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कभी CAA विरोध, कभी चिदंबरम का बचाव, कभी जमातियों की रक्षा: ब्यूरोक्रेट्स जो कुकुरमुत्ते की तरह उग आते हैं

ख़बर आई है कि 101 पूर्व ब्यूरोक्रेट्स ने सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों को पत्र लिख कर ‘समुदाय विशेष के ख़िलाफ़ हो रहे अत्याचार’ पर अपना विरोध जताया है। उन्होंने आरोप लगाया है कि कोरोना वायरस की आपदा के बीच देश के कई क्षेत्रों में ‘समुदाय विशेष पर हो रहे अत्याचार’ को लेकर विरोध जताया है। हालाँकि, उन्होंने ये भी कहा कि तबलीगी जमात ने दिल्ली में जो बैठक किया वो ‘गुमराह होने के कारण’ और निंदनीय है, लेकिन साथ ही कहा कि मीडिया में कुछ लोग मजहब विशेष को लेकर घृणा फैला रहे हैं, जो निंदनीय और दोषपूर्ण व्यवहार है।

क्या लिखा है प्रोपेगंडाबाज ब्यूरोक्रेट्स ने

उन्होंने दावा किया कि कोरोना वायरस रूपी आपदा से पूरा देश त्रस्त है और यहाँ डर एवं असुरक्षा का माहौल है, जिसे देश के विभिन्न हिस्सों में समुदाय विशेष के ख़िलाफ़ अभियान चलाने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है। आरोप लगाया गया है कि दूसरे मजहब को अलग कर के घृणा की नज़र से देखा जा रहा है, उन्हें सार्वजनिक जगहों से दूर रखा जा रहा है और ऐसा इसीलिए किया जा रहा है, ताकि कथित रूप से बाकी जनता को बचाया जा सके।

इन पूर्व अधिकारियों का आरोप है कि पूरा देश उस डर के माहौल से गुजर रहा है। साथ ही इसमें एकता से रहने जैसी बातें भी की गई हैं। हाँ, इन पूर्व नौकरशाहों ने ये बताना नहीं भूला कि वो किसी भी राजनीतिक विचारधारा से ताल्लुक नहीं रखते हैं और वो भारत के संविधान के प्रति आस्था रखते हुए ये पत्र लिख रहे हैं। जैसा कि आप देख सकते हैं, इस पत्र में जमात को निर्दोष, गुमराह और भटका हुआ साबित करने की कोशिश की गई है, जैसा आतंकवादियों के साथ किया जाता है।

जम्मू कश्मीर के आतंकियों को भी सालों तक ‘भटका हुआ’ बता कर उनका पोषण किया जाता रहा। अलगाववादी भी भटके हुए थे, उसी तरह अब महामारी फ़ैलाने वाले भी भटके हुए हैं। पूरे भारत में कोरोना वायरस के जितने मामले आए हैं, उनमें से अकेले 30% तबलीगी जमात से जुड़े हैं। क्या इसके लिए उन्हें दोष न दिया जाए? क्या इसके लिए जमात की पूजा की जाए? ये देश भर में विभिन्न इलाक़ों में जाकर छिप गए और वहाँ पुलिस पर हमले हुए। यानी, पहले महामारी और फिर पुलिस व स्वास्थ्यकर्मियों पर हमला।

इससे पहले भी कर चुके हैं ऐसे ‘कांड’

ये कुकुरमुत्तों का समूह है, जो ब्यूरोक्रेट्स के रूप में यदा-कदा प्रकट होकर मोदी सरकार को ही नहीं बल्कि पूरे देश को बदनाम करने में लगा हुआ है। 100 से भी अधिक ब्यूरोक्रेट्स ने तब भी पत्र लिखा था, जब सीएए के विरोध में आंदोलन भड़काया जा रहा था। इन ‘महान’ बुद्धिजीवियों ने तो यहाँ तक दावा कर दिया था कि देश को सीएए, एनआरसी और एनपीआर की ज़रूरत ही नहीं है। असम में सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर एनआरसी हुआ, यानी ये ब्यूरोक्रेट्स सुप्रीम कोर्ट से भी ज्यादा समझदार हैं।

इन्होने एनपीआर का भी विरोध किया लेकिन जब यूपीए-2 के समय एनपीआर हुआ था, तब इन्होने कुछ नहीं कहा था। यानी, जब वही योजना मोदी सरकार के समय आई तो बुरी हो गई। अभी जिन ब्यूरोक्रेट्स ने चिट्ठी लिखी है, इनमें से कई पी चिदंबरम को आईएनएक्स मीडिया केस में बचाने में शामिल थे। दरअसल, उस मामले में कई अधिकारियों की भी संलिप्तता सामने आई थी। अक्टूबर 2019 में 71 रिटायर्ड ब्यूरोक्रेट्स ने पीएम नरेंद्र मोदी को पत्र लिख कर इस केस में अधिकारियों पर कार्रवाई किए जाने का विरोध किया था।

इन्होने आरोप लगाया था कि रिटायर्ड अधिकारियों को चुन-चुन कर निशाना बनाया जा रहा है। यूपीए के समय के कई भ्रष्टाचार के मामले ऐसे हैं, जिनकी अभी भी जाँच चल रही है। अधिकतर ब्यूरोक्रेट्स इस बात से डरे हुए हैं कि जाँच की आँच उन तक पहुँच सकती है और आईएनएक्स मीडिया केस हो या फिर अगस्ता-वेस्टलैंड हैलीकॉप्टर घोटाला, इन सब में उस समय के बड़े अधिकारियों की भूमिका की जाँच चल रही है ऐसे में, ये मोदी सरकार को दबाव में रखना चाहते हैं।

ये बताना चाहते हैं कि अगर पुरानी फाइलों को खोला जा रहा है तो ये भी सरकार को बदनाम करते रहेंगे, ताकि इनमें से कुछ ने तब जो किया, उसकी सज़ा न मिलने पाए। अब सवाल उठता है कि इन्हें हर उस चीज से दिक्कत क्यों होती है, जो मोदी सरकार को बदनाम करने के काम आ सकती है? इन ब्यूरोक्रेट्स ने पालघर में साधुओं की भीड़ द्वारा निर्मम हत्या पर सवाल क्यों नहीं पूछे? इन रिटायर्ड नौकरशाहों ने सीएए विरोध की आड़ में दिल्ली में हुए हुए हिन्दुओं के नरसंहार के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई क्या?

