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शिक्षा के अधिकार की नींव रखने वाले गोपाल कृष्ण गोखले, जिन्होंने सदन से वाक आउट करना सिखाया

महात्मा गाँधी को देश लौटते ही उनके राजनीतिक गुरु गोपाल कृष्ण गोखले ने भारत को जानने के लिए उसकी तलाश करने की सलाह दी थी। यह सबक गाँधी जी ने अपने जीवन के अंतिम समय तक याद रखा और अपने हर अभियान से पहले भारत के कोने-कोने के लोगों तक पहुँचकर उनको एकजुट करने के प्रयास किए।

गोपाल कृष्ण गोखले का जन्म 1857 की क्रांति के नौ साल बाद मई 09, 1866 को रत्नागिरी जिले के कोटलुक गाँव में हुआ था। यह आज महाराष्ट्र राज्य का हिस्सा है।

गोखले के राजनीतिक दर्शन, उनकी विचारधारा का ही प्रभाव था कि महात्मा गाँधी ही नहीं बल्कि मोहम्मद अली जिन्ना ने भी उन्हें अपना राजनीतिक गुरु कहा था। हालाँकि, यह बात और है कि एक बेहद विनम्र और उदारवादी गोखले का शिष्य जिन्ना जहाँ अपने राजनीतिक जीवन के शुरूआती दौर में उदारवादी रहा, वही अंत में कट्टर इस्लामिक चरमपंथी बनकर उभरा।

भारतीय स्वतन्त्रता आन्दोलन में गोखले की भूमिका ऐसी है कि उन्होंने अंग्रेजी सत्ता के ही नीचे रहकर एक ऐसे भारत का निर्माण किया जो विवेकशील तो था ही, साथ ही उसके भीतर एक उन्नत भविष्य की नींव रखने का सपना भी पलता रहा।

भारत की उन्नति के लिए ब्रिटिश हुकूमत की जरूरत

स्वयं गोपाल कृष्ण गोखले का यह विचार था कि भारत जितनी तरक्की अंग्रेज़ी साम्राज्य में रहकर कर सकता है उतनी उसके बिना सम्भव नहीं। लेकिन इसका तात्पर्य यह नहीं था कि गोखले भारत से प्रेम नहीं करते थे। गोखले का मानना था कि भारतीयों को पहले शिक्षित होने की आवश्यकता है, तभी वह नागरिक के तौर पर अपना हक यानी आजादी हासिल कर पाएँगे। गोखले किसी भी राष्ट्र की तरक्की के लिए शिक्षा के महत्व को बखूबी समझते थे।

यह महज कोरी बातें नहीं थीं। गोखले ने शिक्षा और भारत के वैचारिक जागरण के लिए ऐसे कई प्रयास किए थे, जिनमें से प्रारंभिक शिक्षा को मूलभूत अधिकार बनाने का विचार सबसे प्रमुख है। उनकी ‘सर्वेंट्स ऑफ इंडिया सोसायटी’ ने शिक्षा के प्रसार के लिए स्कूल बनवाए। रात में पढ़ाई के लिए फ्री-क्लासें लीं और एक मोबाइल लाइब्रेरी की भी व्यवस्था की।

देश सेवा के लिए राष्ट्रीय प्रचारकों को तैयार करने के उद्देश्य से गोखले ने 12 जून 1905 को इसी ‘सर्वेंट्स ऑफ इंडिया सोसायटी’ यानी ‘भारत सेवक समिति’ की स्थापना की। इस संस्था से पैदा होने वाले महत्वपूर्ण समाज सेवकों में वी श्रीनिवास शास्त्री, जीके देवधर, एनएम जोशी, पंडित हृदय नारायण कुंजरू आदि थे।

शिक्षा का अधिकार कानून

गोखले ने अनिवार्य और मुफ्त शिक्षा का अपना फॉर्मूला वर्ष 1910 में ‘प्राथमिक शिक्षा बिल’ के रूप में रखा था। उस समय गोखले ने इसके पक्ष में ढेरों तर्क दिए लेकिन तमाम दलीलों के आगे एक सत्य भारी था कि जब औपनिवेशिक सरकार को इस तरह के किसी फैसले से कोई आर्थिक फायदा ही नहीं हो रहा था तो आखिर वो ऐसा क्यों करते?

यही कारण था कि उस समय यह बिल पास नहीं हो सका। लेकिन एक शताब्दी बाद यही बिल देश की जनता के सामने शिक्षा का अधिकार के रूप में आ सका। गोखले के दूरदर्शी व्यक्तित्व की झलक उसी एक बिल में नजर आती है। गोखले का वह कदम भारत में शिक्षा के अधिकार की नींव थी।

तिलक और गोखले

वास्तव में, गोखले उदारवादी होने के साथ-साथ सच्चे राष्ट्रवादी भी थे। लेकिन उग्र दल से कभी उनके विचार मेल नहीं बैठा पाए। यही वजह थी कि एक समय सहपाठी रहने वाले लोकमान्य बालगंगाधर तिलक के साथ उनके रास्ते स्वाधीनता की लड़ाई में बिछड़ने लगे। गोखले इतिहास के उस पल के साक्षी भी बने जब कॉन्ग्रेस में पहली बार वर्ष 1907 में जूते-चप्पल और लाठियाँ चलने के बाद विभाजन हुआ। यही वो समय भी था जिसके बाद लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक पर राजद्रोह का दूसरा चर्चित मुकदमा कायम हुआ।

राजनीतिक कारणों से विरोधी बने गोखले और तिलक के विरोध दुर्भाय्ग्वश गोखले की मृत्यु के बाद ही दूर हो सके। वैचारिक विरोधी और उग्र दल के नेता तिलक ने गोखले की मौत पर उनके सम्मान में जो कहा था, वह राजनीति के हर उस काल में एक सबक है, जब सत्ताएँ आपसी संघर्ष और विचारधारा के द्वन्द में पतनशील मार्ग को अपनाती हैं। बाल गंगाधर तिलक ने गोखले की चिता को देखते हुए कहा था कि ये भारत का रत्न सो रहा है और देशवासियों को जीवन में इनका अनुकरण करना चाहिए।

देखा जाए तो गोपाल कृष्ण गोखले को जिन कुछ कारणों के लिए हमेशा याद किया जाना चाहिए उनमें सबसे अहम हिंदू-मुस्लिम संबंध, दलितों के अधिकार, महिलाओं के अधिकारों का समर्थन, गुणवत्तापूर्ण और अनिवार्य शिक्षा की वकालत और राष्ट्र प्रेम की भावना।

