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ट्रम्प ने की चीन से अरबों डॉलर के निवेश वापस लेने की पुष्टि, कहा- सभी सख्त होना चाहते हैं, जबकि मैं सबसे सख्त हूँ

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने पुष्टि की है कि उनके प्रशासन ने चीन में अमेरिकी पेंशन फंड निवेश में अरबों डॉलर को वापस ले लिया है, साथ ही ट्रम्प ने कहा है कि इसी तरह के अन्य कार्यों पर भी विचार चल रहा है।

कोरोना वायरस की वैश्विक महामारी के बाद अमेरिका और चीन के सम्बन्धों में लगातार उतार-चढ़ाव देखने को मिल रहा है। अमेरिका ने बीजिंग द्वारा कोरोना वायरस को नियंत्रित करने पर निराशा व्यक्त की है। अमेरिका ने चीन पर बौद्धिक संपदा और अनुसंधान कार्य चोरी करने का भी आरोप लगाया गया है।

ज्ञात हो कि कोरोना के कारण सर्वाधिक प्रभावित अभी तक अमेरिका हुआ है, जहाँ पर करीब 86,912 से ज्यादा लोग अब तक अपनी जान गँवा चुके हैं और दुनियाभर में अब तक 3,03,405 लोगों की मौत दर्ज की जा चुकी है।

चीन से अरबों डॉलर के पेंशन फंड निवेश लिए वापस

बृहस्पतिवार (मई 14, 2020) को फॉक्स बिजनेस न्यूज़ ने ट्रम्प से जब उन रिपोर्ट्स की प्रमाणिकता के बारे में सवाल किया गया, जिनमें कहा गया था कि अमेरिका ने चीनी निवेश में अरबों अमेरिकी डॉलर का पेंशन फंड वापस लिया है, तो इस पर ट्रम्प ने जवाब दिया- “अरबों डॉलर, अरबों… हाँ, मैंने इसे वापस ले लिया।”

एक अन्य प्रश्न में, अमेरिका के राष्ट्रपति से पूछा गया कि क्या वह न्यूयॉर्क स्टॉक एक्सचेंज और NASDAQ में सूचीबद्ध होने के लिए चीनी कंपनियों को सभी शर्तों का पालन करने के लिए मजबूर करेंगे?

एक साक्षात्कारकर्ता ने कहा कि अलीबाबा जैसी चीनी कंपनियों को न्यूयॉर्क स्टॉक एक्सचेंज में सूचीबद्ध किया गया है, लेकिन वे अपनी कमाई की रिपोर्ट उस तरह नहीं करते हैं, जिस तरह से कि एक अमेरिकी कंपनी करती है।

‘सभी सख्त होना चाहते हैं, जबकि मैं सबसे सख्त हूँ’

इसके जवाब में ट्रम्प ने कहा – “हम बहुत सख्ती से इस मामले को देख रहे हैं। यह बहुत आश्चर्यजनक है, लेकिन यहाँ इसके साथ समस्या है। मान लीजिए कि हम ऐसा करते हैं? तो वे क्या करने जा रहे हैं? वे अपनी सूची को लंदन या कहीं और स्थानांतरित करने जा रहे हैं। आप इसका मतलब समझ सकते हैं?”

ट्रम्प ने कहा – “मान लें कि आप कठोर (Tough) होना चाहते हैं। तुम्हें पता है कि हर कोई एक ‘टफ’ इन्सान बनना चाहता है। देखो, मैं सबसे टफ आदमी हूँ। वे अब कहते हैं- ठीक है, हम लंदन चले जाएँगे या हम हांगकांग चले जाएँगे।

अमेरिका में चीन के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए उठ रही हैं आवाज

कोरोना वायरस की महामारी के लिए जिम्मेदार देश चीन के खिलाफ अमेरिकी राष्ट्रपति को उनके देश में जमकर समर्थन मिल रहा है। दुनिया में सबसे पहले डोनाल्ड ट्रम्प ने ही कोरोना को लेकर चीन के खिलाफ मोर्चा खोला था।

अमेरिका की सीनेट ने डोनाल्ड ट्रम्प को चीन के खिलाफ सजा तय करने का अधिकार दे दिया है। ऐसे में अमेरिका के 14 राज्यों के एटार्नी जनरल्स ने ट्रंप का समर्थन करते हुए उनसे कहा कि कोरोना से तबाही के लिए चीन को जिम्मेदार ठहराइए।

चीन से सभी रिश्ते तोड़ने की धमकी

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने दुनियाभर में कोरोना वायरस के फैलने के मद्देनजर चीन से सारे रिश्ते तोड़ने की धमकी भी दी है। ट्रम्प ने कहा कि अमेरिका चीन को लेकर कई कड़े फैसले लेने जा रहा है।

सुखदेव थापर: जिनके भगत सिंह पर किए तंज ने क्रांतिकारियों को अमर बना दिया

सुखदेव थापर की आज 113वीं जयंती मनाई जा रही है। सुखदेव थापर और भगत सिंह, दोनों ही ‘लाहौर नेशनल कॉलेज’ के छात्र थे। यह भी संयोग ही है कि दोनों ही एक ही साल में लायलपुर में पैदा हुए थे और एक ही साथ बलिदान भी दिया।

सुखदेव थापर सबसे चर्चित क्रांतिकारियों में से एक रहे हैं, जिन्हें अंग्रेजों ने मार्च 23, 1931 को भगत सिंह, शिवराम राजगुरु के साथ लाहौर के जेल में फाँसी दे दी थी।

रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाकउल्लाह खान और रोशन सिंह, चंद्रशेखर आजाद आदि ने जब हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) का गठन किया, तब भगत सिंह और सुखदेव उसमें भी साथ-साथ ही थे।

इस दल में चंद्रशेखर आजाद सबसे वरिष्ठ नेता थे और उनके बाद भगत सिंह और सुखदेव ही वैचारिक रूप से सर्वाधिक प्रखर माने जाते थे।

सन 1919 में हुए जलियाँवाला बाग के भीषण नरसंहार के कारण देश में भय तथा उत्तेजना का वातावरण बन गया था। इस समय सुखदेव 12 वर्ष के थे। पंजाब में लाला लाजपत राय पर लाठीचार्ज के बाद उनके देहांत की घटना ने सुखदेव और भगत सिंह को बदला लेने के लिए प्रेरित किया।

सुखदेव थापर बेहद जोशीले युवा थे और यही वो वजह थी, जिसने भगत सिंह को अप्रैल, 1929 को असेम्बली में बम फेंकने की उस ऐतिहासिक घटना के लिए प्रेरित भी किया था। सुखदेव चाहते थे कि जो भी काम हो, उसका उद्देश्य सभी के सामने स्पष्ट रूप में होना चाहिए। इसके लिए उन्हें सरदार भगत सिंह को एक ताना भी मारना पड़ा था, जिसे लेकर वो बाद में बहुत पछताए भी थे।

भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव

सुखदेव चेहरे से जितने सरल लगते थे, उतने ही विचारों से दृढ़ व अनुशासित थे। अंग्रेज अधिकारी साण्डर्स को मार गिराने में सुखदेव, भगत सिंह और राजगुरु ने मिलकर काम किया।

नवंबर, 1928 को लाला लाजपत राय का देहांत हो गया। एक महीने बाद ही स्कार्ट को मारने की योजना थी, परन्तु गलती से उसकी जगह सांडर्स मारा गया। इस सारी योजना के सूत्रधार सुखदेव ही थे।

सांडर्स की हत्या के अगले ही दिन अंग्रेज़ी में एक पत्र बाँटा गया, जिसमें लिखा था – “लाला लाजपत राय की हत्या का बदला ले लिया गया।”

हालाँकि, सुखदेव थापर और भगत सिंह अच्छे मित्र थे, फिर भी उनके बीच वैचारिक वाद-विवाद कॉलेज के समय से ही होते रहते थे। जेल में लिखे गए उनके कुछ पत्र में इस बात की झलक भी मिलती है।

दिलचस्प बात यह है कि, नेशनल कॉलेज के छात्रों में, इतिहासकार और प्रोफेसर जय चंद विद्यालंकार के क्रांतिकारी आदर्शों से प्रभावित हो विशेष रूप से भगत सिंह और सुखदेव भी लाला लाजपत राय के साथ ही भारत के लिए गहरा प्रेम रखने लगे थे।

उन्होंने ब्रिटिश उपनिवेशवाद और भारत की स्वतंत्रता पर व्याख्यान के लिए विभिन्न राजनीतिक हस्तियों को आमंत्रित करना शुरू कर दिया। इन प्रयासों ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को नई दिशा देने वाले सुखदेव, भगत सिंह और अन्य लोगों को राष्ट्रीय राजनीतिक हस्तियों के रूप में स्थापित करने का काम किया।

1921 में लाला लाजपत राय द्वारा असहयोग आंदोलन के लिए छात्रों को प्रशिक्षित करने के लिए लाहौर के नेशनल कॉलेज में कर्मचारियों और छात्रों की तस्वीर। दाईं ओर से चौथे, भगत सिंह

‘भगत सिंह! तुम मरने से डरते हो और ऐसा उस लड़की की वजह से है’

कॉलेज के दिनों में सरदार भगत सिंह की एक लड़की से मित्रता थी, जो भगत सिंह के कारण ही क्रांतिकारियों से जुड़ी थी। जब क्रांतिकारी मिलकर असेम्बली में बम फेंकने की योजना बना रहे थे तो सरदार भगत सिंह पहले इसके लिए आगे नहीं आए।

शुरुआती बैठकों में सरदार भगत सिंह इस बात पर चुप ही रहे, फिर एक दिन बैठक में सुखदेव ने सरदार भगत सिंह पर इस लड़की को लेकर कटाक्ष करते हुए कहा कि कॉलेज की वो लड़की, जो तुम्हें देख कर मुस्कराया करती थी, तुम उसके इश्क में गिरफ्तार हो गए हो और इसीलिए मरना नहीं चाहते क्योंकि तुम्हें जिंदगी से प्यार हो गया है।

इस कटाक्ष के अगले ही दिन सरदार भगत सिंह ने क्रांतिकारियों की मीटिंग बुलाकर असेम्बली में बम फेंकने के लिए स्वीकृति जताई थी। दल के नेता चन्द्रशेखर आजाद नहीं चाहते थे कि भगत सिंह ऐसा कोई कदम उठाएँ लेकिन वो पीछे नहीं हटे।

आखिरकार अप्रैल 08, 1929 को असेंबली में बम फेंका गया। इस घटना के कुछ दिन पहले ही सरदार भगत सिंह ने अपने मित्र सुखदेव को एक बेहद भावुक पत्र लिखते हुए स्वीकार किया था कि वो किसी लड़की से प्रेम करते थे।

भगत सिंह ने पत्र लिख कर दिया था जवाब

भगत सिंह ने इस पत्र में लिखा था कि उस प्रेम में जो पवित्रता थी वो उनको साहस देती थी, उनके क्रांतिकारी विचारों को संबल देती थी। अंग्रेजों ने 13 अप्रैल को सुखदेव से यह पत्र उनकी गिरफ्तारी के दिन बरामद किया था।

भगत सिंह ने इस पत्र के एक हिस्से में लिखा –

“किसी व्यक्ति के चरित्र के बारे में बातचीत करते हुए एक बात सोचनी चाहिए कि क्या प्यार कभी किसी मनुष्य के लिए सहायक सिद्ध हुआ है? मैं आज इस प्रश्न का उत्तर देता हूँ – हाँ, यह मेजिनी था। तुमने अवश्य ही पढ़ा होगा की अपनी पहली विद्रोही असफलता, मन को कुचल डालने वाली हार, मरे हुए साथियों की याद वह बर्दाश्त नहीं कर सकता था। वह पागल हो जाता या आत्महत्या कर लेता, लेकिन अपनी प्रेमिका के एक ही पत्र से वह, यही नहीं कि किसी एक से मजबूत हो गया, बल्कि सबसे अधिक मजबूत हो गया।”

‘प्यार पाशविक वृत्ति नहीं, एक मानवीय अत्यंत मधुर भावना है’

“जहाँ तक प्यार के नैतिक स्तर का संबंध है, मैं यह कह सकता हूँ कि यह अपने में कुछ नहीं है, सिवाए एक आवेग के, लेकिन यह पाशविक वृत्ति नहीं, एक मानवीय अत्यंत मधुर भावना है। प्यार अपने आप में कभी भी पाशविक वृत्ति नहीं है। प्यार तो हमेशा मनुष्य के चरित्र को ऊपर उठाता है। सच्चा प्यार कभी भी गढ़ा नहीं जा सकता। वह अपने ही मार्ग से आता है, लेकिन कोई नहीं कह सकता कि कब?”

