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262 साल पहले जब दुर्रानी साम्राज्य को धूल चटा पेशावर में फहराया था मराठाओं ने केसरी झंडा

मराठाओं ने कभी दुश्मन को पीठ नहीं दिखाया जब भी लड़े अपनी आन-बान-शान के लिए लड़े। ये मराठा ही थे जिन्होंने कभी अफगानिस्तान की सीमा तक अपने शौर्य का पताका फहराया था। आज ही के दिन 262 साल पहले यानी 8 मई 1758 को मराठाओं ने लड़ा था पेशावर का युद्ध जिसमें मराठों ने दुर्रानी साम्राज्य को पराजित कर वर्तमान पाकिस्तान के पेशावर में अपना कब्जा जमाया था।

पेशावर के युद्ध से इससे पहले अधिकांश मध्य और पूर्वी भारत भी उनके ही नियंत्रण में था। लेकिन इस विजय के बाद उनका साम्राज्य ‘अटोक से कटक’ तक फैल गया था।

पुणे की सीमा से लगभग 2000 किलोमीटर दूर हासिल पेशावर के इस युद्ध में हासिल विजय ने मराठाओं के कीर्ति को दूर तक पहुँचाने में बहुत बड़ा योगदान दिया था। इस बड़ी जीत को अपने नाम करने से मात्र दस दिन पहले (28 अप्रैल 1758) मराठाओं ने अटोक का युद्ध जीतकर वहाँ भी केसरी झंडा फहरा दिया था।

अटोक पर जीत मराठाओं के साम्राज्य विस्तार के लिए महत्तवपूर्ण पल था। मगर, बावजूद इसके अफगानिस्तान की सीमा पर बजे विजयनाद ने मराठाओं के यश को कोने-कोने तक फैला दिया।

यूँ तो इस युद्ध में लड़ने वाले हर मराठा योद्धा ने अपने अदम्य साहस और शौर्य का परिचय दिया था। लेकिन उनका नेतृत्व करने वाले नानासाहेब पेशवा के छोटे भाई रघुनाथराव और मल्हारराव होल्कर का नाम इस जीत के साथ ही इतिहास के पन्नो में अमर हो गया। इस दौरान इरान के शाह ने भी दुर्रानी साम्राज्य को कुचलने के लिए रघुनाथराव का समर्थन किया था।

बात शुरू होती है 1707 से, 1707 में औरंगजेब के मरने के बाद देश में मराठाओं का विस्तार हो रहा था। इनमें मराठाओं के पाँच बड़े राजवंश थे। पुणे के पेशवा, नागपुर के भोसले, बड़ौदा के गायकवाड़, इंदौर के होल्कर और उज्जैन के सिंधिया।

1526 में बाबर के हमले के भारत में करीब 200 साल बाहर से हमला नहीं हुआ। लेकिन 1738-1739 में नादिर शाह के बाद ये सिलसिला दोबारा शुरू हुआ। लेकिन, 1747 में नादिर शाह की मृत्यु के बाद उसका एक सेनापति अहमद शाह अब्दाली सामने आया। जिसने नादिर की मौत होते ही अपना दुर्रानी नाम से अलग साम्राज्य बना लिया। और यही से अस्तित्व में आया अफगानिस्तान। 

आज जैसे भारत में महात्मा गाँधी को भारत में राष्ट्रपिता की उपाधि हासिल है और लोग उन्हें प्यार से बापू बुलाते हैं। वैसे ही कहा जाता है कि अफगानिस्तान में राष्ट्रपिता की उपाधि अब्दाली को मिली है और लोग वहाँ उसके लिए शाह बाबा का इस्तेमाल करते हैं। हम समझ सकते हैं अफगानियों के लिए वे क्या शख्शियत रहा होगा।

इसके बावजूद अपना साम्राज्य बनाने के अब्दाली की नीति भारत के लिए बिलकुल वैसी ही थी, जैसे महमूद गजनी की थी। यानी लूटकर अपने देश का खजाना भरना और दूसरे इलाकों पर कब्जा करना।

अब्दाली ने दिल्ली पर सबसे पहला हमला 1748 में किया था। लेकिन दिल्ली पहुँच नहीं पाया और बीच में ही हार का मुँह देखकर वापस लौट गया। पर यहाँ उसके इरादे पस्त नहीं हुए। वे हमले करता रहा, 1749 में उसने दूसरा आक्रमण किया, 1751 में तीसरा, 1752 में चौथा।

इस बीच में पाकिस्तान में वह मुल्तान और लाहौर को मुगलों से छीन चुका था। जिसके कारण मुगल घबरा गए और उन्होंने 1752 में मराठाओं से अहमदिया संधि की। जिसके बाद सतलज के दक्षिण में मराठाओं का दबदबा बढ़ गया और उनपर वहाँ कोई बड़ी चुनौती शेष नहीं थी। पर मराठाओं की नजर पंजाब पर थी और अफगान के निशाने पर भी वही था। ऐसे में दोनों के बीच में देर-सवेर पंजाब को लेकर झगड़े शुरु हो गए और आगे जाकर इन्हीं झगड़ों ने बड़ा रूप लिया।

जब 1758 में पेशावर का युद्ध हुआ। उस समय पेशावर के किला तैमूर शाह दुर्रानी और जहान खान रहते थे। मगर मराठाओं की सेना से हारने के बाद वे वहाँ से भाग खड़े हुए और अफगानिस्तान चले गए। परिणामस्वरूप पंजाब, उत्तर-पश्चिम सीमा प्रांत और कश्मीर में, मराठा यहाँ प्रमुख खिलाड़ी बने।

इसके बाद मराठा सेना के मुख्य सेनापति मल्हार राव होल्कर पेशावर में 3 महीने तक रहे जिसके बाद उन्होंने तुकोजी राव होल्कर को 10 हजार मराठा सैनिकों के साथ अफगान से पेशावर के किले की रक्षा करने का जिम्मा सौंप दिया। मगर, शायद पेशावर के संरक्षण में इतनी सेना काफी नहीं थी क्योंकि दुर्रानी की सेना ने 1759 में दोबारा इसपर कब्जा कर लिया।