गोखले हमेशा इस पक्ष में रहे कि अंग्रेजी हुकूमत को भारत की उन्नति के लिए इस्तेमाल किया जाना चाहिए और इसके लिए उन्होंने स्वाधीनता की लड़ाई से ज्यादा वैचारिक लड़ाई को महत्व दिया। उस दौर में गरम दल के लोग उन्हें ‘दुर्बल हृदय का उदारवादी एवं छिपा हुआ राजद्रोही’ तक कहा करते थे।

जबकि हकीकत यह थी कि गोखले ने भारत के लिए ‘काउंसिल ऑफ़ द सेक्रेटरी ऑफ़ स्टेट’ और ‘नाइटहुड’ की उपाधि ग्रहण करने से भी मना कर दिया था। कहा जाता है कि उन्होंने ऐसा निम्न जाति के हिन्दुओं की शिक्षा और रोज़गार में सुधार की माँग के लिए किया था।

गाँधी के गुरु होने के साथ ही गोखले खुद महादेव गोविंद रानाडे के शिष्य रहे। गोपाल कृष्ण गोखले को वित्तीय मामलों की अद्वितीय समझ और उस पर अधिकारपूर्वक बहस करने की क्षमता के कारण उन्हें ‘भारत का ग्लेडस्टोन’ कहा जाता है।

संसद से पहला ‘वाक आउट’

एक समय जब अंग्रेजों द्वारा किसानों से भूमि अधिकार छीनने के लिए बिल रखा गया और ब्रिटिश सरकार इसे बहुमत के बल पर पास करने पर भी अड़ी रही। इस बिल पर चर्चा के विरोध में फिरोजशाह मेहता और गोखले ने इस बिल की कड़ी आलोचना करते हुए सदन से वॉकआउट किया। यह इस प्रकार की पहली घटना थी। ऐसा उससे पहले कभी नहीं हुआ था। गोखले और उनके सहयोगियों के इस फैसले ने औपनिवेशिक ब्रिटिश सरकार की खूब फजीहत हुई थी, क्योंकि यह उनका प्रत्यक्ष तिरस्कार था।

भारतीय संसद में उनकी बहस और तर्क इतने प्रभावशाली होते थे कि एक समय ऐसा भी था जब बजट भाषण पर गोखले की आलोचना पढ़ने के लिए लोग ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ के मुंबई ऑफिस के बाहर लाइन लगाया करते थे। उस समय टाइम्स ऑफ़ इण्डिया का दफ्तर अंग्रेज अधिकारियों द्वारा ही चलाया जाता था।

वायसराय की काउंसिल में रहते हुए गोपाल कृष्ण गोखले ने किसानों की स्थिति की ओर अनेक बार ध्यान दिलाया। वे संवैधानिक सुधारों के लिए निरंतर ज़ोर देते रहे। ऐतिहासिक ‘मिंटो-मार्ले सुधारों’ का बहुत कुछ श्रेय गोखले के प्रत्यनों को जाता है।

नवम्बर 27, 1912 -विक्टोरिया गार्डन, जांजीबार में महात्मा गाँधी और गोखले

गोखले को डायबिटीज और कार्डिएक अस्थमा की शिकायत थी। व्यस्त जीवनशैली और तमाम बीमारियों के कारंगोपाल कृष्ण गोखले की मृत्यु बेहद अल्पायु में हो गई और फरवरी 19, 1915 को मात्र 49 साल की उम्र में उनका देहांत हो गया।

अहमदाबाद के शाहपुर में पुलिस पर पथराव, रेड जोन में रमजान के दौरान सड़क पर जमा हो गए थे लोग

गुजरात के अहमदाबाद का शाहपुर रेड जोन है। यहॉं रमजान के दौरान सड़क पर लोग जमा हो गए। पुलिस ने लॉकडाउन का हवाला दे रोकने की कोशिश की तो पथराव किया।

घटना शुक्रवार (मई 8, 2020) की है। बेकाबू भीड़ को तितर-बितर करने के लिए पुलिस को लाठीचार्ज और आँसू गैस का सहारा लेना पड़ा।

शाहपुर अड्डा इलाके में पथराव के बाद घटनास्थल पर वरिष्ठ अधिकारी भी पहुँचे। इलाके में अनियंत्रित भीड़ के पथराव से पुलिसकर्मियों की जान पर बन आई थी। इस घटना में पाँच पुलिसकर्मी घायल हो गए।

बता दें कि शाहपुर अल्पसंख्यक बहुल इलाका है और यहाँ से काफी सारे कोरोना पॉजिटिव मामले सामने आने के बाद इसे रेड जोन घोषित कर दिया गया है। इसके बावजूद शुक्रवार को नागोरीवाड क्षेत्र के लोग शाम में रमजान के लिए अपने घरों से बाहर निकलने लगे। ड्यूटी पर मौजूद पुलिस ने लोगों से लॉकडाउन का पालन करने को कहा। लोग नहीं माने और पुलिस पर पथराव करने लगे।

सिटी पुलिस कमिश्नर आशीष भाटिया ने रॉयटर्स से कहा कि पुलिस और अर्धसैनिक बलों ने जब लोगों ने लॉकडाउन का पालन करने के लिए कहा तो लोग काफी आक्रोशित हो गए और फोर्स पर पथराव करना शुरू कर दिया।

पुलिस उपायुक्त विजय पटेल ने भी घटना की पुष्टि करते हुए कहा कि 15 लोगों को हिरासत में ले लिया गया है। अब स्थिति पूरी तरह से नियंत्रण में है।

शाहपुर पुलिस स्टेशन प्रभारी आरके अमीन ने कहा कि हिरासत में लिए गए लोगों के खिलाफ लॉकडाउन के उल्लंघन के लिए धारा 188 और महामारी रोग अधिनियम के तहत मामला दर्ज किया गया है। पथराव में आरके अमीन भी जख्मी हुए हैं।

गौरतलब है कि अहमदाबाद म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन ने 15 मई तक दूध और दवा की दुकानों को छोड़कर सभी दुकानों को बंद करने का आदेश दिया है। यहाँ तक कि सब्जी, फल और किराने की दुकानों को भी बंद रखने का आदेश दिया गया है। शहर में लॉकडाउन का सख्ती से पालन कराया जाए, इसके लिए इलाके में पैरामिलिट्री फोर्स की भी तैनाती की गई है।

उल्लेखनीय है कि पिछले दिनों जब वडोदरा के नगरवाड़ा इलाके में कसम आला मस्जिद (Kasam Aala mosque) के नजदीक लॉकडाउन का पालन कराने गई थी, तो 50 लोगों ने पुलिस टीम पर हमला किया था।

राहुल गाँधी ने कोरोना हॉटस्पॉट पर बोला झूठ, राज्यों के इनपुट से तय होता है रेड, ग्रीन और ऑरेंज जोन

कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गॉंधी कोरोना हॉटस्पॉट को लेकर झूठ बोलते पकड़े गए हैं। उन्होंने रेड, ग्रीन और ऑरेंज जोन के निर्धारण को लेकर गुमराह करने की कोशिश की है। कोरोना संक्रमण के हिसाब से ये जोन तय किए गए हैं।

शुक्रवार (8मई, 2020) को वायनाड से सांसद राहुल गाँधी ने दावा किया कि कोरोनोवायरस प्रभावित क्षेत्रों का रेड जोन (जहॉं संक्रमण बेहद ज्यादा है), ऑरेंज और ग्रीन जोन (जहॉं संक्रमण का कोई मामला नहीं है) में वर्गीकरण राष्ट्रीय स्तर पर किया जा रहा है। उन्होंने जोर देकर कहा कि ये ज़ोन राज्य स्तर पर DM और CM की सलाह पर तय होने चाहिए। साथ ही कहा कि ज़ोन पर केंद्र सरकार एकतरफा निर्णय ले रही है।

राहुल गाँधी ने दावा किया कि कॉन्ग्रेस शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने उन्हें बताया है कि केंद्र ने कई ग्रीन जोन को रेड जोन और रेड को ग्रीन जोन घोषित कर रखा है।

भारत में 4 मई को 2 सप्ताह के लिए और लॉकडाउन को बढ़ाया गया था। विशिष्ट क्षेत्रों के अनुसार महत्वपूर्ण छूट दी गई थी। प्रेस नोट में कहा गया है कि गृह मंत्रालय ने इस अवधि में विभिन्न गतिविधियों को विनियमित करने के लिए नए दिशा-निर्देश जारी किए थे, जिनके अनुसार देश के विभिन्न जिलों को रेड (हॉटस्पॉट), ग्रीन और ऑरेंज ज़ोन के आधार पर छूट दिए गए हैं।

MHA के पत्र में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि ज़ोन जिलों के फीडबैक के अनुसार तय किए गए हैं। यह भी कहा गया कि वर्गीकरण के बारे में राज्य के अधिकारियों के साथ क्षेत्रों की साप्ताहिक समीक्षा भी की जाएगी।

आपको बता दें, जहाँ 1 भी संक्रिमत केस अभी तक नहीं आए है या फिर पिछले 21 दिनों से अगर किसी एरिया में संक्रमण की पुष्टि नहीं हुई है उन्हें ही ग्रीन जोन में रखा गया है। सर्कुलर में यह भी कहा गया है कि राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के साथ स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा रेड, ग्रीन और ऑरेंज ज़ोन के वर्गीकरण की हर हफ्ते समीक्षा की जाएगी। इसमें यह भी कहा गया है कि राज्यों को उनके मौजूदा हालातों को देखते हुए रेड और ऑरेंज ज़ोन में जोड़ा जा सकता है।

केंद्रीय गृहमंत्रालय का प्रेस नोट

इसके अलावा पीएम, गृह मंत्रालय और राज्यों के सीएम के बीच कई बैठकों के बाद लॉकडाउन और उसके बाद के कदम उठाए गए हैं। इसलिए यह दावा झूठ है कि सरकार के फैसले एकतरफा हैं।

यह स्पष्ट है कि रेड, ग्रीन और ऑरेंज जोन के सीमांकन का निर्णय केंद्र सरकार ने राज्य के अधिकारियों के परामर्श से लिया था। तात्पर्य यह है कि राज्य सरकार द्वारा इसके बारे में जानकारी दिए जाने के बाद ही किसी क्षेत्र को रेड जोन के रूप में चिह्नित किया गया है।

राहुल गाँधी के अनेकों झूठ

ये कोई पहली बार नहीं है, इससे पहले भी भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा बैंकों को धोखा देने वाले 50 विलफुल डिफॉल्टरों की सूची जारी करने के बाद राहुल गाँधी ने सत्तारूढ़ भाजपा पर हमला किया था। इन 50 डिफॉल्टरों में फरार मेहुल चौकसी और भगोड़े कारोबारी विजय माल्या की कंपनियाँ भी शामिल थीं।

घटना के बाद, वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कॉन्ग्रेस नेता राहुल गांधी को उनके झूठे दावों के साथ, “लोगों को गुमराह करने” का प्रयास बताते हुए उन्हें आइना भी दिखाया था।

राहुल गाँधी को पिछले साल सुप्रीम कोर्ट से भी माफी माँगनी पड़ी थी। उन्होंने आम चुनावों के दौरान राफेल पर मोदी सरकार को घेरने के लिए शीर्ष अदालत का हवाला देकर झूठ बोला था। डोकलाम गतिरोध, मोबाइल कारखानों से लेकर राफेल फाइटर जेट सौदे के लिए राहुल गाँधी हमेशा झूठ पर झूठ बोलते ही रहते हैं।

पाकिस्तान की 4 चौकियाँ तबाह, 4 सैनिक मारे गए: गोलाबारी का भारतीय सेना ने दिया मुँहतोड़ जवाब

पाकिस्तानी गोलाबारी का जवाब देते हुए भारतीय सेना ने उसकी चार चौकियॉं तबाह कर दी है। पाकिस्तान के चार सैनिकों के मारे जाने की भी खबर है। कई सैनिक जख्मी भी हुए हैं।

पाकिस्तान सेना ने शुक्रवार (मई 8, 2020) को पुंछ सेक्टर में सुबह से लेकर देर शाम तक भारतीय सेना की चौकियों और नागरिकों की बस्ती को निशाना बनाकर मोर्टार दागे।

पाकिस्तानी सेना की फायरिंग का भारतीय सेना ने मुँहतोड़ जवाब दिया। भारतीय सेना की जवाबी कार्रवाई में पाकिस्तानी सेना के 3 से 4 जवानों की मारे जाने और 5 जवानों के बुरी तरह घायल होने की खबर है। इस कार्रवाई में सेना ने 4 पाकिस्तानी चौकियों को भी नेस्तनाबूद कर दिया।

जवाबी कार्रवाई में पाकिस्तान की राजा, रानी, रिंगकटूर, बेगम आदि चौकियाँ तबाह हो गई हैं। इन चौकियों से धूल का गुबार और धुआँ उठता दिखने से वहाँ भारी नुकसान की पुष्टि होती है। इससे पाकिस्तान के होश उड़ गए हैं।

कोरोना काल में भी पाकिस्‍तान अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहा है। नियंत्रण रेखा पर लगातार पिछले कई दिनों से संघर्ष विराम का उल्‍लंघन करते हुए फायरिंग कर रहा है।

