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दिल्ली पुलिस ने हिन्दुओं को छोड़ मुस्लिमों पर लाठियाँ चलाई: रुबिका के शो में भद पिटवाने वाली स्वरा भास्कर

दैनिक सस्ते इंटरनेट के माध्यम से ‘विचारक’ बनकर सनसनी बनने की कला यदि किसी से सीखी जा सकती है तो इसके लिए स्वरा भास्कर का नाम सबसे ऊपर आता है। कुणाल कामरा और ध्रुव राठी जैसे नाम इसके बाद आते हैं। हाल ही में एबीपी न्यूज़ चैनल की एंकर रुबिका लियाकत के शो में बुरी तरह से फजीहत करवाने के कारण चर्चा में आई स्वरा भास्कर ने फिर एक पैंतरा अपनाया है। सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे एक वीडियो में वे दिल्ली पुलिस पर आरोप लगा रही हैं। उनका कहना है कि पुलिस ने दंगों के दौरान हिन्दुओं को छोड़कर मुस्लिमों पर लाठियाँ बरसाई।

मध्य प्रदेश सरकार के महिला एवं बाल विकास विभाग द्वारा शुक्रवार (मार्च 06, 2020) को आयोजित ‘बिटिया उत्सव’ सेमिनार में स्वरा भास्कर ने ये बात कही।

इस वीडियो में स्वरा भास्कर कह रही है, “अगर मैं दिल्ली दंगों में जाऊँगी तो मेरी पहचान हिन्दू बताई जाएगी… क्योंकि मैं हिन्दू हूँ, तो शायद दिल्ली पुलिस मेरे ऊपर शायद उस हक़ से लाठी नहीं मारेगी, जिस बर्बरता और हक़ से उसने एक मुस्लिम पर लाठी चलाई है। मैं माफ़ी चाहती हूँ कि मैं ऐसी कड़वी बात कर रही हूँ। लेकिन जो हुआ है वो हम सब के सामने है देखने के लिए।”

स्वरा भास्कर ने कहा कि जिस तरह की राजनीति हो रही है और मानसिकता आ गई है कि एक ही आइडेंटिटी होगी। ‘वन नेशन-वन लैंग्वेज और ‘वन नेशन-वन आइडेंटिटी होगी, क्यों? जहाँ पर इतनी विविधता होगी, वहाँ लड़ाइयॉं और विवाद होगी। किसी भी सभ्य समाज के लिए इतना होना चाहिए कि जो भी विवाद हों वे एक कानून की ढाँचे में डील किया जाए।

स्वरा भास्कर इस विडियो में किसी सांसद का भी जिक्र करते हुए देखी जा सकती हैं। स्वरा का कहना है, “हमने पिछले साल संसद में एक आतंक आरोपी को विजयी बनाकर भेजा है, हमें ये एंटी नेशनल नहीं लगता है।” स्वरा भास्कर ने कहा कि अब हम ऐसे वक्त में आ गए हैं जहाँ सवाल करने पर आप पर एंटीनेशनल होने के आरोप लगते हैं। उन्होंने कहा, “मेरे ऊपर भी एक केस कानपुर में दर्ज हो चुका है और हो सकता है कि यहाँ भी केस दर्ज हो जाए।”

हालाँकि, प्रतिदिन सोशल मीडिया पर अफवाह और उन्माद फैलाने वाली स्वरा भास्कर शायद तथ्यों के साथ भी दुश्मनी कर बैठी हैं और उन्हें अभी तक आईबी अधिकारी अंकित शर्मा की निर्मम हत्या से लेकर मात्र 20 साल के दिलबर नेगी को जला देने जैसी घटनाओं का शायद ज्ञान नहीं।

VIDEO: स्वरा भास्कर ज्ञानगंगा के तीन मिनट जिसने वामपंथियों के प्रचलित तरीकों को फिर एक्सपोज किया

भगवान जब लोगों को अक्ल बाँट रहे थे, तब स्वरा भास्कर NRC के ‘रिलीवेंट सेक्शन्स’ पढ़ने में व्यस्त थी

जामिया हिंसा में हाथ सेंकने ट्विटर पर लौट आए अनुराग कश्यप, स्वरा भास्कर ने भी उगला जहर

महिलाओं के साथ ‘छेड़छाड़’ के लिए होली है: लेफ्ट लिबरल और इस्लामिक गैंग प्रोपेगेंडा के साथ लौटा

रंगों का त्योहार होली नजदीक है। इसके साथ ही वामपंथियों, लिबरलों और इस्लामवादियों का प्रोपेगेंडा भी शुरू हो गया है। वो हमेशा की तरह हिंदू त्योहार को नीचा दिखाने की अपनी हरकत में लग गए हैं। इस्लामवादियों और उनके वैचारिक कॉमरेडों ने एक बार फिर से हिंदू पर्व की छवि को खराब करने का बीड़ा उठाया है। उन्होंने होली के पर्व को महिलाओं के खिलाफ दिखाने की कोशिश की है। उन्होंने आरोप लगाया कि होली के त्योहार के दौरान हिंदू पुरुष, महिलाओं के साथ छेड़छाड़ करते हैं और उनका उत्पीड़न करते हैं।

एक सोशल मीडिया यूजर ने ट्विटर पर सेक्सिस्ट टिप्पणी करते हुए लिखा कि होली के नाम पर पूरे देश में महिलाओं के साथ छेड़छाड़ किया जाता है।

मिनी नायर नाम की एक महिला, जो कि लेखक होने का दावा करती है, लिखती है कि होली उसके लिए काफी भयानक थी, क्योंकि पिछले साल वह केरल में इस त्योहार के दौरान बेचैनी महसूस कर रही थी। ‘फेमिनिस्ट’ मिनी नायर पुरुषों को ‘राक्षस’ बुलाते हुए कहती है कि भांग उसकी परेशानी का सबब बना था।

शची नेली नाम की एक अन्य हिंदूफोबिक सोशल मीडिया यूजर ने शनिवार को ट्विटर पर दावा किया कि वह होली नहीं खेलती है, क्योंकि अतीत में होली खेलने खेलने के दौरान उसके साथ छेड़छाड़ की गई थी। नेली यह भी कहती है कि इस त्योहार को मनाते समय जब ‘होली है’ का उद्घोष किया जाता है, तो ये उसे एक युद्ध की तरह लगता है।

सोशल मीडिया पर एक इस्लामिक ट्रोल Opus of Ali ने भी इसी तरह के हिंदूफोबिक ट्वीट्स का सहारा लिया है, जिसमें कहा गया कि होली छेड़छाड़ का त्योहार है। कट्टरपंथी इस्लामवादी ने लगातार एक के बाद एक कई ट्वीट करते हुए लिखा कि छेड़छाड़ से बचने के लिए लोगों को होली को ना कहना चाहिए।


एक अन्य ट्वीट में Opus of Ali ने होली मनाने वाले हिंदुओं पर झूठे दावे करते हुए कहा कि इस दौरान महिलाओं का यौन उत्पीड़न किया जाता है।

