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इंग्लैंड के डर्बी में गुरु अर्जन देव गुरुद्वारा में तोड़फोड़ करने वाला पाकिस्तानी गिरफ्तार, कश्मीर पर मिला धमकी भरा नोट

ब्रिटेन के डर्बी में सोमवार सुबह गुरु अर्जन देव गुरुद्वारा पर हमला करने वाले शख्स को गिरफ्तार कर लिया गया है। जानकारी के मुताबिक गिरफ्तार आरोपित की पहचान पाकिस्तानी मूल के निवासी के रूप में हुई है। हालाँकि, गुरुद्वारे की तरफ से किसी के भी घायल नहीं होने की पुष्टि की गई है। 

लॉकडाउन के बीच गुरुद्वारे में धार्मिक काम बंद हैं और हर दिन प्रार्थना लाइव स्ट्रीम की जा रही है। अपने सामाजिक कार्यों के लिए मशहूर गुरुद्वारे पर इस तरह के हमले के पीछे हेट क्राइम की बात कही जा रही है।

जानकारी के मुताबिक आरोपित के पास से अंग्रेजी में लिखा हुए एक मैसेज मिला है। जिस पर लिखा था कि कश्मीर के लोगों की मदद करने की कोशिश करें अन्यथा सभी को परेशानी होगी। इसके साथ ही उस पर एक फोन नंबर भी लिखा था।

डर्बी का गुरु अर्जन देव गुरुद्वारा जरूरतमंदों तक खाना पहुँचाने के अपने काम को लेकर काफी जाना जाता है। यहाँ सोमवार सुबह 6 बजे एक शख्स ने तोड़फोड़ की। सामने आई तस्वीरों में देखा जा सकता है कि गुरुद्वारे का काँच टूटा हुआ है। स्थानीय मीडिया ने बताया कि इस बर्बरता से सैकड़ों पाउंड की क्षति हुई। 

वहीं गुरुद्वारे की ओर से बयान जारी कर कहा गया है कि बताया गया है कि घटना के बाद परिसर की सफाई का काम शुरू कर दिया गया। ऐसी घटनाओं से उनके सेवा-भाव में कमी नहीं आएगी और मदद का काम जारी रखा जाएगा। लंगर और प्रार्थना जारी रखी जाएगी।

अर्जन देब गुरुद्वारा हर दिन 350-500 लोगों को खाना खिलाता है। किसी भी धर्म, समुदाय के लोगों को यहाँ मदद पहुँचाई जाती है। खासकर कोरोना वायरस के बीच यहाँ जरूरी काम पर जाने वाले फ्रंटलाइन वर्कर्स को आगे बढ़कर मदद दी जाती है। लॉकडाउन के बीच यहाँ धार्मिक काम नहीं हो रहे हैं। इसलिए पूरे परिसर का इस्तेमाल कोरोना संबंधी मदद पहुँचाने के लिए किया जाता है। वालंटियर्स के पास सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करते हुए अपना काम करने के लिए अच्छी खासी जगह भी है।

ईद पर इस बार BSF ने पाकिस्तान को नहीं दी मिठाई, बांग्लादेश का कराया मुँह मीठा

ईद पर भारत-पाकिस्तान सीमा पर बीएसएफ और पाकिस्तान रेंजर्स के बीच हर साल होने वाली मिठाइयों के आदान-प्रदान की रस्म अदायगी आज सोमवार (मई 25, 2020) को मनाई गई ईद पर नहीं हुई। हालाँकि, बीएसएफ ने बांग्लादेश के सीमा सुरक्षाबल बीजीबी के जवानों को ईद की बधाई दी और उनका मुँह मीठा करवाया।

सरहद की रक्षा के जिम्मेदार सीमा सुरक्षा बल के अधिकारियों ने कहा कि इस बार पाकिस्तान के साथ मिठाई नहीं बाँटी गईं। दोनों देशों के बीच मौजूदा तनावपूर्ण हालातों को देखते हुए यह फैसला लिया गया।

अधिकारियों ने कहा कि पश्चिमी सीमा पार से आतंकवाद की घटनाएँ लगातार जारी हैं और इसलिए, जम्मू से गुजरात तक भारत-पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय सीमा पर किसी भी स्थान पर ईद की मिठाई का आदान-प्रदान नहीं हुआ

पाकिस्तान ने पिछले साल दिवाली के दिन भी सीजफायर का उल्लंघन किया था। जम्मू कश्मीर में एलओसी के पास राजौरी जिले के सुंदरबन सेक्टर में फायरिंग की गई थी, बावजूद इसके दिवाली और गणतंत्र दिवस (26 जनवरी) के दौरान भारतीय सेना ने पाकिस्तानी रेंजर्स को मिठाई देने के लिए संदेश भिजवाया था, लेकिन सीमा के उस पार से कोई सकारात्मक जवाब नहीं आया।

पाकिस्तानी रेंजर ने बीएसएफ को संदेश भेजा था कि वह इस बार दिवाली की मिठाई स्वीकार नहीं करेंगे, जिसके बाद भारत ने भी पाकिस्तान जम्मू-कश्मीर में अंतरराष्ट्रीय बॉर्डर और एलओसी पर बीएसएफ के जवानों की ओर से कोई मिठाई नहीं भिजवाई।

बीएसएफ ने पूर्वी मोर्चे पर तैनात बॉर्डर गार्ड बांग्लादेश (BGB) के साथ मिठाई का आदान-प्रदान किया। भारत और बांग्लादेश 4,096 किलोमीटर लंबी अंतरराष्ट्रीय सीमा साझा करते हैं। बीएसएफ के दक्षिण बंगाल फ्रंटियर की ओर से जारी एक बयान में कहा गया है, “दोनों देश और सीमा-सुरक्षा बलों के बीच गर्मजोशी बरकरार है। ईद के दौरान त्यौहारों की खुशी भी बाँटी गई। बीएसएफ और बीजीबी सौहार्दपूर्ण संबंध साझा करते हैं। दोनों देश एक समान संस्कृति, परंपराओं और त्यौहार मनाते हैं।”

इस महीने की शुरुआत में ही जम्मू-कश्मीर के हंदवाड़ा में एक आतंकी हमला हुआ था। आतंकियों ने एक घर में लोगों को बंधक बना लिया था, जिन्हें छुड़ाने के लिए एनकाउंटर शुरू किया गया, जिसमें दो आतंकी मारे गए।

हालाँकि, बंधक बनाए गए सभी नागरिकों को बचा लिया गया, लेकिन 5 जवान वीरगति को प्राप्त हो गए थे। इस घटना ने एक बार फिर से पाकिस्तान की करतूत उजागर की थी, जहाँ से पाले-पोसे गए आतंकी भारत में तबाही मचाने में लगे हुए हैं।

दुनियाभर के देश जहाँ कोरोना संकट से निपटने में अपनी ऊर्जा और शक्ति का इस्तेमाल कर रहा है पाकिस्तान, भारत के खिलाफ छद्म युद्ध में लड़ने में लगा हुआ है। कभी सीजफायर का उल्लंघन कर तो कभी अपने भेजे आतंकियों से हमले करवा कर।

