें कि फ़रवरी में दिल्ली में हिन्दू-विरोधी दंगे भड़के थे, जिसमें इशरत जहाँ और उनके समर्थकों द्वारा लोगों को भड़काने का मामला सामने आया था। इशरत के समर्थक खालिद ने तो पुलिस को रोकने के लिए भीड़ जुटाई थी। एडिशनल सेशन जज प्रवीण सिंह ने इस मामले की सुनवाई की। एडिशनल पब्लिक प्रासीक्यूटर ने इशरत के निकाह के सम्बन्ध में जानकारी जुटाने के लिए समय माँगा था, जिसके बाद जमानत याचिका पर आज सुनवाई हुई। फिर 10 दिनों के लिए जमानत दे दी गई।

वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जारी हुई सुनवाई में प्रासीक्यूटर धरम चंद ने अदालत से कहा था कि इशरत के निकाह की सत्यता की पुष्टि किए जाने की ज़रूरत है, जिसके बाद ज़रूरी छानबीन की गई। इशरत के जमानत याचिका में लिखा है कि उनकी शादी 2 साल पहले ही तय कर दी गई थी। यानी, इशरत की मानें तो 2018 में ही तय हो गया था कि जून 12, 2020 को उनका निकाह होगा। इशरत जहाँ ने अदालत को भरोसा दिया है कि वो सबूतों और गवाहों के साथ किसी भी प्रकार का छेड़छाड़ नहीं करेंगी।

इशरत जहाँ के अलावा जामिया मिल्लिया यूनिवर्सिटी के आसिफ इकबाल तनहा, गुलफिसा खातून, जामिया कोआर्डिनेशन कमिटी की सफूरा जरगर, मीरान हैदर, जामिया अलुमिनी एसोसिएशन के अध्यक्ष शिफा-उर-रहमान, आम आदमी पार्टी के निलंबित पार्षद ताहिर हुसैन और जेएनयू के छात्र नेता रहे उमर खालिद के खिलाफ दिल्ली दंगों के मामलों में FIR दर्ज किया जा चुका है। इनमें से कईयों की गिरफ़्तारी भी हुई है।

बता दें कि इशरत जहाँ की गिरफ़्तारी के बाद कॉन्ग्रेस ने कहा था कि दिल्ली हिंसा में पहले कुछ दिनों तक जानबूझकर कार्रवाई नहीं हुई और बाद में निर्दोषों को फँसाया गया। जवाबदेही तय होनी चाहिए। आनंद शर्मा ने आरोप लगाया था कि अब जो कार्रवाई हो रही है वह एकतरफा है। जो लोग धरने पर थे उन पर संगीन धाराओं के तहत मुकदमे दर्ज किए जा रहे हैं।

दिसम्बर तक देश की आधी आबादी होगी कोरोना के चपेट में, 3 करोड़ को होगी सघन चिकित्सा की आवश्यकता: NIMHANS

नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरोसाइंसेस (NIMHANS) के डॉक्टर और स्वास्थ्य विशेषज्ञ की माने तो आने वाले समय में देश में कोरोना वायरस संक्रमण की रफ्तार दुगुनी तेज़ी से बढ़ेगा और महामारी का कम्युनिटी ट्रांसमिशन भी देखने को मिलेगा।

नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरोसाइंसेस (NIMHANS) में न्यूरोवायरोलॉजी के साथ ही कोविड-19 के लिए कर्नाटक विशेषज्ञ समिति में नोडल अधिकारी डॉ. वी रवि ने यह अनुमान लगाया है कि दिसंबर 2020 में भारत की आधी आबादी कोरोना महामारी से संक्रिमत हो सकती है!

