पालघर में 2 साधुओं समेत 1 ड्राइवर की लिंचिंग के मामले में पुलिस की लापरवाही को लेकर नया खुलासा हुआ है। खबर है कि पुलिस ने हत्या के बाद कई घंटों तक शवों की सुध नहीं ली। शव उस रात करीब 9 घंटे तक सड़क पर लावारिस पड़े रहे।
न्यूज नेशन के कंसल्टिंग एडिटर दीपक चौरसिया ने इस बात का खुलासा पालघर मामले में चश्मदीद फॉरेस्ट गार्ड का हवाला देकर किया है।
उन्होंने दावा किया है, “पालघर संतों की क्रूर और निर्मम हत्या के बाद उनकी देह 9 घंटे तक सड़क पर लावारिस पड़ी रही। दरअसल पुलिस वाले हत्या के बाद भाग खड़े हुए थे। रात भर ड्राइवर और दो संतों की हत्या के बाद भी पुलिस ने सुध नहीं ली।”
पालघर संतों की क्रूर और निर्मम हत्या के बाद उनकी देह 9 घंटे तक सड़क पर लावारिस पड़ी रही।दरअसल पुलिस वाले हत्या के बाद भाग खड़े हुए थे। रात भर ड्राइवर और दो संतों की हत्या के बाद भी पुलिस ने सुध नहीं ली। #PalgharLynching के चश्मदीद फॉरेस्ट गार्ड ने ये बात @NewsNationTV से कही है।
पालघर में साधुओं की लिंचिंग के बाद से न्यूज नेशन का दावा है कि वो इस मामले पर अपनी पड़ताल कर रहा है। इससे उसे पता चला है कि आदिवासी इलाकों में हिंदू संतों के खिलाफ एक हवा बनाई गई और इसी कारण संतों की मॉब लिंचिंग हुई।
बता दें इस समय पालघर लिंचिंग मामले के संबंध में लगातार नए-नए खुलासे हो रहे हैं और लगातार संतों की निर्मम हत्या पर सवाल भी उठ रहे हैं। लोगों का मानना है कि अभी भी कई प्रश्न ऐसे हैं जिनका जवाब प्रशासन को देना बाकी है।
ऐसे में अब न्यूज नेशन ये नया खुलासा लेकर आया है। इससे एक नया सवाल खड़ा हुआ है कि साधुओं को भीड़ के हवाले सौंपने वाले पुलिसकर्मियों ने हत्या के बाद भी उनके शवों की सुध क्यों नहीं ली? क्यों पोस्टमार्टम का ख्याल उन्हें सुबह आया?
गौरतलब है कि जूना अखाड़ा के महंत कल्पवृक्ष गिरी महाराज (70 वर्ष) और महंत सुशील गिरी महाराज (35 वर्ष) अपने ड्राइवर निलेश तेलगडे (30 वर्ष) के साथ मुंबई से गुजरात अपने गुरु भाई को समाधि देने के लिए जा रहे थे। इसी दौरान 16 अप्रैल 2020 की रात पालघर के दहानु तालुका के आदिवासी बहुल गडचिंचले गाँव में सैकड़ों लोगों की भीड़ ने उनकी पीट-पीटकर हत्या कर दी थी।
आज ट्विटर पर अप-वर्ड द्वारा एक स्क्रीनशॉट दिखाया गया जिसमें गूगल के सर्च रिजल्ट में, एक शब्द का अर्थ खोजने पर ऑक्सफोर्ड द्वारा दी गई डिक्शनरी से परिणाम आते हैं, और उसमें शब्द के उदाहरण में हिंदूफोबिया से सने वाक्य का प्रयोग दिखता है।
गूगल के कार्यकारी अध्यक्ष एरिक श्मिट (Eric Schmidt) ने कहा था कि इंटरनेट इंसानों की बनाई ऐसी चीज है जिसे इंसान ही नहीं समझ पाता, यह अराजकता में किया गया सबसे बड़ा प्रयोग है और अराजकता का सबसे बड़ा हथियार फ्री स्पीच और हर उस चीज में अविश्वास का बीजारोपण है, जो किसी देश को प्रिय होती है।
इस्लामिक आक्रान्ताओं के भारत में घुसने के दौर से ही भारत को विभाजित करने और जीतने के लिए एक महत्वपूर्ण तरीका हिंदुओं को अपमानित करना था। यह प्रवृत्ति आज भी Google द्वारा दिए जाने वाले सर्च के नतीजों में नजर आ रही हैं।
‘UpWord’ ने आज ही ट्विटर पर एक स्क्रीनशॉट जारी किया है। इसमें Co-Religist (को-रिलिजिस्ट/सहधर्मी) शब्द का गूगल-डिक्शनरी द्वारा बताया गया अर्थ दिया गया है।
Do a simple @Google search for co-religionist and the dictionary result and source will amaze you. Such hatred towards Hindus. pic.twitter.com/o9VeNbklYn
Google के डिक्शनरी फीचर में ऐसे शब्दों की परिभाषाएँ दी गई हैं जिन्हें लोग जानना और समझना चाहते हैं। Co-Riligionist यानी सहधर्मी शब्द का अर्थ होता है- किसी अन्य व्यक्ति के समान धर्म और कर्तव्य का पालन करने वाला।
लेकिन गूगल इस शब्द का अर्थ और उदाहरण इस तरह बताता है, Hindu fundamentalists are admired by many of their co-religionists as virtuous people
गूगल द्वारा दिखाया जा रहा उदाहरण “हिन्दू कट्टरपंथी …” है, जो कि लोगों के आक्रोश का विषय बन गया है। इस आपत्ति का मूल यह है कि जब हम किसी चीज का उदाहरण देते हैं तो अपवादों की जगह जो घटना कई बार हो चुकी होती है, बहुतायत है, उसका वर्णन करते हैं, लेकिन यहाँ ऑक्सफोर्ड द्वारा दिए गए इस उदाहरण में न सिर्फ़ हिन्दुओं को कट्टरपंथी कहा गया है, बल्कि बाकी साथी हिन्दुओं को ऐसे कट्टरपंथियों का समर्थक बताते हुए उन्हें गुणवान मानने की बात की है।
यदि उदाहरण के लिए किस धर्म को चुनना ही था तो फिर गूगल ने उस धर्म को क्यों नहीं चुना जो कई सौ सालों से कट्टरपंथी विचारधारा के जरिए दुनिया के नक़्शे पर मजहबी कट्टरपंथ की वास्तविक परिभाषा छोड़ता आ रहा है?
