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दिल्ली: राशन न मिलने से भड़के लोग, स्कूल का गेट तोड़कर शिक्षकों से की बदसलूकी

पश्चिमी दिल्ली के प्रेम नगर में गुरुवार (मई 13, 2020) को एक नगरपालिका स्कूल में राशन वितरण सेवा बंद देखकर भारी तादाद में इकट्ठा हुई भीड़ ने जमकर हंगामा किया। खबर है कि यहाँ लगभग 500 की संख्या में जुटी भीड़ ने पहले स्कूल का गेट तोड़ा और फिर प्रशासन पर पथराव किया।

स्कूल के प्रिंसिपल भरत लाल मीणा के मुताबिक दिल्ली सरकार की ओर से एक नोटिस मिला था। इसमें कहा गया था कि स्कूल द्वारा अब तक बाँटे गए राशन की रिपोर्ट तैयार कर खाद्य आपूर्ति विभाग को देनी है, इसके कारण गुरुवार को राशन वितरण का काम नहीं होगा।

उनके मुताबिक, दिल्ली सरकार के आदेश के बाद स्कूल ने इस संबंध में 13 मई को स्कूल के बाहर एक नोटिस भी लगाया। बावजूद इसके 14 तारीख की सुबह भीड़ इकट्ठा हुई और हंगामा करना शुरू कर दिया।

प्राइमरी स्कूल के प्रिंसिपल बताते हैं कि लोगों को भड़का देखकर स्टाफ के अलावा सिविल डिफेंस के वॉलिंटियर्स और पैरामिलिट्री स्टाफ ने भी जनता को राशन न बाँटे जाने के पीछे का कारण बताया। लेकिन, भीड़ उनपर ही भड़क गई और गाली-गलौच करने लगी। लोगों ने राशन चोरी का इल्जाम भी लगाया।

प्रिंसिपल मीणा के अनुसार, “भीड़ ने शिक्षकों को घेराव भी किया। जब चीजें नियंत्रण से बाहर हो गईं और भीड़ ने पथराव शुरू कर दिया, तो हमें मदद के लिए पुलिस बुलानी पड़ी।” इसके बाद किसी तरह भीड़ को नियंत्रित कर स्कूल के मुख्य द्वार को बंद किया गया। लेकिन लोग इसके बाद भी गेट बजाते रहे और पथराव करते रहे।

गौरतलब है कि इस वाकये से पहले भी दिल्ली के कई इलाकों से इस तरह हिंसा के वाकये सामने आए हैं। बताया जा रहा है कि दक्षिण और पूर्वी नगर निगम के स्कूलों में भी शिक्षकों का घेराव कर उनके साथ बदसलूकी की गई।  इन्हीं घटनाओं पर संज्ञान लेते हुए नॉर्थ एमसीडी आयुक्त वर्षा जोशी ने कहा, “हमने इस विषय में खाद्य आपूर्ति विभाग को पत्र लिखा है। इस तरह की परेशानी राशन की लिस्ट न होने के कारण भी हो सकती है।”

इस बीच शिक्षकों ने भी महामारी के समय में अपनी सुरक्षा की गुहार लगाई है। उन्होंने कहा है, “हम विषम परिस्थितियों में ड्यूटी कर अपने जीवन को खतरे में डालने वाले स्कूल शिक्षकों की सुरक्षा के लिए तत्काल कार्रवाई चाहते हैं। हम कोरोना महामारी के दौरान काम करने के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन हम शिक्षक हैं और एक भीड़ से निपटने के लिए प्रशिक्षित नहीं हैं।”

बता दें, देश भर में लॉकडाउन के बीच अप्रैल से 1,000 से अधिक दिल्ली सरकार और निगम स्कूल हंगर रिलीफ सेंटर्स और राशन सेंटर के तौर पर सेवा उपलब्ध करा रहे हैं। दिल्ली के 40,000 से अधिक सरकारी शिक्षक राशन वितरण ड्यूटी पर लगे हुए हैं। हंगर सेंटर्स रोजाना सुबह 8 बजे खुलते हैं और शाम 6 बजे तक बंद हो जाते हैं। चावल और गेहूँ का आटा यहाँ एक मानक राशन किट के रूप में प्रदान किया जा रहा है।

अलीगढ़: पुलिस पर हमला कर गोतस्करों को छुड़ा ले गई भीड़, रुकसाना और शबाना गिरफ्तार

उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ में गोतस्करों को दबोचने वाली पुलिस टीम पर भीड़ ने हमला कर दिया। हमलावरों ने दारोगा की वर्दी फाड़ दी और आरोपितों को छुड़ा लिया। इस घटना के सिलसिले में दो महिलाएँ गिरफ्तार की गई हैं।

गुरुवार (14 मई, 2020) दोपहर गोतस्करों को गिरफ्तार करने पहुँची पुलिस टीम पर हमला किया गया। भीड़ पुलिस की पकड़ से आरोपितों को छुड़ा ले गई। इसके बाद भारी संख्या में पहुँची पुलिस फोर्स ने हालत को सँभाला और मौके से दो महिलाओं को गिरफ्तार किया।

अमर उजाला की खबर के मुताबिक अलीगढ़ शहर के सासनी गेट थाना क्षेत्र के कासिम नगर इलाके में दारोगा हरेन्द्र सिंह, सिपाही बृजमोहन और ईश्वर दयाल गोकशी के आरोप में वांछित चल रहे दो आरोपितों को गिरफ्तार करने के लिए पहुँची थी। कासिम बाबा मस्जिद के पास से दोनों आरोपितों को पुलिस ने दबोच लिया।

दैनिक जागरण के अलीगढ़ संस्करण में प्रकाशित संबंधित खबर

इसकी जानकारी जैसे ही आसपास के लोगों को हुई उन्होंने इसका विरोध करते हुए पुलिस के साथ कहासुनी शुरू कर दी। दारोगा ने लोगों को समझाने की कोशिश की, लेकिन कहासुनी के बीच ही कुछ महिलाओं ने पुलिस के साथ हाथापाई करते हुए उनकी वर्दी को फाड़ दिया और हँगामा शुरू कर दिया। इतना ही नहीं हमलावर भीड़ में शामिल महिलाओं ने एक कॉन्स्टेबल के हाथ को काट लिया और इसी का फायदा उठाकर आरोपित पुलिस की पकड़ से भाग निकले।

पुलिस पर हमले की जानकारी मिलते ही जिला प्रशासन में हड़कंप मच गया और कुछ ही देर में थाना प्रभारी जावेद खां बड़ी संख्या में पुलिस फोर्स के साथ मौके पर पहुँचे। लेकिन इससे पहले गोतस्करी के आरोपित मौके से फरार हो चुके थे।

आपको बता दें कि पिछले दिनों शहर के भुजपुरा इलाके में गोकशी की एक घटना हुई थी, जिसमें मुस्तकीम और रूसी पुत्र मुन्ना का नाम सामने आया था, तभी से अलीगढ़ पुलिस दोनों की गिरफ्तारी के लिए लगातार छापेमारी कर रही थी। थाना सासनी गेट इंस्पेक्टर जावेद खां के मुताबिक पुलिस पर हमला करने वालों में शामिल दो महिलाओं रुकसार और शबाना को गिरफ्तार कर लिया है।

आपको बता दें कि अलीगढ़ के भुजपुरा क्षेत्र में मौजूद सब्जी मंडी में पिछले महीने 22 अप्रैल को लॉकडाउन के दौरान समय अवधि पूरी होने पर पुलिस की एक छोटी टीम दुकानें बंद कराने पहुँची थी। इसी बीच अचानक से दुकानदारों ने भीड़ के साथ मिलकर पुलिस टीम पर ईंट-पत्थरों से हमला कर दिया। इसमें एक पुलिसकर्मी घायल हुआ था और लेपर्ड बाइक में तोड़फोड़ की गई थी।

लॉकडाउन के बाद स्कूलों में होंगे कई बदलाव: HRD मंत्री निशंक ने शिक्षकों के सवालों के दिए जवाब

केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक ने गुरुवार (14 मई 2020) को देश के अलग-अलग हिस्सों से स्कूल-कॉलेजों के शिक्षकों द्वारा पूछे गए सवालों के जवाब वेब कॉन्फ्रेसिंग के जरिए दिए।

उन्होंने मुख्य रूप से UGC NET परीक्षा तिथि और नवोदय विद्यालय की भर्ती प्रक्रिया को लेकर कंफ्यूज़न को दूर किया। साथ ही लॉकडाउन के बाद स्कूलों में कई बदलाव के संकेत दिए।

