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चुनाव से पहले 2 महीने में प्रचार पर AAP की सरकार ने फूँक दिए ₹29 करोड़: RTI से खुलासा

दिल्ली की लगभग हर गली, हर मोहल्ले, हर नुक्कड़ में आम आदमी पार्टी की सरकार का प्रचार-प्रसार करने वाले विज्ञापन आपने देखे होंगे। लेकिन, क्या आप जानते हैं बड़े-बड़े होर्डिंग, मेट्रो में प्रचार से लेकर अखबार के साथ आए पैम्पलेटों के जरिए दिल्ली के घर-घर पहुँचने के लिए अरविंद केजरीवाल की सरकार ने कितना खर्चा किया? शायद नहीं…। तो आइए आज आपको इसी सवाल का जवाब देते हैं।

प्रचार-प्रसार करके अपनी राजनीति साधना हर राजनैतिक पार्टी का काम है। मगर आम आदमी और क्राउड फंडिंग के जरिए खुद को स्थापित करने वाली पार्टी इसमें 2 कदम आगे निकल चुकी है। आरटीआई से प्राप्त जानकारी के अनुसार सिर्फ़ अगस्त से लेकर जनवरी तक में आप सरकार ने प्रचार-प्रसार पर 43 करोड़ रुपए खर्च किए। इसमें से 29 करोड़ रुपए तो केवल बीते दिसंबर और जनवरी में खर्च किए गए।

आरटीआई से हुआ प्रचार-प्रसार पर AAP सरकार के खर्चे का खुलासा

इस आरटीआई को फाइल करने वाले का नाम विवेक कुमार है। विवेक एक्टिविस्ट हैं। उनकी बदौलत आम आदमी पार्टी की इस हकीकत का खुलासा हुआ है। इस तथ्य के सामने आने से यह भी पता चलता है कि केजरीवाल जनता के कितने बड़े हितैषी हैं। जनता का पैसा उसके कल्याण में इस्तेमाल न कर अपनी पार्टी के प्रचार-प्रसार में किया। एक बार फिर दोहरा दें कि केजरीवाल ने जनता के पैसे से 42.47 करोड़ रुपया सिर्फ अपनी पब्लिसिटी करने में खर्च किया।

गौरतलब है कि ये सिर्फ़ पहला मामला उजागर नहीं हुआ है, जहाँ केजरीवाल सरकार की हकीकत इस तरह से सामने आई है। इससे पहले एक आरटीआई से मालूम हुआ था कि दिल्ली की आम आदमी पार्टी सरकार ने अपने शुरुआती चार सालों में सालाना 78 करोड़ रुपए केवल विज्ञापन में खर्च किए। जबकि पूरे चार सालों को देखें तो ये खर्चा 300 करोड़ रुपए के पार था। जी हाँ, 2015 से 2019 तक पार्टी ने विज्ञापन में कुल 311.78 करोड़ खर्च किए।

इसके अतिरिक्त, 2015 में जब आम आदमी पार्टी सत्ता में आई तो उसने 2015-2016 में ₹81 करोड़ विज्ञापन में उड़ाए, जबकि 2016-17 में ये खर्चा 67.25 करोड़ था। सबसे ज्यादा विज्ञापन पर पैसा उड़ाने वाला साल अगर देखें तो आम आदमी पार्टी ने 2017-2018 में ₹117 करोड़ से ज्यादा खर्चा किया।

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ऐसे ही नहीं डूब गया यस बैंक, प्रियंका गाँधी की पेंटिंग खरीदने पर राणा कपूर ने खर्चे करोड़ों

प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने रविवार (मार्च 8, 2020) तड़के मनी लॉन्ड्रिंग मामले में यस बैंक के फाउंडर राणा कपूर को गिरफ्तार कर लिया। गिरफ़्तारी से पहले ईडी के अधिकारियों ने उनसे करीब 30 घंटे से ज्यादा पूछताछ की था। ईडी अधिकारियों ने बताया कि बैंकर को तड़के करीब तीन बजे धन शोधन निवारण कानून (PMLA) के प्रावधानों के तहत गिरफ्तार किया गया, क्योंकि वह जाँच में सहयोग नहीं कर रहे थे।

इस मामले में एक चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक आयकर विभाग ने यस बैंक के पूर्व प्रमोटर राणा कपूर और प्रियंका गाँधी वाड्रा के बीच कथित साँठगाँठ पाया है।

नए खुलासे के अनुसार, राणा कपूर ने प्रियंका गाँधी वाड्रा की एक पेंटिंग खरीदी थी। इसने यस बैंक घोटाले में गाँधी परिवार की भागीदारी को लेकर संदेह बढ़ा दिया है। खुलासे के बाद आयकर विभाग यह जाँच कर रहा है कि क्या यस बैंक के संस्थापक राणा कपूर और कॉन्ग्रेस की महासचिव प्रियंका गाँधी के बीच कोई संबंध है।

मीडिया में आई रिपोर्टों से पता चलता है कि राणा कपूर के गाँधी परिवार के साथ घनिष्ठ संबंध थे। राणा कपूर ने कथित तौर पर प्रियंका गाँधी की 2 करोड़ रुपए में एक पेंटिंग खरीदी थी। यह खुलासा प्रवर्तन निदेशालय द्वारा राणा कपूर से लगभग 30 घंटे तक किए गए पूछताछ के दौरान हुआ। 

ईडी ने शुक्रवार (मार्च 6, 2020) देर रात राणा कपूर के वरली स्थित समुद्र महल बिल्डिंग में उनके घर पर छापे मारे थे। राणा को शनिवार (मार्च 7, 2020) दोपहर दक्षिण मुंबई के बेलार्ड पियर्स स्थित ईडी दफ्तर ले जाया गया। यहाँ उनसे 30 से अधिक घंटों तक पूछताछ की गई। अधिकारियों ने बताया कि राणा कपूर को एक स्थानीय अदालत में पेश किया जाएगा ताकि उन्हें हिरासत में लिया जा सके।

ईडी ने यह कार्रवाई तब की है जब भारतीय रिजर्व बैंक ने गुरुवार (मार्च 5, 2020) को पूँजी की कमी से जूझ रहे यस बैंक पर पाबंदी लगाई, जिससे उसका हर खाताधारक केवल 50,000 रुपए तक ही निकाल सकता है। निजी क्षेत्र के इस बैंक के बोर्ड को तत्काल प्रभाव से भंग कर दिया गया है।

शुक्रवार को SBI के बोर्ड ने यस बैंक में 49 फीसद हिस्सेदारी के अधिग्रहण को सैद्धांतिक मंजूरी दे दी। पिछले दो दिन में केंद्रीय वित्त मंत्री से लेकर आरबीआई गवर्नर और एसबीआई के चेयरमैन तक यस बैंक के ग्राहकों को आश्वस्त करने की कोशिशों में लगे हैं कि उनके मेहनत की कमाई पूरी तरह सुरक्षित है और डूबेगी नहीं।

इससे पहले वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा था कि यस बैंक को बचाने के लिए सरकार और आरबीआई साथ काम कर रहे हैं। वित्त मंत्री ने हर खाताधारक को भरोसा दिलाया कि उनका पैसा सुरक्षित है और वे लगातार आरबीआई के संपर्क में हैं। उन्होंने कहा कि सरकार बैंक के लिए जल्द ही रिजोल्यूशन प्लान लेकर आएगी। उन्होंने कहा कि वह आरबीआई से बात करेंगी कि यस बैंक के जमाकर्ताओं को नकदी की समस्या का सामना न करना पड़े। इसके साथ ही कम से कम एक साल के लिए बैंक में काम करने वालों का रोजगार और वेतन सुनिश्चित किया जाएगा।

कलीम ने दी थी पुलिसकर्मी पर पिस्टल तानने वाले शाहरुख को पनाह, दोनों के अब्बा तिहाड़ में थे साथ-साथ बंद