इनका एक ही मकसद: मोदी विरोध, BJP की बदनामी

इन नौकरशाहों ने शाहीन बाग़ के आतताइयों के ख़िलाफ़ भी कुछ नहीं बोला, जहाँ राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी और देश के संविधान को गाली देते हुए 3 महीने तक पूरी दिल्ली को एक तरह से बंधक बना कर रखा गया। आज यही ब्यूरोक्रेट्स संविधान की शपथ खाने की बात करते हैं। असल जड़ यही है कि आईएनएक्स केस जैसे मामलों में कई ब्यूरोक्रेट्स के भी हाथ रंगे हुए हैं, पी चिदंबरम के साथ। जब दलाल क्रिस्चियन मिशेल की मंत्रालयों में ऊँची पहुँच होने की बात पता चली है, तब से इनके कान खड़े हैं क्योंकि इनमें से कई तब इस खेल में शामिल रहे होंगे।

ये कुकुरमुत्ते हर अच्छे कार्य व अच्छी योजनाओं को बर्बाद करने के लिए उनके ऊपर ऐसे ही उग आते हैं। तबलीगी जमात के कारण देश के कई राज्यों में महामारी फैली है, जिसे ‘सिंगल सोर्स’ और ‘अंडर स्पेशल ऑपरेशन’ जैसे शब्दों के नीचे ढका गया। कई वीडियो सामने आए, जिसमें फल व सब्जी बेचने वाले महामारी फैलाने जैसा काम कर रहे थे। कई लोगों ने दूसरे मजहब से सामान लेना बंद कर दिया। इसमें मीडिया की क्या ग़लती? क्या ये ब्यूरोक्रेट्स थूक लगा फल या सब्जी खाएँगे?

ये उनसे अलग नहीं है। ऐसे ही सैकड़ों की संख्या में वैज्ञानिक, सामाजिक कार्यकर्ता और बुद्धिजीवी सामने आ जाते हैं और पत्र लिखते रहते हैं। कभी ‘अवॉर्ड वापसी’ का ढोंग रचा जाता है तो कभी राफेल का राग अलापा जाता है। वजह एक ही है- मोदी सरकार को बदनाम करो। आज ब्यूरोक्रेसी में सुधार लाया जा रहा है। नए अधिकारियों को ट्रेनिंग के क्रम में ‘स्टेचू ऑफ यूनिटी’ ले जाया गया। बिल गेट्स से इन्हें प्रशासन के गुर सीखने को मिले। मोदी सरकार ब्यूरोक्रेसी को आरामफरामोशी से सक्रियता की ओर ले जा रही है, ये इसका ही दर्द है।

उत्तर प्रदेश में हमने देखा है कि कैसे मायावती के पूर्व मुख्य सचिव के यहाँ से करोड़ों बरामद हुए। तमिलनाडु के एक बड़े अधिकारी को कोर्ट ने जेल भेजने को कहा। त्रिपुरा में पीडब्ल्यूडी मामले में एक बड़े अधिकारी को दोषी पाया गया। इन ब्यूरोक्रेट्स को भी पुरानी फाइलें खुलने का डर है, इसीलिए कभी कॉन्ग्रेस के अपने आकाओं को बचाने के लिए निकलते हैं तो कभी मोदी सरकार की योजनाओं को गाली देते हैं।

लॉकडाउन में हरियाणा में फँसे 12 मजदूर यमुना तैरकर पहुँचे UP, पुलिस ने किया क़्वारंटाइन

लॉकडाउन के कारण हरियाणा के पानीपत में फँसे उत्तर प्रदेश शामली के 12 मजदूर सीमा पर बहने वाली यमुना नदी से तैरकर UP पहुँच गए जहाँ पुलिस ने उन्हें पकड़कर क्वारंटाइन कर दिया।

लॉकडाउन के कारण घर से दूर रह रहे लोग बेहद अजीबोगरीब कारनामों को अंजाम दे रहे हैं लेकिन इन 12 मजदूरों ने तैरकर अपने घर पहुँचने की खबर ने सबको हैरत में डाल दिया है। नदी तैरकर उत्तर प्रदेश में घुसने की कोशिश कर रहे इन मजदूरों ने पुलिस विभाग की चिंता बढ़ा दी है। अब उन्हें बॉर्डर सील करने और सड़कों पर बैरिकेड्स लगाकर निगरानी रखने के अलावा अब नदी पर भी पहरा देना पड़ रहा है।

रिपोर्ट्स के अनुसार, ये सभी लोग पानीपत की सब्जी मंडी में काम करते हैं। इनका कहना है कि जब इनके मालिक ने खाना देना बंद कर दिया तो मजबूरन इन्हें यह कदम उठाकर अपने घरों को जाने के बारे में विचार करना पड़ा।

ये सभी पानीपत से लगभग 750 किलोमीटर दूर कौशांबी जा रहे थे। यमुना पार करके ये सभी शामली जिले में पहुँच गए। जब शामली के गंगेरू गाँव के लोगों ने इन्हें देखा तो उन्होंने फौरन पुलिस को इसकी सूचना दी।

इस पर शामली की डीएम जसजीत कौर ने कहा कि नदी पार करके आने वाले ज्यादातर लोग शामली के नहीं बल्कि गोरखपुर, वाराणसी और अन्य जिलों के हैं। जिन्हें कि कोरोना के कारण देशव्यापी बन्द के कारण इनके घर नहीं भेजा जा सकता है। डीएम ने कहा कि इन मजदूरों को वापस भेजने के लिए हरियाणा प्रशासन को सूचना दी है। करनाल में ही UP के 740 मजदूर शेल्टर होम्स में रह रहे हैं।

गौरतलब है कि अप्रैल के पहले हफ्ते में पुलिस ने ऐसे कई लोगों को गिरफ्तार किया था, जो ट्यूब के सहारे यमुना पार करने की कोशिश कर रहे थे। बाद में पुलिस ने इस पर कार्रवाई करते हुए रोक लगाइ थी। साथ ही, यमुना किनारे स्थित गाँव के लोगों से अपील की गई है कि नदी पार करने वाले शख्स को देखते ही पुलिस को सूचना दें।

संक्रमित कपड़े का उपयोग कर नाई काट रहा था बाल-दाढ़ी, गाँव में 6 अन्य लोग हुए कोरोना पॉजिटिव, मचा हड़कंप

कोरोना की रोकथाम के लिए स्वास्थ्य विभाग द्वारा समय-समय पर गाइडलाइन जारी की जाती हैं, लेकिन सरकार की लाख कोशिशों के बाद भी कुछ लोग अपनी आदत से बाज नहीं आते। कुछ ऐसा ही हुआ मध्य प्रदेश में खरगोन जिले के एक गाँव में, जहाँ एक नाई संक्रमित कपड़े का उपयोग करते हुए दुकान पर आए लोगों के बाल-दाढ़ी काटता चला गया। इसका परिणाम कुछ यह रहा कि एक के बाद एक गाँव के 6 लोग कोरोना पॉजीटिव पाए गए। इसके बाद पूरे गाँव को सील कर दिया गया है।