इसके साथ ही ‘Baudhkaro’ नामक एक अल्ट्रा-लेप्ट समूह ने होली पर हमला किया। ये खुद को डॉ. बीआर अंबेडकर की शिक्षाओं का फॉलोवर होने का दावा करता है। इसमें दो वामपंथी कट्टरपंथी द्वारा ‘त्योहार- द एंटी होली सॉन्ग’ गाया जाता है। इसमें से एक कट्टरपंथी विवादास्पद वामपंथी विश्वविद्यालय जेएनयू से पीएचडी छात्र है, जो भड़काऊ टिप्पणी करता है और दावा करता है कि होली एक जातिवादी त्योहार है, जिसमें ऊँची जाति के हिंदुओं द्वारा निचली जातियों की महिलाओं का यौन उत्पीड़न किया जाता है।

इनका रीति-रिवाजों और परंपराओं को कोसना केवल हिंदू त्योहारों तक ही सीमित है। गैर-हिंदू त्योहारों की प्रतिगामी प्रथाओं की बात आते ही ये आँखें मूंद लेते हैं। हकीकत यह है कि लिबरल देश की गैर-स्वदेशी संस्कृति के सभी पहलुओं को छुपाते हैं, जबकि वे सभी हिंदू त्योहारों को खत्म करने का प्रयास करते हैं।

उल्लेखनीय है कि लेफ्ट मीडिया ने पिछले साल भी होली पर निशाना साधा था। फेक न्यूज वेबसाइट ‘द क्विंट’ ने हिंदुओं के रंगों के त्योहार की छवि को खराब करने के लिए इस पर्व को बच्चों द्वारा सड़कों पर आतंक फैलाने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले अवसर के रूप में ब्रांड बनाने के लिए आगे बढ़ाया था। इसी तरह से वामपंथी मीडिया पोर्टल स्क्रॉल ने भी होली के खिलाफ जहर उगले थे।

लोकसभा, विधानसभा क्षेत्रों का नए सिरे से परिसीमन: जम्मू-कश्मीर समेत पूर्वोत्तर के 4 राज्यों के लिए बना आयोग

नवगठित केंद्र शासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर समेत पूर्वोत्तर के चार राज्यों असम, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर और नगालैंड के लिए केंद्र सरकार ने शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट की पूर्व जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई की अध्यक्षता में परिसीमन आयोग का गठन कर दिया।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार इस संदर्भ में केंद्रीय विधि मंत्रालय ने शुक्रवार को अधिसूचना जारी की। यह परिसीमन आयोग केंद्र शासित क्षेत्र जम्मू-कश्मीर के साथ साथ पूर्वोत्तर के राज्यों असम, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर तथा नगालैंड के लिए भी लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों का नए सिरे से परिसीमन करेगा। इस अधिसूचना में कहा गया है कि चुनाव आयुक्त सुशील चंद्रा और जम्मू-कश्मीर तथा अन्य चार राज्यों के चुनाव आयुक्त इसके सदस्य होंगे। आयोग को एक साल में अपनी रिपोर्ट देनी होगी।

जम्मू-कश्मीर राज्य के पुनर्गठन के बाद अब इस केंद्र शासित प्रदेश में सात विधानसभा सीटें बढ़नी हैं। जहाँ पहले जम्मू कश्मीर राज्य में विधानसभा के सदस्यों की संख्या 107 थी, वो अब बढ़कर 114 हो गई है। इनमें से 24 सीटें पाक अधिकृत कश्मीर के लिए आरक्षित की गई हैं। परिसीमन एक देश या एक प्रांत की सीमाओं या संसदीय क्षेत्रों का नए सिरे गठन होता है। यहाँ स्पष्ट कर दें कि यह परिसीमन 2011 की जनसंख्या के आधार पर ही होगा।

केंद्र द्वारा जारी इस अधिसूचना में कहा गया है कि परिसीमन अधिनियम, 2002 की धारा-3 के तहत निहित शक्तियों से ही केंद्र सरकार ने परिसीमन आयोग का गठन किया है। केंद्र सरकार का लक्ष्य नवगठित केंद्र शासित प्रदेश जम्मू और कश्मीर के अलावा असम, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर और नगालैंड राज्यों में संसदीय क्षेत्रों और विधानसभा क्षेत्रों का परिसीमन करना है। आयोग जम्मू-कश्मीर के संसदीय और विधानसभा क्षेत्रों का पुनर्गठन और चार पूर्वोत्तर राज्यों की सीमाओं का भी पुनर्गठन करेगा।

पिछली 28 फरवरी को सुरक्षा वजहों के चलते केंद्र सरकार ने असम, नगालैंड, मणिपुर और अरुणाचल प्रदेश के परिसीमन की अधिसूचना को रद्द कर दिया था। इसलिए अब इन चार राज्यों में भी यह कवायद जम्मू-कश्मीर के परिसीमन के साथ शुरू होगी।

शाहीन बाग से भी जुड़े ताहिर हुसैन के तार: गाड़ियों में भरकर लोग भेजे जाते थे, कंटेनर और बोरियों में सामान

उत्तर-पूर्वी दिल्ली के हिंदू विरोधी दंगों में आप के निलंबित निगम पार्षद ताहिर हुसैन की संलिप्तता के कई सबूत सामने आए हैं। अब शाहीन बाग से भी उसका कनेक्शन सामने आया है। चॉंदबाग और खजुरी खास के लोगों का कहना है कि ताहिर लोगों को गाड़ियों में भरकर शाहीन बाग भेजता था। वहॉं भेजने के लिए लोगों को ताहिर कहॉं से लाता था इसके बारे में अभी तस्वीर स्पष्ट नहीं है। शाहीन बाग में अरसे से नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ धरना चल रहा है।

बताया जाता है कि ताहिर हुसैन अपने नेटवर्क के जरिए एक के बाद एक ग़ैर-क़ानूनी गतिविधियों में व्यस्त था। ‘TV9 भारतवर्ष’ कर एक रिपोर्ट में बताया गया है कि शाहीन बाग़ में चल रहे धरने, दिल्ली दंगे और ताहिर हुसैन के आपस में तार जुड़े हुए हैं। चाँदबाग़ की एक पार्किंग में जाकर चैनल के रिपोर्टर ने इस बारे में अहम जानकारी जुटाई। यहॉं ओला-उबर और प्राइवेट गाड़ियॉं पार्क की जाती है। इन्हीं गाड़ियों में से एक के बारे में कहा जा रहा है कि वह रोज शाहीन बाग़ जाया करती थी।

एक चश्मदीद ने बताया कि रात को उसने कई बार देखा है कि ताहिर हुसैन के घर के सामने टैक्सियों को हायर कर शाहीन बाग़ ले जाया जाता था। उसने बताया कि उसे भी अपनी गाड़ी शाहीन बाग़ ले जाने के लिए कहा गया था। क़रीब 50-60 लोग रोज़ ताहिर हुसैन की इमारत से शाहीन बाग़ ले जाए जाते थे। उबर के एक अन्य ड्राइवर ने बताया कि उससे भी कई बार वहाँ चलने के लिए कहा गया था। उसने बताया कि 100 लोगों को भी ले जाता जाता था और क़रीब 5-10 गाड़ियाँ रोज शाहीन बाग़ जाती थीं।