दिल्ली में हुए हिंदू विरोधी दंगों में पुलिस पर पिस्तौल तानने वाले मोहम्मद शाहरुख को पिछले दिनों यूपी के शामली से गिरफ्तार किया गया। उसकी गिरफ्तारी के बाद पुलिस ने उसे पनाह देने वाले 28 वर्षीय कलीम को भी शामली से पकड़ा है। कलीम अतंरराष्ट्रीय स्तर का ड्रग तस्कर है।

कलीम के मुताबिक, 27 फरवरी की रात शाहरुख पठान उसके पास कैराना में रात को 2-2:30 पहुँचा। जब वह शाहरुख से मिला तो उसकी कार टूट-फूट चुकी थी। उसका मोबाइल भी काम नहीं कर रहा था। कलीम ने उससे कुछ सवाल किए, लेकिन शाहरुख ने उसे अपने अपराधों के बारे में कोई बात नहीं बताई। उसने केवल खुद को पुलिस से बचाने को कहा। इसके बाद कलीम को उस पर शक हुआ। बावजूद इसके उसने उसे अपने पास पूरी रात रखा। सुबह होते ही हरियाणा के पानीपत जाने के लिए बस अड्डे पर छोड़ आया।

कलीम के अनुसार वो शाहरुख के साथ पिछले 2 साल से संपर्क में था। दोनों की मुलाकात दिल्ली के तिहाड़ में हुई थी। दोनों दिल्ली के तिहाड़ में बंद अपने अपने पिता से मिलने जाते थे। इसी बीच दोनों की बातचीत बढ़ी और दोनों एक-दूसरे के साथ संपर्क में रहने लगे। पुलिस ने सभी सिरों को तलाशने के बाद कैराना के बिसातयान मोहल्ले में कलीम के घर पर दबिश दी थी, लेकिन उस समय वह उन्हें मिला नहीं था।

इसके बाद पुलिस ने उसे शनिवार को शामली से गिरफ्तार किया। गिरफ्तारी के बाद मालूम हुआ कि कलीम को 235 किलोग्राम गांजा तस्करी के पुराने केसों में भी वांछित था। दिल्ली पुलिस की नारकोटिक्स सेल में उसके खिलाफ़ मामला भी दर्ज है। साथ ही मेरठ कोर्ट से उसके ख़िलाफ़ गैर जमानती वारंट भी जारी हुआ था।

गौरतलब है कि शाहरुख की गिरफ्तारी के बाद उसके ड्रग तस्करों से संबंधों का लगातार खुलासा हो रहा है। कुछ दिन पहले मालूम हुआ था कि न केवल शाहरुख का अब्बा ड्रग तस्करी में जेल जा चुका है, बल्कि उसकी अम्मी के भी ड्रग तस्करों से ताल्लुकात हैं। साथ ही मौसा भी एक ड्रग तस्कर है। इतना ही नहीं, शाहरुख का
ननिहाल भी बरेली के मीरंगज के खानपुरा मोहल्ले में है। यह उन इलाकों में से एक है जहॉं कई बड़े ड्रग तस्कर रहते हैं। शायद इसलिए उसने खुद को पुलिस से बचाने के लिए इस जगह पर छिपना मुनासिब समझा था।

बता दें, इस पूरे मामले की जाँच के दौरा अभी तक पुलिस को कई अहम सुराग मिल चुके हैं। ड्रग तस्करों से संबंध के अलावा पुलिस ने शाहरुख की पिस्टल समेत तीन कारतूस बरामद कर लिए हैं। इसके अलावा उसका एक अन्य फोन भी बरामद हुआ। अब पुलिस इनकी जाँच फॉरेंसिक लैब में करवा रही है।

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बनारस से 30 किमी दूर मिला 3500 साल पुराना शिवलिंग, गुप्तकाल में मंदिर होने के मिले साक्ष्य

बनारस शहर से करीब 30 किलोमीटर दूर बभनियॉंव गॉंव में चल रही खुदाई के दौरान सैकड़ों वर्ष पुराना शिवलिंग मिला है। जानकारी के मुताबिक काशी हिन्दू विश्वविद्यालय यानी BHU के प्राचीन इतिहास विभाग की एक टीम यहाँ पुरातात्विक खुदाई में जुटी है। इसी दौरान उन्हें यहाँ से ये अवशेष मिले। इस खोज के साथ ही गुप्तकालीन ईंटों से बने मंदिरों के शहरों की लिस्ट में अब उत्तर प्रदेश का बनारस शहर भी शुमार हो गया।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, वाराणसी हेरिटेज प्रोजेक्ट्स के अंतर्गत पंचकोस परिक्रमा के लिए आस-पास के क्षेत्रों में सर्वे का काम शुरू किया गया था। उसी दौरान बभनियॉंव गाँव में कई सौ साल पुराने अवशेष मिले। यहाँ ताम्र पाषाण काल के मिट्टी के बर्तनों और कुषाण काल की ब्राह्मी स्क्रिप्ट के मिलने के बाद जब बीएचयू के पुरातत्व विभाग ने खुदाई शुरू की तो 3500 वर्ष पुराना गुप्तकालीन शिवलिंग मिला। BHU के प्राचीन इतिहास के प्रोफेसर मानते हैं यह स्थान गुप्त काल के दौरान लोगों का उपासना स्थल रहा होगा।

हिंंदुस्तान की रिपोर्ट के अनुसार, उत्खनन के निदेशक प्रो. एके सिंह ने इस शिवलिंग के बारे में जानकारी देते हुए बताया कि यह एक जीवंत मंदिर रहा होगा। इस पर बहुत सालों तक जल चढ़ाया गया होगा जिससे कि यह घिस गया है। इसका अरघा एक वर्ग मीटर का है। उत्तर की ओर से आए पानी के बहाव ने मंदिर को ज्यादा क्षतिग्रस्त किया है। मंदिर का मलबा गिरने से अरघा उत्तर की ओर झुक गया होगा। अब तक इसके आधे भाग का उत्खनन हुआ है। इस मंदिर का गर्भगृह दो वर्ग मीटर से बड़ा है। गुप्तकाल की ईटों से बने मंदिर कम मिलते हैं। बभनियॉंव का यह मंदिर उनमें से एक है।

बता दें बीएचयू के पुरातत्व विभाग द्वारा की गई खुदाई में मिट्टी के बर्तन और कई तरह की मूर्तियाँ भी मिली हैं। इसके अलावा ब्लैक एंड रेड बर्तन भी मिले हैं। इन बर्तनों का बाहरी हिस्सा काला और अंदरूनी हिस्सा लाल है। इसे देख बीएचयू के इतिहासकारों का कहना है कि ऐसे बर्तन ताम्र पाषाण काल में यानी आज से 1500 ईसापूर्व (3500 वर्ष पहले) बनते थे।

गौरतलब है कि इसी खोज के साथ भारतीय इतिहास का स्वर्णकाल कहे जाने वाले गुप्तकाल के दौर में काशी का भी एकमंदिर शुमार हो गया है। इससे पहले प्रदेश में कानपुर व सैदपुर भितरी में गुप्तकालीन मंदिर के अवशेष मिल चुके हैं। अब यब मंदिर गुप्तकाल की संस्कृति को हमेशा याद दिलाता रहेगा।

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व्रत था, कहा- मुझे जल्दी जाना होगा… क्या पता था कि वो सदा के लिए चले जाएँगे

उत्तर-पूर्वी दिल्ली के हिंदू विरोधी दंगों में अब 53 लोगों की मौत की पुष्टि हो चुकी है। 200 से अधिक जख्मी हैं। दंगों दिल्ली पुलिस के हेड कॉन्स्टेबल रतनलाल की भी जान चली गई थी। पोस्टमार्टम रिपोर्ट बताती है कि उन्हें गोली मारी गई थी।