AMU में हिंदूफोबिया: अरब की तर्ज पर हिंदू छात्रों को बनाया जा रहा निशाना, दी जा रही जान से मारने की धमकी

अरब देशों की तरह अब अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (AMU) में हिंदू छात्रों को निशाना बनाया जा रहा है। कुछ कट्टरपंथी हिंदू छात्रों के सोशल मीडिया पोस्ट का स्क्रीनशॉट लेकर उन्हें जान से मारने की धमकी दे रहे हैं। इतना ही नहीं ऐसे छात्रों को अंदरखाने एएमयू से निष्कासित कराने की योजना बनाई जा रही है। अब जिला प्रशासन ने इस मामले में कार्रवाई शुरू कर दी है।

पीड़ित शोध छात्र निखिल माहेश्वरी ने ऑपइंडिया को बताया कि उन्होंने सोशल मीडिया पर 4 मई को एक व्यंगात्मक पोस्ट की थी। इसके बाद से ही कट्टरपंथी छात्रों ने उनको और उनके परिवार को निशाने पर ले लिया। उनके स्क्रीनशॉट लेकर सोशल मीडिया पर गाली-गलौच की और उनको तथा उनके परिवार को जान से मारने की धमकी दी।

सऊदी अरब में रहने वाले एएमयू के पूर्व छात्र आरिफ बॉबी ने तो धमकी भरे अंदाज में मैसेंजर पर एक संदेश भेज यहाँ तक कह दिया, “अबे कुछ तो यूनिवर्सिटी से सीखा होता या आरएसएस मानसिकता इतनी हावी हो गई है कि सब भूल गया। लॉकडाउन के बाद यूनिवर्सिटी आओ…।” इसके बाद एएमयू पीएचडी स्कॉलर निखिल माहेश्वरी ने सिविल थाने में मामला दर्ज कराया है साथ ही प्रशासन से मामले में कार्रवाई करने की माँग की है।

पीड़ित छात्र निखिल माहेश्वरी द्वारा सिविल लाइन थाने में की गई शिकायत की कॉपी

एएमयू में असिस्टेंट प्रोपेसर के पद पर तैनात एक हिंदू को भी कट्टरपंथी छात्रों नें निशाना बनाया। इसके बाद वह इतना डर गईं कि उन्हें दवाब में आकर यह कहना पड़ा कि मेरा एकाउंट हैक हो गया है। इतना ही नहीं उन्होंने अपना स्टेटमेंट देने से भी इनकार कर दिया और कुछ भी बोलने के लिए तैयार नहीं हुईं। इस बात से अंदाजा लगा सकते हैं कि एएमयू में हिंदू छात्रों को किस तरह से मानसिक प्रताड़ना दी जाती है।

आरोप है कि जिन छात्रों के खिलाफ सीएए, एनआरसी का विरोध करने पर जिला प्रशासन ने कानूनी कार्रवाई की थी, वहीं छात्र अब बदले की भावना से हिंदू छात्रों को निशाना बना रहे हैं। सोशल मीडिया पर राष्ट्र विरोधी गतिविधियों में शामिल लोगों और वामपंथियों की असलियत सामने लाने वाले लोग निशाने पर हैं। कट्टरपंथी ऐसे छात्रों को एएमयू से निष्कासित कराने पर तुले हुए हैं।

एएमयू के पूर्व छात्र निशित शर्मा ने ऑप इंडिया को बताया, “पहले भी एएमयू में हिंदू छात्रों को निशाना बनाया जाता रहा है। उनको प्रताड़ित किया जाता है। उससे आगे बढ़कर अब हिंदू छात्रों को जान से मारने की धमकी दी जा रही है। यह सब उन लोगों के इशारों पर किया जा रहा है, जिन लोगों ने सीएए, एनआरसी के नाम पर एएमयू के साथ अलीगढ़ में हिंसा फैलाई थी। इन लोगों के तार दिल्ली से भी जुड़े हुए हैं।”

उन्होंने बताया, “कुछ दिनों पहले इन लोगों ने अरब देशों में हिंदूफोबिया फैलाने का प्रयास किया। अब इसी काम को एएमयू के अंदर किया जा रहा है। इस मामले को मानव संसाधन विकास मंत्रालय के सामने रखा जाएगा। हम चाहते हैं इसकी एक उच्च स्तरीय जाँच हो, जिससे कि इस तरह का कृत्य करने वालों के चेहरे उजागर हो सकें।” शर्मा ने बताया कि ये मामला जिला प्रशासन के संज्ञान में है और पीड़ित छात्र निखिल माहेश्वरी द्वारा आरोपितों के खिलाफ संबंधित थाने में मामला दर्ज करा दिया गया है।

इस मामले को लेकर एएमयू के पूर्व छात्र राजेश्वर सिंह ने भी सोशल मीडिया पर अपना दर्द बयाँ करते हुए कहा है कि मैंने अपने जीवन के दस साल इसी विश्वविद्यालय में गुजारे हैं। इस दौरान हमने सभी के विचारों को सुना, लेकिन जब हमने अपने विचार व्यक्ति किए तो हमें गद्दार, नमक हराम और एहसानफरामोश बताया गया। आज हमारे साथियों को अपने विचार व्यक्त करने पर निशाने पर लिया जा रहा है।

आपको बता दें कि कुछ दिन पहले अरब देशों में काम कर रहे हिंदुओं को निशाना बनाते हुए AMU के पूर्व छात्रों ने उनके ख़िलाफ़ अपनी कुँठा व्यक्त करने के लिए अपनी टाइमलाइन पर उन्हें संघी करार दिया था और ये भी कह रखा है कि अरब में अभी सिर्फ़ चार लोग एक्टिव हुए हैं और संघी बाप सावरकर की तरह माफी वीडियो डाल रहे हैं। इसे लेकर भी निशित शर्मा ने जिला प्रशासन को लिखित में शिकायत देकर मामले से अवगत कराया था और ऐसे छात्रों के खिलाफ कार्रवाई की भी माँग की थी।