गवर्नर से मिले पूर्व सीएम नारायण राणे, महाराष्ट्र में राष्‍ट्रपति शासन लगाने की माँग, कहा- फेल है उद्धव सरकार

महाराष्ट्र के पूर्व सीएम और भाजपा नेता नारायण राणे ने सोमवार (मई 25, 2020) को राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी से उनके आवास पर मुलाकात की। इस दौरान उन्होंने राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाए जाने की माँग की। उन्होंने कहा कि कोरोना वायरस के कारण राज्य की स्थिति बद से बदतर होती जा रही है।

बता दें कि कोरोना वायरस से सबसे अधिक प्रभावित राज्य महाराष्ट्र है। राज्य में कोरोना से संक्रमित मामलों की संख्या 50,000 के पार पहुँच गई है। महाराष्ट्र सरकार कोरोना वायरस को रोकने में लगातार नाकाम साबित हो रही है।

ऐसे में नारायण राणे राज्यपाल से माँग की है कि राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू करना चाहिए। उन्होंने कहा है की राज्य सरकार के पास अर्थव्यवस्था को दुरुस्त करने का कोई उपाय नहीं है।

राणे ने कहा ठाकरे सरकार कोरोना संकट को संभाल नहीं सकती है। इस सरकार के पास क्षमता नहीं है। यह सरकार कोरोना से निपटने में विफल रही है। इसलिए, यहाँ राष्ट्रपति शासन लाना चाहिए। उन्होंने कहा कि सरकार लोगों के जीवन को बचाने में सक्षम नहीं है। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री सरकार चलाने में सक्षम नहीं हैं। नारायण राणे ने कहा कि कोरोना राज्य में गहरा संकट पैदा कर रहा है।

नारायण राणे ने कहा, “वर्तमान में महाराष्ट्र में कोरोना की स्थिति गंभीर हो रही है। मरीज और मौतें बढ़ रही हैं। राज्यपाल को इसे गंभीरता से लेना चाहिए और महाराष्ट्र-मुंबई में मौतों को रोकना चाहिए। इस संबंध में प्रयास किए जाने चाहिए।”

नगर निगम और राज्य के सरकारी अस्पतालों की हालत खराब है। अस्पताल में प्रवेश न मिलने से कई मरीजों की मौत हो चुकी है। ऐसी स्थिति में यह नहीं कहा जा सकता है कि सरकार ध्यान नहीं दे रही है। यह सरकार इस स्थिति को संभाल नहीं सकती है।

कोरोना का आँकड़ा हर दिन तेजी से बढ़ता ही जा रहा है। ऐसे में राज्य में प्रमुख विपक्षी दल बीजेपी अब सीएम उद्धव ठाकरे की महाविकास अघाड़ी पर आक्रामक हो गई है।

शौकत अली और राशिद ने दलित नेता हरि माँझी पर की जातिगत टिप्पणी, कहा- तुम फिर भी इनकी ‘लेटरिंग’ साफ करोगे

सोशल मीडिया पर शौकत अली और राशिद द्वारा जातिसूचक और अपमानजनक टिप्पणी करने के मामले में बीजेपी नेता हरि माँझी ने दोनों के खिलाफ सोमवार (25 मई, 2020) को उत्तर प्रदेश पुलिस से कानूनी कार्रवाई करने की माँग की है।

बिहार के गया से बीजेपी के पूर्व सांसद हरि माँझी ने ट्विटर के माध्यम से शिकायत करते हुए उत्तर प्रदेश पुलिस और सीएम योगी आदित्यनाथ को टैग किया है।

साभार-ट्विटर

हरि माँझी का कहना है कि पहले राशिद मियाँ नाम के एक व्यक्ति ने उन्हें दलित होने के लिए अपमानित किया, लेकिन उन्होंने उसे समझाते हुए माफ कर दिया था। जिसके बाद राशिद मियाँ ने ट्विटर पर उनके खिलाफ अपमानजनक टिप्पणी की।

बता दें कि शौकत अली ने ट्विटर पर दो ट्वीट किया था। एक ट्वीट में उसने लिखा था, “चाहे कितनी भी चमचागीरी कर लो। राम मंदिर के पुजारी तो तुम बनने से रहे। किसी का कर्म छुपा ना धर्म, तुम्हें करना वही है जो तुम करते आए हो।”

वहीं दूसरे ट्वीट में लिखा था, “तुम फिर भी इनकी लेटरिंग (लैट्रिन) ही साफ करोगे दलित जी।”

इसका जवाब देते हुए हरि माँझी ने ट्विटर पर लिखा था, “राशिद मियाँ लेटरिंग (लैट्रिन) साफ किया, लेकिन धर्म नहीं बदला हमारे पूर्वजों ने। कुछ लोग तो तलवार के डर से ही धर्म बदल लिए। ऐसे आपकी भाषा के लिए आपको सजा भी हो सकती है, लेकिन आपको माफ किया।”

साभार-ट्विटर

इसके बाद शौकत अली द्वारा किए गए ट्वीट के खिलाफ हरि माँझी ने पुलिस से कानूनी कार्रवाई करने की माँग की।

इन दोनों द्वीट को लेकर अब हरि माँझी ने इस मामलो को देखने और दोनों के खिलाफ कार्रवाई करने की माँग की और शिकायत करते हुए लिखा, “कृपया इस मामले को देखें कैसे एक व्यक्ति मेरी धार्मिक भावना को ठेस पहुँचा रहा है। इससे पहले भी एक व्यक्ति ने किया, जिसे मैंने माफ कर दिया, अब ये शौकत अली उसी के संदर्भ में कहकर मेरी जाति और धर्म के खिलाफ बात कर रहा है। इसके खिलाफ कार्रवाई की जाए।”

लॉकडाउन के बावजूद पढ़ी गई ईद की सामूहिक नमाज, औरैया से 26 और मुजफ्फरनगर से 30 गिरफ्तार

उत्तर प्रदेश में औरैया जिले के अजीतमल क्षेत्र में सोमवार (मई 25, 2020) को ईद के मौके पर धारा 144 का उल्लघंन कर ईद की सामूहिक नमाज पढ़ने का प्रयास कर रहे 26 लोगों को गिरफ्तार कर उनके खिलाफ महामारी अधिनियम के तहत मुकदमा दर्ज किया गया।

पुलिस ने बताया कि कोविड -19 महामारी के कारण जिले में धारा 144 लागू है और सरकार ने ईद पर सभी को घरों में रहकर नमाज पढ़ने के निर्देश दिए थे। इसके बाद भी अजीतमल के आर्यनगर में स्थित जागी मस्जिद में काफी संख्या में लोग सुबह नमाज पढ़ने को एकत्रित हुए थे।

मस्जिद में नमाज पढ़ रहे 26 लोगों को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। जबकि 8 लोग फरार होने में कामयाब हो गए। फिलहाल उनकी तलाश जारी है।