मामला खरगौन जिले के बड़गाँव का है, जहाँ एक साथ 6 लोग कोरोना पॉजिटिव पाए गए। जानकारी के मुताबिक 5 अप्रैल को इंदौर के सैफी होटल में वेटर के रूप में काम करने वाले मनोज कुशवाह को कोरोना पॉजिटिव पाया गया था। इसके बाद स्वास्थ्य विभाग ने हिस्ट्री खंगाली तो पाया कि पीड़ित युवक ने गाँव के ही एक नाई से कटिंग-शेविंग कराई थी। इस पर स्वास्थ्य विभाग के कर्मचारियों द्वारा नाई से की गई पूछताछ में पाया कि नाई ने उसी संक्रमित कपड़े का उपयोग करते हुए गाँव के 8-10 लोगों की हजामत बनाई थी।

इतनी जानकारी मिलते ही स्वास्थ्य विभाग ने नाई के पास आने वाले सभी लोगों के सैंपल लेकर जाँच के लिए भेज दिए। शुक्रवार को खरगौन जिले में एक साथ 9 नए कोरोना पॉजिटिव के केस सामने आए। इसमें आश्चर्य की बात यह कि एक इनमें से एक ही गाँव के 6 लोग कोरोना पॉजिटिव पाए गए। इसकी जानकारी मिलते ही जिला प्रशासन में हड़कंप मच गया और स्वास्थ्य विभाग की टीम ने पुलिस प्रशासन की मदद से तत्काल पूरे गाँव को सील कर दिया।

खरगौन के सीएमएचओ दिव्येश वर्मा ने बताया कि रात में एक ही गाँव के 6 और सुबह 3 पॉजिटिव केस मिले। बड़गाँव के 6 ग्रामीणों के रिपोर्ट पॉजिटिव आए हैं। इसके बाद गाँव की सीमाओं को पूरी तरह सील कर दिया गया। साथ ही लॉकडाउन का सख्ती से पालन हो इसके लिए पूरे गाँव के लोगों को निगरानी में रखा गया है।

आपको बता दें कि खरगोन जिले में अब कोरोना पॉजिटिव केसों की संख्या 60 हो गई। वहीं अगर पूरी मध्य प्रदेश की बात करें तो स्वास्थ्य विभाग की रिपोर्ट के मुताबिक मध्य प्रदेश में कोरोना से मरने वालों की संख्या 92, जबकि इससे संक्रमित लोगों की संख्या बढ़कर 1852 हो गई है।

गौरतलब है कि मध्य प्रदेश के इंदौर शहर कोरोना का केन्द्र बन गया है। महीने के शुरूआत में ही दो दिन में दो कोरोना संक्रमित डॉक्टरों ने दम तोड़ दिया था। यह देश में डॉक्टरों की मौत का पहला मामला था। इसके बाद सरकार ने पूरे शहर की सभी सीमाओं को सील कर दिया था साथ ही शहर को जगह-जगह सैनिटाइज कराया गया था।

फल विक्रेता की दुकान पर हिन्दू प्रतीक देखकर बौखलाया लिबरल गिरोह, लोगों ने पूछा हलाल दुकानों का हाल

कोरोना वायरस के संक्रमण को रोकने के लिए देशभर में जारी लॉकडाउन के बीच भी हिंदुओं से घृणा वाले प्रोपेगेंडा सोशल मीडिया पर देखे जा रहे हैं। झारखंड पुलिस को टैग करते हुए एक युवक ने हिन्दू संगठनों के पोस्टर लगी फल विक्रेता की एक दुकान पर आपत्ति जताई है। उसका आरोप है कि झारखंड सरकार के बजाए अब हिन्दू संगठन फलों की दुकानों और व्यवसायों को परमिशन दे रहे हैं।

फल विक्रेता की इस ट्वीट पर प्रतिक्रिया देते हुए ऑपइंडिया के सीईओ राहुल रौशन ने लिखा है – “इस तरह से चरणबद्ध तरीके से आप एक इस्लामी राज्य की ओर अग्रसर होते हैं। अपने हर उत्पाद पर हलाल की मोहर लगाते हुए हिन्दू प्रतीकों को गैरकानूनी बताओ। पुलिस और राज्य ने यह करने में उनकी मदद की है।”

दूसरे ट्वीट में राहुल रौशन ने कटाक्ष करते हुए लिखा है – “अपनी दुकानों पर राम-शिव की तस्वीर नहीं लगा सकते। अपनी कैब पर एंग्री-हनुमान पोस्टर नहीं लगा सकते। ऑफिस में कलावा और तिलक लगाकर नहीं जा सकते। जबकि आप आलू-भिंडी को हलाल बनाते हैं और पकाने के इस्लामिक तरीकों को वैध बना रहे हैं।”

वहीं, एक अन्य ट्विटर यूजर ने एहसान राज़ी के ट्वीट के जवाब में हलाल मीट की दुकान की तस्वीरें साझा करते हुए लिखा है कि यह हलाल मीट की दुकानों की तस्वीरें हैं, इनके खिलाफ भी कार्रवाई करो।

एक अन्य ट्विटर यूजर ने झारखंड में ही मौजूद ऐसी कई अन्य दुकानों की तस्वीरों को शेयर किया, जिनमें बिस्मिल्लाह ढाबा से लेकर खान मुस्लिम होटल जैसे पोस्टर स्पष्ट देखे जा सकते हैं। साथ ही झारखंड पुलिस से गरीब फल विक्रेताओं को निशाना ना बनाने की भी अपील की है।

हलाल

ज्ञात हो कि हलाल की प्रकिया पूर्ण रूप से इस्लामिक रीति-रिवाजों पर आधारित है। इसमें खाने-पकाने से लेकर इसे ग्रहण करने तक में पूर्ण रूप से मुस्लिम तरीकों को अपनाया जाता है, जिसमें अन्य किसी भी धर्म के व्यक्ति का योगदान नहीं होता है। इस तरह यह एक प्रकार से गैरमुस्लिमों के आर्थिक बहिष्कार की प्रक्रिया का हिस्सा होता है।

मैं कलाकार हूँ, मनोरंजन करूँगी: कोरोना पर जनता की समस्याओं को अनुसना कर Tik-Tok वीडियो बना रही नुसरत जहाँ

जहाँ एक तरफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जैसे नेता कोरोना वायरस संक्रमण के बीच जनता की दुःख-तकलीफों के निवारण में लगे हैं, तृणमूल कॉन्ग्रेस की नुसरत जहाँ जैसी नेता टिक-टॉक के माध्यम से लोगों का ‘मनोरंजन’ करने में लगी हुई हैं। नुसरत जहाँ अक्सर टिक-टॉक पर अपने डांस मूव्स से लाइक्स बटोरती रहती हैं। 30 वर्षीय नुसरत पश्चिम बंगाल के बरिसत से सांसद हैं।

