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‘आओ मिलकर हम बढ़ें, अधिकार अपने छीन लें’ – नसीरुद्दीन शाह ने CAA विरोधी प्रदर्शन की आग को दी हवा

दिल्ली के शाहीन बाग की तर्ज पर बेंगलुरु के बिलाल बाग में नागरिकता संशोधन कानून (CAA), NRC और NPR के खिलाफ पिछले काफी दिनों से प्रदर्शन के नाम पर हंगामा चल रहा है। यहाँ के विरोध में नसीरुद्दीन शाह, रामचंद्र गुहा और जिग्नेश मेवाणी जैसे लोग भी शामिल हो चुके हैं। इसका एक वीडियो भी सामने आया है। इसमें नसीरुद्दीन शाह प्रदर्शन कर रही महिलाओं को भड़काते हुए नजर आ रहे हैं। इस दौरान वो विवादित बयान देते हुए कहते हैं कि अपने अधिकार छीन लो।

नागरिकता संशोधन कानून को लेकर अफवाह का शिकार हुए लोग प्रदर्शन कर रहे हैं और कुछ तथाकथित बुद्धिजीवी लोग हैं, जो प्रदर्शन की इस आग को शांत करने की बजाए उसमें घी डालने का काम कर रहे हैं। ऐसे लोगों की कतार काफी लंबी है। कभी कॉन्ग्रेस के नेता इन प्रदर्शनकारियों को भड़काते हैं, तो कभी इनके वरिष्ठ नेता इनके प्रदर्शन में शामिल होकर ‘आजादी’ का नारा लगाते हैं। तो कभी प्रदर्शन के नाम देश तोड़ने की बात कही जाती है। देश विरोधी और हिंदू विरोधी नारे लगाए जाते हैं।

अब इस प्रदर्शनकारियों की भीड़ को बॉलीबुड एक्टर नसीरुद्दीन शाह का साथ मिला है। दिल्ली में अनुराग कश्यप और स्वरा ने आवाज बुलंद की तो बेंगलुरु में नसीरुद्दीन शाह ने विरोध की आवाज को सुर दिया। इस दौरान वो लोगों को भड़काते हुए एक कविता पढ़ते हैं। वो कहते हैं, “वो हर सुंदर कला को और भी सुंदर बनाती हैं। मर्दों की तरह मेहनत वो रात-दिन करती हैं, मगर फिर भी ना कुछ करने की तोहमत लगाई जाती है। दिल में जो डर का किला है, वो तोड़ दो अंदर से तुम, एक ही झटके में अपने आप ही वो ढह जाएगा। आओ मिलकर हम बढ़ें, अधिकार अपने छीन लें। काफिला अब चल पड़ा है। अब न रोक पाएगा।”

नशीरुद्दीन शाह के इस विवादिय बयान पर लोगों ने कड़ी प्रतिक्रिया जाहिर करते हुए कहा कि अगर बीजेपी CAA नहीं लाती तो हमें पता ही नहीं चलता कि इन गद्दारों के दिल में कितना जहर भरा हुआ है।

एक यूजर ने लिखा, “देखो हिंदुओं तुम्हारे पैसों पर पल कर ये जिहादी के विषैले बोल बाहर आ रहे हैं।”

कुणाल महाजन नाम के एक अन्य यूजर ने लिखा, “ऐसे लोगों के होते हुए हमें पाक या चीन की जरूरत नहीं है, क्योंकि हमारे पास बुद्धिजीवियों, धर्मनिरपेक्षों के साथ ही एक मीडिया गिरोह है, जो देश और इसकी नीतियों के खिलाफ लगातार प्रयासरत रहते हैं। मगर यही गिरोह विदेशी सरजमीं पर पलकें झुकाने तक की हिमाकत नहीं कर पाते हैं।”

नसीरुद्दीन शाह इससे पहले भी CAA विरोधियों के सुर में सुर मिला चुके हैं। वैसे यह कोई पहली बार नहीं है जब उन्होंने विवादित बयान दिया है। इससे पहले उन्होंने ‘मॉब लिंचिंग गिरोह’ का समर्थन किया था। इसके साथ ही उन्होंने ‘अर्बन नक्सल’ के समर्थन में देश विरोधी बयान देते हुए कहा था, “भारत में धर्म के नाम पर घृणा की दीवार एक बार फिर खड़ी हो गई है। जो अन्याय के खिलाफ हैं उन्हें दण्डित किया जा रहा है। जो अधिकार माँग रहे हैं उन्हें जेलों में डाला जा रहा है। कलाकारों, अभिनेताओं, विद्वानों, कवियों को डराया जा रहा है। पत्रकारों को बोलने से रोका जा रहा है।”

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पाकिस्तानी हिंदुओं की व्यथा: मृत परिजनों की अस्थियाँ गंगा में विसर्जित करने में वीजा की दिक्कत

पाकिस्तान के हिंदू समुदाय ने भारत सरकार से उन्हें वीजा मिलने में आ रही बाधाओं को दूर करने के लिए गुहार लगाई है। उन्होंने कहा कि वीजा मिलने से वे भारत में अपने मृत संबंधियों के अंतिम संस्कार में हिस्सा ले सकेंगे और साथ ही पाकिस्तान में जिनकी मृत्यु हुई है, उनकी अस्थियाँ गंगा नदी में विसर्जित करने के लिए भारत जा सकेंगे।

द एक्सप्रेस ट्रिब्यून की रिपोर्ट में कहा गया है कि हिंदू समाज अपने मृतकों की अस्थियों को गंगा में विसर्जित करने को बेहद महत्व देता है। समुदाय के सदस्यों में अस्थियों को हरिद्वार में गंगा में विसर्जित करने की परंपरा रही है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि पाकिस्तान में हिंदू समुदाय का बड़ा हिस्सा अपने मृतकों को दफनाता है, लेकिन जो सवर्ण जातियों के हिंदू हैं, वे मृतकों का दाह संस्कार करते हैं और अंतिम क्रियाकर्म के बाद अस्थियाँ गंगा में विसर्जित करने भारत जाते हैं।