बुरहान गैंग का ‘डॉक्टर’ ले सकता है रियाज नाइकू की जगह, कश्मीर में हिजबुल कमांडर बनाए जाने के चर्चे

रियाज नाइकू के मार गिराए जाने के बाद कश्मीर में आतंकी संगठन हिजबुल के नए कमांडर के नाम पर चर्चा होने लगी है। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक डॉक्टर सैफुल्ला (Dr Saifullah) उर्फ अबु मुसैद उसकी जगह ले सकता है। जुनैद सहराई के नाम की भी चर्चा है।

डॉक्टर सैफुल्ला बुरहान वानी के 12 आतंकियों के समूह का हिस्सा रह चुका है। वह पुलवामा के मलंगपोरा का रहने वाला। सूत्रों के अनुसार सैफुल्ला मेडिकल असिस्टेंट रह चुका है। मुठभेड़ में घायल आतंकियों का इलाज कर उसने अपनी जगह बनाई है। पुलवामा, त्राल, काकापोरा और कुलगाम में आतंकवादियों का गाइड भी वह रह चुका है।

खुफ़िया सूत्रों के मुताबिक डॉक्टर सैफुल्ला वर्ष 2014 से आतंकी गतिविधियों में सक्रिय है। सैफुल्ला पर सुरक्षा एजेंसियों ने 10 लाख का इनाम घोषित कर रखा है। दो दर्जन नागरिक हत्याओं के अलावा सुरक्षाबलों पर हमले की वारदातों को लेकर पुलिस उसे तलाश रही है।

मोस्टवांटेड आतंकियों की सूची में शामिल सैफुल्ला के रियाज नाइकू की जगह लेने की ज्यादा चर्चे हैं। दूसरा दावेदार जुनैद सहराई 2018 हुर्रियत की जिलानी गुट का मुखिया है। वह 2018 में इस आतंकी संगठन से जुड़ा था।

जुनैद श्रीनगर और उससे सटे इलाकों में में सक्रिय है। उसने कश्मीर विश्वविद्यालय से एमबीए की डिग्री ले रखी है। युवा लड़कों को आतंकवाद में शामिल होने के लिए वह प्रेरित करता रहता है। उसके पिता अशरफ सहराई जमीयत-ए-इस्लामी के कट्टर समर्थक बताए जाते हैं। साथ ही अलगाववादियों से भी उनके अच्छे ताल्लुकात हैं।

बता दें कि हिज़बुल मुजाहिदीन के पोस्टर बॉय बुरहान वानी के मारे जाने के बाद रियाज़ नाइकू घाटी में आतंक का चेहरा बना था। सद्दाम पोद्दार के मारे जाने बाद उसे कमांडर बनाया गया। करीब पौने तीन साल तक उसने दक्षिण कश्मीर में हिज्ब की कमान सॅंभाली। उसे सुरक्षा बलों ने बुधवार (6 मई, 2020) को मार गिराया था। उसने अपनी सुरक्षा के लिए जो सुरंग बना रखी थी वही उसका कब्र बन गया।

जम्मू-कश्मीर पुलिस के कश्मीर रेंज के महानिदेशक विजय कुमार ने गुरुवार को बताया था कि पिछले कुछ समय में नायकू सहित 64 आतंकी 27 अलग-अलग अभियानों में घाटी में मार गिराए गए हैं। 25 आतंकी गिरफ्तार भी किए गए हैं। उन्होंने बताया कि नायकू की तलाश पिछले छह महीनों से की जा रही थी।

शेखर ‘कूप्ता’ के ‘द प्रिंट’ का नया धमाका: अपने ही हेडलाइन का किया फैक्टचेक, वो भी उसी लेख में!

अतुल्य गंगा नाम की संस्था राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन को एक प्रस्ताव भेजती है, जिसमें इस बात की जाँच की माँग की गई है कि क्या गंगा जल द्वारा कोरोना वायरस संक्रमितों का इलाज किया जा सकता है? लेकिन शेखर गुप्ता के द प्रिंट ने वास्तविकता जानते हुए भी अपने एजेंडे के तहत इसे ट्वीस्ट देना बेहतर समझा।

अतुल्य गंगा के इस प्रस्ताव को राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन द्वारा इंडियन मेडिकल रिसर्च काउंसिल (ICMR) को आगे बढ़ाया जाता है। इसके बाद आईसीएमआर में अनुसंधान प्रस्तावों का मूल्याँकन करने वाली समिति देखती है कि इस बारे में वर्तमान समय तक उपलब्ध आँकड़े इतने पुख्ता और पर्याप्त नहीं हैं।

इस कारण कोरोना वायरस संक्रमण के इलाज के लिए विभिन्न स्रोतों और उद्गमों से गंगाजल पर क्लिनिकल अनुसंधान अभी नहीं किया जा सकता, और इस प्रस्ताव को यहीं पर रोक दिया गया। आईसीएमार, NGO आदि का काम यहाँ पर समाप्त हो जाता है।

आईसीएमआर और अतुल्य भारत संस्था के बीच मोदी सरकार कैसे आ गई?

यहाँ से काम शुरू होता है ‘जमात-ए-पत्रकारिता‘ के सरगना शेखर गुप्ता के ‘The Print’ और लिबरल मीडिया गिरोह का। ‘द प्रिंट’ इस खबर को फैक्ट चेक का नाम तो देता ही है, साथ में इस पूरे प्रस्ताव को मोदी सरकार के नाम बताकर अपने चिर-परिचित हिन्दू-घृणा के नैरेटिव में ढाल देता है।

अपने रिपोर्टर्स की खामियों पर ध्यान देने के बजाए शेखर गुप्ता ने इसे अपने प्रोपेगेंडा की प्रतिभा का इस्तेमाल करते हुए इसमें चुपके से और बेहद शातिराना तरीके से मोदी सरकार के नाम कर दिया।

शेखर गुप्ता का ‘The Print’ इस पूरी घटना को एक हेडलाइन, जो की हर तरह से झूठी और सामान्य ज्ञान की कमी का उदाहरण है, में लिखता है- “क्या गंगाजल कोरोना वायरस को ठीक कर सकता है? मोदी सरकार जानना चाहती है, आईसीएमआर ने ना कहा!”