पाकिस्‍तानी सेना ने गुरुवार (मई 7, 2020) को भी पुंछ जिले के पाँच सेक्टरों की अग्रिम चौकियों और दो दर्जन गाँवों में गोलाबारी की थी। भारतीय सेना ने लगातार पाकिस्‍तानी फौज का मुँहतोड़ जवाब देना जारी रखा है।

पिछले दिनों जम्मू कश्मीर के हंदवाड़ा में सुरक्षा बलों और आतंकवादियों के बीच मुठभेड़ में दो विदेशी आतंकी मारे गए थे, जिसमें से एक पाकिस्तान का रहने वाला टॉप लश्कर आतंकी हैदर था।

इससे पहले हंदवाड़ा में ही एक ऑपरेशन के दौरान आतंकियों के साथ मुठभेड़ में कर्नल और मेजर समेत भारतीय सेना के पाँच जवान वीरगति को प्राप्त हो गए थे। इसके बाद सेना ने हिजबुल कमांडर आतंकी रियाज नायकू को मार गिराया था।

उल्लेखनीय है कि हिजबुल मुजाहिदीन के टॉप कमांडर रियाज ने अपने घर तक जाने-आने के लिए सुरंग बना रखी थी। इसकी जानकारी बहुत ही गिने-चुने लोगों को थी, क्योंकि वह किसी पर भरोसा नहीं करता था। सेना ने विस्फोटक से वह घर उड़ा दिया और जो सुरंग उसने जान बचाने के लिए खोदी थी, उसी में उसकी कब्र बन गई। 

ट्विटर पर 1200 मजदूरों का रेल भाड़ा देने का ऐलान, चिट्ठी भेज बिहार से माँगे पैसे: घिरी केजरीवाल सरकार

दिल्ली के मंत्री गोपाल राय ने ट्विटर पर ऐलान किया कि लॉकडाउन में फॅंसे 1200 मजदूरों को बिहार भेजने का रेल भाड़ा केजरीवाल सरकार देगी। अब एक पत्र सामने आया है जिसमें भाड़ा बिहार सरकार से मॉंगा गया है।

इस मामले ने दिल्ली से लेकर बिहार तक की सियासत गर्मा दी है। दिल्ली की अरविंद केजरीवाल सरकार पर बीजेपी और जदयू नेताओं ने गुमराह करने का आरोप लगाया है। उस पर कॉन्ग्रेस की ही तर्ज पर इस मामले का फायदा उठाने की कोशिश के आरोप लग रहे हैं।

दिल्ली की आम आदमी पार्टी सरकार ने यह भी आरोप लगाया है कि बिहार सरकार ने प्रवासी मजदूर के रेल का किराया देने से इनकार कर दिया है।

आम आदमी पार्टी ने अपने आधिकारिक ट्विटर हैंडल के जरिए मुजफ्फरपुर रवाना हुई ट्रेन का वीडियो पोस्ट करने के साथ लिखा कि बिहार सरकार ने 1200 प्रवासी मजदूरों के रेल का किराया देने से इनकार कर दिया है और अब पूरा खर्च अरविंद केजरीवाल सरकार वहन करेगी। इसे केजरीवाल ने अपने एकाउंट से शेयर भी किया है।

साथ ही, अरविंद केजरीवाल ने एक वीडियो में दावा किया है कि उनकी सरकार कोरोना वायरस महामारी के दौरान उत्तर प्रदेश और बिहार के लोगों के साथ खड़ी है।

जवाब में जेडीयू प्रवक्ता अजय आलोक ने उस चिट्ठी को ट्वीट किया है जो 6 मई को दिल्ली सरकार के नोडल अधिकारी पीके गुप्ता ने बिहार सरकार के आपदा प्रबंधन विभाग के प्रधान सचिव प्रत्यय अमृत को लिखी थी।

इस चिट्ठी में नोडल अधिकारी पीके गुप्ता ने लिखा है कि 1200 प्रवासी मजदूरों के दिल्ली से मुजफ्फरपुर यात्रा के लिए खर्चा, जो करीब ₹6.5 लाख होगा वह तत्काल दिल्ली सरकार वहन करेगी। बाद में इस खर्चे का भुगतान बिहार सरकार को दिल्ली सरकार को करना होगा।

अजय आलोक ने यह पत्र ट्वीट करते हुए अरविंद केजरीवाल से बिहार के लोगों का अपमान करने और झूठ बोलने के लिए माफ़ी माँगने को कहा है। JDU प्रवक्ता केजरीवाल द्वारा की जा रही राजनीति से बेहद नाराज भी हैं।

दिल्ली की अरविंद केजरीवाल सरकार द्वारा भेजे गए इस पत्र से यह भी स्पष्ट हो गया है कि वह कोरोना वायरस के कारण जारी देशव्यापी बन्द से फँसे बिहार के मजदूरों के बहाने अपने मीडिया मैनेजमेंट में जुटी हुई है।

एक ओर अरविंद केजरीवाल सरकार मीडिया में यह दावा कर रही है कि वह दिल्ली में फँसे मजदूरों का खर्च वहन कर रही है। जबकि वास्तविकता यह है कि अरविंद केजरीवाल सरकार ने बिहार सरकार से ₹6.5 लाख का खर्च अदा करने के लिए कहा था।

दिल्ली अरविंद केजरीवाल सरकार द्वारा बिहार सरकार को भेजा गया पत्र, जिसमें खर्च अदायगी की बात कही गई है –

‘तू भोजन कुत्ते की तरह चाट या मत खा’: हल्दीघाटी की एक अनसुनी कहानी में गद्दारों के लिए संदेश

भारत का इतिहास ऐसे जयचंदों से भरा पड़ा है, जिन्होंने अपने फ़ायदे की ख़ातिर देश को बेचने की कोशिश की, राष्ट्र को धोखा दिया और समाज को बदनाम किया। महाराणा प्रताप जब चित्तौरगढ़ की गद्दी पर आसीन थे और हल्दीघाटी में उनका मुग़लों के साथ एक भीषण युद्ध देखने को मिला, तब उनकी युद्ध कला पूरे भारत में विख्यात हुई और अकबर के ख़िलाफ़ तलवार उठाने के लिए इतिहास में उन्हें एक महान योद्धा के रूप में जाना गया। हालाँकि, महाराणा की युद्ध कला, सैन्य क्षमता, नेतृत्व गुण और बुद्धिबल की चर्चा तभी से थी, जब वो किशोरावस्था में थे। लेकिन, सिंहासन धारण करने के बाद उन्होंने इस सभी चीजों को वास्तविक जीवन में सफलतापूर्वक उतार कर दिखाया। महाराणा प्रताप के युद्धकला की चर्चा तो ख़ूब होती है और होनी भी चाहिए, लेकिन राष्ट्र और कुल को लेकर उनके क्या विचार थे, इस पर भी चर्चा आवश्यक है।