बताया जा रहा है कि भारत और पाकिस्तान के बीच हाल के तनाव के कारण भारत ने अपनी वीजा नीति सख्त कर दी है। इससे हिंदू समुदाय के लोगों के लिए अपने संबंधियों के अंतिम क्रियाकर्म में शामिल होने के लिए भारत जाना मुश्किल हो गया है। सूत्रों का कहना है कि कई परिवारों ने भारतीय उच्चायोग को वीजा अर्जी दी, लेकिन उनकी अर्जी को या तो खारिज कर दिया गया फिर कई कई आपत्तियों के साथ लौटा दी गईं।

हिंदू समुदाय के नेता व पूर्व सांसद दीवान चंद चावला ने द एक्सप्रेस ट्रिब्यून के साथ बात करते हुए कहा कि हिंदू आस्था के अनुसार दाह संस्कार के बाद अस्थियों को पवित्र नदियों में प्रवाहित कर देना चाहिए। हिंदू धर्म में गंगा को देवी के रूप में पूजा जाता है और ऐसी मान्यता है कि अगर किसी मृत व्यक्ति की अस्थियाँ इसमें प्रवाहित कर दी जाती है तो उसका अगला जीवन बेहतर होगा। जब अस्थियाँ गंगा में प्रवाहित की जाती हैं तो मृतक के सभी पाप धुल जाते हैं। मृतक की आत्मा को तब तक शांति नहीं मिलती जब तक कि उसकी अस्थियाँ गंगा में विसर्जित नहीं कर दी जातीं। आगे उन्होंने कहा कि फिलहाल हजारों मृत लोगों की अस्थियों को कराची सहित सिंध के विभिन्न मंदिरों में रखा गया है, जिन्हें भारत ले जाया जाना है।

एक अन्य पूर्व सांसद कांजी राम ने इस बात पर दुख जताया कि पाकिस्तान में हिंदू समुदाय को अपनी धार्मिक परंपरा से हटकर अपने मृतकों को दफनाने पर बाध्य होना पड़ रहा है। उन्होंने पाकिस्तान स्थित भारतीय उच्चायोग से हिंदू परिवारों को मानवीय आधार पर वीजा देने का आग्रह किया।

रिपोर्ट में कहा गया है कि पाकिस्तान में रहने वाले 80 फीसदी हिंदू दलित या फिर अन्य अल्पसंख्यक समुदाय से हैं। दलित समुदाय के सभी लोग प्राय: मृतकों के दाह संस्कार के बजाए उन्हें दफनाते हैं। कांजी राम ने कहा कि इसकी सबसे बड़ी वजह इनकी गरीबी है। दाह संस्कार में और फिर अस्थियों को भारत ले जाने में होने वाले खर्च को वहन करने की क्षमता नहीं होने के कारण दलित मृतकों को दफनाते हैं। उन्होंने उम्मीद जताई है कि भारत सरकार इसे गंभीरता से लेगी और वीजा प्रदान करेगी, ताकि पाकिस्तानी हिंदू मृतकों की अस्थियाँ हरिद्वार में प्रवाहित कर सकें।

वहीं भारतीय दूतावास द्वारा जारी एडवाइजरी में कहा गया है, “उन सभी पाकिस्तानी आवेदकों के वीजा आवेदनों को स्वीकार किया जाता है, जिनमें हिंदू समुदाय के लोग अपने परिवार के सदस्यों का अंतिम संस्कार करने के लिए हरिद्वार जाना चाहते हैं। मगर इसके लिए आवेदक को उस व्यक्ति का मृत्यु प्रमाण पत्र दिखाना होगा, जिसकी अस्थियों को विसर्जित किया जाना है। इसके अलावा आवेदक के NARDA कार्ड की कॉपी, बिजली बिल या गैस बिल की कॉपी और पोलिया प्रमाण पत्र प्रस्तुत करना होगा।”

पैगंबर और कुरान की कसम खाई… बस से उतार चेहरे पर 11 गोलियाँ: अशोक रैना को KP होने की मिली ऐसी सजा

कश्मीरी पंडितों के वादी से विस्थापन की त्रासदी को 30 साल पूरे हो गए। इन 30 सालों में कश्मीरी पंडित उस दर्दनाक वक्त को और खूनी माहौल को कभी नहीं भूल सके हैं। 19 जनवरी को कश्मीरी पंडितों के पलायन के रूप में जाना जाता है। 1990 में इसी दिन सैकड़ों कश्मीरी पंडितों को मार दिया गया था। कई जगहों पर सामूहिक नरसंहारों को अंजाम दिया गया था।

कश्मीरी पंडितों की महिलाओं, बहनों, बेटियों के साथ गैंगरेप की वारदातों को अंजाम दिया गया था। कई लोगों को लकड़ी चीरने की मशीन से जिंदा चीर दिया गया था। वो खौफ की रातें थीं जब घरों में चिट्ठी फेंक कर भाग जाने को कहा जाता था। मस्जिदों से काफिरों कश्मीर छोड़ो के नारे लगाए जाते थे। कहा जाता था कि हमें कश्मीरी पंडितों की औरतों के साथ कश्मीर चाहिए, मर्द नहीं चाहिए। यहाँ निजाम-ए-मुस्तफा चलेगा। हिंसक और आक्रमक भीड़ सड़कों पर निकलती थी, लूटपाट करती थी और मंदिरों को तोड़ती थी। आखिरकार 19 जनवरी 1990 में कश्मीरी पंडित अपने घरों, सामानों को छोड़ कर कश्मीर से निकल गए और अपने ही देश में शरणार्थी बन गए। इन कश्मीरी पंडितों में से हर एक के पास दर्दनाक कहानी है।

हमें हिंदू औरतें चाहिए… कश्मीर की हर मस्जिद से 19/1/1990 की रात आ रही थी यही आवाज