यहाँ पर ‘कट्टरपंथी हिन्दू’ शब्द चौंकाने वाला शब्द है। सवाल तो यही है कि आखिर एक हिन्दू, जो सदियों तक कट्टरपंथी आक्रांताओं के इतिहास से आक्रांतित रहा हो, जिन्हें मुगलों ने जबरन धर्मांतरण करने को विवश किया हो, जिनका कि अपने धर्म का अनुसरण करना मौलिक अधिकार था और है, जिनका कट्टरपंथी मुस्लिमों द्वारा बलात्कार किया गया, जिन्हें काफ़िर ठहराकर उनकी आस्था के प्रतीकों को लज्जित कर उनके देवताओं के मंदिरों को तोड़ा गया हो और आज तक अपनी पहचान और अपनी गरिमा के लिए अपने ही देश में संघर्षरत हो, वह हिन्दू आखिर कट्टरपंथी कैसे हो सकते हैं?
इतिहास में ऐसे भी कोई साक्ष्य नहीं मिलते जब हिंदुओं ने मजहबी कारणों से किसी अन्य धर्म से नफरत कर उनकी शिलाओं, मूर्तियों को खंडित कर उनके उपासकों से जबरन बलात्कार किया हो। उन्हें लूटा हो और कहा हो कि उनके ईश्वर को जो नहीं मानते, वे काफ़िर हैं।
तो फिर जिनका इतिहास, भूत-भविष्य और वर्तमान, इन्हीं सब से सना हो, गूगल ने उनका उदाहरण क्यों नहीं चुना?
हिंदुओं की ऐसी कोई भी तुलना, जो उन्हें कट्टरपंथी मुस्लिमों के समानांतर दिखाने का प्रयास करती हो, बेहद बेबुनियाद, इस्लामी विचारधारा से प्रेरित और हिंदू-घृणा से भरी हुई है।
यह जानने के लिए कि गूगल आखिर हिंदू-घृणा से भरी ऐसी परिभाषा को क्यों दिखा रहा है, यह समझना आवश्यक हो गया है कि गूगल की इन परिभाषाओं का स्रोत क्या है। जब हमने स्रोत पर क्लिक किया, तो पता चला कि Google अपनी परिभाषा ‘लेक्सिको’ (Lexico) से ले रहा है, जो कि ऑक्सफोर्ड द्वारा संचालित है।
पहले ऑक्सफोर्ड ने ऑक्सफोर्ड डिक्शनरीज ऑनलाइन (ओडीओ) नामक एक ऑनलाइन शुरू की थी। इसे अब केवल ऑक्सफोर्ड डिक्शनरीज़ कहा जाता है। यह ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस (OUP) द्वारा निर्मित ऑनलाइन शब्दकोशों का एक संग्रह है, जो ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय से प्रकाशित होती है।
इस संग्रह में ‘लेक्सिको’ नामक एक वेबसाइट पर मुफ्त में उपलब्ध कराई गई अंग्रेजी और स्पैनिश के शब्दकोश शामिल हैं। यह लेक्सिको, ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस (OUP), Dictionary.com और ऑक्सफोर्ड डेक्सस प्रीमियम के सहयोग से बना है।
ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी एपीआई की परिभाषाएँ Google परिभाषा खोज में दिखाई देती हैं, macOS पर डिक्शनरी एप्लिकेशन आदि ऑक्सफोर्ड डेक्स एपीआई के माध्यम से लाइसेंस प्राप्त करते हैं।
Google पर दिखाए जाने वाले शब्दार्थ रिजल्ट में ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी की ही परिभाषाएँ दिखाई देती हैं। macOS आदि पर इस डिक्शनरी एप्लिकेशन को ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी एपीआई के माध्यम से लाइसेंस प्राप्त है।
लेक्सिकन (Lexicon), ऑक्सफोर्ड की ही एक खोज है और इसमें जो परिभाषाएँ हैं, उनके लिए ऑक्सफोर्ड ही जिम्मेदार है। लेक्सिकन को Dictionary.com के सहयोग से तैयार किया गया है, जो विभिन्न स्रोतों से ली जाने वाली सामग्री और सूचना पर आधारित है।
मरियम वेबस्टर ( Merriam Webster) क्या कहता है?
दिलचस्प बात यह है कि ‘मरियम वेबस्टर‘ (ऑनलाइन डिक्शनरी) का इस बारे में एक गहरा राजनीतिक दृष्टिकोण भी है। मरियम वेबस्टर अपने ऑनलाइन संस्करण में ‘सहधर्मियों’ की परिभाषा को इन्टरनेट से उठाए गए उदाहरण के साथ इस तरह परिभाषित करता है,
“हालाँकि, असम और त्रिपुरा बहुसंख्यक हिंदू राज्य हैं, लेकिन उनकी आबादी अन्य देशों के सहधर्मियों की मदद करने के बजाए अपने विशेष पारंपरिक शृंगार और भाषाई विरासत को सुरक्षित रखने के बारे में अधिक चिंतित हैं।”
Definition of Merriam Webster
हालाँकि, कम से कम, मरियम वेबस्टर ने यह कहते हुए अस्वीकरण रखा है कि उनकी परिभाषाएँ विभिन्न पोर्टल्स से ली गई हैं, जो शब्द के ‘वर्तमान उपयोग’ को दर्शाती हैं।
यहाँ पर यदि वे मूल अर्थ से भटक भी गए हैं तो तो यह संभवतः एक एल्गोरिथ्म पर आधारित है और पाठक इस पर अपनी प्रतिक्रिया भी दे सकता है।
लेकिन मरियम वेबस्टर के विपरीत, लेक्सिकन ऐसी कोई सुविधा नहीं देता है और अपने द्वारा दी गई परिभाषा और उदाहरण को ही अंतिम मानकर चलता है।
गूगल क्या कर सकता है?