“गंगा जल पर रिसर्च में आईसीएमआर की रुचि नहीं, पीएमओ और जलशक्ति मंत्रालय का प्रस्ताव खामोशी से खारिज”

प्रशांत भूषण ने दी प्रिंट के इस कारनामे का फायदा उठाते हुए तुरंत इस रिपोर्ट को ट्वीट करते हुए लिखा:

“ICMR ने नरेंद्र मोदी सरकार के उस ‘अनुरोध’ को ठुकरा दिया, जिसमें कहा गया था कि गंगाजल संभवतः COVID-19 को ठीक कर सकता है। गौमूत्र, गो-कोरोना-गो का जप, थालियों को पीटना, मोमबत्तियाँ जलाने के बाद अब कोरोना के इलाज के लिए गंगाजल की बारी है! काफ़ी प्रतिभाशाली!”

यदि द प्रिंट की हेडलाइन देखें तो शेखर गुप्ता ने मोदी सरकार और गंगाजल का प्रयोग किया है, जबकि इस प्रस्ताव के पीछे स्पष्ट रूप से कुछ एक्टिविस्ट्स और NGO हैं।

यह भी ज्ञात होना चाहिए कि यह प्रस्ताव राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन को भी अतुल्य गंगा नाम की आर्मी वेटरेन्ज की संस्था ने भेजा था, जिसे राष्ट्रीय गंगा मिशन ने आईसीएमआर को बढ़ा दिया। अतुल्य गंगा ने राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन को एक पत्र लिखा था, जिसमें कहा गया था कि गंगा के ऊपरी सतह के पानी में पाए जाने वाले बैक्टीरियोफेजेस में बैक्टेरिया के खिलाफ लड़ने की क्षमता है।

सरकार ने महज उनके प्रस्ताव को उस एजेंसी तक पहुँचाने का काम किया है, जिसके पास ऐसे दावों की पुष्टि या खंडन का विशेषाधिकार भी है और जानकारी भी।

द प्रिंट की यह हेडलाइन धूर्तता का उदाहरण है, जहाँ मोदी और हिन्दू-घृणा से सने लोगों के पूर्वग्रहों को हवा देने के लिए इस तरह की बेहूदगी आम हो चली है।

जब इस तथाकथित रिपोर्ट में भीतर लिखा हुआ है कि यह प्रस्ताव कुछ लोगों ने निजी स्तर पर दिया, तो इस में हेडलाइन के जरिए सनसनी फैला कर वैश्विक महामारी के समय क्या सरकार को मूर्खों की तरह गंगाजल पर रीसर्च करने वाला दिखाना धूर्तता नहीं है?

शेखर गुप्ता जैसे लोग इस तरह की ‘क्लिकबेट साहित्य’ के जरिए प्रशांत भूषण जैसे लोगों को ही खुश करने का काम कर रहे होते हैं। नेहरु के नमक में डूबे कॉन्ग्रेस के ये प्रोपेगेंडा-मंत्री’ अच्छी तरह से जानते हैं कि सत्ता और हिंदुत्व-विरोध से भरा हुआ उनका पाठक वर्ग मात्र एक ऐसी ही किसी सनसनीखेज हेडलाइन के इन्तजार में बैठा होता है।

शेखर गुप्ता जानते हैं कि उनका पाठक उनके ‘आसमानी दावों’ को ही बुनियाद बनाकर ‘फेसबुक साहित्य’ लिख सके। पत्रकारिता के मूल्यों की यह कितनी बड़ी हानि है कि यही फेसबुक साहित्यकार आगे चलकर शेखर गुप्ता बन जाते हैं

ये वही लोग हैं, जिन्हें जनता कर्फ्यू के दिन डॉक्टर्स और सफाईकर्मियों के उत्साहवर्धन में बजाए गए शंख, थाली और घंटियों ने हृदयाघात देने का काम किया था।

यह इस बात का एक बड़ा उदाहरण है कि ऐसे ही कॉन्ग्रेस शासित-पत्रकारों ने सदियों तक लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ कहे जाने वाले मीडिया के बड़े पदों पर आसीन रहकर अपनी कुत्सित मानसिकता से समाज को सींचने का कितना व्यापक काम किया होगा?

राजस्थान में कोरोना से जंग में मुस्लिम तुष्टिकरण हावी, ‘भीलवाड़ा मॉडल’ ​को कसीदे पढ़ने वाले ही भूले

आज से महीने भर पहले राजस्थान से लेकर दिल्ली तक सबकी जुबान पर कोरोना से लड़ने के लिए राजस्थान के भीलवाड़ा मॉडल की सफलता के चर्चे थे। लेकिन पिछले कुछ सप्ताह से, जब से जयपुर के रामगंज और जोधपुर का नागौरी गेट, अजमेर का दरगाह बाजार क्षेत्र और कोटा का घंटाघर कोरोना वायरस का एपिसेंटर बना है, सियासत के लोग भीलवाड़ा मॉडल की चर्चा करना भूल गए हैं।

प्रशासन सोच नहीं पा रहा है कि आखिर इन क्षेत्रों में कौन सा मॉडल लागू किया जाए, कि कोरोना संक्रमण की बढ़ती संख्या को नियंत्रण में लाया जा सके।

विपक्षी दल के स्थानीय और केंद्रीय स्तर के नेता लगातार अशोक गहलोत सरकार पर तुष्टिकरण के आरोप लगा रहे हैं। राज्यपाल से हस्तक्षेप करने का आग्रह कर रहे हैं। वे सभी जोर देकर कह रहे हैं कि इन क्षेत्रों में कोरोना वायरस का संक्रमण रोकना है तो सख्ती से लॉकडाउन का पालन करवाएँ।

केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने पिछले दिनों पत्रकारों से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से बातचीत में गहलोत सरकार पर सीधे आरोप लगाए कि गहलोत राजनैतिक मजबूरियों को छोड़े और जयपुर तथा जोधपुर में पूर्णबंदी का सख्ती से पालन करवाएँ। उन्होंने यहाँ तक कहा कि इसके लिए जरूरत पड़ने पर केंद्रीय रिजर्व बल लगाए जाएँ। लेकिन क्या यह संभव है….?