रतनलाल की पत्नी पूनम ने बताया कि जिस दिन उनकी मौत हुई, उन्होंने सोमवार का व्रत रखा हुआ था। पत्रिका से बात करते हुए वो कहती हैं, “सुबह से भूखे थे। सुबह साढ़े आठ बजे घर से निकलते हुए उन्होंने कहा था कि उनके बॉस फील्ड में अकेले हैं। दंगे भड़क गए हैं। मुझे जल्दी जाना होगा…और चले गए। मुझे क्या पता था कि वो सदा के लिए चले जाएँगे। उस दिन उनकी तबीयत खराब थी, लेकिन फिर भी ड्यूटी चले गए।”

पूनम कहती हैं कि जब वह ड्यूटी पर गए तो उन्होंने खैरियत जानने के लिए उनको फोन भी किया था। लेकिन उन्होंने फोन नहीं उठाया। उसके बाद उनका फोन बंद आने लगा। दोपहर बाद जैसे ही रतनलाल की पत्नी ने टीवी पर हेडलाइन देखी तो बेहोश हो गईं। लोगों ने उन्हें दिलासा दिलाने की कोशिश की कि चोटें लगी हैं, मगर कुछ ही समय में पुष्टि हो गई कि अब रतनलाल इस दुनिया में नहीं रहे। इसके बाद उनके ऊपर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा।

बता दें कि रतनलाल ने घटना से दो दिन पहले ही माँ संतरा देवी व भाई दिनेश से फोन पर बात की थी। उन्होंने माँ से हाल-समाचार पूछने के साथ ही इस बार होली पर गाँव आने का वादा किया था, लेकिन बेबस माँ को क्या पता था कि उनकी बेटे से आखिरी बार बात हो रही है। रतनलाल का कभी किसी से लड़ाई-झगड़े की बात तो दूर, ‘तू तू मैं मैं’ से भी वास्ता नहीं रहा। फिर भी उपद्रवियों ने उन्हें मार डाला और हँसते-खेलते परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा।

बलिदानी रतनलाल की पत्नी भावुक होते हुए कहती हैं कि वो अपने तीनों बच्चों को अब अकेले कैसे सँभालेंगी? 42 वर्षीय रतनलाल परिवार में कमाने वाले इकलौते सदस्य थे। वे मूल रूप से राजस्थान के रहने वाले थे और 1998 में दिल्ली पुलिस में बहाल हुए थे।

24 फरवरी को चॉंदबाग इलाके में हुई हिंसा में रतनलाल की मौत हुई थी। कुछ विडियो सामने आए हैं जो इस हिंसा के सोची-समझी साजिश होने की गवाही देते हैं। विडियो में हिंसा भड़कने से पहले कुछ लोग सीसीटीवी को तोड़ते साफ तौर पर दिखाई पड़ते हैं। इसके बाद पुलिस को कॉल कर बुलाया जाता है। डीसीपी अमित शर्मा, एसीपी अनुज, हेड कॉन्स्टेबल रतनलाल व अन्य पुलिसकर्मी जब वहाँ पहुँचे, तो हिंसक भीड़ ने हमला कर दिया। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार सीसीटीवी फुटेज के आधार पर क्राइम ब्रांच हमलावरों की पहचान कर चुकी है। जल्द ही इनके गिरफ्त में होने की बात कही जा रही है।

इसी हमले में रतनलाल को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा। एसीपी अनुज घायल हुए और डीसीपी अमित शर्मा को गंभीर चोटें आईं। हमले का जो विडियो सामने आया है उसमें दंगाई भीड़ दिल्ली पुलिस पर लाठी और पत्थर से हमला करती नजर आ रही है। भीड़ में शामिल बुर्का धारी महिलाएँ भी पुलिस पर हमला करते हुए नजर आती हैं। गोली चलने की आवाज भी सुनाई पड़ती है। डीसीपी अमित शर्मा की पत्नी ने भी कहा है कि उनके पति महिला प्रदर्शनकारियों से बात करने गए थे। लेकिन, वहॉं उन पर हमला कर दिया गया। एसीपी अनुज कुमार ने भी उस भीड़ की हिंसा के बारे में बताते हुए कहा था, “डीसीपी अमित शर्मा के मुँह से खून निकल रहा था। आँखें ऊपर की ओर हो चुकी थी। भीड़ 5-10 मीटर पर थी। हम पर पथराव हो रहा था। फिर मैंने जब डीसीपी को देखा तो आशाहीन हो गया। जैसे-तैसे मैंने खुद को सॅंभाला और डीसीपी को डिवाइडर पर लगी ग्रिल के उस पार किया।”

उन्होंने बताया था, “24 फरवरी को मैं शाहदरा के डीसीपी अमित शर्मा को जख्मी होने के बाद अस्पताल ले जा रहा था। इस दौरान भी प्रदर्शनकारी पथराव कर रहे थे और मुझे भी सिर पर चोट लगी। हमें नहीं पता था कि रतनलाल को गोली लग गई थी। हम रतनलाल को जीटीबी अस्पताल ले गए, जहाँ उसे बचाया नहीं किया जा सका और फिर बाद में हम डीसीपी को मैक्स अस्पताल में ले गए।”

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ताहिर हुसैन की पिस्टल, मोबाइल जब्त: AAP के MLA अमानतुल्लाह ने कहा- मुस्लिम होना सबसे बड़ा गुनाह

उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुए हिंदू विरोधी दंगों में हिंसा भड़काने एवं आईबी के अंकित शर्मा की हत्या का आरोपित निगम पार्षद ताहिर हुसैन शुक्रवार (मार्च 6, 2020) को कड़कड़डूमा कोर्ट में पेशी के बाद 7 दिन की पुलिस रिमांड में भेज दिया गया। दंगों में भूमिका सामने आने के बाद पार्टी से निलंबित कर आप ताहिर से पल्ला छुड़ाने की कोशिश कर रही है। लेकिन, ओखला से पार्टी के विधायक अमानतुल्लाह खान अब भी उसका बचाव कर रहा है। उसने ताहिर की गिरफ्तारी को मजहबी रंग देने की कोशिश भी की है।

अमानतुल्लाह ने ट्वीट कर कहा है, “आज ताहिर हुसैन सिर्फ इस बात की सजा काट रहा है कि वो एक मुस्लिम है। शायद आज हिंदुस्तान में सबसे बड़ा गुनाह मुस्लिम होना है। ये भी हो सकता है कि आने वाले वक्त में ये साबित कर दिया जाए कि दिल्ली की हिंसा ताहिर हुसैन ने कराई है।”

अमानतुल्लाह का बयान आने के बाद भाजपा नेता गौतम गंभीर ने भी आप विधायक पर पलटवार किया। उन्होंने लिखा, “सुंदरकांड का पाठ कराने चले…और कुछ सुंदर ना रहा… पर सुनियोजित कांड ज़रूर हुआ! देश की रक्षा करने वाले अंकित शर्मा पर 400 वार हुए जिसका आरोप ताहिर पर है और अपनी ज़ुबान से देश को बाँटने और धर्म पर वार करने का काम आप के विधायक कर रहे हैं? सवाल “आप” की नीयत पर है!”