“हाँ, मैं यह कह सकता हूँ कि एक युवक और एक युवती आपस में प्यार कर सकते हैं और वे अपने प्यार के सहारे अपने आवेगों से ऊपर उठ सकते हैं, अपनी पवित्रता बनाये रख सकते हैं। मैं यहाँ एक बात साफ़ कर देना चाहता हूँ की जब मैंने कहा था की प्यार इंसानी कमजोरी है, तो यह एक साधारण आदमी के लिए नहीं कहा था, जिस स्तर पर कि आम आदमी होते हैं।”

सुखदेव, भगत सिंह और राजगुरु को मार्च 23, 1931 को जेल में सामूहिक रूप से फाँसी दी गई थी। लेकिन इससे पहले जेल की प्रताड़नाओं, लगातार पिटाई और मानसिक वेदनाओं से तंग आकर सुखदेव आत्महत्या करने तक का निश्चय कर चुके थे लेकिन भगत सिंह ने उन्हें ऐसा करने से रोका था।

उनका उत्तर यह मिला कि निर्धारित तिथि और समय से पूर्व जेल मैनुअल के नियमों को दरकिनार रखते हुए 23 मार्च 1931 को सायंकाल 7 बजे सुखदेव, राजगुरु और भगत सिंह तीनों को लाहौर सेंट्रल जेल में फाँसी पर लटका दिया, इस प्रकार भगत सिंह तथा राजगुरु के साथ सुखदेव भी मात्र 23 साल की आयु में शहीद हो गए।

महात्मा गाँधी को पत्र लिखकर पूछे थे सवाल

सुखदेव ओजस्वी व्यक्तिव के धनी और कुशल रणनीतिकार थे। एक ओर फाँसी से कुछ दिन पहले भगत सिंह निरंतर यह कह रहे थे कि वो आतंकवादी नहीं बल्कि क्रांतिकारी हैं, वहीं सुखदेव ने गाँधी-इरविन समझौते के सन्दर्भ में एक खुला पत्र महात्मा गाँधी के नाम लिखकर बेहद गम्भीर प्रश्न किए थे।

इस पत्र में सुखदेव ने महात्मा गाँधी से सवाल किए थे कि उन्होंने आखिर किस से पूछ कर और क्या सोच कर सविनय अवज्ञा आंदोलन वापस लिया? सुखदेव थापर ने पूछा कि जितने राजनीतिक कैदी थे, वो तो आपके आंदोलन के चलते रिहा हो गए हैं लेकिन ऐसे में क्रांतिकारी कैदियों का क्या होगा?

आन्दोलन वापस लेने से बौखलाए और इरविन समझौते को बेबुनियाद बताते सुखदेव थापर ने गाँधी जी को इस पत्र में बताया था कि 1915 से जेलों में बंद गदर पार्टी के दर्जनों क्रांतिकारी अभी भी कैद में सड़ रहे हैं, कई लोगों की सजा की अवधि भी पूरी हो चुकी है और कई तो जैसे जेलों में ही जिंदा दफनाए जा चुके हैं।

इस पत्र का यूँ भी कोई नतीजा सामने नहीं आया और इन तीन क्रांतिकारियों को आखिरकार फाँसी दे दी गई।

गोपालगंज रोहित जायसवाल मामला: पीड़ित पिता की 2 रिकॉर्डिंग सुने और खुद करें फैसला

अपडेट: बिहार के डीजीपी की जॉंच के बाद हम सूचनाओं को अपडेट कर रहे हैं। पीड़ित पिता इस दौरान कई बार अपने बयान से मुकरे हैं। लिहाजा उनकी ओर से किए गए सांप्रदायिक दावों को हम हटा रहे हैं। हमारा मकसद किसी संप्रदाय की भावनाओं का आहत करना नहीं था। केवल पीड़ित पक्ष की बातें सामने रखना था। इस क्रम में किसी की भावनाओं को ठेस पहुॅंची हो तो हमे खेद है।

ऑपइंडिया ने एक ख़बर प्रकाशित की थी, जिसमें बिहार स्थित गोपालगंज के राजेश जायसवाल के आरोपों का जिक्र था। कटेया थाना क्षेत्र के रहने वाले राजेश ने कुछ सांप्रदायिक आरोप लगाए थे और दावा किया था कि उनके बेटे की हत्या की गई है। उनके आरोपों को पुलिस ने नकार दिया था और कहा था कि दोषियों पर कार्रवाई की जा चुकी है। गौरतलब है कि राजेश के बेटे रोहित की लाश मार्च 29, 2020 को गाँव से 3-4 किलोमीटर दूर एक नदी से निकाली गई थी।

मीडिया में आ रही तमाम ख़बरों के बीच ऑपइंडिया ने गुरुवार (मई 14, 2020) को रात 10 बजे राजेश जायसवाल से फिर से बात की? हमने उनसे उनके शनिवार (मई 9, 2020) को दिए बयान को लेकर सवाल किए।दिया था, क्या वो उस पर पलट गए हैं? सोशल मीडिया और मीडिया में ऐसी बातें चल रही थीं, इसीलिए हमने उसे ये सवाल पूछा।

राजेश जायसवाल ने अपने नए बयान में क्या कहा?

राजेश ने कहा कि उन्हें बस इस सवाल का जवाब चाहिए उनके बेटे पर पानी क्यों छिड़का जाता था? राजेश जायसवाल ने कहा:

“मैंने शक के आधार पर ऐसा कहा था। मैंने ये तो स्पष्ट कहा था कि मेरे बेटे रोहित पर पानी छिड़कता था। वो अपनी माँ से आकर ऐसा बोलता था कि वो उधर जाता था तो उस पर पानी छिड़कते हैं। आख़िर उस पर पानी क्यों छिड़का जाता था? किस चीज के लिए मेरे बेटे के शरीर पर पानी छिड़का जाता था? अब तो वही लोग बताएँगे कि पानी क्यों छिड़का जाता था।”

हम किसी की निजता का सम्मान करते हैं लेकिन इस ख़बर को लेकर ऑपइंडिया पर कई तरह के आरोप लगे हैं और सोशल मीडिया में कई लोगों से इस सम्बन्ध में हमसे सवाल पूछा है, इसीलिए हम मृत रोहित के पिता राजेश जायसवाल से हुई हमारी बातचीत की ऑडियो रिकॉर्डिंग आपके समक्ष पेश कर रहे हैं। नीचे आप रिकॉर्डिंग को सुन सकते हैं, जिसमें हमने उनके 9 मई वाली बातचीत का भी हिस्सा लगाया है, और जब आज बात हुई उसका भी:

दोनों दिनों (मई 9 और 14) के बातचीत की रिकॉर्डिंग का संक्षिप्त हिस्सा

राजेश ने बीच में ये भी कहा कि उन्हें याद नहीं है कि उन्होंने क्या कहा था और क्या नहीं क्योंकि उनके मोबाइल नंबर पर रोज कई कॉल आते हैं। फिर उन्होंने दावा किया कि ये बात उनके किसी सहयोगी ने कही होगी क्योंकि वो कई बार अपने सहयोगी को बात करने के लिए फोन दे देते हैं। जब ऑपइंडिया ने उन्हें याद दिलाया कि ये बयान उनका ही था और उसकी पूरी रिकॉर्डिंग मौजूद है, तो उन्होंने कहा, “मैंने शक के आधार पर ऐसा कहा होगा।