पूरे देश में लॉकडाउन लागू है। आर्थिक रूप से इसका देश को काफी नुकसान हो रहा है क्योंकि उद्योग-धंधे ठप्प हो गए हैं। मजदूरों को भोजन-पानी की दिक्कतें आ रही हैं, जो पहले दिहाड़ी कमा कर परिवार की ज़रूरतों को पूरा करते थे। इस बीच कई ऐसे नेता हैं जो अपने-अपने क्षेत्रों में राहत-कार्य में लगे हुए हैं। दिल्ली में तजिंदर बग्गा जैसे नेता सोशल मीडिया पर लोगों की शिकायतें सुन कर उसके निवारण में लगे हुए हैं। लेकिन, नुसरत जहाँ को इन सबसे कोई मतलब नहीं

पश्चिम बंगाल में स्थिति विकट है लेकिन नुसरत जहाँ अपने लोगों के बीच जाकर उनकी न तो समस्याएँ सुन रही हैं और न ही वहाँ के ग़रीबों के भोजन-पानी के इंतजाम के लिए कुछ कर रही हैं। इसके बदले वो टिक-टॉक पर अपने डांस के वीडियोज बना कर अपलोड करने में व्यस्त हैं। ऐसा नहीं है कि लोगों ने उनसे शिकायतें नहीं की। लोगों ने नुसरत जहाँ से जनता की समस्याओं पर ध्यान देने को कहा। लोगों ने ध्यान दिलाया कि उनके क्षेत्र के लोग परेशानी में हैं।

नुसरत जहाँ ने जनता की समस्याओं पर बात करना तो दूर, उलटा उन्हें जवाब देते हुए एक और वीडियो पोस्ट कर दिया। ट्विटर पर ऐसा करते हुए उन्होंने लिखा– “एक कलाकार हमेशा मनोरंजन करता रहता है।” साथ ही उन्होंने उन सबको ट्रोल करार दिया, जो उनसे टिक-टॉक वीडियोज बनाने की बजाए जनता की समस्याओं पर ध्यान देने को कह रहे थे। उस वीडियो में भी वो तरह-तरह के स्क्रीन इफेक्ट्स के साथ डांस करते हुए दिखती हैं।

इससे पहले नुसरत जहाँ हिन्दू रीति-रिवाजों का पालन करने के कारण मुस्लिम कट्टरपंथियों के निशाने पर भी आ चुकी हैं। भैया-दूज त्यौहार को मनाने के लिए पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता में तृणमूल कॉन्ग्रेस की सांसद नुसरत जहाँ ने एक वृद्धाश्रम को चुना था। नुसरत के इस कार्यक्रम में शरीक होने की तस्वीरें मीडिया रिपोर्ट्स में सामने आई थीं। इस दौरान कई कट्टरपंथियों ने उनका विरोध किया था।

जहाँ तक पश्चिम बंगाल की बात है, वहाँ कोरोना वायरस से निपटने में ममता बनर्जी सरकार के ढुलमुल रवैये के कारण कई मामलों के छिपे होने की आशंका है। टेस्टिंग भी नहीं की जा रही है। अब तक राज्य में कोरोना वायरस के 571 मामले सामने आए हैं, जिनमें से 184 मामले अकेले राजधानी कोलकाता के हैं। कुल 18 लोगों की मौत हुई है और 103 लोग इलाज के बाद ठीक हो चुके हैं।

एंटोनिया माइनो की राष्ट्रीयता नहीं बल्कि मंशा पर प्रश्न रहा है, ‘The Print’ अक्षय कुमार की नागरिकता से करना चाहता है मूल्यांकन

पालघर में साधुओं की हत्या और अर्नब गोस्वामी पर कॉन्ग्रेसी गुंडों द्वारा हमले के बाद एंटोनिया माइनो (Antonia Maino) की अत्याधुनिक डिजिटल सेना ने अपनी-अपनी पोजीशन ले ली हैं। कुतर्कों के धनी शेखर गुप्ता एवं पार्टी ने अब सोनिया गाँधी की वकालत में एक कुतर्क को स्थापित करने का प्रयास किया है जो कि दुराग्रहों और स्वामी-भक्ति की चासनी में निचोड़कर तैयार किया गया है। निसंदेह शेखर गुप्ता इस काम में बेहद निपुण रहे हैं, यही वजह है कि उनका दल भी अब इस कला में महारत हासिल करने लगा है।

एंटोनिया माइनो

मामला कॉन्ग्रेस नेता एंटोनिया माइनो यानी सोनिया गाँधी की नागरिकता को लेकर है। लेकिन ‘दी प्रिंट’ यह भूल गया कि जब सारा देश सोनिया गाँधी के सिर्फ नाम पर चर्चा कर रहा था तो फिर ‘दी प्रिंट‘ ने उनकी राष्ट्रीयता पर क्यों बहस छेड़ दी? सोनिया गाँधी को यह नाम किसने और कब दिया इस बारे में स्पेनिश लेखक जेवियर मोरो की सोनिया गाँधी पर लिखी किताब ‘द रेड साड़ी’ में बेहद सुंदर शब्दों में जिक्र किया गया है।

यह वही जीवनी थी, जिसे वर्ष 2010 में कॉन्ग्रेस पार्टी और कार्यकर्ताओं के विरोध के बाद बाजार से हटा लिया गया था और करीब नौ वर्षों के अनौपचारिक प्रतिबंध के बाद सत्ता परिवर्तन के बाद यह वापस बाजारों में उपलब्ध हो सकी थी। किताब का पहला संस्करण 2008 में स्पेन में छपा था। लेखक जेवियर मोरी का कहना था कि यह किताब कॉन्ग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी की छवि को नुकसान पहुँचा सकती थी, इसी वजह से यूपीए सरकार के कार्यकाल में उन्हें प्रकाशन से रोका गया।

इस किताब (The Red Sari) का जिक्र दो वजहों से आवश्यक था- पहला उन ‘विचारकों’ के लिए जिन्हें अचानक से 2014 के बाद लगने लगा कि भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नहीं है और दूसरा इसलिए कि एंटोनिया माइनो नाम सोनिया को आखिर किसने दिया?