अक्सर, Google अपने सर्च रिजल्ट्स के लिए सबसे सुरक्षित बहाने के तौर पर एल्गोरिथ्म को दोष दे देता है। हालाँकि, पहले भी कई ऐसे मामलों में Google ने सर्च रिजल्ट्स और ऑटो-सुझावों (ऑटो सजेशन्स) का संज्ञान लिया है, जो संवेदनहीन थे और बड़े स्तर पर लोगों की भावनाओं को आहत करने में सक्षम थे।
2016 में, Google ने अपने खोज इंजन से ऑटो कम्प्लीट (Autocomplete suggestions) को हटा दिया था। यह यहूदियों को सर्च करने पर स्वत: ही ‘बुरे हैं’ (Evil) और “महिलाएँ हैं” का सुझाव दिखाया करता था।
हमें क्या करना चाहिए?
हिंदूफोबिया के लिए हिंदुओं के रवैए को भी जिम्मेदार ठहराया जा सकता है, क्योंकि वे अपने प्रति होने वाले मामलों को अपने हाथों में नहीं लेते हैं। हिंदुओं को अनिवार्य रूप से एकजुट, संगठित विरोध की जरूरत है।
भारत में बहुसंख्यक आबादी वाले हिंदू, उपभोक्ताओं का एक बड़ा आधार तैयार करते हैं और इस तरह की एकता और ताकत की जरूरत तब पड़ती है, जब गूगल जैसे वैश्विक दिग्गजों द्वारा हिंदुओं के प्रति नफरत को स्पष्ट रूप से प्रदर्शित किया जाता है और हिंदुओं को कट्टर दिखाया जाता है।
इस मामले में, हिंदुओं को एकजुट होना होगा और न केवल Google द्वारा दिक्खाए जा रहे नतीजों का विरोध करना होगा, बल्कि जिन स्रोतों से गूगल यह नतीजे दिखता है, उन तक भी अपना विरोध पहुँचाना होगा और इस बारे में स्पष्टीकरण की माँग करनी चाहिए।
ध्यान देने की बात यह है कि उन्होंने सहधर्मी को परिभाषित करते हुए इस्लाम को ठेस पहुँचाने का साहस नहीं किया है।
कोरोना महामारी के कहर के बीच बांग्लादेश की राजधानी ढाका में फँसे 167 कश्मीरी मेडिकल छात्रों को आज भारतीय दूतावास और एयर इंडिया के सम्वन्य से विशेष विमान से श्रीनगर लाया गया।
इस बीच बांग्लादेश में लंबे समय से फँसे कुछ बच्चों का वीडियो सामने आया। जिसमें सबसे पहले हादिया रशीद नाम की एक छात्रा ने भारत के हाई कमीशन को धन्यवाद कहा और अपने घर सुरक्षित पहुँचाने के लिए उन्हे आभार व्यक्त किया।
इसके अलावा हादिया ने ये भी बताया कि बांग्लादेश में फँसे होने के दौरान उन्हें भारतीय एंबेसी ने लगातार मदद पहुँचाई जिसके लिए वे उनकी तहेदिल से शुक्रगुजार हैं।
इसके बाद एक अन्य छात्र ने विदेश मंत्री एस.जयशंकर को वीडियो के माध्यम से धन्यवाद दिया और भारतीय एंबेसी का भी आभार व्यक्त किया।
छात्र ने कहा कि भारतीय एंबेसी ने कोरोना के कहर के बीच भी जिस प्रकार उसे और अन्य फँसे लोगों को ढाका से निकाला है, इसके लिए वे उनकी सराहना करते हैं।
Kashmiri students stranded in Bangladesh thank Indian Govt, EAM @DrSJaishankar & Indian High Commission in Dhaka for rescuing them amidst #COVID19 pandemic. First repatriation flight leaves for Srinagar from Dhaka at 11am today. 167 Indian Medical Students return home to Kashmir. pic.twitter.com/3PVI7e5ARi
वीडियो में कुछ अन्य छात्र भी नजर आए। वे मुफ्त यात्रा और एयरपोर्ट पर किए इंतजामों के लिए भारतीय एंबेसी की सराहना करते दिखे। साथ ही ये भी बताते नजर आए कि उनके कॉलेज के 15 छात्र उसी फ्लाइट से अपने घर श्रीनगर लौट रहे हैं।
बता दें, कोरोना वायरस की वजह से दुनियाभर में फँसे भारतीयों को लाने के लिए सरकार का वंदे भारत मिशन गुरुवार को शुरू हो गया है। मिशन के दूसरे दिन दूसरी फ्लाइट बांग्लादेश से आई जो दोपहर करीब 2 बजे श्रीनगर में लैंड हुई।
इस फ्लाइट में 167 मेडिकल स्टूडेंट आए हैं। ये सभी जम्मू-कश्मीर के हैं, जो बांग्लादेश में पढ़ाई कर रहे थे। इससे पहले एक फ्लाइट सिंगापुर से दोपहर 12 बजे दिल्ली पहुँची। इसमें 234 यात्री आए। तीन दूसरे देशों से भी आज एक-एक फ्लाइट आएगी।
उल्लेखनीय है कि 7 मई से शुरू हुए इसे मिशन का पहला फेज 13 अप्रैल तक चलेगा। इस दौरान 12 देशों से 64 विमानों में 14 हजार 800 लोगों को लाने की योजना है।
हालाँकि, इसमें कुछ बदलाव हो सकते हैं। लेकिन, 1990 के खाड़ी युद्ध के बाद ये सबसे बड़ा एयरलिफ्ट ऑपरेशन है। खाड़ी युद्ध के वक्त 1.70 लाख भारतीय एयरलिफ्ट किए गए थे।
हरियाणा से एक बार फिर मुस्लिम परिवारों के हिंदू धर्म में वापसी करने की खबर सामने आई है। हिसार जिले के एक गाँव में दशकों से रह रहे 30 परिवारों के करीब 240 लोगों ने अपनी इच्छा से हिंदू धर्म में वापसी की है। इससे पहले परिवार के लोगों ने घर की एक वृद्धा की मौत के बाद उनका अंतिम संस्कार हिन्दू रीति-रिवाजों से किया।