अब उन्होंने कई अन्य कारण भी गिनाए हैं। राजेश का कहना है कि उनकी दुकान को लेकर भी रोहित की हत्या की गई हो सकती है। उन्होंने बताया कि उनके पास सबूत नहीं है, ऐसे में वो कुछ स्पष्ट नहीं कह सकते।

उन्होंने बताया कि उनसे तो झगड़ा नहीं था लेकिन उनके बेटे का क्या झगड़ा था, इस बारे में उन्हें कुछ नहीं पता। बाद में उन्होंने अपने पुराने बयान की रिकॉर्डिंग सुनने के बाद कहा कि उनके नंबर पर इतने फोन कॉल्स आते हैं कि वो नर्वस हो जाते हैं।

इससे पहले राजेश ने कहा था कि उनकी किसी से कोई दुश्मनी नहीं है, वो बस अपने बेटे के लिए न्याय चाहते हैं। कटेया थानाध्यक्ष अश्विनी तिवारी पर रोहित की पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट को 22 दिनों तक दबा कर रखने का आरोप भी राजेश और उनके परिवार ने लगाया था।

स्पेशल ट्रेन से बेंगलुरु पहुँचे 70 यात्रियों का क्वारंटाइन से इनकार, वापस दिल्ली लौटाने की तैयारी

दिल्ली से स्पेशल ट्रेन से गुरुवार(14 मई, 2020) को कर्नाटक पहुॅंचे करीब 70 यात्रियों ने क्वारंटाइन सेंटर जाने से इनकार कर दिया। हंगामे के बाद उन्होंने वापस दिल्ली भेजने की मॉंग की। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार उन्हें दिल्ली आने वाली ट्रेन में अतिरिक्त कोच लगाकर वापस लौटाने की तैयारी की जा रही है।

लॉकडाउन के बीच देश में सीमित रेल सेवाओं को शुरू कर इन दिनों केन्द्र दूरदराज इलाकों में फँसे लोगों को घर भेजने की प्रक्रिया में लगी हुई है। इसी के तहत आज करीब 1000 यात्रियों को लेकर दिल्ली से पहली ट्रेन कर्नाटक के बेंगलुरू स्टेशन पहुँची।

कोरोना वायरस की रोकथाम के लिए सरकार द्वारा बनाए गए नियमों के मुताबिक प्रवासी लोगों की जाँच की जाएगी और उन्हें 14 दिनों के लिए क्वारंटाइन केन्द्रों में रखा जाएगा। लेकिन दिल्ली से बेंगलुरू रेलवे स्टेशन पहुँचे करीब 70 यात्रियों ने क्वारंटाइन केन्द्र में भर्ती होने से इनकार कर दिया। गुस्साए यात्रियों ने पुलिस के माध्यम से रेलवे के अधिकारियों से माँग की कि वह उन्हें दिल्ली वापस भेज दें। यात्रियों ने आरोप लगाया कि अनिवार्य रूप से क्वारंटाइन किए जाने की जानकारी पहले से नहीं दी गई थी।

रेलवे स्टेशन पर हंगामा करते यात्रियों का एक वीडियो सामने आया है, जिसमें देखा जा सकता है कि कुछ यात्री सरकार द्वारा कोरोना की रोकथाम के लिए बनाए गए नियमों का उल्लंघन करते हुए क्वारंटाइन केन्द्रों में जाने से इनकार कर रहे हैं। बेंगलुरु रेलवे स्टेशन पर खड़े होकर ताली बजाते हुए वे ‘नो क्वारंटाइन’ के नारे लगा रहे हैं।

रेलवे स्टेशन पर मौजूद सभी यात्रियों ने मुँह पर मास्क या रुमाल लगाया हुआ है, इस दौरान वीडियो में पुलिस फोर्स भी मौके पर तैनात दिखाई दे रही है। रेलवे के एक अधिकारी ने पीटीआई को बताया “दिल्ली से आए अधिकांश यात्री क्वारंटाइन सेंटरों के लिए जा चुके हैं।

रेलवे स्टेशन पर हुए विरोध प्रदर्शन के बाद पुलिस महानिरीक्षक (रेलवे) डी रूपा ने बेंगलुरु के डिवीजनल रेलवे प्रबंधक को पत्र लिखा कि जहाँ से यात्री सवार हुए थे वहाँ के लिए एक अतिरिक्त बोगी जोड़ने के लिए कहा है।

पत्र में रूपा ने कहा कि नई दिल्ली से आए कुछ यात्रियों ने 14 दिनों के लिए क्वारंटाइन होने से इनकार कर दिया है, जो कि राज्य सरकार द्वारा कोरोना वायरस की रोकथाम के लिए बनाए गए नियमों का ही एक हिस्सा है। उन्होंने बताया कि इन यात्रियों ने बेंगलुरु से दिल्ली वापस भेजे जाने की माँग की है। इतना ही नहीं इन लोगों का कहना है कि वापस जाने की टिकट का खर्च उठाने के लिए भी तैयार हैं।

रूपा ने DRM को लिखा है कि यात्री अपना खर्च स्वयं वहन करने के लिए तैयार हैं, उन्होंने अधिकारियों से अनुरोध किया कि बेंगलुरु से सुबह 8.30 बजे जाने वाली राजधानी एक्सप्रेस 20691 में एक और बोगी जोड़ने की व्यवस्था करें।

ईद पर मस्जिद और ईदगाह में नमाज पढ़ने की मिले इजाजत: कॉन्ग्रेस नेता इब्राहिम का कर्नाटक के CM को खत

कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता सीएम इब्राहिम ने मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा को पत्र लिखा है। इसमें ईद के मौके पर मस्जिद और ईदगाह मैदानों में नमाज पढ़ने की छूट देने की अपील की है। पत्र 13 मई को लिखा गया।

पत्र में लिखा गया कि कोरोना के कारण पूरे राज्य के लोग मस्जिदों में नमाज पढ़ने में असमर्थ हैं। सरकार के निर्देशानुसार वे अपने घरों में रहकर ही नमाज अदा कर रहे हैं। इसलिए पूरे समुदाय की ओर से एक सलाह है कि सरकार स्वास्थ्य विशेषज्ञों का परामर्श लेकर समुदाय को सभी एहतियाती उपायों के साथ ईद के दिन 1 बजे तक ईदगाह और मस्जिदों में नमाज अदा करने की अनुमति दे।

गौरतलब है कि इस पत्र में पूर्व मंत्री ने ये भी कहा है कि राज्य में 24 या 25 मई को ईद का त्योहार मनाया जा सकता है। इस दिन समुदाय के सदस्य विशेष नमाज़ अदा करते हैं। इसलिए वे चाहते हैं कि मुख्यमंत्री स्वास्थ्य विशेषज्ञों से परामर्श लेकर उनके अनुरोध पर गौर करें। पत्र पर इब्राहिम के अलावा विधान पार्षद (एमएलसी) एस अब्दुल जब्बार का भी नाम है।