The Red Sari में बताया गया है कि सोनिया गाँधी के जन्म के समय चर्च के एक पादरी ने ‘एड्विग एंटोनिया अल्बीना माइनो’ रखा था। यह नाम सोनिया को उनकी नानी के नाम पर दिया गया था। साथ ही इस पुस्तक में यह भी जिक्र है कि किस प्रकार सोनिया के पिता स्टेफिनो ने मुसोलिनी के फासिस्ज्म से प्रभावित होकर दूसरे विश्वयुद्ध में अपना नाम एक सैनिक टुकड़ी में लिखवा लिया था।

सोनिया गाँधी की राष्ट्रीयता की वकालत के लिए शेखर गुप्ता के ‘दी प्रिंट’ की पत्रकार ज्योति यादव ने अक्षय कुमार को जरिया बनाया है। उनका कहना है कि ‘राष्ट्रवादी’ जब कनाडा की नागरिकता वाले अक्षय कुमार को भारतीय मानते हैं तो फिर सोनिया गाँधी को इटली का क्यों माना जाता है?

अपने दुराग्रह को सही साबित करने के लिए ‘दी प्रिंट’ यह भूल गया कि वास्तविक मुद्दा सोनिया गाँधी का इटली से सम्बन्ध कभी नहीं रहा, बल्कि विषय यह रहा कि एंटोनिया माइनो जिस क्षेत्र में हैं, वहाँ वह खुद को कितना भारतीय मान पाई हैं या फिर वह सार्वजनिक रूप से जब भी उनकी या उनके परिवार की नागरिकता को बहस का विषय बनाया गया, उनमें से कितनी बार उन्होंने मुखर होकर लोगों के दावों का खंडन करने का प्रयास किया?

जबकि सोनिया गाँधी के विपरीत अक्षय कुमार ने शायद ही कोई ऐसा मौका छोड़ा हो, जब उन्होंने अपने क्षेत्र में रहकर या फिर उसकी सीमाओं से परे जाकर देशवासियों का दिल जीता है। साथ ही वह कई बार अपनी नागरिकता के बारे में भी खुलकर कहते हुए देखे गए हैं, जिस कारण उनकी नागरिकता पर चुटकुले बनाने वालों की बेरोजगारी में असामान्य रूप से बढ़ोत्तरी देखी गई।

इसका सबसे ताजा उदाहरण तो कोरोना वायरस की वैश्विक आपदा के दौरान अक्षय कुमार द्वारा PM-CARE में की गई आर्थिक मदद ही है। अपनी कुल संपत्ति का इतना बड़ा प्रतिशत दान देते समय अक्षय कुमार ने कहा कि उनकी पत्नी ट्विंकल खन्ना ने उन्हें एक बार फिर सोचने के लिए भी कहा लेकिन वह ये कहकर आगे बढ़े कि उन्होंने जब अपना सफर शुरू किया ही था, तब वह शून्य थे इसलिए अगर वह इतनी आर्थिक मदद कर भी रहे हैं तो यह कोई बड़ी बात नहीं।

अक्षय कुमार ने यहाँ तक कहा कि हम अपने देश को भारत माता कहते हैं और ये योगदान असल में मेरा नहीं है बल्कि ये मेरी माँ की तरफ से भारत माता के लिए है। क्या सोनिया गाँधी भी अक्षय कुमार की तरह ही भारत को माता के प्रतीक रूप में स्वीकार कर सकती हैं या ऐसा करने से पहले उन्हें मुस्लिम वोट बैंक और अपनी सलाहकार एजेंसियों की मदद लेनी होगी?

अब यदि अक्षय कुमार के इस बयान को देश का ‘वामपंथी-उदारवादी’ वर्ग महज बयानबाजी साबित करने का प्रयास भी करता है तो क्या उसे सोनिया गाँधी और इसी राजपरिवार से आर्थिक मदद तो दूर की बात, कम से कम ऐसी बयानबाजी की उम्मीद भी नहीं करनी चाहिए जो देशवासियों का हौंसला बढ़ाए या संकट के समय उन्हें यह एहसास दिला सके कि वह उनके साथ खड़े हैं?

बजाए हौंसला बढ़ाने के, यह ‘राजमाता एंटोनिया माइनो‘ ने अपनी फितरत का नमूना पेश करते हुए अपनी असल चिंता व्यक्त की और कहा कि PM-CARES (Prime Minister- Citizen Assistance and Relief in Emergency Situations) रिलीफ़ फंड में जमा धन को बहस का मुद्दा बना दिया। वास्तविकता यह है कि देश के ‘विचारक वर्ग’ ने अपने अन्नदाता इस राजपरिवार और इसकी राजमाताओं से कभी बहुत ज्यादा अपेक्षा भी नहीं रखीं। यदि वह ऐसा करते तो आज वह बौखलाहट में किसी रेंडम नागरिक के महज नाम मात्र पर उनकी वकालत में निबंध नहीं लिख रहे होते।

दी प्रिंट की इस रिपोर्ट में ऐसी कई दलीलें दी गईं हैं जो कि सोनिया गाँधी का पक्ष मजबूत करने के बजाए और भी कमजोर करते हैं। जैसे- दी प्रिंट की लेखक ज्योति यादव इसमें सोनिया गाँधी की ‘भारतीयता’ को उनके साड़ी पहनने और हिंदी बोलने की कोशिश से तौलती हैं। लेकिन क्या महज साड़ी पहनना भारतीयता का प्रतीक है? ऑड दिन पर हिंदी भाषा को भारतीयता न मानना और इवन दिनों में सोनिया की भारतीयता को साबित करने के लिए उनके हिंदी बोलने की कोशिशों को भारतीयता का प्रमाण पत्र बनाना दी प्रिंट की पत्रकारिता का एक नमूना है।

भाजपा विरोधियों ने अक्सर इस बात पर जोर दिया है कि भाजपा सोनिया गाँधी को इटली का मानती आई है, जबकि हर दूसरे देशवासी की तरह ही भाजपा के लिए भी सोनिया गाँधी की नागरिकता और राष्ट्रीयता शायद ही कभी वजह रही हो। प्रश्न हमेशा एंटोनिया माइनो की मंशा पर ही उठे हैं, ना कि राष्ट्रीयता पर। अर्नब गोस्वामी ने भी सोनिया गाँधी की मंशा पर ही सवाल उठाए हैं। और यह सवाल किए भी क्यों न जाएँ?

अक्षय कुमार और एंटोनिया माइनो की राष्ट्रीयता

ईसाई मिशनरियों द्वारा आदिवासियों के धर्मान्तरण को रोकने का प्रयास करने वालों पर बौखलाने वाली सोनिया गाँधी, उन्हें अपनी नफरत का शिकार बनाने वाली सोनिया गाँधी तब क्यों चुप रह जाती हैं जब हिन्दुओं को मॉब लिंचिंग का शिकार बनाया जाता है या फिर जब हिन्दुओं पर अत्याचार किए जाते हैं? क्रिश्चियनों का जिक्र आते ही सोनिया गाँधी को माता पुकारने वाले एक पत्रकार पर हमला बोल देते हैं। क्या इसका सम्बन्ध भी अक्षय कुमार के कनाडा के नागरिक होने से लगाया जाना चाहिए?