हिसार के गांव बिठमड़ा में 30 परिवारों ने मुस्लिम धर्म छोड़कर हिन्दू धर्म अपना लिया है। परिवार के लोगों का कहना है कि उन्होंने बिना किसी दबाव के अपनी इच्छा से हिंदू धर्म अपनाया है। उनके इस निर्णय का गांववासियों ने स्वागत किया है#Muslims#Hindus#India#Haryana#Hisar#Conversions
जानकारी के मुताबिक हिसार जिले के उकलाना मंडी के बिठमड़ा गाँव निवासी सतबीर सिंह की माता फूल देवी का शुक्रवार (8 मई, 2020) को निधन हो गया। सतबीर ने अपनी माता का अंतिम संस्कार गाँव के ही स्वर्ग आश्रम में हिंदू रीति-रिवाज से किया। इसके बाद पूरे परिवार ने पूर्ण रूप से हिंदू धर्म अपनाने की घोषणा कर दी।
सतबीर सिंह ने बताया कि इससे पहले हमारे परिवार में कोई सदस्य मर जाता था तो हम उसे दफनाते या मिट्टी देते थे। लेकिन आज हम सब ने स्वेच्छा से हिंदू रीति-रिवाज के द्वारा यह अंतिम संस्कार किया। उन्होंने बताया कि औरंगजेब के समय उनके पूर्वजों ने दवाब में आकर मुस्लिम धर्म अपना लिया था। लेकिन आजादी के बाद से ही उनका भाइचारा हिंदुओं से है। हमारे समाज में हिंदू पद्धति (गंधर्व विवाह) से बच्चों का विवाह होता है।
उन्होंने कहा कि हम सभी ने बिना किसी के दबाव में आए हिंदू धर्म में वापसी की है। सतबीर ने बताया कि उनके परिवार के बुजुर्ग आजादी से पहले गाँव दनौदा से आकर गाँव बिठमड़ा में बस गए थे। तब से इसी गाँव में सुख-शांति से परिवार का पालन-पोषण कर रहे हैं। गाँव के अन्य लोगों ने उनके फैसले का तहे दिल से स्वागत किया है।
गाँव के ही सतीश पातड़ ने बताया कि डूम परिवारों के इस फैसले का पूरे गाँव ने सम्मान किया है। बताया जा रहा है कि डूम समाज से ताल्लुक रखने वाले 30 परिवारों के करीब 240 सदस्य गाँव में दशकों से हिंदू रीति-रिवाज से ही अपना जीवन-यापन कर रहे थे। होली, दीवाली, नवरात्र आदि हर्ष उल्लास के साथ मनाते थे।
ये लोग न तो निकाह करते थे और न ही खतना। सिर्फ परिवार के किसी सदस्य की मौत होने पर उसे मुस्लिम रीति से दफनाते थे, इसलिए ग्रामीण इन्हें मुस्लिम मानते थे। अब इन परिवारों ने इसे भी त्याग दिया है।
आपको बता दें कि इससे पहले हरियाणा के जींद जिले के दनौदा गाँव में रहने वाले 6 मुस्लिम परिवारों करीब 35 सदस्यों ने हिंदू धर्म को अपना लिया था। दरअसल 18 अप्रैल को बुजुर्ग निक्काराम की मौत के बाद उनके शव का भी हिंदू रीति से दाह संस्कार किया गया था। इसके बाद परिवार के सदस्यों ने हिंदू धर्म में वापसी की इच्छा जताई और फिर घर पर हवन यज्ञ करा जनेऊ पहन हिंदू धर्म में वापसी कर ली थी। इस फैसले का भी गाँव के लोगों ने बखूबी सम्मान किया था।
आम आदमी पार्टी की समर्थक और एनआरआई पत्रकार विजयलक्ष्मी नादर ने केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह की मृत्यु की कामना फेसबुक में की है। इस पोस्ट के बाद एक अन्य ‘पत्रकार’ लेखा मेनन ने भी गृहमंत्री को कैंसर या फिर कोरोना से मरता देखने की इच्छा जाहिर की।
लेखा की फेसबुक प्रोफाइल के मुताबिक, उन्होंने टाइम्स ऑफ इंडिया, डीएनए, मुंबई मिरर समेत कई नामी मीडिया संस्थानों में काम किया है। मगर, फिलहाल वे दुबई के पब्लिकेशन आईटीपी मीडिया ग्रुप की मसाला मैग्जीन में बतौर संपादक कार्यरत हैं। इतनी उपलब्धियों के बावजूद उनकी मानसिकता उनके भीतर की कुँठा को दर्शाती है।
फेकबुक पर इस समय एक पोस्ट वायरल हो रहा है। फेसबुक पोस्ट में लेखा मेनन ने मोहम्मद अफरोज नाम के यूजर से रिप्लाई सेक्शन में बात की है। इसका स्क्रीनशॉट प्रिया कुलकर्णी नाम की ट्विटर यूजर ने शेयर किया है।
प्रिया के ट्वीट में शेयर इन स्क्रीनशॉट्स में हम देख सकते हैं कि अमित शाह की मृत्यु देखने के लिए लेखा कितनी उतावली हैं। वे लिखती हैं, “और बीमारी क्या है? कोविड, कैंसर या दोनों? अगर ये तड़ीपार है, तो उम्मीद है दोनों।”
Journalist Lekha Menon wants @AmitShah to get Covid and Cancer
हालाँकि, लेखा के इस कमेंट के बाद अफरोज नामक फेसबुक यूजर अपनी और लेखा की बातों में बैलेंस बिठाते हुए कहता है कि वह ऐसी कामना किसी के लिए नहीं कर सकता। लेकिन कुछ लोग इसे कमाते हैं। लेखा आगे रिप्लाई देती हैं और कहती हैं, “सेम हेयर। जब बात कुछ निश्चित लोगों की आती है तो मैं भी गाँधीजी के दूसरे गाल आगे करने वाले सिद्धांत पे यकीन नहीं करती।”
