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PM को गिफ्ट मिली पेंटिंग को प्रियंका गाँधी ने किस हैसियत से बेचा?: ‘यस बैंक’ विवाद में उठे कई नए सवाल

जब ‘यस बैंक’ के संस्थापक राणा कपूर द्वारा कॉन्ग्रेस महासचिव प्रियंका गाँधी की पेंटिंग 2 करोड़ रुपए में ख़रीदने की बात आई, तब पार्टी चारों तरफ़ से आरोपों से घिर गई। इसके बाद कॉन्ग्रेस नेताओं ने बयान जारी कर उस पेंटिंग के बारे में डिटेल्स बताए। रणदीप सिंह सुरजेवाला ने दावा किया कि जो पेंटिंग प्रियंका ने राणा को बेचीं, वो मशहूर पेंटर एमएफ हुसैन ने तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गाँधी को गिफ्ट की थी। ये बात 1985 की है, जब कॉन्ग्रेस अपना 100वाँ स्थापना दिवस मना रही थी। अब इसके बाद कई सवाल उठते हैं। क्या एमएफ हुसैन ने राजीव को जो पेंटिंग गिफ्ट की, उसे बेचने का हक़ उनके परिवार को है?

अगर किसी प्रधानमंत्री को कोई व्यक्ति कुछ गिफ्ट देता है तो वो उस पद को देता है या फिर व्यक्ति को? अगर पद को देता है तो वो चीज सरकारी संपत्ति हुई और उसे बेचने का हक़ उसके परिवार को नहीं है। राजीव उस समय कॉन्ग्रेस अध्यक्ष भी थे। ऐस में अगर वो गिफ्ट कॉन्ग्रेस पार्टी को दी गई थी तो प्रियंका गाँधी बिना पार्टी की अनुमति के उसे कैसे बेच सकती हैं? इस पेंटिंग के कारण ‘यस बैंक’ घोटाले से प्रियंका गाँधी के तार जुड़ रहे हैं और कॉन्ग्रेस पार्टी किसी तरह इस मुद्दे से किनारा करने में लगी हुई है।

भाजपा ने दावा किया है कि ‘यस बैंक’ घोटाले में प्रियंका गाँधी भी शामिल हैं। भाजपा आईटी सेल के प्रमुख अमित मालवीय ने वित्तीय अपराधों की एक सूची शेयर कर के बताया कि भारत में हुए हर ऐसे घोटालों के तार गाँधी परिवार से जुड़ते रहे हैं। उन्होंने भगोड़ा कारोबारी विजय माल्या के सोनिया गाँधी और राहुल गाँधी के संबधों का भी जिक्र किया। उन्होंने याद दिलाया कि एक अन्य भगोड़ा कारोबारी नीरव मोदी की ब्राइडल ज्वेलरी कलेक्शन का उद्घाटन राहुल गाँधी ने किया था और अब राणा कपूर से प्रियंका गाँधी के तार जुड़ते नज़र आ रहे हैं।

टाइम्स नाउ की रिपोर्ट के अनुसार, मिलिंद देवड़ा ने राणा कपूर और प्रियंका गाँधी के बीच इस पेंटिंग को लेकर डील कराई थी। देवड़ा उन्हें ‘राणा अंकल’ कह कर सम्बोधित करते थे। ख़बर में दावा किया गया है कि पेंटिंग बेचने के बाद मिले रुपयों को प्रियंका गाँधी के ऑफिस को दे दिया गया। फिर प्रियंका गाँधी ने किस हैसियत से उस पेंटिंग को राणा कपूर को बेचा, ये अब तक साफ़ नहीं हो पाया है।

सुशांत सिंह की नई बकैती: दिल्ली की हिंसक भीड़ में औरते थीं क्या? मैंने तो नहीं सुना, लोगों ने दिखाई हकीकत

दिल्ली में हुए हिंदू विरोधी दंगों में समुदाय विशेष की भीड़ द्वारा किए गए अपराधों को व्हॉइटवॉश करने में सोशल मीडिया पर वामपंथियों की एक पूरी लॉबी काम कर रही है। इसी लॉबी का हिस्सा टीवी कलाकार सुशांत सिंह हैं। वही सुशांत सिंह जिन्होंने कुछ दिन पहले न केवल सीएए विरोधी प्रदर्शन में भाग लिया, बल्कि सीएए, एनआरसी और एनपीआर को सेक्स का अधिकार छिनने तक से जोड़ दिया। हालाँकि इन सबके कारण सुशांत सिंह की सोशल मीडिया पर काफी फजीहत हुई, लेकिन फिर भी वह अपनी आदतों से बाज नहीं आए और गाहे-बगाहे मौक़ा देखकर केंद्र सरकार के ख़िलाफ़ बोलते रहे, साथ ही विशेष समुदाय के अपराधों पर पर्दा ढकते रहे।

इस बार सुशांत सिंह ने ये कोशिश वुमेन्स डे की आड़ में की। 8 मार्च को वुमेन्स डे पर सुशांत सिंह ने एक ट्वीट किया। ट्वीट में उन्होंने लिखा, “दिल्ली की हिंसक भीड़ में औरतें थीं क्या? नहीं। और कहीं औरतों की हिंसक भीड़ के बारे में सुना है? मैंने तो नहीं। पुरुषप्रधान समाज ने बेहिसाब शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक हिंसा दी है हमें। काफ़ी नहीं है क्या? अब औरतों को दुनिया सम्भालने दो यार।”

अब हालाँकि, ये बात सब जान चुके हैं कि न केवल दिल्ली में हुई हिंसा के पीछे बुर्काधारी महिलाओं का हाथ था। बल्कि डीसीपी अमित शर्मा एवं एसीपी अनुज के घायल होने के पीछे भी इन्ही महिलाओं का हाथ था और साथ ही रतनलाल की मौत के पीछे भी इन्हीं महिलाओं का हाथ था। जिन्होंने प्रदर्शन के नाम पर कई दिनों तक रास्ते को जाम किए रखा।