अकबर जब एक-एक कर भारत के बड़े भू-भाग को जीतता जा रहा था और उसकी बादशाहत पर कोई आँच नहीं था, ऐसे समय में महाराणा के उदय ने उसे भयाक्रांत कर दिया था। सुरभित जयमाला से सुसज्जित उसका वक्षस्थल और हीरों से जड़ित मुकुट तो उसकी पहचान होती ही थी, लेकिन उसके मन में एक डर समाया रहता था। यह एक देशभक्त द्वारा आज़ादी का बिगुल बजाने और चित्तौरगढ़ के किले पर ‘जय एकलिंग’ बोल कर भगवा ध्वज फहराने का डर था। यह एक ऐसा भय था, जो एक विदेशी आक्रांता को भारत की स्वदेशी ताक़त से लग रहा था। राणा की आज़ादी उसे काँटों की तरह चुभती थी। एक दिन उसने मानसिंह को बुला कर शोलापुर जीतने को कहा और पथ में राणा से मिल कर उसे भी समझाने को कहा। वह राणा को लालच देकर और भय दिखा कर अपने वश में करना चाहता था।

मानसिंह जैसे लोग ही थे, जिनके बल से अकबर शासन कर रहा था। उसके नवरत्नों में शामिल मानसिंह एक राजपुत योद्धा था और जोधाबाई का रिश्तेदार भी। अपने समाज, कुल और देश की उपेक्षा कर अकबर की उँगलियों पर नाचने वाले मानसिंह ने शोलापुर को जीत कर अकबर को अपनी निष्ठा का सन्देश पहुँचाया। घमंड से चूर मानसिंह को शायद पता नहीं था कि जिसके लिए वह कार्य कर रहा है, वह एक आक्रांता है, जो अपनी कूटनीति के बल पर नरम भी बना रहा और जिसने मीठी छुरी बन कर हिन्दुओं को हिन्दुओं से लड़वाया भी। ऐसे व्यक्ति के साथ क्या किया जाना चाहिए? आज यह प्रश्न प्रासंगिक है क्योंकि आज भी ऐसे कई गद्दार और हैं, जो खाते तो इस देश का हैं लेकिन अपने ही समाज की पीठ में छुरा घोंपते हैं। आइए आज से क़रीब 450 वर्ष पीछे जाकर महाराणा प्रताप सिंह से सीखते हैं कि ऐसे लोगों के साथ क्या किया जाना चाहिए?

हुआ यूँ कि अकबर मानसिंह ने अपने आने का सन्देश उदयपुर भिजवा दिया। महाराणा ने अमर सिंह को बुलाकर उसकी आवभगत करने को कहा। ‘अतिथि देवो भवः’ की नीति पर चलने वाले राणा को ख़ूब पता था कि मानसिंह के मन में छल है, कपट है, मुग़लों के प्रति वफ़ादारी है, लेकिन फिर भी उन्होंने अपने लोगों को आदेश दिया कि उसके स्वागत में कोई कमी नहीं रहनी चाहिए। महाराणा का विचार तो देखिए, दुश्मन के साथ भी ऐसा व्यवहार! मानसिंह उदयपुर पहुँचा और अमर सिंह ने उसका पूरा स्वागत किया। उस पर पुष्प-वर्षा की गई, गुलाबजल से सड़कों को धुलवाया गया और पूरा शहर जगमगा रहा था। मानसिंह के स्वागत में कलशें रखी गईं, दीप जलाए गए और दरवाजों को सजाया गया। चकित मानसिंह ने कहा कि उसे ख़ुद इस बात का विश्वास नहीं था कि उसका इतना स्वागत होगा।

ख़ैर, मानसिंह राजमहल पहुँचा और उसके लिए भोजन परोसा गया। सोने-चाँदी की थाली में राजस्थानी पकवान से लेकर अन्य प्रकार की खाद्द सामग्रियाँ डाली गईं। लेकिन, यहाँ एक समस्या खड़ी हो गई। मानसिंह को जिसका इन्तजार था, वह जिसके साथ भोजन करना चाहता था, वह जिससे मिलने आया था, जिसे अकबर का सन्देश देने आया था, वह कहीं भी दिख नहीं रहा था। अतः, उसने अमर सिंह को राणा के पास भेजकर कहवाया कि वह तब तक भोजन का एक कण भी नहीं छुएगा, जब तक महाराणा उसके साथ बैठ कर भोजन न करेंगे। अमर सिंह ने वापस आकर मानसिंह को सन्देश दिया कि चूँकि, महाराणा के सिर में दर्द है, वह मानसिंह के साथ भोजन नहीं कर सकते हैं।

महाराणा प्रताप धर्मभीरु थे, प्रखर हिंदूवादी थे और सनातन परंपरा के वाहक एवं रक्षक थे। जहाँ एक तरफ़ उन्होंने मानसिंह का स्वागत कर अपने हिन्दू चरित्र, स्वाभाव और उदार नीतियों का परिचय दिया, वहीं दूसरी तरफ़ एक कुलघाती के साथ बैठ कर भोजन करना उन्हें सपने में भी मंज़ूर नहीं था। राणा ऐसा नहीं कर सकते थे क्योंकि उनके कुछ सिद्धांत थे, कुछ विचारधारा थी, और वह एक सच्चे राजपूत थे, हिन्दू थे और राष्ट्रवादी थे। मानसिंह ने राणा के सन्देश को अपनी अवज्ञा की तरह लिया और वह राणा के सिर में दर्द होने की ख़बर सुनते ही काँपने लगा। उसकी भृकुटियाँ तन गईं और उसका चेहरा गुस्से से लाल हो गया। गुस्से से काँपते हुए मानसिंह ने युद्ध की धमकियाँ देनी शुरू कर दी और दावा किया कि उसी के कारण राणा की स्वतंत्रता बची हुई है। उसने अपनी युद्धकला के बारे में बखान शुरू कर दिया और ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाने लगा।

चकाचौंध सी लगी मान को
राणा की मुख–भा से।
अहंकार की बातें सुन
जब निकला सिंह गुफा से।।

60, (हल्दीघाटी, पंचम सर्ग)