ताहिर दंगों में अपना नाम सामने आने के बाद फरार हो गया था। इस बीच उसकी संलिप्तता की गवाही देते कई विडियो सामने आए। चश्मदीदों के अनुसार उसकी इमारत में करीब तीन हजार दंगाई जमा थे। वहॉं से हिंदुओं को निशाना बना पत्थरबाजी हुई। पेट्रोल बम फेंके गए। गोलियॉं चलाई गई। उसकी इमारत से पत्थरों और पेट्रोल बम का जखीरा बरामद किया गया था। शुरुआत में आप ने भी उसका बचाव करने की कोशिश की थी। 5 मार्च को दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच ने राऊज एवेन्यू कोर्ट की पार्किंग से उसे तब दबोचा था जब वह अपने वकील के साथ पार्किंग में मास्क लगाए पहुँचा।

पुलिस ने ताहिर हुसैन की लाइसेंसी पिस्टल और कारतूस जब्त कर उन्हें फॉरेंसिक जाँच के लिए भेज दिया है। जाँच पूरी होने के बाद मालूम चलेगा कि उससे फायर हुआ था या नहीं। पिस्टल के अलावा एक मोबाइल भी बरामद किया गया है।

गंगाजल स्टाइल में दबोचा गया ताहिर हुसैन, चकमा देने के लिए बुर्का की जगह पहन रखा था…

ताहिर हुसैन के भाई शाह आलम की तलाश: जहाँ हुई IB के अंकित शर्मा की हत्या वहाँ मौजूद था

ताहिर हुसैन के निशाने पर पहले से थे IB के अंकित शर्मा, हत्या के वक्त बांग्लादेशी आतंकी भी थे मौजूद!

पश्चिम बंगाल: BJP बूथ प्रेसिडेंट देवाशीष मंडल की निर्मम हत्या, TMC के गुंडों ने ली एक और जान

राजनीतिक हिंसा के लिए बदनाम पश्चिम बंगाल में एक और बीजेपी कार्यकर्ता की हत्या कर दी गई है। इस बार भी आरोप सत्ताधारी दल टीएमसी के गुंडों पर ही लगा है। गंगा सागर में देवाशीष मंडल की हत्या किए जाने की खबर बंगाल बीजेपी ने अपने ट्विटर हैंडल से दी है। देवाशीष बंगाल बीजेपी के बूथ प्रेसिडेंट थे। बीजेपी बंगाल ने अपने ट्विटर हैंडल से ट्वीट करते हुए लिखा कि ममता सरकार के राज में भाजपा कार्यकर्ता के खिलाफ राजनीतिक हिंसा की घटनाएँ लगातार बढ़ रही हैं।

पिछले दिनों पश्चिम बंगाल के सोनारपुर में एक बीजेपी नेता नारायण विश्वास की निर्मम हत्या कर दी गई थी। उनकी हत्या का आरोप भी टीएमसी पर लगा था। गुंडों ने पहले मृतक को गोली मारी गई और जब वो जख्मी होकर नीचे गिर गए, तो हमलावरों ने धारदार हथियार से उनकी हत्या कर दी।

देवाशीष की हत्या ऐसे वक्त में की गई है जब केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह हाल ही में बंगाल में रैली कर लौटे हैं। उनकी रैली के बाद भाजपा कार्यकर्ताओं को निशाना बनाने की कई घटना सामने आई है। गौरतलब है कि 1 मार्च को अमित शाह के दौरे के दौरान टीएमसी के गुंडों ने भाजपा के कार्यालय में तोड़-फोड़ करने के बाद आग के हवाले कर दिया था। भाजपा ने उस समय आरोप लगाया था कि इस घटना को तृणमूल कॉन्ग्रेस के उपद्रवियों ने अंजाम दिया है, क्योंकि राज्य में भाजपा की संगठनात्मक शक्ति बढ़ रही है और टीएमसी इससे भयभीत है।

इतना ही नहीं, अमित शाह की रैली में जाने की वजह से एक महिला बीजेपी नेता के घर पर फायरिंग भी की गई थी। टीएमसी के गुंडों ने बीजेपी नेता अर्चना विश्वास के घर पर दो राउंड फायरिंग की थी। भाजपा ने दावा किया था कि उनके घर के ऊपर टीएमसी के गुंडों ने इसलिए फायरिंग की, क्योंकि उन्होंने 1 मार्च को अमित शाह की रैली में हिस्सा लिया था।

इसके साथ ही सीएए के समर्थन में 1 मार्च को कोलकाता के शहीद मीनार मैदान में हुई केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की सभा से लौट रहे भाजपा कार्यकताओं पर भी हमले हुए। भाजपा ने आरोप लगाया था कि महानगर के हेस्टिंग्स व हुगली जिले में शाह की सभा से लौट रहे भाजपा कार्यकर्ताओं पर टीएमसी के गुंडों ने हमला किया। उनका कहना था कि इन घटनाओं में दर्जन भर कार्यकर्ता जख्मी हुए। 

इससे पहले टीएमसी के गुंडों ने जलपाईगुड़ी जिले के सात भाजपा समर्थकों के घरों में तोड़-फोड़ के बाद आग लगा दी थी। भाजपा ने इसके लिए टीएमसी को जिम्मेदार ठहराया था।

जब आप मुझे मेरे शब्दों के चयन पर ज्ञान देते हैं, उसी वक्त कोई ताहिर पेट्रोल बम बना रहा होता है

कई दोस्त, शुभचिंतक, वरिष्ठ सहकर्मी से लेकर डिजिटल दुनिया के मित्र आदि हमेशा सलाह देते हैं कि मुझे अपनी भाषा पर नियंत्रण रखना चाहिए वरना भविष्य में मेरे ये कथन/शब्द/अभिव्यक्तियाँ मेरे पीछे पड़ जाएँगी, कमज़ोर करेंगी। वो जो बात मुझे कहना चाहते हैं, वो मैं समझता हूँ। उनकी मंशा भी अच्छी है, मैं वो भी देख पा रहा हूँ।

ऐसा नहीं है कि मैंने नियंत्रण नहीं किया है। किया है, काफी हद तक किया है। लेकिन मैं जिससे लड़ रहा हूँ, मैं सभ्यता के जिस दौर में हूँ, मेरे हाथों की उँगलियों ने जो शस्त्र धारण किए हुए हैं, वो राम और कृष्ण के युग की आदर्शवादिता और सामयिकता से नहीं समझे जा सकते।

आज मेरा दुश्मन युद्ध के किसी भी नियम से नहीं चलता। वो हर दिन, हर घटना के बीतते ही, नए पैंतरे बदलता है, छल का सहारा लेता है, पीछे से वार करता है, छवि को धूमिल करने के लिए तमाम सामाजिक रूप से स्वीकार्य शब्दों का प्रयोग करता है। और आप चाहते हैं कि मैं उन्हें सम्मानसूचक शब्दों से लताड़ता रहूँ?

अंकित शर्मा को जब मजहबी झुंड चाकू मार रहा होगा तब क्या उनमें से किसी की भी घृणा का स्तर, मेरे द्वारा इस्तेमाल किए गए किसी भी शब्द से कम रहा होगा? दिलबर नेगी के हाथ-पाँव काट कर जला देने वाली मजहबी भीड़ की क्रूरता का सामना मेरे द्वारा लिखे या बोले गए कोई भी शब्द कर सकते हैं?

क्या मेरे द्वारा अभिव्यक्त शब्दावली का कोई भी शब्द इतना मारक हो सकता है जितना फारूक फैसल के राजधानी स्कूल पर लगी गुलेल से फेंके गए पेट्रोल बम होंगे? वो कौन-सा शब्द है जो मैंने लिखा या बोला, जिसका घाव ब्रह्मपुरी के विनोद को घसीट कर ले गए 40 कट्टरपंथियों द्वारा दिए गए उस घाव से गहरा है जिससे उनकी हत्या की गई?