उन्होंने कहा कि इस वर्ष के अंत तक लगभग 67 करोड़ भारतीयों का टेस्ट इस चीनी महामारी के लिए पॉजिटिव आएगा।

हालाँकि, विशेषज्ञों का ये भी कहना है कि, इनमें से 90 प्रतिशत लोगों को ये पता भी नहीं चलगा कि उन्हें कोरोना वायरस का संक्रमण हो चुका है। क्योंकि अधिकांश लोगों में इस वायरस के लक्षण दिखाई ही नहीं देंगे और केवल 5 प्रतिशत लोग ही इस महामारी से गंभीर रूप से प्रभावित होंगे। लेकिन भारत में अगर 67 करोड़ लोगों में से 5 प्रतिशत भी गंभीर रूप से बीमार पड़ गए तो ये आँकड़ा 3 करोड़ से ज्यादा होगा।

डॉ. रवि ने कहा कि “इनमें से 5 से 10% मामले ऐसे होंगे जिन्हें ऑक्सीजन के हाई फ्लो के साथ इलाज करना होगा और केवल 5% मरीजों को वेंटीलेटर के सपोर्ट की जरूरत होगी।”

उन्होंने आगे सुझाव दिया कि राज्यों को चिकित्सा से जुड़े बुनियादी ढाँचे को सुधारना होगा ताकि आने वाली गंभीर परिस्थितियों से निपटा जा सके। खासकर उन राज्यों में जहाँ ज्यादा चिकित्सा देखभाल और मेडिकल सेवाओं की आवश्यकता होती है।

मौजूदा स्थिति में देश में कोरोनावायरस मरीजों के इलाज के लिए केवल 1,30,000 बेड्स अस्पतालों में उपलब्ध हैं। वहीं ग्रामीण भारत में केवल 16,613 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र हैं। इनमें से केवल 6,733 स्वास्थ्य केंद्र 24 घंटे काम करते हैं और केवल 12,760 स्वास्थ्य केंद्रों में 4 या उससे अधिक बेड्स उपलब्ध हैं। जो की भविष्य में और घातक स्थिति पैदा कर सकती है।

अभी तक लगाए गए अनुमानों के अनुसार, इस साल के अंत तक लगभग 3.5 करोड़ लोग कोविड-19 के शिकार होंगे और इनमें से 70 लाख के करीब ग्रामीण लोग इसके चपेट में आएँगे। फिलहाल इस वक़्त भारत में ग्रामीण इलाकों से कुल 21% कोरोना वायरस के मामले सामने आए है।

ऑल इंडिया इंस्टिट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस (AIIMS) के डायरेक्टर डॉ. रणदीप गुलेरिया ने हाल ही में आगाह किया था कि देश में कोरोनावायरस के मामले जून-जुलाई में चरम पर पहुँचने की संभावना है। उन्होंने यह भी कहा था कि मामलों की बढ़ती संख्या के पीछे एक मुख्य कारण परीक्षण में वृद्धि हैं।

कुछ वैज्ञानिकों के अनुसार, जुलाई की शुरुआत में देश में संक्रिमत लोगों के आँकड़े काफ़ी तेज़ी से बढ़ सकते है। हालांकि, विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने कहा है कि जुलाई के अंत तक देश में कोरोनोवायरस के मामले कम होने लगेंगे।

अंतरराष्ट्रीय रेटिंग एजेंसी स्टैंडर्ड एंड पूअर के मुताबिक सितंबर से पहले कोरोना अपने चरम पर नहीं पहुँचेगा और इसके कारण अगले साल भारतीय अर्थव्यवस्था में 5 फीसदी तक गिरावट आ सकती है।

हलाल पर सवाल उठाने पर ऑपइंडिया के खिलाफ दुष्प्रचार: रेवेन्यू का गम नहीं, पाठकों का समर्थन जरूरी

पिछले कुछ दिनों से ऑपइंडिया के विरुद्ध एक घटिया दुष्प्रचार अभियान चलाया जा रहा है। दरअसल, हमने ‘हलाल प्रक्रिया’ को लेकर एक ख़बर प्रकाशित की थी। इसमें बताया था कि कैसे इसके तहत भेदभाव वाला रवैया अपनाया जाता है। इसके बाद ‘स्टॉप फंडिंग हेट’ नामक ट्विटर हैंडल ने ये मान लिया कि हम घृणा फैला रहे हैं और उसने हमारे खिलाफ़ दुष्प्रचार फैलाने का ठेका ले लिया। इसके बाद लेफ्ट लिबरल मीडिया पोर्टलों ने इसका जश्न मनाया।