राणा प्रताप भला यह सब कैसे बर्दाश्त कर सकते थे? एक महावीर कैसे अपने सामने मुग़लों के दास की वीरता का बखान सुन सकता था? एक राष्ट्रवादी राजा कैसे किसी को अपनी ही धरती पर अपने ही देश के ख़िलाफ़ युद्ध छेड़ने की इज़ाज़त दे सकता था? विशाल कद-काठी और प्रखर तेजमय व्यक्तित्व के राणा जब अचानक से निकल कर मानसिंह के सामने आए, तब उसकी आँखें चकाचौंध सी हो गई, उसे कुछ भी सूझना बंद हो गया और जिस अकबर के बल पर वह कूद रहा था, उसकी याद तत्काल मिट गई। इसके बाद राणा प्रताप ने मानसिंह से जो कहा, वह एक सन्देश है सभी गद्दारों के लिए। यह भारतीय सेना को बलात्कारी बोलने वालों के लिए भी सन्देश है, यह हिन्दुओं को हिंसक बताने वालों के लिए भी सन्देश है, यह कश्मीर को भारत से अलग करने की कोशिश करने वालों के लिए भी सन्देश है और यह विदेशी पैसों से भारत को बर्बाद करने की साज़िश रचने वालों के लिए भी सन्देश है। महाराणा ने कहा:

“अरे तुर्क, तू अपनी यह बकवास बंद कर। तेरे लिए उत्तम भोजन का इंतजाम किया गया है, तेरे लिए शीतल पेय की व्यवस्था की गई है, वो सब ग्रहण कर। या फिर निकल जा यहाँ से। तू जिस युद्ध की धमकी मुझे दे रहा है न, उससे मैं डरता नहीं। तू आ जाना और मुझ से लड़ लेना, अगर इतनी ही इच्छा है तो चित्तौर पर चढ़ाई कर लेना। अरे मूर्ख, तुम तब कहाँ थे जब मैंने स्वतंत्रता का बिगुल फूँका था? मैं अपनी जाति और धर्म का रक्षक हूँ, समझ क्या रखा है तूने मुझे? मैं क्या हूँ, कौन हूँ, ये सब अभी नहीं बता सकता। ये सब मैं तुझे युद्ध में बताऊँगा। तेरे सारे प्रश्नों का उत्तर मैं युद्ध में ही दूँगा, महामृत्यु के साथ इधर-उधर लहराते हुए। प्रताप के प्रखर तेज की आग कैसे जलाती है, तुझ जैसे समाज का त्याग करने वालों को मैं बता दूँगा।”

“तेरे लिए नरक के द्वार खुले हुए हैं, तुझे जीवन भर धिक्कार है, क्योंकि तूने दुश्मनों का साथ दिया है। तुझे एक नज़र देख लेने से ही मन में निराशा का भाव आ जाता है और तुझे छूने से तो पाप लगता ही है। हिन्दू जनता के लिए तू एक क्लेश है, पश्चाताप है। तू इस अम्बर कुल समाज पर कलंक है। राणा कभी भी तेरा सम्मान नहीं कर सकता, जानता है क्यों? क्योंकि, अकबर तेरा मालिक है और मुग़ल पठान तेरे साथी हैं। तू भोजन से इनकार कर दे अथवा किसी कुत्ते की तरह इसे चट कर जाए, आज मैं इसका थोड़ा भी विचार नहीं करूँगा। अरे, तुझे सौ-सौ बार लानत है। तू म्लेच्छ वंश का सरदार है, तू हमारे इस अम्बर कुल पर अभिशाप है। और सुन, अगर इस बात पर तलवार उठती है तो मैं लड़ने को तैयार हूँ।”

महाराणा प्रताप का यह सन्देश आज जन-जन तक पहुँचनी चाहिए। उनकी हर जयंती पर महाराणा के दिखाए रास्ते पर चलने का प्राण करने वाले इस देश को भी गद्दारों के साथ ऐसा ही व्यवहार करना चाहिए, जैसा हमारे पूर्वज प्रताप ने किया था। आज जब उनकी जयंती है तो राणा के युद्ध के साथ-साथ उनके वाक्यों को भी गंभीरता से लेने की ज़रूरत है और मानसिंह एवं जयचंद जैसे कुलघातकों को इसी भाषा में जवाब देना भी वक़्त की माँग है। कहानी आगे की भी है कि किस तरह मानसिंह ने रोते-रोते अकबर के भरे दरबार में राणा द्वारा कही गई बातों को दुहराया और अंततः कैसे हल्दीघाटी का युद्ध हुआ। लेकिन, वो सब फिर कभी। एक और बात, मानसिंह के जाने के बाद महाराणा ने पूरे घर को खुदवा कर गंगाजल से अच्छी तरह सफाई करवाई थी।

(यह पूरा का पूरा लेख 20वीं सदी के लेखक श्यामनारायण पांडेय की कविता-रूपी पुस्तक ‘हल्दीघाटी‘ पर आधारित है।)

कोरोना पर काबू पाने के लिए मुंबई में 10 दिनों का ‘मिलिट्री लॉकडाउन’: PIB ने फर्जी दावों का किया भंडाफोड़

पीआईबी ने उन दावों का खंडन किया है जिसमें कोरोना संक्रमण पर काबू पाने के लिए मुंबई में 10 दिनों के मिलिट्री लॉकडाउन की बात कही जा रही थी। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने भी इसे अफवाह करार दिया है।

दरअसल, Tech9587 नामक यूट्यूब चैनल द्वारा अपलोड किए गए एक विवादास्पद वीडियो में दावा किया गया था 8 से 17 मई के बीच मुंबई शहर में सेना की तैनाती की जाएगी। इस दौरान शहर में सैन्य तालाबंदी की जाएगी।

व्हाट्सएप पर तेजी से वायरल हो रहे एक संदेश में दावा किया जा रहा था कि मिलिट्री लॉकडाउन के दौरान शहर में केवल दूध, दवाइयों की दुकानों और अस्पताल खुले रहेंगे।

वीडियो में जो व्यक्ति मराठी में मिलिट्री लॉकडाउन की सार्वजनिक घोषणा कर रहा था वह एक ऑटोरिक्शा की पिछली सीट पर बैठा था। यह सुनिश्चित करने के लिए कि सूचना दूर-दूर तक फैले लाउडस्पीकर भी ऑटो पर लगा था। उस शख्स का कहना था कि सामान की खरीदारी के नाम पर लोग घरों से बाहर निकलकर लॉकडाउन के नियमों उल्लंघन करते हैं। इसके चलते शहर के हर कोने में कोरोना पॉजिटिव केस हैं।

वीडियो में आगे दावा किया कि अगर मुंबई को पूरी तरह से बंद नहीं किया गया तो देश में कोरोना संक्रमितों की संख्या 1 करोड़ तक हो सकती है। हालाँकि लगातार उठते सवालों के बाद यह वीडियो को डिलीट कर दिया गया।

वीडियो में किए जा रहे भ्रामक दावों को खारिज करने के लिए शुक्रवार को पत्र सूचना कार्यालय (पीआईबी) ने ट्विटर का सहारा लिया और लिखा “कानून व्यवस्था बनाने के लिए मुंबई शहर में सेना या नौसेना के जवान तैनात नहीं किए जाएँगे। शहर में सैन्य लॉकडाउन लगने जैसी बात पूरी तरह से गलत है।”