दी प्रिंट के इस लेख में तुलना भी एक बॉलीवुड के कलाकार की एक ऐसी महिला से की जाती है, जो किसी भी प्रकार का जोड़-तोड़ कर के कभी भी सत्ता के शीर्ष पर बैठ सकती है। उससे भी बड़ी बात यह कि जिस परिवार से एंटोनिया माइनो जुड़कर भारत आई हैं, उसके पास भारत की सत्ता सबसे अधिक समय तक रही।

वहीं, अक्षय कुमार के अतीत पर यदि नजर डाली जाए तो वह अपनी प्रतिभा के दम पर स्वयं को स्थापित करने वाले एक शानदार कलाकार बनकर उभरने वाले नायक है। सोनिया गाँधी ने भी अपनी प्रतिभा के साथ अवश्य ही इमानदारी की होगी, इसकी तुलना ‘दी प्रिंट’ के स्तम्भकारों पर छोड़ दी जानी चाहिए। इसके साथ ही उनके पास अपनी अभिव्यक्ति और अपने हित चुनने की आजादी भी रही है, और सोनिया गाँधी को अक्षय कुमार से यह सभी विशेषाधिकार अक्षय कुमार से कहीं ज्यादा प्राप्त रहे इसमें कोई विवाद नहीं है।

सोनिया गाँधी की जीवनी में पढ़कर विचार जरुर करें कि अक्षय कुमार और उनके विशेषाधिकारों में कितना अंतर था –

आखिर में यदि देखा जाए, तो यदि नागरिकता के सवाल और इसके द्वारा की जाने वाली तुलनाओं में कुछ देर के लिए भूमिका बदल दी जाए, तो ‘दी प्रिंट’ के ही कुतर्क के अनुसार, यदि सोनिया गाँधी के भारतीय होने से उनकी प्राथमिकताओं का मूल्यांकन नहीं किया जाना चाहिए, तो फिर अक्षय कुमार के कनाडा का नागरिक होने से उनकी प्राथमिकताओं का भी मूल्यांकन करना आखिर किस प्रकार की अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता के अंतर्गत पत्रकारिता बताया गया है? नागरिकता का सवाल उठाने वाले अर्नब गोस्वामी को गुनेहगार बताने वाले ‘दी प्रिंट’ अगर अक्षय कुमार की नागरिकता पर सवाल  उठाकर तुलना करता है तो बेहतर यह है कि देशभक्ति के सर्टिफ़िकेट बाँटने की जगह पर दी प्रिंट को इतना समय स्वयं के मूल्यांकन पर खर्च करना चाहिए

केरल: वामपंथी पार्टी के ऑफिस से मिले फ्री फूड किट का स्टॉक, बाढ़ पीड़ितों के चंदे में भी ऐसी ही धाँधली पकड़ी गई थी

पिछले दिनों केरल में फ्री फूड किट के वितरण की स्कीम शुरू की गई। ये किट सभी राशन कार्ड धारकों के अलावा उन्हें भी बाँटी जा रही है जो लोग क्वारंटाइन में रह रहे हैं। मगर द हिन्दू की रिपोर्ट के मुताबिक राशन कार्डधारकों के बीच वितरण के लिए दिए गए सैकड़ों फूड किट केरल में विभिन्न जगहों पर वामपंथी पार्टी के कार्यालयों से मिले हैं।

यह भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के लिए काफी शर्मिंदगी की बात है। आरोप है कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) की दुकान के मालिकों ने अपने कार्यालयों में नि:शुल्क फूड किट का स्टॉक कर लिया था।

लेफ्ट पार्टी के ऑफिस से मिले फूड किट

बुधवार को, भारतीय जनता पार्टी और कॉन्ग्रेस के कार्यकर्ताओं ने चन्नागसेरी के पास, मदप्पल्ली में भारतीय कम्युनिटी पार्टी (मार्क्सवादी) के एक स्थानीय समिति के कार्यालय के सामने धरना दिया। जिसमें राशन दुकान के डीलर पर फूड किट को पार्टी कार्यालय में पहुँचाने का आरोप लगाया

जिसके बाद, पुलिस की एक टीम घटनास्थल पर पहुँची और दुकान के मालिक को उस सामान को सुरक्षित स्थान पर शिफ्ट करने का निर्देश दिया।

वैकोम में भी मिले 200 PDS किट

गुरुवार को वैकोम के टीवीपुरम में भी इसी तरह की घटना सामने आई थी जब पुलिस और नागरिक आपूर्ति अधिकारियों की एक टीम ने भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के एक कार्यालय पर छापा मारा था। पार्टी कार्यालय में कम से कम लगभग 200 PDS किट मिलने से अधिकारी हैरान रह गए थे।

शुरुआती जाँच से पता चला कि तालुक सप्लाई ऑफिस से पास के एक PDS दुकान में फूड किट पहुँचाई गई थी। दोनों ही मामलों में, व्यापारियों ने दुकानों में जगह की कमी के बहाने किट को पार्टी कार्यालयों में ले गए थे। जिला आपूर्ति अधिकारी ने कहा कि राशन दुकान के डीलरों से स्पष्टीकरण माँगा गया है।

‘शर्तों का उल्लंघन’

एक अधिकारी ने कहा कि प्रारंभिक जाँच में यह पाया गया है कि दोनों डीलरों ने इन फूड किटों को रखने की शर्त का उल्लंघन किया है। उनकी प्रतिक्रिया के आधार पर आगे की कार्रवाई की जाएगी।

इस घटना ने कोट्टायम में विपक्षी दलों के नेताओं के साथ एक राजनीतिक विवाद को जन्म दिया है, जिसमें वामपंथी दलों पर उनकी प्राथमिकताओं के अनुसार सरकार से खाद्य सामग्री के वितरण को विनियमित करने का प्रयास करने का आरोप लगाया गया है।

गौरतलब है कि पिछले दिनों भी केरल में केरल बाढ़ पीड़ितों की सहायता के लिए मुख्यमंत्री राहत कोष में फंड जमा करवाने के नाम पर वामपंथियों का असली चेहरा उजागर हुआ था। कोच्चि म्यूजिक फाउंडेशन ने 1 नवंबर 2019 को बाढ़ पीड़ितों को राहत प्रदान करने हेतु एक कॉन्सर्ट किया था। इसका उद्देश्य पैसा इकट्ठा कर बाढ़ प्रभावित लोगों की आर्थिक मदद करना था। मगर, सीएमडीआरएफ (मुख्यमंत्री राहत कोष) में कोई पैसा जमा नहीं हुआ। एक आरटीआई के जरिए इस तथ्य का खुलासा हुआ, जिसमें राज्य आर्थिक विभाग ने स्वयं इसकी पुष्टि की थी।