हिन्दुओं की मूर्खता और उसके घातक परिणाम

यही मूर्खता हिन्दू करता आया है, और इसी मूर्खता की उम्मीद मुझसे की जा रही है। इसी मूर्खता के कारण हिन्दू अपने मंदिर गँवाता रहा। इसी मूर्खता का परिणाम है कि मंदिर के पुजारी को अपनी युवा बेटियों को दूसरे के घर में छुपाना पड़ता है, लेकिन वो इतना अनभिज्ञ है कि वो कैमरे पर पॉलिटिकली करेक्ट होने के चक्कर में ये बोलता है कि मंदिर पर पत्थर कौन फेंक रहा था उसे पता नहीं।

न तो सेकुलर शब्द या भाव भारतीय है, न ही उसका इस धरती पर होना आवश्यक है। ये शब्द ही वो छलावा है जहाँ अचानक से एक खूनी, आतंकी मजहब का पारम्परिक शिकार धर्म स्वयं को आक्रांता बना पाता है। मंदिर भी तुम्हारे टूटे, दंगों में मरे भी तुम, तुम्हारे ही 59 कार सेवकों को भी जलाया और तुम्हारे ही खिलाफ झूठी कहानी गढ़ी गई कि गर्भवती महिला के पेट के बच्चे को भी निकाल कर मार दिया गया।

कल को फिर से कहानी रची जाएगी कि अंकित शर्मा तो ताहिर हुसैन के घर में आग लगाने जा रहा था, और आत्मरक्षा में उसकी हत्या हो गई, उसके बाद सरकार और पुलिस ने डॉक्टर पर दबाव बनाया और कहा कि पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट बदल डालो, उसे क्रूर बनाओ। तुम इंतजार करो, ये कहानी भी आएगी और उनका तंत्र इतना मजबूत है कि वो पोस्टमॉर्टम करने वाले डॉक्टरों को खारिज कर देंगे, पैसे खाने वाला बता देंगे और अंततः अंकित शर्मा गायब हो जाएगा हमारी सामूहिक स्मृति से।

वो अपने चोर तबरेज को भी याद रखते हैं, लाखों की भीड़ जुटाते हैं। उन्हें झूठ के झूठ साबित होने के बाद भी उसे बोलते रहना आता है। और हम इस इंतजार में हैं कि हमारे लिए जो लिख-बोल रहा है, उसको हम तभी पढ़ेंगे जब वो अपनी भाषा में सुधार लाएगा। और हाँ, मथुरा के भरत, दिल्ली के अंकित, रविंदर, ध्रुव त्यागी, सक्सेना समेत तमाम हिन्दुओं की भीड़ हत्या तो हम भूल ही गए हैं। क्योंकि हमारा पूरा फोकस इस पर है कि यार, वो बोलता तो सही है लेकिन बीच में ‘साला’ बोल जाता है!

हम एक अनवरत युद्ध का अनचाहा हिस्सा बन चुके हैं

आप लोगों को अंदाजा नहीं है कि हम किस समर के केन्द्र में हैं। आप ही को मारने की समग्र तैयारी होती है। मजहबी फसादी छतों से हवाई हमले करते हुए, जमीन पर बंदूक, पत्थर, तलवार से आक्रमण करते हैं, और लाशों को नाली में फेंक रहे हैं, और आपको इस बात की पड़ी है कि उसने तो ट्वीट में ‘फक’ लिख दिया यार, ऐसे नहीं लिखना चाहिए।

वो दुर्गा को वेश्या कहें, चलेगा। वो ‘फक हिन्दुत्व’ लिखें, चलेगा। वो देवी काली को मुस्लिम बना कर हिजाब पहना दें, चलेगा। वो स्वास्तिक के पवित्र प्रतीक में आग लगाएँ, पैरों से तोड़े, चलेगा। वो ॐ को मरोड़ कर नाजियों वाला प्रतीक बना दें, चलेगा। वो शिवलिंग पर कंडोम चढ़ा दें, चलेगा। वो कृष्ण को बलात्कारी बताएँ, चलेगा।

ये सारी गालियाँ चलेंगी क्योंकि ‘हम में और उनमें अंतर रहना चाहिए।’ यही तर्क है ना आपका? आपको ये समझ में नहीं आ रहा कि उनके तंत्र ने कैसे हर छोटी बात पर ‘आपातकाल’ बोल कर आपको धीरे-धीरे अपने मालिकों द्वारा लाए गए उस वीभत्स राजनैतिक और सामाजिक दौर की वास्तविकता से दूर कर दिया। आप उस वक्त पैदा नहीं हुए थे, या काफी छोटे थे, पढ़ना और रिसर्च करना आपके वश की बात है नहीं, तो अब आपको कोई ‘आपातकाल’ कहेगा तो आपको लगेगा कि इंदिरा गाँधी के समय में किसी चोर को किसी भीड़ ने मारा होगा, उसी को ‘आपातकाल’ कहते होंगे।

आपको अंदाजा भी है कि वो चाकू भी मार रहे हैं, और शब्दों के प्रयोग से आपकी स्मृति से अपने राजनैतिक मालिकों के कुकर्मों को धोते भी जा रहे हैं। आप पढ़िए दंगों की कवरेज। आप सुनिए तो रवीश को कि कैसे दस मिनट में नौ मिनट वो फैजान और नईम के जले दुकानों की भावुक बात करता है, और अंत में यह भी कहता है कि राहुल का भी जल गया। बरखा दत्त ने अंकित शर्मा की नृशंस हत्या पर कुछ नहीं लिखा, पर रिक्शाचालक इमरान को किसी हिन्दू ने कथित तौर पर थप्पड़ मार दिया तो भावुक काव्य रचना में लीन है।

आप देखिए तो ‘द वायर’, ‘क्विंट’, ‘स्क्रॉल’, ‘एनडीटीवी’, ‘दी प्रिंट’ जैसों की कवरेज। गिन लीजिए कि कितने ग्राउंड रिपोर्ट हैं, कितने कट्टरपंथियों की कहानी है, और कितने हिन्दुओं की। देखिए जा कर कि पूरी दुनिया को जो पेट्रोल बम, पत्थरों का ढेर, एसिड की बोतलें कट्टरपंथियों के छतों पर दिख रही है, वो इन लोगों को क्यों नहीं दिख रही। वो इसलिए महोदय, कि हम साल भर बाद अगर खोजें, तो हमें सिर्फ कट्टरपंथियों की ही कहानियाँ मिलें कि उन्हीं पर हमला हुआ।

इसलिए शब्दों पर मत जाइए, भाव समझिए। आपको यह समझना ही होगा कि ‘आपातकाल’ जैसे शब्दों को मुक्तहस्त प्रयोग समाज को मेरे द्वारा बोले गए ‘दोगलेपन’ जैसे शब्दों से ज्यादा नुकसान पहुँचाता है। ‘फक’ शब्द से ज्यादा घातक ‘फक हिन्दुत्व’ है, और उससे भी ज्यादा घातक हमारी यह सोच है कि उनके एक पोस्टर से क्या होगा। अरे भाई, वो पोस्टर भी उन्होंने हिन्दुओं से ही बनवाया और उनके ही हाथों में रखवाया है। विवेक का इस्तेमाल करो, समझ जाओगे!

सबूत सामने फिर भी पाप हिन्दुओं के सर कैसे?

सड़कें पत्थरों से पटी हुई हैं, मस्जिदों की छतों पर पत्थर दिख रहे हैं, समुदाय विशेष के लोगों के घर के ऊपर युद्ध लड़ने के मकसद से पेट्रोल बम, एसिड, पत्थर और आग लगाने का सामान इकट्ठा दिख रहा है, और फिर भी आपको बताया जा रहा है कि ये ‘हिन्दुओं द्वारा मुस्लिमों के सफाए की साजिश है’, ‘ये मुस्लिमों का पोगरोम है’, ‘ये मुस्लिमों का नरसंहार है’।

सबूत हमारे सामने चीख रहे हैं लेकिन ‘लागा सेकुलरिज्म का दाग’ ऐसा गहरा है कि दिमाग के तंतुओं तक पर उसकी परत चढ़ी हुई दिख रही है। सबूत हिन्दुओं की लाशें हैं, और उनको मारने का तरीका है। उनको मारने के तरीके में निहित घृणा दिख रही है। आपको नहीं दिखेगी क्योंकि आप दंगा साहित्य के कवियों को पढ़ते हैं जो आज भी कह रहे हैं, “यार! मरे तो दोनों ही तरफ के लोग हैं!”