इसी तरह की घटना उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर से सामने आई है। यहाँ के खतौली के कुछ लोगों ने मस्जिद काजियान में सामूहिक रूप से नमाज पढ़ी। सूचना मिलने पर मौके पर पहुँची पुलिस ने 30 लोगों को गिरफ्तार कर लिया है और उनके खिलाफ कार्रवाई की तैयारी की जा रही है। सीओ खतौली आशीष प्रताप सिंह और इंस्पेक्टर संतोष कुमार त्यागी ने मौके पर पहुँचकर सभी नमाजियों को बाहर निकाला।

अलीगढ़ में भी नमाज को लेकर मुस्लिम समाज के दो पक्षों के बीच विवाद का मामला सामने आया है। कस्बा के दादों की मस्जिद में जमकर पत्थरबाजी और मारपीट हुई। इलाके में तनाव का माहौल है। पुलिस को तैनात किया गया है।

रविवार (मई 24, 2020) को भी अलविदा नमाज को लेकर कई जगहों पर मस्जिदों में एकत्र होकर सोशल डिस्टेंसिग की धज्जियाँ उड़ाई गईं। राँची के पतसा गाँव के मस्जिद में अलविदा जुम्मे की नमाज अदा करने वाले 70 लोगों के खिलाफ FIR दर्ज की गई है।

इनमें मंसूर खान, शेख सिराजुद्दीन, साबिर अंसारी, शेख जावेद खान, इदरीश अंसारी, शकूर अंसारी, शेख अब्दुल्ला,  सेनुलाहखान, सरफुद्दीन अंसारी, शेख मकसूद,एनुल खान, कमालू खान, सफीक खान, जवाद ख़ान एवं निसार खान के नाम शामिल हैं। सभी 70 लोगों के खिलाफ धारा 144 के उल्लंघन के आरोप में FIR दर्ज की गई है।

SatyaHindi की एजेंडा पत्रकारिता… जहाँ सत्य एवं तथ्य को नजरअंदाज करते हैं आशुतोष

देश में वेब पोर्टल की बाढ़ सी आ गई है। उनमें से कुछ के लिए मीडिया जगत में जगह बनाने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आलोचना करना अपने आप को प्रचारित करने का सबसे आसान माध्यम बन गया है। इसी सिद्धांत के आधार पर उनमें से कुछ बड़ा ब्रांड बनने का ख्वाब भी देखते हैं।

‘सत्य हिंदी’ के सह संस्थापक आशुतोष भी कुछ इसी तरह का स्वप्न पाले हुए हैं। उन्होंने ‘कारवाँ’ मैगजीन में छपे लेख में नीति आयोग के दो अधिकारियों के अनाधिकारिक बयानों के इर्द-गिर्द एक कहानी गढ़ने की कोशिश की है कि कोरोना वायरस से बचने के लिए लागू किए गए लॉकडाउन का न तो कोई वैज्ञानिक आधार था और न ही यह इस समस्या का समाधान।

कोविड-19 से निपटने और आर्थिक गतिविधियों को फिर से शुरू करने के लिए केंद्र सरकार ने 11 टास्क फोर्स का गठन किया है। लेकिन, आशुतोष द्वारा इस टास्क फोर्स के दो अज्ञात लोगों के द्वारा किसी और को दिए गए अनाधिकारिक बयान का उपयोग कर अपनी बात रखने की कोशिश करना अपने आप को पत्रकार के रूप में जीवित रखने का एक असफल प्रयास है। इनके पक्षपातपूर्ण विचार और सच पर आँख बंद करने वाली मनोवृत्ति को इनके पोर्टल में जाकर देखा जा सकता है।

वास्तव में कॉन्ग्रेस के प्रति उनकी आशक्ति तब से शुरू हुई, जब वे आम आदमी पार्टी से कुछ पाने में असफल रहे और अब यह प्रश्न कर रहे हैं कि 21 दिनों के पहले लॉकडाउन से क्या हासिल हुआ? क्या बीमारी गायब हो गई? क्या अभी हम 24 मार्च से ज्यादा सुरक्षित स्थिति में हैं? और यदि मरीजों की संख्या बढ़ी है तो इसका जिम्मेदार कौन है?

विश्व स्वास्थ्य संगठन की क्षेत्रीय निदेशक पूनम खेत्रपाल सिंह ने अप्रैल के दूसरे सप्ताह में ही कहा था,

“विश्व स्वास्थ्य संगठन कोविड-19 को रोकने के लिए भारत सरकार द्वारा समय पर लिए गए सख्त निर्णय की सराहना करता है। कोविड मरीजों की संख्या को लेकर अभी कुछ कहना जल्दबाजी होगी, लेकिन 6 हफ्ते के राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन से लोगों को एक-दूसरे के संपर्क में आने से दूर रखा जा सका। इसके साथ ही स्वास्थ्य सेवा की तैयारियों को बेहतर बनाया जा सका, जैसे जाँच, मरीजों को अलग रखना और जहाँ से संक्रमण शुरू हुआ वहाँ तक पहुँचना। निश्चित रूप से ये कदम कोरोना के संक्रमण को फैलने से रोकने की दिशा में मील का पत्थर साबित होंगे।”

अगर पत्रकारों को कुछ स्वतंत्रता है, तो पत्रकारिता की अपनी एक नैतिकता भी होती है, साथ ही कुछ अलिखित मानदंड भी। उन्हें किसी भी सरकार की किसी भी नीति को लेकर प्रश्न करने का पूरा अधिकार प्राप्त है, लेकिन प्रधानमंत्री या किसी अन्य राजनेता के समर्थकों को ‘भक्त’ या ऐसे ही किसी अन्य नाम से संबोधित करना किसी पत्रकार का काम नहीं हो सकता, यह विरोधी दल के राजनीतिक कार्यकर्ता का जरूर हो सकता है।

तो क्या आशुतोष छद्म रूप से पत्रकार के वेश में कॉन्ग्रेस के कार्यकर्ता के रूप में काम कर रहे है? क्योंकि वह पहले ही कह चुके हैं कि अब आम आदमी पार्टी से उनका कोई लेना-देना नहीं है। क्या आशुतोष अब कॉन्ग्रेस से आदेश ले रहे हैं?