एक अन्य ओला ड्राइवर ने बताया कि वो ताहिर हुसैन और उसके सेक्रेट्री व ड्राइवर को पहचानता है क्योंकि वो उसके ऑफिस में जा चुका है। उसने बताया कि उसने अपने मोहल्ले के लोगों को पहले भी मना कर चुका था कि ताहिर हुसैन के कहने पर कोई शाहीन बाग़ नहीं जाएगा। उसने आगे बताया कि यहाँ से कंटेनर व बोरियों में रख कर कई सामान भी शाहीन बाग़ ले जाए जाते थे। उनमें क्या होता था, इस बारे में किसी को भी नहीं पता। न सिर्फ़ शाहीन बाग़, बल्कि 5 बसों में सामान और लोग सम्भल भी ले जाए जाते थे। वहाँ भी सालों से भारी मात्रा में सामान ले जाए जाते थे। लोग कहते हैं कि वे बसें अवैध हैं।

ताहिर हुसैन के घर से कई गाड़ियाँ रोज शाहीन बाग़ जाती थीं

लोगों ने बताया कि वे अभी भी बच्चों के स्कूल नहीं भेज रहे हैं, क्योंकि वे भयभीत हैं। लोगों का कहना है कि वहाँ लोग बच्चों को पकड़ कर उनके साथ क्या कर देंगे, ये सोच कर ही उनकी रूह काँप उठती है। अब सवाल ये उठता है कि आख़िर ताहिर हुसैन के घर से गाड़ियों में भर-भर कर लोगों को व सामान को शाहीन बाग़ क्यों ले जाया जाता था?

गंगाजल स्टाइल में दबोचा गया ताहिर हुसैन, चकमा देने के लिए बुर्का की जगह पहन रखा था…

ताहिर हुसैन के भाई शाह आलम की तलाश: जहाँ हुई IB के अंकित शर्मा की हत्या वहाँ मौजूद था

ताहिर हुसैन के निशाने पर पहले से थे IB के अंकित शर्मा, हत्या के वक्त बांग्लादेशी आतंकी भी थे मौजूद!

GST में 150 करोड़ का घोटाला, श्रीनगर की दो कंपनियाँ सिर्फ कागजों पर: UP से लेकर जम्मू-कश्मीर तक छापेमारी

जीएसटी (गुड्स एंड सर्विस टैक्स) में इनपुट टैक्स के नाम पर 150 करोड़ रुपए की धोखाधड़ी का पर्दाफाश हुआ है। बताया जा रहा है कि कुछ लोगों ने फर्जी कंपनियाँ बनाकर लोगों के साथ जीएसटी टैक्स के नाम पर अवैध वसूली की है।

इस मामले की जानकारी जैसे ही जीएसटी के अधिकारियों को हुई, वैसे ही विभाग की टीमों ने शुक्रवार को दिल्ली, उत्तर प्रदेश के अलावा जम्मू-कश्मीर में भी कई जगह छापेमारी की। जानकारी के मुताबिक कुछ लोगों द्वारा बनाई गई फर्जी कंपनियाँ पिछले करीब दो सालों से अवैध रूप से टैक्स वसूल कर रही थीं। इन कंपनियों ने 1500 करोड़ रुपए की बिक्री करने के नाम पर 150 करोड़ रुपए का इनपुट टैक्स वसूल किया है। बताया जा रहा है कि इनमें से दो कंपनियाँ श्रीनगर की थीं, जो केवल कागजों पर थीं और उन्होंने जीएसटी के नाम पर इनपुट टैक्स वसूल किए थे।

विभागीय टीमों ने शुक्रवार को श्रीनगर में इन कंपनियों के ठिकानों पर दबिश देकर आवश्यक दस्तावेज जब्त किए। फिलहाल इस मामले की जाँच में पुलिस जुट गई है। दरअसल फर्जी बिलों के जरिए जीएसटी घोटाला करने वालों पर सरकार ने शिकंजा कसना शुरू कर दिया है।

इससे पहले बीते बुधवार को रीमा पॉलीकैम के एक निदेशक को गिरफ्तार किया गया था। वहीं तीन कंपनियों पर 4198 करोड़ रुपए से ज्यादा के फर्जी चालान जारी करते हुए 660 करोड़ रुपए के इनपुट टैक्स क्रेडिट (आईटीसी) की धोखाधड़ी करने के आरोप में मुकदमा दर्ज किया गया है। केंद्रीय वित्त मंत्रालय के मुताबिक, जीएसटी खुफिया महानिदेशालय (डीजीजीआई) मुख्यालय ने 3 मार्च को फॉर्च्यून ग्राफिक्स प्राइवेट लिमिटेड, रीमा पॉलीकैम प्राइवेट लिमिटेड और गणपति एंटरप्राइजेज के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया था। जाँच के दौरान सामने आया कि इन तीनों कंपनियों ने 4198 करोड़ रुपए के फर्जी चालान जारी किए थे।

आपको बता दें कि जीएसटी को 1 जुलाई 2017 को मोदी सरकार ने भारत में पेश किया था और इसी के साथ इसे पूरे भारत में लागू किया गया था। जीएसटी लागू होने के बाद इसे सरकार व कई अर्थशास्त्रियों ने स्वतंत्रता के बाद का सबसे बड़ा आर्थिक सुधार बताया था। हालाँकि इसका राजनीति कारणों से कई पार्टियों ने विरोध भी किया था।

एक MLA जिसकी खदानें सील कर दी, रिसॉर्ट ढाह दिया, फिर भी बोले- मर जाऊँगा BJP नहीं छोड़ूँगा

मध्य प्रदेश में एक जिला है कटनी। इस जिले के विजयराघवगढ़ से विधायक हैं बीजेपी के संजय पाठक। तीन बार के विधायक हैं। पूर्ववर्ती सरकार में मंत्री भी रह चुके हैं। राज्य के पल-पल बदलते सियासी घटनाक्रमों के बीच पाठक सुर्खियों में हैं। शनिवार (मार्च 7, 2020) को बांधवगढ़ स्थित उनका रिसॉर्ट जिला प्रशासन ने तोड़ दिया। इससे पहले सरकार ने जबलपुर में आयरन की उनकी 2 खदानें सील कर दी थी।

रिसॉर्ट पर हुई कार्रवाई को लेकर प्रशासन का कहना है कि पहले ही भूमि अतिक्रमण को लेकर नोटिस दे दिया गया था। वहीं पाठक ने कॉन्ग्रेस पर बदले की भावना से कार्रवाई करने का आरोप लगाया है। यह होटल 12 साल पुराना है। इसे पाठक के पिता ने बनवाया था। इस होटल में BJP और कॉन्ग्रेस नेता भी रुकते रहे हैं।

पाठक के खिलाफ सख्ती राज्य की कॉन्ग्रेस सरकार पर संकट के बादल मॅंडराने के बाद से शुरू हुए हैं। कॉन्ग्रेस के कुछ विधायकों ने बगावती तेवर अपना रखे हैं। समर्थन दे रहे सपा व बसपा के विधायक भी बागी रूख अख्तियार कर चुके हैं। कॉन्ग्रेस का आरोप है कि बीजेपी उसके विधायकों को खरीदने की कोशिश कर रही है। इन विधायकों को बंधक बनाने का आरोप भी बीजेपी पर लगाया था। हालॉंकि ये विधायक ही कॉन्ग्रेस के इन आरोपों को खारिज कर चुके हैं। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार कॉन्ग्रेस इस सबके पीछे संजय पाठक की महत्वपूर्ण भूमिका मान रही है। कहा जा रहा है कि पाठक के चार्टर्ड प्लेन से ही कॉन्ग्रेस विधायक दिल्ली भेजे गए थे।