तो फिर, ऐसे में सवाल है कि आखिर ये सुशांत सिंह किन महिलाओं के बारे में बात कर रहे हैं। अगर इन्हें महिला दिवस पर नारी को उसके अधिकार दिलाने की गुहार लगानी ही है, पुरुष प्रधान समाज को कोसना ही है तो फिर आखिर महिलाओं की सौम्यता, सरलता साबित करने के लिए दिल्ली दंगों का उल्लेख करने की क्या जरूरत है? आखिर क्या आवश्यकता है अपने ट्वीट में ये पूछने की कि दिल्ली की हिंसक भीड़ में औरते थीं क्या? आखिर ऐसे सवालों से सुशांत क्या साबित करना चाहते हैं कि सभी महिलाओं का वर्ग एक समान होता है, सभी महिलाओं की परिस्थितियाँ एक सी होती है? जी नहीं। कुछ के ऊपर मजहबी उन्माद का रंग भी चढ़ा होता है। जो पहले उन्हें शाहीन बाग जैसे निराधार प्रदर्शन में प्रदर्शनकारी बनवाता है और फिर पुलिस के पीछे पत्थर लेकर दौड़वाता है।

सोशल मीडिया पर चाँदबाग की वो वीडियो सैलाब की तरह तैर रही है, जिसमें मुस्लिम महिलाओं ने पुलिस अधिकारियों पर पत्थर से हमला कर उन्हें घायल किया। लेकिन, इसके बाद भी सुशांत सिंह पूछते हैं कि दिल्ली की हिंसक भीड़ में औरतें थीं क्या? मैंने तो नहीं सुना। सोचिए कितना शर्मसार करने वाला है सुशांत का ये ट्वीट।

क्या चाँदबाग की वो वीडियो सुशांत सिंह के पास नहीं पहुँची। या फिर ये कहें कि उन्होंने अपनी आँखों पर सेक्युलरिज्म के नाम की ऐसी पट्टी बाँध ली है, जो उन्हें इस भीड़ में मौजूद बुर्काधारी महिलाओं को न देखने पर मजबूर कर रही है।

खैर, वजह जो भी हो। जब सुशांत सिंह ने इस मुद्दे को उठाया और अपने फॉलोवर्स को वुमेन्स डे के नाम पर बरगलाया, तो सोशल मीडिया यूजर्स भी उनके बहकावे में नहीं आए और फर्जी नारीवादी बन नारी के हित में प्रोपगेंडा का झंडा बुलंद करने पर उन्हें खूब लताड़ा। देखते ही देखते यूजर्स उनके ट्वीट के जवाब में चाँदबाग की वीडियो ट्वीट करने लगे और कहने लगे ये देखिए जनाब, बुर्के के अंदर औरते ही हैं।

इसके अलावा ऐसी तस्वीरें भी अपलोड की गई जिनमें मुस्लिम समुदाय की औरतों ने पत्थर उठाकर पुलिस को मारने की कोशिश की थी और साथ ही यूजर्स ने उन्हें ये भी कहा कि उन्होंने सुशांत को उनकी फिल्मों में केवल देशभक्त के किरदार में देखा है, इसलिए अब उनके मुँह से ऐसी बातें अच्छी नहीं लगतीं।

हालाँकि, सोशल मीडिया पर सुशांत सिंह के कुछ प्रशंसक भी आए और उन्होंने इस तथ्य को पूरी तरह से खारिज किया कि इन दंगों में महिलाओं का कोई भी हाथ था, जबकि जिन्होंने चाँदबाग की वीडियो शेयर की वो लगातार पुलिस अधिकारियों के घायल और मौत के पीछे बुर्केधारी महिलाओं को जिम्मेदार ठहराते रहे।

मेरा जिस्म, मेरी मर्जी: Pak में सड़क पर उत्तरी महिलाएँ, कट्टरपंथियों ने बताया इस्लाम के ख़िलाफ़

पाकिस्तान में इन दिनों ‘मेरा जिस्म, मेरी मर्जी’ का नारा ख़ूब चल रहा है। ‘औरत मार्च’ के बाद लोकप्रिय हुआ ये नारा वहाँ के मुल्ला-मौलवियों व इस्लामी कट्टरपंथियों की सोच को चुनौती दे रहा है, जो औरत को बुर्के में कैद रहने वाली एक वस्तु से ज्यादा कुछ नहीं समझते। महिलाएँ अपने अधिकारों के लिए सड़क पर हैं। महिला दिवस के अवसर पर भी पाकिस्तान के कई शहरों में महिलाओं ने रैलियाँ निकालीं। पिछले तीन सालों से लगातार ‘औरत मार्च’ होता आया है और इस बार इसका थीम ‘मेरा जिस्म, मेरी मर्जी’ वाली टैंगलाइन को रखा गया था। आइए, जानते हैं उनकी माँगें क्या हैं।

महिलाओं की सबसे पहली माँग है कि उनके जिस्म पर उन्हें निर्णय लेने का अधिकार हो, ऐसा नहीं कि कोई पुरुष कुछ भी थोप दे। उनकी दूसरी माँग है कि पितृसत्तात्मक समाज की अवधारणा को ख़त्म किया जाए और देश व समाज के आर्थिक संसाधनों पर महिलाओं को बराबर का हक़ मिले। पुरुषों द्वारा प्रताड़ना और जबरन मजहबी धर्मान्तरण का शिकार भी अधिकार महिलाएँ ही होती हैं, इसीलिए इन दोनों की रोकथाम भी महिलाओं की माँगों में शामिल है। उनकी ये भी माँग है कि मीडिया व मनोरंजन की इंडस्ट्री में महिलाओं को जिस तरीके से अब तक दिखाया जाता है, उस पर रोक लगे।

‘औरत मार्च’ का आयोजन व इसकी प्रक्रिया में पाकिस्तान की कई महिला संगठनें शामिल हैं। पाकिस्तान की वामपंथी आवामी वर्कर्स पार्टी ने कहा है कि महिलाएँ अब पितृसत्तात्मक समाज की संरचनाओं को स्वीकार नहीं करेंगी और इसीलिए वो इसे तहस-नहस करने के लिए आगे आ रही हैं। इस मार्च में कई छात्राओं ने भी शिरकत की। महिलाधिकार संगठनों का मानना है कि पाकिस्तान की ताज़ा रैलियों के बारे में ख़ास बात ये है कि इन्हें युवा महिलाओं द्वारा लीड किया जा रहा है। लेकिन हाँ, इसका विरोध भी ख़ूब हो रहा है।