अब अगले प्रश्न पर आते हैं कि इस लॉकडाउन से हम क्या हासिल कर सके हैं। नीति आयोग के सदस्य (स्वास्थ्य) और एम्पावर्ड ग्रुप संख्या-1 के अध्यक्ष डॉ वीके पॉल ने बताया कि दो महीनों में भारत ने कोविड-19 से लड़ने की क्षमता को विकसित किया है और 1,093 कोविड फैसिलिटीज, जिनमें 3.4 लाख अस्पताल बेड और 6.5 लाख बेड कोविड केयर केंद्रों पर तैयार किए गए हैं। देश ने एक दिन में एक लाख से ज्यादा जाँच के लक्ष्य को भी प्राप्त कर लिया है और ऐसा कई दिनों से लगातार किया भी जा रहा है।

प्रधानमंत्री ने 12 मई को राष्ट्र के नाम अपने संबोधन में भी कहा था कि पीपीई किट और एन95 मास्क, जिनका उत्पादन भारत में न के बराबर था, अब प्रतिदिन दो लाख से ज्यादा निर्मित किए जा रहे हैं। इसलिए आशुतोष का प्रश्न न केवल उनकी अज्ञानता, बल्कि उनका पूर्वग्रह भी दर्शाता है।

डॉ पॉल ने आगे बताया कि पहले चरण के लॉकडाउन के 8 दिनों के बाद कोविड-19 के मामलों में, यानी अप्रैल 3, 2020 के बाद, लगातार गिरावट आई है। लॉकडाउन न किए जाने की सूरत में कोविड-19 के मरीजों की संख्या बहुत ज्यादा होने वाली थी।

जनवरी 30, 2020 को पहला मामला प्रकाश में आने के बाद से मई 23 तक भारत में यह संख्या 1,25,101 तक पहुँच गई है और 3,720 लोगों की मौत हो चुकी है, लेकिन भारत में अभी भी मृत्यु दर 3.07 प्रतिशत पर है, जबकि विश्व में यह 6.57 प्रतिशत है। दुनिया में मामलों की संख्या 52,98,207 पर पहुँच गई है और मरने वालों की संख्या 3,39,425 से अधिक हो गई है।

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने सूचित किया है कि भारत में संक्रमण को 100 से एक लाख पहुँचने में 64 दिन लगे, जबकि अमेरिका में 25 दिन, इटली में 36 दिन, इंग्लैंड में 42 दिन, फ्रांस में 39 दिन, जर्मनी में 35 दिन और स्पेन में 30 दिन लगे।

ये सभी देश भारत की तुलना में न केवल आर्थिक रूप से मजबूत हैं, बल्कि बेहतर स्वस्थ्य सेवाएँ भी इनके पास हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात है कि इनके पास भारत जितनी बड़ी जनसँख्या (1.3 अरब) से निपटने का दबाव भी नहीं है। वास्तव में भारत ने इस दौरान जो भी हासिल किया वह किसी भी चमत्कार से कम नहीं है।

आशुतोष का तर्क है कि भारत में स्थितियाँ बदतर हुई हैं और प्रधानमंत्री कोविड-19 के खतरे को आँकने में असफल रहे हैं, अन्यथा 30 जनवरी को जब पहला मामला सामने आया था तब से वे युद्ध स्तर पर काम करते। लगता है आशुतोष को ‘युद्ध स्तर पर काम करने’ की परिभाषा एक बार फिर से समझनी होगी।

अगर समय रहते सोशल डिस्टेंसिंग, कोविड से मुकाबला करने के लिए नई सुविधाओं को तैयार करना, जिसमें अस्पताल भी शामिल हैं, पीपीई किट तैयार करने वाले संयंत्र की स्थापना, जहाँ 2 लाख प्रतिदिन उत्पादन संभव हो पा रहा है, टेस्ट किट बनाने के संयंत्र लगा कर एक लाख प्रतिदिन तक टेस्ट किया जाना और जनता को 20 लाख करोड़ रुपए का आर्थिक पैकेज उपलब्ध करना, गरीबों के खातों में पैसे पहुँचाना- ये सब युद्धस्तर पर काम नहीं हैं तो क्या है? यही वे जनोन्मुखी कारगर कदम हैं, जो केंद्र सरकार ने 30 जनवरी से 24 मार्च के बीच उठाए हैं।

आशुतोष ने दक्षिण कोरिया का उदाहरण देते हुए कहा कि वहाँ बिना लॉकडाउन के सब कुछ नियंत्रण में कर लिया गया। लेकिन यह बेर और तरबूज की तुलना है, क्योंकि 5.12 करोड़ जनसंख्या वाले देश की तुलना 130 करोड़ वाले देश से नहीं की जा सकती। क्या आशुतोष के पास इस बात का कोई जवाब है कि भारत इन दो महीनों में टेस्ट किट, मास्क और पीपीई किट के उत्पादन में स्वावलंबी हो चुका है और वेंटिलेटर्स का भी उत्पादन करने लगा है। उनके हिसाब से सिर्फ केरल की सरकार सही निर्णय कर रही है, लेकिन केरल सरकार को भी केंद्र से कोई दिक्कत नहीं है।

दिल्ली चुनावों और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के अहमदाबाद के कार्यक्रम के चलते भी कोविड नियंत्रण में देरी का आरोप आशुतोष ने केंद्र सरकार पर लगाया है। दिल्ली के चुनाव 8 फरवरी को हुए और ट्रंप का कार्यक्रम 24 फ़रवरी को हुआ, लेकिन आशुतोष तथ्यों से दूर हो गए हैं, क्योकि विश्व स्वास्थ संगठन ने इसे महामारी 11 मार्च को घोषित किया था और उसके पहले तक किसी को भी इस बात का अंदाजा नहीं था कि यह नई बीमारी क्या है!

भारत में 2015 में स्वाइन फ़्लू से 2,500 लोगों की मौत हुई थी और देश ने पहले भी कई वायरस का मुकाबला किया है, लेकिन कोरोना वायरस अपने आप में अभूतपूर्व संकट है। भारत में कोविड-19 से पहली मौत 12 मार्च को हुई थी और तब तक संक्रमित मामलों की संख्या 74 थी। अगर पूरे विश्व में किसी को भी मानवता के इस अज्ञात शत्रु के बारे कोई जानकारी नहीं थी, तो आशुतोष ऐसे किन निर्णयों की बात कर रहे थे जो नहीं लिए गए, सिवाय इसके कि एक-दूसरे से दूरी बना कर रखी जाए और इसके इलाज की संभावनाएँ तलाशी जाएँ।

बेहतर होता कि आशुतोष एकाध ऐसी सलाह सरकार के सामने रखते, जिसे सरकार उपयोग में ला पाती। उन्होंने कहा कि 24 मार्च तक भारत वेंटिलेटर्स का आयात करता रहा, तो क्या वे चाहते थे कि सरकार सारे इलाज को रोक कर पहले वेंटिलेटर्स बनाने की क्षमता विकसित करती, उसके बाद इस आपदा से प्रभावित लोगों का इलाज करती? क्या वे यही कहना चाह रहे हैं?