यह सिलसिला 1990 तक ही सीमित नहीं रहा। ये कश्मीरी पंडित इस दर्दनाक हादसे के सालों बाद बाद भी इस नृशंसता के, इस जिहाद के शिकार हुए। हम बात कर रहे हैं 1997 की। जब अशोक कुमार रैना के चेहरे को 11 गोलियाँ से छलनी करके सिर्फ इसलिए हत्या कर दी गई, क्योंकि वो एक कश्मीरी पंडित थे। जबकि वो वहाँ के मुस्लिम बच्चों को पढ़ाने के लिए जाते थे।

अशोक कुमार रैना और इस घटना के बारे में बताते हुए उनके बेटे विकास रैना कहते हैं कि 1988 में ही कश्मीर में इस्लामिक आतंक का उद्भव हो गया था। इसका मकसद अल्पसंख्यकों खासकर कश्मीरी पंडितों में डर और दहशत पैदा करना था, जिससे कि वो निजाम-ए-मुस्तफा स्थापित कर सकें। इसके लिए उन्होंने कश्मीरी पंडितों को मारना और उत्पीड़ित करना शुरू किया। उन जिहादियों ने आर्मी और एयरफोर्स ऑफिसर्स को भी नहीं छोड़ा, उन्हें भी निशाना बनाया। इसके तहत 1989-1990 में लाखों कश्मीरी पंडितों को उनके कश्मीर से निकाला गया।

विकास रैना द्वारा मैगजीन में लिखी गई आपबीती

विकास कहते हैं, “मुझे आज भी वो दिन याद है, मैं और मेरी बहन सो रहे थे, तभी पापा आए और हमसे कहा कि जल्दी से तैयार हो जाओ। हमलोग कश्मीर छोड़कर जा रहे हैं और फिर हमलोग कुछ दोस्तों की मदद से अपने परिवार के साथ उधमपुर के लिए निकल गए। रास्ते में हमने देखा कि ट्रकों, कारों और बसों आदि में हजारों की संख्या में कश्मीरी पंडित जम्मू की तरफ जा रहे थे। मेरे पापा ने हमसे कहा कि अभी हमलोग कश्मीर से बाहर जा रहे हैं, क्योंकि फिलहाल ये जगह हमारे समुदाय के लिए सुरक्षित नहीं है। जब सब कुछ सामान्य हो जाएगा तो फिर हमलोग वापस आ जाएँगे। और ये दर्दनाक कहानी हर परिवार की है। हम अपने ही देश में शरणार्थी बन गए। हम रिफ्यूजी बनकर उधमपुर में रहने लगे।”

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विकास आगे कहते हैं कि जिंदगी काफी संघर्ष के साथ बीत रही थी। मगर उन्हें यकीन था कि उनकी जिंदगी बेहतर हो जाएगी, क्योंकि वो अपने पेरेंट्स को हीरो मानते थे और उनका मानना था कि वो उनकी जिंदगी को बेहतर बना देंगे। वो कहते हैं कि उन्होंने अपने ग्रैंडपैरेंट्स और पैरेंट्स की आँखों में हमेशा ही दर्द और वेदना ही देखी। फिर उनके परिवार को पिता अशोक रैना के प्रिंसिपल के पोस्ट पर प्रमोशन की खबर के रूप में एक खुशखबरी मिली। उन्होंने बताया कि अशोक रैना उस समय मात्र 42 साल के थे, तो ये किसी बड़ी उपलब्धि से कम नहीं थी। इस उम्र में भी उनके पास 21 साल के लेक्चररशिप का अनुभव था।

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अशोक रैना की पोस्टिंग कारगिल (लद्दाख) में हुई। इस दौरान उनका परिवार उधमपुर से जम्मू में शिफ्ट हो गया। उन्होंने 1991 से 1994 तक कारगिल में तीन साल की सेवा पूरी की। इसके बाद उनका ट्रांसफर जम्मू में कर दिया गया। अशोक के साथ ही 14 अन्य का भी ट्रांसफर किया गया। विकास कहते हैं कि अशोक रैना को छोड़कर बाकी सभी को जम्मू में ही नियुक्त किया गया, जबकि उन्हें नई नियुक्ति दी गई। उनका ट्रांसफर गुल (रामबन) में कर दिया गया। 

विकास बताते हैं कि जम्मू-कश्मीर सरकार के नियम के अनुसार, जिस किसी की भी पोस्टिंग 3 साल के लिए लद्दाख में हो चुकी होगी, उसे किसी सुरक्षित जगह पर पोस्टिंग दी जाएगी, वो भी उसके पसंद के हिसाब से। लेकिन अशोक रैना के 3 साल लद्दाख में बिताने के बाद भी आतंक प्रभावित क्षेत्र में पोस्टिंग दी गई। उन्होंने इसके लिए शिक्षा मंत्री से भी मिलकर बात की, लेकिन उन्होंने भी उनकी बात को नजरअंदाज कर दिया। उनके मौलिक अधिकार का भी हनन किया गया।

इसके बाद अशोक के पिता ने उनको वहाँ जाने से मना किया। क्योंकि गुल एक पहाड़ी इलाका है और यह आतंकवादी हिजबुल मुजाहिद्दीन ग्रुप का प्रभाव क्षेत्र था। हालाँकि पिता के मना करने के बाद भी अशोक रैना ने नौकरी ज्वाइन कर ली, क्योंकि वो अपने काम को लेकर काफी समर्पित थे। उन्होंने वहाँ पर जाकर शिक्षा का प्रचार-प्रसार करना शुरू कर दिया।

अशोक रैना के साथ हुई दर्दनाक वाकये को याद करते हुए विकास कहते हैं, “मेरे पापा गर्मी की छुट्टियों में घर आए हुए थे। वो वापस जाने वाले थे। वो 14 जून 1997 का दिन था, हमें नहीं पता था कि अगला दिन हम सबकी जिंदगी का सबसे काला दिन होगा। अगले दिन मेरे पापा गुल के लिए निकलने वाले थे। शाम में मैं अपनी दादी को लेकर ऑप्टिशियन के पास गया। इसके बाद हमलोग जम्मू के शिव मंदिर गए। मैंने पापा से ढेर सारी बातें की और फिर वापस घर आ गए। घर पर रविंद्र जी और सुशील जी नाम के लेक्चरर आए। वो दोनो भी छुट्टियाँ खत्म होने के बाद वापस से नौकरी ज्वाइन करने के लिए जाने वाले थे, तो वो  पापा के साथ अगले दिन के लिए डिस्कस करने आए थे कि कैसे जाना है।”