पिछले साल हुए ‘औरत मार्च’ में कुछ ऐसे पोस्टर्स शेयर किए गए थे, जो कई लोगों को रास नहीं आए थे। एक पोर्टर में एक महिला टाँगे फैला कर बैठी होती हैं और लिखा होता है कि अब पुरुष नहीं सिखाएँगे कि महिलाओं के बैठने का ‘सही तरीका’ क्या है? जमीयत उलेमा-ए-इस्लाम के मुखिया मौलाना फजलुर रहमान की माँग है कि प्रशासन ऐसी रैलियों पर तत्काल रोक लगाए। उनका कहना है कि इस्लाम में महिलाओं को जितने अधिकार दिए गए हैं, उससे आगे नहीं बढ़ना चाहिए। वकील अज़हर सिद्दीकी का कहना है कि ये मार्च पश्चिमी अजेंडा का हिस्सा है। हालाँकि, उनकी याचिका लाहौर हाईकोर्ट ने ख़ारिज कर दी।

पाकिस्तान में 2012-13 में हुए एक सर्वे के अनुसार 32% महिलाएँ वहाँ हिंसा का शिकार बनती हैं और 40% महिलाओं को उनके शौहरों द्वारा प्रताड़ना का शिकार बनाया जाता है। एक पाकिस्तानी लेखक ने तो सरेमाम लाइव टीवी डिबेट में एक महिला को गालियाँ बकीं क्योंकि उन्होंने ‘मेरा जिस्म, मेरी मर्जी’ का नारा लगाया था। पाकिस्तान में महिलाओं को ‘कायदे के कपड़े पहनने’ की सलाह दी जाती है और ऐसा न करने पर उनके साथ मारपीट होती है। इन्हीं चीजों को रोकने के लिए महिलाओं ने ‘औरत मार्च’ का सहारा लिया है।

होली 2020: ‘हिंदू हमारे भाई नहीं, इमरान को भारत में मुस्लिमों और जम्मू कश्मीर पर बोलना चाहिए’

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री, इमरान खान ने इस्लामिक देश पाकिस्तान के हिंदुओं को होली की शुभकामनाएँ दी। हालाँकि, उनके देश के कट्टरपंथी मुस्लिमों को उनका इस तरह से हिंदुओं को शुभकामनाएँ देना रास नहीं आया। इस्लामी कट्टरपंथियों ने हिंदुओं केे पर्व के दिन उनको शुभकामनाएँ देने के लिए प्रधानमंत्री को आड़े हाथों लिया और उन पर जबरदस्त हमला किया।

कुछ लोगों ने दिल्ली में पिछले दिनों भड़के सांप्रदायिक दंगे का हवाला देते हुए हिंदुओं को खुश करने के लिए इमरान खान को लताड़ा। एक ने लिखा कि भारत के हिंदू जिस तरह से वहाँ के समुदाय विशेष के साथ व्यवहार कर रहे हैं, वो इस शुभकामना के लायक नहीं है। इसलिए आप मुस्लिमों का दिल न तोड़ें।

वहीं एक अन्य यूजर ने लिखा, “शर्म आनी चाहिए नियाजी तुमको। इंडिया में हिंदू लोग मुस्लिम पर जुल्म कर रहे हैं और तुम हिंदू को होली की शुभकामनाएँ दे रहे हो। आई हेट यू इमरान नियाजी।”

एक ने लिखा, “कभी इतनी मुहब्बत से मुस्लिमों को भी किसी त्योहार पर मुबारकबाद दे दिया करो।” 

इसके अलावा कुछ और लोगों ने भी हिंदुओं को होली की शुभकामनाएँ देने को लेकर सवाल किए। एक यूजर ने लिखा, “क्या आप एक इस्लामिक कल्याणकारी राज्य का निर्माण कर रहे हैं, जहाँ मुस्लिम उत्पीड़ित और अल्पसंख्यक सुरक्षित हैं?”

कुछ ने तो पाकिस्तानी पीएम को भद्दी गालियाँ भी दी।

कुछ ऐसे भी लोग थे जिन्होंने कहा कि हिंदू हमारे भाई नहीं हैं और इमरान खान को भारत में मुस्लिमों और जम्मू कश्मीर के लिए बोलना चाहिए। 

कुछेक ने इमरान खान को सलाह दी कि ‘जालिम हिंदुओं’ को खत्म करने के लिए ईरान की मदद लेने की भी सलाह दी। खुशी साजिद हुसैन ने लिखा, “शर्म करो। इस जैसे जालिम को आप होली का मुबारकबाद दे रहे हो। ये हिंदू हैं। ये आपका कभी भला नहीं चाहते। ईरान के साथ मिलकर इनको खत्म करो। सऊदी अरब के चमचे।”

उल्लेखनीय है कि पाकिस्तान में गैर-मुस्लिम और विशेष रूप से हिंदुओं को देश के मुस्लिमों द्वारा काफी सताया जाता है। महिलाओं का बलात्कार किया जाता है, जबरन इस्लाम में परिवर्तित किया जाता है और उनके लिए जीवन नरक बना दिया जाता है। देश के गैर-मुस्लिमों की मदद करने के लिए, भारतीय संसद ने नागरिकता संशोधन कानून पारित किया है।

खाड़ी देशों में कमाने गए भारतीय मुस्लिम नहीं लौट पाएँगे: CAA को लेकर पवार का झूठ, मीडिया चुप

महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री शरद पवार ने सीएए का विरोध करने के लिए ऐसा झूठ बोला है, जो बताता है कि या तो उन्होंने वो क़ानूनी संशोधन पढ़ा ही नहीं है या फिर पढ़ कर भी जानबूझ कर लोगों को भ्रमित कर रहे हैं क्योंकि उन्हें पता है कि मीडिया उनका झूठ पकड़ने के बावजूद उनकी आलोचना नहीं करेगा या जनता के सामने लेकर नहीं जाएगा। शरद पवार ने झूठ बोला है और फैक्ट-चेक का दावा करने वाले तमाम मीडिया संस्थानों ने उस ओर से आँख मूँद लिया है। सीएए को लेकर पवार ने पूछा है कि खाड़ी देशों में कमाने गए भारतीय मुस्लिम वापस कैसे आएँगे?