ये क्या पागलपन है! एक भीड़ मारने के लिए ही निकली थी। वो भीड़ जल-थल-नभ पर तैयार खड़ी थी। वो जानती थी कि हिन्दुओं के इस नरसंहार की कोशिश में उसके अपने भी मरेंगे। वो तैयार थे अपनी लाशें भी गिराने के लिए। योजना तो काफी सघन थी, लेकिन ताहिर या फारूक की छतों से दंगा-फसाद करने वाली इस्लामी भीड़ यह भूल गई कि नीचे दौड़ कर चाकू, पत्थर और गोली चलाने वाली भीड़ भी कट्टरपंथियों की ही है।

हिन्दू का क्या था, वो तो आलोक तिवारी या दिनेश की तरह सुबह अपने बच्चों के लिए दूध लाने निकला था। वो किसी वीरभान की तरह ऐसे ही बाहर निकला होगा। उसने तो तैयारी नहीं की थी। उसकी घात में तो हवा से पेट्रोल बम फेंकते, जमीन पर पत्थर, चाकू और पिस्तौल लिए कट्टरपंथियों की एक भीड़ तैयार थी।

इलाके का अल्पसंख्यक हिन्दू, हवा से भी गोली का शिकार हो सकता था, जमीन पर चाकू से मारा जा सकता था, नाली में फेंक कर मारा जा सकता था। हर जगह भीड़ थी। अब ताहिर के छत की भीड़ को या फैसल फारूक के छत पर से गुलेल ताने, रायफल से निशाना साधती भीड़ को क्या पता कि नीचे भी उसी के पैदल सिपाही हैं। भीड़ में निशाना भी कितना लगाओगे। परिणामवश कट्टरपंथियों को भी कट्टरपंथियों ने ही मार डाला होगा, इससे इनकार नहीं किया जा सकता।

सेकुलर-सेकुलर खेलना बंद करो, हलाल तंत्र को समझो

इसलिए, ‘दोनों तरफ के मरने वाले हैं’ वाला गीत गाना बंद करो। सच्चाई को स्वीकारो कि दंगे की तैयारी उस इलाके के कथित अल्पसंख्यक कर रहे थे। पत्थर इकट्ठा हो रहा था, पेट्रोल बम बन रहे थे, गुलेल बनाए जा रहे थे, हथियार जुटाए जा रहे थे। हिन्दू क्या कर रहा था? वो शायद उसी दुकान से सामान खरीद रहा था जो दंगाइयों को पेट्रोल खरीदने के लिए चंदा दे कर मदद कर रहा होगा।

दो ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था है हलाल तंत्र की। दो ट्रिलियन का मतलब जानते हो? भारत की पूरी अर्थव्यवस्था के दो तिहाई के बराबर। तुम्हारा तंत्र कहाँ है? तुम इस बात पर आह्लादित रहते हो कि ‘मैं तो ये भी नहीं जानता कि मेरी पूजा के लिए धूप, माला और प्रसाद कौन बनाता है?’ ये मूर्खता है क्योंकि ये जानना धार्मिक कारणों से भी जरूरी है कि तुम्हारे पूजा के फूल पर किसी आतंकी के रक्तरंजित हाथों का खून तो नहीं, और नैतिक कारणों से भी कि जो पैसा तुम दे रहे हो, वो किसी अनैतिक कार्य के लिए तो खर्च नहीं हो रहा।

तुम्हें जानना चाहिए कि तुम्हारा व्यापार किसके साथ हो रहा है। तुम किस बात के लिए, किस दुकानदार से सामान खरीदते हो। यह जानना जरूरी है क्योंकि जब गली का कोई दुकानदार जब किसी बम कांड में पकड़ा जाएगा तो नाम सुन कर तुम्हें आश्चर्य होता रहेगा… और थोड़ी देर सोचने के बाद पता चलेगा कि तुम्हारे संकट मोचन मंदिर पर जो बम फटे थे, उसके रहने की व्यवस्था तुम्हारी गली का वही दुकानदार कर रहा था। जागरूक नागरिक बनो, अपना आर्थिक तंत्र बनाओ कि किसी नेगी की हत्या पर, किसी नीरज प्रजापति के चले जाने पर, उनके परिवार वालों को भूखा न रहना पड़े।

वास्तविकता के धरातल पर नंगे पैर चलने पर उसकी तपन और सर्दी, दोनों का ही अहसास, होगा। इनका तंत्र देखो कि तुम्हारा मंदिर तोड़ा, उस पर मस्जिद बनाई, और तुम्हारे राम को काल्पनिक बता कर पूरी लड़ाई लगभग जीत ही ली थी। मथुरा और काशी की तो बात ही नहीं कर रहा। बाकी के तीस हजार मंदिरों की तो चर्चा भी नहीं कर रहा।

मैं तो बता रहा हूँ कि जिस बख्तियार खिलजी ने नालंदा विश्वविद्यालय को आग लगा दी, हमारी संस्कृति के बड़े हिस्से को गायब कर दिया, उसी के नाम का शहर, उसी नालंदा विश्वविद्यालय के खंडहरों के पास, बख्तियारपुर के नाम से है, और किसी माई के लाल में नाम बदलने का प्रस्ताव रखने तक की हिम्मत नहीं है।

यही तो वो तंत्र है जो अपने जलसों पर गलियों में जानवरों के खून की नदियाँ बहा देता है और होली को छेड़छाड़ का त्योहार, दीवाली को प्रदूषण फैलाने वाला, रक्षाबंधन को पितृसत्ता का प्रतिनिधि, गणपति और दुर्गा विसर्जन को जलराशि को गंदा करने वाला बताता है, लेख लिखता है और तुम्हें भी सोचने पर विवश करता है कि ये तो सही बोल रहे हैं। सौ करोड़ हिन्दू हैं भारत में, अगर 10 करोड़ भी होली मनाते हैं तो कितनी खबरें पढ़ते हो छेड़छाड़ की?

छेड़छाड़ बसों में नहीं होती, मदरसों में मौलवी रेप नहीं कर रहे बच्चियों का, आम दिनों में छेड़छाड़ नहीं होती लड़कियों के साथ, परिवार के सदस्य बलात्कार नहीं कर रहे लड़कियों का? तो फिर परिवार नाम की संस्था क्यों खारिज नहीं कर पा रहे? होली को खारिज करना आसान है, क्योंकि हर शहर में दो-चार घटनाएँ होती हैं ऐसी।

सहिष्णुता, भावुकता और कोमलता का लाभ उठा रहे हैं वो

चूँकि सहिष्णु हो, तो तुम्हें अपराधबोध में डुबाना बहुत आसान है। कभी याद है कि क्रिसमस पर या न्यू इयर पर पटाखे छोड़ने की मनाही हुई हो? ईद पर हिंसा न करने का ज्ञान किसी ने दिया? बुरके और हिजाब को किसी ने बंधन कहा? नहीं कहा, क्योंकि तुम कह कर देखो एक बार, और कैसे वो झुंड में हमला बोलते हैं।

वे न सिर्फ अपने पाषाकालीन परंपराओं को डिफेंड करते हैं, बल्कि तुम्हारी वैज्ञानिकता को नकारने के लिए हमेशा तैयार रहते हैं। वो तुम्हें बाँटने के लिए हिरण्यकश्यपु, महिषासुर, होलिका, रावण, कंस जैसे राक्षसों को दलितों का राजा और पता नहीं क्या-क्या बताते हैं, लेकिन दंगे में जब उन्हें दुकान जलानी होती है, तब वो तुमसे नहीं पूछते कि तुम दलित हो कि हिन्दू। उस समय, तुम हिन्दू ही होते हो भले ही सोशल मीडिया पर देवी दुर्गा को वेश्या कहे जाने पर तुम्हें खुशी मिलती है।