जब 23 साल बाद एक कश्मीरी पंडित पड़ोसन दिलशादा से मिलने गई, वही हुआ जो हम सोचते हैं…

विकास आगे कहते हैं, “अगली सुबह 15 जून 1997 को मेरे पापा सुबह-सुबह गुल के लिए निकल गए। उस समय मैं सो ही रहा था। मैंने अपनी माँ से कहा कि उन्होंने मुझे उठाया क्यों नहीं, मैं पापा को गुडबाय बोलना चाहता था। मुझे क्या पता था कि मैं अपने पापा को कभी गुडबाय नहीं बोल पाऊँगा। अगली सुबह 16 जून 1997 को मैं, मेरी माँ और दादी माँ सो रहे थे, तभी तकरीबन 4 बजे डोरबेल बजी। माँ ने दरवाजा खोला तो वहाँ पर कुछ पुलिस ऑफिसर्स थे। उन्होंने माँ से कहा कि जिस बस में मेरे पापा थे, उस पर आतंकवादियों ने हमला कर दिया, जिसमें कई लोग घायल हो गए। मैं और मेरी माँ, चाचा के घर गए और फिर वहाँ से घटनास्थल की तरफ दौड़े। 7 बजे तक सभी लगभग सभी अखबारों में खबर छप गई थी कि आतंकवादियों ने गुल में 3 कश्मीरी पंडितों की हत्या कर दी।” 

विकास आगे उस दिन का दर्दनाक पीड़ा के बारे में बताते हुए कहते हैं, “मैंने अपना होश खो दिया था। वह दु:ख की बेला हम सबके लिए काफी लंबी और पीड़ादायक थी। हमारा परिवार उजड़ गया था, बिखर गए थे हमलोग। शाम में हमारे घर के बार उनकी डेड बॉडी आई। उस समय हमने अंतिम बार अपने पिता को देखा था। मैंने उनके माथे को चूमकर आखिरी गुडबाय बोला। मेरी बहन मुझे पकड़-पकड़ कर रो रही थी। सभी लोग लगातार रोए जा रहे थे और मेरा दिमाग काम करना बंद कर दिया था। मुझे याद है कि चेहरे पर 11 गोलियाँ लगने के बाद भी काफी निश्चलता थी, बॉडी भी सॉफ्ट थी। रात के 10:30 के आस-पास उनका अंतिम संस्कार किया गया। यह इंसानियत की मौत थी।”

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विकास कुछ प्रत्यक्षदर्शी के हवाले से बताते हैं कि आतंकवादियों द्वारा अशोक रैना की बस को गुल से 7 किलोमीटर पहले ही रोक लिया गया था। इसके बाद सभी हिंदुओं को बस से नीचे उतरने के लिए कहा गया। जब कुछ यात्रियों ने इसका विरोध किया तो आतंकवादियों ने कहा कि वो इन लोगों को नुकसान नहीं पहुँचाएँगे, उसके कमांडर सिर्फ इनसे बात करना चाहते हैं। उन आतंकवादियों ने यात्रियों को यकीन दिलाने के लिए पैगंबर मोहम्मद और कुरान की कसम भी खाई थी।

इसके बाद 6 हिंदुओं (4 कश्मीरी पंडित और 2 जम्मू के निवासी) को नीचे उतारा गया। इसमें से 2 यात्री भाग निकले। एक चट्टान कूदकर तो दूसरा पहाड़ों के ऊपर से भाग निकला। बाकी बचे चारों को वहाँ से 30 किलोमीटर दूर एक छोटी सी नदी के पास ले जाया गया और तीनों कश्मीरी पंडितों को गोली मार दिया गया, जबकि चौथे, जो कि जम्मू का था, उसे छोड़ दिया गया। मतलब साफ है- उनका निशाना कश्मीरी पंडित थे। आतंकवादियों ने जिन कश्मीरी पंडितों की हत्या की, उनके नाम हैं- अशोक कुमार रैना (प्रिंसिपल), रविंद्र काबू (लेक्चरर) और सुशील पंडिता (सीनियर टीचर)। विकास कहते हैं कि ये एक पूर्व-नियोजित टारगेटेड हत्या थी। उनके पिता की हत्या इसलिए की गई, क्योंकि वो एक कश्मीरी पंडित थे। उन्होंने कहा कि इस जघन्य अपराध को हिजबुल मुजाहिद्दीन और अमानुल्लाह गुज्जर ग्रुप के बिल्लू गुज्जर ने अंजाम दिया और इस दंश वो आज भी झेल रहे हैं।

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‘पूरी कॉन्ग्रेस पार्टी सिंधिया जी के साथ’ – ज्योतिरादित्य के मीटिंग छोड़ चले जाने के बाद सीनियर नेता का बयान

मध्य प्रदेश में मुख्यमंत्री कमलनाथ और कॉन्ग्रेस पार्टी के वरिष्ठ नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया के बीच चल रही खींचतान अब मुखर होकर सामने आ गई है। शनिवार (फरवरी 15, 2020) को दिल्ली में वैसे तो सरकार और संगठन के बीच आपसी समन्वय को मजबूत बनाने के लिए मध्य प्रदेश कॉन्ग्रेस ने बैठक रखी थी, लेकिन इसमें तल्खी इस कदर दिखी कि सिंधिया बैठक को बीच में छोड़कर चले गए। वहीं कमलनाथ भी सिंधिया को लेकर सख्त दिखे। बैठक खत्म होने के बाद जब उनसे सिंधिया के सरकार के खिलाफ सड़क पर उतरने के ऐलान को लेकर सवाल किया गया, तो नाराजगी भरे अंदाज में उन्होंने इसका जबाब दिया और कहा, “तो उतर जाएँ।”