जिस तरह से नीति आयोग ने बताया था कि इस बीमारी से लगभग 10.22 लाख लोग संक्रमित हो सकते थे, अगर संक्रमित होने की रफ़्तार 3 दिन में दोगुना होने से बढ़ कर 12.53 नहीं हुए होते। सरकार के थिंक टैंक ने और भी अनुमानों पर चर्चा की और कहा कि अगर लॉकडाउन नहीं हुआ होता, तो कुल संक्रमित लोगों की संख्या भारत में वर्तमान संख्या की 44 गुना होती।

जब आशुतोष नीति आयोग के उस कथित दावे की बात करते हैं, जिसमें ऐसा कहा गया कि 16 मई के बाद भारत में कोविड का कोई नया मामला नहीं आएगा! इस पर नीति आयोग का जवाब पहले ही आ चुका था, जिसे आशुतोष ने नजरअंदाज किया।

नीति आयोग ने कहा था कि विश्व के वैज्ञानिक इस तरह का आकलन करते रहते हैं और उन्हें उसी परिप्रेक्ष में समझने की जरूरत है न कि शब्दशः। जिस ग्राफिक्स कि चर्चा की जा रही है (पहले राहुल गाँधी और अभी आशुतोष के द्वारा) वह अब तक के वास्तविक मामलों पर एक धारणा बनाता है। इस तरह का कोई दावा नहीं किया गया कि 16 मई के बाद कोई नया मामला नहीं आएगा। बयान का निष्कर्ष गलत निकाला गया है। लेकिन इस तरह की चीजों को समझने के लिए थोड़े अध्ययन की जरूरत होती है, न कि सुनी-सुनाई बातों पर भरोसा करने की।

मोदी की आलोचना से पहले इसे समझना भी जरूरी है कि दिल्ली सरकार ने भीड़ जमा होने पर 12 मार्च से ही प्रतिबंध लगा दिया था, जबकि केंद्र सरकार ने 25 मार्च को पूरा लॉकडाउन घोषित किया था। केरल ने 10 मार्च को भीड़ पर रोक लगाया था और 15 मार्च से कड़ी तोड़ने का अभियान शुरू किया था। मध्य प्रदेश में कमलनाथ सरकार ने लोगों के जमा होने पर 14 मार्च से रोक लगा दी थी।

महाराष्ट्र में EDA-1897 (Epidemic Diseases Act, 1897) को 13 मार्च से ही प्रभावी कर दिया गया था और 18 मार्च से किराना की दुकानों को छोड़ कर सब कुछ बंद कर दिया गया था। इसी तरह से ओडिशा ने ईडीए 13 मार्च को पूरी सख्ती के साथ लागू कर दिया था। पंजाब ने भी लॉकडाउन की शुरुआत 13 मार्च से की थी और 22 मार्च से पूरी सख्ती हो गई थी। राजस्थान ने 19 मार्च से प्रदेश में धारा 144 लागू कर दी थी, जबकि तेलंगाना 22 मार्च से ही लॉकडाउन कर दिया था। क्या इन सभी सरकारों के निर्णय गलत थे?

जहाँ तक प्रवासी मजदूरों का प्रश्न है, इसमें प्रदेश सरकारों की भी असफलता है कि वे मजदूरों को रोक पाने में असफल रहे हैं और इनके पलायन के समाचार जंगल की आग की तरह काम किया और लोग अपने घरों की तरफ निकल पड़े।

आशुतोष जैसे पत्रकार इस वैश्विक महामारी में भी अपने एजेंडा पत्रकारिता से बाज नहीं आ रहे हैं, जबकि अगर पहले के श्रमिकों को, जिन्हें बस से घर पहुँचाया गया था, न भी जोड़ा जाए, तो 2,600 श्रमिक एक्सप्रेस के माध्यम से 35 लाख श्रमिकों को अब तक घर पहुँचाया जा चुका है। लेकिन, इस तरह की चीजों को एजेंडा पत्रकारिता में नजरअंदाज किए जाने का फैशन है शायद।

स्कूटी में खरोंच लगने से गरीब सब्जीवाले सनातन डेका की हत्या: फैजुल, युसुफ गिरफ्तार, बाकी की खोज जारी

लॉकडाउन के समय में अपने परिवार के लालन-पालन के लिए 22 मई को सनातन डेका अपने घर के पीछे उगाई सब्जियों को साइकिल पर रखकर बेचने निकला। रास्ते में उसकी साइकिल दो युवकों की स्कूटी से टकराई और स्कूटी पर खरोंच आ गई। स्कूटी चालकों को वह मामूली सी खरोंच देखकर इतना गुस्सा आया कि पहले उन्होंने सनातन को खुद पीटा और फिर अपने तीन अन्य साथियों को बुलवाकर उसे इतना मारा कि उसकी मौके पर ही मौत हो गई। आज पुलिस ने इस संबंध में दो आरोपितों को गिरफ्तार किया। इनकी पहचान फैजुल हक और युसूफउद्दीन अहमद के रूप में हुई। 

सनातन डेका (बाएँ)और दोनों आरोपित (दाएँ)

सामाजिक कार्यकर्ता दिगंता गोस्वामी इस घटना पर कहते कि असम के गाँव तेतेलिया में रहने वाले सनातन वैसे एक मजदूर थे। मगर, लॉकडाउन में सभी काम ठप्प होने के कारण घर पर उगी सब्जियों को बेचने के विचार से घर से निकले। बीच में जब वह एक मुस्लिम बहुल इलाके में पहुँचे, तो वहाँ ये घटना हुई और 37वर्षीय (पैन कार्ड के अनुसार) सनातन डेका को उन युवकों ने इतना पीटा कि मौके पर ही उनकी जान निकल गई। दिगंता इस घटना पर अपना गुस्सा जाहिर करते हुए पूछते हैं कि आखिर एक गरीब व्यक्ति से अगर गलती हुई भी तो क्या उसे ऐसे मारा जाना चाहिए था कि वो मर जाए?

वहीं, उनकी पत्नी, जो पति की मौत के बाद बिलकुल अकेली हो गई है, वो मीडिया से बातचीत में बताती हैं कि उनका पति उनके घर में अकेले कमाने वाला था। ऐसे में जब उन्हें सबसे पहले इस घटना के बारे में सूचना दी गई, तो उन्हें बताया गया कि सनातन का एक्सिडेंट हुआ है।

मगर, जब परिजन खुद हाजो अस्पताल गए तो उन्होंने देखा कि सनातन के शरीर पर गहरे चोट के निशान थे। उनके मुँह से, कान से खून निकल रहा था। उनकी स्थिति को देखते हुए साफ पता चल रहा था कि ये कोई एक्सिडेंट नहीं, बल्कि मार-पिटाई का मामला है। सनातन की हालत ऐसी थी कि हाजो सिविल अस्पताल के डॉक्टरों ने उन्हें फौरन GNRC अस्पताल ले जाने को कहा, जहाँ पहुँचते ही डॉक्टरों ने उन्हें स्पष्ट रूप से मृत घोषित कर दिया।

सनातन डेका का परिवार

हाजो भाजपा विधायक सुमन हरिप्रिया ने आज इस संबंध में सनातन के परिवार से मुलाकात की। उन्होंने पूरा मामला जानने के बाद कहा कि लोग पूछ रहे हैं कि एक युवक को आखिर दिन दहाड़े कैसे मारा? आखिर कैसे ईद के 2 दिन पहले फैजुल और युसूफ ने सनातन की हत्या कर दी? रोजे के दौरान तो माना जाता है कि वे किसी तरह का गुनाह नहीं कर सकते? फिर आखिर उन्होंने ये सब कैसे किया?