लगातार फैल रही अपवाहों पर शुक्रवार को महाराष्ट्र सीएम उद्धव ठाकरे ने कहा, “पिछले 2-3 दिनों से अफवाह है कि मुंबई में सेना तैनात की जाएगी। यहाँ सेना की तैनाती की कोई आवश्यकता नहीं है। मैंने आज तक जो भी किया है वह राज्य की जनता को जानकारी देकर किया है। आप सभी को अनुशासित रहना चाहिए और यही काफी होगा। राज्य में सेना बुलाने की कोई जरूरत नहीं है।”

आपको बता दें कि इससे पहले पत्रकार पुण्य प्रसून बाजपेयी ने एक तस्वीर पोस्ट की थी, जिसमें कुछ बच्चों के फटे हुए, खुरदरे पैरों को दिखाया गया था। उन्होंने कहा था, “मदर इंडिया के पाँव देखे हैं कभी”? जिसका अर्थ है कि क्या आपने कभी भारत माता के पैर देखे हैं? जैसा कि ट्विटर यूजर @theFirstHandle द्वारा बताया गया है। दरअसल पुण्य प्रसून बाजपेयी ने जिस फोटो का प्रयोग किया था वह फोटो 2018 में लंदन पोस्ट की एक रिपोर्ट, जिसका शीर्षक “रियल फेस ऑफ पाकिस्तान डेमोक्रेसी- चिल्ड्रन नीड ए स्पोंसर फोरमेडिकल ट्रीटमेंट” में लगा था।

8 मई को हुसैन नाम के एक ट्विटर यूजर ने एक वीडियो जारी किया था, जिसमें दावा किया गया कि भारत का राष्ट्रीय कैरियर एयर इंडिया ने अपने यात्रियों से सोशल डिस्टेंसिंग के बहाने सामान्य से तीन गुना अधिक वसूला है। शुक्रवार को पत्र सूचना कार्यालय (पीआईबी) ने ट्विटर पर साफ किया कि विवादास्पद वीडियो, जिसमें यात्रियों से सोशल डिस्टेंसिंग के नाम पर अधिक किराया वसूलने की शिकायत करते हुए देख गया, दरअसल वह वीडियो पड़ोसी देश पाकिस्तान का है।

बेकरी में ब्रेड चाटकर पैकिंग के लिए काट रहा था अब्दुल नाजिम, टिकटॉक वीडियो वायरल होने के बाद गिरफ्तार

महाराष्ट्र के अमरावती की एक बेकरी में अब्दुल नाजिम शेख महमूद ब्रेड को चाटकर पैकिंग के लिए काट रहा था। इसका टिकटॉक वीडियो वायरल होने के बाद उसे गिरफ्तार कर लिया गया है।

वीडियो में 29 वर्षीय अब्दुल नाजिम एक बेकरी में बैठा नजर आ रहा है। बैकग्राउंड में रमजान का गाना बज रहा है और वह ब्रेड को चाट-चाटकर पैकिंग के लिए टुकड़ों में काट रहा है।

यह वीडियो ऐसे वक़्त में सामने आया है कोरोना वायरस के संक्रमण से बचने के लिए लोग तरह-तरह के उपाय खोज रहे हैं। इससे पहले थूक लगाकर फल और सब्जी बेचने के वीडियो भी सामने आ चुके हैं।

अब्दुल नाजिम का वीडियो तारिक अंसारी नाम के टिकटॉक अकाउंट से बुधवार को अपलोड किया गया था। नाजिम की हरकत के कारण यह वीडियो बहुत तेजी से वायरल हुई। मामला संज्ञान में आते ही पुलिस ने नाजिम को गिरफ्तार कर लिया।

शर्मनाक बात तो ये है कि वीडियो पर जब लोगों की प्रतिक्रिया आई और उन्होंने क्रिएटर समेत शेख की निंदा की, तो वीडियो को डालने वाले अकॉउंट से उस प्रतिक्रिया पर आभार व्यक्त किया गया। बेकरी के मालिक अब्दुल सलाम ने वीडियो देखने के बाद खुद अब्दुल नाजिम शेख महमूद पर अचलपुल थाने में शिकायत दर्ज करवाई।

बता दें, खाद्य सामग्री पर थूक लगाकर उसे ग्राहकों के लिए तैयार करने की वीडियो पहली बार सामने नहीं आई है। इससे पहले शेरू मियाँ का भी एक वीडियो सामने आया था। शेरू मियाँ ठेली पर थूक लगा-लगाकर फलों को बेचने के लिए सजा रहा था।

जब लोगों के सामने ये वीडियो आई और लोगों ने शिकायत की तो उसकी बेटी फिजा ने ये कह दिया कि उसके पिता की नोट गिनने की पुरानी आदत है और वे अक्सर घर में भी कभी-कभी ऐसी हरकतें करते रहते हैं।

मुंबई के सायन अस्पताल की खिड़की से अब कोरोना पॉजिटिव ने की भागने की कोशिश: वीडियो वायरल

मुंबई के सायन अस्पताल से एक बार फिर चौंकाने वाला वीडियो सामने आया है। यहाँ एक कोरोना पॉजिटिव मरीज ने अस्पताल की खुली खिड़की से भागने की कोशिश की। लेकिन बाहर गेट पर बैठे सुरक्षाकर्मियों ने उसे दबोच लिया। इसके बाद अस्पताल प्रशासन की व्यवस्था पर फिर से सवाल खड़े हो गए हैं।

वीडियो में आप देख सकते हैं कि एक आदमी खिड़की की ओर भागता हुआ दिखाई दे रहा है और वह खुली खिड़की से बाहर की ओर कूद जाता है। इस दौरान वहाँ पीपीई किट में एक अस्पताल का कर्मचारी और मरीजों के देखरेख करने वाले कुछ अन्य लोग बैठे हुए हैं।

हालाँकि मरीज अस्पताल से भागने में कामयाब नहीं हो सका, क्योंकि अस्पताल कैंपस से बाहर निकलने से पहले ही सुरक्षा में तैनात गार्डों ने समय रहते उसे पकड़ लिया।

यह घटना बीते रविवार (3 मई, 2020) रात 9:25 बजे की बताई जा रही है।

इस वीडियो की अस्पताल के सूत्रों ने पुष्टि करते हुए बताया कि वह शख्स, जिसने खिड़की से भागने की कोशिश की थी, वह कोरोना पॉजिटिव मरीज है। उसे अस्पताल के भूतल पर कोरोना वार्ड नंबर 5 में भर्ती किया गया था। वह अपने बिस्तर पर था, लेकिन अचानक उठकर खिड़की की तरफ भागा। उसे बाहर पकड़ लिया गया। अस्पताल प्रशासन ने मरीज को कथित तौर पर अस्पताल में भर्ती होने के बाद से ही मानसिक रूप से तनाव में बताया है।