पार्टी के दोनों वरिष्ठ नेताओं के बीच तल्खी बढ़ने की खबर सामने आने के बाद कॉन्ग्रेस पार्टी के वरिष्ठ नेता डैमेज कंट्रोल में जुट गए हैं। साथ ही पूरे मामले से कॉन्ग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी को भी अवगत कराया गया है। इस बीच पार्टी के वरिष्ठ नेता और मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने कहा, “पूरी कॉन्ग्रेस पार्टी सिंधिया जी के साथ है। हम सबने घोषणा पत्र में मिलकर वादे किए थे। पाँच सालों में कमलनाथ जी सभी वादों को पूरा करेंगे। ज्यादातर वादों पर काम तेजी से चल रहा है।”

वहीं, मध्य प्रदेश के कॉन्ग्रेस प्रभारी महासचिव दीपक बाबरिया ने बताया कि बैठक में पार्टी नेताओं की बयानबाजी और अनुशासनहीनता को लेकर चर्चा हुई है, लेकिन बैठक में सिंधिया के बयानों को लेकर कोई चर्चा नहीं हुई। इस बीच उन्होंने ज्योतिरादित्य सिंधिया के बैठक छोड़कर जाने के सवाल पर उनका बचाव किया और कहा, “उनकी पहले से ही कोई बैठक तय थी, इसलिए वह जल्दी चले गए। उन्होंने शुक्रवार को मुझे बताया था कि उनकी शनिवार को 12 बजे दूसरी बैठक है, इसलिए वह मीटिंग से जल्दी चले गए।”

हालाँकि बताया जा रहा है कि कमलनाथ के घर पर हुई इस बैठक में सिंधिया के साथ कई मुद्दों पर नोंकझोंक हुई। इस बैठक में कमलनाथ और सिंधिया के अलावा पार्टी के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह, प्रदेश प्रभारी दीपक बाबरिया, जीतू पटवारी, अरूण यादव आदि मौजूद थे। इस बीच पार्टी समन्वय समिति की अगली बैठक में भोपाल में करने को लेकर भी सहमति बनी है।

उल्लेखनीय है कि इससे पहले ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कमलनाथ सरकार को चेतावनी देते हुए कहा था कि अगर मध्य प्रदेश की कॉन्ग्रेस सरकार घोषणा पत्र को पूरी तरह लागू नहीं करती है तो वह सड़क पर उतरेंगे। एक सभा के दौरान उन्होंने कहा था, “घोषणा पत्र का एक-एक अंश पूरा होगा और अगर ऐसा नहीं हुआ तो आपके साथ ज्योतिरादित्य सिंधिया भी सड़क पर उतरेगा।” इसके बाद इस पर कमलनाथ की भी तल्ख टिप्पणी आई, फिर सिंधिया बीच बैठक से निकल गए और फिर भी कॉन्ग्रेस कह रही है, “सब ठीक है।” 

सिंधिया ने कहा- वादा पूरा नहीं हुआ तो सड़क पर उतरेंगे, जवाब में कमलनाथ बोले – उतर जाएँ

राहुल गाँधी ने कहा था- मंदिर जाने वाले लड़की छेड़ते हैं, कॉन्ग्रेसी मंत्री ने कहा- तीर्थ पर घूमने जाते हैं बुजुर्ग

फैक्ट चेक: पुणे ट्रेन में हुई सागर मरकड की लिंचिंग में क्या कोई मजहबी एंगल भी था?

पुणे की ट्रेन में 26 साल के सागर मरकड की उसकी पत्नी और बच्चे के सामने पीट-पीट कर हत्या कर दी गई। यह दुर्भाग्यपूर्ण घटना मुंबई-लातूर-बीदर एक्सप्रेस में गत मंगलवार को घटित हुई, जिसमें एक छोटी सी बहस ने बड़े झगड़े का रूप ले लिया। अंततः 12 लोगों ने 26 वर्षीय सागर की लाठियों से पीट-पीट कर हत्या कर दी।

पीड़ित की पत्नी ज्योति के अनुसार ट्रेन का कोच पूरा भरा हुआ था। बैठने की भी जगह नहीं थी। इस कारण उसके पति ने कुछ औरतों से मेरे लिए बैठने की जगह बनाने की गुजारिश की। उन औरतों ने न केवल जगह बनाने से इंकार कर दिया बल्कि बहस भी शुरू कर दी। इसके बाद इन औरतों और उनके साथ यात्रा कर रहे पुरुषों ने सागर को लाठियों से पीटना शुरू कर दिया जिससे उसके पति की जान चली गई।

ज्योति बताती हैं कि कोच में सबसे मदद माँगने पर भी कोई उनकी हेल्प को आगे नहीं आया। बाद में रेलवे पुलिस उनके बचाव में आगे आई जिसने दौण्ड जंक्शन पर सागर को ट्रेन से उतार कर गंभीर हालत में अस्पताल में भर्ती करवाया, जहाँ डॉक्टरों ने उसको मृत घोषित कर दिया।

आजकल के दौर में जब आम लोगों और मीडिया बीच अविश्वास बढ़ता जा रहा है, ऐसी दुर्घटनाएँ तुरंत अफवाहों को हवा देने वाली साबित होती हैं। मीडिया की जिम्मेदारी है कि वह सही तथ्यों को सामने लाए। इस दुखद घटना के चर्चा में आने के बाद जब आरोपितों के मुस्लिम होने की अफवाह फैली, सोशल मीडिया यूज़र्स ने इस दुर्घटना पर दुख जताते हुए मीडिया को घेरना शुरू कर दिया कि वह किसी हिन्दू आदमी के मुस्लिम भीड़ द्वारा की गई लिंचिंग पर ही मौन रह जाता है।

हालाँकि इस घटना पर मीडिया के खिलाफ गुस्सा जाहिर करना अनुचित है। लेकिन मेनस्ट्रीम मीडिया इस मामले में इतनी बदनाम हो चुकी है कि कई बार उसको गैर वाजिब आलोचना का शिकार होना पड़ता है। ह्वाट्सएप पर वायरल हुए मैसेज में ‘बुरका’ पहने औरत को शिफ्ट होने को कहने पर उसके साथ चल रहे मुस्लिमों ने सागर नामक हिन्दू की पीट पीट हत्या कर दी की अफवाह चल रही है।

महाराष्ट्र के लोकप्रिय अखबार लोकमत के अनुसार लिंचिंग में दर्ज किए गए आरोपियों के नाम ताईबाई मारुति पवार (30), कलावती धोंडिबा चह्वाण (65), रुपाली सोमनाथ चह्वाण (21), गणेश शिवाजी चह्वाण (24), निकिता अशोक काले (35), जमुना दत्ता काले (20), ताई हनुमंत गणपत पवार (30), गंगूबाई नामदेव काले (40), सोनू आपका काले (24) हैं। इनके अलावा सोमनाथ नामक आदमी फरार हो गया है और एक नाबालिग लड़के से भी पुलिस पूछताछ कर रही है।

ठीक यही नाम महाराष्ट्र के दूसरे लोकप्रिय अखबार ‘साकल’ ने भी छापे हैं। इसके अलावा ऑपइंडिया ने स्वयं भी पुलिस से इन नामों की पुष्टि की है। इस हत्या में आरोपितों के मुस्लिम होने की अफवाहें हर लिहाज से गलत हैं, भ्रामक हैं।

इस तरह की अफवाहें इस बात की साक्ष्य हैं कि किस प्रकार लोगों और मीडिया के बीच अविश्वास बढ़ता जा रहा है। कई ऐसे उदाहरण दिए जा सकते हैं जहाँ मीडिया ने अपराधियों के मुस्लिम होने की बात को शरारतपूर्ण ढंग से न सिर्फ छुपाया, बल्कि उसे हिन्दू नाम देने का कुत्सित प्रयास भी किया। बतौर उदाहरण THE NEWS MINUTE ने मुस्लिम दोषी को हिन्दू नाम दिया था। साथ-साथ कई बार मुस्लिम मौलवियों द्वारा हत्या जैसे अपराधों में उन्हें ‘तांत्रिक’ लिखा भ्रम फैलाया गया, क्योंकि ‘तांत्रिक’ का अर्थ हिन्दू धर्म से संबंधित ‘तंत्र विद्या करने वालों’ से लिया जाता है।

जय श्रीराम से चिढ़े ‘मौलाना’ मुलायम के ‘टोंटी चोर’ पुत्र: पुलिस को हड़काया, युवक को सपाइयों ने पीटा

नाम: अखिलेश यादव। परिचय: यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री। पिता: मुलायम सिंह यादव। मुलायम सिंह दर्जनों रामभक्तों की लाश पर चढ़ ‘मुल्ला’ बने थे। बाद में कहा था- और भी मारते। मौलाना मुलायम कहे जाने पर खूब अघाते भी थे। बाद में बेटे अखिलेश ने ही बेदखल कर दिया। अखिलेश यादव चुनाव हारने के बाद जब मुख्यमंत्री आवास से रुखसत होने लगे थे तो नलों की टोंटी तक उखाड़ ले गए थे।

पिता-पुत्र दोनों तुष्टिकरण की राजनीति के जीवंत मिसाल हैं। इसकी मिसाल एक बार फिर शनिवार को तब देखने को मिली जब एक युवक को ‘जय श्रीराम’ कहने पर सपा के कार्यकर्ताओं ने पीट दिया। अखिलेश ने भी उन्हें रोकने की कोशिश नहीं की। अखिलेश यादव को तो राम का नाम इतना नागवार गुजरा कि इसके लिए एक पुलिस अधिकारी को सरेआम धमका भी दिया।

घटना कन्नौज की है। सपा के महिला सम्मेलन को अखिलेश यादव संबोधित कर रहे थे। तभी जनता के बीच से अचानक से गोविन्द शुक्ला नाम के एक व्यक्ति ने अखिलेश से बेरोजगारी पर सवाल कर दिया। इस पर अखिलेश ने डपटते हुए उससे पलट कर सवाल किया कि तुम किसके आदमी हो? कहीं भाजपा के तो नहीं हो? इतना कहने पर ही शुक्ला ने ‘जय श्रीराम’ का नारा लगा दिया। इसके बाद समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ताओं ने मौके पर ही उसकी पिटाई कर दी।

रिपोर्ट्स के अनुसार अखिलेश ने पुलिस से इस व्यक्ति को अपनी सुरक्षा में उनके पास लाने को कहा और मंच से ही आरोप लगाया- “दो दिन पहले ही उनके मोबाइल फोन पर एक भाजपा नेता ने उन्हें धमकी दी थी।
एक भाजपा नेता ने मुझे फोन और मैसेज कर जान से मारने की धमकी दी है। मेरी जान को खतरा है। धमकी का मैसेज मोबाइल में सेव है। एक-दो दिन में लखनऊ में प्रेस कॉन्फ्रेंस करूँगा।” उन्होंने कहा, “अब हमारी जन सभा में भी भाजपा वाले अपने लोगों को भेजकर माहौल बिगाड़ने की कोशिश कर रहे हैं।”, यादव ने आरोप लगाया कि उन्हें भाजपा वालों से खतरा है।

अखिलेश इतने पर ही नहीं रूके। मंच से ही पुलिस अधिकारी को हड़काते हुए कहा, “मैं पूछना चाहूॅंगा कि कितने स्टार हैं तुम्हारे ऊपर? यह (नारे लगाने वाला) आ कैसे गया यहॉं पर?” फिर कहा, “ऐसा है, जा नहीं सकता है, से काम नहीं चलेगा। आपकी सुरक्षा में ये आया कैसे यहॉं? क्या कर रहे थे आप? जाइए कप्तान साहब को लेकर आइए। अब हम यहॉं से तभी जाएँगे जब आप नारा लगाने वाले का नाम, पता और पिता जी का नाम दे दोगे।”

अखिलेश यादव
अखिलेश की सभा में जय श्रीराम कहने वाले की हुई पिटाई (साभार: हिन्दुस्तान)

अखिलेश यादव के इस बर्ताव की बीजेपी ने आलोचना की है। पार्टी प्रवक्ता शलभ मणि त्रिपाठी ने ट्वीट कर कहा है, “प्रभु राम के नाम से ऐसी नफरत तो मुगलकाल के कट्टरपंथी नवाबों को भी ना थी, हे राम!!”