इसके अलावा 2018 बाढ़ राहत कोष का पैसा स्थानीय सीपीएम नेता अनवर के अकाउंट में ट्रांसफर कर दिया गया था। एर्नाकुलम जिला कलेक्टर एस सुहास के अनुसार ऐसा जानबूझकर किया गया। शुरुआती जाँच में मार्च 2019 में कलेक्ट्रेट ऑफिस से बाढ़ राहत कोष के 325 लाभार्थियों के नाम सही नहीं पाए जाने का पता चला। इन फर्जी नामों के लिए जो पैसा आया वो कथित तौर पर सीपीएम नेता अनवर के अकाउंट में ट्रांसफर कर दिया गया।

कोरोना की हकीकत जानने में न मदद कर रही, न सुरक्षा दे रही बंगाल सरकार: IMCT

पश्चिम बंगाल की ममता बनर्जी सरकार पर कोरोना संक्रमण से जुड़े तथ्य दबाने और लॉकडाउन के कायदों का सही तरीके से पालन नहीं करने के आरोप हैं। वह केंद्र की इंटर मिनिस्ट्रियल सेंट्रल टीम (IMCT) के साथ भी सहयोग नहीं कर रही है।

इस बाबत आईएमसीटी ने शनिवार को पश्चिम बंगाल के मुख्य सचिव को लिखित शिकायत दी है। इसमें सहयोग नहीं मिलने की बात कही गई है। साथ ही कहा गया है कि राज्य सरकार आईएमसीटी को संक्रमण से बचाव के लिए पर्याप्त सुरक्षा भी नहीं दे रही।

आईएमटीसी ने कहा है कि राज्य में स्थापित कोविड-19 अस्पतालों, क्वारंटाइन सेंटर और कंटेनमेंट जोन के संबंध में उसे समुचित जानकारी नहीं दी जा रही है। इसके लिए वह चार बार पत्र लिख चुका है। केंद्र सरकार की ओर आईएमटीसी राज्यों में कोरोना पर काबू पाने के लिए किए गए प्रबंधों की समीक्षा कर रहा है।

आईएमसीटी ने बंगाल के मुख्य सचिव से पूछा है कि राज्य में किसकी मौत कोरोना की वजह से हुई है, यह किस प्रक्रिया के तहत तय किया जा रहा। उसने निरीक्षण के दौरान पाया कि जॉंच के लिए लोगों को लंबा इंतजार करना पड़ रहा है। इसको लेकर भी नाखुशी जताई गई है।

केंद्रीय गृह मंत्रालय की गाइडलाइंस के अनुसार, राज्यों को पीपीई किट का इंतजाम करना है। लेकिन अब ताज IMCT को पीपीई किट नहीं दी गई। आईएमसीटी का कहना है कि वह राज्य में कोरोना की जमीनी हकीकत का पता लगाना चाहती है ताकि केंद्र के पास राज्य के कोरोना मरीजों और संसाधनों को लेकर सटीक जानकारी हो।

इससे पहले बंगाल में लॉकडाउन का सही तरीके से पालन नहीं किए जाने पर केंद्रीय गृह मंत्रालय ने राज्य के मुख्य सचिव और डीजीपी को पत्र लिखकर सख्त आपत्ति जताई थी। पत्र में कहा गया था कि राज्य में सोशल डिस्टेंसिंग के मानकों का उल्लंघन किया जा रहा है। सुरक्षा एजेंसियों से मिल रहीं रिपोर्ट्स के मुताबिक पश्चिम बंगाल में लॉकडाउन का असर धीरे-धीरे घट रहा है। राज्य सरकार की तरफ से दी जा रही छूट का दायरा बढ़ता ही जा रहा है।

गौरतलब है कि ममता सरकार पर जमीनी हकीकत छिपाने के आरोप लगातार लग रहे हैं। बंगाल बीजेपी ने एक वीडियो ट्वीट कर दावा किया है कि संक्रमण से जान गॅंवाने वाले लोगों का शव रात के अंधेरे में रिहायशी इलाकों में ठिकाने लगाने की कोशिश की जा रही है। उससे पहले केंद्रीय मंत्री बाबुल सुप्रियो ने एक वीडियो ट्वीट किया था जिसमें क्वारंटाइन वार्ड में अव्यवस्था और बदइंतजामी दिख रही थी।

आदिवासियों का ब्रेनवाश किया गया, CAA का भी हुआ था विरोध: पालघर मॉब लिंंचिंग पर आचार्य सभा ने गवर्नर को लिखा पत्र

हिन्दू धर्म आचार्य सभा ने महाराष्ट्र के राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी को पत्र लिख कर पालघर में भीड़ द्वारा साधुओं की निर्मम हत्या की निंदा की है। शुक्रवार (अप्रैल 24, 2020) को लिखे गए पत्र में राज्य सरकार पर इस हत्याकांड के दोषियों को बचाने का आरोप लगाया है।

साथ ही कहा है कि इस क्षेत्र का जिस तरह का इतिहास रहा है, उससे लगता है कि इसके पीछे बड़ी साज़िश है। सभा ने पुलिस पर भी सवाल उठाए हैं, जिसने इस केस को ठीक से हैंडल नहीं किया और बार-बार बयान बदले।

पालघर हत्याकांड पर क्या कहा हिन्दू धर्म आचार्य सभा ने

सभा ने सवाल उठाया है कि जैसा इस क्षेत्र का इतिहास रहा है, यहाँ के लोगों में हिन्दुओं के प्रति दुर्भावना घर कर गई है। उन्होंने निम्नलिखित बिंदुओं के जरिए अपनी बात रखी:

  • इस इलाक़े में रह रहे आदिवासियों ने सीएए का पुरजोर विरोध किया था।
  • दिसंबर 2019 में 12 अवैध बांग्लादेशी प्रवासियों को यहाँ से गिरफ़्तार किया गया, जबकि इसी साल फ़रवरी में 23 अवैध बांग्लादेशी नागरिक गिरफ्तार किए गए थे।
  • यहाँ के अशिक्षित लोगों का ब्रेनवाश किया गया और हिन्दू धर्म के प्रति उनके मन में गलत-गलत बातें भर घृणा पैदा की गई। इनके दिमाग में सनातन-विरोधी बातें डाल दी गई हैं।
  • पूरे धनुआ तालुका के आदिवासी साधु-संतों को ग़लत नज़र से देखते हैं। जबकि, साधु-संत ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ की राह पर चलते हैं, अर्थात ये पूरा विश्व एक ही परिवार है।