भीलवाड़ा मॉडल का श्रेय लेने के लिए तो मुख्यमंत्री से लेकर पार्टी अध्यक्षा और शीर्ष पदाधिकारियों ने ट्विटर से लेकर पत्रकार वार्ताओं में खूब बातें की, लेकिन जब से जयपुर, जोधपुर, कोटा और अजमेर में विशेष क्षेत्रों में जिस तेजी से कोरोना संक्रमण का प्रसार हुआ, उसके बाद सरकार और स्थानीय प्रशासन के हाथ-पॉंव फूल रहे हैं। उन्हें भीलवाड़ा मॉडल कहीं दिखाई नहीं दे रहा है।

लेकिन इसका नतीजा यह हो रहा है कि राजस्थान में अब तक (6 मई 2020) आए कुल 3317 मामलों में से लगभग 75 फीसदी से ज्यादा संक्रमित व्यक्ति एक ही समुदाय से हैं।

26 मार्च तक जयपुर में कोरोना वायरस का एक मामला था। ओमान से आए एक व्यक्ति की गैर जिम्मेदाराना व्यवहार ने पूरे जयपुर को एक महीने पीछे धकेल दिया है। जयपुर रेड जोन में है। लगभग पूरा जयपुर शहर गैर जिम्मेदार लोगों की लापरवाही को भुगत रहा है। शहर खामोश है। सड़कें सूनी हैं। ज्यादातर क्षेत्रों में कर्फ्यू जैसे हालात हैं। और यह होना ही था।

कर्फ्यू और लगातार कथित निगरानी के बावजूद जयपुर में संक्रमण बढ़ते गए और यह देश के उन शहरों में शामिल हो गया जहाँ संक्रमण के सर्वाधिक मामले हैं। सात मई शाम तक जयपुर में 1100 से ज्यादा सक्रिय मामले थे। इनमें भी नब्बे प्रतिशत से ज्यादा संक्रमित व्यक्ति एक ही समुदाय से हैं।

यही स्थिति जोधपुर की है। यहाँ शहर के परकोटे के भीतर नागौरी गेट, उदयमंदिर, जालोरी गेट और खांडा पलसा क्षेत्र में कोरोना के खतरनाक संक्रमण के कारण कर्फ्यू लगाया गया है। ये सभी क्षेत्र मुस्लिम बाहुल्य हैं और जनसंख्या के लिहाज से बहुत घने हैं। जोधपुर में कोरोना संक्रमण का प्रसार जमात के लोगों से शुरू हुआ और आज जोधपुर प्रदेश का दूसरा ऐसा जिला है, जहाँ सबसे ज्यादा कोरोना के मरीज हैं।

इन सभी क्षेत्रों में कर्फ्यू के बावजूद कोरोना संक्रमण बढ़ रहा है। यह खुद मुख्यमंत्री का क्षेत्र है। लेकिन स्थानीय लोग दबी जुबान में कहते हैं कि प्रशासन अगर सख्ती नहीं बरतेगा तो पूरा जोधपुर शहर मौत के मुहाने पर पहुँच जाएगा। लेकिन प्रशासन सियासत की और सियासत तुष्टिकरण की सीमा रेखा में बँधा है।

अजमेर और कोटा भी तुष्टिकरण की नीति का कोरोना फल साबित हो रहा है। कोरोना संक्रमण के दौर के काफी दिनों बाद अजमेर का नंबर आया। भीलवाड़ा के कर्फ्यू के माहौल में से कुछ व्यवस्था कर निकला एक सेल्समैन नावेद ने अजमेर को कोरोना भेंट किया। वह पहले अजमेर पहुँचा और अपने परिवार के पाँच लोगों को कोरोना भेंट किया।

कोरोना की यह भेंट अजमेर का दरगाह बाजार, केसरगंज, मुस्लिम मोची मोहल्ला और दरगाह बाजार के आसपास की कॉलोनियों, बाजारों में बँटती गई। फिर कर्फ्यू के बावजूद मेल-मिलाप से इन क्षेत्रों में कोरोना ने जमकर लुत्फ उठाया। प्रशासन ने कर्फ्यू ठोका। लेकिन हालात वही ढाक के तीन पात।

कर्फ्यू के बावजूद कोरोना संक्रमण के मरीज बढ़ रहे हैं। अप्रैल के पहले हफ्ते में यहाँ तीस से चालीस केस थे, जो अब बढ़कर 187 हो गए हैं। इनमें 90 फीसदी से ज्यादा मरीज एक ही समुदाय से हैं।

आइए अब कोरोना संक्रमण से सबसे ज्यादा प्रभावित कोटा चलते हैं। कोरोना संक्रमण और उसे रोकने के उपाय पूरे राजस्थान में एक ही ट्रेंड पर चल रहे हैं। कोटा इससे अलग कैसे हो सकता है। यहाँ भी कोरोना का संक्रमण लेकर आने वाला पहला व्यक्ति जयपुर जमात से जुड़ा एक ड्राइवर था। फिर क्या… शहर के परकोटे के भीतर घंटाघर, मकबरा, पाटनपोल, कैथुनीपोल जैसे मुस्लिम क्षेत्रों में कोरोना मेहमान बनकर बैठ गया।

प्रशासन और सरकार की अपीलों को एक तरफ रख मेल-मिलाप चलता रहा। 5-6 अप्रैल को आए पहले केस के बाद कोटा में अब तक (सात मई 2020) 223 मामले आ चुके हैं। इनमें भी नब्बे फीसदी मामले एक ही समुदाय से हैं। अप्रैल के शुरू में एक दिन ऐसा भी था जब कोटा कलेक्टर ने प्रेस वार्ता में घोषणा कर दी थी कि जिला पूरी तरह कोरोना मुक्त है। लेकिन उसके तीसरे चौथे दिन ही एक साथ पाँच मामले सामने आ गए।

इन चारों प्रमुख शहरों में आखिरकार भीलवाड़ा मॉडल अपनी रफ्तार क्यों नहीं पकड़ पाया। उसने इन शहरों में क्यों दम तोड़ दिया। प्रशासन, सरकार, चिकित्साकर्मी, पुलिसकर्मी, स्वच्छताकर्मी सभी तो वहीं हैं। फिर…?