बता दें, सोशल मीडिया पर लोगों की प्रतिक्रिया देखने के बाद लेखा मेनन ने अपने इस पोस्ट को डिलीट कर दिया है। लेकिन विजयलक्ष्मी नादर के पोस्ट के कमेंट किए गए उनके रिप्लाई सोशल मीडिया पर घूम रहे हैं।
बता दें, कल सोशल मीडिया पर विजयलक्ष्मी नादर का एक पोस्ट वायरल हुआ था। पोस्ट में वे भारत के गृह मंत्री अमित शाह की मौत की कामना करती नजर आई थीं। फेसबुक पोस्ट में नादर ने लिखा कि ऐसा लगता है कि कुछ महीने पहले हुई लिपोमा सर्जरी अब पूरे कैंसर में बदल गई है।
इसके अलावा अपने पोस्ट में उन्होंने यह भी दावा किया कि ज्योतिषियों के अनुसार, अमित शाह की बीमार अवस्था अक्टूबर तक रहेगी। इसके बाद उम्मीद है ये ‘अंतिम तौर से खत्म’ हो जाएगी।
गौरतलब है कि ये पहली बार नहीं है कि पत्रकार समूह के लोगों ने देश के गृहमंत्री के लिए ऐसी मंशा व्यक्त की हो। नादर और लेखा से पहले भी कश्मीर में टाइम्स के साथ काम करने वाली एक पत्रकार सामिया लतीफ ने कोरोना महामारी के बीच में इच्छा जताई थी कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह कोरोना से संक्रमित हो जाएँ।
केरल के तिरुवल्ला से एक चौंकाने वाली घटना सामने आई हैं। जहाँ एक नन बनने के लिए पढ़ाई कर रही लड़की की लाश पलियाकारा बेसेलियन कॉन्वेंट के परिसर के अंदर एक कुएँ में मिली। जहाँ वो रहती थी।
खबरों के मुताबिक, मृतक की पहचान दिव्या पी जॉनी के रूप में हुई है, जो चुंगप्पारा की निवासी है। 21 वर्षीय दिव्या लंबे समय से ननहुड पाने के लिए कॉन्वेंट में रह रही थी।
गुरुवार (7 मई,2020) को कॉन्वेंट के छात्रावासों में रहने वाले लोगों ने सुबह करीब 11 बजे कुएँ में किसी चीज के गिरने की आवाज सुनी। राज्य की राजधानी से लगभग 120 किलोमीटर दूर तिरुवल्ला में बेसलियन कॉन्वेंट के परिसर में स्थित कुएँ में उन्होंने दिव्या को देखा।
पुलिस को सूचित कर, लगभग 20 मिनट में लोगों ने दिव्या को कुएँ से बाहर निकाला और एक निजी अस्पताल लेकर गए। अस्पताल पहुँचने पर डॉक्टर ने उसे मृत घोषित कर दिया। जिसके बाद शव को तिरुवल्ला तालुक अस्पताल में स्थानांतरित कर दिया गया है। पुलिस ने इस पर अप्राकृतिक मौत का मामला दर्ज किया है और जाँच की तैयारी में जुट गई हैं।
पुलिस सूत्रों ने बताया कि लड़की ने या तो आत्महत्या की है या कुएँ से पानी निकालते समय कुएँ में फिसल गई होगी। एक पुलिस अधिकारी ने कहा कि चूँकि घटना में किसी भी तरह के जोर-जबरदस्ती की शिकायत नहीं है। इसलिए मौत का वास्तविक कारण अभी पता नहीं चल पाया है और उसके शव को पोस्टमॉर्टम के लिए भेज दिया गया है।
आपको बता दे इससे पहले भी केरल में कई नन की मौतें इसी तरह कुएँ में गिरने से हो चुकी हैं।
सितंबर 2018 में, केरल के कोल्लम जिले में 54 वर्षीय नन सुसान मथेवा का शव एक कॉन्वेंट के अंदर कुएँ में मिला था। नन राज्य की राजधानी तिरुवनंतपुरम से लगभग 80 किलोमीटर दूर पठानपुरम के सेंट स्टीफेंस स्कूल में पढ़ाती थी।
दिसंबर 2015 में, केरल के इडुक्की जिले में वागामोन से लगभग 10 किलोमीटर दूर उलुपुनी के पवित्र हार्ट कॉन्वेंट के कुएँ में भी एक 33 वर्षीय नन स्टेला मारिया का शव पाया गया था।
वहीं 27 मार्च 1992 को कोट्टायम के सेंट पायस एक्स कॉन्वेंट में एक कैथोलिक सिस्टर को भी पानी के कुएँ में मृत पाया गया था। जानकारी के अनुसार इस मौत की जाँच अबतक केरल में सबसे लंबे समय तक चलने वाली हत्या की जाँच थी।
गुजरात के भुज में एक मस्जिद से देर रात को अजान दी गई। समुदाय विशेष से हथियार उठाकर घर से निकलने की अपील की गई। संदेश में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार घटना भुज के कोकड़ी रोड स्थित बाकली कॉलोनी की है। यहॉं मस्जिद से बेवक्त अजान देकर अपील की गई, “मुस्लिमों अब जागो, हथियार उठाओ और अपने घर से बाहर आओ।”
पुलिस ने कथित तौर पर अजान देने वाले शख्स को गिरफ्तार कर लिया है। मामले में आगे की जाँच की जा रही है। अब्दुल्ला लुहार कथित तौर इमाम-ए-रब्बानी नामक मस्जिद में देर रात करीब 2:30 बजे घुस गया और लाउडस्पीकर से असमय अजान दी।