इसलिए, काल, परिस्थिति और पात्र देख कर आचरण करना ही शास्त्रोचित है। कृष्ण और राम के समय में गालियाँ नहीं थी, न ही सोशल मीडिया था। इसलिए उन्होंने फेसबुक पर गाली नहीं लिखी। उनके दुश्मन वैसे नहीं थे कि मच्छर मारने पर भी आपातकाल की घोषणा कर देते थे। कृष्ण के समय में धूर्त दुश्मन थे, तो कृष्ण ने कर्ण को रथ का पहिया लगाते वक्त मरवाया, दुर्योधन की जाँघ तुड़वाई, जयद्रथ का वध करवाया और युधिष्ठिर से ‘अश्वत्थामा हतः’ कहलवाया…

कृष्ण अगर अपने से पूर्व के युग में, स्वयं के ही अवतार राम का अनुसरण करने लगते तो कुरुक्षेत्र का युद्ध अधर्मी दुर्योधन जीत जाता और नैरेटिव से अभिमन्यु की हत्या गायब हो जाती। कहा जाता कि वो तो आत्मरक्षा में मार दिया गया।

मैं अपने समय का राम या कृष्ण नहीं हूँ। मैं अपने समय का अजीत ही रहना चाहता हूँ, लेकिन मैं राम और कृष्ण दोनों के समय को याद रखना चाहता हूँ। अगर कलयुग में रामायण और महाभारत को पढ़ने के बाद भी, मैं अपना आचरण त्रेता और द्वापर जैसा रखूँ, तो स्वयं राम और कृष्ण ही उसे नकार देंगे। ये कलियुग है, और हम अपना युद्ध लड़ रहे हैं। राम को भारत छोड़ कर लड़ने जाना पड़ा था, कृष्ण को अपनी ही धरती पर युद्ध करना पड़ा था, और हमारे समय में हम पैदा ही अनवरत चलते एक अदृश्य युद्ध के दौर में हुए हैं।

दंगों की लाशों पर मेरे कथित ‘अपशब्द’ भारी कैसे?

इसलिए, यहाँ त्रेता का आदर्शवाद तो बिलकुल नहीं चलेगा। यहाँ तो, सामने वाला ‘पोगरोम’, ‘जिनोसाइड’ जैसे शब्द कहेगा, और बताएगा कि मरने वालों में ज्यादा समुदाय विशेष वाले हैं, तो आपको उसे इस दोगलेपन की याद दिलानी होगी कि ‘अबे हरामखोर, छत पर पत्थर, पेट्रोल, एसिड तुमने जमा किए, जमीन पर तुम्हारे लोग पत्थर, चाकू लेकर घूम रहे थे, तो ये दंगा हिन्दुओं के माथे कैसे मढ़ रहे हो बे?’

अब आप संवेदनशील हो कर कह देंगे कि ‘अजीत जी, आपकी सारी बात सही है लेकिन आपने ‘दोगलेपन’, ‘हरामखोर’ और ‘बे’ का जो प्रयोग किया उससे फलाँ तरह के दर्शक आपसे नहीं जुड़ पाएँगे। और जब आप मुझे ये ज्ञान की बात बता रहे होंगे, उसी समय में कोई जुबैर, किसी फारूक फैसल या ताहिर हुसैन की छत पर टायर-ट्यूब से गुलेल बना रहा होगा, कोई अहमद किसी कोल्ड ड्रिंक की खाली बोतल में पेट्रोल डाल रहा होगा और कोई सलमा एसिड की बोतल ले कर नीचे फेंकने की तैयारी कर रही होगी।

अब आप मुझे बताइए कि मेरे तीन शब्दों से समाज का ज्यादा नुकसान है या फिर पूर्वी दिल्ली के दंगों से? उधर कोई शातिर हर्ष मंदर, जिसे करोड़ों की फंडिंग है, वो खुलेआम कह रहा है कि फैसला सुप्रीम कोर्ट में नहीं सड़कों पर होगा… और अंत में दार्शनिक बनते हुए जोड़ देगा कि ‘फैसला दिलों में होगा’ और आप उस टैक्निकेलिटी के बल पर ‘फैक्टचेकरों की लम्पट टोली’ के जाल में उलझते रहेंगे कि ‘हाँ भाई, उसने तो बोला दिल में होगा फैसला’।

अबे घोंचू, जब फैसला दिल में ही होना था, तो सड़क क्यों बोला? और राम मंदिर का फैसला क्या दिल में हुआ था? अब क्या कल को बलात्कार और चोरी के अपराधों के फैसले भी दिल से होंगे? कोर्ट यहाँ क्या घास छीलने के लिए है? वो पागल बनाते रहेंगे, और तुम कहना कि ‘अजीत जी, आपकी भाषा सही नहीं है, आपको ये शोभा नहीं देता, करियर के लिए खराब है!’

ऐसा है कि मैं किसान का बेटा हूँ। मेरी महात्वाकांक्षाएँ इतनी नहीं हैं कि बीस साल बाद मैं फलाने अवॉर्ड के लिए लालायित रहूँगा और इंटरनेट से कोई मेरी पुरानी क्लिप निकाल कर चला देगा कि देखो उसने तो ‘हरामखोर’ शब्द का प्रयोग किया था, उसे आप सम्मानित कैसे कर रहे हैं। मुझे मान-सम्मान की आशा कभी नहीं रही। जिस कार्य में दक्ष हूँ, करता रहूँगा। जैसे करना है, वैसे ही करूँगा। एक दायरा है, जिसे न तो लाँघता हूँ, न लाघूँगा।

मुझे न तो अवॉर्ड चाहिए, न दस लाख फॉलोवर जुटाने की चाह है, न विडियो से करोड़ों रुपए बनाने की चाह है। जो इतनी बातें सोचते हैं, वही अपने शब्दों को तौलते हैं, पॉलिटिकली करेक्ट बनना चाहते हैं। मैं बस करेक्ट बोलना चाहता हूँ क्योंकि पॉलिटिक्स और डिप्लोमेसी मुझे समझ में नहीं आती। आपको मेरी बात समझ में आती है तो, अच्छी बात है, आगे बढ़ाइए। इससे ज्यादा मेरी कोई इच्छा नहीं।

मेरा ध्यान वामपंथियों और इस्लामी कट्टरपंथियों के नैरेटिव को ध्वस्त करना है। वो कैसे करना है, उसके लिए मेरे पास पूरी योजना है। वो काम मैं जानता हूँ क्योंकि अहर्निश मैं उन्हें पढ़ता और समझता रहता हूँ। मैं आपके सामने सच को लाने को तत्पर हूँ। मैं आपको यह याद दिलाने के लिए काम करता हूँ कि अगर ऑपइंडिया जैसी तीन-चार संस्थाएँ नहीं होतीं, तो आप गोधरा की ही तरह 59 कारसेवकों की हत्या भूल कर, कश्मीर के लाखों हिन्दुओं के नरसंहार को भूल कर, पूर्वी दिल्ली के इन दंगों को भी हिन्दुओं पर ही लाद कर पूछते कि मुस्लिमों की हत्या क्यों कर दी हमारे हिन्दुओं ने?

इसलिए, समय को समझिए, इस अदृश्य अनवरत चलते युद्ध को समझिए और उन परिवारों के दर्द को अपनाइए क्योंकि अगर ताहिर हुसैन के गुंडे गली नंबर पाँच और छः की हिन्दू लड़कियों के कपड़े उतार सकते हैं, तो गलियों और शहरों का नाम बदलने में देर नहीं होगी। आप बच गए लेकिन शरजील आपके शहर तक भी पहुँचाएगा अपनी आवाज, सलमान आपकी कब्र खोदने की तैयारी कर रहा है, एक पूरा विश्वविद्यालय हिन्दुओं से आजादी की जद्दोजहद में लगा हुआ है, दूसरी यूनिवर्सिटी मुस्लिमों के वैश्विक शासन की चाह में दीवारों पर नारे लिख रहा है…

और आपको पड़ी है कि अजीत भारती बोलता तो सही है लेकिन कभी-कभी गाली दे देता है, इसलिए मैं नहीं सुनता!