एनसीपी सुप्रीमो शरद पवार ने बात अपनी पार्टी के दफ्तर में कही। दो पूर्व विधायकों हरिभाऊ बधे व अर्जुन सलगर ने रविवार (मार्च 8, 2020) को एनसीपी का दामन थामा। इस अवसर पर पवार ने कहा कि ये दोनों पिछड़े समुदायों के उत्थान के लिए लगातार प्रयासरत हैं। पवार ने इस मौके का इस्तेमाल राष्ट्रीय मुद्दों पर बात करने के लिए किया और कहा कि देश आज कई समस्याओं से जूझ रहा है। बकौल पवार, आज समाजिक एकता ख़तरे में है और इसे बरक़रार रखना एक चुनौती है, जो चिंता का विषय बनता जा रहा है।

साथ ही पूर्व केंद्रीय मंत्री ये आरोप लगाने से भी नहीं चूके कि केंद्र सरकार अपनी सारी शक्तियों का इस्तेमाल एक ख़ास अल्पसंख्यक तबके को निशाना बनाने के लिए कर रही है। पवार का मानना है कि देश के मुस्लिमों से ये साबित करने को कहा जा रहा है कि वो इस देश के नागरिक हैं या नहीं? इसी दौरान पवार झूठ बोल गए। उन्होंने कहा कि भारत के कई लोग अरब देशों में रहते हैं, वहाँ कमाने जाते हैं। रुपए कमा कर वो वापस आ जाते हैं, सदा के लिए वहाँ नहीं रहते।

शरद पवार ने दावा किया कि सीएए के तहत हिन्दुओं, सिखों, ईसाईयों, बौद्ध और जैन के वापस आने का प्रावधान तो है लेकिन अरब देशों में कमाने गए मुस्लिम कैसे वापस लौटेंगे क्योंकि उनके बारे में कुछ लिखा ही नहीं हुआ है। उन्होंने दावा किया कि मुस्लिम समुदाय को जबरन इस सूची से बाहर रखा गया है। जबकि सीएए शरणार्थियों के लिए है, इसका भारतीय नागरिकों से कोई लेना-देना नहीं। ऐसे में जो पहले से भारतीय नागरिक हैं, पवार उन्हें सीएए का डर दिखा रहे हैं।

आश्चर्य तो इस बात का कि शरद पवार के इस झूठ का मीडिया ने भी पर्दाफाश नहीं किया। पवार ने झूठ बोल कर सीएए का डर दिखाया लेकिन लिबरल गिरोह भी कुछ नहीं बोल रहा। जैसा कि ट्रेंड रहा है, मीडिया पवार के इस बयान को छिपाने में लगा हुआ है।

शोपियाँ: एनकाउंटर में मारे गए हिजबुल के 2 आतंकियों में एक पाकिस्तानी, तलाशी अभियान तेज

जम्मू-कश्मीर के शोपियाँ जिले में आज (मार्च 9, 2020) सुबह सुरक्षाबलों ने आतंकियों के साथ हुई मुठभेड़ में 2 आतंकवादियों को मार गिराया। इस मुठभेड़ में मरने वाले दोनों आतंकियों के संबंध हिजबुल मुजाहिद्दीन से जुड़े मिले। इनमें से एक पाकिस्तानी था और दूसरे की पहचान इशफाक अहमद के रूप में हुई। ये इशफाक कुलगाम के यारीपोरा इलाके के गाँव हंगल बुच का निवासी था और साल 2016 से ही आतंकवादी गतिविधियों में संलिप्त था।

जानकारी के अनुसार, आतंकियों के ढेर किए जाने के बाद भी सुरक्षाबलों का तलाशी अभियान जारी है। सेना को आशंका है कि रिहायशी इलाके में और आतंकी छिपे हो सकते हैं। इस तलाशी अभियान में सेना, पुलिस की SOG और सीआरपीएफ के जवान शामिल हैं। हालाँकि, फिलहाल दोनों ओर से गोलीबारी शांत हैं, लेकिन आतंकियों के होने की आशंका पर घर में घुस पर तलाशी ली जा रही है।

अमर उजाला की रिपोर्ट के अनुसार, कश्मीर के आईजी विजय कुमार ने इस एनकाउंटर की पुष्टि की। उन्होंने बताया कि शोपियाँ जिले के खाजपुरा रेबन इलाके में सुरक्षा बलों और आतंकियों के बीच आज सुबह हुई मुठभेड़ में दो आतंकियों को ढेर किया गया। साथ ही उनके शव भी बरामद कर लिए गए।

वहीं, एक अधिकारी ने बताया कि इस क्षेत्र में आतंकियों के छुपे होने की सूचना मिलने के बाद सर्च ऑपरेशन चलाया गया। ऑपरेशन के तहत जैसे ही सुरक्षाबल संदिग्ध इलाकों की ओर बढ़ने लगे, वहाँ छुपे आतंकियों ने उनपर फायरिंग शुरू कर दी। इसके जवाब में सुरक्षाबलों ने भी फायरिंग की। उन्होंने यह भी बताया कि फिलहाल एक और आतंकी के छिपे होने की आशंका है।

गौरतलब है कि इस मुठभेड़ से पहले अवंतीपुरा पुलिस ने आतंकी संगठन हिजबुल मुजाहिद्दीन के तीन सदस्यों को गिरफ्तार किया था। ये तीनों लोग त्राल क्षेत्र में आतंकवादियों को आश्रय देते थे साथ ही बाकी की तरह की मदद भी मुहैया कराते थे।

इंडोनेशिया: कट्टरपंथियों ने दूतावास के बाहर जलाया तिरंगा, फहराए ISIS के झंडे, पाक की भूमिका संदिग्ध

आतंकी संगठन आईएसआईएस के सहानुभूति रखने वाले कट्टरपंथी इस्लामिक समूहों ने शुक्रवार (मार्च 6, 2020) को इंडोनेशिया की राजधानी जकार्ता में भारतीय दूतावास के बाहर और मेदां में भारतीय वाणिज्य दूतावास के बाहर विरोध प्रदर्शन किया। दूतावास के बाहर 2,000 से अधिक प्रदर्शनकारियों की भीड़ जमा हुई थी, जिन्होंने कथित तौर पर भारतीय राष्ट्रीय झंडे जलाए थे। इनमें से कई प्रदर्शनकारियों ने दूतावास के बाहर आईएसआईएस के झंडे भी लहराए। 

बता दें कि यह विरोध प्रदर्शन दिल्ली में पिछले दिनों एंटी सीएए की आड़ में हुए हिंदू विरोधी हिंदू दंगों के खिलाफ था। अंतरराष्ट्रीय मीडिया के साथ ही भारतीय मीडिया ने इस हिंदू विरोधी दंगे को ऐसे दिखाने की कोशिश की कि यह मुस्लिमों के खिलाफ प्रायोजित हिंसा थी और अब आईएसआईएस समर्थक भी इसी एजेंडे को आगे बढ़ा रहे हैं।