बेवक्त के अजान से जाहिर होता है कि सांप्रदायिकता विद्वेष फैलाने के इरादे से ऐसा किया गया है। आरोपी ने लाउडस्पीकर से भड़काऊ ऐलान किए। कथित तौर पर उसने घोषणा की, “मैं कच्छ का राजा हूँ। मुस्लिमों को जाग जाना चाहिए और हथियार उठाकर अपने घरों से बाहर आना चाहिए।” इसकी जानकारी मिलते ही पुलिस हरकत में आ गई और मौके पर पहुँच गई।
लॉकडाउन के कारण जमावड़े पर है प्रतिबंध
यहाँ यह बताना बेहद जरूरी है कि देश में कोरोना वायरस संक्रमण की रोकथाम के लिए जारी लॉकडाउन में किसी भी स्थान पर लोगों का एकत्र होना प्रतिबंधित है। धार्मिक स्थलों पर भी जुटान की मनाही है।
कई राज्यों में स्थानीय प्रशासन कोरोना के प्रति समुदाय विशेष में जागरुकता फैलाने के लिए मस्जिद के मौलवियों और इमामों के साथ समन्वय बनाए हुए हैं। ऐसी स्थिति में बिना समय के अजान देना सांप्रदायिक हिंसा को भड़का सकता है।
मस्जिदों से हिंसा फैलाने की कुछ पिछली घटनाएँ
पिछले महीने बेंगलुरु में आशा कार्यकर्ताओं और नर्सों के एक समूह पर कोरोना वायरस के हॉटस्पॉट सादिक लेआउट क्षेत्र में स्थानीय लोगों द्वारा हमला किया गया था। स्वास्थ्यकर्मियों ने बताया था कि पॉजिटिव केस मिलने के बाद वे इलाके में सैंपल लेने गए थे। उसी समय स्थानीय लोगों की भीड़ ने उन पर हमला किया और उन्हें पीटा। उन्होंने आरोप लगाया था कि उन्हें पीटने के लिएस्थानीय मस्जिदसे आह्वान किया गया था।
28 अप्रैल को गुजरात के वडोदरा में कसम आला मस्जिद क्षेत्र के पास सेहरी के बाद एक पुलिस टीम पर स्थानीय लोगों द्वारा हमला किया गया था। जब पुलिसकर्मियों ने उन्हें रोकने की कोशिश की तो कथित तौर पर मुख्य आरोपित नजीर और उसके सहयोगियों की एक भीड़ उन पर हमला कर दिया।
कुछ इसी तरह 27 अप्रैल को औरंगाबाद में लॉकडाउन का पालन कराने और मस्जिद में इबादत के लिए इकट्ठा हो रही भीड़ को रोकने के लिए जब पुलिस की टीम मौके पर पहुँची तो महिलाओं सहित भीड़ ने हमला कर दिया।
वहीं 2 अप्रैल को उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ में लोगों की भीड़ ने पुलिस को घेरकर उन पर पत्थर बरसाए थे। यह घटना उस समय घटित हुई कि जब पुलिस सराय रहमान क्षेत्र की एक मस्जिद में सामूहिक नमाज को रोकने के लिए गई थी।
महाराष्ट्र में कोरोन वायरस के बढ़ते मामले, विशेष रूप से समुदाय विशेष के बीच बढ़ते मामलों को देखते हुए राज्य की उद्धव सरकार ने चुनिंदा हॉटस्पॉट्स इलाकों में कोरोना वायरस के प्रति जागरुकता फैलाने के लिए उर्दू में संदेश जारी करने का फैसला किया है। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक सरकार ने कोरोना महामारी की रोकथाम के लिए महामारी विभाग को इस्लामिक धर्मगुरू और स्थानीय मौलवियों के साथ योजना बनाने के लिए भी कहा है।
रिपोर्टों के अनुसार महाराष्ट्र में कोरोना संक्रमण से हुई तीन मई तक 548 मौतों में से 239 मौतें समुदाय विशेष के लोगों की हैं, जो कि राज्य की कुल मौतों में से 44 प्रतिशत हैं। दरअसल, राज्य की कथित अल्पसंख्यकों की आबादी 12 प्रतिशत से भी कम है, इसके हिसाब से यह आँकड़ा महाराष्ट्र सरकार के लिए बेहद खतरनाक साबित हो सकता है।
इस बात का अंदाजा इन आँकड़ों से लगाया जा सकता है कि 17 मार्च से 15 अप्रैल के बीच राज्य में कोरोना से कुल 187 लोगों की मौत हुई, लेकिन इनमें से 89 मजहब विशेष के लोगों की मौत हुई। इसी तरह 15 अप्रैल से 3 मई के बीच हुई 361 मौतों में से 150 समुदाय से थे।
इस बीच संयोग से राज्य में एक फिलीपींस के नागरिक की मौत हुई, जो कि दिल्ली तबलीगी जमात के से जुड़ा हुआ था। वहीं महाराष्ट्र में 69 कोरोन वायरस वायरस के मामले तबलीगी जमात से जुड़े हुए भी पाए गए हैं।
महाराष्ट्र ने धार्मिक सभाओं में प्रतिबंध लागू करने की दिशा में देर से काम किया: विशेषज्ञ
राज्य के अधिकारियों और विशेषज्ञों ने समुदाय विशेष के बीच फैलते कोरोना वायरस को लेकर कई कारण बताए हैं। अधिकारियों ने बताया कि खाड़ी से आने वाले यात्रियों पर देरी से प्रतिबंध लगाया गया। यहाँ तक कि कई मस्जिदों में 20 मार्च तक शुक्रवार की नमाज अदा की जाती रही।
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक समुदाय विशेष का एक बड़ा हिस्सा आसपास रहता है, जहाँ सोशल डिस्टेंसिंग रखना मुश्किल है। वहीं बढ़ती जनसंख्या और गरीबों तक स्वास्थ्य सेवाओं का न पहुँचना कोरोना के मामले बढ़ने का एक प्रमुख कारण है।