दो वजह हैं, जो साफ-साफ नजर आती हैं। लेकिन संभव है सियासत जानबूझकर आँखें मूँदे हुए है। भीलवाड़ा की आबादी का मूल स्वरूप और इन क्षेत्रों की आबादी के मूल स्वरूप और सियासती तुष्टिकरण के रंग में गहरा फर्क है। अगर भीलवाड़ा मॉडल यहाँ दम तोड़ रहा है तो उसका कारण स्पष्ट है। इन क्षेत्रों की आबादी का मूल स्वरूप, उनका गैरजिम्मेदाराना व्यवहार और सियासत की तुष्टिकरण की मजबूरी।

इन चारों ही शहरों के स्थानीय पत्रकार मानते हैं कि समुदाय विशेष के क्षेत्र होने की वजह से सरकार लॉकडाउन और कर्फ्यू का सख्ती से पालन करवाने में पूरी तरह विफल रही है। राजस्थान में विपक्षी पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष से लेकर पार्टी के स्थानीय और केंद्रीय नेता भी गहलोत सरकार से कोरोना नियंत्रण के लिए तुष्टिकरण की नीति को छोड़कर सख्ती से लॉकडाउन की पालना के लिए कह चुके हैं। लेकिन सरकार का कहना है कि वह लॉकडाउन की पालना में न धर्म देखती है और न जाति।

कितनी अच्छी बात है। लेकिन सवाल खड़ा होता है, फिर क्यों इन चारों शहरों में भीलवाड़ा मॉडल की साँसे फूल रही हैं? क्यों वह तुष्टिकरण की सीमा रेखा को लाँघने की हिम्मत नहीं दिखा पा रहा है?

तुष्टिकरण भारत की राजनीति के लिए कोई चीज नहीं है। हाँ, इसके प्रकटन का समय अलग-अलग होता है। यह प्रकटन इस दौर में राजस्थान में हो रहा है। इसलिए कोरोना जैसी महामारी से लड़ने के दौरान जब प्रशासन पर सियासत हावी हो और सियासत के गले में तुष्टिकरण की माला पड़ी हो तो फिर चाहे भीलवाड़ा मॉडल हो या वुहान मॉडल, वह लफ्फाजियों में ही दम तोड़ देता है।

क्यों वायरल हो रही है इस सब्जीवाले की तस्वीर, आखिर ऐसा क्या है खास?

माइक्रोब्लॉगिंग साइट ट्विटर पर एक सब्जीवाले रहे युवक की तस्वीर खूब शेयर की जा रही है। वायरल तस्वीर में ख़ास बात यह है कि सब्जी बेच रहे युवक ने खुद मास्क पहन रखा है और सब्जी के ठेले पर हैंड सैनीटाइजर की बोतल लटकी हुई है।

सहारा न्यूज़ नेटवर्क के सीईओ उपेन्द्र राय ने सब्जीवाले की यह वायरल तस्वीर शेयर करते हुए लिखा है – “किताबें फ़ैसला नहीं कर सकतीं, कौन पढ़ा-लिखा है और कौन अनपढ़। मैंने किताबों के बिना विद्वान और ज्ञानों के साथ जाहिल देखें है।”

वास्तव में, यह तस्वीर इस कारण सबकी प्रशंसा का कारण बन गई है क्योंकि कोरोना वायरस की महामारी के दौरान एक बड़े वर्ग द्वारा सरकार, शासन-प्रशासन और व्यवस्थाओं का उपहास बनाकर उन्हें बिगाड़ने का प्रयास किया गया है।

मास्क न पहनने पर कई लोगों पर दंडस्वरूप फाइन भी लगा है। इसमें पढ़े-लिखे और समृद्ध लोग भी शामिल रहे हैं। ऐसे समय में इस सब्जी वाले ने एक मिसाल कायम की है।

ऐसा नहीं है कि डॉक्टर्स की टीम पर पथराव, हमला और पुलिसकर्मियों के साथ सिर्फ मुस्लिमों ने ही बदसलूकी की हो! बल्कि, लिबरल गिरोह ने भी अपनी ओर से वैचारिक-उपद्रव जारी रखकर समस्या को बढ़ाने में अपना हर सम्भव योगदान किया है।

थूकते मुस्लिम

पिछले कुछ महीनों में पुलिसकर्मियों के लिए सबसे बड़ा सरदर्द हर जगह थूककर कोरोना वायरस के संक्रमण बढ़ाने का प्रयास करते मुस्लिम बने रहे। थूकते मुस्लिमों की वकालत के लिए मीडिया में बैठे पत्रकार-गिरोह ने भी उनकी इन हरकतों का दोष भी सरकार पर डालना चाहा।

तबलीगी जमात

तबलीगी जमातियों का उपद्रव अभी तक भी एक बड़ा मुद्दा बना हुआ है। सैनीटाइजर्स और मास्क का इस्तेमाल तो दूर, ये लोग अभी तक मस्जिदों में छुपकर बैठे हुए हैं और कोरोना को अल्लाह का अजाब ही मानते हुए चल रहे हैं। मास्क लगाकर सब्जी बेच रहे इस युवक की इस तस्वीर पर लोग उसकी तारीफ और सरहाना करते हुए देखे जा सकते हैं।