इस हरकत को फतवा गार्ड्स नेशनल मूवमेंट, इस्लामिक डिफेंडर्स फ्रंट और 212 एलुमनी ब्रदरहुड के एक समूह द्वारा अंजाम दिया गया था। कट्टरपंथी प्रदर्शनकारियों ने इंडोनेशिया में भारतीय राजदूत प्रदीप कुमार रावत से मिलने की धमकी दी। हालाँकि भारतीय राजदूत ने कट्टरपंथियों द्वारा झंडे को जलाने की निंदा की और फिर मिलने से मना कर दिया। रावत ने इस संबंध में कहा, “इस चरमपंथी समूह के विचारों से डर फैलता है जिससे लोग डरते हैं और घबराते हैं। अगर हम डरते हैं और घबराते हैं, तो वे जीत जाते हैं। हम इस धमकी का जवाब नहीं देंगे।”

कट्टरपंथी इस्लामवादियों ने विरोध के नाम पर एक भारतीय मूल के व्यवसायी को धमकी भी दी। कट्टरपंथियों को लामबंद करने में पाकिस्तान और उसकी खुफिया एजेंसी की भूमिका संदिग्ध है। अधिकारियों का कहना है कि इंडोनेशिया के विदेश मंत्रालय ने तेजी से कार्रवाई की और भारतीय दूतावास को समर्थन दिया। विरोध के दौरान ISIS के बैनर भी लहराए गए थे।

होली रेप कल्चर का त्यौहार, मुस्लिम महिलाओं को नहीं पटा पाते हिन्दू मर्द: लिबरलों का नया तर्क

होली का त्यौहार आ गया है और लिबरलों और सेक्युलर गिरोह के कुछ लोगों को इससे दिक्कतें आनी भी शुरू हो गई हैं। पहले तो होली के अवसर पर पानी बचाने का ज्ञान दिया जाता था लेकिन चूँकि ये प्रोपेगंडा पुराना हो गया है और इसके पक्ष में अब वो कोई नया तर्क नहीं दे पाते, इसीलिए गिरोह विशेष भी क्रिएटिव हो चुका है। उनके गुट में क्रिएटिविटी का अर्थ है- किसी भी चीज को किसी ऐसे विषय से जोड़ देना, जिससे उसका दूर-दूर तक कोई सम्बन्ध ही नहीं वो। इसीलिए, अबकी होली के अवसर पर जो बेढंगे तर्क देकर ज़हर फैलाया जा रहा है, उसे आपलोगों को जानना ज़रूरी है।

सबसे पहले तो बात ‘इंडियन एक्सप्रेस’ की पूर्व पत्रकार इरेना अकबर की। इरेना ने होली को हिन्दुओं की ‘मरदाना हीनता’ का त्यौहार करार दिया है। इरेना ने दावा किया है कि हिन्दू मर्द मुस्लिम मर्दों से जलते हैं और इसीलिए ‘लव जिहाद’ की थ्योरी गढ़ी जाती है और यही कारण है कि होली की वीडियो वगैरह में भी इसकी झलक दिखती है। इरेना का मानना है कि कई हिन्दू लड़कियाँ मुस्लिम मर्दों से शादी कर लेती हैं, इसीलिए जलन के कारण हिन्दू मर्द मुस्लिम महिलाओं का यौन शोषण करना चाहते हैं, उनका बलात्कार करना चाहते हैं।

इरेना यही नहीं रुकीं। उनकी मानसिक स्थिति का अंदाज़ा आप उनकी सोच से लगा सकते हैं। उन्होंने लिखा कि हिन्दू मर्द मुस्लिम महिलाओं को पटा ही नहीं पाते क्योंकि वो मुस्लिम मर्दों के मुक़ाबले कहीं नहीं ठहरते हैं। इरेना ने लिखा कि ये श्रेष्ठता नहीं है बल्कि हिन्दुओं के अंदर जलन व हीनता की भावना है। इरेना का कहना है कि इसी जलन और हीनता की भावना का शिकार होकर हिन्दू मर्द मुस्लिमों के व्यापार और घरों को नुकसान पहुँचाते हैं, जला डालते हैं- ताकि मुस्लिम महिलाओं को बेइज्जत कर सकें। इरेना ने गुजरात और मुजफ्फरनगर दंगों को इससे ही जोड़ा है।

हिन्दू समाज में ‘पितृसत्तात्मकता की प्रभुता’ की बात करते हुए इरेना ने कहा कि हिन्दू महिलाओं को संपत्ति समझते हैं, इसीलिए वो मुस्लिमों की संपत्ति जलाते हैं ताकि मुस्लिम महिलाओं की इज्जत के साथ खेला जा सके। इरेना ने इतने सारे आरोप बिना किसी सबूत या उदाहरण के दाग दिए लेकिन ये नहीं बताया कि महिलाओं को बुर्क़े में कैद रखना किस समाज की संस्कृति का हिस्सा है। बच्ची के जन्म के बाद बेरहमी से उसका खतना करना किस संस्कृति का हिस्सा है? वो ये भी बताना भूल गईं कि ‘तीन तलाक’ और ‘हलाला’ जैसी महिलाविरोधी परम्पराएँ किस समाज के अंदर गहरी पैठी हुई हैं।

इसी तरह उर्दू नाम वाले एक व्यक्ति ने दावा किया कि होली पर हिन्दुओं की पहचान इसी टैगलाइन से होती है- “तोहार चोली में रंग डालब ऐ भौजी!” जिस देश में हज़ारों भाषाएँ व बोलियाँ बोली जाती हों, वहाँ एक भोजपुरी गाने की किसी पंक्ति को उठा कर करोड़ों हिन्दुओं द्वारा मनाए जाने वाले त्यौहार को लेकर नकारात्मकता फैलाना कोई इन लिबरलों से सीखे। इसी तरह इसी व्यक्ति ने वाराणसी के मणिकर्णिका घाट पर खेली जाने वाली ‘भस्म होली’ का भी मजाक बनाया। वहीं आसिफ रियाज़ नामक एक व्यक्ति ने दावा किया कि ‘बुरा न मानो होली है’ बोल कर इस अवसर का उपयोग महिलाओं का यौन शोषण के लिए किया जाता है।