बता दें कि कोरोना वायरस की वजह से देशभर में लागू लॉकडाउन के चलते राजनीतिक और धार्मिक सभाओं, सामूहिक रूप से मस्जिदों में नमाज पढ़ने और मंदिरों में पूजा करने पर रोक है। ऐसे में कॉन्ग्रेस मंत्री के इस अनुरोध के बाद सोशल मीडिया पर उनकी बहुत आलोचना हो रही है।

इस चिट्ठी पर राज्य के ग्रामीण विकास और पंचायती राज मंत्री के एस ईश्वरप्पा और कुछ तबकों ने इब्राहिम की आलोचना की है। साथ ही मुख्यमंत्री से कॉन्ग्रेस नेता की इस अपील को अस्वीकार करने की अपील की है। उन्होंने कहा कि कानून सबके लिए बराबर है।

इसके अलावा मंत्री ने गुरुवार को इस संबंध में ट्वीट भी किया। उन्होंने लिखा, ” सब को मालूम है कि (पूर्व मुख्यमंत्री) सिद्धरमैया, सीएम इब्राहिम और (पूर्व मंत्री) बीजेड जमीर अहमद खान द्वारा तबलीगी जमात के समर्थन का क्या नतीजा था।”

ताना मारने पर तेलीनिपाड़ा में हिंदुओं पर तलवार, बम से हमला, घर जलाए: बंगाल के पुलिस अधिकारी हुमायूँ कबीर

बंगाल के हुगली जिले के तेलीनिपाड़ा इलाके में हिंदुओं के ख़िलाफ साम्प्रदायिक हिंसा को बंगाल पुलिस ने ‘ताना मारने’ का अंजाम बताया है। सीएम ममता बनर्जी के करीबी माने जाने चंदन नगर पुलिस आयुक्त हुमायूँ कबीर ने हिंदुओं पर कट्टरपंथियों के हमले को जस्टिफाई करते हुए यह बात कही है।

स्वराज्य के अनुसार, पुलिस अधिकारी हुमाँयू कबीर ने मीडिया से बात करते हुए बताया कि पहले हिंदुओं ने मजहब विशेष के एक छोटे से समूह को कोरोना पर ताना मारा। उसके बाद ही दूसरे समुदाय के लोगों को गुस्सा आया। उन्होंने बाद में सॉकेट बम, गैस सिलिंडर, तलवारों , धारदार हथियारों, लोहे की रॉड और ईंट-पत्थर से हमला किया। 

गौरतलब है कि साम्प्रदायिक हिंसा के पीछे हिंदुओं के तानों को वजह बताने वाले ये वही पुलिस आयुक्त हैं, जिन्हें 2014 के लोकसभा चुनावों से पहले मुर्शिदाबाद जिला पुलिस प्रमुख के रूप में हटा दिया गया था, क्योंकि वे सत्तारूढ़ तृणमूल कॉन्ग्रेस के पक्ष में थे।

हुमायूॅं कबीर के मुताबिक चंदन नगर में कुछ लोगों के कोरोना पॉजिटिव पाए जाने के बाद हिंदुओं ने उर्दी बाजार में दूसरे मजहब वालों पर ताना मारा। इसके बाद वे लोग वापस अपने इलाके में गए और अपने अन्य मजहबी बंधुओं को इस बारे में बताया। वे सब गुस्से में धारदार हथियारों के साथ वहाँ लौटे व हिंदुओं पर हमला किया। हालाँकि, बाद में पुलिस के हस्तक्षेप के बाद इलाके में अब शांति बहाल हो चुकी है।

पुलिस अधिकारी हुमायूॅं कबीर के इस इस नैरेटिव पर यकीन भी कर ले तो आप समझ सकते हैं कि आज बंगाल के हालात कैसे हैं कि केवल ताना मारने पर कट्टरपंथियों ने हिंदुओं के घर जला दिए और उन पर तलवारों से हमला किया।

आईपीएस अधिकारी अपने बयान में आगे मीडिया को ये भी बताते हैं कि हिंदुओं ने दूसरे मजहब वालों को ताना देने के बाद उनके लिए सार्वजनिक शौचालय का रास्ता भी ब्लॉक किया, जिसे वे इस्तेमाल करते थे। बाद में इसी सब आपसी बहस ने साम्प्रदायिक हिंसा का रूप लिया।

इस घटना पर हुगली से भाजपा सांसद लॉकेट चटर्जी ने बयान देते हुए बताया था कि अजमेर से लौटे कुछ दूसरे मजहब के लोगों के कोरोना पॉजिटिव पाए जाने के बाद चंदननगर के लोग सतर्क हो गए थे और उन्होंने अपने इलाके में बाहरी लोगों की एंट्री बंद कर दी थी। मगर, दूसरे मजहब के लोगों ने बैरिकेड लगाने पर रविवार को उन लोगों पर हमला कर दिया।

भाजपा सांसद ने अपने बयान में मंगलवार के हमले को भी पूरी तरह से सुनियोजित बताया था, जिसमें कट्टरपंथी लोग हिंदुओं पर हमला करने के लिए सॉकेट बम, गैस सिलेंडर, धारदार हथियारों से लैस थे।

उन्होंने आरोप लगाया था कि राज्य सरकार द्वारा जो इंटरनेट बैन किया गया है उसका उद्देश्य भी केवल सच को सामने आने से रोकना है। देश के लोग इस बात को न जाने सकें कि हिंदुओं पर हुआ ये आक्रमण कितना भयावह था। भाजपा सांसद चटर्जी ने अपने बयान में ये भी आरोप लगाया है कि बंगाल पुलिस इस मामले में उन हिंदुओं को गिरफ्तार कर रही है, जिन्होंने बैरिकेड लगाए और बाहरियों को अपने इलाके में आने से रोका।

वे कहती है कि इस भेदभाव और एकतरफा गिरफ्तारी ने लोगों में डर व्याप्त कर दिया है और लोगों को ये मानने पर मजबूर कर दिया है कि पुलिस एक समुदाय की ओर झुकी हुई है। 

इसके अलावा भाजपा के राष्ट्रीय सचिव राहुल सिन्हा भी इस मामले पर कहते हैं कि बम स्क्वॉड टीम वहाँ पर है और उन्होंने वहाँ से अभी तक पेट्रोल बम और सॉकेट बमों को बरामद किया है। वे कहते हैं कि विस्फोटकों की बरामदगी इस बात की ओर इशारा करती है कि विशेष समुदाय हथियारों और विस्फोटकों का भंडार रखता है। वे पूछते हैं कि पुलिस की नाक के नीचे विस्फोटक के भंडार कैसे रखे जा सकते हैं, वो भी लॉकडाउन के दौरान?