हालाँकि पाठक इन आरोपों से इंकार करते हैं। उन्होंने कहा है, “मेरे ऊपर काफी दबाव बनाया जा रहा है। मुझे बीजेपी छोड़कर कॉन्ग्रेस में शामिल होने के लिए कहा जा रहा है। अगर मैं ऐसा नहीं करता हूँ तो मेरे और मेरे परिवार के सदस्यों के खिलाफ इसी तरह की कार्रवाई की जाएगी। मेरी जान को लगातार खतरा है। मैं मर जाऊँगा लेकिन बीजेपी नहीं छोड़ूँँगा।”

2 दिन पहले सरकार ने उनकी जबलपुर में आयरन की 2 खदानें सील कर दी थीं। ये खदानें मेसर्स निर्मला मिनरल्स के नाम से सिहोरा तहसील के अगरिया और दुबियारा में है। इसको लेकर भी पाठक ने सरकार पर विपक्ष में रहने की सजा के तहत कार्रवाई के आरोप लगाए थे। इस कार्रवाई को भी विधायक संजय पाठक बदले की कार्रवाई बता रहे हैं।

जबलपुर में खदान सील किए जाने के बाद चर्चा थी कि संजय पाठक ने गुरुवार (मार्च 5, 2020) देर रात मुख्यमंत्री कमलनाथ से मुलाकात की। लेकिन, शुक्रवार (मार्च 6, 2020) सुबह संजय पाठक ने ट्वीट कर मुलाकात का खंडन किया और राजनैतिक षड्यंत्र के तहत हत्या की आशंका जताई थी। उन्होंने ट्वीट करते हुए कहा था, “मैं सीएम कमलनाथ से नहीं मिला हूँ। बीती रात मुझे अगवा करने की कोशिश की गई थी। मेरे ऊपर बहुत दबाव बनाया जा रहा है। मैं हमेशा बीजेपी के साथ रहूॅंगा।” पाठक के इस ट्वीट के बाद शनिवार सुबह प्रशासन ने उनके रिसॉर्ट का एक हिस्सा ढहा दिया।

गौरतलब है कि इससे पहले कॉन्ग्रेस के इकलौते सिख विधायक हरदीप सिंह डंग ने अपनी ही पार्टी के राज्य सरकार को भ्रष्ट बता इस्तीफा दे दिया था। हरदीप डंग ने कहा था कि दूसरी बार लोगों का जनादेश मिलने के बावजूद पार्टी द्वारा उनकी लगातार अनदेखी की जा रही है। उन्होंने विधानसभा अध्यक्ष एनपी प्रजापति को भेजे अपने इस्तीफा पत्र में कहा था, “कोई भी मंत्री काम करने के लिए तैयार नहीं है, क्योंकि वे एक भ्रष्ट सरकार का हिस्सा हैं।”

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शाहीन बाग़ इलाके से मिला 3 शव, सिर्फ एक की ही हो सकी है अभी तक पहचान: पुलिस की जाँच जारी

नए नागरिकता कानून के खिलाफ धरना प्रदर्शन के नाम पर होती अराजकता के लिए बदनाम हुए दिल्ली के शाहीन बाग क्षेत्र से 3 शव मिलने की खबर से हड़कंप मच गया है। दिल्ली के इस शाहीन बाग़ इलाके में संशोधित नागरिकता कानून के विरोध में 84 दिन से धरना चल रहा है। ये 3 शव इस क्षेत्र के 3 अलग-अलग इलाकों में पाए गए हैं।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार साउथ-ईस्ट दिल्ली के डीसीपी आरपी मीणा ने बताया कि शव मिलने का पहला मामला शुक्रवार दोपहर करीब 12 बजे जानकारी में आया। यह शव यमुना नदी के किनारे मिला था, जिसमें मरने वाले की उम्र करीब 35 साल बताई जा रही है। मृतक की पहचान जाँच पड़ताल के बाद अशोक नगर दिल्ली निवासी मदन थापा पुत्र मनवीर थापा के रूप में हुई। शव को पोस्टमॉर्टम के लिए भेज दिया गया है।

मदन थापा नामक इस व्यक्ति के गायब होने की रिपोर्ट हरि नगर थाने में 3 फरवरी 2020 को दर्ज कराई गई थी। हालाँकि इस शव के ऊपर चोट का कोई निशान नहीं मिला है। वहीं शाहीन बाग क्षेत्र के मदर डेयरी के पीछे वाले नाले के पास स्थित एफ ब्लॉक से एक दूसरा शव दोपहर करीब साढ़े तीन बजे बरामद हुआ। इसकी शुक्रवार देर रात तक पहचान नहीं हो पाई थी, हालाँकि मृतक की उम्र करीब 40 साल बताई जा रही है। इस शव को पहचान और फिर पोस्टमॉर्टम के लिए पोस्टमॉर्टम हाउस में सुरक्षित रखवा दिया गया है। इस व्यक्ति की मौत कैसे हुई इस की भी जाँच अभी जारी है। तीसरा शव भी इसी इलाके में रेलवे लाइन के किनारे मिला बताया जा रहा है।

इसके पहले दिल्ली स्थित शाहीन बाग कल भी चर्चा में रहा जब यहाँ की लाइव तस्वीरों को दिखाने के लिए शुक्रवार को शाहीन बाग पहुँची इंडिया टीवी की दो महिला पत्रकारों को देखते ही वहाँ मौजूद प्रदर्शनकारियों में भगदड़ मच गई। जिन्होंने खाली पड़े पंडाल में और ज्यादा भीड़ को एकत्र करने के लिए इमरजेंसी हूटर बजा दिया गया।

इसके बाद तो किसी ने महिला पत्रकार के माइक को थामा तो किसी ने कैमरे के सामने हाथ लगा दिया। और तो और, लाइव कवरेज को रोकने के लिए प्रदर्शनकारियों ने महिला पत्रकार के कैमरे तक को तोड़ने की कोशिश कर डाली। याद रहे कि देश भर में संशोधित नागरिकता कानून के खिलाफ प्रदर्शन का केंद्र बने शाहीन बाग़ में अब वो रौनक नहीं रह गई है और नाम को ही धरना चल रहा है, इसी वजह से मौके पर खाली पड़े पंडाल को लाइव होते देख प्रदर्शनकारियों में अफरातफरी मच गई थी।

शाहीन बाग में सिर्फ 19 महिला प्रदर्शनकारी: हकीकत सामने आई तो महिला पत्रकारों से बदसलूकी, सब कुछ कैमरे में कैद

वारिस पठान के बयान और शाहीन बाग़ की दादियों की जहालत के कारण जली दिल्ली: वसीम रिजवी

शाहीन बाग़ प्रदर्शन के कारण लगी अरबों की चपत, 250 से ज्यादा दुकानों पर लगा ताला: रिपोर्ट्स