एक ट्विटर यूजर ने लिखा है कि उसने हाथों में ग्लव्स भी पहन रखे हैं। काश दुनिया इससे कुछ सीख लेती। मुंबई में अभी तक लोग सोशल डिस्टेंस का पालन नहीं कर रहे हैं। वो इसे कब्रगाह बनाना चाहते हैं।

भारत में 56 हजार के पार पहुँची संक्रमितों की संख्या

गौरतलब है कि वर्तमान में देशभर में 37,916 लोग कोरोना वायरस से संक्रमित सक्रीय मरीज हैं जबकि 1886 लोगों की अब तक मौत हो चुकी है। अब तक देशभर में कोरोना वायरस से कुल 56,342* लोग संक्रमित हो चुके हैं।

पंजाब के नवाँशहर में एयरफोर्स का मिग-29 क्रैश, दोनों पायलट सुरक्षित

पंजाब के होशियारपुर के पास भारतीय वायुसेना का एक लड़ाकू विमान क्रैश हो गया है। मिली जानकारी के अनुसार राज्य के नवाँशहर में एयरफोर्स का मिग-29 विमान दुर्घटनाग्रस्त हुआ है। घटना लगभग सुबह करीब 11 बजे के आसपास की है। हालाँकि, इस घटना में यह अच्छी खबर रही है कि लड़ाकू विमान के पायलट सुरक्षित हैं।

इस हादसे से पहले ही दोनों पायलट सुरक्षित बाहर आ गए। विमान के दुर्घटनाग्रस्त होने को लेकर अभी कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है।

स्थानीय लोगों ने कहा कि उन्होंने हवा में उड़ते एक विमान में आग लगी देखी, और फिर उसके कुछ देर बाद लड़ाकू विमान एक खेत में जाकर गिर गया। बहरहाल घटना की जानकारी मिलते ही स्थानीय प्रशासन के साथ ही भारतीय वायुसेना के अफसर घटनास्थल पर पहुँच गए हैं ।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, सुबह 10.45 बजे रूटीन ट्रेनिंग मिशन के लिए उडान भरी थी। उड़ान के दौरान विमान में तकनीकी खराबी के चलते दिक्कत आई जिसे पायलट ने विमान को काबू करने की कोशिश की लेकिन जब विमान काबू से बाहर हो गया तो पायलट ने इजेक्ट किया और उन्हें हैलिकॉप्टर के जरिए रेस्क्यू किया गया। पहले भी मिग लड़ाकू विमान के क्रैश होने की खबरें आती रही हैं।

दिल्ली के जामा मस्जिद एरिया में तैनात 94 में से 75 बीएसएफ के जवान कोरोना पॉजिटिव

दिल्ली में कोरोना वायरस संक्रमण के मामले बेहद तेजी से बढ़ रहे हैं। कोविड-19 महामारी की चपेट में स्वास्थ्यकर्मियों के साथ-साथ सुरक्षाबलों के जवान भी आ रहे हैं। दिल्ली के जामा मस्जिद इलाके में दिल्ली पुलिस के साथ तैनात बीएसएफ की 126 बटालियन के 94 लोगों की जाँच कराई गई। जिनमे से 75 जवान कोरोना वायरस पॉजिटिव पाए गए हैं। यह आँकड़े तब सामने आए जब बीएसएफ ने नई दिल्ली में अपने दो कोरोना-पॉजिटिव कर्मियों की मौत और मुंबई में एक हेड कांस्टेबल की मौत की सूचना दी।

पिछले दो दिनों में अगर कोरोना के संक्रमितों की तुलना की जाए तो बीएसएफ के कोविड-19 की मौतों और सकारात्मक मामलों की संख्या ने सीआरपीएफ को पछाड़ दिया है। 7 मई को, बीएसएफ ने दो मौतों और 193 कोरोना पॉजिटिव कर्मियों की रिपोर्ट की थी, जिसमे से फिलहाल 2 अभी तक ठीक हो पाएँ हैं। वहीं सीआरपीएफ ने अब तक 162 कोरोना पॉजिटिव कर्मियों की रिपोर्ट की है, जिनमें से एक की मौत हो चुकी है।

गृह मंत्री अमित शाह ने दो बीएसएफ कर्मियों की मौत पर शोक जताया और ट्विटर के माध्यम से संदेश भी दिया।

डीजी, बीएसएफ एस एस देशवाल और सभी रैंकों के अफसरों ने भी बीएसएफ के कोरोना योद्धाओं की मृत्यु पर अपना शोक व्यक्त किया। बीएसएफ के प्रवक्ता ने कहा कि, “सीमाओं को सुरक्षित करने की चुनौतियों का सामना करते हुए, नागरिक प्रशासन के साथ काम करना और अन्य आवश्यक जिम्मेदारियों को निभाते हुए कल से 41 नए कोरोना पॉजिटिव मामले सामने आए हैं। जिसके बाद उन्हें और उनके संपर्क में आए लोगों को तुरंत क्वारंटाइन किया गया। साथ ही यह भी जानकारी दी कि अधिकतम लोगों के टेस्ट नेगेटिव आएँ हैं।

वहीं अगर आँकड़ो की बात करे तो अब तक दिल्ली में कुल 135 बीएसएफ कर्मियों का कोरोना टेस्ट पॉजिटिव आया है। त्रिपुरा में 54 और कोलकाता में 6 कर्मी कोरोना पॉजिटिव पाए गए हैं। इसके अलावा सीआरपीएफ में कुल संक्रमित कर्मियों की संख्या 162 थी, जिनमें से 1 की मौत हो चुकी है, 159 सक्रिय मामले हैं और 2 ठीक हो चुके हैं।

टैगोर जयंती पर बंगाल सरकार ने दिए ममता बनर्जी का लिखा ‘कोरोना गीत’ गाने के आदेश, BJP नेता नाराज