भाजपा विधायक ने कहा कि सनातन के पास रोजगार था। पर, लॉकडाउन की वजह से उसकी सैलरी आना रुक गई थी। इसलिए उसने अपने घर के पीछे खेती करके कुछ सब्जी उगाई। पर जब वह उन्हें बेचने निकला तो उसकी मारकर हत्या कर दी गई। परिवार से मिलने के दौरान भाजपा विधायक ने आरोपितों को जल्द से जल्द गिरफ्तार करने के लिए आभार व्यक्त किया। वहीं, एक कॉन्ग्रेस युवक भी मौके पर पहुँचा और उसने मामले को साम्प्रदायिक रंग न देने की लोगों से अपील की।

हालाँकि, इस मामले में आगे की कार्रवाई संबंधी जानकारी जानने के लिए ऑपइंडिया ने पुलिस से संपर्क करने का बहुत प्रयास किया। मगर, पुलिस थाने में किसी ने कॉल नहीं उठाया।

इस संबंध में ऑपइंडिया ने सामाजिक कार्यकर्ता दिगंता गोस्वामी के अलावा वहाँ के लोकल व सनातन डेका के घरवालों की मदद के लिए कैंपेन चलाने वाले भास्कर ज्योति दास से भी बात की। भास्कर ज्योति ने बताया कि इस घटना के बाद उनके इलाके के सभी लोग सनातन के परिवार को मदद देने के लिए आगे आए हैं। कोई 50 रुपया भेज रहा है, तो कोई 500। जिससे भास्कर स्वयं उनके घरवालों की मदद कर रहे हैं व आरोपितों के ख़िलाफ़ केस दायर करवा रहे हैं।

भास्कर बताते हैं कि वे एक संगठन से जुड़े हुए हैं जिसका नाम असम दतिया महासभा युवा मंशा है। इस संगठन ने अपनी ओर से सनातन डेका को पहले शहीद का दर्जा देते हुए Assamese economical revolution martyr का सम्मान दिया है।

पुलिस कार्रवाई के बारे में पूछने पर भास्कर बताते हैं कि पहले पुलिस ऑफिशियल ने बयान दिया था कि आरोपितों ने सनातन को बस थप्पड़ मारा था जिससे वह नीचे गिर गए। मगर, जब भास्कर के संगठन ने इस मामले पर जोर देकर आंदोलन करना शुरू किया तो पुलिस ने उनके सामने अपनी गलती मानी और कहा कि उन्होंने गलत बयान दे दिया था। इसके बाद पुलिस ने सराहनीय काम किया।

भास्कर ज्योति दास कहते हैं कि आरोपित फैजुल बेहद धनी परिवार से संबंध रखता है, जिसका बड़ा भाई लोगों को रेलवे में नौकरी दिलाने का झांसा देकर ढेर सारे पैसे लेता और फिर गायब हो जाता है। ऐसे करके वे लोग बहुत अमीर हो चुके हैं। वे खुद को स्थानीयों के बीच एजीपी का नेता भी बताता है। लेकिन एजीपी ने इस संबंध में कोई आधिकारिक बयान नहीं दिया है। इसलिए इस बारे में कुछ भी कहना गलत होगा।

उल्लेखनीय है कि इस संबंध में हमारे पास कुछ वीडियोज भी आई हैं जो इस समय सोशल मीडिया पर भी शेयर की जा रही है। इस वीडियो में फैजुल स्कूटी लेकर भागते साफ नजर आ रहा है। वहीं, बुरी तरह घायल सनातन सड़क पर भीड़ के बीच बेबस पड़ा है। कुछ लोगों का इस मामले पर कहना है कि उनकी मौके पर ही मौत हो गई। वहीं कुछ बता रहे हैं कि अस्पताल पहुँचते हुए उन्होंने दम तोड़ा और बाद में पुलिस की निगरानी में इस मामले में पोस्टमार्टम हुआ। लेकिन इस पोस्टमार्टम रिपोर्ट में क्या निकलकर आया, ये अभी किसी को मालूम नहीं है। मगर, पुलिस की पड़ताल इस मामले में जारी है।

इस दुख की घड़ी में सनातन डेका का परिवार बिलकुल अकेला पड़ चुका है। उनकी कोई औलाद नहीं है। उनके परिवार में उनकी पत्नी, उनके माता-पिता, और भाई है। इस समय उनकी मदद के लिए भले ही भास्कर ज्योति दास जैसे लोग दिन रात मदद में जुटे हैं और उनके लिए इंसाफ की माँग कर रहे हैं।

कश्मीर के कुलगाम में छिपे दो आतंकियों को भारतीय सेना ने किया ढेर, मोबाइल इंटरनेट सेवा बंद

जम्मू-कश्मीर में कुलगाम सेक्टर के मंजगाम इलाके में सोमवार (25 मई, 2020) सुबह सुरक्षाबलों और आतंकियों के बीच हुए मुठभेड़ में दो आतंकियों को मार गिराया गया है। इस ऑपरेशन को सेना की 34 आरआर, सीआरपीएफ और कुलगाम पुलिस द्वारा अंजाम दिया गया है। इसी बीच कुलगाम तथा शोपियाँ जिलों में हिसंक प्रदर्शनों के मद्देनजर प्रशासन ने माबाईल इंटरनेट सेवा बंद कर दी है।

आईजी कश्मीर विजय कुमार ने बताया कि मुठभेड़ में सुरक्षाबलों ने दो आतंकियों को मार गिराया है। इलाके में तलाशी अभियान जारी है। मारे गए आतंकियों की शिनाख्त अभी नहीं हुई है।

जानकारी के मुताबिक, सुरक्षाबलों को कुलगाम जिले के मंजगाम इलाके में कुछ आतंकवादियों को छिपे होने की सूचना मिली थी। इसके बाद सुरक्षाबलों ने पूरे इलाके की घेराबंदी कर तलाशी अभियान शुरु किया। इसी तलाशी अभियान के दौरान सुरक्षाबलों का आंतकियों से सामना हुआ तो आतंकियों ने सुरक्षाबलों पर गोलियाँ चलाना शुरु कर दिया।

बताया जा रहा है कि आतंकी दस्ता खुर गाँव के एक घर में छुपे थे और वहीं से उन्होंने फायरिंग शुरू की थी। उसके बाद सुरक्षाबलों ने भी मोर्चा संभालते हुए दो आतंकियों को मौत के घाट उतार दिया और आगे की तलाशी में जुटी हैं।

बता दें जम्मू-कश्मीर में आतंकी लगातार घुसपैठ और आतंकी साजिशों को अंजाम देने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन भारतीय जवान उन्हें मुँहतोड़ जवाब देकर मौत के घाट उतार रहे हैं।

गौरतलब है अभी हाल ही में डाउनटाउन इलाके में सुरक्षाबलों ने हिजबुल मुजाहिद्दीन के 2 आतंकियों को मार गिराया था। जिसमें 1 आतंकी अलगाववादी संगठन तहरीक-ए-हुर्रियत के प्रमुख मोहम्मद अशरफ सहराई का बेटा जुनैद भी था। जुनैद हिजबुल मुजाहिद्दीन का शीर्ष कमांडर भी था। उस एनकाउंटर के बाद सुरक्षाबलों ने मौके से कई हथियार और गोला बारुद भी जब्त किए थे।