मैंने ईश्वर को नहीं देखा, लेकिन आपको देखा है: लकवाग्रस्त महिला की बातें सुन भावुक हुए PM मोदी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘जन औषधि दिवस’ पर इसके कई लाभार्थियों के साथ चर्चा की। पीएम मोदी ने इस दौरान कई महिलाओं से उनकी बातें सुनीं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस मौके का इस्तेमाल कोरोना वायरस को लेकर जागरूकता फैलाने के लिए भी किया और लोगों को एक-दूसरे से हाथ मिलाने की जगह ‘नमस्ते’ कह के अभिवादन करने की सलाह दी। उन्होंने जनता को अफवाहों से बचने की सलाह दी। पीएम ने जन औषधि केंद्रों की उपयोगिता की चर्चा की और उसकी अब तक की उपलब्धियों के बारे में बताया।

इस चर्चा के दौरान एक ऐसा पल भी आया जब प्रधानमंत्री भावुक हो गए। दीपा शाह नामक महिला ने कुछ ऐसा कहा, जिससे पीएम इमोशनल हो उठे। महिला ने बताया कि वह लकवा की मरीज हैं। दीपा ने कहा कि उन्होंने भगवान को तो नहीं देखा है, लेकिन नरेंद्र मोदी को देखा है। उक्त महिला ने बताया कि पहले जब वो दवाएँ खरीदती थीं तो 5000 रुपए से भी अधिक ख़र्च होते थे, जबकि अब मात्र 1500 रुपए प्रतिमाह में उनकी दवाओं का ख़र्च निकल आता है।

महिला ने बताया कि दवाओं से रुपए बचते हैं तो वो घर के ख़र्च में इस्तेमाल किए जाते हैं। उससे वह फल वगैरह भी खरीद लेती हैं। महिला ने रोते हुए अपना दर्द बयाँ दिया और ये भी बताया कि कैसे ‘जन औषधि केंद्र’ से उसे फायदा पहुँचा है।

कार्यक्रम के दौरान प्रधानमंत्री ने कहा कि जन औषधि केंद्रों के साथ-साथ डिस्ट्रिब्यूशन, क्वालिटी टेस्टिंग लैब जैसे अनेक दूसरे साधनों का भी विस्तार हो रहा है। उन्होंने बताया कि इससे हज़ारों युवाओं को रोज़गार मिल रहे हैं। उन्होंने जानकारी दी कि एक हजार से अधिक जरूरी दवाइयों की कीमत नियंत्रित होने से मरीजों के 12,500 करोड़ रुपए बचे हैं। स्टेंट्स और नी-इम्प्लांट्स की कीमत कम होने से लाखों मरीजों को नया जीवन मिला है।

‘आज़ाद कश्मीर’ कहाँ है?: मध्य प्रदेश की बोर्ड परीक्षा में पूछा गया भारत-विरोधी सवाल

मध्य प्रदेश में दसवीं की बोर्ड परीक्षा में एक ऐसा सवाल पूछा गया, जो पाकिस्तान के नैरेटिव को आगे बढ़ाता है। परीक्षा में ‘आज़ाद कश्मीर’ को लेकर सवाल पूछे गए। ‘आज़ाद कश्मीर’ शब्द का इस्तेमाल पाकिस्तान कश्मीर के उस हिस्से जिस पर उसने कब्जा कर रखा है, यानी ‘पाक अधिकृत कश्मीर’ अथवा ‘Pakistan Occupied Kashmir (PoK)’ के लिए करता है। पाक द्वारा कब्जा किए हुए इलाक़े को ‘आज़ाद’ कह कर मध्य प्रदेश की कॉन्ग्रेस सरकार ने भारत विरोधी स्टैंड को आगे बढ़ाया है।

राज्य में विपक्षी पार्टी भाजपा ने भी इस प्रश्न-पत्र को लेकर सवाल उठाए हैं। मध्य प्रदेश शिक्षा मंडल की सामाजिक विज्ञान की परीक्षा में सही जोड़ी मिलाने वाले सवाल (प्रश्न संख्या- 4) में एक विकल्प ‘आज़ाद कश्मीर’ का दिया गया है। इसके बाद प्रश्न नंबर 26 में भी ये दिखाने को कहा गया है कि नक़्शे में ‘आज़ाद कश्मीर’ कहाँ है? इन सवालों के बाद राजनीतिक गलियारों में भी विवाद शुरू हो गया है।

मध्य प्रदेश की परीक्षा में पूछे गए आपत्तिजनक सवाल

भाजपा ने कहा है कि राज्य में कॉन्ग्रेस की सरकार है, ऐसे में इन सवालों का पूछा जाना आश्चर्य वाली बात नहीं है। पार्टी ने कहा कि कॉन्ग्रेस तो वैसे भी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से अलगाववादी आन्दोलनों का समर्थन करती रही है। मध्य प्रदेश भाजपा के प्रवक्ता हितेश वाजपेयी ने इस सवाल को निंदनीय करार दिया। उन्होंने कॉन्ग्रेस पर निशाना साधते हुए कहा:

“दिग्विजय सिंह जैसे कॉन्ग्रेस नेता लंबे समय से देश विरोधी और पाकिस्तान के समर्थन वाले बयान देते रहे हैं। अब वे सरकार में हैं तो यह सब होना ही है। हमारा प्रयास है कि जल्द यह सरकार जाए, जिससे कि इस तरह की चीजों पर रोक लगाई जा सके।”

इस विषय में अभी तक बोर्ड या मध्य प्रदेश शिक्षा विभाग की तरफ से कोई जवाब या स्पष्टीकरण नहीं आया है। पूरे पेपर में कुल मिला कर दो बार आपत्तिजनक सवाल पूछे गए और दोनों ही बार ‘आज़ाद कश्मीर’ का प्रयोग किया गया।

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वेद-रामायण-महाभारत के भारतीय परम्पराओं वाले उत्तर-पूर्व को अंग्रेजों ने कैसे बनाया बर्बर और क्रूर

भारत विश्व का सबसे विविधतापूर्ण राष्ट्र है जो भाषा, वेशभूषा, भोजन, पर्व, परंपरा आदि अनेक सांस्कृतिक एवं भौगोलिक विविधताओं का अद्भुत मिश्रण है। विविधता किसी भी राष्ट्र की समृद्धि व गौरवपूर्ण समावेशी इतिहास का सूचक है l फिर क्यों इस देश की विविधताओं पर प्रश्न उठा कर उनमें अलगाववाद का बीजारोपण किया जाता है? जिसमें मुख्य रूप से पूर्वोत्तर भारत को ही लक्षित किया जाता है। भारत का पूर्वोत्तर क्षेत्र (सम्प्रति असम, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नागालैंड और त्रिपुरा राज्यों का समूह) भौगोलिक, पौराणिक, ऐतिहासिक एवं सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है।