एक सोशल मीडिया यूजर ने तो यहाँ तक लिख दिया कि होली पर ‘बलात्कारी संस्कृति’ को बढ़ावा दिया जाता है। इसी तरह तथाकथित पत्रकार राणा अयूब ने एक ख़बर शेयर कर के दावा किया कि पाकिस्तान के हिन्दू इस बार होली का बायकाट कर रहे हैं ताकि वो सीएए के ख़िलाफ़ अपना विरोध दर्ज करा सकें। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने भी होली पर हिन्दुओं को शुभकामनाएँ दी। वही पीएम, जिनके कार्यकाल में पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों पर अत्याचार अपनी चरम सीमा पर पहुँच गया है। भारत के सेक्युलर गिरोह के लोग होली पर अपना विरोध दर्ज कराने के लिए पाकिस्तान का सहारा ले रहे हैं।

सोचिए, अगर ईद या मुहर्रम के दौरान ऐसे सलाह दिए जाएँ या फिर ‘यौन शोषण’ का ‘बलात्कार’ जैसे शब्दों को इस मजहबी त्योहारों के साथ जोड़ कर देखा जाए फिर क्या होगा? फिर यही लोग ‘इस्लामोफोबिया’ का राग अलापेंगे। एक व्यक्ति जिसने अपने घर की महिलाओं को बुर्के में कैद रखा होगा, सोशल मीडिया पर होली को महिलाविरोधी बताता है। ये अपने-आप में हास्यास्पद है। जिसने अपनी बेटी के जन्म के तुरंत बाद उसका अंगमर्दन कराया होगा, वो भी कह रहा है कि हिन्दू समाज में महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार किया जाता है। इनके बयान देख कर हँसने के अलावा आप कुछ कर भी नहीं सकते।

क्या आपने बहन-बीवी के लिए चाय बनाए हैं, बर्तन धोए हैं? नहीं… तो वेद के ये 4 श्लोक पढ़ डालिए अभी

महिलाओं की सुरक्षा के नाम पर छोटे-मोटे ध्यानाकर्षक हैश टैग्स चलाकर ही हम किसी बड़े अभियान जैसा संतोष हासिल कर लेते हैं और ख़ुशफ़हमी में जी लेते हैं। इसलिए कभी-कभी हमें #MeToo जैसे चलन ही बहुत बड़ी मुहिम लगने लगते हैं। लेकिन बिना किसी औपचारिकता के एक बात कहूँ तो मुझे लगता है कि न तो ये बहुत बड़ी बात है, न ही एक्सक्लूसिवली महिला होने के नाते सुरक्षा हासिल करने के बारे में है क्योंकि हर ज़िंदा चीज़ को सुरक्षित रहने का अधिकार है और महिलाएँ उनमें से ही हैं। पशु, पक्षी, इंसान सबको सुरक्षित रहना चाहिए। जहाँ तक इस अभियान के बड़ा अभियान होने की बात है, तो शायद ये उतना ही बड़ा है जितना उस बच्चे का कक्षा में नीचे से प्रथम आना बड़ा है, जो कभी स्कूल गया ही नहीं। अब शिक्षा के उपयुक्त अवसर प्राप्त न करने वाला बच्चा बस किसी तरह उत्तीर्ण ही हो जाए, यही बहुत बड़ी बात होती है। उसके अव्वल दर्जे वाले अंक प्राप्त करने की बात तो सोचना ही बेमानी है। बस वो पास हो जाए इतना ही काफी है। ऐसी ही स्थिति महिलाओं की है, सुरक्षित है इतना काफी है। बच्चा पास तो हुआ चाहे प्रथम न आया हो, चलेगा।

क्या हम कभी सोचते हैं वो कौन सी बातें हैं जो अभी भी उसे अग्रणी बनने की स्थिति से दूर रखती हैं? कुछ प्रबुद्ध और संवेदनशील लोगों को छोड़ दें तो अधिकांश रूप में सब जगह महिलाओं के साथ वही पूर्वग्रहों वाला रवैया देखने को मिलता है। महिलाओं को उतनी ही सहजता से हर जगह स्वीकार नहीं किया जाता, जितनी सहजता से पुरुषों को किया जाता है। अगर वो कोई बड़ी उपलब्धि हासिल कर लें तो यह एक आश्चर्य का विषय होता है। अधीनस्थ कर्मचारी अपनी बॉस की इसलिए आसानी से अवहेलना करते हैं क्योंकि वो एक महिला है और प्राय: उनको अपनी धाक ज़माने के लिए अतिरिक्त कठोरता का प्रदर्शन करना पड़ता है, चाहे वो उनके व्यक्तित्व से मेल खाता हो या नहीं। अगर पुरुष भद्दा मज़ाक भी करें तो उसको सेलिब्रेट किया जाता है जबकि महिलाओं से अपेक्षा की जाती है कि वो इससे दूर ही रहें। कोई महिला सभ्य-सुशील अंदाज़ में भी हास-परिहास करे तो भी कोई गारंटी नहीं कि लोग उसका उतनी ही सहजता से आनंद लें, जितना पुरुषों की मज़ाक से लिया जाता है। पहले इस बात पर ध्यान जाएगा कि ये जोक एक लड़की की तरफ़ से आया है।

एडवेंचर, शिक्षा के समान अवसर? रुकिए कहीं आप महिला तो नहीं हैं? घर में भाई-बहन की परवरिश के बीच होने वाला फ़र्क कितना स्पष्ट है। पुरुषों की तरह से ही दिन भर परिश्रम करके शाम को घर लौटने के बाद घर के सभी कामों की ज़िम्मेदारी केवल महिलाओं की होती है,जबकि बहुत-सी महिलाएँ अपने पतियों के कामों में अक्सर हाथ बँटाती हैं लेकिन बदले में उन्हें वैसा सहयोग नहीं मिलता। ऐसी कितनी ही और अनचाही बातें हैं जो अगर समाप्त हो जाएँ तो हम सोच सकते हैं कि हाँ अब ये बच्चा अच्छे अंकों के साथ उत्तीर्ण हुआ है।