पिछले दो हफ्तों में कश्मीर में सुरक्षाबलों को कई बड़ी कामयाबी मिली है। 6 मई को जहाँ सुरक्षाबलों ने पुलवामा में हिजबुल के कश्मीर कमांडर रियाज नायकू को मार गिराया था। वहीं, इसके बाद 16 मई की रात हुए डोडा में हुए एनकाउंटर में खोत्रा गाँव में ताहिर के होने की सूचना मिली थी। जिसके बाद सुरक्षाबलों की कार्रवाई में 17 मई को वह भी मारा गया

माफ करना विष्णुदत्त विश्नोई! सिस्टम आपके लायक नहीं… हम पर्दे पर ही सिंघम डिजर्व करते हैं

बचपन की स्मृतियों में एक नाम त्रिवेदी का है। पूरा नाम पता नहीं। रात से कई बार कोशिश की लेकिन घोड़े पर बैठे त्रिवेदी का चेहरा याद नहीं कर पाया। एक ही बार उसे देखा था। नौ बरस के करीब उम्र थी। वह बेनीपट्टी थाने का प्रभारी था। वैसे तो यह इलाका शांत था, लेकिन त्रिवेदी की दिलेरी और दबंगई की कई कहानियाँ हवाओं में थी।

त्रिवेदी आज कहाँ होंगे पता नहीं। बाद में कई पुलिस अधिकारियों के नाम सुने। कुछ महिला अधिकारी भी। इनकी पोस्टिंग का मतलब होता था कि उस इलाके में अपराधियों की खैर नहीं। ऐसे ही अधिकारी थे राजस्थान के चुरू जिले के राजगढ़ थाने के प्रभारी विष्णुदत्त विश्नोई

मैं बुजदिल नहीं था…

विश्नोई शनिवार (23 मई 2020) को अपने सरकारी क्वार्टर से फंदे से लटके मिले थे। पंचतत्व में विलीन हो चुके विश्नोई ने दो सुसाइड नोट भी छोड़े थे। एक में उन्होंने जिले की एसपी तेजस्विनी गौतम को लिखा है,

“आदरणीय मैडम। माफ करना। प्लीज, मेरे चारों तरफ इतना प्रेशर बना दिया गया कि मैं तनाव नहीं झेल पाया। मैंने अंतिम साँस तक मेरा सर्वोत्तम देने का राजस्थान पुलिस को प्रयास किया। निवेदन है कि किसी को परेशान नहीं किया जाए। मैं बुजदिल नहीं था। बस तनाव नहीं झेल पाया। मेरा गुनहगार मैं स्वयं हूँ।”

वह कैसा दबाव होगा जिसका तनाव विश्नोई जैसा अधिकारी झेल नहीं पाया? वह अधिकारी जिससे दुर्दांत अपराधी ही नहीं डरते थे, बल्कि वह जहाँ रहा उस थाने की सूरत बदल गई। इसके लिए वह सरकार के भरोसे नहीं बैठते थे। जनसहयोग से उन्होंने राजस्थान के कम से कम 19 थानों की सूरत बदली थी। यही वह कमाई थी, जिसके कारण अपराध से त्रस्त पब्लिक विश्नोई की पोस्टिंग अपने इलाके में माँगती थी। उनका तबादला हो जाता तो सड़क पर उतर जाती थी।

किस डर से टूटा होगा?

ऐसा दबंग और दिलेर अधिकारी किस डर से टूटा होगा? वो डर इतना भयावह है कि विश्नोई की आत्महत्या के बाद राजगढ़ थाने में तैनात पुलिसकर्मियों ने सामूहिक तबादला माँग लिया। इस डर की परतें तो निष्पक्ष जाँच से ही खुलेंगी। लेकिन इस मामले में कॉन्ग्रेस सरकारों का रिकॉर्ड उत्साहजनक नहीं रहा है। फिलहाल राजनीतिक दबाव में प्रदेश सरकार न्यायिक जाँच के लिए तैयार हो गई है।

इस मामले में सवालों के घेरे में सादुलपुर की ​कॉन्ग्रेस विधायक कृष्णा पूनिया हैं। बीकानेर के आईजी को सामूहिक तबादले के लिए जो पत्र लिखा गया है कि उसमें भी पूनिया और उनके समर्थकों पर स्पष्ट शब्दों में आरोप लगाया है कि वे झूठी शिकायतें उच्चाधिकारियों से करते थे। थाने में तैनात कुछ लोगों को इन्होंने दबाव डालकर लाइन हाजिर भी करवा दिया था।

दैनिक भास्कर की एक रिपोर्ट बताती है कि विश्नोई की सुसाइड का राज थाने की राेजनामचा रपट में दर्ज है। इसके अनुसार “करीब डेढ़ माह पहले एक रपट में उन्होंने लिखा कि शराब का अवैध काराेबार करने वाले बदमाशाें काे पकड़ा ताे छुड़वाने के लिए विधायक ने फाेन पर सिफारिश की। सुसाइड से एक दिन पहले हत्या मामले में हुई बातचीत भी रपट में है।”

हालाँकि पुनिया इसके लिए बीजेपी की ओछी राजनीति को कसूरवार ठहराती हैं। उन्होंने ट्वीट कर कहा है, “मेरी संवेदनाएँ विष्णुदत्त विश्नोई जी के परिवार के साथ है। जिस तरह BJP के नेताओं द्वारा ओछी राजनीति की गई, मैं चाहती हूँ विष्णु दत्त जी की पिछले दिनों की सारी कॉल डिटेल निकलवाकर इस मामले की सम्पूर्ण जाँच की जाए।”

साभार: दैनिक भास्कर

दैनिक भास्कर ने पूनिया से इस मामले में उनका नाम आने को लेकर सवाल किए हैं। जवाब में पूनिया ने कहा है, “विश्नोई से 9 बार फोन पर बात हुई है। कुछ बातचीत 20 से 30 सेकेंड की रही है। बैठकों में आते थे तो देखा है।” साथ ही यह भी कहा है कि दो महीने से लॉकडाउन चल रहा है इस वजह से उनसे कोई खास बात नहीं हुई थी।

सोशल मीडिया में वायरल होती एक तस्वीर जिसमें विश्नोई और पूनिया नजर आ रहे हैं

क्या झूठ बोल रही हैं कृष्णा पूनिया?