आपको बता दें कि इससे पहले भी सायन अस्पताल का एक वायरल वीडियो सामने आया था, जिसमें साफ तौर पर देखा गया था कि जिस वार्ड में कोरोना वायरस के मरीज भर्ती थे, वहाँ लाशें रखी हुई थीं।

वीडियो में वॉर्ड में मरीजों के बीच शव रखे दिख रहे थे। मरीजों के बीच काले प्लास्टिक के बैगों में कोरोना पॉजिटिव मरीजों के शव भी वॉर्ड के बेडों पर रखे थे। कुछ शवों को कपड़ों से तो कुछ कंबल से ढका गया था। मरीज और उनके परिजनों ने मामले में अस्पताल प्रबंधन से शिकायत भी की थी।

अस्पताल के डीन डॉ. प्रमोद इंगले ने वायरल वीडियो की पुष्टि करते हुए बताया था कि कानूनी कार्यवाही और विशेष निर्देश के चलते वे अपने दम पर अंतिम संस्कार नहीं करा सकते थे। उधर, रिश्तेदार शवों को ले जाने के लिए नहीं आ रहे हैं। इसलिए इन्हें वार्ड में रखा गया। मॉर्चुरी में जो 15 सेल्फ हैं, उनमें से 11 भरे हुए हैं।

इससे पहले, कूपर अस्पताल से इसी तरह की घटना सामने आई थी, जहाँ एक मरीज को कथित तौर पर लावारिस छोड़ दिया गया था और उसे अपने आसपास दो लाशों के साथ रात गुजारनी पड़ी थी।

इसी तरह कोलकाता से भी संक्रमित लाशों को सँभालने में लापरवाही के बारे में शिकायतें सामने आई थी। एक वायरल वीडियो में, कोलकाता के एमआर बांगुर अस्पताल में लाशें लावारिस हालत में पड़ी देखी गईं थी।

डॉक्टर सुसाइड केस: AAP विधायक प्रकाश जरवाल के खिलाफ गैर जमानती वारंट, तलाश में दबिश दे रही पुलिस

आम आदमी पार्टी (AAP) के विधायक प्रकाश जरवाल और उनके साथी कपिल नागर के ख़िलाफ़ डॉक्टर राजेन्द्र के आत्महत्या मामले गैर-जमानती वारंट जारी किया गया है।

पुलिस विधायक जरवाल और उनके साथी कपिल की तलाश में जुटी है। 7 मई को इस संबंध में पुलिस ने आप नेता के 2 भाइयों और 8 मई को पिता समेत कुछ रिश्तेदारों से पूछताछ भी की थी।

खबरों की मानें तो विधायक प्रकाश जरवाल को दिल्ली पुलिस पूछताछ के लिए दो बार बुला चुकी है। लेकिन वे दोनों बार पेश नहीं हुए। अब दक्षिण दिल्ली की पुलिस उन्हें पकड़ने के लिए दिन-रात दबिश दे रही है। हालाँकि अभी तक उन्हें गिरफ्तार नहीं किया जा सका है। 

दक्षिण जिला पुलिस अधिकारियों के अनुसार जरवाल के ख़िलाफ़ पुलिस को डॉक्टर से पैसे लेने व उनको खुदकुशी के लिए उकसाने के संबंध में पर्याप्त सबूत मिल गए हैं। अब पुलिस लगातार उन्हें पकड़ने की कोशिशों में जुटी है।

दक्षिण जिला डीसीपी अतुल कुमार ठाकुर ने मीडिया को बताया कि विधायक प्रकाश जरवाल व उसके खास साथी कपिल नागर के खिलाफ शुक्रवार को गैर-जमानती वारंट जारी किया गया। जल्द ही विधायक व उसके साथी को पकड़ लिया जाएगा।

डॉक्टर का सुसाइड नोट

पिछले महीने 18 अप्रैल को दिल्ली के नेब सराय इलाके में 52 वर्षीय डॉक्टर राजेन्द्र सिंह ने फाँसी लगाकर आत्महत्या कर ली थी। मृतक के पास से एक 2 पेज का सुसाइड नोट मिला था जिसमें उन्होंने आत्महत्या के लिए इलाके के विधायक प्रकाश जरवाल और उनके सहयोगी कपिल को जिम्मेदार ठहराया था।

इसके अतिरिक्त पुलिस ने एक डायरी भी बरामद की थी, जिसमें लिखा था, “मेरा इस इलाके में एक क्लीनिक है और मेरे कुछ वाटर टैंकर दिल्ली जल बोर्ड में किराए से चलते थे, लेकिन एमएलए प्रकाश जरवाल और उसका सहयोगी कपिल नागर मुझसे हर टैंकर के हिसाब से पैसे माँगने लगे। कुछ पैसे दिए भी गए लेकिन बाद में मेरे सभी टैंकर प्रकाश जरवाल ने दिल्ली जल बोर्ड से हटवा दिया।”

सुसाइड नोट में लिखा था, “टैंकरों को दिल्ली जल बोर्ड से हटवाने के बाद जब उन्हें ओखला के दिल्ली जल बोर्ड के लगवाया गया तो टैंकरों को वहाँ से भी प्रकाश जरवाल द्वारा हटवा दिया गया।” नोट के अनुसार प्रकाश जरवाल और उसके सहयोगी से उन्हें जान से मारने की धमकी भी मिल रही थी और धमकियों के कारण उनका जीना मुश्किल हो गया था।

प्रकाश जरवाल को सफाई

डॉक्टर के आत्महत्या करने के बाद विधायक प्रकाश जरवाल ने इस संबंध में अपना बयान जारी किया था। बयान में उन्होंने खुद को निर्दोष बताते हुए सफाई दी थी। जरवाल ने कहा था, “मुझे मीडिया के माध्यम से डॉक्टर की आत्महत्या और सुसाइड नोट की बात पता चली है। मैं निर्दोष हूँ। पिछले 8-10 महीनों ने न तो मैं उनसे मिला हूँ और न ही हमारी कोई बातचीत हुई थी। 2017 में जब कुछ मीडिया चैनलों ने टैंकर माफिया के ख़िलाफ़ स्टिंग किया था, तो उसमें उनका नाम आया था। इसके बाद उनकी सभी गाड़ियों को ब्लैकलिस्ट कर दिया गया था। मुझे पहले भी फँसाने की कोशिश की जाती रही है और अब ऐसा ही हो रहा है। मैं किसी भी जाँच के लिए तैयार हूँ। मैं पुलिस का सहयोग करूँगा।”