यहाँ बता दें कि एक ओर जहाँ बंगाल का हुगली साम्प्रदायिक हिंसा की आग में रविवार और मंगलवार को जलता रहा, वहीं बंगाल का गृह विभाग ये दावे करता रहा कि तेलीनिपाड़ा में शांति बहाल हो गई है और जिन्होंने माहौल बिगाड़ने की कोशिश की थी, उन्हें गिरफ्तार कर लिया है। रिपोर्ट्स के अनुसार, तेलीनिपाड़ा हिंसा मामले में बताया जा रहा है कि अब तक वहाँ 56 लोगों की गिरफ्तार हुई है और पूरे इलाके में धारा 144 लगा दी गई है।

मंदिरों का सोना नहीं, कॉन्ग्रेस नेताओं से लें पैसा: पूर्व CM पृथ्वीराज चव्हाण की सलाह पर बोले महंत

महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री और कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता पृथ्वीराज चव्हाण ने कोरोना संकट को देखते हुए मंदिरों का सोना लेने की सलाह दी थी। महंतों ने इसकी निंदा करते हुए कहा है कि पैसा कॉन्ग्रेस नेताओं से लिया जाना चाहिए।

पृथ्वीराज चव्हाण के बयान पर प्रतिक्रिया देते तपस्वी छावनी से जुड़े स्वामी परमहंस ने कहा, “सरकार को हिंदू मंदिरों से सोना लेने से पहले, कॉन्ग्रेस के उन नेताओं की संपत्ति को जब्त करके उसे कोरोना वायरस से लड़ने के काम में लगा देना चाहिए, जिन्होंने 70 सालों तक देश को लूटकर खाया। इसके बाद वह मंदिरों की संपत्ति लेने की बात करें तो हम उनके फैसले का स्वागत करेंगे।”

मणिराम दास छावनी के उत्तराधिकारी महंत कमल नयन दास ने आरोप लगाया कि कॉन्ग्रेस नेता राष्ट्र विरोधी गतिविधियों में शामिल हैं। इस दौरान उन्होंने पूर्व सीएम से सवाल भी किया कि वह केवल हिंदू मंदिरों से हीं क्यों पैसा माँगते हैं, चर्चों और मस्जिदों से पैसा क्यों नहीं माँगते।

दरअसल पृथ्वीराज चव्हाण ने ट्वीट करते हुए केन्द्र सरकार को सुझाव दिया था, “सरकार को देश के सभी धार्मिक ट्रस्टों में रखे सभी सोने का तुरंत इस्तेमाल करना चाहिए। वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल के अनुसार मंदिर ट्रस्टों के पास लगभग 1 ट्रिलियन डॉलर मूल्य का सोना पड़ा हुआ है। सरकार चाहे तो कम ब्याज पर यह सोना सोना मंदिर ट्रस्टों से लिया जा सकता है।”

उन्होंने आगे कहा था, “अगर इन ट्रस्टों से मामूली ब्याज दर पर लिया जाता है, तो इसको निम्न मध्यम और गरीब वर्ग की हालत ठीक करने के लिए खर्च किया जा सकता है।” रिपोर्टों से पता चलता है कि वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल (WGC) ने कहा है कि भारत में धार्मिक संप्रदायों के पास मौजूद सोने के भंडार का मूल्य लगभग 1 ट्रिलियन डॉलर है। इसी बात का उल्लेख करते हुए चव्हाण ने कहा कि “खुले बाजार से धन जुटाने की कम गुंजाइश है।”

‘गौ-माता’ कह बीफ रेसेपी डालने वाली रेहाना फातिमा BSNL से बर्खास्त, सबरीमाला में भी की थी घुसने की कोशिश

साल 2018 में सबरीमाला मंदिर में घुसने की कोशिश कर विवादों में आई रेहाना फातिमा को बीएसएनएल ने बर्खास्त कर दिया है। इससे पहले साल 2018 में विवादों में आने के बाद रेहाना का पलारीवत्तोम टेलीफोन एक्सचेंज में तबादला किया गया था।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, बीएसएनएल ने रेहाना के खि़लाफ़ ये कार्रवाई कई शिकायतों को मिलने के बाद की है। उन्होंने बताया कि पब्लिक द्वारा उन्हें रेहाना से संबंधित कई ऐसी तस्वीरें और वीडियोज भेजी गई, जिनमें दावा किया गया कि उन्होंने लोगों की धार्मिक भावनाओं को आहत किया था।

गौरतलब है कि रेहाना फातिमा अक्सर विवादों में रहती हैं। इससे पहले भी बहुत बार हिंदुओं की भावनाओं को आहत करने के आरोप में उनपर मामला दर्ज हो चुका है।

साल 2014 में किस ऑफ लव कैंपेन का भाग बनने के बाद उनके और उनके पति मनोज श्रीधर के किस की क्लिप भी सोशल मीडिया पर विवादों का हिस्सा बनी थी।

वहीं, केरल मुस्लिम जमात काउंसिल ने भी ‘लाखों हिंदू श्रद्धालुओं की भावनाएँ आहत करने’ को लेकर फातिमा को मुस्लिम समुदाय से निष्कासित कर दिया था।

फातिमा ने 2018 में तरबूजों के साथ टॉपलेस फोटो भी सोशल मीडिया पर पोस्ट की थी। ये फोटो फातिमा द्वारा तब शेयर की गई थी जब कोझिकोड के एक प्रोफेसर ने महिलाओं के वक्ष की तुलना तरबूज से की थी। उस समय फातिमा की हरकत पर फेसबुक पर बहुत बवाल हुआ था।

बता दें, रेहाना के कारनामों की सूची इतनी ही नहीं है। हाल में रेहाना ने यूट्यूब पर एक कुकिंग वीडियो भी डाली थी। वीडियो में रेहाना बीफ की रेसेपी बताती नजर आई थीं। मगर, वीडियो की शुरुआत के 20 सेकेंड में उन्हें बीफ की जगह गौ माता बोलते सुना गया था।

इस मामले में भी सोशल मीडिया पर उनकी बहुत आलोचना हुई थी। मैसूर के कृष्णराज इलाके के विधायक एसए रामदास ने इस वीडियो पर केरल के मुख्यमंत्री पिनरई विजयन से सवाल किया था और साथ ही हिंदुओं की भावनाओं से ख़िलवाड़ करने के आरोप में उस पर एक्शन की माँग की थी।

रुबिका लियाकत के मजहब पर प्रिंट का हमला: मुस्लिम वो है जो देश से पहले मजहब देखे?