जय श्रीराम नहीं बोलने पर समुदाय विशेष की पिटाई जैसे फर्जी प्रोपेगेंडा आप अक्सर सुनते रहते हैं। ऑपइंडिया ऐसे दुष्प्रचारों का लगातार तथ्यों के साथ खंडन करता रहता है। लेकिन, सच्चाई यह है कि जय श्रीराम कहने पर जब किसी की पिटाई होती है तो पूरा लिबरल गिरोह मौन हो जाता है। बीते ही साल पश्चिम बंगाल के दक्षिण 24 परगना जिले के बारुईपुर में जय श्रीराम बोलने पर भाजपा कार्यकर्ता को कुछ लोगों ने दिनदहाड़े गोली मार दी थी। आरोप टीएमसी कार्यकर्ताओं पर लगा था।

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असलम ने सोनू बन की शादी, 6 साल बाद राज खुला तो भाइयों संग मिल पत्नी को प्रताड़ित किया

उत्तर प्रदेश में मजहब छिपाकर एक महिला से शादी करने का मामला सामने आया है। जब राज खुला तो आरोपित ने अपने भाइयों संग मिलकर पत्नी को प्रताड़ित किया। मामला बस्ती का है। महिला के मुताबिक उसे पति के मजहब का पता तब चला जब वह शादी के करीब छह साल बाद ससुराल आई। पीड़िता ने इसका विरोध किया तो उसे जमकर प्रताड़ित किया गया और गला दबाकर मारने की कोशिश की गई।

ऑपइंडिया ने जब इस मामले बस्ती के कोतवाली पुलिस स्टेशन से संपर्क किया तो बताया गया कि महिला की शिकायत पर असलम सहित चार के खिलाफ मामला दर्ज किया गया। पुलिस मामले की जॉंच कर रही है। पुलिस ने बताया कि महिला की शादी 6 साल पहले असलम से हुई थी। दोनों का 3 साल का एक बच्चा भी है। पीड़िता का आरोप है कि असलम ने अपना नाम सोनू बताकर उससे नजदीकियाँ बढ़ाईं और शादी कर ली।

पुलिस ने बताया कि असलम से शादी के पहले पीड़ित महिला की शादी संतोष नामक व्यक्ति से हुई थी, जिससे उसके दो बच्चे हैं। बाद में महिला और संतोष के बीच अनबन हो गई। इसके बाद महिला अलग रहने लगी। तभी असलम ने मौका देख सोनू बनकर महिला से सहानुभूति जताने के बहाने नजदीकियाँ बढ़ाई और उससे शादी कर ली। पुलिस के अनुसार शादी के बाद आरोपी महिला को लेकर किराए के मकान में रहने लगा। कुछ ही दिन पहले वह महिला को लेकर कसाईबाड़ा स्थित अपने घर आया था। तब महिला को उसके मुस्लिम होने का पता चला।

पीड़ित महिला ने अपने आरोप में कहा है कि जब उसने इस धोखाधड़ी का विरोध किया तो उसके पति सोनू उर्फ़ असलम और उसके भाइयों ने उसे मारा-पीटा और गला दबाकर जान से मारने की कोशिश भी की। कोतवाल ने बताया कि इस मामले में महिला के पति सोनू उर्फ़ असलम, उसके भाई रज्जाक, भाईजान और मो. इस्लाम के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया गया है और पूरे मामले की तफ्तीश की जा रही है।

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पुलवामा हमले की बरसी पर 3 कश्मीरी छात्र ने लगाए ‘पाकिस्तान ज़िंदाबाद’ के नारे, कुटाई के बाद गिरफ्तार

पुलवामा में बीते साल 14 फरवरी को आतंकी हमले में 40 जवान वीरगति को प्राप्त हो गए थे। हमला सीआरपीएफ के काफिले को निशाना बनाकर किया गया था। इसकी पहली बरसी पर पूरे देश ने जान गॅंवाने वाले जवानों को नमन किया। लेकिन, एक वीडियो सामने आया है जिसमें कुछ लोग पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगा रहे हैं।

वीडियो में नजर आने वाले तीनों लोग कश्मीर के हैं। कर्नाटक के हुबली स्थित एक कॉलेज में तीनों पढ़ते हैं। वीडियो वायरल होने के बाद नाराज लोगों ने कश्‍मीरी छात्रों की पिटाई की। बाद में पुलिस ने इन छात्रों को गिरफ्तार कर लिया। हुबली-धारवाड़ के पुलिस कमिश्नर ने बताया कि मामले की जानकारी होने पर तीनों को गिरफ्तार कर लिया गया। उनके कॉलेज ने भी शिकायत दर्ज कराई है। मामले की जॉंच की जा रही है।

रिपोर्ट्स के अनुसार, तीनों आरोपी लड़कों को पुलिस ने अपनी हिरासत में ले लिया है। ये केएलई इंजीनियरिंग कॉलेज में पढ़ते हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार, व्हाट्सएप्प पर वीडियो आने के बाद लोगों ने कॉलेज में घुसकर इन छात्रों की पिटाई भी की।

इस वीडियो के बीच में एक छात्र आजादी के नारे भी लगाते हुए सुना जा सकता है। इन तीनों के नाम आमिर, बासित और तालिब हैं। पुलिस के अनुसार, ये इंजीनियरिंग कॉलेज में सेकेंड ईयर के स्टूडेंट हैं और कॉलेज हॉस्टल में ही रहते हैं। सोशल मीडिया पर वायरल हुए वीडियो में तीनों अपना नाम बता रहे हैं। जिस वीडियो के लिए इन तीनों छात्रों की धुनाई के बाद गिरफ्तारी हुई है, उसके बैकग्राउंड में गाना बज रहा है- “खाई है ये कसम, खाई है ये कसम, सुन ले दुश्मन सभी, है ये दिल की सदा.. पाकिस्तान जिंदाबाद, पाकिस्तान जिंदाबाद।”