सभा ने कहा है कि इन सब बातों को देखते हुए लगता है कि साधुओं की मॉब लिंचिंग कोई साधारण घटना या अपराध नहीं था। इसके पीछे बहुत बड़ी साज़िश है। इस पत्र में महाराष्ट्र सरकार से भी जवाब माँगे गए हैं। कहा गया है कि केन्दीय गृह मंत्री अमित शाह के हस्तक्षेप के बाद और वीडियो वायरल होने बाद जनाक्रोश को देखते हुए राज्य सरकार ने कुछ गिरफ्तारियाँ तो की लेकिन असली गुनहगार अभी भी बचे हुए हैं।

हिन्दू धर्म आचार्य सभा ने राज्यपाल को लिखा पत्र

पुलिस ने जो शिकायत दर्ज की है और वीडियो में जो दिख रहा है, इन दोनों में अंतर है। यह बताता है कि पुलिस इस मामले को ठीक से नहीं हैंडल कर रही है। हिन्दू धर्म आचार्य सभा ने पूछा है कि पुलिसकर्मियों के ख़िलाफ़ अब तक कोई एक्शन क्यों नहीं लिया गया? विश्व हिन्दू परिषद ने भी एक दिन पहले इस हत्याकांड को निर्मम बताते हुए कहा था कि इस क्षेत्र में वामपंथियों का इस तरह से हिंसा करने का इतिहास रहा है। वीएचपी ने पूछा था कि अगर किसी अल्पसंख्यक के साथ ऐसा होता तो क्या मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे इसी तरह चुप रहते?

पालघर: मिशनरी, शारब माफिया और रावण एंगल

पालघर मॉब लिंचिंग को लेकर एक चौंकाने वाली बात ये पता चली है कि इस क्षेत्र में शराब माफियाओं का बोलबाला है। शराब का व्यापार धड़ल्ले से चलता है। सामाजिक सेवा में लगे लोग और साधु-संत इन चीजों का विरोध करते हैं। शराब माफिया ऐसे लोगों को दुश्मन समझते हैं।

पालघर में सक्रिय सामाजिक संस्थाओं ने बताया कि पिछले कई महीनों से ये क्षेत्र धर्मान्तरण और ईसाई मिशनरियों के दुष्प्रचार का गढ़ बन गया है। हिन्दू संगठन इसका विरोध करते हैं और इसलिए साधुओं से वे दुश्मनी पालते हैं। उग्र भीड़ के साथ एनसीपी नेता काशीनाथ चौधरी भी खड़ा था। कहा जा रहा है कि यहाँ के ईसाई मिशनरियों को राजनीतिक संरक्षण प्राप्त है और एनसीपी नेता का वहाँ होना इस बात की पुष्टि करता है। सीपीएम के नेता भी उस भीड़ में शामिल थे। 

उत्तर प्रदेश: शामली में लॉकडाउन का उल्लंघन कर ‘निकाह का मुद्दा’ सुलझाने के लिए बुलाई पंचायत, 28 गिरफ्तार

उत्तर प्रदेश के शामली जिले में लॉकडाउन का उल्लंधन कर पंचायत में हिस्सा लेने के आरोप में 28 लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया है। बताया जा रहा है कि ये पंचायत इसलिए बुलाई गई थी, ताकि गाँव के एक शख्स को लेकर यह तय किया जा सके कि उसका बहिष्कार किया जाए या नहीं।

जानकारी के मुताबिक आरोपित जलालाबाद शहर का रहने वाला है। कथित तौर पर खुर्शीद कुरैशी द्वारा अपने बेटे जावेद के निकाह को रद्द कर दिए जाने के बाद वो क्रोधित था। खुर्शीद कुरैशी के बेटे जावेद की शादी 22 अप्रैल को पड़ोसी गाँव में होने वाली थी।

आरोपित ने खुद को ठगा हुआ महसूस करते हुए आरोप लगाया कि कुरैशी ने बिना उसे सूचना दिए जान-बूझकर अपने बेटे की निकाह रद्द करवाकर किसी और परिवार में उसकी शादी तय कर दी।

हालाँकि, शामली के कुरैशी के परिवार ने कहा कि पुलिस ने उन्हें समारोह के लिए अनुमति नहीं दी, जबकि पुलिस ने दावा किया कि उनसे कोई संपर्क नहीं किया गया था।

डीएसपी अमित सक्सेना ने इस बाबत कहा कि एक वीडियो वायरल हुआ था जिसमें कई लोगों को विवाह विवाद को सुलझाने के लिए बुलाई गई सामुदायिक पंचायत में भाग लेते देखा गया था। इस सभा में अचानक से अपने बेटे जावेद का विवाह कैंसिल कर देने की वजह से खुर्शीद कुरैशी के खिलाफ फैसला सुनाया गया।

लॉकडाउन के उल्लंघन में 28 गिरफ्तार

उन्होंने आगे बताया कि इस दौरान गाँव के कई लोग लॉकडाउन का उल्लंघन कर एक जगह पर इकट्ठे हुए थे। इनके खिलाफ FIR दर्ज की गई है और 28 लोगों को गिरफ्तार भी किया जा चुका है। आरोपितों के खिलाफ आईपीसी की धारा 188, 269, 270 और महामारी रोग अधिनियम की धारा 3 के तहत FIR दर्ज की गई है।

गौरतलब है कि देश में कोरोना वायरस के मद्देनजर 3 मई तक लॉकडाउन जारी है। मगर कुछ लोग लगातार इसका उल्लंघन कर रहे हैं। पिछले दिनों केरल के कासरगोड जिले के एक मस्जिद में लॉकडाउन के दिशा-निर्देशों का उल्लंघन करके नमाज अता करवाने वाले इमाम और एक अन्य व्यक्ति को गिरफ्तार कर लिया गया था।

बिहार के गया जिले में लॉकडाउन के दौरान नियमों का उल्लंघन कर खुली दुकानों को बंद करवाने जब पुलिस की टीम पहुँची तो स्थानीय लोगों ने पुलिसकर्मियों पर हमला कर दिया। हमले में एसआइ ददन प्रसाद व एक अन्य पुलिसकर्मी घायल हो गए।

पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए दो महिलाओं समेत छह हमलावरों को मौके से गिरफ्तार कर लिया। इसके बाद तत्काल पुलिस ने कानूनी कार्रवाई करते दस नामजद और 10 अज्ञात के खिलाफ मामला दर्ज कर लिया। वहीं पुलिस ने गिरफ्तार किए सभी छह आरोपितों को जेल भेज दिया।