कोरोना संकट के इस दौर में द प्रिंट रुबिका लियाकत और सईद अंसारी जैसे पत्रकारों का ‘अच्छे’ और ‘बुरे’ मुस्लिम वर्गीकरण में लगा है।

वामपंथी मीडिया पोर्टल द प्रिंट ने दिलीप मंडल का एक लेख छापा है। इस लेख में बुद्धिजीवी लेखक ने शोध करने की अपनी ताकत एबीपी न्यूज की एंकर रुबिका लियाकत और आजतक के एंकर सईद अंसारी जैसे मुस्लिम एंकरों की रिपोर्टिंग समझाने में लगा दी है।

पाठकों को ये बताने की कोशिश की है कि भारत में दो तरह के मुस्लिम हैं। एक तो वे जो खुलेआम उनके प्रोपेगेंडा को बढ़ाने में हवा का काम करते हैं और अपने अस्तित्व को बचाए रखते हैं। दूसरे वे जो उनके ख़िलाफ़ जाकर भाजपा का मुखपत्र बन रहे हैं और ‘अपने’ लोगों में ‘अपनी’ पहचान खो रहे हैं।

दि प्रिंट के इस लेख में जिसका शीर्षक “रुबिका लियाकत और सईद अंसारी जैसे हिंदी समाचार एंकर भाजपा के मुस्लिम नेताओं की तरह हैं” है। इसमें रुबिका लियाकत पर केंद्रित होकर उनके बारे में कहा गया कि मीडिया में कुछ एक ऐसे पत्रकार हैं जो अपनी अंतरात्मा, अपने जमीर और वजूद को खतरे में डालकर उसे बचाने की कोशिश कर रहे हैं।

वरना, बहुत से मुस्लिम पत्रकार तो ऐसे हैं जो मीडिया में विविधता न होने के कारण इस पेशे को ही छोड़ देते हैं या फिर न्यूज रूम में साम्प्रदायिक माहौल देखकर त्रस्त हो जाते हैं। मगर, रुबिका और सईद जैसे पत्रकार ऐसे हैं जो  सार्वजनिक-प्रोफेशनल काम और निजी विचारों और जीवन के साथ सामंजस्य बिठा रहे हैं।

सबसे पहले तो लेखक की मानसिक स्थिति देखकर ही इतनी दया आती है कि वे कोरोना वारयस के समय में भी ऐसे मुद्दों को अपने भीतर विमर्श के लिए लेकर आए। लेकिन जब लेकर आए भी तो ऐसे जैसे उनके भीतर का अवसाद शब्दों में उतर आया हो।

अवसाद इस बात का कि आखिर जिस समय में अधिकांश मुस्लिम मीडियाकर्मी उनके विचारों के इर्द-गिर्द चकरघिन्नी की तरह चक्कर लगा रहे हैं, उस समय रुबिका और सईद जैसे मुस्लिम पत्रकार आखिर कैसे अलग धारा में बह रहे हैं। 

उन्हें दिक्कत इस बात से है कि रुबिका लियाकत मुस्लिम होने के बावजूद उस एजेंडे को आगे नहीं बढ़ातीं, जिसे वामपंथी मीडिया ने उन्हीं के ‘मजहबी वजूद’ को बचाने के नाम पर तैयार किया है। वो वजूद जिसमें सरकार को गाली देने की आजादी है। उनसे निराधार प्रश्न करने की स्वतंत्रता है और बात बे-बात खुद के अस्तित्व को खतरे में बताने के तर्क हैं।

लेखक का कहना है कि रुबिका और सईद जो रिपोर्टिंग कर रहे हैं, वो अपने वजूद के उलट जाकर कर रहे हैं। उनका शायद पूछना कि तबलीगी जमात के कारनामे, शाहीनबाग के मनसूबे, मरकज के उद्देश्यों का खुलासा एक मुस्लिम एंकर आखिर कैसे कर सकता है? क्यूँकि, वामपंथी गिरोह के मुताबिक तो उनकी विचारधारा ये कहती है कि ये काम केवल आरएसएस या फिर बजरंग दल से जुड़े एंकर ही कर सकते हैं। अगर, कोई मुस्लिम पत्रकार इस तरह की जुर्रत कर रहा है, तो ये उसका अपना मन नहीं है, बल्कि उस पर कॉरपोरेट दुनिया का दबाव है।

दरअसल, लेखक चाहते हैं कि रुबिका लियाकत जैसी पत्रकार शाहीनबाग प्रदर्शनों का खुलकर समर्थन करें, क्योंकि वे एक मुस्लिम हैं। वहीं सईद अंसारी जैसे पत्रकार जामिया हिंसा में छात्रों की तरफ से पत्थर फेंके, क्यूँकि वे मुस्लिम हैं। 

लेकिन, ये एंकर अगर, इससे उलट कुछ कर रहे हैं, जैसे रुबिका शाहीनबाग को खाली कराने की माँग कर रही हैं और सईद अपनी रिपोर्टिंग में पुलिस की तारीफ कर रहे हैं, तो दोनों बहके मुस्लिम हैं या फिर ऐसे दबे मुस्लिम हैं, जो बेचारे आज अपने घर के चूल्हे को जलाने के लिए अपने ईमान से, अपने मजहब से, खुद से गद्दारी करने लगे हैं। लेकिन गाहे-बगाहे सोशल मीडिया पर कुरान की आयतें शेयर करके अपने मजहब के साथ तालमेल भी बिठा रहे हैं।

इस लेख में गौर कीजिए कि लेखक इतने सेकुलर विचारों वाले हैं कि वे मानना ही नहीं चाहते कि किसी मुस्लिम में अपनी समझ या फिर अपना मत विकसित हो सकता है या वो अपनी इच्छा से अपना कार्यक्षेत्र व विचारधारा चुन सकता है।

इस लेख में दोहरेपन की हदों को महसूस कीजिए कि लेखक के लिए हिंदू बनाम मुस्लिम पत्रकार कितना महत्वपूर्ण विषय है कि वे खुद ही इस बात पर प्रकाश डालते हैं कि आज मुस्लिमों को हैरानी है कि मुस्लिम एंकर ऐसा कैसे कर सकते है?