पति परमेश्वर जैसी अवधारणाएँ पता नहीं कब और कैसे पैदा हो गईं। शायद इसी के चलते कई लोगों के व्यवहार को देख कर ऐसा लगता है जैसे उनकी पत्नी उनकी पत्नी न होकर उनकी सेविका हो जबकि वेद में पत्नी को घर की साम्राज्ञी कहा है- “सम्राज्ञी श्वशुरे भव सम्राज्ञी श्वश्र्वां भव। ननान्दरि सम्राज्ञी भव सम्राज्ञी अधि देवृषु।।“ मैंने ऋषि दयानंदकृत संस्कारविधि के विवाह और गृहस्थाश्रम प्रकरण से संबंधित वेद मंत्रों को ध्यान से देखा तो कुछ ही मंत्रों को पढ़कर बात स्पष्ट हो गई। वहाँ पढ़े गए मंत्रों में वर और वधू से समान प्रतिज्ञाएँ कराई गई हैं। किसी को किसी पर वरीयता नहीं दी गई है- “अमोऽहमस्मि सा त्वं सा त्वमस्यमोऽहम्। सामाहमस्मि ऋक् त्वम्….।” और अंततः सब कुछ इस बात पर टिका है कि दोनों एक दूसरे का कितना सम्मान कर पाते हैं और कितना एक दूसरे की भावनाओं का ख्याल रख पाते हैं, उनका परस्पर कितना प्रेमपूर्ण व्यवहार है- “ते सन्तु जरदष्टय: सं प्रियौ रोचिष्णू सुमनस्यमानौ।“ यह तो सिर्फ़ विवाह प्रकरण के मंत्रों की बात है, जिनको मैंने यह बताने के लिए यहाँ वर्णित किया है कि जहाँ स्वाभाविक रूप से संसार भर के सभी पुरुष अपनी पत्नियों पर अतिरिक्त अधिकार होने की बात करते हैं, वहाँ वेद इस विषय में क्या कहते हैं।

इसके अतिरिक्त वेदों में महिलाओं की स्थिति के विषय में जो मंत्र हैं, अगर आप उनको पढ़ेंगे तो महसूस करेंगे कि महिलाओं को वहाँ बहुत अधिक सम्मानजनक दर्जा प्राप्त है। ये बहुत ही राहत की बात है कि संसार के सबसे प्राचीन ज्ञान-भंडार वेद महिलाओं को इतना सशक्त, उदात्त और स्वीकार्य स्थान प्रदान करते हैं कि दुनिया की कोई भी तथाकथित आधुनिक और विकसित सभ्यताएँ उसके बारे में सोच भी नहीं सकती।

एक-दो वर्ष पहले लेडी गागा ने Women in Hollywood नामक आयोजन में पावरफुल सूट पहनकर अपनी पावरफुल स्पीच में कहा- “As a sexual assault survivor by someone in the entertainment industry, as a woman who is still not brave enough to say his name, as a woman who lives with chronic pain, as a woman who was conditioned at a very young age to listen to what men told me to do, I decided today I wanted to take the power back. Today I wear the pants.“ सारी दुनिया में महिलाओं के साथ यही दुर्घटना घटती रहती है। ये सब जिसकी लाठी उसकी भैंस वाली बात है और कुछ नहीं। और सच तो ये है कि यदि महिलाओं का शारीरिक सामर्थ्य पुरुषों से अधिक हुआ करता तो वो भी ऐसा ही करतीं। Power corrupts, absolute power corrupts absolutely.

इसलिए सोचने वाली बात ये है कि सब को अपने अंदर मानवीय दृष्टिकोण पैदा करना चाहिए और सचमुच अपने शिक्षित होने का परिचय देना चाहिए न कि एक दूसरे से अधिक दबंग होने का,चाहे वो महिला हो या पुरूष। जंगली पशु इंसानों पर इसलिए हमला नहीं करते कि वो इंसानों से अधिक शिक्षित हैं या आक्रमण की अच्छी योजना बना सकते हैं बल्कि उनका इंसानों पर हावी होने का आत्मविश्वास इस बात पर टिका होता है कि वो शरीर-बल में उनसे बढ़कर हैं। तो क्या इस वजह से हम उन्हें मानव जाति से श्रेष्ठ समझ लें? इसी तरह से जिस बल का प्रयोग विवेक के साथ नहीं किया जाता वो पशु-बल ही है, उसकी वजह से आप श्रेष्ठ नहीं कहला सकते। बल का शालीन प्रयोग ही बल की गरिमा है। जो बल का गरिमामय उपयोग करते हैं उनके व्यक्तित्व में देवत्व झलकता है। अपेक्षाकृत कम शारीरिक बल वाली महिलाओं पर अपना जोर दिखाना दानवता है।

शायद, इसीलिए देवत्व की कसौटी को मनीषियों ने कुछ इस तरह से निर्द्धारित किया- “यत्र नार्यस्तु पूज्यन्तेरमन्ते तत्र देवता:।” पूजा यानी न केवल सुरक्षा बल्कि सम्मान भी। अंतत: किसी के भी साथ हमारे व्यवहार का आधार मानवीय होना चाहिए क्योंकि हम मानव हैं। यही हम पर शोभा देता है और यही सबसे उपयुक्त बात है। जब ऐसा होगा तब ये बड़ी बात होगी।

लेखिका: अमिता, कन्या गुरुकुल चोटिपुरा

जब तक हिन्दू बहुमत में है तभी तक रहेगा लोकतंत्र: भारत की आत्मा में श्रीराम बसे हैं, बाबर नहीं

“स्वतंत्र: कर्ता” अर्थात् कर्म करने में जो स्वतंत्र है वह कर्ता कहलाता है। स्वतंत्रता नैसर्गिक है। भारत का संविधान इस स्वतंत्रता का सम्मान करता है। व्यक्ति अपनी स्वतंत्रता के प्रति बहुत सचेत रहता है परंतु साथ ही उसे दूसरे की स्वतंत्रता का भी ध्यान रखना चाहिए। सब को सामाजिक सर्वहितकारी नियम पालने में परतंत्र रहना चाहिए और प्रत्येक हितकारी नियम में सब स्वतंत्र हैं। इसलिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता राष्ट्रीय स्वतंत्रता की मर्यादाओं में बँधी हुई है।

जिन स्वतंत्रताओं से राज्य की प्रभुता, अखंडता, सुरक्षा और लोक व्यवस्था को हानि पहुँचे, भारतीय संविधान में उन स्वतंत्रताओं के लिए प्रतिबंध भी लगाया गया है। इस प्रकार जहाँ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की पूरी छूट स्वतंत्र भारत में दी गई है, उसके साथ ही देश की स्वतंत्रता को हानि पहुँचाने वाले प्रतिबंधों से उसे मर्यादित भी कर दिया गया है। सच बात तो यह है कि इन अमर्यादित स्वतंत्रताओं से राज्यव्यवस्था भी व्यर्थ हो जाती है। राज्य व्यवस्था है ही इसलिए कि वह जनता को मर्यादित स्वतंत्रता का उद्घोष करने की छूट दे और जो लोग इस प्रकार की मर्यादाओं का उल्लंघन करने की आदी हो, उनको प्रशासन की ओर से दंड दिया जाए। जिससे अन्य नागरिकों का जीवन व्यवस्थित और सुरक्षित रह सके।