प्राचीन ग्रंथों में पूर्व की पर्वत घाटियों एवं कन्दराओं के निवासी को “किरात” संज्ञा दी गई है। किरात शब्द संस्कृत की “कृ विक्षेपे” धातु से बना है जिसका अर्थ है विक्षिप्त अर्थात् टेड़ी मेडी गति वाला। पर्वत पहाड़ों के घुमावदार होने के कारण वहाँ के निवासियों की मैदानी भाग की भाँति सीधी गति न होकर विक्षिप्त गति होती है इसलिए पर्वत-कन्दरा के निवासी को किरात कहा गया। सर्वप्रथम यजुर्वेद में ‘किरात’ शब्द का प्रयोग मिलता है। सरोभ्यो धैवरम्उ पस्थावराभ्यो…..गुहाभ्य: किरातं सानुभ्यो जम्बकं पर्वतेभ्य: किम्पूरुषम् – {यजु. (30.16)}। प्रस्तुत मन्त्र में बताया गया है कि देश की उत्तम व्यवस्था के लिए क्षेत्र-विशेषज्ञ के अनुसार ही व्यक्ति की नियुक्ति करनी चाहिए। ऋषि कहता है कि (गुहाभ्य:) पर्वत कंदराओं के लिए (किरातं) किरात को नियुक्त करें। इस प्रसंग में पर्वत-कंदराओं में नियुक्त व्यक्ति को किरात कहा गया है।

इसी प्रकार अथर्वेद {कैरातिका कुमारिका सका खनति भेषजम् — अथर्वेद (10/414)} में भी पर्वत के शिखरों पर औषधि का खनन करने वाली कन्या को भी कैरातिका (किरात की पुत्री) कहा है। इसके उपरांत शतपथ ब्राह्मण {11.4.14} और पंचविंश ब्राह्मण {13.1.2.3} में किरातों के विशिष्ट परिवारों के कुल के संकेत मिलते हैं, जिसके अनुसार वे इस क्षेत्र के मूल निवासी हैं। मनुस्मृति के अनुसार भी सरस्वती और दृषद्वती (ब्रह्मपुत्र) नदी के मध्य का भूभाग आर्यावर्त कहलाता है {सरस्वतीदृषद्वत्योर्देवनद्योर्यदंतरम् ।- मनु. (2/17)} और इसके पूर्व में रहने वाला जनसमुदाय किरात कहलाता है जो गुण और कर्म के अनुसार क्षत्रिय है {शनकैस्तु क्रियालोपादिका: क्षत्रियजातय: । – मनु. (10/43)}।

रामायण के किष्किन्धा काण्ड में जब राम सीता को खोज रहे हैं तब वे किरातों से भी मिलते हैं। इस प्रसंग में वाल्मीकि किरात जनसमुदाय के वैशिष्ट्य का वर्णन करते हैं कि किरात स्वर्ण वर्ण के, प्रियदर्शी हैं तथा अपने क्षात्र धर्म में तीक्ष्ण हैं {किराता: तीक्ष्ण चुडा: च हेमाभा: प्रियदर्शिना: । (4/40/27)}। महाभारत के सभा पर्व के अनुसार उस समय किरात वासुदेव पौंड्रक राजा के अधीन थे {वङ्ग पुण्ड्र किरातेषु राजा बलसमन्वितः, पौण्ड्रकॊ वासुदेवेति यॊ ऽसौ लॊकेअभिविश्रुतः । (14.20)}। विष्णु पुराण के अनुसार भी समुद्र के उत्तर से लेकर तथा हिमालय के दक्षिण तक का समग्र भूभाग भारत कहलाता था {उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम् । वर्षं तद् भारतं नाम भारती यत्र संततिः ।।}।

विष्णु पुराण में प्राग्ज्योतिषपुर के राजा नरकासुर और श्री कृष्ण के युद्ध का वर्णन है । इस युद्ध में नरकासुर द्वारा नगर की रक्षार्थ तीक्ष्ण धार वाले पाशों के प्रयोग का उल्लेख किया गया है- ‘प्राग्ज्योतिषपुरस्यापि समन्ताच्छशतयोजनं, आचिता मौरवैः पाशैः क्षुरान्तैर्भूर्द्विजोत्तम:’ {विष्णु पुराण (5.29.16)}। ब्रह्म पुराण के अनुसार भी भारत के पूर्व में किरातों का निवास है {पूर्वे किराता यस्यान्ते पश्चिमे यवनस्थिताः}। कालिका पुराण में तो विस्तार से किरात और उनके निवास का वर्णन किया गया है। कालिकापुराण के अनुसार ब्रह्मा ने प्राचीन काल में यहाँ स्थित होकर नक्षत्रों की सृष्टि की थी। इसलिए इंद्रपुरी के समान यह नगरी प्राग् (पूर्व या प्राचीन) + ज्योतिष (नक्षत्र) कहलायी– ‘अत्रैव हि स्थितो ब्रह्मां प्राङ् नक्षत्रं समार्ज ह, ततः प्राग्ज्योतिषाख्येयं पुरी शक्रपुरी समा’।

शास्त्रीय प्रमाणों के अनुसार इन किरात जनसमुदाय द्वारा शासित प्रदेश प्राग्ज्योतिष और कालान्तर में कामरूप कहलाता था जिसका वर्णन शतपथ ब्राह्मण, रामायण तथा महाभारत में उपलब्ध होता है। रामायण में किष्किन्धाकाण्ड में राम जब सीता को खोज रहे हैं तब उस प्रसंग में प्राग्ज्योतिष का उल्लेख मिलता है। सुग्रीव कहता है कि समुद्र के मध्य वराह नाम का 64 योजन का पर्वत है जिसके उत्तर में नरक राजा द्वारा शासित प्राग्ज्योतिष प्रदेश है, वहाँ की प्रत्येक गुहा में सीता को खोजना है {योजनानि चतु:षष्टि: वराहो नाम पर्वत: ।……रावण: सह वैदह्या मार्गितव्यस्तत्स्तत: । ।- किष्किन्धा. (4/42/30-32)}।

महाभारत काल से पूर्वोत्तर का गहरा संबंध है। महाभारत के विख्यात योद्धा राजा भगदत्त पूर्वोत्तर भारत के थे {प्राग्ज्योतिषधिपो शूरो म्लेच्छानामधिपो बली}। पांडवों ने अपना अज्ञातवास इसी क्षेत्र में व्यतित किया था। महाभारत के सभापर्व में अर्जुन और किरात वेशधारी के मध्य युद्ध का उल्लेख है। इस प्रसंग के आधार पर ही संस्कृत के यशस्वी कवि भारवि ने अपने काव्य “किरातार्जुनीयम्” की रचना की है। महाभारत में विभिन्न प्रसंगों में प्राग्ज्योतिष का 20 से अधिक बार उल्लेख हुआ है। कामरूप-नरेश भगदत्त ने महाभारत के युद्ध में कौरवों की ओर से भाग लिया था।

महाभारत में भगदत्त को प्राग्ज्योतिष-नरेश भी कहा गया है– ‘तत: प्राग्ज्योतिषः क्रुद्धस्तोमरान् वै चतुर्दश, प्राणिहोततस्य नागस्य प्रमुखे नृपसत्तम {भीष्म पर्व (95.46)}। कालिदास ने रघुवंश में रघु द्वारा प्राग्ज्योतिष नरेश की पराजय का काव्यमय वर्णन किया है {चकम्पे तीर्णलौहित्येतस्मिन् प्राग्ज्योतिषेश्वर: तद्गजालानतां प्राप्तैः सहकालागुरुद्रुभैः। (4.81)}। दिग्विजय यात्रा के लिए निकले हुए रघु के लौहित्य या ब्रह्मपुत्र को पार करने पर प्राग्ज्योतिषपुर नरेश उसी प्रकार भयभीत होकर कांपने लगा जैसे उस देश के कालागुरु के वृक्ष जो रघु के हाथियों से बंधे थे।