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शशि थरूर ने मोदी को बताया था ‘शिवलिंग का बिच्छू’, हाजिर न होने पर कोर्ट ने लगाया 5 हजार का जुर्माना

अक्सर अपने विवादित बयानों को लेकर चर्चा में रहने वाले कॉन्ग्रेस सांसद शशि थरूर पर दिल्ली की एक अदालत ने मानहानि मामले में कोर्ट में हाजिर नहीं होने पर पाँच हजार रुपए का जुर्माना लगाया है। बीजेपी नेता राजीव बब्बर ने थरूर के ख़िलाफ़ मानहानि की याचिका दायर कर रखी है। कोर्ट ने कई बार कॉन्ग्रेस सांसद को नोटिस जारी किया। लेकिन नोटिस पर शनिवार को भी कोर्ट में पेश नहीं होने पाँच हजार रूपए का जुर्माना लगा दिया। दरअसल थरूर ने मोदी पर टिप्पणी करते हुए उनकी तुलना शिवलिंग पर बैठे बिच्छू से की थी।

इससे पहले पिछले वर्ष दिसंबर माह में मामले पर हुई सुनवाई को 15 फरवरी 2020 तक के लिए टाल दिया गया था। दिसंबर में भी कोर्ट ने थरूर को पाँच हजार रुपए की गारंटी जमा करने का निर्देश दिया था। वहीं कोर्ट ने भाजपा नेता राजीव बब्बर पर भी सुनवाई के दौरान मौजूद नहीं रहने पर 500 रुपये का जुर्माना लगाया था।

बीजेपी नेता बब्बर ने अदालत में शिकायत दायर करते हुए आरोप लगाया था कि थरूर ने अक्टूबर 2018 में बेंगलुरू में आयोजित एक कार्यक्रम में एक लेख का हवाला देते हुए एक विवादित बयान दिया था, जिसमें थरूर ने कहा था कि मोदी शिवलिंग पर बैठे बिच्छू की तरह हैं। कॉन्ग्रेस नेता के इस बयान के तीखी आलोचना हुई थी। उस समय बीजेपी नेताओं ने इस बयान के लिए माफी माँगने के लिए कहा था। हालाँकि थरूर ने ऐसा नहीं किया। इसके बाद ही बब्बर ने कोर्ट में याचिका दायर की।

आपको बता दें कि शशि थरूर तिरुवनंतपुरम से सांसद हैं। मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार में वे विदेश राज्यमंत्री भी रह चुके हैं। थरूर अक्सर बीजेपी और पीएम मोदी को लेकर बयान देते रहे हैं।

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पूरा जम्मू-कश्मीर भारत का नहीं? शशि थरूर ने भारत का ग़लत नक़्शा पोस्ट कर तो यही संदेश दिया!

पत्रकारिता के नाम पर बिग BC: पूछा- कैसे करें पेशाब, ट्विटर यूजर्स ने दिए ‘क्रांतिकारी’ जवाब

भारतीय मीडिया का एक वर्ग ऐसा भी है जिसे तैमूर के डायपर बदलने से लेकर शौच करने के तरीकों में दिलचस्पी है। कुछ लोग प्रोग्रेसिव होने का चोला पहनकर ऐसा करते हैं तो कुछ केवल प्रासंगिक बने रहने के लिए। लेकिन यदि बात मीडिया गिरोह के बीबीसी जैसे सदस्य की हो तो ऐसा दोनों कारणों से किया जाता है।

कश्मीरी आतंकी मोहम्मद मकबूल भट्ट का महिमामंडन करते हुए इसकी फाँसी पर मार्मिक साहित्य लिखना हो या फिर सेक्स जैसे मुद्दे हों, बीबीसी अपनी जिम्मेदारी से पीछे नहीं हटता। आज भी बीबीसी एक रिपोर्ट के जरिए बेहद क्रांतिकारी मुद्दा सामने ले कर आया है। मुद्दा है- “पुरुषों को बैठकर पेशाब करना चाहिए या खड़े होकर?”

इसके बदले में बीबीसी को जो प्रतिक्रियाएँ मिलीं, वो इस शीर्षक से भी ज्यादा ‘क्रांतिकारी’ हैं।

बीबीसी के इस सवाल की प्रतिक्रिया में ट्विटर यूज़र ने तुरंत मोर्चा संभालते हुए एक से बढ़कर एक क्रिएटिव जवाब देकर बीबीसी की मदद की। @Garima1907 ने इस खबर पर आपत्ति जताते हुए कहा कि यह किसी पुरुषवादी महिला द्वारा लिखी गई खबर है।

@sajidrazvi8 ने बीबीसी को जवाब में लिखा- “इस्लाम ने 1400 साल पहले ही बता दिया है बैठ कर पेशाब करना चाहिए, मुझे किसी से सीखने की ज़रूरत नही।”

इस पर @I_ThakurKhem ने जवाब में लिखा – “दुनिया 1400 साल से पुरानी हैं और हमारे पुरखे हजारों सालों से बैठ कर करते आ रहे हैं।”

देश के ‘लिबरल प्रोग्रेसिव विचारक वर्ग’ के बीच महिला-पुरुषों के ऐसे मुद्दे अक्सर चर्चा का विषय बनते देखे जाते हैं। यहाँ तक कि ट्विटर पर महिलाओं के भी खड़े होकर पेशाब करने के अधिकारों पर भी #peestandingup जैसे हैशटैग चलाए जा चुके हैं।

यह पहली बार नहीं है, या फिर इस प्रकार की रिपोर्टिंग करने वालों में बीबीसी ही अकेला नहीं है। बीबीसी की ही तर्ज पर दी लल्लनटॉप एक साल पहले इस तरह की रिपोर्ट शेयर कर चुका है। वैसे लल्लनटॉप एक बार हिटलर का लिंग भी नाप चुका है।

बिग BC का नया चुटकुला: ‘कन्हैया कुमार की लोकप्रियता से मोदी ही नहीं, पूरी सरकार चिंतित है’

बुर्क़ा होता है मुस्लिम महिला की पहचान, घूँघट से रहती है हिंदू महिला परेशान: BBC की बिग BC