जब भास्कर ने नेता प्रतिपक्ष राजेंद्र राठौड़ से पूछा कि पूनिया का दावा है कि वे कभी बिश्नोई से मिली ही नहीं, तो उन्होंने कहा कहा कि पूनिया झूठ बोल रही हैं। विष्णुदत्त के पास पूनिया और उनके पति के बैठे होने की तस्वीर भी है। राठौड़ का दावा है कि पूनिया उन्हें हटाने के लिए तीन महीने से दबाव बना रहीं थीं। अपने ओएसडी अमित ढाका के जरिए मुख्यमंत्री कार्यालय में झूठी शिकायतें कर रही थीं। उन्होंने आत्महत्या के एक दिन पहले विश्नोई और उनके मित्र गोवर्धन सिंह वकील के बीच ह्वाटसऐप चैट का भी हवाला दिया है। राजस्थान पत्रिका ने राठौड़ के हवाले से कहा है कि 12 घंटे तक विश्नोई के मृत शरीर को फंदे से लटका हुआ रखा गया। शुरुआत में कहा गया कि तीन पन्ने का सुसाइड नोट है। बाद में दो ही पन्ने थे।

सवाल कई, फर्क कई

सवाल कई और भी हैं, जिनके जवाब तलाशे जाने जरूरी हैं। ऐसा इसलिए कि पूनिया कोई परंपरागत नेता नहीं हैं। वह एथलीट रही हैं। कई अंतरराष्ट्रीय स्पर्धाओं में पदक जीत देश का नाम रोशन किया है। वह खुद भी कहती हैं कि जिन नेताओं की वजह से इस मामले में मेरा नाम आया है उनकी और मेरी हिस्ट्री में फर्क है।

फर्क केवल पूनिया और दूसरे नेताओं के अतीत में ही नहीं है। फर्क इस मामले को लेकर कॉन्ग्रेस विधायकों के नजरिए में भी है। यही कारण है कि हरियाणा के आदमपुर से कॉन्ग्रेस विधायक कुलदीप बिश्नोई ने 23 मई को ही राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को इस मामले में पत्र लिखा था। इसमें कहा था कि विष्णुदत्त विश्नोई जैसा अधिकारी सुसाइड नहीं कर सकता। इस मामले की सीबीआई जॉंच कर हत्या प्रकरण का सरकार खुलासा करे।

फर्क मेनस्ट्रीम मीडिया और लिबरल गिरोह की सोच का भी है। यदि ऐसी घटना किसी बीजेपी शासित राज्य में हुई होती तो आज मोमबत्ती कम पड़ गए होते। यदि आज राजस्थान में बीजेपी की सरकार होती तो विश्नोई की आत्महत्या प्राइम टाइम में होती। सब मिलकर सिस्टम का मर्सिया पढ़ रहे होते।

क्या ईमानदार अधिकारियों की जान की कीमत यह देखकर तय की जाएगी कि सत्ता में कौन है? फिर आप पर्दे पर ही सिंघम डिजर्व करते हैं। आपका सिस्टम विष्णुदत्त विश्नोई जैसों के लायक नहीं है।

मोदी-योगी को बताया ‘नपुंसक’, स्मृति ईरानी को कहा ‘दोगली’: अलका लाम्बा की गिरफ्तारी की उठी माँग

दिल्ली के चाँदनी चौक विधानसभा क्षेत्र से आम आदमी पार्टी की विधायक रहीं अलका लाम्बा को गिरफ़्तार करने के लिए सोशल मीडिया में ट्रेंड चलाया जा रहा है। उन्होंने अपने पुराने वीडियो शेयर कर के कंट्रोवर्सी क्रिएट किया है। उस वीडियो में अलका लाम्बा पीएम मोदी और सीएम योगी आदित्यनाथ के मुँह पर थूकने की बात करते हुए उन्हें नपुंसक बता रही हैं। वहीं एक अन्य वीडियो में उन्होंने केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी को ‘दोगली’ कहा है।

कॉन्ग्रेस नेता अलका लाम्बा ने जो वीडियो शेयर किया है, वो अप्रैल 2018 में ही यूट्यब पर अपलोड किया गया था। उसमें वो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और यूपी के मुख्यमंत्री आदित्यनाथ पर आरोप लगा रही हैं कि इन दोनों के राज में बेटियों का बलात्कार हो रहा है। उन्होंने कहा था कि ये दोनों नेता सत्ता के गुरुर में इतना आगे बढ़ गए हैं कि ये सोचते हैं उनका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता। उन्होंने सीएम योगी से कहा कि अगर उनकी शादी हुई होती तो वो शायद महिलाओं का सम्मान करना सीख जाते।

इसके अलावा अलका लाम्बा ने एक और ख़बर का लिंक ट्विटर पर शेयर किया, जिसमें उन्होंने केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी के लिए अपशब्द कहे थे। दरअसल, ये दिसंबर 2019 की न्यूज़ है, जब स्मृति ईरानी ने राहुल गाँधी के ‘रेप इन इंडिया’ के बयान की आलोचना करते हुए उन्हें देश की जनता से माफ़ी माँगने को कहा था। ख़बर के अनुसार, लाम्बा ने इसका जवाब देते हुए कहा था:

यहाँ भी इसका “सास-बहू” का नाटक चालू है। संसद भी इसको थिएटर लगता है। डायलॉग बाज़ी कर, थोड़ा रोना धोना कर, यह सोचती है कि एक मंत्री के तौर पर अपनी जिम्मेदारियों और जवाबदेही से यह बच निकलेंगी। निहाल चंद, चिन्मयानंद, नित्यानंद, सेंगर पर चुप्पी रखने वाली दोगली महिला, शर्म करो।

इस तरह की शब्दावली का प्रयोग करना और फिर उसे बार-बार शेयर करने से आक्रोशित लोगों ने ‘अरेस्ट अलका लाम्बा’ नाम से ट्विटर ट्रेंड चलाया। ख़बर लिखे जाने तक ये ट्रेंड पूरे भारत का नंबर एक ट्रेंड बन गया था। लोगों ने पीएम मोदी और सीएम योगी के साथ-साथ केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी के लिए कॉन्ग्रेस नेता अलका लाम्बा द्वारा प्रयोग किए गए शब्दों को ओछा करार देते हुए उनकी गिरफ़्तारी की माँग की।

इससे पहले लाम्बा ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के लिए ‘ढोंगी’ शब्द का प्रयोग करते हुए फेक न्यूज़ फैलाया था कि कुलदीप सेंगर को हाईकोर्ट ने जमानत दे दी है क्योंकि जज को भी अपनी जान बचानी है। सेंगर की बेटी ऐश्वर्या ने अपनी अलका लाम्बा के खिलाफ पुलिस को दी गई शिकायत में आरोप लगाया कि हाईकोर्ट में उनके पिता की अपील पर 1 जून को सुनवाई होगी लेकिन उससे पहले ही जानबूझ कर भ्रम फैलाया जा रहा है।

इससे पहले कॉन्ग्रेस नेता अलका लाम्बा ने कहा था कि अगर कॉन्ग्रेस ने 2002 में ही ‘दोनों को नाप दिया होता’ तो आज भारत को ये दिन नहीं देखने पड़ते। लोगों ने कहा था कि वो पीएम नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की बात कर रही हैं। बता दें कि 2002 की बात कर वे गुजरात दंगों का जिक्र कर रही थीं।