राज्य महामारी विज्ञान विशेषज्ञ प्रदीप आप्टे ने बताया कि खाड़ी देशों में काम करने वाले बहुत से लोग घर लौट आए और इनमें से कुछ लोग हवाई अड्डों पर स्क्रीनिंग कराने से चूक गए। यह भी राज्य में कोरोना वायरस को तेजी से फैलने का एक बड़ा कारण रहा।
इसी तरह गाइड लाइन के मुताबिक सरकार ने 16 मार्च को पहली बार संयुक्त अरब अमीरात, कतर, ओमान और कुवैत से आने वाले यात्रियों को क्वारंटाइन करना शुरू किया था। इसी दिन, यूरोपीय संघ, तुर्की और यूके के यात्रियों को प्रतिबंधित कर दिया गया था साथ ही 22 मार्च से सभी अंतरराष्ट्रीय उड़ानों को प्रतिबंधित कर दिया गया था।
मलिन बस्तियों डिस्टेंसिंग रखना बेहद मुश्किल है।
प्रदीप आप्टे ने कहा कि ये मामले एक विशेष मजहबी समूह की वजह से नहीं, बल्कि खराब जीवनशैली के कारण झुग्गियों में फैल रहे हैं। दरअसल, मलिन बस्तियों में मजहब के लोग बड़ी संख्या में हैं और एक छोटे से कमरे में कम से कम 8-10 लोग रहते हैं, जहाँ सोशल डिस्टेंसिंग रखना बेहद मुश्किल है। मुंबई में जी-साउथ वार्ड (वर्ली) के बाद दूसरा सबसे बड़ा अग्रीपाड़ा और नागपाड़ा कोरोना वायरस के वार्ड हैं, जहाँ 34 मौतें दर्ज की गईं।
बीएमसी के सहायक आयुक्त प्रशांत गायकवाड़ ने कहा कि इस वार्ड में कई लोग चॉल में रहते हैं और वहाँ कोरोना के मामले लगातार बढ़ रहे हैं। यहाँ की एक आवासीय भवन में समुदाय विशेष के लोगों के साथ 26 लोग थे, जिन्होंने विदेश यात्रा की थी, लेकिन इनमें से केवल एक को कोरोना पॉजिटिव पाया गया। पूरी इमारत में संक्रमण नहीं फैला। मगर चॉल में एक ही संक्रमित केस कई लोगों को भी संक्रमित कर सकता है।
सरकार ने लिया मौलाना और मस्जिदों का साथ
इसी क्रम में महाराष्ट्र के स्वास्थ्य विभाग ने समुदाय विशेष में कोरोना वायरस के प्रति जागरूकता संदेश देने के लिए मस्जिदों और स्थानीय मौलानाओं का सहारा लिया है। आप्टे ने कहा कि हम जाने-माने लोगों की तलाश कर रहे हैं, जो एक संदेश वाहक का काम कर सकते हैं और स्थानीय स्तर पर बीमारी के बारे में जानकारी का प्रसार कर सकें।
हम जल्द ही अल्पसंख्यक तक पहुँच बनाने लिए हॉटस्पॉट्स इलाकों जैसे मालेगाँव और मुंबई में उर्दू में जागरूकता संदेश जारी करेंगे। इस बीच महाराष्ट्र में अब तक कोरोना वायरस से संक्रमितों की संख्या 16758, जबकि इससे हुई मौतों का आँकड़ा 651 दर्ज किया गया है। राज्य के कुल केसों का 75 प्रतिशत मुंबई और पुणे शहर में है।
उत्तरप्रदेश के सहारनपुर में देवबंद के मोहल्ला पठानपुरा में लॉकडाउन का पालन कराने गई पुलिस पर हमले की घटना सामने आई है। हमले में 1 होमगार्ड समेत 4 पुलिसकर्मी घायल हो गए।
इस मामले के संबंध में पुलिस ने सभासद और उसके 2 पुत्रों समेत 50 अज्ञात लोगों के ख़िलाफ़ संगीन धाराओं में मुकदमा दर्ज किया है। आरोप है कि घटना के समय मौजूद भीड़ ने पुलिसकर्मियों के बचाव में गई फोर्स पर भी पथराव किया। बड़ी मशक्कत कर पुलिस को भीड़ को तितर-बितर करना पड़ा।
एसएसपी दिनेश कुमार ने इस संबंध में बताया, “गुरुवार की रात होमगार्ड व एक पुलिसकर्मी मोहल्ला पठानपुरा में गश्त पर गए थे। वहाँ सभासद व उसका पुत्र भीड़ के साथ खड़े थे। पुलिसकर्मियों ने जब उन्हें लॉकडाउन का पालन करने के लिए कहा तो उन्होंने पुलिसकर्मियों पर हमला करते हुए उनकी बाइक छीनने का प्रयास किया और मारपीट भी की। पूरे प्रकरण में मुकदमा दर्ज किया जा रहा है। दोषी लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।”
अमर उजाला की रिपोर्ट के अनुसार, पठानपुरा में कल रात दो पुलिसकर्मी दीपक चौधरी और विकास कुमार बाइक पर गश्त कर रहे थे। इस दौरान उन्हें वहाँ कुछ युवक खड़े दिखाई दिए। उन्होंने उन युवकों से घर जाने को कहा। लेकिन पुलिस की बात मानने की बजाय वे लोग उनसे बहस करने लगे। देखते ही देखते मामला बढ़ गया और वहाँ मौजूद भीड़ ने पुलिसकर्मियों पर हमला कर दिया। इस दौरान पुलिस वालों की बाइक भी क्षतिग्रस्त हो गई।
हमले की खबर मिलते ही प्रभारी निरीक्षक यज्ञ दत्त शर्मा भारी पुलिस बल के साथ मौके पर पहुँचे और भीड़ को समझाने का प्रयास किया। लेकिन स्थिति बिगड़ गई। इसके बाद पुलिस ने लाठीचार्ज करके किसी तरह लोगों को उनके घरों में घुसाया और हालात पर काबू पाया।