साथ ही निशंक ने लॉकडाउन खत्म होने के बाद स्कूलों में सोशल डिस्टेंसिंग को लेकर कई एहतियाती कदम उठाने की भी बात कही। उन्होंने क्लासेज़ में बच्चों के पढ़ने से लेकर उनके सारे काम के तरीके को भी बदलने का सुझाव दिया है। सोशल डिस्टेंसिंग को मद्देनजर रखते हुए विद्यार्थियों को छोटे-छोटे समूह में बाँट कर कई सेक्शन किए जाएँगे।

आचार्य देवो भव:’ का संदेश देते हुए रमेश पोखरियाल ने सभी शिक्षकों को इस महामारी के दौर में सरकार का साथ देते हुए छात्रों तक मिड-डे मील पहुँचाने, लोगों को खाने-पीने की चीजें पहुँचाने और अन्य तरीके से देश सेवा करने के लिए धन्यवाद दिया।

यूजीसी नेट

राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा (नेट – UGC NET) की परीक्षा तिथि को लेकर केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री रमेश पोखरियाल ने कहा कि इसकी घोषणा जल्द से जल्द कर दी जाएगी।

नवोदय विद्यालय भर्ती

अध्यापकों की नियुक्तियों पर जवाब देते हुए केंद्रीय मंत्री ने कहा कि सरकार के अनुसार किसी भी शैक्षणिक संस्थान में अध्यापकों के पद खाली नहीं रहने चाहिए। नवोदय विद्यालय की जो भर्ती प्रक्रिया लॉकडाउन से पहले पूरी हो चुकी थी, उसमें चुने गए अध्यापकों को लॉकडाउन ख़त्म होने के बाद नियुक्तियाँ मिल जाएँगी।

शिक्षकों का ऑनलाइन प्रशिक्षण

मंत्री ने कहा पंडित मदन मोहन मालवीय राष्ट्रीय मिशन ऑन टीचर्स एंड टीचिंग के तहत ई-लर्निंग संसाधन के उपयोग के लिए स्कूली शिक्षकों के प्रशिक्षण का आयोजन किया जा रहा है। अध्यापक भी इसमें बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रहे हैं।

उत्तर पुस्तिकाएँ जाँचने वाले अध्यापकों को छूट

जिन अध्यापकों के पास उत्तर पुस्तकाएँ मूल्यांकन के लिए जा रही हैं उनको ऑनलाइन शिक्षण और दैनिक रिपोर्ट नहीं भेजनी होगी। साथ ही इन्हें नए सत्र की तैयारी से जुड़े काम नहीं दिए जाएँगे।

इस दौरान दिल्ली के प्राथमिक विद्यालय की एक अध्यापिका की कोरोना वायरस से हुई मृत्यु पर शोक व्यक्त करते हुए निशंक ने कहा कि शिक्षक किसी भी तरह की परेशानी को लेकर उनसे जब भी चाहें, उनके ट्विटर और फेसबुक पर जुड़ सकते हैं।

दर्थवामा रेन्थलेई: मिजोरम के एक अज्ञात राष्ट्र नायक, जिन्होंने नेताजी के नेतृत्व में लड़ी थी आजादी की लड़ाई

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का स्वर्णिम गौरव पूर्ण अतीत सुविज्ञात ही है। यह उनके राष्ट्रभक्ति पूर्ण जोश एवं उत्साह का ही परिणाम है कि हम आजादी का आनंद ले रहे हैं और स्वतंत्रता के 7 दशकों बाद भी हम अपने राष्ट्र वीरों के बलिदान का गुणगान करते हैं।

दुर्भाग्य से ऐसे असंख्य स्वातंत्र्यवीर हैं जिन्हें स्वार्थवश इतिहासकारों ने भुला दिया है और आज की पीढ़ी उनके नाम तक नहीं जानती। मिजोरम के दर्थवामा रेन्थलेई (Darthawma Renthlei) भी एक ऐसे ही अज्ञात राष्ट्र नायक हैं जिन्होंने नेताजी सुभाष चंद्र बोस के नेतृत्व में गठित भारतीय राष्ट्रीय सेना (INA) के एक सेनानी के रूप में अंग्रेजों के विरुद्ध विदेशी धरती पर लड़ाई लड़ी थी।

हम राष्ट्र के प्रति उनके प्रयासों व बलिदानों को कभी नहीं भूल सकते। आज संपूर्ण राष्ट्र प्रेम पूर्वक उनका स्मरण करता है और इस वयोवृद्ध स्वतंत्रता सेनानी का 100वाँ जन्म दिवस मना रहा है। इनका देशभक्ति पूर्ण जोश एवं पराक्रम हम सब की प्रेरणा का प्रकाश स्तंभ है। इस अवसर पर हम उनके जीवन एवं राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम में उनके महान योगदान पर दृष्टि डालेंगे ।

श्री दर्थवामा का जन्म 15 मई 1921 को दक्षिण मिजोरम (लुंगलेई से 5 मील) में पुखपुई गाँव में हुआ था। वे अपने माता-पिता छिंग लिइया रेन्थलेई (पिता) और नुबुन्गी (माँ) की पाँच संतति में से दूसरी संतान थे। उन्होंने बैप्टिस्ट मिशन द्वारा संचालित सर्कोन मिडिल स्कूल में 7वीं कक्षा तक शिक्षा प्राप्त की। शिक्षा के प्रति उत्कंठ इच्छा शक्ति होते हुए भी अपने माता पिता की अत्यधिक कमजोर आर्थिक स्थिति तथा मिजोरम में उच्च विद्यालय न होने के कारण वे अपनी शिक्षा जारी नहीं रख सके।

सामाजिक रूप से सक्रिय, ऊर्जावान, शस्त्र कला में सहज निपुण तथा कुछ बड़ा करने को जुझारू किशोर दर्थवामा द्वितीय विश्वयुद्ध के समय 20 वर्ष के थे। उन दिनों पश्चिमी यूरोप में चलने वाला विश्व युद्ध ही मुख्य चर्चा का विषय होता था।

हर शाम युद्ध की वर्तमान स्थिति का प्रसारण होता था। श्री दर्थवामा और उनके मित्र युद्ध की नवीनतम सूचनाओं का व्यग्रता से प्रतीक्षा करते थे और सूचना प्राप्त होने पर सूक्ष्मता से अवलोकन कर आपस में चर्चा करते थे।

भारत ने ब्रिटिश उपनिवेश होने के कारण अंग्रेजों का समर्थन किया। यहाँ तक कि मिजोरम के प्रत्येक चर्च में जन प्रार्थना सभाओं में ब्रिटिश की द्वितीय विश्व युद्ध में जीत की प्रार्थना की जाती थी। अत: एक प्रकार से मिजोरम में ईसाई मिशनरी के प्रभाव से युवा इस युद्ध में ब्रिटिश की जीत के लिए सेना में जाना चाहता था।

दर्थवामा ने भी निश्चय किया कि यदि शिक्षा ग्रहण करने का अवसर नहीं मिला तो मिज़ो यूथ (Mizo Youth) द्वारा द्वितीय विश्वयुद्ध में ब्रिटिश सेना में भर्ती के लिए बुलाए जाने पर, सेना में भर्ती हो जाएँगे।

1940 में लुंगलेई में जैसे ही ब्रिटिश सेना में नवीन भर्ती की खबर फैली, दर्थवामा ने सेना में भर्ती होने की तीव्र इच्छा जताई। एक भर्ती अधिकारी लुंगलेई पहुँचा और उसने 8 अन्य युवाओं के साथ दर्थवामा का नाम भी सूची में लिख लिया ।

इन सब युवाओं को सेना के चिकित्सीय पुलिस में उपचार सिपाही के रूप में भर्ती किया गया तथा आइजोल में शारीरिक परीक्षण एवं चिकित्सीय जाँच के उपरान्त अग्रिम प्रशिक्षण हेतु लखनऊ भेजा गया।

लखनऊ में पुन: परीक्षण के उपरान्त 27 नवम्बर, 1940 को आधिकारिक रूप से भारतीय- ब्रिटिश सेना में शामिल कर लिया गया। यहाँ इनका सैनिक तथा चिकित्सीय सहायक के रूप में प्रशिक्षण पूर्ण हुआ ।