पश्चिम बंगाल में हुगली के भाजपा सांसद लॉकेट चटर्जी ने आरोप लगाया है कि TMC सुप्रीमों और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने उनके लिए नोबेल पुरस्कार विजेता रवींद्रनाथ टैगोर की जयंती की पूर्व संध्या पर ममता बनर्जी द्वारा लिखा गया ‘कोरोना वायरस जागरूकता गीत’ गाना अनिवार्य किया है।

लॉकेट चटर्जी ने एक ट्वीट में लिखा, “पश्चिम बंगाल पुलिस ने शहरों के अलग-अलग रिहायशी इलाके और हाउसिंग कॉम्प्लेक्स में अनिवार्य रूप से ममता बनर्जी के गीत बजाए जाने का आदेश जारी किया है। गुरुदेव को याद करने की जगह बंगाल सरकार लोगों पर मुख्यमंत्री को थोप रही है।”

इस आदेश में लिखा गया है कि यह गीत सुबह 9:00 बजे से 11.30 बजे के बीच भी बजाए जाने चाहिए। लॉकेट चटर्जी ने मई 05, 2020 को अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक द्वारा कथित रूप से बंगाल के सभी एसएसपी को एक पत्र साझा किया था, जिसमें उनसे उक्त आदेश के कार्यान्वयन को सुनिश्चित करने का आग्रह किया गया था।

उल्लेखनीय है कि ममता बनर्जी द्वारा लिखे गए कोरोना गीत को गाने का आदेश ऐसे समय में आया है जब पश्चिम बंगाल कोरोना वायरस महामारी की चपेट में सबसे ज्यादा नजर आ रहा है।

पश्चिम बंगाल सरकार को लिखे पत्र में केंद्रीय गृह मंत्रालय ने खुलासा किया है कि राज्य में कोरोनो वायरस की मृत्यु दर सबसे अधिक है।

एक ज्ञापन में, केंद्रीय गृह मंत्रालय ने यह भी बताया गया कि बंगाल में जनसंख्या के अनुपात में परीक्षण की बहुत कम दर और किसी राज्य के लिए सबसे अधिक 12.8% मृत्यु दर है।

अरबी मुस्लिमों की आँधी से काफिरों को मिटाने की चाह रखने वाला जफरुल इस्लाम दे रहा बुढ़ापे की दुहाई

राजद्रोह के आरोपित दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष जफरुल इस्लाम खान ने पुलिस की जाँच में शामिल होने के लिए असमर्थता जताई है। और इस असमर्थता के पीछे अपने बुढ़ापे का हवाला दिया है।

जब साइबर सेल की टीम बुधवार शाम को पूछताछ में शामिल होने के लिए इस्लाम को लेने गई तो वहाँ कुछ लोग इकट्ठे हो गए थे। इस कारण साइबर सेल की टीम वापस लौट आई थी।

दिल्ली पुलिस अधिकारियों के अनुसार जफरूल खान ने बुधवार (मई 06, 2020) शाम साइबर सेल को पत्र लिखकर अपनी असमर्थता का जिक्र किया है। जफरुल इस्लाम ने इस पत्र में लिखा है कि वह 72 वर्ष का सीनियर सिटीजन होने के साथ ही हार्ट पेशेंट है और उन्हें इसके अलावा भी कई अन्य बीमारियाँ हैं।

बिमारी और बुढ़ापे का हवाला देते हुए जफरुल ने कहा कि वह पूछताछ में सहयोग करने लिए पुलिस स्टेशन नहीं जा सकते। जफरुल इस्लाम ने यह भी कहा है कि वह अपने घर पर दिन के समय पूछताछ के लिए उपलब्ध हैं।

उल्लेखनीय है कि दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने अप्रैल 30, 2020 को सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए भड़काऊ बयान देने पर दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष जफरुल इस्लाम खान के खिलाफ राजद्रोह के तहत मामला दर्ज किया था।

दिल्ली पुलिस स्पेशल सेल के संयुक्त आयुक्त नीरज ठाकुर ने बताया था कि जफरुल इस्लाम के खिलाफ आईपीसी की धारा 124 ए और 153 ए के तहत FIR दर्ज की गई।

‘कट्टर हिन्दुओं सँभल जाओ, वरना अरबी मुस्लिमों की आँधी ले आएँगे हम’

जफरुल इस्लाम द्वारा दी गई बुढ़ापे की दलील सोशल मीडिया पर शेयर की जा रही है। इसके पीछे एक कारण यह भी है कि कुछ दिन पहले यही जफरुल इस्लाम ने कहा था कि कट्टर हिन्दू ये भूल गए थे कि अरबी मुस्लिमों की आँखों में भारतीय मुस्लिमों की साख काफ़ी ऊँची है।

बकौल ज़फरुल, भारत के मुस्लिमों ने इस्लाम के लिए जो किया है, उसे देखते हुए अरबी उन्हें सिर-आँखों पर रखते हैं। भारतीय मुस्लिम अरबी और इस्लामी अध्ययन में पारंगत हैं, दुनिया को दुनिया भर में इस्लामी संस्कृति और सभ्यता से जुड़ी विरासत में अहम योगदान दिया है।

ज़फरुल ने ‘काफिरों’ को चेताते हुए कहा था कि कट्टर हिन्दुओं को शुक्र मनाना चाहिए कि भारत के मुस्लिमों ने अरब जगत से कट्टर हिन्दुओं द्वारा हो रहे ‘घृणा के दुष्प्रचार, लिंचिंग और दंगों’ को लेकर कोई शिकायत नहीं की है और जिस दिन ऐसा हो जाएगा, उस दिन अरब के मुस्लिम एक आँधी लेकर आएँगे, एक तूफ़ान खड़ा कर देंगे।

ऐसी धमकियों के बाद अचानक से जफरुल इस्लाम के बुढ़ापे, दिल के साथ ही कई अन्य किस्म की बीमारियों के सामने आने के कारण उनकी बातें दोबारा सोशल मीडिया पर शेयर की जा रही हैं।