भारत बहुभाषी, बहुपंथी और बहुजातीय देश है। यदि यहाँ की जनता के बहुसंख्यक वर्ग में सांप्रदायिक सहिष्णुता की भावना न होती तो इस देश में शांति, व्यक्ति स्वतंत्रता और व्यवस्था स्थापित करना कठिन हो जाता। भारत इस सहिष्णुता का विश्व में प्रथम और अनूठा उदाहरण रहा है। इसलिए दावे के साथ कहा जा सकता है कि सांप्रदायिक सहिष्णुता में विश्वास रखने वाला 85 प्रतिशत हिंदू समाज जब तक यहाँ बहुमत में है तभी तक यहाँ लोकतंत्र भी है, सम्प्रदाय निरपेक्षता भी है, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता भी है और जन जीवन की सुरक्षा भी है।

वर्तमान परिप्रेक्ष्य में बहुत बड़ा प्रश्न है इस देश की आत्मा तथा चिंतन की स्वतंत्रता को जान कर उसमें आस्था रखने का। कहा जा सकता है कि आज प्रश्न है भारतीयता और अभारतीयता का। जैसे श्रीराम को भारत की आत्मा और जन जीवन से कभी अलग नहीं किया जा सकता और बाबर को कभी भारत की आत्मा और जन जीवन से जोड़ा नहीं जा सकता। जिस आक्रमणकारी बाबर के समकालीन संत प्रवर गुरु नानक ने स्वयं अपनी आँखों से देखे उसके अत्याचारों का ऐसा दर्दनाक वर्णन किया है कि आज भी उसको पढ़ कर किसी का भी दिल पसीजे बिना नहीं रह सकता। उस अत्याचारी विदेशी और अभारतीय बादशाह की जामिया मिलिया जैसे राष्ट्रीय संस्था में 500वीं जयंती मनाई गई थी। इससे बढ़कर अभारतीय मानसिक विकृति का और क्या परिचय हो सकता है?

वास्तव में भारतीयता इतने अरसे बाद आँखें मलकर उठने का प्रयत्न कर रह रही है, यही इसका अपराध है। अन्यथा स्वराज्य प्राप्ति के साथ ही बाबरी मस्जिद और राम मंदिर जन्मभूमि विवाद का निपटारा हो जाना चाहिए था। केवल इसी का नहीं बल्कि जितने भी अत्याचारी विदेशी हमलावर हुए हैं उन सब के प्रतीकों और स्मारकों का उनकी मूर्तियों का और उनके नाम से बनी इमारतों तथा सड़कों का निपटारा अब से कई वर्ष पूर्व होना चाहिए था। दूसरा, धर्म के आधार पर हुए विभाजन के नाम पर जब इस्लामिक देशों का गठन हो चुका है, तब वहीं के नागरिकों के लिए भारतीयता को ठेस नहीं पहुँचना चाहिए था। सबको समझना चाहिए कि वर्तमान नगरिकता संशोधन कानून वहाँ के मुस्लिम के लिए पुनः कोई प्रावधान नहीं करता है क्योंकि मुस्लिम न तो अपने इस्लामिक देशों में अल्पसंख्यक हैं और न ही धार्मिक आधार पर उन्हें वहाँ अपने ही देश में उत्पीड़ना का सामना करना पड़ रहा है।

इस कानून से किसी भी भारतीय अल्पसंख्यकों विशेषकर मुस्लिमों की नागरिकता किसी भी प्रकार से प्रभावित नहीं हो रही है। यह कानून किसी की नागरिकता का हनन नहीं कर रहा बल्कि वंचितों को कानूनन अधिकार दे रहा है। यह अधिनियम किसी को बुलाकर भी नागरिकता नहीं दे रहा है बल्कि जिन्होंने 31 दिसंबर 2014 की निर्णायक तारीख तक भारत में प्रवेश कर लिया है, वे भारतीय नागरिकता के लिए सरकार के पास आवेदन कर सकेंगे। इन इस्लामिक देशों के इस्लाम मतावलंबी नागरिक भारतीय नागरिकता के लिए ‘आवेदन द्वारा नागरिकता’ इस पर्याय के अंतर्गत आवेदन कर सकते हैं। यह पर्याय किसी भी विदेशी व्यक्ति के लिए लागू है। भारत सरकार ऐसे आवेदनों के ऊपर विचार करने के बाद नागरिकता प्रदान करती है। जैसे पाकिस्तानी गायक/कलाकार अदनान सामी को 1 जनवरी, 2016 को भारतीय नागरिकता दी गई है। यह संशोधन केवल तीन देशों के 6 अल्पसंख्यकों के प्रवासियों को निर्धारित मानदंडों को पूर्ण करने पर ही प्राथमिकता प्रदान करता है ।

पंथ निरपेक्षता के सिद्धांत के कारण देश में अल्पसंख्यकों ने धर्म के नाम पर विशेषाधिकार प्राप्त करने और बहुसंख्यकों को उन्हें मानने के लिए बाधित करने के आंदोलन भी समय समय पर कम नहीं किए हैं। अल्पसंख्यक अपनी मनमानी के लिए धर्म के नाम पर प्रशासन को बाधित करते रहे हैं और यह सिद्ध करने का प्रयत्न भी करते रहे हैं कि उनके धार्मिक नियम सर्वोपरि हैं। उनके ऊपर राष्ट्र का कोई कानून लागू नहीं होता अर्थात वे देश के कानूनों से ऊपर हैं।

प्रत्येक नागरिक का अपने अधिकारों और संविधान के प्रति जागरूक होना आवश्यक है। परन्तु इस कानून को लेकर विरोध करने से पहले उसकी वस्तुस्थिति जाननी उससे भी ज्यादा आवश्यक है। क्योंकि अपने राजनैतिक स्वार्थ सिद्ध न होने से कुछ राजनेताओं की यह समस्या बन चुकी है कि वे यथार्थ जानते हुए भी मुस्लिमों को गुमराह कर रहे हैं और मुस्लिम समाज को भेड़चाल के लिए विवश कर रहे हैं। वे बिना सोचे-समझे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर विरोध कर रहे हैं। सार्वजनिक संपत्ति और भारतीय संविधान तथा साम्प्रदायिक सद्भाव को नुकसान पहुँचा रहे हैं।

लेखिका: डॉ सोनिया