प्रशिक्षण के उपरान्त अगस्त, 1941 को मलेशिया के पेनांग भेजा गया। उसी समय जापान ने ब्रिटिश सेना पर हवाई आक्रमण से गोलाबारी शुरू कर दी। अंग्रेजों ने अधिकांश लड़ाकू विमान को यूरोपीय मोर्चे पर लगा रखा था अत: पेनांग में ब्रिटिश सेना के पास जापान से हवाई-युद्ध के लिए अपेक्षाकृत कम संसाधन थे। ब्रिटिश सेना को यहाँ से पीछे हटना पड़ा और पेनांग कुआलालम्पुर से पूरे रास्ते लड़ते हुए सिंगापुर में प्रवेश किया।

जापानी सेना ने सिंगापुर के ब्रिटिश मुख्य कार्यालय को भी ध्वस्त कर दिया। अंततः इस भीषण युद्ध के एक सप्ताह बाद, ब्रिटेन ने 15 फरवरी, 1942 को सिंगापुर जापान को सौंप दिया और यहाँ युद्ध कर रही भारतीय-ब्रिटिश सेना को भी आत्मसमर्पण करना पड़ा। परिणामत: लगभग 45000 भारतीय सैनिक जापानी सेना द्वारा सिंगापुर में युद्ध-बंदी बना लिए गए ।

इसी समय नेताजी सुभाष चन्द्र जी ने जापानी सरकार के साथ समझौते पर हस्ताक्षर किए, जिसमें जापान ने नेता जी का साथ देना का आश्वासन दिया तथा सिंगापुर में सभी भारतीय युद्ध-बंदियों को स्वतन्त्र करा लिया। तत्पश्चात सभी भारतीय सैनिकों से कैम्प में नेता जी ने भेंट की और राष्ट्र के लिए आह्वान किया।

नेता जी के इस संबोधन से प्रेरित होकर दर्थवामा अंग्रेजों से भारत की स्वतंत्रता हेतु दृढ़ संकल्पित होकर जून 1942 में आजाद हिन्द फ़ौज (INA) में सहर्ष शामिल हुए। उन्होंने फिर से यहाँ विभिन्न हथियारों का उपयोग करना सीखा और लक्ष्य शूटिंग का अभ्यास किया।

यहीं से दर्थवामा की भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के लिए यात्रा प्रारम्भ होती है। वे 3 साल तक सिंगापुर में रहे। इस बीच, श्री दर्थवामा ने कौलामपुर प्रशिक्षण केंद्र में भी भर्ती के लिए प्रशिक्षण दिया था। उन्होंने अंग्रेजी कमांडिंग ऑर्डर को त्याग दिया और हिंदी कमांडिंग शब्दों को अपनाया ।

जापानी सेना के साथ INA एक छत्र के रूप में अंग्रेजों के विरुद्ध बर्मा (वर्तमान म्यामांर) में युद्ध हेतु पूर्ण तैयारी तथा जोश के साथ वेग से आगे बढ़ रही थी तथा कुछ ही दिनों में बर्मा को अपने अधीन कर लिया। सेना ने U-GO ऑपरेशन शुरू किया तथा आगे बढ़ते हुए इम्फाल, कोहिमा पहुँची। यहाँ अंग्रजो से सामना हुआ।

यूरोपीय पक्ष में युद्ध थोड़ा थम गया था अत: बहुत सारे युद्ध विमानों को अंग्रेजी सेना ने INA से युद्ध में लगा दिए। दुर्भाग्यवश INA को पीछे हटना पड़ा और बर्मा में इरावदी नदी के यान-आंग-यांग किनारे पर रात्री 12 बजे भीषण युद्ध हुआ।

इसी जगह युद्ध में दर्थवामा को कोहनी पर गोली लगी। उन्हें प्राथमिक चिकित्सा इकाई में ले जाया गया और फिर वह पूरी रात फिर से लड़ने के लिए युद्ध के मोर्चे पर वापस आ गए। परन्तु यहाँ हुए भीषण युद्ध-विध्वंस तथा जापान में परमाणु बम के आक्रमण के कारण सेना के पास आत्मसमर्पण करने के अलावा कोई चारा नहीं था। INA के सभी सैनिकों के साथ दर्थवामा को भी बंदी बना लिया गया।

2 मास के उपरान्त ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध युद्ध करने के अभियोग में कोलकाता में उन पर मुकद्दमा चलाया गया। अनेक मुकद्दमों तथा दोषारोपण से पीड़ित होने पर भी दर्थवामा ने अपने देश के सम्मान की रक्षा करते हुए एक वर्ष वहीं जेल में बिताया। इसके बाद उन्हें लखनऊ में स्थानांतरित कर दिया गया और वहाँ हवालात में कठोर निरीक्षण में रखा गया। ब्रिटिश सरकार ने उनके सम्पूर्ण जीवन तथा उनकी प्रत्येक गतिविधियों का विवरण एकत्रित किया और उनको दोषी सिद्ध कर दिया। इस दोषारोपण के परिणामस्वरूप उनके जेल में मिलने वाले भत्ते इत्यादि सब रोक दिए गए।

भारतीय प्रशासकों ने विविध प्रयासों से यह सिद्ध किया कि दर्थवामा कोई साजिशकर्ता नहीं हैं, बल्कि वे भारत की स्वतंत्रता के लिए लड़ रहे थे। वे हिंसा से लड़े और उन्होंने हथियारों से लड़ाई लड़ी अत: वे राजनीतिक कैदी हैं। अंततः उनको सशर्त जनवरी, 1946 में एक मुक्ति पत्र के साथ रिहा कर दिया गया। अब उनका ब्रिटिश शासनाधीन भारत में सरकार के अधीनस्थ कोई भी प्रशिक्षण, रोजगार तथा सेवा करना प्रतिबंधित हो गया था तथा वे गैर-सरकारी गतिविधियाँ करने पर भी अधिकारियों की सतत निगरानी में थे।

अंततः जब देश स्वतंत्रता हुआ तब भी नरम-दल ने देश के प्रति उनकी सेवाओं को स्वीकार नहीं किया। जब श्रीमती इंदिरा गाँधी प्रधानमंत्री बनीं, तो उनके सामने ये प्रस्ताव रखा गया। श्री दर्थवामा को तब दिल्ली में गृह विभाग में अपने स्वतंत्रता संग्राम का विवरण प्रस्तुत करने के लिए बुलाया गया था।

उनके बयानों को भी डी. सी. बैजल ने प्रमाणित किया। दिल्ली के गृह विभाग ने उनके बयानों का लखनऊ में बनाए गए दस्तावेजों से जाँच की और यह साबित किया कि उनके सभी कथन सही हैं। तत्कालीन भारत सरकार ने तब उन्हें “भारत के स्वतंत्रता संग्राम” सेनानी के रूप में स्वीकार किया। इस प्रकार अनेक प्रयत्नों के उपरान्त उनको वह पहचान मिली, जिसके वे सच्चे अधिकारी थे।

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में अपना अद्भुत योगदान देने के लिए 15 अगस्त, 1972 को ‘ताम्रपत्र’ राष्ट्रीय पुरुस्कार से उनको सम्मानित किया गया तथा मिजोरम सरकार ने योद्धा-शॉल (TAWLPOH PUAN) प्रदान किया गया। गतवर्ष ही 21 जुलाई को, 99 वर्ष की उत्तम आयु में मिजोरम के लुंगलेई में पंचतत्व में विलीन हो गए। उनकी वीरता, पराक्रम एवं राष्ट्रीय स्वतंत्रता के प्रति अप्रतीम योगदान भारत को मजबूत एवं अखंड राष्ट्र हेतु सदैव प्रत्येक भारतीय के लिए प्रेरणादायक रहेगा। ऐसे राष्ट्र-प्रेमी के प्रति राष्ट्र कृतज्ञ है और उनको नमन करता है।

ट्विटर गली में शोर है, मुनव्वर राना? जी हाँ, ‘मेरे हिस्से माँ आई’ शेर का सच ये है

मुनव्वर राना द्वारा ‘माँ’ शीर्षक पर कथित तौर पर लिखी गई कविता को आज तक हर कोई यही कहते आया है कि ‘माँ’ पर अगर किसी को कुछ बेहतरीन पढ़ना हो, तो उसे मुनव्वर राना की ये पंक्तियाँ पढ़नी चाहिए।

लेकिन मुनव्वर राना (Munawwar Rana) ने जिन पंक्तियों पर जिंदगीभर वाह-वाही लूटी, वास्तव में वो मशहूर लेखक आलोक श्रीवास्तव द्वारा लिखी गई ‘अम्मा’ कविता से चुराई गईं हैं।