ऐतिहासिक तथ्यों के अतिरिक्त आज भी पूर्वोत्तर का समाज अपने को रामायण-महाभारत के पात्रों का वंशज मानती हैं । अरुणाचल प्रदेश का मिश्मी समुदाय खुद को भगवान कृष्ण की पटरानी रुक्मिणी का वंशज मानता है। रुक्मिणी अद्यतन अरुणाचल के भीष्मकनगर की राजकुमारी थीं। इस प्रदेश के सियांग जिले में स्थित मालिनीथान और ताम्रेश्वरी मंदिर का संबंध श्रीकृष्ण एवं रुक्मिणी से है। लोहित जिले में अवस्थित परशुराम कुंड एक प्रमुख तीर्थस्थल है जो भगवान परशुराम से संबंधित है। अरुणाचल में शिव मंदिर का वर्णन शिव पुराण के 17वें अध्याय के रुद्र खंड में आता है। आज अरुणाचल प्रदेश स्थित जीरो घाटी की करडा पहाड़ी पर सबसे बड़ा शिवलिंग है इतना विशाल शिवलिंग अभी तक कहीं और नहीं देखा गया है। धरती के ऊपर इसकी ऊंचाई 20 फीट है, जबकि इसका चार फीट हिस्सा धरती के नीचे है। कुल मिलाकर 24 फीट ऊंचा यह शिवलिंग आस्था का एक बड़ा केंद्र बन चुका है।

अद्यतन मेघालय की खासी पहाड़ी में रहने वाला जन समुदाय आज भी तीरंदाजी में प्रवीण है और वे तीरंदाजी करते समय यह अंगूठे का प्रयोग नहीं करता। क्योंकि उनका विश्वास है कि उनके पूर्वज ने अपना दाहिना अंगूठा गुरु दक्षिणा में दे दिया था, इसलिए तीर चलाते समय अंगूठे का उपयोग नहीं करना चाहिए। इसी प्रकार नगालैंड के दीमापुर में रहनेवाली दिमाशा जन समुदाय खुद को भीम की पत्नी हिडिंबा का वंशज मानता है। वहाँ आज भी हिडिंबा का वाड़ा है, जहां राजवाड़ी में स्थित शतरंज की ऊँची-ऊँची गोटियाँ पर्यटकों के आकर्षण के केंद्र मानी जाती हैं। इन गोटियों से हिडिंबा और भीम का बाहुबली पुत्र घटोत्कच शतरंज खेलता था।

बोडो जन समुदाय खुद को सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा का वंशज तथा कार्बी आंगलंग में रहनेवाला कार्बी जन समुदाय स्वयं को सुग्रीव का वंशज मानता है। महाभारत काल में पूर्वोत्तर के राजवंशों के साथ वैवाहिक संबंधों का स्पष्ट उल्लेख मिलता है । नगालैण्ड में नगा कन्या उलुपी से अर्जुन ने विवाह किया था। अर्जुन की दूसरी पत्नी चित्रांगदा को मणिपुर के ही मैतेयी समाज का माना जाता है। असम का तेजपुर नगर (महाभारतकालीन शोणितपुर) श्रीकृष्ण के पौत्र अनिरुद्ध और बाणासुर की पुत्री ऊषा के प्रेम का साक्षी है।

महाभारत के बाद इनका पहला उल्लेख समुद्रगुप्त द्वारा प्रयाग में स्थापित पाषाण स्तम्भ पर उल्लिखित शिलालेख पर मिलता है {समतट-डवाक-कामरूप-नेपाल-कर्त्तृपुरादि-प्रत्यन्त-नृपतिभिर्म्मालवार्जुनायन-यौधेय-माद्रकाभीर-प्रार्जुन-सनकानीक-काक-खरपरिकादिभिश्च5 सर्व्व-कर -दानाज्ञाकरण-प्रणामागमन}। जिसमें कामरूप को गुप्त साम्राज्य के अधीन बताया गया है। महाभारतोत्तर प्राग्ज्योतिष/कामरूप जिसे आज पूर्वोत्तर के नाम से जाना जाता है, में तीन अलग अलग वंशों ने शासन किया- वर्मन वंश, मलेच्छ वंश और पाल (या भौम पाल) वंश। तीनों वंशों के राजा नरकासुर से अपना रिश्ता जोड़ते थे और इसी आधार पर राजा की पदवी पर अधिकार करते थे।

असम में मिले शिलालेखों के अनुसार वर्मन वंश के विभिन्न राजाओं ने बड़ी तीव्रता से कामरूप का विस्तार किया। राजा भूतिवर्मन द्वारा अश्वमेध यज्ञ करने का भी उल्लेख है। कई वर्षों तक एक सशक्त राज्य के निर्माण और विस्तार के पश्चात् वर्मन वंश पर गौर राजा का आक्रमण हुआ जिसमें वे परास्त हुए और कुछ समय के लिए गौर वंश के अधीन हुए। परन्तु भूतिवर्मन के छोटे बेटे राजा भास्करवर्मन ने थानेसर के राजा हर्षवर्धन से मित्रता की और संयुक्त आक्रमण से गौर राजा शशांक पर विजय पायी।

इतिहासकार विलक्षण महाकवि कल्हण ने महाभारत युद्ध से कश्मीर की क्षात्र-परम्परा को काव्य की विषय वस्तु बनाकर ‘राजतरंगिणी’ में क्रमबद्ध विशद वर्णन किया है। जिसका रचना काल 10 वीं से 12 वीं शताब्दी के मध्य माना जाता है। कश्मीर का सम्बन्ध उस समय पूर्वोतर भारत से था। कश्मीर के राजकुमार का विवाह कामरुप की राजकन्या के साथ हुआ था। 8 वीं शताब्दी में कश्मीर के राजा ललितादित्य ने स्त्री-राज्य (मेघालय) तथा प्राग्ज्योतिष तक अपने राज्य का विस्तार किया था। उस समय प्राग्ज्योतिषपुर वर्मन वंश के कामरूप राज्य की राजधानी थी जो सम्प्रति गोहाटी (असम) है। मूल्यवान कालागुरु अर्थात् अगुरु या अगर के लिए सर्वोत्तम अनुकूल मौसम उत्तर पूर्व भारत का क्षेत्र है जो असम में प्राकृतिक रूप से बहुलता में उपलब्ध होते हैं। अगुरु का प्रयोग सुगन्धित इत्र, धूपधूम आदि बनाने में किया जाता है। जिसका वर्णन कल्हण ने भी किया है {शून्ये प्राग्ज्योतिषपुरे निर्जिहानं ददर्श सः । धूपधूमं वनप्लुष्टात्कालागुरुवनात्परम् । । (4. 171)}।