द प्रिंट का ये लेख प्रमाण है इस बात का कि लेखक को मुस्लिमों से तो बहुत प्रेम है, लेकिन वो अपने मजहबी कट्टरपंथ से हटकर यदि कुछ ऐसा करें, जो देश की बहुसंख्यक आबादी के विचारों/मतों से मेल खाता हो, तो उन्हें उनकी स्थिति पर अचंभा होता है, विचारों पर दया आती है।

आप खुद लेख को पढ़िए। आपको खुद समझ नहीं आएगा कि द प्रिंट के इस लेख में रुबिका जैसे पत्रकारों की उनके काम के लिए आलोचना हुई है या फिर ये बताया गया कि मुस्लिम एंकर मजहब के उलट जाकर अपना काम केवल दबाव में कर रहे हैं। वरना उनकी ऐसी प्रवृत्ति ही नहीं है और ये सब उनसे 2014 के बाद तैयार हुआ माहौल करवा रहा है।

लेख में बताया गया है कि मुस्लिमों की ऐसी एंकरिंग देखते हुए हम उन्हें इन बिंदुओ पर आँक कर संतोष कर सकते हैं कि वे या तो इस माहौल में अपनी पहचान बनाने के लिए ऐसा कर रहे हैं, या सरकार के आगे-पीछे घूमने के लिए ऐसा कर रहे हैं, या फिर बहुसंख्यक आबादी को खुश करने के लिए ये सब कर रहे हैं।

लेख के जरिए बताया जाता है कि ऐसे मुस्लिम चेहरों का इस्तेमाल भाजपा हिंदू नैरेटिव गढ़ने के लिए करती हैं। जिसे प्रतीकवाद भी कहा जा सकता है। उनके मुताबिक, इन चेहरों से हिंदुत्व के एजेंडे को आगे बढ़ाने में विश्वसनीयता मिलती है और पाठक-दर्शक इस बात को स्वीकारते हैं कि मुस्लिम लोग भी जब इनके पक्ष में बोल रहे हैं, तो यही सच होगा…मगर, वास्तविकता कुछ और होती है।

द प्रिंट के इस लेख के मुताबिक, रुबिका लियाकत, सईद अंसारी जैसे मुस्लिम चेहरे, वे रंगमंच की जीती-जागती, विचारवान कठपुतलियाँ हैं, जिनकी डोर किसी और के हाथ में है और उनका किरदार भी किसी और ने और काफी हद तक जमाने ने लिखा है।

उल्लेखनीय है कि ये पहली बार नहीं है जब कुछ मुस्लिमों के अलग मतों को जानकर उनके मजहब पर, उनके काम पर निशाना साधा गया हो। इससे पहले कई बार राणा अय्यूब जैसे पत्रकारों व इस्लामोफोबिया का प्रमोशन करने वाला ये धड़ा मुख्तार अब्बास नकवी और मोहम्मद आरिफ खान जैसे लोगों पर भी भाजपा से जुड़े होने के कारण अपना गुस्सा निकाल चुके हैं।

जैसे द प्रिंट के इस लेख में एक जगह नकवी और शाहनवाज हुसैन का नाम लिया जाता है और उन्हें भी भाजपा की कठपुतली बताते हुए लिखा जाता है कि भाजपा इन जैसे नेताओं को भी अपने पास शोकेज में सजाकर रखती है, जिनकी नीति-निर्धारण में न्यूनतम भूमिका होती है।

बता दें, ये बातें सिर्फ़ यही नहीं थमती। आज भाजपा सरकार में नकवी, जो एक महत्वपूर्ण पद पर हैं, उनके लिए द प्रिंट इससे पहले छाप चुका है कि मुख्तार अब्बास वास्तविक में कपिल मिश्रा ही हैं, बस उनके मुख पर नाम अल्लाह का रहता है।

इसके अलावा आरिफ मोहम्मद खान को लेकर भी ये पोर्टल इस विषय पर अपना लेख प्रकाशित कर चुका है कि अगर भाजपा के लिए अच्छा मुस्लिम बनना है तो आरिफ मोहम्मद से सीखिए।

20 मार्च के बाद मरकज छोड़ना चाहते थे, मगर मौलाना साद ने रोके रखा: 166 जमातियों ने दिया बयान

कोरोना महामारी के बीच तबलीगी जमात का खुलासा होने के बाद से निजामुद्दीन मरकज के ख़िलाफ दिल्ली पुलिस सबूत इकट्ठा करने में जुटी है। ऐसे में दिल्ली की क्राइम ब्रांच की पड़ताल में एक नया खुलासा हुआ है।

दरअसल, मामले की जाँच में जुटी पुलिस ने 166 जमातियों का बयान दर्ज किया है। जो मार्च माह में मरकज में हुए कार्यक्रम में मौलाना साद और उसके बेटों के साथ वहाँ मौजूद थे।

एबीपी न्यूज के अनुसार, पूछताछ में इन जमातियों ने बताया कि कोरोना वायरस के बारे में मालूम पड़ते ही 20 मार्च के बाद वे मरकज़ से जाना चाहते थे, मगर मौलाना साद ने उन्हें रोके रखा।

खबर की मानें तो क्राइम ब्रांच की अब तक की जाँच में उनके पास काफी सबूत हैं, जिससे मालूम पड़ता है कि पुलिस के नोटिस दिए जाने के बाद मरकज में जमातियों को जानबूझकर रोका गया। मगर, जाँच को पक्का करने के लिए क्राइम ब्राँच ने इन 166 जमातियों के बयान को दर्ज किया। 

गौरतलब है कि इससे पहले मरकज मामले में कार्रवाई करते हुए दिल्ली पुलिस ने तबलीगी जमात के 700 विदेशी जमातियों के डॉक्यूमेंट सीज किए थे। ताकि ये लोग देश छोड़कर कहीं न भाग सकें और इनसे इस मामले में पूछताछ की जा सके कि आखिरकार इन्होंने किस आधार पर वीजा हासिल किया और किसने वीजा दिलाने में उनकी मदद किसने की थी।

जानकारी के मुताबिक, दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच इस समय हर एंगल की जाँच करके मौलाना साद पर शिकंजा कसने की तैयारी कर रही है और जमात से जुड़ी सभी जानकारी गृह मंत्रालय को भेजी जा चुकी है जिससे जमातियों पर आवश्यक कार्रवाई हो सके।

कुछ मीडिया रिपोर्ट्स का ये भी कहना है कि मौलाना साद जानबूझ कर अपना कोविड 19 टेस्ट सरकारी अस्पताल से नहीं करवाना चाहता, क्योंकि वो जानता है कि जैसे ही सरकारी अस्पताल से कराए हुए कोरोना टेस्ट की रिपोर्ट नेगेटिव आती है तो क्राइम ब्रांच उसको पूछताछ के लिए बुला सकती है।

याद दिला दें कि मरकज मामला खुलने के बाद मौलाना साद का एक ऑडियो वायरल हुआ था। उस ऑडियो में साद जमातियों को मरकज में रुकने का दबाव बना रहा था और कह रहा था कि मरने के लिए मस्जिद से बेहतर कोई जगह नहीं है। इस ऑडियो में उसे जमातियों को ये कहते स्पष्ट सुना गया था कि अल्लाह पर भरोसा करो,अल्लाह कोई मुसीबत इसलिए ही लाता है कि देख सके कि इसमें मेरा बंदा क्या करता है।