यह पंक्ति आज ट्विटर पर चर्चा का विषय है। दूरदर्शन न्यूज़ के वरिष्ठ पत्रकार अशोक श्रीवास्तव ने एक ट्वीट करते हुए लिखा –

“मुन्नवर राना पर आरोप हैं कि उनकी मशहूर नज़्म ‘मेरे हिस्से में माँ आई’ दअरसल हिंदी कवि आलोक श्रीवास्तव की कविता ‘मेरे हिस्से अम्मा आई’ को चुरा कर लिखी गई। (आलोक जी का पुराना पत्र पढ़िए)”

अशोक श्रीवास्तव ने मुनव्वर राना के एकाउंट को टैग करते हुए लिखा – “@मुनव्वर राना, जी आरोप गंभीर है। जवाब दें अन्यथा कोई अवार्ड बचा हो तो लौटा दें।”

इस ट्वीट के साथ संलग्न पत्र में 2003 की तारीख है और यह आलोक श्रीवास्तव द्वारा लिखा गया है।

आलोक श्रीवास्तव द्वरा लिखा गया पत्र, जो ट्विटर पर शेयर किया जा रहा है

पत्र में लिखा गया है कि मुनव्वर राना ने अपने मुशायरे में उनकी लिखी पंक्तियों को लोगों के टोकने के बाद भी कई बार इस्तेमाल किया है। आलोक श्रीवास्तव ने इस पत्र में लिखा है कि लगभग तीन दशक से उनका ये शेर प्रकाशित होता आया है और मुनव्वर राना को अपनी याददाश्त का इस्तेमाल पाकीज़गी से करना चाहिए।

ज्ञात हो कि आलोक श्रीवास्तव का नाम देश के मशहूर ख्याति प्राप्त शायरों में शामिल है। जगजीत सिंह, अमिताभ बच्चन, मालिनी अवस्थी समेत कई गायक आलोक श्रीवास्तव के लिखे गीतों और गजलों को सुर दे चुके हैं।

इसके साथ ही बॉलीवुड की कई फिल्मों के लिए आलोक ने गीत लिखे हैं। दर्जनों से भी ज्यादा देशों में कवि सम्मेलन और मुशायरे में भी आलोक श्रीवास्तव शिरकत कर चुके हैं और देश विदेश में कई सम्मान भी मिल चुके हैं।

एक और ट्वीट में अशोक श्रीवास्तव ने लिखा कि अभी इस पत्र की पुष्टि नहीं हुई है लेकिन सोशल मीडिया पर यह पत्र वायरल हुआ है जिस पर 2003 की तारीख है।

उन्होंने लिखा – “सच या तो मुन्नवर राना बता सकते हैं या विदिशा के कवि आलोक श्रीवास्तव। यदि कोई इनका संपर्क दे सके तो आभारी रहूँगा। इस पत्र का सच जानना ज़रूरी है।”

लेकिन इसके जवाब में मुनव्वर राना की ओर से कोई भी प्रतिक्रिया न आने पर अशोक श्रीवास्तव ने एक और ट्वीट करते हुए लिखा –

“पुष्टि के बाद पुनः यह पत्र ट्वीट कर रहा हूँ। जिस नज़्म ‘मेरे हिस्से में माँ आई’ की कमाई मुनव्वर राना, ज़िंदगी भर खाते रहे वो आलोक श्रीवास्तव, जी की कविता की कॉपी है। मुनव्वर राना ने खत का आज तक जवाब नहीं दिया, बेशर्मी से चुराई नज़्म पर पुरस्कार और तालियाँ बटोरते रहे।”

आलोक श्रीवास्तव की कविता ‘अम्मा’ –

मुनव्वर राना पर यह आरोप पहले भी कई बार लगाया गया है लेकिन इस पर कभी इतनी खलकर बहस नहीं हुई, जिसका फायदा उठाते हुए मुनव्वर राना ने भी कभी इस पर स्पष्टीकरण देना उचित नहीं समझा।

आलोक श्रीवास्तव की लिखी की कविता ‘अम्मा’ की पंक्तियाँ इस तरह हैं –

“बाबूजी गुजरे..आपस में सब चीजें तकसीम हुईं।
मैं घर में सबसे छोटा था, मेरे हिस्से आई अम्मा।”

आलोक की ये कविता कई पत्रिकाओं में छपी थी। कई बार उन्होंने जिक्र भी किया कि मुनव्वर राना ने उनकी लाइनें चुराई ही नहीं थीं, बाकायदा उसकी लाइनों पर डकैती डाली थी।

मुनव्वर राना ने जिस शेर को हमेशा अपना बताया है वो इस तरह से है –

“किसी को घर मिला हिस्से में या कोई दुकाँ आई।
मैं घर में सब से छोटा था मिरे हिस्से में माँ आई।”

फिर से विवादों में हैं मुनव्वर राना

मुनव्वर राना आजकल एक बार फिर विवादों के कारण चर्चा में आए हैं। दरअसल, उन्होंने एक विवादित ट्वीट में कहा है कि भारत में 35 करोड़ इंसान और 100 करोड़ जानवर रहते हैं। इसके साथ ही मुनव्वर राना ने लिखा है कि ये 100 करोड़ चुनावों में वोट देने के ही काम आता है।

अब देखना यह है कि आलोक श्रीवास्तव के लिखे इस पत्र के वायरल होने पर मुनव्वर राना ईमानदारी का परिचय देकर इसे स्वीकार करते हैं या फिर प्रमाण सहित इन दावों का खंडन करते हैं।

कोरोना संकट के कारण जो लौटे हैं उनका पलायन रोकने में हम सक्षम हैं: बिहार के कृषि मंत्री प्रेम कुमार

इसी साल बिहार में विधानसभा चुनाव होने हैं। राज्य की राजनीतिक परिस्थितियों, कोरोना संक्रमण के कारण बदली परिस्थितियों और कृषि क्षेत्र के हालात पर बिहार के कृषि, पशुपालन एवं मत्स्य संसाधन मंत्री डॉ. प्रेम कुमार से अजीत कुमार झा ने लंबी बात की।

नीतीश कुमार की सरकार में भाजपा के कोटे से मंत्री प्रेम कुमार के इंटरव्यू का संपादित अंश;

लॉकडाउन में जिस तरह घर लौटने के लिए प्रवासी श्रमिकों को मुसीबतें उठानी पड़ी है, उसने पलायन की मजबूरी को फिर से चर्चा के केंद्र में ला दिया। इसकी एक बड़ी वजह खेती-किसानी और उससे जुड़े स्थानीय उद्योगों का चौपट होना है। इस सूरतेहाल में बदलाव के लिए क्या प्रयास एनडीए सरकार ने किए हैं?

बिहार की जमीन उर्वरा है। जलवायु कृषि के अनुकूल है। इस क्षेत्र में असीम संभावनाएँ है। 2005 में राज्य में पहली बार एनडीए की सरकार बनी थी। 2008 में हमने कृषि क्षेत्र में विकास का रोडमैप तैयार किया था। उसके बाद से उत्पादकता लगातार बढ़ी है। आज खेती घाटे का सौदा नहीं रहा। बड़े पैमाने पर केला, मशरूम, मखाना, आम और लीची का उत्पादन हो रहा है। राज्य को पॉंच बार कृषि कर्मण पुरस्कार मिला है। एक तो इसी साल जनवरी में मिला।

पैदावार की लागत कम करने के लिए कई कदम उठाए गए हैं। साथ ही किसानों को बाजार उपलब्ध कराने पर फोकस है। राज्य में 52 बाजार प्रांगण हैं। इनका इस साल रेनोवेशन पूरा हो जाएगा। इससे बड़े पैमाने पर रोजगार पैदा होगा। मसलन, पटना में 50 एकड़ में बाजार प्रांगण है। वहॉं 5000 दुकानें बनेंगी। इसका मतलब है उससे 25,000 लोगों को सीधा फायदा होगा। किसान हमारी प्राथमिकता में हैं। हमारा लक्ष्य उत्पादन में लागत कम कर उन्हें पैदावार की सही कीमत दिलाना है।

बावजूद पलायन पर इन सालों में कोई असर नहीं दिखता?