पेट्रोल बम फेंको, नौकरी पाओ योजना: ‘ये लोग’ दंगाइयों को पालते रहेंगे, हिंदू सोता रहेगा

शाहीन बाग ने पोस्टर से मंशा बता दी: हिन्दू स्त्रियों पर है इनका ध्यान, पहले कन्वर्जन फिर…

‘दोनों तरफ के लोग हैं’: ‘दंगा साहित्य’ के दोगले कवियों से पूछिए कि हिन्दू ने कहाँ दंगा किया, कितने दिन किया?

हाथ-पैर काट जिंदा आग में झोंक दिया: मुस्लिम भीड़ की क्रूरता पर ‘The Wire’ ने डाला पर्दा

प्रोपेगेंडा पोर्टल ‘द वायर’ ने दिलबर नेगी की दिल्ली के हिन्दू विरोधी दंगों में की गई क्रूरतापूर्ण हत्या को ‘जलने के कारण हुए घाव से हुई मौत’ बताया है। उसने मुस्लिम दंगाई भीड़ द्वारा किए गए इस जघन्य कुकृत्य को छिपाने के प्रयास किया है। दिल्ली क्राइम ब्रांच ने नॉर्थ-ईस्ट दिल्ली में हुए हिन्दू विरोधी दंगों में दिलबर नेगी की हत्या के आरोप में शाहनवाज़ को गिरफ़्तार किया है। दिलबर नेगी बृजपुरी में एक मिठाई की दुकान में काम करते थे। उनकी हत्या फ़रवरी 26, 2020 को कर दी गई थी।

अताताइयों ने उनके पूरे शरीर को क्षत-विक्षत कर दिया गया था। इसके बाद शाहनवाज़ और उसके साथियों ने मिल कर नेगी को ज़िंदा आग में झोंक दिया था। उनकी हत्या जिस तरह से की गई, वैसे कसाई भी जानवरों को नहीं मारता। शाहनवाज़ और उसके साथियों ने पहले तो 20 साल के दिलबर नेगी के हाथ-पाँव काट डाले और फिर उसके बाद उनकी दुकान में आग लगा दी। फिर नेगी को उसी दुकान में लगी आग में ज़िंदा झोंक दिया गया, जिसके बाद उनकी मृत्यु हो गई।

दिलबर नेगी की यावह हत्या को छिपाने के लिए ‘द वायर’ ने लिखा कि वो जलने से मरे

शाहनवाज़ व उसके साथ आई मुस्लिम भीड़ को बचाने के लिए और इस हत्या की वीभत्सता को छिपाने के लिए ‘द वायर’ ने लिख दिया है कि दिलबर नेगी जलने के कारण हुए घावों से मरे। जबकि सच्चाई ये है कि उनकी हत्या की गई। उन्हें तड़पाया गया, प्रताड़ित किया गया और फिर ज़िंदा जला डाला गया। ‘द वायर’ के लिए ये सब एकदम सीधा है, सपाट है- “जलने के कारण उनकी मृत्यु हो गई।” ऐसा थोड़े था कि वो ग़लती से किसी जलती हुई आग में गिर गए और घायल होने के कारण उनकी मृत्यु हो गई?

‘द वायर’ क्रूर मुस्लिम दंगाइयों को बचाने के लिए पागल हो गया है। उसने दंगों में मारे गए मृतकों की एक सूची प्रकाशित की, जिसमें दिलबर नेगी के बारे में बताया गया है। बस एक लाइन में उनके बारे में लिख दिया गया है और इतिश्री कर ली गई है। न तो दंगाई मुस्लिम भीड़ का जिक्र है, न शाहनवाज़ का और न ही इसका जिक्र है कि उनकी हत्या के लिए कौन सा वीभत्स तरीका अपनाया गया। उलटा इन सभी चीजों को छिपाने और ढकने के लिए पूरा जोर लगाया गया।

…जिन दिलबर नेगी का हाथ-पैर काटकर आग में फेंका था, उनकी हत्या के आरोप में शाहनवाज गिरफ्तार

हाथ काटा, पैर काटा, माँस के टुकड़े की तरह आग में फेंक दिया: मृतक दिलबर नेगी का विडियो वायरल

दिलबर सिंह नेगी के हाथ-पैर काट दंगाइयों ने दुकान की आग में झोंका: बचकर भागे श्याम ने बताई आपबीती


तारिक ने दी थी ताहिर हुसैन को पनाह, दिल्ली पुलिस की हिरासत में लियाकत और रियासत भी

आप के निलंबित पार्षद ताहि​र हुसैन पर लगातार शिकंजा कसता जा रहा है। ताहिर उत्तर-पूर्वी दिल्ली के हिंदू विरोधी दंगों का वह मुख्य सरगना बनकर उभरा है। चश्मदीदों के अनुसार उसकी इमारत में करीब तीन हजार दंगाई जमा थे जिन्होंने हिंदुओं को निशाना बनाया। दिल्ली पुलिस ने तारिक रिजवी, लियाकत और रियासत को हिरासत में लिया है। सूत्रों के अनुसार लियाकत और रियासत दिल्ली दंगों में संलिप्त थे। वहीं तारिक पर ताहिर हुसैन को पनाह देने का आरोप है। दंगों में अपनी भूमिका सामने आने के बाद ताहिर फरार हो गया था।

लियाकत और रियासत के दिल्ली दंगों के आरोपी ताहिर हुसैन से तार जुड़े हैं। पुलिस इनमें से एक से ताहिर हुसैन को छिपाने को लेकर पूछताछ कर रही है। ज्ञात हो कि आईबी अधिकारी अंकित शर्मा के हत्या के आरोप में दिल्ली पुलिस ने गुरुवार (मार्च 05, 2020) को ताहिर हुसैन को गिरफ्तार किया था।

इसके बाद पुलिस ने शुक्रवार को ताहिर को कोर्ट में पेश किया। कोर्ट ने ताहिर को सात दिनों के लिए पुलिस कस्टडी में भेज दिया है। सात दिन की पुलिस रिमांड पर चल रहे ताहिर हुसैन की घटना वाले दिन की जानकारी निकालने पर शुक्रवार को मामले की जाँच कर रही एसआईटी को काफी कुछ जानकारियाँ हासिल हुई हैं।

दिल्ली में हुई हिंसा मामले में पुलिस ने अब तक 690 एफआईआर दर्ज की है। 48 मामले आर्म्स एक्ट के तहत दर्ज किए गए है। 2193 लोग हिरासत में लिए गए हैं या गिरफ्तार किए गए हैं। दंगों में अब तक 53 लोगों की मौत की पुष्टि हो चुकी है। 200 से ज्यादा घायल हुए हैं।

गिरफ्तार किए गए लोगों में जाफराबाद में पुलिसकर्मी पर पिस्टल तानने वाला मोहम्मद शाहरुख़ और बीस साल के दिलबर सिंह नेगी को काटने के बाद आग में झोंकने का आरोपित शाहनवाज भी है। बलिदानी कॉन्स्टेबल रतनलाल और पुलिस पर हमला करने वाले दंगाइयों की पहचान किए जाने की बात भी कही जा रही है।

शाहीन बाग से भी जुड़े ताहिर हुसैन के तार: गाड़ियों में भरकर लोग भेजे जाते थे, कंटेनर और बोरियों में सामान

गंगाजल स्टाइल में दबोचा गया ताहिर हुसैन, चकमा देने के लिए बुर्का की जगह पहन रखा था…

ताहिर हुसैन के भाई शाह आलम की तलाश: जहाँ हुई IB के अंकित शर्मा की हत्या वहाँ मौजूद था