इन प्रोपेगेंडा पोर्टलों ने एक भारतीय मीडिया पोर्टल पर किसी विदेशी संस्था द्वारा किए जा रहे आक्षेप का समर्थन किया और इससे सम्बंधित ख़बरें भी चलाईं। ‘स्क्रॉल’ ने हमसे संपर्क कर इस विषय पर हमारी राय भी जाननी चाही। वामपंथी मीडिया के चाल-चलन के विपरीत ‘स्क्रॉल’ ने कम से कम इस विषय में हमारा पक्ष जानने के लिए हमसे सम्पर्क किया। फिर भी हम अपना बयान यहाँ प्रकाशित कर रहे हैं, क्योंकि वामपंथी मीडिया की आदत है कि वे बयानों को तोड़-मरोड़कर और उनसे छेड़छाड़ कर पेश प्रस्तुत करते हैं।

‘स्क्रॉल’ के 3 सवाल

‘स्क्रॉल’ ने हमसे ये 3 सवाल पूछे:

  • ये जो ‘अभियान’ चल रहा है, इस बारे में विज्ञापन देने वाली कम्पनियों या फिर नेटवर्क्स ने हमसे कुछ कहा है? क्या उन्होंने इसे लेकर चिंताएँ जताई हैं?
  • इस ‘अभियान’ के अंतर्गत ऑपइंडिया के खिलाफ जो आरोप लगाए गए हैं और कई लेखों में घृणा फैलाने का जो आरोप लगा है, उस बारे में आपका क्या कहना है?
  • विज्ञापन देने वाली कम्पनियों ने जो भी चिंताएँ जाहिर की हैं, क्या उसके बाद ऑपइंडिया ने अपने लेखों में बदलाव करने का फ़ैसला लिया है?

हमने ‘स्क्रॉल’ को ये जवाब दिया

एक तरफ जब पूरा वामपंथी मीडिया ऑपइंडिया को नीचा दिखाने में लगा हुआ है, ऐसे में ‘स्क्रॉल’ को धन्यवाद कि उसने कम से कम हमे हमारी राय जानने का तो प्रयास किया। ये पत्रकारिता का एक ऐसा नैतिक सिद्धांत है, जिसे वामपंथी मीडिया ने कब का त्याग दिया है। यह हमारा बयान है, जिसे आशा है कि तोड़-मरोड़कर नहीं पेश किया जाएगा। इसे हम हूबहू जनता के समक्ष रख रहे हैं:

‘गूगल ऐड्स’ या फिर किसी भी विज्ञापन कम्पनी या नेटवर्क ने हमसे इस ‘अभियान’ के सम्बन्ध में कुछ नहीं कहा है और न ही किसी प्रकार की चिंता जाहिर की है। अभी तक कम्पनी ने नहीं कहा है कि वो ऑपइंडिया की वेबसाइट पर से अपनी प्रचार सामग्री हटाना चाहते हैं। एडवरटाइजिंग डैशबोर्ड गूगल के हाथ में रहता है तो कम्पनियों को इस बारे में हमसे संपर्क करने की आवश्यकता भी नहीं है। इसलिए आप उन्हीं लोगों से पूछ लीजिए।

क्या है ‘हेट स्पीच’? आजकल ये एक ऐसा हथियार बन गया है, जिसके द्वारा उन आवाज़ों को दबाने की कोशिश की जाती है जो उनलोगों से सहमत न हों। ये असहिष्णु समूह की पहचान है, जिसका इस्तेमाल कर वे विरोधियों को चुप कराना चाहते हैं। ऑपइंडिया कभी भी किसी अन्य के लिए परेशानी क्रिएट करने के लिए फ्री स्पीच का इस्तेमाल नहीं करता, ये हम भलीभाँति समझते हैं।

लेकिन, जहाँ तक हमारे लेख की बात है (जिस पर सवाल उठ रहे हैं), हमारा मानना है कि ये फ्रीडम ऑफ स्पीच और मीडिया की स्वतंत्रता के अंतर्गत आता है। इस लेख में हमने हलाल की प्रकिया पर सवाल उठाए थे, जो भेदभाव भरा है। इसने हिन्दुओं, ख़ासकर दलितों को मांस इंडस्ट्री में नौकरी पाने से वंचित रखा हुआ है। जहाँ खास समुदाय इसे खाने की च्वाइस बताता है, ये असल में एक मजहबी प्रक्रिया है, जिसके अंतर्गत एक खास समुदाय के व्यक्ति को शहादा का पालन करने को कहा जाता है।