जवाब: देखिए समय बड़ा बलवान होता है। देश के दूसरे हिस्से में काम करने गए करीब 40 लाख लोग अब अपनी माटी को चूम रहे हैं। कह रहे हैं यहीं काम करेंगे और बिहार को बढ़ाएँगे। अभी गाँवों में मनरेगा, जल जीवन हरियाली के तहत मजदूरों को काम दिया जा रहा है। सड़कों निर्माण में बड़े पैमाने पर रोजगार के अवसर मिल रहे हैं। रबी की अभी कटाई हुई है। उपज का अच्छा पैसा मिल रहा है। आगे खरीफ की हमारी तैयारी है। करीब 31 लाख हेक्टेयर में धान, 4 लाख हेक्टेयर में मक्का, 1 लाख हेक्टेयर में दलहन और 50 हजार हेक्टेयर में तेलहन की खेती करने जा रहे हैं। इन सबका असर जल्द दिखने लगेगा। कृषि की बदौलत बिहार खुद को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में बढ़ रहा है। कोरोना संकट के कारण जो लौटे हैं, उनको दोबारा पलायन करने से रोकने में हमारा कृषि सेक्टर सक्षम है।

प्रधानमंत्री ने बीते दिनों देश को संबोधित करते हुए ‘लोकल के लिए वोकल’ बनने की बात कही थी। इसके लिए स्थानीय स्तर पर रोजगार भी पैदा करने होंगे। क्या बिहार का कृषि सेक्टर रोजगार पैदा करने में सक्षम है? अभी जो श्रमिक लौटकर आए हैं उन्हें यह सेक्टर दोबारा पलायन से रोक पाएगा?

लोकल के लिए वोकल होने का मतलब ही है स्थानीय को प्राथमिकता। प्रकृति ने बिहार को जो अकूत वरदान दिया है उसका फायदा उठाने का वक्त आ गया है। खेती के अलावा दूध के कारोबार से 12 लाख गोपालक जुड़े हुए हैं। राज्य में 22, 775 सहकारी समितियॉं काम कर रही है। दूध हम नेपाल, बंगाल, यूपी, झारखंड भेजते हैं। इसी तरह नॉर्थ-ईस्ट में मिठाई भेजते हैं। 30 हजार तलाब है और मछली उत्पादन पर जोर दे रहे हैं। मधुमक्खी पालन में बिहार का देश में पहला स्थान है। सब्जी के मामले में हम तीसरे पायदान पर हैं। इन सबकी बदौलत किसानों और कामगारों के सहयोग से हम कोरोना महामारी के चुनौती को अवसर में बदलने के लिए तैयार हैं।

सब्जी उत्पादन को प्रोत्साहित करने के लिए राज्य सरकार द्वारा आयोजित तरकारी महोत्सव में किसानों को संबोधित करते मंत्री डॉ. प्रेम कुमार

बेमौसम बरसात से राज्य के किसानों को काफी नुकसान हुआ है। इसकी भरपाई के लिए सरकार क्या कर रही है?

बेमौसम बारिश और ओला वृष्टि के कारण फरवरी में 11 जिले के 44 प्रखंड, मार्च में 23 जिले के 198 प्रखंड और अप्रैल में 19 जिले के 146 प्रखंडों में किसानों को नुकसान हुआ है। इसकी भरपाई के लिए 7 अरब 16 करोड़ रुपया मँजूर किया गया है। अब तक करीब साढ़े सात लाख किसानों के खाते में पैसा ट्रांसफर किया जा चुका है। आगे भी जॉंच की जा रही है और पैसा भेजा जाएगा। किसानों को हुए नुकसान के पाई-पाई की भरपाई सरकार करेगी।

बाढ़, सुखाड़ बिहार के किसानों के लिए सालाना समस्या है। मुआवजे के इतर इनके स्थायी समाधान का सरकार प्रयास क्यों नहीं कर रही?

ये आज की समस्या नहीं है। सदियों से चली आ रही है। यदि नेपाल में हाई डैम बन जाए तो उत्तर बिहार के किसानों को बाढ़ के संकट से मुक्ति मिल जाएगी। दक्षिण बिहार में ‘जल जीवन हरियाली योजना’ के तहत वर्ष जल का हम संचय करेंगे। गॉंव-गॉंव में तालाब पर अतिक्रमण कर लिया गया था। उसे जिंदा करने का प्रोजेक्ट जल जीवन हरियाली योजना के तहत शुरू किया गया है। 2400 करोड़ रुपए से तीन साल में राज्य के सभी गॉंवों, खेतों, घरों और सरकारी भवनों में वर्षा जल संचय की योजना पर काम हो रहा है। आने वाले कुछ समय में इसकी मदद से बाढ़ और सुखाड़ के संकट का निश्चित तौर पर रास्ता निकलेगा।

रोहतास जाने के क्रम में सरसों के खेतों का मुआयना करते हुए बिहार के कृषि मंत्री डॉ. प्रेम कुमार

बिहार में ज्यादातर छोटे जोतदार हैं। वे विज्ञान, तकनीक से जुड़े और उनको फायदा हो इसके लिए क्या किए जा रहे हैं?

राज्य में 95 फीसदी छोटे जोतदार हैं, इसलिए सामूहिक खेती पर हम जोर दे रहे हैं। इसके लिए हम समूह बना रहे हैं। करीब 19 हजार कृषक समूह बन गए हैं। सहायक तकनीकी प्रबंधक, प्रखंड तकनीकी प्रबंधक की बहाली की गई है, जो गॉंवों में खेतों में जाकर किसानों को विकसित तकनीक मुहैया कराएँगे। उनको ऑनलाइन ट्रेनिंग दी जा रही है।

मछली, मखाना, पान जैसे सेक्टर में बड़े पैमाने पर रोजगार पैदा करने की क्षमता है। लेकिन लगता नहीं कि सरकार का इस ओर ध्यान है?

इसी को ध्यान में रखकर 23 जिले के लिए 14 फसलों का चयन कर विशेष योजना शुरू की गई है। इससे 10 लाख किसानों को जोड़ने की योजना है। इनकी खेती के लिए उन्हें प्रेरित किया जा रहा है। बिहार में जो मछली का उत्पादन हो रहा वह बिल्कुल जैविक है। इस समय 6 लाख 42 हजार मीट्रिक टन उत्पादन हम कर रहे हैं। देश में मछली उत्पादन में छठे स्थान पर आ गए हैं। समय बदल रहा। मछली की सप्लाई बाहर शुरू हो गई है। जल्द ही बिहार की मछली वर्ल्ड फेमस होगी।

कृषि और बागवानी को बढ़ावा देने के लिए राज्य सरकार द्वारा आयोजित महोत्सव में मंत्री डॉ. प्रेम कुमार

आप गया टाउन से सातवीं बार विधायक चुने गए है। गया कई देशों के लिए आस्था का केंद्र है। एनडीए की पहली सरकार से ही बोधगया को लेकर जो गंभीरता घोषणाओं में दिखती है, वह जमीन पर नजर नहीं आता?

ऐसा नहीं है। वाजपेयी सरकार के समय गया को वर्ल्ड हेरिटेज में शामिल किया गया। कॉन्ग्रेस के जमाने में बंद हो गए एयरपोर्ट को दुबारा चालू किया गया। राज्य सरकार करीब 150 करोड़ रुपए की लागत से कन्वेंशन सेंटर बना रही है। 24 घंटे बिजली मिलती है। फोर लेन सड़क का निर्माण हो रहा। पर्यटकों को हर तरह की सुविधा सरकार मुहैया करा रही है। नए रिसॉर्ट, होटल सब लगातार खुल रहे हैं। एनडीए की सरकार बनने के बाद से काफी इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट हुआ है।

बीते एक साल पर नजर डालें तो बिहार आपदाओं से ही जूझ रहा है। चमकी बुखार, बाढ़, पटना में जलजमावऔर अब कोरोना। इन सबसे नीतीश कुमार ने सुशासन बाबू की जो छवि गढ़ी थी वो दरकती दिख रही है। आपको लगता है कि उनका चेहरा अब बीजेपी के लिए बोझ बन गया है।

हम मिलकर अच्छा काम कर रहे हैं। हो सकता है कुछ लोग नाराज हों। लंबे समय तक पद पर बने रहने से यह स्वभाविक भी है। मैं भी 35 साल से विधायक हूँ। लगातार चुने जाने का कारण अच्छा काम रहा है। लेकिन फिर भी कुछ लोगों को लगता होगा कि बहुत हो गया। 40 साल कॉन्ग्रेस, 15 साल लालू और एनडीए कार्यकाल की तुलना कर देख लीजिए सच्चाई सामने आ जाएगी। पता चल जाएगा बिहार कहाँ था और आज कहाँ खड़ा है।

यही आपके ​आलोचक भी पूछते हैं कि जंगलराज का भय दिखाकर कब तक वोट माँगते रहेंगे?

हमारा एजेंडा विकास है। हम उस पर ही वोट माँगते हैं। आगे भी उस पर ही माँगेंगे।

मौजूदा परिस्थिति में बीजेपी के लिए बिहार में अकेले चुनाव लड़ना ही ज्यादा फायदेमंद रहेगा?

यह फैसला लेना राष्ट्रीय नेतृत्व का काम है। वह देखता है कि चुनाव कैसे लड़ा जाए। अकेले लड़ा जाए या मिलकर। यह सब उस समय की परिस्थितियों पर निर्भर करता है। वैसे बिहार में हम साथ मिलकर अच्छा काम कर रहे हैं। आगे जो फैसला लेना होगा केंद्रीय नेतृत्व करेगा। वे जो भी फैसला करेंगे देशहित, राज्य हित में ही करेंगे।

संत शोभन सरकार के अंतिम दर्शनों के लिए लॉकडाउन का उल्लंघन कर जुटे हजारों, 4000 अनुयाइयों के खिलाफ मुकदमा दर्ज

उत्तर प्रदेश में कानपुर देहात के शोभन आश्रम के महंत विरक्तानंद महाराज उर्फ शोभन सरकार के ब्रह्मलीन शरीर के दर्शन के लिए उमड़ी भीड़ पर पुलिस ने महामारी अधिनियम के तहत लगभग 4000 अनुयायियों खिलाफ तीन मुकदमे दर्ज किए हैं।

बता दें संत शोभन सरकार का बुधवार (13.5.20) को निधन हो गया था। जिस पर दुख व्यक्त करते हुए अंतिम विदाई और श्रद्धांजलि देने के लिए गुरुवार को लोगों का हुजूम चौबेपुर स्थित उनके सुनौहरा आश्रम में एकत्र हुआ। उस वक्त लोगों ने कोरोना महामारी को अनदेखा कर सोशल डिस्टेंसिंग के नियमों को भी दरकिनार कर दिया।

जहाँ एक तरफ शोभन सरकार के निधन पर समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने शोक व्यक्त किया था। वहीं कई अधिकारी, सांसद, मंत्री, विधायक और यहाँ तक कि आसपास के जनपदों में जो सरकारी कर्मचारी उनके अनुयायी थे, वे भी अपने काम को छोड़कर उनकी अंतिम यात्रा में शामिल हुए। जिसके बाद सोशल डिस्टेंसिंग की धज्जियाँ उड़ाते हुए उनकी वीडियो भी सोशल मीडिया पर खूब वायरल हुई।

जिस पर देवेंद्र मिश्र, सीओ बिल्हौर ने कहा, “नियम सभी के लिए बराबर हैं, बुधवार को लोगों ने लॉकडाउन का मजाक बना दिया था। हजारों लोगों पर महामारी का अंदेशा बढ़ गया है।”

घटना की जानकारी देते हुए चौबेपुर के थाना अध्यक्ष विनय तिवारी ने कहा, “हमने भीड़ को आश्रम की तरफ बढ़ने से रोकने की कोशिश की लेकिन हमारे तमाम प्रयास विफल साबित हुए।” इस घटना का वीडियो विभिन्न सोशल मीडिया पर वायरल हुआ है। तिवारी ने बताया कि लॉकडाउन के कारण किसी भी अंत्येष्टि कार्यक्रम में 20 से ज्यादा लोगों का इकट्ठा होना मना है, मगर आश्रम में हजारों की भीड़ पहुँच गई। इस मामले में करीब 4000 लोगों के खिलाफ तीन मामले दर्ज किए गए हैं।

लगभग 4000 लोगों के खिलाफ दर्ज मुकदमे में पहला 2000 लोगों के खिलाफ सुनोड़ा घाट पर थाना प्रभारी विनय तिवारी द्वारा दर्ज किया गया। तो वहीं 1200 सौ लोगों के खिलाफ बंदी माता पर उपनरीक्षक अंजलि तिवारी ने दूसरा मुकदमा दर्ज किया। तीसरा मुकदमा उप निरीक्षक देवेंद्र कुमार ने बेला रोड क्रॉसिंग पर जुटे 900 अज्ञात लोगों के खिलाफ लिखवाया है।

गौरतलब है कि शोभन सरकार 2013 में उस वक्त सुर्खियों में आए थे, जब उनके एक सपने के आधार पर उन्नाव के डौंडिया खेड़ा में आर्किलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (ASI) की टीम खजाने की खोज में जुट गई थी।

शोभन सरकार ने दावा किया था कि उन्हें सपने में राजा राम बख्श सिंह के किले में शिव चबूतरे के पास 1000 टन सोने के दबे होने का पता चला है। इसके बाद ही साधु शोभन सरकार ने सरकार से सोना निकलवाने की बात कही थी।

चूँकि हलाल कानूनी है, इसलिए दूसरे धर्मों द्वारा ‘हम समुदाय विशेष को काम नहीं देते’ लिखना भी जायज है

हाल ही में हलाल प्रमाणन के मामले पर बहुत कुछ कहा गया है। एक कथित विज्ञापन को लेकर हुए बवाल के बाद जिसमें ये क्लेम था कि जैन बेकरी में किसी भी मजहब विशेष के व्यक्ति को काम पर नहीं रखा गया है। जिसके बाद चेन्नई में जैन बेकरी के मालिक की गिरफ्तारी भी हुई। इस गिरफ्तारी के बाद पता चला कि वो विज्ञापन ही फोटोशॉप करके दुर्भावना के कारण वायरल किया गया था। गूगल पर सर्च करने पर दुकान बंद करने की भी नौबत आ गई। इसी की प्रतिक्रिया परिणाम स्वरूप सोशल मीडिया पर हलाल उत्पादों का बहिष्कार करने की माँग बढ़ गई है।

इस्लामिक मीडिया पोर्टल मिल्ली गज़ेट ने दावा किया कि इस तरह की माँगें ‘इस्लामोफोबिया’ और ‘कट्टरपन’ को दर्शाती हैं, हालाँकि इस की निंदा का कोई असर इस बहिष्कार की माँग पर पड़ता नहीं दिखाई दे रहा है।

ऐसे कई मुद्दे हैं जिन पर ध्यान देने की आवश्यकता है। क्या हलाल उत्पादों के बहिष्कार का आह्वान करना कट्टरता है? क्या इस तरह की माँगें इस्लामोफोबिया हैं? क्या चेन्नई पुलिस द्वारा जैन बेकरी के मालिक को गिरफ्तार करना ठीक था? क्या इस तरह कथित विज्ञापन निकालना अवैध या असंवैधानिक है? क्या हलाल प्रमाणीकरण का बहिष्कार करना अनैतिक है? ये ऐसे प्रश्न हैं जिन पर बात होनी चाहिए।

जैसा कि हम पहले भी कई बार बता चुके हैं कि हलाल प्रमाणन एक तरह का भेदभाव है। यह मांस उद्योग पर समुदाय विशेष के लिए एकाधिकार स्थापित करता है। जब एक मजहब वाले इस बात पर जोर देते हैं कि हलाल मीट ही खाना चाहिए, इसके साथ ही वह यह भी सुनिश्चित करते हैं कि जहाँ से आप मांस खरीद रहे हैं। उस प्रतिष्ठान पर केवल समुदाय विशेष के कर्मचारी ही कार्य करते हैं, क्यों कि उनका मानना है कि हलाल केवल मजहब का व्यक्ति ही इसे तैयार कर सकता है। इस तरह हलाल मीट सिर्फ भोजन सामग्री ही नहीं रह जाता बल्कि यह एक ही समुदाय के लोगों को रोजगार सुनिश्चित करने का तरीका भी है।

जो जानवर इस्लामी नियमों के अनुसार कत्ल किए जाते हैं सिर्फ उन्ही को हलाल माना जा सकता है, क्योंकि उसे कत्ल करने से पहले कुरान की आयत पढ़ी जाती है। वहीं दूसरे धर्म वालों द्वारा किया गया कोई भी कत्ल इसकी परिभाषा के अनुसार हलाल नहीं माना जाता। इस तरह हलाल मीट को ही खाने योग्य बताना दुर्भावनापूर्ण और गुमराह करने वाली मानसिकता को दर्शाता है। हलाल प्रमाणन मीट उद्योग में समुदाय विशेष के लिए एकाधिकार भी स्थापित करता है।

हालाँकि, शाकाहारी उत्पादों के प्रमाणन प्रक्रिया हलाल प्रमाणन से थोड़ी सी भिन्न है, जबकि मूल प्रक्रिया समान है। प्रमाणन के लिए एक प्रतिष्ठान को हलाल प्रमाणीकरण प्राप्त करने के लिए एक इस्लामी प्रमाणन प्राधिकरण को एक निश्चित राशि का भुगतान करना पड़ता है। इस प्रकार यदि कोई व्यावसायिक संस्थान समुदाय विशेष के साथ व्यापार करना चाहता है, तो उन्हें पहले समुदाय विशेष के ‘ठेकेदारों’ को ‘हफ्ता’ देना होगा।

वास्तव में इस तरह के प्रमाण पत्र प्राप्त करने की लागत को समुदाय विशेष और अन्य धर्मों के लोग, दोनों तरह के ग्राहकों से वसूल किया जाता है। इस प्रकार दूसरे धर्मम का ग्राहक समुदाय विशेष के ‘ठेकेदारों’ की आजीविका का माध्यम हैं।

इन स्थितियों को देखते हुए यह समझना आसान है कि अन्य धर्म इस तरह की व्यवस्था से संतुष्ट नहीं होंगे। दूसरे मजहब वाले समुदाय विशेष की मजहबी मान्यताओं के कारण भुगतान के लिए बाध्य नहीं हैं, क्योंकि हलाल प्रमाणीकरण साफ तौर पर एक आर्थिक गतिविधि है, इसलिए विरोध भी आर्थिक क्षेत्र में होगा। इस प्रकार, हमारे तीन सवालों का जवाब दिया जा चुका है।

अब आगे बात करे तो, अगले सवाल का जवाब है कि हलाल उत्पादों के बहिष्कार का आह्वान करना कोई गलत बात नहीं है और यह निश्चित रूप से ‘इस्लामोफोबिया’ नहीं है और ये अनैतिक भी नहीं है। इसलिए हर एक जागरूक नागरिक की जिम्मेदारी है कि वह सभी प्रकार के भेदभावों के खिलाफ अपनी आवाज उठाए।

अब हम अन्य दो प्रश्नों की ओर आते हैं जो खास मजहब के कर्मचारियों को न रखने वाले कथित विज्ञापन की संवैधानिकता व वैधता की बात करते हैं और चेन्नई पुलिस द्वारा की गई गिरफ्तारी पर सवाल खड़ा करते हैं। हलाल मीट पर जोर देना आर्थिक बहिष्कार का ही एक रूप है। समुदाय विशेष के उपभोक्ता मीट उद्योग में केवल अपने ही मजहब की भर्ती के लिए अपने समुदाय के लोगों को ही प्रोत्साहित करते हैं।

इससे यह प्रभाव पड़ेगा कि मीट इंडस्ट्री हलाल मीट का उत्पादन बढ़ाने पर जोर देगी, क्योंकि ज्यादातर उपभोक्ताओं को हलाल मीट खाने में कोई परेशानी नहीं होगी, लेकिन दूसरे मजहब का आदमी कभी गैर-हलाल मीट नहीं खाएगा। इस प्रकार हलाल मीट कारोबार का दायरा ज्यादा बढ़ जाता है। इसी प्रकार की व्यवस्था को नसीम निकोलस तालेब के शब्दों में ‘अल्पसंख्यकों की तानाशाही’ कहा गया है।

इस प्रकार, मजहब विशेष की हलाल मीट की माँग के कारण मीट इंडस्ट्री का झुकाव सिर्फ हलाल मीट के उत्पादन की तरफ है। इस तरह समुदाय विशेष को मांसाहार में अन्य धर्मों के साथ भारी भेदभाव करके रोजगार में एकाधिकार देता है। जितनी कि यह व्यवस्था खतरनाक है उनता ही देश का संविधान इस पर मौन है।

इस तरह के मामलों में आज तक कोई गिरफ्तारी नहीं हुई है, जबकि तथ्य यह है कि मीट उत्पादों पर हलाल प्रमाणीकरण का नियम यह घोषणा करता है कि मीट उत्पाद बनाने में किसी अन्य धर्म वालों को काम पर नहीं रखा गया था। इसलिए यदि व्यावसायिक प्रतिष्ठान बिना किसी कानूनी भय और संविधान की सहमति से दूसरे धर्म को रोजगार से वंचित करने की खुली घोषणा कर सकते हैं, तो किसी दूसरे धर्म प्रतिष्ठान के द्वारा इसी तरह की घोषणा करने पर कार्रवाई क्यों की जानी चाहिए?

अगर हलाल प्रमाणीकरण कानूनी है, तो अन्य व्यावसायिक प्रतिष्ठानों को भी यह अधिकार है कि वह भी अपने प्रतिष्ठान में धर्म के आधार पर दूसरे मजहब को रोजगार देने से इनकार कर सकता है। यदि समुदाय मीट उद्योग में अपने ही मजहब वालों के रोजगार को प्रोत्साहित कर सकता है, जो हलाल मीट अनिवार्य रूप से जोर देता है, तो दूसरे धर्मों को भी अपने व्यवसायिक प्रतिष्ठानों में विशेष धर्म के लोगों को नौकरी पर रखने के लिए प्रोत्साहित करने का अधिकार है।

यदि हलाल कानूनी और संवैधानिक है तो, उदाहरण के तौर पर अगर कोई हिंदू ज़ोमैटो या अमेज़ॅन या किसी ई-कॉमर्स सेवा पर ख़ास मजहब के डिलीवरी वाले व्यक्ति से डिलीवरी नहीं लेता है, तो ऐसा करना एक ग्राहक के रूप में उनका अधिकार है।

अन्य धर्म भी अन्य मोर्चों पर भी इस तरह विचार कर सकता है, यदि वे अपने स्वयं के धर्म वाले विक्रेताओं से किराने का सामान और सब्जी खरीदना चाहते हैं, तो ऐसा करना उनका अधिकार है। यदि हलाल कानूनी और संवैधानिक है, तो ऐसा व्यवहार कानूनी रूप से या नैतिक रूप से गलत नहीं है। जब तक हलाल की भेदभावपूर्ण प्रथा के खिलाफ विरोध केवल आर्थिक क्षेत्र तक ही सीमित है, तब तक यह पूरी तरह से उचित है।

भारतीय संविधान में समानता को परिभाषित किया गया है और समानता के सिद्धांत निर्धारित करते हैं कि प्रत्येक नागरिक को कानून के समक्ष समान होना चाहिए। हालाँकि, पुलिस कभी-कभी यह भूल जाती है कि जैन बेकर्स के मालिक की गिरफ्तारी और झारखंड में हिंदू विक्रेता के खिलाफ कानूनी कार्रवाई कहीं न कहीं एकतरफा प्रतिक्रिया है।

यह उल्लेख करना भी उचित है कि इन दोनों अवसरों पर मजहब विशेष के कुछ लोगों द्वारा सोशल मीडिया पर आपत्ति दर्ज कराने पर पुलिस ने कार्रवाई की है। खास समुदाय को यह अहसास होना चाहिए कि यदि वे आर्थिक मोर्चे पर अन्य धर्मों के खिलाफ सक्रिय रूप से भेदभाव करते हैं, तो दूसरा पक्ष भी समान रूप से जवाबी कार्रवाई का अधिकार रखता है।

यह इस्लामोफोबिया नहीं है, यह प्रतिक्रिया का स्वाभाविक नियम है। ख़ास समुदाय को यह भी अहसास होना चाहिए कि अन्य धर्म उनके मजहबी विश्वासों को सब्सिडी देने के लिए बाध्य नहीं हैं और उन्हें उम्मीद करना भी बंद कर देना चाहिए।

दुर्भाग्यवश खास समुदाय ने पीड़ितों की तरह रोने की आदत बना ली है, जबकि वो हर तरफ हावी हैं। भारतीय कानून एजेंसियों को इस तरह की आपत्तियों को बढ़ावा नहीं देना चाहिए, क्योंकि इस तरह की कार्रवाई निश्चित रूप से समुदायों के बीच भेदभाव व कड़वाहट पैदा करती है।

खास समुदाय यदि तर्क में यकीन रखता है तो उम्मीद है कि खास समुदाय को अपने भेदभाव पूर्ण व्यवहार एहसास होगा और वे भेदभावपूर्ण प्रथाओं को या तो छोड़ देंगे या दूसरे को भी वैसा ही अधिकार देने पर सहमत होंगे। अंत में इतना ही कि इन सभी बातों पर विचार किया जाना चाहिए, जिसमें कि पूरे देश की भलाई है।

श्रमिक ट्रेन पर जावेद अख्तर ने गुस्से में किया गलत ट्वीट, लोगों ने कहा- 8 बजे के बाद न करें ट्वीट!

श्रमिक ट्रेन पर जावेद अख्तर गुस्से में हैं। इसे लेकर उन्होंने जल्दीबाजी में ट्वीट भी कर दिया। जावेद अख्तर ने भारतीय रेलवे के श्रमिक ट्रेनों पर की गई घोषणा पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा है कि रेलवे ऐसा कैसे कर सकती है जबकि घर जाना प्रवासियों का अधिकार है।

श्रमिक ट्रेन पर जावेद अख्तर ने गुस्से में किया गलत ट्वीट

हालाँकि, जावेद का गुस्से से भरा हुआ ट्वीट भारतीय रेलवे की घोषणा से कहीं भी मेल नहीं खाता है। जावेद अख्तर ने ट्वीट में लिखा – “30 जून तक ट्रेन नहीं चलाने का क्या मतलब है? प्रवासी मजदूर वापस अपने घर जाना चाहते हैं और वापस जाने का उन्हें पूरा अधिकार भी है।”

जावेद अख्तर ने आगे लिखा है, “लेकिन विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग सस्ती लेबर को जाने नहीं देना चाहता। गलत तरीके से उनके रास्ते को रोकने की कोशिश करके हम उन्हें बंधुआ मजदूरी में बदलने की कोशिश नहीं कर रहे हैं?”

जावेद अख्तर ने जो ट्वीट किया है वह हर हाल में सिर्फ और सिर्फ उनकी कल्पनाओं के आधार पर है जबकि वास्तविकता जावेद अख्तर के ट्वीट से बहुत अलग है। जिसे देखते हुए कई यूजरों ने उनसे 8 बजे के बाद ट्वीट न करने की अपील की।

रेलवे ने कहा है कि श्रमिक और विशेष ट्रेनों का संचालन जारी रहेगा।

भारतीय रेलवे ने स्पष्ट किया है कि सिर्फ नियमित यात्री ट्रेनों में 30 जून को या उससे पहले यात्रा के लिए बुक किए गए सभी टिकट रद्द कर दिए हैं जबकि श्रमिक और विशेष ट्रेनों का संचालन जारी रहेगा। साथ ही, जून 30, 2020 तक बुक किए गए सभी टिकटों का रिफंड यात्रियों को कर दिया गया है।

रेलवे द्वारा शुरू की गई विशेष ट्रेनों में अब तक 2,34,411 यात्रियों ने टिकट बुक की हैं। भारतीय रेलवे ने कहा है कि यात्री रिजर्वेशन सिस्टम (पीआरएस) के तहत इससे अब तक कुल 45.30 करोड़ रुपए की कमाई भी हो चुकी है।

उल्लेखनीय है कि केंद्र सरकार ने 01 मई से 642 श्रमिक स्पेशल ट्रेनों का संचालन किया है, जिससे अब तक देश के विभिन्न हिस्सों में कोरोना वायरस के कारण जारी लॉकडाउन के चलते फँसे हुए आठ लाख प्रवासी मजदूरों को उनके घर पहुँचाया गया है।

इनमें से सबसे अधिक ट्रेनें (301) उत्तर प्रदेश और उसके बाद बिहार (169) पहुँची हैं।

रेल मंत्री ने कहा कि कुछ राज्य साथ नहीं दे रहे

केन्द्रीय रेल मंत्री पियूष गोयल ने एक ट्वीट के जरिए बताया है कि रेलवे रोजाना 300 श्रमिक स्पेशल ट्रेनों को चलाकर कामगारों को उनके घर पहुँचाने के लिये तैयार है, लेकिन कुछ राज्यों, जैसे बंगाल, राजस्थान, छत्तीसगढ, व झारखंड की सरकारों द्वारा इन ट्रेनों को अनुमति नहीं दी जा रही है, जिससे श्रमिकों को घर से दूर कष्ट सहना पड़ रहा है।

प्रवासी और श्रमिकों के लिए केंद्र कर रहा है प्रबंध

इसके अलावा सरकार लगातार प्रवासी मजदूरों की समस्या का समाधान करने के लिए प्रयास कर रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में देश की अर्थव्यवस्था को सहारा देने के लिए 20 लाख करोड़ के आर्थिक पैकेज की घोषणा भी की है।

जबकि वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने भी कल ही अन्य राज्यों में फँसे हुए श्रमिकों को कई प्रकार की राहत और सुविधाओं की घोषणा की है।

जम्मू कश्मीर में सक्रिय टॉप-10 आतंकियों की नई लिस्ट जारी: डॉ. सैफुल्ला, मो. अशरफ, जुनैद जैसे मोस्ट वांटेड आतंकी सेना के निशाने पर

हिजबुल कमांडर आतंकी रियाज नाइकू के मारे जाने के बाद सुरक्षाबलों ने कश्मीर घाटी में सक्रिय टॉप-10 आतंकियों की नई लिस्ट तैयार की है। हिजबुल मुजाहिदीन, लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद के कई मोस्ट वॉन्टेड आतंकियों के नाम शामिल हैं।

घाटी में बीते कई दिनों से आतंकियों के खिलाफ जारी ऑपरेशन के बीच भारतीय सुरक्षाबलों ने केंद्र शासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर में सक्रिय शीर्ष 10 सर्वाधिक वांछित आतंकियों के खौफनाक मंसूबों को बेअसर करने के लिए नए अभियान शुरू कर दिए हैं। इस लिस्ट में डॉ. सैफुल्ला उर्फ डॉक्टर, मोहम्मद अशरफ, जुनैद सहराई जैसे मोस्ट वांटेड आतंकी शामिल है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक कश्मीर घाटी में सक्रिय इन सभी टॉप-10 आतंकवादियों को पाकिस्तान की खुफिया इकाई आईएसआई की मदद से संचालित आतंकी शिविरों में प्रशिक्षित किया गया था। यह आतंकी नए लड़कों की भर्ती करने के अलावा पूरे कश्मीर में आतंकी नेटवर्क की पूरी जानकारी रखने के अलावा सीमा पार अपने आकाओं के साथ लगातार संपर्क में रहते हैं।

टॉप-10 खतरनाक और खूंखार आतंकी:

1. डॉ. सैफुल्ला उर्फ डॉक्टर

हिजबुल मुजाहिदीन का नवनियुक्त कमांडर
अक्टूबर, 2014 से हिजबुल मुजाहिद्दीन में शामिल
पुलवामा के मलंगपोरा का रहने वाला
नाइकू ने उसे गाजी हैदर नाम दिया था।

2. मोहम्मद अशरफ खान उर्फ अशरफ मौलवी

हिज्बुल मुजाहिदीन का नया ऑपरेशनल चीफ
कश्मीर के अनंतनाग का निवासी
9 सितंबर, 2016 को हिजबुल मुजाहिद्दीन में शामिल हुआ और तब से घाटी में सक्रिय है।

3. जुनैद सहराई

कश्मीर विश्वविद्यालय से एमबीए की डिग्री
2018 से आतंकी संगठन हुर्रियत की जिलानी गुट का मुखिया
जुनैद के पिता अशरफ सहराई जमीयत-ए-इस्लामी के कट्टर समर्थक हैं

4.मोहम्मद अब्बास शेख

यह हिजबुल संगठन के साथ 3 मार्च 2015 से जुड़ा है।
इसे तुराबी मौलवी के रूप में भी जाना जाता है।

5. जाहिद जरगर

2014 से अंत में जैश-ए-मोहम्मद में शामिल
पिछले कुछ महीनों से भूमिगत

6 .फैसल भाई

A + कैटेगरी का आतंकवादी
2015 से जैश ज्वॉइन

7.शकूर

लश्कर का सदस्य और 2015 से सक्रिय है।

8. शिराज अहमद लोन उर्फ मौलवी

हिजबुल का सदस्य
30 सितंबर 2016 को आतंकी संगठन में शामिल

9.सलीम पर्रे

आतंकी संगठन जैश ए मोहम्मद से जुड़ा

10.ओवैस मलिक

आतंकी संगठन लश्कर से जुड़ा

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, जम्मू-कश्मीर पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया इन आतंकवादियों की तलाश जारी है। अब इनके साथ जुड़े लोगों की सूची तैयार की जाएगी जिसके जरिए हम इनके बारे में आवश्यक जानकारियाँ जमा कर इनके खिलाफ अभियान चलाएँगे। साथ ही इनके मारे जाने से आतंकी गतिविधियों में कमी आएगी और आतंकी कैडर का मनोबल टूटेगा।