इधर पूर्व विधायक माविया अली व पालिका चेयरमैन जिऊद्दीन अंसारी और उनके पुत्र जमाल अंसारी मौके पर पहुँचे। उन्होंने हंगामा कर रहे लोगों को समझा-बुझाकर मामला शांत कराया।
लोगों ने पुलिस पर आरोप लगाया कि पुलिसकर्मी रोजाना उन्हें परेशान व मारपीट करते है। गुरुवार को भी पुलिसकर्मियों ने जब महिलाओं के साथ मारपीट की तो उन्होंने इसका विरोध किया।
हालाँकि, बता दें, पुलिस अधिकारी ने इन आरोपों को निराधार बताया है। रेलवे रोड चौकी प्रभारी रोबिन मलिक ने पुलिस पर हुए हमले के मामले में पठानपुरा निवासी सभासद मजाहिर हसन उर्फ भोला, उसके पुत्र मो. जाकिर और आरिफ समेत अन्य 50 लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज हुआ है।
पुलिस अधिकारी यगदत्त शर्मा ने बताया कि एक आरोपित को हिरासत में लिया गया है। पुलिसकर्मियों पर अभद्रता के लगाए जा रहे आरोप निराधार हैं। दीपक, कुलदीप, कमल व होमगार्ड विकास चंद्र घायल हुए हैं। जिनका जिला चिकित्सालय में उपचार कराया जा रहा है।
गौरतलब है कि इस मामले को लेकर क्षेत्र में राजनीति शुरू हो गई है। खबर है कि सपा, बसपा और कॉन्ग्रेस ने पुलिस प्रशासन पर एक वर्ग के लोगों को जानबूझकर परेशान करने का आरोप लगाया है।
ज्ञात हो कि लॉकडाउन में पुलिसकर्मियों पर हमले की घटनाएँ कई जगह से सामने आई हैं। हाल की बात करें तो मुंबई के कुर्ला में लॉकडाउन का पालन कराने गई पुलिस टीम पर समुदाय विशेष की भीड़ ने हमला किया था। इसी प्रकार हावड़ा में भी पुलिस पर हमला किया गया था और अलीगढ़ में भी लोगों ने लॉकडाउन के नियमों का उल्लंघन करते हुए ईंट-पत्थर फेंके थे।
जामिया मिलिया इस्लामिया में पढ़ने वाली लॉ की छात्रा महूर परवेज पर हंदवाड़ा में वीरगति प्राप्त जवानों के लिए सोशल मीडिया पर आपत्तिजनक टिप्पणी करने के आरोप में मामला दर्ज हो गया है।
परवेज के ख़िलाफ यूपी के खुर्जा में तहरीर के बाद ये केस दर्ज हुआ है। दैनिक जागरण की खबर के मुताबिक प्रवीण भाटी एडवोकेट व बजरंग दल के प्रांत सह संयोजक ने खुर्जा कोतवाली पुलिस को दी तहरीर में बताया कि जामिया मिलिया विश्वविद्यालय दिल्ली की BA (LLB) की छात्रा महूर परवेज ने बीते 3 मई को भारतीय सेना व सरकार के विरुद्ध दुर्भावना प्रदर्शित करने वाली पोस्ट अपनी इंस्टाग्राम आईडी से पोस्ट की थी।
इस पोस्ट में महूर ने मुठभेड़ में वीरगति प्राप्त होने वाले भारतीय सेना के जवानों को ‘युद्ध अपराधी’ कहा था। उन्होंने बताया कि यह पोस्ट समाज के वर्गों के मध्य शत्रुता बढ़ाने वाली थी।
शिकायत के आधार पर खुर्जा कोतवाली पुलिस ने परवेज के खिलाफ़ मुकदमा दर्ज कर लिया। थाना प्रभारी सुभाष सिंह ने बताया कि मुकदमा दर्ज करके अब मामले में आगे की जाँच जारी है।
खुर्जा की तरह गुलावठी शहर कोतवाली में भी बजरंग दल के अन्य दो पदाधिकारियों ने तहरीर देकर इस छात्रा के खिलाफ देशद्रोह का मुकदमा दर्ज करने की माँग की है। बजरंग दल के लोगों का कहना है कि यदि इस छात्रा को जिला पुलिस ने तत्काल गिरफ्तार नहीं किया तो वह सड़कों पर उतर कर आंदोलन करेंगे।
क्या है महूर परवेज का मामला?
दरअसल, 3 मई को हंदवाड़ा से 5 जवानों के बलिदान की खबर आने के बाद महूर परवेज (Mahoor Parvez) ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म इंस्टाग्राम पर हंदवाड़ा में बलिदान हुए 5 भारतीय सैनिकों को ‘वार क्रिमिनल’ यानी ‘युद्ध के अपराधी’ बताया था।
परवेज ने अपने सोशल मीडिया पर देश की सुरक्षा में तैनात वीरकर्मियों के वीरगति प्राप्त होने पर उन्हें श्रद्धांजलि मिलता देख आश्चर्य जताया था और पूछा था कि लोग युद्ध अपराधियों का महिमामंडन क्यों कर रहे हैं।
महूर परवेज (Mahoor Parvez) ने लिखा, “आप सभी युद्ध अपराधियों का महिमामंडन क्यों कर रहे हैं? इन ताकतों ने कश्मीर में 70+ वर्षों से अवैध रूप से घोर मानव अधिकारों का उल्लंघन किया है। फिर भी कश्मीर को आज़ाद कराने के लिए बंदूक उठाने वाला आप के लिए आतंकवादी है और ये शहीद हैं? ये कैसी बात है।”
इस पोस्ट के बाद कई कट्टरपंथियों ने महूर का समर्थन किया। मगर, जिस फर्म के साथ वे काम करती थी, उसने बयान जारी कर कहा कि इस बयान का संस्थान से कोई लेना-देना नहीं है। परवेज सिर्फ़ उनके यहाँ इंटर्न के तौर पर काम कर रही थीं।