हमारे लेख का मूल भाव ये था कि अगर मजहब की आड़ में एक प्रकार का भेदभाव उचित और वैध है तो फिर किसी अन्य संप्रदाय या धर्म के लिए उसी प्रकार का दूसरा भेदभाव अनुचित और अवैध कैसे ठहराया जा सकता है? अगर हलाल वैध है तो फिर हिन्दुओं द्वारा अपने व्यापर में खास मजहब वालों को नौकरी न देना अवैध कैसे हो सकता है? इसे अपराधिक बता कर एफआईआर क्यों दर्ज कराया जाता है? ‘हेट स्पीच’ का आरोप ही इसलिए लगाया जाता है ताकि दशकों से चली आ रही ऐसी चीजों की सच्चाई कभी बाहर न आने पाए।

ऑपइंडिया कभी भी अपने किसी लेख में इसलिए परिवर्तन नहीं करेगा, या फिर अपने मूलभूत सिद्धांतों से समझौता नहीं करेगा, क्योंकि कुछ असहिष्णु लोगों को इससे दिक्कत है और इसे लेकर दुष्प्रचार फैलाया जा रहा है। यूके में बैठ कर कोई ट्विटर हैंडल भाषण झाड़े और हमें झुकाने की कोशिश करे तो ये संभव नहीं है। ये नहीं हो पाएगा। उन्होंने हलाल के खिलाफ लेख को समुदाय विशेष का आर्थिक बहिष्कार बता कर ऑपइंडिया का आर्थिक बहिष्कार करने का दुष्प्रचार अभियान चला रखा है, लेकिन हम अपने लेख पर शत प्रतिशत कायम हैं।

इसे संक्षिप्त में कहें तो हम अपने लेख पर पूर्णत: कायम हैं। उसमें जो भी कंटेंट है, उससे हम शत-प्रतिशत सहमत हैं। हम उसमें किसी भी प्रकार का रत्ती भर बदलाव भी नहीं करने जा रहे हैं। हमारा अस्तित्व और हमारी वफादारी हमारे पाठकों से है। हम उनके प्रति जवाबदेह हैं। हम कोई हिन्दूफ़ोबिया से ग्रसित कॉर्पोरेट हाउस नहीं हैं जो इन चीजों पर सवाल उठाने से डर जाएगा।

रेवेन्यू को लेकर CEO राहुल रौशन का बयान

वेबसाइट पर प्रचार सामग्री इसलिए होती है ताकि अतिरिक्त रेवेन्यू आए और इससे किसी को कोई परेशानी नहीं होती। हालाँकि, हमारे पास अधिकतर वित्त उन पाठकों से आता है, जो स्वेच्छा से हमें दानस्वरूप धनराशि भेजते हैं, क्योंकि उन्हें हमारा कंटेंट पसंद आता है। ये एक तरह से हमारे लिए अदृश्य ‘पोस्ट सर्विस पेवॉल’ है। ये पाठकों के ऊपर है कि वे कितना डोनेट करने की क्षमता रखते हैं और उन्हें हमारा कंटेंट कितना पसंद है।

हमें छोटे शहरों में रहने वाले छात्रों से 10 रुपए का डोनेशन भी मिलता है और बड़े शहरों में स्थापित कोई व्यक्ति हमें 3 लाख रुपए भी डोनेट कर देता है। हमें यही आगे बढ़ने की प्रेरणा देते हैं, कोई एडवरटाइजमेंट्स नहीं। हमें यह बताने में ख़ुशी हो रही है कि इस दुष्प्रचार अभियान के बाद से हमारे रेवेन्यू में 700% की वृद्धि आई है और हमें लोगों का भरपूर समर्थन मिल रहा है।

अगर रेवेन्यू गिर भी जाए तो कोई गम नहीं है, क्योंकि हमें सिर्फ हमारे पाठकों के समर्थन की ज़रूरत है और हम उनके लिए ही लिखते हैं। इसलिए ऐसे दुष्प्रचार अभियान से हमें और ज्यादा प्रेरणा मिलती है। हमारे काम को लेकर हमारा जोश और हाई हो जाता है। दुष्प्रचार फैलाने वाले इन्हीं असहिष्णु लोगों ने तो हमारे रेवेन्यू को बढ़ाने में खासा योगदान दिया है और हम चाहते हैं कि ये अपना नकारात्मक चेहरा हर महीने ऐसे ही दुनिया के सामने लेकर आएँ, ताकि हमारे पाठक हमारा और ज्यादा उत्साहवर्द्धन करें।

और हाँ, हमें हमारे कई पाठक प्रति महीने नियमित रूप से डोनेशन देना चाहते हैं और उनकी माँग है कि हम ऑटोमेटिक पेमेंट का फीचर लेकर आएँ। हम इस पर काम कर रहे हैं और ये जल्द ही सार्थक होगा।

ऑपइंडिया अंग्रेजी की संपादक नुपूर शर्मा का मूल रूप से अंग्रेजी में जवाब यहॉं पढ़े

चीन के खिलाफ जंग में उतरे ‘3 इडियट्स’ के असली हीरो सोनम वांगचुक, कहा- स्वदेशी अपनाकर दें करारा जवाब

फिल्म थ्री इडियट्स के असली हीरो सोनम वांगचुक ने चीन के खिलाफ एक अभियान छेड़ा है। सोनम वांगचुक वही शख्स हैं, जिनसे प्रेरित होकर फिल्म थ्री इडियट्स बनाई गई थी। रैमन मैग्सेसे अवॉर्ड विजेता सोनम वांगचुक ने चीनी सेना के आक्रामक रुख का जवाब देने के लिए वीडियो जारी किया है।

इस वीडियो में उन्होंने बताया है कि कैसे दो मोर्चे पर चीन से युद्ध जीता जाए- पहला, सेना के माध्यम से और दूसरा, चीनी सामानों का बहिष्कार करके। उन्होंने लोगों से चीनी कंपनियों में बने सामानों के बहिष्कार करने की अपील की है। वांगचुक ने कहा, “एक सप्‍ताह में चीन के सभी सॉफ्टवेयर को छोड़ें और एक साल में चीन के सभी हार्डवेयर को।”

वीडियो में उन्होंने अपना परिचय देते हुए कहा, “मैं लद्दाख में हूँ और आप देख रहे हैं सिंधु नदी को बहते हुए देख रहे हैं यहाँ, और वो जो पहाड़ियाँ हैं। उनके पीछे नुब्रा और चांगतांग के वो इलाके हैं, जहाँ पर यह तनाव बढ़ता जा रहा है। हजारों सैनिक वहाँ ले जाए जा चुके हैं। सुनने में आया है कि चीनी वायु सेना के जहाज भी वहाँ तैनात किए गए हैं और एक घंटे पहले भारतीय वायु सेना के जहाज भी मेरे ऊपर मंडरा रहे थे।”

उन्होंने आगे कहा, “सामान्यता जब सीमा पर तनाव होता है तो हम आप जैसे नागरिक यह सोचकर सो जाते हैं कि रात को सैनिक इसका जवाब दे देंगे। मगर मैं आज आप लोगों को यह जरूरी बात बताना चाहता हूँ कि इस बार सिर्फ सैनिक जवाब नहीं, दो तरफा जवाब हो और उसमें नागरिक जवाब भी हो।”

वांगचुक आगे कहते हैं, “आपने देखा होगा कि यह सिर्फ भारत के साथ नहीं हो रहा है, बल्कि पिछले कई हफ्तों से चीन यह दक्षिणी चीन सागर में वियतनाम, ताइवान और अब हांगकांग के साथ भी छेड़खानी कर रहा है, और मेरा यह विश्लेषण है कि वो यह सब किसी देश के साथ दुश्मनी से ज्यादा अपने अन्दर की समस्याओं को सुलझाने के लिए कर रहा है।”

उन्होंने कहा, आज चीन को सबसे बड़ा डर है तो अपनी जनता से है, उनकी 140 करोड़ की आबादी जो कि एक बंधुआ मजदूर की तरह बिना मानवाधिकारों के चीनी तानाशाह सरकार के लिए काम करते हैं, और उसे समृद्ध बनाते हैं। जब वो नाराज हो जाए तो फिर एक क्रांति की सी परिस्थिति बन पड़ती है और इससे चीन बहुत डरता है।

वीडियो में कहा गया है कि आज कोरोना के प्रकोप के बाद चीन में फैक्ट्रियाँ बंद हैं, एक्सपोर्ट्स बंद हैं और बेरोजगारी 20 प्रतिशत तक बढ़ चुकी है, लोग बहुत नाराज हैं, क्रांति हो सकती है, तख्तापलट हो सकता है। इसीलिए चीन अपने पड़ोसियों से दुश्मनी करके अपनी जनता को अपने साथ जोड़ने में लगा हुआ है और यह पहली बार नहीं कर रहा है। 1962 में जब भारत के साथ जंग की तो वो जंग भी उसने अपनी जनता को संभालने के लिए की थी, तब चार साल का आकाल और भुखमरी हुई थी और इससे ध्यान हटाने के लिए यह जंग की थी।

चीन के लिए अपनी जीडीपी और जो खुशहाली है, उसे बढ़ाते रहना बहुत ही जरूरी है, और जिस दिन जीडीपी घट जाए वहाँ की जनता क्रांति के लिए तैयार है, मैं तो कहता हूँ कि इस बार भारत की बुलेट पॉवर से भी और वॉलेट पॉवर से भी काम करना चाहिए।

आगे सोनम वांगचुक कहते हैं कि जरा सोचिए हम आप भारतीय उद्योग को मार कर चीन से मूर्तियों से कपड़ों तक हर साल पाँच लाख करोड़ के सामान खरीदते हैं और फिर ये पैसा आगे जाकर हमारे सीमा पर हथियार और बन्दूक बनकर हमारे सैनिकों के मौत का कारण बन सकते हैं, तो इसलिए अगर हमारे देश के 130 करोड़ लोग और तीन करोड़ भारतीय जो बाहर के देशों में हैं, सब मिलकर भारत में और बल्कि दुनिया भर में एक बायकॉट मेड इन चाइना मूवमेंट या अभियान शुरू करते हैं तो आज दुनिया भर में चीन के प्रति रोष है।

उनका कहना है कि हो सकता है कि सारी दुनिया साथ आए और इतने बड़े स्तर पर चीनी व्यापार का बायकॉट हो, कि चीन को जिसका सबसे बड़ा डर था वही हो, यानी कि उसकी अर्थव्यवस्था डगमगाए और उसकी जनता रोष में आए, विरोध और तख्तापलट और अगर हम ऐसा नहीं करते हैं तो कितनी बदनसीबी की बात होगी भारत के लिए।

सोनम ने कहा, “एक तरफ हमारे सैनिक उनके खिलाफ लड़ रहे हैं और दूसरी तरफ, हम चीनी हार्डवेयर खरीदते हैं और टिकटॉक जैसे सॉफ़्टवेयर का उपयोग करते हैं, हम उन्हें करोड़ों रुपए का बिजनेस देते है ता‍कि वे हमारे खिलाफ लड़ने के लिए अपने सैनिकों को सौंप सकें।”

उन्होंने लोगों को पीएम मोदी के ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ के लिए प्रेरित करते हुए बताया कि वो एक हफ्ते में अपने फोन से सारे चीनी सॉफ्टवेयर को हटा रहे हैं, साथ ही अपने चीनी फोन को भी एक हफ्ते के अंदर अपनी जिंदगी से हटा रहे हैं। इतना ही नहीं, एक साल के अंदर अपनी जिंदगी से हर उस चीज को निकालने जा रहे हैं, जिस पर मेड इन चाइना लिखा हुआ है।

उन्होंने कहा, “हमें चीन से या चीनी लोगों से कोई समस्या नहीं है। हमें चीनी सरकार और उसके रवैये से समस्या है। जब तक चीन में परिवर्तन न हो, हमें ऐसा करना होगा और आप लोगों से मैं अपील करता हूँ कि अपने शहर, मुहल्ले में ऐसे इवेंट्स करें, जहाँ लोग प्रतिज्ञा करें कि वो चीनी सामान का बहिष्कार करेंगे। 21वीं सदी में देश के लिए जान देने की नहीं, बल्कि जिंदगी देने की जरूरत है।”

POK में ऐतिहासिक बौद्ध धरोहरों पर उकेर दिए पाकिस्तानी झंडे, तालिबान पहले ही कर चुका है बौद्ध प्रतिमाओं को नष्ट

पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (POK) के गिलगित-बाल्टिस्तान के चिलास इलाके में पाकिस्तानियों द्वारा 800 ईस्वी की बौद्ध शिलाओं और कलाकृतियों को नुकसान पहुँचाते हुए उन पर पाकिस्तान के झंडे उकेरे गए हैं। पत्थरों पर की गई ये नक्काशियाँ और कलाकृतियाँ पुरातत्व की दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण हैं।

स्थानीय लोग काफी लम्बे समय से इन कलाकृतियों के संरक्षण की माँग कर रहे हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार ये कलाकृतियाँ इन्हीं स्थानीय लोगों द्वारा ढूँढी भी गईं थीं। इन कलाकृतियों को नुकसान पहुँचाने के पीछे एक प्रमुख वजह चीन के खर्चे पर पाकिस्तान द्वारा तैयार किया जाने वाला दिआमेर-ब्हाशा बाँध बताया जा रहा है।

बौद्ध कलाकृतियों पर उकेरे गए पाकिस्तानी झंडे

दरअसल, भारत के विरोध के बावजूद चीन POK के गिलगित-बाल्टिस्तान में दिआमेर-ब्हाशा (DiamerBhasha) बाँध बना रहा है। इस बाँध के निर्माण से इस क्षेत्र में पर्वतों पर उकेरी गईं बौद्ध धर्म की धरोहरें भी डूब जाएँगी।

भारत के विरोध के अलावा इस क्षेत्र में रहने वाले लोग भी इस बाँध का विरोध कर रहे हैं। लोगों का कहना है कि इस क्षेत्र में पर्यटन क्षेत्र की काफी संभावनाएँ हैं, इसलिए इन कलाकृतियों के संरक्षण की आवश्यकता है।

तालिबान द्वारा भी तोड़ी गई थी बुद्ध प्रतिमाएँ

बौद्ध प्रतीकों को नष्ट करने की ऐसी घटना इससे पहले 2001 में सामने आई थी, जब बुद्ध की नक्काशीदार प्रतिमा को नष्ट कर दिया गया था। कई सालों तक किसी ने भी तालिबान के डर से इस प्रतिमा को दोबारा बनाने की कोशिश नहीं की। यह बलुआ पत्थर की प्राचीन प्रतिमा कभी विश्व में बुद्ध की सबसे ऊँची मूर्ति हुआ करती थी।

गत 13 मई को ही पाकिस्तान सरकार ने चीन की एक कंपनी के साथ बाँध निर्माण के लिए 442 बिलियन रुपए की डील साइन की। इसके बाद से इस मुद्दे को लेकर विवाद छाया हुआ है। बताया जा रहा है कि इस बाँध के निर्माण से यहाँ पर मौजूद 50 गाँव डूब जाएँगे।

14 मई को, भारत ने गिलगित-बाल्टिस्तान क्षेत्र में बाँध बनाने के पाकिस्तान और चीन के फैसले का विरोध किया था। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अनुराग श्रीवास्तव ने कहा था कि गिलगित-बाल्टिस्तान क्षेत्र जम्मू-कश्मीर का हिस्सा है और पाकिस्तान द्वारा अवैध रूप से कब्जा कर लिया गया था।

भारत ने इस परियोजना पर चीन और पाकिस्तान दोनों के साथ अपने विरोध और चिंताओं को साझा किया है। इससे पहले, भारत ने चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (Economic Corridor) के हिस्से के रूप में पीओके में परियोजनाओं का विरोध किया है।

कई स्थानीय मुस्लिम भी सोशल मीडिया पर इस बाँध के निर्माण का विरोध कर रहे हैं। इनका कहना है कि वे एक समृद्ध विरासत के नष्ट होने से दुखी हैं, क्योंकि बाँध बनने के साथ ही ‘इंडिक इतिहास’ की संपत्ति भी पानी में डूब जाएगी।