ललितादित्य उसके बाद ‘स्त्री राज्य’ पहुँचते हैं । स्त्री राज्य से अभिप्राय अद्यतनीय मेघालय है । प्राचीन असम का वर्णन करते हुए Calcutta Review {H. Lyngdoh, Introduction, pp. X-XI.} में भी H. Lyngdoh {Homiwell Lyngdoh, 1877-1958, Khasi physician, political leader, and social activist} लिखते हैं कि असम में Hieun Tsang के भ्रमण के समय कश्मीर के राजा ललितादित्य ने जैन्तिया साम्राज्य पर आक्रमण किया जिसे स्त्री राज्य कहतें हैं तथा पद्म श्री से सम्मानित असम इतिहासकार ‘सूर्य कुमार भुयान’ {Studies in the History of Assam, Laksheswari Bhuyan, 1965 के आधार पर} (1894–1964) के अनुसार अनेक इतिहासकारों का मानना है कि ‘स्त्री राज्य’ का अभिप्राय वर्त्तमान मेघालय के खासी और जयंती के मातृवंशीय समाज से है।

कल्हण तत्कालीन ‘स्त्री-राज्य’ का वर्णन करते हुए कहते हैं कि ललितादित्य की सेना को ‘स्त्री राज्य’ के मतवाले हाथियों के मस्तकों ने नहीं अपितु स्त्री-सौन्दर्य ने ही निष्प्रभ कर दिया, परन्तु स्त्री-राज्य की रानी ने ललितादित्य के प्रताप-भय से कांपते हुए समर्पण कर दिया {तद्योधान्विगलद्धैर्यान्स्त्रीराज्ये स्त्रीजनोऽकरोत् । तुङ्गौ स्तनौ पुरस्कृत्य न तु कुम्भौ कवाटिनाम् । । स्त्रीराज्यदेव्यास्तास्याग्रे वीक्ष्य कम्पादिविक्रियाम् । संत्रासमभिलाषं वा निश्चिकाय न कश्चन । । (4. 173-174) }। ललितादित्य ने अपने शासनकाल में व्यापार, चित्रकला, मूर्तिकला धार्मिक उत्सवों को महत्व दिया। अतः कलाप्रिय ललितादित्य ने विजयोपरांत अपनी विजय के चिह्न के रूप में उस विजित प्रदेश में मंदिर या मूर्ति आदि का निर्माण भी कराया था। स्त्री-राज्य (मेघालय) में भी नृसिंह भगवान की विलक्षण चुम्बकीय निराधार विलक्षण मूर्ति स्थापित की {एकमूर्ध्वं नयद्रत्नमधः कर्षत्तथापरम् । बद्ध्वा व्यधान्निरालम्बं स्त्रीराज्ये नृहरिं च सः । । (4. 185)}।

उपरोक्त वैदिक, ऐतिहासिक,पौराणिक आख्यानों, अभिलिखों, शिलालेखों, भग्नावशेषों, लोकमान्यताओं एवं प्रादुर्भूत हुए इन शिवलिंगों को देखकर यह सिद्ध होता है कि पूर्वोत्तर भारत सदियों से भारतवर्ष का ही अभिन्न अंग है। इस क्षेत्र के साथ भारतीय संस्कृति के सूत्र हजारों वर्षों से गूँथे हैं। पूर्वोत्तर भारत इस देश की भौगोलिक तथा सांस्कृतिक विविधता में एकत्व का एक अनुपम उदाहरण है। यह विविधता यहां के प्राकृतिक सौन्दर्य एवं जन-जीवन में सहज रूप से दृष्टिगोचर होती है। यह क्षेत्र 1947 तक मुख्य रूप से असम एवं बंगाल क्षेत्र में विभाजित था। देश-विभाजन के पश्चात् तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान (वर्तमान बांग्लादेश) के उत्तरी एवं पूर्वी क्षेत्र में असम एवं कुछ अन्य क्षेत्रों से अलग होकर धीरे-धीरे कालान्तर में असम, मेघालय, नागालैण्ड, मणिपुर, मिजोरम, त्रिपुरा तथा अरुणाचल प्रदेश इन सात राज्यों का गठन हुआ।

वर्तमान में भारत का यह क्षेत्र बांग्लादेश, भूटान, चीन, म्यांमार और तिब्बत- इन पांच देशों की अंतरराष्ट्रीय सीमा से संलग्न है। यह क्षेत्र अपने गौरवशाली इतिहास, समृद्ध संस्कृति, भाषा, परंपरा, रहन-सहन, पर्व-त्योहार आदि की दृष्टि से इतना वैविध्यपूर्ण है कि इस क्षेत्र को भारत की सांस्कृतिक प्रयोगशाला कहना अतिशयोक्तिपूर्ण नहीं होगा। असंख्य भाषाएं व बोलियाँ, भिन्न-भिन्न प्रकार के रहन-सहन, खान-पान और परिधान, आध्यात्मिकता तथा नैसर्गिक सौन्दर्य के कारण यह क्षेत्र अपनी विशिष्ट पहचान रखता है। जैव-विविधता, सांस्कृतिक कौमार्य, सामुहिकता-बोध, प्रकृति-प्रेम, अपनी परंपरा के प्रति सम्मान भाव पूर्वोत्तर भारत की अद्वितीय विशेषताएँ हैं।

पौराणिक और सांस्कृतिक दृष्टि से पूर्वोत्तर भारत का शेष भारत से गहरा संबंध है परंतु शेष भारतवासी अल्प संपर्क होने के कारण इस क्षेत्र की विशिष्टताओं से अनभिज्ञ हैं अथवा वे भ्रांत धारणाओं से ग्रस्त हैं। अंग्रेजों की औपनिवेशिक, विभाजनकारी तथा जनजातीय नीतियों और ईसाई शिक्षा ने पूर्वोत्तर क्षेत्र में अलगाववाद और उग्रता का बीजारोपण किया तथा स्वतंत्रता प्राप्ति के उपरान्त उसको निरंतर उपेक्षित किया गया। आज भी अंग्रेजों की ‘फूट डालो और राज करो नीति’ को मजबूत करने वाली मैकॉले की शिक्षा पद्धति में अलगाववादी शिक्षा दी जाती है कि इस क्षेत्र की सभी जनजातियां मंगोल हैं, वे क्रूर जंगली तथा हिंसक हैं। परन्तु उनमें प्रचलित अनेक रीतियाँ, लोक-मान्यताएँ, जीवन-मूल्य तथा परम्पराएँ शेष भारत की परम्पराओं से लेशमात्र भी अलग नहीं हैं।

अंततः इन सब तुच्छ नीतियों ने पूर्वोत्तर के अधिकांश क्षेत्र को अलगाव की आग में झोंक दिया और उग्र रूप धारण किए इस अलगाववाद की जड़ें बहुत गहराई तक फैल गई हैं। सौभाग्य से इस समय भारत सरकार की ‘एक्ट ईस्ट नीति’ के क्रियान्वयन से आशा बढ़ी है। जिससे सांस्कृतिक आधार पर भारत के सुदूर प्रांतों-पूर्वोत्तर में समरसता, आत्मीयता बढ़ेगी। भारत के पड़ोसी देशों के साथ सुदृढ़ सम्बंधों का आधार भी यही होगा। इतना ही नहीं, भारत विश्व में न केवल आर्थिक या सामरिक बल्कि विश्व बन्धुत्व तथा विश्व कल्याण की उच्चतम सांस्कृतिक भावना को सशक्त, सुदृढ़ तथा सुसंगठित करेगा।

लेखिका: डॉ सोनिया (सहायकाचार्या, संस्कृत विभाग), हिन्दू महाविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय